Incest Pyaar - 100 Baar - Page 16 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 97

कलयुग का चक्रव्यूह


"मुझे तुमसे बात करनी है. क्या हम थोड़ी देर अकेले में बात कर सकते है अर्जुन?", दोपहर का खाना ख़तम करते हे अर्जुन उठने लगा था. सामने बैठी मंजू ने झूठ बोल दिए था के वह घर से हे खा के आई. इधर आरती ने भी खाने के बाद रसोई संभल ली थी. बर्तन, चूल्हे की सफाई और ललिता जी अपने कमरे में चली गई थी, क्योंकि वह हमेशा वही खाना कहती थी.

"तुम साथ हे चलने वाली हो स्टेडियम तोह हम वह बात कर लेंगे मंजू. अभी शरीर थोड़ा थका हुआ है और अगर आराम नहीं किआ तोह शाम की प्रैक्टिस प्रभावित होगी.", अर्जुन ने हलकी सी मुस्कान देते हुए मंजू को जवाब दिए और फिर अपने दादा जी के कमरे में आ कर लेट गया. मंजू अब थोड़ी और परेशां हो गई थी लेकिन वह जाहिर न करते हुए आरती के हे पास चली गई. अर्जुन हाथ के नीचे तकिया दबाये लेट चूका था.

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3 बज रहे थे और आमतौर पर गर्मियों के शुरुवात भी प्रदेश में थोड़ी तेज हे रहती थी इस वक़्त. Log-bag ऐसे समय gaanv-dehat में घर में अंदर रहते है या खेत में पेड़ के नीचे आराम करते है. लेकिन स्वर्गीय राममेहर के यहाँ इसके विपरीत माहौल था. सुशीला ने मोहर सिंह को कुछ जरुरी काम से अगले शहर भेज दिए था और इसके पीछे भी उसका मकसद कुछ और हे था. यहाँ गाँव के बहार एक पुराणी हवेली में वह 5 मर्दो के बीच अकेली महिला थी लेकिन देखने से यही प्रतीत होता था के सभी उसके शुभचिंतक हे थे.

"बेबे, इस बार कटाई काम ख़तम हे कर देना है. न यु रामेश्वर का झंझट आरर न तेरी सास चंद्रो का.", ये 45-50 साल का रोबीला अधेड़ सुशीला का ममेरा भाई था और जैसे करीबी राजदार.

"नरसिंघ, मेरी परेशानी की वजह है भीम, शबनम आरर बिजेन्दर. रामेश्वर का पौता तोह मारन खातिर 8-10 तैयार है लेकिन बिजेन्दर पहला उसके गइल अकेले भिड़ेगा बाद में भीम काम कर देगा उसका. लेकिन भीम चाहवे है आधी जायदाद, बबिता आरर मेनका. शबनम रांड है जो मेरे ख़याल से काल मैंने भी रस्ते से हटा सके है क्यूंकि सिर्फ मेरे धोरे हे उसके सबूत है.", बाकी पांचो ध्यान से देख रहे थे सुशीला को

"बिजेन्दर?", नरसिंघ ने इतना हे पुछा.

"वह बावला हो चुक्या है. बबिता पसंद है आरर शादी की ृत्त लाग ऋ है उसके."

"बेबे, ज़िंदा गाड़ द्यूंगा जे उसने कोई ऐसी हरकत कारन की सोची भी. नाम माटी में मिलावेगा कुनबे का आरर बिरादरी का.", ये तोह पल में हे अंगारे सा दहकने लगा था और बाकी सबके भी चेहरे वैसे हो गए थे.

"शांत रह. 2 साल जेल में भेजन की सोचु थी आरर इतनी देर में बबिता का ब्याह भी कड़े कर हे देवांगे अपनी पहचान में. तू आरर थाम बाकी सब ध्यान डीओ के जगह पे 6 बजे पहुंचना है. भीम का काम ख़तम करना है आरर फेर उस छोरे की लाश रामेश्वर की गली में फेंकनी है. शबनम हाथ चढ़े तोह ससुरी कर डीओ साफ़ वाह भी.", सुशीला सच में हे जहर उगल रही थी. उसका इरादा हे नहीं था किसी को भी छोड़ने का.

"बेबे फेर बिंदु ने के कह्वेगी?", ये एक और तगड़ा सा अधेड़ था जो कुर्सी पर बैठे हुए भी बाकी सबसे 5-6 इंच ऊँचा हे था.

"काले, एक काम कर फेर बिजेन्दर ने भी काट दिए आरर मेनका ने भी. साला साबुत ऐ कोणी छोड़ना आरर अर्जुन शर्मा बी गोदाम में मारा मिलेगा तोह अपने आप मामला हवा पकड़ लेगा.", सुशीला ने एक पाँव कुर्सी के ऊपर रखते हुए ठुड्डी के नीचे हाथ लगा लिए.

"बहोत दूर की सोचहि से तन्ने. मेनका का चक्कर पंडित के पौटे से, बिजेन्दर का शबनम गइल आरर भीम ने बदले के चक्कर में यु कर दिए लेकिन मारा गया उनके साथ हे. चोखी कहानी मिलेगी या तोह. लेकिन बाकी सब ध्यान रखिओ के कोई सा किसी की नजर में ना चढ़ जे. पहला हे साली पुलिस कुत्ते की तरह पाछे लाग ऋ है.", नरसिंघ के पल्ले ये खुनी काण्ड पड़ गया था.

"फेर एक छोटा सा काम रह्वेगा लेकिन वह तोह मैं आप कर लियुंगी. बिंदु की दूसरी छोरी मुस्कान के भी पारर काटने पड़ेंगे, जाने वाह भी बहोत कुछ है.", सुशीला क्या करने वाली थी ये तोह बस वही जानती थी लेकिन कितनो को मौत देने का इरादा बनाये थी ये खतरनाक बात थी.

"वह भी हो जे गए बेबे. तू 13 दिन दुःख में बिता के फेर कुनबा कत्था कर लिए. महारा भी सबकुछ तेरा है, राममेहर फूफा का भी आरर तेरी ससुराद का भी. 40 गाम कब्जे में आये पाछे तोह तू हे टिकट लेवे गई. फेर मैं देखु उस डॉक्टर ने आरर उसके घर की लुगाईया ने.", नरसिंघ की ऐसी बात सुनकर सुशीला हंसने लगे.

"मैंने याद है के तेरी नजर उसकी लुगाई पे है. याद भी है कितने साल पहला देखि थी.?

"ाहो. आज लाक याद है वाह आरर सच कहु तोह इतनी जानलेवा औरत न देखि बेबे कड़े.", नरसिंघ जैसे यादों में रेखा जी का चेहरा ध्यान करने लगा था.

"चाल वा सब बहोत दूर की बात है. फ़िलहाल तोह आज की घडी ध्यान में राखो. थोड़ी सी भी चूक होइ और सारे सपने ख़तम.", सुशीला वह से कड़ी हो कर पैदल हे गाँव की तरफ चल निकली.

"नरसिंघ, अपनी बात याद रखिये. मैं यु काम की कीमत लेके रहूँगा. तू मुकर कोन्या सकदा.", साथ हे बैठे इतनी देर से शांत इस लम्बे चौड़े अधेड़ की बात सुन्न कर नरसिंघ दांत दिखने लगा.

"भाई सुशीला की लेनी है ने? ले लिए. याद रखिओ कोई सा नई बचना चाहिए सुशीला ने छोड़ के. रात ने हवेली भी साफ़ कर देनी है.", नरसिंघ की ऐसी बात पर वह लम्बा व्यक्ति बोल उठा.

"बबिता की पहले मारूंगा फेर उसने मारूंगा. थाम लोग भी देख लिओ 3-4 है उनकी हवेली में. जुन्न सी हाथ चढ़े कोई रेहम नई आरर जितना दिल कर कार्यो फेर ..... समझदार हो कुणसा पहली बार करोगे. हाहाहा.", काला दिल और मैं का भी कला हे था और इन सबमे कही ताक़तवर. ये दूसरे रस्ते से चल पड़े तैयारी करने के लिए.

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"गोलू भाई, के लगे है के जो भी हों लाग रहा है वह ठीक से? मां की बात सच्ची है लेकिन दूसरी तरफ माँ है मेरी. उसने बीच मई कोंनी छोड़ू.", बिजेन्दर 4 बजे हे गोदाम में आ चूका था और ये जगह अब पहले सी dhool-mitti वाली से विपरीत अंदर से साफ़ सुथरी दिख रही थी.

"मैं सलाह कोंनी दे सकू भाई बस इतना कहूंगा के ज़िन्दगी में कड़े कड़े जरुरी नहीं के जो पैदा करे वह सही होव आरर जो नुक्सान करे वह गलत. मां भी शातिर है आरर ताई तोह खैर के कहु. फेर तेरा भीम के बारे में यु सब बताना तोह मैंने भी परेशान करे है यार. तू खुद सोच के मैं किसी छोरी गइल दुष्कर्म करू तोह तू के करेगा? अपनी आख्यान के स्यामि यु सब थोड़ी देर पाछे हों वाला है."

"गोलू तू कड़े एहसा कोणी कर सके और मैंने भी या हे बात परेशां कारन लाग ऋ है के वा मेनका भीम की सगी छोटी बेबे है आरर विधवा अकेली. अर्जुन ुस्ते प्यार करे है या वाह उस लड़के ने तोह बात सही है लेकिन भीम जो करेगा वह तोह हत्या तेह भी बड़ा अपराध से गोलू."

"भीम ने हम कोन्या रोक सकदे या बात ध्यान रखिये. दूसरी ताई खुद अगर यु कारवां लाग ऋ है तोह हम तोह khud-ba-khud शामिल हो गए अपराध में. वैसे यु खेल बड़ा है हमारी सोच से. वह तेरी इंग्लैंड वाली बेबे भी तोह जुगत भिड़ा ऋ होगी किम्मे?"

"हाँ, इस सबमे तोह वाह है हे लेकिन माँ के गइल मिलके व दादी चंद्रो का काम कारन ाली है. कुंण करेगा यु तोह बेरा भी कोणी आरर दादी के कुछ होया तोह माँ जो इतने साल से चाहवे है वह उसने मिल जावेगा.", दोनों कुछ पल खामोश से बैठ गए थे एक तरफ. कुछ पल शांति बरकरार रही और फिर सामने वाला शटर थोड़ा ऊपर हुआ और ये 4-5 लोग अंदर आ खड़े हुए.

"के हाल है भीम काका? Raam-Raam छोटी दादी.", शीला देवी और उसका भीमकाय बीटा भीम उनकी तरफ आ रहे थे. पीछे हे 3 और आदमी थे जो बिजेन्दर की नजरो में हे थे. तीनो हे sapaat-sakht चेहरे वाले लम्बे चौड़े. लेकिन यहाँ खड़े सभी में भीम अलग हे नजर आ रहा था. उसका देहाती लेकिन चौड़ा बदन बिजेन्दर से 25 हे था. सख्त चेहरे पर लम्बी घनी मूछे और गले में सोने का चौकोर कैसा ताबीज काले धागे में पिरोया हुआ. वह सचमुच हे जैसे महाभारत से निकल कर आ खड़ा हुआ था उनके सामने.

"दादी के होव है रे? तू मेरा hum-umar है आरर मेरी माँ काकी की. काकी बुलाये कर आरर आड़े तोह hal-chal बदलन खातिर कत्थे होये है फेर आराम तेह हवेली पे करेंगे साड़ी बात.", भीम इधर उधर देखने लगा फिर सीधा उस कमरे में घुस कर वह से लकड़ी का तख़्त कागज़ की तरह मुट्ठी में पकडे इस भीतर वाले पक्के गोदाम में बिछा कर उसपे बैठ गया.

"ठीक बात है.", बिजेन्दर को गुस्सा तोह आया लेकिन वह दूसरी तरफ देखने लगा जहा वह 3 आदमी अब साथ वाले खुल्ले कच्चे हिस्से की तरफ चल दिए थे. जैसे ये जगह उनकी हे थी.

"तेरी माँ कोणी आवे के बीटा?", शीला देवी भीम की बगल में बैठी इन दोनों को देखती हुई बिजेन्दर से पूछ रही थी.

"आवे है माँ भी काकी. शबनम बेबे ने लेके वाह आड़े ाँ हे वाली होगी.", भीम उसकी बात सुनकर मुस्कुराया और पिछले कमरे से सुशीला इधर हे चलती हुई आ कड़ी हुई. पीछे हे दुपट्टे से मुँह ढके शबनम कड़ी थी. ये गली वाला रास्ता था जो भीम को भी अभी पता लगा था.

"घनी लम्बी उम्र है तेरी सुशीला."

"बेरा नई उम्र लम्बी है या तेरी जुबान काली है शीला. चाल तू अंदर कमरे में आजा आरर भीम के इरादा है मेनका ने आड़े बुलाएं का? 5 बज चुके है सब निबटा के सफाई भी करनी पड़ेगी" सुशीला के बात पर भीम के एक आंख हलकी सी कांपने लगी थी.

"काकी, उसने आड़े का पता देना ठीक कोन्या आरर घर पे जा के था के लयाणा तोह खेल हे खराब कर देगा."

"मतबल? तन्ने किम्मे बदलाव किआ है के?"

"हाँ काकी जरुरी था बदलाव करना भी. लेकिन उसने खुद कोन्या बेरा के वाह आड़े अपने आप ाँ लाग ऋ है.", सुशीला अचरज से देखने लगी भीम को.

"चंद्रो एडमिट है हस्पताल में आरर आखिरी सांस लेवे है. लाड़ली ने देखे बिना न मरती और लाड़ली लिकड़ चुकी है सब भूल के अपनी बड़ी माँ तेह मिलान. आड़े से हे जावेगी.", भीम के चेहरे पर कुटिल मुस्कान आ चुकी थी. और बाकी सब उसको हैरानी से देख रहे थे सिवाय शीला देवी के. बिजेन्दर खून का घूँट पी के रह गया क्योंकि अब वह तीन आदमी भी उधर हे आ खड़े हुए थे.

"यु किस तरिया एकदम से?", सुशीला अब भीम की तरफ हे आ कड़ी हुई थी और शबनम कपडे के पीछे से हे मुस्कुराती सब देखने लगी.

"तेरे साथ वाली लोमड़ी से पूछ काकी, नजर तोह इसने रखवा राखी थी. मैं तोह माँ ने मिलवां लेके गया था. फेर हस्पताल से हे ऋचा ने फ़ोन लगाया महारे जाए बाद मेनका धोरे.", अभी भीम बता हे रहा था के सामने से मूर्छित हालत में मेनका को 2 लोग पकडे हुए अंदर चले आये. माथे पर खून बह रहा था जहा एक आदमी ने कपडा रखा हुआ था. भीम फुर्ती से खड़ा हो कर उन दोनों के सामने आ गया.

"भान के लोडे यो के कर दिए? तेरी माँ छोड़ू.", एक के गाल पर कस के झापड़ जड़ते हे वह जमीन पर जा गिरा. दूसरे ने खुद हे मेनका भीम की तरफ कर दी.

"रुकी कोणी भीम भाई साहब तोह गाडी के शीशे पे ईंट मारनी पड़ी. अपना एक आदमी तोह गाडी के नीचे भी आ गया. लेकिन या बस बेहोश हुई है.", भीम पल में हे ठंडा हो गया था.

"किसी ने देख्या आरर गाडी?"

"किसे ने कोणी देख्या भाई जी. कोई आवे हे कोणी आड़े और गाडी बहार कड़ी है."

"अंदर कर तौली उसने. माँ ले लोडे कोई काम सही तेह नई करदे. इसके कुछ होया तोह थारी माँ छोड़ दूंगा.", मेनका को फूल की तरह उठाते हुए उसने दीवान पर दाल दिए. भीम की हालत देखते हुए खुद सुशीला ने उसके माथे को साफ़ करते हुए घाव देखा और तकिया फाड़ के ढेर साडी रूई वह लगा कर सफ़ेद लीर से पट्टी बांध दी. इस दौरान शीला देवी और शबनम भी मदद कर रही थी. गाडी अंदर करते हे शटर ाचे से बंद कर दिए गया था. 10 मिनट बाद सबकुछ शांत हो चूका था.

"बोलू थी न के प्लान मत बदले कर. लेकिन तू कड़े सुने है आरर शबनम के जरुरत थी इस सबकी? बुढ़िया मारनी थी तोह मार देती लेकिन सब एकसाथ नहीं करना था.", सुशीला जबड़े भींचे बोलने लगी तोह भीम भी नजरे झुकाये खड़ा हो गया.

"मौसी, मैं मेरा काम कर रही हु. अगर भीम ने ऐसे मेनका को उठाना था तोह मैं इसको भी नहीं बताती ये बात. लेकिन परशान मत हो आप. ये जगह ऐसी है के लोग इधर आने से कतराते है और भीम भी की कोई बचा तोह है नहीं. अब आपका काम कितना हुआ है?", शबनम पर जैसे कोई प्रभाव हे न पड़ा था सुशीला के क्रोध का. वह बिजेन्दर को देखने लगी तोह जैसे बिजेन्दर को कुछ पता हे न था.

"देखे के है be-akal. तेरा काम कोणी होया. 6 बजन वाले है आरर दुश्मन का किम्मे पता कोणी.", सुशीला के गुस्से के बावजूद बिजेन्दर शांत हे रहा.

"ताई वह भूरा उसने लें गया था 4 बजे. लेकिन स्टेडियम से छोरा साढ़े 5 या 6 बजे लिकडे करे है तोह थोड़ी देर में थारे सामने हे होगा.", गोलू की बात सुनकर भी सुशीला का गुस्सा काम न हुआ. लेकिन मेनका की कराह सुन्न कर एक बार फिर से सबका ध्यान उसकी तरफ हो गया. शीला ने झट्ट से मेनका के मुँह पर कपडा लगा दिए और सुशीला ने पीछे से बांधते हुए आवाज बंद कर दी. वह उठने की कोशिश करती उस से पहले हे पीछे से दोनों कलाई पकड़ कर भीम ने हाथ भी तकिये के कपडे से कस कर बांध दिए.

"मुँह बांधने की जरुरत नहीं है वैसे. दोनों तरफ खंडहर है और पीछे वाली गली भी वीरान है. बिपास यहाँ से 5 किलोमीटर है जहा शहर की आखिरी चालू ईमारत है.", बिजेन्दर मेनका की आँखों में ज़माने भर का दर्द देख रहा था. वह चटपटा भी नहीं प् रही थी.

"खोल दूंगा बेबे. सब खोल दूंगा और तू चाह के भी नहीं चीखेगी.", भीम की ऐसी बात सुनकर खून साणे चेहरे पर वही खौफ के भाव आ गए जैसे उसको उम्मीद थी.

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"चलता हु भाई बस बहुत प्रैक्टिस हो गई.", इधर अर्जुन पसीने में लथपथ अपना अभ्यास ख़तम करता हुआ बेंच पर बैठ कर ग्लूकोस पी रहा था और बलबीर उसको आज रुकने के लिए मन रहा था.

"भाई 7 से 10 का शो है. चल न यार, सुमन जभी चलेगी अगर मंजू साथ जाएगी तोह."

"तोह भाई मंजू को ले जाओ यार. लेकिन मेरे घर आज कोई नहीं है तोह जाना जरुरी है. ताईजी अकेली होंगी.", अर्जुन फिर कपडे बदलने अंदर चल दिए और बलबीर भी. कुछ समय बाद हे दोनों साफ़ कपड़ो में पटरी पर चलते हुए स्टैंड की तरफ जा रहे थे.

"अर्जुन, सुनो जरा.", मंजू ने पास आते हुए कहा तोह बलबीर थोड़ा पीछे हो गया.

"मेरे साथ चलो, जरुरी बात है.", इस बार वह थोड़ी धीमी आवाज में अर्जुन का हाथ पकड़ कर आगे ले जाने लगी.

"चलते है परेशां क्यों हो रही हो.?", अर्जुन ने आराम से जवाब दिए और बलबीर को जाने का इशारा करता वह मोटरसाइकिल निकल कर मंजू को पीछे बैठने को बोलै. अभी दोनों स्टेडियम से निकल कर पहले चौक पर हे आये थे की ये तगड़ा पहलवान अर्जुन के हाथ में कागज पकड़ता एक तरफ जा कर खड़ा हो गया.

'चुपचाप गाडी में बैठ. मेनका', अर्जुन ने स्टैंड लगते हुए वही मोटरसाइकिल कड़ी कर दी. अपना बैग मंजू को देता वह होंठो पर ऊँगली रखने के बाद उस लड़के के बराबर कड़ी काले शीशे वाली जेन कार की तरफ बढ़ गया. मंजू के चेहरे पर एक डर साफ़ झलक रहा था. लेकिन गाडी को जाते देख वह बस नंबर पढ़ सकीय. अर्जुन को उसने आगाह भी किआ था के मेनका के साथ उसकी भी जान खतरे में है लेकिन वह फिर भी उसकी बात maan-ne की बजाये मनमानी करता रहा. अब आफत आ हे चुकी थी.

'Beep-Beep' की इस धीमी आवाज को सुनते हे मंजू होश में आई. वह अभी भी मोटरसाइकिल के पास हे जमी हुई कड़ी थी लेकिन बैग के अंदर से आई इस आवाज ने उसका ध्यान भांग किआ. तुरंत चैन खोलती वह ऊपर वाली जेब देखने लगी. यहाँ एक कागज़ और ये छोटा सा यन्त्र था कैलकुलेटर जैसी स्क्रीन वाला. 'इस नंबर पर फ़ोन करो.' मोटोराला लिखा ये कला सा यन्त्र एक सन्देश दिखा रहा था और मंजू ने वह कागज देखा तोह वह भी एक और नंबर लिखा था जिसके नीचे अर्जुन का सन्देश था.

'परेशां मत होना और इस पर फ़ोन करके बता दो अर्जुन निकल गया है. स्टेडियम के गार्ड रूम से फ़ोन करके तुम घर चली जाना. लव यू.", मंजू भौचक्की रह गई ये पढ़ते हे. मतलब अर्जुन पहले से तैयार था और वह खुद हे मंजू को दूर रखे थे.

"आप फ़ोन कर लीजिये. मोटरसाइकिल मैं पंहुचा दूंगा.', ये 6 फ़ीट का सफ़ेद कमीज और नीली पतलून में खड़ा व्यक्ति मंजू के लिए किसी जीन की तरह था. जाने कहा से एकदम आया और अर्जुन की मोटरसाइकिल लेकर यूनिवर्सिटी की तरफ चला गया. मंजू भगति हुई स्टेडियम की तरफ उड़द चली.

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हाथ बांध दो लेकिन आँखें क्यों बंद कर रहे हो भाई? मैं इतनी शराफत से तोह साथ चल रहा हु तुम्हारे.", अर्जुन के दोनों हाथ नायलॉन की डोरी से बांधने के बाद उसकी अगल बगल बैठे पहलवानो ने बिना कुछ जवाब दिए सफ़ेद कपडा आँखों पर बांध दिए.

"ाची बात है.", अर्जुन मुस्कुराता हुआ आराम से पीठ सीट पर टिकता बैठ गया. वह दोनों पहलवान थोड़ा हैरान थे की यहाँ वह अपहरण करके ले जा रहे है और ये लड़का उन्ही पर मुस्कुरा रहा है.

"भूरे, इसका के चक्कर है?"

"भाई सुशीला तै ने इसका काम करना है. मैं तोह जानू हु के लड़का शरीफ है पर के कर सका है.?", ये गाडी चलता हुआ पहलवान जैसे हमदर्दी जाता रहा था अर्जुन के साथ.

"वैसे भैया आप थोड़े दिन पहले अपने दोस्त के साथ मुझे हे देखने तोह आये थे स्टेडियम. वह माजरा अलग था न.?", अर्जुन की बात सुन्न कर एक पल को वह चुप रहा फिर बोलै.

"ग़लतफहमी हो गई थी छोटे भाई. नजर मारने आये थे के वह लड़का कौन है जिसने बिजेन्दर भाई पर हाथ उठाया था.", भूरा देसी भाषा की जगह सरल हिंदी में जवाब देने लगा.

"ग़लतफहमी नहीं थी आपकी. मैं हे था जिसने बिजेन्दर पहलवान पर हाथ उठाया था जब वह विकास भाई से लड़ने आये थे.", अर्जुन के इस खुलासे से चारो एक पल उसको देखने लगे फिर भूरे ने नजर सड़क पर कर दी. हल्का ubad-khabadd रास्ता था ये बाईपास शुरू होने पर.

"मौत इन्तजार कर रही है और तू यहाँ डींगे हक रहा है. बिजेन्दर बीच से चीयर के रख देगा तुझे लेकिन वह नहीं मारने वाला. पर और बहोत लोग है ऐसी इत्छा लिए वह.", अर्जुन खामोश हो गया था अब. जैसे उसका ध्यान माहौल को समझने में रम चूका हो. बाकी सब भी आगे कुछ नहीं बोले. ये छोटी सी गाडी अंदर से जानदार हे थी. और जल्द हे वह पलभर के लिए रुकी. आगे से बायीं तरफ का दरवाजा खुलने और बंद होने की आवाज के बाद 30 सेकंड बाद हे थोड़ा आगे चलती फिर बंद हो गई.

"निकालो रे बहार इसने. अपना काम ख़तम तोह आड़े रुकने का कोई फायदा नहीं.", लेकिन भूरे की बात ख़तम हुई हे थी की उसको एक तरफ धकेलता हुआ भीम आगे बढ़ा और अर्जुन की गर्दन पकड़ कर उसको जमीन पर गिरा दिए.

"कोई कही न जा रहा जितने काम ख़तम न हो जाता. इस बहनचोद की छाती मैं सबके सामने पडूंगा.", अर्जुन आँखों पर बंधी पट्टी के साथ हे उठने लगा था के पीठ पर एक तेज प्रायः किआ भीम ने और एक बार फिर वह जमीन पर जा लगा.

"भीम, यु मेरा आरर इसका मामला है. तू बाद में देखिये.", बिजेन्दर दोनों के बीच आ खड़ा हुआ था. भीम एक बार उसको अपनी आग उगलती आँखों से देखने लगा फिर सुशीला को. बिजेन्दर ने अर्जुन की आँखों से पट्टी खोली हे थी की सुशीला भी इधर चली आई.

अर्जुन के होंठ और माथे से हल्का खून आ रहा था. उसका चेहरा ऊपर करती वह गुस्से से अर्जुन को देख रही थी.

"बिजेन्दर मैं तोह कहु सु के भीम ने हे यु ख़तम कारन दे. तू एक तरफ हो जा."

"न माँ. शंकर आरर मेरे बाप में भी मुकाबला होया था आरर आज मैं भी इसके खून की गर्मी देखना चहु हु. बाद में भीम जो मर्जी करे इसके साथ लेकिन मौका जरूर दूंगा इसने मैं.", बिजेन्दर अपनी बात कह रहा था उधर अर्जुन से 40 फ़ीट दूर मेनका के गले पे चाक़ू रखे शीला देवी कड़ी थी. अर्जुन के हाथ खुलने के बावजूद बंधे हुए थे.

"बेबे, अगर तू मेरी बात मान लेती तोह मैं इस सब में ना पड़ता. खैर तू दगाबाज हो गई तोह के बात लेकिन मैं पहले इसने मारूंगा फेर इसकी लाश के बगल में तेरे से प्यार गइल अपना नया रिश्ता बनाऊंगा. आशिक़ है न तेरा यु? भाई में के कमी थी जो यु पसंद किआ.", भीम चलता हुआ मेनका के पीछे आ खड़ा हुआ और शीला देवी एक तरफ हो गई. गर्दन पर चाक़ू अब भीम रखे हुए था. मेनका की मुँह पर बंधी पट्टी हटते हुए वह हंस रहा था.

"अर्जुन.. मुझे माफ़ कररर दो.. भैया आपने जो करना है मेरे साथ कर लीजिये. मैं साथ जाने को तैयार हु हमेशा के लिए. प्लीज इसको जाने दीजिये.", शीला देवी न एक करारा झापड़ मेनका के मुँह पर जड़ दिए उसकी बात सुनते हे.

"हरामजादी महीना न होया विधवा होये और यार बनाये बैठी है. इतनी खाज थी तोह मैंने कहती तेरे पे यु सांड मैं खुद चढ़वा देती. यु रामेश्वर का पिल्ला पसंद आया तन्ने.", मेनका के होंठ से खून की बून्द थोड़ी तक आने लगी थी और अर्जुन के चेहरे पर हल्का सा दर्द उभर आया. वह जमीन पर घुटने टिकाये खामोश सा आँखों को बंद किये बैठा रहा.

"देख जरा शंकर का नकली खून. यु पसंद आया था जो न मुअकबला कारन ने तैयार लागे है आरर न तेरी खातिर एक लफ्ज़ लीकडया इसके मुँह से.", सुशीला जाने किस बात पर भड़क उठी थी जो एक तरफ रखा डेढ़ इंची का लोहे का पाइप अर्जुन के सर पर मारती उसके सामने थूक कर आगे बढ़ गई. सर इस चोट से कुछ पल के लिए जमीन पर टिका लेकिन टपकते खून के साथ हे वह फिर से चेहरा सामने करते हुए उन्हें देखने लगा. पाइप जैसे उतना मजबूत न था या अर्जुन का सर पत्थर होगा. खून तोह निकला था लेकिन कोई बड़ा घाव जैसे कुछ न हुआ.

"जब सब थक्क जाओ तोह बता देना.", अर्जुन ने मेनका के सुबकते हुए चेहरे को देखते हुए बस इतना हे कहा.

"पूरे 5 मिनट है तेरे पास. या तू मैंने मार दे अर्जुन या मैं तेरा हाल खराब कर दूंगा. बाद में तेरा तोह निश्चित है मरना.", बिजेन्दर ुको खड़ा करने के लिए बाजू पकड़ कर ऊपर उठा रहा था लेकिन जैसे शरीर में जान न थी या अर्जुन अचानक से चट्टान बन्न गया. अर्जुन ने इस पल में बिजेन्दर को जैसे देखा वह पहले थोड़ा झेंप सा गया फिर अर्जुन की आंखों में जलालत देखते हे उसकी छाती में घुटना मारता हुआ चीखने लगा.

"तू घाना अकड़े है? मैं सोचु था के तू समझ दर होगा लेकिन तू मरना हे चाहवे है." जमीन पर गिरे अर्जुन को घसीट कर वह गोदाम और इस फर्श के बीच वाले मिटटी के हिस्से तक घसीट लाया.

"सुशीला बुआ, खुश तोह बहुत होंगी आप. अपने बेटे के साथ विश्वासघात कर सकती हो तोह बाकी जितने यहाँ है उनकी भी बलि चढाने का प्रबंध करके आई होगी.?" अर्जुन अपने होंठो पर आया खून मिटटी में थूकता हुआ सुशीला को देखने लगा. अर्जुन की ऐसी मुस्कान देख कर सुशीला का रंग उड़द गया था.

"के के बाके है तू? मौत सर पे कड़ी है और भाषण देवे है मैंने. कोई बुआ न लगती मैं तेरी."

"बबिता और बिजेन्दर का रिश्ता तोह कभी होने नहीं वाला, ये मूरख औलाद वैसे हे मेरे साथ म्हणत कर रहा है. और जो खुद लड़की के गर्दन पर चाक़ू लगाए खड़ा है वह खुद को भीम समझता है. थोऊ है ऐसे नामर्दो पर.", अर्जुन जमीन से उठ खड़ा हुआ था और कपडे झाड़ता बिजेन्दर को घूरने लगा.

"माँ यो किस तरह जाने है या बात? आरर यु तन्ने बुआ कहके बुलावे है मतलब झूठ तोह कोणी बोले है.", बिजेन्दर की बात ख़तम हुई और उधर से भीम सांड की तरह दहाड़ता अर्जुन पर लपका. मेनका की गर्दन पर कोई चाकू न था क्योंकि भीम अर्जुन पर उस से हे प्रहार करने लगा था.

'ढड्ढाममम", जिस रफ़्तार से भीम उसकी तरफ आया था उस से दोगुनी रफ़्तार के साथ वह जेन का शीशा तोड़ता हुआ उसके अंदर जा फंसा. अर्जुन की कलाई के ऊपर ये 2 इंच लम्बा घाव जरूर बन्न गया था लेकिन कोई परवाह न थी. बाकी सबका जैसे हलक सूख चूका था भीम की हालत देख कर. आनन् फानन में शीला देवी ने ये दूसरा चाक़ू मेनका की गर्दन पर कस दिए था. हल्का खून बहार चालक आया था वह से. अर्जुन एक बार फिर से असहाये हो गया था. जो 3 आदमी भीम के साथ आये थे अब अपना दम दिखते वह रूई की तरह अर्जुन पर laat-ghunse बरसते पिल पड़े. बिजेन्दर अपनी माँ को देख रहा था जो मुस्कुरा रही थी और मेनका का बेहटा खून देख जमीन पर गिरे मार कहते अर्जुन का उसके प्रति प्यार.

"बहनचोड़ दूर हत्तो. गोलू मार इन कमीं लोग ने.", बिजेन्दर झोटे की तरह उन तीनो से भीड़ गया था. और उसकी आवाज सुन्न कर इतनी देर से सर झुकाये खड़ा गोलू भी अपने दोस्त की राह पर चल दिए. भूरा और उसके दोस्त आगे आये और इधर एक के बाद एक 6 गोलियां उस रिवॉल्वर से छूट गई. शबनम के हाथ में धुँआ छोड़ती खली रिवॉल्वर थी और इधर जमीन पर भूरा, गोलू, भीम का एक आदमी और बिजेन्दर का वह पहलवान दोस्त जो अर्जुन को लेके आया था गिरे पड़े थे. शबनम कोई निशानची न थी लेकिन 6 गोलियों में 4 लोग उसने गिरा दिए थे. माहौल पूरा बदल चूका था. शबनम अभी भी ट्रिगर दबा रही थी इस उम्मीद से की कही से कोई और गोली चले और निशाने पर आया अर्जुन भी अपने अंजाम तक पहुंच जाए.

"शबनम दीदी. ये काम आपने आते हे क्यों नहीं कर दिए था? ये सब बेवजह मारे न जाते.", अर्जुन में उठने की ताक़त न थी लेकिन वह गर्डर उठता हुआ शबनम को जैसे जलील कर रहा था.

"मिन्दे, अपनी रिवोलेर लिकड़ के ले आ. साले सारे मारने है ये. कोई बचके न जा सके.", भीम जैसे तैसे बहार निकल कर गाडी पकडे खड़ा था. अपने एक आदमी से उसने पहले हे रिवॉल्वर प्लाट वाले हिस्से में रखवाई थी ये सोच कर की अगर कोई बहार आये तोह छत्त से हे टपका देना. वह आदमी भी फुर्ती से उस और भगा. बिजेन्दर जमीन पर गिरे अपने दोनों दोस्तों का सर थामे बैठा था. गोलू की सांसें चल रही थी क्योंकि गोली पेट में थी लेकिन भूरा शांत हो चूका था. एक गोली सीने में और दूसरी उसके दिल के ठीक ऊपर लगी थी. पक्का फर्श खून से ऐसे भरा था जैसे बाल्टी भर के वह उड़ेल दिए गया हो.

अगला दृश्य एकदम अलग था जहा भीम का मददगार जमीन पर रगड़ता हुआ अंदर आ रहा था और उसके आगे साढ़े 6 फ़ीट का ये दाढ़ी वाला 45-50 के करीब का यमराज सा आदमी जिसने मिन्दे की टांग पकड़ राखी थी.

"माहौल तोह ज्यादा खराब कर दिए तुमने सुशीला. और शीला वह चाकू हटा लो नहीं तोह सूनी मांग तुम्हारे हे खून से भरने में मुझे कष्ट नहीं होगा.", शीला और सुशीला के पसीने छूट गए थे अपने सामने इस पहाड़ को खड़े देख कर. भीम के दोनों आदमीओ के चेहरे पर सटीक गोली मरते हुए उसने अपनी बात पुख्ता कर दी थी की वह शबनम की तरह कोई कच्चा निशानची न था. शीला एक तरफ कड़ी हुई और शबनम ने इस तरफ से वह लोहे का पाइप पूरी जाने से इस व्यक्ति के सर पर मारने का उपक्र्रम किआ.

"जानती मुझे तोह ये चेष्टा नहीं करती लड़की. ये तिनके उमेद सिंह से टकरा कर मदद सकते है लेकिन हमें खरोच भी नहीं दे सकते.", शबनम को उसके हाल पर छोड़ता उमेद सिंह शेर सी चाल चलता बड़े आराम से बिजेन्दर के सर पर आ खड़ा हुआ.

"बीटा बहार गाडी कड़ी है और ड्राइवर भी. इसको हॉस्पिटल ले जाओ ये ज़िंदा है.", बिजेन्दर के आंसुओ से गीले चेहरे पर बड़े प्यार से हाथ फेरते हुए उमेद सिंह ने जैसे उसको हिम्मत दी और बाकी दोनों दोस्त भी तेजी से लपके. आनन् फानन में शटर खोलते वह गोलू को उठाये बहार निकल लिए.

"तोह भीम सिंह, बाज नहीं आते न तुम. हालत तोह तुम्हारी भी ठीक नहीं है लगता है किसी नए शिकारी से टकरा गए इस बार.", पहली बार चेहरे पर मुस्कान आई थी उमेद सिंह के और वह अपना भूरा ray-ban उतारते हुए भीम का चेहरा पकड़ कर ऐसे देखने लगे जैसे डॉक्टर मरीज का निरिक्षण कर रहा हो.

"अर्जुन, मेनका को खोल दो और इन तीनो को बांध दो. चलो फिर काम धंदा करते है, बहोत समय खराब हो गया.", उमेद सिंह ने उस चश्मे में हे प्रतिबिम्ब देखा था शबनम को जो भागना चाहती थी लेकिन आवाज और रिवॉल्वर अपनी तरफ देख कर वही ृक्क गई. अर्जुन हल्का सा लड़खड़ाता हुआ मेनका की और बढ़ा. रस्सी खोलते हे वह उसके गले लग चुकी थी. और यही उमेद सिंह से गलती हो गई जो वह बहार से आते इन 5 बदमाशों का न देख सका लेकिन फुर्ती से एक तरफ होता वह उनकी गोली से जरूर बच गया था. लेकिन शीला देवी इतनी खुशकिस्मत न थी. गले को चीरती वह गोली बहोत थी उसका शरीर जमीन पर गिराने के लिए.

नरसिंघ के पास पिस्तौल थी और बाकी 4 के हाथ में एक तलवार और 3 लोहे की रोड. और अपनी गोली का गलत निशाना देख कर वह भी गाडी के दूसरी तरफ चिप्पे उमेद पर 12-14 फ़ीट से गोली बरसाने लगा. उधर से भी 4 गोलियां चली जिसमे 2 लोग मारे गए, एक तोह वही था जिसको सुशीला चाहिए थी. नरसिंघ की बन्दूक से भी आखिरी गोली उमेद के पांव में जा घुसी थी.

"बच न सकता आज तू उमेद. गोली तेरी भी ख़तम आरर मेरी भी लेकिन तू अकेला है और हम 4.", नरसिंघ ने भीम को भी सहारा देते हुए उठा लिए था. काला उमेद की तरफ बढ़ा क्योंकि शरीर से वही था जो उमेद से टकरा सकता था, भीम की हालत दुरुस्त होती तोह शायद वह भी ऐसी हिमकर कर सकता था. लेकिन उन चरों का ध्यान अपनी तरफ बढ़ती मौत पर न गया जो तीनो महिलाओ को कमरे में बंद करने के बाद उनकी तरफ आ रहा था.

"उमेद तुम जैसे 4-5 पर नींद में भी भरी पड़ेगा हिजड़े. नरसिंघ नाम रखने से तू शेर नहीं बन्न ने वाला.", काले की तलवार का वॉर बचते हुए उमेद ने उसकी कलाई पकड़ ली थी लेकिन हवा में गूंजी इस चीख को सुन्न कर सभी इधर हे देखने लगे.

"वार सामने से करते है भीम, पीछे से गीदड़ हे झूठन चुराने आते है.", अर्जुन ने उमेद की तरफ लोहे की रोड लिए बढ़ रहे भीम सिंह को कमर से पकड़ कर उस गाडी के बोनट पर ऐसे दे मारा था के भीम की चीख में गाडी का टूटना भी सुनाई न दिए था. बचे हुए शीशे भी मिटटी की तरह हर तरफ बिखर गए थे और भीम कटे वृक्ष सा आधा बोन्नुत पर और आधा गाडी की छत्त फाड़े उसके भीतर. शरीर कुछ हिलने के बाद शांत हो गया था लेकिन अब नरसिंघ की कलाई अर्जुन के हाथ में थी. उधर उमेद भी कुछ जोश में काले की तलवार उसकी हे छाती के भीतर दाल चूका था.

2 और गोलिया चली जिसके साथ हे नरसिंघ जमीन पर गिर गया बिना अर्जुन की मार खाये और आखिरी वाला भागने से पहले हे जमीन सूंघ रहा था.

"छोटे पंडित, हमेशा देरी से हे आती है पुलिस. खैर तुम आये तोह अब सम्भालो ये सब. मैं निकलता हु.", संजीव भैया गंभीर चेहरे से अर्जुन को देख रहे थे, जो मुस्कुरा रहा था. उमेद सिंह संजीव को आँख दिखते हुए अर्जुन के सीने से लगते हुए बस इतना हे बोले, "नाज है तुझपे. मैसेज देरी से मिला उसके लिए सॉरी, वह चुनाव भी आ रहे है न."

"चाचा, फ़ोन करता हु सुबह.", अर्जुन ने भी संक्षिप्त सा जवाब दिए और वह अँधेरे में बहार निकल गए.

"ये सब मुझे मंजू के फ़ोन से पता चला. और दादाजी से तेरा पेजर नंबर. इतनी बड़ी वारदात तू अकेले करने निकल आया?", गुस्से में उन्होंने भीम के चेहरे में 2 गोलियां उतार दी थी.

"जेब देख लिए करो जरा अपनी. गाडी में बैठने से पहले मैंने कागज डाला था. सीक्रेट सर्विस वाले अंडरकवर.", अर्जुन उनके गले लगते हुए हंसने लगा. संजीव भैया बी अपने छोटे भाई की हंसी पर शांत हो गए थे.

"बाकी सब कहा है?"

"उधर बंद किआ हुआ है हाथ बांध के.", उनके साथ हे वह सुशीला और शबनम के पास आ गया जो जमीन पर बैठी थी, हाथ पीछे से बंधे थे उनके. और एक तरफ कड़ी मेनका के गले पर अर्जुन का रुमाल बंधा था.

"चल तू मेनका को ले कर निकल मैं इन्हे जरा ससुराल के दर्शन करवाता हु. वैसे तोह इरादा कुछ और है लेकिन कानून की हद्द में रहना ज्यादा सही रहेगा. घर पे ये अंडरकवर वाली बात."

"हाँ नहीं कहता मैं कुछ भी लेकिन अपने छोटे भाई से मत छुपाया करो इतना सब. रिवॉल्वर रखनी नहीं आती आपको अभी तक."

"तेरा पेजर है कहा? और ये इतना एडवांस्ड पेजर तेरे पास?", संजीव भैया सुशीला के पीठ पर रिवॉल्वर लगाए चल रहे थे और शबनम भी सेहमी हुई साथ हे थी.

"मेरे पास बहोत कुछ है लेकिन मनाही है. पेजर उमेद चाचा के कहने पर एक पोलिसवाले कल देके गया था और दादाजी को पता था. इसलिए सब घरवाले बहार हैं.", अर्जुन ने ये जोर का झटका दिए था संजीव भैया को.

"वो इस सब के बारे में जानते है? और उन्होंने तुझे इजाजत दी इस सबकी? बिना सोचे की तू इतना छोटा है और यहाँ जान जा सकती थी.", संजीव थोड़ा सकते में था.

"यहाँ और भी लोग है भैया. दूसरी बात उन्हें ये पता है के उमेद चाचा सब कर रहे है, मैं तोह सिर्फ छोटा सा प्यादा हु. समझ लो खबरि जैसा. इधर तोह मैं आया हे नहीं हु. आप उनसे भी यही कहेंगे.", अर्जुन ने बहार कड़ी जीप को देखा तोह थोड़ा सोचने लगा. फिर शटर के पास कड़ी बुलेट देख कर वह उसकी तरफ बढ़ा. ये बिजेन्दर की थी और चाबी उसमे हे लगी थी.

"किसी को मैं कुछ नहीं कहने वाला लेकिन तुझसे बहोत सवाल है मेरे. मंजू अगर फ़ोन न करती तोह यहाँ गड़बड़ हो जानी थी आज.", संजीव भैया ने दोनों महिलाओ को जीप के पीछे बैठने के बाद सीट के साथ हे एक एक हाथ उनके हथकड़ी से बांध दिए थे.

"मंजू न करती तोह भी आपके पास फ़ोन आता. वैसे पेजर देख लीजिये मैसेज जरूर होगा पूरे 6 बजे.", अर्जुन ने मेनका को अपने पीछे बिठाया और संजीव भैया अपने पेजर की हरी लाइट में वह सन्देश पढ़ने लगे.

"हम्म. तोह तुझे मेरा पेजर नंबर भी पता है?"

"आप आगे चलो मैं आराम से आता हु. सवाल मेरे भी बहोत है लेकिन फिर कभी बात करेंगे जब आपका दिल हो jeera-lemon पिलाने का. अभी मुझे कुछ काम है." , अर्जुन ने किक लगते हुए वह बुलेट स्टार्ट की और भैया गाडी में बैठ ने के साथ हे वायरलेस पर कोई सन्देश देने लगे. आज पहली बार वह अपना परिचय दे रहे थे. आईपीएस सजीव शर्मा. लाल बत्ती वाली वह जीप उनसे आगे चलने लगी थी और अर्जुन धीमी रफ़्तार से ये अलग तरीके की बुलेट चलता ठंडी हवा का लुत्फ़ लेने लगा.

"आज तुमने मुझे खरीद लिए अर्जुन. बेशक तुम मुझे फिर कभी मत देखना लेकिन मैं तुम्हे बचाना हे चाहती थी.", मेनका उसकी कमर में हाथ डाले भावुक हो गई थी और पछतावा भी था के इतना सबकुछ हो गया.

"ये ऐसे वक़्त पर भी रोने की वजह समझ नहीं आ रही. तुम मेरे साथ हो, दोनों ज़िंदा और सलामत. हमारे प्यार की वजह से देखो आज भीम सिंह भी नहीं रहे और तुम्हारी माँ भी. देखा जाये तोह तुम्हे मुझसे नफरत करनी चाहिए क्योंकि मेरी वजह से परिवार ख़तम हो गया तुम्हारा.", अर्जुन सपाट लहजे में कह रहा था. लेकिन मेनका जोर से उसकी पीठ से लिपट गई.

"आज मैंने देखा था तुम्हारी आँखों में. तुम अपनी जान भी देने को तैयार थे. कैसे कर सकते हो इतना प्यार वह भी ऐसी औरत से जो शायद तुम्हारी दुश्मन हे थी एक तरह से.", अर्जुन कुछ जवाब देता उस से पहले हे 'भदायकक.. chhrrrrrrrrrrr' का ये धमाका वातावरण को हिला गया. उनसे 500 मीटर दूर चल रही भैया की जीप इस बाईपास वाले मदद से विपरीत दिशा में उछलती हुई सड़क से परे घने वृक्षों में जा लगी. धमाके की गर्जना ऐसी थी की एक पल के लिए बुलेट भी अनियंत्रित हो गई लेकिन अर्जुन बदहवास सा खुद हे मोटरसाइकिल नीचे गिरता उस तरफ भागने लगा. स्थिति हर तरह से बेकाबू हो चुकी थी. उस सेंटर से उतर कर 3 लोग जीप की तरफ भद्द रहे थे जब तक अर्जुन वह पहुँचता एक आदमी ने ड्राइवर के भेजे में गोली उतार दी थी. दूसरा पीछे वाले हिस्से की तरफ जाता खली कनस्तर से जैसे पानी छिड़कने लगा था.

"संजीव कड़े गिरा है रे? उसने ज़िंदा नहीं छोड़ना.", वह आदमी आगे कुछ कहता उस से पहले हे 2 गोलिया उसके सीने में आ लगी उधर झाड़िओ से. बाकी दोनों भी उधर हे लपके लेकिन कोई और गोली चलती उस से पहले हे अर्जुन दोनों को लिए अँधेरे में कूद गया.

"कडाकक" की तेज आवाज और जंगल इस आदमी की चीख से गूँज उठा. अर्जुन ने रीढ़ का जोड़ हे टॉड दिए था. दूसरा संभालता उस से पहले हे उसका शरीर जीप पर जा गिरा.

"Bhaiya-Bhaiya..", अर्जुन पुकारता हुआ आगे बढ़ रहा था और सामने से कराहता हुआ संजीव पसलिया दबाये दूसरे हाथ में पिस्तौल के साथ रगड़ता हुआ आ रहा था. अर्जुन ने फुर्ती से उन्हें अपने कंधे पर डाला और सड़क की तरफ बढ़ने लगा. अँधेरे में दोनों भइओ के chehre-sar से खून बेहटा जमीन गीली कर रहा था. ये मजबूत सा हाथ अर्जुन के पाँव पर कैसा तोह वह जैसे नीचे बैठने लगा, लेकिन फिर खुद हे मुट्ठी खुल गई थी.

"मोहर सिंह.. मोहर सिंह है ये. अर्जुन ऐसे हम नहीं जा पाएंगे भाई.. तू जीप देख, मैंने वायरलेस किआ हुआ है. उन्हें बता इसके बारे में.", इधर मेनका भी आ कड़ी हुई थी. कुछ और न सूझा तोह अपने सर पर बंधी पट्टी और गले का रुमाल वह संजीव भैया के सर पर दबती हुई उनका खून रोकने लगी. किस्मत इतनी भी बेरहम न थी आज. अर्जुन की आँखों में आंसू देख शायद भगवन भी तरस खा गया था. लाल बत्ती की जीप और बड़ी वन मदद से इधर आती दिखी. अर्जुन अपने भैया को कंधे पे लिए ठीक सड़क के बीच खड़ा होता उनके सामने आ गया.

"इन्हे जल्दी हॉस्पिटल लेके चलो. और उधर जीप में देखो के कोई ज़िंदा है क्या.", अर्जुन की बात सुन्न कर भैया दर्द में भी मुस्कुराने लगे.

"ये अपना काम कर लेंगे. इधर लकी है मेरे साथ. तू यहाँ से निकल और जुबान बंद रखना. मैं जल्द मिलता हु तुझसे.", लकी भी संजीव की हालत देख घबरा गया था लेकिन दूसरी गाडी वालो को निर्देश देता वह जीप लिए शहर की तरफ निकल चला. जीप में सुशीला और शबनम शायद बेहोश हो गई थी जिन्हे ये 4 पोलिसवाले गाड़ी में डालने के बाद बाकी 3 अधमरे और मृत व्यक्तिओ और ड्राइवर की लाश को भी वन में लिटा कर वापिस निकल गए. घटनास्थल पर एक हवलदार छोड़ कर.

"भाई, जरा वह से मेरी मोटरसाइकिल ला दो गए?", अर्जुन ने कमर पर हाथ रखते हुए उस पोलिसवाले से कहा और वह बिना कुछ कहे अँधेरे में उस तरफ चल दिए. अर्जुन की सोच से कही ज्यादा हे बड़ा मामला हो गया था ये. आज एक पल के लिए वह जैसे अपने भैया को खो हे चूका था. ऐसा हो जाता तोह शायद अर्जुन ज़िन्दगी भर ये इल्जाम अपने दिल पर लिए रहता. जैसे तैसे वह खामोश सा मेनका को लिए उसके घर आ गया. अगले 10 मिनट में वह बिस्टेर पर लेता था मंजू के कमरे में जहा ये डॉक्टर साहब उसके हर घाव पर मरहम लगाने के बाद नींद का इंजेक्शन दे कर चले गए थे. कुछ ऐसा हे दूसरे कमरे में मेनका के साथ हुआ था.

"इसका ध्यान रखना बिटिया. और होश में आने पर कह देना के रामेश्वर शर्मा के सवाल इसका इन्तजार कर रहे है. ये मासूम प्यादा मेरी gair-maujdgi में वजीर बन्न बैठा.", ये पंडित जी हे थे जिनके साथ तेजपाल शर्मा चुपचाप खड़े थे.

"कोई घबराने वाली बात तोह नहीं है न दादाजी?", मंजू की आँखों में आंसू देख कर वह मुस्कुरा दिए.

"ये मेरा अभिमान है बिटिया, कभी कुछ नहीं हो सकता इसको. लेकिन नासमझ है थोड़ा ज्यादा होशियार पता नहीं. घाव छोटे मॉटे है 1-2 दिन में तोह दिखने वाले भी नहीं. चलो आज बिटिया तुम्हारे हाथ की चाय पीला दो अब आ हे गया हु तोह फिर क्या 10 मिनट और क्या घंटा.", रामेश्वर जी मंजू को सर सहलाते हुए बहार सोफे पर आ बैठे.

"तोह बिट्टू मिया, देख लिए नजारा?"

"पंडित जी, ये पागलपन हे था. संजीव मारा जाता अगर ये न होता तोह. उमेद के भी पाँव में गोली लगी है. लेकिन ये कैसे पहुंच गया उधर?"

"पोलिसवाले का खून तोह कही न कही सबमे हे है इस घर में. इसने कहा था के ये उमेद की मदद करेगा, गुरु है न वह इसका. लेकिन उमेद भी जैसे इसका गुलाम हो गया है. बाकी सब तोह जांच के बाद पता लगेगा. कहा खाद में मिटटी देने की बात कही थी और ये सब साफ़ कर आया.", रामेश्वर जी की मुस्कान रहस्य से भरी थी.

"चंद्रो देवी की हालत भी स्थिर है अब. डॉक्टर कह रहे थे की खतरे से बहार है. Bheem-Sheela देवी ने 3 और लोगो की मदद से सुशीला के परिवार पर हमला किआ जिसमे मोहर सिंह के साथ 12 और लोग मारे गए है अपराधियों को मिला कर.", जैसे तेजपाल मां ने खाखा तैयार किआ हो रिपोर्ट बनाने से पहले.

"हम्म्म.. 12 की जगह 13 कर दो तेजपाल. एक को हमने खुद आजाद कर दिए. भाभी जी से मैं परसो मिल लूंगा और सुशीला को कहना की रामेश्वर आज भी उनका भला हे सोचता है बेशक उसकी वजह से मेरे बेटे की खुशिया मैंने ख़तम कर दी लेकिन उसको ba-ijjat बरी कर दिए गया है. बिजेन्दर से व्यक्तिगत मुलाकात मैं परसो कर लूंगा. हाँ शबनम को अपनी निगरानी में रखना, शंकर करेगा बात आने पर.", इधर मंजू चाय रखने के बाद मेनका के कमरे में चली गई.

"जी. आर्डर और फाइल तोह आप भिजवा हे देंगे. वैसे अभी आप यही रुकने वाले है?"

"बरखुरदार तुम्हारे पिता जी ने आज दावत राखी है तोह हम यहाँ क्या करेंगे. 8:00 बजे है तोह 45 मिनट में तोह तुम मुझे घर उतार हे डोज.", तेजपाल जी के चेहरे पर भी हंसी आ गई.

"वैसे सच कहु तोह अर्जुन को देख कर गर्व होता है."

"हाँ भांजा जब मां की गर्दन पकड़ने लगे तोह गर्व होगा हे. हाहाहा.. वैसे सच बात है. मैं इसको इन सबसे दूर रखना चाहता हु लेकिन छह कर भी रख न पाउँगा.", रामेश्वर जी कमरे में निगाह मरते हुए अर्जुन को देखने लगे.

"अब चिंतित होने की वजह हे नहीं है अंकल. सब साफ़ तोह कर हे दिए है संजीव और उमेद ने मिलकर. जो बचे है वह दोस्त रहेंगे या शुभचिंतक."

"इसके साथ एक समस्या है बीटा. काम न मिले तोह ये खुद हे ढून्ढ लेता है. अभी तोह चलो जो हुआ सो हुआ. और मैं भी कोशिश करूँगा के इसकी शिक्षा थोड़ी ज्यादा बढ़ा दू, मेरे लिए हे ाचा रहेगा. चलो भाई अब चलते hi. बेटी के घर की चाय पी ली बहोत ाचा लगा.", रामेश्वर जी उठने के बाद फिर से अर्जुन को देख कर मंजू को भी आशीर्वाद देते हुए बहार निकल चले.

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बिजेन्दर िक के बहार बैठा था अपने एक दोस्त के साथ. आज उसने एक दोस्त खो दिए था और दूसरा शायद खो हे देता अगर उमेद काका उसकी समय रहते मदद न करते. आँखे अभी तक भीगी थी. सबसे अजीब बात ये हुई थी की इस हस्पताल में हे उसकी माँ और चचेरी बहिन को भी लाया गया था लेकिन वह बताने के बावजूद वह से हिला नहीं.

"जी, आपके कपडे और खाना लाइ हु.", अनुपमा पहली बार बहार यु उसके सामने आई थी. बेशक बबिता हे उसको लेके आई थी लेकिन बबिता अलग इमरजेंसी वार्ड में अपनी माँ के पास चली गई थी. एक पल तोह बिजेन्दर खामोश बैठा रहा, शुन्य में देखते हुए लेकिन फिर उसकी कमर पर मुँह रखते हुए वह फफक कर रो पड़ा. यहाँ बस 3 हे लोग थे लेकिन उसका दोस्त बहार चला गया था हालत देख कर.

"आपने कभी कुछ गलत नहीं किआ लेकिन कही न कही चूक हुई है. हम मिल कर सुधर सकते है सबकुछ. बलवान (भूरा) भाई के जाने का मुझे भी दुःख है लेकिन गोलू भैया खतरे से बहार. हौंसला रखिये आप. चलिए कपडे बदल लीजिये इतने मैं यहाँ देखती हु.", अनुपमा की साफ़ और दिल से कही बात सुनकर बिजेन्दर खड़ा हो कर उसके गले लग गया. वह बहोत कुछ कहना चाहता था लेकिन आज जैसे शब्द नहीं फुट रहे थे.

