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जवान Din-Haseen रात (2)
"इतनी बेक़रार हो?", अर्जुन ने भी जाली के साथ लकड़ी वाला भी दरवाजा बंद करने के बाद उस गदराई जवानी को बाहों में भर लिया. एक पल में समझ गया की बदन में नहाने के बाद वाली नमी है और अंदर सबकुछ आजाद. वो मॉटे सख्त सतांन भी और भारी नितम्भ भी. गुरदीप के हाथ भी अर्जुन की पीठ पर कस चुके थे.
"बता भी नहीं सकती की मेरी हालत क्या है. एक तोह पहली मुलाकात में हे दर्द दे दिया और उसके बाद इतनी लम्बी जुदाई."
"दर्द दिया था तोह? फिर तोह तुम्हे मेरे पास नहीं होना चाहिए.", अर्जुन वो 38 के मॉटे गद्देदार छुटतात मसलते हुए गुरदीप को जैसे सताने लगा.
"आह्हः.. दर्द वह नहीं, यहाँ दिया था. अब बातें मैट करो, बस वो प्यार दो जिस से मैं कुछ दिन वो कमी महसूस न करू. आह्हः...", पजामा इस गदराये मॉटे हिस्से पर ाचे से फंसा था और गुरदीप की हालत को समझते हुए अर्जुन उसको गॉड में उठाये चाचा वाले कमरे में चल दिया. गुरदीप ने दिल के दर्द की बात कही थी और अर्जुन अपने प्यार से वही दूर करने वाले था इस भोली सरदारनी का.
उस बड़े बिस्टेर पर आते हे उनका जोश परवान चढ़ गया. वो मखमली गदराई सरदारनी किसी तजा गुलाब सी महक बिखेरती खुद हे अर्जुन को अपने जिस्म पर गिरती हुई उसका चेहरा चूमने लगी थी. गुरदीप के वो मलाई से नरम और गुलाबी होंठ आखिर मिल हे गए अपने हरजाई के होंठो से. वो चुम्बन पुरकशिश से भरा जाने कब तक चला और अर्जुन के हांथो दोनों हे मॉटे गुब्बारे से चुके मसलवटी हुई गुरदीप खुद हे कमर को उचकने लगी.
"उफ्फ्फ.. सेहन नहीं होता yar..ummmm..", गुरदीप की तड़प और हालत देख अर्जुन एक पल अलग हुआ कपडे उतरने के लिए. दिन के उजाले में जल्द हे दोनों एक दूसरे के निर्वस्त्र आकर्षक बदन को निहारने लगे. गुरदीप के चेहरे पर आयी लाली और लुंड से नजरे हटाना बता रहा था के वो kaam-jwar में तपने के साथ अब शर्मा रही थी. सफ़ेद मॉटे चुके इतने भारी थे की शायद प्रियंका वाले पर्वत भी 19 थे इनके सामने. अर्जुन ने अपने सख्त लुंड पर गुरदीप की नरम हथेली रखते हुए झुक कर कहा.
"इस से हे शरमाओगी तोह ये बुरा भी मान सकता है. प्यार से पकड़ कर सहलाने से शायद ये तुम्हारा साथ दे.", अर्जुन की बातें असर करती उस से पहले हे गुरदीप ने वो हथेली के घेरे से मोटा मूसल कास के थाम लिया. आकर्षित तोह वो भी थी उस जानदार अंग से और वो सख्ती जैसे गहरा असर करने लगी. अर्जुन भी मस्ती में डूबा उन कठै निप्पल को मुँह में लिए एक मॉटे चुके को चुसकने लगा तोह गुरदीप ने भी जाएंगे खोल दी. तजा बाल साफ़ की हुई वो gori-gulabi छूट शहद टपका रही थी.
"ाःह.. आराम से यार.. बड़े सेंसिटिव हो गए है ये जबसे इन्हे तुमने पहली बार हाथ लगाया है. उफ़... और मैं भी कुछ देना चाहती हु आज तुम्हे.", एक हाथ से लुंड मुठियाती हुई गुरदीप दूसरे से अर्जुन के बाल सेहला रही थी. अर्जुन को अपने चुचो पर इतना आसक्त देख मजे के साथ हे गुरदीप मुस्कुरा रही थी. ऐसे दृश्य में जो कामुकता एक गरम लड़की के चेहरे पर आती है वो जैसे बिखर रही थी गुरदीप के चेहरे पर. अर्जुन बात सुन्न कर अलग होते हुए बगल में लेट गया. अब गुरदीप उसके सीने पर दोनों दूध टिकती आगे कहने लगी.
"वीडियो देखि थी मैंने वर्ल्डसेक्स पर कुछ दिन पहले. ये थोड़ा ज्यादा मोटा और बड़ा है लेकिन मैं वैसा हे करके देखना चाहती हु.", गुरदीप की आधी अधूरी बात भी अर्जुन समझ चूका था. वो निरंतर उस तगड़े मूसल को हिलती रही.
"साथ में करते है जिस से तुम्हे भी ाचा लगा.", अर्जुन सरक कर अब गुरदीप की मोटी चिकनी जांघो की तरफ आ गया. गोल नाभि से 6 इंच निचे हे वो पूरा मैदान चमक रहा था जहा फूली हुई छूट कॉमर्स से लबरेज महक रही थी. छूट को इन्तजार न करना पड़ा और अर्जुन की जीभ ने करामात दिखानी चालू कर दी.
"िष्ठ... ये क्या करने लगे आह्हः.. बाप रे.. उम्म्म्म.. माहहह.. ", गुरदीप ने फिर से लुंड को कब्जे में लेते हुए जोर से भींच लिया. अर्जुन ने छूट को ाचे से चूमते हुए चेहरा वही दबा दिया. ठुमकता हुआ लाल सूपड़ा हे गुरदीप को अपनी आहें बंद करने की उम्मीद दिखा. ये कामशाष्त्र की वही उनहत्तर वाली मुद्रा थी जो ख़ास प्रचलित न थी. गुरदीप को एक पल वो lisa-lisa सा स्वाद अजीब लगा लेकिन सब भुला कर वो भी लुंड को सुपडे से थोड़ा आगा तक अपने गीले गरम मुँह में उतार गयी. अगले 5 मिनट में हे उसका गार्द्रय जिस्म झटके लेने लगा और होंठ उस जरुरत से अधिक मॉटे लिंग पर कही जोर से लिपट गए. अर्जुन के अलग होते हे गुरदीप भी बिस्टेर पर पीठ के बल पसारती हुई गहरी सांसें लेने लगी. चुके कम्पन्न से थिरक रहे थे और अर्जुन ने सही वक़्त देखते हुए क्रिया आगे बढ़ने का निश्चय किया.
"हिम्मत रखना डीपी, दूसरी हे बार है और मुझे लगता है के दर्द जरूर होगा.", भारी जाँघे फैलते हुए अर्जुन ने पनियाई तजा स्खलित छूट के मुहाने सूपड़ा भिड़ते हुए गुरदीप को चेताया तोह लाल डोरो से भरी आँखें बताने के लिए बहोत थी की वो तैयार है.
"जिस्म तोड़ने से पहले मैट अलग होना.. आठ..", ऐसी हिम्मत देख अर्जुन भी पूरी तरह उस मांसल नरम जिस्म पर छ गया. होंठो को चूसते हुए एक करारे धक्के के साथ हे वो लगभग ांचुडी छूट चीरती चली गयी. 5 इंच की दुरी छूट के कॉमर्स और उत्तेजना की वजह से वो भीषण लुंड उस धक्के में तये कर गया.
"उननननंग्ग....", न चाहते हुए भी बंद होंठो के बीच से वो दर्द की आवाज बहार आ हे गयी, आँखों में आंसुओं के साथ. गुरदीप के लचीले बदन की हरकत अर्जुन की कमर पर टाँगे बांधने से नजर आयी. एक और धक्के ने गर्भ को हे चूम लिया. मॉटे dugdh-kalash पइसस चुके थे चौड़ी छाती टेल और छूट किसी परत की तरह लिपटी हुई उस मजबूत लुंड को महसूस करने लगी. ये हिम्मत गुरदीप की अर्जुन के प्रति गहरी चाहत साफ़ बताती थी. होंठो की हरकत होते हे अर्जुन भी हौले हौले उन रसभरे लबो का रास पीने लगा. कमर को हिलना ऐसा लग रहा था जैसे दरवाजे में धंसी कोई कील प्लास से निकली जा रही हो. आधे लुंड को बहार निकलते हे अर्जुन ने होंठ अलग कर लिया.
"फाड़ के तोह रख हे दी है.. आठ.. अब रुकना नहीं.. आठ.. सचमुच बहोत मोटा है यार तुम्हारा और अंदर तक लगता है.", गुरदीप की बोली बातें और आँखों में आये आंसू देख अर्जुन ने हलके से दोनों आँखें चूमते हुए बड़ी नजाकत से लुंड वापिस अंदर उतार दिया. छूट बुरी तरह फ़ैल चुकी थी लेकिन चिकनाहट ने साथ दिया.
"उस दिन तोह बस जोश में हो गया था डीपी.. हहह.. आज तुम्हे मैं आराम से प्यार करना चाहता था... बहोत टाइट है तुम्हारी लेकिन हिम्मत दिखाई.. बहोत सुन्दर भी हो..", अर्जुन ने दोनों पंजे उन गुब्बारे पर लगते हुए छूट को आराम से छोड़ना शुरू किया तोह गुरदीप दर्द के बावजूद मजा ले रही थी. उसकी छूट आज दूसरी हे बार लुंड ले रही थी जिस से हर धीमा घर्षण भी कही जोरदार लगता था. ऐसे हे इस सरल मुद्रा में चुदाई गति पकड़ने लगी थी और जल्द हे दर्द तेज सिसकियों में बदल गया.
"आठ... ऐसे हे करते रहो.. उम्म्म.. मुझे नहीं लगता के ाःह... कभी तुम्हारी जगह कोई और ले पायेगा.. Arjunn.nn ी लव यू..", गुरदीप kaam-sagar में तैरती हुई भी अपने दिल की चाहत उजागर कर रही थी. सच हे तोह था के उसके जिस्म के साथ आत्मा ने भी खुद को अर्जुन के हवाले कर छोड़ा था. अर्जुन के चेहरे को हर तरफ चूमने के बाद उसने खुद हे उसका चेहरा अपने एक मॉटे गुब्बारे पर टिका दिया. चुचो को चुसवाना भी ऐसा सुखदायी हो सकता है ये बस कुछ वक़्त पहले तक उसको न पता था और न कोई अनुभव था. ठंडक भरे कमरे में भी दोनों जिस्मो की गर्मी बढ़ हे रही थी. धीमी चुदाई अब बदल कर लम्बे और गहरे धक्को के साथ रफ़्तार लेने लगी थी. छूट ने दुरसी बार बाँध तोड़ते हुए रस बहाया तोह अर्जुन अलग हो गया. गुरदीप की उखड़ी हुई सांसें और बंद आँखें बता रही थी की वो कितना दुर्लभ चरम महसूस कर रही है. छूट में खालीपन का एहसास होते हे उसने अर्जुन को देखा.
"तुम बहोत हे प्यारी हो डीपी. मैं तुम्हारे साथ कही गलत तोह नहीं कर रहा?"
"बड़े आये गलत और सही बताने वाले. जिसमे सिर्फ प्यार और सुख हो, वो सही और गलत से परे है मिस्टर. अब मेरी बारी है.", तरबूज से मॉटे चुत्तड़ फैलाती वो अर्जुन के ऊपर आ चढ़ी. अर्जुन जवाब देता उस से पहले समूचे लुंड को अपनी गीली छूट में उतारती हुई गुरदीप ने वो लम्बी सिसकी लेते हुए मंशा स्पष्ट कर दी. इस खेल में अनुभवी न सही लेकिन जोश भरपूर था इस लड़की में. अब सचमुच मजे की बारी अर्जुन की थी और गुरदीप के मॉटे मॉटे उभर सीने पर रगड़ते हुए अपना काम करने लगे. सवेरे अलका के साथ अधुरु मिलान से उत्तेजित अर्जुन भी 10 मिनट में अकड़ने लगा था गुरदीप के निचे.
"आह्हः.. होने वाला है मेरा डीपी.. हटो..", गुरदीप इतना सुनते हे लुंड को बहार निकलती हुई अपनी गीली छूट से हे रगड़ने लगी.
"उफ़... मैं भी..", अर्जुन का वीर्य दोनों के जिस्मो के बीच हे बरस कर रह गया. अलग होते हे गुरदीप हंसने लगी.
