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"कहा आवारागर्दी करता घूम रहा है तू?", घर के अंदर अभी आया हे था अर्जुन की ऋतू ने थोड़े तीखे अंदाज में स्वागत किया. वक़्त से थोड़ा लेट होने पर स्वागत तोह ऐसे हे होता था उसका लेकिन ये बात उसको दादी हे कहती थी. और कौशल्या जी, जो किसी काम से आँगन में थी वो भी ऋतू की ऊँची आवाज सुन्न कर वही देखने लगी.
"वो यही पास में था लेकिन टाइम का पता नहीं चला सॉरी.", अर्जुन कभी ऋतू से बहस नहीं करता था क्योंकि वो बड़ी थी और उस से बेइंतेहा प्यार करती थी.
"कार की चाबी इधर ला और आइंदा 8 बजे घर मतलब घर. तेरे पास मोटरसाइकिल और साइकिल है अगर अकेले हे जाना हो तोह. कार बता कर और सिर्फ जब जरुरी हो तभी. चल जा के mooh-hath धो मैं खाना लगाती हु.", अर्जुन ने भी जेब से कार की चाबी उन्हें थमा दी जिसको लेने के बाद वो खुद हे अर्जुन के लिए नलका चलने लगी. हाथ मुँह धोने के बाद टोलिया भी ऋतू दीदी ने हे दिया और रसोई में चली गयी. कुछ सोच कर कौशल्या जी खाने की मेज पर हे बैठ गयी जहा फ़िलहाल सिर्फ अर्जुन हे था.
"तू इतना भी छोटा नहीं है उस से फिर कभी कुछ बोलता क्यों नहीं पलट कर?", कौशल्या जी ने बात बड़े आराम से कही थी जो अर्जुन के सिवा सिर्फ ऋतू को सुनाई दी, जो खम्बे के पास कड़ी प्लेट साफ़ कर रही थी.
"छोटा तोह अगर 1 मिनट भी होता तब भी वो बड़ी हे रहती दादी. गलती तोह मेरी हे है के मैं देर से आया और उन्हें भी डर लगता है क्योंकि कार लेके गया था.", अर्जुन ने गिलास में पानी दाल कर अपनी दादी की तरफ बढ़ाया जिनके हाथ में अजवाइन थी.
"कार जब ली है तोह चलाएगा हे, तभी तोह हाथ साफ़ होगा. और तेरी कार के अगर कुछ होता है तोह उसको टेंशन क्यों हुई भला?", कौशल्या जी कहने को तोह दिखा रही थी की वो अर्जुन का साथ दे रही है और ऋतू की बात का बुरा लगा उन्हें. लेकिन वो ऐसे हे कोई बात नहीं करती थी और वो भी ऋतू के लिए जो उनकी जान थी.
"कार तोह और आ जाएगी दादी लेकिन मैं? मुझे कुछ हुआ तोह फिर? बस उनकी यही चिंता है और गलती से मैं बता कर भी नहीं गया था. सॉरी और दीदी नाराज नहीं है वो बस मुझे ले कर थोड़ा ज्यादा घबरा जाती है जैसे आप खुद. आप भी तोह वैसी हे हो जो जानते हुए वही सवाल कर रही हो क्योंकि ये सब तोह आप कहने वाली थी अगर ऋतू दीदी न कहती.", कौशल्या जी मुस्कुराती हुई कड़ी हो गयी. पानी का गिलास अंदर ले जाने से पहले उन्होंने अपनी लाड़ली पौती को गले लगते हुए माथा चूमा और अनजाने हे मुँह से अनचाही इत्छा निकल gayi.'Shivji जोड़ी बनाये रखे' लेकिन ये बात जैसे वो बुदबुदा गयी थी बस.
"चल खाना खा ले उसके बाद रुपाली के साथ थोड़ा पढ़ लेना.", ऋतू दीदी ने खाना लगाया हे था और विन्नी दीदी के साथ आरती, तारा और अलका भी आ बैठी. विन्नी ने तोह आते हे अर्जुन के बराबर वाली सीट हथिया ली थी और दूसरी तरफ आरती.
"आज कोई padhai-vadhai नहीं बोल देती हु. ये आज मेरे साथ टाइम स्पेंड करेगा फिर चाहे फिल्म देख के या फिर बातें कर के.", विन्नी दीदी ने अर्जुन के कंधे पर हाथ रखते हुए ऋतू से कहा तोह वो बस मुस्कुरा दी.
"हाँ ठीक है कर लो आप भी इसके साथ टाइम स्पेंड फिर कल इसके प्यारे भैया आ जायेंगे तोह ये किसी के पास नहीं बैठने वाला.", अलका ने जैसे हे संजीव भैया का जीकर किया तोह अर्जुन के चेहरे पर चमक आ गयी.
"वाओ. ये तोह सचमुच ऐसे खुश हो रहा है जैसे भैया न हुए कोई कुम्भ का मेला हो गया. कोई बात नहीं वैसे भी कल मैंने वापिस जाना है तोह आज इस मुन्ना की हे टांग खिंचाई कर लेते है.", विन्नी दीदी ने भी एक प्लेट में खाना डालने के साथ हे उसको आरती की तरफ बढ़ा दिया. और अलका ने ऐसा हे तारा के लिए किया. फिर अपना भी खाना लगते हुए सभी हलकी फुलकी बातें करते भोजन का लुत्फ़ लेने लगे लेकिन पंडित जी के कमरे में माहौल थोड़ा अलग था अभी.
"खुश भी हो और थोड़ा थोड़ा परेशां भी. थानेदारनी जी ऐसी रंगत आज पहली बार देखने को मिल रही है.", रामेश्वर जी आज थकान महसूस कर रहे थे तोह जल्दी हे बिस्टेर पर आ गए थे. अपनी बीवी को देख उन्होंने सवाल कर हे लिया.
"दिमाग और दिल कई बार अलग अलग चल पड़ते है तोह चौराहा बन्न जाता है जी. तब बात 2 नहीं 4 तरफ़ा हो जाती है और आज मेरे से भी यही हो गया.", कौशल्या जी ने अजवाइन और पानी अपने पति को देने के बाद हाथ कपडे से साफ़ किये और बिस्टेर के दूसरी तरफ जाने से पहले जीरो की रौशनी कर दी बड़ी तुबे बंद करते हुए.
"धर्मसंकट तोह कोई बड़ी बात नहीं है कौशल्या. एक तिनके के 2 हो जाये तोह roop-rekha बदलना स्वाभाविक हे है. अब कहो के दिमाग और दिल में ऐसा कौनसा द्वन्द चल गया जिसमे दिल को जीता रही हो और दिमाग को पीछे भी नहीं हटा पा रही.", पंडित जी भी गहरी जानकारी रखते थे इंसान और भावनाओ की.
"ये सब न आपकी हे कारस्तानी है जी और आपके कपूत की. मेरे दिमाग में जाने कैसे कैसे ख्याल बैठा दिए है आप लोगो ने और मैं खुद अनजाने हे प्रभावित हुए जा रही हु.", हलकी नाराजगी से कौशल्या जी ने इतना कहा और तकिया ठीक करके करवट के बल लेट गयी.
"देखो कौशल्या कोई भी किसी के मैं को नहीं बदल सकता अगर सामने वाला स्वीकार न करे. और इतना घुमा फिर कर बात क्यों कर रही हो, सीधा कहो के अर्जुन और मैंने ऐसा क्या कर दिया है जिसका तुम पर dush-prabhav हो रहा है?"
"मैंने कब कहा के ये गलत प्रभाव है? बस ये लड़की न उसके साथ वैसे हे बर्ताव करती है जैसे माँ या प्रेमिका हो उसकी. अर्जुन सामने से कभी जवाब तक नहीं देता चाहे बात वो कितनी बड़ी हे क्यों न कह दे. किसी और का होना न होना भी नहीं देखती.", अब रामेश्वर जी भी थोड़े गंभीर हो गए थे इतना सुन्न कर.
"जब शंकर ने कहा था के मैं अर्जुन को सांड बना रहा हु जो कल को मुझे हे भरी पड़ सकता है, तोह तुम्हे ध्यान है मैंने क्या कहा था? सांड कितना भी बड़ा क्यों न हो लेकिन वो एक मामूली सी रस्सी में बांध जाता है अगर दूसरा सीरा उसको प्यार करने वाले के हाथ में हो. तुम इसको झुठला नहीं सकती कौशल्या के अर्जुन को निस्वार्थ सिर्फ ऋतू हे नियंत्रित रखती है.", रामेश्वर जी की बात सुन्न कर उनकी धर्मपत्नी जी का स्वर भी थोड़ा सा चिंतित सा हो गया था.
"जी आप जानते हो के बचो में मैंने कभी फरक नहीं किया लेकिन ऋतू मेरे लिए भी ख़ास है. उसका एक पक्ष जो सबके सामने है वो बिलकुल अर्जुन जैसा है या उस से भी बेहतर. लक्ष्य के लिए हमेशा गंभीर, मेहनती, कड़े निर्णय लेने वाली और मर्यादित श्रेष्ठ संतान सा. वही अर्जुन के लिए वो इस सब से उलट है जैसे वो खुद हे अर्जुन को श्रेष्ठ बनाना चाहती है लेकिन सिर्फ अपने लिए.", इतनी गहरी बातें और अपनी बीवी की चिंता देख पंडित जी परिचित अंदाज में मुस्कुरा दिए.
"तुम वैसा नहीं चाहती क्या कौशल्या?", कौशल्या जी तोह ऐसे चौंक गयी जैसे उनकी चोरी पकड़ी गयी हो लेकिन रामेश्वर जी ने खुद हे बात आगे कही.
"देखो वो उसको बेहतर बना रही है लेकिन तुमने अगर ध्यान दिया हो तोह ऋतू ने अपने व्यक्तित्व के पहले पक्ष के साथ समझौता नहीं किया है. आज सवेरे भी अर्जुन की हालत तुम्हारे सामने हे थी की ऋतू उसको कही बेहतर निखारना जानती है. लेकिन ये एक अंदरूनी पक्ष जिस से तुम्हे डर या चिंता हो रही है तोह मेरी सलाह यही है के सब वक़्त पर छोड़ दो."
"आप ऐसे कैसे कह सकते हो जी की सब वक़्त पर छोड़ दो? वक़्त आने पर अपने हे पौटे का ब्याह पौती के साथ करवा सकते हो आप? मुझे तोह ये होता दिख रहा है क्योंकि अर्जुन की नजरो में ऋतू के लिए सिर्फ प्यार है और कोई सवाल तक नहीं. इतनी दुनिया तोह मैंने भी देखि है जो बता न सकू के ये प्यार कैसा है."
"तुम आशीर्वाद डौगी तोह मैं भी हाथ पीछे नहीं रखने वाला बस फिर अपनी ज़िन्दगी के निर्णय उन्हें हे लेने होंगे, सिर्फ उन्हें.", रामेश्वर जी को जैसे कुछ हद्द तक भविष्य पता था जो इतना सरल भी न था लेकिन हल निकला जा सकता था.
"यही गलती हुई है जी अभी थोड़ी देर पहले. दिल से अपने आप हे निकल गया के भगवन उनकी जोड़ी बनाये रखे और अब खुद पर हे गुस्सा आ रहा है एक ये मैं कैसे कर सकती हु. गलत में गलत होना समझदारी नहीं है."
"तुमने इस से भी बड़े बड़े आशीर्वाद और कस्मे दी है कौशल्या और जबतक तुम्हारा साथ है मैं सबकुछ कर सकता हु क्योंकि ये परिवार तुमने बसाया है. मैं खुद इसका हिस्सा हु क्योंकि इन्हे तुमने बिखरने देने की जगह मजबूती से बांधे रखा है. कीमत कई बार बहोत बड़ी चुकानी पड़ी लेकिन तुमने कुछ भी बिखरने नहीं दिया. और अब भी नहीं होने डौगी ये मुझे विश्वास है.", अपने पति के इस जवाब पर कौशल्या जी ने कितने हे वर्षो बाद आज उनके गाल को छु लिया था.
"Putra-moh में आपने भी बहुत कुछ किया है जी तोह ये दिन भी साथ मिल कर हे देखेंगे. बस अगर मैं पहले चली जाऊ तोह अर्जुन को अधूरा मैट रहने देना. बहोत सारे राज ऐसे है जो समय रहते हे बस ख़तम हो जाए और शंकर भी आपके जैसे निर्णय ले सके. रेखा मुझ से कही बेहतर है और वो अर्जुन को रोके रहेगी."
"तुम अभी न जाने लगी थानेदारनी. जो बात मुँह से निकली है वो मेरे साथ पूरी करना बस क्योंकि संतुलन तोह दोनों के साथ रहने से होगा. बाकी शंकर का दिल भी बहोत कुछ समझता है बस वो जाहिर नहीं करता. दुविधा में है के अभी बेटे को प्यार करे या बाद में...", रामेश्वर जी ने बात अधूरी छोड़ कर एक मुस्कराहट दी तोह कौशल्या जी भी हंसने लगी.