"हम नै शुरुवात कर सकते है. कल पापा को मुखाग्नि देनी है आपको और उसके बाद जिम्मेवारी सम्भालनि पड़ेगी साडी.", बिजेन्दर ने चेहरे से चेहरा लगते हुए सिर्फ हामी भरी और कपडे ले कर चला गया. पुलिस ने इस मामले में इनमे से किसी से पूछताछ तोह नहीं की थी लेकिन अपनी तैयार रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करवा लिए थे. शबनम को संदिग्ध की श्रेणी में रखा गया था और उसका इलाज भी पुलिस निगरानी में हे हो रहा था.

"देख माँ, के हो गया पूरे परिवार गइल. तन्ने सबके स्यामि यो कहा था ने के मेरी छोरी इतने ब्याह नई करेगी जितने शंकर के परिवार साथ बदला न ले लिए जाये. मैंने सिर्फ तेरी हां में हां मिले थी. लेकिन आज शंकर के परिवार ने पूरा घर ख़तम करने की जगह तन्ने ba-ijjat बरी आरर उस हरामी मामे की मौत भी बदले की भावना से की हत्या लिख दी. वह छोरा सबने मार सके था लेकिन उसने एक की जान भी कोन्या ली. ेब तेरे धोरे बहोत टेम है सोचन का. यु टांग टूट चुकी है, कलाई की हड्डी भी आरर सर्र पे 6 टाँके आये है. हफ्ता आते हे रह, मैं हलचल लेती रहूंगी तेरा.", बबिता ने आगे कुछ न कहते हुए अपनी माँ को दाल का पानी बड़े प्यार से पिलाया जो सुशीला पीना नहीं चाहती थी. आँखे उसकी भी भरी थी और सब खोने के बाद एहसास हुआ था के वह कितनी खराब बहु, बीवी, माँ और बहिन थी. लेकिन फिर सामने से बिजेन्दर को आते देख मुँह फेर लिए. आज हिम्मत न थी अपने बेटे की आँखों का सामना करने का.

"ऐ माँ, तू तौली ठीक हो जय. 13 दिन बाद तेरे छोरे का आरर छोरी का ब्याह है.", बिजेन्दर गोल स्टूल पर बैठता अपनी माँ के गाल पर हाथ रखते हुए बोलै तोह बबिता हैरानी से उसको देखने लगी.

"बेबे तू टेंशन न ले. गोलू गइल तेरा ार अनुपमा गइल मेरा ब्याह होवेगा. गोलू ने होश आया तोह मैंने बताया के मैं अनुपमा ने पसंद करू हु. वह बावला तोह अर्जुन धोरे काल स्टेडियम हे चला गया था यु कहां के बिजेन्दर ने वह कुछ न करे आरर वह यु सब अपने प्यार खातिर कारन लाग रहा है. फेर बेरा चल्या के थम्म दोनो पसंद करो हो एक दूसरे ने. चाल माँ तू आराम कर, मैं तड़के आऊंगा मिलान. गोलू के maa-baap हो सके है के hal-chal लें ऊपर आवे. मैं अनुपमा ने छोड़ के औ घर. तू ध्यान रखिये बेबे अपना. जो गलती हुई उसके खातिर छोटे भाई ने माफ़ कर दिए.", जाने से पहले वह अपनी माँ और बहिन से गले लग के मिला.

"देख ले इसका दिल. यु है सच्चा आरर परिवार की हिफाजत कारन वाला. खैर तेरे नींद की सुई दे राखी है तोह तू आराम कर. मई इस बिस्तरे पे सोउ हु.", बबिता ने भी माँ के चेहरे पर हाथ फेरते हुए कहा और फिर खली बिस्टेर पर लेट गई.

सुशीला सोच रही थी की अगर आज यही लड़ाई शंकर के साथ हुई होती तोह एक बार फिर सब ख़तम हो जाता लेकिन वह अर्जुन था. जो मरने को तैयार था और सबको बचने के लिए भी.

"बेटी, एक बार बस अर्जुन ने सन्देश भिजवा दिए के उसकी बुआ मिलना चाहवे है उस से. शंकर तोह कड़े कोणी आवे लेकिन वह छोरा भला है.", सुशीला ने इतना कहा और आँखे बंद कर ली. वही बबिता मुस्कुरा उठी अपनी माँ की बात सुनकर.

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रात 12 बजे अर्जुन झटके से उठ खड़ा हुआ. पसीने से भीगा जिस्म और उत्तेजना से वह बेचैन सा था लेकिन फिर अचानक हे वह वापिस बिस्टेर पर लुढ़क गया.
 
अपडेट 98

कुछ अपनों के साथ- कुछ अपनों से दूर (1)


"आराम से लेते रहो. तुम नहीं आ सकते थे तोह मैं खुद आ गई.", मुस्कान अर्जुन के सीने पर प्यार से हाथ रखती उसको शांत कर रही थी. अर्जुन पर शायद अब दवा का असर लगभग ख़तम हो चूका था और बस कही कही हल्का दर्द था शरीर में जो सेहन करने लायक था.

"मंजू कहा है? और तुम यहाँ कैसे आ गई?", अर्जुन उसके हाथ पर हाथ रखे आँखे बंद किये था. मुस्कान वैसे हे बराबर में बैठी प्यार से उसके स्पर्श को महसूस करती हुई धीमी आवाज सुन्न रही थी.

"मुझे मंजू ने बताया तुम्हारे बारे में. फ़ोन किआ था मैंने उसको अपना सच बताने के लिए. फिर पता लगा के तुम्हारे साथ इतना कुछ हो गया है तोह मैं खुद को रोक न सकीय आने से. मंजू से सजा की उम्मीद लिए आई थी लेकिन उसका दिल देखो, कसूरवार को हे अपने गले लगा लिए उसने.", मुस्कान की आवाज गंभीर होने लगी थी लेकिन बीच में हे रह गई.

"अब इसके सामने tape-recorder बंद कर ले मुस्कान. तेरे साथ मैंने जो करना था कर लिए लेकिन इसको माफ़ नहीं करने वाली मैं. बिस्टेर से हिले भी तोह टाँगे टॉड दूंगी कह देती हु.", मंजू कपडे बदल कर बाथरूम से बहार आने के बाद मुस्कान की बात सुन्न चुकी थी. फिर अर्जुन के पास आ कर कड़ी हुई उसको डांटने लगी थी की उसकी कलाई पकड़ कर अर्जुन ने अपने पास खींच लिए.

"हाथ छोडो मेरा.", मंजू ने हलकी नाराजगी दिखते हुए मुँह फेर लिए और अर्जुन के मुँह से हलकी कराह निकल गई.

"क्या हुआ? देखने दो मुझे, कह भी रही हु की बिस्टेर पर रहो."

"यहाँ दर्द हुआ थोड़ा.", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए अपने दिल पर हाथ रखा और फिर मंजू को अपने सीने से लगा लिए, जिसका मंजू को जैसे पहले से इन्तजार था. सारा गुस्सा और नाराजगी पल में हे गायब हो गया. मुस्कान का हाथ अभी भी अर्जुन के दूसरे हाथ में था लेकिन बिस्टेर पर. वह इन दोनों को देख कर मुस्कुरा रही थी.

"आज बहोत परेशां किआ न मैंने? जरुरी था मंजू, मैं तुम्हे इस सबमे शामिल नहीं करना चाहता था. यकीन मानो मुझे कुछ नहीं हुआ और तुम्हारे रहते वैसे भी कुछ हो भी नहीं सकता.", अर्जुन की इस कलाई पर भी पट्टी बंधी थी जिस हाथ से उसने मंजू को अपने सीने से लगाया हुआ था. लेकिन वह अब बिलकुल सही था.

"और तुमने ये मुस्कान वाली बात भी मुझसे छुपाई? जानती हु की ये saaf-dil है लेकिन मेरी सहेली के बारे में तुम्हे ज्यादा पता था.", मंजू उसके सीने पर सर टिकाये हुए मुस्कान को देख रही थी और फिर उन दोनों के हाथ भी.

"इसको खुद नहीं पता था के ये क्या कर रही है? लेकिन फिर भी मुझे बचाये तोह रखा इसने और तुम्हे भी खुद हे इसने सब बता दिए."

"सबकुछ नहीं बताया है अभी. तुमने भी वैसे लेकिन मैं देख रही हु की तुम दोनों में से कौन ये बताएगा ये मुझे.", मंजू को खुद की तरफ ऐसे देखते हुए मुस्कान का चेहरा लाल होने लगा. वह हाथ छुड़ाने लगी लेकिन अर्जुन ने थोड़ा कस के हथेली पकड़ ली.

"तुम्हे सचमुच नहीं पता मंजू?", अर्जुन के सवाल पर मंजू मुस्कुरा कर उठने लगी थी इन दोनों को समय देने के लिए लेकिन साथ हे अर्जुन भी खड़ा होने लगा.

"घर चलता हु मैं ताई जी और आरती दीदी अकेले है उधर."

"नहीं, उन्हें बता दिए था के तुम आज यही रुकने वाले हो. मेनका दीदी की तबियत ठीक नहीं है और उधर दादाजी ने अपना कोई आदमी भेजा हुआ है. प्रीती भी आरती के हे साथ है. सुबह तुम चले जाना. वैसे अपनी चोट के बारे में क्या कहने वाले हो?", मंजू देख रही थी की अर्जुन उसकी बात सुन्न कर बाथरूम की तरफ जा रहा था. लेकिन दरवाजा खुला हे रखते हुए वह खुद को आईने में देखने लगा. होंठ पर सूजन और हलकी चोट का निशाँ था, दाई तरफ की एएब्रो पर भी पट्टी थी टेप के साथ, सर के ऊपर भी वैसे हे पट्टी थी और कलाई पूरी बंधी थी. शरीर पर रगड़ और खरोंचे थी लेकिन कही खून का निशाँ न था.

"मेरे कपडे किसने बदले थे.?", अर्जुन के जिस्म पर साफ़ पायजामा था और ऊपर भाग निर्वस्त्र.

"मैंने हे बदले थे डॉक्टर की मदद से. दादाजी उस वक़्त मेनका दीदी का इलाज करवा रहे थे तोह ये मुझे हे करना पड़ा.", मंजू अलमारी से टीशर्ट निकलने लगी तोह अर्जुन वापिस बहार आ गया.

"ठीक किआ. और इसकी जरुरत नहीं है फ़िलहाल. मुस्कान तुम खाना बना लेती हो?", अर्जुन ने मंजू को टीशर्ट वापिस देते हुए बीएड पर खामोश बैठी मुस्कान से पुछा.

"है.... हाँ बना लेती हु थोड़ा बहोत.", वह उठने लगी तोह मंजू अर्जुन का हाथ पकड़ कर खुद हे बहार ले आई, मुस्कान को साथ आने का कह कर.

"सोफे पर बैठ जाओ. खाना बनाया हुआ है, मैं लगाती हु.", मंजू ने अर्जुन के पाँव खुद हे सीधे करते हुए कुर्सी पर रख दिए, नीचे गद्दी लगते हुए. मुस्कान बड़े ध्यान से देख रही थी ये सब. वह अभी कड़ी हे थी की अर्जुन की बात सुन्न कर सकते में आ गई.

"बैठ जाओ तुम भी, वह बीवी है मेरी. शायद अब सिर्फ मेरी.", मंजू ने रसोई में हे प्लेट तैयार करते हुए प्यार से एक बार अर्जुन को देखा और फिर काम करने लगी.

"मंजू की शादी तोह मेनका के भाई से हुई है न? तुम्हारी पत्नी कैसे हो सकती है वह?"

"वो बात तोह सब जानते है लेकिन मेरा और मंजू का रिश्ता अब सिर्फ तुम्हे पता है. वैसे टेबल पर फ्रेम के अंदर किसकी फोटो है देखो जरा?", कांच के टेबल पर हमेशा वह फ्रेम रहता था जिसमे मंजू और ऋषभ की फोटो होती थी लेकिन आज वह सिर्फ मंजू की फोटो थी, दूसरी जगह खली थी. मंजू 2 पालते टेबल पर लगाने के बाद एक मुस्कान के सामने रख कर खुद अर्जुन की बगल में आ गई.

"दादा जी निकल कर ले गए थे ये. लेकिन मुझे भी नहीं पता था के उन्होंने ऐसा क्यों किआ? तोह क्या अब मैं ऋषभ की विधवा हु?", मंजू शांत और गंभीर थी.

"जब शादी से पहले हे मेरे नाम का सिन्दूर मांग में भर चुकी हो तोह फिर उसके साथ तुम्हारा विवाह कोई मायने रखता है?", अर्जुन ने खुद हे मंजू का गाल चूमते हुए खुद से लगा लिए. मुस्कान जैसे उलझन में खोई इन दोनों को देख रही थी और उसकी मौजूदगी में अर्जुन की ऐसी हरकत पर मंजू आँखे झुकाये शर्माती हुई सिकुड़ने लगे थी.

"ये तुम्हे कैसे पता? शादी में तोह तुम नहीं थे."

"गलत तोह नहीं कहा न मैंने? और दादाजी आये थे तोह आँखे बंद करने से पहले मैंने भी उन्हें मेरे कमरे में देखा था. यहाँ आते हे फोटो पर नजर पड़ते हे समझ गया था के वह इस घर से क्या लेके गए है. और मुस्कान अब तुम निश्चिंत हो कर अपना भविष्य बना सकती हो. जब भी दिल करे यहाँ मंजू के पास rehne/milne आ जाना. अब तुम अकेली नहीं हो. खाना खाओ और फिर आराम कर लेना.", मुस्कान थोड़ी भावुक हो गई थी. कुछ उन दोनों का प्यार देख कर और कुछ अर्जुन द्वारा उसके लिए परवाह देख कर. लेकिन फिर मुस्कुराती हुई वह खाने लगी, शायद खाना उसने भी नहीं खाया था एक दो दिन से.

"तुम आराम से बैठो मैं खिलाती हु तुम्हे.", मंजू अपने हाथो से अर्जुन को खिलने लगी.

"सच कहु तोह ये सब बहोत अलग है, समझ से परे भी और प्यारा भी. तुम्हारी अपनी हे के दुनिया है जिसमे बहार जैसा सबकुछ दीखता है वह सब तुम्हारे आसपास बिलकुल हे अलग है.", मुस्कान बहोत कुछ कहना चाहती थी लेकिन जैसे सही शब्द न थे उसके पास.

"हाँ ऐसा हे कुछ समझ लो. जो निजी ज़िन्दगी है वह बहार से अलग है क्योंकि दोनों अलग दुनिया है. मैं मंजू से कुछ नहीं छुपाना चाहता और तुमसे भी नहीं. यहाँ मैं इसका हु और हर उस जगह जहा ये मेरे साथ हो. तुम्हारे व्यक्तिगत क्षण में तुहरे साथ, मंजू की नजर में रहते हुए.", मुस्कान पूरी बात का मतलब समझते हुए शर्माती हुई उठ गई और प्लेट रखने रसोईघर में चल दी. मंजू ने भी अर्जुन का चेहरा साफ़ करते हुए सामान उठाया और वह भी उधर हे गई जहा से मुस्कान वापिस आ रही थी. लेकिन वह सीधा अर्जुन के पास आती हुई उसके होंठो को हलके से चूम कर बोलने लगी.

"यहाँ तुम miya-biwi के बीच मैं हड्डी नहीं bann-ne वाली. अपनी जगह तुम्हे पता है और अब मैं चली उस कमरे में सोने. मंजू, ध्यान रखना जरा शायद म्हणत तुम्हे हे करनी पड़ेगी.", हंसती हुई वह मेनका के कमरे में जाते हे दरवाजा बंद करती बिस्टेर पर लेट गई. माहौल ठीक कर गई थी अपनी इस नटखट हरकत से.

"मेरे सामने हे तुमने ऐसा किआ?

"मैं तोह हिला भी नहीं, अगर तुमने ध्यान दिए हो.", अर्जुन मासूमियत से मंजू को देखने लगा. और वह हंसती हुई उसको खड़ा करती अपने कमरे में आ गई. जो शायद अब इन दोनों का हे रहने वाला था. घर और रसोई जांचने के बाद वह 10 मिनट बाद अर्जुन के बाहों में थी, pur-sukoon से. वह सीधा लेता अपने ऊपर झुकी मंजू के पतले रसभरे होंठो को आराम से पी रहा था.

"डेट नहीं आई है मेरी.", अर्जुन के एक बार मुस्कुरा कर देखती वह कड़ी हुई और तुबेलिघ्त बंद करती जीरो बल्ब रोशन करने के बाद एकमात्र गाउन भी शरीर से जुड़ा करके वह फिर से अर्जुन के पास चली आई. उसको भी आराम देती हुई वह पजामा हटा कर उसकी बगल में आ गई थी.

"तुम ये चाहती हो? आखिरी साल भी है तुम्हारा आगे और फिर नेशनल भी.", अर्जुन उसकी पतली कमर पर हाथ फेरते हुए अपने दिल की बात कह रहा था.

"4 महीने तोह कोई दिक्कत नहीं फिर वैसे भी 6-7 महीने मैं यहाँ घर में और माँ के साथ उधर गाँव में बिता लुंगी. पढाई ख़तम करके देखूंगी की आगे क्या करना है. इतना जरूर है के ये छोटा अर्जुन मुझे har-haal में चाहिए." दोनों हे अपने मधुर पालो में एक दूसरे के साथ ढेरो बातें कर रहे थे और कुछ क्षण बाद मंजू खुद हे अर्जुन की सवारी करती हुई दोनों को आराम दे रही थी. एक इनका मिलान था जिसमे हमेशा मंजू हे अर्जुन को नियंत्रित करती थी और वह भी पूरे दिल से उसके साथ होता था.

"ये बड़े होने लगे है अब., अर्जुन प्यार से दोनों उभारो को हथेली में लिए सेहला रहा था. मंजू के चेहरे पर भी अलग हे चमक थी इस दौरान. वह एक बार होने के बावजूद बड़े आराम से कमर हिलती हुई अर्जुन की बातें सुन्न रही थी.

"म्हणत जब भी की है थोड़ी तोह नहीं की तुमने. हर बार किसी भूखे बचे से तोह तुम इन्हे खाते रहते हो, बड़े तोह होंगे हे. और भी कई जगह से साइज बदल चूका है.", मंजू हमेशा एकांत में अर्जुन के साथ दिल की हर बात कर लेती थी और अर्जुन भी उन सख्त उभारो से हाथ नीचे लता उसके तराशे हुए हिलते कूल्हों को दबाने लगा. यहाँ पहले की तुलना में सचमुच ज्यादा हे इजाफा हुआ था.

"कितना बदले है है? अब तोह सच में इन्हे प्यार करना पड़ेगा."

"धत्त. पहले ठीक हो जाओ फिर मन नहीं करुँगी. कंधे और पाँव में भी चोट है तुम्हारे.. आह्हः.. वैसे मेरा तोह मान लिए तुम्हारी वजह से सब बढ़ रहा है लेकिन ये तुम्हारा भी जैसे हर बार पहले से बड़ा कैसे हो रहा है.", मंजू बेशक अर्जुन के साथ भरपूर एकाकार हुई थी और हमेशा वह हिम्मत से उसको पूरा झेल लेती थी लेकिन बात सही थी.

"तुम्हारी म्हणत है ये भी. वैसे कितना बदलाव आया है? तुम सच में अब ज्यादा नरम लग रही हो.", अर्जुन ने फिर से दोनों गोल चुके पकड़ लिए थे. उन्हें अपनी तरफ लाने लगा तोह खुद मंजू उस पर झुक गई. होंठो में वह तीखे निप्पल भरता पीने लगा. एक हाथ अब अपने ऊपर झुकी मंजू की कमर पर था. वह भी अपनी लाये बरकरार रखती वैसे हे अपनी गीली योनि उसके विशाल लिंग पर आगे पीछे कर रही थी.

"बी से स हो गए है और ऋतू के साथ सूट सिलने देने गई थी तब पता चला के यहाँ भी 36 हो गया है साइज 34 से. आठ.. काटो मैट.. उम्म्म", मंजू थोड़ा थकने लगी थी और अर्जुन भी समझ गया था. वैसे भी दोनों करीब हे थे अपनी मंजिल के. अर्जुन आराम से उसको पलटते हुए ऊपर आया और वैसे हे लंबवत लेते हुए ये आखिर धक्के गहरे लगाने लगा.

"आह.. तुम क्यों म्हणत करने लगे.. आठ.. सीई", उसकी पीठ पर हाथ रखती वह चरम पाने हे लगी थी की अर्जुन भी अपना सारा जोश अंदर खाली करता हुआ ऊपर लेट गया.

"इतनी हेर देर के लिए तोह कर सकता हु. वैसे मैं अब ठीक हु.", होंठो को चूमते हुए दोनों कुछ पल इस स्थिति में रहे फिर शरीर जोड़े हुए हे करवट लेकर एक दूसरे को देखने लगे. मंजू का लम्बा पाँव अब अर्जुन के ऊपर था. लिंग रस खली करने बावजूद वैसे हे योनि के अंदर पूरा भरा रहा.

"तुम्हारे साथ तोह मैं वैसे भी कभी नहीं थकता. और वह तोह खुद हमेशा अंदर हे रहना चाहता है.", मस्ती करते हुए वह इस हाल में भी मंजू के एक नितम्भ को हलके से दबाते हुए छोटे छोटे चुम्बन दे रहा था. मंजू भी आराम से लिपटी हुई इस किस्मत की रात का पूरा लुत्फ़ ले रही थी. इतना सबकुछ हुआ था पूरे दिन में. कहा घर में 2-2 लोग अपने सपने संजोये थे, मुस्कान खुद सारा दिन अर्जुन के बारे में सोचती रही थी, मेनका ने भी प्यार देखा था अर्जुन की आँखों में लेकिन आदमी जहा भी रहे वह वापिस अपनी बीवी की बाँहों में हे सुकून पता है. हलकी फुलकी चुहल के बाद दोनों इस हालत में हे एकदूसरे से लिपटे नींद के आगोश में चले गए थे, घडी रात के 2 बजा रही थी.

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इस सबसे दूर और बेखबर रामेश्वर जी का bhara-pariwar यहाँ अर्जुन के ननिहाल में बहुत खुश था. रेखा जी अपनी भाभी और सहेली ममता के साथ रात के 11 बजे उनके कमरे में ज़िन्दगी के sukh-dukh सांझे कर रही थी, वही कौशल्या जी भी अपनी संधान सुनंदा जी के साथ ढेरो बातें करने के बाद आराम से लेती थी. अलका, ऋतू, तारा ने समय के खली कमरे पर कब्ज़ा जमा लिए था और उनकी ममेरी बहिन स्वाति भी उनके साथ बेहद खुश थी. साथ वाले कमरे में हे मधु बुआ, माधुरी दीदी और प्रियंका दीदी दिनभर की थकान और ghoomne-firne की वजह से आराम कर रही थी. आज सबका दिन ाचा रहा था यहाँ. हनुमान जी के मंदिर में श्रद्धा से pooja-path करने के बाद उन्होंने शहर भी देखा था और खरीदी भी की थी. बस कोमल दीदी इधर नहीं थी.

"तोह मामी कुछ बदलाव आया क्या आपकी ज़िन्दगी में?", वह इस वक़्त खुली छत्त पर गद्दे बिछाये यहाँ संगीता और अनीता मामी के साथ थी. जो उनसे कुछ हे बड़ी होने के साथ कोमल दीदी की ाची सहेलिया भी थी.

"थोड़ी आस तोह है कोमल और अब कुछ सुकून रहने लगा है. संगीता दीदी का तोह महीना भी नहीं आया इस बार.", अनीता मामी, जो सबसे छोटी बहु थी वह पहले से बेहतर नजर आ रही थी. उनकी बात सुनकर संगीता मामी ने अपना चेहरा तकिये में दबा लिए था.

"वाह संगीता मामी, लगता है मां ने फिर म्हणत कर हे दी.", कोमल दीदी की ऐसी बात सुन्न कर अनीता मामी ने नखरे से उनके हाथ पर हाथ मारा.

"उन दोनों से घंटा कुछ न हुआ कभी. लेकिन हाँ म्हणत जो भी हुई वह काम कर गई अपना.", अनीता मामी जैसे बात जाहिर नहीं करने वाली थी लेकिन कोमल दीदी के हंसने पर वह दोनों हे उन्हें देखने लगी.

"मालूम है मुझे, नानी आपसे जैसे कह रही थी न के जिसको आप ढून्ढ रही हो वह नहीं आया. लेकिन थोड़े दिन में आएगा तब कर लेना अपने दिल की.", कोमल दीदी की बात सुन्न कर इस बार अनीता मामी की नजरे झुक्क गई. शायद झिझक और उनके राज के खुलने से.

"देख कोमल, इसमें अनीता का भी कोई दोष नहीं. ये मैं हे चाहती थी और हम दोनों का उस से कोई गलत सम्बंद रखने का इरादा नहीं है. तुम बहिन हो उसकी तोह नाम लेना नहीं चाहती लेकिन हमारी ज़िन्दगी बनाने वाला वह हमेशा हमारे लिए भगवन सामान रहेगा.", संगीता मामी की आवाज हलकी भर्रा गई थी.

"परेशां मत हो मामी. आप इतनी प्यारी हो तोह उसने जो भी किआ आपके और सबकी ख़ुशी के लिए किआ न. और जानती हु मैं के आप दोनों हे इस परिवार से बहोत प्यार करती हो. अगर अनीता मामी का कन्फर्म नहीं हुआ है और वह अब ऐसा करना नहीं चाहती तोह ठीक है मैं उसको यहाँ नहीं भेजूंगी.", कोमल दीदी की बात पर अनीता मामी ने झट्ट हाथ पकड़ लिए.

"तू मन करके देख उसको, वही आ कर उसपे चढ़ जाउंगी मैं. इनका एक बार में ठहर गया तोह ाची बात है लेकिन मेरा अभी बाकी है. इस बार जबतक यकीन न हो जाये मैं तोह उसको छोड़ने वाली नहीं.", उनका उतावलापन देख कर दीदी हंसने लगी.

"ओह मेरी प्यारी मामी, इतना मत सोचो आप. शुक्रवार रात वह यही आने वाला है बिट्टू मां के साथ और फिर शनिवार दोपहर तक वह आपके हवाले. बस थोड़ा आराम करने देना, वह अभी छोटा है.", वह हंसती हुई कह रही थी लेकिन फिर अनीता मामी के बात सुन्न कर करंट सा लगा.

"तू बड़ी बहिन है उसकी इसलिए मुँह नई खोलती ज्यादा. लेकिन जिसको छोटा बोल रही है न उसने एक बार में हे ऐसा हाल किआ था के हम दोनों तेरी नानी के हाथ चढ़ गई थी लंगड़ाने की वजह से. कुछ छोटा नहीं है उसका, बचा समझ रही है क्योंकि तेरे सामने हे बड़ा हुआ है न इसलिए.", अनीता मामी की बात अंदर एक आग सी लगा गई थी लेकिन कोमल दीदी शांत हो गई.

"कुछ भी बोलती है तू भी अनीता. इसकी बात का बुरा ना मान कोमल, ये खुद भी अभी नासमझ है. लेकिन सच कहु तोह वह प्यार करना जानता है, बड़ो से कही ज्यादा ाचे से. उतना हे ख़याल भी रखता है."

"अरे मामी आप लोग मेरी सहेलियां हो. मैं तोह इस वक़्त उस हिसाब से हे बात कर रही हु. चलो ाचा है के समझदार है, कालको बीवी का पूरा ध्यान रखेगा. अनीता मामी के साथ आपका दिल करे तोह देख लेना. ः.", वह भी हंसती हुई तकिया ठीक करके करवट के बल लेट गई.

"हाँ वह तोह लाजमी है. टैक्स तोह लुंगी हे इन दोनों से चौकीदारी का. वैसे माधुरी और संजीव की शादी का क्या हिसाब है? माजी से सुना था के उनके रिश्ते हो चुके है."

"मामी दीदी का तोह रिश्ता हो चूका है लेकिन संजीव भैया के लिए लड़की सिर्फ दादाजी ने देखि है. और जहा तक माधुरी दीदी की शादी की बात है तोह वह 21 मई को होनी है. महीना पड़ा है अभी."

"और तेरी शादी? हम दोनों से कही जवानी तेरे पे है, शायद बड़ी ननद जी का पूरा रूप तुझे उनसे हे मिल गया."

"मामी अभी शादी दूर दूर तक नहीं करने वाली. 2 साल पढाई और फिर देखते है. हाँ 27-28 की उम्र तक तोह हो जाएगी."

"बड़ी हिम्मत है तेरे में. यहाँ तोह 17 की हुई थी और खारिश होने लगी थे मेरे.", अनीता मामी की इस चुहल से बाकि दोनों हंसने लगी.

"मामी मेरे कोई खारिश नहीं होती, बाल नहीं है न. आप ध्यान रखती तोह इतना रिस्क न लेना पड़ता.", कोमल शायद हे ऐसे किसी के साथ मजाक करती थी. इन दोनों के साथ गहरा जुड़ाव था उनका.

"आग थी मेरे अंदर. हाँ नहीं तोह और राजी थी मैं शादी के लिए. अब तू ठंडी है तोह इसमें मेरी गलती नहीं.", अनीता मामी के अदा से मुँह बनती हुई जैसे दीदी को ताना दे रही थी.

"ाची बात है. अब इस आग पर कुकर चढ़ेगा जल्दी हे फिर 9 महीने बाद सीटी बजेगी तोह देखूंगी आग रहती है या खारिश होती है.", उनकी बात पर अनीता मामी हँसते हुए कोमल को हलके हाथ से मारने लगी.

"देख लो दीदी, सब कहते है इतनी भोली है ये. यहाँ इसको कुकर और सीटी सब पता है. कोमल बाज आजा तू.", फिर 5-10 मिनट मस्ती मजाक करने के बाद तीनो हे आराम करते हुए सोने लगी. दिल भी हल्का हो गया था और सुकून भी था हंसने बोलने की वजह से.

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6 बजे मेनका की आँख खुली तोह बगल में ये अनजान खूबसूरत लड़की देख कर एक पल के लिए वह उसको देखने लगी फिर सावधानी से उठ कर बाथरूम में चली आई. शरीर दुःख रहा था और लगभग 10 घंटे से वह सो रही थी तोह लघुशंका का बोझ सहा न गया. जैसे तैसे वह फारिग होने के बाद आईने में खुदको देखने लगी. इस हाल में घर से बहार जाना कही से भी ठीक न था. माथे पर चोट थी जहा साफ़ पट्टी बंधी थी और गले पर जो हल्का घाव बना था वह भी. अर्जुन का ध्यान आते हे वह कपडे बदल कर ड्राइंग हॉल में पहुंची हे थी की मंजू ब्रेड पर माखन लगाने के बाद चाय की ट्रे लिए सामने आ कड़ी हुई.

"दीदी आप बिस्टेर पर चलो वापिस. डॉक्टर ने हैवी दोसे दी थी और आपने कुछ खाया भी नै है. कल दोपहर के बाद. चलिए अंदर.", मंजू इस वक़्त ाचे से त्यार थी नहीं हुई. सूती लाल रंग का प्रेस किआ हुआ कमीज जिसपर गोल सफ़ेद कपडे के बटन टंगे थे, सफ़ेद चूड़ीदार सलवार और मांग में सिन्दूर के साथ पूजा का तिलक उसको एक आदर्श युवती का पूर्ण स्वरुप दे रहा था. मेनका ने भी पलभर के लिए उसको देखा और फिर ज्यादा कुछ कहे बिना अंदर हे आ गई.

"अर्जुन सो रहा है?"

"वह तोह आधा घंटा पहले हे तैयार हो कर चला गया था. और ये मेरी सहेली है मुस्कान, रात आई थी फिर अर्जुन वह पहले से हे सो रहा था तोह मैंने इसको यहाँ सोने को बोल दिए था.", मंजू ने हलके से मुस्कान का पाँव हिलाते हुए जगाने का उपक्रम किआ और इधर वह चाय की ट्रे मेनका के सामने रखे थे.

"जस्ट 5 मिनट्स मोरे एंड वेयर इस ब्रूनो डैडी?", नींद में वह एक हाथ बिस्टेर पर फिर रही थी लेकिन फिर जैसे हे कुछ ख्याल आया तोह वह झट्ट से उठ कड़ी हुई.

"सॉरी. क्या टाइम हो रहा है? नमस्ते दीदी.", हड़बड़ाहट में हे वह मेनका को हाथ जोड़ कर कड़ी हो गई.

"आराम से आराम से. ये मेनका दीदी है और अभी 6 बजे है. सोना है तोह थोड़ी देर और सो जा, वैसे मैं चाय बना ले हु तेरी.", मंजू ने उसको शांत करते हुए पास हे बिठाना चाहा तोह वह फ्रेश होने का बोल कर बाथरूम में भाग गई.

"लगता है ये लड़की पापा की लाड़ली है.", मेनका ने कप उठाते हुए कहा लेकिन मंजू ने हाथ रोकते हुए अपने हाथ से उनके मुँह पर वह ब्रेड लगा दी.

"पहले अंदर कुछ जाने दीजिये फिर ये चाय पीनी है. और इसके पापा यहाँ नहीं रहते, इंग्लैंड में है. सपना देख रही होगी.", मेनका मंजू का इतना प्यार देख कर हलके से मुस्कुरा दी. अपने हे हाथ से मंजू ने वह आधी ब्रेड खिलने के बाद उन्हें चाय पीने दी. फिर बाकी वह खुद आराम से खाने लगी.

"अर्जुन ठीक था? रात को उसके खून तोह बहोत लगा था? फिर तूने उसको जाने क्यों दिए.?"

"वह उसका खून नहीं था और अगर होगा भी तोह थोड़ा बहोत. साड़ी पत्तियां खोल कर बस कलाई वाली बांधे वह सही सलामत हे निकला था. और कैसे रोकती बताओ? घर भी लोग चिंता कर रहे होंगे और वह सुनता भी नहीं है.", मंजू ध्यान से मेनका के हाथ और कलाई देख रही थी, जहा अभी भी हलके निशान थे, शायद रस्सी के खिचाव के.

"अर्जुन सो रहा है क्या?", मुस्कान भी बाथरूम से बहार आते हुए वही सवाल दोहराने लगी.

"यूनिवर्सिटी आएगा वह मिलने तुझसे.", मंजू अगर कहती की वह स्टेडियम मिलेगा तोह मेनका अगला सवाल जरूर करती और मुस्कान भी समझ गई की सामने बात करना गलत हे होगा.

"तुम चाय नहीं पी रही?"

"मैं चाय नहीं पीती. दूध पी चुकी हो पहले हे. आप लोग बैठो मैं जरा आती हु.", मंजू इतना बोल कर बहार चल दी.

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अर्जुन बिजेन्दर की मोटरसाइकिल लिए हे घर के बहार पंहुचा था और छोल साहब के घर के सामने कड़ी उनकी गाडी पर नजर पड़ी. उसको देख कर छोल साहब ने इशारे से हे पास बुलाया.

"जी छोटे दादू. वैसे आप चंडीगढ़ से वापिस कल आये है और आज फिर इतनी सुबह जाने लगे है."

"बीटा जी मैं नहीं जा रहा कही. अलीशा जा रही है वापिस ग्रीस तोह उसको एयरपोर्ट भिजवा रहा हु. तुम ये किसकी मोटरसाइकिल चला रहे हो?"

"दोस्त की है दादू. मेरी खराब हो गई थी स्टेडियम के बहार.", अर्जुन अंदर से आती इस स्वर्ग से उतरी अप्सरा को देखने लगा अपनी बाते कहते हुए. गोल खूबसूरत चेहरा, काले लहराते हुए सीने से निचे तक आते बाल, हलकी घुमावदार और ऐसी कमनीय काया जो साफ़ जाहिर थी की वह हिंदुस्तानी तोह है हे नहीं.

"अलीशा हे इस अर्जुन एंड अर्जुन she's Preeti's मैटरनल आउंट एंड Viky's माँ अलीशा.", दोनों का परिचय उन्होंने हे करवाया तोह अर्जुन ने सीधे खड़े होते हुए हाथ जोड़ कर अभिवादन किआ.

"He's ओने बिग गाए अंकल एंड हैंडसम तू. यू लुक रियली गुड यंग मन.", अलीशा ने मुस्कुराते हुए अर्जुन को सीने से लगते हुए हलके से गाल को चूमा तोह छोल साहब ने भी हलकी सी गर्दन एक तरफ करते हुए अर्जुन को इशारा किआ वैसा हे करने का. उनके गुलाबी मुलायम गाल पर हलके से होंठ रखते हे एक दिलकश खुशबु साँसों में उतर गई. अलीशा का शिकंजा भी हल्का कस गया था अर्जुन पर लेकिन सब इतना जल्दी हुआ के किसी को इसका भान न हुआ. दोनों फिर से तहजीब पूर्वक खड़े थे.

"बीटा प्रीती अभी तुम्हारे हे घर सो रही है. उसको बुला दो जरा.", छोल साहब की बात सुनकर अर्जुन तुरंत वह से निकल लिए. अलीशा का तेज वह अभी तक महसूस कर रहा था. और कैसी खुशबु थी जो वह वह खड़े छोटे दादू को भी भूल गया था. अपनी हे सोच में वह घर के अंदर चला आया जहा उसकी रानी पहले से हे कड़ी थी और आँगन में बैठा ये व्यक्ति अर्जुन को देख कर सीधा खड़ा हो गया.

"बैठ जाओ भैया. तोह आप लेकर आये थे मेरी मोटरसाइकिल?", वह व्यक्ति चाय पी रहा था लेकिन अर्जुन को देख कर कप रख दिए था.

"भैया जी ये तोह शो साहब का ड्राइवर छोड़ कर गया था रात 10 बजे. चाबी इसमें हे लगी है. आप आ गए हो तोह फिर मैं भी जाता हु."

"पहले चाय पी लीजिये आराम से. वैसे आपने किधर जाना है?"

"जी यहाँ से तोह सीधा पहले ऑटो हे लूंगा सिविल हस्पताल का, फिर वही ड्यूटी है मेरी."

"आप वह काले वाली मोटरसाइकिल ले जाना. गोलू नाम का पेशेंट अगर आप खोज पाओ तोह इसकी चाबी उनके हवाले कर देना नहीं तोह फिर तेजपाल मां के ठाणे कड़ी कर देना, बिजेन्दर तक वह पंहुचा देंगे.", अर्जुन ने जैसे हे बिजेन्दर नाम लिए तोह ये व्यक्ति सर हां में हिलने लगा.

"जी वही ड्यूटी है मेरी. बिजेन्दर सिंह के साथ डेड बॉडी लेके उनके गाँव हे जाना है, पंडित जी ने कल रात हे ये काम जिम्मे लगा दिए था.", अर्जुन धन्यवाद करता हुआ उनसे हाथ मिला कर अंदर गलियारे में हे आया था के सीधा प्रीती से टकरा गया. वह भी अपनी हे धुन्न में आ रही थी और अर्जुन से टकराते हे गिरने लगी लेकिन फिर उसकी हे बाहों ने प्रीती को थाम लिए.

"मतलब अब मैं नजर भी नहीं आता?", सब इतनी जल्दी हुआ था और ऊपर से अर्जुन का ऐसा कहना. प्रीती की धड़कन बढ़ गई थी यु अचानक उसकी बाँहों में खुद के होने से.

"वापिस आती हु, प्लीज जाने दो. मैं लेट हो गई हु.", प्रीती बहार देख रही थी जैसे वह कोई उसको बुलाने हे ना आ गया हो और इधर अर्जुन ने सही मौका देख कर उसके होंठो पर हल्का सा चुम्बन करते हुए आजाद कर दिए.

"अभी बताती हु तुम्हे, फायदा उठाने लगे हो.", वह झुंझलाती हुई बहार आँगन की तरफ आई तोह विक्य उन्हें देखने के बाद वापिस जा रही थी. प्रीती सर पे हाथ मरती हुई उसके हे पीछे चल दी.

"पता था के घर पे हम 2 हे लोग है फिर भी पूरी रात बहार. अरे ये तेरे होंठ और हाथ पर क्या हुआ लल्ला?", ललिता जी शिकायत करती हुई एकदम हे घबरा कर अर्जुन को बड़े ध्यान से देखने लगी. मतलब इस से पहले वह 3 लोगो से मिला था और उन्होंने किसी ने गौर न किआ उसकी हालत पर.

"ताई जी, आराम से बैठो आप यहाँ. कुछ नहीं हुआ है मुझे. वह कल मेनका जी को थोड़ा मार्किट लेके गया था और वापिस आते हुए टायर स्लिप हो गया था. मामूली सी चोट आई है लेकिन उस वक़्त आता तोह आपने सबको बता देना था. देखो बिलकुल ठीक हु और वह मेनका जी के थोड़ी सर पे चोट आई थी इसलिए उन्हें डॉक्टर के ले जाना पड़ा और देरी होने के वजह से मैं वही रुक गया. बिलकुल ठीक हु और आप बस दूध बना दो फिर मुझे तैयार भी होना है.", अर्जुन ने अपनी घबराई हुई प्यारी ताई जी को गले लगा कर आस्वस्त किआ तोह वह फिर भी उसको ध्यान से देखने लगी.

"तू कही नहीं जा रहा है. फ़ौज की ड्यूटी नहीं है, स्कूल है. घर पे रह कर आराम कर, कह देती हु.", ताई जी परवाह और हलके गुस्से से इतना बोल कर रसोईघर में चली गई तोह अर्जुन माधुरी दीदी वाले कमरे की तरफ चल दिए. उसको उम्मीद थी की प्रीती यही सोई हो गई आरती दीदी के साथ और वैसा हे था. दरवाजा शायद प्रीती वापिस भिड़ा कर चली गई थी और इस वक़्त अंदर बिस्टेर पर आरती दीदी ast-vyast हालत में दरवाजे की तरफ हे मुँह करके सो रही थी. अर्जुन आराम से उनके पास बैठ कर निहारने लगा. वह तोह हमेशा हे मासूम दिखती थी और अब भी वैसी हे किसी छोटी बची सी वह नींद में डूबी थी. कंधे तक सफ़ेद चादर को अर्जुन ने हलके से नीचे किआ तोह चेहरे पर हलकी सी हंसी आ गई.

आरती को जैसे कपड़ो का भी होश न था या फिर कोई और वजह होगी. उनका एक गुलाबी निप्पल उस ढीली टीशर्ट से हल्का सा बहार निकला हुआ झाँक रहा था. एक बार पूरे उभर को सहलाते हुए अर्जुन ने वापिस टॉप ऊपर किआ तोह आरती ने हाथ पकड़ लिए.

"सोने दे प्रीती की बची, अब दर्द नहीं है."

"ाचा जी, प्रीती यहाँ तक हाथ लगाने लगी है?", अर्जुन ने कान में सरगोशी की तोह आरती ने मुँह चादर में छिपा लिए. उसको ऐसे शरमाते देख अर्जुन हल्का सा अपना भर डालते हुए चादर के ऊपर से हे उनके गाल पर होंठ रखे बैठ गया.

"प्लीज, कोई आ जायेगा. वह प्रीती ने सिर्फ हाथ रखा था यहाँ क्योंकि मुझे अजीब लग रहा था अंदर से.", धीमी आवाज में आरती दीदी ने अर्जुन को अपना सच बताया.

"फिर ये बहार कैसे था? मैंने हे अंदर किआ अभी.", अंदाजे से अर्जुन ने सीने का वही उभर पकड़ते हुए हलके से दबाया तोह वह सिसक उठी.

"सष्ठ.. यही दर्द है. मत करो न अर्जुन."

"दीदी, यहाँ गिल्टी बानी हुई है. आपने इन्हे सख्ती से दबाया था क्या? या कोई चोट लगी इधर?", अर्जुन अब सीधा हो कर बैठ गया था. फिर आरती भी उसकी बात सुनकर खुद को सहज करती हुई एक मिनट में आने का बोल कर बहार चली गई. अर्जुन ताई जी की आवाज सुन्न कर बहार आया तोह बाथरूम का दरवाजा बंद देख समझ गया था के दीदी कहा गई है और टेबल पर उसकी खुराक राखी थी.

"सोने देना था बेचारी को. रात 2 बजे तक तोह ये मेरे पांव दबा रही थी. प्रीती भी मेरे कमरे में हे थी. अब नींद पूरी नहीं होगी तोह सारा दिन आलस चढ़ा रहेगा.", ताई जी की बात सुन्न कर अर्जुन उन्हें देखने लगा.

"आपको क्या हुआ था ? मैं डॉक्टर के ले चलता हु थोड़ी देर में."

"अरे लल्ला जैसा सोच रहा है वैसा कुछ नहीं है. कल सारा दिन आराम हे किआ था और फिर रात में पिंडली की नस चढ़ गई थी. ऊपर से ये दोनों मेरे कमरे में जब आई तोह मैं खुद मालिश करने में लगी थी तोह दोनों लड़किया शुरू हो गई. फिर न सोने दिए और न खुद सोई. चल दूध पी ले फिर आराम कर लिओ. साढ़े 6 बजे है तोह 9 बजे तक नाश्ता तैयार करुँगी. माँ जी का फ़ोन आया था के वह लोग 6 बजे तक आएंगे शाम को.", इधर आरती दीदी बहार आई तोह चेहरा धुला हुआ था और शायद सीने पर उन्होंने पिंजरा पहन लिए था.

"बीटा, तेरी कॉफ़ी भी तैयार है. मैं जरा दिया बत्ती कर दू क्यूंकि माँ जी नहीं है. तुम लोग बैठो.", आरती दीदी सकुचाती सी अर्जुन के सामने बैठ गई और ताईजी हाथ धोने के बाद मंदिर में चल दी, जो कौशल्या जी के कमरे के साथ हे बना था. अगला आधा घंटा तोह अब वह वही रहने वाली थी.

"ये तुम्हे क्या हुआ?", आरती दीदी ने भी अब ध्यान दिए था अर्जुन पर और उनको भी वही कहानी बता दी जो ताई जी से कही थी.

"अब बताओ आप, वह गिलटी कैसे बानी? और आपने ये फिर इनको जकड लिए ब्रा में?", हलकी आवाज लेकिन स्पष्ट शब्द कहने पर आरती एक पल के लिए नजरे झुका कर बैठ गई.

"वह गलती से हो गया जब तुम्हारे पास से आई थी उसके बाद. हो जायेगा ठीक अपने आप हे."

"ऐसे ठीक नहीं होने वाला. दादी की दर्ज में 'ओलिमेसा' की शीशी पड़ी है वह ले कर ऊपर आ जाना नाश्ता करने के बाद. अभी आप ताई जी के साथ रहो.", आरती दीदी जमीन में नाखून गाड़ने लगी थी उसकी ऐसी बात सुन्न कर और अर्जुन ज्यादा कुछ बात कहे बिना दूध ख़तम करता ऊपर चल दिए, अपने कमरे में.

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"Bal-bal बचे हो तुम मेरे भाई. किस्मत ाची थी तुम्हारी जो गाडी से बहार उछले भी तोह ऐसी जगह गिरे जहा जमीन नरम थी और किसी की गोली का शिकार नहीं बने. कुछ कहना चाहोगे?", लकी इस प्राइवेट हॉस्पिटल के वातानुकूलित कक्ष में बिस्टेर पर लेते अपने दोस्त संजीव को चाय पीला रहा था. छाती पर एक फ़ीट चौड़ी पट्टी बंधी थी और सर पे भी 4 टांके आये था. पाँव का जोड़ हिल गया था जिसको सहारे के साथ सीधा करते हुए गुलाबी पट्टी के साथ लपेटा हुआ था. खरोंचे तोह बहोत थी लेकिन शायद वह उतनी बड़ी या दर्द देने वाली न थी.

"मेरा छोटा भाई मुझे कुछ होने नहीं देता लकी. पहली बार वह मुझे अपने से कही परिपक्वा और संजीदा लगा. वैसे तोह वह मुझसे बहोत प्यार करता है लेकिन आज अगर ज़िंदा हु तोह उसकी वजह से. वह अकेला होता तोह मैं भी मर्डर गया होता, 2 हे गोली तोह बची थी जो मैंने मोहर सिंह पर खर्च कर दी थी. वैसे बाकी 2 लोग और थे, उनका क्या हुआ?", संजीव की बात सुन्न कर लकी असमंजस में पड़ गया.

"मतलब उन दोनों का वह हाल तुमने नहीं किआ था?"

"मैंने बताया न भाई के सिर्फ मोहर सिंह मेरे निशाने पर आया था और उसके बाद तोह कोई मेरी गर्दन भी दबा देता तोह मैं शायद हाथ भी न पकड़ा पता उनका. जान हे नहीं थी."

"संजीव, उनमे से एक जिंदगी भर व्हीलचेयर पर रहने वाला है और दूसरा जो गाडी पर मिला था अभी भी क्रिटिकल है. बच तोह जायेगा लेकिन ज़िंदगीभर आम हालत में तोह नहीं रहने वाला. अर्जुन ने किआ उनका वह हाल?"

"ये बात बहार नहीं जानी चाहिए. वह इस केस में कही भी नहीं है ध्यान रखना. और वह क्या कर सकता है ये तोह हम लोग उम्मीद भी नहीं कर सकते.", संजीव भैया का जो हाथ थोड़ा बेहतर था उसमे उन्होंने कप थाम लिए. लकी उठकर एक खिड़की खोलने के बाद सिग्रेटी जलाता हुआ संजीव को काश लगवाने लगा.

"जिस तरह वह तुझे आराम से उठाये था वह देख कर मैं भी समझ सकता हु की वह ख़ास है. लेकिन तुम्हे उस अपराधी भीम सिंह की रिपोर्ट देखनी चाहिए. थोड़ी देर पहले हे डॉ गुलाटी ने सांझी की थी."

"ऐसा क्या था उसमे? कुछ घबराने वाली बात तोह नहीं?"

"उन्होंने रिपोर्ट तोह खैर खुद हे बदल कर सर में गोली लग्न बता दिए लेकिन जैसा उसके शरीर का हाल असली रिपोर्ट में था तोह वह ज़िंदा वैसे भी न रहता. कई जगह तोह गाडी का स्टील 3 इंच तक जिस्म के अंदर था और सर से पाँव तक 27 फ्रैक्चर. किसी ने उसको 5-6 मंजिल से जैसे नीचे फेंका हो. छाती की हड्डी अंदर हे उसके फेफड़े में घुस चुकी थी. अब मैं तुम्हारी बात से इत्तेफ़ाक़ रखता हु के हम लोग उम्मीद भी नहीं कर सकते के वह क्या कर सकता है. बहार वालो पर नजर रखने के साथ उसके ऊपर भी नजर रखनी चाहिए.", लकी के इस मश्वरे पर संजीव भैया के सूजे हुए चेहरे पर एक फीकी हंसी आ गई.

"गलती भी नहीं कर सकते हम ये करने की. उसको मेरे बारे में पता था पहले से हे. उसने पहले भी मेरे से कुछ सवाल किये थे जिनके लिए मुझे झूट बोलना पड़ा और सही कहु तोह hum-tum जितने मर्जी अंडरकवर या शातिर बन्न जाये वह अपनी नादानी में हे हमसे कही आगे है. तूने जहा से फ़ोन किआ था न तोह वह तुझपर भी नजर रखे था. हम सब बस अपना काम करे तोह ज्यादा ठीक रहेगा, अर्जुन पीछे पड़ा तोह वह सिर्फ सही और गलत समझता है. कीमत बहुत बड़ी चुकानी पड़ सकती है मेरे भाई.", संजीव एकाएक गंभीर हो चूका था.

"उसको किसी का सपोर्ट है?"

"एक तरह से तोह किसी का भी नहीं है क्योंकि परिवार का कोई सदस्य ऐसा नहीं चाहेगा. लेकिन कही न कही दादा जी जरूर साथ है. शायद उन्हें भी नहीं पता के अर्जुन कितना कुछ खोजने में लगा है. फ़िलहाल उसके सभी रस्ते बंद हो गए है आगे बढ़ने के. बस तुम अबसे कोई गलती मत करना और मैं भी ध्यान रखूँगा.", संजीव थोड़ा आराम करना चाहता था और लकी ने भी उस बिस्टेर को सिरहाने की तरफ से थोड़ा ऊपर करने के बाद अपने दोस्त को ठीक से लिटाया और कुछ देर बैठने के बाद काम पर चला गया.

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सुबह 8 बजे तक बिजेन्दर अपने कुछ दोस्तों की मदद से मोहर सिंह की लाश हॉस्पिटल से गांव लेके आ गया था. अब परिवार में तोह खास लोग थे नहीं फिर भी antim-sanskaar करना उसका दाइत्व था. पहली बार बड़े परिवार से मधुलता अपनी बेटी ऋचा के साथ उनके गांव आई थी. भंवरी देवी जो बिजेन्दर की बड़ी मामी थी, उनसे गले लग कर मिली थी. माहौल ग़मगीन था क्योंकि उस पीढ़ी का मोहर सिंह आखिरी व्यक्ति और एक तरह से सितारा देवी का वारिस हे था. नोहरे में पुरुषो के लिए अलग व्यवस्था की गई थी जिधर बिजेन्दर सब देख रहा था. मिलने वाले वही शोक मन रहे थे. घर में अनुपमा का भी थोड़ा बुरा हाल था, आखिर बाप तोह मोहर सिंह हे था उसका चाहे वह कैसा भी था चरित्र से. अक्षरा हमेशा से वही सपाट चेहरा लिए काम कर रही थी.

"ाचा किआ मुन्नी तू चली आई बेटी. हमने तोह उम्मीद हे न थी की उस घर से कभी यहाँ कोई आएगा. मेरे सारे बेटे भगवन को प्यारे हो गए.", सितारा देवी की आँखें सूख चुकी थी रो रो कर लेकिन मधुलता और ऋचा के गले लगते हे वह फिर भावुक हो गई. ऋचा ने हे अनुपमा को संभाला और हिम्मत बंधे.

"सुशीला दीदी कैसी है अब?", मधुलता ने बबिता से गले लगने के बाद अपनी जेठानी का भी पता लेना उचित समझा.

"माँ ने छुट्टी न मिलती चची अभी. आरर ठीक भी है उसका वही रहना. मां जिह्सा भी था घर में एक बड़ा तोह था लेकिन वह भी न रहा. बात बुरी लगेगी लेकिन मैं फेर कहूँगी के हादसे होते रेहवे है लेकिन इंसान का फ़र्ज़ है उनसे सीख लेना और परिवार में रहना. सबने देख लिए के बुरा करना और चाहना कड़े ठीक कोणी होव. बलवान बेचारा अपने घर का एकलौता जवान छोरा था चची. के गलती थी उस बेचारे की? उसकी पत्नी पेट से है आरर बाप पहले हे कोणी था बलवान का. किसे भी घर से कोई एक की मौत कोणी होइ चची, परिवार मारे गए सबके सिर्फ माँ की ज़िद्द आरर लालच से.", बबिता ने जितनी सख्ती से अपनी बात शुरू की थी उतनी हे जल्दी उसके चेहरे पर आंसुओ की बाढ़ आ गई थी.

"बेटी मैं समझ सकती हु के तू अपनी माँ से प्यार करती है इसलिए जो सुशीला ने किआ तूने कभी विरोध न किआ लेकिन तू साथ भी नहीं थी. आखिरी मौका तोह सबको मिलना चाहिए.", मधुलता का दिल भी अलग हे था जो इतनी बड़ी बात कह रही थी, सबकुछ जानते हुए.

"चची, बिजेन्दर बेशक माँ ने और मौके दे लेकिन मेरा तोह जी भर लिए ेब. इनके फूल चुग्ग लिएवे बिजेन्दर फेर या तोह माँ आड़े रह्वेगी या मैं. बेटी हु तोह सेवा करुँगी लेकिन छुट्टी मिले पाछे दादी के पाँव पकड़ के माफ़ी मांगे आरर प्रायश्चित्त करे.", चेहरा साफ़ करने के बाद बबिता भी गाँव की महिलाओ के पास बैठ गई. कुछ हे समय बाद मोहर सिंह के शरीर को अर्थी पर लिए पुरुष sadasya/gaanv के लोग शमशान चले गए. हवेली के आँगन में लोग शोक करते रहे और मिलने आते रहे.

"सुकन्या नहीं आई अक्षरा?", ऋचा अनुपमा के कमरे में थी जहा जुड़वाँ अक्षरा उनके लिए चाय लेके आई थी.

"वह समझदार है जो इन सबसे अलग रह कर अपनी ज़िन्दगी बना रही है. बाप उसका भी नहीं था लेकिन दीदी बदलाव का महत्व जानती है और इन जंजीरो में वैसे भी कौन रहना चाहेगा.", अक्षरा हमेशा शांत रहती थी लेकिन फ़िलहाल वह बोलना चाहती थी.

"तुम भी तोह जंजीरो से निकल सकती थी?", ऋचा की बात सुन्न कर वह अपनी 10 मिनट बड़ी बहिन को देखने लगी जो सर झुकाये बैठी थी.

"ये है मेरे यहाँ रहने की वजह. हमारे बाप ने तोह पूरी कोशिश की थी की यहाँ न रह कर आपकी तरह बहार रहे. कुछ बने और ज़िन्दगी में अपना मुकाम बनाये. आप तोह साल बाद सरकारी अफसर बन्न जाओगी लेकिन मेरी ज़िन्दगी इसकी वजह से अँधेरे में हे रह गई. इसको संभालती रही हु और इस घर पे भी नजर रखती रही. बड़ी बहिन ये है लेकिन बिजेन्दर के सिवा कभी इसको कुछ दिखा नहीं. मज़बूरी है के मैं प्यार करती हु इस से नहीं तोह मैं तोह यहाँ एक पल न रूकती.", अक्षरा की कड़वी बात में जरा भी झूठ न था. अनुपमा के आँखों में ये नए आंसू आ गए थे अपनी छोटी बहिन की हालत देख कर.