"देखो क्या हालत है हम दोनों की. फिर से नहाना पड़ेगा.", दोनों के हे पेट कॉमर्स और वीर्य से सन्न चुके थे और गुरदीप के उठते हे अर्जुन की निगाह थिरकते विशाल कूल्हों और तरबूज सी लाल हो चुकी छूट पर पड़ी. मुर्झात हुए लुंड ने भी हरकत करके सहमति जताई की गुरदीप की वो ख़ास जगह पसंद आयी.
"जहा देख रहे हो मुझे पता है बच्चू. इसके लिए तुम्हे म्हणत करनी पड़ेगी क्योंकि वो तुम्हे चाहिए, मुझे जो चाहिए था उसके लिए मैंने म्हणत की. आज साथ हे नहाते है.", गुरदीप ने जिस कामुकता से अर्जुन को इशारा किया था वो झट्ट उठ कर उसके साथ बाथरूम में घुस गया. जो चाहिए था उसके लिए म्हणत तोह करनी हे थी.
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"अर्जुन से मिली थी जाने से पहले?", ऋतू के साथ इस वक़्त सिर्फ प्रीती हे थी यहाँ ऊपर Ritu-Alka के कमरे में और दोपहर के इस समय घर में जो भी हलचल थी उस से ये वाला हिस्सा अछूता था. हमेशा हे खिले गुलाब सी रहने वाली प्रीती इस वक़्त थोड़ी उदास थी और ऋतू से बेहतर संगिनी और कौन हो सकती थी जो ये उदासी न समझ सकती.
"पता हे नहीं था के वो पंजाब जा रहा है और आपके सामने हे तोह वापिस आये थे सब. माँ ने जब बताया तबतक तोह वो निकल भी चूका था. आप हे बुलाने आ जाती अगर आपको पता चल गया था तोह.", प्रीती ने एक रबर से अपने कंधे से निचे तक के बालो को बंधा हुआ था और आज वो सफ़ेद सलवार कमीज में थी, अपनी वेशभूषा के विपरीत. ऋतू ने भी एक छोटी सी काली बिंदी उस प्यारे चेहरे के माथे पर लगाने के बाद प्रीती की ठुड्डी के निचे हाथ रखते हुए जवाब दिया.
"मुझे पता होता तोह क्या मैं तुझे बताती नहीं? ऊपर से सुबह थोड़ा माहौल खराब हो गया था जिस से मेरा मूड भी डाउन हो गया. जाने से पहले अर्जुन आया था मुझसे मिलने और बोल कर गया था के मैं तुम्हारा ाचे से ध्यान राखु. कल वापिस आने के बाद वो तुम्हारे साथ ाचा टाइम बिताने वाला है. वैसे तुम्हे कही इस बात का बुरा तोह नहीं लग रहा की वह गाँव जाने की वजह से तुम दोनों मिल नहीं पाए?", अर्जुन द्वारा कही बातें ऋतू से सुन्न कर अब प्रीती के चेहरे पर भी ख़ुशी आ गयी थी. ऋतू ने वो ख़ास पायल की जोड़ी प्रीती के गोर पाँव में पहनाई तोह प्रीती की आँखों में हलकी सी नमी भी आ गयी.
"पता नहीं दीदी ऐसा लगता है के शायद मैं उतना प्यार अर्जुन को नहीं दे प् रही जितना वो करता है. और आपका प्यार मेरे साथ न होता तोह शायद मैं ज्यादा गलतियां कर जाती. ी लव यू सो मच एंड प्लीज ऑलवेज स्टे विथ में लिखे थिस, फॉरएवर.", ऋतू ने दोनों पायल पहनाने के बाद एक बार बैठे हुए हे प्रीती को गले से लगाया और उठ कर अलमारी से nail-polish निकलते हुए कहने लगी.
"तेरे साथ हे तोह रहना है साड़ी ज़िन्दगी और वैसे भी मेरे लिए तुम भी उतनी हे जरुरी हो जितना अर्जुन. यकीन करो तुम उसको उस से ज्यादा प्यार करती हो और इसका एक्साम्प्ले है तुम्हारा उसको हर रूप में स्वीकार करना. कैसा लगता है जब वो किसी और के साथ हो जबकि प्यार वो हमारा है? हम दोनों हे इस बात को ाचे से समझती है की अर्जुन ऐसा तबतक हे कर रहा है जबतक शरीर में बदलाव आ रहे है और हम फ़िलहाल रिश्ता बना नहीं सकते. जब तुम उसकी ज़िन्दगी में बीवी बन्न कर आ जाओगी न प्रीती, वो किसी की तरफ देखने वाला भी नहीं.", गोर हाथो की लम्बी उँगलियों के नाखून भी सही लम्बाई के साथ बेदाग़ थे प्रीती के. ऋतू ने एक हाथ को पकड़ते हुए पोलिश लगाने का उपक्रम किया तोह प्रीती हलके से मुस्कुराई. ऋतू उसका सचमुच बहिन से ज्यादा ख्याल रखती थी.
"मैं चाहती हु के पहले आप उसकी बीवी बने या फिर हम दोनों हे साथ में. और मुझे बुरा नहीं लगता अर्जुन को किसी और के साथ सम्बन्ध बनाने से क्योंकि वो पहल नहीं करता. और शादी के बाद आप ाचे से संभल लेंगी उसको."
"धत्त... उसके लिए तोह sunday-monday बनाने पड़ रहे है और तुम कहती हो मैं अकेली संभल लुंगी. वैसे शादी तुम्हे हे पहले करनी पड़ेगी प्रीती और ये मई किसी वजह से हे कह रही हु.", प्रीती एकटक ऋतू के उस गंभीर चेहरे को देखने लगी जहा एक पल पहले मुस्कराहट और शर्म थी.
"ऐसी क्या वजह है? बड़ी आप है तोह पहला हक़ भी आपका हे हुआ."
"तुम असलियत भूल रही हो मेरे और अर्जुन के रिश्ते की. शादी तोह जैसे तैसे हो हे जाएगी लेकिन इस घर में नहीं. तुम यहाँ की बहु बनोगी और मैं इधर से बहार जा कर. सफर अभी दूर है लेकिन ये बताना जरुरी था जिस से तुम्हे भी वैसे ढलने में परेशानी न हो. ये एक कड़वा सच है प्रीती की इस घर में मैं कभी भी अर्जुन की बीवी का दर्जा नहीं पाने वाली और मैं भी चाहती हु के यहाँ तुम एकमात्र बीवी और बहु रहो. वैसे इतना परेशां भी मैट होना ज्यादा सोच कर, बहोत साल पड़े है इस सबके लिए.", ऋतू फिर से पहले की तरह मुस्कुराने लगी थी और प्रीती की सोच को विराम लगा.
"वैसे मंजू भी 2 साल से पहले हे हमेशा के लिए इधर से जाने वाली है दीदी. अर्जुन ने पूरी कोशिश की है उसको खुश रखने की और वो है भी लेकिन अब जैसे वो खुद अपनी लाइफ को बदलने का सोच चुकी है. कितना अजीब हैं न ये सब और अर्जुन अगर उसको न संभालता तोह बहोत बुरा हो सकता था उसके साथ.", प्रीती ने यहाँ मंजू का जीकर किया तोह ऋतू ने दूसरे हाथ को पकड़ लिया.
"कैसे बुरा होने देता वो मंजू के साथ? वो अर्जुन से प्यार करती है तोह अर्जुन परवाह करेगा हे लेकिन मंजू जैसे अपने नए लक्ष्य बना चुकी है और अर्जुन भी उसका साथ दे रहा है जैसे तू. एक मजबूत व्यक्ति हे ऐसे फैंसले ले सकता है और हारने की जगह जीवन को और बेहतर बनाने की कोशिश करने वाली मंजू ने मुझे भी प्रेरित किया है. वैसे तेरी मामी भी आ रही है, जितना मैंने सुना है. विक्की से मिलने या फिर कुछ और वजह है?"
"हाहाहा.. विक्की से मिलने क्यों आएँगी वो? आज माँ की बात सुनी थी मैंने थोड़ी बहोत जब वो फ़ोन पर लगी हुई थी. उनको तोह मालूम है घर में किसी को ग्रीक नहीं आती लेकिन मुझे भूल गयी. वो मामी को सरप्राइज देने की बात कर रही है और इस बार मामी हफ्ते भर इधर रहने वाली है शादी में शामिल होने के साथ साथ.", प्रीती की बात में अभी भी रहस्य छुपा था.
"पूरी बात बता न, क्यों मजे ले रही है.", ऋतू को तोह पता हे था के प्रीती ऐसे हे बात आगे बढ़ाएगी.
"वो कह रही थी की उनके पास कोई है जो एक आइडियल लवर है, दिल और शरीर को ाचे से सटिस्फी करने वाला. ऐसा लवर जैसा मामी ने कभी खयालो में भी न सोचा हो और अगर मामी उनकी बात मानेगी तोह वो उनके साथ भी उसको शेयर कर सकती है. माँ की बातों से लगा था जैसा वो मामी से इस टॉपिक पर पहले भी थोड़ी बहोत बात कर चुकी है और मेरी सोच कहती है के माँ की लाइफ में ऐसा कोई भी नहीं है. चाहे पापा के साथ उनकी केमिस्ट्री अब ाची नहीं है लेकिन वो अपने काम पर हे फोकस रहती है और घर से बहार तोह कही जाती नहीं.", प्रीती बातों के साथ सवाल करने लगी थी लेकिन ऋतू की कुटिल मुस्कान देख आँखें बड़ी हो गयी.
"सहित. ऐसा इम्पॉसिबल है दीदी. Don't तेल्ल की माँ अर्जुन की बात कर रही थी?", प्रीती ने हे sawal-jawaab किया था हैरान होते हुए.
"और कौन हो सकता है जरा खुद हे सोच? वैसे अर्जुन ने ऐसा कुछ किया तोह नहीं है जितना मैं उसको जानती हु तोह आंटी का ऐसा कहना समझ नहीं आया. और तुम्हारी मामी क्या निम्फो है जो सिर्फ ऐसी बात पर इधर आने वाली है? जरूर मसला कुछ और हे है प्रीती क्योंकि आंटी ने आजतक तोह अर्जुन के सामने ऐसी वैसी हरकत नहीं की. तुम जरा अब थोड़ा ध्यान रखना के वो उधर आता है तोह उनकी रिएक्शन और एक्सप्रेशंस कैसे रहते है. लेकिन खबर धमाकेदार है. तुम्हारी मामी तोह खुद हे चलती फिरती आग है और आंटी भी कुछ काम नहीं."
"छियई... माँ ऐसा वैसा नहीं करने वाली अर्जुन के साथ."
"ड्राइंग याद नहीं है क्या? आंटी कहती नहीं क्योंकि वो काम्प्लेक्स है थोड़ी जिसको समझना अलका और मेरे लिए भी फ़िलहाल मुश्किल हे है पर उनके जज्बात दिख हे जाते है अगर ध्यान दिया जाए. उन्हें दिलचस्पी तोह हैं अपने दामाद में लेकिन वो एक्सप्रेस नहीं करती.", ऋतू की बात से प्रीती को भी वो चित्र याद आ गए जिन्हे रोमिला ने बड़ा सहेज कर रखा हुआ था और कितने बेहतरीन बनाये गए थे वो.
"हम्म्म.. सही कहा आपने और मैंने हे गौर नहीं किया इस बात पर. मामी के बारे में जान ने के लिए अब विक्की की हे मदद लेनी पड़ेगी. वो अपने आप हे एक अलग समस्या है.", प्रीती ने विक्की का जीकर किया तोह ऋतू हंसने लगी.
"क्यों उसको तड़पा रही है यार? उसकी हालत भी समझ और वैसे भी हसरत पूरी करना भारी पड़ने वाला है विक्की को. हाहाहा."
"हंस लो आप लेकिन बात उसको रोकने की नहीं है. माँ के होते हुए अगर ऐसा कुछ हुआ न तोह बात बिगड़ जाएगी और विक्की बेशक यूनिवर्सिटी स्टूडेंट है और उम्र में भी बड़ी लेकिन आज तक वर्जिन है. अर्जुन के साथ कुछ भी उल्टा हुआ जो की होना निश्चित है, मैं भी फसूंगी और अर्जुन भी. माँ को विक्की से बहोत लगाव है और यहाँ वो उनकी जिम्मेवारी है. उनके जाते हे मैं विक्की को नहीं रोकने वाली. मेरी तरफ से तोह चाहे वो करे क्योंकि तब जिम्मेवार वही होगी."
"वो अभी तक वर्जिन है?"
