Incest Pyaar - 100 Baar - Page 21 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 119

मुकाम - Haansil/Pryaas (5)

साल 1973 दुस्सहर्रा का समय


ये युवक युवती काम क्रीड़ा करके इस निर्जन खेत से निकल कर बहार आये थे अभी. युवक खुश था वही लड़की संतुष्ट होने के बावजूद नाराज दिख रही थी. Salwar-kameej झाड़ती हुई वह मुँह फिराए थी अपने आशिक़ से.

"लता, मैंने कहा है न के पापा को मैं मन लूंगा हमारी शादी के लिए. तुम बिना वजह गुस्सा हो रही हो और मैं इतनी दूर सिर्फ तुम्हे खुश करने आता हु लेकिन हर बार वही नाराजगी.", ये युवक अपनी मेहबूबा का हाथ पकड़ते हुए मानाने लगा. गाँव से बहार इन खेतो में शाम का धुन्दल्का बढ़ने हे लगा था लेकिन किसी और की मौजूदगी का निशाँ भी न दिखा.

"शंकर, तुम्हे चुदाई करनी होती है तोह मेरी याद आती है. डॉक्टर की डिग्री पूरी होने तक तुम ब्याह नहीं करोगे और तब तक मेरे बापू मुझे घर न बैठने वाले. तुम्हारे तोह दोनों हाथो में लड्डू है. इतने जी भर के मेरा जिस्म लूटना और फिर नयी नवेली बीवी का.", लड़की तुनक कर बोली और जुबान सिर्फ कड़वाहट से लबरेज.

"तुम जानती हो लता के मैंने सिर्फ तुमसे प्यार किया है. बात अगर जिस्मानी रिश्ते की हे है तोह क्या लड़कियां मेरे कॉलेज या कसबे में नहीं है? शादी तुमसे हे करूँगा और अगर तुम्हे मेरी पढाई इतनी हे आखर रही है तोह मैं अपनी माँ से कह कर तुम्हारे यहाँ रिश्ता भिजवा देता हु. सगाई होने पर तोह रुक जाओगी न?"

"इतना आसान है क्या ये सब? मेरे बापू बिरादरी को मानते है और पांच भी है तोह ज्यादा परेशानी होगी. लेकिन ये सब तुम्हे हे देखना होगा और मुझे अपनी बीवी बना कर यहाँ से लेके जाओगे. अगर ऐसा नहीं हुआ तोह मैं तुम्हे बर्बाद कर दूंगी."

"गुस्सा क्यों करती हो चाँद. तुम हमारे हे घर की बहु बनोगी और फिर कर लेना मुझे बर्बाद, जैसे थोड़ी देर पहले किया था. कल हे भेजता हु मैं माँ और पापा को.", शंकर ने वह नरम उभर कस के मसल दिया था गाल को चूमने के साथ हे.

"आठ.. मेरा तोह खुद का दिल करता है रे शंकर की तुम बस ऐसे हे मुझको सुख देते रहो. लेकिन जवान लड़की हु और ऊंच नीच हो गयी तोह लड़की पहले मारी दी जाती है फिर सवाल किया जाता है. कल जरूर भेज देना अपने maa-baap को और कह देना के बापू बिरादरी से बहार शादी तभी करवाएंगे अगर ये उनकी शर्तो पर होती है तोह.", लता ने भी बात पूरी करते हुए शंकर को चूमा और यहाँ से निकलने को कहा. अब थोड़ी चिंता इस तगड़े नौजवान के मुखड़े पर थी. आगे एक तरफ खड़े स्कूटर तक जाते हुए शंकर ने पीछे मदद कर लता को देखा जो hari-sabjiyon को चुन्नी में लपेट कर गाँठ लगा रही थी. कुछ हे पालो में धुल उडाता वह स्कूटर कच्चे रस्ते से गाँव से विपरीत दिशा में निकल चला.

"तू बहोत बड़ी छिनाल है मुन्नी. पहली छोरी होगी इन दस गाँव में जो खुद यार से छोड़ने विरानो में घूमती रहती है.", ये 2 लड़के गोबर के बिटोड़ो के पीछे से लता के सामने आ खड़े हुए लेकिन लड़की के चेहरे पर कोई डर न था. एक युवक कोई 25-26 साल का सवा 6 फ़ीट लगभग और दूसरा अपने भाई से आधा फ़ीट छोटा Lata/Shankar की हे उम्र का, जो अधिक गुस्से में था.

"तेरी क्यों सुलग रही है फ़तेह? शंकर मर्द है और तबियत से ठंडा करता है. तेरे भाई का तोह मुझे पेशाब करते देख कच्चा सफ़ेद हो गया था. चलो बाजु हटो दोनों, बेगैरत साले.", लता के एक हाथ में तेज डरती और दूसरे में सब्जी की पोटली, जिसको कंधे पर लटकाये पकडे थी.

"देख मुन्नी, शंकर तुझे छोड़ता है लेकिन फिर भी तू मुझे पसंद है. साफ़ बात कहता हु के मेरे से ब्याह कर ले, हवेली की रानी बना कर रखूँगा.", ये बात छोटे वाले युवक ने उसका डरती वाला हाथ पकड़ कर कही और लता के सामने फ़तेह आ खड़ा हुआ.

"मेरे भाई का दिल देख ले मुन्नी कितना बड़ा है. चाहता तोह यही पटक कर छोड़ देता, तू कुछ कर भी नहीं सकती ये तुझे पता है. लेकिन ये ब्याह के लिए कह रहा है, मर्जी से या फिर बिना मर्जी ब्याह तोह हो के रहेगा तेरा सुरेंदर से.", अब सचमुच लड़की के दिल में डर पनप गया था लेकिन चेहरा शांत रखे वह फिर से बोली.

"मर्द हो तोह मर्द की तरह फैंसला करो न. कहो इस सुरेंदर से की शंकर को हरा दे, मैं कर लुंगी ब्याह इसके साथ. ये हरा तोह जिस हाथ से मेरी कलाई पकड़ी है वह राखी बांधूंगी, कह देती हु."

"तू शंकर को हारने का कहती है, मैं तोह जान से मार दूंगा. देखती जा बस तू लेकिन उस से पहले हे तू बहु होगी हमारे घर की. सुशीला से अभी कहता हु के तेरी माँ को शगुन दे आये. और तू न खुद अपने घरवालों को मन नहीं कर पायेगी.", फ़तेह जैसे बहोत कुछ सोचे बैठा था और इस बीच सुरेंदर ने हँसते हुए लता का गाल चूम लिया.

"भैया जो कहते है वही होता है. रांड की तरह छोडूंगा तुझे, देखती जा मुन्नी. बहोत दिल जलाया है न तुमने.", सुरेंदर की हिमाकत का कोई जवाब न था अब लता के पास. लेकिन दोनों हे युवक दूर हट गए जब साइकिल पर गुनगुनाता हुआ ये सजीला hatta-katta नौजवान इस तरफ आते देखा. साइकिल के सामने लगी बड़ी सी टोकरी में कुत्ते का पिल्ला रखे वह मुस्कुराता हुआ वही खड़ा हो गया.

"कैसे हो फ़तेह भैया? और भाई सुंडी आज खेत में पत्ते खाने आया है क्या?", अपने नाम का उपहास होते देख सुरेंदर का चेहरा गुस्से से तमतमा गया था वही लता इस लड़के को देख रहत की सांस ले रही थी.

"मेरा नाम सुरेंदर सिंह है, मालूम नहीं के हवेली के उत्तराधिकारी से कोई बदतमीजी से बात नहीं कर सकता. यहाँ के 10 गाँव में हमारा राज है."

"क्या फ़तेह भैया, इसका फ्यूज उदा रहता है क्या हर बखत? तभी सुंडी (कीड़ा) कहते है इसको. गुस्से में खुद को हे खाता रहता है. अबे मेरे भाई तुम हवेली हवेली करते रहते हो न जो हर समय तोह बता देते है के अभी तुमसे भी बड़ी हवेली में मूट मार कर आ रहे है. बैठो लता भाभी, शंकर भाई बोल कर गए थे के सांझ हो रही है तोह आपको लेता औ.", इस युवक की बात से दोनों भाइयो की गांड हे सुलग गयी थी. बेशक फ़तेह उम्र में बड़ा था और शरीर में भी तगड़ा लेकिन फिर भी इस लड़के से नहीं उलझा. और साइकिल के पीछे बैठ कर लता सुरेंदर की तरफ ख़ास तरह मुस्कुराती हुई निकल गयी जिधर से ये लड़का आया था उधर हे.

"आप कुछ भी कर लो भैया, साला शंकर से पहले इसको मारना पड़ेगा. अकेले तोह आपसे भी नहीं होगा इसका कुछ ये पता है मुझे लेकिन जबतक ये ज़िंदा है तोह भूल हे जाओ के आप हुकूमत बरक़रार रख पाओगे. ऊपर से जब से बाप बने हो, आपकी ज्यादा फटी रहती है.", गुस्से में सुरेंदर अपने बड़े भाई से पहले गाँव की तरफ चल दिया.

"अरे रुक तोह सही सुंडी. माफ़ कर दे भाई लेकिन मैं तेरा ब्याह कल हे पक्का करवा दूंगा उस मुन्नी से और फिर देखना इस अज्जू की कैसे गांड मारते है हम. शेर है न वह, भवानी भाई के साथ मिल कर हम इसका ऐसा शिकार करेंगे छोटे की रघुबीर सिंह की हवेली सुनसान न हो गयी तोह मैं अपना लुंड अपने हाथ से काट लूंगा. वादा है तेरे से मेरा. मुन्नी से तेरी शादी करवाते हे मैं इस अज्जू को मिटा दूंगा.", सुरेंदर अपने बड़े भाई की बात सुन्न कर गले लग गया था.

"फिर मेडी और शंकर. हाहाहा.", अपने ख्याल बुनते हुए दोनों भाई अपनी हवेली जाने लगे. विचार तोह कही से नेक न थे इनके, शायद परवरिश हे ऐसी रही होगी.

जैसे हर सूर्यास्त के बाद सूर्योदय होता है वैसा हे इधर भी हुआ था. अपने घर शंकर ने आज पूरी बात बता दी थी अपनी माँ को, भाई नरिंदर की उपस्थिति में और रौबदार कौशल्या देवी ने भी अपने पति रामेश्वर जी को बुलवा लिया था. बचो की ख़ुशी और अपनी बीवी के प्यार की वजह से थानेदार रामेशर शर्मा सवेरे हे अपनी पहचान के इस गाँव निकल लिए थे शुदा पत्नी कौशल्या.

ये भी एक bhara-poora गाँव था जो आता तोह रामेश्वर जी के परम mitra-bhai सामान रघुबीर सिंह की जड़ में था लेकिन उतनी हे पकड़ एक और दोस्त सोमबीर सिंह की भी थी, जो उम्र में रघुबीर से बड़ा था. पांच ईश्वर सिंह के आँगन में रघुबीर सिंह और रामेशर जी के आने से पहले हे सोमबीर सिंह की कार और जीप कड़ी मिली. पांच के घर सरपंच का होना कोई बड़ी बात न थी.

"आइये रघुबीर जी, पंडित जी. आज तोह आपका भी आना बड़े मंगल समय पर हुआ है. नमस्कार थानेदारनी जी.", ईश्वर सिंह ने खुद हे इन सबका स्वागत किया था और कौशल्या देवी अपनी सखी पूर्णिमा के साथ घर के भीतर चली गयी थी, वही बाकी सभी बैठक में विराजमान हो गए. सोमबीर सिंह से खुद रामेशवर जी ने हाथ जोड़ कर मुलाकात की और बराबर बैठे Fateh-Surender के सर पर भी हाथ फेरा.

"देखो भाई रामेश्वर, तुम कुछ भी कहो उस से पहले जरा मैं भी अपनी बात रख देता हु. हमारा जो आपसी भाईचारा है वो मजबूत रहना चाहिए बेशक तुम्हारा और हमारा यहाँ आने का प्रयोजन एक हे क्यों न हो.", सोमबीर सिंह सफ़ेद पगड़ी में हमेशा एक महाराजा सा तेवर रखता था, सामने वाला चाहे जो भी हो. बस रघुबीर सिंह एक अपवाद था.

"जी सोमबीर भाई. आपकी बात से मैं भी पूर्ण सहमत हु लेकिन जब प्रयोजन एक हे है तोह फैंसला उसको करना चाहिए जिसकी ज़िन्दगी का फैंसला हम दोनों में से किसी भी एक के परिवार से जुड़नेवाला हो. और मैं ईश्वर सिंह जी से भी हाथ जोड़ कर शमा चाहता हु के ऐसे सीधा हे उनकी देहलीज पर चला आया.", रामेशवर शर्मा को हाथ जोड़ते देख ईश्वर सिंह ने खुद हे उनके हाथ थाम लिए.

"देखिये ऐसा पाप मैट चढ़ाये मेरे सर पर पंडित जी. आप मेरे घर पधारे है तोह इस से ज्यादा ख़ुशी की और क्या बात हो सकती है. वैसे अब आप दोनों हे मेरी बेटी का हाथ मांगने आये है तोह मैं किसी को नाराज कैसे कर सकता हु? बस किसी भी सूरत में इस नाचीज की पगड़ी मैट उछलने दीजियेगा.", ईश्वर सिंह एक समझदार इंसान था और पूरे गाँव को हे परिवार मान कर चलने वाला नेक व्यक्ति. बेशक उसकी धर्मपत्नी कुछ अलग विचारो वाली थी.

"जी मैं आपको वचन देता हु, यहाँ जो फैंसला होगा मैं पूरे दिल से उसका सम्मान करूँगा. आप बेटी के पिता है और जो फैंसला लेंगे सही लेंगे बस मधुलता से जरूर राये ले लीजियेगा.", रामेश्वर जी के कथन पर रघुबीर सिंह ने भी सहमति जाता दी.

"मैं भी इस बात से इत्तेफाक रखता हु ईश्वर सिंह जी. सोमबीर भाई साहब हो सके तोह Fateh-Surender को बहार भेज दीजिये.", रघुबीर सिंह का ऐसा कहना उन तीनो का न पसंद आया लेकिन सोमबीर सिंह ने अपने दोनों बेटो को इशारे से जाने को कहा.

"सभी बातें तुम तीनो हे करोगे तोह हमको तोह यहाँ होना हे नहीं चाहिए. ईश्वर सिंह जैसा रामेश्वर ने कहा के फैंसला तुम्हे और तुम्हारी बेटी को लेना चाहिए, मुझे ये बात सही लगी लेकिन कुछ jaat-biradari, पंचायत और समाज भी मायने रखता है. खुद पांच हो तुम, इस बारे में भी विचार करना थोड़ा.", सोमबीर सिंह के स्वर में जो चेतावनी थी वह ये तीन लोग भली भाँती समझते थे.

"मेरे लिए मेरा समाज ये गाँव है सोमबीर सिंह जी लेकिन फैंसला करना है तोह फिर हम 4 लोगो के बीच चारो महिलाये भी होंगी और जिसका विवाह होने जा रहा है वो मेरी बेटी भी.", ईश्वर सिंह की इस प्रतिक्रिया को देख सभी सहमत थे. थोड़े हे समय में इस बैठक में चारो परिवार के दंपत्ति बैठे थे लेकिन सोमबीर सिंह के साथ चंद्रो देवी की जगह ये जवान महिला थी कोई 30-32 साल की. सभी जानते थे की ये खूबसूरत औरत शीला देवी है, सोमबीर सिंह की युवा दूसरी पत्नी.

"तुम जानती हो बेटी के हम सब यहाँ क्यों जमा है?", रामेश्वर जी ने हे घूंघट लिए बैठी मधुलता से सवाल की शुरुवात की थी.

"जी काका. मेरे ब्याह की बात करने के लिए."

"सभी तुम्हारा फैंसला jaan-na चाहते है, शुदा शरत मुन्नी.", सोमबीर सिंह की आवाज पर कुछ पल ख़ामोशी छायी रही. कौशल्या जी को ये 'शरत' लफ्ज़ बड़ा खटका और वह व्यक्तित्व अनुसार बोल हे उठी.

"भाई साहब, शर्तो पर कौनसे रिश्ते बनते है? और जरा बताओ बेटी तुम्हारी शर्ते जो तुमने मेरे बेटे से प्यार करते समय उसको नहीं बताई. अगर ये निस्चल प्रेम है तोह मैं यहाँ बैठे हरेक इंसान के खिलाफ जा सकती हु और अगर इसमें मिलावट है तोह ये सभी एक तरफ और मैं यहाँ उपस्थित भी नहीं.", शीला देवी को अलग हे मिर्च लग गयी थी लेकिन सोमबीर सिंह ने हाथ थाम कर चुप रहने को कहा.

"प्यार है तभी तोह शंकर से कहा के वह आप लोगो को मेरे यहाँ भेजे, काकी. लेकिन मैं भी एक भविष्य चाहती हु जैसा आपका है. मेरी शरत कोई बड़ी नहीं है और मेरा फैंसला शंकर के साथ ज़िन्दगी भर रहने का है.", मधुलता के कथन को सुन्न कर शीला फिर से सोमबीर सिंह को देखने लगी जो अपनी मुछो को ताव दे रहा था. बहार से वो दोनों भाई झरोखे से कान लगाए सब सुन्न रहे थे.

"मेरे घर में आने के बाद यही तोह होगा आगे चल कर. जैसे आज मैं बचो की माँ हु, घर चलती हु वैसे हे कल तुम भी यही करोगी. तुम्हे ऐसा संदेह क्यों हुआ भला? प्रेम करना बुरा तोह नहीं है और बेशक बात jaat-biradari की हो लेकिन मेरे घर में इंसान को इंसान हे मन जाता है, किसी के साथ पराये सा व्यवहार या रसूख नहीं दिखाया जाता.", कौशल्या देवी अभी भी मंतव्य jaan-na चाहती थी इस लड़की का जो सिर्फ जुबान से हे तेज न थी.

"हाँ बेटी खुल कर कहो जो कहना है. हमे इतना तोह समझ में आ गया के तुम्हारी नजर में हम दूसरे स्थान पर है लेकिन श्रीमती कौशल्या देवी जी का अपना मंतव्य स्पष्ट कर दो.", सोमबीर सिंह के बोलने पर अब रामेश्वर जी ने गहरी सांस ली जैसे उन्हें भान हो गया के यहाँ मिलावट जरूर है.

"आपके बाद परिवार की मुखिया मैं बनूँगी. और जो भी है वह शंकर और उसके बाद मेरे बचो के नाम होगा.", अब तोह ईश्वर सिंह के भी पाँव टेल जमीन खिसक गयी थी, बाकी सब तोह हैरान हे थे बेशक सोमबीर सिंह अदाकारी कर रहा था लेकिन साथ उसने भी सबका दिया चौंकने में. पहली बार पूर्णिमा जी ने कुछ कहा.

"हमारी हवेली, खेती की ज़मीन और लकड़ी का कारखाना बहोत रहेंगे तुम्हारे लिए या फिर शहर वाला प्लाट इसमें जोड़ दू? अगर तुम्हे परिवार के बड़ो पर हे भरोसा नहीं है जो अपनी हे बिरादरी के बहार सिर्फ बचो की खुशियों के लिए इधर चले आये तोह तुम्हारा मैं इतने से भी नहीं भरेगा. उठो भाई साहब यहाँ से.", पूर्णिमा जी ने रामेश्वर जी को कहा तोह उन्होंने अपनी भाभी के सामने हाथ जोड़ कर वापिस बैठने की गुहार की.

"आप ये सब क्यों देने लगी, मैं कोई अज्जू से ब्याह तोह नहीं करने लगी.? बात मेरी और शंकर की है तोह उनके पिता जी अपना फैंसला देंगे. मैं शादी के लिए तैयार हु बस मेरी एक यही शरत है.", मधुलता की बात पर भारी मैं से पंडित जी ने अपने गले वो तुलसी की माला उतार कर मधुलता के सामने रख दी.

"बेटी ये मेरी माँ की निशानी है, वचन देता हु के हमारे घर के बहार जो भी मेरे नाम है वो सब मैं तेरे बचो के नाम कर दूंगा. घर में मेरे 3 बेटे है और एक छोटी बेटी. उनको सभी को तेरे बचो से 10 काम हे दूंगा लेकिन घर की एक भी ईंट किसी के नाम नहीं होगी.", जीवनभर थानेदार रामेश्वर शर्मा ने वह तुलसी की माला कभी अलग न की थी खुद से. कभी maans-madira के हाथ न लगाया था क्योंकि उनकी माँ ने रुखसत होने से पहले अपने गले से यही उतार कर उन्हें पहनाई थी.

"आप गलत कर रहे है जी. भूलिए मत यहाँ सिर्फ आपके हे 4 बचे नहीं है. एक बहु पहले हे है मेरी, जो बड़ी है लेकिन उसका ओहदा कम् कर रहे है आप.", कौशल्या जी ने इतना कहा हे था के मधुलता ने वह माला उठा कर एक तरफ रख दी.

"ऐसे वचन नहीं चाहिए काका जिनका कोई मोल न हो. आप सबकुछ शंकर के नाम करिये, इधर मेरे पिता जी तारिख निकलवाते है ब्याह की.", मधुलता ने जो कहा वह असहनीय था इन सब के लिए.

"माफ़ कीजियेगा, भाई साहब. हमको अपने बेटे का प्यार चाहिए था लेकिन इस शरत पर नहीं के परिवार बिखर जाए. भगवन सबको खुश रखे बस, कोई गलत बात कही हो तोह शमा कीजियेगा.", Cigaar-daani के बराबर राखी अपने पति की माला को रुमाल में रखते हुए कौशल्या जी ने उठते हुए कहा तोह अब कही मधुलता की माँ के बोल निकले.

"पंडिताइन जी, चोखी बात है आपकी. अब बहार आपका बीटा जो हमारी इज्जत उछलेगा उसका क्या?"

"शंकर तोह है भी उद्दण्ड, बड़ो को कुछ नहीं समझता फेर ये तोह एक लड़की की िज्जात्त उछलने जैसा आसान काम है.", शीला ने अपनी टांग भी फंसा हे दी थी.

"मैं इस कमरे से बहार सिर्फ यही कहूंगा के ये रिश्ता इस लिए नहीं हो सकता क्योंकि पांच ईश्वर सिंह जी की बिरादरी ने उन्हें बेदखल करने की धमकी दी है अगर ऐसा होता है तोह. दूसरी बात मैं आपसे कहता हु शीला देवी, लड़की की िज्जात्त उछलने से ज्यादा गलत बात तोह इस शब्द को एक महिला हो कर कहना है. मेरा बीटा कटाई ऐसा काम नहीं करेगा जिस से आप लोगो पर कोई आंच आये, ये जिम्मेवार मेरी है. उसको मैं ये एक पारिवारिक फैंसले के रूप में कहूंगा.", रामेश्वर शर्मा इधर बहार निकल हे रहे थे की आँगन में उमेद अज्जू इन्दर और शंकर आ खड़े हुए थे, जीप उमेद के हाथ.

एक पल के लिए तोह माहौल शांत सा हो गया था. और सोमबीर सिंह ने जैसे मोहर लगवा हे ली थी ईश्वर सिंह की बीवी से अपने बेटे के साथ मधुलता के ब्याह की. सभी इस बड़े आँगन में आये तोह राममेहर सिंह के 2 लड़के भी सुरेंदर और फ़तेह के साथ मौजूद थे यहाँ.

"दीपावली के बाद सुरेंदर का विवाह किसी भी शुभ दिन हम मधुलता के साथ करवा देंगे. आप सभी को मैं अभी से आमंत्रित करता हु.", सोमबीर सिंह की ये गर्जना आघात कर गयी थी इन चारो के दिल में जो अभी अभी इधर आये थे. मधुलता ऊपरी मंजिल में जाली से देख रही थी बस.

"पापा, आपने मेरे लिए ये एक काम न किया? मैं आपकी प्रतिष्ठा के लिए सब सही तरीके से करना चाहता था नहीं तोह भगा कर भी ले जा सकता था मैं लता को. और अब भी आपके चेहरे पर कोई दुःख नहीं है?"

"बीटा ईश्वर जी एक लड़की के बाप है, बिरादरी समाज से इन्हे बहार करके हम चैन से रह सकेंगे? इनका भी तोह हक़ है अपनी बेटी पर और जहा ये उसका ाचा भविष्य देखेंगे वही तोह भेजेंगे. तुम मेरे ाचे बेटे हो शंकर, लड़की भागने जैसा कलंक तुम कभी मेरे सर नहीं लगने दे सकते. चलो अब हमको चलना चाहिए.", रामेश्वर जी अपने बेटे को लिए इस जीप में सवार हुए और दूसरी कार में कौशल्या देवी, पूर्णिमा और रघुबीर सिंह. बस मुस्कुराता हुआ अज्जू यहाँ जीप से उतर कर खड़ा रह गया.

"तोह ताऊ जी आपने तिकड़म लगा हे डाला न? पता था मुझे के आपके लोंडो के बस का नहीं है ये सब, 4-4 निकम्मे आज तक अपने बाप पर निर्भर. मेरी हार्दिक मुबारकबाद सुंडी भाई को, खेत से कटी फसल उसके पास चली आयी. Ram-Ram लाजो काकी, वैसे लाज तोह ना आयी होगी आपको भी. पता भी है के लड़की शंकर भाई से आठवीं से प्रेम करती आ रही है लेकिन पांच ईश्वर सिंह जी को बिरादरी का बहाना करके शिकार बना दिया.", अज्जू के मुस्कुराते चेहरे के साथ साथ ऐसे तीखे शब्द सभी के दिल में बाण से चुभ रहे थे, सिवाए ईश्वर सिंह के जो सर झुकाये खड़ा था.

"घनी जुबान चलती है लड़के तेरी लेकिन आइंदा नहीं चल ...आह्हः.", ये पहलवान सा व्यक्ति था भवानी गुज्जर, कड़ियल और आपराधिक व्यक्ति जो राममेहर का बीटा था. लेकिन इस सवा 6 फ़ीट के दानव को बड़े आराम से अज्जू ने गर्दन से पकड़ कर आँगन में चित्त पटक दिया था. बाकी किसी की हिम्मत न हुई थी के आगे बढे.

"देखो भैया ऐसा है के हम हे बड़े है और हम हे छोटे है. रही तुम्हारे इन bhai-kaka या जो भी हो यहाँ की बात तोह सबको पता है के अज्जू बोलता है तोह खरा बोलता है नहीं तोह hare-gopala hare-murari. अभी छोड़ रहा हु लेकिन आगे से कोई ऐसी चेष्टा की तोह वही हाल करूँगा जो किसी का भी नहीं किया आज तक.", भवानी हैरान था के कोई इतना तेज और ताक़तवर कैसे हो सकता है. वो भी साधारण सेहत वाला. बेशक 6 फ़ीट का अज्जू बाकी सबकी तरह पहलवान न था लेकिन शरीर गहरा कटाव लिए और मांसपेशियों से भरपूर था.

"हम तुम्हारे ताऊ लगते है बीटा. थोड़ा तमीज और िज्जात्त का ख्याल किया करो. हम भी तोह पसंद करते है तुम्हे क्योंकि तुम ाचे लड़के हो.", सोमबीर सिंह ने एक नजर जमीन पर पड़े भवानी को देखने के बाद अज्जू के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.

"ताऊ जी, िज्जात्त तोह मैं भी आपकी करता था लेकिन आप न हमेशा बचो के बीच शामिल हो जाते हो. बताओ भला के लता भाभी इस सुंडी से शादी क्यों करेगी?"

"ये तोह तुम्हे लता से पूछना चाहिए और अब तुम हो एक व्यस्क तोह शादी तक तुम उस से मिल नहीं सकते. विवाह के बाद बता देगी तुम्हे की उसने ऐसा क्यों किया.", सोमबीर सिंह ने बाल सहलाते हुए अज्जू को समझाया तोह वह हामी भरता हुआ ईश्वर जी के आँगन से हे साइकिल उठा के अपने घर की और निकल लिया. इधर सोमबीर सिंह भी कल वापिस आने का बोल कर यहाँ से निकला तोह शीला देवी के साथ फ़तेह था और एक गाडी में भवानी सिंह, सुरेंदर और सोमबीर सिंह थे.

"पिता जी, आप न कुछ करो या न करो बस इस अज्जू का कुछ कर दो. शंकर तोह आधा आज हे मर्डर गया.", सुरेंदर ने बात कही जो गुस्से में था.

"अरे मेरे सुंडी बीटा, धीरज से काम ले. वो लोग अपने हे तोह हैं, अज्जू ाचा लड़का है बीटा. उसके साथ गलत करके बहुत कुछ खराब हो जायेगा. तुम उस से दूर रहो वो तुमसे दूर रहेगा. शंकर भी गलत नहीं है लेकिन जो चीज सोमबीर सिंह के बेटे को पसंद हो वह फिर किसी और की नहीं हो सकती. और भवानी याद रखना उस लड़के को, तुम जैसे तोह क्या फ़तेह सिंह जैसे भी 10 मिलकर अर्जुन सिंह सुपुत्र रघुबीर सिंह का बाल बांका नहीं कर सकते. वो श्रेष्ठ है और हमको पसंद भी है.", सोमबीर सिंह अपने इस लाडले को समझा रहा था और बीच में भवानी के साथ बैठा मोहर बोल पड़ा.

"भवानी भाई केहवे थे के शंकर की बहिन भी बहोत सुन्दर है."

"हरामखोर, ये गलती मैट कर देना तुम लोग. ज़िंदा दफ़न कर दूंगा तुम सबको अगर कुछ भी ऐसा वैसा सोच तोह मधु बिटिया के बारे में. कान खोल कर सुन लो और जो यहाँ नहीं है उनको भी कह देना के सोमबीर सिंह ने कहा है कोई भी मतलब कोई भी रामेश्वर शर्मा और रघुबीर सिंह के परिवार के किसी भी शक्श के साथ ऐसी वैसी हरकत नहीं करेगा. माँ छोड़ के रख दूंगा मैं तुम सबकी.", सोमबीर सिंह का तमतमाया चेहरा देख कर सबकी गांड फट गयी थी. इतना गुस्सा तोह वह कभी किसी पर न हुआ था.

चलो आज उसने जैसे तैसे अपने एक बेटे का घर तोह बसवा हे दिया था बेशक तिकड़म चलाये थे लेकिन तिकड़म भी वही चलते है जहा सामने वाले की मंजूरी हो. ऐसे रही अक्सर सफर में लावारिस भी रह जाते है जो प्यार के साथ शर्ते जोड़ देते है.

वही साइकिल के पैदल मारता हुआ अज्जू दुखी भी था अपने भाई शंकर के लिए और दुःख को काम करने के लिए हमेशा की तरह गीत गुनगुना रहा था.

'तेरी मंजिल न है ये बाँवरे, बस रुकाव है एक कतार का.

कर खुद को साबित जरा, बना दे नया संसार एक प्यार का.

प्रीत कर राधा सी, प्रेम कर मीरा सा

प्रीत कर राधा सी, प्रेम कर मीरा सा

प्यारे पत्त्झड़ से न टूटना, आएगा मौसम नया बहार का.

तेरी मंजिल न है ये बाँवरे, बस रुकाव है के कतार का

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साल 1998 (वर्तमान)

अर्जुन हिमानी को लिए घर से निकला तोह ये देख कर ाचा लगा था के वह खुश थी. लेकिन वही चस्मा आँखों पर था जो अर्जुन को पसंद न था.

"थैंक यू अर्जुन.", हिमानी ने जैसे ये लफ्ज़ कहे थे सुन्न कर अर्जुन को ाचा लगा. आज वह कल की तरह नाराज भी न थी और हाथ अर्जुन की कमर में डाले हिमानी मुस्कुरा भी रही थी.

"आप बस व्यस्त रहा करा, लेकिन अकेले नहीं. बहार निकला करोगी तोह मेरी जरुरत नहीं पड़ेगी आपको."

"तुम्हारी जरुरत हे रहने वाली है अब. कोमल को कह दिया है मैंने. जब भी मुझे तुम्हारे यहाँ आना होगा, तुम लेने आओगे मेरे फ़ोन करने पर.", अर्जुन बस खुश था के हिमानी बोलने लगी है.

"ठीक है, लेकिन कभी कभी मेरे न होने पर आप भी चली जाया करना या ऋतू दीदी लेने आ जाया करेगी. मैं चाहता हु के कॉलेज के पहले दिन आप खुद जाए, पूरे आत्मविश्वास से."

"फ़िलहाल तोह मैं पीछा छोड़ने नहीं वाली हु, जो भी करो या कहो. आओ तुम्हे मां जी से मिलवाती हु.", हिमानी ने गेट खोल कर अंदर आमंत्रित किया तोह अर्जुन ने ना में गर्दन हिला दी.

"फिर कभी मिलूंगा uncle-aunty से. अभी तोह स्टेडियम जाना जरुरी है.", अर्जुन ने असमर्थता से कहा तोह हिमानी ने हाथ हिला कर bye कहा और नजाकत से अंदर चली गयी. अर्जुन भी इतने दिन के बाद आज स्टेडियम जा रहा था, बेशक संधू जी को बताया जा चूका था के अर्जुन व्यस्त है लेकिन प्रशिक्षण प्रभावित जरूर हुआ था. इतने दिनों बाद स्टेडियम के द्वार से अंदर आया तोह अजीब सी ख़ुशी मिल रही थी इन सब चेहरों और जगह को देख कर.

"कैसे हो मिस्टर? आजकल तोह चौदवी का चाँद हो गए हो?", ये चांदनी थी जो डिम्पी की तरफ से चलती हुई स्टैंड तक आ गयी थी. डिम्पी टेनिस में व्यस्त थी और न उसका ध्यान था इधर. चांदनी की नजरे बहोत कुछ कहती थी और ये भाषा भी अर्जुन के लिए नयी न थी.

"मैं तोह ाचा हु चांदनी लेकिन लगता है आपका ख्याल नेक नहीं है. अब तोह सुमन ने भी बॉयफ्रेंड बना लिया है, परमानेंट. क्यों समय खराब कर रही हो किसी बेवकूफ के पीछे.?", अर्जुन ने कंधे पर बैग टांगते हुए जवाब दिया.

"ये बेवकूफ समझ नहीं रहा मेरी तड़प को. साफ़ कहती हु के बस एक बार मेरी ये जिज्ञासा शांत कर दो फिर कभी नहीं टोकने वाली तुम्हे.", खुलकर कहना हे बेहतर लगा था चांदनी को.

"जिस रस्ते की कोई मंजिल न हो उसका क्या फायदा चांदनी? समझदार हो और अब तोह टीम की कप्तान भी. खेल और करियर पर ध्यान दो, चाहने वाले तोह तुम्हारे भी बहोत है.", अर्जुन चलने हे लगा था के उसने हाथ पकड़ लिया.

"देखो, बेशरम भी बन्न गयी हु तुम्हारे लिए. अब इतना भी न गिराओ के मेरा वजूद हे न रहे. सच कह रही हु अर्जुन, तुम जो कहोगे वो करुँगी लेकिन एक बार मेरी चाहत पूरी कर दो."

"मंजू से जवाब ले लेना चांदनी, वह कहेगी तोह मैं आग में भी कूद जाऊंगा. अब हाथ छोडो मेरा.", अर्जुन ने नरमी से कहा और हाथ छुड़वाते हुए अपने रस्ते बढ़ गया. चांदनी के पास सुमन आ कड़ी हुई.

"देख चांदनी, वो लड़का ाचा है और मंजू अपनी हे सहेली है. क्या मिलेगा तुझे ऐसा करके?"

"सुमन बात सिर्फ सेक्स की नहीं है. मैं मंजू से हर चीज में बेहतर रही लेकिन सबकुछ उसको मिला. तुझे क्या लगता है के मंजू ने गेम छोड़ कर मुझे कप्तान ऐसे हे बना दिया? तमाचा मार के गयी है वह मेरे मुँह पर. एक बार ये लड़का मेरी तरफ चला आया न फिर देख मैं मंजू को कैसा दर्द देती हु."

"थू है तेरी जैसी सहेली पर चांदनी. गलती से मंजू अपने पुराने रूप में आ गयी तोह तेरा हॉस्टल, कॉलेज और स्टेडियम ख़तम हो जायेगा. दोस्त को दुश्मन समझने वाली तेरे जैसी कमीनी लड़की के आसपास भी नहीं दिखना चाहती मैं..", सुमन की बात सुन्न कर चांदनी ने गुस्सा और अकड़ दिखते हुए अलग हे जवाब दिया.

"तू मैट इत्र रंडी. जिसके साथ तू गुलछर्रे उड़ा रही है न, उसको तेरा पास्ट बताया तोह वो भी नफरत करने लगेगा तुझसे. पहले भी तोह यार था तेरा, जिस से छुड़वा कर अपना खर्च चलती थी. और कप्तान हु मैं, कोच की ख़ास भी. नेशनल तोह क्या खेलेगी, एक्स्ट्रा में भी न बैठने दूंगी तुझे.", चांदनी जो भी कह रही थी वह जैसे सुमन को मजाक सा लग रहा था.

"कर ले जो तू करना चाहती है. बलबीर प्यार करता है मुझसे और उसको पता है मेरे अतीत के बारे में. रही बात इस बास्केटबॉल की तोह अगले साल शादी है मेरी बलबीर के साथ, वो मेरे लिए मायने रखता है. जा छुड़वा ले कोच से भी और फिर देखती हु तुझे मंजूबाला नैन से कौन बचता है. तेरा कोच या तेरा घमंड.", सुमन ने भी करारा तमाचा लगा दिया था इस मूरख युवती के दिल पर, शब्दों और सचाई से. पाँव पटकती हुई चांदनी बड़बड़ाती हुई टेनिस कोर्ट से आगे जाने लगी तोह पानी की घूँट भर्ती डिम्पी ने तोह आग में घी का काम कर दिया.

"दीदी ओह चांदनी दीदी, सुना है स्टेडियम फेडरेशन कोई जांच बैठा रहा है बास्केटबॉल कोच और कुछ संदिग्ध लोगो पर. ये दीप्ति अभी वही से आयी है.", चांदनी के पाँव जड़ हो गए थे और डिम्पी के साथ कड़ी लड़की भी सहमति में सर हिला रही थी.

"क्या बक रही हो? हमारी टीम तोह नार्थ विनर है. कोच सर की तोह प्रमोशन होने वाली थी. ये कैसी जांच की बात कर रही हो तुम और कैसे पता इसके बारे में.?"