"हाँ जलोकदा है वो पूरा और हो भी क्यों न, बाप ने सबकुछ तोह उसको बिना मांगे दे दिया. अब दिक्कत हो रही है तोह या तोह बात करे या चुपचाप रहे. चलो आप आराम करो जी, मैं एक चक्कर लगा आती हु.", कौशल्या जी ने खड़े होने से पहले अपने पति को कमर तक चादर दी और बहार चली आयी पीछे दरवाजा वापिस बंद करके.
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हवेली पर लड़की के साथ साथ लड़के का भी ब्याह था और एक प्रतिष्ठा के साथ साथ ये अलग परंपरा भी थी जहा मर्दो के लिए मदिरापान का आयोजन भी होता था. बिजेन्दर ने तोह मन भी किया था अपनी माँ और दादी को इस सबके लिए लेकिन चंद्रो देवी ने खुद हे कहा के इस अवसर पर वो ये परंपरा भी शामिल रखेंगी. हवेली के सामने हे इनका ये आधा एकड़ का चारदीवारी किया नोहरा था जहा उन्होंने आयोजन के लिया बिजेन्दर को आदेश दिया.
7 बजे के बाद हे हलकी रौशनी में उस जगह desi-angrezi की छोटी छोटी महफ़िल जमने लगी जो बाद में 50 लोगो की एक बड़ी महफ़िल बन चुकी थी. Murga-mutton के साथ साथ हल्का संगीत भी डेक से बज रहा था और सब अपने अपने हिसाब से पीते हुए हवेली में होने वाले विवाह की शुभकामनाये दे रहे थे. 8 बजे के करीब उमेद सिंह इस बड़े नोहरे में चले आये तोह नौजवान लड़के संकोचवश 1-2 बोतल ले कर अपनी महफ़िल गाँव से बहार हे ले गए.
"सब ठीकठाक है न यहाँ? कोई कमी पेशी.", उमेद सिंह के इतना बोलते हे कुछ लोग हाथ जोड़ कर खड़े हो गए और बिजेन्दर भी उनके पास चला आया.
"न काका, सब ठीक है. मुझे पता न था के आपने ये सब भी मंगवा रखा है."
"बिजेन्दर बीटा, अब बरात में तोह सिर्फ तू खुश होवेगा. यहाँ इन्हे भी तोह खुश करना है.", उमेद काका की बात सुन्न कर बिजेन्दर लड़की सा शर्माने लगा तोह बाकी सब भी हंसने लगे. आधा घंटा वह लोगो से बतलाने के बाद उमेद अपने साथ हे बिजेन्दर को लिए सामने हवेली आ गए. बिजेन्दर तोह वैसे भी शराब से दूर हे रहता था और साथ हे कल के दिन जो जरुरी काम थे उनकी चर्चा भी करनी थी. उधर नोहरे में भी 2 घंटे में लगभग सभी लोग टुन्न हो कर अपने अपने घर चले गए थे. बिजेन्दर को दिल से धन्यवाद् करते हुए और उमेद सिंह सिग्रत्ते पीने हवेली की छत्त पर. चंद्रो देवी के सामने सिर्फ शंकर की हे इतनी हिम्मत थी या उमेद को कुछ झिझक थी.
"thak-thak." ये आवाज सांकल की थी जो किसी ने दरवाजे पर बजे थी. बिजेन्दर नहाने गया था और उमेद ऊपर थे. मधुलता के कहने पर ऋचा ने दरवाजा खोला तोह सामने खड़े व्यक्ति को हाथ जोड़ कर नमस्ते करती हुई बोली.
"जी मां, कोई काम था क्या इतनी रात को?", ये व्यक्ति था चंदरभान, ऋचा का मां और लता का ममेरा भाई. जो एक बार ऋचा को निहारने के बाद बोलै.
"ऋचा बिटिया, ठंडा पानी न है उधर और 1 खास दोस्त बैठा है तोह बस एक गड़वी ठंडा पानी भिजवा दे. फेर हम भी अपने घर चले.", चंदरभान लड़की का मां था और उसी हक़ से उसने अपनी बात कही थी. ऋचा भी उस छोटे दरवाजे को वैसा खुला छोड़ कर अंदर चली गयी. गुड्डी ताई को बता कर वो वापिस गेट पर आयी तोह मां वह नहीं दिखा. कुछ सोच कर वो 10 कदम दूर नोहरे की तरफ चल दी.
"मां, ये लो पानी. बर्फ भी दाल दी है इसमें.", हलकी आवाज में ऋचा ने गेट के पास से हे आवाज दी तोह सामने लकड़ी के तख़्त पर बैठा वो व्यक्ति बोलै.
"बिटिया, चन्दर हल्का होने गया है. पानी यहाँ रख दे मेरे हाथ मैले है थोड़े.", ऋचा हवेली की बेटी थी तोह निडर भी थी क्योंकि सभी उनके परिवार से नजरे नीची करके बात करते थे. लेकिन शायद उसको भी नहीं पता था के इस शराब ने तोह ाचे ाचे को बेइज्जत्त कर छोड़ा है और कितने हे दुनिया से जा चुके इसकी जड़ में आ कर. कदम नोहरे में रखती वो इस हलके अँधेरे की तरफ चल दी. ये व्यक्ति भी उसके हे मां की उम्र का था और अभी भी मुर्गे की टांग से बचा खुचा मंच उधेड़ने में व्यस्त था.
"ऋचा बिटिया ये लट्टू दिक्कत कर रहा था इसलिए बंद कर दिया. तू पानी ले आयी?", लोहे के गेट से अंदर आते चंदरभान ने लौटा रखती ऋचा को देखा तोह अँधेरे की वजह बताई. ाचे सुरूर में थे ये दोनों व्यक्ति जिस वजह से अब ऋचा को चलना हे उचित लगा. लेकिन सामने से चंदरभान ने आते हे भांजी के कंदेह पर हाथ रख दिया.
"ये भी तेरा मां हे लगता है ऋचा और मनबीर ये अपनी मुन्नी की बेटी है मेरी भांजी.", इस बात पर पहली बार व्यक्ति ने थोड़ा गौर से ऋचा को देखने की कोशिश की. बहार से आती रौशनी में हल्का चेहरा और शरीर देखा जा सकता था.
"हम्म्म. चोखी बात है चन्दर और बीत्या तोह माँ से भी सुथरी है. पहले न देख्या बिटिया को?", अब ऋचा भी मज़बूरी में ठिठक गयी थी लेकिन किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा माँ को सुन्दर कहना उसको जांचा नहीं.
"देख्या तोह मैंने भी आज हे है भाई 4-5 साल बाद. बहार पढ़ती है न तोह नजर न आयी. अब गाँव में है और मैं भी कुछ दिन इधर हे हु तोह भांजी को मां का पूरा प्यार दूंगा.", ये कहते हुए चंदरभान का हाथ फिसल कर कंधे से ऋचा के नितम्ब को रगड़ गया. शरीर में ये कैसी झरझरी सी दौड़ गयी थी. मां हो कर कैसे वो उसके साथ ये कर सकता था लेकिन सदमा तोह मनबीर की बात सुनकर लगा.
"मुन्नी वाला प्यार तोह बस पीछे पीछे था भाई, ये भांजी है तोह इसको पूरा देना पड़ेगा.", ऋचा नादान न थी जो ऐसी द्विअर्थी बातें न समझ सकती और उसको शांत खड़े देख चन्दर ने हद्द लांघते हुए जाएंगे के बीच हे पीछे से हाथ दाल कर दबा दिया.
"मन न करेगी मेरी भांजी.. आठ..", 'चटाक की आवाज के साथ हे चंदरभान की चीख निकल गयी और थप्पड़ की गूँज सुन्न कर 1 मिनट में हे उमेद सिंह इधर आ पंहुचा जहा से ऋचा उसकी हे तरफ आ रही थी. गुस्से के साथ रोटी हुई.
"रुक बेटी. क्या हुआ था यहाँ अभी?", ऋचा के साथ बहार उमेद सिंह को देखते हे ये दोनों व्यक्ति नशे में होने के बावजूद बड़ी तेजी से दिवार फांद कर खेतो की तरफ भाग निकले.
"चाचा, वो वो आदमी मेरा मां कैसे है? छियई.. कितनी घटिया हरकत और वो भी अपनी बेटी जैसी भांजी के साथ.", ऋचा के मुँह से इतना हे सुन्न पाया था उमेद सिंह और तुरंत बहार कड़ी जीप में अपनी भतीजी को बैठा वो निकल चला उस जगह जहा ये घिनोना मां मिल सकता था. लेकिन पीछे हवेली के गेट पर कड़ी लता के शरीर को जैसे लकवा मार गया था ये बातें सुन्न कर.
"मुन्नी, वह क्यों कड़ी है?", चंद्रो देवी की आवाज सुन्न कर वह घबराती हुई पलटी तोह इधर बिजेन्दर भी आँगन में आ गया था.
"वो माँ जी पता नहीं जेठ जी ऋचा को जीप में बैठा कर किधर ले गए. गुस्से में थे."
"ऋचा बहार कब गयी मुन्नी? उमेद भी कोई आवाज सुन्न कर हे गया था तोह मतलब वह कोई घटना हुई है? चल देख लेगा वो अपने आप तू काम कर."
"मैं कह रही थी की बिजेन्दर बस पीछे चला जाये तोह.."
"मुन्नी, उमेद गया है न. बिजेन्दर घर से बहार ब्याह वाले दिन हे निकलेगा अब.", घबराती हुई लता जैसे तैसे एक कोने में चूल्हे के पास जा बैठी. मैं अशांत था और दिल घट्ट रहा था ये सोच सोच कर की अनजाने में हे चन्दर ने काले राज खोल दिए तोह वो जीते जी मारी जाएगी. इसके साथ हे कही दूर एक पटाखा चलने की आवाज सुनाई दी जिस से इस हवेली के लोग तोह ाचे खासे वाकिफ थे. कोई 15 मिनट बाद उमेद और ऋचा वापिस आये तोह उमेद सिंह के चेहरे पर ख़ास भाव न थे. ऋचा भी सधी हुई चाल से अपने कमरे में चली गयी.
"ाचा ताई मैं चलता हु, कल हल्दी पे माँ और राजेश्वरी को लेके आ जाऊंगा. और 2-3 लोग गेट पे रखने शुरू करो, खेतो में अभी जरुरत नहीं है.", पाँव छू कर वो जाते हुए बिजेन्दर से भी थोड़ी बात करके गए. मधुलता अभी तक बेचैन थी और चंद्रो देवी बस अकेले बैठी मुस्कुरा रही थी. अपनी बेटी को दूध देने का बोल कर लता अंदर ऋचा के कमरे में आ गयी थी.
"बहार क्या हुआ था ऋचा?"
"थोड़ी देर में या सवेरे पता लग हे जायेगा आपको की क्या हुआ होगा. अब जान गयी हु के दादी और बिजेन्दर भैया क्यों पापा और उमेद चाचा को मर्द बोलते है.", ऋचा के जवाब ने लता को जैसे मिर्चे लगा दी थी.
"तू क्या बकवास कर रही है तुझे पता है? तू जवान हो रही है तोह क्या कुछ भी बकेगी?"
"आवाज निचे रखिये माँ. मर्द का मतलब सुरक्षा देने वाला भी होता है. सोच में कही तोह खराबी है और मैं ये जान कर रहूंगी.", ऋचा को पता था के ऐसे तोह माँ पीछा नहीं छोड़ने वाली तोह उठ कर वो दादी के पास आ गयी. लता बस हैरत से कड़ी देखती रही.
"दादी अबसे मैं आपके साथ हे सोया करुँगी या फिर बड़ी ताई जी के साथ.", ऋचा की बात सुन्न कर सुशीला ने पलट कर हे जवाब दे दिया.
"मेरे साथ. माँ जी नींद में बन्दूक उठा ले कुछ पता नहीं. तू मेरे साथ हे सोया कर अगर अकेले में दिक्कत है तोह.", लाड से वह उसका सर सहलाने लगी जिसके भीतर ऋचा न जाने क्या कुछ सोच रही थी. पिछले आधे घंटे में एक तरह से उसकी दुनिया हे ulat-palat गयी थी लेकिन वो शायद नतीजे पर नहीं पहुंची थी. और साथ साथ मधुलता भी जैसे एक अलग हे सदमे में आ गयी थी. उसकी बेटी ने कोई सवाल न किया था. लेकिन आवाज नीची रखने का जैसा आदेश दिया था उतनी हिम्मत तोह आज तक किसी का न हुई थी. इसको भी एक मूक संधि मान कर वो खामोश हे रह गयी.
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अर्जुन को आज खाने के बाद ऋतू दीदी ने पहली बार इस नए कमरे का परिचय करवाया. यहाँ उनकी ट्रेडमिल और एक आइना हे होता था जहा समय मिलने पर वो लोग खुद को तराशने के लिए म्हणत करती थी. लेकिन आज ये जगह अलग थी और कही बेहतर. अर्जुन इस 12क्ष14 के कमरे में आया तोह वह बस हैरत से देखने लगा. ये भविष्य में एक और bathroom-store के लिए छोड़ा गया हिस्सा था जो एक व्यायामशाला में तब्दील हो चूका था.