"हैरानी वाली क्या बात है इसमें? आधे से ज्यादा ग्रीक लड़कियां जिसके साथ कमिटेड होती है वो लाइफ टाइम उसके साथ हे रहती है. विर्जिनिटी एक सिंबल है प्यार पर ट्रस्ट का और बॉटनिस्ट जैसी बोरिंग विक्की की लाइफ में कभी उतना ख़ास लड़का आया हे नहीं. इसलिए तोह मुझे माँ का डर है, कही अर्जुन को हे न कह दे की वो विक्की से शादी कर ले अगर दोनों ने वो सब किया toh.",Preeti ने एक और ाची बात बताई थी ग्रीस की लड़कियों के बारे में और उनके प्यार पर विश्वास की.
"फिर विक्की को कर राजी और जान ने की कोशिश कर उसकी माँ के बारे में.", ऋतू अभी आगे और भी कुछ बताती उस से पहले हे अपने नाम की आवाज सुन्न कर उठ कड़ी हुई. कोमल दीदी ने पुकारा था उसको निचे से.
"चल यार निचे हे चलते है. और दुपट्टा ऐसे ले, बहनजी की तरह नहीं. हाँ.. अब लगी तोह प्रीती शर्मा.", हँसते हुए ऋतू ने प्रीती को छेड़ा लेकिन जवाब में वो भी मुस्कुरा रही थी.
"अब जो हु तोह वही लगूंगी न.. थैंक यू सो मच अपनी पायल देने के लिए और इस सबके लिए भी."
"मुझे थैंक यू नहीं चाहिए, किश करने दे बस एक.", ऋतू अब कामयाब रही थी प्रीती को तंग करने में.
"की... कुछ भी बोलती रहती हो आप. चलो निचे और फ़िलहाल थैंक यू से हे काम चलाओ. कल अर्जुन को किश कर दूंगी तोह उस से हे ले लेना मेरी किश.", प्रीती भी अब कहा पहले जैसी रही थी. ाचा जवाब दे कर वो ऋतू के साथ हे निचे चली आयी जहा पहले से हे रोमिला रेखा और कृष्णा के पास बैठी थी. तीनो के साथ साथ कौशल्या जी भी कमरे से बहार आती हुई प्रीती को देख कर रुक हे गयी. वो इस रूप में कमाल की लग रही थी, ऋतू से बराबर टक्कर लेती एक खूबसूरत हिंदुस्तानी यौवना.
"देख ले रोमिला, ये अभी से मेरी चाहत पूरी कर रही है. नजर न लगे मेरी बची को.", यहाँ भी कौशल्या जी ने प्रीती को नजर का टिका ऋतू की आँखों के काजल से करते हुए जैसे कुछ साबित हे किया. एक दूसरे की पूरक जो थी ये दोनों.
"सचमुच आंटी जी, प्रीती कही से भी वैसी नहीं लग रही जैसी हमेशा दिखती है. रेखा, ये दोनों हे एक साथ कितनी ाची लग रही है न? और ये पायल कब ली तुमने प्रीती?"
"माँ, ये ऋतू दीदी ने दी है. उन्होंने हे सूट भी दिलवाया था और अब मैं ऐसे हे ढेर सारे सूट लेने वाली हु.", प्रीती चलती हुई अपनी माँ और रेखा जी के बीच हे बैठ गयी. ऋतू ने यही खड़े हुए हे अपनी दादी के गले में पीछे से बाहें दाल दी. कौशल्या जी ने भी हर बचे को बराबर प्यार दिया था लेकिन लड़कियों में जहा ऋतू उनके दिल के करीब थी वही पौटे दोनों हे सामान रूप से ख़ास. अर्जुन छोटा था इसलिए हे उसकी ज्यादा परवाह करती थी लेकिन फिर भी उन्हें मान था तोह बस ऋतू पर. ऋतू भी अपनी दादी के हे सामान थी गुणों और काम में.
"देख रही हो दादी ये लड़की हर तरह से आपकी बहु बन्न ने के लायक है.", धीमी आवाज में ऋतू ने अपनी दादी के काम में कहा था. कृष्णा जी भी बड़े स्नेह से उधर प्रीती की भोली बातें सुन्न रही थी. इधर कौशल्या जी के चेहरे के भाव तोह ऋतू न देख पायी लेकिन जवाब ने सोचने पर मजबूर कर दिया.
"वो तोह बहु बनेगी हे इस घर की लेकिन तेरा साया उस पर हमेशा रहना चाहिए. मैं से ये भोली भली है, sahi-galat की ज्यादा पहचान भी नहीं इसको. तू मेरी समझदार बेटी है जो दुनिया को सबसे बेहतर समझती है उम्र के हिसाब से. भगवन तुम दोनों का प्रेम ऐसे हे बरक़रार रखे.", कौशल्या जी इतना बोल कर थोड़ा पलटी तोह जैसे वो गले हे लग गयी थी एक पल के लिए. फिर अलग हुई तोह कोमल दीदी की आवाज सुनाई दी.
"दादी, आपने तोह कहा था ऋतू को बुलाने के लिए. बात हे भूल गयी क्या आप?"
"हाँ ाचा याद करवाया तुमने. ऋतू, तू जरा मेरे साथ चल स्कूटरी पर ये अगली मार्किट तक."
"दादी, आप क्यों तकलीफ करती हो. जो लेके आना है वो मैं हे ले आती हु प्रीती या रुपाली के साथ जा कर."
"दादी मैं हु या तू है? जब जाना मेरा जरुरी है तभी तोह कह रही हु. कपडे बदलने है तोह बदल ले, वैसे ये भी ठीक है. मैं पर्स लेके आयी.", उनकी बात सुन्न कर ऋतू तुरंत अपनी माँ के कमरे में चली गयी और बहार आयी तोह सलवार कमीज के साथ अब पाँव में जूती और आँखों पर अर्जुन द्वारा आज सुबह दिया 'एविएटर' चस्मा था पूर्ण श्याम रंगत का, डंडी समेत. उसको ऐसे देख कर कृष्णा जी भी पालक झपकना भूल गयी और ऋतू हाथ हिलती हुई मुस्कुराते हुए गलियारे से बहार वाले आँगन में.
'Dug-dug' की ये आवाज घर में सिर्फ अर्जुन के होने पर सुनाई पड़ती थी और इस वक़्त संजीव भी घर न था जो उस मोटरसाइकिल को चालू करता. कोमल दीदी के साथ हे प्रीती भी बहार चली आयी जैसे उसको पता था के ये कौन होगा. सामने ऋतू हे अर्जुन की रानी पर सवार दिखी तोह कोमल दीदी का चेहरा अजीब सा हो गया. प्रीती हंस रही थी.
"ये क्या शरारत सूझी तुम्हे?"
"उन्हें आती है ये चलनी दीदी. अर्जुन खुद हे सिखाता रहा है और अब वो चला लेती hai.",Preeti के ऐसा कहने पर ऋतू ने भी चस्मा थोड़ा निचे करते हुए बड़ी बहिन को आँख मारी और दुपट्टा गले में एक तरफ घूमते हुए कमर की और से बांध लिया. इधर कौशल्या जी के साथ साथ रामेश्वर जी भी चले आये थे क्योंकि ये शोर उन्हें भी पता था. लेकिन प्रीती की बात सुन्न कर वो भी मुस्कुरा दिए.
"संभल कर लेके जाना बीटा थानेदारनी को. वैसे भी स्कूटरी पर तोह ये जांचने नहीं वाली थी.", पंडित जी के स्वीकारने पर अब कोमल दीदी खुद भी मुस्कुरा उठी. कौशल्या जी भी पायदान पर पांव टिकती ाचे से बैठी और ऋतू ने गियर दाल कर 'रानी' को आगे बढ़ा दिया. ये घटना सबके लिए हे चौकाने वाली थी सिवाए प्रीती के.
"तुम्हे नहीं सिखाया अर्जुन ने मोटरसाइकिल चलना?", रामेश्वर जी के स्वर में हास्य का पट था और प्रीती भी मुस्कुराते हुए बोली.
"दादा जी, मेरे लिए तोह ड्राइवर रखने का फरमान है न अंकल (शंकर) की तरफ से. वैसे भी मुझे चलने का शौक नहीं है."
"वह पुत्तर जी, अहो भाग शंकर के. सीखने तोह क्या देना ऊपर से नाकारा बनाने की सिफारिश और कर दी. तुम्हे अब कार सीखनी चाहिए बिटिया क्योंकि जरुरत कभी भी पड़ सकती है. जैसे अभी न अर्जुन है, संजीव और तारा भी नहीं है. ये ऋतू भी चली गयी और ऐसे में जरुरी जाना पड़े तब? ड्राइवर पर विश्वास क्या करना जब वो भी आपकी हे गाडी चला रहा हो, तनख्वाह के बदले. हम ज्यादा सेफ अपने हे हाथो महसूस करते है न?", पंडित जी ने बड़े हे पते की बात की थी और प्रीती को भी लगा के सचमुच कार चलनी आणि हे चाहिए, ड्राइवर हो या न हो लेकिन खुद के लिए हे सही.
"तोह सीखने के लिए आपको कहु या दादू को?"
"कल से मुनीर ले जाया करेगा तुम्हे और फिर तारा तुम्हारा हाथ साफ़ करवा देगी. सीखना जरुरी है, ड्राइवर तोह तुम्हे मिलेगा हे जैसा शंकर ने कहा. ाचा अब एक बार अपने दादू को भी बुला लाओ, जरुरी बात करनी है.", रामेश्वर जी इतना कह कर अंदर चले गए और कोमल अभी भी वही प्रीती के पास कड़ी थी.
"अब लग रहा है न के मोटरसाइकिल भी सीख लेनी चाहिए थी?"
"क्या दीदी. मुझे कभी भी मोटरसाइकिल नहीं सीखनी, पीछे बैठना ज्यादा सही है. हाँ कार जरूर सीखूंगी और आपके पास टाइम हो तोह साथ हे चलना, रेखा माँ से मैं खुद बात आकर लुंगी.", प्रीती के इस प्रस्ताव को दीदी ने हँसते हुए मन कर दिया.
"साथ चलने में कोई हर्ज़ नहीं है लेकिन ड्राइविंग नहीं सीखनी. वैसे तुम भूल रही हो के दादा जी ने कुछ कहा है तुम्हे."
"आ कर बात करती हु आपसे तोह main.",Preeti भी हंसती हुई अपने दादा जी को बुलाने निकल चली और कोमल दीदी वापिस अंदर. उन्हें अभी हैरत हो रही थी की ऋतू वो bhari-bharkam मोटरसाइकिल चलने लगी थी और अर्जुन हे सीखा रहा था उसको.
'इनका प्रेम ना जाने और क्या क्या करतब करेगा. दोनों पागल हे है और जानती हु के ये अर्जुन की फरमाइश हे होगी की ऋतू सीखे ये सब.' खुद से हे वो ये कही जा रही थी और मुस्कुरा भी रही थी.
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यहाँ सांगवान के फार्महाउस पर तोह आज 3 बजे हे महफ़िल चालू हो गयी थी, वो भी घने वृक्षों के छाया टेल. नरिंदर और उमेद ने 2 मुर्गे अलग अलग तरीके से पकाये थे जिनको जरुरत अनुसार पतीली और देगची से निकल कर ये सब खाने के साथ गिलास भी खडका रहे थे. सारा तामझाम जमीन पर हे दरी बिछा कर हो रहा था. जाम गुलाटी बना रहा था और soda-baraf का जिम्मा दलीप के हाथ. परमवीर ने 2 बड़ी प्लेट सलाद काट लिया था इस बीच और अब जाम के साथ साथ मजेदार बातें भी चालू हो गयी.
"ऐसा हे भाई लोगो, हम सभी आपस में सालो से एक दूसरे के साथ है. एक दूसरे को thik-thaak जानते है तोह मेरी मंशा है के पहचान थोड़ी और बधाई जाए.", सांगवान की इस बात पर भुप्पी ने तोह बिना सोचे सहमति दे दी और जो खेल वो खेलने वाला था उसका अंदेशा बाकी सभी को भी हो गया.
"जान पहचान बढ़ाना तोह बढ़िया खेल है लेकिन जाट भाई, सवाल दर्द भरे न हो.", नरिंदर ने जैसे कुछ सोच कर ये कहा और सभी ने सहमति में एक एक लम्बी घुट शराब की निचे उतार ली.
"इन्दर जानी, मैं न बावली गांड जरूर हु लेकिन इतना भी नहीं के hansi-khushi के माहौल की माँ छोड़ दू. ये रोस्टेड चिकन की कसम दोस्त, ऐसी चुटिया बात नहीं करेंगे जिस से दिल दुखे. इसकी कसम इसलिए क्योंकि आज तक का सबसे बेहतरीन मुर्गा खाया है तेरे भाई ने और उमेद भाई बहोत धन्यवाद् इसके लिए. लुगाई होते तोह हाथ चूम लेता, दैत्य हो तोह दूर से हाथ जोड़ कर शुक्रिया.", इस बात पर सभी के ठहाके गूँज उठे. यही तोह यारी दोस्ती है जिसमे कोई स्वार्थ नहीं और उम्र बढ़ने पर कही ज्यादा हे गहरी.