"दीदी, अभी हमारे टूर्नामेंट के बारे में पता करने गयी थी मैं तोह वह S.A.I. से भी कुछ लोग थे और स्टेडियम मैनेजमेंट भी. प्रदीप सर (टेनिस कोच) एक लड़की को चुप करवा रहे थे और वह उन्हें बता रही थी की कैसे टीम में जगह के लिए सीनियर लड़की ने उसको आपके कोच के साथ गलत काम करने को कहा. फ़िलहाल तोह वह और कुछ नहीं पता चला लेकिन प्रदीप सर कह रहे थे के वो उस लड़की को इन्साफ दिलवाएंगे और पुलिस जल्द हे आने वाली है.", दीप्ति नामक ये लड़की जितना जानती थी उसने उतना बता दिया. लेकिन चांदनी एक शब्द भी बोले बिना तेज कदमो से बास्केटबॉल कोर्ट की जगह दूसरी तरफ चल दी.

"नाम हे बता देती उसको यार, शायद ज्यादा जल्दी भाग जाती.", डिम्पी ने हँसते हुए कहा और दीप्ति थोड़ा शर्मा गयी.

"क्या यार डिम्पी, वैसे ये लड़की हो कर भी इतनी गलत कैसे हो सकती है?"

"कई बार हम सही मौको पर गलत फैंसले ले लेते है डार्लिंग. इसकी भूख ने इसको अँधा बना दिया लेकिन अब भुगतने दे, हम मैच लगते है.", यहाँ ये दोनों वापिस खेलने में लग गयी और इधर आज बलबीर के साथ कसरत करने के साथ साथ अर्जुन ने ढेरो बातें भी की. उसको ये जान कर भी ख़ुशी हुई थी की बलबीर को क्लर्क की नौकरी भी मिल गयी है. दोनों ने पसीना सुकाने के बाद अभ्यास वाली जगह का रुख किया तोह अर्जुन के कदम ठिठक गए.

"अबे तुझे क्या हुआ? कोच सर को ढून्ढ रहा है क्या?", बलबीर ने अर्जुन की चिंतित देख पुछा. लेकिन यहाँ चारुल को देख वह थोड़ा हैरत में था, परेशां नहीं.

"कहा है सर?"

"पता नहीं अभी थोड़ी देर पहले हे प्रबंधक साहब का प् उन्हें बुला कर लेके गया था. कोई meeting-weeting होगी भाई. वैसे 5 दिन से ये मैडम भी इधर आ रही है, तेरे दोस्त है न चारुल मैडम?", बलबीर इतना कहता हुआ किट की तरफ लिए चल दिया अर्जुन को.

"हम्म. लेकिन फीमेल बॉक्सिंग का प्रैक्टिस एरिया तोह दूसरी तरफ है न भैया. यहाँ क्यों है ये?", अर्जुन ने दोनों पंजो पर गरमपट्टी बांधते हुए पुछा. चारुल ने भी अर्जुन को देख लिया था और सोच रही थी की वो बात करने आएगा. लेकिन यहाँ तोह अर्जुन ने आज बलबीर से पहले किट पर शुरुवात कर दी थी. हलके मुक्को से वह सधी हुई लाये में अभ्यास करते हुए बलबीर की बातें भी सुन्न रहा था.

"वो सीखने नहीं आयी है भाई. 40 दिन के लिए अस्सिटेंट है वह, ट्रेनिंग देने से पहले ये जरुरी प्रक्रिया है. इसके बाद वह जूनियर कोच का इम्तिहान देंगी, यही स्टेडियम या फिर यूनिवर्सिटी में सीखने के लिए.", बलबीर ने ग्लूकोस की बोतल मुँह पर लगाई और फिर एक घूँट लेने के बाद 2-3 बार उठक बैठक की.

"ये बॉक्सिंग की कोच कैसे बन्न सकती है? जहा तक मुझे पता है वह पहले ञंञैस्ट थी और बाद में जुडो की प्लेयर.", अर्जुन अलग हुआ तोह बलबीर ने किट को थाम लिया. संतुलित करने के बाद वह भी आराम आराम से बस कंधे का अभ्यास कर रहा था हर मुक्के के साथ.

"गेम तोह और भी बहोत खेले है मैडम ने लेकिन जुडो में black-belt है वह. एथलेटिक्स की एक और बात है भाई, के कोचिंग के लिए जरुरी नहीं के वही खेल आपने खेला हो. आपको समझ है तोह प्रशिक्षण लो, तैयारी करो और इम्तिहान दो. बाकी आपकी समझ और कुशलता पर निर्भर है. दिखय बर्ड का तोह मैंने कोई क्रिकेट मैच नहीं देखा लेकिन वह अंपायर है.", बलबीर ने सही समझाया लेकिन गलत उदाहरण के साथ.

"हाँ लेकिन होल्डिंग बॉलर थे जो बाद में बोलिंग कोच भी बने. आपने एक्साम्प्ले रेफरी का दिया है भैया. वैसे वो टीम गेम्स है तोह वह शायद जरुरी हो जैसा मैं समझता हु लेकिन इधर आप सही है इंडिविजुअल में. संधू जी खुद बॉक्सर रहे है और अब सीनियर कोच है, करवा सकते है नाम की सिफारिश.", आखिरी बात अर्जुन ने थोड़ा तेज कही जो चारुल के कान तक सही से पहुंची. वो इतनी देर से इनकी हे बातें सुन्न रही थी. फिर भी वह खामोश रही और ये दोनों प्रैक्टिस करने लगे रहे. थोड़ी देर बाद संधू जी भी आ गए थे और ये दोनों अभ्यास ख़तम करके शरीर को सूखा रहे थे.

"बलबीर, तुम जरा हॉस्टल वार्डन के साथ चले जाओ. वो इन्तजार कर रही है तुम्हारा. और अर्जुन बीटा, मुझे अभी थोड़ा समय लगेगा यहाँ, अगर ज्यादा परेशानी न हो तोह चारुल को अपने साथ ले जाना.", संधू जी ने विनम्रता से कहा था जैसे वह थोड़ा परेशां हो.

"मैं ऑटो से चली जाउंगी पापा.", चारुल ने तुरंत जवाब दिया.

"ठीक है अगर तुम्हे ऑटो से जाना है तोह अर्जुन तुम्हे बत्तियों के परे तक छोड़ देगा. यहाँ से तोह ऑटो भी नहीं मिलेगा. वैसे भी इसको काम है shaadi-byaah के तोह घर छोड़ने के बाद कही तुम्हारी माँ इसका समय न खराब कर दे. मैं चलता हु बाकी सब लोग अभ्यास के बाद सभी सामान ठीक से रख के चले जाना.", संधू जी ने ज्यादा कुछ न कहा. काली चुस्त टीशर्ट और सलेटी सूती ट्रैक पजामा पहने चारुल के गोर गाल थोड़ी म्हणत की वजह से गुलाबी हो चुके थे. सुन्दर तोह वह पारुल से भी कही ज्यादा थी लेकिन हमेशा पहरावा खिलाड़ियों वाला रहता था.

"जी 2 मिनट रुकिए, मैं कपडे बदल कर यही आता हु. तब तक आप भी चेंज कर लीजिये चाहे.", अर्जुन ने आगे का जवाब न सुना और फुर्ती से निकल गया. चारुल धर्मसंकट में थी अब. जाना चाहती भी थी लेकिन अर्जुन द्वारा अनदेखी किये जाने से आहात भी थी. ये भी पता चला था के वह इतने दिन से क्यों नहीं आ रहा और अब अपने हे कथन पर गुस्सा थी के क्यों ऑटो का कहा. फिर कुछ सोच कर वो भी अलग दिशा में चली गयी, कपडे बदलने. अर्जुन 5 मिनट बाद उसकी प्रतीक्षा करता हे मिला. चारुल ने कपडे बदले जरूर थे लेकिन वह वैसे हे थे. बस अब काली की जगह सलेटी चुस्त टीशर्ट और ये कला ट्रैक पजामा जो कूल्हों पर से अब कुछ ज्यादा चिपका था.

"चलो और मेरी वजह से इन्तजार करना पड़ा उसके लिए सॉरी.", चारुल ने अपेक्षा से विपरीत बात कही थी और अर्जुन मुस्कुरा रहा था.

"दोस्तों में तोह सॉरी जैसा कुछ नहीं होना चाहिए."

"मैं दोस्त नहीं मानती तुम्हे. साफ़ कहती हु और याद रखना.", दोनों चलते हुए स्टैंड तक आ गए थे जहा आज स्टेडियम की शुरुवात चांदनी के साथ अलग बहस से हुई थी वही कुछ ऐसा हे जाते वक़्त होने वाला था.

"फिर क्या मानती हो आप? यहाँ भी मैडम हे कहु क्या?", अर्जुन ने अपना बैग चारुल को पकड़ते हुए कहा जो बेहिचक उसने थाम लिया.

"प्यार.", अर्जुन को एक पल अपने कानो पर विश्वास न हुआ के अभी चारुल ने क्या कहा है. लेकिन वो गहरी भूरी आँखे अपने जवाब पर अडिग थी जैसे. बिना प्रसाधन के भी चारुल उल्लेखनीय रूप से सुन्दर थी.

"पता है आप क्या कह रही है और हम लोग इस वक़्त कहा खड़े है?", अर्जुन ने वापिस आगे बढ़ते हुए मोटरसाइकिल में चाबी लगाई और बहार निकलने लगा.

"जहा मर्जी हो, ये बदलने तोह नहीं वाला जगह के हिसाब से. हाँ मानती हु के मैं तुम्हे किसी और के साथ नहीं देख सकती थी इसलिए कभी बोल न सकीय."

"फिर आज कोई ख़ास वजह इस पुरूस्कार से नवाजने की?", अर्जुन के बैठने के बाद चारुल भी दोनों तरफ पाँव करते हुए बैठ गयी. बीच में एक बैग था और दूसरा कंधे पर.

"सोचा कब तक अकेले परेशां होती राहु, तुम्हे भी थोड़ा करना हे चाहिए. इसलिए 5 दिन से स्टेडियम भी आ रही हु. 3 से 6 बजे तक."

"मैं कैसे परेशां होऊंगा जी? और इसका मतलब ये हुआ के आप मेरे लिए यहाँ आ रही है. फिर तोह ये सरासर गलत है."

"तुम ख़ास वजह हो लेकिन दूसरा पहलु भी जरुरी है. और गर्लफ्रेंड के नखरे कभी कभी परेशां तोह करते हे है. क्यों ऐसा नहीं होता क्या?", स्टेडियम से बहार निकलते हे चारुल ने अपना एक हाथ अर्जुन की कमर में रख लिया. अर्जुन समझ नहीं प् रहा था के वह क्या जवाब दे इस सब का.

"मेरी 2 गर्लफ्रेंड है पहले से हे, तीसरी इंग्लैंड जा चुकी है. एक और भी है जो फ़िलहाल यहाँ नहीं तोह टोटल हुई 4. अब पांचवी बन्न ने से तोह बहोत ज्यादा बुरा नहीं लगेगा आपको मिस चारुल संधू.?"

"हजारवीं में भी प्रॉब्लम नहीं है श्रीमान अर्जुन जी. आप बस हाँ तोह कहो के मैं आपके लायक हु, सच कह रही हु कभी कोई डिमांड नहीं होगी सिवाय साथ वक़्त बिताने और वो साड़ी बातें सुनाने के जो मैं अकेले करते आयी हु अबतक. इस से पहले के ये पूछो की मैंने एकदम से ये सब क्यों कहा तोह इसका जवाब है अन्नू."

"अन्नू का इस सब से क्या लेना देना? और तुम्हारी बात कब हुई उस से?"

"जब तुमने उस से बात की थी जस्ट उसके बाद. तुम बड़े सरल हो अर्जुन और मैं खुद तुम्हे उलझन की तरह समझ रही थी. नाउ ी रिग्रेट की तुम सामने थे और मैं हर वो बात ढून्ढ रही थी जिसका मुझसे कोई लेना देना न था. और जब बात समझ में आयी तोह आज सारा दिन मैं सिर्फ तुम्हे याद करती रही. देखो तुम आये भी आज लेकिन जैसे मेरी अनदेखी कर रहे थे तोह मुझे वही फीलिंग आ रही थी जो सचमुच एक लवर को होती है, मेरी गलती मान ली मैंने.", चारुल ने कुछ भी दिल में न रखते हुए साफ़ साफ़ हकीकत बयान कर दी. अर्जुन अभी भी असमंजस में था.

"उस दिन थप्पड़ क्यों मारा था?"

"क्यूंकि मुझे लगा तुम ..", एक पल के लिए चारुल चुप हे हो गयी.

"क्या लगा तुम्हे चारुल?", अर्जुन ने अब नाम से बुलाया तोह चारुल ने चेहरा एक तरफ करते हुए उसके कान के समीप होते हुए कहा.

"मेरे िन्नेर्स के कलर की बात कर रहे हो. सॉरी फॉर तहत तू. लेकिन तब भी सिर्फ तुम हे मेरे ख्याल में थे और सिम्मी ने मूड ख़राब किया हुआ था सच बोल बोल कर. मैं इस बात का बुरा नहीं मानती अगर वो सब तुम कहते या हम अकेले होते. थोड़ा इस बाद से भी गुस्सा थी के अन्नू वही थी जिस से तुम प्यार करते हो."

"और अब?"

"कहा न जब तुम और मैं हो बस तब. किसी के सामने मैं खुद हे पीछे हट जाउंगी."

"मतलब अब मैं िन्नेर्स की बात कर सकता हु?", अर्जुन ने चंचलता से कह तोह दिया लेकिन अंजाम देख कर खुद हे हालत पतली हो गयी.

"देख भी सकते हो, बस मेरे कमरे में या जहा हम दोनों हो. तभी तोह कह रही थी की मेरा दिल भरा बैठा है अर्जुन तुमसे ढेरो बातें करने के लिए. किस्मत कही और ले जाए तोह ये मलाल न हो के मैं एक बंद डायरी सी ज़िंदा थी जिसको वो इंसान खोल कर पढ़ भी न सका जिसका जीकर हर लाइन में था.", चारुल ने पीछे से हे उसको आगोश में ले लिया था.

"सड़क पर लोग है चारुल."

"सॉरी. और अगर तुम्हे तुम्हारी व्यस्त ज़िन्दगी से कभी भी फुर्सत मिले तोह मिलने जरूर आना अर्जुन."

"मैं यही हु चारुल और जब तुम्हारा दिल करे बात करने का तोह कह देना. मैं आ जाऊंगा और पढ़ लूंगा क्या क्या लिखा है."

"कल?"

"कल.", अर्जुन ने भी वही शब्द बिना प्रश्न के दोहरा दिया.

"कहा? मेरे घर तोह कोई न कोई होगा हे. वैसे भी 2 दिन स्कूल और है अभी."

"स्कूल के बाद या स्टेडियम के बाद जब तुम्हे ठीक लगे. बात करने के लिए तोह पूरा शहर हे है, फिर एक घर पर निर्भर क्यों रहना.", अर्जुन ने मोटरसाइकिल चारुल के घर से थोड़ा पहले हे रोक दी थी.

"ठीक है, स्टेडियम के बाद. जहा तुम्हारा दिल करे. पार्क या मार्किट या चलती मोटरसाइकिल इस भीड़ से परे. गुड bye एंड टेक केयर.", हाथ हिला कर जाने से पहले चारुल ने बैग अर्जुन को वापिस किया और एक मुस्कान के साथ विदा किया. अर्जुन पहले दिन से हे जानता था के चारुल उसको ख़ास तरह से देखती है, स्कूल के बास्केटबॉल वाले प्रकरण से कुछ समय पहले जब अन्नू ने उसको कक्षा से बहार किया था तभी से. वो चारुल हे तोह थी जिसने अन्नू को बोलै था अर्जुन को वापिस क्लास में लेने के लिए. लेकिन उसके बाद सिलसिला एकतरफा मोहब्बत का बनती चारुल ने अनजाने हे खुद को क्षति पहुंचे थी.

'पागल सा एक शक्श, दुनिया समझने निकला लेकिन वापिस घर पागल हे आया.', इन विचारो से निकलता जब अपने घर दाखिल हुआ तोह बस इतना हे खुद से कहा. आँगन से बगीचे की तरफ जाते पंडित जी के साथ धर्मवीर सांगवान और छोल साहब थे. शंकर जी की कार फिर से नदारद थी और उमेद चाचा भी जा चुके थे.

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"तुम्हारी लाड़ली मेरी नाक कटवाने पर तुली हुई है सरोज. एक बाप ने आज वो देख लिया जो कभी कोई भला इंसान सपने में सोचने तक की गलती नहीं करता.", भन्नाये से दलीप सिंह की आवाज चाह कर भी तेज न हो सकीय थी. दीवान पर बैठते हुए चेहरे पर dard-gussa और बेबसी के mile-jule भाव लिए वह हाथ पांच रहे थे.

"लाड़ली तोह वैसे वह ब्याह से पहले तक आपकी हे थी. मुझे तोह आपने बस उसकी पालनहार समझ के रखा हुआ था. जरा सुनु तोह आपकी लम्बी नाक पर मेरी लाड़ली कैसे पहुंच गयी.?", सरोज मौसी के स्वर में सिर्फ बेबाकी थी.

"कुछ कह भी नहीं सकता और कर भी नहीं सकता, इतना बेबस मैं कभी न था सरोज. मंजू वह खेत में शंकर के बेटे के साथ उस हालत में थी जिसको देखना हर बाप के लिए शर्मनाक है. कैसे मुमकिन है ये सब? मेरे लिए तोह दोनों एक सामान हे हैं.", आज दोपहर में अपनी बेटी और na-maloom दामाद को देखने वाले वही तोह थे.

"गौमती तोह आपकी सगी चचेरी बहिन नहीं है? सुना है ब्याह के बाद तक वो अपने लाडले बड़े भाई की गॉड में खेलती रही है. वैसे मंजू की शादी जहा आपने करवाई थी वह तोह खुद आप लोगो ने उसका संसार उजाड़ डाला. अब जहा वो अपनी मर्जी से खुश है, उधर भी आपको दिक्कत है. हो क्या आप? बाप? कसाई? भेड़िये या फिर मुँह खराब करके नयी उपाधि दे दालु?", सरोज की आवाज नरम न थी इस वक़्त और दलीप सिंह के पाजामे के अंदर पिछवाड़े तक पसीना आ चूका था ऐसी खरी खरी सुन्न कर. सरोज तोह कभी उसके साथ तीखा व्यवहार न करती थी. कभी कोई सवाल नहीं के वह कहा जाता है क्या करता है लेकिन आज. वह भी इतनी बड़ी बातें कह डाली थी.

"गौमती के साथ जो भी मेरा सम्बन्ध था मैं उसमे तुम्हारा पापी हु सरोज लेकिन ये जो मंजू और अर्जुन के बीच हो रहा है वो तूफ़ान ला देगा कई घरो में. शंकर गौशाला पे हे था और अगर वो ये सब देख लेता या फिर राजेश? देखो मैं माफ़ी मांगता हु अपने किये की तुमसे. मुझसे बदले की भावना में गलत हो गया और मंजू मेरी जान है. उसकी ज़िन्दगी बर्बाद हो जाएगी."

"वो पेट से आपकी करनी की वजह से. गिरवा दो बचा और फिर से बांध दो उसको किसी के पल्ले, बकरी है न वह तुम्हारे खानदान की. बदले की भावना वाले कसाई अपने खून से साणे कपड़ो के लिए किसी और को जिम्मेवार मैट ठहराओ. चुड़ैल भी बलि किसी और की देती है अपनी औलाद की नहीं. वो खेत मेरा है और आइंदा वह कदम मत रखना आप, कह देती हु. रही बात अर्जुन की तोह वह इस घर के अंदर मेरा दामाद है जिसने मेरी बेटी को एक सही जिंदगी दी. उसके और मंजू के बाप की तरह उजाड़ी नहीं.", सरोज बेफिक्र सी ठीक सामने बैठ गयी थी एक कुर्सी पर. दलीप सिंह शून्यभाव से बस सोच रहा था.

"पंडित जी से ये राज न बचेगा सरोज. मुझे चिंता अर्जुन की है और उसकी ज़िन्दगी किसी और लड़की के साथ पहले हे बाँधी जा चुकी है. मैं तुम्हारे सामने से कही न जाऊंगा और जहा भी गया तुम्हे लेके जाऊंगा लेकिन ये अनर्थ रोक दो."

"यही बात शंकर जी को यहाँ बुलवा कर कहिये, मैं भी विचार करुँगी. फ़िलहाल मेरे बचे खुश है अपनी दुनिया में. अर्जुन एक जिम्मेवार पति और दामाद है, मंजू का हर फैंसला वो करेगा और बात करनी होगी शंकर जी के साथ बैठ कर आपको. हाँ मंजू उसके साथ हे होगी उस समय भी. मिलाये तोह जरा शंकर जी को फ़ोन.", सरोज ने कहते के साथ हे स्टूल पर रखा फ़ोन आगे कर दिया था दलीप के. सोचने समझने की ताक़त जब न बची हो तोह आदमी हुकुम मान हे लेता है. दलीप को पता था शंकर अभी कहा होगा. डायरी से नंबर निकल कर बस हैंडल कान पे टिकाये वह प्रतीक्षा करता रहा.

"शंकर भाई दलीप बोल रहा हु."

"पता है भाई, आवाज जानता हु तुम्हारी. लेकिन घबराये हुए क्यों हो? मुसीबत में तोह नहीं, मैं आता हु तुम्हारे पास."

"सुनो भाई सुनो. एक बहोत बड़ी घटना हो गयी है शंकर. मंजू और अर्जुन...", अब वो अटक गया था इतना कहते कहते और दूसरी तरफ शंकर की बेचैनी बढ़ गयी थी इन 2 नामो को सुन्न कर.

"क्या हुआ उन दोनों को? कहा है वह दलीप? कुछ तोह बोल मेरे दोस्त, देख उन पर मुसीबत आयी तोह मैं bina-wajah मारा जाऊंगा."

"शंकर, यार उन दोनों का चक्कर है. मुझे माफ़ कर दे यार लेकिन मुझे आज हे पता लगा के मेरी बेटी अर्जुन के साथ शर्मनाक हालत में थी.", दलीप दर्द में इतना हे कह सका.

"Pati-patni के बीच क्यों आते हो मेरे भाई? हमारे पास किसी के भी सवाल के सही जवाब नहीं है. और जो सही है उनसे सवाल करके हम ज्यादा गिर जायेंगे. तेरी बेटी उसकी बीवी है बस यही एक गुप्त सच है. अपने तक हे रखना इस बात को, वैसे भी लफड़े 50 पहले से है कही ये अब तुम्हारे पीछे पड़ गया तोह तुम्हे तोह बचने वाला भी कोई नहीं. मेरे पास माँ तोह हैं.", शंकर से तोह ऐसे जवाब की उम्मीद तक न थी दलीप को.

"तुम्हे पता है क्या कह रहे हो?"

"हाँ पता है. हम दोनों सचमुच कसूरवार है मंजू के और अर्जुन उसका सबकुछ. और ये बात भी समझ लेना के अर्जुन की शादी परिवार के हिसाब से प्रीती से हे होगी, लेकिन वो लड़की भी शायद शामिल है Arjun-Manju के साथ. हम बहार है तोह हमारे लिए फ़िलहाल ठीक है. तू गौमती के पास जा थोड़ा ठंडा करेगी तोह चैन से समझ सकेगा.", ये नाम भी सरोज को सुनाई दे गया था बाकी बातों के साथ. हड़बड़ाहट में दलीप ने तुरंत फ़ोन रख दिया.

"मैं भगवन कसम खाता हु के गौमती के साथ अब मेरा कुछ नहीं है. आइंदा मैं उनके परिवार के भी किसी इंसान से नहीं मिलने वाला. मुझे कैसे भी माफ़ कर दो सरोज."

"आप बस अब वही करोगे जो इस घर के लिए ठीक होगा. काम राजेश के साथ जो की मंजू के हिस्से किया है अर्जुन ने और बाकी वक़्त यहाँ घर में. अपने भाई को बोल देना के उस खेत में न जाए और वह जब भी हम काम करेंगे, पता होना चाहिए. बगीचे वाली तरफ घेराव करवा दो और वह 2 एकड़ मंजू के नाम. बाकी सब तोह सही है. मैं नहीं रोकती गौमती के पास जाने से या बिंदिया के. चाय ला रही हु.", सरोज जाते हुए ये नया नाम भी बम की तरह फोड़ गयी थी अपने पति के सर पर.

'सही कहते थे पंडित जी, बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी. फटती भी ऐसी की अब दुबारा सील न पायेगी.', दलीप बेबस सा यही कह सका खुद को. दिल ग़मगीन था और बीवी अब भी साथ थी. आँखों में पानी आ हे गया था.

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"तू अब इधर आ कमरे में, भागता फिर रहा है न मैं सब समझती हु.", अर्जुन नाहा धो कर बाथरूम से निकला तोह कोमल दीदी ने बैठक का दरवाजा अंदर से बंद करते हुए उसको बिस्टेर पर बैठा लिया.

"क्यों भागूंगा मैं आपसे.? बस थोड़ा व्यस्त था और सब होते है यहाँ. कोई आ जायेगा दीदी."

"कोई नहीं आता तू निश्चिंत हो जा. और चल अब बता के मधु बुआ के साथ क्या हो रहा है?", सीधा सवाल तोह टेढ़ा जवाब देने की गलती अर्जुन यहाँ तोह नहीं कर सकता था. अगले 20 मिनट तक रट्टू तोते की तरह वह सब बोलता गया सिवाए अपने पिता के राज के. कैसे उसने बुआ के साथ सम्बन्ध बनाये, बुआ को उस से प्यार होना, बुआ की परेशां हालत और साथ हे दादा जी का बेटी के लिए व्यथित होना. आखिर में जब उनके ससुराल में शामिल होने का उल्लेख किया तोह कोमल ने अपने भाई को प्यार से गले लगा लिया.

"तोह इसलिए बुआ रो रही थी? देख समबन्ध के बारे में तोह मैं क्या हे कहु. दोनों व्यस्क हो और वह समझदार बड़ी महिला है. लेकिन तूने ये बहोत ाचा किया के उनकी ज़िन्दगी को सही मंज़िल तक पंहुचा दिया. जिस इंसान का दिल छलनी हुआ हो न अर्जुन, उसको प्यार की मरहम लगाना गुनाह नहीं है. वैसे 2-3 सवाल और है मेरे पास.", कोमल दीदी ने अर्जुन का हाथ पकड़ते हुए पूछ हे लिया.

"जी आप पूछिए."

"तेरे कुछ बातें समझ में नहीं आती मेरे भाई. कहा था के हर उस लड़की के साथ शामिल मैट होना जो कहे की उसको तुझसे प्यार है? ये गलतिया तुझे कही का कही ले जा सकती है."

"आप किसकी बात कर रही है?", अर्जुन ने दिमाग पर जोर डाले बिना कहा.

"ाचा ये छोड़ और जरा ये बता के हिमानी, ऋचा और विनीता दीदी के बारे में तुम क्या फील करते हो. मुझे पता है के तुम हमेशा सच बोलते हो.", कोमल दीदी ने जैसे ये बात कही थी अर्जुन बिस्टेर पर थोड़ा सही से हो कर बैठ गया.

"बता रहा हु दीदी लेकिन इसके बाद एक सवाल मेरा भी होगा. सबसे आखिर में."

"ठीक है. आज तुम सवाल भी कर लेना."

"हिमानी दीदी एक जिम्मेवारी है मेरे लिए, जिन्हे बड़े विश्वास से आचार्य जी ने मेरे सुपुर्द किया है. वो उस सूक्ष्म पल में हे क़ैद है जहा अगर उन्हें निरंतर बाहरी दुनिया का एहसास न कराया जाये तोह वो वापिस बंद हो जाएँगी. मैं उन्हें अकेला ठीक नहीं कर सकता. हो सकता है इस सबके दौरान वह मुझमे दिलचस्पी ले और ऐसा स्वाभाविक है दीदी. लेकिन मेरा लक्ष्य है के बिखरे कांच को गोंड से जोड़ने की जगह पिघला का एक मजबूत मूरत दू, जिसमे कोई और अक्स न हो. हिमानी दीदी के बारे में मेरा यही विचार है.", अर्जुन ने हर शब्द को गहनता से कहा, सोच समझ कर.

"और ऋचा?"

"उनके बारे में हम व्यर्थ हे बात करेंगे दीदी. सवाल भी आपके पास, जवाब भी आपके पास. लेकिन अगर कुछ मेरे मुँह से हे jaan-na है तोह बता देता हु. वो हैं चंद्रो देवी की पौती और इनकी माता जी का नाम है मधुलता Singh/Lata शर्मा. दिमाग मजबूत, हर चीज को सिर्फ देखना समझना और चुप रहना. मतलब जीवन में 2 किरदार जीने वाली, शायद अतृप्त और एक आशावान लड़की. मुझको भाई की तरह देखती है, ऋतू दीदी को किसी प्रतिस्पर्धी की तरह और सामने दिखती चीज का पता पूछने वाली. मतलब बात करने के लिए उत्सुक एक अकेलेपन की शिकार, मासूम लड़की. आधा सच और na-maloom सच उनकी ज़िन्दगी को आसान नहीं करने वाला.", अर्जुन के इस जवाब पर कोमल की धड़कन तेज हो गयी थी. वो उसकी सोच से आगे जा चूका था और जैसे किसी सचाई के करीब जो कोमल के साथ साथ किसी को भी न पता थी.

"विनीता?", ये नाम लेते हुए होंठो कंपकंपा रहे थे.

"वो तोह आपके हे जैसी है न दीदी? उनके बारे में तोह हमको नहीं बात करनी चाहिए. आप चाहती है के ये मैं कहु या आप वैसे हे समझ जाये जैसे आप Tara-Priyanka दीदी के बारे में जानती है.", अर्जुन से आज शायद वो गलत हे उलझ गयी थी लेकिन कोमल दीदी जानती थी की अर्जुन हैं तोह उनसे छोटा हे.

"तुम आज सुबह कहा गए थे? आचार्यजी तोह बहार है और एक बात मैं कह देती हु की कामवाली बाई ने तुम्हे कुछ सन्देश दिया था. बिमला जीजी के नाम से.", यहाँ अब माहौल बदल कर कोमल दीदी के पक्ष में आ चूका था. घडी ने इतनी जल्दी पौने 8 बजा दिए थे लेकिन अर्जुन कुछ सोच कर अपनी बात कहने लगा.

"साधू सिंह अंकल की बीवी है बिमला देवी. उनकी बेटी है काजल जिसके साथ मैंने जंगल में 3-4 बार वो सब किया है. सच कहता हु के वह सिर्फ जिस्मानी जरुरत जैसा है जो खुद वह चाहती है. मैंने वह जाना छोड़ा तोह बिमला आंटी ने यहाँ सन्देश भिजवा दिया. मुझे नहीं पता था के आपने सुन्न लिया था वह. इसलिए सुबह मैं काजल के साथ फिर से वही दोहरा कर आया. एक और लड़की भी शामिल थी आज."

"कौन है वो लड़की?"

"स.. s..Savita नाम है उसका दीदी."

"वो तुझसे प्यार करती है?"

"हाँ. और पहले मैंने उसको हे देखा था काजल से. लेकिन हमने कुछ किया नहीं और अब उसकी शादी है 2 महीने बाद काजल के भाई के साथ."

"और इन 2 महीने में तू उसको भी औरत बना देगा? मैंने झूट तोह नहीं कहा न?"

"हाँ. वो यही चाहती है."

"तू क्या चाहता है अर्जुन ये जरुरी है. इधर देख कर बात कर निचे देखने से ये बात नहीं छुप जाएगी की तेरा सम्बन्ध शायद बिमला देवी से भी है.", कोमल दीदी ने आज पहली बार थोड़ा जोर से कहा था. अर्जुन के चेहरे पर अजीब से भाव आ गए थे.

"मैं क्या करू दीदी? सामने से अगर कोई खुद तैयार हो और फिर मेरा भी दिल हो उस लड़की के साथ तब मैं क्या करू?"

"मेरे और उस सविता में से किसी एक को चुनन ले भाई.", दीदी ने इतनी बड़ी बात कह दी थी की अर्जुन बिना कुछ कहे बस उनके गले लग गया था.

"एक बार ऐसे हे हादसे ने बहोत कुछ बदल दिया था अर्जुन. मैं नहीं चाहती की तू शिकार हो किसी क्षद्यंत्र का. तू शिकार नहीं करता क्योंकि तू प्यार करना जानता है. लेकिन खुद हे सोच तू उस लड़की के प्यार को महसूस करना चाहता है या जिस्म को? अगर वो तुझे के नजर में कभी ाची लगी होगी तभी तोह वह आजतक अक्षत है. आज वह उस देहलीज पर है जहा वह अपना सबकुछ तेरे हवाले करके तुझे अपना बनाना चाहती है. इसमें काजल या बिमला देवी जैसा वो kaam-vaasna या सुख का चाह नहीं रे पगले. खुद हे सोच के पहल सविता मिली लेकिन 3-4 बार तू काजल के साथ एकाकार हुआ. ये सब महीने 2 महीने के बीच तोह हुआ हे होगा. इतना सबर करने वाली को तू क्या जवाब देगा? या वो लड़की क्या लेके अपने पति के पास जाएगी जब आत्मा तेरे हवाले हो जाने वाली है. कई मंदिरो में दिए किसी और को भी जलने दे ारु, पंडित प्रेम का हर कोई. न कोई न होये. अब तेरा सवाल.", दीदी ने जो आइना दिखाया था वह बहोत था उसके लिए.

"मैं आपसे प्यार करता हु. और आइंदा ये मत कहना के किसी के लिए भी आप खुदको सामने रख देंगी. मेरा कोई सवाल नहीं है बस.", अर्जुन हलकी नाराजगी में था और चेहरा पर हल्का दर्द. कोमल दीदी ने भी उसके चेहरे को पकड़ते हुए होंठो से होंठ जोड़ दिए. जब अलग हुए तोह अर्जुन शरमाने लग रहा था.

"हाँ अब बोल. तू मेरी जान है ारु और मैं जानती हु के तू मेरे बिना नहीं रह सकता. तभी तुझे सुधरती हु थोड़ा थोड़ा. बाकि तू जो मर्जी करता रह."

"ी लव यू.", इस बार अर्जुन ने उन्हें चूमने के बाद बाहों में ले लिया था. कुछ देर तक वह उन्हें जकड़े रहा तोह कोमल दीदी को भी पता लग गया के वह सचमुच परेशां हो गया है.

"ाचा बाबा. आइंदा ऐसा नहीं कहूँगी. लेकिन अब तू न अपना सवाल कर.", कोमल दीदी ने अर्जुन को गले लगा लिया था.

"मुझसे शादी कर लो."
 
दोस्तों, माफ़ी चाहता हु के आप सभी के रेविएवस पढ़ने के बावजूद मैं रिप्लाई नहीं दे प् रहा लास्ट 2 उपदटेस से.

आज का काम ख़तम होते हे सभी सवालो के और रेविएवस के रिप्लाई करूँगा. काम सचमुच ज्यादा था जो आज ख़तम हो जायेगा.

जल्द हे बातचीत शुरू करेंगे ?
 
अर्जुन सिंह का अपडेट आज पॉसिबल है. 50%
 
अपडेट 120

फैंसले - फांसले


"शादी. सुन्न ने में तोह बस एक लफ्ज़ है अर्जुन लेकिन इसके मायने इतने विशाल है के तुम समझ नहीं सकते. और मैं थोड़ी खुदगर्ज़ हु, प्यार की डोर से हे बंधे रहने दो भाई. वैसे भी तुम्हारी राहें पहले हे बड़ी मुश्किल है. तोह सवाल करो जो तुम पूछना चाहते हो?", कोमल दीदी का ये जवाब सचमुच गहरा था और इंकार करना अपने आप में एक रहस्य सा. अर्जुन भी बस उन्हें देखता रह गया.

"आप चाहती है के मैं वो सब करना बंद कर दू तोह मैं ऐसा कर सकता हु दीदी.", अर्जुन ने एक और कोशिश की लेकिन सामने कौन है ये जैसे इस पल में वो खुद भूल रहा था.

"क्या बंद करने को कह रहे हो तुम अर्जुन? अगर तुम्हारा मतलब शारीरिक सम्बन्ध बनाने से है तोह वह एक न एक दिन खुद बंद हो जायेगा. समझदारी से या फिर दुर्घटना होने के बाद. लेकिन ऋतू, अलका, तारा, Manju-Preeti या खुद मेरे साथ तुम भावनात्मक और आत्मिक तौर पर जुड़े हो, ये कैसे रुक सकता है? सेहन तोह तुम रेणुका से अलगाव हे नहीं कर पाए थे. वो वाडे कभी मत करना अर्जुन जिनका पूरा न होना प्यार को गलत रूप दे दे. तुम मेरे हो, ये सच है लेकिन मैं तुम्हारी रहूंगी ये भविष्य हे फैंसला करे तोह सही होगा. अगर कुछ कर सकते हो तोह इतना करो के जब जिस्म में वो अलग से गर्मी तुम्हे बहार ले जाने लगे, अपने कदम वापिस अंदर ले आना.", कोमल दीदी ने अर्जुन के चेहरे को बड़े प्यार से सहलाते हुए कहा.

"कदम घर में ले औ? और ये गर्मी लगती हे क्यों है दीदी? सच कहु तोह मैं ऐसा कुछ करना हे नहीं चाहता और जब सामने से हे कोई हाथ पकड़ लेता है तोह मैं खुद साथ चल देता हु. आप कहती है के वादा पूरा नहीं होता तोह मैं इतना हे कहूंगा के इसको कोशिश समझ लीजिये मेरी. लेकिन घर आने का मतलब भी बता दीजिये."

"तुम्हे मैंने कहा था न के सविता और मेरे में से एक को चुन लो. तुमने मुझे चुना तोह वो दर्द भी मैं हे दूर करुँगी. तुम ऋतू या तारा के भी पास जा सकते हो या फिर बाकी किसी के भी जो सिर्फ तुम्हे वैसा हे प्यार करता हो जैसा तुम. आज रोकना शुरू करोगे तोह शादी तक संभल हे जाओगे. जानती हु के ये सब इतना आसान नहीं होगा तुम्हारे लिए लेकिन मुझे यकीन है के तुम दर्द बर्दाश्त कर सकते हो. बस जैसे हमेशा सावधान रहते हो वैसे जरूर रहना, घर है ये.", कोमल दीदी ने इस बार जैसे अर्जुन का सर अपने पेट पर लगते हुए सहलाया था उसमे कही से भी premika-behan वाला स्पर्श न था.