"जिस दिन स्टेडियम नहीं जाओगे उसदिन यहाँ 90 मिनट रहना होगा. वैसे तोह ये no एंट्री है किसी भी व्यक्ति के लिए लेकिन मैंने तुम्हारे लिए इसको बदल दिया है. अपना अलग मत भी ले आना जब मार्किट जाना हो क्योंकि हम सबके अलग अलग है, विथ नाम. संजीव भैया का सारा सामान इधर है और चाहो तोह ऐसा हे एक बेंच और ले लेना, कुछ वेइट्स के साथ.", कमरे में वही सब सामान ाचे से रखा था जो संजीव भैया कसरत में प्रयोग करते थे. डम्बल, 3 तरह की रोड, लोहे की विभिन्न प्लेट, एक वजनी इस्पात का गद्दी लगा टेबल और एक रोड जो लटकने के लिए अलका ने हे यहाँ लगवाया था.
"ये तोह अपने आप में हे एक गयम है. आप लोग ये सब भी करती हो क्या?", अर्जुन ने जिज्ञासावश पुछा तोह ऋतू से पहले अंदर आती तारा ने जवाब दिया.
"न लेकिन रोड उसे कर लेते है कभी कभी. लेकिन तू हलके वेट लेकर देगा तोह मैं तेरे साथ करने को रेडी हु. बाकी तोह बस रनिंग, स्ट्रेचिंग और जो Alka-Preeti सिखाती है वही सब होता है."
"करवाती हु तुझे तोह मैं इसके साथ एक्सरसाइज, बड़ी आयी डोले बनाने वाली. ये सब तुम अकेले करोगे और अगर जरुरत पड़े तोह कोमल दीदी या प्रीती को बुला सकते हो. बस अपना अलग मत जरूर ले आना.", ऋतू ने तारा का हाथ पकडे हुए हे अर्जुन को निर्देश दिए के वो यहाँ संजीव भैया को भी आमंत्रित नहीं कर सकता. अर्जुन ने भी सर हां में हिला दिया.
"चल अब अपने कमरे में जा और आराम कर. सवेरे 5 बजे मैं बुलाने आउंगी तोह तैयार मिलना. चल तारा अब पढ़ने का टाइम हो गया. पापा से बोल कर अब कंप्यूटर भी मंगवाना पड़ेगा.", कमरे को वापिस बंद करती ऋतू दीदी अपने साथ तारा को भी अपने कमरे में ले गयी. अर्जुन सर खुजाता हुआ अगले हिस्से में आया तोह कमरा बर्फ सा ठंडा हो रखा था लेकिन ऐसे में भी विन्नी दीदी के साथ Madhuri-Priyanka दीदी बैठी हुई ये फिल्म देख रही थी.
"थोड़ा तोह टेम्परेचर ठीक रखो दीदी, कुल्फी जमनी है क्या?", अर्जुन अंदर आते साथ हे रिमोट से तापमान बढ़ाते हुए बोलै तोह विन्नी दीदी ने आँख मार दी.
"बहार से आया है न इसलिए लग रहा है. तू कहा भटकता फिरता है हर वक़्त?", विन्नी दीदी के इस सवाल को अर्जुन ने अपने कमरे में जाते हुए सुना और अलमारी से पजामा टीशर्ट निकलते हुए बोलने लगा.
"ाची नींद के लिए भटकना तोह पड़ता हे है दीदी. वैसे बहार सचमुच एकदम से उमस जैसा हो गया है.", अर्जुन कंधे पर टोलिया टाँगे वापिस इस तरफ आया तोह कोमल दीदी अपनी जगह से कड़ी हो गयी.
"आ के नाहा लियो ारु, बारिश आ गयी तोह मेरी सहमत आ जाएगी. छत्त पर दरी, परदे धुप लगवाने के लिए रखे थे और भीग गए तोह दादी ने जान ले लेनी है.", वो अभी इतनी बात कहके हटी थी की तेज गर्जना ने उनकी बात को साबित कर दिया. अर्जुन उनसे पहले हे कमरे से बहार निकला और छत्त पर बढ़ गया. अभी तक बारिश शुरू नहीं हुई थी लेकिन आसमान घुट्ट गया था.
"तू उधर से समेत और मैं ये परदे उठती हु.", कोमल दीदी ने बिखरे हुए पर्दो को उठाना शुरू किया तोह अर्जुन उनसे दुगनी रफ़्तार से बाकी सब समेटने लगा. विन्नी दीदी भी इधर आ गयी थी जो कोमल की मदद करने लगी.
"वैसे ाचा हे है के बारिश आ जाये. 2-3 दिन से बादल आ रहे है लेकिन बरस नहीं रहे. चलो इधर का तोह हुआ, ये आप लेके चलो मैं बाकि लेके निचे आती हु.", विन्नी दीदी ने कोमल दीदी को उठाने लायक सामान देने के बाद अर्जुन द्वारा तेह किये परदे और चादर खुद उठा लिए. भारी दरी और कालीन अर्जुन खुद उठा कर उनके पीछे चल दिया. फ़िलहाल के लिए सबकुछ संजीव भैया के कमरे में रखते हुए तीनो ने रहत की सांस ली.
"सॉरी दीदी, आपसे भी काम करवाना पड़ा.", कोमल दीदी ने अर्जुन के तोलिये से हे विन्नी दीदी के हाथ साफ़ किये और फिर अपने भी करने के बाद टोलिया अर्जुन को देती गूडनिघत बोल कर निचे चली गयी. साढ़े 10 बज चुके थे और प्रियंका दीदी के साथ वह माधुरी दीदी काम करवा रही थी. कोमल दीदी बड़ी बहिन से काम नहीं करवाना चाहती थी इसलिए खुद हे रसोई में आ जुटी बर्तन साफ़ करने.
"बारिश में नहायेगा?", अर्जुन से जैसे हे विन्नी दीदी ने ये कहा वो उन्हें हैरत से देखने लगा.
"एक में बैठी थी आप इतनी देर से और अब इतनी रात को बारिश में नहाने की बात कर रही हो. बीमार पड़ गयी न फिर आपको तोह कोई कुछ नहीं कहेगा लेकिन मेरी शामत आ जाएगी. आप आराम से टेलीविज़न देखो मैं बाथरूम से नाहा कर आया.", अर्जुन ने इतना जवाब दिया और अंदर घुसते हुए दरवाजा बंद कर लिया.
"सहित. मेरी ुंडिएस... हो गयी एक और गलती तुझसे विन्नी.", अपने सर पे हाथ रखती विन्नी को ध्यान आया के कपडे बदलने के बाद वो अपने अधोवस्त्र अंदर हे छोड़ आयी थी. वो भी बेपर्दा और अर्जुन को जाते हे दिख जाने वाले है. शर्मिंदगी में यहाँ से गायब होने के सिवा कोई दूसरा चारा न था अब. अर्जुन की नजरो से बचने के लिए वह बहार निकली तोह मोटी मोटी बुँदे आँगन में टपक रही थी. सामने Ritu-Alka की तरफ कमरे बंद थे और निचले आँगन में भी ऐसा हे नजारा था सिवाए रसोईघर के. विन्नी अपनी हे सोच में खोयी सीढ़ियों से छत्त पर चली गयी.
'अब ये विन्नी दीदी कहा चली गयी?', अर्जुन नाहा कर 10 मिनट बाद बहार निकला तोह कमरा खाली था. बेध्यानी में वह अपने कमरे में आ कर बाल सही करने लगा तोह एक भयंकर गर्जना ने उसका ध्यान बहार बदले मौसम की तरफ कर दिया.
'ये पागल विन्नी दीदी चली गयी ऊपर बारिश में.', अर्जुन तुरंत गीला टोलिया लिए बहार निकल आया. निचले आँगन में Priyanka-Madhuri दीदी उसको कमरे में जाती दिखी और Ritu-Alka वाला कमरा भी बंद. बारिश अब एक झड़ी का रूप अख्तियार कर चुकी थी जिस से अर्जुन का दिल बैठ गया. सीढिया फांदता हुआ वो जैसे हे खुली छत पर पंहुचा, विन्नी दीदी को देख कर ठिठक गया.
"सचमुच पागल हे हो आप दीदी. मन करने के बाद भी आप यहाँ बारिश में भीगने आ हे गयी."
"हर रोज तोह बारिश नहीं होती न? मुझे ये पसंद है और साथ हे बिजलियों का कड़कना, वो चमक जो अँधेरे को एक पल के लिए ख़तम कर देती है. शुरू में तोह धरती का सेक बहार निकलता है लेकिन फिर जो ठंडक ये बारिश देती है उसका कोई जवाब नहीं.", इतनी घनी बारिश में दोनों बस एक दूसरे को स्याह साये की तरह देख भर सकते थे. अर्जुन कुछ आगे चलता थोड़ा करीब आया तोह विन्नी दीदी इस मूसलाधार बारिश में जैसे प्रभावहिर हे थी.
"आपको ये तीखी बुँदे चुभ नहीं रही?", अर्जुन भी अब उनके साथ भीग हे चूका था और वैसे भी बारिश तोह हमेशा हे उसको पसंद थी.
"ाची लग रही है अब तोह. बस शुरू में चेहरे पर जरूर चुभ रही थी लेकिन इसका भी अलग मजा है. वैसे पहले मुझे भीगना बिलकुल पसंद नहीं था.", विन्नी दीदी अपनी हथेलिया बरसते पानी के निचे फैलाती हुई वापिस उन बूंदो को ऊपर उछाल रही थी. किसी छोटी सी बची की तरह.
"जब पहले बारिश पसंद हे नहीं थी तोह ऐसा क्या हुआ के ये गरजती बिजली का भी डर ख़तम हो गया? क्योंकि ज्यादातर लड़कियों को ये डरा देती है.", अर्जुन भी कुछ सोच कर अब फर्श पर बैठ गया था, पाँव लम्बे पसार कर. एक नजर विन्नी दीदी ने अर्जुन को देखा और फिर वो भी कुछ दुरी पर वैसे हे बैठ गयी.
"वह जब अकेली थी तोह ये बारिश बहोत डरा देती थी. एक तोह अकेलापन क्योंकि अपने घर से इतनी दूर थी और दूसरा मुझे बाहरी दुनिया का कोई ज्ञान हे न था. लेकिन कितने दिन ऐसे रहती? 5 साल लगे मुझे खुद को हिम्मत देने में और जब मैं कमरे से बहार निकल कर अकेली ऐसी घनघोर बारिश में आ कड़ी हुई तोह कुछ पल के लिए मैं बस सुन्न रह गयी थी. डर, दर्द और असुरक्षा. मेरे से 4-5 साल छोटे 2 bhai-behan वैसी हे बारिश में uchal-kood करते हुए अपनी माँ के पीछे चल रहे थे खुली सड़क पर. उस दिन इन बूंदों से तोह डर ख़तम हो गया लेकिन लैटनिंग फिर भी डरा देती थी.", इतना कह कर विन्नी एकाएक खामोश हो गयी थी. आँखें मूंदे वह चेहरा ऊपर करती जैसे एक जुंग लड़ रही थी इन टपकती बूंदों से.
"फिर ये डर कैसे दूर हुआ आपका? शायद इस बार वजह उन बचो जैसी मासूम नहीं रही होगी.", अर्जुन ने भी हथेलिया पीछे फर्श पर रखते हुए खुली आँखों से ऊपर देखा तोह सचमुच ये चेहरे पर ाचा खासा वार कर रही थी. कैसी विन्नी दीदी इनको झेल रही होंगी अर्जुन ये सोच कर हे हैरान था और साथ हे एक डर ने भी घेर लिया था क्योंकि उसका सवाल गलत था.
"तुम्हे बताया नहीं मैंने लेकिन सच कहु तोह तुम पहले लड़के हो जो इंसान को अलग तरह से देखते और समझते हो. और ये भी सच है के इस डर को दूर करने की वजह एक ऐसा दर्द था जिसने मुझे बस काबिल बनाया, टूट के बिखरने से ाचा तोह यही है न.", विन्नी दीदी भी जैसे कई मौसम देख चुकी थी, dard-akelepan और समाज के.
"अगर बात ऐसी है तोह बेहतर रहेगा हम इस पर चर्चा न करे. आप फिर से उस दर्द को याद करेंगी तोह मुश्किल होगा."
"एक बार निकलना जरुरी है बस और तुम पर ट्रस्ट कर हे सकती हु.", जैसे विन्नी दीदी ने ये बात कही थी इस अँधेरे में भी उनकी मुस्कान जाहिर कर गयी की वो इस लड़के को कितना मान ने लगी है.
"हाँ ये भी बात ठीक है के दर्द से निकलने के लिए एक बार खुद को खाली करना बेहद जरुरी है. नहीं तोह हम ाची यादें नहीं बना सकते. फिर हर बारिश बस एक द्वन्द या टकराव सी लगेगी जिसमे मजे से ज्यादा खुद को साबित करना ऐसा लगता है जैसे खुद से हे भाग रहे हो.", अर्जुन की इतनी दूर की बात विन्नी दीदी को भी समझ आ गयी थी. बैठे हुए हे उनकी हथेली कुछ हद्द तक अर्जुन की ऊँगली से टकरा गयी जिस पर दोनों ने ध्यान न दिया.