"कोई बात नहीं, गुस्सा मत हो. पापा ने कहा है के वह सोमवार को तुम्हारा Ph.D. के लिए आवेदन दे देंगे. हॉस्टल में रहोगी पंजाब यूनिवर्सिटी में तोह जो दिल करे वह करना. मैं भी मिलती रहूंगी और इसको करने दो शादी, उम्र है इसकी और कोई तोह सपने पूरे करे अपने.", ऋचा ने अक्षरा का एक हाथ थामे हुए हे अनुपमा का सर सहलाते हुए समझाया.

"इस से तोह गुस्सा हो भी नै सकती मैं. शायद ये माँ पे चली गई और मैं बाप पे. ओह घर की बहुरानी, तेरा खसम आ गया है नीचे जा के कपडे दे उसको. शमशान से आया है.", अक्षरा की बात सुनकर अनुपमा रोटी हुई उसके सीने से लग गई.

"चुप हो जा चल. तेरे सामने हे तोह बोल लेती हु यार. और सुना नई के मैं सोमवार को जा रही हु, इतने कमरे में तू मेरे हे साथ है. समझले mummy-papa वाला रिश्ता बस 4-5 दिन का रह गया अपना. इतने रोना बंद कर और जा के काम कर थोड़ा.", ऋचा ध्यान से सुन्न रही थी उसकी बार और फिर आंसू साफ़ करती हुई अनुपमा बहार निकल गई.

"ये कोनसा रिश्ता है तुम दोनों का?"

"Mia-biwi वाला. अभी तोह बताया था आपको के मैं पापा पे गई हु और ये माँ पे. 11 के बाद सुबह 4 तक मेरे साथ हे सोती है. कमरे दिखने को अलग है मेरे लेकिन हम दोनों को नींद एक दूसरे के साथ हे आती है. चलो आप भी नीचे आ जाओ mooh-hath धो कर. चची वापिस जाने वाली है.", अक्षरा का ये अंदाज अलग हे था लेकिन जैसे ऋचा को अंदेशा था और वह दोनों जैसे एक दूसरे को बेहतर जानती थी. दिन के 11 बज चुके थे.

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इधर रामेश्वर जी के घर पे सुबह साढ़े 9 बजे रोजाना से अलग सिर्फ 3 लोग थे. ललिता जी दोनों को नाश्ता करवाने के बाद अब कपडे धोने लगी थी. सामने कश्यप जी की बहु उनसे बातें करती हुई कपडे धुलवाने में मदद भी कर रही थी. ललिता जी ने तोह मन किआ था लेकिन सरोज हंसती हुई अपना पल्लू कमर में खोंसती हुई बाल्टी से कपडे खंगाल कर उन्हें पकड़ने लगी.

ऊपर अर्जुन कुछ काम करने के बाद कुर्सी पर बैठा हे थे की इस आहात से पलट कर देखने लगा. दरवाजे से अंदर आ कर आरती दीदी सेहमी सी नजरे झुकाये कड़ी थी.

"आ जाइये इधर. मुझसे डर लग रहा है क्या आपको?", अर्जुन की बात सुन्न कर वह ना में गर्दन हिलती हुई उसकी कुर्सी के पास चली आई.

"घर में ताईजी है?"

"ाचा तोह इस बात से परेशां है आप. वह 2 घंटे से पहले तोह काम ख़तम करने से रही. साथ हे वह ऐसे ऊपर नहीं आती जबतक जरुरी काम न हो.", अर्जुन ने उनके दोनों हाथ पकड़ते हुए प्यार से उनके भोले चेहरे को देखा.

"वैसे भी मैं कुछ करने नहीं वाला जिस से आपको दिक्कतत हो.", अर्जुन खड़ा हो कर उन्हें बीएड की किनारे बैठते हुए वह तेल की शीशी साथ रखे छोटे स्टूल पर रखता उन्हें सीधा लेटने को बोलने लगा.

"फिर भी अर्जुन.", वह हल्का घबरा रही थी लेकिन सीढ़ी लेट कर बस उसको देखने लगी. अर्जुन उनकी कमर के पास बैठ कर आराम से टीशर्ट ऊपर करने लगा. उसने तोह आरती के सीने पर नजर तक न डाली थी. हाथ उन उभारो पर हलके से लगते हे वह समझ गया दीदी ने ब्रा नहीं पहनी हुई.

"आपको जो सिखाता हु वह रात में सोने से पहले खुद भी कर लेना.", वह रंगहीन तेल हाथ पर डालने के बाद सिर्फ एक नजर दीदी ने निर्वस्त्र गोल उभारो को देख कर उसने हलके से एक उभर को किनारो से पकड़ते हुए घडी की दिशा से उसपर तेल से मालिश शुरू कर दी. न ज्यादा दबाव और न सख्ती. वह अलग बात थी की उसके ऐसे खुले स्पर्श से आरती दीदी की आँखें बंद हो चुकी थी और निप्पल उभर कर सख्त हो गया था. फिर सतांन की जड़ से निप्पल तक दोनों हाथो से मालिश करने लगा. हाली गिल्टी का एहसास अब हुआ था.

"ऐसे हे एक बार clock-wise और फिर बॉटम तो टॉप. 5-5 मिनट करना.", अर्जुन ने उन्हें समझाया तोह वह आँखें खोल कर उम्मीद से उसको देखने लगी.

"इधर वाले पर भी कर दो."

"ठीक है.", वह हँसता हुआ उनके चेहरे को निहारने लगा.

"मैं ाची नहीं लगती तुम्हे?"

"आप पागल हो दीदी? मुझे तोह आप बड़ी प्यारी लगती हो और वैसे आप हो भी प्यारी और मासूम. सुबह मैं आपके पास बैठा यही देख रहा था.", अर्जुन मालिश करते हुए महसूस कर रहा था के ये उभर बिलकुल दुरुस्त था. लेकिन फिर उनका खुद हे उसको कहना बहोत कुछ बता रहा था.

"मुझे वैसे हे किश करो जैसे कल की थी.", आरती दीदी की ऐसी मांग सुन्न कर अर्जुन ने इस बार दोनों उभारो पर हाथ रखते हुए उनके ऊपर झुक कर दोनों गुलाबी होंठो पर अपने होंठ रख दिए. आरती दीदी जैसे सचमुच अंदर से भरी हुई थी जो उस से लिपट कर खुद हे बेतहाशा चूमने लगी. अर्जुन उभर से हाथ हटाने लगा तोह खुद उन्होंने वापिस हाथ वही रख दिए. फिर हलके से शरीर कांपने लगा तोह वह होंठ मुँह में भरे हे ृक्क गई. हाथ अर्जुन से लिपटे उसको अपने से लगाए वह अर्जुन की आँखों में देखने लगी.

"मुझे तुम्हारे साथ अकेले रहना है पूरा दिन.", उनकी ऐसी मांग जायज थी. कितने समय से आरती दीदी घर पे थी और अर्जुन को प्यार करने के बावजूद आजतक एक पल खुदसे नहीं माँगा था उन्होंने.

"मेरे साथ पंजाब चलेंगी संडे को? मैं प्रियंका दीदी को बोल दूंगा के वह यही रहे और आप मेरे साथ चल पड़ना. संडे आपके साथ और मंडे काम होने के बाद जब आप कहेंगी हम वापिस आ जायेंगे.", अर्जुन ने टीशर्ट ठीक करने के बाद उनका चेहरा प्यार से सहलाते हुए कहा तोह आरती दीदी ने उसका हाथ अपने गाल पर हे दबा लिए.

"दीदी को साथ हे चलने दो, जहा तक मुझे मालूम है उनका भी दिल होगा तुम्हरे साथ रहने का."

"फिर कैसे मुमकिन है मेरा आपके साथ वह अकेले रहना?"

"वह मैं अपने आप कर लुंगी बस दादी को बोल देना के तुम मुझे भी लेकर जा रहे हो अपने साथ. मैं उन्हें समझा दूंगी की मेरे कॉलेज में मेरा हे जाना जरुरी है.", अर्जुन ने हामी भरते हुए इस बार खुद हे उनके होंठो को चूमा और फिर खड़ा हो गया.

"जैसा आप कहे. और अब अपने कमरे में जा कर थोड़ी देर इन्हे आजाद कर के लेट जाना.", अर्जुन की बात पर वह खुश होती हुई उसका गाल चूम कर नीचे चली गई. अर्जुन भी हाथ धोने के बाद अपनी डायरी खोल कर बैठ गया. जाने वह क्या लिखता रहा वह अगले 5-6 मिनट.

"तोह भैया जी यहाँ हो आप. पूरे घर में ढून्ढ लिए मैंने आपको.", अर्जुन इस मीठी चहकती आवाज को सुन्न कर दांग रह गया. सरोज भाभी उसके कमरे में आ गई थी.

"भाभी आप तोह गीली हो कर आई हो. आज होली तोह नहीं है.", अर्जुन ने गर्दन घुमा कर हरे ब्लाउज और साड़ी में कड़ी सरोज भाभी के शरीर का पूरा जायजा लेते हुए कहा. ब्लाउज शरीर से चिपका हुआ था और पानी की वजह से रंग और गहरा दिखने लगा. गोर उभर हलके से बहार तक आये हुए चमक रहे थे. सफ़ेद पेट पर नाभि से नीचे बंधी साड़ी और उनका शरारती चेहरा देख कर अर्जुन खुद हे शर्मा गया.

"खेल लो होली देवर जी. मैंने तोह मन भी नहीं किआ कभी. उल्टा कही पिचकारी काम नहीं करती तोह बात अलग है. वैसे तोह उसदिन भी पीछा छुड़ा के भाग आये थे.", वह आगे की बात सुने बिना उसके करीब हे बिस्टेर के किनारे बैठ गई थी.

"आंटी वही थे भाभी और आप तोह कमाल हे हो. सीधा मेरा गाल हे चूम लिए. ऐसे कौन करता है.?", अर्जुन हलकी शर्म से इतना कहता फर्श देखने लगा.

"आये हाय देखो तोह कैसे गाल लाल हो रहे है. लड़की मैं हु और शर्मा तुम रहे हो. गाल हे चूमा था कौनसा कपडे उतरने लगी थी. और रही मेरी सास की बात तोह सबको पता है के वह घर से क्यों नहीं निकलती. पास का तोह फिर भी नजर आ जाता है उन्हें चश्मे से लेकिन 6 फ़ीट दूर तोह सब रंग बराबर है. ग्लूकोमा है उन्हें. वैसे अब तुम हो हे इतने प्यारे तोह भाभी कैसे न चूमे.", सरोज भाभी जब भी दूर से देखि थी तोह हमेशा शर्माती या नजरे चुराती देखि थी अर्जुन ने लेकिन पिछली 4-5 बार से तोह वह जैसे अर्जुन को हे चुप्प करवा देती थी.

"भाभी, आप जानती हो की जो हुआ वह गलत था और अगर आगे बढे तोह वह भी गलत हे होगा. मस्ती मजाक कभी कभी बहार निकल जाता है.", अर्जुन ने हिम्मत करते हुए उनका गोरा हाथ पकड़ते हुए अपने दिल की बात कह दी. वह जहा उसके द्वारा हाथ पकड़ने से खुश हुई वही बात सुन्न कर नजरे झुका ली.

"शादी को साल भर तोह हो चूका है अर्जुन लेकिन मेरी सब उम्मीद दम छोड़ चुकी है. बहार बेगैरत होने से तोह ाचा है के तुम्हारे हाथो हे खुद को सौंप दू. तुम बहनो और परिवार के बीच पीला बढे समझदार लड़के हो जो मेरे साथ अपने सम्बन्ध बहार नहीं जाहिर करोगे.", सरोज भाभी ने चाँद शब्दों में हे अपनी ज़िन्दगी का सच उसके सामने रख दिए था. अर्जुन अचरज से कभी उन्हें देखता कभी उनके ठन्डे हाथो को.

"सच कहु तोह तुम्हारे भैया का सम्बन्ध किसी और से है. वह भी शादी से पहले से हे. उन्हें मैं सिर्फ घर के हिसाब से पसंद हु, बहु की तरह. पत्नी नहीं. तुमने तोह देखा हे होगा के वह neem-andhere निकल जाते है फिर 2-3 दिन बाद आना और फिर वापिस चले जाना. मेरे saas-sasur बहोत ाचे है और मैं उनके साथ खुश भी हु."

"भाभी आप खुश है तोह फिर ये सब क्यों? और कोनसे सम्बन्ध ऐसे होते है जिन्हे बहार नहीं जाहिर करते? Devar-bhabhi का हे तोह रिश्ता है.", अर्जुन ऐसे वक़्त में कोई कदम पहले नहीं लेने वाला था. बेशक भाभी की बात दुःख पहुंचने वाली थी और उसको हमदर्दी भी थी.

"इसको खुश दिखना कहते है, रहना नहीं अर्जुन. औरत हु गाये नहीं की खरीद लाये और खूंटे से बांध दिए. यहाँ शादी परिवार की मर्जी से की मैंने क्योंकि एक तोह ये लोग ाचे भी है ऊपर से बिना किसी मांग के सादे तरीके से ब्याह करके लाये. मेरी 2 और बहने है लेकिन उनके ऊपर सिर्फ मेरी माँ है. 3-4 साल में उनकी शादी के वक़्त मेरी सूनी कोख बहुत कुछ कह जाएगी. लेकिन तुम नहीं समझ सकते क्योंकि हो सकता है मेरा ऐसे खुदको थाली में परोसना तुम्हे मेरा अलग हे चरित्र दिखता हो.", वह अब गीली आँखे लिए वह से उठ कर चलने लगी लेकिन हाथ तोह अभी तक अर्जुन के हाथ में था.

"ऐसे कैसे चली जाएँगी आप? इतनी देर से अपनी कही जा रही है और फिर देवर से रूठ को जाओगी कहा?", अर्जुन ने हलके से अपनी तरफ उन्हें झटका तोह वह उसकी बाहों में आ लगी.

"भाभी, माफ़ करना मैं पहले बात समझना चाहता था. ऐसा है न के ये देवर शरारत करता नहीं लेकिन अगर गलती हो जाये तोह रुकना भी नहीं आता. अब जरा आखिरी सवाल का जवाब भी दे हे दो.", अर्जुन ने उनकी गुदाज नरम कमर पकड़ते हुए हौले से कहा.

"बहोत बुरे हो तुम. पूछो अब भी कुछ रह गया हो तोह.", वह सजल नेत्रों से उसको पल भर देखने के बाद उसके सीने से लगी रही.

"आपका राजदार कौन है? ऐसा कदम किसी को विश्वास में लिए बिना तोह मुमकिन नहीं.", अर्जुन साड़ी के ऊपर से हे उनके बहार की तरफ निकले मॉटे नितम्भ का जायजा लेते हुए बोलै.

"ललिता आंटी को मैंने सब बताया है. एक वही है जिनके साथ मेरी ाचे से बोलचाल है और उन्होंने भी कहा था के अगर तुमने इंकार कर दिए तोह फिर वह कोई मदद नहीं करेंगी. प्लीज उनके सामने ये मत कहना.", ड्राइंग रूम का दरवाजा बड़े आराम से बहार से बंद हुआ और अर्जुन ताईजी के ऐसा करने पर mand-mand मुस्कुरा रहा था.

"भैया ने थोड़ी म्हणत की है या सब मुझे हे करना होगा?", अर्जुन वैसे हे उन्हें लिए खड़ा था और ऐसी बात ने सरोज भाभी के चेहरे पर भी लाली ला दी थी.

"3-4 बार किआ है लेकिन बताया न 2-3 मिनट बस. न करते तोह फिर मेरी हालत इतनी बुरी नहीं होती."

"हालत ज्यादा भी बुरी हो सकती है. और आप अभी तैयार है?"

"तुम्हारी छुट्टी खराब तोह नहीं जानी चाहिए.", फिरसे उनके लाल अधरों पर पुराणी मुस्कराहट आ गई थी. ज्यादा समय न खराब करता वह उनके साथ हे बिस्टेर पर देह गया. सरोज भाभी चंचल होने के साथ हे एक भरपूर उन्नत्त शरीर की मालकिन थी. आज वही नरम मांसल जिस्म अर्जुन के शरीर के नीचे दबा था. जल्दी हे दोनों बिस्टेर पर एक दूसरे से उलझते हुए शरीर से खेल रहे थे.

"रुको, घर भी जाना है मुझे.", उसके बाहुपाश से निकलती वह खुद हे 2 मिनट बाद सिर्फ सफ़ेद ब्रा और हरे पेटीकोट में उसके सामने थी. हल्का सा उभरा चिकना पेट और मॉटे मॉटे तने हुए अनार अर्जुन को दिखती वह जुल्फे पीछे करने के साथ हे उसकी गॉड में आ बैठी.

"घर जाने में वक़्त लगेगा भाभी.", अर्जुन ने ब्रा के ऊपर वाले अनावृत हिस्से पर होंठो से प्यार जतय और वह भी कमर आगे करती उसका सर अपने अनारो के ऊपर दबाने लगी.

"आठ.. देरी तोह ठीक है लेकिन फाटे हाल जाने पर सवाल हो सकते है.. उम्", जल्द हे ब्रा की दोनों पत्तिया ढीली हो चुकी थी. भूरे तन्ने हुए निप्पल उंगलिओ से मरोड़ता वह अब भाभी के होंठो को चूम रहा था. सरोज भाभी को भी ये नया एहसास हुआ जो कपड़ो के ऊपर से हे उनके नरम खजाने पर लग रहा था. लेकिन अर्जुन का हर स्पर्श आग भड़का रहा था उनके तन्न में. बेपरवाह सी वह उसकी पकड़ में मचल रही थी. जल्द हे दोनों मॉटे उभर अर्जुन के पंजो के साथ हे होंठो के कलाकारी देखने लगे.

"शठ.. आठ.. आराम से बाबा.. ये नाजुक है.", मस्ती और हलके दर्द में कमर पीछे होने लगी थी और ऐसे करते देख अर्जुन ने उन्हें बिस्टेर पर हे लिटा दिए. अब वह खुलकर उनके दोनों चुके पीटा और मसलता पेटीकोट की गांठ खोल चूका था.

"मेरी छुट्टी का आपको पता था.?"

"आठ.. बातें बाद में कर लेना प्लीज. कल मुझे पता लगा था के घर के लोग आज शाम आने वाले है.. उम्म्म. मैंने रिक्वेस्ट की थी की आह्हः.. वह मेरी मदद कर दे.. बाकी मैं कर लुंगी.. उम्.", वह टाँगे उठाना चाहती थी लेकिन अर्जुन ने भरपूर उजाले में पहले उन्हें निर्वस्त्र करना हे उचित समझा. पेटीकोट के नीचे कोई कच्ची न थी. नाभि से 3 इंच नीचे आधी हथेली जितने हिस्से में वह महीन बाल बता रहे थे की उन्हें जैसे aaj-kal में हे साफ़ किआ गया हो. जाँघे मोटी और भरव्दार आपस में चिपकी हुई सरोज भाभी का खजाना छुपा रही थी.

"दर्द होगा आपको.", अर्जुन ने जैसे हे उनकी तागे दूर की तोह सामने वह गुलाबी मोटी फांके जैसे इन्तजार हे कर रही थी. हल्का सा निचला हिस्सा गहरे रंग का था लेकिन कही भी कोई बाल नहीं.

"मुझे नहीं लगता के दर्द होगा. और होने दो जो होता hai...aahhh..", नर्म दहकती छूट में एक ऊँगली जाते हे अर्जुन जैसे निरिक्षण करने लगा. पहली ऊँगली हे अंदर मुश्किल से सर्कि थी लेकिन चिकनाई बता रही थी को वह उत्तेज्जित है. सामने तेल पर नजर पड़ते हे अर्जुन आरती दीदी का शुक्रिया ऐडा करने लगा. ाची तरह भाभी की छूट तेल से टर्र करने के बाद वह भी अपना पजामा उतर कर एक तरफ बैठ गया. जड़ से सुपडे तक चिकना करने के साथ हे वह बिना देरी किये उनके ऊपर किसी बादल की तरह चा गया था. अब सरोज भाभी को पता चला था के वह सच में हे कही ज्यादा बड़ा और चौड़ा है. सेहत तोह देखि थी उन्होंने लेकिन निर्वस्त्र दोनों आज हे थे.

"चीखना मैट.", अर्जुन के दिमाग में कुछ और हे चल रहा था जो वह आज कुछ अलग कर रहा था. लेकिन सरोज भाभी का कंठ सूख गया जब वह दहकता हुआ मोटा सूपड़ा उनकी छूट पे आ टिका. टाँगे चौड़ी थी और घुटने मुड़े हुए. अर्जुन बीच में सही आसान लिए एक हाथ से उनका कन्धा पकडे होंठो पर होंठ रखता हल्का दबाव देने लगा तोह भाभी की गर्दन 'ना' में हिलने लगी. लेकिन आँखें बंद करती वह अगले हे पल तैयार भी हो गई थी.

"Ummmm..maahhh...iiiiiiii", होंठो से होंठ तोह अलग न हुए लेकिन उनकी मोटी छूट की फांके औकात से ज्यादा दूर तक फ़ैल चुकी थी इस दबाव के साथ लगे धक्के से. 3 इंच लुंड उन गुलाबी होंठो के अंदर फंस गया था और अर्जुन की जीब भाभी के दांतो में दबी थी. एक हल्का धक्का और मारते हे भाभी का कौमार्य भी भांग हो गया.

"Aahhhiiiiii..maar दिए .. अर्जुनंनं.. फट गई है meri..aahhh..", आँखों से पानी और छूट से खून एक रफ़्तार से हे बहार निकल आये. शरीर सुन्न हो गया था जैसे गरम लोहा उनकी छूट को फाड़ता अंदर बैठ गया हो. अर्जुन आधे से ज्यादा लुंड अंदर फंसाये अब उन्हें सेहला रहा था. 3-4 मिनट बाद आवाज निकली तोह अर्जुन ने पानी की बोतल भाभी के होंठो पर लगाई. गाला और होंठ गीले होते हे वह दर्द भरे चेहरे से इस जालिम को देखने लगी जो दूसरे हाथ से उनका एक चुका बेदर्दी से मसलता हुआ लाल करने पे तुला था.

"कहा फंस गई मैं इस चक्कर में.. आह्हः.. फाड़ के रख दी तुमने आह्हः.. ऐसे कोण करता है..?"

"भाभी पहली बात तोह आपने सेक्स किआ हे नहीं था. दूसरा आपका कौमार्य सख्त था, मैंने खुद ऊँगली से चेक किआ था. ऐसा नहीं करता तोह हम कुछ कर नहीं सकते थे. झूठ क्यों बोलै आपने?"

"कैसे कहती की उनका काम हे नहीं करता.. उन्न्नन.. पर तुम्हारा इतना बड़ा है बता तोह सकते थे. जान निकल रही है मेरी."

"दर्द तोह मुझे भी हुआ भाभी.. आपका शरीर dubla-patla होता तोह मैं करता भी नहीं. वैसे हो आप पक्की भाभी हे.", अर्जुन ने एक मुस्कान के साथ फिर से उनके होंठो को मुँह में लेते हुए उतने हे लिंग को हलके से थोड़ा निकल कर आधा हे रास्ता खोलना शुरू किआ. वह उसकी मजबूत पकड़ में हलकी तड़फ रही थी लेकिन अगले 5 मिनट में हे गुलाबी दीवारों का सूखापन काम होने लगा.

"आह.. बेदर्दी हो देवर जी.. उम्म्म.. आह्हः.. सचमुच मार हे डोज अगर कोई ठंडी लड़की गले पड़ गई तोह.. उम्.. आह्हः..", भाभी अभी इतने में हे बेहाल थी और अर्जुन अपनी ताईजी के बारे में सोच रहा था.

"भाभी, अभी आधा बहार हे है. मुझे लगता है इतने में हे आज संतुष्ट हो जाओ बाकी अगली बार अंदर करूँगा.", अर्जुन की बात सुन्न कर सरोज भाभी ने आँखें बड़ी करते हुए हाथ नीचे लगाया तोह फिर से सांस अटक गई. अर्जुन समझ गया के ये इतना हे झेल सकती है. प्यार से अगले 3-4 मिनट में हे उन्हें खाली करके वह अलग हुआ तोह सरोज भाभी आँखें बंद किये अपने मुनिया सेहला रही थी.

"ठीक कहा तुमने. पूरा लेना मेरे बस में भी नहीं, चाल खराब तोह अभी हो गई होगी. आह्हः.. लेकिन तुम्हारा?"

"भाभी आप आराम करो थोड़ा मैं ठीक करता हु आपको. और उसके बाद चुपचाप ये बहार वाले रस्ते से हे घर चली जाना.", अर्जुन बाथरूम से हल्का गरम पानी लेके आया और उनकी लहूलुहान छूट को ाचे से साफ़ करते हुए ध्यान भी देने लगा के ज्यादा नुक्सान न हुआ हो. कपडे पहनाने के बाद खुद हे उन्हें खड़ा किआ.

"देवर जी.. आठ.. ये सब मेरे घर हे करना ..आठ. अभी तोह जैसे तैसे पहुंच भी जाउंगी लेकिन ये अजगर पूरा ले लिए तोह उठने वाली नहीं.", अर्जुन का लिंग चुतरस में भीगा अभी तक अकड़ा हुआ था. सरोज भाभी ने पहली बार हे शायद एक ढंग का लुंड देखा था. सरोज भाभी ग्रिल पकड़ती अपने घर के लिए निकल गई और अर्जुन कुछ सोचने के बाद नहाने चला गया. 15 मिनट बाद वह अब नीचे दादा जी के कमरे में के नंबर मिला रहा था.

"जी अर्जुन शर्मा, उमेद चाचा को इतना बता दीजिये.", सामने वाली तरफ जो भी था उसने अर्जुन को लाइन पर रखते हुए दूसरी तरफ की लाइन पर बात की. जल्द हे दोनों बात करने लगे. इस वक़्त अर्जुन चौकस भी था और बात भी सावधानी से कर रहा था. 10 मिनट बाद कुछ निश्चिन्त होता वह वही पसर गया.

"हाँ तोह मेरा गिफ्ट पसंद आया लल्ला?", ताईजी उसके पास आ बैठी थी.

"ताई जी ऐसे गिफ्ट देने से पहले ये तोह सोचा कीजिये के कही मैं हे न फस्स जाऊ. ऊपर से वह पहली बार कर रही थी.", अर्जुन थोड़ा संजीदा था इस वक़्त.

"बीटा, भली लड़की है वह और किसी का घर बस रहा हो तेरी वजह से तोह वह गलत तोह नहीं. हाँ वह पहली बार ये कर रही है ये मुझे भी नहीं पता था.", ललिता जी कुछ सोचने लगी थी.

"पहले मेरे साथ ऊपर चल के देखो क्या हो गया उधर.", अर्जुन उन्हें हाथ पकड़ कर अपने साथ लिए चला और ललिता जी भी किसी आशंका के बारे में सोचती तुरंत साथ हो ली. वह उस से आगे चलती कमरे में आई तोह इधर अर्जुन ने दरवाजा बंद कर दिए.

"क्या हुआ, ये खून तोह चल उतर जयेगा. और क्या है इधर?"

"और ये है ताई जी.", अर्जुन ने पीछे से उनके दोनों गुब्बारे जकड लिए. वह एक पल को रूकती फिर मुस्कुराने लगी.

"ाचा तोह अपनी हे ताई से होशियारी. चल देखु कितना जोश बाकी है उसके साथ करने के बाद.", यहाँ दोनों मजबूत शरीर मिले थे और अगले आधे घंटे में अर्जुन उन्हें 3 बार खली करने के बाद अंदर हे फारिग हो कर बराबर लेट चूका था.

"तू सचमुच घोडा है रे. आराम से नहीं कर सकता था क्या? सब हिला कर रख दिए मेरा.", ताई जी भी गहरी सांसें ले रही थी. उनके वह गोश्त से भरे मॉटे चुके दोनों तरफ से छत्त को देखते अर्जुन को जैसे और उत्तेज्जित करने लगे.

"जो आग लगाई है न ताई जी वह तोह अब निकलूंगा मैं. और आगे से ये सब पहले मुझे पता होना चाहिए.", अर्जुन ने उनका फूला हुआ गाल मुँह में भरते हुए दोनों खरबूजे पकड़ लिए. ताई जी तोह जैसे खुद हे तैयार थी की वह उनका हर अंग झकजोर दे. मॉटे भूरे निप्पल चूसक्ता वह एक बार फिर उनके यौनकुंड में पूरा उतर गया था. बस इस बार प्यार करने का तरीका पहले सा तेज न हो कर धीमा और गहरा था.

"आह.. तू हे मेरा ख्याल रखता है.. उम्म्म.. पता है तू पीछे से लिए बिना नहीं जाने देगा. ाः.. करले रे..", ताईजी इस बार 5-6 तगड़े धक्के में हे जवाब दे गई थी. अर्जुन उन्हें सीधा लिटाये हे दोनों भरी चिकनी टाँगे ऊपर उठता गांड के भूरे चले को निहारने लगा. सचमुच ताईजी हे तोह थी जिनके हर अंग में कामुकता और चर्बी भरपूर भरी थी. जैतून के तेल की बूंदे उधर टपकता वह इस मुद्रा में हे उनके पिछले छेड़ को उभरे अपना गुलाबी सूपड़ा वह टिकता दोनों मॉटे चुचो को पकड़ कर दबाव बनाने लगा.

"आठ.. घोडा है रे तू.. ाहहममममम.. लगता नहीं फिर तेरा ताऊ कुछ कर payega..aahhh.", उस गहरी गुफा में पल प्रतिपल अंदर जाता वह विकराल लुंड कूल्हों को छोड़ने लगा था. इधर अर्जुन जबड़े भींचे पूरा अंदर उतार कर उनसे जुड़ गया. हवा में ऊपर उठी मोटी जाएंगे और उनके बीच फंसा वह 9 इंच का बांस दोनों को एक पल आराम देता ठहर चूका था. जल्द हे अर्जुन ने गति पकड़ी और उनके मॉटे निप्पल चूसता वह अपनी ताई जी के इस छेड़ का पूरा मजा ले रहा था. ललिता जी भी जैसे अब guda-dwar के बिना पूरा सुख महसूस नहीं करती थी. अर्जुन का चेहरा उठती वह खुद उसके होंठो को खाने लगी और आते के तरह अर्जुन दोनों बड़े स्टैनो का भरपूर मर्दन करने में लगा रहा.

"ताईजी.. आठ. सचमुच यहाँ अलग हे लगता है.. aahh..Har धक्के पर वह अंडकोष तक गांड के छेड़ पर भीड़ रहा था. चुके लाल पद चुके थे और दोनों पसीने में नैहए हटने का नाम नहीं ले रहे थे. पूरा बहार खींच कर अर्जुन ने एक हे बार में उनकी छूट में तेल दिए.

"आह.. तू जानता है रे चुदाई कैसे करते है. आह्ह्ह्ह.. मममम.. कर मेरे लल्ला.. आठ.. बहुत दिनों बाद तू मिलता है रे.", अब वह भी उन मोती फैंको के बीच थोड़ा चैन से चुदाई करता जहा तहा ताईजी को चूम रहा था. लुंड फिर से फूलने लगा था और इस बार शायद पहले से भी कही भयंकर और दोनों एक साथ हलकी कंपकंपी से झड़ते चिपके रहे.

"पेट से न हो जाऊ इसलिए दवा लेनी शुरू कर दी है तेरे इस डंडे की वजह से.. लेकिन सच में सुकून तोह ऐसे हे मिलता है. निहाल कर दिए लल्ला.", दोनों पसीने से भीगे चादर पर पसरे रहे. अर्जुन नंगा हे सो गया था और कुछ समय बाद ताई जी भी उठ कर उसपे चादर डालती नीचे चली गई. अगले 2 घंटे तक उसको कोई होश न था.

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"पुत्तर जी 3 वरि 6 ऑन तेह वारि ख़तम. हूँ वेख मई तेरी यह पक्की गिट्टी किवे वापिस घर पहुचंडी आ.", अन्नू की माता जी और अर्जुन लूडो खेले में लगे थे. वह ठीक ढाई बजे इधर आ गया था और अन्नू से मिले बिना हे वह ड्राइंग रूम में गट्टे की लूडो देख कर आंटी के साथ वही बैठ गया था. पिछले 15 मिनट में आंटी ने अर्जुन की 2 गिट्टी वापिस बंद कर दी थी और खुदकी 2 होम कर चुकी थी. ये तीसरी वाली भी 1 नंबर से बाल बाल बच गई.

"आंटी वेखो हुन्न फेर मैं किवे खोल्दा वि है तेह िस्नू होम करदा है.", अर्जुन 4 नंबर आने पर फिर मायूस हो गया लेकिन गिट्टी बच गई थी. आंटी हँसते हुए फिर से एक बार 6 और 5 लाती उसकी पहुंच से तीसरी वाली भी दूर ले चली. इधर अन्नू लॉबी से उन दोनों को देख रही थी और फिर जब अगले 5 मिनट तक दोनों ऐसे हे खोये रहे तोह आ कर लूडो पलट दी.

"हद्द हो गई दोनों की. मम्मी मैं कह्या सी के यह जड़ो आवेगा तह अंदर भेज डीओ. नाल ऐ खुद वि तुहाडे वर्ग हे है. मैं गल्ल नई करनी हुन्न किसे वि नाल.", पाँव पटकती हुई वह अंदर भाग गई और इधर अर्जुन ने हँसते हुए खेल वही से लगा दिए.

"झल्ली है आंटी जी ऐ. ेह्णु की पता अस्सी सब याद रखदे है."

"पुत्तर जी मैं झल्ली नई हैगी. एक गिट्टी घर वच रख ते बारी मेरी है.", आंटी की बात पर अर्जुन स्टार्ट पर राखी एक गिट्टी अंदर करता उन्हें पास दे कर बैठ गया.

"अन्नू घर नहीं है क्या आंटी?", ये आवाज सुनते हे अर्जुन ने ध्यान हे न दिए और आंटी ने भी चारुल को अंदर का इशारा करते हुए पास फेंका. इधर ये दोनों खेल में लगे रहे और अंदर अन्नू को आराम से टेलीविज़न देखते हुए चारुल हैरान हो गई.

"तुझे पता भी है के बहार कौन है?"

"माँ और अर्जुन के अलावा कोई और है क्या?"

"मतलब वह तुझे छोड़ कर यहाँ बैठा है? और तू भी आराम से यहाँ अकेली टीवी में लगी हुई है."

"हाँ तोह मेरे जाने के बाद वह वही रहने वाला है. माँ जाने वाली है वैसे भी करतार आंटी के साथ तोह करने दे दोनों को टाइम पास. उनका भी दिल खुश हो जाता है अर्जुन के साथ. परसो वह उनके साथ पकोड़े बना रहा था, पापा भी जल्दी घर आ गए थे. और तू बता कैसा रहा तेरा स्कूल.?", अन्नू ने जगह बनाते हुए कहा और रिमोट एक तरफ रख दिए.

"वही जो हमेशा रहता है. लेकिन ये आज स्कूल नहीं आया."

"उसके चोट लग गई थी कल शाम तोह फिर नहीं गया. मम्मी ने आते हे पुछा था और मैंने सुन्न लिए. आ जायेगा कल और वैसे भी ये मजे के लिए हे आता है. इसका एडमिशन लेटर देखा, non-attending है. मतलब जब दिल करे आये जब करे न आये.", अन्नू की ऐसी बात सुन्न कर चारुल का तोह चेहरा हे उतर गया.

"तुझे कैसे पता चला?"

"बॉयफ्रेंड है वह मेरा स्टूडेंट होने के साथ हे. पिछली बार उसने बताया था के उसकी दीदी वैसे हे लीव देने चली गई, जरुरत नहीं थी. चल टेंशन मत ले बढ़िया कॉफ़ी पिलाती हु.", ये लोग बात कर रहे थे और इधर अन्नू के माता जी चले गए थे, अर्जुन को हरा कर. अन्नू की आवाज सुन्न कर अर्जुन मुस्कुराता हुआ फ्रिज से दूध निकल कर रसोई में चला गया. 5-6 मिनट बाद हे 2 कॉफ़ी लिए वह बिस्टेर पर उन दोनों के सामने ट्रे रखता दूसरी और से अन्नू की गॉड में सर रख के विपरीत दिशा में पाँव पसारता लेट गया.

"मम्मी कुछ कह कर गई थी क्या?", अन्नू ने प्यार से उसका सर सहलाते हुए पुछा और हाथ ने चोट को महसूस कर लिए था.

"हाँ वह 5-6 बजे तक आएँगी, तुम बहार जाओ तोह चाभी उनकी भाभी जी को दे देना.", अर्जुन की आँखें बंद हे थी.

"तोह आजकल आंटी का भी ध्यान रख रहे हो?", चारुल ने कॉफ़ी का कप उठाते हुए बीच में हे अपनी बात शुरू कर दी.

"तुम अपने घर नहीं बुलाती नहीं तोह वह भी मैं दिल लगा हे दूंगा आंटी का.", अर्जुन ने जैसे हे ये कहा तोह अन्नू हंसने लगी. बिंदास स्वाभाव दिखने लगा था अब अर्जुन में.

"बुला ले इसको, देख फिर.", अन्नू ने जैसे हे ये कहा तोह चारुल कॉफ़ी की चुस्की लेने लगी.

"आंटी कॉफ़ी सच में ाची बनती है. पहले हमेशा चाय हे पी थी."

"हाँ, ये इस आंटी ने बनाई है. वैसे तुमने पहले नहीं बताया अर्जुन के तुम इतना काम कर लेते हो किचन में."

"तुमने कहा बताया था के तुम इतनी ाची हो .....", अर्जुन ने गॉड में लेते हुए हे अन्नू को शरारत से देखा बात अधूरी छोड़ कर. वह भी हंसती हुई उसके गाल को खींच कर फिर चारुल से बात करने लगी.

"ये बद्तमीज होता जा रहा है. मैं यही बात करने आई थी.", चारुल ने सपाट लहजे में कहा जिसपर अन्नू ने ख़ास प्रतिक्रिया नहीं दी.

"देख चारुल अगर इसके बारे में मेरे साथ कोई बात करनी है तोह वह पॉजिटिव हे होनी चाहिए. तेरी गलती मैंने सिर्फ इसकी वजह से इग्नोर की और तेरे सामने है के मैंने फिरसे तुझे एक्सेप्ट कर लिए. ये बद्तमीज है तोह शायद कोई वजह तोह जरूर होगी उसके पीछे. आगे से नहीं होगा ऐसा कुछ ये मैं बता देती हु. पे इसके पास है नहीं और स्पोर्ट्स पीरियड में ये लाइब्रेरी रहेगा. बात ख़तम और अगर इसने कुछ गलत कहा है तोह मैं उसके लिए सॉरी बोलती hu."Arjun इनकी बातों से अलग अब अन्नू के पेट में मुँह दबाये लेता था, टॉप के ऊपर से हे.

"इतनी भी बड़ी बात नहीं थी जिसके लिए ऐसा करना पड़े. I'm सॉरी अर्जुन फॉर माय प्रीवियस बेहेवियर एंड फॉर प्रेजेंट ओने. बूत तुम्हारा भी कही न कही फाल्ट है.", चारुल गलती मानते हुए भी जैसे अर्जुन के साथ मुकाबला कर रही थी. इस बार जवाब भी अर्जुन ने हे दिए.

"हाँ मेरी गलती तोह जरूर है और उसके लिए मैं अन्नू को कभी कुछ नहीं कह सकता क्योंकि ये saaf-dil है और सीढ़ी बात करती है. रही बात तुम्हारी तोह जरा समय दो अपने आप को और पहले दिन से लेकर यहाँ ये बात कहने तक जो भी हुआ उसको समझना. मैं तोह हमेशा यही रहने वाला हु.", इस बार अर्जुन अपनी बात कह कर एक तरफ लेट गया और बीएड की दर्ज से rooi-savlon निकलती अन्नू उसके सर पे जहा चोट थी वह लगाने लगी.

"यू अरे राइट. मई बे I'm वर्थिंकिंग. चलो कल मिलती हु तुम दोनों से, अभी जाना है.", चारुल उठ कर कड़ी हुई तोह अन्नू भी उसको बहार छोड़ कर आने के बाद दरवाजा बंद करती अर्जुन की बगल में लेट गई.

"ये सर पे चोट कैसे लगी?", दोनों हे जैसे चारुल की किसी बात की परवाह किये बिना अपने में हे शुरू हो गए.

"गिर गया था कल तोह पत्थर लग गया छोटा सा. तुम यही सब देखती रहती हो क्या? 3 दिन पड़े है ये नहीं की प्यार कर लू, लेकिन नहीं जांच करनी जरुरी है.", अर्जुन मुँह बनाते हुए अन्नू को देख रहा था जो उसके ऊपर आती हुई प्यार से आँखों पर चूम कर थोड़ा नीचे सरकती सीने पर सर रख के लेट गई.

"लड़ाई करने लगे हो और बहाना चोट का. कलाई पर चोट, होंठ का किनारा भी और सर के दूसरी तरफ. लेकिन कोई बात नहीं अगर इतना जरुरी कुछ था तोह साफ़ मन कर सकते हो लेकिन मुझसे झूट नहीं कहना. फिर ऐसा लगता है जैसे मैं तुम्हारे लिए कुछ मायने नहीं रखती और प्लीज ये रीलीज़ मत करवाना कभी.", अर्जुन को अपनी गलती का एहसास हो गया था.

"ऐ मोटी, सॉरी. सुनो जरा इधर आओ. वह क्या है न कल से यही बोल रहा हु सबको तोह तुम्हे भी कह दिए. किसी ने सर नहीं देखा था न और किधर कैसे लगी है ये तोह तुम हे ध्यान दे सकती हो. जैसे मुझे पता है तुम्हारे कहा पर टिल है.", अर्जुन ने टीशर्ट के अंदर हाथ डालते हुए मानाने की कोशिश की.

"तुम्हारे भी वह टिल है, लेकिन जो कहा वह याद रखना.", अब सचमुच वह बस रोने हे वाली थी.

"ठीक है मेरी माँ. चलो अब इधर आ जाओ, दोनों आराम से सोते है."

"सोने आये हो अब? पहले माँ के साथ बहार फिर ये महारानी आ गई और अब तुम टाइम वास्ते कर रहे हो.", अन्नू उसके होंठो पर होंठ रखती खुद हे अपने ऊपर खींचने लगी.
 
अपडेट 99

कुछ अपनों के साथ- कुछ अपनों से दूर (2)


"नींद भी लेना चाहता हु मैं तुम्हारे साथ.", अर्जुन की चूड़ी निर्वस्त्र छाती के नीचे लेती अन्नू उसकी बात सुन्न कर जैसे दर्द में मुस्कुराने की कोशिश करने लगी थी. दर्द, उस से जुड़ा होने का और अर्जुन का इतनी बड़ी बात कह जाना वह भी इस वक़्त जब दोनों संसर्ग करने हे वाले थे.

"तुम्हे अभी कुछ नहीं पता अर्जुन की ज़िन्दगी किस और करवट लेगी. तुमने हे कहा था न कोई वादा नहीं और कोई भविष्य नहीं. फिर आज इस बात को मैं क्या समझू?", अन्नू की बात भी गलत नहीं थी लेकिन अर्जुन खुद हे उसके ऊपर से हट गया. एक तरफ सीधा लेट कर वह छत्त पर घुमते पंखे को देखने लगा जिसमे कोई आवाज न थी लेकिन उसका वेग समय की तरह एकसार था. कोई मंजिल नहीं कोई ठहराव नहीं बस अपनी धुरी पर एक दायरे में घूमता हुआ वह पंखा उसकी तरह हे तोह था. अन्नू यहाँ भी अपनी हे गलती मान कर उसके सीने पर सर रखती माफ़ी मांग रही थी.

"सॉरी मेरा मतलब तुम्हे चोट पहुंचना नहीं था अर्जुन. तुम भी जानते हो के मैं कभी सपने में ऐसा नहीं कर सकती लेकिन हम दोनों हे जानते है के इन प्यार के कुछ लम्हो के बाद हमारी अलग ज़िंदगिया होंगी जिसमे मेरे पास तुम्हारी यादों और प्यार के यही पल जीने की वजह रहने वाले है. भगवन ने इतना हे दिए लेकिन शिकायत नहीं है मुझे.", अन्नू की हर बात बस उन दोनों के प्रेम पर स्थिरर थी और वह जैसे अब खुद हे अर्जुन को हर बंधन से मुक्ति दे कर उसको वापिस पुराणी ज़िन्दगी में जाने देना चाहती थी.

"तुम इन्तजार करोगी अन्नू?", अर्जुन कैसे ये कह सकता था? उसका वादा ऋतू दीदी से था, शादी प्रीती से निर्धारित थी और अभी जाने ज़िन्दगी ने कितने रंग और दिखने थे. रेणुका, मंजू का जो दर्जा था वह क्या कुछ मायने नहीं रखता था? शायद अर्जुन ने कुछ सोचा हे होगा क्योंकि वह इतने दिल नहीं टॉड सकता था. अन्नू भी इस सवाल के जवाब में हैरानी से उसके शुन्य भाव से चेहरे को देखने लगी जो छत्त को हे टाक रहा था.

"तुम्हारे सिर्फ इतना कहने से मैं ज़िन्दगी भर ऐसा कर सकती हु लेकिन तुम ऐसा कुछ भी मत करना के सब बदल जाये. मैं तोह वैसे भी अब किसी और की नहीं हो सकती.", अन्नू की आँखों का दर्द हलके पानी से अर्जुन की छाती तक चला आया.

"अभी तोह मैं भी कुछ नहीं जानता अन्नू. लेकिन मैं तुम्हे कभी खोना नहीं चाहता. तुम सिर्फ 7 दिन के साथ अगला एक साल बिताने वाली हो तोह मैं तुम्हे ऐसे 7 दिन हर महीने दे सकता हु. वह ऐसे कुछ वक़्त वाले नहीं पल नहीं की कभी 1 घडी या 2, पूरे सात दिन सिर्फ हम दोनों के. बस वापिस जरूर आना.", अर्जुन ने बिना देखे अन्नू को अपने सीने पे कस लिए. अन्नू उसके दिल के ठीक ऊपर चेहरा रखे थी और आंसू खुद हे तेज हो चले. अर्जुन की धड़कन उसके गाल के नीचे धड़कती हुई बता रही थी वह अन्नू से जुड़ चूका था. कुछ लम्हो बाद ये ख़ामोशी अन्नू ने हे भांग की.

"इन बातों के बीच तुम मुझ पर ध्यान नहीं दे रहे हो.", वह चेहरा साफ़ कर चुकी थी और रूठती हुई अर्जुन की कमर पर बैठी थी. अर्जुन ने दिल के गहराई से उसको नजर भर देखने के बाद अपनी तरफ खींच लिए. मुलायम कूल्हों के बीच सिर्फ वह नीली पंतय थी जो naam-matra कपडा था. ऊपर ढीली टीशर्ट के अंदर अन्नू के दोनों बेजोड़ उभर आजाद थे जो अर्जुन के सीने पर दबने लगे उनके प्यार से चूमने पर. अर्जुन आँखें बंद किये बस अन्नू के होंठो में डूबा था और वही हाल अन्नू का था. मखमली नितम्भो के बीच वह नीली पट्टी एक तरफ खिसकते हुए अर्जुन ने हाथ के दबाव से अन्नू को कॉपर ऊपर करने का इशारा किआ. बिना उसकी पंतय उतरे वह अपनी सख्त लिंग उन निचले मादक होंठो पर टिका कर फिर से उसके दोनों गद्देदार कूल्हों को मसलने लगा

"आह्हः.. उम्म्म्म.. ये क्या सूझा?"", खुद अन्नू ने थोड़ी कमर दबाई तोह जरुरी हिस्सा उस रस बहते लाल गुलाब में उतर गया. एक पल के लिए होंठ जुड़ा हुए क्योंकि अभी भी अन्नू के बाहरी किनारे इतनी मोटाई लेने में सक्षम नहीं हुए थे. फिर वापिस अर्जुन के चेहरे पर झुकती वह आराम से गाल और माथे को चूमने लगी.

"दिल नहीं कर रहा के तुम्हे अलग करू खुद से. वैसे तुम्हे ऊपर लिटाने का भी अलग मजा है.", अर्जुन ने पुराने अंदाज में शरारत से कहा था.

"पता है तुम्हे ये स्पंज जैसे हिप्स दबाने ाचे लगते है. और मुझे तुम्हारे ऊपर लेटना पसंद है. ये भी तुम्हे पसंद करते है.", अन्नू का इशारा अपने बड़े नरम स्टैनो से था.

"पता है अन्नू, कभी भी नहीं लगता था के तुम अंदर से इतनी अलग होगी. खूबसूरत तोह हो हे लेकिन इस कमरे में जब तुम्हे पहली बार पूरी तरह से देखा था तोह आँखों पे विश्वास नहीं हुआ था.", नरम उभरे कूल्हे सच में उंगलियों के दबाव से आधा इंच तक अंदर डब्ब रहे थे. हाथ फिसलता हुआ उनके बीच वाली चिकनी गहरी दरार में आया तोह अर्जुन वही अपनी उंगलियों सहलाते हुए एक छोटा सा चुम्बन अन्नू को करने के बाद देखने लगा. 2-3 बार अपनी कमर आगे पीछे करती वह अब आधा लिंग अंदर लिए फिर से रुक गई थी.

"उम्म्म.. मुझे नहीं पता के तुम्हे ये अलग लगा या ाचा. बूत मैं खुद इन दोनों के साइज और सॉफ्टनेस से कम्फर्टेबले नहीं थी. देखा नहीं सूट कैसे ऊपर से टाइट रहते है, वह भी स्ट्रैट और लूसे pehan-ne की वजह से.. आठ.. आराम से बाबा. मैं कर रही हु.. ummm..Aur इन्हे हाईड करने के लिए मुझे थोड़ा मोटा दिखने से भी दिक्कत नहीं. लेकिन ये तुम्हारे सामने ऐसे हे रहेंगे.", बातों के बीच हे अर्जुन ने हल्का सा धक्का उस lachili-naram सुरंग में लगा दिए था. अन्नू सिसकती हुई दर्द जज्ब करने के बाद खुद हे टीशर्ट उतर कर परे रखती अर्जुन के हाथ अपने उभर पर रखने लगी.

"पहली बार तोह डर लगा था के .. उम्.. इनको चोट न पंहुचा दू. नाजुक लगे थे और हैं भी तोह इतने प्यारे.", हलके से उस गुलाबी निप्पल को एक बार होंठो पर लगा कर वह फिर से उसको धीमे से दबाने लगा. अन्नू की कमजोरी भी शायद उसके नरम उरोज हे थे जिन पर अर्जुन का सपर्श उसको स्वर्ग सा आनंद दे रहा था. पतीली पंतय की रगड़ से लिंग और कसता हुआ अंदर बहार होने पर दोनों को अलग हे सुख दे रहा था. यही तोह खासियत थी अन्नू की जो अपने जिस्म को पूरी तरह अपने प्रेमी पर वार देती थी.

"तुम्हारा है ये और इन्हे भी तुम पसंद हो. तुम्हारा स्पर्श पूरी रात इनमे भरा रहता है.. आह्हः.. उम्म्म.. जाने कैसे मैं ये ले रही hu..aahh... एक बात कहु", अन्नू फिर से उसके सीने पर लेती अपने दोनों सतांन खुद हे अर्जुन के जिस्म से रगड़ती हुई aage-peeche हो रही थी. वह जांघो के बीच महकता गुलाब अपना रास बहता अर्जुन के कामदण्ड को सख्ती से जकड़े भिगोने लगा था.

"अह्ह्ह. तुम्हे सिर्फ कहना चाहिए.. उम्म्म.. और तुमसे प्यार करने के बाद मुझे भी हर समय यही खुशबु जकड़े रहती है, तुम्हारी महक मेरे जिस्म से... आठ..", अर्जुन भी कसाव की वजह से अन्नू को जोर से दबाये उसके स्टैनो का अपने शरीर पर हो रहा अलग हे असर महसूस करता कुछ ज्यादा उत्तेजित हो रहा था. लेकिन ये सिर्फ दोनों का हे जुड़ाव था जो एक दूसरे को हर तरह का सुख देना जानते थे.

"तुम अनल करना चाहते हो मेरे साथ?", अन्नू के इस सवाल पर अर्जुन ने कास कर उसके होंठो को जकड लिए. कमर अपने आप हे ऊपर उठती अन्नू की हद्द तक ठोकर मरने लगी. अगले 3-4 मिनट वह vidhyut-gati से अन्नू के पूरे शरीर को नियंत्रण में लिए अब तक की सबसे तेज और गहरी चुदाई में लगा रहा. अन्नू भी अंतिम समय पर अपनी जांघो के बीच जड़ तक लुंड को दबाये उसके पेट पर स्थिरर हो गई. होंठ अलग न हुए और शरीर का पूरा जोर जैसे इस पल में अन्नू की गहराई में उड़ेलता वह pruva-vatt उसको अपने ऊपर लिए लेता रहा. आज अन्नू ने भी महसूस किआ था के अर्जुन के शरीर से इतना समान निकला है जितना 2-3 बार में निकलता था. ख़ामोशी को भी उसने हे भांग किआ.

"अनल सुनते हे तुमने तोह जान हे निकल दी. ऐसा मैट कर देना की 9 महीने बाद मैं वह से फाइनल baby-bump के साथ यहाँ औ. आठ.. लगता है जैसे महीने भर का अंदर निकल दिए तुमने.", अन्नू भी अभी उठना नहीं चाहती थी लेकिन पंतय से थोड़ा परेशानी जरूर होने लगी थी.

"अनल तुम्हारे आने के बाद. जब सिर्फ हम दोनों पूरी रात अकेले हो और रही बात baby-bump की तोह परसो तुमने हे कहा था के 2-3 दिन में डाउन होने वाली हो तोह वह पॉसिबल नहीं. वैसे तुमने अभी तक बताया नहीं की वह क्यों जा रही हो?"

"पहले तोह जाने की 2 वजह थी. एक तुम और दूसरा मेरा दूसरा सपना. वह एडमिशन मिल गया भैया की वजह से और तुम्हारे बिना रहना मेरे लिए मुश्किल था यहाँ."

"तुमने ाचा किआ अन्नू. लोग गलत रास्ते पर चल पड़ते है लेकिन तुमने यहाँ भी ज़िन्दगी को मकसद दिए. लेकिन मैंने कहा था के मैं हमेशा साथ हु तुम्हारी हर परेशानी और फेंसलो में."

"इसलिए तोह अब मेरा दिल कर रहा है के मैं ृक्क जाऊ."

"नहीं, मुझे दूसरा सपना हे रहने दो अन्नू. तुम्हारा फैंसला कही से गलत नहीं है."

"ये एक साल का नहीं है, मैं एक साल बाद भी सिर्फ तुमसे मिलने के लिए आने वाली थी. 3 साल और फिर 1 साल की रिसर्च. नामुमकिन हो जायेगा अब जब मैं ये जान गई हु के तुम भी मुझे उतना हे प्यार करते हो."

"यहाँ तुम साल में 2 बार तोह आ हे सकती हो. क्या पता जो तुम करने जा रही हो वह मेरे हे काम आये. अपने से दूर जाने पर भी वह करीब हे रहता है. कभी खुद के फेंसलो पर संदेह मैट करना."

"मैं हर 6 महीने से पहले यहाँ आउंगी लेकिन क्या तुम एक बार वह आओगे? सॉरी भूल जाती हु के तुम अभी स्टूडेंट हो और फॅमिली में सबसे छोटे भी. कोई बात नै.", अन्नू खुद हे सवाल करने के बाद जवाब देती हुई उठने लगी तोह वह सफ़ेद रस दोनों के ख़ास अंगो को भिगोये अर्जुन के शरीर पर जमा हुआ था. अन्नू बाथरूम में जाने लगी थी और पीछे हे अर्जुन भी आ गया. अन्नू को देखे बिना हे फुहारा चलाये वह नीचे खड़ा हो गया.

"तुम्हारी रिसर्च से पहले मैं वह आऊंगा और अगर मुमकिन हुआ तोह वह समय साथ हे बिताएंगे.", अन्नू कोड पर बैठी हाथ वाले फुहारे से अपने सामने पानी डालती हुई रुक गई. पाँव में झूलती पंतय फर्श पे गिरती वह पीछे से अर्जुन के निर्वस्त्र जिस्म से लिपट कर साथ हे भीगने लगी.

"जो काम मुमकिन न हो उसकी बात भी नहीं करनी चाहिए. आज एक हे दिन में तुमने बहोत बड़ा वादा पहले हे कर दिए है अर्जुन."

"अन्नू, वह मैं परिवार के काम से आने वाला हु तभी मैंने रिसर्च से पहले कहा, साल नहीं बताया. और मैंने फ़िलहाल तोह अपनी किये वाडे निभाए है. हाँ सांस रुक गई.."

"शठ.. चुप. 10 मिनट बस अब मैं तुम्हारे साथ रहना चाहती हु. गलती से ऐसी बात मुँह पर फिर कभी मत लाना."

"मुँह बंद कर दो फिर.", अर्जुन ने पलट कर अन्नू के गीले जिस्म को निहारा तोह वह भी बात पूरी करती उसके जिस्म से लिपट कर चूमने लगी. आदर्श प्रेमिका की तरह.

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करीब साढ़े 6 बजे अर्जुन को अपने गालो पर हे हल्का गीलापन महसूस हुआ तोह ऋतू दीदी उसके सिरहाने बैठी थी. आँखों से 2 गरम मोती निकल कर अर्जुन के गाल पर गिर गए थे.

"ओह तोह अब आप ऐसे उठाने लगी हो मुझे. लेकिन मैं बदलने नहीं वाला.", अर्जुन उन्हें अपने ऊपर खींच कर गाल साफ़ करने लगा. ऋतू दीदी कमर के साथ बैठी हुई उसके सीने पर थोड़ी झुक गई थी.