"ये बदलाव कैसे आ रहे है दीदी?", आखिर अर्जुन ने अपना सवाल पूछ हे लिया था इस स्नेह से भरे divya-sparsh में अभिभूत हो कर. कोमल दीदी वैसे हे उसका सर सहलाती कड़ी थी. वो भी क्या जवाब देती उस सवाल का जिसकी असली वजह तोह खुद उन्हें भी पता न थी. अर्जुन का प्रेम तोह उनके साथ दुनिया से परे हे था, जिस्मानी क्या रूहानी क्या.

"कैसे आ रहे है इसका तोह मैं भी क्या जवाब दू अर्जुन. बस इतना जानती हु के जो बदलाव ला रहा है तोह उसको हे इन्हे झेलना होगा. तू हमारा है और हम सब तेरे लेकिन तुम हमेशा वही मासूम से प्यारे भाई रहने वाले हो जिसको मैंने अपने सीने से लगाए रखा था. आज माँ के पास सो जाना ारु, मैं चलती हु निचे.", कोमल दीदी ने जवाब भी ऐसा दिया जिसमे कितने हे सवाल थे लेकिन अर्जुन अगला सवाल नहीं कर सकता था.

"दीदी, रेणुका."

"माँ के पास अर्जुन. रेणुका अपने घर हे रहेगी कुछ दिन.", कोमल दीदी ने कोई आदेश न दिया था, परवाह थी अपने छोटे भाई की जिसका दर्द वो उस से भी ज्यादा समझती थी. अर्जुन के शरीर में आने वाले बदलाव बाहरी और मानसिक तोह सभी करीबी लोगो को दीखते थे लेकिन शायद कुछ ऐसा था जो कौशल्या जी को भी न दिखा और कोमल से न छुपा. कोमल दीदी के जाने के बाद अर्जुन भी निचे अपनी माँ के कमरे में चला आया. रुपाली दीदी के साथ खाना करके वो दोनों हे पढ़ते रहे जबतक रात न गहरा गयी. विन्नी ने भी कोशिश की थी अर्जुन से बात करने की लेकिन अलका एक बाहरी कवच थी जो उन्हें अपने साथ हे ले गयी. आज सही मायने में अर्जुन किसी छोटे बचे सा रेखा जी की छाया में सुकून से सो गया था.

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साल 1973

"अरे भोले भाई, तुम न दिमाग वाली बात दिल से और दिल की बात लुंड से सोचते हो. तभी तुम्हे रामेश्वर जी में भी वह ईश्वर काका न दिखे जो बंधे हाथ थे.", ये अज्जू हे था जो हवेली की छत पर उमेद, शंकर और नरिंदर के साथ सबके लिए जाम बना रहा था, अँधेरे में. आज यही लोग थे कुछ काम करने वालो के सिवा यहाँ. इनके mata-pita शीलू और शालिनी को अपने साथ ले गए थे रामेश्वर जी के घर.

"हाँ तोह ये बात सबको पता है सिवाए शंकर के. हाहाहा", उमेद ने हँसते हुए कहा तोह अज्जू ने अपने बड़े भाई को घूर के देखा जैसे वह माहौल को ठीक रखना चाहता हो. लेकिन शंकर तोह वो सांड था जिसको कुछ और दिखाई न देता था जब ब्यौरा जाये.

"क्या दिखा तुम्हे ईश्वर काका में जरा बताओ प्रभु? हमारे आदरणीय शो रामेश्वर शर्मा जी ने बेडा गरक करने का ठान लिया हो तोह फिर माता कौशल्या जी भी कैसे रोक सकती थी? और मैं डॉक्टरी की पढाई कर रहा हु, दिमाग है मुझमे.", शंकर ने ये मॉटे कांच का गिलास एक बार में हे हलक से निचे उतार लिया था. बहोत दुःख था दिल में आज अपनी लता को खोने का और इसका दोष भी अपने पिता को देते हुए सबसे ज्यादा बुरा लग रहा था.

"ाचा भोले एक बात बता, कौवे और हांसे में क्या समानता है?", अज्जू ने भी अपना गिलास उठाया और बाकी दोनों की तरफ देखने के बाद घूँट घूँट पीने लगा. इसने एक पूरा जग निम्बू की शिकंजवी बना राखी थी अपने लिए. बेशक माहौल ठंडा था लेकिन swaad-swaad की बात है.

"दोनों पक्षी है. अब तू चुतियो जैसी बातें क्यों कर रहा है अज्जू? मैं उस फ़तेह और सुंडी की गांड मार लूंगा.", शंकर खुद हे वो प्लास्टिक की बोतल से रम डालते हुए अपना अगला जाम बनाने लगा लेकिन अज्जू ने गिलास और बोतल एक तरफ रख दिए. इन्दर और उमेद अभी पहला हे पी रहे थे.

"देख तीनो बात गलत कही और फिर कहते हो के तुम्हारे दिमाग में लुंड नहीं है. कौवा और हंस दोनों विपरीत रंगो के है लेकिन उनका प्रेम जो होता है न वो एक सामान होता है. हंसो का परिवार होता है न उसमे प्रमुख नर एक जवान हंस को तभी शामिल करता जब वह जवान हंस को अपनी बेटी के लिए म्हणत करते देखता है. फिर भी मादा की मर्जी होती है नर को पसंद करने में. जोड़ा बन्न जाये तोह फिर ये दोनों अलग हो जाते है. हंस साड़ी ज़िंदगी एक हंसिनी के साथ बिता देता, एक मर्डर जाये तोह दूसरा भी ज़िंदा नहीं रहता. ऐसे हे nar-kauva अपनी प्रेमिका के साथ एक आशिक़ जैसी शुरुवात करता है. मादा को कभी पत्थर भेंट करेगा, कभी लकड़ी तोह कभी भोजन. वह मादा भी न भोले इसका मजा लेती है जबतक वह उस पर विश्वास न करने लगे. फिर दोनों अपना जीवन साथ गुजरते है, ज़िन्दगी भर. तुम न तोह कौवे हो और न हे हंस, भोले.", अज्जू हमेशा हे अपनी बात कहानी के हिसाब से कहता था. लेकिन सबको पसंद आती थी उसकी बातें जिनमे ज्ञान और सच्चाई होती थी.

"ये सांड है अज्जू, तू क्या इसके सामने cheel-kauve-bagule के बातें कर रहा है.", उमेद ने भी अपना खली गिलास बीच में रखते हुए कहा.

"इसने बगुला चील कब कहा गज्जू? हंस और कौवे का सटीक उदहारण दिया है. और अगर शंकर किसी पक्षी सा है तोह वह मोर हे होना चाहिए या फिर बाज.", ये इन्दर उर्फ़ नरिंदर बोलै जो हूबहू शंकर जैसा हे था, थोड़ा सा लम्बा लेकिन.

"हाँ कैसे भूल गया था के यहाँ तोह पहले हे परम ग्यानी ध्यानी उमेद जी है और उनके साथ इन्दर देव. भय इसकी सांगत में ज्यादा न रहा करो, किसी दिन ताव में आके आग लगा देगा ये भोलेनाथ. मोर, कहा से मोर दीखता है तुम्हे ये मेडी भैया? देसी मुर्गा है शंकर वह झुण्ड का सबसे तगड़ा वाला, जो अपने बाड़े में कुत्तो को भी न आने देता. हर मुर्गी पर चढ़ जाता है, चाहे उसकी मर्जी हो या न हो. लेकिन वो होती है न एक सफ़ेद तगड़ी मुर्गी जो गांड पे चोंच मारती रहती है उस aashiq-bhogi मुर्गे के वही इसकी जान बस्ती है. हम कहना छह रहे थे कुछ और ले आये कही और.", अज्जू ने पहले गज्जू का जाम बनाया फिर इन्दर का और आखिर में शंकर का गिलास आगे कर दिया. दबे मुँह इन्दर हंस भी रहा था शंकर की तुलना मुर्गे से करने पर.

"गज्जू यार इसका रेडियो बंद करवा. खुद शिकंजी पी कर भाई का गम करने की बातें कर रहा है. लेकिन कोरा ज्ञान देने के सिवा कुछ कह नहीं रहा."

"भोले भाई, सुनो अब गौर से. तुम्हारी मुर्गी कोई गले पे तलवार लगा के तोह लेके न गए सोमबीर ताऊजी अपने घर. थानेदार काका तोह तुम्हारे लिए जान दे सकते है ये रिश्ता मांगने वाली बात बहोत छोटी भला. गए तोह पिता जी भी थे न काका के साथ? वह सबको यही दिखा के लड़की का रिश्ता उधर हो गया, शंकर से लता भाभी दूर हो गयी या बिरादरी बीच में आ गयी लेकिन किसी ने ये नहीं पुछा के वह सोमबीर काका आये कैसे? लता भाभी ने रामेश्वर काका तुम्हारी तरह हे कबूला होगा के वह तुमसे प्यार करती है? और ये बात की अब वह ब्याह होने तक घर में हे रहने वाली है कोई पुरुष मिल नहीं सकता उनसे?", शंकर और इन्दर के तोह जाम जमीन पर हे आ गए. अज्जू की बात जरा भी कोरी न थी और अब उमेद बोलै.

"देख भोले, बात में दम है. चाचा जी सबसे ज्यादा तेरा हे करते है और वो इतनी जल्दी ईश्वर काका के घर भी आ गए. लेकिन बात सिर्फ 2 हे जगह खराब हुई होगी. बिरादरी से काका के बहार होने के अंदेशे पर या फिर लता की तरफ से. होने को सोमबीर ताऊजी भी इस सबके पीछे हो सकते है क्यूंकि शीला भी साथ थी."

"होने को तोह ऐसा भी हो सकता है के पापा ने सोमबीर ताऊजी के वह होने और रिश्ते की पहल करने पर खुद हे कदम पीछे ले लिए हो. सब जानते है वो बड़े है और सब पर हुकुम चलते है, सुंडी शुरू से मेरी लता के लिए पागल है और पापा झगड़ा नहीं चाहते जो की हो हे जाता अगर सोमबीर ताऊ की बात ताल दी जाती. मतलब मेरे पापा ने प्रयास तोह किया लेकिन फिर घुटने तक दिए.", शंकर के इस बयान पर बाकी तीनो हैरान थे. वो मधु का तोह जीकर हे नहीं कर रहा था.

"देख भोले तुझे वचन देता हु भाई के अगर कही भी ऐसा कुछ है तोह लता भाभी को मैं हाथ पकड़ कर उनकी हवेली से लेके आऊंगा और फिर मंदिर में हाथ रखवा कर सच बहार निकलवाऊंगा. लेकिन ब्याह होने तक ईश्वर काका की इज्जत नहीं उछालनी भाई. वह पूरे गाँव को परिवार मानते है. रही बात रामेश्वर काका की तोह अगर उनसे जुबान लड़ाई तोह फिर मैं तेरे से बात नहीं करूँगा.", अज्जू ने जैसे हक़ से कहा था शंकर कुछ शांत हो गया.

"देख भाई भोले, बनवारी मां और मैंने कहा था न के तू लता को लेके भाग जा. तब बात सिर्फ ईश्वर काका और चाचा जी को मानाने से हल हो हे जाती लेकिन तेरी लता को तोह ये भी पसंद नहीं आया था. और अब अगर कुछ भी ऐसा वैसा किया तोह भाई मूछ के नाम पर talware-banduke निकल जाएँगी और ऐसा राममेहर के बदमाश लड़के चाहते भी है. हम किसी से डरते नहीं भोले और ये उन सबको पता भी है लेकिन एक गलत कदम और सब अपने खिलाफ हो जाने वाले है भाई.", उमेद ने अपने दलील पेश की तोह इन्दर ने भी उसका साथ दिया.

"शंकर तुम कहोगे तोह मैं ये भी कर सकता हु, Gajju-Ajju की भी जरुरत नहीं पड़ेगी अगर लता को उठा कर हे लेके आना. लेकिन भाई पापा ने सबके सामने कहा है और उनकी बात मतलब उनके हे खिलाफ जाना. चल भाई कल कॉलेज वापिस चलते है विजयदशमी तोह हो गयी अपनी. तू कॉलेज ख़तम कर और अपना वो सपना पूरा कर जो तेरी म्हणत पर निर्भर है. प्यार करना है तोह अब इस से हे कर ले."

"लता को नहीं भूल सकता इन्दर और पापा के खिलाफ जाने का सोच भी नहीं सकता. अज्जू तू कॉलेज हे आ जाना गज्जू के साथ, मैं शादी में तोह आऊंगा नहीं जो की सोमबीर ताऊजी पक्का आमंत्रित करने वाले है. लेकिन लता से इतना कहना के वह मुझसे एक बार जरूर मिले. बात करना जरुरी है भाई.", शंकर ने गिलास खाली किया और उठ खड़ा हुआ. तजा तजा सिग्रत्ती की आदत लगी थी अपने कॉलेज के हे एक दोस्त से तोह एकमात्र सिग्रत्ती जेब से निकाल कर जलाते हुए छत्त की मुंडेर से बहार देखने लगा.

इस रात के बाद शंकर और इन्दर इस हवेली लौट कर ना आये थे. कौशल्या जी भी बेबस थी और रामेश्वर शर्मा तोह थे हे ऐसे इंसान सो अपने परिवार के से पहले बहार की सुरक्षा का ध्यान रखते थे, उनकी धर्मपत्नी बहोत थी परिवार को सँभालने के लिए. वो दिन भी आ गया था जब सोमबीर सिंह की हवेली से सुरेंदर और उसके छोटे भाई की बारात निकली और लता को ब्याह कर हवेली की तीसरी बहु बना दिया गया, वही सबसे छोटे बेटे का विवाह भी बिंदिया नमक युवती से एक हे मंडप में हुआ. 10 गाँव निमंत्रित थे और बड़े बड़े mantri-santri भी. सब खुश थे इस विवाह से लेकिन अगर कोई दुखी था तोह वह 4 लोग थे. चंद्रो देवी जो हवेली के प्रमुख सोमबीर सिंह की पहली बीवी थी, कौशल्या देवी जिनका बीटा अब गहरे दर्द में था और दिवाली भी घर मानाने न आया था, ईश्वर सिंह (पांच) जो जानता था के ये गलत हुआ है और शंकर शर्मा.

यहाँ रामेश्वर शर्मा अपनी धर्मपत्नी और बेटी मधु के साथ पधारे थे तोह इस खूबसूरत लड़की पर गन्दी नजर पड़ हे गयी थी मोहर सिंह नामक इस व्यक्ति की. अपनी बीवी की मदद से उसने जान लिया था के ये लड़की कहा पढ़ती है और फिर खामोश रहा ब्याह होने तक. सब ाचे से निबट गया था और पहली बार सोमबीर सिंह ने कौशल्या देवी के सामने हाथ जोड़े थे. बता भी दिया था के उनके लिए उनके बेटे की चाहत कितनी जरुरी थी. लेकिन समय हमेशा एक सा नहीं रहता. लता से ब्याह के 10 दिन बाद अज्जू मिलने आया था.

सोमबीर सिंह की हवेली में ऐसा नहीं था के किसी भी बचे से कोई बैर बड़ो ने रखा हो. शंकर भी यहाँ फ़तेह की बीवी सुशीला के बचो से मिलने खेलने आता था, उमेद का भी जुड़ाव था और अज्जू को तोह खुद सोमबीर सिंह पसंद करता था. तीनो युवको को भरपूर प्रेम मिलता था यहाँ चंद्रो देवी से. इन्दर हे एक था जो यहाँ आना पसंद नहीं करता था.

"लता भाभी, कुछ बात करनी थी आपसे.", अज्जू ने हवेली के पिछले आँगन में धुप सेकने बैठी लता से कहा. हाथो पर मेहँदी का रंग उतर चूका था और चेहरे पर भी कोई ख़ास चमक न थी लता के. अज्जू को अपने करीब बैठा देख जहा एक तरफ उसको ख़ुशी हुई थी वही दिल में दर्द भी.

"हाँ तो बोलो न देवर जी. बात करने का हक़ तोह सबको है."

"बुरा न maan-na लेकिन भोले एक आखिरी बार आपसे मिलना चाहता है. अब तोह ब्याह को हफ्ता पूरा हो गया, बहार जाने से तोह न रोकने वाला कोई आपको. दोपहर में निकल लो कल.", अभी वो दोनों हे खुसर फुसर कर रहे थे के अंदर से लता के जेठ फ़तेह ने दोनों को देखने के बाद खिड़की बंद करते हुए वैसे हे आवाज लगाई.

"मुन्नी, जरा पानी का जग देना. सुशीला शायद ज़िले के घर गयी हुई है.", आवाज ऐसे सुनाई दी थी जैसे दूर से पुकारा गया हो.

"भाभी, आप हो आओ अंदर. मैं इन्तजार करता हु.", अज्जू भी खड़ा हो इस पिछले आँगन में हे एक तरफ खेल रहे छोटे लड़के के साथ मस्ती करने लगा. 5-6 साल का ये लड़का भी अज्जू को पसंद करता था.

"चाचा, मैं न नया लाटू लाया हु आप यही रुको फिर दोनों घुमाएंगे उसको. कमरे से अभी आया मैं.", बचा तेजी से दौड़ कर सामने वाले हिस्से से हवेली में दाखिल हो गया और अज्जू इस मिटटी के आँगन में बैठा अपने हे विचारो में उलझा रहा. लता को पानी देके आने में 15 मिनट लग गए थे और वह छोटा बचा भी वापिस न आ कर बड़े ध्यान से अपनी नयी चची को अज्जू चाचा से बात करते देखने लगा.

"देख अज्जू, मैं बहार तोह निकल लुंगी लेकिन मिलना खुले में न होगा. मैं दोपहर में 3 बजे सबकी रोटी के बाद बहार निकलूंगी. लेकिन तू लेने आएगा और पुराने स्कूल में मिलूंगी मैं शंकर से. अभी वह बंद है और कमरे है तोह कोई देखने वाला नहीं होगा. बात कुछ हुई तोह तेरा नाम ले दूंगी, साथ वाली जमीन तुम्हारी हे है और बेरी तोड़ने गए थे.", लता ने जैसा कहा अर्जुन को समझ आ गया था. मुलाकार के लिए वह जगह बिलकुल उचित थी और गाँव से परे भी.

"ठीक है, मैं भोले से बात करके उसको बता देता हु. वह शहर वाले घर हे है और चाचा जी भी उधर आये हुए है. तड़के वह ड्यूटी चले जायेंगे और फिर भोले भी स्कूटर लेके आ जायेगा आधे घंटे में. बस ध्यान रखना भाभी, जो हुआ सो हुआ लेकिन भाई को सब सच सच बता देना कल.", अज्जू यहाँ से निकलता हुआ चंद्रो देवी के भी पाँव छू गया था और अब इधर वाला दरवाजा खोलते हुए ये 4 व्यक्ति लता के पास आ गए. फ़तेह, भवानी, मोहर और सुरेंदर.

"देख मुन्नी, तू कितनी समझदार है ये हमको मालूम है. और अगर कोई गड़बड़ होई तोह फिर अंजाम पता हे है तुझे. मोहर भाई, शंकर इधर नहीं आना चाहिए. बाकी घेराबंदी मैं और भवानी भाई संभल लेंगे.", फ़तेह ने जो भी कहा था वो जैसे पहले भी सबकुछ लता को बता चूका था.

"जेठ जी, बात बहुत बड़ी हो रही है. देखो मेरी एक गलती की वजह से मुझे शंकर को छोड़ना पड़ा लेकिन अब आप मुझे इतने बड़े षड़यंत्र का हिस्सा बना रहे है. मेरी भी मौत पक्की है इसमें, चाहे अज्जू मारा जाये तोह भी और ज़िंदा बच गया तब भी.", लता की बात को इन लोगो के अलावा 3 लोग और भी सुन्न रहे थे लेकिन वह दखल न दे सके या शायद उनमे से किसी को ये सब मंजूर भी था.

"वो एक गलती कहा हुई मुन्नी? पहले शंकर ने तुझे औरत बनाया, फिर तू अपने हे मां के लड़के से गांड मरवा रही थी और अब इस हवेली की बहु बन्न कर सटी सवितिरि बन्न रही है. सबूत दोनों के साथ सम्बन्ध बनाते वक़्त के है हमारे पास. ये काम पूरा हो गया तोह माँ कसम, तू अपने हाथो से जला दियो और फिर तुझे कभी ज़िन्दगी में परेशां न करेंगे. चाहे तोह सुंडी को हाथ भी न लगाने दियो.", फ़तेह सिंह ने जो भी कहा सुन्न कर लता की आँखों में हल्का पानी आ गया.

"शंकर के साथ कुछ नहीं करोगे? चन्दर (मां का बीटा) के साथ सम्बन्ध कुछ मज़बूरी में हुआ जेठ जी, लेकिन शंकर से मेरा प्यार सिर्फ दिल से है."

"पक्की बात. उसके साथ हम कुछ नहीं करेंगे और तू चाहे तोह छुड़वा लियो उस से. कोई रोकने वाला भी नहीं. और तेरी माँ भी चुदवाती है चन्दर से ये हमको पता है, मैंने भी कई बार मिलकर पेला है काकी को.", फ़तेह ने अपनी जेब से कुछ निकल कर लता को दिया और हँसते हुए आगे बोलै. "सही जगह और सही समय पर बस वही करना जो कहा है.", और सभी इधर से निकल गए सिवाए सुरेंदर के जो अब हर घडी अपनी बीवी के साथ हे रहने वाला था.

"भोले भाई, लता भाभी मिलने को मान गयी है कल तुम यहाँ आ जाओ.", फ़ोन पर आहिस्ता से बात बताते हुए अज्जू इधर उधर भी ध्यान दे रहा था के कही उसकी माँ या छोटी बहिन न सुन्न ले.

"अज्जू, आ तोह जाऊंगा लेकिन पहले गुड्डू (मधु) को कॉलेज से लेके आना है. उसका परचा 2 बजे ख़तम होगा.", शंकर भी एहतियात से इधर उधर देख रहा था.

"इन्दर ले आएगा यार बेबे को. वैसे भी 3 बजे मैं उसको लेके सरकारी स्कूल पहुंचने वाला हु, पुराने वाले में."

"भाई, बड़ी भाभी पेट से है तोह इन्दर और माँ जा रहे है उन्हें भैया के पास से लाने. मैं घर पर हु तोह पापा ने सख्ती से मुझे हे कहा है ये करने को. नाराज है थोड़े कॉलेज वाली घटना पे तोह मैं इन सबके बाद तेरे पास पूरे 3 बजे पहुंच जाऊंगा. चल रखता हु.", शंकर ने aas-pas जायजा लिया तोह वह कोई नहीं दिखा. रात जैसे तैसे कटी और सवेरे रामेश्वर जी कोई 8 बजे हे निकल गए थे, सभी को हिदायत देने के साथ. शंकर के बड़े भाई राजकुमार जी अपने काम की वजह से घर से बहार रहते थे लेकिन जल्द हे वह इस घर में वापिस आने वाले थे. धर्मपत्नी ललिता गर्भवती थी और उन्हें भी आज लेके आना था.

"माँ मैं गुड्डू को कॉलेज छोड़ने जा रहा हु. आप लोग चाबी ाले में हे रख जाना क्योंकि मैं इसके पेपर के बाद इसको साथ लेके हे आऊंगा.", शंकर की बात सुन्न कर मधु अलग हे तरह मुस्कुरा रही थी. और कौशल्या देवी ने भी सहमति दे दी. शंकर अपनी बहिन को लिए स्कूटर पर निकल गया तोह कौशल्या जी को याद आया के बेटी dahi-cheeni तोह खा कर हे नहीं गयी. इधर चूल्हे पर उबलता दूध भी गिर गया था.

"बस यही बाकी था होना. भगवन सबको सुरक्षित रखना.", कौशल्या जी का दिल थोड़ा सा खट्टा हो गया था अनजाने भये से. लेकिन जैसे तैसे वह भी तैयार हो कर निकल गयी इन्दर के साथ कार में. बहु को लेके आना था तोह उसके लिए ये कार हे उचित थी. मधु को कॉलेज के बहार छोड़ते वक़्त शंकर ने हिदायत दी.

"गुड्डू, यही गेट पर मिलना 2 बजे. मैं लेने आऊंगा और जबतक न औ इन्तजार करना.", शंकर तब तक कॉलेज के बहार खड़ा रहा जब तक बहिन अंदर न चली गयी. माहौल अलग था और gaanv-shehar के लड़के मनचले भी थे. शंकर बस ये न देख सका था के कोई और उनसे भी पहले यहाँ नजर रखे हुए था. अपने कॉलेज के दोस्त के घर समय व्यतीत करके शंकर 1:55 पर हे इस महिला महाविद्याला वापिस आ गया था.

"भैया, मधु तोह अभी अभी निकल गयी. वो उस कार में, कोई शीला आंटी थी आपके परिवार की.", शंकर के कानो में पिघलता हुआ सीसा दाल दिया था इस मधु की सहली द्वारा कहे लफ्ज़ो ने. शंकर ने स्कूटर की किक लगाई और इस खुली सड़क पर सरपट जाती कार के पीछे अपना स्कूटर दौड़ा दिया. कार के अंदर मधु बेहोश थी और उसको थामे शीला देवी अलग तरह से हंसती हुई मोहर सिंह से बतला रही थी.

"कर दी न तेरे मैं की मोहर? अब तू जी भर के मसलियो इस bagad-billi को. नमस्ते काकी कह ऋ थी, अब करवाती हु रामेश्वर की नमस्ते.", शीला देवी औरत के रूप में एक हैवान हे तोह थी. कैसे दिन दहाड़े ये घटना अंजाम दे दी थी उसने और मोहर सिंह तोह जोश में गाडी को हवा में दौड़ा रहा था.

"कुछ भी कह शीला, तू और भवानी भाई न मेरा पूरा ख्याल रखते हो. साला शंकर वह खड़ा बहिन को ढून्ढ रहा होगा और इधर मैं इसका नाडा टॉड के छूट खोल दूंगा. फिर रामेश्वर भी वैसे हे मुट्ठी में होगा जैसे मुन्नी है.", उन्हें ये नहीं पता था के शंकर पीछे हे है, बेशक फांसला ज्यादा हो चूका था लेकिन जिस रस्ते पर गाडी दौड़ रही थी वह शंकर की पहचान का हे था.

"चल मेरी मदद कर मोहर. उठा के ले चल साली को कमरे में, फेर मैं करती हु इसका cheer-haran.", कार से मधु को निकल कर दोनों ने इस निर्जन char-diwari के भीतर किया और शीला अपना जरुरी सामान लाने वापिस चली गयी.

"आज आयी मेरे हाथ असली जवानी. बहनचोद ऐसी गांड मरूंगा न... aahh..kaun है... शंकर...", पजामा खोलते मोहर सिंह की गांड पर जोरदार लात पड़ते हे वह लुढ़कता हुआ आगे जा गिरा. चारदीवारी के बहार शंकर का स्कूटर जमीन पर गिरा था और अब शंकर गुस्से में फुफकारता मोहर सिंह पर काल की तरह खड़ा था.

"तेरी ये मजाल कुत्ते, मेरी बहिन की इज्जत पर हाथ डालेगा.", शंकर ने इसके बाद तस्सली से मोहर सिंह के चेहरे का नक्शा बिगाड़ा. उसकी चीखे सुन्न कर शीला देवी दबे पाँव हे वह से गायब हो गयी थी. Hath-paanv लगभग टॉड हे दिए थे शंकर ने और जैसे हे जान से मारने के लिए कस्सी उठाई ये पतिव्रता नारी उसके पैरो में आ गिरी.

"शंकर, हाथ जोड़ती हु इनको जान से मैट मारो. इन्होने जो भी गलत किया उसकी सजा तुम मुझे दे दो. इनकी जान मैट लो.", ये komal-hridya महिला अपना रोटा चेहरा लिए शंकर के पाँव में मुँह टिकती बैठ गयी और toote-foote शरीर के साथ मोहर सिंह बस खून से लिस्डे अपने चेहरे से देखता रहा. सचमुच उसका शरीर इतना टूट चूका था के हाथ से वह आँखों के सामने आते खून को भी साफ़ न कर प् रहा था.

"सजा तोह मैं देके हे रहूँगा और वह भी ऐसी की ये हर रोज तड़पता रहे. कपडे खोलो अपने तुम. और ऐसा मेरे हर बार आने पर होना चाहिए.", मोहर सिंह की बीवी बिलखना भूल कर बस अपने पति को गीली आँखों से देखती रही. आज पति के कुकर्मो की वजह से भला देवर शैतान बन्न कर उसके शरीर को राउंड रहा था. शंकर का सारा क्रोध लुंड से निकल कर इस औरत की कोख में जा गिरा तोह उसने ध्यान दिया. निर्जीव सी ये औरत निर्वस्त्र जमीन पर पड़ी थी. जिस्म पर अनगिनत दाग और निशाँ बना दिए थे वहशीपन और सम्भोग के. मोहर सिंह दर्द से बेहोश हो चूका था, लेकिन देखा उसने भी था अपनी बीवी पर सवार शंकर को.

"ये जेल जायेगा और तुम अबसे मेरी हो. याद न दिलाना पड़े.", औरत की तरफ कपडे भड़ाते हुए शंकर ने उसको अपनी बहिन का ध्यान रखने को कहा और बहार निकल गया. उसको पता था के राममेहर के घर की ये बहु ाचे से जान गयी है उसको. 10 मिनट बाद हे वह वापिस आया तोह पुलिस की जीप उसके साथ हे थी.

"ये पड़ी मेरी बहिन, वो रहा अपराधी और ये गाडी जो इस्तेमाल हुई इस अपराध में. मेरे पापा संभल लेंगे सबकुछ, तुमने अगर इसको बहार आने दिया तोह यही हाल मैं तुम्हारा करूँगा.", शंकर ने दोनों सिपाहियों को बेधड़क हे धमका दिया था. मोहर सिंह की dharam-patni ने मुँह पर पानी दाल दाल कर मेहनत से मधु को होश में लाया तोह दरी सेहमी से वह कुछ वक़्त हर तरफ देखती रही और फिर अपने भाई के गले लग कर दहाड़े मारती हुई रोने लगी.

"चल गुड्डू, सब ठीक है. घर चलते है बस.", शीला देवी इस बीच निकल गयी थी और शंकर को जैसे उसका ध्यान भी न रहा. ख़ामोशी से स्कूटर चलता हुआ अपनी बहिन को लिए जब घर पंहुचा तोह बाप की गाडी पहले हे कड़ी थी. समय 4 बता रही थी घडी.

"आप इस वक़्त?", शंकर के इस सवाल का जवाब न देते हुए रामेश्वर शर्मा ने अपनी बेटी को गले लगा लिया.

"बीटा कपडे बदल कर आराम करो, शंकर को अभी मेरे साथ हॉस्पिटल जाना होगा.", शंकर को अपने पिता के इस जवाब में दर्द हे दर्द नजर आया. पड़ोस के घर की एक महिला और उसकी बेटी मधु के साथ यहाँ थी. रामेश्वर जी अपने बेटे को लिए तुरंत निकल लिए यहाँ से.

"हुआ क्या है पापा? मैंने कुछ नहीं किया, गलती मोहर की हे थी. हाँ उसके बाद मेरे से गलती हुई लेकिन मैं क्या करता.?"

"शंकर, तुम एक ाचे बेटे हो ये मैं जानता हु. लेकिन अब तुम खुद को थोड़ा मजबूत कर लो.", रामेश्वर जी की भीगी आँखें कुछ और हे बता रही थी. शहर के इस बड़े हॉस्पिटल के बहार तक अनगिनत गाड़िया कड़ी थी. कितने हे पोलिसवाले थे यहाँ और फिर भी सन्नाटा सा पसरा था. एक अनहोनी की आशंका से शंकर के कदम अंदर बढ़ गए. कौशल्या देवी की कार भी यही देख कर शंकर की आँखों से अपने आप हे आंसू टपकने लगे. इस गलियारे में हर चेहरे पर मातम था और आखिरी कमरे के बहार बिलखती पूर्णिमा चची को देख कर शंकर खुद को संभल हे न पाया.

"मेरा सब उजाड़ गया शंकर मेरा सब कुछ उजाड़ गया बीटा.", दहाड़े मार कर रोटी पूर्णिमा तोह जैसे इस लड़के का हे इन्तजार कर रही थी जिसके गले लगते हे वह बेहोश हो गयी. कितनी cheekh-pukaar कानो में गूंजती रही शंकर के और वह बस देखता रहा अपनी बाहो में अचेत अपनी चाची को.

"डॉक्टर बुलाओ कोई.. मेरी चची.. मेरी चची को देखो कोई. पापा क्या हो गया है यहाँ..? माँ कहा है .. माँ देखो चची को क्या हो गया... सब रो क्यों रहे है?", कमरे से रोटी हुई कौशल्या देवी बहार निकली और 2-3 लोग तुरंत हे पूर्णिमा देवी को ले कर एक कमरे में चले गए.

"शीलू इस दुनिया में न रहा शंकर.", बिलखती हुई कौशल्या देवी अपने बेटे से लिपट गयी थी. और शंकर तोह बस बर्फ सा ठंडा हो गया था.

"कौशल्या, डॉक्टर इन्हे लेके जाओ.", रामेश्वर जी ने रट हुए अपनी बीवी को पकड़ा और इन्दर अपने भाई का हाथ पकडे इस कमरे में आ गया. बुरी तरह कटा हुआ एक जिस्म निर्जीव सा बिस्टेर पर पड़ा था. ये दलशेर उर्फ़ शीलू न था. ऑक्सीजन मास्क के पीछे उस चेहरे को देख शंकर किसी छोटे बचे की तरह फफक कर रोटा हुआ दिवार से जा लगा.

"देख शंकर, डॉक्टर ने जवाब दे दिया है. ये आखिरी बार तुझे देखना चाहता है भाई.", नरिंदर ने भाई को हाथ से पकड़ कर अज्जू के करीब किया तोह शंकर रट हुए इन्दर से हे लिपट गया.

"मैं नहीं देख सकता इन्दर. अगर इसकी सांसें चल रही है तोह कोई इसको बचता क्यों नहीं?"

"इसलिए नहीं बचा सकते?", नरिंदर ने चादर हटाई तोह शंकर का रहा सहा दम भी निकल गया. अज्जू का एक हाथ नदारद था, सिलाई की हुई छाती भी सक्षम न थी शरीर को जोड़ने में. नरिंदर ने वो मास्क हटाया तोह शरीर में हलचल सी हुई. जाने कैसे अभी भी सी शरीर में कुछ बाकी था. अज्जू के होंठो पर दर्दभरी मुस्कान आयी तोह धीमी आवाज भी निकल आयी.

"इन्दर... तेरी बहोत याद आयी यार, चची माँ... को कहना... के भोले को मेरी माँ.... आठ भईईई.. से मिलवाती रहे. आम तोड़ने... अब अकेले जाना पड़ेगा..', और इसके साथ हे अज्जू हमेशा के लिए खामोश हो गया. इन्दर ने भी भीगी आँखों से उसके शरीर को ढंकने के बाद माथा चूम लिया. वो खुली आँखें बंद करते हुए उसके हाथ थरथरा रहे थे. इस कमरे में अब जैसे किसी का भी दिल ज़िंदा न रहा था. रामेश्वर जी के साथ रघुबीर सिंह भी अंदर आये तोह दोनों लड़को को बेहाल पाया. नरिंदर तोह बगल में हे लेता हुआ जाने क्या क्या बड़बड़ा रहा था, वही शंकर घुटनो में मुँह दबाये बस रोये जा रहा था. रघुबीर जी करीब आये तोह सुना नरिंदर अपने भाई के कान में भगवद गीता के श्लोक उच्चारण कर रहा था, उसकी आत्मा की शान्ति के लिए.

"रामेश्वर, इन्हे संभल भाई.", रघुबीर सिंह ने इस कठिन समय भी हिम्मत दिखाई.

"इन्दर, बीटा अपने भाई को ले जाओ. तुम्हारी माँ और चची को तुम दोनों की जरुरत है. काम से काम उमेद और शालिनी का हे ख्याल करो, तुम्हे उन दोनों को भी देखना है.", रामेश्वर जी ने जैसे तैसे ये लफ्ज़ कहे. नरिंदर भी 1 मिनट बाद धीमे कदमो से अपने भाई की तरफ आया और हाथ थाम कर उठाने लगा.

"अज्जू मेरी वजह से मारा है. मैंने मारा है अज्जू को. ये सब मेरी वजह से हुआ है, मुझे जीने का कोई हक़ नहीं है पापा. मेरी वजह से मेरा भाई मारा गया.", शंकर की गर्जना सुन्न कर नरिंदर और रामेश्वर जी भी आँखे फाड़े उसको देखने लगे जो अब एक टूटा हुआ इंसान था बस. बार बार सूखे पत्ते सा हिलता शंकर कांप रहा था.

"अर्जुन सिंह को सिर्फ अर्जुन सिंह हे मार सकता है बीटा. वो रेल के साथ टकराया था और बाकी तोह मैं पातळ से निकल कर भी ढून्ढ लूंगा जो वजह होगी. लेकिन उसने खुद बयान दिया है.", रघुवीर सिंह के इतना कहने के साथ हे नरिंदर अपने भाई को लगभग घसीट कर यहाँ से ले गया.

"रघुबीर, ये हादसा नहीं है भाई. मधु को भी अगवा किया गया था और एक हे वक़्त शीलू के साथ साथ अर्जुन पर हुम्ला हुआ. मैं कुछ न कर सका मेरे भाई. मैं कुछ भी न कर सका.", रामेश्वर का रुदन भी बता रहा था के व्यक्ति कितना सरल और आत्मिक तौर पर जुड़ा था सबके साथ.