"फर्स्ट ईयर में मुझे एक लड़के से अट्रैक्शन होने लगी थी. उसका नाम डर्क था, शामे क्लास में लोकल जर्मन लड़का. उस से पहले तोह स्कूल में हमेशा खुदसे हे उलझी रहती थी लेकिन डर्क खुद मेरा ध्यान रखता और मुझे मदद करता माहौल में पार्टिसिपेट करने में. एक साल में हम ाचे दोस्त बन्न गए और मैं उसके साथ हर बात शेयर करती. समय मिलने पर aas-pas हाईकिंग के लिए चले जाना, स्ट्रीट्स एक्स्प्लोर करना और लोगो से मिलना जुलना होने लगा. तब तक वो अट्रैक्शन एक ाचे फ्रेंड से भी थोड़ी ऊपर चली गयी थी. हम सेकंड ईयर भी हाफ कम्पलीट कर चुके थे.", विन्नी और अर्जुन को तोह अब इस बारिश का असर हे नहीं हो रहा था. वो चुपचाप बस सुन्न रहा था
"वीकेंड पर एक लोकल फ्रेंड के यहाँ पार्टी थी जहा मैं जाना नहीं चाहती थी लेकिन डर्क पार्टी करता था और वो लड़की उसकी भी दोस्त थी. एक room-mate के फाॅर्स करने पर मैं भी थोड़ी देरी से वह चली गयी जिसका शायद डर्क को अंदाजा नहीं था. पार्टी में वो कही नजर नहीं और मैं भी थोड़ा बोर होने के बाद घर के पिछले यार्ड में चली गयी जहा थोड़ा सुकून रहता था. वह मैंने डर्क और उसके एक फ्रेंड को एक लड़की के साथ इंटिमेट देखा तोह मुझे कुछ समझ नहीं आया. मैं सोच कर बैठी थी की नेक्स्ट डे संडे है और डर्क के प्रपोजल को एक्सेप्ट करके एक रिश्ता शुरू करुँगी लेकिन सब एक पल में हे खता हो गया.", विन्नी के आँखों में अगर इस वक़्त आंसू भी थे तोह वो दिख नहीं सकते थे. लेकिन आवाज की कम्पन्न अर्जुन समझ सकता था.
"लाइफ इस ूनप्रेडिक्टेबले विन्नी दी. आप जिस मदद से रोज गुजरो जरुरी नहीं के वो एक दिन वैसा हे रहेगा. वह 2 रस्ते भी बन्न सकते है जिसमे नए वाले पर चलना थोड़ा अंजना और कोरा सा होता है. खली खली सा.", अर्जुन की बात सुन्न कर विन्नी ने एक फीकी हंसी दी लेकिन आँखें सचमुच बह रही थी. हाथ अब ऊँगली की जगह अर्जुन की हथेली के ऊपर टिक गया था.
"बात इतनी हे नहीं थी अर्जुन. उसके दोस्त ने जो आगे से कहा वो बुरे सपने से भी बुरा था. डर्क उसके साथ मुझे शेयर करने वाला था जैसे वो अपनी गर्लफ्रेंड को डर्क के साथ मेरे सामने शेयर कर रहा था. उस वक़्त मुझे कुछ सुनाई न दिया और मैं रोटी हुई अगले 5 किलोमीटर चल कर हॉस्टल तक आयी. इस से भी ज्यादा बुरी बरसात में जहा गिरने को तोह ये आसमानी बिजली हर तरफ गिर रही थी लेकिन मेरे अंदर हाल उस से भी बुरा था. कितने हे दिन मैं कमरे में फिर से बंद रही और सोचती रही के एक फैंसला मैं खुद करने वाली थी और वही गलत साबित हो गया. मुझे बिलकुल नहीं पता था के दिल टूटना इतना ज्यादा दर्द दे सकता है. मेरी गलती हे क्या थी अर्जुन?", अब विन्नी की आवाज लड़खड़ा चुकी थी और अर्जुन के पास अब कोई रास्ता न था सिवाए उन्हें शांत करने का.
"जो इंसान अगर किसी सच्चे दिल को ठेस पहुँचता है न वो कभी भी एक ाची ज़िन्दगी नहीं जी सकता. आपने तोह इसमें कुछ गलत नहीं किया न और प्यार करना गुनाह या पाप नहीं है लेकिन उतना हे कठोर सच ये है के हम सही प्यार और इंसान की समझ नहीं रखते. मुझे तोह बिलकुल भी नहीं है और मैंने अनगिनत ऐसे फैंसले किये है जिनका परिणाम कही ज्यादा दुखदाई हो सकता है. सबसे जरुरी बात है के आपने खुद को संभाला और जीवन को सही दिशा दी. हर लड़की इतनी मजबूत नहीं होती.", विन्नी अब उसके सीने से लगी थी और अर्जुन एक संरक्षक की तरह उनके सर पर एक हाथ रखे उन्हें हौंसला दे रहा था. कुछ पल वो बस लिपटी रही और फिर धीमी आवाज में बोली.
"मुझे ठण्ड लग रही है अर्जुन. निचे चलते है.", बारिश में हवा का मिलान हो चूका था और इतनी देर से भीगने के बाद जब दोनों खड़े हुए तोह सचमुच रोये खड़े हो गए थे जिस्म पर.
"हाँ चलिए और अब इस बारे में बिलकुल भी मैट सोचना.", अर्जुन उनका हाथ पकडे हुए हे निचे लेके आया तोह दरवाजे पर आ कर रुक गया.
"आप चेंज कर लिए इतने मैं निचे से पानी ले कर आ रहा हु.", अर्जुन की बात सुन्न कर विन्नी दीदी ने बस हाँ में सर हिला दिया. रौशनी में आते हे खुद की हालत देख वो सकपका गयी थी. अलका की वो टीशर्ट उनके जिस्म पर त्वचा की तरह चिपकी थी जिसमे से कठोर चूचक बहार उभरे साफ़ दिख रहे थे. वैसा हे हाल नितम्ब और yoni-pradesh के पास था. सरपट वो बाथरूम में जा घुसी और चिटकनी लगते हे कपडे जिस्म से जुड़ा करती वो आईने में देखने लगी. चेहरा सफ़ेद सा दिख रहा था और पूरे शरीर पर रोये खड़े थे. निप्पल किसी छोटी सी घुंडी के रूप में कठोर हुए अपनी रंगत से अधिक गहरे. गीले बालो से पानी टपकता हुआ फर्श पर गिर रहा था.
'ओह्ह्ह.. सहित. कुछ भी कर बैठ टी हु.', इतना कहती वह कुछ याद आने पर फुहारे की तरफ देखने लगी तोह वह उनके अंगवस्त्र न दिखे. दरवाजे के पीछे लगी हक्क पर एक साफ़ तोलिये के पीछे वो दोनों कपडे सही से टंगे देख थोड़ा परेशां भी हुई लेकिन फिर मुस्कुरा उठी.
'कपडे तोह लेके नहीं आयी और तोलिये में बहार नहीं जाने वाली. पहले हे beda-garak कर चुकी हु.', अभी वह शरीर पांच कर इतना हे बोल रही थी की अर्जुन की आवाज सुनाई पड़ी.
"विन्नी दीदी, ये दरवाजे के हैंडल पर कोमल दीदी की टीशर्ट और लोअर टांग दिया है. आप ले लीजियेगा और मैं मेरे कमरे में हु.", इतना बोल कर अर्जुन दोनों कमरों के बीच वाला दरवाजा बंद करता अपने बिस्टेर पर आ गया था. अपने कपडे वो निचे हे बदल आया था माँ से ले कर. साढ़े 11 बज चुके थे और बरसात अब हलकी होने लगी थी. वही विन्नी के चेहरे पर अलग हे मुस्कराहट आ गयी थी.
'ये लड़का अब पसंद न आने की तोह कोई वजह देता हे नहीं. नहीं रुक पाएगी तू विन्नी जितना मर्जी जोर लगा ले. पता है ये सब गलत हो रहा है लेकिन हल क्या है? शादी तोह डर्क से भी नहीं होने वाली थी और इस से तोह मुमकिन भी नहीं. इस दिल को कौन समझाए अब.', खुद से बतियाती हुई वो टोलिया लपेटे बहार आयी तोह दोनों तरफ से दरवाजे बंद थे. बिना अधोवस्त्र के टीशर्ट और वो ढीला पजामा पहन कर विन्नी अपने बाल सूखने लगी. अर्जुन द्वारा पहल हे एक बंद करने के बावजूद शरीर अभी तक ठंडक महसूस कर रहा था.
"ओह हीरो, अब खोल भी दो ये दरवाजा.", बाल सूखने के बाद विन्नी ने अर्जुन को आवाज लगाई तोह एक मिनट बाद हे वो बीच का रास्ता खुल गया. अर्जुन वापिस अपनी कुर्सी पर जा बैठा और विन्नी दीदी 2 तकिये सर के निचे लगाती बीएड पर पसर गयी. किनारे राखी सफ़ेद चादर अपने शरीर पर लेने के बावजूद ठंडक वैसी हे बरक़रार रही.
"अब तुम रात में Ph.D करोगे क्या?"
"आप बताओ फिर क्या करे? ये आखिरी डायग्राम न 2 दिन से लटका हुआ है.", अर्जुन ने एक नजर विन्नी दीदी को देखा और उनके मासूम से चेहरे पर अकेलेपन के भाव. फिर बिना उनका जवाब सुने बिस्टेर पर अपनी तरफ आ लेता. कमरे में बस वही नाईट लैंप और जीरो की रौशनी थी जो पर्याप्त थी.
"मजाक कर रही थी बाबा. तुम कर लो डायग्राम पूरा, फाइल सबमिट भी करवानी होगी तुम्हे.", उन्होंने अर्जुन को 2 तकिये बीच में रखते देखा तोह उठा कर एक तरफ फेंक दिए. अर्जुन बस मुस्कुरा कर रह गया.
"और ये diwar-vivar नहीं बनानी बीच में. कह देती हु."
"फाइल तोह जुलाई में चेक होगी अब, वो तोह बस समय रहते ख़तम कर रहा था. वैसे परसो तोह आप खुद हे दिवार बना रही थी.", अर्जुन ने इतना कहा तोह विन्नी दीदी सरक कर उसके करीब आ गयी. दुरी मात्रा aadha-pauna फ़ीट थी बीच में.
"वो दिवार उस रात हे हटा दी थी मैंने और बाकी ऊपर छत पर. सच कहु तोह तुम मुझे कभी ेम्बरस फील नहीं करवाते, बेशक मुझसे अनजाने में गलती हो जाती है लेकिन तुम ढकने के बाद भी जाहिर नहीं करते.", अर्जुन समझ गया था के वो क्या ढकने की बात कर रही है.
"गलती नहीं सिर्फ भूल कहते है उसको और ऐसा सबके साथ होता है. मुझे तोह ख़ुशी हुई की आपने मुझे अपना समझा और भरोसा किया. आज भी आप हिचकिचाती है, हेसिताशन की जगह कॉन्फिडेंटली एक्ट करना चाहिए. कभी प्रॉब्लम नहीं होगी पर्सनल ग्राउंड पर. क्योंकि काम के प्रति तोह आप हैं हे बेस्ट.", अर्जुन ने अभी अपनी बात पूरी की हे थी और विन्नी दीदी ने उसके होंठो को तेजी से चूम लिया. बारिश की वजह से दोनों के हे होंठ कुछ उखड से गए थे लेकिन वो 5 सेकंड का स्पर्श बहोत कुछ कर गया.
"ऐसे एक्ट करने को तोह नहीं कहा था.", अर्जुन ने भोलेपन से उनकी तरफ देखा तोह वो शर्म होने के बावजूद खुली आँखों से उसको निहार रही थी.
"मैं तोह परसो रात हे तुम्हे किश करने वाली थी लेकिन तब मुझे बस ये एक अट्रैक्शन जैसा लग रहा था क्योंकि तुम सबका इतना ख़याल रखते हो और परवाह करते हो. हाँ हैंडसम हो इसलिए पहली नजर में तुम्हे देख कर इग्नोर कर दिया था, एक्चुअली जरुरत से ज्यादा हैंडसम हो. लेकिन सबसे अलग बात पता है अर्जुन, मैं तुमसे भाग रही थी और फिर सुकून भी मुझे तुम्हारे पास बैठ कर मिला. ऐसा लगा जैसे एक कन्धा मेरे पास भी है जिस पर मैं भरोसा कर सकती हु.", विन्नी दीदी ने आहिस्ता आहिस्ता अपना वो कोमल हाथ खिसका कर अर्जुन के निचले हाथ पर रख दिया.
"दीदी, सच कहु तोह ये दोनों के लिए ठीक नहीं रहेगा."
"प्रीती से प्यार करते हो इसलिए ऐसा कह रहे हो? मैं बीच में नहीं आ रही अर्जुन और मुझे भी वो प्यार सी लड़की तुम्हारे साथ ाची लगती है. बस मुझे अपने प्यार का थोड़ा सा सहारा दे दो जिस से मैं फिर कभी लड़खड़ा न सकू. उस रात जब मैं तुम्हारी बाहों में थी, मैं सालो बाद सुकून से सो पायी. और तुमने मुझे जैसे गॉड में उठाया था तोह मैं चाहती थी की वो 10 कदम का सफर थोड़ा लम्बा होता तोह बेहतर रहता. हर चाहत पूरी नहीं कर सकते तोह काम से काम अपने सीने से लगा का वैसी हे प्यारी नींद तो सोने दे सकते हो?", इस बार अर्जुन ने हे उन्हें अपनी तरफ खींच कर बगल में लिटा लिया. एक पल तोह शर्मा गयी लेकिन हैरान भी हुई के कितने आराम से अर्जुन ने ये कर दिया था.