"चल तू शुरू तोह कर क्या खेल खेलना है.", ये शंकर ने कहा और सांगवान ने बीच में एक थाली रख दी.
"बात ऐसी के खेल तोह विदेशी है पर इसमें देसी तड़का लगा दिया गया है ma-badolat श्री श्री 2016 परमवीर जी सांगवान जी ने. बोतल का धक् जिसकी कानि (तरफ) रुकेगा वो सवाल करेगा और बाकी सब लोग जवाब देंगे. मतलब एक सवाल और सबके जवाब उसके हे अनुसार."
"भोस्डिके जाट, तू न सुधारियो. अपने नाम के साथ गाँव, पिनकोड, तहसील भी बता देता. चल घुमा इस बोतल को और देखे किसके हाथ में लगाम आती hai.",Shankar उत्साहित था और जाम खली करके गिलास निचे टिका दिया. उधर सभी की नजर थाली में पड़ी गोल बोतल पर थी और संगवानी ने उसको फिरकी की तरह घुमा दिए. आखिर में वो आ रुकी मेहुल गुलाटी के सामने.
"लग गए लोडे जो इस पंजाबी की बारी आ गयी.", भुप्पी को जैसे इसकी जरा उम्मीद न थी.
"तेरी हे गांड मरता हु देखता रह.", बात कहने के साथ हे एक टुकड़ा मीट का चबाते हुए जाम भी हलक में खली करके गुलाटी ने मुँह साफ़ किया.
"आज तक कितनी लड़कियों से सम्बन्ध बनाये है? बाकि सभी भी जबतक गिनती कर हे लो भाई लोगो, भुप्पी के बाद सबका नंबर चक्की चलने के हिसाब से आने वाला है.", गुलाटी ने पहले हे सवाल में बम फोड़ दिया था.
"4. आज तक 4 के साथ भाई लेकिन शादी से पहले थी जो बाकि 3 थी.", भुप्पी के जवाब के साथ हे अब खेल शुरू हो चूका था. दलीप ने सबके जाम फिर से बनाने शुरू कर दिए जैसे वो ध्यान हटाना चाहता हो.
"भाई मेरा तोह कोई आईडिया हे नहीं है लेकिन तू 50 मान हे ले जिनमे से 20 तोह रुस्सियन हे होंगी.", ये स्वर था परमवीर सांगवान का और अब इन्दर देख रहा था उसको हैरानी से. ये सफेदपोश डॉक्टर 50 महिलाओ और युवतियों के साथ सम्बन्ध बना चूका था. अगली बरी थी दलीप की और उसको चेताया उमेद ने.
"दलीप भाई, जवाब दो जरा.", उमेद की हंसी से दलीप थोड़ा शर्मिंदा हो गया.
"वो मेरी बीवी से पहले 15 के करीब और शादी के बाद बस 4. टोटल 20."
"शादी के बाद 4 तोह ऐसे कह रहे हो जैसे बड़ी लाचार ज़िन्दगी है. 4 भी काम होती है क्या?", नरिंदर ने भी चुटकी ली तोह दलीप बगले झाँकने लगा. उसके बराबर बैठे हुए शंकर की तोह अभी तक गिनती चालू थी.
"ओह जल्लाद, तू भी फूट पड़ कितनी सील खोली है आज तक.", सांगवान अभी तक तोह सबसे आगे था गिनती में.
"सील तोह ज्यादा न खोली मैंने कोई 25-26 हे होंगी जो पहली बार हे कर रही थी. हाँ नर्स और डॉक्टर को मिला कर कोई 150 मान हे लो. रंडी इनमे से कोई नहीं थी.", अब उमेद के भी कान गरम हो गए ये आंकड़ा सुन्न कर. शनकर तोह ऐसे मुस्कुरा रहा था जैसे वर्ल्ड कप जीत लिया हो.
"यार गुलाटी जवाब तू तुझे भी देना पड़ेगा सबके बाद.", ये बात भुप्पी ने कही तोह गुलाटी ने हामी भर दी.
"अब भाई इन्दर तू भी बोल दे जरा. हैं तोह तू भी शंकर का सागा भाई और हमदम.", गुलाटी के कथन पर उमेद और नरिंदर दोनों हे हंसने लगे वही शंकर खिसिया कर इधर उधर देखने लगा.
"भाई 2. एक शादी से पहले और एक जिसके साथ शादी की है बस वही. पहले वाला सम्बन्ध भी मेरी तरफ से नहीं था और मैं अपनी कृष्णा के साथ सुखी हु.", नरिंदर का जवाब हतप्रभ करने वाला था और ये उत्तर उमेद के साथ शंकर भी जानते थे. शंकर को उम्मीद नहीं थी की इन्दर उस एक सम्बन्ध को भी यहाँ उजागर करेगा जो विवाह से पहले बनाया गया था.
"क्या बात भाई? शंकर के तोह कॉलेज में हे दर्जन पार हो चुके थे तोह तुम कैसे कोरे रह गए?", भुप्पी के सवाल पर दलीप भी जान न चाहता था.
"ऐसा है भूपिंदर भाई के पहले कभी उस तरफ ध्यान हे नहीं गया था और जब गया तोह jiwan-sangini हे बना लिया उसको. और सचमुच मुझे कभी कोई कमी महसूस नहीं हुई, उल्टा मेरी बीवी ने हे मुझे उस प्यार से बहार न आने दिया जिस से हम दोनों आजतक बंधे है. शरीर हे तोह है, एक क्या और 100 क्या लेकिन प्यार और समर्पण है तोह वो एक हे बहोत है. जानते हो मेरे दोस्त भी उँगलियों से काम रहे है क्योंकि शादी तक तोह ये दोनों हे हमेशा साथ रहे मेरे तोह और किसी की जरुरत हे महसूस नहीं हुई.", नरिंदर ने बताया था की सही जीवन का असली मंत्र ज्यादा आंकड़ों में नहीं बल्कि बेहतर साथी से है.
"वाह भाई. गज़ब इंसान हो यार तुम तोह. इसलिए हे तोह हमने ये खेल खेलना ाचा समझा. दोस्ती में हमको एक दूसरे का बेहतर पता होना चाहिए जिस से कभी तुम्हारे सामने गलत स्थिति न पैदा हो. खैर अब बारी आती है अपने दैत्य भाई साहब की.", सांगवान के इतना कहते हे उमेद ने बस एक ऊँगली उठा दी.
"एक और वही श्रेष्ठ है भाई अपने लिए तोह. सच कहु तोह मैं न हे कामुक इंसान हु और न मेरी संगिनी ने कभी अधूरा हे छोड़ा मुझे. यहाँ बैठे सभी दोस्तों में से विवाह भी मेरा हे पहले हुआ होगा, दलीप भाई के बाद. और विवाह से पहले तोह हम लोग बस भोले के प्रहरी भर रहे है ऐसे कामो में.", उमेद ने जैसे हे निगरानी वाली बात कही तोह शंकर भी हंसने लगा. खेत खलिहान वाले उस पुराने दौर में यही लोग तोह उसको ऐसा स्थान देते थे जहा शंकर गर्मी निकल सके या प्रेमिकाओ से मिल सके.
"वाह वाह.. बहनचोद ये है भाईचारा तोह. वैसे पंजाबी अब तू भी तेरे नंबर बता दे.", सांगवान ने मुर्गे की बोटी उधेड़ते हुए आँखे ऊपर निचे करके मेहुल को उसकी बारी याद दिलाई.
"100 से 10 ऊपर निचे. अब ये शंकर महाराज की किरपा है जो पहला ज्ञान भी इन्होने हे दिलवाया था और आज भी मौका दिलवाते रहते है. बाकी घरवाली आज भी साथ दे देती है जब कभी बहार मूड न हो तोह.", गुलाटी के आंकड़े भी उम्मीद से कही ज्यादा हे थे. उसको पूरा गिलास एक बार में खली करते देख बाकी सभी ने वैसा हे किया. दोस्त थे और जाम तक एकसाथ खली करना जैसे एक रिवाज था अब.
"बाप आ गया बहनचोद. और इन्हे बताया किसने यहाँ के बारे में?", सांगवान की गांड हे उधड़ गयी उस काली मेरसेदेज़ जीप को गेट से अंदर आते देख. शंकर ने हाथ के इशारे से वैसे हे बैठने को कहा और दलीप पेग बनाने जुट गया फिर से.
"बाप हे है भाई, कितनी बार दारू पी है गिनती भी याद नहीं. चाचा कुछ नहीं कहने वाले.", और धर्मवीर सांगवान जी इनकी हे और चले आये, तीसों को साथ लिए.
"ये नकली जाट साला गांडू अपनी बेबे (बहिन) को लारा लगा कर यहाँ murga-daaru उधेड़ रहा है. सांझ हो गयी और ऋचा तेरे गोली मारेगी जाते हे. दलीप बीटा मेरा भी पेग घायल (दाल). मुर्गे की शोरूम (खुसबू) तगड़ी आ रही है.", जूती उतार कर वो भी नरिंदर की बगल में आ बैठे.
"बेबे ने क्या काम कहा था इसको? ये तोह बोलै की आपने पार्टी करने की इजाजत दी है तोह हमने बोतल खोल ली. नहीं तोह दिन में कभी दारु पीते देखा आपने मुझे.", शंकर जैसे ऐसे हे मौके की तलाश में था.
"पापा यु भड़कान लग रहा है."
"पता है बीटा तुम सारे कितने हे लायक हो. कुछ लोग इधर आराम करने आये थे और बाकी चिकित्सक shagal-mela करने पहुंच गए. निक्कम्मो मान लिया के कभी कभी aish-masti करनी चाहिए लेकिन पता तोह हो. ये भुप्पी बता के आया था मुझे की कहा जा रहे हो तुम लोग तोह समझ गया पार्टी होगी."
"वैसे आप तोह इस वक़्त घर हे होते हो.", गुलाटी के ऐसा कहने पर उन्होंने एक घूँट भरते हु बुरा सा मुँह बनाया.
"बेटी ने घर से लिकाड दिया तोह सोचा गम मिटने के लिए मैं भी तुम लोगो से कुछ जाम उधार मांग लू. वैसे मुर्गा गज़ब बनाया है जिसने भी बनाया है.", नरिंदर उनकी बात सुन्न कर हंस रहा था. ऐसे हे मस्तमौला इंसान थे धर्मवीर सांगवान जी. बचो के साथ कब बचा और कब बाप बन कर रहना है उन्हें ाचे से पता था.
"पापा ये वाला उमेद ने और जो आप खा रहे हो वो इन्दर ने बनाया है. जमा मलाई बर्गा नरम और क्या मसाले है. आठ.. मजा आ गया."
"भाई इन्दर, तुम और उमेद न ऐतवार (संडे) शाम मेरे साथ बैठो. सीखा भी देना और हम तीनो गुफ्तगू भी कर लेंगे.", यहाँ मेल मिलाप का दौर अब लम्बा चलने वाला था और घर की चिंता इनमे से किसी को न थी.
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5 बजे कार से अर्जुन अपनी दोनों बहनो को लिए मोडल टाउन की इस बड़ी मार्किट में आ चूका था जहा उन्हें अपने कपडे और घरवालों द्वारा बताया सामान खरीदना था. गुरदीप के साथ ाची खासी म्हणत करने के बाद वो डेढ़ घंटा सोया था और गुरदीप अपने घर पर अभी तक बिस्टेर पे थी.
"आप लोग यही मिलना मैं आधे घंटे से पहले हे आ जाऊंगा. ये पैसे माँ ने दिए थे, सामान के लिए.", अर्जुन ने कार में बैठे हुए हे अलका के पर्स में वो नोटों की गद्दी डालते हुए हिदायत दी और दोनों को दूकान तक जाते देखता रहा. ये वही जगह थी जहा आरती और प्रियंका दीदी ने उसको वो आधुनिक कपडे ले कर दिए थे. गुरुद्वारे साहिब के सामने से कार को जगतार उर्फ़ जग्गी भाई के घर की ले जाता वो अब जसलीन का ध्यान कर रहा था. पिछली बार जाने से पहले जो प्यार वो जसलीन में जगह गया था क्या वो आज भी कायम होगा या हालात अलग होंगे? फ़ोन पर हमेशा हे बात अस्पष्ट होती थी चाहे वो 3-4 बार बात कर चुके थे.