"तुम्हारे साथ क्या हुआ है ारु? सच सच बताना ये चोट कैसे आई तुम्हे. चेहरे और सर पे निशाँ है और ये कलाई पर 3 टांके. भाई क्या हुआ ये सब?", वह रट हुए बस अर्जुन को देख रही थी. अर्जुन भी कलाई पर बंधी पट्टी को वह न देख समझ गया था के अब बचना नामुमकिन है. और वह बच भी कैसे सकता था अपनी आत्मा से.

"बताता हु पहले रोना बंद कीजिये और सामने से फर्स्ट अिध बॉक्स निकल कर इधर बैंडेज करो.", अर्जुन उनके दोनों गाल हाथ में लेके माथे पर चुम्बन करने के बाद कमर बिस्टेर से टिका कर बैठ गया. दीदी भी साफ़ पट्टी, बेटाडीन और रूई लेकर उसके पास बैठ कर हाथ का जख्म देखने लगी.

"कल एक हादसा हुआ था जिसको आप अपने तक हे रखेंगी. मेनका के साथ बहोत बुरा हो सकता था क्योंकि एक तरह से वह किडनैप हे हो गई थी लेकिन मेरे दोस्त ने मुझे इसके बारे में बताया और वह मेनका को बचते वक़्त ये झड़प हो गई. सर पे हलकी सी चोट आई लेकिन कुछ खास नहीं और ये होंठ पर तोह गिरने की वजह से लग गई. आपके होते हुए मेरे साथ कुछ बुरा हो सकता है क्या दीदी?", अर्जुन देख रहा था के दीदी बड़े ध्यान से पहले पट्टी की कुछ तेह लगाने के बाद उसपर दवा फ़ैलाने लगी. फिर जख्म के ऊपर ाचे से उसको सेट किआ. जख्म को उन्होंने पहले भी साफ़ किआ था जिस से दवा काम कर सके. रूई को भी चौकोर काटने के बाद ऊपर रखती वह सावधानी से पट्टी कलाई पर घूमने लगी.

"ये नाइफ का मार्क है यहाँ. तुम्हारी कलाई कट सकती थी अर्जुन.", वह अभी भी सुबक रही थी. उस खूबसूरत चेहरे को अर्जुन सपने में दर्द में नहीं देख सकता था. दोनों हाथो में उन्हें पकड़ कर सीने से लगा कर वह कुछ पल के लिए बैठा रहा. पीठ को सहलाते हुए वह दुविधा में था के दीदी को सच कहे या न कहे.

"दीदी, मुझे जो सजा देना चाहो वह आप दे सकती हो इस गलती के लिए. मैं चाहता हु के ये परिवार हमेशा खुश रहे और कभी किसी तरह का कोई दुःख न देखे. कल मैंने जो भी किआ है उसमे मेनका की जान बचने के साथ हे कुछ ऐसे लोगो को भी दूर करना जरुरी था जो हमारे 'संसार' पर नजर लगाए थे. हमारे परिवार के लिए आपका छोटा भाई खुद को दांव पे लगाने से भी पीछे नहीं हटेगा. बस इस से ज्यादा मैं कुछ नहीं कह सकता लेकिन जिस दिन आप फिर से ऐसे रोई तोह मैं वापिस बोर्डिंग चला जाऊंगा.", अर्जुन को पता था के ये बात कहने से ऋतू दीदी का बाकी बातों से ध्यान हट जायेगा.

"तू कर कोई ऐसी बेवकूफी और देख मैं क्या करती हु फिर. तूने मुझे रुलाया है न फिर ज़िन्दगी भर तू मेरी फोटो पर हार देखेगा.", अर्जुन को ऐसी तोह उम्मीद बिलकुल नै थी.

"पागल. गलती से भी ऐसा कहा तोह फिर .. मैं मजाक कर रहा था और फिर ऐसा मत कहना दीदी. मैं सबकुछ बर्दाश्त कर सकता हु लेकिन आपके बिना मेरा अस्तित्व नहीं है. बस थोड़ा सा मेरी जिम्मेवारी की तरफ भी सोचो. क्या एक जान की ऐसी मामूली कीमत आपका भाई नहीं चूका सकता?"

"तूने मुझसे मिलकर एक बार भी प्यार नहीं किआ.", ऋतू दीदी खुद हे चेहरा ठीक करती उसके सीने पर हाथ टिकाये पुराने रूप में आ गई थी.

"बड़ा मौका दिए न आपने मुझे. उम्म्म्म.. ", उनके होंठो पर अपना प्यार देता वह एक बार और उन्हें सीने से लगा कर सुकून देने लगा.

"ोये शाबाश. ये तोह खुल्लमखुल्ला chuma-chati हो रही है. बेशर्मो दरवाजा कौन देखेगा?", तारा अंदर आती हुई दरवाजा बंद कर चुकी थी. और उसने बस इन्हे चुम्बन करते हे देखा था.

"तू तोह इतना कुछ करती है तोह मैं बीच में आई क्या? अब 2 दिन बाद इसको देखा है तोह मिलु भी नहीं.", ऋतू दीदी ने तारा के ऐसे देखने पर प्रतिक्रिया हे नहीं दी थी जबकि अर्जुन बेचैन हो गया था

"हाँ. जो मर्जी करो लेकिन वह अंदर आने का रास्ता बंद करके. और तेरे ये एएब्रो पे सूजन? होंठ, हाथ और पीठ पे भी. खड़ा हो पहले तू और तुझे ये सब नहीं दिखा क्या ऋतू?", तारा पल में हे झल्ला गई थी बुरी तरह. अर्जुन को सीधा करके वह जैसे जहां निरिक्षण करने लगी उसका.

"आते हे देख लिए था मैंने. कल स्टेडियम में प्रैक्टिस के वक़्त इसके चेहरे का ये हाल हुआ है. हाथ पर चोट बाइक गिरने से लगी है, मैंने अभी फ्रेश बैंडेज की है.", ऋतू दीदी ने जो कहा वह विश्वास दिलाने के लिए बिलकुल ठीक था. मुक्केबाज़ी में तोह चेहरे पर ऐसी सूजन और चोट लग हे सकती थी.

"बंद करवाती हु इसका ये सब नाना जी को बोल कर. ाचे भले शरीर का क्या हाल किआ है."

"तारा जी, शांति रखो. अब आगे से ऐसा नहीं होगा.", तारा को एक हाथ से अपने गले लगते हुए अर्जुन ने प्यार से मन लिए. लेकिन ऋतू दीदी का दिमाग अभी भी कही चल रहा था.

"प्रीती आई थी यहाँ?", ऋतू दीदी का ये सवाल अपने आप में बहुत कुछ था जिसके पीछे की मंशा अर्जुन भांप गया था.

"सुबह गई थी अपने घर जब मैं आया था. बाद में पता नहीं मुझे. क्यों क्या हुआ अब? रहने देना अगर आपने कुछ पूछताछ करनी हो तोह.", अर्जुन दोनों से अलग हो कर साफ़ टीशर्ट और ट्रैक पजामा पहन ने लगा. दोनों लड़किया भी उसको नीचे आने का बोल कर बहार चल दी.

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"हाँ तोह लगता है के स्कूल और स्टेडियम से आज़ाद रहे हो आज तुम. क्या कुछ सीख रहे हो आजकल थोड़ा हमें भी बता डीओ करो भाई.", रामेश्वर जी तोह जैसे आने के बाद सीधा बगीचे में हे आ बैठे थे. हमेशा वाले अपने सफ़ेद कुर्ते पयजामे में. फ़िलहाल उनके साथ वह छोल साहब थे जो अर्जुन द्वारा लगाए नए पपीते और रात की रानी को जांच रहे थे. अर्जुन दोनों से गले लग कर हे मिला था.

"जाना तोह था लेकिन ताईजी से स्कूल जाने से मन कर दिए और फिर स्टेडियम में इसकी वजह से नै गया. पसीना आएगा तोह शायद ये जल्दी ठीक न हो.", अर्जुन वही उनके सामने घास पर बैठ गया था.

"तुम्हारे छोटे दादू पूछ रहे थे के ये दोनों ऐसी विकसित किस्मे कहा से ले आये. और इन्होने भी आज अपने पिछले आँगन में पूरी जगह तैयार करवा दी है. खुली जगह है तोह बगीचा ाचा बनेगा.", रामेश्वर जी ने बात करते वक़्त एक नजर अपने दोस्त पर भी डाली जो वही आ बैठे थे.

"हाँ भाई, ये पपीते के पौधे तोह अलग है हे लेकिन तुम शायद इनका ध्यान भी खास तरीके से रख रहे हो. रात की रानी की बैल इतनी बड़ी कैसे मिल गई? हो सके तोह थोड़ा मुकेश को भी समझा देना और रोमिला को भी."

"छोटे दादू वह धर्मपाल अंकल है न उनके एक दोस्त है जो यूनिवर्सिटी में ऐसी किस्मे तैयार करते है या फिर बहार से मंगवा कर उनको यहाँ के माहौल से तैयार करते है. धर्मपाल अंकल ने हे ये ला कर दिए थे. पपीते तोह थाईलैंड के है, सीडलेस जिन्हे सीधा पानी देने की जगह ये गड्ढो में पानी भर देना है बस. बाकी खाद वही अपनी देसी वाली है. रात की रानी के लिए तोह उन्हें भी म्हणत करनी पड़ी थी लेकिन जैसे तैसे वह ले हे आये थे. इसको सुबह लगाने के बाद मैंने शाम को सीधा किआ तोह देखो जरा ये कितनी लम्बी है. पहली मंजिल तक पहुंच रही है. वैसे पिछले आँगन में तोह आपके पास इस बगीचे जितनी हे जगह है.", अर्जुन सब खुश हो कर बता रहा था.

"हाँ 400 गज़ होगी हे. 4 ट्राली मिटटी और आधी ट्राली खाद डलवाई है वह साफ़ करवाने के बाद. 2-3 दिन मुकेश सफाई करेगा फिर तुम थोड़ा आईडिया दे देना बाकी भाई साहब है हे."

"पहले तोह दादू अब 'सिलेक्शन' लगवा लो साड़ी जगह में. घास जगह पकड़ लेगी तोह जमीन का भी पता चल जायेगा. क्यों बाउजी आप क्या कहते हो?", कभी कभी वह पंडित जी को बाउजी भी कहता था जो उसने बचपन में उनके ड्राइवर या मदद मांगने आये लोगो को कहते देखा था. वह हंसने लगे लेकिन हाँ में सर हिला दिए.

"मैंने भी यही कहा था एक किनारे रोक कर लॉन बना ले फिर कुछ बड़े पौधे हे मंगवा कर रेपलेंट करवा लेना. उनके नीचे बाकी छोटे फूल और सब्जी की क्यारी लग हे जाएगी. वैसे तुमसे एक और काम था भाई.", रामेश्वर जी ने एक नजर कोमल को देखा जो ट्रे स्टूल पर रखती कुछ और लाने के लिए पूछ रही थी. लेकिन nimbu-pani बहोत था ऐसा दादा जी ने कहा और दीदी चली गई.

"कहिये फिर आपका दूसरा काम करते है.", अर्जुन जैसे ये बोलै था न चाहते हुए भी पंडित जी उसको मुस्कुराते हुए चुप रहने का इशारा करने लगे.

"परसो तेरा मां आएगा तुझे लेने तोह स्कूल के बाद उसके साथ चले जाना. पटवारी के पास तेरे नाना ले जायेंगे तोह सब ध्यान से padh-likh कर काम पूरा कर लेना. अगले दिन सुबह भूमि पूजन करवा के आ जाना."

"कैसा bhoomi-poojan? वह पहले हे इतने खेत है के मनोहर नाना और छोटे मां से वह नहीं सँभालते तोह ये नया काम कौन देखेगा? राजेश मां तोह देखे 10 साल होने को आये और बिट्टू मां पुलिस में है.", अर्जुन हैरान भी था और जानकारी भी लेना चाहता था.

"राजेश आ गया है और वही कॉलेज की नीव रखनी है. एक तोह ये जमीन वह तेरे नाम कर चुके है और ऊपर से वही हिस्सा है जो सड़क पर है और शहर के साथ लगता है. आधे घंटे का काम है और उनकी भी इत्छा है के तू हे वह पहली ईंट रखे."

"तोह आप नहीं जायेंगे?", अर्जुन को फ़िलहाल तोह समझ नहीं आ रहा था लेकिन फिर भी जो दिल किआ पूछ लिए.

"अभी भूमि पूजन है, मैं जाऊंगा जब ईमारत की बुनियाद रखेंगे. देख ले भाई सतीश, ये लड़का स्कूल पास नहीं है अभी लेकिन कॉलेज में मालिकाना हिस्सा रखने वाला है.", रामेश्वर जी हंसने लगे तोह छोल साहब ने भी उनका साथ दिए.

"वैसे सही है बीटा, 2 साल में तुम अपने हे कॉलेज में पढ़ने जाओगे फिर तोह."

"नहीं छोटे दादू कॉलेज तोह मैं अपने प्रदेश में नहीं करने वाला. नार्मल ग्रेजुएशन की तोह सत. स्टेफन्स दिल्ली या कलकत्ता से करूँगा और ेंगिनीरिंग पिलानी या बॉम्बे से.", रामेश्वर जी से भी अर्जुन ने कभी कॉलेज के बारे में ऐसा नहीं कहा था. क्योंकि वह तोह भविष्य की बात हे नहीं करता था.

"फिर तू इंग्लैंड क्यों नहीं चला जाता?", उन्होंने ये मजाक में कहा था.

"हाँ अगर आपकी पहचान है कैंब्रिज या King's कॉलेज में तोह मैं चला जाऊंगा वह भी.", अर्जुन ने उन्हें हे लपेटे में ले लिए हँसते हुए.

"फिर तोह बीटा ऑक्सफ़ोर्ड ज्यादा बेहतर रहेगी." ये छोल साहब थे

"वह तोह पहचान भी काम नहीं आने वाली छोटे दादू और 10% सीट्स के लिए जाने कितने लाख स्टूडेंट बैठे होंगे. वैसे भी घर से इतना दूर नहीं जाने वाला मैं."

"चल शेखचिल्ली वापिस बगीचे में हे आजा. मैं जरा तेरे छोटे दादू के साथ सैर करने जा रहा हु तू पानी पीला इन्हे. हाँ कल दिन में मेरे साथ बहार चलना है तोह कही मत जाना स्कूल के बाद.", वह अर्जुन को नयी दुविधा में छोड़ कर निकल चले अपने मित्र के साथ.

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"कृष्णा को दाखिल कर लिए था उन्होंने आज. डॉक्टर के रहे है के सब ठीक है और शायद उतना समय भी न लगे जितना पहले सोच रहे थे. यहाँ शायद सही टेस्ट नहीं हो पाए और रिपोर्ट में भी थोड़ी बहोत चूक थी.", अर्जुन अपनी दादी के पास बैठा था और वह उसका hal-chal लेने के बाद अमेरिका की खबर दे रही थी. अर्जुन की चोट को ज्यादा टूल न दे कर वह बस बाकी सब बता रही थी. मधु बुआ भी उठ कर वह से चली गई तोह रामेश्वर जी भी अंदर आ गए थे. साथ हे उन्होंने वह दरवाजा बंद कर दिए था जिधर से पिछले आँगन का रास्ता था.

"तोह बरखुरदार जरा अब समझने का कष्ट करोगे?", वह बीएड पर आराम करने की जगह अर्जुन के सामने एक कुर्सी रख कर बैठ गए. कौशल्या जी भी शांति से दोनों को देखती रही.

"आपको तोह पता हे है सबकुछ. मैंने सिर्फ मेनका को बचने के लिए थोड़ा सा बदलाव किआ था.", अर्जुन इस वक़्त सपाट लहजे में बोल रहा था.

"तुम्हे सबसे ज्यादा खबर थी और बात इतनी बड़ी है ये तुमने एक बार भी जाहिर नहीं किआ. इसकी वजह? वैसे भी मामला तोह ये था की वह पर शबनम और उसके साथी मिलने वाले थे, सुशीला पर नजर थी और कही न कही मोहर सिंह के होने से भी इंकार नहीं था लेकिन तुमने बाकी कोई जानकारी नहीं दी. ये सुशीला और मोहर सिंह के बारे में तुम्हे कैसे मालूम था?", रामेश्वर जी भी स्पष्ट बात हे कर रहे थे लेकिन कौशल्या देवी के चेहरे पर दुनिया भर का कहुआफ था.

"वजह तोह आप बेहतर समझते होंगे. शबनम से ज्यादा नजर मेरी उन बड़ी दादी के परिवार पर थी. मेनका के घर से एक छोटा सा सबूत मिला था लेकिन वह कितना गहरा था ये समझते हुए वक़्त हाथ से निकल चूका था. एक न एक दिन तोह ये होना हे था लेकिन मेरा वैसा इरादा बिलकुल भी नहीं था. आपको सन्देश भेजा था मैंने और उमेद चाचा को भी लेकिन वह मुझे हे ले गए तोह फिर कोई रास्ता नहीं बचता था."

"संजीव? उसको शामिल करने की वजह?"

"वह शामिल नहीं होते तोह फिर आपसे नजरे नहीं मिला पता मैं कभी भी. वह सिर्फ सजा से काम तोह नहीं चल सकता था. और उनके बारे में मैं आपसे सवाल नहीं करूँगा की वह कैसे और कब बने.", अर्जुन की बात पर कुछ देर तक वह गहराई से सोचते रहे.

"भीम की हालत देख कर मैं समझ सकता हु की तुम अकेले में क्या करते लेकिन तुम्हे बहार रहने के लिए कहा गया था. कोई और हल हो सकता था इस सबका."

"फिर वही हल होता जो मैं कभी नहीं चाहता के ऐसा हो. आप मुझे मेरे से बेहतर जानते है. गले पर चाक़ू लगाए कोई खड़ा हो और वह सभी लोग मेरे परिवार के साथ वैसा हे कुछ करने का सोचे तोह मुझे नहीं लगता उनकी गोलियां रोक सकती थी. हाँ भीम पर गुस्सा था और ऐसा नहीं करता तोह वह उमेद चाचा को पीछे से नुक्सान पहुंचने वाला था. उनके पहले हे गोली लगी थी पाँव में.", अर्जुन की बातें अब कौशल्या जी के कुछ पल्ले पड़ रही थी. और वह रोक न सकीय बीच में बोलने से.

"कितने मार दिए?"

"दादी मैंने एक भी नहीं मारा. उमेद चाचा और संजीव भैया ने किआ है जो किआ है.", रामेश्वर जी संतुष्ट थे अर्जुन के ऐसे कहने से.

"सही कहा बीटा तुमने. थोड़ी सी चूक हो गई थी मेरे से और कभी कभी सिपाही को ऐसे वक़्त खुद हे फैंसले लेने पड़ते है लेकिन जानकार ाचा लगा के तुमने हाथ खराब नहीं किये. भीम और ऋषभ ने मिलकर जो किआ था उसकी सजा हम दोनों ने हे अपने असूल से बहार निकल कर दी. तुमने अकेले में बगावत नहीं की और वह ड्यूटी पर भी बागी हो गया था.", रामेश्वर जी का चेहरा हलकी पीड़ा दिखने के बाद फिर शांत हो गया.

"अब बताओगे के ये क्या फसाद कर दी है तुम लोगो ने जिसकी मुझे भनक नहीं लगी. और उमेद अब कहा से आ गया?", कौशल्या जी पास खिसक आई थी.

"भगवान जो परिवार कभी अलग हुए थे उन्हें ये तेरा कपूत फिर से करीब ले आया है. चंद्रो देवी ने तुम्हे याद किआ है तोह कल एक बार मिल आना और मैं जरा अर्जुन के साथ राममेहर के घर जाऊंगा."

"बात पूछ रही हु और आप कोरस सुना रहे हो जी."

"शीला देवी का परिवार नहीं रहा अब और मोहर सिंह के साथ उसके ममेरे डकैत भाइयों का भी नाम मिटत गया है. अर्जुन ने सुशीला और उसके बेटे के साथ हे मेनका, शबनम की ज़िन्दगी भी बचाई है. साथ हे अपने बड़े भाई और चाचा को भी.", रामेश्वर जी की ऐसी बात सुन्न कर कौशल्या जी के आँखों में आंसू आ गए.

"आपका दिल नहीं घटा जी एक बार भी. इसको कुछ हो जाता तोह मैं भी मर्डर जाती. वह सब नाग है दूध पिलाने पर भी काटने वाले. मेरा मासूम सा बचा उन दरिंदो में अकेला था और आपने ये होने दिए."

"कौशल्या मानता हु थोड़ी चूक हुई लेकिन अगर इसको रोकता तोह भी समस्या होने वाली थी और करने दिए क्योंकि सब मेरी नजर में था. उमेद इसका धरम बाप है और वह इसको कभी कुछ नहीं होने देगा. संजीव ने भी अपना काम पूरा किआ. समस्या तब आती जब एक भी उनमे से बच जाता."

"तोह सच में सब साफ़ कर दिए क्या जी?", कौशल्या जी की ऐसी अचरज वाली शकल देख कर अर्जुन मुस्कुराते हुए उन्हें अपने से लगा कर बैठ गया.

"दादी, दादाजी जब सफाई करवाते है तोह मैदान में कंकर तक नहीं छोड़ते. और उमेद चाचा न सिर्फ इधर हे गोली मारते है, पता नहीं ओलिंपिक में क्यों नहीं गए. आप परेशां मत हुआ करो और वादा है के मैं अब कभी ऐसा नहीं करने वाला.", अर्जुन ने ये बात अपने दादा की तरफ एक राजदार मुस्कान के साथ कही थी

"हाँ वह उल्लू इनके पास हे निसंचि बना था. ख़ास लगाव था न उस से इन्हे लेकिन तू उमेद को कबसे मिल रहा है?"

"जबसे घर आया हु तबसे 2 बार हे मिला हु लेकिन फ़ोन पर बात हो जाती है. स्कूल में चाचा हर 2 महीने बाद आते थे मिलने और फिर 2 दिन रहने के बाद जाते थे जैसे दादाजी.", अर्जुन की बात ने अब रामेश्वर जी को फसवा दिए था.

"तोह हम लोग हे मूरख थे."

"ये सांड ऐसे हे नहीं बना देवी जी. और मैं सिर्फ इसका हाल jaan-ne के लिए जाता था और किताबे देने. उमेद के पिता और तुम्हारे स्वर्गीय जेठ जी ट्रस्टी थे वह तोह बाद में खुद उमेद ने इसके लिए abhyaas-shala बनवा राखी थी. वह तोह इसको वही रखना चाहता था लेकिन ये और रुक न पाया तुम सबकी वजह से. पहले 5 साल तोह इसने उमेद से भी जयते बाद नहीं की थी.", रामेश्वर जी उठ खड़े हुए और दरवाजे पर से टोलिया उतार कर बहार वाले बाथरूम की तफाफ चल दिए.

"तोह तू जानता है इन सबको जिनसे तेरा सामना हुआ?"

"नहीं दादी. किसी को नहीं जानता लेकिन थे सब मुझे ाचे से jaan-ne वाले हे."

"मेनका ाची लड़की है और ये समझ ले के वह अबसे तेरी बुआ जैसी है. तेरे दादा जी ने सिर्फ उसकी ाची ज़िन्दगी के लिए उस परिवार की मदद की जो हमारे लिए हे मुसीबत बन्न रहा था. दिल ऐसा हे उनका लेकिन फिर कड़ी फसल उखाड़ने से भी पीछे नहीं हटेंगे अपनी भूल सुधरने के लिए. कल जब दादा के साथ जायेगा न तोह सुशीला से ाचे से मिलना, वह बड़ी है तेरे पापा से. ज़िद्दी और घमंडी है लेकिन तूने उस पर एहसान कर दिए है तोह वह तेरे साथ दिल से व्यहवहार करेगी. ज्यादा सवाल मत करना तेरे दादा के सामने. और हो सकता है वह बिजेन्दर और सुदर्शन भी हो, बड़े भाई जैसे है वह दोनों. सुदर्शन तेरी बड़ी दादी के साथ रहता है लेकिन ऐसे मौके पर तोह आया हे होगा", दादी की आखिरी बात पर वह उन्हें घूरने लगा.

"सुदर्शन का इस सबसे क्या चक्कर?"

"तू जानता है उसको? तेरे से तोह 10-12 साल बड़ा होगा वह. आखिरी बार देखा था तोह वह 7-8 का था और उतना हे बिजेन्दर रहा होगा. बिजेन्दर फिर भी मिलता रहा था जब तक स्कूल जाता रहा."

"सुदर्शन नाम सुना है बस लेकिन शायद ये वाला अलग हो जिसको आप जानती है.", फिर दरवाजे पर हलकी थपकी की आवाज से अर्जुन उठ कर खोलने गया तोह सामने अलका दीदी थी जो उसका हाथ पकड़ कर अपने साथ हे ऊपर ले चली, उनके हे कमरों वाली तरफ.

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खुली हवा में यहाँ 4 चारपाई लगी थी नोहरे में रात के वक़्त. एक पर बिजेन्दर लेता आसमान में तारे देख रहा था और उसके बगल वाली पर विकास पुनिअ बैठा लौटे से पानी पीने में लगा था. विकास दिन में हे आ गया था बिजेन्दर से फ़ोन पर सन्देश मिलते हे. वह लोग यहाँ नोहरे में हे सोने वाले थे अब क्योंकि फूल चुगने तक तोह बिजेन्दर घर में सो नहीं सकता था.

"विकास, तन्ने मैं कड़े दुखी नई करना चाहता था लेकिन सामने से सब बता भी कोणी सकू था."

"छोड़ इस बात ने भाई. बालक तोह ghule-lade करे हे है. जाता के तोह 2 सेज भाई जूट न बजावे इतने वह सेज न कहलाते आपने तोह फेर भी किमी 2 गहरा का फैसला है.", विकास के मैं में भी कोई द्वेष न था.

"तू जिस छोरे गइल नई रहता, शंकर चचे वाला अर्जुन. काल उसने हे पूरा परिवार बचाया से विकास. बहोत दिलेर और समझदार मानस से वह."

"छोटा भाई है मेरा और जमा साची बात है के वह दिलेरी में घात कोन्या. शायद चोखा हे होवेगा जितना देख्या है."

"ऋषब का भाई कोणी वह भीम सिंह, अर्जुन ने वह गाडी पे किसी गिंडी की तरिया उछाल दिए था. सवा 6 फुट का जानवर एक बालक ने. मैं उसने हल्का कूट के प्लाट तेह भागना चहु था लेकिन मेरे तेह वह हलया भी कोणी.", बिजेन्दर इस वक़्त सब याद कर रहा था जो उसने देखा था.

"गुड्डी काकी वाला सुदर्शन छोटी ध्यान है भाई?"

"हाँ, एक वह हे तोह जानवर है जो मैंने अर्जुन के टक्कर का लगया. लेकिन अपनी बोलचाल न है उसके साथ.", बिजेन्दर ने जैसे मुँह बनाया उसका नाम सुन्न कर.

"उसके rod-plate घल्ल ऋ है सारे शरीर में. उसके अकेले के नहीं वह 4 और भी थे उसके मलंग बदमाश उनके भी. अर्जुन ने सर तेह ऊपर था के वह स्यामि दरवाजे जितनी दूर बागा के मार्य था. अकेला वह आरर 5 छोटी बर्ज, स्टेडियम ने बेरा है यु बात.", विकास की बात सुन्न कर बिजेन्दर खाट से उठ कर बैठ गया.

"यु कद होया? अर्जुन ने अकेले शोध भर दी उनकी आरर दादी चंद्रो ने भी कुछ न कहा?"

"हाँ अकेले, क्यूंकि मैं आरर बलबीर तोह एक ने हे संभल न सके. दादी के कह्वेगी जड़ बात छोरी का हाथ पकडन की हो. छोटी अर्जुन की मंगेतर आरर एक विदेशी मेहमान न ठान लगया था. सच कहु बिजेन्दर वाह छोरी न रोकती अर्जुन ने तोह वह उन सबके 2 फाड़ कर देता."

"इतनी जान है उसमे? छोटी छोटा जानवर कोन्या. खैर तू झूठ तोह बोले कोणी आरर 2 नज़ारे तोह मैं खुद देख चुक्या. वह तोह मार खा के भी हासे था. मिलना पड़ेगा इस के गइल तोह."

"तू पहल्या भी मिल्या है जड़ मेरे धोरे आया था."

"ाहो. सही कह्या विकास ने. गोलू बतावे था के बिजेन्दर भाई टकराया होया है उस लड़के से. आरर वह भी गया था मिलान खातिर लेकिन अर्जुन ने उसका चाक़ू मदद के वापिस गोज में घायल दिए था. साथ हे न्यू भी कह्या के वह अपने भाई ने कुछ हों नई देगा.", ये बिजेन्दर का दोस्त हे था जो लड़ाई के वक़्त साथ था.

"शीलू, या तोह गोलू ने भी नहीं बताई मैंने. और के केहवे था वह?"

"भाई गोलू भी ulti-sulti बाके था. केहवे था के बिजेन्दर भाई का प्यार दिलवाना चाहवे था इस खातिर हे वह अर्जुन धोरे गया था लेकिन वह छोरा बहोत बढ़िया निकल्या आरर जितना शांत वह रेहवे है, उतना कोई और ताक़तवर गोलू ने कड़े नई देख्या. छोरा जिह्सा भी है बिजेन्दर लेकिन तेरे पे हाथ नई थ्यया.", शीलू भी दूसरी तरफ वाली चारपाई पर लेट गया.

"मेरी समझ से बहार है सबकुछ. मेनका ने दर्द में देख के उसकी भी आँख बंद हो गई थी. लेकिन वह उसके खातिर मरण ने भी त्यार था. प्यार करे है वह उस से? करदा हे होवेगा क्यूंकि भीम तोह इस खातिर ज्यादा उतावला था उसने मारन के लिए.", बिजेन्दर खुद हैरान था क्योंकि विकास ने भी बताया था उसको मंगेतर वाली बात और झगड़ा और मेनका वाला तोह खुद उसके सामने था.

"याद है बिजेन्दर तेरी छोटी काकी के कह्या करती थी. प्यार दें वाला तोह 100 ने भी कर सके है आरर नफरत वाला एक पे हे अटक्या रह जे है.", विकास ने यहाँ मधुलता का जीकर कर दिए था.

"हाँ मुन्नी काकी हमेशा या बात कहे करती. माँ की वजह से काकी तेह भी आज 8 साल बार मिलना होया. वा औरत सच में महान है विकास. अर्जुन उसका छोरा होता जितना मैंने पता है उसका और शंकर काका के बारे में. खैर अर्जुन की या माँ भी घात न होगी.", अभी वह लोग चर्चा हे कर रहे थे के नोहरे के गेट के उस पार से अनुपमा की आवाज आई. चेहरे पर इस वक़्त भी चुन्नी किये वह नजरे फेरे संदेसा देने आई थी.

"जी, वह छोटे दादा का फ़ोन था अभी. काल आवेंगे मिलान 2 बजे. सबका पुछया था आरर विकास भाई ने भी रुकन की कही है.", विकास ध्यान से देख रहा था के थोड़ी देर पहले तोह जब वह हवेली में था तब अनुपमा उसके सामने बिना परदे के थी और सीढ़ी बात कर रही थी.

"ठीक से. तू भी roti-took खा के आराम कर ले ेब 4 बजे की उठ ऋ है. सवेरे मामी आप कर लेगी की काम तू 6 बजे बहार आइये कमरे से. मैं माँ से मिल के तौली आ जाऊंगा.", बिजेन्दर ने जैसे अनुपमा को देखा था वह जाते हे कनखियों से खुद भी एक नजर देखने के बाद हां में सर हिलती वही चली गई जहा से आई थी.

"के देखे है? भाभी बनानी है या मेरा साला बनेगा?", बिजेन्दर की बात समझ आते हे विकास मुस्कुराता हुआ लेट कर ऊपर देखने लगा.

"सही है. वैसे साला हे ठीक सु. सुण्या है के जीजा साले ने घाना लाड लड़ावे है.", विकास की ऐसी बात पर प्यार से उसकी ब्याह पर थपकी मारता बिजेन्दर भी मुस्कुराने लगा. दुःख की इस घडी में कैसे करीब आ गए थे वह रिश्ते जो सालो दूर रहे थे.

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"प्रीती की तोह ाची खासी खबर ले डाली आज अलका ने. लेकिन फिर प्यार से अपने साथ हे रख लिए आज.", रेणुका बुआ अर्जुन से लिपटी हलकी आवाज में बात कर रही थी.

"उस पगली की भी गलती नहीं है. नींद में थी और ऊपर से उसकी मामी ने जाना भी था. फिर वह विक्य के साथ यूनिवर्सिटी चली गई और शाम को हे आई थी.", अर्जुन आराम से रेणुका बुआ को पीठ की तरफ से चिपकाये उनके गाल को हलके से चूम रहा था. उनके बालो से आती वह तजि महक भी उसको ाची लग रही थी. हलके हलके उनके नरम कबूतर सहलाता वह उनसे बातें भी कर रहा था.

"कोई बात नहीं, कभी कभी daant-fatkaar जरुरी है. समझेगी तभी तोह घर सँभालने लायक बनेगी. नहीं तोह सबको सैंडविच हे मिलने वाले बाद में.", रेणुका बुआ खुद हे अपने नरम कूल्हे अर्जुन के उस ठोस हिस्से पर दबा रही थी. उन्हें ाचा लग रहा था ये नया स्पर्श.

"सॉरी बोल रही थी और फिर ऋतू दीदी ले गई उसको अपने साथ. वह भी मेरी हे खबर ले डाली जिस से प्रीती को ाचा लगे. वैसे आज आप ज्यादा हे नहीं ये दबा रही?", अर्जुन ने कूल्हों के निचले नरम भाग को हाथ में भर के जैसे जायजा लिए और गाउन को उस गहरी नरम दरार में अंदर दबा दिए.

"आठ.. ऐसा कुछ मत सोचो. हाँ. बस ाचा लग रहा है तोह साथ चिपक रही हु.", अर्जुन उनकी शर्म देख रहा था और वह ऐसे उनके साथ करने भी नहीं वाला था. मधु बुआ के सामने रेणुका बुआ का rona-dhona सब बिगाड़ देता.

"ाचा तोह आज ऐसे हे सोने वाली हो आप?"

"नहीं नहीं. आज वैसे हे जैसे हमेशा सोते है.", वह जल्दी हे पलट कर उसके सीने में आ लगी. अर्जुन भी इनकी मखमली जांघ पर हाथ फिरता सामने से उनके लबो को हलके हलके चूमने लगा.

"तुम दोनों ये miya-biwi से बहार भी निकल लो थोड़ा. 2 घंटे मई khatar-patar सुनती रहती हु इसलिए कान में ये स्पीकर लगा के सोना पड़ रहा है. आधे घंटे का सीरियल बनाने की जगह 3 घंटे की फॅमिली फिल्म बनाने लग जाते हो. सो जाओ chup-chap नहीं मैं नीचे आ जाउंगी फिर दोनों में से के भाग खड़ा होगा.", मधु बुआ की आवाज सुनते हे रेणुका अर्जुन से लिआपत गई आँखें बंद करते हुए और अर्जुन ने मधु बुआ को आँख मारते हुए हवाई चुम्बन दे दिए. वह फिर दूसरी तरफ मुँह करके हंसती हुई लेट गई.

"गलत तोह नहीं कहा न उन्होंने.", अर्जुन ने रेणुका की टांग वापिस अपने ऊपर रखते हुए गाउन कमर तक सरका दिए, वह अभी भी आँखें बंद किये थी, एक शर्मीली मुस्कान के साथ.
 
खैर कहानी के उस अपडेट से पहले एक लाइव राइटिंग यहाँ कर रहा हु

प्रीती- जानते भी हो कितने अक्स दिखते हो मुझे तुम? शायद तुम्हे नहीं पता क्योंकि वह मैं देखती हु.

अर्जुन- जैसे मैं तोह कुछ देखता हे नहीं. लेकिन चलो तुम कहना चाहती हो तोह मैं भी फिर बता दूंगा.

प्रीती- हम जब यहाँ आये थे तब दादा जी एक गण सुनते थे. ी वास् नॉट कम्फर्टेबले विथ हिंदी तहत टाइम. कुछ ऐसा था 'दर्पण ने देखा तुमको, तूने जब जब किआ श्रृंगार' और फिर मैंने वह इंसान देखा जो वीडियो में था. फिल्मी तोह ऐसा हे होता है लेकिन मैं कभी उस चेहरे से निचे न जा सकीय. फ़िरोज़ खान कहते है उन्हें दादू , तुम बस वैसे हे ज्यादा जवान हो.

अर्जुन- ये कैसा प्यार हुआ?" हँसते हुए

प्रीती- ऐसा की फिर मैं कभी इस चेहरे को भूल न पाई. तुमको.

अर्जुन- तुम पागल हो. कैसी अजीब बातें करती हो. फिल्मो में मुझे जोड़ लिए

प्रीती- नहीं. उस चेहरे और एक बात को.

अर्जुन - कोनसी बात प्रीती?

प्रीती - ये ढूंढ फिर ढल जाएगी, रिश्ते भी. मैं वही तुमसे हर लम्हे प्यार करता मिलूंगा. एक तस्वीर हाथ में लिए. गुनेहगार भी हो सकता हु ख्वाहिश का साहिल भी. मोहब्बत तुमसी फिर कैसे कर सकूंगा जब दर्पण में तुम हे हो, आराधना.
 
आप सभी से दिल से क्षमा चाहता हु जो मैं अपना वादा पूरा न कर सका सही समय पर अपडेट न दे कर. वजह तक बताने का समय नहीं मिला इस लिए ये सन्देश अब दे रहा हु.

मेरे 2 बेटे हमेशा मेरी ज़िन्दगी के उस अँधेरे से मुझे बहार रखते रहे जहा सिर्फ भीड़, फरेब, दुःख और अकेलापन हे था. हर साल 3 महीने मई अकेले बीतता था और शराब से बहार निकलने में मेरी मदद करने के लिए मेरे प्यार ने मुझे ये 2 हफ्ते का नन्हा सा रॉटवेलर भेंट किआ था 2012 में. ज़िन्दगी अपनी जैसी भी रही खाया न खाया, सोये या daud-bhag करते रहे लेकिन अपनी धड़कन का ये आखिरी तोहफा वैसा हे प्यार और बदलाव मेरी ज़िन्दगी में लाया जैसा वो लाइ थी कभी.

सुबह 5 बजे चेहरे को चूम कर उठाना, फिर घंटो मेरे साथ घूमना खेलना और एक कमजोर शरीर में धीरे धीरे ऊर्जा का संचार करना रेम्बो ने शुरू किआ था.

गाडी शाम क 5 बजे फिर से घर आने की वजह वही था जो जाने कैसे हमेशा पहले हे घर की खिड़की से मुँह निकले मेरा स्वागत करता मिलता. उसके साथ रहकर फिर से अपने अकेलेपन को मैंने भूलना शुरू कर दिए था. शराब सिगरेट की जगह रसोई में दोनों का खाना बनाना ज्यादा ाचा लगता था.

आज वह दृश्य नजरो के सामने हे लगता है जब 2014 में मुझे हॉस्पिटल भर्ती किआ गया था लंग्स में प्रॉब्लम की वजह से. 5 दिन बाद मेरे घर वापिस आने पे हे उसने निवाला खाया था.

हमेशा बिस्टेर पे मेरे दिल की तरफ सोने वाला रेम्बो एक बार फिर से घर को अधूरेपन में छोड़ गया.

उसके जाने के बाद फ्रैंक भी सदमे है जो शायद मेरे से ज्यादा रेम्बो का हंसाया रहा. फ्रैंक की हालत में आज सुधर है लेकिन फ़िलहाल हॉस्पिटल रहेगा कल सुबह तक.

काम से काम हिम्मत रहेगी की ये वजह तोह है मेरे पास फिर से घर आने की.

थोड़ा समय दीजिये, मैं रुकने वाला व्यक्ति नहीं हु और न हे कमजोर दिल. बस कभी कभी जीवन के कठोर सत्य का सामना करना पड़ता है.

यहाँ लिख कर थोड़ा दिल हल्का करने की चेष्टा है.

सभी को प्यार और आशा रखता हु की इन्तजार करेंगे आप लोग.

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अपडेट 100 (ा)

कुछ अपनों के साथ- कुछ अपनों से दूर (3)


"दीदी, आपको तोह पता है न रात कितनी देर हो गई थी. ऊपर से 3 घंटे बाद हे उठ कर भागना पड़ा और घर में अकेला देख कर अर्जुन शुरू न हो जाये इसका भी डर था, मामी के जाने के साथ हे.", प्रीती रात में इस वक़्त आरती और ऋतू दीदी के साथ बीएड पर लेती थी. तारा दूसरे कमरे में अलका दीदी से मैनेजमेंट के नोट्स समझ रही थी जो की उनकी ट्रेनिंग का हे हिस्सा था.

"अरे तू इस बात को ऐसे समझ की अगर उसको कुछ होगा तोह तू हे पीछे से ध्यान नहीं देगी तोह फिर पास होने का क्या मतलब? जब सारे यहाँ होते है तोह वह नजरो से बच नहीं सकता लेकिन तुम दोनों को ज़िन्दगी में ऐसे इम्तिहान भी देने होंगे जहा तीसरा कोई नहीं होगा. अर्जुन तुझे कभी कुछ कहेगा नहीं लेकिन ऐसे वक़्त में तू उसके साथ होगी तोह वह ध्यान रखेगा.", ऋतू दीदी प्रीती के सर को थपकी दे रही थी.

"सही बात है ऋतू की प्रीती. तुम दोनों का कनेक्शन ाचा है लेकिन अगर ऐसे समय में तुम्हारा उसके साथ होना जरुरी है जब कोई भी न हो. सच कहना के तुम दोनों कब आखिरी बार एक साथ थे अकेले में.?", आरती दीदी का भी सवाल सटीक हे था. प्रीती ने जब गौर किआ तोह वह मासूम सच में हे अपने अर्जुन से पास होने के बावजूद पूरे हफ्ते से दूर हे थी.

"वह मम्मी के आने के बाद ये विक्य वाला इन्सिडेन्स है हो गया और फिर मैंने सच में हे अर्जुन को समय नहीं दिए. लेकिन ये अनजाने में हुआ था दीदी."

"यहाँ उसकी ज़िन्दगी में 20 लोग तोह होंगे हे प्रीती. क्या उसने कभी किसी को शिकायत का कोई मौका दिए समय नहीं बिताने या ध्यान नहीं देने के लिए? तू विक्य को रोकने के चक्कर में अर्जुन को हे भूल गई. फिर चंडीगढ़ जाने की जगह अगर तू यहाँ होती और विक्य को वह भेज देती तोह अर्जुन परसो स्टेडियम से लेकर आज सुबह तक तेरे साथ होता. वह प्यार करता है तुझसे इसलिए वह कभी शिकायत नहीं करेगा. बस कभी कभी थोड़ा सा हिस्सा भी खली हो न तोह कोई और वह स्थान बना सकता है. तुझसे तोह सम्बन्ध अटूट है और रहेगा लेकिन जो मैं कह रही हु उसको समझ.", ऋतू दीदी ने तोह साफ़ साफ़ हे कह दिए था के अगर प्रीती ऐसे हे करती रही तोह कुछ तोह बदलाव जरूर आएगा.

"अब नहीं होगा ऐसा कुछ. आपकी बात ठीक है दीदी, मैं विक्य पर खामख्वाह हे ध्यान दे रही थी. उसको अर्जुन संभल सकता था और इस बीच मैं उसके साथ हे रहती तोह शायद दोनों को मनचाहा टाइम भी मिलता और वह चोट भी न खा के आता. अलका दीदी को बोल देना की अब मैं ऐसी गलती नहीं होने दूंगी.", प्रीती सचमुच भावुक हो कर ऋतू दीदी के सीने से लगने लगी.

"आज न तू इसके गले नहीं लगेगी. आज तू इधर आ और उसको पढ़ने दे, पहले हे वह तेरे laad-pyaar में बहोत टाइम ख़राब कर चुकी है.", अलका दीदी ने प्रीती को कमर से पकड़ कर अपने पास कर लिए. वह अब आरती दीदी न थी और ऋतू दीदी भी उठ कर हंसती हुई स्टडी टेबल की तरफ बढ़ गई.

"सॉरी दीदी. वह रूटीन इतना उनवेन हो गया था के सचमुच ऐसी गलती कर बैठी.", प्रीती की इस साफगोई को देखते हुए अलका दीदी ने भी उसको अपने साथ लगा लिए.

"अब तू आराम से सो जा और फिर सुबह अर्जुन के साथ हे घूमने चली जाना. मैंने बोलै है उसको के जाते समय हमारा दरवाजा नॉक कर के हे जाए. चल अब हम दोनों नींद लेते है और ये महारानी सजा भुगतेगी अर्जुन को अकेले प्यार करने की.", ऋतू दीदी की तरफ नाराजगी से अलका दीदी ने नजरे तरेर कर कहा तोह वह मुस्कुराती हुई फिर से किताब में लग गई. प्रीती भी जल्द हे उनके आगोश में लिपट कर नींद में चली गई थी. उधर अर्जुन भी रेणुका बुआ को ऊपर से संतुष्ट करने के बाद आराम से सो चूका था.

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सुबह रामेश्वर जी भी अपने समय से पहले हे उठ गए थे. शायद अर्जुन अभी अभी बहार निकला था और गेट बंद करने की आवाज साफ़ सुनाई देने से रामेश्वर जी की भी नींद उचट गई थी.

"क्या हुआ जी? आप रात भी बहोत देर तक सोये नहीं थे और फिर अभी 4 बजे उठ गए. परेशां हो जी किसी बात से?", कौशल्या जी सच में उनकी अर्धांगिनी हे थी, सिर्फ नाम की पत्नी नहीं.

"कौशल्या नींद तोह ाची हे आई थी मुझे लेकिन पता नहीं ये दिमाग इतना सतर्क क्यों हो रहा है.", रामेश्वर जी ने स्टूल पर रखा ताम्बे का लौटा उठाया और घूँट घूँट करके पीने लगे. उनका उठने का बाद सबसे पहले काम यही होता था के ser-bhar साफ़ जल पीने के बाद हे बिस्टेर त्यागते थे और ये लौटा उनकी माँ की हे निशानी थी जिसको वह खुद हे सँभालते थे.

"सतर्क ज्यादा तोह होना हे है जी. आपके लाडले की जान पर बन्न आई थी तोह अब आप जरुरत से ज्यादा हे चौकस रहोगे. लेकिन मैं फिर भी कहती हु के आप बस वैसे हे रहे जैसे आप अर्जुन के वापिस आने के बाद हुए हो. वह परिपक्व है और साथ हे आपकी छाया में रहता है. वैसे मुझे लगा था के आप ऋषभ की वजह से परेशां हो रहे होंगे.", कौशल्या जी ने अपने बाल सही से जुड़े में बांधते हुए सर पर साड़ी ठीक की और वह भी अपनी तरफ रखा कांच का ढाका गिलास उठा कर थोड़ा थोड़ा पीने लगी.

"ऋषभ को मैं ाची ज़िन्दगी देना चाहता था कौशल्या और मुझे शंकर की वह बात भी याद है जो उसने Menaka-Renuka के सुहाग उजड़ने के समय कही थी. कौशल तोह शंकर को कभी भय हे न था और फिर उसने यही बात कही थी की जैसे मेनका का घरवाले एक चलवा भर है वैसे हे ये ऋषभ उसके लिए. तब मैंने शंकर को कहा था के ऋषभ मेरी निगरानी में है. लेकिन देखो कैसे वह थोड़ी सी पहचान और ताक़त मिलते हे अपनी badi-maa की हे मौत का षड़यंत्र कर गया. सच कहु तोह लोग मुझे पारखी कहते है लेकिन तुम्हारा सपूत शायद मुझसे बेहतर गलत की पहचान कर लेता है."

"जी आप खुद को दोष क्यों दे रहे हो. आपने हमेशा करम किआ है और कभी किसी मासूम का बुरा नहीं होने दिए. वह शंकर है जो सिर्फ गलत हे ढूंढ़ता है, सही तोह उसकी नजर में सिर्फ कमजोर हे होते है. आप इंसान को हमेशा ठीक कहते है और परिस्थिति हे जो होती है वही करवाती है सही गलत. बस अब मंजू को ले कर मुझे बेचैनी है."

"कौशल्या वह लड़की मैंने देखि है. अभी से उसकी आँखों में अर्जुन के लिए माँ सा प्यार और बहोत हिम्मत है. बस अब दलीप को कह देना के वह जो चाहती है वो करने दे मंजू को नहीं तोह फिर मैं बात करूँगा दलीप से. चलो तुम अभी थोड़ा आराम करो मैं कुछ वक़्त बगीचे में बैठना चाहता हु.", रामेश्वर जी अपनी जगह से उठ कर बैठक वाले रस्ते बहार खुली हवा में चल दिए.

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प्रीती अर्जुन का हाथ थामे jal-nigam वाले जंगल के पास हे एक साफ़ पत्थर पर बैठी थी. दोनों हे हलकी दौड़ लगते इधर आ गए थे. अभी भी हल्का अँधेरा था आसमान में और यहाँ अर्जुन प्रीती के गरम गाल पर नाक से गुदगुदी कर रहा था. वह भी उसके साथ लगी इस सब चुहल और मस्ती का आनंद ले रही थी.

"तुम्हे ये जगह पसंद है?"

"तुम्हे ाची नहीं लगी?", अर्जुन ने जवाब में हे सवाल कर दिए.

"बहोत अलग और शांत है ये. और देखो न यहाँ सिर्फ हम दोनों हे है.", प्रीती की नजरे इस पल में सिर्फ असीम शांत और प्रकृति से भरपूर इस जगह पर स्थिरर थी. वही अर्जुन उसके हलके गरम शरीर की महक लेता गुलाबी गाल पर होंठ रखे थे. कब हाथ सरक कर प्रीती के पेट पर आ गया ये पता न चला.

"फिर भी तुम उधर देख रही हो?", अर्जुन प्रीती के सपाट चिकने पेट पर टीशर्ट के अंदर हाथ डालते हुए अब उसके कान की वह बारीक सोने की पिन चूमता हुआ अपनी साथ पूरी तरह सत्ता चूका था. आज प्रीती के चेहरे पर वह शरारत या अर्जुन पर हावी होने का इरादा न दिखा. हलकी शर्म से वह खुद हे सिकुड़ती हुई अर्जुन के आगोश में आ गई. जहा पहले दोनों साथ बैठे थे अब वह अर्जुन की जांघ पर बैठी थी.

"आज मेरा दिल है के तुम मुझे देखो और मैं बस महसूस करू, हम दोनों के साथ इस जगह को.", प्रीती की ऐसी बात सुनकर अर्जुन ने उसके गुलाबी गाल को होंठो में हलके से दबा लिए. वही हाथ पेट से सरकता हुआ उन कठोर उभारो की तलहटी में आया तोह मजे से आँखे बंद करती हुई प्रीती अपनी गर्दन पीछे करने लगी. ये भी जैसे एक अवसर था अर्जुन के होंठो के लिए. लम्बी उत्तेजक गर्दन पर होंठ रखने का. Aas-pas के दृश्य को पल में भूलती वह खुद किसी जोंक की तरह अर्जुन के होंठो से चिपकती हुई अब उसके साथ सीना भिद्ये थी.

"उम्मम्मम्म.. मुझे खींच हे लेते हो अपने साथ.", दोनों के होंठ जुड़ा हुए तोह अर्जुन मुस्कुरा रहा था वही प्रीती हलके गुस्से से देखती मुँह बना रही थी. फिर एक बार दोनों के चेहरे करीब आये और इस बार बस समय रुक सा गया. धीमे से एक होंठ को मुँह में भरते हुए अर्जुन प्रीती को वही ले जाने लगा जहा सिर्फ उन दोनों का हे अस्तित्व था. अर्जुन के मुँह में गुलाबी जीभ फिरत वह भी आँखे बंद किये उसके बालो में उंगलिया फिरने लगी. कब टाँगे अर्जुन की गॉड में दोनों तरफ हो गई और कब सीने एक दूसरे पर दबाव देने लगे..

'तृण्णनं' की आवाज जैसे अर्जुन को धरती पर वापिस ले आई. बहोत धीमी लेकिन इस सन्नाटे में उन कानो के लिए सुनाई देने वाली ये ध्वनि अर्जुन पहचानता था. दोनों अलग हुए तोह अब प्रीती के चेहरे पर हैरानी थी. उसके दोनों वक्षो पर कैसे अर्जुन के हाथ बहार निकल आये लेकिन वह मुस्कुरा रहा था.

"ये साधू सिंह अंकल है, दूधवाले. मतलब 5 बजने को है अब और हमने भी वापिस चलना चाहिए."

"भाड़ में जाए तुम्हारे अंकल.", प्रीती हावी हो चुकी थी और अब जैसे अर्जुन बेबस. दोनों जिस तरफ थे वह साधू सिंह का ध्यान जा हे नहीं सकता था. वह तोह शहर में जाते थे और यहाँ ये दोनों विपरीत दिशा में इन घने वृक्षों की चाय टेल सबकी नजरो से परे जैसे प्रकृति का हे हिस्सा बने हुए थे. अर्जुन प्रीती को दोनों हाथो से थामे अपना प्यार जताने दे रहा था लेकिन वह अब भी संतुष्ट न थी. अर्जुन का एक हाथ अपने सीने पर खुद हे रखती वह उसको चूमने के साथ हे अपनी कमर आगे सरकने लगी.

ऐसी हे तोह थी अर्जुन की प्रीती. उसको सम्पूर्ण अधिकार से अपने वश में करने वाली जहा अर्जुन कभी हावी नहीं हो सकता था. होंठ अलग होने के बावजूद वह उसके पूरे चेहरे को गीला करने लगी थी. शरीर से चिपके पाजामे के बीच जभी kumud-ras आने लगा तोह शांत होती वह उसके गले लग गई. अर्जुन भी जैसे फेफड़ो में हवा भरता खुद की हालत दुरुस्त करने लगा. हाथ अभी तक उन दोनों वक्षो पर जमे थे, टीशर्ट के अंदर.

"इन्हे छोड़ भी दो अब नहीं तोह आगे जो होगा फिर शिकायत करते रहना.", प्रीती की ऐसी घुड़की सुन्नते हे अर्जुन ने झट्ट से दोनों हाथ बहार खींच लिए. कठोर निप्पल पे हलकी रगड़ से प्रीती ने एक बार और अर्जुन की कमर पर दबाव बना कर फिर खुदको ढीला छोड़ था.

"पागल हो जाती हो तुम. कहा तोह मैं तुम्हे ये जगह दिखने लाया था एक्सरसाइज करने के लिए और कहा ये तुम्हारा बलात्कारी रूप सुबह अँधेरे में हे बहार आ गया.", अर्जुन की मस्ती जैसे भरी पड़ने वाली थी अब.

"बच्चू जिस दिन किआ न मैंने रपे फिर कई दिन तक ये खड़ा नहीं होने वाला. कह देती हु, हाँ. और ऐसी वैसी जगह न हे लेके आया करो अगर खैर चाहते हो अपनी.", प्रीती उसकी गॉड से निकल कर अब सामने कड़ी थी. अर्जुन अपने हे सर पे हाथ मरता खड़ा हुआ और ना में गर्दन हिलता मुस्कुराने लगा.

"बिलकुल पागल हो तुम. चलो तुम्हे एक और जगह दिखता हु, अभी बहोत टाइम पड़ा है.", अर्जुन उसका हाथ थामे आगे जंगल की तरफ जाती कच्ची पगडण्डी पर बढ़ गया. प्रीती भी छोटी बची की तरह इठलाती हुई उसके साथ चलने लगी जैसे वह एक और नजारा उनकी प्रतीक्षा में हो. जंगल के बीच 400-500 कदम बढ़ने पर वह खुद हे हाथ छुड़ा कर आगे भागने लगी जहा ये नजारा देख कर वह हैरान थी. वह नहर जहा अक्सर अर्जुन गाँव पार करके तैरने जाता था, वो इस तरफ से हे उधर जाती थी. साफ़ नीला पानी और घने वृक्ष जैसे इस तरफ उनके सिवा कोई आया हे न हो.

"ववववव... ये तुमने कब ढूंढा? थिस इस सेरेने.", वह नहर के बनेरे कड़ी कभी पानी को तोह कभी उसके ऊपर झुके बरगद के घने पेड़ को देखने लगी. बरगद की लम्बी जताये लटकती हुई नहर से 3-4 फ़ीट हे ऊपर थी. नहर के दूसरे किनारे भी कतार से ऐसे हे घने वृक्ष, झाडिया और कही कही साफ़ जमीन थी. अर्जुन उसके बराबर खड़ा खुद भी इस दृश्य को निहार रहा था.

"मैं खुद पहली बार हे आया हु यहाँ. ये नहर मैंने आगे गाँव के बहार देखि थी लेकिन इस तरफ मैं नहीं आया था. वैसे बता देता हु की यहाँ थोड़ा खतरा हो सकता है.", अर्जुन का इशारा जंगल की तरफ था लेकिन प्रीती की मुस्कान जैसे ज्यादा बड़ा खतरा थी.

"हाँ, यहाँ तुम्हे कोई बचने वाला नहीं होगा. लेकिन मैं तरस खा लुंगी अगर तुम मेरे साथ इसके अंदर चलो तोह.", प्रीती मुस्कुराते हुए फिर से पानी को देखने लगी थी. जैसे ये हंसिनी किसी भी पल उसमे उतरने वाली हो. अर्जुन दुविधा में पड़ गया. एक तोह प्रीती को यहाँ ला कर वैसे हे आफत मोल ले ली थी ऊपर से उसका यहाँ पानी के अंदर जाने के लिए लालायित होना.