"मुझे पता है के आप बीच में नहीं आ रही हो. और आपकी वो उलझन परसो रात हे मैंने सुन्न ली थी. बस कई बार हम वादा कर बैठते है जो निभा नहीं पाते. मैं आपको कमजोर नहीं करना चाहता दीदी. आपको बड़ी बहिन की तरह पूरा हक़ है लेकिन अगर इसकी जगह आपने एक ऐसा भविष्य मांग लिया जो मुमकिन न हो तोह ये सबके साथ विश्वासघात जैसा होगा. उस तरफ आगे बढ़ने पर शायद आप बीच मझदार में न फंस जाओ.", अर्जुन उनके नाम बालो को कान के पास से पीछे करते हुए किसी बड़े की तरह समझा रहा था. विन्नी दीदी को तोह इस एक पल में जैसे सबकुछ मिल गया था.
"थोड़ा सा विश्वासघात कर लेते है, इस बंद कमरे में हम दोनों बस बार्बी एंड केविन बहार तुम विन्नी के मुन्ना. सहित, थोड़ा नौघट साउंड कर रहा है बूत I'm okay विथ आईटी. और अगर कभी भी कुछ प्रॉब्लम हुई तोह विनीता सिंह इस अर्जुन शर्मा पर ऊँगली तक नहीं उठने देगी.", जैसे आँखें मटकते हुए विन्नी दीदी ने दोनों के नाम लिए अर्जुन हंसने लगा.
"पक्की ड्रामेबाज हो आप लेकिन फिर भी मैं कहता हु के इसको लिमिट में रखते है.", अर्जुन ने अब ऊपर वाला हाथ उनकी कमर पर रखते हुए कहा, जहा से टीशर्ट थोड़ी ऊपर हो चुकी थी. इस गरम स्पर्श से हे विन्नी किसी अदृश्य डोर से खींचती अर्जुन के होंठो पर आ रुकी. वो अपने आधार मजबूती से चिपकाये थी लेकिन जैसे उन्हें यही एक चुम्बन का ज्ञान था. लेकिन जिसके साथ वो ऐसा कर रही थी वो जैसे अंतरंग पालो का सर्वज्ञानी था. अर्जुन ने उनके निचले होंठ को मुँह में भर कर आराम से पीने के उपक्रम किया तोह विन्नी को लगा जैसे वो होंठो से उसकी आत्मा अपने अंदर खिंच रहा हो. इस नए अनुभव से जैसे हे विन्नी का मुँह थोड़ा खुला तोह होंठ को छोड़ कर अर्जुन उनकी गुलाबी मीठी जीभ को मुँह में लेते हुए पीने लगा. ये सब बस एक मिनट में चला था और इतने में हे विन्नी की सांसें उखड कर किसी धौंकनी सी तेज चलने लगी.
"ह्ह्हह्हुउउ.. ये क्या था अर्जुन?", बड़ी मासूमियत से इतना पूछ कर वो उसके सीने में सर रखती सब याद सा करने लगी. अर्जुन भी समझता था के बेशक दीदी डर्क को कभी पसंद करती थी लेकिन वो कभी उस हद्द से आगे न गयी जो लड़की को बदल देती है.
"आपने कहा था के आप बार्बी हो तोह केविन ने वैसे हे प्यार दिखाया. लेकिन एक बात पता लग गयी की आपने कुछ भी नहीं सीखा बहार रह कर भी.", अर्जुन उन्हें और ाचे से अपने साथ लगते हुए पीठ सहलाने लगा. विन्नी दीदी को तोह अपने सीने में भी आज अलग अलग तरंगे उठती महसूस हो रही थी. एक तरफ अर्जुन का निर्वस्त्र चौड़ा सीना और खुद वो बस एक पतली सी टीशर्ट में अपना यौवन आजाद किये. लेकिन जो अर्जुन ने कहा उस पर चुप रहना भी मंजूर न हुआ.
"तुमने तोह इसमें Ph.D. कर राखी है पक्का. ऐसे सिर्फ फिल्मो में देखा था लेकिन पता नहीं था के ये ऐसा महसूस होता है. प्रीती के साथ यही सब करते हो क्या?"
"आप खुद हे पूछ लीजियेगा के उसने क्या कुछ सिखाया है मुझे. वैसे सचमुच वो कोई बेवकूफ हे रहा होगा जो आप जैसी प्यारी लड़की को न संभल कर रख पाया. यू अरे रियली ब्यूटीफुल एंड पुरे दीदी.", अर्जुन के स्पर्श में विन्नी ने जरा भी वासना न महसूस की थी. कैसे वो एकाएक इतना शांत था उस गहरे चुम्बन के बाद. खुद हे ऊपर सरकते हुए वो जब अर्जुन के चेहरे तक आयी तोह नरम गुब्बारों ने अलग हे एहसास पाया उस रगड़ से. जैसे तैसे काबू करती विन्नी दीदी उसकी भूरी आँखों को देखने लगी.
"तुम हो क्या चीज जरा बताओगे.? एक जवान लड़की खुद तुम्हारे साथ लिपटी हुई है और तुम हो के तारीफ हे किये जा रहे हो. मैं इतनी बुरी भी नहीं दिखती शायद."
"आपको तोह मैंने पूरा हे देखा हुआ है और चाह कर भी भुला नहीं सकता इस ख़ूबसूरती को. लेकिन क्या ये ठीक रहेगा की सबकुछ ek-sath हे हो जाये.?", अर्जुन ने जिस तरह वो पल याद दिलवाया था विन्नी ने शरमाते हुए अपना गाल उसके होंठो से सत्ता दिए.
"बहोत गंदे हो तुम. क्या सचमुच तुमने मुझे पूरा देखा था.?", वो नजरे नीचे किये वैसे हे लेती थी. अर्जुन की गरम साँसे गाल से टकराती हर तरफ एक नयी आग लगाने लगी.
"सचमुच पूरा. आप हसीं हो इसलिए तोह कह रहा था के वो बेवकूफ हे होगा जो आपको न देख पाया. अंदर और ज्यादा अंदर से. उमाह.", गाल पर अपने होंठ दबाते हुए अर्जुन ने पहली बार अपना हाथ कमर से खिसकते हुए नरम लचीले पेट पर फिराया. कांच पर गिरे पानी सी फिसलन को दोनों ने हे एहसास किया. विन्नी का चेहरा मस्ती में थोड़ा ऊपर हुआ और इस बार वो खुद अपने सुर्ख होंठो को अर्जुन से जोड़ती रेगिस्तान के प्यासे सी पीने लगी. वो मरदाना हाथ कभी पेट की तलहटी पर जाता तोह कभी घुमावदार नाभि पर. एक तान खुद हे अर्जुन के ऊपर रखती वो हाथ को दबाने लगी थी.
"हम गलत कर रहे है फिर भी ये गलत नहीं लग रहा Arjun..aahh.. सच कहु तोह कुछ गलत नहीं बस बेनाम बेवजह के बंधन है. तुम मुझे मुक्त कर दो इन बंधनो से. ये सोच कर हे की मैं आजाद होना चाहती हु.", विन्नी ने वो हाथ खुद हे अंदर सरकते हुए अपने एक उभार पर टिका दिया. इतना सुकून और ख़ास एहसास था ये उसके लिए की वो अर्जुन के साथ इस सफर पर आगे जाना चाहती थी. वही अर्जुन भी उस नरम उभर की संरचना का जायजा लेता बड़े इत्मीनान से अपनी बड़ी दीदी के होंठो को चूमता उस वक्ष को सहलाने लगा. ये सतांन अछूते और बिलकुल कोरे थे, 24 की उम्र के बावजूद.
"आज सबकुछ मुमकिन नहीं होगा दीदी. आप बस मेरे साथ प्यार से चिपक कर आराम कीजिये. हाँ हम दोनों कपडे उतार सकते है जिस से आपको ऐसा नहीं लगेगा की मैं आगे नहीं बढ़ना चाहता. बस इस सबके लिए समय काम भी है और सुबह आप फंस जाओगी.", अर्जुन ने उनकी दुविधा दूर करते हुए अपना पजामा हटा दिए. विन्नी जहा ये सोच रहे थी की अर्जुन बीच मझदार में छोड़ कर जा रहा है वही अब वो उस झूलते हुए 9 इंच के असाधारण लिंग को देख सकते में आ गए.
"अरे यू रियल?"
"जस्ट कलम डाउन. आप ये ले सकती है लेकिन साढ़े 12 हो चुके है अभी और फिर जानती है न के आपको घर भी जाना है कल. थोड़ा मुश्किल हो जायेगा.", अर्जुन ने खुद हे वो टीशर्ट विन्नी दीदी के जिस्म से अलग करते हुए दोनों गुब्बारों को बरी बारी से चूम लिया.
"आठ.. सेह लुंगी यार. बड़ा तोह सचमुच बहुत है."
"आपको प्यार से हे सुलाऊँगा दीदी. आज बस फील कीजिये.", अर्जुन ने सुविधा के लिए वो जीरो बल्ब भी बंद कर दिया. कुछ हे पल बाद विन्नी उस सफ़ेद चादर के भीतर निर्वस्त्र लिपटी थी अर्जुन से और जांघो के बीच उस कामदण्ड की 2-3 रगड़ ने हे उन्हें पागल कर दिया था.
"ोुछ.. ये क्या सेंसेशंस है अर्जुन.. आह्हः..", अर्जुन के शरीर की गर्मी और छोटे छोटे चुम्बन के साथ वो आज पहली बार लिंग को भी अपने यौवन कुंड पर दस्तक देते महसूस कर रही थी. अर्जुन ने उन्हें निराश न करते हुए अपने साथ लगाए हे 10-12 बार दबा कर उस अक्षत छूट के होंठो पर अपना विकराल लिंग फिराया तोह उत्तेजजना में विन्नी की हलकी चीख हे निकल गयी. यौनकुंड ने इतनी जल्दी अपना रस बहार उड़ेल दिया था. विन्नी दीदी बेचारगी से अर्जुन को लैंप की रौशनी में देख रही थी.
"ाःह.. ये क्या था अर्जुन? कुछ किया भी नहीं और.. आठ.. I'm स्टिल लॉकिंग एंड थी गूसबम्प्स."
"अब आपको ाचे से नींद आएगी दीदी. जरुरी नहीं के हम वो सब हे करे. ये तब ाचा लगेगा जब कुछ और दीवारे भी देह जाये."
"लव यू अर्जुन. यू अरे रियली ओने ड्रीम गाए एंड I'm हैप्पी तहत ी ऍम हेरे, विथ यू. उमाठ. स्लीप वेल केविन.", एक दीर्घ चुम्बन करती विन्नी ने अपने मांसल चुके अर्जुन के साथ लगते हुए आँखें बंद कर ली.
"लव यू लिटिल बार्बी. आप आराम कीजिये, मैं साथ हु.", अर्जुन ने माथे पर होंठ लगते हुए उन्हें एहसास करवाया के वो इस बंद कमरे में उनसे बड़ा है और परवाह करने वाला भी. चाहता तोह वो आज सभी हद्द पर कर सकता था लेकिन अब बिना ऋतू या कोमल दीदी की मर्जी के वह इस घर में ऐसा कुछ नहीं करने वाला था. और कैसे वो ठेस पंहुचा सकता था खुदको? विन्नी दीदी आज भावनाओ के प्रभाव में शायद वो सब कर जाती जो नयी सुबह एक पश्चाताप का रूप ले सकती थी. ऐसे हे उन्हें बाहो में लिए वो नींद के आगोश में जाने लगा था. लिंग अपने सामान्य अकार में आता बता गया के वासना पर काबू करना अर्जुन सीख रहा है.
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"दोनों लाश वैसे हे दिखानी है जैसे निर्देश दिए थे. लग्न चाहिए के शराब के बाद झगड़ा हुआ है.", संजीव ने इतनी हिदायत दी थी की अँधेरे में 2 लाशो को उन हवलदारों ने बड़ी म्हणत से एक आपसी रंजिश का रूप दे दिया था. खेतो के बीच सबकुछ सही तरीके से व्यवस्थित करके संजीव अब चलता हुआ अपने उमेद चाचा के पास आ खड़ा हुआ.
"लो जी, हो गया सब तैयार. हूटर हमारे जाते हे बजेगा. वैसे मामला समझ नहीं आया चाचा.", संजीव उनकी कार में बैठ कर सिग्रत्ती सुलगता हुआ बोलै तोह उमेद सिंह मुस्कुराने लगा.