जवान Din-Haseen रात (2)
"इतनी बेक़रार हो?", अर्जुन ने भी जाली के साथ लकड़ी वाला भी दरवाजा बंद करने के बाद उस गदराई जवानी को बाहों में भर लिया. एक पल में समझ गया की बदन में नहाने के बाद वाली नमी है और अंदर सबकुछ आजाद. वो मॉटे सख्त सतांन भी और भारी नितम्भ भी. गुरदीप के हाथ भी अर्जुन की पीठ पर कस चुके थे.
"बता भी नहीं सकती की मेरी हालत क्या है. एक तोह पहली मुलाकात में हे दर्द दे दिया और उसके बाद इतनी लम्बी जुदाई."
"दर्द दिया था तोह? फिर तोह तुम्हे मेरे पास नहीं होना चाहिए.", अर्जुन वो 38 के मॉटे गद्देदार छुटतात मसलते हुए गुरदीप को जैसे सताने लगा.
"आह्हः.. दर्द वह नहीं, यहाँ दिया था. अब बातें मैट करो, बस वो प्यार दो जिस से मैं कुछ दिन वो कमी महसूस न करू. आह्हः...", पजामा इस गदराये मॉटे हिस्से पर ाचे से फंसा था और गुरदीप की हालत को समझते हुए अर्जुन उसको गॉड में उठाये चाचा वाले कमरे में चल दिया. गुरदीप ने दिल के दर्द की बात कही थी और अर्जुन अपने प्यार से वही दूर करने वाले था इस भोली सरदारनी का.
उस बड़े बिस्टेर पर आते हे उनका जोश परवान चढ़ गया. वो मखमली गदराई सरदारनी किसी तजा गुलाब सी महक बिखेरती खुद हे अर्जुन को अपने जिस्म पर गिरती हुई उसका चेहरा चूमने लगी थी. गुरदीप के वो मलाई से नरम और गुलाबी होंठ आखिर मिल हे गए अपने हरजाई के होंठो से. वो चुम्बन पुरकशिश से भरा जाने कब तक चला और अर्जुन के हांथो दोनों हे मॉटे गुब्बारे से चुके मसलवटी हुई गुरदीप खुद हे कमर को उचकने लगी.
"उफ्फ्फ.. सेहन नहीं होता yar..ummmm..", गुरदीप की तड़प और हालत देख अर्जुन एक पल अलग हुआ कपडे उतरने के लिए. दिन के उजाले में जल्द हे दोनों एक दूसरे के निर्वस्त्र आकर्षक बदन को निहारने लगे. गुरदीप के चेहरे पर आयी लाली और लुंड से नजरे हटाना बता रहा था के वो kaam-jwar में तपने के साथ अब शर्मा रही थी. सफ़ेद मॉटे चुके इतने भारी थे की शायद प्रियंका वाले पर्वत भी 19 थे इनके सामने. अर्जुन ने अपने सख्त लुंड पर गुरदीप की नरम हथेली रखते हुए झुक कर कहा.
"इस से हे शरमाओगी तोह ये बुरा भी मान सकता है. प्यार से पकड़ कर सहलाने से शायद ये तुम्हारा साथ दे.", अर्जुन की बातें असर करती उस से पहले हे गुरदीप ने वो हथेली के घेरे से मोटा मूसल कास के थाम लिया. आकर्षित तोह वो भी थी उस जानदार अंग से और वो सख्ती जैसे गहरा असर करने लगी. अर्जुन भी मस्ती में डूबा उन कठै निप्पल को मुँह में लिए एक मॉटे चुके को चुसकने लगा तोह गुरदीप ने भी जाएंगे खोल दी. तजा बाल साफ़ की हुई वो gori-gulabi छूट शहद टपका रही थी.
"ाःह.. आराम से यार.. बड़े सेंसिटिव हो गए है ये जबसे इन्हे तुमने पहली बार हाथ लगाया है. उफ़... और मैं भी कुछ देना चाहती हु आज तुम्हे.", एक हाथ से लुंड मुठियाती हुई गुरदीप दूसरे से अर्जुन के बाल सेहला रही थी. अर्जुन को अपने चुचो पर इतना आसक्त देख मजे के साथ हे गुरदीप मुस्कुरा रही थी. ऐसे दृश्य में जो कामुकता एक गरम लड़की के चेहरे पर आती है वो जैसे बिखर रही थी गुरदीप के चेहरे पर. अर्जुन बात सुन्न कर अलग होते हुए बगल में लेट गया. अब गुरदीप उसके सीने पर दोनों दूध टिकती आगे कहने लगी.
"वीडियो देखि थी मैंने वर्ल्डसेक्स पर कुछ दिन पहले. ये थोड़ा ज्यादा मोटा और बड़ा है लेकिन मैं वैसा हे करके देखना चाहती हु.", गुरदीप की आधी अधूरी बात भी अर्जुन समझ चूका था. वो निरंतर उस तगड़े मूसल को हिलती रही.
"साथ में करते है जिस से तुम्हे भी ाचा लगा.", अर्जुन सरक कर अब गुरदीप की मोटी चिकनी जांघो की तरफ आ गया. गोल नाभि से 6 इंच निचे हे वो पूरा मैदान चमक रहा था जहा फूली हुई छूट कॉमर्स से लबरेज महक रही थी. छूट को इन्तजार न करना पड़ा और अर्जुन की जीभ ने करामात दिखानी चालू कर दी.
"िष्ठ... ये क्या करने लगे आह्हः.. बाप रे.. उम्म्म्म.. माहहह.. ", गुरदीप ने फिर से लुंड को कब्जे में लेते हुए जोर से भींच लिया. अर्जुन ने छूट को ाचे से चूमते हुए चेहरा वही दबा दिया. ठुमकता हुआ लाल सूपड़ा हे गुरदीप को अपनी आहें बंद करने की उम्मीद दिखा. ये कामशाष्त्र की वही उनहत्तर वाली मुद्रा थी जो ख़ास प्रचलित न थी. गुरदीप को एक पल वो lisa-lisa सा स्वाद अजीब लगा लेकिन सब भुला कर वो भी लुंड को सुपडे से थोड़ा आगा तक अपने गीले गरम मुँह में उतार गयी. अगले 5 मिनट में हे उसका गार्द्रय जिस्म झटके लेने लगा और होंठ उस जरुरत से अधिक मॉटे लिंग पर कही जोर से लिपट गए. अर्जुन के अलग होते हे गुरदीप भी बिस्टेर पर पीठ के बल पसारती हुई गहरी सांसें लेने लगी. चुके कम्पन्न से थिरक रहे थे और अर्जुन ने सही वक़्त देखते हुए क्रिया आगे बढ़ने का निश्चय किया.
"हिम्मत रखना डीपी, दूसरी हे बार है और मुझे लगता है के दर्द जरूर होगा.", भारी जाँघे फैलते हुए अर्जुन ने पनियाई तजा स्खलित छूट के मुहाने सूपड़ा भिड़ते हुए गुरदीप को चेताया तोह लाल डोरो से भरी आँखें बताने के लिए बहोत थी की वो तैयार है.
"जिस्म तोड़ने से पहले मैट अलग होना.. आठ..", ऐसी हिम्मत देख अर्जुन भी पूरी तरह उस मांसल नरम जिस्म पर छ गया. होंठो को चूसते हुए एक करारे धक्के के साथ हे वो लगभग ांचुडी छूट चीरती चली गयी. 5 इंच की दुरी छूट के कॉमर्स और उत्तेजना की वजह से वो भीषण लुंड उस धक्के में तये कर गया.
"उननननंग्ग....", न चाहते हुए भी बंद होंठो के बीच से वो दर्द की आवाज बहार आ हे गयी, आँखों में आंसुओं के साथ. गुरदीप के लचीले बदन की हरकत अर्जुन की कमर पर टाँगे बांधने से नजर आयी. एक और धक्के ने गर्भ को हे चूम लिया. मॉटे dugdh-kalash पइसस चुके थे चौड़ी छाती टेल और छूट किसी परत की तरह लिपटी हुई उस मजबूत लुंड को महसूस करने लगी. ये हिम्मत गुरदीप की अर्जुन के प्रति गहरी चाहत साफ़ बताती थी. होंठो की हरकत होते हे अर्जुन भी हौले हौले उन रसभरे लबो का रास पीने लगा. कमर को हिलना ऐसा लग रहा था जैसे दरवाजे में धंसी कोई कील प्लास से निकली जा रही हो. आधे लुंड को बहार निकलते हे अर्जुन ने होंठ अलग कर लिया.
"फाड़ के तोह रख हे दी है.. आठ.. अब रुकना नहीं.. आठ.. सचमुच बहोत मोटा है यार तुम्हारा और अंदर तक लगता है.", गुरदीप की बोली बातें और आँखों में आये आंसू देख अर्जुन ने हलके से दोनों आँखें चूमते हुए बड़ी नजाकत से लुंड वापिस अंदर उतार दिया. छूट बुरी तरह फ़ैल चुकी थी लेकिन चिकनाहट ने साथ दिया.
"उस दिन तोह बस जोश में हो गया था डीपी.. हहह.. आज तुम्हे मैं आराम से प्यार करना चाहता था... बहोत टाइट है तुम्हारी लेकिन हिम्मत दिखाई.. बहोत सुन्दर भी हो..", अर्जुन ने दोनों पंजे उन गुब्बारे पर लगते हुए छूट को आराम से छोड़ना शुरू किया तोह गुरदीप दर्द के बावजूद मजा ले रही थी. उसकी छूट आज दूसरी हे बार लुंड ले रही थी जिस से हर धीमा घर्षण भी कही जोरदार लगता था. ऐसे हे इस सरल मुद्रा में चुदाई गति पकड़ने लगी थी और जल्द हे दर्द तेज सिसकियों में बदल गया.
"आठ... ऐसे हे करते रहो.. उम्म्म.. मुझे नहीं लगता के ाःह... कभी तुम्हारी जगह कोई और ले पायेगा.. Arjunn.nn ी लव यू..", गुरदीप kaam-sagar में तैरती हुई भी अपने दिल की चाहत उजागर कर रही थी. सच हे तोह था के उसके जिस्म के साथ आत्मा ने भी खुद को अर्जुन के हवाले कर छोड़ा था. अर्जुन के चेहरे को हर तरफ चूमने के बाद उसने खुद हे उसका चेहरा अपने एक मॉटे गुब्बारे पर टिका दिया. चुचो को चुसवाना भी ऐसा सुखदायी हो सकता है ये बस कुछ वक़्त पहले तक उसको न पता था और न कोई अनुभव था. ठंडक भरे कमरे में भी दोनों जिस्मो की गर्मी बढ़ हे रही थी. धीमी चुदाई अब बदल कर लम्बे और गहरे धक्को के साथ रफ़्तार लेने लगी थी. छूट ने दुरसी बार बाँध तोड़ते हुए रस बहाया तोह अर्जुन अलग हो गया. गुरदीप की उखड़ी हुई सांसें और बंद आँखें बता रही थी की वो कितना दुर्लभ चरम महसूस कर रही है. छूट में खालीपन का एहसास होते हे उसने अर्जुन को देखा.
"तुम बहोत हे प्यारी हो डीपी. मैं तुम्हारे साथ कही गलत तोह नहीं कर रहा?"
"बड़े आये गलत और सही बताने वाले. जिसमे सिर्फ प्यार और सुख हो, वो सही और गलत से परे है मिस्टर. अब मेरी बारी है.", तरबूज से मॉटे चुत्तड़ फैलाती वो अर्जुन के ऊपर आ चढ़ी. अर्जुन जवाब देता उस से पहले समूचे लुंड को अपनी गीली छूट में उतारती हुई गुरदीप ने वो लम्बी सिसकी लेते हुए मंशा स्पष्ट कर दी. इस खेल में अनुभवी न सही लेकिन जोश भरपूर था इस लड़की में. अब सचमुच मजे की बारी अर्जुन की थी और गुरदीप के मॉटे मॉटे उभर सीने पर रगड़ते हुए अपना काम करने लगे. सवेरे अलका के साथ अधुरु मिलान से उत्तेजित अर्जुन भी 10 मिनट में अकड़ने लगा था गुरदीप के निचे.
"आह्हः.. होने वाला है मेरा डीपी.. हटो..", गुरदीप इतना सुनते हे लुंड को बहार निकलती हुई अपनी गीली छूट से हे रगड़ने लगी.
"उफ़... मैं भी..", अर्जुन का वीर्य दोनों के जिस्मो के बीच हे बरस कर रह गया. अलग होते हे गुरदीप हंसने लगी.