"कपडे नहीं है और टोलिया भी. हम कल आ जायेंगे और कल भी तोह ये सब यही रहने वाला.", अर्जुन की बात जैसे वह अनसुनी करती हुई अपने जूते खोल कर अब ढीली टीशर्ट उतार चुकी थी. नीला तंग पजामा भी उसके दूधिया जिस्म से उतर कर बाकी कपड़ो पर आ गिरा तोह अर्जुन ने गहरी सांस ली. यहाँ वैसे भी किसी की मौजदगी का कोई निशाँ न था और ऊपर से ये कामदेवी 2 छोटे कपड़ो में कड़ी अपना हे अक्स पानी में देख कर मुस्कुरा रही थी. स्पोर्ट्स ब्रा को भी खोल कर हाथ में पकडे वह अर्जुन को देखने लगी.

"हम अभी यहाँ पर है तोह कोई kal-val नहीं. मेरा दिल जो चाह रहा है वह तोह मैं करके रहूंगी. हो सकता है ये बेशर्मी लगे लेकिन मैं अपने पति के साथ हु और वह मुझे इस हालत में देख सकता है. अपनी टीशर्ट मुझे दे देना, टॉवल का काम ये कर हे देगी.", अर्जुन कुछ जवाब देता उस से पहले हे वह सिर्फ एक तंग पंतय पहने दोनों हाथ ऊपर उठती पानी में उतर गई. वीराने में ये छप्पाक की आवाज बहोत थी अर्जुन को होश में लाने के लिए. उसकी आँखों के सामने प्रीती किसी जलपरी से पानी की सतह के नीचे दूर निकल चुकी थी. हलके बहाव वाले इस पानी में जहा वह रुक कर कड़ी हुई तोह अर्जुन उसके भीगे चेहरे और गीले बालो को देखने लगा. बहाव का जैसे प्रीती पर कोई असर न था लेकिन नजरे पानी पर जमाये वह क्या सोच रही थी ये जरूर अर्जुन को हैरान कर रहा था.

"तुम बहाव के उलट बिना छलांग लगाए कैसे तैर लेती हो?", काजल से कही ज्यादा दक्ष थी प्रीती जो वेग के विपरीत मछली सी टेरिटी हुई अर्जुन से थोड़ी आगे बने हौद की दवार को पकड़ कर फिर से रुक गई थी.

"तुम एक्सटर्नल फाॅर्स उसे करते हो न स्विमिंग के लिए तोह तुम आसानी से नहीं समझोगे. मंजू इस स्लिंगटली बेटर टीचर क्योंकि ये मैं बस करना जानती हु समझा नहीं सकती. वैसे क्या इरादा है? जमीन पर तोह तुम हारे हे थे जरा पानी में भी उतर आओ. देखे कितना वर्कआउट किआ है तुमने.", अर्जुन मुस्कुराता हुआ अपनी टीशर्ट इस बिना कांटो वाले झाड़ पर उतर कर रखते हुए जवाब देने लगा.

"यहाँ तुम हारने वाली हो. तुम तैरना जानती हो लेकिन जान लगाना नहीं. वह सामने नहर का मदद है जहा सफेदे का पेड़ लगा है. वह तक रेस लगते है. जो हरा वह किसी तीसरे के सामने किश करेगा.", अर्जुन ने जूते और पजामा भी उतार के रख दिए थे. वह सिर्फ आधी निक्कर पहने होड की दिवार पर आ खड़ा हुआ. शरीर को खोलता हुआ वह खुद भी अपने बताये निशाँ की तरफ देखने लगा. 300 गज़ से काम दूर तोह वह किसी हाल में नहीं था. प्रीती उसकी शर्त और आत्मविश्वास को देख बस मुस्कुरा रही थी.

"तुम ऊपर से हे जम्प करने वाले हो न? मेरे 3 कहते हे स्टार्ट कर देना.", प्रीती दिवार छोड़ कर दूसरी तरफ चल दी. अर्जुन ने भी उसके निर्वस्त्र उभारो को निहारने के बाद हँसते हुए अंगूठा दिक्या और प्रीती के 3 कहते हे पानी में कूद गया. उसकी छलांग प्रीती से जुड़ा थी और थोड़ी अनादि तैराक वाली. पानी को उछलता वह दोनों हाथ बारी बारी से आगे पीछे करता आगे बढ़ गया. प्रीती वही कड़ी ये देख कर मुस्कुरा रही थी.

"थकने के काम करता है फिर स्वीम्मर बनेगा. अर्जुन डार्लिंग 50 मीटर का लैप दिए है तुम्हे और दुगने से हारने वाले हो.", नहर की सतह पर हे पाँव का जोर लगते हुए प्रीती एक बार फिर पानी के अंदर हे फुर्ती से किसी मछली से आगे बढ़ी. वह सर के सामने से हाथ अर्द्धचक्र बनती पीछे ला कर कही ज्यादा रफ़्तार और बिना शोर किये तैरने लगी. अर्जुन उस उसके बीच की दुरी जैसे आधे मिनट में हे ख़तम हो गई थी और अगले एक मिनट के बाद प्रीती मंजिल पर पहुंच कर सामने से आते अर्जुन को देख रही थी. हाथ चलता हुआ वह thik-thak तैर रहा था और पास आते हे प्रीती ने खुद हे उसको अपनी गिरफ्त में ले लिए.

"बड़ा ाचा तैर लेते हो.", अर्जुन के निर्वस्त्र जिस्म से पानी के बीच में चिपकी वह भीगे होंठो को चूमने लगी.

"ये हाथ ठीक नहीं है अभी तोह थोड़ा स्लो हो गया मैं.", अर्जुन भी गहरी साँसे लेता प्रीती के तीखे चूचक छाती पर महसूस कर रहा था. अपनी कलाई प्रीती को दिखते हुए वह जैसे एक बहाना देने लगा छोटे बचो की तरह. कलाई पर बंधी पाती के ऊपर शायद घर से चलने से पहले हे ये टेप लगा ली थी उसने, पसीने से बचने के लिए.

"कोई बात नहीं. अब सजा तोह मिलेगी हे. गॉड में उठा कर कपड़ो तक लेके चलना पड़ेगा बच्चू. पानी के अंदर या बहार किनारे से, तुम्हारी मर्जी.", अर्जुन को बहार निकलना हे बेहतर लगा. एक तरफ नहर पर झूलती मोटी दाल को पकड़ कर वह बहार आया तोह प्रीती अभी उसके तगड़े जिस्म को देखने लगी. भीगा हुआ वह मजबूत बदन अब पहले से कही ज्यादा फूला और पूरे कटाव दिखा रहा था. उसकी तरफ हाथ बढाती वह भी अर्जुन से हालत में पानी से बहार निकलने लगी. प्रीती सचमुच अर्जुन जैसी हे थी लेकिन fakk-gulabi गोरी. तराशा हुआ जिस्म जिसपर कोई वासा न थी, साधारण लड़कीओ से ज्यादा चौड़े और मजबूत कंधे, उभरी बाहे और पिण्डलिया. अर्जुन उसके सीने के उभर देखने के बाद अब गोर कूल्हों के बीच फांसी पंतय देख रहा था.

"बहार निकालो मुझे. वह बाद में देख लेना ाचे से.", प्रीती की आवाज से होश आया के उसको बहार भी खींचना है. झेंपता हुआ वह बड़े ध्यान से प्रीती को बहार निकलने के बाद गॉड में उठाये कपड़ो की दिशा में चलने लगा. इतनी सवेरे खुद को निर्वस्त्र अर्जुन के साथ इस हालत में पा कर प्रीती के चेहरे पर अलग हे चमक आ गई थी. ठन्डे पानी के बावजूद दोनों के जिस्म अब गरम थे.

"ऐसे मुस्कुराने की वजह?"

"तुम सेक्सी लग रहे हो और मुझे बड़ा मजा आ रहा है ऐसे.", अर्जुन के हाथ प्रीती की कमर और गुदाज कूल्हों पर थे. नंगे चुके कही ज्यादा सख्ती से अर्जुन से दबते हुए प्रीती की थोड़ी देर पहले वाली हालत को फिर से आग देने लगे.

"जो दिमाग में चल रहा है वह न हे सोचो तोह ठीक रहेगा. देखो कैसे हाल में हम दोनों अभी और तुम्हे यहाँ मस्ती सूझ रही है."

"तुम्हारा वह जहा लग रहा है तुम्हे भी खबर है. अनजान मैट बनो.", अर्जुन उसकी बात पर हलकी शर्म से सामने देखने लगा. गीली निक्कर से बहार निकला उसका मोटा सूपड़ा प्रीती की पंतय के ठीक बीच फूली हुई छूट पर दबा था. कपड़ो के पास वह उसको उतरने लगा लेकिन प्रीती और कास के उसकी गर्दन से लिपट कर अपनी कमर आराम से उस जगह रगड़ने लगी.

"उम्.. मैट करो प्लीज.", अर्जुन की आँखें बंद होने लगी थी और प्रीती सब अनसुना करती हुई उसको होंठो के साथ साथ लिंग को भी दबाने लगी. अर्जुन का दिमाग काम करना बंद कर रहा था. सीने पर वह गुलाबी चूचक चाक़ू सी रगड़ मरते हुए 2-3 इंच ऊपर नीचे होने लगे. पंतय का किनारा जाने कैसे हल्का सा एक तरफ खिसक गया और दोनों के शरीर में तेज करंट सा दौड़ गया. शायद जांघो के फैलने और निरंतर रगड़ की वजह से. लेकिन परिणाम ये हुआ की वह गुलाबी baal-vihin नरम yon-kund सीधा अपने प्रेमी से चिपक गया था. प्रीती अगर अब 2 इंच नीचे होती तोह हद्द पर हो जाती.

"प्लीज.", अर्जुन ने होंठ अलग करते हुए कहा और प्रीती भी उसको आजाद करती हुई जमीन पर कड़ी हो गई. एक अडाड से अपनी गीली पंतय उतार कर वह purn-nirvastra अपनी कमर और कूल्हे दिखती हुई झाड़ से टीशर्ट उतार कर खुद को साफ़ करने लगी. अर्जुन मूरत बना बस उस नज़ारे को देख रहा था. तराशे हुए ठोस गोल कूल्हे और उनके बीच उभरी हुई वह बंद योनि की फांके. झुकने पर तोह जैसे धड़कन हे रुक गई थी. दिल पर हाथ रखे वह बस प्रीती को ताकता रहा.

"देख के हे काम चलना अब. कपडे पहन लो फिर चलते है यहाँ से.", अर्जुन को होश आया तोह प्रीती हाथ से हे अपने बाल सूखा रही थी, पूरे कपडे पहने. एक बार फिर से उसके चेहरे पर शर्म आ गई. तुरंत निक्कर उतर कर वह पजामा pehan-ne लगा.

"सच में बहोत बड़ा है यार. तुम कही से भी नेचुरल नहीं हो.", प्रीती ने फुर्ती से वह स्प्रिंग सा उछलता kaam-dand पकड़ लिए था. एक बार जड़ से सुपडे तक उसको मापने के बाद वह एक तरफ हो गई. अर्जुन देख हे सकता था. पजामा पहन कर टीशर्ट की हालत देखि तोह वह इतनी गीली थी जैसे पानी में डुबो कर निकली हो. कस कर निचोड़ने के बाद गीली हे पहन ली. प्रीती अभी भी जैसे गहरी सोच में डूबी एक हाथ से दूसरे हाथ पर गीत बनती हुई जैसे अर्जुन के लिंग के साथ हाथ की समीक्षा कर रही थी.

"इतना बड़ा अगर यहाँ से अंदर जायेगा तोह ये तोह नैवेल भी क्रॉस कर गया.", अर्जुन को वो जैसे अपने छूट से पेट तक इशारा करके दिखा रही थी वह मुस्कुराता हुआ ना में गर्दन हिलने लगा.

"ऐसे सीधा थोड़ी न जाता है. छोडो इस सबको लेकिन ये बताओ तुम इतना ाचा कैसे तैर लेती हो? और तुमने कहा के मंजू सीखा सकती है तोह क्या वह भी तुम्हारे जैसी हे स्विमिंग कर लेती है?", अर्जुन अब गंभीरता से बात कर रहा था तोह प्रीती ने भी जमीन पर बैठ कर जूते पहनते हुए जवाब दिए.

"माँ ने मुझे पानी में हे पैदा किआ था. ये एक नेचुरल तरीका है और फिर ग्रीस में जहा माँ का परिवार है वह पूल भी थे और पोंड्स भी. तुम्हे शायद पता हो या नहीं लेकिन बेबीज स्विमिंग कर लेते है. मुझे किसी ने ज्यादा नहीं सिखाया लेकिन उस और ग्रीस में मैंने लाइफ के पहले 5 साल में इतनी स्विमिंग कर ली थी जितनी तबसे आजतक नहीं की. यहाँ भी दादू जब क्लब जाते थे तोह वह मैं घंटो स्विमिंग करती थी. वह आर्मी की कुछ प्रोफेशनल स्विमर्स भी प्रैक्टिस करती थी और मेरी तारीफ करती थी. लेकिन मंजू को देखा तोह लगा के वह बेटर है. बूत वह कहती है के मैं नेचुरल हु और उस से ज्यादा ाची. Don't क्नोव बूत she's वे मोरे स्किल्ड एंड फास्टर थान थे पीपल ी क्नोव.", प्रीती बैठी हुई पानी को हे देख रही थी.

"मैं बोर्डिंग में करता था स्विमिंग और यहाँ अभी कुछ समय से हे इस नहर में आने लगा. मुझे लगता था के मैं ाचा कर रहा हु. तुमने इस डिस्टेंस में हे मुझे 100 मीटर के आसपास से हरा दिए. मंजू के बारे में ये तोह पता था के वह स्विमिंग बचपन से करती आ रही है लेकिन जैसा तुम कह रही हो उतना नहीं पता.", अर्जुन भी बराबर हे बैठ गया था.

"देखना चाहिए तुम्हे एक बार. यहाँ तोह फिर भी फ्लो की वजह से एनर्जी काम लगती है लेकिन स्टेडियम वाले स्विमिंग पूल में वह 10 लैप ऐसे करती है जैसे कोई warm-up हो. मेरे कहने पर उसने फुल फाॅर्स से कपट किआ था और डिम्पी ने स्टॉपवॉच से बताया के वह हर बार मुझसे 4-5 सेकंड आगे रही. और वह प्रैक्टिकल है, समझ है के दिवे कैसे करना है. पोजीशन और मूवमेंट की हर छोटी छोटी बारीक बात तक वह समझा सकती है. तुम बुरा नहीं टेरिटे लेकिन ऐसा लगता है जैसे जान ज्यादा लगा रहे हो और बॉडी मूवमेंट पर ध्यान काम दे रहे हो. कल उसको साथ लेके आते है और टॉवल लेके भी. ये गीली टीशर्ट और दोनों के ुंडेरवेअर्स काम खराब कर देंगे.", प्रीती फिर से हंसने लगी थी. अर्जुन ने उसकी पंतय साफ़ पानी से निकालने के बाद निचोड़ कर अपनी जेब बे दाल ली.

"हे. ये क्या कर रहे हो? वह मेरी है."

"तुम्हारे पास जेब नहीं है. और रही बात मंजू को यहाँ लाने की तोह वह फ़िलहाल नहीं करने वाला मैं. तुम आ सकती हो मेरे साथ जब दिल करे.", अर्जुन के सपाट चेहरे को एक पल देखने के बाद प्रीती का ध्यान उसके बालो पर गया. हमेशा अपने घुंगराले केश पीछे की दिशा में सलीके से रखने वाले अर्जुन के कुण्डल इस वक़्त कुछ सामने और एक तरफ की चीयर लिए थे. उसके स्वाभाविक रूप में. फिर ध्यान उस पट्टी पर गया जो अर्जुन खोल कर एक तरफ रख चूका था. कलाई पर 3 काले टांके उस जख्म को बंद किये थे जहा भूरी परत आ चुकी थी.

"जानते भी हो कितने अक्स दिखते हो मुझे तुम? शायद तुम्हे नहीं पता क्योंकि वह मैं देखती हु.", प्रीती ने एक कंकर पानी में मारते हुए कहा. चेहरे पर अलग हे हंसी थी.

"जैसे मैं तोह कुछ देखता हे नहीं हु. लेकिन चलो तुम कहना चाहती हो तोह मैं भी फिर बता दूंगा.", अर्जुन ने अपने बाए हाथ में प्रीती का दया हाथ थामते हुए उसके गीले बालो से टपकती एक बूँद को उस सुराहीदार गर्दन पर फिसलते देखा.

"हम जब यहाँ आये थे न रहने के लिए, तब दादू एक गण सुनते थे. ी वास् नॉट कम्फर्टेबले विथ हिंदी तहत टाइम. कुछ ऐसा था 'दर्पण ने देखा तुमको, तूने जब जब किआ श्रृंगार' और फिर मैंने वही गण एक फिल्म में देखा और उस अभिनेता को भी. बेशक बात फिल्मी है लेकिन वह चेहरा मेरे मैं में बस गया था. फ़िरोज़ खान नाम बताया था दादू ने उनका, और देखो जरा तुम बिलकुल वैसे हे हो बस थोड़े ज्यादा जवान और मेरी जान.", खिलखिलाते हुए प्रीती ने दूसरे हाथ से अर्जुन के बाल खराब करते कहा और वही अर्जुन ने उसको खींच कर अपनी गॉड में लिटा लिया.

"तुम न पूरी पागल हे हो मेरी मानो. फिल्मो में भी मुझे जोड़ लिए. सच में भोली सी गोरी गुड़िया.", अर्जुन ने लाड जताते हुए माथे को चूम लिए. गॉड में सर रखे प्रीती भी आराम से लेती अर्जुन को निहार रही थी.

"ये ढूंढ फिर ढल जाएगी, रिश्ते भी. मैं वही तुमसे हर लम्हे प्यार करता मिलूंगा, तस्वीर दिल में लिए. गुरेहगार भी हो सकता हु ख्वाहिश का साहिल भी. मोहब्बत तुमसी फिर कैसे कर सकूंगा जब दिल के दर्पण में तुम हे हो, आराधना.", प्रीती ने जैसे ये कहा अर्जुन के चेहरे पर ख़ुशी चा गई.

"चलो पहले मैं तुम्हारी बातों को सही करता हु फिर अपनी कहूंगा. लगता है तुमने वह बोल बस तभी सुने थे और जैसे सुने वैसे याद रखे.", अर्जुन नहर के दूसरी तरफ से उगती लालिमा को देखने लगा.

"दर्पण को देखा तूने जब जब किआ सिंगार

फूलों को देखा तूने जब जब आई बहार

एक बदनसीब हु मैं मुझे नहीं देखा एक बार", ये चाँद पंक्तिया किस गहराई से कही थी वह प्रीती के दिल में उतरती चली गई. अर्जुन का चेहरे निचे करते हुए खुद हे उसने प्यार उस होंठो को चूम लिए.

"ये मैंने पहले भी तुम्हारे हे मुँह से सुना था और आज भी मेरा दिल था की तुम फिर से ये गुनगुनाओ. हाँ वह बात भी सच है के मुझे वह अभिनेता इसलिए हे पसंद है क्योंकि ये तुम्हारे बाल बचपन में भी ऐसे हे दीखते थे."

"तुमने मेरे मुँह से ये गण कब सुना? जहा तक मुझे याद है मैंने कभी किसी के सामने तोह गण सुना भी नहीं.", अर्जुन उसके सर को सहलाता ध्यान से देख भी रहा था उस गुलाबी चेहरे और neeli-hari आँखों को.

"तुमने घर आने के बाद मुझे स्टेडियम में हे देखा था और जैसे मैं तुम्हे याद भी नहीं थी. लेकिन हमारी उस पहली छोटी मुलाकात के बाद मैं तुम्हारे घर आई थी क्योंकि चंडीगढ़ से वापिस आने के बाद मैं ऋतू दीदी से मिली नहीं थी. जब उनसे पता लगा के तुम घर में हे हो तोह मैं ढूंढ़ती हुई ऊपर चली आई थी. तुम कैसे दीखते होंगे, मुझे याद भी रखा होगा या कही अब वह बचपन का प्यार तुम्हे याद भी होगा या नहीं, ये सब सोचती मैं छत्त की सीढ़ियों पर आ कड़ी हुई थी. रात में तुम छत्त पर अकेले बैठे थे और आसमान में देखते हुए यही गुनगुना रहे थे. मैंने सही से देखा नहीं थी और फिर वापिस लौट गई थी.", प्रीती की इस बात को सुन्न कर अर्जुन ख़ामोशी से उसका मासूम चेहरा देखने लगा.

"फिर याद आया के मुझे तुमसे दूर रहना है क्योंकि तुम्हे शायद कुछ याद हे नहीं रहा अपने बचपन के बारे में. ऋतू दीदी से लिपट कर मैं कुछ वक़्त खुद को संभालती रही लेकिन उन्होंने कहा था के तुम मेरे हो और जल्द वापिस आओगे मेरे पास. लेकिन मैं खुद से कोई पहल न करू. पालक दीदी की शादी से पहले वाले दिन जब राजन ने मेरी कलाई पकड़ी तोह तुमने कहा था के 'प्रीती सिर्फ मेरी है.' और वह बहोत था ये बताने के लिए की तुम वापिस आओगे.", प्रीती ने जो भी कहा था वह कही से गलत न था.

"तुम्हे पता है प्रीती जब मैं घर से दूर था तोह मैंने सबकुछ भुला दिए था. सबकुछ मतलब अपना परिवार, लोग और खुद को भी. हर रात बस एक सपना मैं कभी भुला न पाया. मेरी बगल में बैठी वह neeli-hari आँखे जो तुम्हारी थी और हम दोनों को संभाले ऋतू और अलका दीदी. बस तुम वैसी न रही जब मैं वापिस आया और फिर मिली भी जब मैं स्टेडियम जाने लगा.", अर्जुन थोड़ा भावुक होता फिर से प्रीती पर झुका लेकिन उसके गले और बालो को सूंघता हुआ.

"पता है मुझे और ये भी पता है के हम तीनो से कही ज्यादा भी तुम किसी से जुड़े हो. लेकिन वह सही भी है क्योंकि हम चार लोग उस चाय टेल हे तोह बड़े हुए है.", प्रीती की ऐसी बात सुन्न कर अर्जुन ने आराम से हे उसकी आँखों में झाँका और जैसे जवाब मिल गया था.

"हाँ कोमल दीदी को कोई भी najar-andaaj नहीं कर सकता. बेशक उसके बाद मंजू और रेणुका है लेकिन मैं जानती हु की कभी तुमने अपने साथ हम तीनो की भी अगर अनदेखी की तोह वह कोमल दीदी के लिए हे होगी. और सच कहती हु की हम तुम्हारे साथ हे होंगी उस घडी में.", प्रीती शायद अर्जुन को उस से बेहतर हे जानती थी.

"ऐसा नहीं होगा मेरी जान. चलो अब कड़ी हो जाओ और चलते है.", अर्जुन ने हलके से उन सुर्ख होंटो को चूम कर प्रीती को उठाया तोह अंगड़ाई लेती वह अपनी सख्त चूचियां मस्ती से अर्जुन को दिखती कड़ी हो गई.

"वादा सिर्फ एक जगह शादी के बाद करने का है. मैं बाकी दोनों जगह हमेशा तैयार हु. लेकिन तुम्हारी सहमति से.", प्रीती ने आगे बढ़ने से पहले अर्जुन को आँख मरते हुए कहा और फिर दोनों हे हँसते हुए वह से चल पड़े.

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रूपाली दीदी के साथ घर से निकलते वक़्त अर्जुन उनसे बातों में लगा था. वह भी hansti-muskurati उसकी हर बात का जवाब देती साथ चल रही थी. बगीचे में बैठे छोल साहब और अंगूर की बैल को दुरुस्त करते रामेश्वर जी अपने इन बचो को देख कर मुस्कुरा रहे थे. आज छोल साहब भी अपने बड़े भाई साहब के बराबर बगीचे में काम कर रहे थे. टमाटर, hari-mirch और बैंगन के पौधों को मजबूती देने के लिए वह सरकंडे बराबर रूप कर उन्हें धागे से पौधे के साथ बाँध रहे थे.

"भाई साहब रूपाली आपकी भतीजी से पौती बन्न हे गई. सच में ये Komal-Ritu इस अलग नहीं लगती अब."

"सतीश, रिश्ते का तोह कोई नाम नहीं होता भाई. सम्मान, प्यार और विश्वास जो हो वो दुनिया बदल सकते है. रुपाली ने वही प्यार अर्जुन और बाकी बहनो में पाया जो हर बहिन चाहती है. यहाँ उसको सम्मान मिल रहा है चाहे वह तुम्हारी भाभी से या फिर अर्जुन द्वारा. ऋतू जिस हक़ से इसको दांत लगते, समझती है और अपने साथ रखती है वह परिवार में विश्वास करता है. वह इसका रिश्तेदार हे कौन था?", रामेश्वर जी अब अंगूर की बैल को आगे तक दुरुस्त करते बाँध चुके थे.

"सही कहा भाई साहब आपने और बड़ी गहरी बात है के रिश्ते का कोई नाम नहीं. समाज बस किसी तरह अपनी मनमानी से वह रूपरेखा बनाये है जो भर दी गई हरेक दिमाग में. रिश्ता तोह बस प्यार का हे होता है और वह दोनों तरफ से.", छोल साहब neele-safed बैंगन और उस केसरिया टमाटर को देखने लगे जो अपने अपने पौधे से जुड़े थे. रामेश्वर जी भी ध्यान दे रहे थे अपने दोस्त की तरफ और उनकी बातों पर.

"सतीश इधर देखो. ये जो गुलाब का झाड़ है न, ये अर्जुन ने तैयार किआ था पूरे 6 महीने में.", छोल साहब उनकी बात सुनकर अपने जगह से उठ खड़े हुए और 4 फ़ीट के लगभग ऊँचे उस गुलाब के झाड़ को समझने लगे. सफ़ेद, पीले, नारंगी और गहरे लाल गुलाब के phool-kaliyan एक हे पौधे par.Jameen में मोटी जड़ भी एक हे थी.

"ड्राफ्टिंग. मतलब उसको कलम लगाने की ाची समझ है. 4-4 किस्म एक पर हे लगा दी उसने?"

"भाई, ये पौधा है तोह 2 साल पुराण लेकिन सवा साल से अर्जुन इसके साथ हे दुनियदारी समझता आ रहा है. वह कहता है गहरे जुड़ाव के लिए सबसे जरुरी है भीतर से ek-samaan होना. ये सफ़ेद और लाल गुलाब के बीच जितने रंग है वह बेशक अलग अलग है लेकिन सभी गुलाब है. इनके बीच टमाटर नहीं लग सकता.", छोल साहब इस बात को सुन्न कर खिलखिला उठे.

"अब ये बात तोह दुनिया भर को पता है के टमाटर और गुलाब एक दाल पर नहीं लग सकते भाई साहब. हाँ गुलाब उसने सभी रंग के ऊगा दिए."

"सतीश उसने इस से आगे जो बात कही थी वह बड़ी गहरी थी.", रामेश्वर जी भी एक रहस्य से चेहरे को ढके छोल साहब को देख रहे थे.

"क्या भाई साहब?"

"वह कहता के टमाटर और गुलाब विचित्र है. एक पर फल लगता है दूसरे पर फूल, एक कांटो से भरा सख्त और दूसरा नरम. लेकिन ये एक दूसरे का ध्यान रख सकते है. इनकी जरूरते अलग अलग है लेकिन वही ek-dusre के लिए वरदान है. तुम समझ सको तोह समझो."

"सही कहा है उसने भाई साहब. गुलाब का झाड़ इस सही दुरी से टमाटर की रक्षा कर सकता है, उसकी मदद कर सकता अधिक फल देने में वही बदले में अपनी तरफ की पर्याप्त नमी से टमाटर का पौधा गुलाब को सूखने न देगा. जितनी खुराक इस फल वाले पौधे को मिलेगी वही खंजिज़ से भरपूर मिटटी आगे गुलाब को सेहतमंद रखेगी. बड़ी दूर की सोचता है अर्जुन."

"पूछो मत भाई के कितनी दूर तक सोच जाता है वह. कभी कभी लगता है के उसके सवाल वह पूछने से रुक जाता है क्योंकि शायद मेरे पास उनके जवाब हे न होंगे.", रामेश्वर जी मिटटी से साणे हाथ साफ़ करते हुए बोल रहे थे.

"ऐसे कोनसे सवाल भाई साहब जिनके जवाब आपके पास भी न हो?"

"सतीश, उसके सवाल समाज के नियम से परे चले जाते है. ज्यादा तोह मैं भी नहीं कह सकता लेकिन जितना आभास है वह बताता है के उसको जीवन और प्रेम का कही अधिक गहरा ज्ञान है.", अभी दोनों और बातें करते उस से पहले हे कौशल्या जी तैयार हो कर उधर आ चुकी थी.

"मेनका के साथ मैं बड़ी जेठानी जी से मिलने जा रही हु जी. आप नाश्ता कर लीजिये और बिट्टू से बात भी. उसका फ़ोन आया था के वह प्रतीक्षा कर रहा है.", रामेश्वर जी ने ध्यान दिए तोह बगीचे के बहार गाडी में मेनका बैठी थी. सामने का हिस्सा जैसे तजा दुर्घटना के हलके निशान बता रहा था लेकिन गाडी सही हालत में थी गेराज से ठीक होने के बाद.

"ठीक है श्रीमतीजी. वैसे कोमल भी साथ जा रही है?"

"हाँ. लेके तोह अर्जुन को जाना था पर वह अपने दादाजी का भगत आपके हे साथ जायेगा. चलती हु जी.", उनके सामने हे कौशल्या जी और कोमल गाडी में बैठ गए. कोमल अगली सीट पर बैठने से पहले अपनी दादी को पीछे आराम से बिठा चुकी थी. कार तुरंत आगे बढ़ गई.

"तोह सब ठीक हो गया है?", छोल साहब ने भी हाथ धो लिए थे और अपने भाई साहब के साथ अंदर नाश्ते के लिए चलने लगे. आज उनका भी भोजन यही था.

"मेरी समझ से तोह शायद कुछ हद्द तक ठीक हो गया है. बाकी Nar-Narayan की कृपा."

"वह परसो रात वाली मुठभेड़ तेजपाल ने संभाली थी? और ये चंद्रो भाभी जी का मसला क्या हुआ?"

"हाँ, सूचना मिली थी की शीला देवी का परिवार कुछ लोगो की मदद से सुशीला और उसके बचो को मिटने जा रहे थे. दूसरी तरफ उन्होंने बड़ी भाभी को भी नुक्सान पहुंचने की कोशिश की थी लेकिन दोनों तरफ असफल हो गए."

"आपने अनहोनी रोक हे दी फिर भाई साहब. मैं जानता था के उस परिवार के लिए आप सबकुछ डाव पर लगा सकते है.", छोल साहब की ऐसी सटीक बात सुन्न कर रामेश्वर जी ने गौर से उन्हें देख. फिर जैसे उन्हें भी समझ आ गया था के ये बात वह चाह कर भी छुपा नहीं सकते. शंकर और कौशल्या का अटूट बंधन और छोल साहब का शंकर से प्रेम अपने आप में मिसाल थे.

"क्या लगता है के मैंने कैसे किआ होगा? हाँ उस परिवार को मैं कुछ होने नहीं दूंगा जबतक ज़िंदा हु. रघुबीर सिंह और सोमबीर सिंह ने कभी मुझे खून से अलग भाई नहीं समझा तोह उनके बाद मेरा हे दाइत्व है परिवारों की देखभाल करना.", दोनों हे बैठक में आ गए थे और अलका ये देख कर अंदर चली गई थी.

"मैं नहीं जानता ये आपने कैसे किआ होगा क्योंकि सामने से तोह आप शामिल हुए नहीं होंगे. और शंकर का फैला जाल कितना भी बड़ा क्यों न हो लेकिन वह आपका बस एक छोटा सा अलग हिस्सा भर है. जिसकी अनदेखी आप जानबूझ कर करते है.", छोल साहब ने पानी की छोटी घूँट लेते हुए गिलास वापिस रख दिए.

"नहीं सतीश इस बार मैं सामने से शामिल था. सभी को मंदिर के बाद मार्किट में छोड़ कर मैं खुद हे बड़ी भाभी वाली घटना पर पंहुचा था. 1 मिनट की देरी तोह जरूर हुई लेकिन 25 साल बाद मेरे हाथ बिलकुल नहीं काम्पे उस इंसान को मिटते हुए जिसको मैं एक बेहतर भविष्य देना चाहता था. अपनी बड़ी माँ को जिन्दा जलने वाले का ये हाल करना कही गलत न लगा मुझे बस तीस जरूर रह गई की मैंने शंकर को बात क्यों न मानी thi.Bhabhi के साथ ऐसा न होता.", रामेश्वर जी के चेहरे पर जो पश्चाताप था वह कही भी उस अपराध के लिए न था जो उन्होंने किआ. एक मासूम के लिए था जो सबकी देखभाल करती आज अपने हे परिवार वालो के षड़यंत्र से घिरी थी.

"आपने कोई अपराध नहीं किआ है लेकिन ऋषभ पर शंकर की नजर काफी समय से थी. उसका फ़ोन आया था मुझे के कुछ बुरा होने वाला है लेकिन वह अमेरिका में है तोह कर वह भी कुछ नहीं सकता था. आपका भी दुःख समझ सकता हु के आपने उस लड़के को कभी अलग नहीं समझा लेकिन अपने हे हाथ से ये करना बड़ा मुश्किल रहा होगा.", रामेश्वर जी ने उनकी बात सुनकर अब चेहरे को दुरुस्त कर लिए था.

"वैसे तुम्हे तोह खुश होना चाहिए भाई. तुम्हे मेरा यही रूप पसंद था और शंकर इस वजह से हे तोह तुम्हारा हंसाया है.", रामेश्वर जी सचमुच आशावादी और हंसमुख व्यक्ति हे थे.

"हाहाहा.. सबको लगता है के शंकर जानवर है या उसमे दिल नहीं है. वह आज भी शायद भावनाओ को एक हे तरीके से समझता है और जवानी उस पर ठहराव लिए है. वह मात्रा आपका एक अंश है. पहले 3 साल तोह आपने फ़ौज में हे बिताये थे और मैं आपके साथ 1 साल रहा हु उस वक़्त. ताऊजी (रामेश्वर जी के पिता) महाराजा साहब से कहकर आपको फ़ौज से निकलवा कर पुलिस में भर्ती न करवाते तोह आपने अपने हे अफसर मार दिए होते. ाची बात ये है के कभी शंकर संतुलन नहीं रख पाया जैसा आपमें थे."

"सष्ठ.. शांत. फिर कभी चर्चा करेंगे इस बारे में. कौशल्या नहीं भी है तब भी उसके मुरीद इधर हे रहते है भाई. जो इतिहास में दफ़न है वही रहने दो और रही बात मेरे पिता जी की तोह वह मुंशी थे तोह दिल कमजोर हे था. माँ ने हे बचपन में जोश भरा था जो 16 की उम्र में मैं रेजिमेंट में दाखिल हुआ था. लेकिन अभी खाना खाओ भाई लुक्मी आ रही है.", रामेश्वर जी ने तुरंत हे बातचीत बदल दी थी सामने आती अलका को देख कर.

"अलका, फिर डिग्री के बाद क्या करने वाली?", दोनों के सामने थाली लगाने के बाद छोटे दादा जी की बात सुनकर अलका भी मुस्कुराती हुई वही बैठ गई. रामेश्वर जी के ये लाड़ली थी.

"2 साल पड़े है अभी दादाजी. लेकिन ये पक्का है के कैंब्रिज या ऑक्सफ़ोर्ड से मास्टर्स करुँगी. थर्ड ऑप्शन जर्मनी है."

"मतलब ये कन्फर्म है के जाना बहार हे है.? लेकिन उसके लिए प्लान भी करना होता है कुछ. बहार डिग्री करने में 8-10 लाख लग जायेंगे और रहना भी इतना हे पड़ेगा.", छोल साहब सवाल पर मुस्कुरा रहे थे.

"मेरे अकाउंट में इतने तोह हैं हे और बाकी दादाजी का भी गाँव वाला पैसा मेरा और ऋतू का हे है. तोह पैसे की दिक्कत तोह आने से रही लेकिन दादी को ये बात मेरे बाउजी हे समझायेंगे.", अलका ने बड़ी सफाई से बनूड़क रामेश्वर जी के कंधे पर रख दी थी लेकिन अलका के पास इतनी रकम सुन्न कर छोल साहब हैरानी से दोनों की तरफ देखने लगे.

"भाई यहाँ सब मुझे हे सामने कर देते है. और लुक्मी जो पैसे बता रही है वह गाँव की फसल और #### शहर वाली मार्किट के किराये से होने वाली आमदनी के हिस्से है. जमीन तोह अर्जुन के नाम है लेकिन फसल के मुनाफे अलग तरह से कर दिए थे कौशल्या ने. ऋतू और इसका 30-30% है बाकि सबका 10-10. ये दोनों 18 की हुई तोह सारा पैसा baap-dada के अकाउंट से अपने में जमा करवा लिए. विश्वास हे नहीं है किसी पर.", रामेश्वर जी इतना कह कर हंसने लगे और अलका के चेहरे पर झूठी नाराजगी आ गई. इधर माधुरी दीदी गरम चपाती रखने के बाद अलका को घूर कर देखती चली गई.

"भाई साहब बड़ी दूर की सोच कर राखी आपने तोह बचो के लिए. और ये कमाई का ऐसा बंटवारा तोह मेरी समझ से भी परे है. मतलब संजीव, माधुरी, कोमल और अर्जुन का 10%.?"

"नहीं नहीं भाई. इसमें संजीव और अर्जुन कहा से आ गए? प्रियंका और आरती का है वह. हाँ संजीव ने अपना सबकुछ अर्जुन को दे रखा है. उस अकेले की कमाई इन सबसे ज्यादा है लेकिन वह भी बाकी चारो को 10-10 देता है. ये दोनों जरा कौशल्या जी की ख़ास है तोह उन्होंने अपना और मेरा भी ऋतू और इसके नाम कर रखा है."

"#### शहर वाले बाग़ और भाभी की पुश्तैनी जमीन की आमदन मतलब अर्जुन की है? आपने तोह बहोत जल्दी हे सबकुछ इनमे बाँट दिए.", छोल साहब के चेहरे पर प्रशंशा के भाव.

"न भाई, बंटवारा तोह एक सूट जमीन का भी नहीं किआ. हाँ ये बचे पढ़े लिखे और कल को जो करना चाहे वह अपने पैसो से कर सके इतनी कोशिश की है. जमीन साड़ी अर्जुन के नाम है लेकिन एक टुकड़ा भी बेचने के लिए उसको रेखा, संजीव और प्रियंका के हस्ताक्षर चाहिए होंगे. तुम्हारी भाभी के गाँव वाली जमीन में रुपाली उसकी गौरडिअन है.", अलका भी ध्यान से सुन्न रही थी जो भी उसके दादाजी बता रहे थे अपने param-mitra को.

"बहुत खूब. संसार को बनाये रखने के आपके नियम भी उतने हे जटिल है जितना अर्जुन. हाहाहा. ाची बात है. और अलका बेटी तुम बहार जाओगी तोह ऋतू तोह यहाँ अकेले रहने नहीं वाली तुम्हारे बिना.", उनकी बात सुन्न कर अलका मुस्कुराने लगी और जवाब उसके दादा जी ने हे दिए.

"वह तोह अभी से आवेदन दिए बैठी है. 2 साल बाद वह माइग्रेशन इंग्लैंड ले रही है, उसके डॉक्टर दादाजी की कृपा से. चले तोह अभी जाना था लेकिन तुम्हारी भाभी 21 से पहले न भेजने वाली थी उसको. धर्मवीर भाई का सपना है ऋतू न्यूरो सर्जन बने तोह वह जाने कैसे ये सबकुछ पहले हे किये बैठे है."

"सांगवान जी का मोह सिर्फ शंकर से नहीं है. उस से जुडी हर चीज और इंसान से वह उतना हे प्यार करते है. ये मैंने वह बनवारी के संस्कार के वक़्त हे देख लिए था. कपडे बदले बिना जो व्यक्ति ऑपरेशन से निकलते हे इतनी दूर आ पंहुचा तोह वह किस हद्द तक शंकर से जुड़ा है हम सिर्फ सोच हे सकते है. और बहोत म्हणत की है शंकर के ऊपर उन्होंने. शंकर की ट्रेनिंग से पहले से हे वह उसको अपने साथ gehan-chikitsa में शामिल रखते थे. वैसे आपके साथ भी उतना हे प्रेम है उनका."

"शंकर की वजह से हे है भाई. अब वह तोह यहाँ रहता नहीं लेकिन एक तरफ तुम्हे मेरे साथ बंधा हुआ है और ऊपर से धर्मवीर, कुन्दनलाल और निर्मल सिंह जैसे उसके बाकी dharam-pita भी मेरे aas-pas हे रहते है. हाहाहा.", अलका अब वह से जा चुकी थी और दोनों अपनी बातें hasi-majaak करते purane-naye दिन याद करते रहे.

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स्कूल में मरस वर्मा ने आते हे अर्जुन से उसका haal-chal लिए और अपनी चिंता जाहिर की थी उसके एक्सीडेंट में चोटिल होने पर. हमेशा की तरह उनका पीरियड सही तरीके से गया. कुछ समझने और कुछ सवालो के साथ लेकिन आज फिजिक्स की नयी टीचर निर्धारित की गई थी जिनका प्रथम दिन था क्लास में.

वेदिका ग्रोवर. एक आकर्षक 30 वर्षीया महिला जिनके कंधे तक करने से कटे बाल और चटख रंग की साड़ी उनके बहरी सौन्दर्य को जाहिर कर रहे थे. चेहरे पर भी नैसर्गिक ख़ूबसूरती और मुस्कराहट बता रहा था के ये किसी भी लिहाज से खड़ूस तोह नहीं थी. सबका परिचय लेने के बाद उन्होंने ने अपने बारे में संक्षिप्त शब्दों में बताया और अब तक पढ़ाये पथ की जानकारी लेने लगी. कोयल आज उन्हें देख कर ज्यादा हे चहक रही थी जो अर्जुन की नजरो से बच न सका. एक कागज कोयल ने बिना अर्जुन की तरफ देखे अपने डेस्क से उसकी तरफ सरकाया तोह अर्जुन ने जल्दी से वह पकड़ लिए.

"तोह पहलवान जी क्लास में आप लड़किया ताड़ने आते है?", अर्जुन इस आवाज से हड़बड़ाता हुआ अपनी नयी टीचर की तरफ देखने लगा जिनके चेहरे पर वही सवाल था जो जुबान ने कहा था. मुट्ठी में कागज़ दबाये वह खड़ा हो गया. सुशिल और दिनेश तोह ख़ामोशी सर झुका कर बैठे रहे लेकिन धरमिंदर पीछे बैठा मुँह पर हाथ रखे हंसने लगा.

"Ji...ji.. मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था. वह तोह बस कोयल को ऐसे खुश देख कर मैं थोड़ा हैरान था बस.", अर्जुन ने जैसे हे खड़े होने के बाद नजरे झुके तोह वेदिका मैडम ध्यान से उसको और अब चौकन्नी बैठी कोयल को देखने लगी.

"Maar-peet करने वाले लड़के यही तोह करते है. स्कूल में आना और फिर time-pas करते रहना, यही तोह आता है. हाँ भोलापन दिखा कर तुम मेरी बात को गलत साबित नहीं कर सकते.", अभी वह ये कह रही थी की क्लास में अंदर आती मिस अन्नू वालिए को देख कर सभी खड़े हो गए. हमेशा की तरह आकर्षक vesh-bhoosha और सिमित प्रसाधन के बावजूद वह पहले से कही अधिक खूबसूरत लग रही थी. यौवन का ये निखार भी अर्जुन की हे दें था.

"तुम भी बैठ जाओ.", अन्नू ने एक नजर अर्जुन पर डालते हुए एक फाइल वेदिका की तरफ बढ़ा दी. फाइल हाथ में लेते हुए वेदिका ने जो कहा वह सुन्न कर अन्नू कभी अर्जुन तोह कभी वेदिका को देखने लगी.

"इसको मैंने खड़ा किआ है मिस अन्नू. पता नहीं था के इतने अनुशाषित और नामी स्कूल में ऐसे लोग भी पढ़ते है. ा सेक्शन में जाने कैसे आया होगा, पैसे के दम पर या सिफारिश पर."

"क्या किआ है इसने?", अन्नू ने शांत स्वाभाव से पुछा और नजरे झुकाये खड़े अर्जुन को देखने लगी.

"Maar-peet करने वाले लड़के से क्या उम्मीद कर सकते है. देखा नहीं इसका हाल और शरीर. ऊपर से खुलेआम लड़कीअ घूर रहा था बेशर्मी से.", लेकिन इस बात का जवाब कही और से हे आया.

"मिस अर्जुन बिलकुल वैसा नहीं है जैसा आप कह रही है. वह मेरे खुश होने पर वजह पूछ रहा था और मैंने हे चित पर लिख कर वजह बताई लेकिन आपको शायद कुछ और हे लगा.", कोयल की ऐसी बात सुन्न कर अन्नू ने अर्जुन की मुट्ठी पकड़ कर सामने की तोह एक छोटा सा कागज़ दबा हुआ था. जिस पर लिखा था 'मेरी भाभी'

"लीजिये मम. देख लीजिये क्या है. मुझे तोह समझ नहीं आया 'मेरी भाभी' का मतलब. बाकी ये लड़का और इसकी किस्मत फिजिक्स टीचर्स के साथ खराब हे है. आप रखिये ये course-notes और डिटेल्स. मैं चलती हु.", अन्नू ने एक बार फिर जाने से पहले अर्जुन को देखा और बहार निकल गई. वेदिका ने पर्ची पर लिखी बात देखि और फिर कोयल को भी खड़ा कर दिए.

"तुम्हारी भाभी मैं घर पर हु और मिस्टर तुम जरा ऐसी बातें क्लास के बाद कर लिए करो. अपनी गलती के लिए ी ऍम रियली सॉरी बूत यू मस्ट फोकस ों क्लास व्हेन योर टीचर इस एक्सप्लेनिंग एनीथिंग. फिर जो बातें करो मैं कुछ नहीं कहूँगी."

"It's नॉट योर फाल्ट मम. I'm रियली सॉरी एंड ी विल नॉट रिपीट थिस इन फ्यूचर."

"सीट डाउन. वैसे ये मिस अन्नू वालिए के साथ क्या हुआ था?", फिर से वेदिका मैडम के चेहरे पर वही मुस्कान आ गई थी.

"मैडम इसने पहले हे दिन उनसे उनका इंट्रोडक्शन मांग लिए था जिस पर वह भड़क गई थी और ये क्लास से बहार. हुआ तोह अगले दिन भी बहार था लेकिन तब कुछ और बात पर. इसके साथ हे हम बाकी तीनो के भी बुरे दिन शुरू हो गए थे अन्नू मम के पीरियड में.", धरमिंदर से जब चुप नहीं रहा गया तोह वह मुस्कुराते हुए अर्जुन की महिमा बताने लगा और बाकी सब भी हंसने लगे. वेदिका मैडम भी कुर्सी पर आराम से बैठ कर माहौल के साथ हो ली.

"मतलब फिजिक्स के साथ 36 का आंकड़ा है और पढ़ने वाले के साथ 72 का.", वह भी हाजिर जवाब और अलग हे व्यक्तित्व वाली थी.

"ऐसा नहीं है मम, अर्जुन को फिजिक्स बहोत पसंद है. अन्नू मिस खुद वर्मा मम से कह रही थी की ये सीलबस से 2 साल आगे चल रहा है.", इस मीठी आवाज को सुना तोह अर्जुन का ध्यान भी उसकी तरफ हुआ. क्लास में वह कभी भी तीसरी कतार की तरफ नहीं देखता था. आकांक्षा और कोयल के सिवा तोह उसने कभी किसी से बात भी नहीं की थी. इस लड़की को पहली बार गौर से उसने देखा था. बेहद गोरी और शांत चेहरे वाली इस लड़की के रेशमी ताम्बे बाल एक सफ़ेद कपडे के रबर से बंधे थे. लम्बाई जहा शर्ट स्कर्ट से जुड़ती थी वह तक. लेकिन इस पल भी उसने अर्जुन को नहीं देखा था.

"भाई ये मिनी तेरे बारे में क्या बोल रही है.?", दिनेश ने अर्जुन के कान में फुसफुसाते हुए कहा और इधर वेदिका मम इस लड़की की बात सुन्न कर ताज्जुब से अर्जुन को देख रही थी.

"तुम कोचिंग ले रहे हो बहार से? Non-attending स्टूडेंट्स की लिस्ट में नाम है तुम्हारा.", ये फाइल का पहला पेज था जो अन्नू मैडम दे कर गई उन्हें.

"जी नहीं मम. मेरी बड़ी सिस्टर मुझे पद्धति है तोह फिर वह क्लास के chapter नहीं देखती. वह टॉपिक कम्पलीट होने के बाद हे नेक्स्ट लेसन पर जाती है. कही एक छोटी सी टर्म या पॉइंट अगर नेक्स्ट क्लास का होता है तोह वह उसको डिटेल में एक्सप्लेन करती है इसलिए कई बार वह अपनी बुक्स इन्क्लुडे कर लेती है.", अर्जुन ने अपनी सफाई में जवाब दिए.

"Non-Attending क्यों हो फिर? और तुम्हारी सिस्टर कोनसी पढाई कर रही है.?", वेदिका मैडम की भी अचानक दिलचस्पी बढ़ गई थी ये जान कर की वह क्लास से आगे चल रहा है.

"जी स्पोर्ट्स की वजह से. दीदी मब्ब्स कर रही है और.", अगला कोई सवाल वह करती उस से पहले हे घंटी बज गई. सभी लैब के लिए खड़े होने लगे थे की मिस चारुल सिंह कक्षा में चली आई.

"कंप्यूटर का पीरियड आज ग्राउंड में लगेगा आप लोगो का.", उनकी इस सपाट बात पर सभी कतार से बहार निकलने लगे और अर्जुन उस लड़की को देखने लगा जिसका नाम दिनेश ने मिनी बताया था. सलेटी स्कर्ट घुटनो तक की थी और सफ़ेद शर्ट की बाजू कोहनी तक मौडे वह एक सधी चाल से उसके सामने से बहार निकल गई. लम्बाई कही से भी साढ़े 5 फ़ीट से काम न थी और पहली बार अर्जुन इतने ध्यान से देख रहा था. फिर वह भी बहार चल दिए अपनी तरफ चारुल को घूरता देख.

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#### शहर बिपास से कोई आधे घंटे की दुरी पर था जहा चंद्रो देवी अब इस निजी हॉस्पिटल के sarv-suvidha संपन्न वातानुकूलित कमरे में बिस्टेर पर लेती थी और उनके शरीर पर अलग तरह की पत्तिया बंधी थी. चेहरे के एक तरफ ये नीला रंग का क्रीम लगाई गई थी और वैसा हे गले से लेकर सीने तक था. शरीर जैसे आग में झुलस गया हो वैसे हे जलने के निशान इस दवा से छुपाये गए थे. उनका ये सुरक्षित हाथ कौशल्या जी थामे हुए बगल में बैठी थी.

"कौशल्या, तू आई तोह दिल को सकूं मिल गया बहिन. देख इतने पापी पैदा करने का नतीजा तेरे सामने है. रामेश्वर को माफ़ कर देना बस.", चंद्रो दादी तोह हमेशा पहाड़ से थी जिनकी आवाज सुन्न कर ाचे खासे मर्द की नजर नीची हो जाती थी और वही आज बेबस और दुखी कौशल्या जी को बड़े प्यार से बुला रही थी.

"जीजी, कैसी बात करते हो आप. बचो को हमारे बीच में कभी न आपने आने दिए न इन्होने. देख कर दिल को ठेस जरूर पहुंची की ऋषभ कैसे इतनी हिमाकत कर गया. आप और आपके देवर के प्यार भरे रिश्ते के बीच कौशल्या कैसे आ सकती है? उन्हें आपकी चिंता हमेशा रहती है और वह यही कहते है के भाभी को हवेली से अकेले बहार नहीं निकलना चाहिए. उस दिन भी आप घर आई तोह बस वह इसलिए हे परेशां थे. भगवन जल्दी ठीक कर देगा सबकुछ.", कौशल्या जी की भी आँखें थोड़ी नम्म हो गई थी इस हालत को देख कर. इस वक़्त कमरा अंदर से बंद था और मेनका बहार Richa-Komal के साथ थी.

"सही कहती है तू. ऋषभ 3-4 बार पहले भी उस वक़्त मिलने आता था खेत पर जब मैं दोपहर में चक्कर मारने जाती थी. उसमे इतनी हिम्मत कभी न थी की वह कुछ गलत कर सकता, मेरी सोच के हिसाब से. और देख कैसे देखे से हाथ पाँव बाँध के जलते भत्ते में गिरा दिए. मैंने कभी फरक न किआ किसी बचे में पर ये नाजायज़ अपना रंग दिखा गया.", इतनी देर बाद उन बूढी आँखों में हल्का गुस्सा आया था.

"नाजायज़ तोह वह था हे इसलिए शंकर की आँख उस पर रहती थी. भंवर सिंह का बीज था जो उस मासूम को पैदा करना पड़ा था जिसकी इज़्ज़त्त उसने लूटी थी. शीला को इसलिए दिए था क्योंकि उसके हे सम्बन्ध थे मोहर और भंवर के साथ. लेकिन इन्हे कैसे पता चला आप पर हमले का?", ऋषभ की कुंडली मिनट में खोल दी थी कौशल्या ने जिस पर एक फीकी सी मुस्कराहट चंद्रो देवी के चेहरे पर आ गई.

"चला गया उन सबके हे पास और गलती कर दी मैंने जो शंकर की बात न मानी. वह पहले हे कह के गया था के उस से दूर राहु वह गन्दा खून है. चल कोई बात नई कौशल्या सोच लुंगी ऐसे पाप का प्रायश्चित कर दिए. रामेश्वर कैसे आया ये तोह मुझे भी पता नहीं लेकिन राजेश (अर्जुन का मां) कुछ समय से aas-pas हे था. बुढ़ापे में रामेश्वर को वह करना पड़ गया जो वह जवानी में भी नहीं करता था. गोलियां चेहरे में उतारने के बाद भी चैन न आया तोह शरीर भत्ते में दाल कर टाला लगा के मुझे इधर ले आया था. कुंदन भी साथ हे था उसके.", कौशल्या जो को थोड़ी हैरत तोह हुई अपने पति के ऐसा करने पर लेकिन फिर वह मुस्कुरा उठी कुन्दनलाल का जीकर आने पर.

"सुनंदा आई थी मिलने?", कौशल्या जी ने वह बातें हे ख़तम कर दी.

"न. आज आएगी शाम को राजेश के साथ, ऋचा से बात हुई थी. मेरा पौता कहा है कौशल्या?", इस बार जैसे ये आखिरी बात में दिल हे उन्होंने कौशल्या की हाथ में रख दिए था. आवाज लरज गई थी.

"जीजी उसको हॉस्पिटल आने पर पाबन्दी है. आपके देवर के साथ वह घर हे आ जायेगा मिलने. रख लेना अपने पास जितना दिल करे.", कौशल्या जी की बात उनके चेहरे पर पीड़ा के बावजूद एक मुस्कान आ गई.

"शंकर और उसको दूर हे रखना है? सही बात है तेरी वैसे. कोमल बता रही थी की दिमाग ज्यादा तेज है उसका और जोर भी Shankar-Narinder से कही ज्यादा है. ाची बात है के उस मासूम को इन सबसे दूर हे रखो. लेकिन तू किस्मत वाली है कौशल्या जो बचो के बाद pauta-pauti भी वरदान से मिले."

"क्यों बिजेन्दर, ऋचा, सुदर्शन कही काम है क्या जीजी? और Guddi-Munni जैसी समर्पित बहु किसी के पास न होंगी. मेरे वाले भी तोह आपके हे है बस दूर हो गए लेकिन जल्द मिल लेंगे एक दूसरे से."

"जितने नाम लिए उनमे से बस ऋचा हे तोह साथ है. सुशीला पहले हे Bijender/Babita का बचपन ख़तम कर गई और सुदर्शन कभी समझदार था हे नहीं. बनाना था उसको शंकर और बन्न गया वह फ़तेह. नतीजा भी ज्यादा न बदला और देख अर्जुन ने लिटा दिए उसको साल भर के लिए बिस्टेर पे.", ये बम फोड़ दिए था जैसे चंद्रो देवी ने कौशल्या जी पर.

"क्या जीजी? सुदर्शन और अर्जुन का झगड़ा? कोई ग़लतफहमी तोह नहीं हो गई?"

"ठण्ड रख और आराम से बैठी रह कौशल्या. सुदर्शन ने गलती की थी जो उसने अर्जुन की मंगेतर और सहेली के साथ गुस्ताखी कर डाली. लेकिन सच कहु तोह दुःख भी होया और ख़ुशी भी. दुःख इस बात का के मेरी इतनी म्हणत के बावजूद सुदर्शन सही रास्ते न चल पाया, कही न कही घर के किसी बड़े मर्द की चाय में न पला शायद इसलिए. ख़ुशी इस बात की के अर्जुन अपनों की रक्षा करनी जानता है और वह भी किसी के कंधे पर बन्दुक रखे बिना. मैंने तोह अर्जुन को तभी माफ़ कर दिए था जब सुदर्शन की गलत हरकत पता लगी, एक तरह से तोह मैं भी अर्जुन की गुनेहगार हे हुई जो इस घर के लड़के ने ऐसी हरकत कर डाली. लेकिन शंकर उस रात हे आया था मेरे पास माफ़ी मांगने.", कौशल्या जी हैरानी से साडी बात सुन्न रही थी. शंकर का गाँव वाली हवेली अकेले जाना कोई बड़ी बात न थी लेकिन अर्जुन के लिए.

"क्या वह सचमुच माफ़ी मांगने हे आया था.?"