"भाई, अर्जुन ने सबूत छोड़े हे कहा? बाकी 12 लाश तुमने देखि नहीं. और शीलू को मारने के साथ साथ मेरे 15 लोग भी ज़िंदा जला दिए गए फैक्ट्री में. मेरा वो मासूम बचा तोह खुद रोटा हुआ वह गया था के कोई उसके भाई को मार रहा है. औरत थी साथ.. औरत थी साथ... बस यही सुन्न पाया जो जख्मो की ताव सेहत मरने से पहले बता गया शीलू के बारे में. इनके संस्कार के बाद सोमबीर सिंह के लड़के हाजिर करो रामेश्वर. औरत के साथ वही लोग घेरेंगे एक शेर को. मेरे पास खोने के लिए अब ज्यादा कुछ नहीं है और Shankar-Inder इस सब से दूर रहे इतनी गुजारिश कर सकता हु.", इनकी बातें ख़तम भी न हुई थी की सोमबीर सिंह, राममेहर और सप राठोड कमरे में दाखिल हुए.

"रघुबीर, मेरे भाई इस दर्द को मैं समझ सकता हु लेकिन तुम पर जो बीत रही है वह कोई और नहीं jaanta.",Sombir सिंह के आंसू अलग हे कहानी कह रहे थे.

"रघुबीर जी, कानून आपके साथ है और हर मुमकिन छानबीन की जाएगी. कोई अपराधी नहीं बचेगा जो इस केस से जुड़ा हो.", राठोड ने अपनी टोपी कख में दबाये आश्वासन दिया और शोक प्रकट करके वो लोग बहार चले गए. आनन् फानन में हे सबकुछ किया गया और संध्या के समय हे कुछ लोगो की मौजदगी में दोनों बेटो का संस्कार कर दिया गया.

पूर्णिमा और कौशल्या जी के लिए तोह सबकुछ असहनीय हे था, उन्हें गाँव की हवेली में हे रखा गया था. रामेश्वर शर्मा ने भी खुद को परिवार से दरकिनार करते हुए पूरी गहराई से जांच शुरू कर दी थी. 3 दिन में हे उनके हाथ पुख्ता सबूत थे जो घेरते थे राममेहर के बेटे भवानी, सोमबीर सिंह के लाडले सुरेंदर, फ़तेह को. भाड़े के कातिल उप से आये थे, भवानी के संपर्क से. लेकिन ये बात आगे बढ़ती उस से पहले हे उनके तबादले के कागज़ खुद सप राठोड ने पकड़ा दिए थे रामेश्वर जी के हाथ.

"रघुबीर भाई, आज बचो का चौथा है और मेरा काम पूरा हुआ. अब इस केस से मुझे हटा कर #### ट्रांसफर किया जा रहा है. ये है जो अपराध में शामिल थे और ये दिया है मुझे राठोड साहब ने पुरुस्कार."

"मुनीम जी, सोमबीर को हाजिर करो और साथ हे राममेहर को.", रघुबीर सिंह ने हुंकार भरी तोह देखते हे देखते ये बड़ा जमघट सा लग गया था इस बड़े आँगन में. आधे हे घंटे में दोनों बाप यहाँ हाजिर थे, अपने बेटो के साथ.

राजीनामे की शर्तो पर सोमबीर के मोहर लगाने से पहले हे फ़तेह ने गोली दाग दी थी रघुबीर सिंह पर जो टकराई रामेश्वर के कंधे से. दूसरी गोली भवानी ने चलाई थी रिवॉल्वर निकलते रामेश्वर पर और अपने ऊपर ले गया उनका ये अनजान सहयोगी जो सारे केस में रामेश्वर जी को सुराग दे रहा था. जवाब में चली 10-12 गोलियों ने 6 शरीर नीचे गिरा दिए थे जिनमे से एक तोह राममेहर का नामजद बीटा हुकुम सिंह भी था. पलभर में हे Sombir-Rammehar यहाँ से नदारद हो चुके थे.

"ये गलत हुआ रघुबीर. बहोत बड़ी गलती करदी इन्होने, कोशिश करने से भी शायद अब ये अनहोनी न ruke.aahh.", खून में लथपथ रामेश्वर अपने दोस्त की बाहों में बेहोश हो गए थे.

"उमेद, गाडी निकल बीटा. और तुम सब हवेली की सुरक्षा करना, देखते हे गोली उतार देना जो नजदीक आये.", रघुबीर सिंह ने अचेत भाई को गाडी में डालते हुए हॉस्पिटल का रुख किया.

"अब बीच में न पड़ना पापा.", उमेद ने हद्द पर करके कार भागे थी लेकिन अगली सीट पर हे बन्दूक रखे था.

"तू एक हे बचा है मेडी मेरे पास. मैं संभल लूंगा तू बस घर देख. इन्हे कुछ हो गया तोह मैं जीते जी मर्डर जाऊंगा बीटा.", इतनी हे जल्दी एक बार फिर सबलोग हॉस्पिटल थे और इस बार शंकर की आँखों में कोई आंसू न था. 3 दिन तक माहौल शांत था और इस बीच सोमबीर सिंह ने सब समझते नकारते हुए मंदिर पर कब्ज़ा जमा लिया था. सर्कार, प्रशाशन सब उसकी पकड़ में था.

और एक हफ्ते बाद Rammehar-Sombir सिंह की दोनों हवेलिया मर्द विहीन कर दी गयी थी और अब अज्जू की तेहरवी पर शंकर ने मुंडन करवा लिया था. उन सभी को अज्जू के पास पंहुचा कर जो उसकी मौत के पीछे थे. नए साल के पहला दिन काल बन्न के आया था उन सभी के लिए जो म्हणत और प्यार की जगह षड़यंत्र और ताक़त के गुरूर में अंधे हो चुके थे. परिवार की ताक़त का जो नजारा Shankar-Umed-Narinder ने दिखाया था उसको देखने वाले कोई ज़िंदा न रहे थे, वो राजनेता भी नहीं जिनको गुमान था.

फिर भी कुछ मुजरिम बच हे गए थे, जिनका सुराग रामेश्वर जी का वो ख़ास दोस्त न लगा पाया था केस से हटने की वजह से. बस सोने का एक कंगन जो किसी महिला का था अज्जू के कटे हुए हाथ में. रामेश्वर जी ने वह कंगन कुछ सोच कर एक बक्से में बंद कर दिया था बजाये उस अज्ञात को पकड़ने के. वक़्त का प्रहार कुछ ऐसा हुआ था के रघुबीर सिंह ने अपने dharam-bhai को छोड़ कर सबसे किनारा कर लिया था. उमेद ने भी जल्द विवाह करते हुए सब जिम्मेवारियां अपने कंधो पर ले ली थी, हवेली से अज्जू की हर याद दफ़न करते हुए.

सोमबीर सिंह की हवेली से भी कौशल्या देवी ने सशर्त संधि की थी, चंद्रो देवी बागडोर अपने हाथ में ले और शीला देवी को यहाँ से रुखसत किया जाये. कुछ लोग नाराज भी हुए थे इस संधि से. बड़ी बहु सुशीला अपने मायके चली गयी थी और सबसे छोटी बिंदिया ने कुछ और हे फैंसले लिए थे, जो बस उसके सीने में दफ़न थे और नरिंदर वजह था. मोहर सिंह एकमात्र व्यक्ति था जो ज़िंदा बचा, 1 साल कारावास की वजह से. सितारा देवी ने दुहाई देते हुए रामेश्वर जी के पाँव पकड़ लिए थे अपने बचे एकलौते बेटे की ज़िन्दगी को बख्सने के लिए. अपनी doodh-moohi बच्चियों के सर से माँ का साया ख़तम करके मोहर सिंह भी 14 साल के लिए वापिस अंदर चला गया था, शंकर ने इतना प्रताड़ित जो कर दिया था उसको.

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1998

रात के किसी पहर विन्नी तारा और अलका के साथ ढेरो बातें करने के बाद आराम से वही सो गयी थी उनके साथ. कोमल दीदी भी आज ऊपर वाले पिछले हिस्से में, हमेशा बंद रहने वाले कमरे में ऋतू के साथ सोई थी. बातें यहाँ भी हुई थी लेकिन वो लड़कियों वाली स्वाभाविक बातों से कुछ अलग हे थे. रुपाली ने जहा आज आरती के साथ कोमल दीदी वाले कमरे में हे सोना बेहतर समझा था वही Madhuri-Priyanka उनके बगल वाले कमरे में हमेशा की तरह थोड़ी मस्ती मजाक के बाद आराम से सो गयी थी. तक़रीबन 12 बजे शंकर जी लौट कर आये थे, आज घर के हे काम से बहार थे तोह माँ की दांत तोह पड़ने का सवाल हे न था.

"ये यहाँ सो रहा है?", पिछले एक हफ्ते में तीसरी बार वह रात में अपनी पत्नी के दरवाजे खड़े हुए थे.

"हाँ, वो कभी कभी जब देर तक बातें करता है तोह यही सो जाता है. आपका खाना लगाती हु मैं.", रेखा जी की तबियत अब बिलकुल ठीक थी. अर्जुन किसी छोटे बचे से घुटने मौडे विपरीत दिशा में सोया हुआ था जिसकी पीठ के तरह 2 तकिये लगते हुए रेखा जी कमरे से बहार आ गयी, दरवाजा वापिस लगाती हुई. शंकर जी hath-mooh धो कर टेबल पर बैठे तोह उन्हें पानी देने के बाद रेखा जी ने खाना परोसा. कोमल ने सबसे बाद में अपने पापा का खाना त्यार किया था उनके फ़ोन आने पर.

"वो बड़ा हो रहा है, अब तोह उसको ये आदत नहीं होनी चाहिए.", रोटी का निवाला तोड़ते हुए उन्होंने सामने वाली कुर्सी पर हे रेखा को बैठने का इशारा किया.

"हाँ, वो शायद 8 महीने का था तभी बड़ा हो गया था.", रेखा जी ने शादी के इतने सालो बाद ये ऐसा जवाब पहली बार दिया था. एक पल को शंकर जी को भी ये बात चुभी लेकिन गलत बात तोह नहीं कही थी उनकी बीवी ने.

"तब हालत कुछ और थी रेखा. कृष्णा को जरुरत थी उस बचे की लेकिन अब वह 18 पार कर चूका है.", शंकर जी प्लेट की तरफ देखते हुए हे बोल रहे थे.

"कृष्णा के लिए तोह मैंने ऐसा नहीं कहा. बात एक माँ और बेटे की है जी. वो 8 महीने का था तब दूर हुआ था और आज 18 का होने पर भी वह खुदको वही समझता है. लेकिन उसको ये नहीं पता के इतने साल गए कहा. एक साल कोमल उसको सीने लगाए सुलाती रही फिर ये जिम्मेवारी Ritu-Alka पर आ गयी और आगे तोह उसको अकेले हे सोना पड़ा उस छोटी उम्र में. माँ के पास रहा हे कब वह?", समंदर सी शांत रेखा जी के शब्दों में बेहद नरमी थी, वियोग के साथ साथ.

"बात वर्तमान की हो रही है रेखा. जो उस समय उसके लिए सही था वही किया गया, देखती हो न के वो कितना समझदार हो गया है."

"उसको समझदार कह कर आप खुद को ाचा पिता साबित कर रहे है. और ये गलत भी नहीं है कही से. मैं बस ाची माँ नहीं बन्न पायी क्योंकि मेरे बेटे को मैं कभी वह साया न दे पायी जो हर माँ देती है. नींद में वो आज भी डरता है, उसके मुँह से आज भी सोये हुए वक़्त माँ निकल जाता है. कितने हे साल ये वो अकेले झेलता रहा होगा. वो कमी तोह पूरी नहीं कर सकती लेकिन इस समझदार लड़के को कभी कभी एहसास करवा सकती हु के वह अकेला नहीं है.", रेखा जी ने प्लेट में एक और रोटी रखते हुए अपनी बात को ख़तम किया.

"जो भी हुआ उस वक़्त हालात ऐसे हे थे रेखा. ये ज़िद्दी भी था और बेशक गुस्सैल भी. अगर समय रहते ये सब नहीं किया जाता तोह नतीजा कुछ और हे होता. आज वह एक बेहतर नौजवान है. Maa-papa ने उस पर इतनी म्हणत की है, सही शिक्षा दी है और सबसे बढ़कर उसको अकेले को हे वारिस बनाया है. तुम्हारी ममता अपनी जगह है और एक जीवन को सुधर कर बेहतर बनाना उस से कही जरुरी. तुमने भी इस घर का पूरा ख्याल रखा जो तुम्हे ाची बहु और माँ साबित करता है.", शंकर जी के पास सीधा जवाब न था लेकिन अपनी बीवी का बोलना उन्हें ठेस पंहुचा गया था.

"जी. मैं उसको उठा कर बोल देती हु, वो अपने कमरे में सोने चला जाएगा.", रेखा जी के चेहरे पर कोई ख़ास भाव ना था. उन्होंने एक पल भी ये न दिखाया के उन्हें कितना बुरा लगा था अपने पति की इस बात का.

"रहने दो अभी. वो सो रहा है तोह आज सोने दो लेकिन उसको समझा देना के इस कमरे में उसके mata-pita सोते है.", शंकर जी ने तीसरी रोटी का निवाला तोड़ते हुए अपनी बीवी को अभी के लिए मन कर दिया.

"जी कह दूंगी."

"तुम्हे इसके बारे में पता है ये क्या करता है, कहा जाता है या कौन दोस्त है इसके? माँ हो तोह ये सब पता हे होगा.", शंकर जी जैसे किसी और हे धुन में जा रहे थे.

"ये सीधा समझदार हे हो गया और ये सब मेरे सामने तोह नहीं हुआ. एक साल में इसके जो दोस्त है वह मुझे पता है. जहा जाता है और जो भी करता है उसके बारे में सबसे ज्यादा तोह माँ जी को पता है. यहाँ मेरे हे पास कई कई दिन बाद आता है तोह इसकी मुझे बेहतर जानकारी नहीं है.", रेखा जी का जवाब वैसा हे था जैसा शंकर जी चाहते थे.

"फिर तुम इसका पूरा ध्यान कैसे रखती हो? ये सब तुम्हे बेहतर पता होना चाहिए.", शंकर जी की ये मुस्कान जैसे एक तंज़ था अपनी बीवी के प्रति.

"हाँ. यही तोह बात मुझे खलती है. मैं ाची माँ नहीं बन्न पायी इसकी.", रेखा जी उठ कर रसोई में चली गयी थी अपने पति के लिए दूध गरम करने के लिए. वही शंकर जी के पास अब और कोई ऐसा सवाल न था जिस से वह अपनी बीवी से बहस कर सके. पहली बार रेखा ने सामने से सवाल किया था और ये कटाई गंवारा न हुआ शंकर जी को. लेकिन एकाएक सब ध्यान में आया तोह आखिरी निवाला वापिस थाली में रख दिया.

वो खुद अपनी माँ के पास अभी तक सोते रहते थे जिस पर कभी उनके पिता ने आपत्ति न जताई थी. सबसे ज्यादा ज़िद्दी और गुस्सैल होने के बावजूद वही माँ के लादले थे जिन्हे कौशल्या जी ने खुद कभी अपने से दूर न किया था. उनके पिता, वो तोह ज्यादा कुछ कहते भी न थे बेशक कैसी भी गलती हो. उनका बचपन अतुलनीय था जहा ढेरो दोस्त, शरारते, mauj-masti थी. क्या वो खुद ये सब अपने बेटे को दे पाए? क्या रेखा के साथ न्याय किया? वो क्यों ाची माँ नहीं है जो आज भी अपने बचे के लिए इतनी आस रखती है. अपने आप पर हे शर्मिंदगी का बोझ बढ़ने लगा तोह घुटन सी होने लगी थी शंकर जी को.

"जी दूध. आपने कहा सोना है, मैं बिस्टेर तैयार कर देती हु.", रेखा जी ने हमेशा वाले भाव से कहा.

"देखो रेखा, मेरा इरादा तुम्हे ठेस पहुंचने का बिलकुल नहीं था. किसी और बात की वजह से मैंने ये गलत बात शुरू कर दी थी. वो जहा सोना चाहे वह सो सकता है, मैं कुछ नहीं कहूंगा. मैं अबसे बैठक में सोया करूँगा.", शंकर जी ने दूध गिलास हाथ में ले कर खड़े होते हुए कहा. रेखा जी अपने पति के इतनी जल्दी पलट जाने पर थोड़ा हैरान थी, चेहरे पर स्थिर भाव के साथ.

"मेरे साथ ऋतू, कोमल, रुपाली भी सोते है. आपने एक अर्जुन को हे चुना, वो कोई भी बात थी लेकिन जुडी अर्जुन से हे थी.", शंकर जी के कदम वही ृक्क गए थे.

"हाँ वो बात उस से जुडी है लेकिन कोई गंभीर बात नहीं है. बस उसको थोड़ा समझाओ के वो बचा है और वैसे हे माहौल में रहे."

"वो बड़ा है और समझदार भी. आपने हे कहा था अभी. आपने जो भी बात केहनी हो वो स्पष्ट कहा कीजिये, खासतौर पर अर्जुन से जुडी हुई बात."

"तुम्हे नहीं लगता के हद्द पर कर रही हो तुम रेखा? वो भी अपने पति के साथ.", शंकर जी का ये कहना शायद खुद के हम पर लगी ठेस का नतीजा था.

"जी मैंने सिर्फ आपकी हे बात दोहराई है. आपको लगता है के इसमें कोई हद्द पर हुई है तोह मैं माफ़ी चाहती हु. फिर भी ये जरूर कहूँगी की मेरे बचो का मुझ पर अधिकार है. मैंने आपकी बेटी से कोई फरक नहीं किया और आप तोह हम दोनों के बेटे को अलग कर रहे है. ये हद्द कौन पर कर रहा है?", सारा हम एक हे पल में चकनाचूर करके रख दिया था रेखा जी ने सिर्फ एक शब्द में. 'आपकी बेटी'

"वो.. वो बात.. उस बात का तुमसे कोई सरोकार नहीं है."

"मेरा भी यही जवाब है जी. मेरे बचे है और मेरे साथ हे रहेंगे, चारो एक सामान.", इस बार शंकर जी को एहसास हुआ था के रेखा ने खुद उनकी बेटी के साथ इतना अपनापन दिखाया था, मालूम होते हुए. और वह बेमतलब kheench-taan कर रहे थे.

"सॉरी. तुम्हे जो ठीक लगे वह करो. और ऋचा के साथ ाचे बर्ताव के लिए धन्यवाद. मैं और कोई बात नहीं करना चाहता.", शंकर जी को यही बेहतर लगा क्योंकि उनकी बीवी ने अपना बड़ा दिल दिखा दिया था. नाराजगी जायज थी क्योंकि ये बात शंकर जी ने कभी न बताई थी और उल्टा वही अपने बेटे को दोष दे रहे थे. बीवी को उकसा रहे थे. एक जवाब ने उन्हें नजरे मिलाने लायक न छोड़ा.

"वर्तमान और भविष्य को ठीक किया जा सकता है. अतीत सिर्फ सवाल और sahi-galat से भरा मिलेगा. शुभरात्रि.", रेखा जी ने जाते हुए विनम्रता से अपने पति से विदा ली और सभी बर्तन साफ़ करने के बाद अपने कमरे में चली आयी. जहा उनका बीटा बड़े आराम से निश्चिंत सोया हुआ था.

"तू हे मेरे जीने की वजह है बीटा. और तेरी माँ हमेशा तेरा ध्यान रखेगी, फिर सामने जो भी हो.", पीछे से तकिये हटा कर उसको बाहों में लेती हुई रेखा जी कुछ देर बेटे के बारे में सोचती रही और थोड़े समय बाद हे नींद के आगोश में चली गयी.
 
गूडनिघत गाइस, टेक केयर एंड स्लीप वेल. ी विल बे बैक बी 29तह
 
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प्रभाव - 1


हमेशा अवसाद में रही हिमानी का जीवन जितना सामाजिक तौर पर दयनीय था उतना हे कष्टदायक आत्मिक अंदरूनी रहा था. अकेली माँ के साथ बचपन गुजरा जरूर था लेकिन उसमे भी कही न कही दर्द ने दस्तक दे हे दी थी. माँ का अतीत और आकस्मिक मृत्यु के बाद वो उस वृक्ष की तरह हो गयी थी जो बहार तौर पर खूबसूरत लगता है लेकिन अंदर धीरे धीरे दीमक खोखला करने लगती है. हर रात दुस्वपन और एक अंजना डर उसके साथ सोने लगे थे. आज भी हाल कुछ ऐसा हे था.

'मुझे जाने दो. प्लीज मुझसे दूर रहो.', इस दुस्वपन में वह अनजान चेहरों से भागती हुई इस जगह आ पहुंची थी जहा आगे कोई रास्ता न था. अँधेरी सुनसान गली यहाँ ख़तम हो जाती थी. ये 3 ाकृत्य उसको भयभीत करती हुई और पास चली आयी.

'मरने से पहले तुम्हे ज़िन्दगी का सबसे बड़ा सुख जरूर मिलेगा.', अट्टहास करता ये विशालकाय आदमी उसके सामने आ खड़ा हुआ था. हिमानी डर से आँखें मूंदे बस गिड़गिड़ा रही थी. तीनो हे वहशी दरिंदे इस कमजोर शिकार की हालत पर हंस रहे थे.

'मुझे जाने दो प्लीज, भगवन के लिए मेरे साथ ऐसा मत करो.', हर बार की तरह आज भी वो घुटने टेकती हुई रोये जा रही थी. उन स्याह काले सायो पर कोई असर न हुआ इस मासूम के रोने गिड़गिड़ाने का.

'अब बहोत देर हो चुकी है लड़की.', दूसरा साया भी सर के पास आ खड़ा हुआ. हिमानी का जिस्म सपने से बहार भी पसीने से लथपथ था. सीने पर हाथ रखे वो इस से बहार आना चाहती थी लेकिन शरीर को जैसे लकवा मार गया था. उस बुरे सपने में भी अब तीनो लोग उस असहाये सी लड़की पर गिद्ध की तरह मंडरा रहे थे. सबसे पहले वाले दरिंदे ने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए उसके बाल पकड़ने चाहे लेकिन हाथ कोहनी से टूट कर निचे जा गिरा. उस चीख से हिमानी की रही सही हिम्मत भी जाती रही.

'आप तक अब कभी कोई मुसीबत नहीं पहुंचने दूंगा.', इस चौथे साये ने हिमानी को खड़ा करते हुए अपने सीने से लगा लिया. जमीन पर तीन साये shat-vishat हालत में पड़े थे और वो अंधेर बंद गली में एक दरवाजा बन्न चूका था, सूर्य सी रौशनी वाला चकाचोंध सा रास्ता. दरी सेहमी हिमानी दरवाजे की सुरंग से बहार निकली तोह उजला दिन और हर तरफ हरियाली थी. घने वृक्ष, हँसते मुस्कुराते वृक्ष और दिल को सुकून देती ठंडक. ये jana-pehchana सा मोर और उसके daaye-baaye 2 मोरनी चलती हिमानी के पास आ गहे थे.

हमेशा की तरह हिमानी का हाथ सामने हुआ जिसमे चुगने के लिए वो दाने जाने कहा से आ गए थे. वो महसूस कर रही थी अपना ये नया रूप, एक अलग हे ताक़त और हिम्मत. जवाब कही न मिला और नजरे उन 2 मॉर्नियो पर जा तिकी. वह दाना चुगगने की जगह एकटक हिमानी को हे देख रही थी. बायीं तरफ वाली मोरनी की भूरी गहरी आँखे और दायी तरफ वाली की hari-neeli. एक अजीब सा खिंचाव महसूस करती हिमानी घुटनो पर हो गयी. अब वह वह विशाल मोर न था, बस ये दोनों मॉर्निया उसकी हथेली से बचे हुए दाने खाती जैसे उसकी सभी समस्याओ को ख़तम करती रही.

'वो शक्श कहा गया जो मुझे बचा के यहाँ लेके आया था?', हिमानी ने पीछे मदद कर देखा तोह अब वह कोई दरवाजा न था. सिर्फ ये बड़ा उद्यान और इस से बहार निकलते हुए वो 2 शक्श जिनका कद एक सामान था. इधर पक्षियों की तरफ देखा तोह यहाँ भी सब साफ़ था, सिवाए सामने गिरे उस मोरपंख के.

"अर्जुन.", हिमानी ने झटके से आँखे खोल ली. इस बड़े हवादार कमरे में वो अकेली थी और बड़ी खिड़की के सामने वाला सफ़ेद पर्दा हिल रहा था. दोनों हाथ बिस्टेर पर टिकाये हिमानी आज डर की वजह से नहीं उठी थी. उसकी धड़कन सामान्य थी और चेहरा शांत. बिस्टेर से कड़ी होती वो इस एकमात्र लम्बे सफ़ेद परिधान में खिड़की तक चली आयी. आधे दरवाजे जितनी बड़ी ये जगह उसके कमरे में उसकी पसन्दीदा जगह थी. पर्दा हटाया तोह ये neela-hara मोरपंख फर्श पर आ गिरा. घर के बगीचे से बहार उड़ता गया मोर 'peehun-peehun' करता बता गया था के हिमानी अकेली नहीं है.

'जाने क्या हो तुम लेकिन लगता है इस हिमानी को सरिता (नदी) बना कर आजाद करके हे रहोगे.', हिमानी ने घडी में देखा तोह 5 बज गए थे और कितने हे दिनों बाद वो आज इतनी देर तक सो पायी थी. कुछ सोचते हुए हिमानी ने वो पंख उठा कर गद्दे के निचे रखा और बाथरूम में चली गयी.

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रामेश्वर जी के संसार में भी आज कुछ अलग हुआ था. रेखा जी ने नहाने के बाद अपने बेटे को उठाया तोह वह कुछ पल माँ के गले लगा उन्हें बताने लगा के रात कितनी ाची नींद आयी थी अर्जुन को. माँ ने भी बेटे को उतना हे दुलार किया और जल्दी तैयार होने का बोल कर बहार आ गयी. ललिता जी ने इस वक़्त उठने वालो के लिए चाय बना ली थी और रेखा जी ने एक कप अपने पति को देने के बाद उनके कपडे भी पकड़ा दिए थे.

"चल जूते पहन ले फिर चलते है आज वाक पर.", ऋतू दीदी खुद पिछले आँगन में तैयार कड़ी थी बाथरूम से बहार निकलते अर्जुन के सामने. अपने उन हलके घुमावदार लम्बे बालो को एक रबर में बांधे ऋतू एक पूरी आस्तीन की ढीली टीशर्ट और track-joote में किसी खिलाडी सी तैयार थी.

"आप, मेरे साथ दौड़ने चलोगी? मैंने तोह घर से बहार आपको चलते हुए भी नहीं देखा.", अर्जुन ने शरारत से जवाब दिया और इधर रेखा जी ने उसके जूते सीढ़ियों के पास रख दिए.

"मुझे जो करना है वो हम देख लेंगे फ़िलहाल तुम लेट हो 15 मिनट.", ऋतू दीदी ने हाथ में वो सफ़ेद छोटा टोलिया पकड़ा हुआ जिस से पसीना पूछा जाता हो. अर्जुन भी सर झटकता जूते पहन कर उनके साथ गलियारे से बहार निकला तोह ऋतू दीदी ने एक तरफ कड़ी ये 'रेंजर' साइकिल साथ ले ली.

"प्रीती की है, मैं ये चलाऊंगी तू रनिंग करना. मुझे बैठा के तू भी चला सकता है, अपनी रनिंग पूरी करने के बाद.", ऋतू दीदी के उस गोर चेहरा पर एक नजर डालते हुए अर्जुन ने बड़ा गेट खोला और उनके साइकिल पर बैठते हे धीमी रफ़्तार दौड़ना शुरू कर दिया. नाहा कर बहार आये शंकर जी ने भी देखा था अपने दोनों बचो को ऐसे जाते हुए.

"आज का तेरा प्रोग्राम है कुछ?", कौशल्या जी ने कमीज सामने करते हुए पुछा.

"आज तोह पूरा दिन हॉस्पिटल हे लगने वाला है माँ. सांगवान भी नहीं है और ऊपर से कुछ जरुरी पेशेंट को समय दिया हुआ है. मुझे तोह लगता है के कल भी यही होने वाला है. क्मो छुट्टी पर जा रहा है आज.", शंकर जी ने अपनी माँ से कमीज ले कर पहनते हुए जवाब दिया. रामेश्वर जी भी पूजा से फारिग हो कर इधर आ गए थे.

"फेर राममेहर के घर काम कौन देखेगा?", कौशल्या जी का सवाल सुन्न कर शंकर कुछ शांत रहा तोह पंडित जी हे बोल उठे.

"आज मैं चला जाता हु कल का कल देखेंगे. वैसे विकास ने ाचे से संभल रखा है काम, लेकिन एक बड़े का होना जरुरी है.", रामेश्वर जी का ये अलग हे अंदाज था, नहाने और पूजा पाठ के बाद शेव करना.

"मैं शाम को वही चला जाऊंगा और कल शायद उतनी जरुरत न पड़े. कोई नाच गाने वाला माहौल तोह है नहीं. बस हलवाई बैठ रहे है, खाना, शगन और riti-riwaj है बस. परसो ब्याह है जिसमे थोड़ी परेशानी होने वाली है."

"कोई परेशानी नहीं होने वाली. तू राममेहर के रह कर लड़की के पिता का फ़र्ज़ अदा करेगा और तेरे पापा वह सोमबीर सिंह की तरफ बबिता के विवाह में देखभाल करेंगे. सब आसान हे होता है बीटा, बस एक समय में एक जगह रहो.", कौशल्या जी इतनी देर से बस इस बात तक हे आना चाहती थी. अपना फैंसला बता कर वह अंदर चली गयी, बेटे का नाश्ता लगवाने.

"माँ का हर बात पर तना देना जरुरी होता है क्या पापा?", शंकर जी कुर्सी पर बैठते हुए अपने पिता को कहने लगे.

"तुम्हारे और कौशल्या के बीच मुझे को बुरा बनवाते हो भाई? वैसे बात ठीक है तुम्हारी माँ की. कन्यादान करना है तोह छोटे से शगुन से ले कर विदाई तक तुम्हारी हे तोह मौजदगी प्रमुख है."

"इस सब में तोह पिता के साथ माँ का भी होना जरुरी रहता है. अनुपमा की माँ तोह नहीं है फेर मैं किसके साथ बाकी रस्मे करूँगा?", शंकर जी शायद भूल गए थे के वह किसके साथ और क्या बात कर रहे है.

"किती बीवी है तुम्हारी बरखुरदार.? जहा तक याद है हमने तोह तुम्हारा विवाह कुन्दनलाल जी की सुपुत्री रेखा से करवाया था."

"जी.. मेरा यही मतलब था के मुझे रेखा को वह साथ ले जाना होगा? आप सब जानते है.", शंकर की बात पर उस छोटे आईने में bachi-khuchi क्रीम देख कर कपडे से साफ़ करते रामेश्वर जी मुस्कुरा दिए.

"हमारी अर्धांगिनी को तोह ये भी याद है के फलानि तारिख को फैलाने वक़्त उनका पति ड्यूटी पर कहा था, किसके साथ था और क्या कर रहा था. लगता है तुम बातचीत नहीं करते. ऐसा तोह कुछ ख़ास नहीं है राममेहर की हवेली में जिस से तुम्हे चिंता हो. एक लड़की के mata-pita नहीं है, उसका कन्यादान करके बड़ा हे नेक काम कर रहे हो. तोह तुम्हे तोह खुश होना चाहिए. रेखा के साथ साथ लक्ष्मी और ऋतू को भी लेके जाना, दोनों बच्चियां भी देख लेंगी परंपरा, riti-riwaj, gaanv-biradari.", रामेश्वर जी ने बात ाचे से समझे थी अपने बेटे को. इधर कौशल्या जी भी लस्सी का लौटा, मक्खन और पराठे लिए आ गयी.

"अर्जुन? वो नहीं जायेगा क्या इन समारोह में?", शंकर जी ने अब कर हे दिया था अपने बेटे का जीकर. और होना भी जरुरी था क्योंकि सामने अर्जुन के संरक्षक जो बैठे थे.

"बीटा इस बूढ़े की लाठी है वो. कैसे नहीं जायेगा? हाँ वो उधर बबिता के विवाह को देखेगा, चंद्रो देवी ने उसको ख़ास आमंत्रित किया है और फेर सुशीला ने कहा है के वह अर्जुन को हे फेरे के लिए बबिता के साथ भेजेगी. उधर से तोह अनुपमा के साथ पड़ोस का एक छोटा लड़का है वही बहिन की ससुराल जायेगा.", रामेश्वर जी ने पूरा विवरण हे दे दिया था.

"उसका जाना वह ठीक होगा? आप हे तोह कहते है के अर्जुन का दिमाग ज्यादा हे चलता है. उस हवेली में बहोत कुछ ऐसा है जो उसको नहीं jaan-na चाहिए.", शंकर जी ने स्टूल पर प्लेट रखने के बाद पराठे पर ढेर सारा मख्हन रखते हुए अपने पिता को देखा.

"उसका दिमाग तोह साधारण हे है शंकर. एक छोटे बचे की तरह बिलकुल बस ऊँगली पकडे रहना पड़ता है. कोने में छिपे खिलोने कई बार उनके काम के नहीं होते.", कौशल्या जी का जवाब सुन्न कर शंकर ने खाने पर हे ध्यान देना उचित समझा. माँ के जाते हे उन्होंने अपने पिता को फिर से देखा.

"तेरे लिए जब इतना कर सकता हु तोह कुछ भी गलत कैसे करूँगा शंकर.? अर्जुन मेरी जिम्मेवारी है जब तक वह अपने पाँव पर खुद खड़ा नहीं हो जाता लेकिन एक वादा तूने भी किया था और मुझे नहीं लगता के तराजू के दोनों पलड़े तेरी तरफ से बराबर है.", ये बात जैसे गुप्त शब्दों में हो रही थी. शंकर को भी एहसास हुआ के पिछले कुछ समय से सचमुच उनसे चूक हुई है.

"एक कोशिश."

"कोई कोशिश वोशीश नहीं. मैंने उस परिवार के किसी सदस्य को यहाँ आने से मन नहीं किया, लेकिन स्वर्गीय सोमबीर सिंह के नाम टेल हे आना होगा. बीटा, तुम जानते हो के मैंने अपने वचन का कभी तिरस्कार नहीं किया लेकिन बदले में मुझे भी सामने वाले से दिल की बात दिल और दिमाग की बात दिमाग से मिलनी चाहिए.", रामेश्वर जी थोड़ा करीब खिसक आये थे. अपने हे बेटे की प्लेट से उसके साथ हे खाना शुरू करते हुए वो बता रहे थे के दोनों कही अलग नहीं है. आज समय से पहले हे वो भोजन की शुरुआत कर रहे थे.

"आपको पता है न पापा के मैं अकेला निर्णय नहीं ले पता?", शंकर जी ने झेंपते हुए ये बात जैसे तैसे कह दी.

"एक बेहतरीन चिकित्सक जो दुसरो को हमेशा सबसे सही राये देता है, अकेले में कही ज्यादा परिपक्वता से जख्मी को बचता है और फिर कहता है के अकेले निर्णय नहीं ले सकता? शंकर मोह होना लाजमी है, जूनून और गुलाम नहीं. इन्दर को तुमने दूर नहीं किया था ये भी तुम कबूल कर सकते हो.", रामेश्वर जी को भी नाश्ता करते देख कौशल्या जी चाय रख कर तुरंत वापिस चली गयी.

"आपने भी तोह सबकुछ नहीं बताया. बातें दोनों तरफ से कही न कही गायब है."

"हैं तोह घर के अंदर हे शंकर. और उनका कोई फायदा भी नहीं जब वो तुम्हारे लिए मायने न रखती हो."

"मेरे लिए भी ये परिवार और आप सबसे ऊपर हो पापा. हाँ जानता हु के मुझे शायद सबके बीच रहने की आदत नहीं है.", शंकर जी ने भी चाय का घूँट भरा और देखा तोह इस बार कोमल पराठे लेके आयी थी.

"जाने से पहले तोह सब सवाल और जवाब मिल हे जाते है इंसान को. तुम्हे जो ठीक लगता है करते रहो भाई. मेरी वचन वाली बात का मान रखना, इसलिए कह रहा हु के पिछले महीने में 3 दिन थे. ये बढ़कर 30 पे आये ऐसा मैं इन्तजार नहीं करूँगा."

"अब 3 भी नहीं आते लेकिन.."

"हाँ तुम उस से मिलो, ाची परवरिश दो, हर जायज जरुरत पूरी करो. वो फ़र्ज़ है और कोशिश करना ये उतना हे इधर भी हो.", कोशिश शब्द ऐसे कहा था पंडित जी ने जैसे वो एहसास करवा रहे हो की पक्षपात तोह है हे लेकिन सुधारना शुरू किया जा सकता है.

"उठ जा रे शंकर, 8 पराठे खा चूका तू और lassi-chai एक साथ कौन पीटा है?", कौशल्या जी ने आते हे झाड़ लगाई तोह शंकर जी ने देखा के वह सचमुच कटोरा भर मख्हन, लस्सी का लौटा और 2 कप चाय के भी पी चुके थे, अपने पिता वाला भी.

"बाद वाले पराठे ज्यादा ाचे लगे तोह खाये गए माँ, गुस्स क्यों करती हो? चाय और लस्सी दोनों हे दूध से बनते है, कुछ नहीं होता.", ये अगला पराठा भी अपनी तरफ सरकाया तोह कौशल्या जी ने सर पे हे हाथ रख लिया.

"भाभी जी, लगता है आज जल्दी हे आपको चूल्हे के सामने बैठा दिए मेरे भाई साहब और बेटे ने.", छोल साहब पूरे तैयार हो कर आये थे. अपनी बड़ी भाई को प्रणाम करने के बाद वो भी वही बैठ गए तोह कौशल्या जी चाय लेने चली गयी इन दोनों के लिए.

"सतीश, ये सामने बैठ के खाने लगा तोह मुझे भी मौका मिल गया. जितने चाय ख़तम करोगे इतने मैं भी तैयार हो जाऊंगा.", रामेश्वर जी ने भी ये गरम पराठा अपनी तरफ करते हुआ कहा.

"पापा, माँ ने मुझे तोह कह लिया जो कहना था. आपको पराठे मन है. देख लो चाचा जी आपके सामने हे है."