"देखो क्या हालत है हम दोनों की. फिर से नहाना पड़ेगा.", दोनों के हे पेट कॉमर्स और वीर्य से सन्न चुके थे और गुरदीप के उठते हे अर्जुन की निगाह थिरकते विशाल कूल्हों और तरबूज सी लाल हो चुकी छूट पर पड़ी. मुर्झात हुए लुंड ने भी हरकत करके सहमति जताई की गुरदीप की वो ख़ास जगह पसंद आयी.
"जहा देख रहे हो मुझे पता है बच्चू. इसके लिए तुम्हे म्हणत करनी पड़ेगी क्योंकि वो तुम्हे चाहिए, मुझे जो चाहिए था उसके लिए मैंने म्हणत की. आज साथ हे नहाते है.", गुरदीप ने जिस कामुकता से अर्जुन को इशारा किया था वो झट्ट उठ कर उसके साथ बाथरूम में घुस गया. जो चाहिए था उसके लिए म्हणत तोह करनी हे थी.
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"अर्जुन से मिली थी जाने से पहले?", ऋतू के साथ इस वक़्त सिर्फ प्रीती हे थी यहाँ ऊपर Ritu-Alka के कमरे में और दोपहर के इस समय घर में जो भी हलचल थी उस से ये वाला हिस्सा अछूता था. हमेशा हे खिले गुलाब सी रहने वाली प्रीती इस वक़्त थोड़ी उदास थी और ऋतू से बेहतर संगिनी और कौन हो सकती थी जो ये उदासी न समझ सकती.
"पता हे नहीं था के वो पंजाब जा रहा है और आपके सामने हे तोह वापिस आये थे सब. माँ ने जब बताया तबतक तोह वो निकल भी चूका था. आप हे बुलाने आ जाती अगर आपको पता चल गया था तोह.", प्रीती ने एक रबर से अपने कंधे से निचे तक के बालो को बंधा हुआ था और आज वो सफ़ेद सलवार कमीज में थी, अपनी वेशभूषा के विपरीत. ऋतू ने भी एक छोटी सी काली बिंदी उस प्यारे चेहरे के माथे पर लगाने के बाद प्रीती की ठुड्डी के निचे हाथ रखते हुए जवाब दिया.
"मुझे पता होता तोह क्या मैं तुझे बताती नहीं? ऊपर से सुबह थोड़ा माहौल खराब हो गया था जिस से मेरा मूड भी डाउन हो गया. जाने से पहले अर्जुन आया था मुझसे मिलने और बोल कर गया था के मैं तुम्हारा ाचे से ध्यान राखु. कल वापिस आने के बाद वो तुम्हारे साथ ाचा टाइम बिताने वाला है. वैसे तुम्हे कही इस बात का बुरा तोह नहीं लग रहा की वह गाँव जाने की वजह से तुम दोनों मिल नहीं पाए?", अर्जुन द्वारा कही बातें ऋतू से सुन्न कर अब प्रीती के चेहरे पर भी ख़ुशी आ गयी थी. ऋतू ने वो ख़ास पायल की जोड़ी प्रीती के गोर पाँव में पहनाई तोह प्रीती की आँखों में हलकी सी नमी भी आ गयी.
"पता नहीं दीदी ऐसा लगता है के शायद मैं उतना प्यार अर्जुन को नहीं दे प् रही जितना वो करता है. और आपका प्यार मेरे साथ न होता तोह शायद मैं ज्यादा गलतियां कर जाती. ी लव यू सो मच एंड प्लीज ऑलवेज स्टे विथ में लिखे थिस, फॉरएवर.", ऋतू ने दोनों पायल पहनाने के बाद एक बार बैठे हुए हे प्रीती को गले से लगाया और उठ कर अलमारी से nail-polish निकलते हुए कहने लगी.
"तेरे साथ हे तोह रहना है साड़ी ज़िन्दगी और वैसे भी मेरे लिए तुम भी उतनी हे जरुरी हो जितना अर्जुन. यकीन करो तुम उसको उस से ज्यादा प्यार करती हो और इसका एक्साम्प्ले है तुम्हारा उसको हर रूप में स्वीकार करना. कैसा लगता है जब वो किसी और के साथ हो जबकि प्यार वो हमारा है? हम दोनों हे इस बात को ाचे से समझती है की अर्जुन ऐसा तबतक हे कर रहा है जबतक शरीर में बदलाव आ रहे है और हम फ़िलहाल रिश्ता बना नहीं सकते. जब तुम उसकी ज़िन्दगी में बीवी बन्न कर आ जाओगी न प्रीती, वो किसी की तरफ देखने वाला भी नहीं.", गोर हाथो की लम्बी उँगलियों के नाखून भी सही लम्बाई के साथ बेदाग़ थे प्रीती के. ऋतू ने एक हाथ को पकड़ते हुए पोलिश लगाने का उपक्रम किया तोह प्रीती हलके से मुस्कुराई. ऋतू उसका सचमुच बहिन से ज्यादा ख्याल रखती थी.
"मैं चाहती हु के पहले आप उसकी बीवी बने या फिर हम दोनों हे साथ में. और मुझे बुरा नहीं लगता अर्जुन को किसी और के साथ सम्बन्ध बनाने से क्योंकि वो पहल नहीं करता. और शादी के बाद आप ाचे से संभल लेंगी उसको."
"धत्त... उसके लिए तोह sunday-monday बनाने पड़ रहे है और तुम कहती हो मैं अकेली संभल लुंगी. वैसे शादी तुम्हे हे पहले करनी पड़ेगी प्रीती और ये मई किसी वजह से हे कह रही हु.", प्रीती एकटक ऋतू के उस गंभीर चेहरे को देखने लगी जहा एक पल पहले मुस्कराहट और शर्म थी.
"ऐसी क्या वजह है? बड़ी आप है तोह पहला हक़ भी आपका हे हुआ."
"तुम असलियत भूल रही हो मेरे और अर्जुन के रिश्ते की. शादी तोह जैसे तैसे हो हे जाएगी लेकिन इस घर में नहीं. तुम यहाँ की बहु बनोगी और मैं इधर से बहार जा कर. सफर अभी दूर है लेकिन ये बताना जरुरी था जिस से तुम्हे भी वैसे ढलने में परेशानी न हो. ये एक कड़वा सच है प्रीती की इस घर में मैं कभी भी अर्जुन की बीवी का दर्जा नहीं पाने वाली और मैं भी चाहती हु के यहाँ तुम एकमात्र बीवी और बहु रहो. वैसे इतना परेशां भी मैट होना ज्यादा सोच कर, बहोत साल पड़े है इस सबके लिए.", ऋतू फिर से पहले की तरह मुस्कुराने लगी थी और प्रीती की सोच को विराम लगा.
"वैसे मंजू भी 2 साल से पहले हे हमेशा के लिए इधर से जाने वाली है दीदी. अर्जुन ने पूरी कोशिश की है उसको खुश रखने की और वो है भी लेकिन अब जैसे वो खुद अपनी लाइफ को बदलने का सोच चुकी है. कितना अजीब हैं न ये सब और अर्जुन अगर उसको न संभालता तोह बहोत बुरा हो सकता था उसके साथ.", प्रीती ने यहाँ मंजू का जीकर किया तोह ऋतू ने दूसरे हाथ को पकड़ लिया.
"कैसे बुरा होने देता वो मंजू के साथ? वो अर्जुन से प्यार करती है तोह अर्जुन परवाह करेगा हे लेकिन मंजू जैसे अपने नए लक्ष्य बना चुकी है और अर्जुन भी उसका साथ दे रहा है जैसे तू. एक मजबूत व्यक्ति हे ऐसे फैंसले ले सकता है और हारने की जगह जीवन को और बेहतर बनाने की कोशिश करने वाली मंजू ने मुझे भी प्रेरित किया है. वैसे तेरी मामी भी आ रही है, जितना मैंने सुना है. विक्की से मिलने या फिर कुछ और वजह है?"
"हाहाहा.. विक्की से मिलने क्यों आएँगी वो? आज माँ की बात सुनी थी मैंने थोड़ी बहोत जब वो फ़ोन पर लगी हुई थी. उनको तोह मालूम है घर में किसी को ग्रीक नहीं आती लेकिन मुझे भूल गयी. वो मामी को सरप्राइज देने की बात कर रही है और इस बार मामी हफ्ते भर इधर रहने वाली है शादी में शामिल होने के साथ साथ.", प्रीती की बात में अभी भी रहस्य छुपा था.
"पूरी बात बता न, क्यों मजे ले रही है.", ऋतू को तोह पता हे था के प्रीती ऐसे हे बात आगे बढ़ाएगी.
"वो कह रही थी की उनके पास कोई है जो एक आइडियल लवर है, दिल और शरीर को ाचे से सटिस्फी करने वाला. ऐसा लवर जैसा मामी ने कभी खयालो में भी न सोचा हो और अगर मामी उनकी बात मानेगी तोह वो उनके साथ भी उसको शेयर कर सकती है. माँ की बातों से लगा था जैसा वो मामी से इस टॉपिक पर पहले भी थोड़ी बहोत बात कर चुकी है और मेरी सोच कहती है के माँ की लाइफ में ऐसा कोई भी नहीं है. चाहे पापा के साथ उनकी केमिस्ट्री अब ाची नहीं है लेकिन वो अपने काम पर हे फोकस रहती है और घर से बहार तोह कही जाती नहीं.", प्रीती बातों के साथ सवाल करने लगी थी लेकिन ऋतू की कुटिल मुस्कान देख आँखें बड़ी हो गयी.
"सहित. ऐसा इम्पॉसिबल है दीदी. Don't तेल्ल की माँ अर्जुन की बात कर रही थी?", प्रीती ने हे sawal-jawaab किया था हैरान होते हुए.
"और कौन हो सकता है जरा खुद हे सोच? वैसे अर्जुन ने ऐसा कुछ किया तोह नहीं है जितना मैं उसको जानती हु तोह आंटी का ऐसा कहना समझ नहीं आया. और तुम्हारी मामी क्या निम्फो है जो सिर्फ ऐसी बात पर इधर आने वाली है? जरूर मसला कुछ और हे है प्रीती क्योंकि आंटी ने आजतक तोह अर्जुन के सामने ऐसी वैसी हरकत नहीं की. तुम जरा अब थोड़ा ध्यान रखना के वो उधर आता है तोह उनकी रिएक्शन और एक्सप्रेशंस कैसे रहते है. लेकिन खबर धमाकेदार है. तुम्हारी मामी तोह खुद हे चलती फिरती आग है और आंटी भी कुछ काम नहीं."
"छियई... माँ ऐसा वैसा नहीं करने वाली अर्जुन के साथ."
"ड्राइंग याद नहीं है क्या? आंटी कहती नहीं क्योंकि वो काम्प्लेक्स है थोड़ी जिसको समझना अलका और मेरे लिए भी फ़िलहाल मुश्किल हे है पर उनके जज्बात दिख हे जाते है अगर ध्यान दिया जाए. उन्हें दिलचस्पी तोह हैं अपने दामाद में लेकिन वो एक्सप्रेस नहीं करती.", ऋतू की बात से प्रीती को भी वो चित्र याद आ गए जिन्हे रोमिला ने बड़ा सहेज कर रखा हुआ था और कितने बेहतरीन बनाये गए थे वो.
"हम्म्म.. सही कहा आपने और मैंने हे गौर नहीं किया इस बात पर. मामी के बारे में जान ने के लिए अब विक्की की हे मदद लेनी पड़ेगी. वो अपने आप हे एक अलग समस्या है.", प्रीती ने विक्की का जीकर किया तोह ऋतू हंसने लगी.
"क्यों उसको तड़पा रही है यार? उसकी हालत भी समझ और वैसे भी हसरत पूरी करना भारी पड़ने वाला है विक्की को. हाहाहा."
"हंस लो आप लेकिन बात उसको रोकने की नहीं है. माँ के होते हुए अगर ऐसा कुछ हुआ न तोह बात बिगड़ जाएगी और विक्की बेशक यूनिवर्सिटी स्टूडेंट है और उम्र में भी बड़ी लेकिन आज तक वर्जिन है. अर्जुन के साथ कुछ भी उल्टा हुआ जो की होना निश्चित है, मैं भी फसूंगी और अर्जुन भी. माँ को विक्की से बहोत लगाव है और यहाँ वो उनकी जिम्मेवारी है. उनके जाते हे मैं विक्की को नहीं रोकने वाली. मेरी तरफ से तोह चाहे वो करे क्योंकि तब जिम्मेवार वही होगी."
"वो अभी तक वर्जिन है?"