"लल्ला, अब न भोले को भूतनाथ उसकी बेटी बनाये तोह ज्यादा बेहतर होगा. बात तोह मुझे भी kachi-pakki पता है इसलिए एक की गर्दन तोड़ी और दूसरे को गोली मारी. मां हो के इसने मेरी लाड़ली का हाथ पकड़ा, अपनी भांजी का तोह बात इतनी तोह नहीं होने वाली. चल दारू पीते है हवेली पे और इनको बोल के गाँव में शोर मचाये.", उमेद सिंह की बात सुन्न कर संजीव ने हँसते हुए बहार 5 मिनट का इशारा किया और वो दोनों यहाँ से निकल गए.
मनबीर और चंदरभान सिंह शराब पीने के बाद आपस में लड़ के मारे गए. गाँव से बहार, पूलि के पास दोनों की लाशें गश्ती पुलिस ने बरामद की. पूरी रिपोर्ट पोस्टमॉर्टम और जांच के बाद. गहरी स्याह रात में बारिश ने भी अपना काम बखूबी किया था जो दो निर्जीव जिस्मो को मटियामेट करके बचे खूहे सबूत भी मिटा गयी थी. रात एक बजे पुलिस जीप ने एक खेतवाले से पहचान करवाने के बाद जब स्वर्गीय पांच ईश्वर सिंह का दरवाजा खटखटाया तोह लाजवंती के पाँव टेल जमीन खिसक गयी.
"जी चंदरभान सिंह आपके भाई के सुपुत्र है?"
"हांजी. क्या हुआ? वो आज हे आया है यहाँ कुछ दिन रहने के लिए. कुछ गड़बड़ की है क्या?"
"आया था कहे तोह बेहतर रहेगा. पहचान होने पर हे आपके पास आये. चंदरभान और एक अज्ञात व्यक्ति के बीच मुठभेड़ में दोनों की मृत्यु हो गयी है. घर में कोई पुरुष है तोह वो साथ चले नहीं तोह शिनाख्त के लिए आप सुबह सरकारी हॉस्पिटल आ सकती है क्योंकि फ़िलहाल महिला पुलिस हमारे साथ नहीं है.", कांस्टेबल ने पूरी बात बताई तोह लाजवंती की हालत हे ख़राब हो गयी. वो कांस्टेबल चला गया था लेकिन लाजवंती तोह बहार की तरफ जैसे शुन्य में देख रही थी. होश आया तोह बिना सोचे समझे हवेली का नंबर मिला दिया. आँखों से आंसू बह रहे थे लेकिन बुरी किस्मत ये थी की आज फ़ोन भी खराब था.
'जब सब रस्ते बंद होते है तोह फिर एक साथ हे होते है.', इतना कहती वो पैदल हे हवेली की और निकल चली, बिना परवाह किये कीचड और अँधेरे की. 15 मिनट में वो भारी कदमो के साथ हवेली के द्वार पहुंची थी की चेतना वापिस आयी. कैसे कहे और क्या कहे? लेकिन कुछ तोह कहना हे था क्योंकि अब उसकी बेटी हे तोह एक सहारा थी इस गाँव में उसका. सांकल खड़कते हुए दरवाजा बजाय तोह 2-3 मिनट बाद बिजेन्दर ने हे वो छोटा द्वार खोला.
"काकी इतनी रात को? सब खैरियत तोह है?", उन्हें अंदर लता वो पूछने लगा. चारपाई उसकी भी गलियारे में लगी थी जहा बारिश से भीग भी नहीं सकता था लेकिन घर पर नजर भी रख सकता था.
"बीटा वो चन्दर घर पे बोल के आया था के यहाँ आज महफ़िल है लेकिन उसके बाद पुलिस को उसकी लाश मिली वो भी गाँव से बहार खेतो में.", बिजेन्दर इतना सुनते हे भोचक्का रह गया. रह रह कर कुछ बुँदे गिर रही थी लेकिन उनसे परे दोनों गलियारे तक आ पहुंचे और इधर मधुलता के साथ साथ गुड्डी, ऋचा और बबिता भी यहाँ आ गयी थी.
"नानी, इतनी रात में आप यहाँ?", ऋचा ने हे सवाल किया था रोटी हुई लाजवंती से.
"मुन्नी, चन्दर हमारे बीच न रहा. पुलिस अभी बता कर गयी है. उसकी लाश सरकारी हॉस्पिटल में है बेटी, मेरे साथ चल के ले आ उसको.", फफकती हुई लाजवंती की बात सुन्न कर मधुलता, गुड्डी के चेहरे के तोह रंग हे उड़द गए थे. लेकिन मुस्कुराती हुई ऋचा को देख बिजेन्दर कुछ शांत हे रहा.
"माँ ये सब कैसे हुआ? भैया यही से तोह 4 घंटे पहले गए थे.", लता की तोह आप रुलाई निकलने लगी थी.
"जो होगा नानी वो सुबह हे होगा. रात तोह पोस्टमॉर्टम करके वो डेड बॉडी देने से रहे. आप यहाँ आराम से सो जाओ सुबह चली जाना माँ को लेके.", ऋचा ने तोह ये तक न कहा के वो चलेगी साथ. स्पष्ट ना.
"क्या बक्ति है तू? मेरा भाई मारा गया, तेरा मां और तू ऐसी बात कर रही है. माँ मई शंकर का नंबर मिलती हु, वो कुछ करेंगे."
"हाँ बेटी, शंकर सरकारी बड़ा डॉक्टर है, वो सब कर देगा.", लाजवंती ने अभी इतना हे कहा था के ऋचा ने बात काट दी.
"ऐसी गलती भी मैट करना माँ. नहीं तोह नंबर मैं मिलाऊँगी इस बार शंकर चाचा का. और नानी सुना है माँ का बहोत गहरा प्यार था इस मां के साथ. चुपचाप इस हवेली से वापिस अपने घर चली जाओ. और ये अगर उस शैतान के संस्कार पर भी आयी तोह फिर वही रहेंगी. गूडनिघत और बिजेन्दर भैया गेट तक छोड़ आये नानी को आप, माँ जाना चाहे तोह उन्हें भी.", ऋचा इतना बोल कर अंदर चली गयी लेकिन बबिता की ऐसे मौके पर भी हंसी छूट गयी.
"बिज्जू छोड़ आ भाई, दादी जाग गयी तोह आज दुलारी 2 बार चालेगी. ऋचा शायद अपने से ज्यादा जान गयी कुछ.", इस बात का असर तुरंत हे हुआ और गर्दन झुकाये लाजवंती बहार की और चलने लगी.
"काकी, रात यही रहो. सवेरे मैं भिजवा दूंगा आपको हॉस्पिटल. चची ले जाओ अपने साथ और ऐसा कुछ न करना के जिसका दुःख हो बाद में.", बिजेन्दर ने बड़प्पन दिखते हुए उन्हें घर के भीतर किया तोह भीगी आँखों से लाजवंती अपनी बेटी के साथ उसके कमरे में चली गयी. ऋचा अपनी ताई सुशीला के पास आ गयी थी और पीछे पीछे बबिता भी.
"इसने सीप लगा दी माँ पक्की वाली. या छोरी शायद कोई बड़ा राज जान गयी है और मैंने लगे है अगर तू इसके साथ न रही तोह या मारी जाएगी.", हंसी से बात शुरू करते हुए बबिता ने एकदम हे बड़ी बात कह दी थी. सुशीला सिंह न हिम्मत होते हुए भी बिस्टेर पर बैठ गयी थी.
"ये रात कोई मजाक तोह नहीं कर रही तू बबिता? बिजेन्दर कहा है और ऋचा तू इधर आ.", सुशीला ने तुरंत हे ऋचा को बगल में बुला लिया.
"मैं इधर हे हु माँ, वो बात ऐसी है के मुन्नी काकी का ममेरा भाई चन्दर मारा गया है ऐसा पुलिस ने बताया है."
"तोह जाना चाहिए न मुन्नी को और ऋचा को."
"ताई, शांत रहो. इस हवेली से जो भी उधर गया न तोह सच कहती हु पापा से बुरा कोई न होगा फिर. उमेद चाचा से तोह आप ru-ba-ru हो न, उन्होंने हे दोनों को ऊपर पहुंचाया है क्योंकि उस शैतान ने मेरे हाथ लगाया था. लेकिन कोई कुछ नहीं बोलेगा, हिसाब हो चूका है.", ऋचा ने अपनी ताई को जबरदस्ती साथ लगते हुए लेता लिया तोह बिजेन्दर ने भी सहमति जाता दी.
"उमेद न इज्जत पे बात आ जाये तोह फिर सोचता न कुछ मेरी बची. वो गोली की आवाज सबने सुनी थी और माँ जी को भी पता है के किसी ने तेरे साथ कुछ गलत हे किया होआ. शंकर अलग है, वह गाँव के आग लगा देगा अगर तुझे किसी ने हाथ लगाया. चल अब सो जा, ऐसी बहोत गोलियां देखि है हमने.", सुशीला सिंह ने भी ख़ामोशी से अपनी भतीजी को गले लगते हुए दूसरी तरफ बबिता को सोने का इशारा किया. आज रात कुछ लोगो के लिए लम्बी होने वाली थी.
प्रभाव - 3
"कहा आवारागर्दी करता घूम रहा है तू?", घर के अंदर अभी आया हे था अर्जुन की ऋतू ने थोड़े तीखे अंदाज में स्वागत किया. वक़्त से थोड़ा लेट होने पर स्वागत तोह ऐसे हे होता था उसका लेकिन ये बात उसको दादी हे कहती थी. और कौशल्या जी, जो किसी काम से आँगन में थी वो भी ऋतू की ऊँची आवाज सुन्न कर वही देखने लगी.
"वो यही पास में था लेकिन टाइम का पता नहीं चला सॉरी.", अर्जुन कभी ऋतू से बहस नहीं करता था क्योंकि वो बड़ी थी और उस से बेइंतेहा प्यार करती थी.
"कार की चाबी इधर ला और आइंदा 8 बजे घर मतलब घर. तेरे पास मोटरसाइकिल और साइकिल है अगर अकेले हे जाना हो तोह. कार बता कर और सिर्फ जब जरुरी हो तभी. चल जा के mooh-hath धो मैं खाना लगाती हु.", अर्जुन ने भी जेब से कार की चाबी उन्हें थमा दी जिसको लेने के बाद वो खुद हे अर्जुन के लिए नलका चलने लगी. हाथ मुँह धोने के बाद टोलिया भी ऋतू दीदी ने हे दिया और रसोई में चली गयी. कुछ सोच कर कौशल्या जी खाने की मेज पर हे बैठ गयी जहा फ़िलहाल सिर्फ अर्जुन हे था.
"तू इतना भी छोटा नहीं है उस से फिर कभी कुछ बोलता क्यों नहीं पलट कर?", कौशल्या जी ने बात बड़े आराम से कही थी जो अर्जुन के सिवा सिर्फ ऋतू को सुनाई दी, जो खम्बे के पास कड़ी प्लेट साफ़ कर रही थी.
"छोटा तोह अगर 1 मिनट भी होता तब भी वो बड़ी हे रहती दादी. गलती तोह मेरी हे है के मैं देर से आया और उन्हें भी डर लगता है क्योंकि कार लेके गया था.", अर्जुन ने गिलास में पानी दाल कर अपनी दादी की तरफ बढ़ाया जिनके हाथ में अजवाइन थी.
"कार जब ली है तोह चलाएगा हे, तभी तोह हाथ साफ़ होगा. और तेरी कार के अगर कुछ होता है तोह उसको टेंशन क्यों हुई भला?", कौशल्या जी कहने को तोह दिखा रही थी की वो अर्जुन का साथ दे रही है और ऋतू की बात का बुरा लगा उन्हें. लेकिन वो ऐसे हे कोई बात नहीं करती थी और वो भी ऋतू के लिए जो उनकी जान थी.
"कार तोह और आ जाएगी दादी लेकिन मैं? मुझे कुछ हुआ तोह फिर? बस उनकी यही चिंता है और गलती से मैं बता कर भी नहीं गया था. सॉरी और दीदी नाराज नहीं है वो बस मुझे ले कर थोड़ा ज्यादा घबरा जाती है जैसे आप खुद. आप भी तोह वैसी हे हो जो जानते हुए वही सवाल कर रही हो क्योंकि ये सब तोह आप कहने वाली थी अगर ऋतू दीदी न कहती.", कौशल्या जी मुस्कुराती हुई कड़ी हो गयी. पानी का गिलास अंदर ले जाने से पहले उन्होंने अपनी लाड़ली पौती को गले लगते हुए माथा चूमा और अनजाने हे मुँह से अनचाही इत्छा निकल gayi.'Shivji जोड़ी बनाये रखे' लेकिन ये बात जैसे वो बुदबुदा गयी थी बस.
"चल खाना खा ले उसके बाद रुपाली के साथ थोड़ा पढ़ लेना.", ऋतू दीदी ने खाना लगाया हे था और विन्नी दीदी के साथ आरती, तारा और अलका भी आ बैठी. विन्नी ने तोह आते हे अर्जुन के बराबर वाली सीट हथिया ली थी और दूसरी तरफ आरती.
"आज कोई padhai-vadhai नहीं बोल देती हु. ये आज मेरे साथ टाइम स्पेंड करेगा फिर चाहे फिल्म देख के या फिर बातें कर के.", विन्नी दीदी ने अर्जुन के कंधे पर हाथ रखते हुए ऋतू से कहा तोह वो बस मुस्कुरा दी.