"तेरे जैसे डॉक्टर मैंने पैदा किये है, मुझे न बता के क्या मन है. दिल कर रहा है तोह खाऊंगा, सारा दिन तोह फिर वही सूखी चपाती और अदरक मिली फीकी सब्जियों पर जीना पड़ता है.", रामेश्वर जी इतना बोल कर निवाला मुँह में लेके हे गए थे के कौशल्या जी आ कड़ी हुई.

"हाँ जी, सूखी रोटी, कड़वे करेले और शिमला मिर्च हे खिलाती हु आपको तोह. बड़ा गुणगान कर रहे हो मेरे बेटे और देवर के सामने. जितना मर्जी रोक लो, दही बंद नहीं होता इनको तीनो टाइम. ऊपर से सब्जी सरसों के तेल में अलग से बना दी तोह प्लेट एक तरफ. सिर्फ भरवा बैंगन हे उस तेल में खाते है बाकी सब में देसी. बप की दवाई ले रहे है कल को पता नहीं कोनसी शुरू करवा ले."

"जिन लोगो के सामने तुम मेरी बड़ाई कर रही हो न थानेदारनी जी, वो कुछ भी नहीं छोड़ते.", पंडित जी का आशय समझ कर कौशल्या जी जाते हुए शंकर को कोसती हुई चली गयी, रामेश्वर जी के कपडे निकलने. 'राक्षस है उसका क्या करू. आप तोह समझदार हो.'

"देख लो चाचा जी, अपनी तरफ आती गोली यहाँ मदद दी.", शंकर ने छोल साहब से शिकायत की लेकिन जवाब करारा मिला.

"भाई शुक्र है सिर्फ गोली तुम्हारी तरफ की. कईओ के सामने तोह बन्दूक भी कर देते है. संभल के रहा करो. हाहाहा.", यहाँ इनकी बातें चल रही थी की पसीने में लथपथ अर्जुन साइकिल लिए घर में दाखिल हुआ. सर से लेकर पाँव तक वो भीगा हुआ था और पीछे बैठी ऋतू के हाथ में फलो के जूस के जूस का पैकेट था, शायद 4-5 गिलास.

"ए कपडे पहन कर कही पानी में कूद के आये हो क्या?", पंडित जी ने हालत देखते हुए अर्जुन से सवाल किया तोह उसने नाराजगी से ऋतू दीदी को देखा.

"भाई ने शर्त लगाई थी और वो हार गया. बदले में bus-stand तक ये साइकिल पर मुझे लेके गया जूस दिलवाने.", ऋतू ने चहकते हुए वह बड़ा प्लास्टिक दिखाया जहा अंदर वाली थाइल को ठंडा रखती बर्फ naam-matra बची थी और पानी बहार तक टपक रहा था.

"बस स्टैंड? बड़े वाले बस स्टैंड तक तुम लोग साइकिल पर गए थे?"

"देख लो दादा जी दीदी को. दौड़ने के बाद आधा घंटा ये साइकिल खींचनी पड़ी और अभी भी शर्त पूरी नहीं हुई है.", अर्जुन ने लाचार सी शकल बनाते हुए कहा और एक तरफ जाते हुए टीशर्ट उतार कर निचोड़ने लगा. वो सचमुच पानी की तरह पसीना गिरा रही थी. शंकर जी तोह बस उसकी चमकती मसनपेशिया देख रहे थे. ऐसी तोह उन्होंने अपने किसी की भी न देखि थी.

"ये आफत तेरे गले कैसे पड़ गयी इतनी सवेरे? और तू बड़ी है ऋतू, भाई को ऐसे कौन परेशान करता है?"

"दादी आप तोह इसका पक्ष लो हे न. ये कितना दौड़ता है पता लग गया मुझे. और रही बात छोटे बड़े की तोह उसमे हम दोनों की कोई गलती नहीं है. बड़ा यही लगता है और जो लगता है वही बड़ा.", ऋतू गर्दन झटकती हुई अंदर चली गयी सबको अवाक छोड़ कर बस पंडित जी मुस्कुरा रहे थे.

"ये तन्ने क्या पैदा करि है शंकर? देख मेरे बचे की रेल बना दी दिन चढ़ते हे."

"इसको हे निखार रही है भगवन वो. अगर इसने 8 किलोमीटर साइकिल चला हे ली तोह कौनसा बड़ी बात है. पसीना आना जरुरी है और वैसे भी ऋतू जो करेगी इसके फायदे के लिए हे करेगी. स्टेडियम भी हफ्ते बाद जाना बंद हो जायेगा तोह म्हणत करने दो.", यहाँ उन्होंने शान्ति से माहौल संभल लिया. कौशल्या जी अपने लाडले को टोलिया पकड़ा कर दूध लेने अंदर चली गयी जहा पर ऋतू ने पहले हे hud-dang मचाया हुआ था. विन्नी और तारा को अनानास (पाइनएप्पल) का जूस पीना था और उन दोनों को वो जगा चुकी थी.

"तुम बॉक्सिंग के साथ साथ वजन भी उठाते हो अर्जुन?", शंकर जी ने अपने बेटे को सिर्फ निक्कर में फर्श पर बैठे देख पुछा.

"हाँ पापा. पहले तोह सिर्फ शोल्डर और आर्म्स की एक्सरसाइज करता था लेकिन अब एक घंटा पूरा वर्कआउट करता है. कोच सर तोह कहते है के गेम बदल लो लेकिन उन्हें भी नहीं पता के मैं कौनसा गेम लू जिस से और बेटे वर्कआउट हो सके."

"कितना वेट लिफ्ट करते हो?", शंकर जी तोह खुद अभी तक हफ्ते में 3 दिन व्यायाम करते थे गयम में और उन्हें दिलचस्पी हुई इस धारदार बड़े और चौड़े जिस्म को देख कर.

"25-25 आर्म्स पर, 100 चेस्ट, 100 शोल्डर और 120 लेग्स. बाकि मशीन भी है बहोत साड़ी वह. आपके पास भी पुराणी जगह गयम थी न?"

"हाँ. यहाँ भी देखेंगे कुछ, ये शादी के बाद. तुम्हे नहीं लगता के बड़ी जल्दी इतने बदलाव आ गए शरीर में.?", शंकर जी की उत्सुकता देख रामेश्वर जी रहस्यमयी तरीके से मुस्कुराते हुए अंदर चले गए.

"नहीं इतना भी जल्दी नहीं बदला पापा. पिछले 15 महीने से तोह मैं रोज हे सवेरे दौड़ लगाने जा रहा हु. हाँ हाइट जो है वह एक साल में 5-6 इंच जरूर बढ़ गयी है. पहले ुंडेरवेइट तोह नहीं था बस अब माँ और दादी ने डाइट पर सख्ती की हुई है.", अर्जुन ने दादी के हाथ से गिलास और वो छोटा सा लड्डू लिया तोह अब इस तरफ भी उनकी नजर गयी. आधा किलो दूध जिसमे कितना बादाम डाला होगा ये साफ़ दिख रहा था.

"इस से तुम्हे कैसा लगता है? देखने में तोह अजीब है.", शंकर जी ने हाथ लगा कर उस छोटे लड्डू को ध्यान से देखा और वापिस रख दिया. छोल साहब बस आराम से चाय की चुस्की लेते इन्हे भी देख रहे थे और अपनी भाभी से बतला रहे थे.

"अजीब सा स्वाद लगा था पहली बार पापा. इस से पहले वाले लड्डू तोह फिर भी खाये जाते थे लेकिन ये वाला निगलना पड़ता है. हाँ अब नींद ाची आती है और थकान भी नहीं होती.", अर्जुन ने वो नहीं बताया जो शायद शंकर जी jaan-na चाहते थे.

"ाची बात है, लेकिन इसका मतलब ये भी हो सकता है के क्षमता के हिसाब से कसरत नहीं कर रहे. अजीब बात है. शरीर अलग कहानी कह रहा है तुम अलग बता रहे हो."

"उस से न पूछ, कुछ जवाब मेरे पास भी है. मेहनत से पहले जितनी ताक़त की जरुरत होती है उतनी करने के बाद भी होनी चाहिए. थक्क कर बैठ जाना सही क्षमता नहीं. और जो तेरे सामने है वही सच है, बाकी जानता तोह तू भी है.", कौशल्या जी के इतना कहते हे वह चुहल से उन्हें प्रणाम करके घर का गेट खोल अपनी एस्टीम में जा बैठे.

"रात का पापा को बता दिया है मैंने. कल मिलता हु.", शंकर जी ने जाते हुए कहा और गेट खुला हे छोड़ कर निकल गए.

"Laat-sahab हे है ये लड़का. गेट माँ हे बंद करेगी इसकी. वैसे कुंदन भाईसाहब के कार्ड देने जा रहे हो तोह सुनंदा को बोल देना इधर आ जाएगी समय से. परसो से अगले दिन आपको मेरे साथ चलना है गाँव.", कौशल्या जी ने आखिरी बात छोल साहब से कही थी जो हामी भर रहे थे. मतलब ये था के अभी ये लोग पहले रेखा जी के मायके जाने लगे थे.

"अर्जुन बीटा, ख्याल रखना घर का. मैं सांझ तक लौट के आऊंगा और तुम्हारी दादी भी थोड़ी देर तक हवेली जाने वाली है.", रामेश्वर जी हमेशा की तरह सलीके से इस्त्री की हुई kameej-patloon और चमड़े के जूते पहने बहार आये. एक अटैची जैसा भूरा बैग भी उनके हाथ में था.

"दादी अकेले कैसे जाएँगी?", अर्जुन अभी भी इस बकबके स्वाद वाले लड्डू को कुतर कुतर कर खा रहा था.

"अकेली तोह मैंने नहीं कहा भाई. वैसे भी एक थानेदार laav-lashkar के साथ हे जाता है. मुनीर आएगा थोड़ी देर में और सफारी से इन्हे ले जायेगा. कही दूर मैट जाना अगर काम भी हो तोह.", पंडित जी ने भी अपने कदम बहार बढ़ा दिए, छोल साहब की गाडी उनके घर के हे सामने थी. अर्जुन कुछ देर बाद नहाने चला गया, आज ऋतू दीदी के साथ जा कर जैसे गलती हो गयी थी.

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संजीव आज बेहतर था और इतनी सुबह अपने चाचा के यहाँ आने पर थोड़ा खुश भी. एकाकी जीवन जीना कोई मर्जी न थी लेकिन इतने सालो में जैसे आदत सी हो गयी थी. हॉस्पिटल में अब टहल भी लेता था और थोड़े बहोत केस की फाइल पढ़के मीटिंग भी करता रहता था. अभी शंकर चाचा ने खुद जांच की और कुर्सी पर बैठ गए.

"तोह सुधर तोह हुआ है लेकिन ये सर पे निशाँ कुछ समय रहने वाला है. टाँके भी कट हो गए तोह बस ये चेस्ट सपोर्ट मेरे ख्याल से आज उतर जानी चाहिए.", शंकर जी ने निरिक्षण करने के बाद सिग्रत्ती सुलगते हुए कहा. संजीव ने पीने से साफ़ मन कर दिया था, शायद परहेज.

"हाँ चाचा जी, अब दर्द नहीं है. जिस दिन यहाँ आया था तोह लगा था के हड्डियां टूटी होंगी, लेकिन बाहरी छोटो के सिवा बस मसल्स में थोड़ा प्रभाव आया था. टाँके भी बड़े सफाई से लगाए है. वैसे आपको कैसा लग रहा है घर आ के.?", नर्स संजीव को ये दूध शहद देके वापिस चली गयी थी.

"शरीर ाचा है तुम्हारा और समय रहते इलाज हो गया तभी नुक्सान नहीं हुआ. बाकी भाई घर का मत हे पूछो.", शंकर जी ने हँसते हुए कहा लेकिन संजीव समझ गया था के परेशानी जरूर हुई है उन्हें.

"आपसे बहोत छोटा हु चाचा जी इसलिए रिक्वेस्ट हे कर सकता हु. आप उस बात पर ध्यान न हे दे तोह सही रहेगा. अर्जुन कही कही आपके जैसा है लेकिन आप हमेशा बेटे की तरह रहे है तोह आपको अजीब लगता होगा जब सभी उसकी परवाह करते दिखे, जैसे कभी वह ऐसा आपके लिए था. मुझे भी पता था के जब आप हमेशा के लिए घर रहने आएंगे तोह ये बात प्रभावित करेगी आपको.", संजीव ने ऐसा सच कहा था जिसको शंकर जी मन नहीं कर सकते थे.

"यार बात तोह तेरी ठीक है और मैं इतना भी नासमझ नहीं हु. लेकिन वो कभी कभी अकेला नहीं सोता, पापा से ले कर ऋतू तक उसको बचे की तरह रखते है. सचाई तोह तू भी जानता है के वह बचा नहीं रहा. क्या क्या गुल खिला चूका है वह और अभी भी खिला हे रहा है. मुझे तोह किसी ने ये न बताया के तू यहाँ आया तोह पूरी बात क्या थी, अर्जुन कैसे शामिल हुआ. दिमाग की गांड न इस बात ने मार राखी है के एक तरफ वो छोटा बचा है तोह दूसरी तरफ वो उनके लिए एक जिम्मेवार व्यक्ति. कर क्लियर अगर कर सकता है तोह.", शंकर जी ने अपनी बात खुलकर कहना हे सही समझा. सिग्रत्ते की राख झाड़ते हुए वह भी देख रहे थे की बढ़ी दाढ़ी लिए संजीव भी कुछ सोचने में लग गया. सोच से बहार आते हे उसने जवाब दिया.

"वो बचा हे है चाचा जी जो युवक बन्न चूका है. कोई भी उसका खोया हुआ वक़्त वापिस नहीं दिला सकता जहा उसने इतना बड़ा परिवार होते हुए भी ऐसा जीवन देखा जहा उसके पास कोई न था. जिस समय वो स्कूल भेजा गया था घर से दूर, तब तक वह बाथरूम के बहार मुझे खड़ा करके रखता था डर की वजह से. क्या नहीं किया होगा उसने वह अकेले में? पिछले सवा साल में तोह हम वह 9 साल वापिस नहीं कर सकते उस लड़के के लेकिन उसको एहसास कराये रख सकते है के वह हमारे लिए आज भी बचा है. वो लोगो से जल्दी ghul-mil जाता है बेशक लोग सिमित है और जो भी उस से मिलता है वह खुद उसका हो जाता hai.Un 9 सालो में उसने मानसिक रूप से खुद को परिपक्व किया, दिल अभी भी बचे का है जो प्यार करना जानता है.", संजीव हर पंक्ति रुक रुक कर बोल रहा था. जैसे वह याद कर रहा हो के कितने घंटे, दिन और पल अर्जुन के साथ उसने बिताये थे.

"तुम्हे भी पता है के उसको बोर्डिंग भेजने के पीछे बस उसकी ज़िन्दगी सुधारना था यार. कोई और मकसद नहीं था. लेकिन फिर वो ऐसे का क्यों कर रहा है जिस से बहोत कुछ गलत हो सकता है?"

"आपके पास सबूत तोह नहीं होगा उसके खिलाफ. बेशक किसी लड़की के साथ फोटो हो, मिलते देखा हो, किसी ने मूजबानी बताया हो. झगडे की बात करे तोह अर्जुन का खुद का कोई कलेश नहीं मिलेगा आपको. किसी के पुराने षड़यंत्र, कमजोर की मदद या परिवार की सुरक्षा में शामिल होना उसको हिंसक या खूंखार नहीं बनता. मैं तोह आज तक उसके साथ वही बनते वाली बोतल पीने जाता हु जो उसको सबसे ज्यादा पसंद है. पिछली गर्मी में हमने पतंग भी साथ उड़ाई थी और वह मेरे घर होने पर अब भी मेरी बगल में सोता है. इसलिए मैं उसको अपना सबकुछ मानता हु चाचा जी. आज यहाँ ज़िंदा बैठा हु क्यूंकि मेरा छोटा भाई उतना हे प्यार मुझसे करता है. आपको बस ये समझना होगा के घर में सब अपनी गलतियों की भरपाई कर रहे है और बदले में वो सबको बराबर प्यार करता है. आप भी शामिल हो हे जायेंगे इस सब में.", संजीव ने खड़े हो कर आराम से चलते हुए वो कांच की खिड़की खोल दी. हलकी धुप कमरे में आ रही थी, ताज़ी हवा के साथ.

"संजीव मैं सिर्फ कोशिश कर सकता हु लेकिन सच बात तोह ये है के मैं उसको अपने समकक्ष समझने लगा हु. न चाहते हुए भी मुझसे गलतिया हो जाती है. ऊपर से एक डर ये भी लगता है के सबका इतना अधिक लगाव है और कोई अनहोनी हो गयी तोह काम खराब हो जायेगा. तुम खुद जानते हो के दुश्मन भी अनगिनत है चाहने वालो की तरह.", सिग्रत्ते बुझाते हुए शंकर जी ने पानी का घूँट लिया और कुल्ला करते हुए डस्टबिन में उगल दिया.

"दादा जी ने बताया था के आप 4 भाई थे, ताक़तवर और दिलेर. यहाँ तोह हम 2 है और दोनों में से एक तोह लगभग बहार हे रह कर लोगो के बिमा करता है. दादा जी ऐसी गलती नहीं करेंगे की ये एक उन 4 के बराबर न हो. हाँ इतिहास तोह मुझे भी ज्यादा नहीं पता और अर्जुन को भी. लेकिन अब वो खोजबीन नहीं करेगा, जैसा वह पिछले मामले में कर गया. बस मेरी समझ में ये नहीं आ रहा के वो कम्बखत कौन था जिसने अर्जुन को ऐसी जानकारी दी जिस से वह उन अनजान लोगो से अपना रिश्ता जान गया.?", बात कहते कहते संजीव के जबड़े कस गए थे.

"वो कम्बख्त मैं हे हु. एक गलती हुई और जाने ये तीसमार खान कैसे मेरी गुप्त जगह पहुंच गया. रिकार्ड्स मेन्टेन करता था मैं कुछ, दलीप के साथ एक ख़ुफ़िया जगह. कुछ लोगो के खिलाफ सबूत भी थे और बाकी सिर्फ दुश्मनो की पारिवारिक जानकारी. दिमाग की दाद देनी पड़ेगी की वैसे उसके.", शंकर जी की बात पर मुस्कुराता हुआ उनका भतीजा वापिस अपनी जगह बैठ गया.

"तोह फिर कुछ chhed-chhad मिली आपको अपने खजाने से? उसका दिमाग हे तोह जिसको रोकने के लिए परिवार के बीच रखना पड़ता है.", संजीव ने दूध पीना शुरू किया और अपने चाचा के जवाब की प्रतीक्षा करने लगा.

"उमेद ने सब नष्ट कर दिया लेकिन कुछ जरुरी कागज और तस्वीर शायद वो ले गया. सुशीला और बिंदु के परिवार का उसको वही से पता लगा होगा. और तोह जो भी था वो लोग गायब हो चुके है या फिर बाकी सामान बड़े लोगो को मुट्ठी में रखने का था, वक़्त आने पर. अब अर्जुन ने वह से क्या लिया और क्या छोड़ा उसकी बात करना बेकार होगा संजीव लेकिन कही वो गलत इस्तेमाल न कर बैठे उन जानकारियों का.", शंकर जी ने घडी में समय देखा तोह 8 बजने में कुछ हे मिनट थे.

"वो गलत का भी इस्तेमाल सही हे करेगा, उदहारण तोह आपके सामने हे है. जानकारी ली सुशीला सिंह की जो पागल हो चुकी थी बदले की भावना में और आज वो अर्जुन को सबसे ऊपर मानती है. ये दादा जी ने बताया मुझे और उस रात शयद अर्जुन ने उन दोनों को बचाया भी था मेरे बाद. जो भी करेगा किसी का नुक्सान नहीं करेगा जबतक सामने वाला परिवार का नुक्सान न करे. सुना है मेरी शादी की तैयारी में वही लगा हुआ है?"

"हाँ, पापा ने उसको व्यस्त रखा हुआ है. रोज एक लिस्ट उसको दी जाती है जिस से वो matha-pachi करता रहे. अब शादी होने वाली है तोह घर भी आ हे जाओ भाई."

"परसो एक मीटिंग है चाचा जी, उसके अगले दिन आ जाऊंगा और फिर महीना भर घर हे तोह रहना है. वैसे ाचा लगा के आप राधिका के घर दादा जी के साथ गए. कुछ ज्यादा बातचीत तोह नहीं हुई?"

"जाना तोह था हे, पापा के सामने मैं राहु तोह फिर साथ लेके हे जायेंगे. वैसे Ritu-Tara भी गयी थी अपनी होने वाली भाभी को देखने और अकेले हे मिली थी बहु से उसके कमरे में.", शंकर जी ने जो बताया शायद रामेश्वर जी ने ये बात नहीं कही थी संजीव से. चेहरे पर अलग हे गंभीरता उतर आयी एकाएक.

"मरवा दिया इन दोनों ने मुझे चाचा जी. ये अगर राधिका से मिली होंगी तोह उसने सबके बारे में पुछा होगा और अर्जुन का जीकर जरूर हुआ होगा. ये नहीं होना था अभी."

"क्यों, जब आएगी तब भी तोह मिलने हे वाली है वो अर्जुन से. बात तोह करते हे होंगे तुम राधिका से तोह क्या इतने समय में अर्जुन के बारे में तुमने कभी नहीं बताया?", शंकर जी को भी जिज्ञासा हुई की राधिका और अर्जुन का क्या मामला हो सकता है जो संजीव अपने सबसे ख़ास भाई का भी जिक्र नहीं करना चाहता था.

"इतना भी गंभीर मुद्दा नहीं है चाचा जी. दरअसल ## सेक्टर की पार्किंग में लगभग साल पहले मैं और अर्जुन गए थे हमेशा की तरह nimbu-soda पीने. शहर कुछ काम था तोह हम उस सेक्टर में हे चले गए. ये जनाब अपनी हे दुनिया में आवारा कुत्तो को bread-biscuit खिलने लगे और राधिका भी उधर आयी हुई थी, क्योंकि उसकी मौसी जी भी वही रहती है. मैं अपनी आदत अनुसार छुप कर सिग्रत्ते पी रहा था और मैडम जी को इन जनाब की ये हरकत ाची लगी जो 15-16 कुत्तो की बीच बैठा पूछकर भी रहा था और खिला भी रहा था. थोड़ा पास गयी तोह आवारा कुत्ते भोंक दिए और उनके साथ साथ अर्जुन महाराज ने कह दिया के 'दीदी, जब कोई खाना खा रहा हो तोह डिस्टर्ब नहीं करना चाहिए.' गुस्सा तोह नाक पर उस वक़्त रहता हे था राधिका के तोह पाँव पटकती हुई चली गयी.", संजीव बात बता कर मुस्कुरा रहा था और अब शंकर जी अपने बेटे के काम पर मुस्कुरा रहे थे.

"फिर तुम कहा कहानी में आ गए? और अब Arjun-Radhika एक दूसरे को देखेंगे तोह पक्का वह खिंचाई करेगी उसकी."

"सुनो तोह सही चाचा जी. तब तक हमारी ghar-pariwar की ज्यादा बातें नहीं होती थी लेकिन अगले दिन हम दोनों साथ हे गए थे एक ड्रिल पर. वह राधिका ने अर्जुन वाला काम किया. चाय के खोखे से डबल रोटी लेकर खिलने लगी तोह मैंने भी इस बदलाव का पूछ लिया. पहले कभी तोह देखा नहीं था ऐसा करते हुए. उसने कहा के जब कोई खाना खा रहा हो तोह डिस्टर्ब नहीं करना चाहिए. हाहाहा. मतलब ये था के वह एक हे पल में अर्जुन से इम्प्रेस हो गयी थी. मुझे तोह पता था के पिछली शाम क्या हुआ था लेकिन उसको नहीं पता था के मैं वह था. जब राधिका ने खुद से हे 'उस' लड़के का जीकर किया और बताया के वह बेख़ौफ़ सा इतने कुत्तो के बीच मजे से बैठा था तोह मैंने भी सोच लिए के वो उस लड़के से अब खुद हे मिले. लम्बे घुंगराले बाल, बचो सी शकल वाला वो लड़का राधिका में एक पल में बहोत कुछ बदल गया था चाचा जी.", संजीव को इतना ख़ुशी से अपने भाई का गुणगान करते देख शंकर जी भी हंसने लगे.

"लेकिन अर्जुन का नाम लेने से वो कैसे जान जाएगी की उस लड़के के बारे में? ज्यादा नहीं सोच रहे तुम?"

"उसकी मौसी अर्जुन को दसवीं में इंग्लिश पद्धति थी. वह पे पंडित जी का तोह कोई जीकर है नहीं जिस से अर्जुन के बारे में टीचर कुछ बता सकती. नाम पता है राधिका को और कही ऋतू को ध्यान से देखो तोह थोड़ा अर्जुन भी नजर आ हे जाता है.", बस यही तोह बात थी जिसको शंकर जी सुन्न न नहीं चाहते थे. लेकिन आज वो थोड़ा ाचे मूड में थे.

"हाँ ये बात तोह सही कही तुमने. उन दोनों के कुछ फीचर्स एक जैसे हे है. चलो ख्याल रखेंगे की bhabhi-devar एक दूसरे को देख कर सरप्राइज हो. वैसे राधिका ने अर्जुन की रेल जरूर बना देनी है. अकेली भाभी होगी और इधर जनाब अकेले देवर."

"हाहाहा.. मैं तोह ये सोच रहा हु चाचा जी की मुझे तोह सिर्फ अर्जुन से बचना पड़ता है, उसको बहोत लोगो के सामने वकील रहना पड़ेगा.", संजीव ने अब कमीज पहन ली थी बात करते हुए.

"वो तुझसे भी ाची अफसर है, ात लीस्ट अंडरकवर के मामले में. जब तुझे अर्जुन नहीं पकड़ सका तोह वह हाथ नहीं आने वाली."

"किसने कहा के मैं अर्जुन के हाथ नहीं चढ़ा था? उस से तोह हमारे पंडित जी बचते फिरते है और राजेश मां की भी नब्ज़ पकडे बैठा है वो. आप पे और दलीप काका पे शक था इसलिए हे उसने सेंध लगाई होगी उस जगह. कभी मैट भूलना के हमारे पंडित जी रिटायर होने के बाद सबसे ज्यादा उसके साथ रहते है. याद है न लकी को सिर्फ टेलीफोन बूथ से पकड़ लिया था? लेकिन वो राज को अपने तक हे रखता है. बस उसके सामने वही रहो जो रिश्ता है नहीं तोह 10 सर वाले रावण के दिमाग में क्या चल रहा हो पता नहीं लगता.", संजीव ने भी घडी में देखा जैसे किसी का इन्तजार कर रहा हो.

"हाँ, रावण जैसा भी तोह है वह. नियम, परिवार के प्रति समर्पित, ज्ञान के लिए हमेशा तत्पर. वैसे कमाल हे नहीं कर दिया हमारे पंडित जी ने इसको ऐसा बना कर?", शंकर जी के मुँह से अर्जुन के लिए तारीफ देख संजीव मुस्कुरा दिया.

"पता है आपको वो सबसे ज्यादा चाहता है जैसे आप उसको. हाँ वो अलग बात है के आपका मूड कब बदल जाता है उसको अभी मालूम नहीं. अर्जुन सही मायने में आपके साथ रहना चाहता है, सीखना चाहता है क्योंकि उसके हीरो आप हो चाचा जी.", ये बात एक बात सुन्न कर तोह शंकर जी को बेढंगी सी लगी क्योंकि उन्होंने तोह अर्जुन को कुछ अलग हे देखा था. फिर याद आया जब अर्जुन उनके गले से लगा था होली वाले दिन. कैसे लिप्त था वो अपने बाप से जैसे छोटा बचा गॉड में आना चाहता हो. कार, उसकी पहली कार खुद वो चाहता था के उसके पिता चलाये, वही सिखाये और अगर पिछले कुछ दिनों में कुछ भी अनमोल मिला था शंकर को तोह वो पल जब ऋतू और अर्जुन उनके साथ थे. अर्जुन के हाथो में अभी तक नरमी थी जैसे हर बाप के समकक्ष बीटा होता है. उनकी गॉड में बैठा वह लड़का उनका सबसे छोटा बचा था जिसके लिए खुद वो आज कितनी हे भ्रांतिया पाले थे.

"पापा भी यही चाहते है न शायद? मतलब इस घर में मैं हे अकेला हु जिसके साथ अर्जुन का रहना बाकी है.", शंकर जी के भाव mile-jule थे लेकिन सिर्फ उन्हें हे पता था के कहा चूक हुई है.

"हाँ चाचा जी लेकिन ये सब आराम से और धीरे धीरे करना. मैं भी जानता हु के आप उसकी बहोत परवाह करते है बस वो डर निकलना होगा जो आपको उस से दूर रखता है.", बात ख़तम हुई और एक लड़के ने दरवाजे पर दस्तक दी.

"सर, आपकी शेव करनी है?"

"तुम्हारा हे इन्तजार था भाई.", संजीव ने उसको अंदर बुलाया और शंकर जी उठ खड़े हुए.

"चलो भाई, तुमसे अब कल मिलना होगा अगर फुर्सत लगी. ध्यान रखना अपना.", संजीव ने भी हाथ हिला कर उन्हें विदा किया. अब शंकर जी कमरे से बहार आते हे अपनी सोच पर हंस भी रहे थे और खेद भी था. सच हे तोह था के अर्जुन का वास्तविक परिचय अर्जुन शंकर शर्मा था. अपने मित्र भुप्पी से भी कुछ समय मिलने के बाद वो वापिस सरकारी हॉस्पिटल आ गए थे. शनिवार होने के बावजूद दिन लम्बा रहने वाला था उनका लेकिन अब सोच लिया था के वो अर्जुन को उचित समय जरूर देंगे, आखिर रेखा भी तोह नाराज हुई थी पहली बार उनसे.

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कौशल्या जी के घर से जाने के बाद अब अर्जुन ऊपर अपने कमरे में बैठा प्रैक्टिकल फाइल पूरी करने में लगा हुआ था. कौशल्या जी के साथ आज लगभग हर सदस्य उमेद सिंह की हवेली गया था सिवाए अलका, कोमल, माधुरी और विन्नी के. राजकुमार जी पुराने घर चले गए थे जहा से वो दोपहर के हे वक़्त वापिस आने वाले थे. कोमल दीदी ने बहार मशीन लगा राखी थी कपडे धोने के लिए जहा माधुरी दीदी भी उनके साथ काम करवा रही थी. विन्नी का दिल था के वो अर्जुन के साथ अकेले में थोड़ा वक़्त गुजरे लेकिन ऐसा करने में झिझक भी थी. प्रीती उन्हें अपने घर ले गयी थी किसी काम से जिसमे विन्नी दीदी की मदद चाहिए थी.

"अब तोह लगता है के pyaar-girlfriend जैसे शब्द बस ढकोसले हे थे. ज्यादा की चाहत जो रहती है हर मर्द को.", अलका दीदी चलती हुई अर्जुन के कमरे में दाखिल हुई तोह अर्जुन ने आईने में उन्हें एक बार देख कर नजरे वापिस फाइल पर गदा दी. अलका दीदी भी उसकी कुर्सी के हे पीछे बीएड पर तक लगाती हुई पसारती सी अपनी बात कहने लगी. अर्जुन ने नजर घुमा कर उन्हें देखा तोह वह उस से विपरीत सामने लगी दिवार को देख रही थी. कमरतक लम्बे बाल इस वक़्त खुले थे. शरीर पर झीना सा rang-biranga कमीज और लम्बे खूबसूरत पाँव पर इलास्टिक वाला ढीला पजामा, जो गोरी पिंडलियों तक चढ़ा हुआ था.

"और आपको ऐसा क्यों लगता है?", अर्जुन इस चित्र को पूरा करता हुए मुस्कुरा रहा था.

"जवाब मुझे चाहिए. कहा तोह पहले मैं एक पल भी अकेली दिखती थी तोह अपने सीने से लगा लेते थे और अब शायद मेरा नाम तक नहीं लेते. बताओ जरा इस अनदेखी की वजह क्या है? कौन है जो तुम्हे मेरे से बेहतर प्यार करने लगी है? तुम्हारे लिए तोह मैंने वो सबकुछ kiya-saha जो शायद ऋतू के सिवा कोई और न कर सके.", अलका दीदी क्या सोच कर आयी थी जो आते हे बरस रही थी. अर्जुन ने पेंसिल फाइल के बीच रखते हुए उसको बंद किया और उठ कर अलका दीदी की बगल में आ गया. लेकिन वो थोड़ा आगे खिसक गयी.

"आपको ये तोह नहीं कहना चाहिए के मैं आपसे प्यार नहीं करता. बाकी आपके सामने है के लाइफ कितनी उनवेन हो रही है. परिवार में भी इतने लोग है और समय कहा मिलता है.", अर्जुन ने गाल को हाथ लगाया तोह बिदकती हुई वो उठ कर बैठ गयी. खूबसूरत गुलाबी चेहरे पर सचमुच गुस्सा था.

"तुम्हारी बात तुम्हे भी पता है कितनी सच है. सर पर हाथ रख कर कहो के तुम हर रोज सेक्स नहीं करते? मैं, ऋतू और तारा काम पड़ती थी जो बहार ये सब करते फिरते हो? कहो के तुम्हारा घर से बहार किसी के साथ कोई चक्कर नहीं है?", अलका ने अब खुद अर्जुन का हाथ अपने सर पर मजबूती से रख लिया था. वो चुप रहा तोह अलका जैसे ज्यादा भड़क गयी.

"मिल गया अपनी हे बात का जवाब तुम्हे? वक़्त, परिवार, व्यस्त ज़िन्दगी मुझे भी दिखती है लेकिन बहार समय निकलना तुम्हे मंजूर है. आइंदा आना तुम मेरे करीब, ऋतू नहीं हु के प्यार नजर अंदाज करने लगे तब भी खुद हे सामने से आ कर लिपट जाऊ. सब भूल कर.", आज अर्जुन की सचमुच फटती थी. कोमल दीदी तोह उसको आराम से समझती थी, ऋतू दीदी उल्टा खुश हे रहती थी जब भी वह उनके साथ थोड़ा समय बीतता था लेकिन अलका दीदी ने सीधा उसको आइना हे दिखा दिया था.

"सॉरी. आप सही कहती हो लेकिन..

"क्या लेकिन? लगा कोई और बहाना के फलानि तेरे से प्यार करने लगी, सहारे की जरुरत थी, तुझे भी उसके साथ ाचा लगता.. जो तुम्हारे लेकिन वेकिन है वो सब सिर्फ एक्सक्यूज़ है अर्जुन. सच वही है के मर्द हो न तोह मर्जी कर सकते हो, मैं भी यही करने लागु तोह कलंक कहलाउंगी.", अलका की आँखों में मॉटे मॉटे आंसू आ गए थे जिनमे उसका दर्द लबरेज था. शर्मिंदगी के अलावा जैसे अर्जुन के पास अब और कुछ न बचा था. पहली बार किसी ने उसके कपडे उतार दिए थे, आत्मा तक हिला दी थी.

"हाँ मैं आपका कसूरवार हु, जो किया वो गलत किया. मेरे सम्बन्ध है कई युवतियों से जिनमे मैं बराबर शामिल रहा हु. दीदी, लेकिन आपकी अनदेखी भी मैं नहीं कर सकता. यहाँ हमेशा कोई न कोई रहता है या मैं हे बहार होता हु. पहले घर में लोग हे कितने थे लेकिन अब वैसा नहीं है. बुआ अभी गयी है और Aarti-Priyanka दीदी भी यही रहती है. पापा और ताऊजी के होने पर मैं कर सकता हु.?"

"सिर्फ उस बारे में बात नहीं कर रही ारु मैं. मुझे भी तू अपने साथ लेके जा सकता है, 2 घडी मेरे कमरे में साथ बैठ सकता है और ज्यादा हे दिल हो तोह सीधा ऋतू और मेरे कमरे में आ सकता है. सुबह 4 बजे से ले कर रात 12 तक तुम्हारे पास हमारे लिए 5 मिनट भी नहीं हो सकते क्या ारु? गले लगा कर इतना भी नहीं कह सकते के तुमने मुझे मिस क्या? मुझे कोई लेना देना नहीं के तुम किस किसके साथ लगे रहते हो लेकिन अगर सचमुच तुम आज भी वही ारु हो तोह मेरी इतनी अनदेखी के लिए ऐसी वजह नहीं देते.", अलका दीदी उठ कड़ी हुई और अर्जुन एक उम्मीद से उन्हें देखता हुआ हाथ पकड़ने लगा.

"जब तुम्हे लगे के तुम आज भी मुझसे प्यार करते हो तोह खुद आना, मैं इन्तजार नहीं करुँगी.", अलका दीदी ने हाथ झटक कर छुड़ाया और बहार चली गयी. अर्जुन ख़ामोशी से बस अभी जो कुछ हुआ था उसके बारे में सोचने लगा. अलका दीदी के साथ वो कॉलेज के दिनों में शुरू हुआ प्यार, उन्हें स्कूटी के बहाने बहार लेके जाना, कितनी मस्ती करते थे वह दोनों जिसमे शरीर से ज्यादा दिल और प्यार हे था. ऐसा हे तोह ऋतू दीदी और प्रीती भी महसूस करती होंगी. बेशक कोमल और माधुरी दीदी कुछ ज्यादा नहीं कहती थी लेकिन उनके साथ भी तोह अर्जुन का जुड़ाव कितना गहरा था.

ये सब मिलते हुए भी वो बहार कितनो के साथ हे अंतरंग हो गया इतने काम समय में. बेशक वो सभी अर्जुन के साथ दिल से जुडी थी लेकिन उन के पास पंहुचा तोह वो खुद हे था. सभी तरफ कदम उसके हे तोह गए थे चाहे वो गाँव में Savita-Kajal हो या फिर बिंदिया, मुन्नी, बिमला. नाम तोह और भी कई थे लेकिन वह अर्जुन की जगह सामने वाले की बस मज़बूरी थी. कुछ जगह वह सचमुच कदम पीछे कर सकता था और अलका के साथ अगर घर में समय नहीं मिल रहा था तोह वो प्रेमिका को बहार घूमने भी तोह ले जा सकता था. ऐसे नजरअंदाज उसने सभी को किया था बेशक तारा सामने से खुद मौका बना लेती थी लेकिन खुद तोह अर्जुन भी उसकी तरफ खुद से नहीं गया था

"खुली आँखों से कौनसे सपने ले रहा है ारु? ज्यादा परेशां है किसी बात से तोह मुझे बता सकता है भाई.", कोमल दीदी आयी तोह थी यहाँ मैले कपडे लेने लेकिन जब अर्जुन को उनके आने का एहसास भी न हुआ तोह चिंता लाजमी हुई. बड़े स्नेह से अपने छोटे भाई के सर पे हाथ फेरा तोह अर्जुन तन्द्रा से बहार आया.