"हैरानी वाली क्या बात है इसमें? आधे से ज्यादा ग्रीक लड़कियां जिसके साथ कमिटेड होती है वो लाइफ टाइम उसके साथ हे रहती है. विर्जिनिटी एक सिंबल है प्यार पर ट्रस्ट का और बॉटनिस्ट जैसी बोरिंग विक्की की लाइफ में कभी उतना ख़ास लड़का आया हे नहीं. इसलिए तोह मुझे माँ का डर है, कही अर्जुन को हे न कह दे की वो विक्की से शादी कर ले अगर दोनों ने वो सब किया toh.",Preeti ने एक और ाची बात बताई थी ग्रीस की लड़कियों के बारे में और उनके प्यार पर विश्वास की.
"फिर विक्की को कर राजी और जान ने की कोशिश कर उसकी माँ के बारे में.", ऋतू अभी आगे और भी कुछ बताती उस से पहले हे अपने नाम की आवाज सुन्न कर उठ कड़ी हुई. कोमल दीदी ने पुकारा था उसको निचे से.
"चल यार निचे हे चलते है. और दुपट्टा ऐसे ले, बहनजी की तरह नहीं. हाँ.. अब लगी तोह प्रीती शर्मा.", हँसते हुए ऋतू ने प्रीती को छेड़ा लेकिन जवाब में वो भी मुस्कुरा रही थी.
"अब जो हु तोह वही लगूंगी न.. थैंक यू सो मच अपनी पायल देने के लिए और इस सबके लिए भी."
"मुझे थैंक यू नहीं चाहिए, किश करने दे बस एक.", ऋतू अब कामयाब रही थी प्रीती को तंग करने में.
"की... कुछ भी बोलती रहती हो आप. चलो निचे और फ़िलहाल थैंक यू से हे काम चलाओ. कल अर्जुन को किश कर दूंगी तोह उस से हे ले लेना मेरी किश.", प्रीती भी अब कहा पहले जैसी रही थी. ाचा जवाब दे कर वो ऋतू के साथ हे निचे चली आयी जहा पहले से हे रोमिला रेखा और कृष्णा के पास बैठी थी. तीनो के साथ साथ कौशल्या जी भी कमरे से बहार आती हुई प्रीती को देख कर रुक हे गयी. वो इस रूप में कमाल की लग रही थी, ऋतू से बराबर टक्कर लेती एक खूबसूरत हिंदुस्तानी यौवना.
"देख ले रोमिला, ये अभी से मेरी चाहत पूरी कर रही है. नजर न लगे मेरी बची को.", यहाँ भी कौशल्या जी ने प्रीती को नजर का टिका ऋतू की आँखों के काजल से करते हुए जैसे कुछ साबित हे किया. एक दूसरे की पूरक जो थी ये दोनों.
"सचमुच आंटी जी, प्रीती कही से भी वैसी नहीं लग रही जैसी हमेशा दिखती है. रेखा, ये दोनों हे एक साथ कितनी ाची लग रही है न? और ये पायल कब ली तुमने प्रीती?"
"माँ, ये ऋतू दीदी ने दी है. उन्होंने हे सूट भी दिलवाया था और अब मैं ऐसे हे ढेर सारे सूट लेने वाली हु.", प्रीती चलती हुई अपनी माँ और रेखा जी के बीच हे बैठ गयी. ऋतू ने यही खड़े हुए हे अपनी दादी के गले में पीछे से बाहें दाल दी. कौशल्या जी ने भी हर बचे को बराबर प्यार दिया था लेकिन लड़कियों में जहा ऋतू उनके दिल के करीब थी वही पौटे दोनों हे सामान रूप से ख़ास. अर्जुन छोटा था इसलिए हे उसकी ज्यादा परवाह करती थी लेकिन फिर भी उन्हें मान था तोह बस ऋतू पर. ऋतू भी अपनी दादी के हे सामान थी गुणों और काम में.
"देख रही हो दादी ये लड़की हर तरह से आपकी बहु बन्न ने के लायक है.", धीमी आवाज में ऋतू ने अपनी दादी के काम में कहा था. कृष्णा जी भी बड़े स्नेह से उधर प्रीती की भोली बातें सुन्न रही थी. इधर कौशल्या जी के चेहरे के भाव तोह ऋतू न देख पायी लेकिन जवाब ने सोचने पर मजबूर कर दिया.
"वो तोह बहु बनेगी हे इस घर की लेकिन तेरा साया उस पर हमेशा रहना चाहिए. मैं से ये भोली भली है, sahi-galat की ज्यादा पहचान भी नहीं इसको. तू मेरी समझदार बेटी है जो दुनिया को सबसे बेहतर समझती है उम्र के हिसाब से. भगवन तुम दोनों का प्रेम ऐसे हे बरक़रार रखे.", कौशल्या जी इतना बोल कर थोड़ा पलटी तोह जैसे वो गले हे लग गयी थी एक पल के लिए. फिर अलग हुई तोह कोमल दीदी की आवाज सुनाई दी.
"दादी, आपने तोह कहा था ऋतू को बुलाने के लिए. बात हे भूल गयी क्या आप?"
"हाँ ाचा याद करवाया तुमने. ऋतू, तू जरा मेरे साथ चल स्कूटरी पर ये अगली मार्किट तक."
"दादी, आप क्यों तकलीफ करती हो. जो लेके आना है वो मैं हे ले आती हु प्रीती या रुपाली के साथ जा कर."
"दादी मैं हु या तू है? जब जाना मेरा जरुरी है तभी तोह कह रही हु. कपडे बदलने है तोह बदल ले, वैसे ये भी ठीक है. मैं पर्स लेके आयी.", उनकी बात सुन्न कर ऋतू तुरंत अपनी माँ के कमरे में चली गयी और बहार आयी तोह सलवार कमीज के साथ अब पाँव में जूती और आँखों पर अर्जुन द्वारा आज सुबह दिया 'एविएटर' चस्मा था पूर्ण श्याम रंगत का, डंडी समेत. उसको ऐसे देख कर कृष्णा जी भी पालक झपकना भूल गयी और ऋतू हाथ हिलती हुई मुस्कुराते हुए गलियारे से बहार वाले आँगन में.
'Dug-dug' की ये आवाज घर में सिर्फ अर्जुन के होने पर सुनाई पड़ती थी और इस वक़्त संजीव भी घर न था जो उस मोटरसाइकिल को चालू करता. कोमल दीदी के साथ हे प्रीती भी बहार चली आयी जैसे उसको पता था के ये कौन होगा. सामने ऋतू हे अर्जुन की रानी पर सवार दिखी तोह कोमल दीदी का चेहरा अजीब सा हो गया. प्रीती हंस रही थी.
"ये क्या शरारत सूझी तुम्हे?"
"उन्हें आती है ये चलनी दीदी. अर्जुन खुद हे सिखाता रहा है और अब वो चला लेती hai.",Preeti के ऐसा कहने पर ऋतू ने भी चस्मा थोड़ा निचे करते हुए बड़ी बहिन को आँख मारी और दुपट्टा गले में एक तरफ घूमते हुए कमर की और से बांध लिया. इधर कौशल्या जी के साथ साथ रामेश्वर जी भी चले आये थे क्योंकि ये शोर उन्हें भी पता था. लेकिन प्रीती की बात सुन्न कर वो भी मुस्कुरा दिए.
"संभल कर लेके जाना बीटा थानेदारनी को. वैसे भी स्कूटरी पर तोह ये जांचने नहीं वाली थी.", पंडित जी के स्वीकारने पर अब कोमल दीदी खुद भी मुस्कुरा उठी. कौशल्या जी भी पायदान पर पांव टिकती ाचे से बैठी और ऋतू ने गियर दाल कर 'रानी' को आगे बढ़ा दिया. ये घटना सबके लिए हे चौकाने वाली थी सिवाए प्रीती के.
"तुम्हे नहीं सिखाया अर्जुन ने मोटरसाइकिल चलना?", रामेश्वर जी के स्वर में हास्य का पट था और प्रीती भी मुस्कुराते हुए बोली.
"दादा जी, मेरे लिए तोह ड्राइवर रखने का फरमान है न अंकल (शंकर) की तरफ से. वैसे भी मुझे चलने का शौक नहीं है."
"वह पुत्तर जी, अहो भाग शंकर के. सीखने तोह क्या देना ऊपर से नाकारा बनाने की सिफारिश और कर दी. तुम्हे अब कार सीखनी चाहिए बिटिया क्योंकि जरुरत कभी भी पड़ सकती है. जैसे अभी न अर्जुन है, संजीव और तारा भी नहीं है. ये ऋतू भी चली गयी और ऐसे में जरुरी जाना पड़े तब? ड्राइवर पर विश्वास क्या करना जब वो भी आपकी हे गाडी चला रहा हो, तनख्वाह के बदले. हम ज्यादा सेफ अपने हे हाथो महसूस करते है न?", पंडित जी ने बड़े हे पते की बात की थी और प्रीती को भी लगा के सचमुच कार चलनी आणि हे चाहिए, ड्राइवर हो या न हो लेकिन खुद के लिए हे सही.
"तोह सीखने के लिए आपको कहु या दादू को?"
"कल से मुनीर ले जाया करेगा तुम्हे और फिर तारा तुम्हारा हाथ साफ़ करवा देगी. सीखना जरुरी है, ड्राइवर तोह तुम्हे मिलेगा हे जैसा शंकर ने कहा. ाचा अब एक बार अपने दादू को भी बुला लाओ, जरुरी बात करनी है.", रामेश्वर जी इतना कह कर अंदर चले गए और कोमल अभी भी वही प्रीती के पास कड़ी थी.
"अब लग रहा है न के मोटरसाइकिल भी सीख लेनी चाहिए थी?"
"क्या दीदी. मुझे कभी भी मोटरसाइकिल नहीं सीखनी, पीछे बैठना ज्यादा सही है. हाँ कार जरूर सीखूंगी और आपके पास टाइम हो तोह साथ हे चलना, रेखा माँ से मैं खुद बात आकर लुंगी.", प्रीती के इस प्रस्ताव को दीदी ने हँसते हुए मन कर दिया.
"साथ चलने में कोई हर्ज़ नहीं है लेकिन ड्राइविंग नहीं सीखनी. वैसे तुम भूल रही हो के दादा जी ने कुछ कहा है तुम्हे."
"आ कर बात करती हु आपसे तोह main.",Preeti भी हंसती हुई अपने दादा जी को बुलाने निकल चली और कोमल दीदी वापिस अंदर. उन्हें अभी हैरत हो रही थी की ऋतू वो bhari-bharkam मोटरसाइकिल चलने लगी थी और अर्जुन हे सीखा रहा था उसको.
'इनका प्रेम ना जाने और क्या क्या करतब करेगा. दोनों पागल हे है और जानती हु के ये अर्जुन की फरमाइश हे होगी की ऋतू सीखे ये सब.' खुद से हे वो ये कही जा रही थी और मुस्कुरा भी रही थी.
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यहाँ सांगवान के फार्महाउस पर तोह आज 3 बजे हे महफ़िल चालू हो गयी थी, वो भी घने वृक्षों के छाया टेल. नरिंदर और उमेद ने 2 मुर्गे अलग अलग तरीके से पकाये थे जिनको जरुरत अनुसार पतीली और देगची से निकल कर ये सब खाने के साथ गिलास भी खडका रहे थे. सारा तामझाम जमीन पर हे दरी बिछा कर हो रहा था. जाम गुलाटी बना रहा था और soda-baraf का जिम्मा दलीप के हाथ. परमवीर ने 2 बड़ी प्लेट सलाद काट लिया था इस बीच और अब जाम के साथ साथ मजेदार बातें भी चालू हो गयी.
"ऐसा हे भाई लोगो, हम सभी आपस में सालो से एक दूसरे के साथ है. एक दूसरे को thik-thaak जानते है तोह मेरी मंशा है के पहचान थोड़ी और बधाई जाए.", सांगवान की इस बात पर भुप्पी ने तोह बिना सोचे सहमति दे दी और जो खेल वो खेलने वाला था उसका अंदेशा बाकी सभी को भी हो गया.
"जान पहचान बढ़ाना तोह बढ़िया खेल है लेकिन जाट भाई, सवाल दर्द भरे न हो.", नरिंदर ने जैसे कुछ सोच कर ये कहा और सभी ने सहमति में एक एक लम्बी घुट शराब की निचे उतार ली.
"इन्दर जानी, मैं न बावली गांड जरूर हु लेकिन इतना भी नहीं के hansi-khushi के माहौल की माँ छोड़ दू. ये रोस्टेड चिकन की कसम दोस्त, ऐसी चुटिया बात नहीं करेंगे जिस से दिल दुखे. इसकी कसम इसलिए क्योंकि आज तक का सबसे बेहतरीन मुर्गा खाया है तेरे भाई ने और उमेद भाई बहोत धन्यवाद् इसके लिए. लुगाई होते तोह हाथ चूम लेता, दैत्य हो तोह दूर से हाथ जोड़ कर शुक्रिया.", इस बात पर सभी के ठहाके गूँज उठे. यही तोह यारी दोस्ती है जिसमे कोई स्वार्थ नहीं और उम्र बढ़ने पर कही ज्यादा हे गहरी.