"हाँ ठीक है कर लो आप भी इसके साथ टाइम स्पेंड फिर कल इसके प्यारे भैया आ जायेंगे तोह ये किसी के पास नहीं बैठने वाला.", अलका ने जैसे हे संजीव भैया का जीकर किया तोह अर्जुन के चेहरे पर चमक आ गयी.
"वाओ. ये तोह सचमुच ऐसे खुश हो रहा है जैसे भैया न हुए कोई कुम्भ का मेला हो गया. कोई बात नहीं वैसे भी कल मैंने वापिस जाना है तोह आज इस मुन्ना की हे टांग खिंचाई कर लेते है.", विन्नी दीदी ने भी एक प्लेट में खाना डालने के साथ हे उसको आरती की तरफ बढ़ा दिया. और अलका ने ऐसा हे तारा के लिए किया. फिर अपना भी खाना लगते हुए सभी हलकी फुलकी बातें करते भोजन का लुत्फ़ लेने लगे लेकिन पंडित जी के कमरे में माहौल थोड़ा अलग था अभी.
"खुश भी हो और थोड़ा थोड़ा परेशां भी. थानेदारनी जी ऐसी रंगत आज पहली बार देखने को मिल रही है.", रामेश्वर जी आज थकान महसूस कर रहे थे तोह जल्दी हे बिस्टेर पर आ गए थे. अपनी बीवी को देख उन्होंने सवाल कर हे लिया.
"दिमाग और दिल कई बार अलग अलग चल पड़ते है तोह चौराहा बन्न जाता है जी. तब बात 2 नहीं 4 तरफ़ा हो जाती है और आज मेरे से भी यही हो गया.", कौशल्या जी ने अजवाइन और पानी अपने पति को देने के बाद हाथ कपडे से साफ़ किये और बिस्टेर के दूसरी तरफ जाने से पहले जीरो की रौशनी कर दी बड़ी तुबे बंद करते हुए.
"धर्मसंकट तोह कोई बड़ी बात नहीं है कौशल्या. एक तिनके के 2 हो जाये तोह roop-rekha बदलना स्वाभाविक हे है. अब कहो के दिमाग और दिल में ऐसा कौनसा द्वन्द चल गया जिसमे दिल को जीता रही हो और दिमाग को पीछे भी नहीं हटा पा रही.", पंडित जी भी गहरी जानकारी रखते थे इंसान और भावनाओ की.
"ये सब न आपकी हे कारस्तानी है जी और आपके कपूत की. मेरे दिमाग में जाने कैसे कैसे ख्याल बैठा दिए है आप लोगो ने और मैं खुद अनजाने हे प्रभावित हुए जा रही हु.", हलकी नाराजगी से कौशल्या जी ने इतना कहा और तकिया ठीक करके करवट के बल लेट गयी.
"देखो कौशल्या कोई भी किसी के मैं को नहीं बदल सकता अगर सामने वाला स्वीकार न करे. और इतना घुमा फिर कर बात क्यों कर रही हो, सीधा कहो के अर्जुन और मैंने ऐसा क्या कर दिया है जिसका तुम पर dush-prabhav हो रहा है?"
"मैंने कब कहा के ये गलत प्रभाव है? बस ये लड़की न उसके साथ वैसे हे बर्ताव करती है जैसे माँ या प्रेमिका हो उसकी. अर्जुन सामने से कभी जवाब तक नहीं देता चाहे बात वो कितनी बड़ी हे क्यों न कह दे. किसी और का होना न होना भी नहीं देखती.", अब रामेश्वर जी भी थोड़े गंभीर हो गए थे इतना सुन्न कर.
"जब शंकर ने कहा था के मैं अर्जुन को सांड बना रहा हु जो कल को मुझे हे भरी पड़ सकता है, तोह तुम्हे ध्यान है मैंने क्या कहा था? सांड कितना भी बड़ा क्यों न हो लेकिन वो एक मामूली सी रस्सी में बांध जाता है अगर दूसरा सीरा उसको प्यार करने वाले के हाथ में हो. तुम इसको झुठला नहीं सकती कौशल्या के अर्जुन को निस्वार्थ सिर्फ ऋतू हे नियंत्रित रखती है.", रामेश्वर जी की बात सुन्न कर उनकी धर्मपत्नी जी का स्वर भी थोड़ा सा चिंतित सा हो गया था.
"जी आप जानते हो के बचो में मैंने कभी फरक नहीं किया लेकिन ऋतू मेरे लिए भी ख़ास है. उसका एक पक्ष जो सबके सामने है वो बिलकुल अर्जुन जैसा है या उस से भी बेहतर. लक्ष्य के लिए हमेशा गंभीर, मेहनती, कड़े निर्णय लेने वाली और मर्यादित श्रेष्ठ संतान सा. वही अर्जुन के लिए वो इस सब से उलट है जैसे वो खुद हे अर्जुन को श्रेष्ठ बनाना चाहती है लेकिन सिर्फ अपने लिए.", इतनी गहरी बातें और अपनी बीवी की चिंता देख पंडित जी परिचित अंदाज में मुस्कुरा दिए.
"तुम वैसा नहीं चाहती क्या कौशल्या?", कौशल्या जी तोह ऐसे चौंक गयी जैसे उनकी चोरी पकड़ी गयी हो लेकिन रामेश्वर जी ने खुद हे बात आगे कही.
"देखो वो उसको बेहतर बना रही है लेकिन तुमने अगर ध्यान दिया हो तोह ऋतू ने अपने व्यक्तित्व के पहले पक्ष के साथ समझौता नहीं किया है. आज सवेरे भी अर्जुन की हालत तुम्हारे सामने हे थी की ऋतू उसको कही बेहतर निखारना जानती है. लेकिन ये एक अंदरूनी पक्ष जिस से तुम्हे डर या चिंता हो रही है तोह मेरी सलाह यही है के सब वक़्त पर छोड़ दो."
"आप ऐसे कैसे कह सकते हो जी की सब वक़्त पर छोड़ दो? वक़्त आने पर अपने हे पौटे का ब्याह पौती के साथ करवा सकते हो आप? मुझे तोह ये होता दिख रहा है क्योंकि अर्जुन की नजरो में ऋतू के लिए सिर्फ प्यार है और कोई सवाल तक नहीं. इतनी दुनिया तोह मैंने भी देखि है जो बता न सकू के ये प्यार कैसा है."
"तुम आशीर्वाद डौगी तोह मैं भी हाथ पीछे नहीं रखने वाला बस फिर अपनी ज़िन्दगी के निर्णय उन्हें हे लेने होंगे, सिर्फ उन्हें.", रामेश्वर जी को जैसे कुछ हद्द तक भविष्य पता था जो इतना सरल भी न था लेकिन हल निकला जा सकता था.
"यही गलती हुई है जी अभी थोड़ी देर पहले. दिल से अपने आप हे निकल गया के भगवन उनकी जोड़ी बनाये रखे और अब खुद पर हे गुस्सा आ रहा है एक ये मैं कैसे कर सकती हु. गलत में गलत होना समझदारी नहीं है."
"तुमने इस से भी बड़े बड़े आशीर्वाद और कस्मे दी है कौशल्या और जबतक तुम्हारा साथ है मैं सबकुछ कर सकता हु क्योंकि ये परिवार तुमने बसाया है. मैं खुद इसका हिस्सा हु क्योंकि इन्हे तुमने बिखरने देने की जगह मजबूती से बांधे रखा है. कीमत कई बार बहोत बड़ी चुकानी पड़ी लेकिन तुमने कुछ भी बिखरने नहीं दिया. और अब भी नहीं होने डौगी ये मुझे विश्वास है.", अपने पति के इस जवाब पर कौशल्या जी ने कितने हे वर्षो बाद आज उनके गाल को छु लिया था.
"Putra-moh में आपने भी बहुत कुछ किया है जी तोह ये दिन भी साथ मिल कर हे देखेंगे. बस अगर मैं पहले चली जाऊ तोह अर्जुन को अधूरा मैट रहने देना. बहोत सारे राज ऐसे है जो समय रहते हे बस ख़तम हो जाए और शंकर भी आपके जैसे निर्णय ले सके. रेखा मुझ से कही बेहतर है और वो अर्जुन को रोके रहेगी."
"तुम अभी न जाने लगी थानेदारनी. जो बात मुँह से निकली है वो मेरे साथ पूरी करना बस क्योंकि संतुलन तोह दोनों के साथ रहने से होगा. बाकी शंकर का दिल भी बहोत कुछ समझता है बस वो जाहिर नहीं करता. दुविधा में है के अभी बेटे को प्यार करे या बाद में...", रामेश्वर जी ने बात अधूरी छोड़ कर एक मुस्कराहट दी तोह कौशल्या जी भी हंसने लगी.
"हाँ जलोकदा है वो पूरा और हो भी क्यों न, बाप ने सबकुछ तोह उसको बिना मांगे दे दिया. अब दिक्कत हो रही है तोह या तोह बात करे या चुपचाप रहे. चलो आप आराम करो जी, मैं एक चक्कर लगा आती हु.", कौशल्या जी ने खड़े होने से पहले अपने पति को कमर तक चादर दी और बहार चली आयी पीछे दरवाजा वापिस बंद करके.
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हवेली पर लड़की के साथ साथ लड़के का भी ब्याह था और एक प्रतिष्ठा के साथ साथ ये अलग परंपरा भी थी जहा मर्दो के लिए मदिरापान का आयोजन भी होता था. बिजेन्दर ने तोह मन भी किया था अपनी माँ और दादी को इस सबके लिए लेकिन चंद्रो देवी ने खुद हे कहा के इस अवसर पर वो ये परंपरा भी शामिल रखेंगी. हवेली के सामने हे इनका ये आधा एकड़ का चारदीवारी किया नोहरा था जहा उन्होंने आयोजन के लिया बिजेन्दर को आदेश दिया.
7 बजे के बाद हे हलकी रौशनी में उस जगह desi-angrezi की छोटी छोटी महफ़िल जमने लगी जो बाद में 50 लोगो की एक बड़ी महफ़िल बन चुकी थी. Murga-mutton के साथ साथ हल्का संगीत भी डेक से बज रहा था और सब अपने अपने हिसाब से पीते हुए हवेली में होने वाले विवाह की शुभकामनाये दे रहे थे. 8 बजे के करीब उमेद सिंह इस बड़े नोहरे में चले आये तोह नौजवान लड़के संकोचवश 1-2 बोतल ले कर अपनी महफ़िल गाँव से बहार हे ले गए.
"सब ठीकठाक है न यहाँ? कोई कमी पेशी.", उमेद सिंह के इतना बोलते हे कुछ लोग हाथ जोड़ कर खड़े हो गए और बिजेन्दर भी उनके पास चला आया.
"न काका, सब ठीक है. मुझे पता न था के आपने ये सब भी मंगवा रखा है."
"बिजेन्दर बीटा, अब बरात में तोह सिर्फ तू खुश होवेगा. यहाँ इन्हे भी तोह खुश करना है.", उमेद काका की बात सुन्न कर बिजेन्दर लड़की सा शर्माने लगा तोह बाकी सब भी हंसने लगे. आधा घंटा वह लोगो से बतलाने के बाद उमेद अपने साथ हे बिजेन्दर को लिए सामने हवेली आ गए. बिजेन्दर तोह वैसे भी शराब से दूर हे रहता था और साथ हे कल के दिन जो जरुरी काम थे उनकी चर्चा भी करनी थी. उधर नोहरे में भी 2 घंटे में लगभग सभी लोग टुन्न हो कर अपने अपने घर चले गए थे. बिजेन्दर को दिल से धन्यवाद् करते हुए और उमेद सिंह सिग्रत्ते पीने हवेली की छत्त पर. चंद्रो देवी के सामने सिर्फ शंकर की हे इतनी हिम्मत थी या उमेद को कुछ झिझक थी.
"thak-thak." ये आवाज सांकल की थी जो किसी ने दरवाजे पर बजे थी. बिजेन्दर नहाने गया था और उमेद ऊपर थे. मधुलता के कहने पर ऋचा ने दरवाजा खोला तोह सामने खड़े व्यक्ति को हाथ जोड़ कर नमस्ते करती हुई बोली.
"जी मां, कोई काम था क्या इतनी रात को?", ये व्यक्ति था चंदरभान, ऋचा का मां और लता का ममेरा भाई. जो एक बार ऋचा को निहारने के बाद बोलै.
"ऋचा बिटिया, ठंडा पानी न है उधर और 1 खास दोस्त बैठा है तोह बस एक गड़वी ठंडा पानी भिजवा दे. फेर हम भी अपने घर चले.", चंदरभान लड़की का मां था और उसी हक़ से उसने अपनी बात कही थी. ऋचा भी उस छोटे दरवाजे को वैसा खुला छोड़ कर अंदर चली गयी. गुड्डी ताई को बता कर वो वापिस गेट पर आयी तोह मां वह नहीं दिखा. कुछ सोच कर वो 10 कदम दूर नोहरे की तरफ चल दी.
"मां, ये लो पानी. बर्फ भी दाल दी है इसमें.", हलकी आवाज में ऋचा ने गेट के पास से हे आवाज दी तोह सामने लकड़ी के तख़्त पर बैठा वो व्यक्ति बोलै.