"दीदी, आप सबसे मिले इतने प्यार के बावजूद मैंने अनगिनत गलतिया कर दी. सभी का कितना दिल दुखाया होगा मैंने अपनी नासमझी की वजह से.", अर्जुन को इतने दर्द में देख कर दीदी ने बस गले से लगा लिया.

"तू किसी को दुःख नहीं देता भाई बस अनजाने में हे तू थोड़ा आगे निकल जाता है. पूछ सकती हु के तू क्या सोच रहा था अभी.?", दीदी ने इतने प्यार से पुछा था के अर्जुन बोलने से खुद को रोक न पाया.

"दीदी, मुझसे वही गलती हुई जिसके लिए आप मुझे समझती रहती थी. प्यार करने वालो की अनदेखी करके मैंने खुद हे बहार नए रिश्ते जोड़ लिए. बहोत गलत किया दीदी मैंने और जानती हो अलका मेरी पहली गर्लफ्रेंड है. उनके साथ मैंने बहोत गलत किया है दीदी.", अर्जुन का अलका को दीदी कहने की जगह गर्लफ्रेंड बताना कोमल दीदी के चेहरे पर मुस्कान ले आया.

"ाची बात है न के उसने सामने से आ कर नाराजगी दिखाई ारु. तभी तोह कहा था के जब दर्द हो या मैं विचलित होने लगे तोह बहार की जगह कदम अंदर ले आना. चल आजा आज हम मिल कर कुछ जरुरी काम करते है. तू यहाँ वो नाम लिख जो घर से बहार है. देखे जरा कितने काम हो सकते है.", दीदी ने ये कहते हुए जैसे अर्जुन को और निर्वस्त्र कर दिया था. टेबल से एक कलम और कॉपी उठती वो बराबर आ बैठी.

"ये सही होगा दीदी?"

"गलत होता तोह मैं ऐसा कहती क्या? तू बस हमारे दरवाजे से बहार के सभी नाम लिख और यकीन दिलाती हु ये कागज़ यही ख़तम हो जायेगा.", कोमल दीदी ने उसकी पीठ सहलाते हुए हिम्मत दी. अर्जुन भी अब तक के जीवन का वो सार लिखने लगा जहा उसके कदम बहके थे. पन्ना अंतिम पंक्ति तक जा पंहुचा तोह कोमल दीदी की आँखें हे चौड़ी हो गयी. वो हैरत में थी की अर्जुन उनकी सोच से भी कही ज्यादा दूर तक गया था.

'मल्टी

ज्योति

Manjubala(W)

नुसरत*

चारु

Akanksha(L)

अनीता मामी

संगीता मामी

पूजा मामी

बिंदिआ

मुन्नी

काजल

बिमला

मेनका सिंह

सरोज मौसी

सरोज भाभी*

बबिता

समय*

कंचन*

स्वाति*

अन्नू वाली (ल)

रेणुका (व)

मुस्कान

गुरदीप'

जहा * का मतलब था के यहाँ कुछ या बहुत कुछ हुआ है लेकिन अभी तक जिस्मानी रिश्ता नहीं स्थापित हुआ था. अर्जुन के हाथ से कॉपी लेते हुए वो bar-bar सब नाम दोहरा रही थी. प्रीती को तोह अर्जुन दिल में हे रक्तः था और उसका नाम वो बहार कही लिख नहीं सकता था. दीदी ने मंजू, रेणुका के नाम काटने के बाद अर्जुन से इतनी देर में पहला सवाल किया.

"आकांक्षा और अन्नू को तुम भी प्यार करते हो?", उनके सवाल पर अर्जुन ने बस सर हाँ में हिला दिया. और दीदी ने वो दोनों नाम भी हटा दिए.

"ये बबिता कौन है?"

"जी, सुशीला बुआ की बेटी है. ## गाँव वाली.", अर्जुन के इस कबूलनामे से तोह कोमल दीदी की धड़कन हे तेज हो गयी.

"ये क्या कर दिया तुमने ारु? ये नहीं होना चाहिए था.", उनकी बात पर अर्जुन ने साड़ी कहानी बताई तोह वह अब शांत हुई. ये जानकार ाचा लगा था के बबिता ने सबकुछ अपनी मर्जी से किया और अर्जुन ने भी समझदारी से हैंडल किया सब.

"देख ारु अब तू खुद से ये बता के इनमे से किसके साथ तेरा आगे मिलना नहीं हो सकता.", दीदी ने कॉपी उसकी तरफ बढ़ा थी. अर्जुन ने मल्टी, ज्योति, चारु, मुन्नी, बिंदिआ, बिमला और सभी मामियों के नामो के आगे 'क्ष' निशान लगा दिया तोह दीदी मुस्कुराने लगी.

"ये मामी वाला किस्सा अभी भूल जा तू लेकिन काजल, मुस्कान और ये गुरदीप का क्या चक्कर है? काजल के पास जायेगा तोह बिमला से भी मिलेगा और सविता से भी.", दीदी ने फ़िलहाल मां की बेटियों पर ऊँगली नहीं उठाई थी.

"वो, काजल से मिल कर मैं उसको मन करना चाहता था दीदी. उसको मेरे साथ बस सेक्स हे करना होता है और कुछ नहीं. ये मुस्कान ाची लड़की है दीदी और अकेली भी. गुरदीप वह पंजाब में चाचा जी की पडोसी है. Aarti-Priyanka दीदी की ख़ास सहेली."

"मतलब मुस्कान और गुरदीप तेरे रोजाना वाली लाइफ में तोह नहीं है! लेकिन काजल से आखिरी बार मिलना गलत न हो जाये ारु. वैसे सरोज मौसी का किस्सा हैरानी वाला है क्योंकि वो तेरे साथ ऐसा कर नहीं सकती. वजह कुछ और हे होगी. बचती है अन्नू, आकांक्षा, मेनका और ये तीनो बहने."

"अन्नू यहाँ नहीं है दीदी और Swati-Kanchan से मैं खुद हे दूर रहता हु.", अर्जुन ने तुरंत जवाब दे दिया.

"गुड. अब तू खुद समझ जब इतने नाम इनमे से हट हे गए तोह बाकी सब तू समझदारी से हैंडल कर हे लेगा. सरोज भाभी का किस्सा भी छोटी मामी जैसा हे है तोह वो बड़ी वजह नहीं होंगी. अब तू तैयार हो जा और अलका के साथ उसकी सहेलियों के घर इनविटेशन दे आ. बाकी सबको ऐसे काम के साथ साथ टाइम देते रहने से अनदेखी भी नहीं होगी और कोई न कोई हमेशा साथ रहेगा तोह तू इधर उधर भी नहीं निकलेगा.", कोमल दीदी ने अर्जुन का गाल चूमने के बाद खड़े होते हुए वो कागज अनगिनत टुकड़ो के रूप में अर्जुन की हथेली पर रख दिया था.

"थैंक यू सो मच दीदी.", अर्जुन का दिमाग कुछ शांत हो चूका था अब. न दर्द था और न परेशानी. बहार जाने से पहले दीदी ने उसकी अलमारी से कपडे निकल कर उसके पास रखे तोह अर्जुन को कुछ याद आ गया.

"दीदी, वो दादा जी ने कहा था के मैं घर से बहार न जाऊ ज्यादा दूर. क्या ये करना ठीक रहेगा?"

"ज्यादा दूर कहा जा रहे हो तुम, यही 2 सेक्टर्स के बीच हे अलका की सहेलियों के घर है. चल तू तैयार हो मैं अलका को बोलती हु के वो भी तैयार हो जाये.", अर्जुन ने अपने सामने राखी सफ़ेद कमीज और नीली जीन्स देखि तोह टीशर्ट उतरने लगा. दीदी जा चुकी थी और अर्जुन मुँह हाथ धो कर ाचे से तैयार होने लगा. लेकिन अब झिझक वापिस आ चुकी थी अलका दीदी की बात याद आते हे. आधे घंटे बाद वो कमरे से निकल कर पिछले आँगन में आया तोह अलका दीदी के कमरे में कोई न था. भूल गया था के यहाँ अब Ritu-Alka नहीं रहती. वापसी ऊपर आते हुए अब वो इन पिछले कमरों की तरफ परेशां सा बढ़ा तोह दरवाजा खोलते हे सामने बिस्टेर पर अलका दीदी उसकी प्रतीक्षा में हे तैयार बैठी थी.

"कमरा हे भूल गए हो तोह लाजमी है मुझे कहा याद रखोगे.", चेहरे पर सपाट भाव लेकिन गुस्से में और गुलाबी होती वो गज़ब ध रही थी. Gori-lambi अलका थी भी तोह सबसे ख़ास और सांचे में ढली. कटटर के पीले चुस्त कुर्ते के निचे तंग मोरी की ढीली सूती सलवार, do-ranga दुपट्टा और कानो में भी peele-safed टोपस. भूरे लम्बे बाल सलीके से गूंथ कर कमर तक की छोटी के रूप में उन्हें सम्पूर्ण रूप दे रहे थे. अर्जुन को सामने बस ऐसे एकटक देखते अलका के होंठ पल भर के लिए हिले पर फिर से चेहरे पर गंभीर भाव आ गए.

"सॉरी. अब चले या और गुस्सा करना है?", अर्जुन ने जैसे सॉरी कहा था और उसके बाद यु एकेएक चलने का बोलै तोह अलका उठिति हुई थोड़ा ज्यादा उखड़े स्वर में बोल पड़ी.

"एहसान कर रहे हो मुझे पर? उमंमाहहह.", पल में हे बोलती बंद हो गयी थी अलका की. एक दो बार अर्जुन से छूटने की कोशिश की लेकिन फिर खुद हे उसको कास के पकड़ती वह इस गहरे चुम्बन में अर्जुन के साथ लिप्त हो गयी. 2 मिनट बाद दोनों अलग हुए तोह अलका की नजरे नीचे थे लेकिन अर्जुन ने एक हाथ को पकड़ते हुए अपने दिल पर रख लिए.

"आइना कभी शिकायत का मौका नहीं dunga.I'm रियली सॉरी. अभी अकाल नहीं है न ज्यादा लेकिन आपको भी तोह पूरा हक़ है न. खुद भी बांध सकती थी मुझे जैसे प्रीती करती है."

"बाँध हे लिया तोह फिर प्यार कैसा अर्जुन. विश्वास है और मैं आजादी में यकीन करती हु. बस दिन की शुरुवात और अंत अगर हमारे बीच होने लगे तोह तुम भी नहीं भटकोगे.", अलका कितने हे दिनों बाद निस्चल प्रेम से अर्जुन के गले लगी थी. अर्जुन खुद को खुशकिस्मत मान रहा था के इतना प्यार करने वाली प्रेमिकाए है उसके पास. वो आवारगी कही जायज न थी इनके सामने जो घर से बहार की थी. हाँ कुछ फूल वह भी थे जिनके लिए कोमल दीदी ने भी ऐतराज न किया था.

"अब हम चले?", अर्जुन ने वही बया हाथ थामे पुछा तोह अलका ने इशारे से हैंडबैग उठाने को कहा.

"देखते जाओ अब तुमसे क्या करवाती हु.", इतराती हुई अलका आगे आगे और उसका परोसे लिए अर्जुन उसके पीछे. दोनों बहार वाले आँगन तक आये तोह अलका मोटरॉयचले के पास रुक गयी.

"मेमसाब, आप यहाँ बैठिये.", नयी कार का दरवाजा खोलते हुए अर्जुन ने वो ऋतू दीदी के लिए आरक्षित सीट की तरफ इशारा किया. अलका हैरानी से देख रही थी और इधर प्रीती के साथ विन्नी दीदी बैठक से बहार निकल आयी.

"आप लोग घर में हे थे?", अर्जुन के इस सवाल से विन्नी को ख़ुशी हुई की वह भी उसके बारे में सोच रहा था. प्रीती ने 2 साड़ी अर्जुन को दिखते हुए जवाब दिया.

"माँ, पेंटिंग बना रही है और विन्नी दीदी उनका सब्जेक्ट है. बहोत मजेदार काम है.", प्रीती ने जैसे हँसते हुए कहा था विन्नी दीदी ने उसके हलकी चपत लगा दी.

"खाख मजा आ रहा है. एक हे तरह बैठ बैठ कर बॉडी नम्ब होने लगती है. वैसे इसकी माँ आर्टिस्ट कमाल की है. बाद में मिलते है.", विन्नी जैसे खुद हे ज्यादा लालायित थी और दोनों बहार निकल गयी तब अलका दीदी ने अर्जुन से पुछा.

"तुम कार चला लेते हो? और ये सीट शायद ऋतू की है."

"आप बैठिये, ऋतू को बुरा नहीं लगेगा. और रही बात चलने की तोह घर में कड़ी रहेगी तोह कैसे चलाऊंगा.?", अर्जुन के कहने पर अलका दीदी सावधानी से कपडे संभालती अंदर बैठ गयी. पिछली सीट पर पर्स, nimantran-mithai रखने के बाद अर्जुन ड्राइवर सीट पर आ बैठा. मुख्या द्वार खुला हे था क्योंकि बहार वाले फर्श को कामवाली धो रही थी.

"ये सीट ऋतू के साथ साथ सभी की है लेकिन जहा मैं बैठा हु ये वाली सिर्फ ऋतू की.", अपनी सीट के आगे हाथ रखते हुए अर्जुन ने मुस्कुराते हुए पूरी बात कही तोह अलका दीदी हंसने लगी. 1 मिनट तक कार चालु रखने के बाद अर्जुन ने गियर लगते हुए बड़ी सावधानी से उसको बहार निकला. अलका दीदी गौर से कार के अंदर की हर चीज देख रही थी. सचमुच ये कार ख़ास थी और सुन्दर भी.

"ऋतू ने मोर्चा मार लिया शायद. नहीं तोह तुम अंदर नहीं बैठने वाले थे. वैसे आजकल सीधा ऋतू बुलाने लगे हो."

"आपके सामने या उनके साथ अकेले में हे बुलाता हु. और जब कार घर के अंदर आयी थी तब वही स्टीयरिंग पर थी, मेरी गॉड में बैठी हुई.", गली में आराम से चलते हुए अर्जुन बातें तोह कर रहा था लेकिन ध्यान चलने पर हे था.

"मतलब grah-pravesh कर लिया जोड़ी ने. वाह ऋतू मैडम, कितना दूर का सोचती हो.", अलका दीदी के हंसी के साथ साथ अर्जुन को भी अब समझ आया था उस दिन ऋतू दीदी का ऐसा करना.

"तोह कहा चलना है हमे?"

"## सेक्टर में और वह आशा को इन्विते करने के बाद उनके पड़ोस में हे नुसरत है. उसके बाद जहा तुम्हारा दिल करे. वैसे कार निकलने के पीछे कोई और मसला तोह नहीं है न तुम्हारा?", आँखें तरेरती हुई अलका दीदी और हसीं लगती थी.

"अभी 11 बजे है और अगर सब सही रहा तोह कार की जरुरत नहीं पड़ेगी. आपका कमरा ज्यादा ठीक है.", अर्जुन मुख्या मार्ग पर अब अपनी तरफ कार चला रहा था. दोनों हलकी प्यार भरी मस्ती करते जाने लगे.

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स्वर्गीय रघुबीर सिंह जी की हवेली में आज वर्षो बाद चहल पहल दिख रही थी. ज्यादातर शांत रहने वाली ये जगह अनुशाषित सी थी लेकिन आज यहाँ रामेश्वर जी की pautiya-bahuen और बीवी आयी हुई थी. साथ हे उमेद सिंह अपनी बहिन शालिनी को भी ले आया था उसके ससुराल से. Aas-pas से भी कुछ चुनिंदा लोग हाजिर थे यहाँ. ऋतू तोह हैरान थी इस जगह को देख कर. उलटे 'ु' के अकार में बानी हवेली की ईमारत में कोई दर्जन कमरे नीचे और इतने हे ऊपर थे. बीच वाला आँगन जहा गुलाबी पत्थर लगा था वो जगह उनके घर से दोगुनी बड़ी थी. कमरों के बहार छायादार गलियारा कोई 15 फ़ीट चूडा और बड़ी बड़ी सीढिया. सचमुच एक महल सी हवेली थी जहा हर चीज व्यवस्थित थी.

"दादी यहाँ कितने लोग रहते है?", आरती ने जो सवाल किया वही ऋतू कहने वाली थी. उनकी बात सुन्न कर कौशल्या जी तोह क्या जवाब देती पूर्णिमा जी ने उन्हें प्यार से गले लगाने के बाद कहा.

"सब यही रहते है. फ़िलहाल तोह तेरा चाचा, चची और मैं हे है इधर. तुम्हारी शालिनी बुआ भी आती रहती है मुझसे मिलने, कभी कभी शंकर और इन्दर भी आते है. बाकी कमरे बंद पड़े है, जब जरुरत हो तोह खुलवा लेते है.", सबको ले कर वो इस बड़े हाल में आयी तोह तारा के मुँह से ये आश्चर्य की आवाज निकल गयी.

"वाओ. ये तोह बहोत हे सुन्दर है. कितनी पुराणी होगी ये हवेली? वैसे लग तोह बिलकुल नए जैसी रही है.", तारा छत्त पर लगे फानूस, फर्श पर कालीन और शाही कुर्सियां, मेज और lakdi-pathar की कलाकारी निहार रही थी.

"पुराणी तोह पता नहीं बीटा ये कितनी है लेकिन हमारे दादा जी से पहले यहाँ उनकी 2 और पीढ़ियां रह चुकी है. काम समय समय पर होता रहता है तोह कुछ भी बदला नहीं है.", तारा के कंधे पर हाथ रखे ये खूबसूरत महिला शालिनी सिंह थी. तक़रीबन 40 वर्ष की शालिनी सिंह खुद भी एक आकर्षक रुतबे वाली और मिलनसार महिला थी. उम्र का कोई प्रभाव न था जिस्म पर और बैंगनी रंग की साड़ी पर एक सिलवट तक न होना बता रहा था के वो अनुशाषित भी है.

"मौसी, हम यहाँ कभी क्यों नहीं आये पहले?", तारा अभी भी उनके साथ हे कड़ी थी वही बाकी सब kursi-diwan पर इत्छा अनुसार बैठ चुके थे.

"आये तोह बीटा तुम हो यहाँ पर लेकिन शायद याद नहीं. प्रियंका बिटिया और कोमल को शायद याद हो. बस अर्जुन हे कभी नहीं आया इधर.", पूर्णिमा जी ने प्रियंका को दुलार करते हुए जवाब दिया तोह प्रियंका ने हां में सर हिला दिया.

"यहाँ और कुछ भी है क्या?", आरती के कौतहूल को देख ऋतू भी शालिनी बुआ को देखने लगी.

"यहाँ सिर्फ कमरे तोह नहीं होंगे न. पीछे वाले हिस्से में अस्तबल भी है घोड़ो का और एक तरफ तुम्हारे चाचा का डॉग फार्म. स्विमिंग पूल हवेली के अंदर हे है लेकिन पिछले हिस्से से हे रास्ता है. मीणा घुमा देगी तुम्हे नाश्ते के बाद और जिसने मंदिर चलना हो वो वह चल सकता है.", इतना कुछ होगा यहाँ इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी इन बहनो में से.

"यार ये विन्नी दीदी भी न. साथ आ जाती तोह ाचा रहता.", ऋतू ने मुँह बनाते हुए कहा तोह कौशल्या जी ने अब कही अपनी लाड़ली को टोका.

"उसका दिल वह रहने का था तोह यहाँ क्यों आएगी? घूम लो अपने आप, कोई रोक रहा है तुम्हे? बस वह कुत्तो वाली तरफ मैट जाना.", कौशल्या जी जैसे परिचित थी इस जगह से.

"चची जी क्यों न जाए कुत्तो के पास? बेटी निश्चिन्त जहा दिल करे घूमो तुम और यहाँ सभी कमरे खुले है. दिल करे तोह तस्वीर भी ले लेना, कैमरा वो शोकेस में रखा है.", उमेद सिंह अब वस्त्र बदल कर साफ़ कुर्ते पाजामे में थे. आरती और ऋतू को लाड लड़ते हुए उन्होंने अपनी बहिन को भी कुछ इशारा किया.

"वो आइशा अभी सो रही है भाई. उठेगी तोह मिल लेगी सबसे, रात जाग रही थी और फिर 5 घंटे का सफर.", शालिनी ने जवाब दिया और इधर नाश्ता ले कर 2 युवतिया आ गयी. सभी chai-coffee ले रहे थे और ऋतू जिज्ञासा में नाश्ता छोड़ कर इस पिछले हिस्से वाली खिड़की से बहार देख रही थी. छायादार घने वृक्ष के निचे वो विशाल कुत्ता आराम करता हुआ उसको बड़ा प्यारा लगा. रेशमी हलके भूरे रंग वाला उसका शरीर जो किसी रॉटवेलर से भी बड़ा था और गुलाबी लटकते हुए जबड़े. हैरानी की बात थी की वो बंधा हुआ न था.

"उसका नाम रोमियो है, तुम्हारे चाचा का लाडला है वो और यहाँ घर को छोड़ कर बाकि जगह ऐसे हे घूमता रहता है.", शालिनी जी के ऐसा बताते हुए ऋतू मुस्कुराने लगी.

"इसका नाम गलत नहीं है बुआ? वो कितना बड़ा और स्ट्रांग दीखता है लेकिन नाम रोमियो.", ऋतू की बात पर शालिनी जी भी मुस्कुराने लगी और इस बड़े शीशे के पास उमेद सिंह भी आ खड़े हुए.

"बिटिया अभी तुमने किंग को नहीं देखा न इसलिए रोमियो तुम्हे बड़ा लग रहा है. रोमियो एक मस्तिफ्फ़ है जो फॅमिली डॉग है लेकिन थोड़े बड़े.", उमेद को देख कर हैरानी नहीं हुई थी की ऋतू कुत्तो को पसंद कर रही थी. अर्जुन भी ऐसा हे था और इनके पिता शंकर तोह जैसे उमेद की तरह हे थे.

"ाचा अब जिसने रुकना है रुको यहाँ, हम लोग नाश्ता भी आ कर करेंगे मंदिर से तोह चलना चाहे चलो.", कौशल्या जी ने अपनी बात कही और कड़ी हो गयी. उनके साथ हे ललिता जी, रेखा जी, राजेश्वरी और पूर्णिमा जी ने भी अपनी जगह छोड़ दी थी.

"मैं भी चलती हु आप लोगो के साथ.", प्रियंका दीदी ने कहा तोह तारा भी उनके साथ हो गयी. उमेद सिंह भी बहार निकल लिए क्योंकि अब 2 गाड़ियों की जरुरत थी. घर में पीछे आरती, ऋतू, शालिनी जी और बस काम करने वाली महिलाये हे बची थी.

"चलो अब यहाँ रह कर मैं खुद तुम दोनों को सैर करवाती हु घर की.", शालिनी जी के इतने अपनेपन से कहने पर Aarti-Ritu के चेहरे खिल उठे.

"सचमुच आप बहोत ाची है बुआ. अर्जुन भी यहाँ होता तोह उसको बड़ा ाचा लगता.", ऋतू ने अर्जुन का जीकर किया तोह एक पल के लिए शालिनी के चेहरे पर कई तरह के बाव आ गए. खुद को संभालती हुई वो मुस्कुराती हुई उन दोनों को साथ लिए इस गलियारे से निकलती पिछले हिस्से की तरफ जाने लगी.

"अर्जुन तुम्हारा छोटा भाई है न जिसको सब मुन्ना बालते है. अब तोह बड़ा हो गया होगा वो?", यहाँ ये बड़ा मैदान था जैसे खेत की जमीन को दुरुस्त करके तैयार किया हो और कुछ कुछ दुरी पर एक कतार में घने वृक्ष लगे थे. वो कुत्ता हिलता दुलत इन लोगो के पास चला आया तोह एक पल के लिए आरती के चेहरे पर दार सा भाव आ गया. लेकिन वो इन्हे बस सूंघ कर हिलता डुलता इधर उधर मटकने लगा.

"रोमियो, से hello तो दीदी?", शालिनी जी की बात सुन्न कर इस विशाल जीव ने बस मुँह खोल जैसे वो खुश हो रहा हो. शालिनी जी ने ऋतू का हाथ पकड़ कर उसके बड़े सर पर रखवाया तोह खुद हे वो सहलाने लगी. रोमियो भी मस्ती करता जमीन पर बैठने लगा तोह ऋतू भी घुटने मोड़ती हुई उसको गर्दन तक सहलाने लगी.

"हाहाहा. टेडी बेयर जैसा है ये तोह. आरती देख जरा.", अपने पाँव हवा में हिलता रोमियो जमीन पर लौट लगा रहा था. आरती का डर भी जाता रहा तोह वो भी अपनी बहिन के साथ शामिल होती इस प्यारे जीव को दुलारने लगी.

"बुआ जी ये शरीर से बहोत बड़ा है लेकिन कितना प्यारा है.", आरती के ऐसा कहने पर शालिनी जी ने सहमति में गर्दन हिलाई और दोनों लड़किया भी कड़ी हो गयी. आगे चलते हुए अब रोमियो उनके साथ हे था.

"ये जैसा अभी है वैसा रात के वक़्त नहीं होता. इधर रात में कुछ सियार आ जाते थे और रोमियो ने 4 तोह मार हे दिए. अनजान लोगो को ये हवेली के अंदर नहीं आने देता लेकिन घर को कोई व्यक्ति मौजूद हो तोह उतना हे प्यार भी दिखता है. एक बार तुमसे अब पहचान हो गयी है तोह ज़िन्दगी भर याद रखेगा.", टहलते हुए वो थोड़ी आगे आये तोह 6 फ़ीट ऊँचे jaali-dar बाड़े के अंदर से भोंकने की भयंकर आवाजें आने लगी. रोमियो भी एक पल ठिठक गया था उन झबरैले कुत्तो को जाली पर पंजे मारते देख. Kaale-bhoore लेम बाल और खतरनाक लम्बे सफ़ेद दांत.

"वाओ, ये तोह बिलकुल अलग और बड़े गुस्से वाले है.", ऋतू इस बाड़े के पास जा कड़ी हुई तोह कुछ देर भोंके के बाद बस वो 2 कुत्ते गुर्राते रहे.

"ये तुम्हारे चाचा हिमाचल से लेके आये थे, गद्दी नेसल के भालू जैसे ये कुत्ते है तोह बड़े वफादार लेकिन जल्दी ट्रस्ट नहीं करते. दिनभर अंदर कूलर की ठंडक में पड़े रहते है और रात को पहरेदारी करते है.", उनके पास से गुजरने पर पहली बार रोमियो भोंका था, जैसे उन्हें चिड़ा रहा हो. आगे अस्तबल और किंग भी तोह देखना था अभी.

वही बाकी सब मंदिर में पहुंचे तोह तारा को थोड़ी हैरत हुई के उनके साथ 4 सुरक्षाकर्मी क्यों आये है. और Purnima-Kaushalya जी को देख कर बहुत से लोग नमस्कार करते हुए आदर भाव से सर भी झुका रहे थे. महिलाये सभी अंदर चली गयी थी उमेद सिंह के साथ, जहा उन्होंने पूजा करनी थी. वही तारा ने प्रियंका दीदी को इधर हे रोक लिया था अपने साथ.

"आपने देखा कुछ? नानी को यहाँ कितने लोग जानते है और वो पुजारी खुद झुक कर उन्हें नमस्ते कर रहा था. मंदिर भी ाचा पुराण है और लोग भी बहोत है आसपास.", तारा भी हर बात पर ध्यान देती थी जो शायद हर व्यक्ति नहीं जानता था.

"Dada-daadi जी यहाँ अपनी शादी के वक़्त से आ रहे है तारा और गाँव के लोग उन्हें ाचे से जानते है. वैसे वो बहार पेड़ के निचे जो लोग बैठे थे उन पर ध्यान नहीं दिया तुमने.", प्रियंका दीदी की बात सुन्न कर तारा हंसती हुई उन्हें लिए इन घने वृक्षों की तरफ चल दी.

"बात तोह उस बारे में हे करनी थी मैंने आपसे. एक गाडी हमसे पहले यहाँ के लिए आयी और उमेद मां ने उन्हें कुछ समझा कर भेजा था. मुझे जितना लगता है उसका मतलब तोह लेडीज पर कोई नजर न डाले इसलिए ऐसा किया गया होगा. बाकी आपको क्या लगता है?"

"तारा, बात तुम्हारी सही हो सकती है क्योंकि गाँव के अंदर ऐसा होना लाजमी है लेकिंन सुरक्षा के लिए अलग से इतने आदमी. बात कुछ और भी हो सकती है.", प्रियंका दीदी की बात सुन्न कर तारा भी सोचने लगी थी. एक 45 वर्ष के करीब का व्यक्ति थोड़ी दुरी से इन दोनों लड़कियों को बड़े गौर से देख रहा था. मंदिर के अंदर कोई सुरक्षाकर्मी न था, सब गेट पर थे इस समय.

"वो अंकल कैसे घूर कर देख रहा है न तारा.", प्रियंका दीदी ने तारा और अपने कपडे देखे तोह वो सही तरह से salwar-kameej के ऊपर दुपट्टा लिए थे लेकिन उस व्यक्ति का ऐसे देखना उन्हें बुरा लग रहा था.

"ठरकी बूढ़े को अंकल क्यों कह रही हो आप. लगता है इरादे ठीक नहीं है इस कमीने के."

"जानता नहीं है न वो के ऐसा करना कितना भरी होने वाला है इसके लिए.", प्रियंका दीदी ने मंदिर के प्रांगण में खड़े उमेद चाचा को एक नजर देखने के बाद इस व्यक्ति पर नजर डाली तोह 10 सीढिया उमेद सिंह ने एक शन्न में हे माप दी थी. वो अब इस व्यक्ति के ठीक सामने आ खड़े हुए, जिसकी नजरे इन लड़कियों पर अटकी हुई थी.

"परे हो जा बहनचोद, ऐसा सामान दस हजार में भी न मिले.", इस आदमी ने जैसे ये देखा हे न था के सामने उमेद सिंह खड़ा हुआ है.

"आजा मैं तुझे जन्नत की सैर करवाता हु.", ये रौबदार आवाज और अब इस दानव के चेहरे को देखते हे इस आदमी की घिग्गी बांध गयी लेकिन तबतक देर हो चुकी थी. गिरबान से पकड़ते हुए उमेद सिंह ने इस व्यक्ति को बहार खड़े सुरक्षाकर्मी की तरफ धकेल दिया.

"प्रधान जी पाँव पढू हु..", वो हाथ जोड़ रहा था लेकिन उमेद सिंह अपने आदमियों को इशारा करके वापिस मंदिर में चले गए. आदमी को 3 लोग लेकर वह से गायब हो चुके थे और तारा मुस्कुरा रही थी क्योंकि प्रियंका दीदी ने जो कहा वह सच साबित हुआ था. और उमेद सिंह ने बड़ी शांति से सब संभल कर अपनी समझदारी दिखाई थी. अब तारा और प्रियंका भी अंदर चल दी थी मंदिर से आती आवाज सुन्न कर.

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आशा के घर निमंत्रण देने के बाद जब अर्जुन और अलका नुसरत के घर निकलने लगे तोह आशा भी उनके साथ कार की पिछली सीट पर आ बैठी. घर में वह ढंग से बात नहीं कर पायी थी और अर्जुन को निहारना भी न हुआ था.

"तोह तुम दोनों की मस्ती लगता है ज्यादा हे आगे जा चुकी है.", पीछे बैठते हे पहली बात यही की थी आशा ने.

"ऐसा कुछ नहीं है यार. मैंने पहले हे बताया था के हम इतना नहीं मिल पाते.", अलका के चेहरे की लाली बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखती थी. अर्जुन बस चुपचाप बताई सड़क पर धीरे गाडी चला रहा था.

"जितना निखार आया है न तुझमे वो छुप नहीं रहा. म्हणत तोह ाची खासी हुई है बाकी तेरी अपनी ज़िन्दगी तोह हम कर हे क्या सकते है.", इतराती हुई आशा ने एक नजर खामोश अर्जुन पर की लेकिन वो घर पे भी शांत था और अब भी.

"वैसे तू हिमाचल क्यों जा रही है यार? मैं तोह यही सोच कर आयी थी की दीदी की शादी में हर फंक्शन तू अटेंड करेगी.", अलका ने बात बदलते हुए जरुरी बात कही तोह आशा ने भी ठंडी सांस लेते हुए जवाब दिया.

"यार वह तोह घर पे थी इसलिए खुल कर नहीं कह सकीय, कुल्लू (हिमाचल) रिश्ता पक्का हो गया है मेरा और 15 तारीख को सगाई के बाद पूरी फॅमिली वही शिफ्ट होने वाली है.", आशा के इस खुलासे पर जहा अलका को हैरत हुई वही अर्जुन भी चुप न रह सका.

"आप तोह अभी पढाई कर रही हो. कॉलेज ख़तम नहीं हुआ है आपका और इतनी जल्दी sagai-shaadi. घर में बात नहीं करि क्या इस सबके लिए?"

"Hello ध्यान से समझो जरा मेरी बात को. जब परिवार हे पूरा वापिस जा रहा है तोह मेरी क्या मजाल जो सवाल करू.? दादी है मेरी और उन्होंने कहा है तोह मतलब पत्थर की लकीर. वैसे जानकारी के लिए बता देती हु के मुझे तोह फिर भी सबसे ज्यादा फ्रीडम मिली है, माँ 15 की थी जब उनकी शादी हुई थी और मेरी बड़ी दीदी 18 की और आज उनके 2 बचे है 22 की उम्र में.", अर्जुन और अलका दोनों को हे झटका लगा ये बात सुन्न कर और आशा ने अर्जुन को दाहिनी तरफ मदद कर एक तरफ गाडी रोकने का कहा.

"मतलब आज भी ऐसा होता है? गलत है ये सब.", अर्जुन इतना कहने के साथ हे गाडी में बैठा रहा और दोनों लड़किया उतर कर उसकी प्रतीक्षा करने लगी.

"आप जाइये अंदर, मैं यही इन्तजार करता हु.", अलका ने कोई सवाल न किया और आराम से अंदर चली गयी. अर्जुन जानबूझ कर यहाँ रुका था क्योंकि नुसरत के साथ कुछ हद्द तोह वह भी पार कर चूका था और आगे से वो वही सब नहीं दोहराना चाहता था. वो अंदर बैठा बस धीमी आवाज में चलते गाने सुन्न रहा था और कोई 15 मिनट में हे सिर्फ अलका बहार आयी.

"चलो अब जहा चलना है. नुसरत आएगी शादी में लेकिन फ़िलहाल उसके यहाँ रिलेटिव आये हुए और आशा भी उसके पास रुक गयी.", कार में बैठते हे अलका दीदी अपने चेहरे पर आया पसीना साफ़ करते हुए कहा. अर्जुन बड़े ध्यान से ये देख रहा था और अलका के चेहरे पर एक मोहक मुस्कान आ गयी.

"अब मैट कहना के मैं खूबसूरत लग रही हु."

"वो हमेशा हे लगती हो आप. बस ये देख रहा था के आपको भी एक की आदत लग हे गयी.", अर्जुन ने कार चालू करने से पहले एक बार उनका हाथ थाम कर चूम लिया. तुरंत हाथ पीछे खींचती वह शर्माती हुई दूसरी तरफ देखने लगी.

"ऐसे में कोई देख सकता है अर्जुन. सबके लिए हम लवर्स नहीं है.", थोड़ा ठीक से बैठने के बाद वो अपनी हे बात को झुठलाती हुई अर्जुन की कलाई पर हाथ रखते हुए कहने लगी. अर्जुन ने इस तरफ से हे कार मुख्या सड़क पर लाते हुए गियर बढ़ा कर उलटे हाथ में उनका सीधा हाथ पकड़ लिया था. अलका को भी अब सुकून था और खली सड़क पर अर्जुन को भी परेशानी नहीं हो रही थी एक हाथ से स्टीयरिंग सँभालने में.

"अब बताओ के लंच रेस्ट्रा में करना है या कही और? इस सेक्टर में भी एक बड़ी मार्किट है.", अर्जुन ने कार धीमी की तोह गियर बदलने के लिए हाथ अलग करना पड़ा. इंडिकेटर देता वो इस पार्किंग में मुड़ने लगा तोह अलका थोड़ा असमंजस में आ गयी.

"घबराती क्यों हो आप? दुनिया की नजरो के हिसाब से हे चल लो."

"मैं गर्लफ्रेंड के हिसाब से हे चलूंगी. तुम टेंशन न लो और उस ice-cream पार्लर के पास गाडी लगा दो.", अलका दीदी का विश्वास देख अर्जुन भी हैरान था. छाया में थोड़ी मशक्कत से कार लगाने के बाद वो बहार निकला तोह अलका दीदी अभी भी अंदर बैठी थी. वो समझ गया था इसकी वजह. सामने से घूम कर उसने अलका दीदी की तरफ का दरवाजा खोला तोह एक बड़े फ्रेम का भूरा धुप का चस्मा लगाए अलका दीदी नजाकत से बहार निकली.

"वाह. क्या इरादा है आपका?", अर्जुन के लिए तोह वह आज ज़माने भर की सभी लड़कियों से कही बढ़कर लग रही थी. बेशक अर्जुन भी कुछ काम नहीं दिख रहा था लेकिन अलका अपने पहनावे और इस कमाल के रंगत पर गहरे रंग के इस चश्मे के साथ तोह क़यामत का दूसरा नाम थी.

"इरादा बिलकुल नेक है डार्लिंग. तुम्हे लड़कियां देखती है न तोह उन्हें ये भी पता होना चाहिए के इस लड़के की लवर भी कुछ काम नहीं है.", बात जरा भी गलत न थी अलका की. 3-4 लड़के बड़े गौर से इन दोनों को देख रहे थे लेकिन lambi-haseen अलका ने अर्जुन का हाथ एक सलीके से पकड़ते हुए इस बड़े ice-cream पार्लर का रुख किया. थोड़ी दूर हे खड़े वो 4 कॉलेज के लड़के उन्हें देखते हे आपस में बतियाने लगे.