"चल तू शुरू तोह कर क्या खेल खेलना है.", ये शंकर ने कहा और सांगवान ने बीच में एक थाली रख दी.
"बात ऐसी के खेल तोह विदेशी है पर इसमें देसी तड़का लगा दिया गया है ma-badolat श्री श्री 2016 परमवीर जी सांगवान जी ने. बोतल का धक् जिसकी कानि (तरफ) रुकेगा वो सवाल करेगा और बाकी सब लोग जवाब देंगे. मतलब एक सवाल और सबके जवाब उसके हे अनुसार."
"भोस्डिके जाट, तू न सुधारियो. अपने नाम के साथ गाँव, पिनकोड, तहसील भी बता देता. चल घुमा इस बोतल को और देखे किसके हाथ में लगाम आती hai.",Shankar उत्साहित था और जाम खली करके गिलास निचे टिका दिया. उधर सभी की नजर थाली में पड़ी गोल बोतल पर थी और संगवानी ने उसको फिरकी की तरह घुमा दिए. आखिर में वो आ रुकी मेहुल गुलाटी के सामने.
"लग गए लोडे जो इस पंजाबी की बारी आ गयी.", भुप्पी को जैसे इसकी जरा उम्मीद न थी.
"तेरी हे गांड मरता हु देखता रह.", बात कहने के साथ हे एक टुकड़ा मीट का चबाते हुए जाम भी हलक में खली करके गुलाटी ने मुँह साफ़ किया.
"आज तक कितनी लड़कियों से सम्बन्ध बनाये है? बाकि सभी भी जबतक गिनती कर हे लो भाई लोगो, भुप्पी के बाद सबका नंबर चक्की चलने के हिसाब से आने वाला है.", गुलाटी ने पहले हे सवाल में बम फोड़ दिया था.
"4. आज तक 4 के साथ भाई लेकिन शादी से पहले थी जो बाकि 3 थी.", भुप्पी के जवाब के साथ हे अब खेल शुरू हो चूका था. दलीप ने सबके जाम फिर से बनाने शुरू कर दिए जैसे वो ध्यान हटाना चाहता हो.
"भाई मेरा तोह कोई आईडिया हे नहीं है लेकिन तू 50 मान हे ले जिनमे से 20 तोह रुस्सियन हे होंगी.", ये स्वर था परमवीर सांगवान का और अब इन्दर देख रहा था उसको हैरानी से. ये सफेदपोश डॉक्टर 50 महिलाओ और युवतियों के साथ सम्बन्ध बना चूका था. अगली बरी थी दलीप की और उसको चेताया उमेद ने.
"दलीप भाई, जवाब दो जरा.", उमेद की हंसी से दलीप थोड़ा शर्मिंदा हो गया.
"वो मेरी बीवी से पहले 15 के करीब और शादी के बाद बस 4. टोटल 20."
"शादी के बाद 4 तोह ऐसे कह रहे हो जैसे बड़ी लाचार ज़िन्दगी है. 4 भी काम होती है क्या?", नरिंदर ने भी चुटकी ली तोह दलीप बगले झाँकने लगा. उसके बराबर बैठे हुए शंकर की तोह अभी तक गिनती चालू थी.
"ओह जल्लाद, तू भी फूट पड़ कितनी सील खोली है आज तक.", सांगवान अभी तक तोह सबसे आगे था गिनती में.
"सील तोह ज्यादा न खोली मैंने कोई 25-26 हे होंगी जो पहली बार हे कर रही थी. हाँ नर्स और डॉक्टर को मिला कर कोई 150 मान हे लो. रंडी इनमे से कोई नहीं थी.", अब उमेद के भी कान गरम हो गए ये आंकड़ा सुन्न कर. शनकर तोह ऐसे मुस्कुरा रहा था जैसे वर्ल्ड कप जीत लिया हो.
"यार गुलाटी जवाब तू तुझे भी देना पड़ेगा सबके बाद.", ये बात भुप्पी ने कही तोह गुलाटी ने हामी भर दी.
"अब भाई इन्दर तू भी बोल दे जरा. हैं तोह तू भी शंकर का सागा भाई और हमदम.", गुलाटी के कथन पर उमेद और नरिंदर दोनों हे हंसने लगे वही शंकर खिसिया कर इधर उधर देखने लगा.
"भाई 2. एक शादी से पहले और एक जिसके साथ शादी की है बस वही. पहले वाला सम्बन्ध भी मेरी तरफ से नहीं था और मैं अपनी कृष्णा के साथ सुखी हु.", नरिंदर का जवाब हतप्रभ करने वाला था और ये उत्तर उमेद के साथ शंकर भी जानते थे. शंकर को उम्मीद नहीं थी की इन्दर उस एक सम्बन्ध को भी यहाँ उजागर करेगा जो विवाह से पहले बनाया गया था.
"क्या बात भाई? शंकर के तोह कॉलेज में हे दर्जन पार हो चुके थे तोह तुम कैसे कोरे रह गए?", भुप्पी के सवाल पर दलीप भी जान न चाहता था.
"ऐसा है भूपिंदर भाई के पहले कभी उस तरफ ध्यान हे नहीं गया था और जब गया तोह jiwan-sangini हे बना लिया उसको. और सचमुच मुझे कभी कोई कमी महसूस नहीं हुई, उल्टा मेरी बीवी ने हे मुझे उस प्यार से बहार न आने दिया जिस से हम दोनों आजतक बंधे है. शरीर हे तोह है, एक क्या और 100 क्या लेकिन प्यार और समर्पण है तोह वो एक हे बहोत है. जानते हो मेरे दोस्त भी उँगलियों से काम रहे है क्योंकि शादी तक तोह ये दोनों हे हमेशा साथ रहे मेरे तोह और किसी की जरुरत हे महसूस नहीं हुई.", नरिंदर ने बताया था की सही जीवन का असली मंत्र ज्यादा आंकड़ों में नहीं बल्कि बेहतर साथी से है.
"वाह भाई. गज़ब इंसान हो यार तुम तोह. इसलिए हे तोह हमने ये खेल खेलना ाचा समझा. दोस्ती में हमको एक दूसरे का बेहतर पता होना चाहिए जिस से कभी तुम्हारे सामने गलत स्थिति न पैदा हो. खैर अब बारी आती है अपने दैत्य भाई साहब की.", सांगवान के इतना कहते हे उमेद ने बस एक ऊँगली उठा दी.
"एक और वही श्रेष्ठ है भाई अपने लिए तोह. सच कहु तोह मैं न हे कामुक इंसान हु और न मेरी संगिनी ने कभी अधूरा हे छोड़ा मुझे. यहाँ बैठे सभी दोस्तों में से विवाह भी मेरा हे पहले हुआ होगा, दलीप भाई के बाद. और विवाह से पहले तोह हम लोग बस भोले के प्रहरी भर रहे है ऐसे कामो में.", उमेद ने जैसे हे निगरानी वाली बात कही तोह शंकर भी हंसने लगा. खेत खलिहान वाले उस पुराने दौर में यही लोग तोह उसको ऐसा स्थान देते थे जहा शंकर गर्मी निकल सके या प्रेमिकाओ से मिल सके.
"वाह वाह.. बहनचोद ये है भाईचारा तोह. वैसे पंजाबी अब तू भी तेरे नंबर बता दे.", सांगवान ने मुर्गे की बोटी उधेड़ते हुए आँखे ऊपर निचे करके मेहुल को उसकी बारी याद दिलाई.
"100 से 10 ऊपर निचे. अब ये शंकर महाराज की किरपा है जो पहला ज्ञान भी इन्होने हे दिलवाया था और आज भी मौका दिलवाते रहते है. बाकी घरवाली आज भी साथ दे देती है जब कभी बहार मूड न हो तोह.", गुलाटी के आंकड़े भी उम्मीद से कही ज्यादा हे थे. उसको पूरा गिलास एक बार में खली करते देख बाकी सभी ने वैसा हे किया. दोस्त थे और जाम तक एकसाथ खली करना जैसे एक रिवाज था अब.
"बाप आ गया बहनचोद. और इन्हे बताया किसने यहाँ के बारे में?", सांगवान की गांड हे उधड़ गयी उस काली मेरसेदेज़ जीप को गेट से अंदर आते देख. शंकर ने हाथ के इशारे से वैसे हे बैठने को कहा और दलीप पेग बनाने जुट गया फिर से.
"बाप हे है भाई, कितनी बार दारू पी है गिनती भी याद नहीं. चाचा कुछ नहीं कहने वाले.", और धर्मवीर सांगवान जी इनकी हे और चले आये, तीसों को साथ लिए.
"ये नकली जाट साला गांडू अपनी बेबे (बहिन) को लारा लगा कर यहाँ murga-daaru उधेड़ रहा है. सांझ हो गयी और ऋचा तेरे गोली मारेगी जाते हे. दलीप बीटा मेरा भी पेग घायल (दाल). मुर्गे की शोरूम (खुसबू) तगड़ी आ रही है.", जूती उतार कर वो भी नरिंदर की बगल में आ बैठे.
"बेबे ने क्या काम कहा था इसको? ये तोह बोलै की आपने पार्टी करने की इजाजत दी है तोह हमने बोतल खोल ली. नहीं तोह दिन में कभी दारु पीते देखा आपने मुझे.", शंकर जैसे ऐसे हे मौके की तलाश में था.
"पापा यु भड़कान लग रहा है."
"पता है बीटा तुम सारे कितने हे लायक हो. कुछ लोग इधर आराम करने आये थे और बाकी चिकित्सक shagal-mela करने पहुंच गए. निक्कम्मो मान लिया के कभी कभी aish-masti करनी चाहिए लेकिन पता तोह हो. ये भुप्पी बता के आया था मुझे की कहा जा रहे हो तुम लोग तोह समझ गया पार्टी होगी."
"वैसे आप तोह इस वक़्त घर हे होते हो.", गुलाटी के ऐसा कहने पर उन्होंने एक घूँट भरते हु बुरा सा मुँह बनाया.
"बेटी ने घर से लिकाड दिया तोह सोचा गम मिटने के लिए मैं भी तुम लोगो से कुछ जाम उधार मांग लू. वैसे मुर्गा गज़ब बनाया है जिसने भी बनाया है.", नरिंदर उनकी बात सुन्न कर हंस रहा था. ऐसे हे मस्तमौला इंसान थे धर्मवीर सांगवान जी. बचो के साथ कब बचा और कब बाप बन कर रहना है उन्हें ाचे से पता था.
"पापा ये वाला उमेद ने और जो आप खा रहे हो वो इन्दर ने बनाया है. जमा मलाई बर्गा नरम और क्या मसाले है. आठ.. मजा आ गया."
"भाई इन्दर, तुम और उमेद न ऐतवार (संडे) शाम मेरे साथ बैठो. सीखा भी देना और हम तीनो गुफ्तगू भी कर लेंगे.", यहाँ मेल मिलाप का दौर अब लम्बा चलने वाला था और घर की चिंता इनमे से किसी को न थी.
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5 बजे कार से अर्जुन अपनी दोनों बहनो को लिए मोडल टाउन की इस बड़ी मार्किट में आ चूका था जहा उन्हें अपने कपडे और घरवालों द्वारा बताया सामान खरीदना था. गुरदीप के साथ ाची खासी म्हणत करने के बाद वो डेढ़ घंटा सोया था और गुरदीप अपने घर पर अभी तक बिस्टेर पे थी.
"आप लोग यही मिलना मैं आधे घंटे से पहले हे आ जाऊंगा. ये पैसे माँ ने दिए थे, सामान के लिए.", अर्जुन ने कार में बैठे हुए हे अलका के पर्स में वो नोटों की गद्दी डालते हुए हिदायत दी और दोनों को दूकान तक जाते देखता रहा. ये वही जगह थी जहा आरती और प्रियंका दीदी ने उसको वो आधुनिक कपडे ले कर दिए थे. गुरुद्वारे साहिब के सामने से कार को जगतार उर्फ़ जग्गी भाई के घर की ले जाता वो अब जसलीन का ध्यान कर रहा था. पिछली बार जाने से पहले जो प्यार वो जसलीन में जगह गया था क्या वो आज भी कायम होगा या हालात अलग होंगे? फ़ोन पर हमेशा हे बात अस्पष्ट होती थी चाहे वो 3-4 बार बात कर चुके थे.