"और मुन्नी से मिलने आता तोह मैं ये बात थोड़ी बताती. वह साड़ी रात बहार आँगन में लेता रहा और भोर के वक़्त पहली बात उसने माफ़ी से हे शुरू की. उसकी बात में डर था कौशल्या और वह अर्जुन के लिए नहीं था. सबके लिए था और वह महसूस करते हे मेरा दिल मचल गया अर्जुन को देखने को. बस इसलिए तेरे दरवाजे चली आई थी उस दिन. उस बचे को कभी दुःख परेशानी न होने देना कौशल्या, मेरे चाहे मिलवा या मत मिलवा.", कौशल्या जी फ़िलहाल संतुष्ट भी थी और मुस्कुरा भी रही थी.

"मैंने तोह पहले हे कहा है के मैं कौन होती हु बीच में आणि वाली. उसके ऊपर उतना हे हक़ आपका भी है. वैसे आप जल्दी से ठीक हो जाओ फिर ऋचा की शादी भी करनी है.", इस बार चंद्रो देवी ने छत्त की तरफ देखते हुए गेहटी सांस भरी.

"शंकर उसकी शादी एक साल तोह होने न देता अभी. ट्रेनिंग चालू है उसकी इनकम टैक्स अफसर की अभी. शंकर की बेटी की ज़िन्दगी का फैंसला किसी और को करने का हक़ नहीं है. मुन्नी भी बात करना चाहती थी शंकर से लेकिन वह अमेरिका चला गया. कोई न, बिजेन्दर की शादी 2 हफ्ते बाद है तोह किसी से तोह शुरुवात हो."

"बिजेन्दर ब्याह कर रहा है?"

"हाँ. आया था आज 6 बजे और फिर आएगा. कह रहा था वही लेके जायेगा मुझे वापिस हवेली और अब मेरे हे पास रहेगा. कुछ भी कह वह प्यार हमेशा करता था लेकिन सुशीला की जिद्द ने काम खराब कर दिए. कौशल्या 2 काम है जो सिर्फ तू कर सकती है. बोल करेगी? आखिरी इत्छा समझ ले चाहे.", इतना निवेदन वह किसी से नहीं करती थी लेकिन जैसे कौशल्या देवी हे जिसके सामने वह खुद को भी एक साधारण इंसान समझती थी.

"आप बस हुकुम करो जीजी, मैं और आपके देवर जान तक दे सकते है बस आप अंतिम इतक्या मत कहो."

"कौशल्या जिसके साथ बिजेन्दर ब्याह कर रहा है वह अनाथ है. उसका कन्यादान शंकर से करवा डीओ."

"ये कोई बड़ी बात तोह नहीं. कौन लड़की है वह?"

"अनुपमा."

"शंकर ख़ुशी से करेगा ये काम. आप दूसरी बात बताओ.", कौशल्या जी के चेहरे पर ये मुस्कान देख कर चंद्रो देवी भी खुश हो गई थी. फिर कुछ गंभीर होते हुए उन्होंने अपनी दूसरी मांग की.

"बिंदु. वह डायन है कौशल्या और अगर बिंदु का नहीं रोका तोह मेरे पास तोह खोने को कुछ नहीं लेकिन तेरा संसार भी झुलस सकता है. वह इंग्लैंड में बैठ कर यहाँ जड़े पसार रही है लेकिन शंकर उसके खिलाफ कभी कुछ नहीं करेगा.", ये झुलसा देने वाली बात पर कौशल्या जी का चेहरा भी तमतमा गया.

"चिंता न करो जीजी. वह बिंदु है तोह उसके ऊपर 'रेखा' लगाने वाला शंकर से बड़ा शेर भी है मेरे पास. लेकिन ये बात बेहतर होगा अपने देवर से कहना क्योंकि मेरे हाथ 2 हे है और दोनों एक जैसे.", कौशल्या जी का स्वाभिमान बहोत कुछ बता गया था.

"उस मासूम को बीच में नहीं लाना कौशल्या.", चंद्रो देवी भी कुछ समझ गई थी.

"घबराओ मत जीजी. आप बस उनसे बात करना और वह खुद देखेंगे कैसे जड़े काटनी है बिंदु की.", कौशल्या जी बात पर बस उन्होंने सहमति जताते हुए सर हिला दिए. दरवाजे पर खटका होते हे वह कुण्डी खोलकर बहार वाले व्यक्ति को देखने लगी.

"दवा और इंजेक्शन का समय हो गया माँ जी इनका.", नर्स ने अंदर आते हुए कहा और फिर मेनका के साथ ऋचा और कोमल भी अंदर आ गई. सभी ने कुछ देर उनसे बातें की और जाने से पहले कोमल और मेनका को आशीर्वाद दे कर चंद्रो देवी भी आराम करने लगी.

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स्कूल के समय से एक सवा घंटा पहले हे अर्जुन को ऋतू दीदी लेने आ पहुंची थी. प्रिंसिपल ऑफिस से हे चपड़ासी अर्जुन को अपने साथ कक्षा से इधर ले आया था.

"ऋतू शर्मा तुम्हारी दीदी है?", प्रिंसिपल मरस सिंगला के कांच के टेबल के इस तरफ बैठी ऋतू दीदी को देख कर अर्जुन ने अदब से सर हिलाते हुए कहा.

"यस मम. She's माय एल्डर सिस्टर."

"पीसीबी में 98% थे तुम्हारी सिस्टर के, हाईएस्ट इन रीजन. तुमसे वही एक्सपेक्टेशंस रहेंगी हमारी.", मरस सिंगला ने चश्मे का फ्रेम ठीक करते हुए एक नजर शार्ट लीव पर डालते हुए कहा.

"लेकिन मम मेरे पास तोह पीसीएम है. रुपाली दीदी मेडिकल में है तोह वह टॉप कर सकती है.", अर्जुन की ऐसी नासमझी पर जहा ऋतू दीदी उसको घूरने लगी वही मरस सिंगला ले लाल सुर्खी वाले होंठो पर मुस्कराहट आ गई.

"कोई बात नहीं फिर तुम उसमे हे अपनी दीदी की बराबरी कर लेना. वैसे ऋतू तुम्हारे बरोथेर की प्रोग्रेस रिपोर्ट तोह तुम्हारी मदर ले हे गए थे लास्ट वीक लेकिन मैं बताना चाहूंगी की ये सभी मैं सब्जेक्ट्स में इम्प्रूव कर रहा है.", अर्जुन हैरान था के उसकी माँ कब रिपोर्ट ले गई, वह तोह कभी बहार निकलती नहीं है.

"एडिशनल सब्जेक्ट्स में मम?", ऋतू दीदी ने जैसे उनकी बात समझ ली थी.

"वैसे तोह कंप्यूटर क्लास में भी ये एक्टिव है लेकिन स्पोर्ट्स फैकल्टी का कहना है के बेहेवियर और फिजिकल एक्टिविटीज में अर्जुन इस डिसओबेडिएंट एंड इर्रेगुलर.", ऋतू दीदी ने एक बार सर झुकाये खड़े अर्जुन की तरफ देखा और फिर आगे बात कही.

"पे की क्लास ये अटेंड नहीं करेगा मम. लाइब्रेरी इस बेटर ऑप्शन.", ऋतू दीदी ने बात ख़तम हे कर दी थी और पहली बार अर्जुन के चेहरे पर ख़ुशी झलक रही थी. मरस सिंगला के हामी भरते हे ऋतू दीदी अर्जुन को लिए बहार आ गई.

"ये क्या चक्कर है बताएगा?", जैसी उम्मीद थी वैसा हे सवाल कर दिए था दीदी ने. कॉरिडोर से बहार आते हुए उन्होंने एक नजर उनकी तरफ देख रही चारुल पर भी डाली और अर्जुन के जवाब का इन्तजार करने लगी.

"आपको क्या लगता है? मैं कभी भी ऐसा कुछ कर सकता हु? लेकिन आपने ठीक किआ जो झंझट हे ख़तम कर दिए.", अर्जुन अभी भी दीदी का हाथ थामे चल रहा था. उसको ख़ुशी थी की आज ऋतू दीदी खुद स्कूल लेने आई थी.

"ये चारुल हे तेरी पे फैकल्टी है न?", ऋतू दीदी को भी ाचा लग रहा था जैसे अर्जुन ने अपनी उंगलिया उनकी उंगलियों में पिरोये हाथ पकड़ रखा था.

"हाँ. आप जानती है इसको?"

"ाचे से जानती हु इसको. ये और पारुल आती थी पहले माधुरी दीदी के पास फिर कॉलेज बदल गए तोह मिलना काम हो गया. कही इसके साथ तेरा कुछ?", शरारत से दीदी ने अर्जुन के चेहरे को देखा और दोनों हँसते हुए बहार आ गए. स्कूटी में चाबी लगते हुए अर्जुन ने अपनी बात कही.

"दीदी ये स्कूटी पर जाना अब अजीब लगता है. देखो जरा मेरा साइज और इसका. वैसे आप लेने कैसे आ गई.?"

"दादा जी ने तेरे साथ कही जाना है इसलिए उन्होंने कहा था के 12 बजे मैं तुझे ले औ. वैसे भाई तू मुझे बुलेट चलनी सीखा सकता है क्या?", पीछे बैठती ऋतू दीदी की बात सुन्न कर अर्जुन ने शीशे में उनका प्यारा चेहरा देखा.

"दोने. वैसे सच कहु तोह ये मेरी भी ख्वाहिश थी की आप रानी को चलाओ. सबलोग जो सिर्फ आपको नाजुक गुड़िया सा समझते है वह भी देखे की मेरी जान सिर्फ खूबसूरत हे नहीं कही ज्यादा मजबूत भी है.", अर्जुन का सीधे सीधे उन्हें अपनी जान कहना ऋतू दीदी के चेहरे पर एक हाय और मुस्कान ले आया. अर्जुन ने स्कूटी आगे बधाई तोह शांत गली में उसके पीछे बैठी दीदी ने अपने हाथ उसके पेट पर रख लिए.

"तू सच में ऐसा चाहता है?"

"हाँ. और साथ हे चाहता हु के आप यहाँ भी कभी कभी मुझे लेने आया करो. मुझे आपके साथ घर वापिस जाना तोह हमेशा से पसंद है.", अर्जुन ऋतू दीदी के साथ हमेशा हे दिल से बात करता था.

"चल ठीक है मैं आगे से कोशिश करुँगी कभी कभी तेरे स्कूल आने की. वैसे दादा जी के साथ कहा जा रहा है?"

"आप उन्हें जानती हो. जाने के बाद हे पता चलेगा ये तोह.", दोनों हे घर के बहार आये तोह दीदी उतर कर अंदर चल दी. बहार छोल साहब की गाडी कड़ी थी. अर्जुन जल्दी से कपडे बदलने ऊपर चला गया और 10 मिनट बाद हे हाथ में एक पराठा गोल बनाये हुए अपने दादा जी के पास बैठक में आ गया.

"बरखुरदार अगर इजाजत हो तोह चला जाये? तुम्हारे छोटे दादा जी तोह पिछले एक घंटे से इन्तजार कर रहे है.", अपने दादा जी की बात सुन्न कर वह मुँह में निवाला भरे हे उनके साथ बहार निकल लिए. टाटा सिएरा की बीच वाली सीट पर सफ़ेद कुरता पायजामा पहने वह आराम से पराठा चबा रहा था और आगे बैठे दोनों गहरे dost-dil से भाई अपने रस्ते चल दिए. कोई आधे घंटे बाद गाडी इन गाँव की गलियों से होती हुई एक बड़ी हवेली के बहार आ रुकी जहा पहले हे एक एम्बुलेंस और पुलिस जीप कड़ी थी.

ये सचमुच के महल सी बड़ी हवेली थी जिसके बहार 5-6 गाड़ियां कड़ी थी और लोग आ जा रहे थे. दूसरी तरफ को आधे एकड़ का दरवाजा लगा प्लाट था जहा दर्जन भर लोग बैठे गुफ्तगू कर रहे थे और इस गाडी से उतारते रामेश्वर जी को देख कुछ अदद और बुजुर्ग तुरंत हे उनकी तरफ लपक लिए. कोई पाँव छु रहा था और कोई गले मिलता हुआ आभार जाता रहा था. ऐसा हे उन्होंने छोल साहब के साथ भी किआ और फिर आखिर में अर्जुन ने जो देखा तोह वह हैरान हे रह गया. वह गाडी से अभी उतर कर नीचे भी नहीं आया था के ठीक सामने उस बड़े कुत्ते के साथ अपने दादा जी का स्नेह देख वही जड़ हो गया. दोनों पाँव दादाजी के ऊपर रखे वह उनके सीने को चाट रहा था. अर्जुन बहार आया तोह वह bhoora-kala कुत्ता उसको भी सूंघने के बाद फिर से उसके दादा जी के साथ हे आगे चलने लगा.

"पाँव लागू दादा जी.", बिजेन्दर का सर इस वक़्त पूरा चिकना था और वह दोनों के पाँव छूने के बाद हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया था. रामेश्वर जी ने एक बार गले मिलने के बाद कुछ बात की और फिर अर्जुन को करीब आने का इशारा किआ.

"ये तुम्हारे बड़े भाई है बीटा, बिजेन्दर सिंह.", अर्जुन बिना कुछ कहे खुद हे गले मिला तोह कुछ पल के लिए बिजेन्दर उसको सीने से लगाए जैसे दिल को आराम देने लगा. दूसरी तरफ छोल साहब अंदर जा चुके थे विकास के साथ.

"सुशीला बस घंटे भर के लिए आई है फिर उसको वापिस भी जाना है. तुम बाकी सब देखो मैं सबसे खुद हे मिल लूंगा बीटा.", रामेश्वर जी की बात सुन्न कर भी वह उन्हें अपने साथ लिए हवेली के अंदर आ गया. यहाँ आज सिर्फ रिश्तेदार हे थे और घर की महिलाये. एक स्ट्रेचर पर सुशीला लेती थी जिसके करीब कुछ महिलाये बैठी बातें कर रही थी लेकिन सामने से आते रामेश्वर जी को देख सुशीला की शांत आँखों से भी jhar-jhar आंसू बहने लगे.

"ये तुम्हारी ताई है बुआ नहीं.", अर्जुन थोड़ा अचंभित सा अपने दादा जी की बात सुन्न कर दोनों को देखने लगा. रामेश्वर जी सुशीला के सर पर हाथ फेरते हुए वही बैठी बबिता और अनुपमा से बोले.

"अपने भाई का ध्यान रखना मैं जरा नोहरे में जा रहा हु बिजेन्दर के साथ.", उनकी बात सुन्न कर दोनों हे कड़ी हो गई और इधर छोल साहब भी मोहर सिंह की तस्वीर के सामने हाथ जोड़ कर विकास को लिए उनके साथ हे बहार निकल चले.

"उनकी बात पर मत जाना आप. मेरे लिए आप बुआ हे हो और रहोगी. पापा ने तोह यही लिखा हुआ था आपके नाम के साथ.", अर्जुन निसंकोच किसी के परवाह किये बिना सुशीला का गाल चूम कर वही घुटने नीचे करता उनका हाथ थाम कर बैठ गया. आसपास सभी ये देख रहे थे लेकिन सुशीला जिस मोह से उसको निहार रही थी वह सिर्फ ये दोनों हे जानते थे.

"तू बहोत प्यारा है रे और कुछ अलग हे मिटटी से बना हुआ. अपने मारने वाले को भी प्यार कर रहा है.", सुशीला की पनियाई आँखे और मुश्किल से हिलता हाथ देख कर अर्जुन ने खुद हे वह हाथ अपने गाल पर रख लिए.

"बुआ, गलती सबसे हुई और फिर आपको किसी ने समझा भी नहीं. आप अपने हाथ से मुझे मार भी देती तोह मैं तैयार था इसके लिए. बस बात सिर्फ इतनी सी थी की आपका प्यार मिलने से पहले मैं मरना नहीं चाहता था. और ये मोटी मेरी बड़ी बहिन बबिता हे होगी.", अर्जुन की ऐसी बात सुन्न कर जहा सुशीला उसकी समझदारी और स्नेह से खुश थी वही बबिता हैरान सी होती उसके सर के पास आ कड़ी हुई.

"तू किस तरिया जाने है रे मैंने? चूजा सा तोह है आरर मैंने मोटी केहवे है.", बबिता ने भी उसके सर पर हाथ रखा तोह अर्जुन के गहरी मुस्कान देख वह जैसे जड़ हो गई थी.

"आपको तोह गुस्सा आता है न सब पे, वही देखने के लिए बोलै था. सॉरी और सच कहु तोह बड़ी प्यारी हो आप भी. पापा आपको डोली बुलाते थे न?", अर्जुन ने जो कहा वह सुनकर ये दूसरी व्यक्ति थी जो इन 5 मिनट में रोने लगी थी. फिर खुद हे अर्जुन ने वह 2 मॉटे आंसू साफ़ करते हुए उनके चेहरे को देखा.

"तू पैदा भी न होया था फेर तन्ने यु सब किस तरिया पता?", बबिता भी जमीन पर उसके बराबर घुटने मुद्दे बैठी थी और अर्जुन ने उसका हाथ सुशीला के हाथ में पकड़ा दिए.

"मैं किसी को नहीं जानता था लेकिन पापा ने बिना कहे वह रास्ता दिखाया जहा आप और उनके दिल से जुड़े सभी लोग थे. माफ़ी चाहता हु की मेरी अनदेखी की वजह से इतना कुछ हो गया लेकिन मैं नहीं जानता था के जो हो रहा था वह इतना बड़ा होगा. सुशीला बुआ आपके जख्म भर जायेंगे फिर मैं खुद हे आपके साथ इधर आऊंगा.", बिजेन्दर पीछे खड़ा ये सब देख रहा था. उसकी पत्थर सी माँ आज आंसू बहा रही थी उसकी बहिन एक लड़के को पहले बार अपने सीने से लगाए थी.

"ओह झकोई. आड़े तेरा बड़ा भाई भी से जिसने तू 2 बार कूट चुक्या. शर्म आवे तोह मेरे से भी थोड़ी माफ़ी मांग ले.", अर्जुन झट्ट खड़ा हो कर उसके गले लग गया.

"भैया 2 नहीं एक बार. पता नहीं था न के आप बड़े भाई हो नहीं तोह वह गलती भी नहीं करता लेकिन फिर भी एक बात जरूर कहूंगा की विकास भैया के लिए मैं जान दे सकता हु."

"रहने दे छोटे भाई. तेरा ये विकास भाई इतना मतलबी नहीं है. मेरी मौसी आज मैंने पहली बार roti-hansti देखि है और मैं बिजेन्दर ने कहु था के यु छोरा जादूगर है जो कुछ भी कर सके है. समय का her-fer समझ ले और तू शायद सब ठीक कारन खातिर हे आया था इस दुनिया में.", विकास भी इधर हे आ गया था और फिर अपनी बात कहने के बाद अर्जुन के सर पर हाथ फिरते हुए एक बार फिर बिजेन्दर को अपने साथ ले कर अंदर चला गया.

"बीटा तू निर्मल से लेकिन हर इंसान तेरे बर्गा कोणी होव. मैं बहोत बुरी सु आरर देख तू सब अपनी आख्या से देखन बाद भी मेरे पे प्यार लुटान लाग रहा है."

"बुआ, आप न गुस्से वाली थी और जो हुआ वह गलती बहोत लोगो से हुई होगी. दादी कह रही थी की आप बहोत प्यारी हो बस कोई आपको समझता नहीं है.", अर्जुन ने अपना निस्चल रूप दिखते हुए उनके गाल को हलके से चूम लिए और खड़ा हो गया. बबिता इतनी देर से सब देख रही थी. अब उसकी माँ के चेहरे पर दर्द की जगह बस एक हलकी सी ख़ुशी थी.

"जब या चालान लाग जे गई फेर प्यार दिखा लिए तू. चाल बाकी सबते तेरा इंट्रोडक्शन करवा दिउ. यु सारे तन्ने आँख पांडे देखन लाग रे है.", बबिता ने उसका हाथ थामते हुए 12-13 महिलाओ की तरफ ला कर परिचय दिए.

"Kaaki-Maami यु अर्जुन है, शंकर काका का छोरा. आरर अर्जुन या बड़ी मामी, या मंझली मामी आरर यु है कांटा काकी गोलू की माँ. आरर या भी तेरी बेबे लागे है इसका नाम अनुपमा है.", अर्जुन ने सबको हाथ जोड़ कर प्रणाम किआ और फिर अंदर से बहार आती इस बुजुर्ग महिला ने उसके सर पर हाथ रख दिए.

"मैंने दादी कह ले या नानी, मैं बीटा बबिता की नानी लागू हु आरर अनुपमा की दादी.", ये घर की बुजुरु और स्वर्गीय राममेहर की धर्मपत्नी जी थी. उनका आशीर्वाद लेने के बाद अर्जुन कुछ देर वही खड़ा रहा तोह सुशीला के कहने पर बबिता उसको अपने साथ अंदर ले गई.

"वो दीदी को मैं जानता हु क्या?", अर्जुन के शब्दों ने जैसे बबिता को झंझोड़ हे दिए था. अनुपमा को जिस तरह अर्जुन ने देखा था वह भी समझ गई थी की ये सवाल उसने क्यों किआ होगा.

"बेरा कोणी. वैसे गलत टेम पर एक बात केहनी थी. कह सकू हु के?", बबिता कमरों से उसको साथ लिए अंदर आँगन में चली आई जहा चूल्हे पर बड़े पतीले में चाय बनती अक्षरा उनसे कुछ दुरी पर हे थी अभी.

"हाँ बेझिझक."

"अगले मंगलवार ने इस नंबर पे फ़ोन कर लिए एक बार.", फ्रिज पर रखे कागज़ पेन से वह एक टेलीफोन नंबर लिख कर अर्जुन को पकड़ती हुई बोली और फिर आगे बढ़ गई. अर्जुन ने नंबर अपनी जेब में रखते हुए बबिता का हे अनुसरण किआ तोह अक्षरा पर नजर पड़ी. बहार देखि अनुपमा और इस लड़की में एक दूसरे का हे अक्स था बस ये शरीर से थोड़ी दुबली और फक्क सफ़ेद गोरी थी.

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क्रमश
 
अपडेट 100 (बी)

कुछ अपनों के साथ- कुछ अपनों से दूर (3)

जारी


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"के देखे है? यु अक्षरा है अनुपमा की जुड़वाँ.", बबिता परिचय करवा रही थी लेकिन अर्जुन कही खोया सा बस इस मासूम से चेहरे को देखने लगा. जाने क्या हुआ जो उसने झुक्क कर अक्षरा के पाँव छु लिए. अक्षरा को भी जैसे होश आया लेकिन वह अपना हाथ उसके सर पर रख चुकी थी.

"कौन हो?"

"अर्जुन. सॉरी आप उतनी बड़ी नहीं हो लेकिन दिल ने कहा के शायद मुझे यही करना चाहिए था.", अर्जुन ने संक्षिप्त सा परिचय दिए और बबिता ने स्टील की बड़ी थाली में 12-13 गिलास चाय के रखते हुए उसकी तरफ बढ़ा दिए.

"यु गलियारे से सीधा बहार जा के स्यामि नोहरे में चला जा. आरर सबने चा पकड़ा के बाकी झूठे कासन (बर्तन) आड़े ले आइये हौद पे.", बबिता ने इशारे से बर्तन धोने वाली जगह दिखाई तोह अर्जुन आराम से चला गया. Gaanv-dehat में अपनापन सहायद ऐसे हे दिखाया जाता था. अर्जुन अंदर उस जगह तक आ गया था जहा मोहर सिंह को भी इजाजत न थी और बिजेन्दर भी अपनी माँ या दादी के मौजदगी में हे इधर आ सकता था.

"जाने है यु कौन है?", बबिता मुद्दा (ट्रेडिशनल चैने स्टूल) सरकती उस पर बैठ गई. अक्षरा अर्जुन को जाते हुए हे देख रही थी.

"जीजी, जो कोई भी है लेकिन बेरा कोणी क्यों अपना सा लागे है.", अक्षरा ने सर पे से दुपट्टा उतार कर एक तरफ रखते हुए कमीज के निचले हिस्से से हे अपना चेहरा साफ किआ और बबिता को देखने लगी. जो मुस्कुरा रही थी बस.

"वह भी देख बिना जाने किस तरिया तन्ने देखे था. दिल तोह उसका तेरी छाती तेह लगन का था लेकिन शायद छोरा शर्मीला है."

"जीजी बताओ न कौन है यु? मेरी जी मिचलन लाग रहा है और आप पहेलियाँ पूछो हो.", अक्षरा की तड़प देख कर बबिता ने इस बार शांत स्वर में हे कहा.

"तेरा छोटा भाई है वह. अर्जुन शर्मा, शंकर काका का बीटा. बहार वह अनुपमा ने भी घूरे था लेकिन तू काका पे ज्यादा गई है और वह भी. शायद खून एक दूसरे ने पहचान गया हो लेकिन बेरा कोणी के थाम दोनुआ का रिश्ता भी हो सके है.", अक्षरा तुरंत हे कड़ी हो कर ऊपर अपने कमरे की तरफ भाग गई. पीछे बबिता उसकी हालत को समझती हुई खुद चूल्हे के पास बैठ गई. 'बावली है जमा. खुद केहवे है के शंकर से कुछ लेना देना कोणी आरर आज भाई देख के बुरा हाल हो गया.'

"दीदी, मैं वही जा रहा हु. कुछ और काम है क्या आपको?", अर्जुन की आँखें जैसे किसी और को भी ढून्ढ रही थी लेकिन फिर वह जाने लगा तोह बबिता ने उसको अपने पास हे बुला लिए.

"आड़े बैठ एक मिनट.", बबिता को जैसे ये माहौल कुछ सही लगा था बात कहने के लिए.

"जी कहिये.", अर्जुन कुछ दुरी पर बैठ कर बबिता को देखने लगा. गोल गोरा चेहरा, काली स्याह आँखें और 6 फ़ीट का एक तगड़ा गदराया शरीर. बबिता कही से भी कोई कमजोर घरेलु महिला या युवती नहीं लगती थी बस उसका चेहरा सरल मासूम सा था.

"फ़ोन कारन की जरुरत कोन्या लेकिन तू मंगलवार ने मिलान आ सके है?", धीमी आवाज में जैसे वह कुछ जरुरी हे बात कहना चाहती थी. लेकिन अर्जुन तोह पहली हे बार मिल रहा था उस से.

"अगर आना जरुरी है तोह मैं आ सकता हु. वैसे भी 30 किलोमीटर हे तोह है गाँव आपका."

"जरुरी से इस खातिर हे कहु हु. गाँव ाँ की जरुरत कोन्या लेकिन. जड़ सड़क इस तरफ मुड़े है तोह उलटे हाथ की तरफ पुराणी हवेली है महारी. मंगलवार ने तड़के 11 बजे या दोपहर में ढाई-3 बजे आना है."

"ठीक है मैं 11 बजे आ जाऊंगा.", अर्जुन की बात सुन्न कर बबिता हैरत से देखने लगी.

"मार के गैर दिउ तन्ने वड्डे फेर? किम्मे डर कोन्या के तेरे में?"

"दीदी, आपसे कैसा डर? छोटे भाई को तोह मरने से रही आप. बाकी इतना मुझे भी पता है के आप जरुरी बात हे करना चाहती है.", अर्जुन की साफ़ बात पर वह हलके से मुस्कुराई और फिर सीढ़ियों की तरफ इशारा करती बोली.

"ऊपर चला जा और वह गलियारे में आखिरी कमरे से पहले वाले में दवा का डिब्बा राख्या है. जा के ले आ.", अर्जुन सर हिलता उस तरफ चल दिए तोह बबिता भी वह से उठ कर बहार की और चल दी.

गलियारे में यहाँ एक कतार से 4 कमरे थे जैसे हवेली के निचले भाग में बने थे. 2 कमरे पर करते हे वह समझ गया था के इस हिस्से में लोग नहीं रहते शायद और दरवाजा ठेलता हुआ वह अंदर आया तोह भीगी आँखों से अर्जुन को देखती अक्षरा सामने बिस्टेर पर बैठी थी. दोनों अपनी अपनी जगह हे जैसे स्थिरर हो गए थे. अर्जुन चेतना में आया जब अक्षरा उसको अपने सीने से लिपटी मिली.

"भईईई.. ", फफक कर रोटी हुई अक्षरा के मुँह से ये अल्फाज सुन्न कर अर्जुन ने आँखें बंद कर ली. हाथ खुद हे पीठ सहलाते हुए जैसे अक्षरा को हौंसला देने लगे. फिर दोनों हाथ में वह प्यारा चेहरा थामते हुए अर्जुन ने प्यार से उनकी आँखों को देखा और जेब से रुमाल निकल कर चेहरा साफ़ करने लगा.

"दीदी.. आप मेरी दीदी हो?"

"शंकर काका के साथ तुझे 12 बरस पहले देखा था मैंने. मेरा सागा भाई तोह कोई नहीं है लेकिन तेरे राखी जरूर बंधी थी. इतने सालो बाद देखा न तोह खुद को रोक न पाई.", अर्जुन ने इस बार फिर से उन्हें सीने से लगते हुए जैसे उनकी धड़कन महसूस करनी चाहि. और वह भी समझ गया था के कुछ तोह झूठ है लेकिन वह प्यारा हे था जो भी था.

"चलो अबसे हम सेज bhai-behan हे हो गए. 12 साल की तोह मैं पूर्ती कर नहीं सकता लेकिन आपसे हर महीने मिलने आया करूँगा यहाँ और आप भी जब दिल करे घर पे फ़ोन करके मुझसे बात कर सकती है. अब रोना बंद कीजिये और चलिए बहार चलते है. हाँ वह दवा का डिब्बा लेने के लिए मुझे यहाँ बबिता दीदी ने भेजा था."

"कोई डब्बा नहीं है इधर. जीजी ने मुझे परेशां देख कर तुझे भेजा है. यहाँ तोह मैं तेरे गले लग हे सकती हु, बहार तोह चौहदारियो के उसूल इजाजत नहीं देते न जवान लड़की को लड़के से प्यार दिखने का. चाहे फिर bhai-behan हे क्यों न हो.", ये बात जैसे चोट हे कर गई थी अर्जुन के मैं में.

"चलो जरा आप मेरे साथ आओ.", अर्जुन ने कलाई छोड़ दी तोह चेहरा साफ़ करने के बाद अक्षरा सकुचाती सी उस से 2 कदम पीछे हे चलती नीचे आ गई. उसको बहार वाले आँगन में लेके आती वह हालत संभल चुकी थी.

"बुआ, अब आपसे जल्द हे मिलूंगा मैं.", अर्जुन ने सुशीला को हलके से अपने सीने से लगाया, जो अब स्ट्रेचर पर हे थोड़ी बैठी सी थी. सुशीला ने भी माथ चूम कर हामी भरी. लेकिन इसके बाद अर्जुन ने जो किआ वह देख कर अक्षरा के पसीने छूट गए. वह वैसे हे बबिता और अनुपमा के गले लगता हुआ आखिर में दरवाजे के पास कड़ी उसके भी गले से लग गया. बबिता मुस्कुरा रही थी और अनुपमा भी हैरत में थी अपनी जुड़वाँ बहिन के जैसे हे. फिर सितारा देवी के गले लगते हुए अर्जुन ने कहा.

"वैसे तोह मेरा भी दिल आपको नानी हे कहने का था लेकिन नानी तोह 3 है पहले हे और दादी मेरी 2 है. तोह आपको दादी हे कहूंगा मैं, बराबर हो जायेगा न.", सितारा देवी इस ग़मगीन वक़्त में भी मुस्कुरा उठी बेशक आँखों में आंसू आ गए थे.

"बीटा तू आज पहली बार भी आया तोह ऐसे वक़्त में जब तुझसे मैं सही से मिल भी न पाई. लेकिन तू अब यहाँ बेफिक्र हो के आ और सब तेरे हे अपने है यहाँ. बस आना जरूर बीटा क्योंकि शायद तू हे इस घर में खुशियां वापिस ला सकता है.", वह खुद हे जब अर्जुन के सीने से लगी तोह जैसे कमजोर पड़ने लगी. अर्जुन उन्हें संभल कर इस तरफ लाते हुए चारपाई पर बैठा कर हाथो से पानी पिलाने लगा.

"आप अपना ध्यान रखिये और ये घर आपकी हे छाया में चलना चाहिए. खुशियां कही नहीं जाती बस हमको साथ रहकर उस से पहले का सफर करना पड़ता है. दादी मैं जल्द हे आपसे मिलने आऊंगा और आपके पास ृक्क कर हे जाऊंगा.", अर्जुन उनका हाथ थामे बैठा था के रामेश्वर जी भी इधर आ गए और हाथ जोड़ते हुए सितारा देवी के चरण स्पर्श करके बराबर बैठ गए. रिश्ते में जैसे वह देवर हे थे जो सितारा देवी न घूंघट भी न किआ.

"रामेश्वर इसका ख़याल रखिओ. मैं जानती हु इस घर ने तुम्हे बहुत तकलीफ दी है लेकिन अबसे यहाँ तेरी भाभी हे सबकुछ संभालेगी और कभी शिकायत का मौका न मिलेगा.", अर्जुन का हाथ रामेशवर जी के हाथ में रखती वह अर्जुन का सर सहलाने लगी थी.

"तकलीफ शायद चारो परिवारों को बराबर हुई है भाभी. आप अपना ख़याल रखिये और सुशीला भी दुरुस्त होने के बाद अपने घर हे जाएगी. मैं आता रहूँगा और सोमवार को उमेद के साथ हे शंकर भी मिलने आएगा. अभी आज्ञा दीजिये फिर तेहरवी पर मैं कौशल्या के साथ हे आऊंगा.", रामेश्वर जी ने फिर से हाथ जोड़े तोह छोल साहब भी इधर आने के बाद सितारा देवी से मिले.

"अपनी छाया के बिना तुम आज भी नहीं चलते. सतीश तुझे भी jaane-anjaane बहोत दुःख पहुंचाया है मैंने. माफ़ कर देना भाई हो सके तोह."

"भाभी जब आपने कुछ किआ हे नहीं तोह माफ़ी किस बात की और मेरे दिल में तोह कभी किसी के लिए कोई नफरत वैसे हे नहीं आई. अपना ध्यान रखिये अब मुझे भी चलना होगा.", इतनी देर से सुशीला के पास बैठा सुल्तान भी तुरंत उठ खड़ा हुआ. 2 हेल्पर और एक नर्स उस स्ट्रेचर को भी ले जाने लगे थे और Babita-Bijender उनके साथ हे बहार आ गए. अर्जुन एक बार अक्षरा को प्यार से देख कर अपने दोनों दादा के साथ बहार निकल गया.

"ये आपको जानता है? मुँह देखना कितना बड़ा है इसका.", अर्जुन देख रहा था के उसके दादाजी अब खुद हे उस बड़े कुत्ते को दुलार रहे थे. और उसकी बात का जवाब बिजेन्दर ने दिए था.

"दादा ने हे दिए था ये मुझे 5 साल पहले और उस से पहले एक साल इनके पास हे था. इसका नाम सुल्तान है.", बिजेन्दर ने नाम पुकारा तोह सुल्तान एक बार उसकी तरफ देख कर फिर से रामेश्वर जी के साथ खेलने लगा.

"बीटा, कोई दिक्कत परेशानी हो तोह हिचकिचाना नहीं. जो बन्न पड़ेगा मैं जरूर करूँगा और तुम्हारी माँ से मिलने जाते रहना. समय सबकुछ ठीक कर देगा. विकास तुम भी कुछ दिन यही से आना जाना करते रहना. घर में जितने सदस्य है उनकी देखभाल ये अकेला नहीं कर पायेगा.", ये बात छोल साहब ने कही थी और दोनों हे पहलवान उनके चरण स्पर्श करते उन्हें गाडी में बैठते देखने लगे. अर्जुन भी दोनों से गले लग कर फिर मिलने का बोलता हुआ बीच वाली सीट पर आ बैठा. दरवाजा से झांकती अक्षरा को देख वह मुस्कुरा रहा था. कुछ हे देर में गाडी जहा से आई थी उस रस्ते पर वापिस चलने लगी.

"मुझे भी वैसा डॉग चाहिए बाउजी.", अर्जुन की ऐसी बात सुन्न कर रामेश्वर जी के उदास चेहरे पर फिर से हंसी आ गई.

"अभी तुम पहले हे बहोत जिम्मेदारी संभल रहे हो. और सुल्तान जैसी नेसल तुम बिना किसी अनुभव के नहीं काबू कर सकते हो अभी. वह एक जर्मन बड़ी नेसल है अर्जुन जिसके लिए शायद हमारा घर पर्याप्त न हो.", रामेश्वर जी फिर से सामने देखने लगे और अर्जुन थोड़ा उदास हो गया था उनकी बात सुन्न कर.

"कोई बात नहीं तुम उदास मत होना. मैं शंकर से कहता हु वह तुम्हे जर्मन शेफर्ड या कोई लैब्राडोर ला देगा. वह नस्ले घर में आराम से रह भी लेंगी और तुम संभल भी सकते हो. लेकिन गर्मी की छुट्टियों में हे मिलेगा.", छोल साहब की बात सुन्न कर रामेश्वर जी थोड़ा अचरज से उन्हें देखने लगे.

"सतीश मानता हु की अर्जुन संभल सकता है लेकिन जब ये घर से बहार से बहार हो कुछ दिन तोह पीछे से कौन देखभाल करेगा?", उनकी शंका जायज़ हे थी.

"Preeti-Ritu कोई भी कर लेगा और वैसे भी जहा तक मैं जानता हु आप खुद हे ट्रेनिंग देने वाले हो. आपका लगाव jag-jahir था और मधुबन में शायद हे कोई पुलिस डॉग हो जो आपकी नजर से बचा हो. सबको दिए है आपने तोह एक अर्जुन भी रख सकता है.", अर्जुन ध्यान से सुन्न रहा था उनकी बातें.

"दादा जी डॉग्स को भी ट्रैन करते थे?"

"घोड़ो को भी. तेरे पापा के पास तोह अभी भी 2 कथिआवादी घोड़े और 2 जर्मन शेफर्ड है. खुद दिलवा के लाये थे ये उसको पूना से. लेकिन मैं सहमत हु के अब घर पे जरुरत भी है. नहीं तोह फिर मैं मेरे यहाँ रख लेता हु.", छोल साहब के इतने बड़े खुलासे के बाद अर्जुन अपने दादा को हैरत से देख रहा था.

"ठीक है भाई अगर ऐसी हे बात है तोह मंगवा देते है. अपनी दादी के सामने तुम मानोगे जिम्मेदारी उठाने वाली बात और उसकी saaf-safaai भी तुम्ही देखोगे."

"मतलब जब मैं जब अनुभवी हो जाऊंगा तोह उसके बाद आप मुझे सुल्तान जैसी नेसल भी रखने देंगे.?"

"नहीं. कॉलेज के बाद तुम haathi-ghode जो मर्जी रख लेना उस से पहले सिर्फ तुम्हारे पास तीन ऑप्शन है. लैब्राडोर, डोबर्मन और जर्मन शेफर्ड. रॉटवेलर या पाकिस्तानी बुल्ली कभी घर के अंदर नहीं आएंगे.", रामेश्वर जी ने थोड़ा शीशा नीचे किआ और बहार देखने लगे. अर्जुन मुस्कुरा रहा था और उसके साथ हे छोल साहब भी.

"आप सचमुच बड़े प्यारे हो बाउजी. थैंक यू सो मच.", पीछे बैठे अर्जुन ने अपनी बाहें उनके गले में डालते हुए ख़ुशी जाहिर की.

"बीटा रखना मैं भी चाहता हु लेकिन तुम खुद हे देख लेना की एक छोटा सा पिल्ला जब घर में आता है तोह हर चीज उस से प्रभावित हो जाती है. वह म्हणत किसी इंसान के बचे से ज्यादा लगती है पहले 6 महीने और अगर हम ध्यान नहीं देंगे तोह नतीजे उलट भी सकते है. शंकर के पास जगह है, लोग है और वह समय भी देता है. जबसे वह पैदा हुआ तोह घर में हमेशा जानवर रखे गए लेकिन यहाँ इस घर में पिछले 8 साल में कोई जानवर नहीं पला गया है. खैर ाची बात है तुम ज़िन्दगी के बहोत सारे सबक सीखने वाले हो अपनी इस itcha-purti के साथ.", रामेश्वर जी भी उसके दोनों हाथ पकडे वैसे हे समझा रहे थे.

"भाई साहब प्रीती कबसे पीछे पड़ी थी लेकिन मेरे इधर वह देखभाल नहीं हो सकती जैसी आपके पास मिलेगी.", रामेश्वर जी अब मान चुके थे.

"वैसे दादा जी माँ के पास भी ननिहाल में एक है जो उनसे बहोत प्यार करता है. तोह वह भी ध्यान रखने में मेरी मदद कर हे देंगी."

"टाइगर भी तेरे दादा जी ने हे दिए था लेकिन रेखा ने वह वही रखा क्योंकि उनके पास लोग और जगह है. साथ हे निगरानी करने वाला समझदार कुत्ता है वह.", अर्जुन अब जैसे नाराज हे हो चला था ये बात सुन्न कर.

"कहा फसवा रहे हो भाई. बिट्टू ने वह मुझसे लिए था क्योंकि तुम्हारी माँ चिंता करती थी उधर की. हाँ उनके घर में भी शुरू से हे पशु रहे है तोह सभी घरवाले जानते है संभालना. कल को तू कहेगा गाये भी रखनी है.", रामेश्वर जी पल्ला छुड़ाते हुए जवाब देने लगे.

"80 गाये है पहले हे अपने पास. गौशाला में जा चूका हु. और वह भी आपने 2 डॉग्स रखे हुए है. चलो छोडो ये सब बस अब आप जो कहेंगे वह मैं मानूंगा लेकिन छुट्टियों में मुझे टाइगर जैसा हे पप्पी चाहिए.", हलकी फुलकी बातें करते पता भी नहीं चला के कब घर भी आ गए. समय अभी ढाई हे हुआ था तोह दोपहर का खाना करने के हिसाब से पंडित जी अपने मित्र को भी घर में हे ले आये और अर्जुन बहार से हे ऊपर अपने कमरे की और.

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"हाँ तोह मेरी लोमड़ी मिल ली अपने भाई ते?", बबिता इस वक़्त खाना खा रही थी और उसके साथ हे अक्षरा और अनुपमा भी, उसके हे कमरे में.

"मिल ली जीजी.", अक्षरा की बात सुन्न कर अनुपमा हैरत से देख रही थी. उसको जैसे कुछ खबर नहीं थी की किस भाई की बात हो रही है.

"सबके स्यामि तेरे कालजे ने लाग गया देखि छोरे की हिम्मत. इस हवेली में आज तक तोह एहसा पहले कोणी होया था लेकिन आज होया भी आरर देख naani-maami आरर मेरी माँ भी कुछ कहां की जगह खुश होव थी. आज तोह कोई चौधरी न दिखया.", बबिता ने जैसे हे ये याद दिलाया अक्षरा के शर्मीले चेहरे पर एक खूबसूरत मकान तैर गई. वही इतनी देर से चुपचाप बैठी अनुपमा बोल उठी.

"जीजी, वह महारा भाई किस तरिया होया? आरर आपकी बात भी चोखी है. उसने तोह आपके भी कोली भर ली थी आरर इतनी हिम्मत कोई और कर देता तोह आप तोह गाल सुजाति हे साथ बाकी तोह haddi-pasli एक कर देते."

"वह पहला हे भाई आरर माँ ने बचा ल्याया ऋ बावली. जो मौत दें वाले ने भी प्यार करके माफ़ कर सके है तोह उसके खातिर यु काम बड़ा कोन्या. रही बात मेरे कोली भरण की तोह मैं तोह तेरे छोटे भाई के स्यामि के के करुँगी थाम बस सोच के हैरान हो लिओ. शंकर काका का छोरा थाम दोनुआ ने शायद पहचाने है.", बबिता ने अंगड़ाई लेते हुए अपने दोनों बड़े और कसाव लिए खरबूजे उभरते हुए एक मादक अंगड़ाई के साथ कातिल मुस्कान देते हुए बात कही.

"छी.. वह बालक है जीजी. आप कैसी बात करो हो?", अक्षरा शर्म से लाल होती हुई रोटी के अंदर नाख़ून गाड़ने लगी थी और अनुपमा अभी भी हैरानी से कभी बबिता को देखती तोह कभी अपनी जुड़वाँ बहिन को.

"बालक तोह उसने भीम और बिजेन्दर साबित कर दिए. चालू भी घाना है जो थारे तोह प्यार तेह गले मिल्या आरर मेरे कस के. ेब तलाक बोब्बे दुखे है मेरे.", थाली बिस्टेर के एक तरफ रखती बबिता ने बंद कमरे में हे अपनी कमीज ऊपर उठा कर वह असाधारण रूप से बड़ी ब्रा खोल कर एक तरफ फेंकी और अपने बड़े चुचो को सहलाने के बाद कमीज फिर से निचे कर लिए. बिस्टेर के दूसरी तरफ तकिया छाती के नीचे दबती वह लेट कर दोनों को देखने लगी. अनुपमा तोह होंठ दबाये अभी थोड़ी देर पहले वाले दृश्य से भौचक्की सी अपनी बड़ी बहिन को देख रही थी लेकिन अक्षरा आराम से बैठी रही.

"जीजी आप सच में उसके कानि आसक्त हो?", अक्षरा की सीढ़ी सी बात सुन्न कर बबिता गंभीरता से बोली.

"देख बेबे, ब्याह तोह मेरा गोलू गइल होवेगा लेकिन सच कहु तोह मैंने एक शरत खुद के साथ लगाई होइ थी. भीम या बिजेन्दर उस छोरे ने मार देते तोह उनमे से जो भी कोई मेरे हाथ लगता तोह मैं अपना कुंवारापन सौंपने के साथ मार देती. आरर जो उल्टा होता जो हो भी चुक्या है तोह मैं दिल से उस इंसान ने धन्यवाद करती जिसने यु परिवार बचाया और गलत के गलत सही गइल सही किआ. अर्जुन ने तोह और भी गहरी जगह बना दी ऋ. Maa-bhai तोह बचाये हे साथ हे दोनुआ ने बदल के पूरा कुनबा सुधर दिए. ेब बता मैं 32 की उम्र में अगर पहली बार अपनी ख़ुशी जाहिर करू तोह यु गलत किस तरिया होया?"

"न जीजी. किम्मे गलत कोणी और अर्जुन शायद संभल भी ले आपने, कोई और तोह शायद हे प्यार का जवाब प्यार गइल दे.", अक्षरा ने बिना नजरे उठाये कहा.

"तू बावली है जो बड़ी जीजी ने उलटी बात बतावे है? वह शरीर तेह तगड़ा होवेगा लेकिन जो बात जीजी करे है उसके खातिर और भी बहोत कुछ सीखना पड़े है.", अनुपमा कहने से रोक न सकीय.

"तू के सोचे है वह छोरा अनुभवी कोणी? बावली तू है बेबे. मेनका उसपे लट्टू है आरर पहले भी मैंने जिसके सत्ती वह देख्या था वाह उसकी माशूक भी कोई मेरी उम्र की हे थी. भूल न के वह औलाद किसकी है. शंकर काका इस मामले में अपने टेम पे शिकारी था आरर यु उसका भी बाप लागे है मैंने. बाकी भिंडी हो या गाजर, भीतर तोह पहला उसका हे जावेगा.", बबिता ने हँसते हुए आखिरी लाइन कही और अनुपमा थालिया उठा कर अभी आने का बोल कर फिर से दरवाजा बंद करती बहार चली गई.

"मुस्कान भी तोह अर्जुन के साथ हे है जीजी.", अक्षरा ने ऐसी बात कही के बबिता सीढ़ी बैठ गई. कमीज पर दोनों तरफ बटन से उभर आये थे उन पहाड़ो के शिखर पर.

"वाह मेरी जान. यु बात करि तन्ने पते की. फ़ोन खिशकाइये आड़े.", अक्षरा ने फ़ोन सामने किआ और डायरी भी जिसमे फ़ोन नंबर लिखे थे. नंबर मिलाने के बाद बबिता ने वह लाल रंग का 'लाउडस्पीकर' वाला बटन दबा दिए.

"Hello. इंटरनेशनल वीमेन हॉस्टल."

"जी ी ऍम बबिता सिंह सिस्टर ऑफ़ मुस्कान ####. प्लीज कनेक्ट माय लाइन विथ हेर.", बबिता ने साफ़ अंग्रेजी भाषा में जवाब दिए और सामने वाले ने भी 2 बटन दबाने के बाद ये लाइन होल्ड पर रखते हुए हॉस्टल के कमरे का नंबर दबा दिए. जल्द हे लाइन पर ये मीठी आवाज आई.

"बबिता सिंह ों ानोथेर लाइन."

"प्लीज कनेक्ट.", मुस्कान अपने बिस्टेर पर लेती हाथ में इण्टरकॉम लिए अगली आवाज का इन्तजार करने लगी.

"ओह लाडो. के हाल तेरे?"

"मैं बढ़िया दीदी. आज आपको मेरी याद आ हे गई.", मुस्कान ने जवाब दिए तोह बबिता की जगह अक्षरा ने बात की.

"मुस्कान, यहाँ पे माहौल ठीक नहीं था इसलिए दीदी बात नहीं कर पाई. पहले तोह हर दूसरे दिन फ़ोन करती हे थी."

"सॉरी दीदी मेरा वह मतलब नहीं था. वैसे आना मैं भी चाहती थी लेकिन पता नहीं फिर सब कैसे ट्रीट करेंगे और क्या सोचेंगे.", मुस्कान ने एक नजर घडी पर घुमाई तोह 3 बजे हुए थे. वह आराम से बात कर सकती थी.

"अर्जुन गइल तोह हे सके है. और तेरे से किसकी नाराजगी आड़े? तू पहला भी आड़े लाड़ली थी आरर एब्ब भी है.", बबिता ने जो नाम लिए वह सुन्न कर मुस्कान की मुस्कान लम्बी हो गई. खुद के पेट को सहलाती हुई वह हंसती हुई बोली.

"आपको ये अर्जुन कहा से याद आ गया? और बड़े यकीन से कहा के मैं उसको वह लेके आ जाऊ."

"थोड़ी देर पहला आड़े हे था वह बालक. उसने देख के तोह तेरी याद आई के महारी मुस्कान भी देखो किस बालक गइल दिल्लगी लगाए बैठी से.", बबिता की बात अक्षरा समझ गई थी. वह मुस्कुराती हुई मजे से बात सुन्न रही थी.

"बचा नहीं है दीदी लेकिन प्यारा तोह सचमुच बहोत है. और देखो वह आप लोगो से मिलने भी चला गया और मुझे खबर तक नहीं. वैसे एक और बात बता देती हो, आपके सामने तोह बेशरम हु हे थोड़ी मैं.", मुस्कान भी पेट के बल लेट गई थी अब.

"ओहो. तू मेरे जितने बेशरम कद्द हो गई? बता कुणसा राज बताना था.", बबिता ने अक्षरा को आँख मारते हुए मुस्कान से कहा.

"आज रात अर्जुन मेरे पास आएगा या शायद मैं उसके पास जाउंगी.", इतना बोलते हे मुस्कान ने आँखे बंद कर ली.

"बाप रे. बालक ने खा न जाइये. तू खेली खाई है वह नासमझ है, खागड (सांड) होया तोह के बात होइ है तोह बालक बुद्धि."

"न मैं खेली खाई हु और न वह नासमझ. 2 गर्लफ्रेंड पहले हे है उसकी और अगर उसका वह आपने देख लिए न तोह पहले आँखें फटेंगी फिर वह जगह जहा वह जायेगा.", मुस्कान के कहने का अंदाज हे बता रहा था के उसने जीवन में ये सुख कभी लिए नहीं और न ऐसी खुली भाषा प्रयोग की थी जो gaanv-dehat में की जाती है.

"पागल है के? और तू तोह कह रही है के खेली खाई कोन्या फेर जड़ लिए हे कोणी तोह किस तरिया बेरा?"

"दीदी प्यार से एक दूसरे को बाहों में तोह लिए हे है. मेरा पहला किश हे उसके साथ अब तक की सबसे अनमोल याद बन चूका है. अर्जुन प्यार को जितनी गहराई से समझता है उतना तोह शायद हे कोई समझता होगा. वह एहसास करता है के आप उसके लिए कितने ख़ास हो, जिस पल में आप उसके साथ हो. हाथ चेहरे पर भी रखता है तोह धड़कन खुद हे उसका नाम लेने लगती है. कैसे न प्यार हो उस से जो आपकी सभी गलतिया भुला कर भी खुद को समर्पित कर दे? प्यार का एहसास मैंने किआ है दीदी और वह बेहद ख़ास और शब्दों में बता सकने जैसा बिलकुल नहीं है. अब वह दूर है फिर भी ऐसा लगता है जैसे वह करीब हे हो.", मुस्कान बिस्टेर के किनारे झूलती सी अपने दिल का हाल बताये जा रही थी और दूसरी तरफ तीनो खामोश बस उसकी बात सुनती अपनी हे सोचो में सब महसूस कर रही थी. मुस्कान के हाथ से फ़ोन का हैंडल छिटक कर निचे गिर गया जैसे हे 2 हाथो ने उसके पाँव पकड़ कर अपनी तरफ खींचा.

"तुम? तुम यहाँ कैसे? पागल हो क्या जो दिन में हे इधर आ गए और दरवाजा बंद है.", घबराहट जल्द हे हैरानी में बदल चुकी थी जब खुद को उस इंसान की बाहों में पाया जिसने उसको प्यार का एहसास कराया था.

"खुद हे तोह बताया था के ये पिछले हिस्सा सुनसान रहता है और खिड़की एक तरफ खिसकने से हे खुल जाती है. मुझे तोह लगा था के तुम्हे खुसी मिलेगी मेरे आने से.", अर्जुन के सीने में दबी अब वह खुद हे गहरी सांस लेती हुई मुस्कुराने लगी.

"सीढ़ी ढून्ढ हे ली तुमने. बता तोह सकते हे थे के आने वाले हो. देखो मेरी हालत जरा.", मुस्कान के चेहरे की ख़ुशी शब्दों में केहनी सच में मुश्किल थी. और उसको बढ़ाते हुए अर्जुन ने उन हिलते लाल होंठो पर अपने होंठ रख दिए. 10 सेकंड का हे वह चुम्बन बहोत था मुस्कान की आंख्ने बंद करने के लिए. पतली सी बनियान और एक छोटी कासी निक्कर पहने उसका वह बेदाग जिस्म पूरी तरह अर्जुन के आगोश में था.

"स्टेडियम साढ़े 4 जाना था और घर पे सब अपने काम में लगे थे. कल नानी के घर जाना है वह से परसो आऊंगा और उसके बाद अगले दिन मुझे दीदी के साथ पंजाब जाना है सुबह जल्दी और अगले दिन रात तक हे घर आ पाउँगा. जाने से पहले इतना तोह कर हे सकता हु की 2 बार तुमसे मिल लू.", मुस्कान ने इतना सुन्न कर खुद हे उसका चेहरा अपने ऊपर झुका लिए. वह धीमा चुम्बन जल्द हे उत्तेज्जन से भरा बन्न गया. अर्जुन के हाथ उस पतली सी बनियान में चिप्पे ठोस उभारो पर आये तोह गर्दन झटकती मुस्कान की एक तेज सिसकारी निकल गई.

"आह्हः.. अर्जुनंन.. उम्म्म प्यार से बाबा.. सब तुम्हारा हे है.. आठ.. इन पर मेरा भी हाथ बस तुम्हारी याद में लगा है.. आह्हः.. ", गर्दन चूमते हुए अर्जुन ने दोनों amrit-kalash हाथो में भरते हुए जैसे हे कपडे के ऊपर से एक निप्पल मुँह में लिए मुस्कान की टाँगे उसकी कमर पर लिपट गई और मादक आवाज कमरे में गूँज उठी.

"धीरे. तुम तोह मरवा हे डौगी.", अर्जुन ने चेहरा ऊपर करते हुए उन मदहोश आँखों को देखते हुए कहा.

"जान, साउंड प्रूफ है और कॉरिडोर में मेरे ये आखिरी कमरा हे है जिसमे कोई रहता है. अगले तीन खली हे है.. उम्म्म्म", फिर से मुस्कान उसको ऊपर खींचती नगिन्स सी उसके शरीर से लिपट गई.

"सुन्न ले तेरे भाई और मुस्कान की आवाज. बावले हे हो रखे है दोनो और छोरा तोह घन्ना हे तेज है.", फ़ोन की लाइन चालू थी और बबिता के साथ हे बाकी दोनों भी शर्म और हैरत में सब आवाजे सुन्न रही थी. और मुस्कान के कमरे में जैसे हे उसने अपना ऊपर भाग आजाद करते हुए अर्जुन की गॉड में नरम कूल्हे टिकाये अर्जुन ने बाहों में लेते हुए ना में गर्दन हिला दी.

"कपडे अभी नहीं उतरने. मेरा दिल तुमसे मिलने और कुछ समय बिताने का था. रात की जगह मैं सुबह 3 बजे आऊंगा और फिर 6 बजे तक तुम्हारे हे साथ खुद हे तुम्हारी हर ख्वाहिश पूरी करूँगा. हाँ ऐसे तुम ऊपर लेती सकती हो.", अर्जुन मुस्कान की कमर थामे हुए हे उस नरम गद्दे वाले बीएड पर चित्त लेट गया. हाथ उस इलास्टिक वाली निक्कर से नरम कूल्हों को दबाने लगे थे. मुस्कान भी प्यार से उसका चेहरा थामे छोटे छोटे चुम्बन दे रही थी.

"तुम हाथ लगते हो तोह मैं वैसे हे वेट हो जाती हु. पता नहीं तुम्हारा इरादा और क्या फील करवाने का है. वैसे बहोत बुरे हो तुम. गंदे कही के खुद पूरे कपडे पहने हो और मेरी हालत देखो. ाःह.. क्या करते हो वह से हाथ हतोऊ.. उम्मम्मम.. आआआआअह्ह्ह...", नरम उभरे हे कूल्हों दबाते हुए अर्जुन मुस्कान की प्यारी बातें सुन्न भी रहा था और उसका प्यार भी महसूस कर रहा था. मजे मजे में हाथ जब गीली नरम फैंको से चूहा तोह एक ऊँगली से वह थोड़ा सा हिस्सा सेहला दिए.