"अबे वो लड़की अलका हे थी न, #### कॉलेज वाली मिस फ्रेशर? क्या माल है भाई मालिक ये लड़की.", ये चौकोर छापे वाली कमीज पहने पतला सा युवक स्कूटर पर बैठे हुए अपने एक दोस्त से बोलै जिसका नाम शायद 'मालिक' था.

"भोस्डिके वो अलका शर्मा हे है लेकिन लोंदा न दिखा तुझे उसके साथ? साला कार भी ऐसी और ऊपर पर्सनालिटी भी देख. और खुद सोच के वो इतनी लम्बी और खूबसूरत लड़की, जो नजर उठा कर किसी को नहीं देखती तोह तेरे मेरे जैसे के तोह पत्नी से रही बिल्लू.", ये मोटा सा दाढ़ी वाला लड़का इनमे समझदार था.

"वैसे भाई वह छोरा न हरामी है पक्का. उस लड़की को तोह मैंने आज हे देखा है लेकिन इस लड़के का चक्कर न इस से भी सुन्दर छोरी के साथ है. हरी आँखें है उस लड़की की, बड़े पार्क के बहार जूस की स्टाल पे सवेरे देखा था मैंने उसके साथ इस लड़के को. लाल बुलेट थी तब इसके पर और सच कहु तोह शरीफ तोह है नहीं बेशक अमीर हो. Maar-kutai वाला शरीर भी है वैसे इसका.", ये उलझे हुए बालो वाला युवक भी किसी दौड़ वाले खिलाडी सा था और उसकी बात सुन्न कर 'बिल्लू' नामक लड़का थोड़ा चौंक उठा.

"अबे क्या कह रहा है? अलका से भी सुन्दर लड़की पता राखी है इसने? अलका को देखने के चक्कर में 4 बार डंडे खा चूका हु मैं तोह इस से सुन्दर कौन हो सकती है बे छोटू?", बिल्लू इतना कह कर बड़ी आस से उस पार्लर की तरफ देखने लगा जहा बड़ा शिक्षा लगा था और एक टेबल पर Arjun-Alka एक तरफ 2 कुर्सियों पर बैठे एक दूसरे को बड़े प्यार से आइस क्रीम खिला रहे थे.

"सबने बोल दिया हो तोह मैं कुछ कहु.?", ये लड़का इन सबमे थोड़ा छोटा लग रहा था और मुँह पर एक रुमाल बंधा था इसके. स्कूटर पर बैठा वह जैसे अर्जुन को देखना भी नहीं चाहता था.

"बोल राणे तू भी बोल."

"माँ छोड़ के रख देगा वो अकेला सबकी. आप मालिक भाई बुरा मैट मान न लेकिन अर्जुन नाम है उसका और जब वो धुलाई करने लगता है न तोह हाथ संभल के करता है. पुलिस भी उसका हे साथ देती है, बाकी छोटा भाई होने के नाते इतना हे कहूंगा के गलती भी मैट करना उस से उलझने की. कुलविंदर और मैं तोह इसके सेक्टर में भी नहीं जाते."

"अबे इसने हे तुम्हारी दुरगति की थी क्या?"

"भाई वो नीली आँखों वाली कुलविंदर और मुझे बड़ी पसंद थी. इस पहलवान ने जो धोया न हमको पूछो हे मैट बिल्लू भाई. दिल का ाचा है लेकिन बस कोई मौका मैट देना जिस से ये गांड मार दे सबकी.", राणे की बात सुन्न कर ख़ामोशी सी छ गयी कुछ पल के लिए.

"मतलब भाई ये 2-2 संभल रहा है और तुम दोनों कह रहे हो के दूसरी वाली भी काम नहीं है? साला ये तोह na-insaafi है. अगर किसी तरह अलका को पता लग जाये के ये लड़का उसको धोखा दे रहा है तोह फिर बात बन्न सकती है.", बिल्लू अपना दिमाग लगते हुए अंदर देख रहा था जहा शीशे के पास बैठी अलका अर्जुन को अपने हाथ से ice-cream खिलाती हुई मुस्कुरा रही थी.

"लौड़े लग जायेंगे मैं बोल रहा हु बिल्लू भाई. और आपने जो करना है वो करो, मैं और दिलप्रीत तोह चले यहाँ से.", स्कूटर चालू करते हे वह धावक युवक भी पीछे बैठा और राणा वह से निकल लिया.

"मालिक भाई डंडे खा चूका हु इस लोंड़िया के पीछे और आप भी जानते हो के ये लड़की एक taj-mehal है. आप तोह मेरा साथ डोज या फिर भागने वाले हो.? देखो वो खड़े हो गए है और मैं हिम्मत करके बोलने वाला हु के इस लड़के का चक्कर है किसी और के भी साथ."

"तू बेफिक्र बोल बिल्लू. अगर लड़की ने बात सुनी तोह मैं तेरे साथ हु, कैंप में तेरे भाई का राज है. बेशक पैसेवाला हो और ताक़तवर भी, लेकिन अपने पास जमघट है लड़को का. सोनू बदमाश मां है मेरा तोह इसको कही भी पटक लेंगे.", अलका और अर्जुन हाथो में हाथ लिए बहार आ रहे थे और मालिक भी उनको देख रहा था. उसने बिल्लू की पीठ थपथपाते हुए आगे बढ़ने का इशारा किया तोह राणे 200 गज दूर छुप कर दिलप्रीत के साथ यहाँ का नजारा देख रहा था.

"ये लड़का धोखेबाज है अलका. इसका चक्कर एक और के साथ चल रहा है अगर तुम्हे न पता हो तोह मैं बता देता हु. तुम जैसी शरीफ और इज्जतदार लड़की इसके साथ देख कर ाचा नहीं लगा.", बिल्लू ने ये बात थोड़े जोश से कही थी और अलका के लिए दरवाजा खोलता हुआ अर्जुन एक अलग हे तरह मुस्कुराने लगा.

"हु अरे यू? गेट लॉस्ट.", अलका उसको नजरअंदाज करती हुई अंदर बैठने लगी तोह अर्जुन ने थोड़ा रुकने का इशारा किया. वो भी मुस्कुराती हुई कार से तक लगाती इस लड़के को देखने लगी.

"मैं जो भी हु ये लड़का न सही न है. इसकी एक और भी सेटिंग है, कोई नीली आँखों वाली.", अर्जुन गुस्सा होने की जगह हंसने लगा तोह अब मालिक भी उनके करीब आ गया.

"हाँ तोह तुम्हे क्या प्रॉब्लम है.? वो मेरी बेस्ट फ्रेंड है. अगली बार ये सूरत नजर आयी तोह फिर कभी नजर नहीं आओगे. फ़क ऑफ.", अलका ने जैसे गाली दी थी एक पल के लिए अर्जुन भी हैरान हो गया था.

"ओह मैडम, मेरा दोस्त जो कह रहा है वो दिल से कह रहा है. उसको परवाह है आपकी, पैसा देख के ऐसे लड़के के चक्कर में न पदों.", मालिक थोड़ा आगे आया तोह अर्जुन भी इस तरफ आ गया था. वो गौर से मालिक को देखने लगा.

"तुम अपने काम से काम रखो और ये 2 संभाले या 10 तुम्हे कोई मतलब नहीं होना चाहिए. गेट लॉस्ट.", अलका इतना कहती अंदर बैठ गयी और अर्जुन ने दरवाजा बंद कर दिया. मालिक ये बेइज्जत्ती जैसे दिल पर ले गया था.

"महंगा पड़ेगा लोंदे तुझको. पैसो का घमंड मत रखना, खाल उतार सकता हु teriii..aaahhhh", वह कुछ कहता उस से पहले अर्जुन ने ब्याह पकड़ कर एक तरफ फेंक दिया था उसको.

"कैंप में देखा था तुझको, सोनू से बोलना के अर्जुन शर्मा से मिल कर आये हो. उसकी बात ध्यान से सुन्न लेना. अगली बार इतना मौका नहीं दूंगा.", मालिक की तोह गांड हे फट गयी थी जब उसके मां का नाम अर्जुन ने ऐसे लिया.

"मां. मां को कैसे जानते हो तुम?", दर्द की परवाह न करते हुए वो बस ये देख रहा था के इस लड़के की बाजू में कितनी जान थी और वो जानते हुए भी उसके साथ ऐसा सलूक कर रहा था.

"स्टेडियम में सिक्योरिटी गार्ड है न तुम्हारे दूसरे मां? घर भी आया था मैं सोनू के जब तुम गली में उनकी बीवी के साथ बातें कर रहे थे.", अर्जुन ने जैसे ये कहा तोह मालिक पर घडो पानी गिर गया. जितना dum-khum था अर्जुन में तोह वह उसकी हालत बुरी कर सकता था लेकिन बस वह चुपचाप कार में जा बैठा. अलका मुस्कुरा रही थी और वो गाडी उनके सामने से निकल गयी.

"माँ छुड़ा बिल्लू, ये लौंडा बाप है अपना. वो लड़की भी संतुष्ट है और इसकी बात भी खरी है. मैं चला और राणे को बोल देना के वो सही था."
 
अपडेट आज रात 12 बजे तक. असुविधा के लिए खेद है.
 
अपडेट 122

प्रभाव - 2


आज शंकर शर्मा का दिन खासा व्यस्त चल रहा था हॉस्पिटल आने के बाद. सुबह से मरीजों की कतार, भर्ती किये हुए bimar-chotil लोगो की jaanch/upchaar के बाद कही 2 बजे वो अपने केबिन में आये थे. 5 घंटे कैसे निकले उन्हें खुद हे पता न चला और अब कही उन्होंने एक चाय मंगवाई तोह केबिन के दरवाजा पर दस्तक देती उनकी प् ने सूचित किया के एक इंस्पेक्टर उनसे मिलने आये है.

"नमस्कार डॉक्टर साहब.", इन जनाब ने आते हे शंकर जी को हाथ जोड़ अभिवादन किया और उन्होंने भी हाथ मिलाने के बाद बैठने के लिए सामने वाली कुर्सी पेश की.

"कहिये गौतम जी, आपकी क्या सेवा कर सकता हु?", चाय और पानी के लिए फ़ोन करने के बाद शंकर जी ने इंस्पेक्टर से मुखातिब होते हुए कहा. गौतम जी के चेहरे पर अभी परेशानी के भाव आ गए थे बंद कमरे में निजता मिलते हे.

"शंकर यार मुझे 3 दिन पहले हे पता चला के तुम्हारा वह से तबादला हो गया है. आज छूती ले कर मैं सिर्फ तुमसे हे बात करने आया हु.", गौतम जी भी hum-umar थे शंकर के और एक तंदरुस्त व्यक्ति जिन के बालो में समय का प्रभाव पड़ने लगा था. चाय और पानी अंदर रखने के साथ हे शंकर ने दरवाजे पर चिटकनी लगा दी.

"भाई बात बता क्या है? तेरे चेहरे से तोह लगता है के कुछ बड़ी घटना हुई है.", शंकर अब इनके बराबर आ बैठे.

"एक डेड बॉडी मिली थी 3 दिन पहले #### रोड पर. 19-20 साल की लड़की जिसके सीने के हिस्से को भी काट खाया था दरिंदो ने. तुझे ध्यान है न महीना पहले भी एक इस तरह की वारदात वही थोड़ी दुरी पर हुई थी? तब भी लड़की इतनी हे उम्र की थी लेकिन सबूत नहीं मिले थे उस वक़्त.", गौतम ने अपने जेब से लिफाफे में राखी 3-4 तस्वीरें शंकर के सामने रख दी. घटना वही हुई थी जहा इस से पहले शंकर की ड्यूटी थी. बड़े ध्यान से शंकर उन फोटो को देखने लगा जहा एक युवती के साथ सभी सीमाएं लांघ कर मार दिया गया था.

"तुमने अपराधी का पता लगा लिया गौतम?"

"मुझे केस से हटा दिया गया है शंकर. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी बदल कर सिर्फ अज्ञात द्वारा हत्या बता कर बात ख़तम कर दी गयी है. लड़की का परिवार भी प्रवासी है तोह सभी को धमका कर कुछ पैसे देने के बाद वह से भेज दिया गया. परसो रात से अब तक मैं सो नहीं प् रहा दोस्त और दसप सम्पत शायद मुझे वायरलेस या ट्रैफिक में दाल देगा."

"तुझे पक्के सबूत मिले थे गौतम? और अगर hospital-police भी अपराधी का साथ दे रहे है तोह मतलब व्यक्ति बहोत रसूख वाला है.", शंकर के लिए लाशें देखना आम बात थी लेकिन उन तस्वीरों को देख कर अजीब सी बेचैनी होने लगी थी उन्हें भी.

"सेठ नरोत्तम दस का बीटा प्रतीक उर्फ़ बॉबी और ये गैंगरेप था जिसमे कुछ और बड़े घरो के लाडले भी शामिल होंगे. देख भाई बात नौकरी की नहीं है, बेटी मेरी भी है और कल को यही सब किसी और के साथ फिर होगा तोह खुद को क्या जवाब दूंगा."

"सबूत क्या है उस सेठ के लोंदे का तुम्हारे पास?", शंकर ने 2 टूक बात कही जिस से वो कोई फैंसला ले सके.

"सबूत था जो सम्पत ने खुद मेरे सामने बॉबी को लौटा दिया. उसकी चैन से टूट कर गिरा 'बॉबी' नाम लिखा सोने का लॉकेट. ढंग से जांच की जाती तोह पक्का स्पर्म और फिंगर प्रिंट मैच हो जाते. रिपोर्ट तोह अभी भी होगी हे वह हॉस्पिटल में. पक्का सबूत उस से ज्यादा क्या होगा और किसी तरह बॉबी हत्थे चढ़ जाए तोह उसका मिलान किया जा सकता है.", अब शंकर ने सहमति में गर्दन हिलाई क्योंकि बात सही कही थी इंस्पेक्टर ने. फ़ोन अपनी तरफ खिसकते हुए शंकर ने नंबर मिलाया और कुछ घंटी जाने के बाद हे सामने वाले ने जवाब दिया.

"कर्मबीर, शनकर बोल रहा हु."

"जी सर. कहिये क्या सेवा कर सकता हु.?", सामने वाले ने भी जोशीली आवाज में जवाब दिया.

"3 दिन पहले कोई dead-body आयी थी 19 साल की लड़की की. किसने जांच की थी?", इस बात को सुन्न कर सामने वाले ने व्यक्ति ने कुछ सेकंड तक मौन रखा और फिर धीमी आवाज में बोलै.

"डॉ मरस कालरा ने सर. बाद में उसको बदलवा दिया गया था, 5 लाख लिए है M.O. सतीश ने और कालरा मैडम को शायद धमकी भी मिली है."

"तुम्हारे aas-pas कोई है?"

"नहीं सर, लंच टाइम है और मैं भी यही देख रहा था. आपकी ख़ास रूचि है इस केस में तोह मतलब कई लोगो का नंबर लगाने वाले हो."

"ऐसा हे समझ लो कर्मबीर. वो ओरिजिनल रिपोर्ट क्या है बता सकते हो अगर कुछ रिकॉर्ड है तोह?"

"एक मिनट दीजिये सर, ऐसे पेचीदा केस तोह मैं हमेशा छुपा कर रखता हे हु. हाँ.. ये यहाँ लाने के 12 घंटे पहले मरी थी लगभग. मल्टीप्ल सीमेन ट्रेस थे, गेनिटल्स और चेस्ट पर सीरियस इंजरी थी और सांस घुटने से मौत जो नैक एरिया पर बानी मार्किंग्स से पता लगता है."

"कोई और ख़ास बात कर्मबीर?", शंकर बड़े गौर से सबकुछ सुन्न रहे थे.

"यस सर, अल्कोहल मुँह में डाला गया था दम घुटने के बाद. मतलब दिखने के लिए हे ऐसा किया गया होगा. वैसे डॉ मरस कालरा आपको बेटर बता सकती है सर क्योंकि उन्होंने जो पहले इंस्पेक्टर आये थे उन्हें बताया था के ऐसा हे केस शायद आपने स्टडी किया था 5 हफ्ते पहले."

"हम्म. थैंक यू कर्मबीर और ये बात मरस कालरा से भी मैट करना. रिपोर्ट की जरुरत पड़ी तोह तुम्हे याद करूँगा."

"वेलकम सर.", और इसके साथ हे लाइन काट दी गयी.

"गौतम, अभी शांत रहो 3 दिन तक लेकिन अपने खबरि मुस्तैद रखना. मैं भी बात करता हु और बुधवार को तुम कानूनी प्रक्रिया अपनाना मैं मेरी डॉक्टर वाली. तुम्हारा ट्रांसफर तोह होने नहीं दूंगा दोस्त जबतक केस निबटा नहीं देते और इस दसप सम्पत की भी कुंडली निकलते है भुप्पी से बोल कर.", ये बात सुन्न कर अब गौतम के चेहरे पर सुकून के भाव आ गए थे.

"यार शंकर इसलिए हे तोह मैं तुम्हे इतना मानता हु. मुझे पता है के तुम सही काम को बेशक अलग तरीके से अंजाम दो लेकिन बुरे का साथ नहीं देते. वैसे सम्पत जी ने थोड़े हे समय पहले दिल्ली में कोई महंगा घर ख़रीदा है अपने बेटे के नाम से. कुंडली की शुरुवात मैं हे कर देता हु और तुम बस मासूम के साथ इन्साफ में मेरा साथ दो भाई.

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"सुना है तुम अगले हफ्ते फिर से पंजाब जा रहे हो. इस बार मैं भी साथ चालू क्या?", अलका दीदी को ख़ास अधोवस्त्र दिलवाने के बाद अर्जुन अब घर की तरफ कार ले कर चल रहा था. दोनों ने आज काफी समय साथ गुजरा था जो चेहरों की ख़ुशी से पता चल रहा था.

"मुझे तोह किसी ने बताया नहीं के मुझे पंजाब जाना है. लेकिन आप कह रही है तोह जरूर जाना होगा. आप चलोगी तोह मुझे ज्यादा ख़ुशी होगी.", अर्जुन ने एक नजर अलका दीदी को देखा और उनका गाल प्यार से सेहला दिया. वो भी मुस्कुरा रही थी लेकिन उनकी चाहत इस से कही ज्यादा थी.

"यहाँ खुलकर नहीं समय बिता सकते न अर्जुन. साथ जाउंगी तोह सफर में भी आराम नहीं लेने दूंगी.", बहार सड़क सुनसान देखते हुए अलका ने अर्जुन का गाल चूम लिया.

"मतलब आज हम कुछ नहीं करने वाले? वैसे 5 बजे तक घर में ज्यादा लोग नहीं होने वाले.", अर्जुन की बात सही थी और चाहती अलका भी थी की वह अर्जुन से बेफिक्र हो कर प्यार करे.

"मेरा दिल तोह हर वक़्त हे तुम्हारे साथ रहने का करता है. घर पे माधुरी दीदी और विन्नी दीदी का खतरा है यार, रात को तोह फिर भी कुछ कर सकते है."

"मुझे नहीं लगता के विन्नी दीदी से परेशानी होगी. वो कोमल और माधुरी दीदी के साथ लगी रहेंगी और वैसे भी प्रीती के घर गयी है तोह प्रीती उनके साथ आर्किटेक्ट के अनगिनत सवाल पूछने वाली है.", अर्जुन को इतना उत्तेजित देख अलका की मुस्कान गहरी हो गयी.

"सुबह ऋतू ने तुम्हे हराया था न?", अलका दीदी की इस बात को सुन्न कर अर्जुन को भी याद आ गया था के आज उसके साथ क्या घटना घाटी थी. शर्म से झेंपता वो अपने सेक्टर की सड़क पर हे ध्यान देने लगा.

"शर्माओ मैट. ये बात सिर्फ मुझे पता है और इसमें तुम्हारी गलती नहीं है. मैं भी तुम्हारे साथ अगर वैसा करुँगी तोह नतीजा शामे हे होगा."

"पता नहीं ये कुछ समय से क्या होने लगा है अलका. मैं अपना सबकुछ कण्ट्रोल कर सकता हु लेकिन ज्यादा कण्ट्रोल करने पर अजीब सी गर्मी और बेचैनी होने लगती है. ऋतू ने बस होंठो के पास अपने होंठ किये और मैंने उनकी सांसें महसूस करि तोह मेरा ये बेकाबू सा होने लगा था. अगर वो पसीना न निकलता तोह मैं जरूर घर से बहार किसी के पास चला जाता."

"मैं हु न अर्जुन और ऋतू भी तुम्हे समझती है. तुम हर रोज किसी एक के साथ टाइम स्पेंड कर सकते हो और जिस दिन ऐसा न हो उस दिन या तोह एक्सरसाइज करके खुदको शांत कर लेना नहीं तोह बहार जाने पर भी कोई रोक नहीं है. बस ख्याल रखना के तुम सेफ रहो. तुम्हारी बॉडी में कुछ चंगेस आ रहे है और ऋतू ने भी यही बात मुझसे शेयर की थी. ज्यादा रोकना भी गलत हे होगा अर्जुन और शादी के माहौल में 10 दिन पहले से हे शायद तुम्हे ज्यादा दिक्कत आये.", अलका दीदी ने ये बात बड़ी संजीदगी से कही थी अर्जुन के हाथ पर हाथ रखते हुए.

"मैंने भी कुछ समझा है अलका. जो ये दादी जी मुझे खुराक देती है न इनमे ओवरआल स्ट्रेंथ देने वाली jadi-bootiyan है. लेने मैं हे गया था तोह कुछ नाम मुझे याद रहे और जब उनके बारे में थोड़ा बहोत जाना तोह वह शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव भी समझ आये. शायद दादी को भी ये नहीं पता होगा के सिर्फ शरीर मजबूत और ज्यादा ताक़त के साथ इनका असर कही और भी हो रहा है.", अर्जुन के ये खुलासा करने पर अलका दीदी थोड़ा हंसने लगी.

"तुम इतनी म्हणत कर रहे थे? दादी ने जब वो jadi-booti लिखी थी न तोह उसके निचले पैन पर हमने वो नाम निकाल लिए थे. ऋतू के साथ कोमल दीदी ने भी हरेक चीज को समझा था के तुम में बदलाव किस वजह से आ रहे है. खासकर जब ऋतू की हालत तुमने खराब की थी उसके बाद. और अब तोह शायद ज्यादा दुर्लभ चीज खा रहे हो जिनके बारे में khoj-bin चल रही है. वैसे सच कहु तोह मुझे तोह ाचा लगता है.", अलका दीदी दबे शब्दों में हे अर्जुन के लिंग का जीकर कर गयी थी.

"सही में जेम्स बांड हे आप. वैसे ये सब किस किसको पता है?", अर्जुन ने बात को घुमा दिया था और अब वो घर के पास आ रहे थे.

"तारा, कोमल दीदी और ऋतू के साथ मुझे."

"आरती दीदी को?", अलका इस नाम से थोड़ा चौंक गयी थी लेकिन फिर मुस्कुरा दी.

"कमीने हो तुम, पक्के वाले कमीने. पंजाब में कर हे दी न उस बेचारी की हालत खराब. उसको इस सबके बारे में नहीं पता कुछ लेकिन वो और तारा भी मेरे और ऋतू के साथ अब सब बातें करती है. तुम ये जाहिर नहीं करोगे उन तीनो के सामने.", अर्जुन को कुछ कुछ खबर थी इन चारो के बीच इतना जुड़ाव देख कर. वो घर के सामने कार रोक कर उतरने लगा तोह अलका दीदी उस से पहले निकल कर गेट खोलने लगी. कार अंदर कड़ी करते हे उनके पीछे राजकुमार जी भी आ गए थे. उन्होंने अपनी कार गेट के बहार हे लगा दी थी.

"अलका मेरा खाना लगवा दो बेटी, जल्दी हे वापिस जाना है.", उन्होंने बहार वाले हैंडपंप पर हे हाथ मुँह धोया तोह अर्जुन ने तार पे टेंगा टोलिया अपने ताऊजी की तरफ बढ़ा दिया.

"मैं चला जाता हु ताऊजी, आप आराम कीजिये लंच के बाद." अर्जुन ने थोड़ी परवाह से कहा था लेकिन राजकुमार जी ने हँसते हुए मन कर दिया.

"आज मेरा वह होना जरुरी है बीटा. और तुमने पहले हे सबकुछ तोह भिजवा दिया है, घर रहो बस.", राजकुमार जी ने प्यार से मन किया और अंदर अलका ने माधुरी दीदी से बोल कर अपने पापा का खाना लगाने का कहा और खुद ऊपर चली गयी. अर्जुन भी अपने ताऊजी के हे साथ बैठ कर जरुरी बातें समझने लगा था भोजन के वक़्त.

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आज बबिता भी अपने दादा की हवेली आ चुकी थी क्योंकि एक दिन बाद हे उसका विवाह होने वाला था. बिजेन्दर को भी ाची मदद मिल गयी थी शंकर जी और उमेद काका के पहले हे सब काम शुरू करवा देने से. इस हवेली पर माहौल थोड़ा बेहतर था राममेहर वाली जगह से और आज मेहंदी की रसम के साथ गीत भी गाये जा रहे थे देसी बोली में. Gaanv-dehat में अक्सर यही तोह ख़ूबसूरती होती है के सभी मिलनसार और एक दूसरे के sukh-dukh में शरीक होते है. बुजुर्ग, अधेड़ और जवान महिलाये गीत भी गए रही थी और बबिता के साथ मेहंदी की रसम भी निभाई जा रही थी.

"कुछ भी कह सुशीला, बबिता से 19 हे होगा दूल्हा.", सुशीला की उम्र की हे ये महिला बबिता के सर पर चुनड़ी डालती हुई बोली. एक पुराने सलवार कमीज में बबिता का जिस्म बेहतर नजारा दे रहा था. चिकने पाँव घुटनो तक निर्वस्त्र थे और ऐसे हे gol-chikni बाहें पूरी नुमाया थी बबिता की.

"मेरी बबिता है हे इतनी प्यारी के हर कोई 19 हे दिखेगा इसके सामने लाली.", पास में हे बैठी सुशीला ने भी अपनी बेटी के खूबसूरत चेहरे और मुस्कराहट को देखते हुए जवाब दिया. वही बबिता की उम्र की एक भाभी जो बबिता की हथली पर मेहंदी लगा रही थी वो भी बोल पड़ी.

"काकी, बात ऐसी है के हम तोह है bhed-bakri जैसी और बबिता नीरी झोटी (जवान भैंस). टक्कर का तोह मर्द कोई न लगता इसके सामने, उल्टा कही ये न भरी पड़ जाये आपके दामाद पर.", बबिता शर्म से नजरे झुकाये झेंप रही थी और सुशीला मुँह पर हाथ रखती हंस रही थी. ये सब हवेली के पिछले बड़े आँगन में था तोह जायज बात थी की कोई पुरुष यहाँ आ नहीं सकता था. सभी को chai-mithai देती ऋचा भी हंसती हुई अपनी बड़ी बहिन के पास हे बैठ गयी.

"बाला बहु, गोलू इतना कमजोर भी न है लेकिन मेरी बेटी स्पेशल है क्योंकि maa-baap का पूरा असर होया है इस्पे. फेर ढूंढ़ने के बाद भी इस से तोह ऊपर कोई छोरा मिलता न, गोलू भी पहलवान है और स्वाभाव भी साफ़."

"या बात तोह सही कही सुशीला, तू जब ब्याह के आयी थी न तोह गाँव के मर्द सारे अरमान अपनी अपनी लुगाई पर जोश दिखा के पूरे कर लेते थे. और बबिता तोह तेरे से भी 2 कदम आगे है.", ये वही महिला थी लाली. और इनकी बात सुन्न कर ऋचा की भी हंसी छूट गयी. इस बार शर्माने की बारी थी सुशीला की और बबिता अपनी माँ को देख रही थी.

"वैसे ताई जी अगर इजाजत हो तोह मैं कुछ बोलू?"

"हाँ तू भी बोल मुन्नी की मुनिया, अगला नंबर तेरा हे है.", ये भाभी थी जो बबिता को मेहँदी लगा रही थी. ऋचा इनकी बात पर मुस्कुराती हुई बबिता को देखती हुई कहने लगी.

"बबिता दीदी की टक्कर का लड़का तोह है बस 12-13 साल उम्र काम है उसकी.", इस बात पर एक पल तोह बबिता को भी सांप सूंघ गया के ऋचा ने ये कैसा धमाका कर दिया लेकिन सुशीला सिंह हंसती हुई ऋचा का गाल खींचती हुई बोली.

"बावली, भाई है इसका वो. पसंद मैंने (मुझे) भी बहोत है अर्जुन और सच कहु उसके काबिल दुनिया की शायद हे कोई लड़की हो. लाली, तू भी देखिये उस छोरे ने जड़ परसो वो आवेगा जिसकी बात ऋचा करे है.", अपनी माँ के मुँह से अर्जुन के लिए इतनी प्रशंशा सुन्न कर बबिता के चेहरे पर ये अलग हे ख़ुशी आ गयी थी. उसको भी अर्जुन एक नजर में पसंद आ गया था. लेकिन कोई ये नहीं जानता था के बबिता को पहली हे औरत बना चूका है.

"देखना हे पड़ेगा ेब तोह सुशीला. जिसकी बात पे हे बबिता तुबेलिघ्त सी जगमग हो रही है, पक्का ख़ास हे होगा.", लाली जी की बात सुन्न कर सभी ने बबिता को देखा जिसके गाल शर्म से लाल हो चुके थे. जैसे कोई चोरी पकड़ी गयी हो.

"ये तोह ब्याह की ख़ुशी है जीजी. बबिता बेटी अब बस नया बीएड बनवा लियो क्योंकि पहली रात में एक तोह पक्का टूटेगा.", एक और अधेड़ महिला बातों में शामिल हुई थी और ऋचा खुद बबिता के दूसरे हाथ पर मेहंदी लगाने लगी थी. ऐसी व्यस्क बातो से माहौल में हंसी और शर्म का मिला जुला रंग उड़द रहा था.

"वैसे बीएड तोह एक बारी सुशीला जीजी का भी टूटा थी भाभी. हाँ बहाना कुछ और बताया था जीजी ने.", लता, जो हमेशा काम से काम रखती थी आज वह भी यहाँ शामिल हो गयी थी. इतनी पुराणी बात याद दिलाती वो हंसने लगी तोह बिंदास सुशीला भी कहा चुप रहती. Richa-Babita को भूल कर वो भी बोल पड़ी.

"तू तोह अंडे हे फोड़ दिया करती थी मुन्नी. मुन्नी पायलट थी अपने टाइम पर.", अब नहले पे दहला लगते हे लता की बोलती बंद हो गयी थी.

"कुछ तोह शर्म करो जीजी, बचे भी है यहाँ."

"तेरी बारी में बचे और मेरी बारी में? इसका ब्याह हो जायेगा परसो और थोड़े टाइम बाद ऋचा का भी. टेंशन न लिया कर, माहौल है आरर इन्हे भी समझना है सबकुछ. ज़िन्दगी में hansi-khusi से बढ़ के कुछ न होता.", सुशीला ने समझदारी से एहसास करवाया के अब वो बड़ी हो चुकी है. हंसना बोलना बहोत जरुरी है इनके लिए.

"वैसे ताई जी, शंकर चाचा उधर जाएंगे तोह अर्जुन यहाँ क्यों आएगा? वो भी तोह अनुपमा के उधर जायेगा न.", ऋचा ने अर्जुन का जीकर तोह कर दिया लेकिन एक पल के लिए लता की बेचैनी बढ़ा दी थी.

"क्यों न आएगा वो यहाँ.? उसका बाप कन्यादान कर रहा है अर्जुन थोड़ी. और रामेश्वर काका इधर आएंगे तोह अर्जुन साथ आएगा. अपनी बहिन के ससुराल फेरे पे भी जाना है उसने. बिजेन्दर का ब्याह न भी होता तब भी मैंने अर्जुन को हे बबिता के साथ भेजना था, दिल से वो मेरा बीटा है अब ऋचा. मैं चली अंदर, दवाई का टाइम हो गया मेरा.", सुशीला ने अपनी बात कहते हुए ऋचा के बाल सहलाये और एक युवती उनकी व्हीलचेयर खिसकर ले गयी इधर से हे उनके कमरे में.

"देखियो बबिता कल को बिजेन्दर और तेरे हिस्से में अर्जुन न आ के बैठ जाये? तेरी माँ ने तोह औलाद हे घोषत कर दिया उस लड़के को.", लता चची की ये बात सुन्न कर बबिता ने मुस्कुराते हुए जो जवाब दिया वो बहोत कुछ कह भी गया और उलझा भी गया सबको.

"क्या काकी बस इतनी सी बात. मेरा तोह सबकुछ अर्जुन का है फेर हिस्से की बात हे ख़तम और बिजेन्दर भी मन न करेगा उसको."

"आपका सबकुछ अर्जुन का है?", ऋचा ने मेहँदी रोक कर अपनी बड़ी बहिन को देखते हुए पुछा.

"ज़िन्दगी से बढ़के तोह कुछ न होता मेरी लाडो? अर्जुन ने माँ, भाई, मेरी और बाकी कितनो की ज़िन्दगी bachai-sudhari और बदले में सिर्फ प्यार दिया. दुश्मनी न की उसने कोई और मेरी माँ को गले लग के मिलता है वो. कुछ रिश्ते भगवन ऐसे बड़े बना देती है बहना जिनका प्रभाव हम जुबान से नहीं समझा सकते.", बबिता ने जब पूरी बात कही तोह ऋचा ने समझते हुए हाँ में सर हिलाया और लता जी के चेहरे पर कुछ अलग हे भाव आ गए थे. गीत गाना अभी भी एक तरफ जारी थी और बहार वाले आँगन में गाँव के लोगो का जलपान शुरू हो चूका था.

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दोपहर 3 बजे थे और यहाँ Ritu-Alka वाले कमरे में बंद दरवाजे के भीतर अलका पूरी तरह से अर्जुन के ऊपर लेती थी. अपने तराशे हुए गुलाबी होंठो से वो रह रह कर अर्जुन के गाल, होंठ और नाक पर चूम लेती. अर्जुन भी उस पीले कमीज के अंदर दोनों हाथ डाले अलका की माखन सी त्वचा को सहलाता हुआ इन अंतरंग पालो में पूरा साथ दे रहा था. अलका पैदाइशी खूबसूरत थी लेकिन म्हणत से उसने अपने पूरे जिस्म को उत्कृष्ट बना लिया था.

"सबसे ज्यादा मैंने यही मिस किया है अर्जुन. तुम्हारा ये टच और ऐसे मुझे खुद से लगाए रखना. याद है कैसे पागलो जैसे मुझे पकड़ कर किश करने लग जाते थे अपने कमरे में और हाथ हर जगह घुमते रहते थे तुम्हारे.", अलका ने कोहनी और कलाई उसकी छाती पर टिकते हुए आंखों के ऊपर अपना चेहरा करते हुए धीमी आवाज में कहा. अर्जुन उन घने बालो के अंधकार में चमकती अलका की आँखों को हे देख रहा था.

"मुझे तोह याद है आपका मेरे साथ बाथरूम में नहाना."

"कमीने कही के. बेशरम हो तुम पूरे.", खिलखिलाती हुई वह अपनी आँखें बंद करती हुई डिवनवर सी अर्जुन के होंठो को चूमने लगी. सच तोह ये था के वो भी अर्जुन के साथ अपने अंतरंग पालो को रोज सपने में देखती थी. शिद्दत से होंठो का रास चूसते हुए दोनों एक दूसरे की जीभ भी दांत में पकड़ते मस्ती कर रहे थे. कमर पर बंधी सलवार कूल्हों पर एक जादुई उठान लेती थी अलका के. लम्बी सुडोल टांगो के ऊपर वो गुमड़ से तराशे हुए कूल्हे जो अकल्पनीय थे. अर्जुन के हाथ उस ढीली सलवार से अंदर जाते हुए लगभग निर्वस्त्र कूल्हों को आते की तरह गूंथने लगे.

"दोनों बेशरम है ये कहना ठीक रहेगा. वैसे लगती तोह आप डांस करती हुई भी कमाल हो बस तब कण्ट्रोल करना पड़ता है.", अर्जुन के हाथो द्वारा अपने कूल्हे सहलाये जाने से अलका भी मुस्कुरा रही थी.

"तुम्हे न मेरे ये कुछ ज्यादा हे पसंद है. लेकिन वह no एंट्री और मुझे पता है डांस में भी तुम वही देखते हो."

"न सिर्फ वही नहीं, पूरा का पूरा आपको देखता हु. और जितने आपके ये इधर से बहार है, उतने हे सामने से ये.", अर्जुन उन्हें पलट कर अपने नीचे लाते हुए अलका के मांसल स्टैनो पर कमीज के ऊपर से हे चूमने के बाद बोलै. अलका को अपने सपाट पेट पर वो मोटा कठोर लिंग भली भांति महसूस हो रहा था. 2 कपड़ो के बावजूद छूट से ऊष्मा बहार निकलती बता रही थी की हालत उसकी भी ठीक नै है.

"तुम जैसे इन्हे मसलते हो न तोह जल्दी हे ये ज्यादा बड़े हो जायेंगे. बहोत म्हणत करनी पड़ती है इन्हे इतना रखने के liye.Aahhh.. ज्यादा टाइम नहीं है अपने पास.", अलका ने इस बीच घडी पर नजर घुमाई तोह अर्जुन सीधा हो गया. अर्जुन के निर्वस्त्र होने से पहले हे अलका उसके सामने सिर्फ एक झीनी से ब्रा और पतली डोरी वाली पैंटी में बिस्टेर पर लेती थी. नारियल सी गोलाई और सख्ती लिए उसके दोनों चुके छत की तरफ सर उठाये अर्जुन को आमंत्रित करते दिखे. चिकने समतल पेट के दोनों तरफ ऊपरी हिस्से में पसलिया बता रही थी की अलका के शरीर में जो भी है बस चर्बी नहीं है. 36 के गोल चुके और 28-29 लगभग कमर इस 5'9" लम्बाई वाली अप्सरा को बेजोड़ हे बनाते थे.