"सच में हे तुम वेट हो चुकी, यही देख रहा था. और जो भी करेंगे वह हम दोनों हे करेंगे तोह फील भी साथ हे होने वाला है. वैसे तुम्हे कभी किसी ने ये नहीं बताया के तुम जितनी खूबसूरत हो उतना खूबसूरत शरीर और ये दिल है.", अर्जुन ने बाए उभर पर हथेली टिकते हुए कहा तोह मुस्कान जोर से लिपट गई.

"तुम्हारे इरादे ठीक नहीं लगते. बूब्स पर हाथ रखते हुए दिल की बात कर रहे हो. इसलिए कहती हो के गंदे हो बहोत गंदे. लेकिन प्यार भी तोह मैं तुमसे हे करती हो. दिल भी तुम्हारा और जो पकडे लेते हो वह भी. उमाठ.", एक मीठा चुम्बन करती फिर वह वैसी हे लेट गई और अर्जुन अब दोनों हाथ पीठ पर रखे बस लेता हुआ बातें करने लगा था. उधर बबिता ने भी लाइन काट दी थी.

"देख्या. दोनो किस हद्द तक जुड़े है आपस में? बूब्स, किसिंग और पानी छोड़ती मुनिया सेहला गया वह उसकी", बबिता की बात पर अक्षरा ने जवाब दिए.

"जीजी आपने सुना के दोनों दिल से जुड़े है जो वह शरीर मिलाने की जगह एक दूसरे को कितना प्यार दे रहे है. वह सिर्फ उसकी ख़ुशी के लिए इतना झंझट करके कैसे कमरे में आ गया. और सबसे बड़ी बात की मुस्कान हमारे साथ बात करते हुए भी उसको दिल से याद कर रही थी."

"सच बात कही तन्ने लाडो. या डोर तोह घनी मजबूत है जो दिखे कोणी लेकिन बन्दे दोनो है. एक बात तोह बेरा पाती के वह प्यार कारन का हुनर राखे है. मुस्कान ने भी बेरा है के दोनो ब्याह न कर सकते लेकिन प्यार तोह निभा हे सके है.", बबिता की कमीज से वह दोनों चूचक कही ज्यादा हे उभर कर खड़े थे फ़ोन पर सुनाई दी गई बातों से.

"जीजी, आपके तोह ये तने हुए है.", अनुपमा ने ये बात ऐसी हे कही थी क्योंकि उसको जैसे इस सबका ज्ञान हे न था.

"तेरा खसम जब रगड़ेगा को तोह तेरे भी दाने बड़े हो ज्यांगे. वह लगया तोह मुस्कान गइल था लेकिन बिना फोटू की पिक्चर तोह हमने भी देखि है. ले इसके भी देख ले तू.", बबिता ने फुर्ती से अक्षरा का ढीला कमीज ऊपर उठाते हुए वह सफ़ेद अंगिया थोड़ी नीचे खिसका दी. मुट्ठी के अकार के दोनों गोर उभारो बार लाल चूचक किशमिश के दाने से खड़े थे और बबिता की मजबूत गिरफ्त में जकड़ी अक्षरा शर्म से सिमटी खुद को छुपा रही थी लेकिन उसके कपडे ठीक करके बबिता ने वही बिस्टेर पर लिटा दिए. शर्म से अक्षरा ने मुँह दूसरी तरफ घूमते हुए कहा.

"जीजी, बहोत गन्दी हो आप. ऐसे कौन करता है भला? चीई."

"बेबे, तेरी या जोड़ीदार शरीर से बढ़ गई लेकिन अकाल जरा भी कोणी. ेब मीठी बात सुन्न के शरीर भी तोह चस्के लेवे हे है. बेरा नई बिजेन्दर जड़ इसने रगड़ेगा तोह या मजे लेवेगी या दर्द में रोवेगी.", अनुपमा हमेशा हैरान हे हो जाती थी.

"मेरे साथ ऐसा क्यों नहीं हुआ जीजी? इसके तोह मेरे से छोटे है लेकिन घुंडी देखो कैसे पहली हुई थी.", अनुपमा ने झिझकते हुए अपना दूधिया जिस्म थोड़ा बेपर्दा करते हुए वैसे हे ब्रा तक कमीज उठाया और थोड़ी मुश्किल से एक कप निचे करती अपनी एक दबे हुए सुस्त से चूचक को उनके सामने कर दिए. अनुपमा के उभार अक्षरा से दोगुने थे, किसी बड़े किन्नू के जैसे लेकिन शरीर जैसे उत्तेज्जित नहीं हुआ था.

"तू निरि मन्दबुद्धि है. देख लो जीजी इसको तभी कहती हु के इसमें अकाल हे नहीं कोई.", अक्षरा ने थोड़ी हिम्मत दिखते हुए अपनी उँगलियों से वह बेपर्दा उभर सहलाया तोह निप्पल हल्का कड़ा होता हुआ उभरने लगा. अनुपमा ने आँखें भींच ली और अक्षरा ने हाथ हटा लिए.

"शाबाश. मतलब या सिर्फ तेरे हाथ लगान से चस्के ले सके है क्यूंकि मेरा हाथ लगान का तोह इस्पे फरक न हो रहा.", बबिता ने भी हाथ लगा के देखा था और वह निप्पल वैसे हे रहा, अर्धविकसित सा.

"जीजी या कई बार रात ने मुँह में भर ले है मेरे.", अनुपमा की बात पर अक्षरा ने सर पे हाथ रख लिए और फिर चेहरा छुपाती उठने लगी.

"दत्त.. कड़े जावे है तू मेरी लोमड़ी? मतलब तू यु सब भी करे है इसके साथ?", बबिता ने आँखें तरेर कर कहा तोह अक्षरा पाँव के अंगूठे से जमीं कुरेदने लगी.

"जीजी हम दोनो तोह रात ने कत्थई सोया करा आरर जड़ भी अक्षरा मेरे कोली भर्र के चुकी चूसे है तोह ये और भी बड़े हो जे है. या भोली कोणी, इस जगह भी हाथ लगा के मैंने गन्दा करदे है. शुरू में तोह ाचा कोणी लागे करता लेकिन 3-4 साल से तोह जिस दिन या मेरे साथ कोणी सोवे मैंने नींद कोणी आवे.", ये बम फोड़ दिए था अनुपमा ने नासमझी में.

"ऐ तू ठीक तोह है भान? तन्ने तेरे बेबे गइल चस्के आवे है? मतलब तेरी मशीन खराब तोह कोणी? 2 छोरियां आपस में यु कोणी करे है.", बबिता गंभीरता से अक्षरा को पूछ भी रही थी और समझा भी रही थी.

"ऐसी बात नई है जीजी. एक तोह हम दोनों शुरू से साथ रही है इसलिए मैं इसके साथ खुली हु और दूसरा जब कॉलेज जाने लगी थी तोह थोड़ा बहोत इस सबके बारे में पता लगा था. समलिंगी नहीं हु मैं लेकिन अगर आपको याद हो तोह पहले ये कमजोर भी रहती थी और चेहरा दानो से भरा भी था. मेरे ऐसा करने से ये अब ठीक रहती है और शरीर देख लो कैसे भर गया है. कल को ब्याह होगा तोह काम से काम इसको कुछ अकाल तोह आएगी. 8 क्लास पढ़ने के बाद घर पे हे बैठी है ये.", बबिता को समझ आ गया था के अक्षरा ऐसा क्यों करती है.

"फिर तू कमजोर क्यों रह गई?"

"मैं ठीक हु और समझ है थोड़ी तोह शादी के बाद ठीक हो हे जाउंगी.", अक्षरा ने इतना कहा तोह बबिता ने उसको सीने से लगा लिए.

"मेरी बन्नो तोह बड़ी समझदार है. और तू घोड़ी हो गई तन्ने अकाल जमा कोणी. ये सब बात बिजेन्दर स्यामि न करिये नहीं तोह तेरा ब्याह कोणी हों दिउ.", बबिता ने झूठे गुस्से से अनुपमा को डराया.

"न जीजी उनके सामने तोह मैं वैसे हे कुछ न बोलती. जो मर्जी करे वह मेरे साथ लेकिन मैं कड़े भी कुछ न खाउंगी.", दोनों उसकी बात सुन्न कर हंसने लगी और फिर खुद को दुरुस्त करती वह बहार लोगो के लिए chai-pani का इंतजाम करने चल दी.

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इधर हॉस्टल के कमरे में मुस्कान सुकून से अर्जुन की बाहों में सो रही थी. प्यार भरी बातों और अर्जुन के सहलाने से वह कुछ वक़्त पहले हे सो गई थी. अर्जुन का दिल था के आज वह मुस्कान को ऐसे हैरान करते हुए कुछ खुशियां दे सके. कुछ दिनों से ये प्यारी सी लड़की भी अंदर से खोखली हो चुकी थी और अर्जुन जैसे उसका वह खालीपन दूर करना चाहता था. घडी में 4:20 का समय देख कर बड़े ध्यान से उसने मुस्कान को तकिये पर सही से रखते हुए वह भूरे रंग का नरम खिलौना उसके हाथ के नीचे रख दिए. एहि उसके अकेलेपन का दोस्त ब्रूनो था. गहरी नींद में सोई वह अब कही ज्यादा हे मासूम सी लग रही थी. गाल को चूम कर अर्जुन ने एक का तापमान थोड़ा काम करते हुए सफ़ेद चादर कमर तक ुधा दी. जिस रस्ते वह आया था वही से उतर कर वह 5 मिनट बाद हॉस्टल के इस पिछले भाग में जमीन पर खड़ा था. सीढ़ी वापिस दिवार के साथ लिटा कर वह आगे पैदल हे चल दिए.

"भाई आज पहली बार देख रहा हु के कुछ देरी से आये हो.", स्टेडियम बेशक पास हे था लेकिन फिर भी अर्जुन 10 मिनट देरी से था और बलबीर उसका इन्तजार स्टैंड पर करता मिला.

"बड़े भाई वह यूनिवर्सिटी में एक सामान पकड़ना था तोह बस वही वक़्त लग गया. ट्रायल तोह 5 बजे है न, इतने शरीर गरमा लेते है.", अर्जुन की बात सुन्न कर बलबीर हँसता हुआ साथ चल दे गयम की तरफ. कुछ हलकी कसरत करते हुए दोनों बातें कर रहे थे.

"यूनिवर्सिटी का सिक्योरिटी इंचार्ज विकास भाई की पहचान का है. कभी कोई लफड़े वाली बात हो तोह बेहिचक कह देना.", बलबीर ने ये बताया तोह अर्जुन मुस्कुराने लगे.

"वह इंचार्ज और स्टेडियम वाले अपने मनीराम जी भाई है. और मेरी पहचान अब अंदर वालो से भी thik-thak है. आपको कभी जरुरत हो तोह मेरा नाम हे ले लेना. विकास भाई की जरुरत जब पड़ेगी तब पड़ेगी.", अर्जुन तेजी से पाँव आगे पीछे करता हुआ कंधे भी daye-baye हिला रहा था.

"वाह भाई तू तोह चीता है रे. ये कमाल कब कर लिए तूने?"

"वैसे तोह वक भी मेरे अंकल के मित्र है लेकिन उतने बड़े इंसान की जगह मैंने ये सामने दिखने वालो से दोस्ती करनी ठीक समझी. मनीराम जी ने कुछ दिन पहले सवेरे 5 बजे मेरी मुलाक़ात अपने भाई से करवाई थी और उन्होंने मेरा पास बना दिए. उनके भाई का नाम महिपाल है और फिर उनकी मदद से अब मेरे पास लाइब्रेरी का कार्ड भी है और यूनिवर्सिटी के क्लब का भी. एक तरह से अपने साथ वह के सुरक्षाकर्मी से लेकर माली, लाइब्रेरियन, कैंटीन वाला तक है. बदले में उन्होंने कुछ माँगा नहीं लेकिन आपको तोह पता हे है के इंसान प्यार और िज्जात्त मिलने पर साथ रहता है. आते जाते मिलता हु और कुछ काम की चीज सीख भी लेता हु.", अर्जुन ने कुछ न छुपाया और पिछले 8-10 दिन में जो भी उसने सम्बन्ध बनाये थे वह बलबीर के सामने खोल कर रख दिए.

"बड़ी पहुंची हुई चीज निकला रे तू तोह. मैं तोह समझता था के तू शरीफ लड़का है."

"भैया लालच तोह मेरे मैं में कोई है हे नहीं. मेरी दीदी पढ़ती है वह यूनिवर्सिटी में. और बताया न के वक भी मेरे अंकल के दोस्त है. जितने लोगो के बारे में मैंने आपको बताया वह सभी मेहनती और अपने काम के प्रति ईमानदार है. ठंडी हवा में अंदर जंगल तक घूम आता हु, माली भैया से थोड़ी बागवानी की जानकारी ले लेता हु, महिपाल जी का घर है उधर हे तोह उनके छोटे बचो के लिए किताबे ला दी तस्वीर वाली कहानियो की. सारा संसार हे तोह एक घर है फिर क्या मेरा और क्या आपका.", अर्जुन ने हँसते हुए कहा और टीशर्ट उतार का दूसरी पहन ली. बलबीर के साथ हे वह फिर मुक्केबाजी के हॉल की तरफ चल दिए. द्वार पर हे 3क्ष4 का चार्ट लगा था जिस पर लिखा था 'स्टेट बॉक्सिंग Trial-Haryana' और अर्जुन हैरानी से बलबीर को देखने लगा.

"क्या हुआ? ट्रायल देने आया है तोह यही हो रहे है."

"बड़े भाई, स्टेडियम इंचार्ज ने तोह कहा था के ट्रायल स्टेडियम को रिप्रेजेंट करने के लिए है. यहाँ लिखा है स्टेट ट्रायल. मतलब यहाँ तोह पूरे राज्य से बोसेर्स ट्रायल देने आये हुए है.", बलबीर ने उसका हाथ पकड़ा और अंदर चल दिए.

"टेंशन मत ले भाई तेरी केटेगरी में 6 लोग है. 2 मैच जीत और तू पहले नंबर पे और एक भी जीता तोह भी क्वालीफाई हो जायेगा. 3-3 मिनट के 3 राउंड होंगे और अभी 5 से 6 के बीच अंदर के तीनो रिंग में हैवीवेट के हे ट्रायल है.", ये वही हाल था जहा नेशनल के छोटे मैच खेले गए थे. अर्जुन बलबीर के साथ हे अंदर आया तोह तक़रीबन so-sawa सो लोग तोह इन 3 रिंग के आजु बाजु हे थे. वह दोनों हे शायद सबसे आखिरी थे जो यहाँ आये थे.

"अरे जवान तुम्हारे मुक़ाबले का वक़्त है और तुम हे गायब हो.", संधू जी ने आगे बढ़ कर अर्जुन का हाथ थमा तोह उनके साथ हे स्टड़कुम इंचार्ज मर देसाई को हैरत से देखने लगा.

"बीटा तुम सोच रहे होंगे की मैंने तुम्हे कहा था स्टेडियम रिप्रेजेंट करने के लिए और यहाँ सीधा inter-district हो रहे है. तोह बात हम दोनों की हे सही है. ये नेशनल स्टेडियम है और जब तुमने कागज सिग्न किआ तोह तुम यहाँ के सदस्य बन्न गए. मैं तुम्हे एक अनुभव देना चाहता हु क्योंकि मुझे जोगिन्दर बता चूका है के ये खेल तुम सिर्फ एक सिमित समय के लिए खेल रहे हो न की इसमें अपना करियर बनाने के लिए. हरयाणा की कमीज तुम अपनी मर्जी से pehan-na कोई जल्दी नहीं है. बस एक बार खुद को परख लो की क्या तुम अकेले हे दौड़ कर फर्स्ट आ रहे हो या फिर भीड़ को चीयर कर.", देसाई जी की बात 16 आने सच थी. अर्जुन ने थोड़ा बहोत सुना था के सिर्फ बॉक्सिंग में उनका स्टेडियम सीधा डिस्ट्रिक्ट एंट्री लेता है.

"जी मैं तैयार हु और अब बात खुद को परखने की है तोह पीछे हटने का समय जा चूका है."

"चलो भाई जोगिन्दर जी इसकी ड्रेस बदलवा दो और पहनाओ इसको स्टेडियम की जर्सी. 5:20 पे इसका मुक़ाबला आपके परम मित्र कटियार के शागिर्द से है. दिल्ली के लड़के को फरीदाबाद से खिला रहा है वह.", देसाई जी की बात सुन्न कर जोगिन्दर जी के चेहरे पर थोड़ी परेशानी आ गई.

"चल पुत्तर तू ये लाल निक्कर और बनियान पहन के इधर आजा फिर head-guard खेल से पहले लगता हु. वह बीच वाले रिंग में तेरा मुकाबला है 7 मिनट बाद.", अर्जुन को लिए बलबीर वही एक अँधेरे कोने में आ गया.

"भाई जल्दी से यही बदल ले मैं सामने खड़ा हु.", अर्जुन हँसता हुआ बलबीर की बात सुन्न कर कपडे बदलने लगा. वैसे भी बलबीर का जिस्म कहा उसके पहाड़ से शरीर को छुपा सकता था. गोर तगड़े शरीर पर वह सुर्ख लाल बनियान और घुटनो से हलकी ऊपर तक की निक्कर अर्जुन को आज पहली बार दिखा रही थी उसके खिलाडी वाले स्वरुप में. फिर देरी न करता वह बिना इधर उधर किसी को देखे पहले रिंग के बराबर से होता हुआ इस बीच वाले के पास आ खड़ा हुआ. संधू जी ने एक झलक उसके रूप को निहारा और स्टेडियम के निशान वाला neela-safed स्टीकर उसके दिल से थोड़ा ऊपर बनियान पर ाचे से चिपका दिए. वह ढीली बनियान भी उसके 46 इंच चौड़े सीने पर कासी हुई थी.

"अपने प्रतिद्वंदी को देखना चाहते हो तोह उधर देख सकते हो.", संधू जी ने रिंग के दूसरी तरफ इशारा किआ तोह अर्जुन ने गर्दन ना में हिला दी.

"अंदर तोह जाना हे है गुरूजी फिर 5 मिनट जी भर के देख लूंगा. आप बस यही रहना.", अभी वह अपनी बात कह हे रहा था एक और पहाड़ सा व्यक्ति उसके सामने आ खड़ा हुआ.

"संजय भाई आप?", अर्जुन कहते हे संजय सांगवान से लिपट गया.

"अरे रुक जा चाँद. पता लगा तेरा मुक़ाबला है तोह मैं आज तेरा हेल्पर ban-ne की इत्छा से आ गया. 3 मुकाबले है तेरे और पहले में मैं हे तेरे कॉलम में रहूँगा.", ये बहोत बड़ी बात थी क्योंकि संजय सांगवान अब मुक्केबाजी में वह नाम था जो विकास पहलवानी में था. ट्रायल के मुअकबले में उसका आना दिखता था जोगिन्दर जी और अर्जुन के प्रति उसका लगाव. इधर रिंग में ये अधेड़ से रेफरी ने स्टील की सीटी बजे तोह माहौल थोड़ा शांत हो गया. अर्जुन के चेहरे पर ये लाल फोम वाला हेडगार्ड लगते हुए संधू जी ने मुँह में सेफ्टी भी सही से कर दी.

"जो दिल करे वह कर. कोई प्रेशर नहीं लेना.", उन्हें भी पता था के अर्जुन का सामना जिस से हो रहा है वह एक परिपक्व खिलाडी है और इसका तोह ये पहला ट्रायल हे था. संजय हाथ में टोलिया और ग्लूकोस वाले ठन्डे पानी की बोतल लिए खड़ा था और अर्जुन झुक कर रस्सी के बीच से निकलता हुआ अंदर आ गया.

"#### स्टेडियम से अर्जुन शर्मा का मुकाबला है फरीदाबाद के सतबीर खतना के साथ. आप दोनों को पहले हे बता दिए जाता है के 2 बार नियम तोड़ने पर डिसक्वालिफाई कर दिए जायेंगे और कमर से नीचे किसी भी सूरत में प्रहार की सख्त मनाही है. घंटी बजने पर आप दोनों हे अपने स्थान पर चले जायेंगे और खेल का फैंसला 3 जज आप लोगो के टेक्निकल प्रहार की गिनती से करेंगे. नाकआउट की समय सीमा 10 की गिनती तक रहेगी. आप दोनों एक दूसरे से हाथ मिलाये और खेल को खेल की भावना से हे खेलिएगा.", इतनी लम्बी चौड़ी जानकारी देने के बाद जब रेफरी ने दोनों के दस्ताने वाले दाए हाथ एक दूसरे से भिड़ाये तोह सतबीर ने रोबीले अंदाज में अर्जुन के हाथ के ऊपर हे हल्का प्रहार करते हुए गुस्से से निहारा. 6 फ़ीट का सतबीर भी एक बलशाली जिस्म का व्यक्ति था और चेहरे पर दाढ़ी के हलके बाल बता रहे थे के वह उम्र में भी बड़ा हे था.

'तंत्र' की आवाज से दोनों हे कदमो को एक अंदाज में आगे बढ़ाते एक दूसरे की तरफ चले आये. खतना जैसे भाप गया था के अर्जुन एक नौसिखिया और अनुभवहीन है इसलिए सीधा उसके चेहरे पर प्रहार करने लगा. लेकिन 6-7 बार उसके दोनों हाथ बेकार हे हवा में घूमे. अर्जुन चेहरे के साथ सीधा हाथ लगे उलटे मुक्के को सामने किआ बस इधर से उधर बड़ी चपलता से जा रहा था. सतबीर को जैसे ये उम्मीद नहीं थी की इस केटेगरी का मुक्केबाज ऐसी फुर्ती और लचक भी रख सकता है.

"पसली में मार. कहा समय खराब कर रहा है.", ये कटियार की आवाज थी जो डेढ़ मिनट में हे खीज गया था और इसके साथ हे सतबीर ने चलवा दिखते हुए पसली का निशाना करने के बाद दूसरे हाथ को अर्जुन के चेरे की तरफ तेजी से घुमा दिए. लेकिन दोनों हाथ अर्जुन ने कुशलता से रोकते हुए उलटे हाथ का एक भरपूर वार सतबीर की सीढ़ी तरफ की पसली में कर दिए. हलके दर्द में वह चरण हे 3-4 कदम पीछे हुआ और दर्द जज्ब करता समाया खराब करने लगा.

"देख रहे हो के ये लड़का क्या कर रहा है? ये इस मुक़ाबले को कही ज्यादा हे गंभीरता से ले रहा है संजय.", जोगिन्दर जी धीमी आवाज में अपने प्रसिद्ध शिष्य से गुफ्तगू कर रहे थे.

"गुरु जी बात कुछ और है. अर्जुन उस लड़के की जगह कटियार जी से मैच खेल रहा है.", संजय की बात सुन्न कर पहली बार उनके चेहरे पर थोड़ी अजीम सी मुस्कान आ गई. अंदर अभी भी अर्जुन उस अनुभवी मुक्केबाज को हताश कर रहा था. राउंड में 30 सेकंड पड़े थे और किसी सांड की तरह सतबीर अंधाधुन्द मुक्के बरसाने लगा लेकिन अर्जुन पूरी मुस्तैदी और रफ़्तार से हर वॉर विफल करता उसको पूरा मौका दे रहा था. 'तंत्र' की आवाज से भी वह नहीं रुका तोह अर्जुन ने हे आवाज देते हुए कहा जो थोड़ी अजीब तरह से निकली थी मुँह में सुरक्षा होने की वजह से. 'लुक जा भाई . वॉनिंग मिल देगी.' और हताश होता हुआ सतबीर रेफरी के बीच में आने के बाद पीछे चल दिए. कटियार उसको ज़माने भर की शिक्षा देता गुस्से में वह सेफ्टी गीली करते हुए थोड़ा पानी पीला रहा था. अर्जुन मुस्कुराता हुआ संजय के हाथ से पानी लेकर गरारे करता शरीर को सहज करने लगा.

"तुम इतना शांत रहने के साथ चौकस कैसे हो सकते हो? ऊपर से लचक बहोत ज्यादा है शरीर में, साइज के हिसाब से ये मुमकिन नहीं होती."

"भैया सब मुमकिन है. और आपने हे सिखाया था के अनजान खिलाडी के साथ पहल राउंड में सिर्फ उसका खेल समझो. मुझे आपका सबक हमेशा याद रहा है.", संजय ने उसके मुक्के पर हलके से मुक्का मरते हुए कहा, "नाकआउट" और 'tann-tann' की आवाज से दूसरा राउंड शुरू हो गया था.

सतबीर जितने वेग से अर्जुन की तरफ लपका था उतनी हे रफ़्तार से चेहरे पर एक के बाद एक 6 मुक्के पड़ने पर हिलता हुआ नीचे गिर गया था. झुंझलाता हुआ वह खड़ा हुआ तोह इस बार दोनों तरफ से पसलियों और छाती पर 5 सेकंड में 10 मुक्के पड़ गए थे.

"रोक दो रोक दो.", रेफरी का हाथ पकड़ता वह रिंग में बैठा अर्जुन को मन कर रहा था मारने से. चेहरे पर इतनी सुरक्षा के बावजूद गाल लाल हो चुके थे और आँख और नाक के बीच से हल्का खून रिस रहा था. अर्जुन 4-5 फ़ीट दूर खड़ा बस देख रहा था उस इंसान को जो थोड़ी देर पहले पागल सांड सा पूरा जोश दिखा रहा.

"प्रतिभागी के मैच के बीच में हे खेल छोड़ने पर मैच #### स्टेडियम के अर्जुन शर्मा के नाम होता है. इसके साथ हे आप अपने bhaar-varg में antar-rajya के लिए क्वालीफाई करते है.", रेफरी ने इतना कहते हुए अर्जुन का हाथ ऊपर उठा दिए और अब पहली बार उसकी नजर सामने खड़े अपने दादा जी और छोल साहब पर पड़ी. जो मर देसाई के साथ हे खड़े इस मैच का नजारा जाने कब से ले रहे थे. कुछ और लोग भी थे जो विशेष थे और शायद उनके करीबी भी. संधू जी की जगह रिंग के अंदर संजय हे आया.

"अरे मेरे भाई तू तोह पूरा मुक्केबाज है बिना हे मैच खेले. वाह लड़के दिल खुश कर दिए बाकी मैच का जो भी नतीजा हो ये गजब गया."

"भैया वह कटियार जी न इंसान ाचे नहीं है बस इसलिए मैं इतना सीरियस हुआ था. गुरूजी को जैसे परेशां करना हे उनकी आदत है.", संजय भी हँसता हुआ उसको साथ लिए बहार आने लगा तोह जोगिन्दर जी ने दोनों को रिंग में रहने का इशारा किआ. विकास जाने कब आया था जो उनके बराबर खड़ा ये फोटो लेने लगा उन दोनों की. और उसके बाद अगली तस्वीर में दोनों का साथ जोगिन्दर जी और रेफरी साहब ने भी दिए.

"ाचा खेलते हो बीटा. अब अगला मुकाबला 5:40 पर है तुम्हारा. गुड लक.", रेफरी महोदय ने इतना कहा और पीठ थपथपा दी.

"आप कब आये?", अर्जुन अपने दोनों दादा के गले लगते हुए खुश हो गया. उन्होंने हे बाकी सबसे अपने पौटे को मिलवाया और फिर जवाब दिए.

"हम तोह कबसे इधर हे थे लेकिन तू हे जाने कहा था."

"अंकल जी वह अर्जुन मेरे हे साथ अभ्यास कर रहा था.", बलबीर ने भी पाँव छूने के बाद देरी की वजह बताई और विकास भी इधर उनके साथ शामिल हो गया.

"अगला मुक़ाबला खेलेगा या बस.?", विकास की बात पर अर्जुन की जगह जवाब इस मीठी सी आवाज ने दिए.

"बाकी के दोनों खेलने पड़ेंगे इसको और हर हाल में.", प्रीती ग्लूकोस सुड़कती हुई एक तरफ से इधर हे आती हुई बोली जिसके साथ हे मंजू, चांदनी, डिम्पी भी थी.

"दादा जी आज ये इस बचे का काम करवा के हे मानेंगी.", विकास ने हंस के कहा तोह छोल साहब भी साथ हे हंसने लगे.

"बीटा ाचा है न गाल लाल फ्री में हो जायेंगे. Seb-badaam खाने की जरुरत हे नहीं.", रामेश्वर जी की बात पर माहौल थोड़ा खुशनुमा हो गया और इसके साथ हे बलबीर ने चेहतया के तैयार हो जाये क्योंकि पहले वाले रिंग में मुक़ाबला होने वाला है. अर्जुन उसके साथ हे उधर चल दिए. इस बार पाँव में एक मुक्केबाज वाली चपलता रिंग के बहार से हे दिख रही थी.

"ये वाला भी ाचा प्रतिद्वंदी है. मैंने जनुअरी में इसका मुकाबला देख हुआ है छोटे भाई और इसका खेल दिमाग के साथ हे स्टैमिना वाला भी है. बस आराम से खेलना है.", बलबीर समझते हुए उसको तैयार करने लगा और घंटी की आवाज के साथ हे अर्जुन फिर से अंदर जा चूका था. दूसरे रिंग में भी एक और मुक़ाबला शुरू था लेकिन इस बार फिर भीड़ इस रिंग के बहार आ चुकी थी. औपचारिक बातें सुनते समय अर्जुन ने अपने प्रतिद्वंदी को देख तोह ये भी उसके बराबर कद का लेकिन थोड़ा पतला और मासपेशियो से भरपूर युवक था. हलकी मऊछ और काली आँखें उसका व्यक्तित्व बता रही थी.

"अर्जुन शर्मा और हेमंत राठोड पहले हे अपने दोनों मुक़ाबले जीत चुके है. अगर ये मुक़ाबला दोनों में से कोई भी नॉक आउट से जीत जाता है तोह वह पहले स्थान पर क्वालीफ़ायर ख़तम करेगा. अंको के आदर पर हेमत को 5 और अर्जुन को 2 अंक के अंतर से मैच जीतना होगा प्रथम रहने के लिए.", इसके साथ हे कांसे की घंटी पर 'तन्न' की आवाज से ये मैच भी शुरू हो गया.

"गुरु जी राठोड क्वालीफ़ायर क्यों खेल रहा है? ये तोह पहले हे हरयाणा चैंपियन है.", विकास ने खेल में गंभीरता दिखते हुए सवाल किआ और अंदर दोनों खिलाडी एक दूसरे की फुर्ती माप रहे थे.

"कटियार ने ीदार 3 लड़के उतारे है और हेमंत उसके पास हे प्रशिक्षण ले रहा है हरयाणा जीतने के बाद से हे. पैसा मुक्केबाज को चाहिए और ऐसे बने हुए खिलाडी कटियार को.", रामेश्वर जी भी थोड़ी दिलचस्पी ले रहे थे इन बातों में शामिल हुए बिना हे. और ऐसा हे हाल उनके साथ आये ये 4 लोग जीने से एक दिग निर्मल सिंह थे, सादे kameej-pant में.

"पंडित जी लड़के दोनों तेज है लेकिन सामने वाला ज्यादा अनुभवी है.", निर्मल सिंह जी की बात सही थी अभी तक तोह. अंदर इन 2 मिनट में हेमंत 6 सही वॉर कर चूका था अर्जुन के 4 के बदले. दोनों वार करने से पहले एक दूसरे की सुरक्षा भेड़ रहे थे. आखिरी क्षणों में के करारा मुक्का अर्जुन के गाल पर लगने के साथ राउंड ख़तम हुआ तोह हेमंत तुरंत अपने शतान पर चला गया. दिमाग शांत और खेल साफ़ था इस लड़के का.

"भाई स्कोर देख जरा. जज का तोह पता नहीं लेकिन मैच के हिसाब से 5-8 है फ़िलहाल.", बलबीर ने अर्जुन के चेहरे को गीले तोलिये से साफ़ करने के बाद थोड़ा पानी पिलाया और फिर से गॉर्ड सही से लगा दिए. अर्जुन बस सर हिलता शरीर को हल्का खोलने लगा था. 2 घंटी बजते हे मैच आगे बढ़ गया. दोनों हे एक बार फिर एक दूसरे के खेल को आजमाते हुए कोशिश कर रहे थे प्रतिद्वंदी को थकने की. हेमंत एक पंच मारने के बाद अब थोड़ा तेज हो गया था. पाँव बिजली से आगे पीछे करता वह अर्जुन के शरीर के दोनों तरफ से वार करने में लगा था लेकिन अब जैसे अर्जुन उसकी हे रफ़्तार के साथ मेल करता हर मुक्के को अपने से दूर रखने लगा था.

"उप्पेर कट लगा जब साइड नहीं लग रहे.", हेमंत खेल में 10-6 से आगे था लेकिन फिर भी कटियार गुस्से में चिल्लाता हुआ उसको जल्दी खेल ख़तम करने के लिए उकसा रहा था. और यही पर हेमंत ने जल्दबाजी में सीधा हाथ नीचे से ऊपर लात हुए अर्जुन की ठुड्डी को निशाना बना दिए. परिणाम विपरीत रहे और खामियाजे में हेमंत के टूटे सुरक्षा कवच से चेहरे पर ताबड़तोड़ ग़ुस्से बरसता अर्जुन उसको कटियार के पास हे कोने में फसाये ढीला करने लगा.

"स्टॉप.", हेमंत ने होश सँभालते हुए अर्जुन को बाँहों में भर लिए तोह रेफरी ने दोनों को एक दूसरे से पृथक कर दिए. चेहरे का हाल इतनी हेर देर बदल गया था हेमंत का और इसके साथ हे 2 घंटी बजते हे राउंड ख़तम हो गया.

"वह एक कमजोर खिलाडी है हेमंत. तुम पता नहीं कैसा खेल खेल रहे हो जो 2 राउंड लगा दिए. इस क्वालीफ़ायर में मैंने सिर्फ जोगिन्दर को उसकी औकात दिखने के लिए तुम्हे शामिल किआ था लेकिन लगता है तुम कुछ और हे विचार बनाये बैठे हो. सरकारी नौकरी लगवा दूंगा अगले साल तक तुम्हारी.", कटियार ने अपना डाव खेला और फिर उस लड़के को दुरुस्त करता हुआ गार्ड पहनाने लगा. दूसरी तरफ बलबीर भी वही कर रहा था.

"मामला अभी तक ठीक है छोटे भाई. 14-11 तुम्हारे हाथ में खेल है. बढ़त बनाये रखना क्योंकि अब वह मौका नहीं देने वाला.", अर्जुन ने हाथ भिड़ते हुए सलाह का मान रखा और कदम हिलता हुआ तीसरी घंटी के साथ हे हेमंत के सामने आ खड़ा हुआ. बलबीर ने सच कहा था. जो फुर्ती और तेजी एकदम से हेमंत ने दिखाई थी वह अर्जुन ने पहले 2 राउंड में नहीं देखि थी. बड़ी दाखस्ता से वह अर्जुन की पसली में 2 वॉर और एक मुक्का गाल पर जमा गया था. इस बार वाला पंच भी ाचा खासा था जिस पर अर्जुन हलके से दर्द को महसूस करके मुस्कुरा उठा था.

"साला पागल है ये लड़का दुबे. मार खाने पर हंस रहा है.", कटियार आखिरी राउंड की वजह से नीचे अपने प् से बात कर रहा था. घडी दिखा रही थी की खेल में एक मिनट हे बाकि रह गया है और अब बारी हैरान होने की हेमंत की थी. कान से पहले जो पंच लगा तोह एक पल के लिए आँखों के सामने अँधेरा चा गया था. अर्जुन की रफ़्तार इस वक़्त वैसी थी जैसी किट पर अभ्यास के वक़्त बलबीर ने देखि थी. न कदम हेमंत को समझ आ रहे थे और न कमर के ऊपर का लहराता हिस्सा. छाती, काख, पसलिया और चेहरे पर एक ख़ास अंदाज में मुक्के लगने पर लड़खड़ा कर वह रिंग के कोने में झूल गया. अर्जुन ने आगे कोई वार न करते हुए जैसे उठ कर सँभालने का पूरा मौका दिए लेकिन वह घंटी बजने के बाद हे दोनों हाथो से चेहरा संभालता सामने खड़े अर्जुन को देख प् रहा था.

"बहोत हे ाचा खेलते हो दोस्त. मेरे जैसा हे खेल है लेकिन शायद रफ़्तार कही ज्यादा और फुर्ती भी कमाल की है.", हेमंत ने खुद हे गार्ड उतारने के बाद अर्जुन से हाथ मिलते हुए गले लगा लिए.

"भाई तुम्हारा खेल बहोत हे साफ़ है और उतना हे खूबसूरत. मेरे हे साथ खेलते तोह पक्का हम दोनों एक दूसरे की मदद कर सकते थे.", अर्जुन ने भी अपना एक दस्ताना उतार कर हेमंत का हाथ थाम लिए था. रेफरी ने अंको के आधार पर अर्जुन को विजय घोषित किआ. मुकाबला 23-15 से वह जीता था लेकिन उसने विकास भाई को कह कर एक तस्वीर हेमंत के साथ हे खिचवाई थी. हलके खून के बावजूद हेमंत मुस्कुरा रहा था.

कटियार वह से एक बार फिर बिना कुछ कहे बहार निकल चूका था लेकिन निर्मल सिंह जी ने हेमंत को अपने पास बुला लिए था.

"ाचा खेलते हो बीटा. पढाई करते हो खेलने के साथ?"

"जी अंकल बा सेकंड ईयर के इम्तिहान दिए. वैसे तोह इस बार नेशनल में पहले हे मैं जा चूका हु जनुअरी में inter-district जीतने के बाद लेकिन कोच साहब ने जबरदस्ती यहाँ उतार दिए."

"ये मेरा कार्ड रखो और अबसे तुम्हारी पढाई के साथ खेल की जिम्मेवारी भी हमारी रहेगी. 10 मई से तुम हरयाणा पुलिस की तरफ कोचिंग लोगे.", हेमंत की आँखों से आंसू हे निकल आये थे इतनी बड़ी बात सुन्न कर.

"बीटा तुम लायक हो और मेहनती भी. ये दिग साहब है और जैसा कहते है वैसा हे करना. मधुबन पुलिस अकादमी में तुम्हारा नाम दर्ज करवाने के बाद आगे बता दिए जायेगा. सोमवार को इन्हे फ़ोन करके समय ले लेना.", रामेश्वर जी ने उसकी पीठ थपकते हुए शाबाशी दी

"वैसे खेल तोह अर्जुन जीता है. ये सब आप उसको दे तोह बेहतर रहेगा.", हेमंत का दिल सचमुच बड़ा हे था.

"वह स्कूल जाता है और ये खेल बस सर्दी शुरू होने तक हे ये खेलेगा. इतने नेशनल खेला या प्रैक्टिस करे इसकी मर्जी है. बॉक्सिंग तुम्हारी ज़िन्दगी है और तुम्हे इस रस्ते पर हे चलना चाहिए. एक साल बाद पढाई पूरे होते हे तुम पुलिस में नौकरी करोगे.", रामेश्वर जी ने जैसे हे अर्जुन का पूरा परिचय दिए तोह वह भी दांग रह गया के जिस लड़के के साथ वह खेल रहा था वह 3 साल छोटा है.

"कटियार अपने तीसरे लड़के को ले कर चला गया तोह अब अर्जुन को अगला मचा नहीं खेलना.", संजय सांगवान ने इतना कहा तोह सभी मुस्कुराते हुए बहार चल दिए. हेमंत भी खुश था लेकिन उसकी तरफ देख कर छोल साहब ने सवाल किआ.

"कैसे वापिस जाओगे? तुम अपने कोच के साथ हे आये थे और वह तोह चले गए.", हेमंत सच में सोचने पर मजबूर हो गया क्योंकि उसका बैग भी कटियार की गाडी में हे था.

"जी मेरा बैग भी उनके हे साथ चला गया."

"चलो मैं तुम्हे भिजवा देता हु. आज हे सरकारी गाडी में बैठ जाओ भाई.", निर्मल सिंह जी के साथ हे 4 पोलिसवाले जुड़ गए थे और वह हेमंत को लिए निकल चले पंडित जी से विदा ले कर.

"बरखुरदार आज तुमने हमारा स्वाभिमान और बढ़ा दिए है. देख कर ाचा लगा के तुम हर काम के लिए प्रतिबद्ध हो और हलके में नहीं लेते. जोगिन्दर बीटा पता नहीं कैसे लेकिन तुमने इस लड़के पर ाचा काम किआ है.", रामेश्वर जी की बात पर संधू जी ने हाथ हे जोड़ दिए.

"पंडित जी मैंने तोह आज तक इसको सिर्फ बाहरी स्टारर का प्रशिक्षण दिए है. मुक्केबाजी का प्रतिद्वंदी के साथ अभ्यास तोह अगले महीने शुरू होने वाला था. बाकी ये लड़का है जो अर्जुन के दिल से म्हणत करता है.", बलबीर का हाथ पकड़ कर उन्होंने सामने किआ तोह वह भी हाथ जोड़ के खड़ा हो गया.

"बलबीर भैया ने हे इस मैच में मेरी पूरी सहायता की है दादाजी. गुरूजी तोह हमेशा हे क्रेडिट लेने से इंकार करते है और इनके साथ बलबीर भैया भी वैसा हे करेंगे लेकिन जो भी सीखा है वह कोच सर ने सिखाया और बलबीर भैया ने मेरे से दुगनी मेहनत करके मेरा साथ दिए है.", अर्जुन ने भी अपनी दिल की बात कहने में वक़्त न लगाया.

"विकास बीटा, बलबीर को लेके तेहरवी के दिन गाँव में हे मिलना. अब इजाजत लेता हु भाई हमारा व्यक्तिगत समय हो रहा है दुनिया से अलग बैठने का. क्यों सतीश भाई."

"चलो भाई साहब. और तुम दोनों भी बैठो गाडी में.", उन्होंने प्रीती और मंजू से ऐसा कहा तोह प्रीती नाराजगी से अपने दादू को देखने लगी.

"दादाजी मैं चलती हु आपके साथ और प्रीती अर्जुन के साथ आ जाएगी. उसने मॉडल टाउन से सामान लेना है.", मंजू प्रीती का हहत दबती हुई खुद उन दोनों के साथ चली गई और बाकी सब ने तुरंत इन दोनों से दुरी बना ली विकास के एक इशारे पर.

"ओह तोह खेल ऐसे चल रहा है आजकल.", अर्जुन प्रीती को देख कर मुस्कुराया और फिर एक मिनट वही रुकने का बोल कर संधू जी के पास दौड़ लगा दी.

"ये वापिस करनी थी गुरु जी.", अपनी खेल वाली पोषक के बारे में उन्हें बताते हुए वह बनियान उतरने लगा तोह वह मुस्कुरा दिए.

"पहने रखो वह तुमने कमाई है.", अर्जुन उनके पाँव छु कर फिर से प्रीती की तरफ चला आया तोह उसने भी घर तक वैसे हे जाने को कहा.

"पागल हो. ये बनियान पहन कर सड़क पर."

"चुपचाप चलो. मैं दिखाना चाहती हु मेरे बॉयफ्रेंड का सेक्सी लुक.", प्रीती की बात सुन्न कर वह अपना बैग उसको पकड़ा के चाबी गुआंता स्टैंड की तरफ चल दिए. ऐसी हे प्यार की डोर तोह थी अर्जुन के जीवन में जो उसको हर वक़्त किसी न किसी रूप में संभाले रखती थी. कभी करीब रह कर तोह कभी दूर से. प्यार के साथ.
 
आज दिन अजीब हे रहा. अपडेट कल रात दूंगा लेकिन सभी के साथ ये बात भी सांझी करने का दिल था. ज्यादा नहीं कहूंगा लेकिन प्यार 100 बार शायद अगले साल एक साफ़ संस्करण के रूप में चलचित्र पर आएगी. पता नहीं सीरीज या फिल्म लेकिन मुझसे मिलने कोई जुलाई में आने वाला है मुंबई से.

किसने और कैसे ये किआ मुझे कोई अंदेशा नहीं है. बस कन्फर्म हो गया क्योंकि जो व्यक्ति खुद सन्देश देने के बाद मिलने आये वह मामूली नहीं थे.

भगवन क्या रंग कैसे दिखता है इसकी कोई जानकारी नहीं. जिसने भी ये किआ आप लोगो में से उनको दिल से नमन.
 
अपडेट 101

नफरत और प्यार (ी)

साल 2003


'दिल में हो तुम, आँखों में तुम. बोलो तुम्हे कैसे चाहे...' पृष्ट में बज रहे इस गाने पर सिर्फ एक हे लड़के का ध्यान था इन 4 जवान लड़को में से. हाथ में स्नूकर की लाठी लिए चारो इस बड़ी हरे कपडे की टेबल पर देख रहे थे जहा एक 15-16 साल का लड़का लाल प्लास्टिक की गेंदे लकड़ी के तिकोने फ्रेम की मदद से सजा रहा था. लम्बे हाल में सिर्फ यही लोग थे और रौशनी भी सिर्फ इस टेबल के गिर्द.

"तेरी परेशानी क्या है बे? 3 साल से हम चारो साथ है लेकिन तुझे समझ नहीं पाए.", ये 20-21 साल का हत्ता कट्टा सरदार युवक था जिसके दूसरे हाथ में 'Kala-Tittar' बियर की बोतल थी. एक बड़ी घूँट मारने के बाद उसने अपने इस दोस्त से कहा जो स्नूकर टेबल पर झुकते हुए सफ़ेद बॉल से लाल बॉल के घुचे पर निशाना साध रहा था. 'थाकककक' की आवाज के साथ वह 15 गेंदे इधर उधर हो गई.

"मैं ताज की बात से सहमत हु. बहनचोद वह लड़की 3 साल से तेरे पीछे है लेकिन तू साला कर क्या रहा है? Pyaar-vyaar नहीं करना तोह न कर लेकिन थोड़ा टाइम तोह स्पेंड कर हे सकता है उसके साथ? वैसे आशिमा जैसी लड़की पूरी यूनिवर्सिटी में नहीं है. फ्रेशर वाले टाइम याद है भास्कर, हम सबके साथ साथ सीनियर्स भी बस उसको हे देख रहे थे.", ये भी 6 फ़ीट लम्बाई का एक गठीला युवक था. वैसी हे बियर पीटा हुआ वह भी टेबल पर देख रहा था जहा सवा 6 फ़ीट से कुछ ऊँचा उनका दोस्त बड़े ध्यान से गुलाबी गेंद पर निशाना लगते हुए उसको होल में डालने के बाद सीधा हो गया. चेहरे पर घनी दाढ़ी जो शायद अभी नरम हे थी और एक असीम शान्ति के साथ हे प्यारी मुस्कान थी.

"भास्कर क्या बोलेगा बे? और ये ताज जानता है के मैं क्यों आशिमा से दूर रहता हु. लड़की प्यार करने के लिए बानी है लेकिन वह ज़िन्दगी भर के लिए साथ रहना चाहती है. आशु, मैं एक और दिल नहीं टॉड सकता. आज उसको मैं कुछ लम्हे दे भी दू प्यार के लेकिन कल वह रह नहीं पायेगी.", इतना बोल कर वह भी भूरी बोतल से गाला गीला करते हुए फिर से टेबल पर झुक्क गया. एक बार फिर लाल गेंद को होल में डालने के बाद के बॉल गुलाबी वाली के पास आ रुकी.

"लतिका मैडम वाला इन्सिडेन्स भूल क्यों नहीं जाता तू? बहनचोद वह तेरी गलती नहीं थी. शादीशुदा होने के बावजूद वह तेरे प्यार में पड़ी और तूने जितना खुश उसको रखा कोई और नहीं रख सकता था. लेकिन उसने तुझे प्यार नहीं किआ था कभी. ऐसा होता तोह वह सबके सामने तुझे जलील न करती.", सरदार की बात सुनते हे माहौल शांत हो गया था. खेलने वाली चड्डी (स्टिक) को जमीन पर टिकते हुए दाढ़ी वाले ने सरदार को देखते हुए कहा.

"सरताज, मंगलसूत्र का वजन हर प्यार पे भारी पड़ता है. लतिका प्यार करती थी मुझसे और यही वजह थी जो उसने मुझे bhala-bura कहा. गलती सबसे होती है और वह भूल गई थी की उसका एक पति भी है.", एक कड़वा सच कह दिए था उसने जिसको भास्कर ने समर्थन दिए. भास्कर उनकी हे उम्र का एक gora-chitta आकर्षक युवक था.

"जूनि की गर्लफ्रेंड के बारे में पता लगते हे लतिका ने लड़ाई कर ली थी ताज. उसने जूनि को कहा था के वह प्रीती को भूल जाये. इसने जब उसको अपना पति छोड़ने के लिए कहा तोह मामला बिगड़ गया. चल माँ छुड़ाने दे यार उस लतिका को और तू भी गांड मारा अपनी. Bila-wajah माहौल की माँ छोड़ने में लगे हो. आशिमा की बात कहा लेके आ गए. वह बहिन की लोदी गजेंदरा भल्ला की बेटी है, कुछ ऐसा वैसा हुआ न तोह हम चारों की लाश नई मिलेगी. जूनि तू मार तेरी गुलाबो की, टेबल खाली कर फिर आशु के घर चलते है.", ऐसी बातें और गालियां सुन्न कर बाकी तीनो भी मुस्कुराने लगे. माहौल हल्का हो गया था और चारो हे अपनी अपनी बियर ख़तम करने लगे.

"वैसे भास्कर सुना है आशिमा के बाए चुके पर टिल है.", ये आशु था जिसने अपने चौड़े सीने पर हाथ घूमते हुए मस्ती में कहा.

"मादरचोद, दाए चुके पर है. और भास्कर ने आजतक मरस नंदिता के सिवा किसी को नंगा नहीं देखा और तू आशिमा का पूछ रहा है?", जूनि ने एक बार फिर गुलाबी बॉल पॉकेट करने के बाद भास्कर को आँख मारते हुए कहा.

"गल्ल सही है यार पंडत. नंदिता के मोममे और बून्द देख के तोह मेरा बैठने का नाम नई लेता और ये साला भास्कर 2 साल से उनमे हे घुसा हुआ है.", सरताज ने अपनी जीन्स पर से हे लुंड को सहलाते हुए कहा.

"सरदार साले तू गांड हे देखता रहिओ सबकी. नंदिता प्यार करती है मुझसे और कॉलेज के बाद मैं शादी करने वाला हु उस से.", भास्कर ने जूनि से डंडी लेते हुए अपनी बात बताई तोह सरताज ने लुंड से हाथ हटा लिए.

"राजे तू ठीक है? वह तलाकशुदा है और उसकी पहले हे एक 5 साल की बेटी है.", सरताज को जवाब जूनि से मिला जो आशु से अगली बियर ले रहा था.

"प्यार करते है यार ये दोनों. और ाची बात है न के पहले से हे बेटी है, भास्कर के शुक्राणु काम भी हुए तोह बचे की टेंशन तोह नहीं होने वाली.", इस बात पर सभी जोर से हंसने लगे और भास्कर ने जूनि के पिछवाड़े पर डंडा मारते हुए खिचाई की.

"तू भी पक्का मादरचोद है साले. कंडोम लगाना पड़ता है नहीं तोह नंदिता अब तक 2 बचे दे चुकी होती.", भास्कर अपनी सफाई दे रहा था.

"चल कोई न भाई हम सब दोस्त है. तेरे शुक्राणु काम भी होये तोह शाही दवाखाना ले चलेंगे. आशु भी तोह जाता है, शर्माने वाली बात नहीं है कोई.", सरताज की ऐसी बात सुन्न कर आशु के मुँह से बियर बहार निकल गई.

"साले तेरी गांड मारु सरदार. खुद लेके गया था अपने साथ और मेरा नाम लगा रहा है.", आशु ने सरताज की गांड पर थप्पड़ मरते हुए कहा लेकिन एकदम हे सारा हंसी भरा माहौल शांत हो गया. बेसमेंट में उतरती सीढ़ियों पर नजर जाते हे चारो लड़के अपनी अपनी जगह जम्म गए. जैसे ये तहखाना पृथ्वीलोक और वह सीढ़ियां स्वर्ग से आने का रास्ता थी. वही से उतर कर ये खूबसूरत पारी ठीक उनकी तरफ बढ़ी चली आ रही थी. अँधेरे से इधर रौशनी में आती इस अप्सरा को देखते हुए सभी के चेहरे गंभीर थे.

"तुम्हारी बात मेरी समझ में आ गई है. मैं बिना किसी शर्त या वाडे के तुम्हारी गर्लफ्रेंड बन्न ने को तैयार हु. यूनिवर्सिटी के बहार मैं तुम्हारी ज़िन्दगी में कोई इंटरफारे नहीं करुँगी और अंदर तुम्हारी मोटरसाइकिल के पीछे मेरे सिवा कोई और नहीं बैठेगी.", इस लड़की ने अपने दोनों हाथो में जूनि का एक हाथ पकड़ लिए था. रात सी काली आँखें हीरे सी चमक रही थी अपनी चाहत को देख कर.

"और अगर बैठी तोह?", जूनि के ऐसे सवाल पर वह बिना किसी की परवाह किये उसके चौड़े सीने में जा लगी.

"बस मेरे सामने नहीं, फिर तुम जो चाहे करो.", आशिमा की बात पर बाकी तीनो हैरान से एक दूसरे को देखने लगे. जैसे ये उन्हें उम्मीद हे नहीं थी. हिम्मत करते हुए आशु ने बियर एक तरफ रखते हुए कहा.

"तुम आशिमा भल्ला हे हो न?"

"क्यों? कोई और लग रही हु क्या?", आशिमा अभी भी जूनि से चिपकी कड़ी थी. उसका जवाब सुन्न कर भास्कर ने हे बात करना बेहतर समझा.

"आशुतोष का ये मतलब नहीं था. तुम्हे कभी ऐसे नहीं देखा न किसी ने और हमेशा गुस्से और ग्रुप में रेहनी वाली आज यहाँ अकेली वह भी इतने प्यार से बात करती हुई देखि नहीं थी पहले.", भास्कर शायद इन सबमे दिलेर था.

"अब ऐसा हे देखने को मिलेगा. सॉरी तुम लोगो का पर्सनल टाइम ख़राब करने के लिए. मैं चलती हु और तुमसे शाम को मिलूंगी वही जहा तुम अकेले बैठते हो.", ाश्मीअ ने जाने से पहले जूनि के दाढ़ी वाले चेहरे पर होंठ लगाए और तितली सी उड़ती हुई बिना कोई जवाब लिए वह से निकल गई. वह छोटा लड़का भी सब देख रहा था.

"भैया जी आपकी तोह निकल पड़ी. ये मैडम सुन्दर भी है और अमीर भी.", छोटू की बात पर सरताज हँसता हुआ उसका सर सहलाने लगा.

"छोटू पुत्तर ये एक तरह से शहर की मालकिन है और अपने जूनि ने बर्फ समझ कर जिसपे गांड टिके है वह पानी है या तेजाब वह पिघलने के बाद पता लगेगा. चल 5 कुलचे लेके आ फिर आज तुझे जेबखर्ची देते है.", सरताज के साथ हे आशु और भास्कर भी तेजाब वाली बात पर हंसने लगे. सरताज ने जेब से 100 का नोट निकल कर बढ़ाया तोह छोटू ने ना में गर्दन हिला दी.

"जूनि भैया ने आते हे 500 दे दिए थे और हिसाब तोह कल हे चूका दिए था. बाकी रही बात इनकी गांड की तोह वह फौलाद है भैया. आपने तोह खुद हे देखा था जब ऊपर रेस्टोरेंट पर इन्होने अकेले सबकी धुलाई की थी. महीना हो गया उन लोगो की जीप को बहार खड़े, आज तक लेने नहीं आये."

"चल तू भाग और अपने लिए फ्रूटी और पेटिस ले लिओ.", जूनि ने उसके पिछवाड़े पर चपत लगते हुए कहा और छोटू हँसता हुआ दौड़ गया.

"वैसे लड़के ने बात 16 आने सच कही. भास्कर तेरी भी तोह गांड जूनि ने हे बचाई थी आउटसाइडर वाले झगडे में.", आशु के ऐसा कहते हे भास्कर ने जूनि को गले लगा लिए.

"मेरी जान है ये. जूनि नहीं होता तोह आज शायद मैं ज़िंदा भी नहीं होता."

"ओह मादरचोद 2 बोतल में तू सेंटी हो जाता है साले. ऐसे तोह इस सरदार ने भी मेरी जान बचाई थी लेकिन मैं तोह इसकी तारीफ नहीं करता. हम दोस्त है और दोस्त मतलब परिवार.", जूनि के इतना कहते हे आशु और सरताज भी उन दोनों के गले लग गए. कुछ पल बाद फिर से मैच शुरू करते हुए ठंडी बियर खुल गई थी. यही तोह ज़िन्दगी थी इन सबकी, घर से दूर एक और परिवार एक और घर.

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साल 1998

अर्जुन प्रीती के साथ वक़्त बिता कर घर आया तोह सबने अपने लादले को गले लगा कर प्यार दिए. उसकी चर्चा घंटे भर पहले सबतक पहुंच चुकी थी. सबसे ज्यादा ख़ुशी कौशल्या जी ने जाहिर की थी और अपने सीने से अर्जुन को लगाए वह बिस्टेर पर बैठी सबको बता रही थी की उन्हें कितना नाज है अपने पौटे पर.

"ये होता है वारिस और स्वाभिमान. देख ले मधु मेरे लाल को, इसने पूरे परिवार का नाम बढ़ाया है आज.", मधु बुआ तोह खुद भी अर्जुन के लिए कही ज्यादा हे खुश थी.

"अभी इसने बहोत कुछ करना है माँ. ये सब तोह आपकी और पापा की म्हणत है. अर्जुन अपने फैंसले से जब कुछ करेगा तोह ज्यादा ख़ुशी मिलेगी. काबिल भी है और मेहनती भी."

"सच कहा बुआ आपने की ये सबकुछ तोह खेल हे था. लेकिन मेरे फैंसले भी बिना दादा और दादी के कोई मायने नहीं रखते. अब नाहा कर थोड़ा आराम करता हु आप लोग बातें कीजिये.", कौशल्या जी का गाल चूम कर वह बहार निकल गया.

"कल इसने ननिहाल जाना है अपने फिर ऐतवार को पंजाब भी. रेखा को बता देना के अर्जुन के कपडे लगा देगी और प्रियंका के साथ आरती भी जा रही है.", कौशल्या जी ने वही कड़ी कोमल को सब बताया तोह वह तुरंत बहार चली गई. रेणुका, मधु और प्रियंका वही कौशल्या जी के पास बैठी बातें करने लगी.

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"मुझे लगा के तुम्हे इनाम मिलना चाहिए और शायद यही सबसे ाचा वक़्त है तुम्हे आराम देने के लिए.", फुहारे के नीचे अमरबेल सी अर्जुन के शरीर से लिपटी तारा का नरम मांसल बदन रौशनी को भी फीका दिखा रहा था. गोल तराशे हुए मुलायम उभर उस ठोस सीने में दबे पूरे उत्तेज्जित थे और दोनों के जिस्म को भिगोता ठंडा पानी भी भाप सा गरम होने लगा. भीगे होंठ बुरी तरह से उलझे थे और अर्जुन अपने मजबूत हाथो में तारा के गोल सुघड़ कूल्हे मसलता उतना हे प्यार वापिस दे रहा था. पता नहीं तारा इनाम दे रही थी या ले रही थी.

"तुम्हे मेरा पूरा ख्याल रहता है. देखो कैसे हर गुजरते दिन के साथ तुम निखार रही हो.", अर्जुन का विकराल लिंग तारा की कोमल नाभि से ऊपर रगड़ लगा रहा था. आईने में दोनों का अक्स देखती तारा जैसे दृश्य में खोने लगी थी.

"आह्हः.. आराम से अर्जुनंनं.. ये हर बार पहले दर्द देता है.. आह्हः.. फिर मजा.", दिवार से तारा को लगते हुए अर्जुन ने रास बहती फांको के बीच अपना लिंग उतार दिए था. अगले 20 मिनट तक बंद बाथरूम में दोनों के आकर्षक शरीर भरपूर रगड़ देते हुए एक दूसरे को आनंद देते रहे. कामक्रीड़ा से तृप्त हो कर तारा कपडे पहन कर बहार चली गई और अर्जुन एक ढीली निक्कर पहन कर अपने बिस्टेर पर जा लेता. शरीर में हलकी थकान थी और अभी आराम करने के लिए पर्याप्त समाया भी उसके पास था.

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"चाचा एक बात करनी थी आपसे.", भुप्पी #### शहर के इस फार्महाउस में बड़े सांगवान जी के सामने बैठा था. साफ़ हरी घास के लॉन में बांस की आकर्षक कुर्सियों पर दोनों आमने सामने था और बीच में वैसा हे एक टेबल जिसपर 2 शराब के गिलास और खाने का सामान पड़ा था.

"Be-hichak कह सकते हो तुम. पूछ कर शर्मिंदा क्यों कर रहे हो.?", सांगवान जी की बात पर भुप्पी की नजरे जमीन को देख रही थी.

"वह बात ऐसी हे है के पहले आपसे हे करना ठीक रहेगा.", भुप्पी अभी भी संकोच कर रहा था.

"बताओ भाई अगर मेरे बस में होगा तोह मैं ना नहीं कहूंगा और जो सहायता हो सकेगी वह करने को त्यार हु."

"सत्तू के बटुए से एक लड़की की तस्वीर निकली थी. मैंने उस से पूछताछ की तोह उसने बताया के वह उस लड़की को एक साल से पसंद करता है और पढ़ाई होने के बाद उस से हे शादी करना चाहता है.", भुप्पी जैसे अभी तक हिचकिचा रहा था.

"ये तोह ाची बात है के सत्येंद्र को कोई लड़की पसंद है और वह गलत रास्ते पर चलने की जगह उसको अपना हमसफ़र बनाना चाहता है. कौन लड़की है और परिवार के बारे में कुछ बताया उसने?"

"स्मिता के साथ हे मब्ब्स कर रही है वह और सत्तू ने वह फोटो भी अपनी छोटी बहिन की एल्बम से हे निकली थी. ऋतू शर्मा."

"परिवार?", सांगवान जी ने एक बड़ा घूँट शराब का गले से नीचे उतारते हुए इतना हे सवाल किआ.

"पंडित रामेश्व...

"भुप्पीीी.. तुम मेरे बेटे हो और बस यही वजह है के हमने ये बात सुन्न ली. ऋतू का नाम आइंदा जुबान पर नहीं आना चाहिए. तुम्हारे बेटे ने ये बताया के वह लड़की उसको पसंद करती है या कभी उसने सामने से सत्येंद्र को देखा है? कभी मिला है या उसके बारे में choti-badi बात उसको पता है?"

"नहीं. वह 2-3 बार कॉलेज छोड़ने गया था स्मिता को तस्वीर देखने के बाद लेकिन स्मिता ने बताया के ऋतू को पहले से हे कोई प्रेमी है."

"नाम बताया तुम्हारी बेटी ने उस प्रेमी का?"

"कोई अर्जुन है."

"अब तुम खुद हे सोच लो के अगर एक बड़ी बहिन इस सब लफड़े से दूर रहने के लिए अपने भाई को हे अपना प्रेमी बता रही है तोह वह अपनी ज़िन्दगी के लिए कितनी चिंतित और मेहनती होगी. ये सिर्फ एक पक्ष है. दूसरा है शंकर जो ऋतू के लिए अपनी जान दे सकता है और उसपर पड़ने वाली परछाई तक को पातळ में दफ़न कर सकता है. लेकिन इन सबसे ज्यादा खतरनाक और पागल है अर्जुन जिसकी ज़िन्दगी कोमल और ऋतू है. कही गलती से भी सत्येंद्र पर उसकी नजर पड़ गई तोह तुम और मैं भी कुछ नहीं कर सकेंगे."

"चाचा मैं संभल सकता हु. और वैसे भी बात मेरे बेटे की है तोह उसकी ख़ुशी के लिए मैं भी तोह कुछ न कुछ कर हे सकता हु.", भुप्पी का जवाब देना सांगवान जी के दिल पर चोट कर गया.

"मौत हे चाहिए तोह तुम मेरे हाथ क्यों खराब करना चाहते हो? 26-27 साल का तुम 4 लोगो का याराना अगर बलि पर चढ़ाना चाहते हो तोह मैं तुम्हे अभी आजाद करता हु. याद रखना के उस तरफ जाने वाला हर कदम तुम्हारी तरफ भी बढ़ेगा.", भुप्पी को इसकी कदाचित उम्मीद न थी की बड़े सांगवान उसको ऐसा भी के सकते है.

"माफ़ी चाहता हु आपका दिल दुखने के लिए. सत्तू को मैं समझा दूंगा."

"बेहतर रहेगा लेकिन इस पल के बाद अगर पंडित जी के परिवार के किसी भी सदस्य पर खरोच भी आयी, और देने वाला जो भी व्यक्ति हो लेकिन मैं गर्दन तुम्हारी अलग करूँगा. तुमने जाहिर कर दिए है के तुम क्या इरादे रखते हो. हमने कभी तुम्हे अपने से अलग नहीं समझा लेकिन आज तुम्हारे कुछ जवाब बहोत थे हमारा विश्वास झकझोरने के लिए. शंकर के वापिस आते हे मैं तुम्हारा हिस्सा तुम्हे दे दूंगा.", सांगवान जी का इतना बड़ा फैंसला सुन्न कर भुप्पी की आँखों में पानी भर आया. अनजाने में हे उस से आज बहोत बड़ी गलती हो गई थी. बात कहने का परिणाम ये निकलेगा उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था.

"आप इस बात पर मुझे अपने से हे अलग कर रहे है? मैं तोह हमेशा आपके साथ साये की तरह रहा हु. इतनी बड़ी सजा सिर्फ छोटी सी बात के लिए?"

"सब जानते हुए तुमने ये गलती की है बीटा. वह तस्वीर देखते हे तुम्हे सत्येंद्र के दिमाग से हर बात मिटा देनी चाहिए थी. उसको सच बताना चाहिए था की जो आकर्षण लग रहा है वह साक्षात् मौत है. लड़की का प्रेमी होने के बावजूद अगर तुम्हारा बीटा उसको पाने की चाह रखता है तोह वह सबको गुमहराह कर रहा है. इरादे अलग है और गलत भी. तुम्हे ये समझ नहीं आया या तुमने जानते हुए भी अपने बेटे का साथ दिए?"

"गलती हो गई चाचा जी. सच कहा आपने की मैंने ये बात नहीं समझी और आपसे बात करने चला आया. सत्तू को मैं समझा दूंगा बस मुझे अपने से अलग मत कीजिये.", भुप्पी कुर्सी से खड़ा हो कर उनके पाँव में झुखने लगा लेकिन आज पहली बार कालू और शेरू बीच में आ खड़े हुए थे.

"मौका हमने सबको दिए है और तुम तोह हमारे बेटे हो. बस अब से तुम हॉस्पिटल सम्भालो और जबतक हम न बुलाये तुम मिलने नहीं आओगे.", सांगवान जी इतना कह कर खड़े हो गए और भुप्पी के सर पर हाथ फेरते हुए अंदर चले गए. भुप्पी ख़ामोशी से बस उन्हें जाता देख रहा था.

'भारी गलती हो गई अपने बेटे के मोह में मुझसे. आप मुझे माफ़ करे या न करे चाचा लेकिन मैं प्रायश्चित करके रहूँगा. उसके इरादे गलत है तोह आज इन हाथो से उसको भी वही सजा मिलेगी जो मैंने हर गुनेहगार को दी है.' कुछ निश्चित करता हुआ भुप्पी तुरंत उस काली कॉन्टेसा कार की तरफ चल दिए जो सीमेंट की पटरी पर शान से कड़ी थी. सत्येंद्र के इरादे उसके बाप को समझ आ चुके थे.

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"भाई, तू फ्री है?", ऋतू दीदी के ऐसा पूछने पर अर्जुन वही रुक गया. अभी रात का भोजन किआ हे था और देर तक सोने की वजह से बस अर्जुन हे इस वक़्त टेबल पर था. अपने छोटे भाई को इत्मीनान से खाना खिलने के बाद ऋतू दीदी ने उसका हाथ थामते हुए बस इतना हे पुछा.

"आपको ऐसे नहीं कहना चाहिए. मैं तोह हमेशा आपके लिए खली हु."

"मुझे पता है फिर भी पूछना जरुरी लगा. चल मेरे साथ छत्त पर चल, वही बात करेंगे.", ऋतू दीदी की आँखों की चमक बहोत कुछ कह रही थी लेकिन ये तोह बस वही जान सकता था जो उनके दिल को समझता था. अर्जुन वैसे हे उनका हाथ थामे ऊपर चल दिए और दूसरी मंज़िल पार करते हे ऋतू दीदी के नाजुक बदन को गॉड में उठा कर बाकी सफर पूरा करता खुली छत्त पर आ खड़ा हुआ. ऋतू दीदी भी उसकी गर्दन में बाहों का हार डाले मुस्कुरा रही थी.

"बताओ आपने क्या बात करनी थी?", अर्जुन वैसे हे उन्हें उठाये छत्त के बीच तक आ गया था.

"नीचे उतर तोह सही."

"आपको ऐसे ाचा नहीं लग रहा?", अर्जुन ने शरारत से पुछा तोह ऋतू दीदी ने जल्दी से उसके होंठ चूम लिए.

"मैं तोह चाहती हु तू हमेशा मुझे ऐसे हे थामे रहे लेकिन वह बात ऐसी है न के न तू कुछ कर सकेगा और न मैं.", ऋतू दीदी के ऐसा कहते हे अर्जुन ने उन्हें गद्दे पर खड़ा कर दिए और खुद नीचे पसर गया. ऋतू दीदी भी आराम से अर्जुन के बराबर लेट कर टिमटिमाते तारो को देखने लगी. उनका नाजुक जिस्म पूरी तरह से अर्जुन के आगोश में था.

"आपके 4 साल पड़े है और मेरे काम से काम 6. कैसे निकलेगा ये वक़्त?", कहा तोह ऋतू दीदी उसको ऊपर लेके आई थी बात करने के लिए और कहा अर्जुन हे अपने सवाल ले कर उन्हें अपने सीने से लगाने लगा.

"तुम भविष्य का सोच रहे हो? पहले तोह कभी तुमने इतना आगे का नहीं सोचा.", ऋतू दीदी का चेहरा भी थोड़ा गंभीर हो गया.

"मैं भी रुकना चाहता हु दीदी. मुझे मालूम है के रुकना कोई हल नहीं है, मुझे हर पल अपने लक्ष्य और कर्त्तव्य निभाने होंगे. फिर भी मैं चाहता हु की जब साड़ी भागदौड़ के बाद मैं घर वापिस औ तोह बस वह वक़्त आपका और मेरा हो. हमारा अपना समाया जिसमे मैं वह हर बात आपसे करू जो मैं करना चाहता हु, आपका ध्यान राखु, प्यार करू और जब तक बहार न निकलू तब तक आप मेरी बाहों में रहो.", अर्जुन भी अपनी रौ में हर बात कहता चला गया. वह तोह कभी ऐसी बातें नहीं करता था.

"इतना प्यार करते हो मुझसे? जानते भी हो के जो हम चाहते है उसकी सम्भावना ना के बराबर है. और मेरे साथ हे तुम्हारी ज़िन्दगी में अलका और प्रीती भी है. कोमल दीदी बेशक परिवार की हद्द न पार करे लेकिन कही न कही तोह उन्हें भी उनका प्यार मिलना हे चाहिए."

"आप कहती थी न के प्रीती, अलका दीदी और आप 33 प्रतिशत है. वह गलत है दीदी. प्रीती से मैं बेइंतेहा प्यार करता हु और वह भी. अलका दीदी ने भी कभी कोई कसार नहीं छोड़ी प्यार करने में. देखा जाये तोह होश में आने के बाद वही मेरी पहली प्रेमिका बानी लेकिन एक सच इन सब बातों पर भरी है.", अर्जुन बात कहते हुए थोड़ा भावुक हो गया. आवाज भर्राने लगी लेकिन वह खुद को शांत रखने की कोशिश कर रहा था.

"बेहिचक बोल ारु. तू जानता है मैं तेरा दर्द बर्दाश्त नहीं कर सकती.", ऋतू दीदी जैसे उसकी पूरी हालत समझ रही थी. उन्होंने जैसे महसूस किआ था के आज अर्जुन कुछ बड़ी बात कहने जा रहा है.

"दीदी वह दोनों हे मेरी धड़कन है लेकिन बंद आँखों में भी सिर्फ आप हो जो मुझे पूरा करती हो. जाने कैसी डोर है या कुछ और लेकिन हम दोनों एक जैसे है. मैं जब सदमे में बेहोश था तब भी मुझे आपका रोना सुनाई दे रहा था. मैं उठना चाहता पर मैं जैसे जकड़ा हुआ था लेकिन उस अन्धकार से आप मुझे निकल कर लाइ. हम दोनों शायद एक दूसरे के पूरक है. मैं इस सच का सामना नहीं कर प् रहा हु. प्रीती के साथ मेरे ढेरो सपने है, मैं मंजू को भी हमेशा खुश रखना चाहता हु लेकिन मेरी दुनिया आप हे बना सकती हो."

"ये डोर अटूट है अर्जुन और ये ऐसी हे रहेगी. मैं भी लाख खुद को समझा लू लेकिन न हम दोनों जुड़ा हो सकते है और न अलग रह सकते है. तेरी पहली बीवी हु तोह तू ज्यादा मैट सोच. जो सपने तू देख रहा है वही मेरे भी है लेकिन हम दोनों को हे समझना होगा की तेरे पर उनका भी अधिकार है. सही समय आने पर हम दोनों वैसा हे करेंगे जो तू कह रहा था. और अब देख तेरी ऐसी बातों में कितना समय निकल गया. कहा तोह मैं आई थी ये सोच कर की तुम कुछ पल प्यार के मेरे साथ बिताओगे लेकिन यहाँ तोह पतिदेव का मूड कुछ और हे है.", ऋतू दीदी ने पलट को खुद को अर्जुन के ऊपर बिछा लिए. अर्जुन ने भी उनके गुलाब से महकते जिस्म को बाहों में भरते हुए नरम होंठो पर एक गहरा चुम्बन अंकित कर दिए.

"पता नहीं ऋतू कैसे मैं इतना कमजोर हो गया. तुम मेरी सांस हो, मेरे होने का कारण और मेरी ताक़त. बस आज पहली बार मैं डर गया था के कही तुम्हे खो न दू.", अर्जुन उस पतली मुलायम कमर को सहलाते हुए जैसे उस क्षण में पहुंच चूका था जहा ऋतू दीदी उसकी बीवी थी.

"ऐसा करना गलत तोह नहीं है. मैं भी तोह सोचती हु की जल्दी सब ख़तम हो जाये और फिर हमेशा मैं तुम्हारे पास राहु. शादी हो, एक प्यारा सा घर और हमारे छोटे छोटे बचे, बिलकुल तुम्हारे जैसे.", ऋतू दीदी ने भी अपना दिल खोल कर रख दिए था. अर्जुन की आँखों पर चूमती वह भी उसके स्पर्श को दिल तक महसूस कर रही थी.

"घर? हमारा घर तोह यही है न."

"अर्जुन, तुम्हे इस सच को भी समझना होगा की अगर हम दोनों जीवन साथ बिताते है तोह दादा जी के संसार से बहार निकलना हे होगा. हाँ तुम यहाँ रह सकते हो लेकिन हम दोनों का घर यहाँ से दूर और सिर्फ हम दोनों से हे होगा."

"हाँ ये सच है. और मैं डर भी इस बात से हे रहा हु."

"तुम्हे डरना नहीं है. समझना है और वैसा हे करना है जैसा मैं कह रही हु. इस घर में तुम प्रीती के साथ रहोगे और हमारी दुनिया में मेरे साथ. तालमेल बनाना मुश्किल नहीं है. बहोत समय है इन बातों में, मैं हु न. अब थोड़ा सा समय दो फिर मैं चलती हु.", ऋतू दीदी की ऐसी बात सुन्न कर अर्जुन निश्चिन्त हो गया था. उसको पता था के दीदी सबकुछ संभल सकती है. अगले कुछ पल बस वह दोनों ऊपर से हे एक दूसरे के जिस्मो को सहलाते हुए प्यार करते रहे. अर्जुन के ऐसे हे प्यार करने पर ऋतू दीदी अपने चरम को पा गई थी.

"जब Priyanka-Aarti के साथ वापिस आओगे तोह तुम्हारे लिए एक सरप्राइज यहाँ इन्तजार करता मिलेगा. यही बताना था तुम्हे पहले और अब चलती हु."

"ी लव यू."

"ी लव यू तू ारु. उमंमाहः.", होंठो पर एक प्यार भरा चुम्बन देती हुई वह हिरणी सी नीचे चली गई. अर्जुन कुछ समय वैसे हे अकेला छत्त पर आँखे बंद किये लेता रहा. उसने मधु बुआ को बता दिए था के आज बुआ हे रेणुका के साथ सो जाये. वो छत्त पर अकेला हे आराम करना चाहता है. घडी में 11 बजे थे और अभी मुस्कान से मिलने में काफी समय था. ध्यान मुद्रा में हे वह नींद में चला गया था.

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"Tring-Tring" गहरी रात में बिस्टेर के किनारे बजते फ़ोन पर नजर डालते हुए धर्मवीर सांगवान बिस्टेर से खड़े हो गए. नंबर पहचान का था और कुछ सोच कर उन्होंने उठा लिए.

"है भुप्पी, इतनी रात में कैसे याद किआ?"

"चाचा, आप सही थे लेकिन बात कही ज्यादा हे बड़ी है.", दूसरी तरफ से हफ्ते हुए भुप्पी अपने चेहरे का पसीना साफ़ कर रहा था.

"क्या मतलब की बात बड़ी है?"

"सत्तू जो भी कर रहा था उसकी वजह कुछ और हे थी. वह बहन सिंह के कहने पर सबकुछ कर रहा था.", ये नाम सुनते हे हल्का पसीना सांगवान जी के चेहरे पर भी आ गया.

"सत्तू कहा है इस वक़्त.?"

"मुझे गोली मार कर वह बहन सिंह के साले के साथ फरार हो गया. परम और मेहुल आ रहे है मेरे पास लेकिन आप अपनी सुरक्षा चौकस रखना. बहन सिंह जेल से कैसे बहार आया ये भी jaan-na पड़ेगा. आठ..", भुप्पी के पेट से खून बह रहा था जहा उसकी बीवी एक तकिया दबाये रो रही थी. भुप्पी की बेटी स्मिता के भी ब्याह पर गहरा जख्म था जहा उनकी कामवाली रूई को लगाए खून रोकने की कोशिश कर रही थी.

"मैं आ रहा हु बेटे. शंकर को कुछ मत बताना मैं आधे घंटे में हे वह पहुंच जाऊंगा.", कुरता पयजामा पहने हे वह अपनी अलमारी से एक स्वचालित रुस्सियन रिवॉल्वर निकल कर कमरे से बहार चल दिए. बहार कड़ी मेरसेदेज़ जीप का दरवाजा खोलते हुए उन्होंने अँधेरे में हे आवाज लगाई. 'तीसों' 'मिली' और तुरंत हे 2 बड़े कुत्ते उनके सामने आ रुके. सुल्तान की नेसल के ये दोनों हे कुत्ते उस से भी ज्यादा बड़े और खतरनाक दिख रहे थे.

'गेट इनसाइड.' इतना कहते हे दोनों कुत्ते गाडी के अंदर जा बैठे. ड्राइवर सीट सँभालते हे वह कोठी के गेट पर आ रुके.

"रहीम, सुरक्षा बढ़ा दो थोड़ी और गब्बर के साथ आज जोरावर को भी खोल देना. बीबी जी पूछे तोह बता देना के मैं जरुरी काम से बहार गया हु.", 6 फ़ीट ऊँचा रहीम जैसे हर बात समझता था. निगरानी वाली कमरे में हे एक तरफ राखी do-nali उठा कर वह बहार आ गया. दरवाजा खोलते हे गाडी तूफानी रफ़्तार से निकल गई.

'जोरावर को खोलने का बोल रहे है तोह बात बड़ी हे होगी. मंतोष को भी बुला लेता हु.', रहीम अँधेरे में एक तरफ चल दिए गेट को अंदर से टाला लगाने के बाद. 150 गज दूर इस हलकी रौशनी वाले कमरे के बहार वाला दरवाजा खोलते हे गब्बर नाम का जीव बहार निकल आया. रहीम को सूंघने के साथ हे वह पूरी चौकसी से खुले में घूमने लगा. उसके साथ वाले कमरे से आती गुर्राने की आवाज बता रही थी की वह भी कोई ऐसा हे जीव बंद है. दरवाजा खुलते हे पूरी रफ़्तार से ये तीन फ़ीट उचाई वाला सफ़ेद कुत्ता बहार निकल आया. रहीम से दुलार करने के बाद कुछ पल अपने हमजोली गब्बर से soongh-padtal करता वह उसके साथ हे कोठी के बहार वाले खुले हिस्से में शान से गश्त लगा रहा था.

"ये दोनों कैसे खोल दिए?", ये शायद मंतोष हे था.

"साहब जी Tyson-Mili को लेकर गए है. बोलै के कोई अनजान aas-pas दिखे तोह सवाल बाद में पूछना पहले गोली उतार देना.", रहीम की बात पर मंतोष भी अपनी कमर से रिवॉल्वर निकल कर जांच करने लगा. गोलियां बराबर भरी थी.

"कोई न. साहब जी ने कहा है तोह फिर शिकार पक्का खेलने को मिलेगा. जोरवार वैसे भी अपने काम ाचे से करना जानता है.", दोनों हे फिर से गेट की तरफ बढ़ चले. शायद ये रात आज कुछ लम्बी होने वाली थी.

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"कितने लोग थे?", बड़े सांगवान जब भुप्पी की कोठी पर पहुंचे तोह बहार हे उन्हें बहोत सरे जवाब मिल गए थे. लम्बी गोलियों की दर्जन भर खोल पड़े थे. दिवार और दरवाजो पर भी गोलियों को निशाँ बता रहे थे की वारदात छोटी नहीं थी. इस वक़्त Mili-Tyson बहार निगरानी कर रहे थे और सांगवान साहब अंदर भुप्पी की बगल में बैठे परम और मेहुल गुलाटी को उसका इलाज करते देख रहे थे. भुप्पी था जिगरवाला और मजबूत इंसान जो गोली को झेलने के बाद भी होश में बैठा अपने पेट पर सिलवाई करवा रहा था. गोली निकल कर एक तरफ राखी जा चुकी थी. स्मिता की ब्याह पर भी 5 टाँके आये थे और नींद के इंजेक्शन की वजह से वह मूर्छित थी.

"मैं घर आया और सत्तू की पिटाई करने लगा था की वह शायद घबराहट में मान बैठा की मुझे सब पता चल गया है. धक्का दे कर वह घर से भाग गया तोह मैंने ज्यादा गौर नहीं किआ. अभी घंटा पहले मैं गाये को रोटी खिला कर अंदर आ रहा था के पीछे से गोली चल गई. गलियारे में शायद निशाना ठीक नहीं लगा अँधेरे की वजह से और मेरे मुड़ते हे अगली गोली मेरे पेट में आ घुसी. सत्तू, सूरजमल (बहन सिंह का साला) और गंगाराम को तोह मैं पहचान गया था लेकिन उनके साथ 2 और लोग थे.", परम ने ग्लूकोस मुँह में डाला तोह भुप्पी कुछ वक़्त के लिए शांत हो गया. फिर मुँह गीला करके आगे बताने लगा.

"उनके साथ हे दूसरी गाडी के अंदर बहन सिंह अकेला बैठा था और उसकी हे गोली स्मिता को लगी जब इसने मुझे रिवॉल्वर पकड़े थी. गंगाराम शायद मर्डर गया लेकिन वह ले गए थे उसको भी अपने साथ. उनकी तैयारी देख कर लग रहा है के वह आपके और रामेश्वर जी के घर हुम्ला करने वाले है."

"मेरे पर हे करेंगे. बहन सिंह इतना दिलेर नहीं है के वह पंडित जी के शहर में घुसने की हिम्मत करेगा. फिर भी गुलाटी तू जरा संजीव को फ़ोन कर दे और वह निगरानी रखवाने का बोल. परम तू भुप्पी के पास हे रहना और मेहुल तुम मेरे साथ चलो.", कुछ सोच कर वह खड़े हुए तोह गुलाटी फ़ोन पर शायद संजीव से बात कर रहा था. घडी रात के 1 बजा रही थी. किसी भी खतरनाक काम को अंजाम देने के लिए ये वक़्त जैसे बिलकुल ठीक था. अगले 5 मिनट में गुलाटी भी अपनी रिवॉल्वर हाथ में लिए बड़े सांगवान जी के साथ बहार निकल चला.

"हम कहा जायेंगे?"

"आज ये कीड़ा कुचलना हे पड़ेगा. शंकर की gair-maujdgi में इतने सालो बाद मुझे हे हथियार चलना पड़ेगा."

"आप गाडी सम्भालिये, काम मैं कर लूंगा.", गुलाटी के शांत चेहरे के साथ हे हाथो में दोनों तरफ हथियार थे. जो उसकी बात का समर्थन कर रहे थे की वह तैयार है. गाडी में एक बार फिर धर्मवीर सांगवान स्टीयरिंग के पीछे थे और बीच वाली सीट पर सिर्फ तीसों. मिली को वही छोड़ कर दोनों अँधेरे में अपनी मंजिल की और चल दिए.

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"लकी, मैं पता करता हु की ये बहन सिंह बहार कैसे निकला तू बस मेरे घर की सुरक्षा का ध्यान रखना. बात बहार न निकले इतना ध्यान रखना.", संजीव के शरीर पर लगी पत्तियां बता रही थी की वह खुद कही जाने की हालत में नहीं था लेकिन फ़ोन के दूसरी तरफ उसके जिगरी पर वह भरोसा कर सकता था.

"तू आराम कर मेरे भाई, मैं वह पर किसी को फटकने भी नहीं दूंगा.", लकी भी पीसीआर और कार लेकर ## सेक्टर की तरफ निकल चूका था. अँधेरी रात में जैसे यही चाँद लोग मुस्तैदी से एक अनहोनी का सामना करने को त्यार थे.

इस बीच एक टाटा सूमो सांगवान जी की बड़ी कोठी से कुछ दूर आ कर रुक चुकी थी. गाडी का ड्राइवर अँधेरे में खड़े इस आदमी से बात कर रहा था.

"कब निकला वह यहाँ से?"

"घंटा भर पहले निकला था अकेला. पिछली सीट पर 2 बड़े कुत्ते भी थे."

"घर में इस वक़्त कौन होगा?"

"चौकीदार, कामवाली और डॉक्टर की पत्नी."

"ठीक है. 5 लोग बहोत है ऐसे 3 को ख़तम करने के लिए. तू निकल यहाँ से और कोठी पे जीजा को बोल डीओ सत्तू का काम ख़तम कर दे.", अंदर बैठे बाकी 4 लोगो के हाथ में भी do-nali चमक रही थी. बहार वाला आदमी अँधेरे में एक तरफ चल दिए. झाड़ियों के पास कड़ी अपनी मोटरसाइकिल चालू करता वह तुरंत संदेसा देने अँधेरे में खो गया. ये गाडी एक तरफ कड़ी करते पांचो लोग बहार निकल आये. शरीर से सभी मुस्तैद और मजबूत थे. देसी पहनावा बता रहा था के बागी और हुनरवले अपराधी है जो किसी भी दया के मूड में नहीं थे. 2 लोग मुख्या दरवाजा की तरफ बढ़ चले और 2 एक दूसरे से विपरीत दिशा में इस एक एकड़ की कोठी की 6 फ़ीट ऊँची दीवारों की तरफ. ड्राइवर हे सूरजमल था.

अभी सबको गए 3-4 मिनट हे हुए थे की सन्नाटे में 3 गोलियों की आवाज सुनाई दी. 3 में से 2 आवाज पटाखे जैसी थी जो do-nali की हरगिज़ नहीं थी.

"के मसला हो गया?", सूरजमल तेज कदमो से कोठी के मुख्यद्वार की तरफ पंहुचा हे था की कुछ समझने से पहले उसकी गर्दन जानलेवा शिकंजे में जकड गई. पैने मजबूत दांत बड़े आराम से अंदर उतरने लगे और साथ हे उस से कही मजबूत जबड़े जांघ पर आ कैसे. जोरावर और गब्बर उसको ज़माने भर का दर्द देते हुए अंदर खींच कर ले जा रहे थे. इस बीच सूरजमल की आँखों के सामने हे एक और गोली चली जो उसके हे आदमी के सर फाड़ती हुई निकल गई. ये do-nali रहीम के हाथ में थी और बता रही थी की अंदर वाले उनसे कही ज्यादा खूंखार और चौकन्ने लोग है.

"Jorawar-Gabbar.", मंतोष के इतना बोलता हे दोनों कुत्ते सूरजमल को आजाद करते हुए उसके चेहरे के सामने हे बैठ गए. जैसे अगले हुकुम का इन्तजार हो और फिर दोनों इस इंसान का गोश्त हड्डियों से अलग कर दे. गले से आधा दर्जन सुराखों में से खून बेहटा हुआ सीमेंट की पटरी को गीला कर रहा था. जांघ का एक हिस्सा जैसे हड्डी से अलग लटका सूरजमल की बुरी हालत जाहिर कर रहा था.

"कितने लोग थे?"

"च.. छह.. चाररर.." और इसके साथ हे मंतोष ने लड़खड़ती आवाज को शांत कर दिए. दोनों कुत्ते जैसे गोलियों के आदि थे और आराम से अंदर चले गए.

"रहीम ये कबाड़ एक तरफ करवा भाई. रात ख़राब कर दी सालो ने." इसके साथ हे वह दोनों अपने काम में लग गए कोठी की सुरक्षा जोरावर और गब्बर को सौंप कर. अंदर शायद कमरे dhwani-rahit थे जिस से अभी तक कोई बहार नहीं आया था.

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"बहन सिंह, तुझे मैं कुत्ता नहीं कह सकता क्योंकि मैं उनकी वफ़ादारी और समर्पण की वजह से उन्हें प्यार करता हु. तू वो सुवर है जो अपने हे बचे खा सकता है भूख लगने पर.", इस विशाल हॉल के भीतर 3 लाश पड़ी थी और उनके बीच रिवॉल्वर थामे धर्मवीर सिंह की गरजती आवाज सुन्न कर बहन सिंह जमीन पर गिरा हुआ बेबस सा बस अपनी मौत को देख रहा था. एक तरफ गुलाटी कमीज खोलकर अपने कंधे पर शराब उड़ेल रहा था. एक गोली thik-thak चोट पंहुचा कर निकल गई थी और अब गुलाटी दर्द काम करने के लिए थोड़ी शराब पी रहा था और बाकी से अपना जख्म साफ़ कर रहा था.

"सांगवान साहब आपके साथ मेरी कोई दुश्मनी नहीं. वह तोह शंकर और उसके परिवार ने मुझे बर्बाद कर दिए जिसका मैं बदला ले रहा था.", जांघ पर लगी गोली का दर्द जुबान में भी असर दिखा रहा था. बहन सिंह ने सोचा भी न होगा के एक बूढा आदमी और एक पंजाबी डॉक्टर उसकी ऐसी हालत कर देंगे.

"शंकर, मेहुल, भुप्पी मेरे बेटे है. और मैंने कहा न के तू सूअर है जिसका कोई भरोसा नहीं. जल्दी बता तेरे बाकी आदमी कहा है.", इस गर्जना के साथ हे एक और गोली चली जो दूसरी जांघ में जा घुसी. गुलाटी ने करीब आ कर बड़ी सफाई से ये गोली मारी थी. फिर एक बड़ा घूँट शराब का पीते हुए वह बहन सिंह के पास हे बैठ गया. चौड़े निर्वस्त्र सीने पर कुछ पुराने निशान बता रहे थे के गुलाटी अलग तरह का दरिंदा है.

"अगली गोली तेरे लुंड पे और उसके बाद तेरे फेंफड़े पे. न मर्द रहेगा और न बिना सिलिंडर के जी सकेगा. टांग तोह तेरी ख़तम कर हे दी है. अब बताता है या तेरे बाप वाला हाल करू तेरा?", मेहुल गुलाटी जाने कैसी शक्शियत था लेकिन उसका तुरंत प्रभाव पड़ा. खूब फर्श को भिगो रहा था लेकिन दर्द में तड़पता बहन सिंह रट्टू तोते सा बोलने लगा.

"सूरजमल के साथ 4 लोग आपकी कोठी पर गए है. 4 लोग #### शहर गए है रामेश्वर के परिवार को मारने और 2 लोग भुप्पी की biwi-beti को लेने गए है.", बहन सिंह ये सोच रहा था के भुप्पी मर्डर चूका है. फिर भी उसने ाची बिसात बिछा दी थी. इस बीच बहार किसी के चीखने की आवाज सुन्न कर गुलाटी फुर्ती से आवाज की तरफ बढ़ गया. थोड़ी देर बाद हे एक आदमी को घसीट कर वह वही ले आया. तीसों ने उसकी दुर्गति कर दी थी लेकिन ये ज़िंदा था.

"मेहुल, संजीव से जायजा लेने के बाद परम से भी hal-chal पूछो.", बड़े सांगवान इतना कह कर इस जख्मी आदमी के पास आ बैठे. गुलाटी वही पड़े फ़ोन पर नंबर मिलाने लगा. तीसों पूरी चौकसी से बस बहन सिंह को देख रहा था.

"तोह तुम हे बैठे थे मेरे घर के माउद पर गर्मी में कम्बल ओढ़े.?"

"माफ़ कर दो maai-baap. मेरा कुछ लेना देना कोणी इन सबसे. खबरि हु और बहन सिंह ने 5000 दिए थे इस काम के.", हालत पहले हे खराब दी ऊपर से जख्मो को रिवॉल्वर से कुरेदने पर हो रहे दर्द में वह बुरी तरह तड़फ रहा था. माहौल कुछ पल शांत रहा फिर गुलाटी चलते हुए उनके पास आ गया.

"पंडित जी के घर के बहार 4 लोग गाडी में बेहोश मिले है पुलिस को, सभी वांछित थे और हथ्यारो के साथ. उनकी हालत गंभीर है जैसे बिठाने से पहले उनको तबियत से मारा गया हो. लेकिन गली सुनसान है और चौकीदार ने भी किसी को नहीं देखा. परम भी जख्मी हुआ है थोड़ा लेकिन मिली के साथ वह उन दोनों को मार कर अब अपना जख्म सी रहा है.", गुलाटी की बात सुन्न कर बहन सिंह के साथ हे बड़े सांगवान जी भी हैरान हो गए.

"बेहोश मिले है?"

"हाँ. और सबसे खास बात है के किसी को खबर भी नहीं लगी. कौन कर सकता है ऐसा?"

"अर्जुन. लेकिन वह अकेला 4 हथियारबंद का सामना नहीं कर सकता. चलो इस पर बाद में चर्चा करेंगे. इस हिजड़े का क्या करना है वह बताओ?"

"तुझे बहार किसने भेजा?", गुलाटी को जैसे हे ये बात याद आ गई और वह तुरंत बहन सिंह के सामने बैठ गया. तीसों भी वैसे हे करीब चला आया, शायद उसकी जरुरत पड़े pooch-tach के लिए.

"जेलर अमरीक सिंह.", जवाब मिलते हे गुलाटी खड़ा हो गया और बहन सिंह का हाथ तीसों के मुँह के सामने कर दिए. "बाईट." और कुछ देर तक चीखे गूंजती रही.

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रात के डेढ़ बजे अर्जुन की आँख अपने आप हे खुल गई. वह आज बहार टाला लगाना भूल गया था. ये बड़ी बात नहीं थी और उनकी गली भी सुरक्षित थी. फिर भी शाम को आराम करने और अभी ढाई घंटे सोने के बाद वह शरीर की जकड़न दूर करने के लिए नीचे चल दिए. गलियारे से बहार बगीचे को देखता हुआ वह दरवाजे तक आया तोह गली के चौकीदार को देख कर घर से बहार हे आ गया.

"कैसे हो अंकल? मतछार तोह नहीं लगते रात में?"

"बढ़िया हु बीटा. गर्मी में तोह मतछार हे होंगे लेकिन चलता फिरता रहता हुआ और यहाँ तुम्हारे घर के बहार थोड़ा सो लेता हुआ तोह रात काट जाती है.", अर्जुन को भी बात करना ाचा लगा तोह वह दरवाजा बहार से बंद कर वही पेड़ की चाव में बैठ गया.

"कल से यहाँ ठन्डे पानी की बोतल रख दिए करूँगा आपके लिए. घड़े का पानी भी गरम हो जाता है. वैसे ड्यूटी सख्त है आपकी जो साडी रात गश्त देते रहते हो."

"रात में ाचा लगता है बीटा. ड्यूटी तोह दिन की खराब होती है."

"पहले आप फ़ौज में थे क्या?"

"हाँ बीटा था तोह फ़ौज में लेकिन नायक के ओहदे से 10 साल पहले छुट्टी हो गई थी मेरी. ये हाथ का अंगूठा काट गया था मेरा. फ़ौज पे अपांग की कोई जगह नहीं."

"ये तोह गलत बात है. फिर घर चलने के लिए ये नौकरी करने लगे?"

"वह उधर मल्होत्रा जी रहते है न, उनके बेटे की धागा कंपनी में मैं चौकीदार था. फिर तुम्हारे घर के मालिक ने मुझे यहाँ नौकरी दिलवा दी 8000 में. काम भी खास नहीं है कुछ. एक मिनट, वह गाडी मदद पर ृक्क कर क्यों कड़ी हो गई.?" अपनी कहानी बीच में रोकते हुए चौकीदार राम सिंह खड़ा होने लगा लेकिन अर्जुन ने हाथ पकड़ कर अँधेरे में खींच लिए.

"देखते है क्या चक्कर है और आप शांत रहना. इरादे ठीक नहीं लग रहे.", ये बात कर रहे थे की गाडी की लाइट बंद हो गई. 2 आदमी बन्दूक लिए उनकी हे तरफ आ रहे थे. अर्जुन ने राम सिंह के कान में आहिस्ता से कुछ कहा और सफाई से पेड़ की आउट ले कर अंदर बगीचे में आ गया. उसको मालूम लग गया था के इस गली में सिर्फ एक उनका हे घर है जहा हमला हो सकता है. राम सिंह भी अँधेरे में सरक कर और पीछे हो गया था. डंडे पर हाथ कस गए थे लेकिन अंगोछा अर्जुन ले जा चूका था.

एक आदमी कुछ दुरी पर ृक्क कर नजर रखने लगा और दूसरा दरवाजे के बहार खड़ा 4 फ़ीट की दिवार से अंदर झाँकने लगा. एक कनाल के शांत बगीचे से आगे खुला आँगन और कमरे थे. गलियारा खुला था जो अंदर जाने के लिए सही रास्ता था. कंधे पर बन्दूक सही से टांग कर वह दिवार फांदता हुआ अंदर आया और खड़े होने से पहले हे वापिस जमीन पर लेट चूका था. अर्जुन मजबूती से उसका मुँह दबाते हुए कान के पीछे की नस दबा चूका था. ये उसको आचार्य जी ने सिखाया था. घसीट कर शरीर एक तरफ करते हुए वह फिर अपनी जगह आ बैठा. अगले 10 मिनट में बगीचे में अब 3 शरीर बेहोश पड़े थे.

इतनी देर तक न कोई आवाज, न कोई चीख सुनाई दी तोह वह गाडी अब उनके घर के सामने आ कड़ी हुई. ड्राइवर के उतारते हे उस मजबूत लेथ का भरपूर वार उसके सर पर पड़ा और ीदार फुर्ती से अर्जुन बहार आ कर उस तड़पते शरीर को थाम चूका था.

"अंकल अब जरा मेरे साथ चलो अंदर.", दोनों ने बाकी तीन शरीर को भी निकल कर गाडी के पास रख दिए.

"ये अंगोछा मजबूती से इसके मुँह पर बांध दीजिये.", राम सिंह हिम्मत वाला था और अर्जुन की बात सुन्न कर उसने वैसा हे किआ. अगले हे पल उस शरीर में हड्डिया टूटने की आवाज निकली और आंख्ने खुलने के बाद फिर बंद हो गई. अर्जुन ने वैसे हे बाकी तीनो के भी जोड़ ढीले कर दिए थे. गाडी में सबको टूटी baaju-ghutno के साथ बैठा कर राम सिंह ने न्यूट्रल किआ और दोनों ने धक्का लगते हुए गाडी वापिस उस मदद पर कड़ी कर दी. शरीर मिटटी और पसीने में लथपथ हो चुके थे.

"बीटा शरीर की बड़ी जानकारी है. किसी हड्डियों के डॉक्टर से शिक्षा लेते हो क्या?", पानी से हाथ पाँव धोते हुए वह बात कर रहे थे.

"किताबे पढता हु और कुछ जानकार लोगो से सीखता रहता हु. डंडा तोह आपने भी ऐसा मारा की उसकी चीख नहीं निकली."

"हाँ यहाँ जो ये हिस्सा होता है न यही आवाज पैदा करता है. इसको नुक्सान पंहुचा दो तोह जुबान बंद. कुछ भी कहो, बड़ी हड्डी तोड़ने के लिए शरीर में जितनी ऊर्जा चाहिए होती है वह आम इंसान के लिए मुमकिन नहीं. तुमने कंधे तोह आराम से उतरे हे, घुटने भी रबर की तरह अलग कर दिए. वैसे लोग थे कोण?"

"आप बस किसी को कुछ मत बताना. पुलिस जल्दी हे आएगी जितना मैं जानता हु. बाकी सब मैं आपको जब अगली बार मिलूंगा तब बता दूंगा. मुझे कही जरुरी जाना है.", अर्जुन उठने लगा तोह उसकी नजर छत्त पर कड़ी सरोज भाभी पर पड़ गई. उसको यकीन था के वह भी खामोश हे रहेंगी अगर कुछ देखा भी होगा तोह. राम सिंह अर्जुन से हाथ मिलता हुआ अपना अंगोछा ले कर शरीर पौंछने लगा और अर्जुन आराम से अपनी रानी को बहार निकल कर फिर से घर में अंदर से टाला लगा कर पैदल हे राम सिंह के साथ उस मदद की तरफ चल दिए. गली से बहार निकलने से पहले हे दूसरी तरफ से आती लाइट देख अर्जुन वह से गायब हो गया. एक मिनट बाद लाल पीसीआर और एक कार राम सिंह के सामने आ कड़ी हुई.

"ये कौन है?", लकी कार से बहार आते हे राम सिंह से पूछने लगा.

"साहब मैं उधर चक्कर लगाने गया था और जाते बख्त ये गाडी यहाँ नहीं थी. 10 मिनट बाद आया हु तोह ये कड़ी है. अंदर भी कुछ लोग है चलिए देखते है.", राम सिंह की बात सुन्न कर लकी के साथ हे 2 पोलिसवाले उस गाडी के पास आ खड़े हुए. अंदर चारो लोग बेहोश थे और हथ्यार बता रहे थे की उनकी मंशा ठीक नहीं थी.

"ये बेहोश है और कोई एक इस गाडी को चला कर सरकारी हॉस्पिटल ले चलो. बाबूलाल, हथियार अपनी गाडी में दाल लो.", लकी ने ज्यादा पूछताछ किये बिना पीसीआर और उस गाडी को वह से भेज दिए. पीछे 4 पुलिस वाले राम सिंह के साथ छोड़ कर वह भी सब जानकारी लेने के लिए चला गया.

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"तेरा भाई हमसे बेहतर सुरक्षा कर सकता है.", लकी फ़ोन पर संजीव से बात कर रहा था.

"बात गंभीर हो सकती थी यार. इतनी हिम्मत कैसे कर दी बहन सिंह ने? और तुझे कोई सबूत नहीं मिला वारदात पर? उनके पास हथियार थे."

"संजीव, चौकीदार 10 मिनट तेरे घर से दूर रहा और उसको भनक नहीं लगी तोह सोच पीछे हमको क्या मिलता. बंदूके लोडेड थी लेकिन उन्हें कोई चला भी नहीं पाया. सभी के घुटने और कंधे अंदर से टूटे हुए है और वह सभी इमरजेंसी में है. सोचने वाली बात ये है की इतनी बुरी हालत अगर होश में रख कर की जाट तोह चीखो से मोहल्ला उठ जाता लेकिन इधर तोह एक कुत्ते के भोंकने की आवाज नहीं आई."

"ये काम अर्जुन का हे है. चाचा ने बताया था के वह शरीर से जुडी किताबे पढता है और ताक़त उसमे कितनी है वह बताना बेवकूफी हे होगी. लेकिन तुम कोई ढील मत देना और एक पीसीआर लगा दे वह चक्कर लगाने के लिए. पता लग जायेगा जल्द हे क्योंकि गुलाटी अंकल को तोह पता हे था के ऐसा होने वाला है.", इनकी बातें जल्द हे ख़तम हो गई और कुछ सोच कर लकी फिर से रामेश्वर जी के सेक्टर की तरफ बढ़ चला.

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कुछ समय यूनिवर्सिटी के मुख्या सुरक्षाकर्मी के साथ बातचीत में बिताने के बाद अर्जुन उस ख़ुफ़िया रस्ते से हे मुस्कान के कमरे में पहुंच गया था. इंटरनेशनल हॉस्टल के कमरे अपने आप में सुविधासम्पन्न थे जैसे किसी बड़े होटल का shayan-kaksh. 18क्ष20 के बड़े कमरे के साथ हे फ्रिज, बाथरूम, स्टडी टेबल, टेलीफोन और एक काम चलौ रसोई वाला वातानुकूलित कमरा. हलकी दूधिया रौशनी में अर्जुन ने बिस्टेर पर लेती इस नवयौवना को देख तोह नाम के मुताबिक उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई. सफ़ेद चादर सीने से निचे तक शरीर को छुपाये थी और एक मासूम गुड़िया सी वह बाहो में तकिया दबाया उसकी तरफ हे चेहरा किये सो रही थी.

'खूबसूरती ऐ सनम वह खुदा हे ला सकता है, है तेरी तस्वीर ये अर्जुन बना सकता है', ये पंक्तिया कहता वह उसके बराबर आ लेता. गुलाबी गोर गाल को सहलाता वह मुस्कान के चेहरे से बाल पीछे करते हुए बस उसको निहार रहा था. कुछ पल निहार पाया था के वह झील से आँखें किसी स्वचालित दरवाजे सी धीमी रफ़्तार से खुलती हुई अपने रहनुमा को देखने लगी. बंद होंठ ख़ुशी से धनुषाकार हो गए और अर्जुन को यु अपने पास देख कर गालो पर हाय की लाली जाहिर कर रही थी की मुस्कान में भी वही शर्मीली नारी खूबी थी जो हर संवेदनशील ladki-aurat में होती है.

"तुम सपना हो?"

"मैं रक़ीब हु इस खूबसूरत दुश्मन का.", अर्जुन की ऐसी बात पर खुद मुस्कान ने अपनी एक ब्याह उस पर डालते हुए अपने करीब कर लिए. लरजते मॉटे गुलाबी होंठो पर अर्जुन के आधार लगते हे दोनों आँखे बंद किये इस मधुरस को पीने लगे. जल्द हे चादर जिस्म से जुड़ा हो गई और रेशमी बनियान और एक झीनी तंग निक्कर में जरुरी जिस्म छुपाये मुस्कान अर्जुन के ऊपर सवार अपनी ज़िन्दगी का ये ख़ास पल जीने लगी.

"रात में खाना नहीं खाया था क्या?", अर्जुन ने शरारत से सवाल किआ तोह मुस्कान अपने गीले होंठ कलाई से साफ़ करती ना में गर्दन हिलने लगी. पतले कपडे के ऊपर से हे वक्षो के चूचक का पैनापन उभर का बता रहा था के मुस्कान की तड़प कहा तक पहुंच चुकी है.

"जब एक्सोटिक fruit-salad मिलने वाला हो तोह bread-roti किसको पसंद आएगी. बहोत गंदे गंदे सपने दिखाए है तुमने और अब मैं उन्हें सच में बदलने वाली हु."

"खुद को गन्दा करने वाली हो?"

"नहीं. तुम्हारे प्यार से सबकुछ साफ़ करने वाली हु. दिल करता है के खुद को सटिस्फी करू लेकिन ये दिल मानता नहीं. वह कहता है के बस ये हक़ अर्जुन का है.", एक बार फिर से उसके ऊपर झुकती वह चूमने के साथ हे अर्जुन के जिस्म पर फांसी टीशर्ट को खींचने लगी. अर्जुन ने भी साथ देते हुए जल्द हे खुद को ऊपर से निर्वस्त्र कर लिए. मुस्कान कुछ पल बस उस गोर जिस्म को घूरती रही. छाती के बीच में इतनी गहरी लकीर और चौड़ी उभरी हुई फांके. अंदर की तरफ जाता पेट जहा कटाव के साथ 6 चौकोर मांसपेशिया बता रही थी की पेट पत्थर सा सख्त है.

"यू अरे रियली हूजे एंड माचो. ऐसी बॉडी बहोत रेयर है एंड it's एक्सोटिक विथ सुच हैंडसम फेस. लव यू बेबी.", छाती को नाखून से सहलाती वह बुरी तरह अर्जुन से लिपट गई. Khud-ba-khud मुस्कान की पकड़ अर्जुन पर मजबूत हो गई. थोड़ा नीचे सरकते हे उसके गुदाज नाराज निताबमभ उस इस्पात से सख्त अंग पर आ रुके. एक पल के लिए पूरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई. शरीर से चिपकी उस झीनी निक्कर के अंदर कोई और कपडा न था. नरम छूट को जैसे हे वह गरम और अनोखा एहसास हुआ, एक बूँद शबनम बहार निकल आई.

"तुम्हे भी ऊपर वाले ने बहोत फुर्सत से बनाया होगा. ऐसा नहीं है के मैंने खूबसूरत लड़कियां नहीं देखि लेकिन तुम में एक अलग कशिश, मासूमियत और नूर है जो हर किसी में नहीं होता. नींद में भी चेहरे पर दर्द और प्यार हर वक़्त दीखता है. पता नहीं मेरे जैसे आवारा भँवरे को ये हसीं गुलाब कैसे मिल गया."

"ये गुलाब सिर्फ इस भँवरे का हे है. फिर चाहे बहनवृ मेरे साथ रहे या कभी कभी आता जाता रहे. एंड ओने मोरे थिंग. यू अरे रियली वेल पैक्ड. तुम्हारा वह कुछ ज्यादा हे बड़ा है.", शर्माती हुई मुस्कान उसके सीने से लिपट गई. हिम्मत नहीं थी की फिर से वह अपने कूल्हे अर्जुन के हथियार पर टिका सके.

"अगर तुम नार्मल नहीं हो तोह तुम्हे प्यार करने वाला भी नार्मल नहीं होना चाहिए..", वह रेशमी बनियान सा कपडा आहिस्ता से मुस्कान के बदन से अलग करते हुए अर्जुन अपने नजरे उसके चेहरे पर हे रखे था. वह जानता था की मुस्कान सीधा अपना जिस्म उसके सामने नहीं परोस सकती. बेशक वह रोकेगी नहीं लेकिन ख़याल रखना भी जरुरी था. गोर सुडोल उभारो के ठीक बीच में रक्तिम लाल चूचक बहार की तरफ निकले अपनी हालत बता रहे थे. सिर्फ अर्जुन ने हे इन्हे चूहा था और वह उसका हे स्पर्श पसंद करते थे. शर्म से मुस्कान फिर से उसके सीने आ लगी.

"आठ.. बहोत तीखे है ये.", अर्जुन के सीने पर कठोर उभर चुभते हे उसको अलग हे मजा आ गया. लेकिन उसकी बात सुन्न कर मुस्कान की शर्म अपनी सीमा पर कर गई.

"गंदे हो. बहोत गंदे. यू क्नोव माय बूब्स नेवर फेल्ट अन्य इतर स्किन. लेकिन तुम्हारे पास आते हे ये किसी स्पाइक जैसे खड़े हो जाते है. Don't मोचक में एंड दो व्हाट यू वांट तो. इन्हे प्यार करो, मुझे प्यार करो और मेरे अंदर अपना नाम लिख दो अर्जुन. ये मुस्कान इतनी अकेली है की तुम्हारे आने से पहले ज़िन्दगी से हार चुकी थी. मुझे वापिस ज़िंदा कर दो अपने प्यार से, प्लीज.", इस बार उन झील सी आँखों में भरपूर पानी उभर आया था. अर्जुन भी समझ गया था के मुस्कान की ज़िन्दगी में उसके क्या मायने है.

"तुम्हे कभी एहसास नहीं होगा के तुम अकेली थी. अब से तुम्हारी तन्हाई सिर्फ मेरी है जहा हम दोनों होंगे. उसके बहार ये मुस्कान हमेशा वह मुस्कान रहेगी जिसको जीना आता है.", अर्जुन ने कमर को थामते हुए मुस्कान का सीना अपने चेहरे के सामने कर लिए. उसके आगे का सफर अर्जुन बखूबी जानता था. चेरी से लाल उभरे चूचक पर होंठो से कलाकारी करता वह कब मुस्कान के दर्द को हवा करता उसको इस प्रेम सागर में ले चला ये किसी को खबर न लगी. कमरे में बस मुस्कान की सिसकियाँ और अर्जुन का youn-gyaan हे कार्यरत्त थे.

"आह्हः... उम्म्म्म.. यू अरे इंसाने अर्जुन... आठ.. सूचक थम, बाईट.. आह.. गॉड I'm डाईंग... उम्म्म..", दोनों चूचक और स्टैनो का भरपूर मर्दन करते हुए अब वह उस मखमली कमर को चूम रहा था. किसी नागिन सी बलखाती मुस्कान इस चौड़े शरीर के नीचे कब आ गई उसको पता न चला. जल्द हे वह रेशमी चुस्त निक्कर कमरे के एक कोने में जा गिरी. गहरी साफ़ नाभि से 4 इंच नीचे कुदरत की वह अनमोल रचना थी जिसको अर्जुन ने भी ख्वाबो में नहीं देखा था. मुँह पर तकिया रखे मुस्कान हिम्मत नहीं जूता पा रही थी अर्जुन को देखने की.

"तुम सचमुच अलग हो मुस्कान.", गोरी लम्बी टांगो को फैलते हुए अर्जुन इस नायाब yon-kund को देख रहा था. दोनों सिलवट लिए गुलाबी होंठ आपस में बुरी तरह चिपके थे और छूट का ये हिस्सा सिर्फ 3 इंच लम्बा कटाव लिए ठीक गुदाद्वार से आधा इंच दूर ख़तम हो रहा था. अध्भुत्त. किसी की छूट मोटी, किसी की लम्बी. कोई घने बाल वाली तोह कोई सपाट चिकनी लेकिन तारा के बाद यही एक छूट थी जो बेजोड़ थी. इसके समकक्ष या ऊपर सिर्फ Ritu-Komal थी लेकिन तार्किक क्योंकि अर्जुन को प्यार उन दोनों के साथ आत्मिक था.

"मुझे कुछ नहीं पता. बस प्यार करो और ये सब तुम्हारा है.", अर्जुन की ऊँगली की वह मामूली रगड़ अपनी छूट पर महसूस करते हे मुस्कान सिसक उठी.
 
aka3829 और firefox420 भाई नदारद है. सब खैरियत है? और Story Collector भाई आपसे आग्रह है की अगर कुछ समय मिले तोह इंडेक्स अपडेट कर दीजियेगा.
 
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