"जितना समय लग्न है उतना तोह लगेगा हे न. और आज पूरा प्यार करूँगा आपको.", अर्जुन फिर से होंठो को चूमता हुआ अपने सीने के निचे दीदी की छातियां दबाने लगा. अलका ने भी पाँव फैलते हुए उसको कास के खुद से चिपका लिया था. साँसे उखड़ी तोह दोनों हे एक दूसरे को हँसते हुए देख रहे थे. अलका ने हाथ बढ़ा कर अर्जुन के तन्नाए लुंड को कास के पकड़ लिया. वही अर्जुन ने भी कंधे के दोनों तरफ से ब्रा की पट्टी निचे सरकते हुए चिकने कंधो पर आधा दर्जन चुम्बन चिपका दिए.

"तुम तोह पूरा प्यार कर लोगे लेकिन मुझे सबके सामने सही से भी चलना है डार्लिंग. करने के बाद ात लीस्ट एक घंटा तोह मिलना चाहिए के नहीं?", अलका अब उस मॉटे डंडे को निरंतर हाथ से हिलाये जा रही थी. अर्जुन भी पूर्ण उत्तेजित था आधा घंटे से हलकी मस्ती करने की वजह से.

"इन्हे प्यार कर लू फिर आगे करते है.", सख्त उरोजों को निर्वस्त्र करते हे अर्जुन उन किशमिश से निप्पल को देखने लगा. स्पंज से गद्देदार और पूर्णकार ardh-gole सचमुच बेमिसाल थे. एक चूचक मुँह में लेते हे अलका की आवाज निकल गयी. दूसरे चुके को भी अर्जुन सेहलते हुए निप्पल रगड़ रहा था. छूट के सामने वाला कपडा बुरी तरह कॉमर्स में भीग कर चिपक चूका था.

"आठ.. कर लो इन्हे भी प्यार.. लेकिन उम्म्म.. वो भी साथ हे कर लो न.. आह्हः. सेहन नहीं हो रहा अर्जुनननननन", अलका की आँखे तोह नशे में बंद सी होने लगी थी, चूचक एक मिनट में तन्न कर सूई से खड़े हो गए थे. मदहोशी में अलका का gora-gulabi चेहरा लाल होने लगा और शरीर में झुरझुरी से मच चुकी थी. ऐसा कुछ उसके साथ सिर्फ तब हुआ था जब अर्जुन ने पहली बार उसके इन उरोजों पर हाथ रखा था. अर्जुन ने भी छूट के सामने से कच्ची का वो हिस्सा हटा कर ऊँगली फिरै तोह लेसदार पानी बहार हे महसूस हो गया. अलका सचमुच तड़प रही थी मिलान के लिए.

"ऐसे हे करू या निकल कर?", अर्जुन की बात सुनकर अलका ने जोश में पंतय हे एक तरफ से पकड़ कर खींच दी. 'चर्रर्र' की ये छोट सी आवाज के साथ हे छूट के सामने अब कोई अवरोध न था.

"इतना मैट सोचा करो तुम.. आह्हः.. गीला करू क्या तुम्हारा?", अर्जुन को वापिस अपने ऊपर लिटाते हुए अलका ने हे उसका लुंड अपनी ras-bahati छोटी सी छूट के मुहाने लगा दिया. 3-4 बार उस महीन लकीर और गुलाबी फांको में फिरने से हे वो जीरो बल्ब सा मोटा सूपड़ा चिकना हो गया था. रह रह कर दोनों के शरीर में झटके लगते जब छूट और सुपडे का ये अनोखा चुम्बन होता. अर्जुन भी अपने लिंग में ख़ास थिरकन महसूस कर रहा था जो अलका की योनि पर लगने पर होती.

"ज्यादा हे गरम हो आप इस वक़्त. करंट दौड़ रहा है क्या अंदर.?"

"यार करो भी तुम आह्हः.. तुमने वह से बिजली लेनी है क्या? लगाओ अपना ट्रांसफार्मर अगर करंट चाहिए toh..aahhh.. maa..Araam से अर्जुनंनं.. ये दादी की दवाई मेरी फाड़ रही hai..aahhhh माँ..", ऐसी नटखट बातें और उत्तेजना से अर्जुन ने भी हलके दबाव से आधा सूपड़ा अंदर भरने के बाद एक धक्का लगते हुए 5 इंच अंदर बैठा दिया था. कनक सी योनि इस विकराल लिंग को लेते हे शंख सी हो गयी थी. अलका सचमुच जान न्योछावर करने वाली प्रेमिका थी अर्जुन की जो इस असीम दर्द को भी बड़ी कुशलता से सेहती बस मुस्कुरा रही थी.

"इसलिए भी मैं दूर रहता था आपसे.. आठ.. हालत खराब हो जाती है न?", अर्जुन ने उतना लिंग फंसाये हुए हे अलका के मुस्कुराते चेहरे से वह अतिरिक्त पसीना साफ़ करते हुए विवशता जाहिर की तोह अलका ने उसका चेहरा निचे करते हुए होंठो को अपने मुँह में दबा कर अपनी कमर ऊपर उचका दी. अर्जुन के हलके झांट योनि के ऊपर आ चिपके. एक पल के लिए दोनों का शरीर बर्फ सा हो गया और तुरंत अलका ने अपनी आँखे खोलते हुए होंठ हटा लिए.

"तुम दर्द नहीं देते इतना याद रखना. बस वो मंजिल आसान नहीं है जो अलका ने पसंद की है. उमाहहह. अब दिखाओ जरा अपना दम बस ऋतू वाले से थोड़ा काम हे रखना.", अलका ने इस भयंकर पीड़ा को भी जज्ब करते हुए पूरा लिंग अपनी योनि में समाहित कर लिया था. रबर सी लचीली छूट अपनी क्षमता से चौड़ी हुई कस कर लुंड के गिर्द लिपटी थी. गुलबृ सुर्ख आधार (लिप्स) चूमते हुए अर्जुन ने कोई जोर न दिखते हुए बस अलका को भरपूर प्यार किया. कमर एक क्रम में आगे पीछे करता वो ऐसे चुदाई कर रहा था जैसे ये अलका का पहली बार हो और वो उसको दर्द नहीं देना चाहता था.

"इस सबसे ज्यादा मजा आता है जब मैं आपको अपने साथ लगा के सोता हु. ऐसा नहीं है के मुझे आपके साथ संसर्ग में ख़ुशी नहीं मिलती. ये तोह बयां भी नहीं कर सकता लेकिन जिस रात आप और ऋतू मेरे साथ सोई थी न वो सबसे ाचा पल था.", दोनों चुचो को बस थामे हुए अर्जुन लगभग आधी लम्बाई इस गीली सुरंग में आगे पीछे कर रहा था. हलके हलके संकोच बता रहे थे के अलका साखळीत हो चुकी है जो बड़ी बात न थी.

"आह्हः.. मुझे भी उम्म्म. तुम्हारी पीठ से चिपक कर सोना ाचा लगता है.. ष्ठीी.. आठ.. ऋतू मारेगी मुझे आज पक्का... आह्हः..", अलका ने ये जिस भाव से कहा था वो अर्जुन न समझा.

"क्यों.. आह्हः.. उम्म्म्म.. वो कुछ नहीं कहेंगी. उमाहहह.", गाल को होंठो में भर के अर्जुन ने निर्वस्त्र चुचो पर अपना सीना रगड़ा तोह अलका की भी टाँगे उसकी कमर से बेल्ट की तरह लिपट गयी.

"बीएड गन्दा हो गया. आठ.. हमने उम्म्म.. रूल बनाया था के इस पर दोनों में से कोई तुम्हारे साथ नहीं करेगा. आह्हः.. वह नहीं आह्हः.", गोल कूल्हे इस मुद्रा में थोड़ा बिस्टेर से ऊपर उठे हे थे की अर्जुन ने उनकी फांको के बीच उंगलिया धंसा दी. गुदद्वान के पास वो चिकनाहट और गहराई अर्जुन को अलग हे मजा दे रही थी. ज्यादा आगे न बढ़ते हुए वो बस गहरे धक्के लगता रहा. कमरे में कॉमर्स जैसे हवा में हे भर गया था.

"सचमुच ये प्रॉब्लम वाली बात है अलका. आज कुछ ज्यादा हे ओर्गास्म हो रहे है. जहा मेरी उँगलियाँ है वह तक.", अर्जुन की बात सुन्न कर अलका आहें भरते हुए भी मुस्कुराने लगी.

"गंदे कही के. आठ. एक तोह इतने दिन बाद हम मिल रहे है और ऊपर से उम्मम्माह्ह.. आज तुम जैसे पुश कर रहे हो अलग सा फ्रिक्शन हो रहा है.. माहहह..", अलका एक और बार तेजी से झड़ी तोह आँखें बंद हो गयी थी. चादर मुट्ठी में कैसे वो अकड़ी और अर्जुन ने भी दोनों हाथ उसके कंधे के निचे रखते हुए रफ़्तार बढ़ा दी. वो भी कुछ ज्यादा हे भरा बैठा था लेकिन अलका एक बार फिर उसके साथ इस kaam-sagar में डुबकी लगाने लगी.

"कितनी बार होना है आपने आज.. आठ? ऐसे भी कोई होता है क्या? मेरा भी होने वाला है.. हूह.."

"ाःह.. बहार हे निकलना अर्जुनंनं.. आह्हः.. फर्टाइल टाइम है..", अलका ने उसके कंधो पर हाथ रखते हुए अर्जुन को अपनी विवशता बताई और एक बार फिर वो रह रह कर हिलने लगी थी. इधर अर्जुन अलग हुआ तोह 'पुक्क' की हलकी आवाज से choot-ras में भीगा उसका लिंग स्प्रिंग सा उछलता योनि से बहार आ गया. पूरी चुदाई एक हे मुद्रा में की थी और अंदर जाने के बाद सूपड़ा 25 मिनट बाद अभी बहार निकला था. 2-3 बार हाथ से हिलाते हे सफ़ेद गाढ़ा तरल लहराता हुआ अलका के गुलाबी चुचो और पेट पर गिरने लगा. 5-6 फुहारे छोड़ने के बाद अर्जुन भी अलका की बगल में आ गया. चेहरे के सामने से बाल ठीक करता वह देख रहा था के अलका आज कितनी सुकून में दिख रही है.

"10 से ज्यादा बार. हूऊऊह्ह्ह्हह्ह.. 10 से ज्यादा बार आज मैं रिलीज़ हुई है. अब तोह उठने की भी जैसे हिम्मत नहीं है.", अलका पलट कर अर्जुन की बाहों में आ गयी. वही अर्जुन हैरान था के इतने सखलन एक बार में कैसे. फिर कुछ न कहता वो भी अलका के मुलायम जिस्म को अपने आगोश में लेके आराम करने लगा. एक घंटे बाद अलका की आँख पहले खुली तोह अर्जुन अभी भी एक हे स्थिति में सोया था. मुस्कुराती हुई वो उसका गाल चूम कर सावधानी से अलग हुई तोह बिस्टेर के ठीक बीच में 1 फ़ीट का दायरा पूरा गीला हुआ पड़ा था. मुस्कुराते हुए एक नजर अपनी गुलाबी योनि पर डाली तोह वह भी खुसी से थोड़ा फूल चुकी थी.

'अब कोई कैसे संभाले खुद को जब प्यार हे ऐसा हो. जान निकल भी देता है और दाल भी देता है.', उठ कर बाथरूम में जाने से पहले अलका ने सभी कपडे वह से हटते हुए बिस्टेर थोड़ा ठीक कर दिया था. थोड़ी हे देर बाद अर्जुन भी उठ कर नहाने लगा और अलका कमरे को दुसरुस्त करके अपने चेहरे को सही करने लगी. प्यार के कुछ निशान यहाँ भी ध्यान देने पर दिख हे रहे थे.

'Thakk-thakk' की दस्तक दरवाजे पर होते हे अलका ने बेफिक्री में कुण्डी खोल दी.

"बंद क्यों किया हुआ था? नाहा रही थी तोह बाथरूम बंद करना हे बहोत है.", ऋतू बेधक सी अंदर आती हुई अलका का गाल चूमने के बाद बिस्टेर पर आ पसरी. तुरंत पीछे हे तारा भी.

"ये क्या अलका, पंतय 2 दिन पहले हे ली थी आज फाड़ भी दी और यहाँ ऐसे क्यों फेंक राखी है?", तारा ने जैसे हे तकिया उठाकर अपनी गॉड में लिया वो पंतय भी हाथ में आ गयी. अलका के लाल चेहरे पर ढेरो जवाब थे बस जुबान पर ताला.

"यार मान लिया यहाँ हमारे सिवा कोई नहीं आता लेकिन गलती से कोई आ जाये तोह? विन्नी दीदी या सरोज भाभी हे.", ऋतू ने वो पंतय तारा से लेते हुए अलमारी में रखते हुए कहा.

"माजरा तोह कुछ और हे है ऋतू. यहाँ तोह इतना बड़ा निशान भी है और अजीब सी स्मेल भी.", तारा ने बैठे हुए हे उस गहरे रंग के हिस्से पर हाथ लगाया तोह अब अलका को बोलना हे पड़ा.

"अर्जुन और और कोई सवाल नहीं बस.", अलका इतना कहती हुई साथ वाले कमरे में चली गयी, दूसरी चादर लेने. यहाँ इन दोनों के चेहरे पर हैरत के भाव थे थोड़े.

"इनको जरा भी डर नहीं है क्या? रुपाली, Madhuri-Komal दीदी और विन्नी दीदी भी घर हे है. दिन दिहाड़े ये खतरा ले लिया.", तारा के खुलासे से बाथरूम के अंदर शरीर पोंछता अर्जुन भी हैरान था. मतलब की ये आपस में तीनो हे एक दूसरे के बारे में जानती है. जानती है तोह जानती है लेकिन अब इनका सामना कैसे करेगा ये अलग डर था अर्जुन को.

"रुपाली और विन्नी दीदी नहीं है यहाँ. वो होती तोह अलका ऐसा कुछ नहीं करती लेकिन बात ये हुई थी की इस कमरे में अर्जुन के साथ कुछ नहीं.", ऋतू ने खड़े हो कर चादर हटाई तोह तारा भी मदद करने लगी. कुछ पल कोई आवाज न सुन्न अर्जुन कपडे पहने बहार आया तोह सामने हे ऋतू दीदी कड़ी थी.

"जल्दी 9-2-11.", ऋतू दीदी के ऐसा कहते हे अर्जुन ने तारा की तरफ भी नहीं देखा लेकिन अब तीनो हंस रही थी.

"अलका की बची तू रात तक नहीं रुकी.", ऋतू ने बाथरूम से हे आवाज देते हुए कहा.

"रात? मैं तोह तुम्हारे जाने के बाद हे उसके कमरे में करने वाली थी. कोई बात नै रात को भी कर लुंगी तू टेंशन मैट ले.", अलका ने बेधड़क कहा तोह तारा खिलखिलाने लगी.

"बताती हु तुझे मैं रुक तोह सही. रात को भी कर लुंगी की बची. अब नेक्स्ट आरती है और आज हम चारो में से कोई कुछ नहीं करेगा. आरती को सँभालने दो अगली बारी.", ऋतू ने चेहरा साफ़ करते हुए अपनी कमीज उतार कर एक तरफ राखी और अलमारी से टीशर्ट निकलने लगी.

"यार ऋतू तुझे बुरा नहीं लगता? वैसे मान लिया के तुझे पता लग गया लेकिन फिर ऐसे आपस में इन्वॉल्व करना?", तारा ने सवाल के साथ हे अपने भी कपडे उतार लिए थे. वो भी टीशर्ट और पजामा पहन ने लगी थी.

"देख तारा बुरा तब लगेगा जब उसकी मर्जी नहीं होगी और दूसरा उसकी शादी हो चुकी हो. हम 4 है और चारो उस से आत्ताच है. प्रॉब्लम उसको भी है जिसकी वजह से ये सब मिल कर करना जरुरी है. रोज अकेली अलका या तू अर्जुन को नहीं संभल सकती. जिस दिन सब ठीक हुआ फिर उसकी मर्जी या प्रीती की. लाइसेंस उसके पास है और फ़िलहाल हमारे पास किराये पर है समझ ले.", ऋतू ने पजामा पहन ने से पहले अलका के पिछवाड़े पर एक झापड़ लगते हुए आँख मार दी.

"आउच. कामिनी. सही बात है तारा इसकी. खुद हे सोच हम आपस में उसकी ज्यादा बात नहीं करते लेकिन परवाह बराबर करते है और सबसे बड़ी बात है के पता होने के बाद हम आपस में ज्यादा क्लोज हुए है.", अलका की बात पर तारा ने उसका गाल चूम लिया.

"अरे बाबा, मेरा ऐसा कोई मतलब नहीं था. फ़िक्र थी की ऋतू के आँखों में अर्जुन हे दीखता है मुझे. तू तोह उसकी गर्लफ्रेंड है लेकिन ये ऋतू न जैसे उसका सबकुछ है. अजीब सा लगता है मुझे जब मैं अर्जुन के पास से इसके पास आती हु. ये उसका फीमेल वर्शन है लेकिन पता नै क्यों मुझे गिलटी फील होता है.", ऋतू भी तारा की इस बात पर मुस्कुराती हुई उसके गले लग जाती है.

"तू सचमुच बहोत कुछ समझती है. ये अलका की बची तुझे भी जेम्स बांड बना कर मानेगी लगता है. चल अलका को आराम करने दे, हम कॉफ़ी बना के लाते है. प्रीती भी आने वाली होगी आरती के साथ.", तारा को कमर से पकड़ कर ऋतू अपने साथ बहार ले आयी थी. और इस सबके चलते आज अर्जुन स्टेडियम भी नहीं जा पाया था लेकिन आकांक्षा के पास जाने के लिए कार से निकल चूका था.

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"कुछ भी कहो माँ ऋतू सचमुच ख़ास है. वो बिलकुल अलग है टिपिकल लड़कियों से लेकिन साथ हे बड़ी प्यारी भी.", शालिनी जी अपनी माता पूर्णिमा, भाई उमेद और भाभी के साथ बैठी चाय के वक़्त बातचीत कर रही थी. शालिनी का व्यक्तित्व ऐसा था के वो ज्यादा किसी से बात नहीं करती थी लेकिन सबका ख्याल रखने वाली पढ़ी लिखी महिला था.

"सो तोह है शालिनी. रेखा भी बता रही थी की वो लड़की मुन्ना (अर्जुन) का साया है और अपने भाई की पूरी देखभाल करती है. साथ हे पढाई में भी टॉप है. वैसे तुम्हे उसमे दिलचस्पी कैसे हुई.?", पूर्णिमा जी ने एक तरफ से आती इस चांदनी सी गोरी और मासूम सी लड़की को अपनी गॉड में लेते हुए पूछ भी लिया. ये तरुणा शालिनी जी की बेटी आयशा थी, जिसका कॉलेज में प्रवेश होने वाला था.

"उसने किंग को बिना डरे गर्दन से पकड़ लिया था माँ.", शालिनी जी ने ये बात हिचकिचाते हुए कही थी अपने बड़े भाई से नजरे चुराते हुए.

"क्या बोल रही हो शालिनी? किंग को किसने खोला और वो उसके करीब कैसे चली गयी? हादसा पूछ कर नहीं होता कभी.", उमेद सिंह ने अपने सर पे हाथ रख लिया था.

"भैया, वो अनजाने में हे गेट खुल गया था उसके बाड़े का. मुझे भी पता नहीं लगा क्योंकि हम तीनो (Aarti-Ritu) अस्तबल में थे. किंग वह पंहुचा तोह मुझे भी डर लग गया था. लेकिन वो ऋतू के aas-pas घूमता रहा जहा रोमियो भी सतर्क था. फिर ऋतू जमीन पर बैठी तोह किंग भी शांति से उसके सामने बैठ गया. ऋतू से उसने खुद हे दोस्त कर ली जैसे शंकर भैया के साथ वो आते हे पंजा रख कर करता है. सॉरी लेकिन सचमुच मुझे पता नहीं लगा के वह बहार कैसे आ गया.", बात सुन्न कर उमेद ने एक गहरी सांस ली.

"कुत्ते समझदार होते है बहिन बस उन्हें सामने से प्यार और इज्जत मिलनी चाहिए. किंग भी अलग नहीं है बस कभी कभी भेड़िया बन्न जाता है. मैं वह टाला हे लगवा देता hu,kundi शायद काम की नहीं.", उमेद सिंह को अंदर से थोड़ी हैरत भी थी की एक यही कुत्ता था जो किसी के सामने घुटने नहीं टेकता था. खुद को किसी भेडियो के सरदार की तरह किंग भी अल्फा (प्रमुख) मानता था.

"मां, वैसे वो दीदी है बड़ी सुन्दर. मम्मी कुछ और भी कहना चाहती है.", आइशा ने अपनी नानी के गले में बाहें डाले कहा तोह शालिनी झिझकती हुई अपने बड़े भाई को देखने लगी.

"बोलो शालिनी, तुम्हे तोह हिचकिचाना नहीं चाहिए.", पूर्णिमा जी ने अपनी बेटी को हौंसला देते हुए कहा.

"जी वो अगर अंतर्जातीय विवाह मानते है तोह शंकर भैया से ऋतू के रिश्ते की बात कर सकते है. करणवीर (जेठ का बीटा) की भी पढाई ख़तम हो चुकी है और लड़की देखने के लिए भी चर्चा की थी didi-jeth जी ने. ऋतू हर तरह से कारन के लिए सही लड़की रहेगी.", उमेद सिंह तोह बस सुन्न रहा था अपनी बहिन की बात और साथ हे मंद मंद मुस्कुरा रहा था जैसे उसको पता हो के जवाब माँ हे देने वाली है.

"ये फैंसला शंकर के भी हाथ में नहीं है शालिनी. पता है मैंने कोमल के लिए बात की थी उस से. कोमल बड़ी भी है और कही ज्यादा बेहतर भी हर काम में. अपने सुशिल जी है न जयपुर वाले, उनके बेटे के लिए. शंकर का जवाब था के ये फैंसला कोमल करेगी और जबतक वो पढ़ रही है वो अपनी बेटी से सवाल नहीं करेंगे. ऋतू के अभी 4 साल तोह मब्ब्स के बाकी है और फिर वो शायद आगे भी पढाई करे. जीवनसाथी का चुनाव भी वो खुद हे करने वाली है और तेरा भतीजा 6-7 साल इन्तजार नहीं करेगा.", पूर्णिमा जी ने कही भी कोई गलत बात नहीं कही थी. अपनी बेटी को सच समझाया था जिस से दिल को ठेस न लगे.

"शंकर भैया की यही बात सबसे ाची है माँ. बचो को उनके फैंसले लेने के लिए पूरी आजादी दी हुई है और साथ हे बचे भी कोई गलत फायदा नहीं उठाते. उनमे संस्कार भी है और हरेक के प्रति िज्जात्त भी. मेरा बीटा बड़ा होता तोह मैं पक्का इन्तजार करती ऋतू के लिए.", शालिनी का बीटा आइशा से छोटा था जो बहार हे पढता था.

"शादी फिर भी नहीं होती बहना. एक परिवार में ये मुमकिन नहीं है. तुझे शंकर मुझसे भी ज्यादा मानता है तोह खुद हे सोच ऐसा कैसे हो सकता है? कल तू अर्जुन को देख लेगी तोह कहेगी की उसको आइशा के लिए पक्का कर लेते है. पहले हे बता देता हु के उस लड़के का रिश्ता इस पीढ़ी में सबसे पहले पक्का हो चूका है क्योंकि उसको देखते हे तेरे दिल में ये ख़याल पक्का आएगा.", उमेद सिंह ने जब दोनों परिवार की असलियत याद दिलाई तोह शालिनी सचमुच झेंप गयी.

"सच कह रहे है ये शालिनी. आप देखना जरा अर्जुन को जरा एक बार. मुझे तोह दांत पड़ हे गयी थी लेकिन इन्होने आपको पहले हे बता कर बचा लिया.", राजेश्वरी जी की बात पर पूर्णिमा जी भी हंसने लगी थी और आइशा अपनी माँ और मामी को देखे जा रही थी.

"ऐसे कोनसे हीरे जेड है मामी? और आपने क्या कहा था मां से जो दांत पड़ी.?"

"तेरी मामी कहती की अर्जुन का रिश्ता विनीता से करवा दो.", अब उमेद के साथ साथ बाकी सब भी हंसने लगे लेकिन राजेश्वरी बस शर्मा रही थी.

"वो विनीता से 6 साल छोटा है भाभी. आपको पता नहीं था क्या?"

"शालिनी, गलती राजेश्वरी की भी नहीं है. वो पहली बार मुन्ना से मिली थी और वो भी hatta-katta जवान है, बेशक उम्र काम है लेकिन तेरे भाई से भी चौड़ा होगा. पता होता तोह मेरी बहु ऐसी बात नहीं करती.", पूर्णिमा जी अपनी बहु की तरफदारी करती बोली तोह आइशा फिर से बोल उठी.

"हम कब जा रहे है उनके घर? देखे कौन है ये जनाब जिनकी मेरी नानी और मां तारीफ करे जा रहे है. वैसे विन्नी दीदी से भी मैं नाराज हु. उन्हें पता था के मैं आयी हु फिर भी अपने हे घर नहीं आयी."

"बेटी, उसका दिल एक तोह कही लगता नहीं और अगर वह उसको ाचा लग रहा है तोह ठीक है न. वह उसके साथ पूरा जमघट है उसकी बहनो का. वैसे भी वो इधर कुछ सीखने वाली थी नहीं लेकिन उधर chaav-chaav में रसोई में जाने लगी है.", पूर्णिमा जी की बात सुन्न कर उमेद को भी ाचा लगा था.

"वैसे ऋतू दीदी से तोह मेरी भी दोस्ती हो गयी. आरती दीदी थोड़ा काम बोलती है लेकिन वो भी ाची है.", आइशा अब उठ कर कड़ी हुई और स्विमिंग का बता कर निकल गयी.

"शंकर भैया को वैसे कोई और नाम नहीं मिला माँ? उनका प्यार गहरा था अज्जू भैया के साथ लेकिन बेटे को उनका नाम देना. सब इस से बचने के लिए उसको Munna-munna कहते है लेकिन आप हे सोचो ऐसे तोह भैया ने अपने जखम भरने हे नहीं दिए."

"तेरे चाचा जी ने दिया था ये नाम उसको क्योंकि वो चाहते थे की शंकर का बीटा बिलकुल वैसा बने जैसा उनका लाडला अज्जू था. और यकीन कर शालिनी, कुछ गलत नहीं किया उन्होंने. हाँ मेरे से ज्यादा उसको तेरा भाई जानता है क्योंकि वो इसका भी बीटा है. कौशल्या ने बताया कैसे उमेद ने अर्जुन पर म्हणत की और जितना इसको अज्जू के बारे में मालूम था उतना मुन्ना को बनाने की कोशिश की.", इस खुलासे से शालिनी अपने बड़े भाई को देखने लगी.

"शंकर या कोई और माने न माने माँ, अर्जुन शर्मा वैसा हे है जैसा मेरा भाई था. बस उनमे कभी समानता मत कीजियेगा क्योंकि दोनों हे कही न कही अपने आप में ख़ास रहे है. मैं चलता हु माँ, थोड़ी देर तक आ जाऊंगा.", उमेद सिंह ने भी घडी की तरफ देखा तोह उठ खड़े हुए. सांझ के साढ़े 7 बज चुके थे और एक चक्कर सोमबीर सिंह की हवेली पे लगाने का सोच कर वो निकल गए.

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अर्जुन ने आज ाचा समय व्यतीत किया था आकांक्षा के साथ और अब हल्का अँधेरा होने लगा तोह कार को वापिस उसके घर की तरफ ले चला. 2 घंटे दोनों ने जी भर के बातें की थी, भुना हुआ भुट्टा (मक्की) भी आकांक्षा ने बड़े चाव से खाया था और अर्जुन ने उसका किसी शहजादी सा ध्यान रखा था हर जगह. घर पहुंचने से पहले एक गहरा चुम्बन करके दोनों ने ये शाम ख़तम करने का निर्णय लिया और फिर मुस्कुराती हुई वो अपने घर में दाखिल हो गयी. विनय तनेजा भी अपनी बेटी को खुश देख कर मुस्कुरा रहे थे.

"ये लॉन्ग फ्रॉक, बँगलेस और इतनी साड़ी चोचलाते ली है मैंने आज. और निम्बू वाला भुट्टा भी खाया और मसाला डोसा भी.", आकांक्षा धम्म से उस बड़े सोफे पर जा बैठी

जहा उसकी माँ सुषमा जी अपनी बेटी को खुश देख थोड़ा हैरान भी थी और खुश भी.

"तेरा तोह बर्थडे भी नहीं है फिर इतनी शॉपिंग और मस्ती? पैसे भी तोह नहीं लेके गयी थी तू अंशु.", सुषमा जी ने अपनी लाड़ली को एक तरफ से अपने साथ लगते हुए पुछा और गाल चूमती हुई सर सहलाने लगी.

"अर्जुन की जेब काट ली मैंने आज. नयी कार ली है तोह कैसे बच सकता था मुझसे.? लेकिन वो तोह उल्टा खुश था, एक बार भी मन नहीं किया.", आकांक्षा अभी बता हे रही थी की उसकी बुआ जाया भी अपने भाई के लिए शरबत ले कर अंदर आ गयी. वो बड़ा सा डब्बा टेबल पर रखे देख उन्होंने भी पूछ लिया.

"ये इसमें क्या है भाभी? अंशु लेके आयी है?"

"हांजी बुआ जी, मुझे गिफ्ट मिला है मेरे बेस्ट फ्रेंड से. और वो लाख के rang-birange कड़े और चोचलाते है. फ्रॉक देखो आप भी चक्र जाओगी, ये मैंने भी नहीं मांगी थी.", आकांक्षा ने इस do-taraf खुलने वाले 3 फ़ीट लम्बे डब्बे को खोला तोह सचमुच वो किसी महंगे गाउन जैसी पारी वाली फ्रॉक हे थी, बिना chaand-sitaro के.

"वाह. यहाँ ऐसे कपडे भी मिल जाते है? सचमुच सुन्दर है बिलकुल तेरी तरह. मेरी अंशु भी पारी हे तोह है.", बुआ ने भी बड़े स्नेह से कहा लेकिन सुषमा जी ने वो डब्बा अपनी तरफ खिसकाया तोह गौर से देखने लगी.

"अंशु बीटा ये कितने की है? और क्या ये तूने मांगी थी अर्जुन से?"

"माँ मैं ऐसा कर सकती हु क्या? हम तोह वह बस बँगलेस लेने गए थे क्योंकि अब सूट पहनूंगी तोह उनके साथ कलाई में कुछ तोह होना चाहिए. ये अर्जुन ने हे मंगवा राखी थी पहले से हे उसकी पहचान के शोरूम से. सरप्राइज बोल कर उसने बिलेटेड हैप्पी बर्थडे प्रेजेंट दिया तोह मैंने मन नहीं किया.", आकांक्षा की भोली सूरत देख कर विनय ने भी अपनी बेटी को प्यार से शांत किया.

"अब दोस्त है तोह हमको बीच में नहीं बोलना चाहिए सुषमा. अंशु भी उसको प्रेजेंट दे देगी उसके बर्थडे पे."

"आप समझ नहीं रहे हो जी. ये स्कूल के बचे है बेशक बड़ी क्लास में और इसकी कीमत लिखी हुई है 9 हजार यहाँ. इतना महंगा उपहार गलत है न.?"

"माँ मैं कुछ कहु?", आकांक्षा ने बीच बचाव करते हुए कहा.

"बोलो लेकिन बात वाजिब होनी चाहिए.", सुषमा जी शायद असूल वाली महिला थी, बेशक ाचे व्यक्तित्व और ख्याल रखने वाली भी.

"अर्जुन के दोस्त ने ये बोलै था के 50% लिखे हुए प्राइस से और ये गिफ्ट देने के लिए वो पॉकेट मनी सेव कर रहा था जो की मेरी बर्थडे तक इस ड्रेस की कीमत जितनी नहीं हो पायी थी. अब आपको बुरा लगता है तोह मैं वापिस कर देती हु.", अब सुषमा जी लाजवाब हो गयी थी. एक लड़के ने साढ़े 4 हजार सिर्फ इसलिए जोड़े की वो उनकी बेटी को ये ड्रेस गिफ्ट कर सके. मतलब उनकी बेटी अर्जुन के लिए कही ज्यादा ख़ास है. कुछ कहे बिना बस वो आकांक्षा को कुछ पल अपने साथ लगाए रही. फिर चुपचाप हे उस डब्बे को बंद करती कड़ी हुई तोह विनय हे बोल पड़े.

"मैडम, वापिस करवा दे ये उपहार? सब जानती हो सुषमा की वो इसकी कितनी परवाह करता है फिर भी तुमने ये बात कही?"

"गलती हो जाती है न. बस कुछ देर के लिए मुझे गलत ख्याल आ गया था लेकिन वो अर्जुन है जो हमको हे हमारी अंशु के लिए समझा गया था. उसका दिया हर उपहार मेरी बेटी के प्रति उसका स्नेह हे है. बेस्ट फ्रेंड है तोह अब है. मैं इसको अंशु की ालमिरह में रख के आती हु."

"भैया फिर आप उनके घर अंशु की बात हे कर लीजिये.", जाया ने जैसे हे ये कहा विनय तोह गंभीर हो गया वही आकांक्षा हंसने लगी.

"ओह मेरी प्यारी बुआ जी ऐसा वैसा मैट कहिये जिस से सभी हमारी दोस्ती को अलग तरह से देखने लगे. जो दोस्त होता है न वही परवाह कर सकता है, रिश्ता होने पर बोझ और जिम्मेदारी में फरक नाह रहता. अर्जुन कुछ छिपता नहीं क्योंकि वो दोस्त है और मेरे लिए यही जरुरी है. That's आईटी.", आकांक्षा के इतने आराम से ऐसी बड़ी बात कहने पर विनय तनेजा का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था और वापिस आती सुषमा जी भी मुस्कुराती हुई अपनी बेटी की बात को आगे बढाती हुई बोली.

"सही दोस्ती ऐसी नहीं होती जो किसी रिश्ते पर भरी पड़ी. वो बस सब रिश्तो को जोड़ देती है. लाइफ में कभी कुछ समय के प्यार और पुराणी दोस्ती में से कुछ एक सेलेक्ट करना पड़े तोह वह पुराणी दोस्ती हमेशा ऊपर रखना. I'm रियली हैप्पी फॉर यू माय प्रिंसेस एंड हे इस रियली ा स्पेशल पर्सन. उमाह. चलो अब कपडे बदलो और अपनी दादी के पास बैठो थोड़ी देर.", सुषमा जी ने अब खाने की तैयारी करनी थी और बाकी सब भी अपने काम में लग गए. अर्जुन अब अन्नू के घर बैठा था जहा लूडो की इस लम्बी बाजी के बाद सरदार जी अपना जाम बनाये बैठे थे और अन्नू की माता जी के साथ अर्जुन रसोई में खड़ा अन्नू से फ़ोन पर लगा था. 8 बजते हे वो कल आने का बोल कर यहाँ से भी अपने घर के लिए निकल चला.
 
एक जरुरी सूचना

ाचा ाचा नार्मल रिक्वेस्ट मान लो दोस्तों. ?

बहुत से लोग चिंतित है और ये उन सब का जुड़ाव हे है और प्यार भी लेकिन मैं फिर एक बार स्पष्ट कर देता हु की मैं इसको पूरा लिखूंगा बेशक ज़िन्दगी एक सरल रेखा जैसी नहीं तोह उतार चढ़ाव आते रहते है.

मेरी सबसे पहली कोशिश यही रहती है के इस कहानी को प्रसार करना और फिर हर किरदार को वैसे हे लिखना जैसे वो मैंने बनाया है. इसमें लेखक सिर्फ व्यक्तित्व से न्याय कर सकता है व्यक्ति से नहीं. समय लग जाता है कभी कभी.

दूसरी बात है के यहाँ और भी बंधुवर है जो बेहतरीन लिखते है या मेरी तरह शुरुआत करते है लिखने की, आप सभी उनको प्रोत्साहित कीजिये और अगर ऐसा न कर सके तोह उनका मनोबल मैट गिराए. उनकी सोच को वो बड़ी म्हणत से एक रूप देते है बेशक सभी का अलग तरीका होता है या खूबी पर म्हणत तोह म्हणत है. बस यही निवेदन है की मुझे आप प्यार करते है ये देख कर मैं भी खुश रहता हु की 100 लोग है मेरी परवाह करने वाले लेकिन उन सभी लेखकों के साथ जरूर न्याय कीजिये.

यहाँ कुछ लोग हो सकते है जो कटाक्ष करते हो या अपशब्द कहते हो लेकिन हो सके तोह उनका जीकर मैट कीजिये. सफ को हम गलत कैसे कह सकते है जब यही वह स्टेज है जहा हम एक है?

दोस्तों मुझे मॉडरेटर्स या स्टाफ ने कभी परेशां नहीं किया. कहानी में कुछ गलतिया होने पर उन्होंने मार्गदर्शन किया जिस से कहानी बन न हो और सिराज भाई हो ये ट्रिनिटी, उन्होंने व्यस्त समय भी मुझे सुझाव दिए है. वेबसाइट पर बहोत ट्रैफिक है और यही मॉडरेटर्स इसको सँभालते है.

देखिये आप सभी मुझसे प्यार करते है और मेरे लिए भी ये जगह एक परिवार है. बेहिचक अपनी दिल की कहिये, कहानी पर बात करिये और दिल करे तोह मेरे साथ व्यक्तिगत बातें भी करो. मैं हमेशा आप लोगो के बीच हु.

आज एक भाई ने कहा के इस हफ्ते 6 अपडेट दीजिये उपहार स्वरुप तोह अगले रविवार तक 6 अपडेट आपको मिलेंगी चाहे फिर एक दिन में 2-2 अपडेट दू. बस आप लोग थोड़ा सा छोटी मोती बातें नजर अंदाज कीजिये. अपने अड्डे पे महफ़िल लगते है, बीड़ी सुलगाते है और दुनिया गयी तेल लेने. अड्डा है भाई अपना वो और ये अपनी कहानी. आप सभी की कहानी.

ढेर सारा प्यार और शुभकामनाये

रेगार्ड्स

एनिग्मा
 
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