"बिटिया, चन्दर हल्का होने गया है. पानी यहाँ रख दे मेरे हाथ मैले है थोड़े.", ऋचा हवेली की बेटी थी तोह निडर भी थी क्योंकि सभी उनके परिवार से नजरे नीची करके बात करते थे. लेकिन शायद उसको भी नहीं पता था के इस शराब ने तोह ाचे ाचे को बेइज्जत्त कर छोड़ा है और कितने हे दुनिया से जा चुके इसकी जड़ में आ कर. कदम नोहरे में रखती वो इस हलके अँधेरे की तरफ चल दी. ये व्यक्ति भी उसके हे मां की उम्र का था और अभी भी मुर्गे की टांग से बचा खुचा मंच उधेड़ने में व्यस्त था.
"ऋचा बिटिया ये लट्टू दिक्कत कर रहा था इसलिए बंद कर दिया. तू पानी ले आयी?", लोहे के गेट से अंदर आते चंदरभान ने लौटा रखती ऋचा को देखा तोह अँधेरे की वजह बताई. ाचे सुरूर में थे ये दोनों व्यक्ति जिस वजह से अब ऋचा को चलना हे उचित लगा. लेकिन सामने से चंदरभान ने आते हे भांजी के कंदेह पर हाथ रख दिया.
"ये भी तेरा मां हे लगता है ऋचा और मनबीर ये अपनी मुन्नी की बेटी है मेरी भांजी.", इस बात पर पहली बार व्यक्ति ने थोड़ा गौर से ऋचा को देखने की कोशिश की. बहार से आती रौशनी में हल्का चेहरा और शरीर देखा जा सकता था.
"हम्म्म. चोखी बात है चन्दर और बीत्या तोह माँ से भी सुथरी है. पहले न देख्या बिटिया को?", अब ऋचा भी मज़बूरी में ठिठक गयी थी लेकिन किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा माँ को सुन्दर कहना उसको जांचा नहीं.
"देख्या तोह मैंने भी आज हे है भाई 4-5 साल बाद. बहार पढ़ती है न तोह नजर न आयी. अब गाँव में है और मैं भी कुछ दिन इधर हे हु तोह भांजी को मां का पूरा प्यार दूंगा.", ये कहते हुए चंदरभान का हाथ फिसल कर कंधे से ऋचा के नितम्ब को रगड़ गया. शरीर में ये कैसी झरझरी सी दौड़ गयी थी. मां हो कर कैसे वो उसके साथ ये कर सकता था लेकिन सदमा तोह मनबीर की बात सुनकर लगा.
"मुन्नी वाला प्यार तोह बस पीछे पीछे था भाई, ये भांजी है तोह इसको पूरा देना पड़ेगा.", ऋचा नादान न थी जो ऐसी द्विअर्थी बातें न समझ सकती और उसको शांत खड़े देख चन्दर ने हद्द लांघते हुए जाएंगे के बीच हे पीछे से हाथ दाल कर दबा दिया.
"मन न करेगी मेरी भांजी.. आठ..", 'चटाक की आवाज के साथ हे चंदरभान की चीख निकल गयी और थप्पड़ की गूँज सुन्न कर 1 मिनट में हे उमेद सिंह इधर आ पंहुचा जहा से ऋचा उसकी हे तरफ आ रही थी. गुस्से के साथ रोटी हुई.
"रुक बेटी. क्या हुआ था यहाँ अभी?", ऋचा के साथ बहार उमेद सिंह को देखते हे ये दोनों व्यक्ति नशे में होने के बावजूद बड़ी तेजी से दिवार फांद कर खेतो की तरफ भाग निकले.
"चाचा, वो वो आदमी मेरा मां कैसे है? छियई.. कितनी घटिया हरकत और वो भी अपनी बेटी जैसी भांजी के साथ.", ऋचा के मुँह से इतना हे सुन्न पाया था उमेद सिंह और तुरंत बहार कड़ी जीप में अपनी भतीजी को बैठा वो निकल चला उस जगह जहा ये घिनोना मां मिल सकता था. लेकिन पीछे हवेली के गेट पर कड़ी लता के शरीर को जैसे लकवा मार गया था ये बातें सुन्न कर.
"मुन्नी, वह क्यों कड़ी है?", चंद्रो देवी की आवाज सुन्न कर वह घबराती हुई पलटी तोह इधर बिजेन्दर भी आँगन में आ गया था.
"वो माँ जी पता नहीं जेठ जी ऋचा को जीप में बैठा कर किधर ले गए. गुस्से में थे."
"ऋचा बहार कब गयी मुन्नी? उमेद भी कोई आवाज सुन्न कर हे गया था तोह मतलब वह कोई घटना हुई है? चल देख लेगा वो अपने आप तू काम कर."
"मैं कह रही थी की बिजेन्दर बस पीछे चला जाये तोह.."
"मुन्नी, उमेद गया है न. बिजेन्दर घर से बहार ब्याह वाले दिन हे निकलेगा अब.", घबराती हुई लता जैसे तैसे एक कोने में चूल्हे के पास जा बैठी. मैं अशांत था और दिल घट्ट रहा था ये सोच सोच कर की अनजाने में हे चन्दर ने काले राज खोल दिए तोह वो जीते जी मारी जाएगी. इसके साथ हे कही दूर एक पटाखा चलने की आवाज सुनाई दी जिस से इस हवेली के लोग तोह ाचे खासे वाकिफ थे. कोई 15 मिनट बाद उमेद और ऋचा वापिस आये तोह उमेद सिंह के चेहरे पर ख़ास भाव न थे. ऋचा भी सधी हुई चाल से अपने कमरे में चली गयी.
"ाचा ताई मैं चलता हु, कल हल्दी पे माँ और राजेश्वरी को लेके आ जाऊंगा. और 2-3 लोग गेट पे रखने शुरू करो, खेतो में अभी जरुरत नहीं है.", पाँव छू कर वो जाते हुए बिजेन्दर से भी थोड़ी बात करके गए. मधुलता अभी तक बेचैन थी और चंद्रो देवी बस अकेले बैठी मुस्कुरा रही थी. अपनी बेटी को दूध देने का बोल कर लता अंदर ऋचा के कमरे में आ गयी थी.
"बहार क्या हुआ था ऋचा?"
"थोड़ी देर में या सवेरे पता लग हे जायेगा आपको की क्या हुआ होगा. अब जान गयी हु के दादी और बिजेन्दर भैया क्यों पापा और उमेद चाचा को मर्द बोलते है.", ऋचा के जवाब ने लता को जैसे मिर्चे लगा दी थी.
"तू क्या बकवास कर रही है तुझे पता है? तू जवान हो रही है तोह क्या कुछ भी बकेगी?"
"आवाज निचे रखिये माँ. मर्द का मतलब सुरक्षा देने वाला भी होता है. सोच में कही तोह खराबी है और मैं ये जान कर रहूंगी.", ऋचा को पता था के ऐसे तोह माँ पीछा नहीं छोड़ने वाली तोह उठ कर वो दादी के पास आ गयी. लता बस हैरत से कड़ी देखती रही.
"दादी अबसे मैं आपके साथ हे सोया करुँगी या फिर बड़ी ताई जी के साथ.", ऋचा की बात सुन्न कर सुशीला ने पलट कर हे जवाब दे दिया.
"मेरे साथ. माँ जी नींद में बन्दूक उठा ले कुछ पता नहीं. तू मेरे साथ हे सोया कर अगर अकेले में दिक्कत है तोह.", लाड से वह उसका सर सहलाने लगी जिसके भीतर ऋचा न जाने क्या कुछ सोच रही थी. पिछले आधे घंटे में एक तरह से उसकी दुनिया हे ulat-palat गयी थी लेकिन वो शायद नतीजे पर नहीं पहुंची थी. और साथ साथ मधुलता भी जैसे एक अलग हे सदमे में आ गयी थी. उसकी बेटी ने कोई सवाल न किया था. लेकिन आवाज नीची रखने का जैसा आदेश दिया था उतनी हिम्मत तोह आज तक किसी का न हुई थी. इसको भी एक मूक संधि मान कर वो खामोश हे रह गयी.
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अर्जुन को आज खाने के बाद ऋतू दीदी ने पहली बार इस नए कमरे का परिचय करवाया. यहाँ उनकी ट्रेडमिल और एक आइना हे होता था जहा समय मिलने पर वो लोग खुद को तराशने के लिए म्हणत करती थी. लेकिन आज ये जगह अलग थी और कही बेहतर. अर्जुन इस 12क्ष14 के कमरे में आया तोह वह बस हैरत से देखने लगा. ये भविष्य में एक और bathroom-store के लिए छोड़ा गया हिस्सा था जो एक व्यायामशाला में तब्दील हो चूका था.
"जिस दिन स्टेडियम नहीं जाओगे उसदिन यहाँ 90 मिनट रहना होगा. वैसे तोह ये no एंट्री है किसी भी व्यक्ति के लिए लेकिन मैंने तुम्हारे लिए इसको बदल दिया है. अपना अलग मत भी ले आना जब मार्किट जाना हो क्योंकि हम सबके अलग अलग है, विथ नाम. संजीव भैया का सारा सामान इधर है और चाहो तोह ऐसा हे एक बेंच और ले लेना, कुछ वेइट्स के साथ.", कमरे में वही सब सामान ाचे से रखा था जो संजीव भैया कसरत में प्रयोग करते थे. डम्बल, 3 तरह की रोड, लोहे की विभिन्न प्लेट, एक वजनी इस्पात का गद्दी लगा टेबल और एक रोड जो लटकने के लिए अलका ने हे यहाँ लगवाया था.
"ये तोह अपने आप में हे एक गयम है. आप लोग ये सब भी करती हो क्या?", अर्जुन ने जिज्ञासावश पुछा तोह ऋतू से पहले अंदर आती तारा ने जवाब दिया.
"न लेकिन रोड उसे कर लेते है कभी कभी. लेकिन तू हलके वेट लेकर देगा तोह मैं तेरे साथ करने को रेडी हु. बाकी तोह बस रनिंग, स्ट्रेचिंग और जो Alka-Preeti सिखाती है वही सब होता है."
"करवाती हु तुझे तोह मैं इसके साथ एक्सरसाइज, बड़ी आयी डोले बनाने वाली. ये सब तुम अकेले करोगे और अगर जरुरत पड़े तोह कोमल दीदी या प्रीती को बुला सकते हो. बस अपना अलग मत जरूर ले आना.", ऋतू ने तारा का हाथ पकडे हुए हे अर्जुन को निर्देश दिए के वो यहाँ संजीव भैया को भी आमंत्रित नहीं कर सकता. अर्जुन ने भी सर हां में हिला दिया.
"चल अब अपने कमरे में जा और आराम कर. सवेरे 5 बजे मैं बुलाने आउंगी तोह तैयार मिलना. चल तारा अब पढ़ने का टाइम हो गया. पापा से बोल कर अब कंप्यूटर भी मंगवाना पड़ेगा.", कमरे को वापिस बंद करती ऋतू दीदी अपने साथ तारा को भी अपने कमरे में ले गयी. अर्जुन सर खुजाता हुआ अगले हिस्से में आया तोह कमरा बर्फ सा ठंडा हो रखा था लेकिन ऐसे में भी विन्नी दीदी के साथ Madhuri-Priyanka दीदी बैठी हुई ये फिल्म देख रही थी.
"थोड़ा तोह टेम्परेचर ठीक रखो दीदी, कुल्फी जमनी है क्या?", अर्जुन अंदर आते साथ हे रिमोट से तापमान बढ़ाते हुए बोलै तोह विन्नी दीदी ने आँख मार दी.
"बहार से आया है न इसलिए लग रहा है. तू कहा भटकता फिरता है हर वक़्त?", विन्नी दीदी के इस सवाल को अर्जुन ने अपने कमरे में जाते हुए सुना और अलमारी से पजामा टीशर्ट निकलते हुए बोलने लगा.
"ाची नींद के लिए भटकना तोह पड़ता हे है दीदी. वैसे बहार सचमुच एकदम से उमस जैसा हो गया है.", अर्जुन कंधे पर टोलिया टाँगे वापिस इस तरफ आया तोह कोमल दीदी अपनी जगह से कड़ी हो गयी.
"आ के नाहा लियो ारु, बारिश आ गयी तोह मेरी सहमत आ जाएगी. छत्त पर दरी, परदे धुप लगवाने के लिए रखे थे और भीग गए तोह दादी ने जान ले लेनी है.", वो अभी इतनी बात कहके हटी थी की तेज गर्जना ने उनकी बात को साबित कर दिया. अर्जुन उनसे पहले हे कमरे से बहार निकला और छत्त पर बढ़ गया. अभी तक बारिश शुरू नहीं हुई थी लेकिन आसमान घुट्ट गया था.
"तू उधर से समेत और मैं ये परदे उठती हु.", कोमल दीदी ने बिखरे हुए पर्दो को उठाना शुरू किया तोह अर्जुन उनसे दुगनी रफ़्तार से बाकी सब समेटने लगा. विन्नी दीदी भी इधर आ गयी थी जो कोमल की मदद करने लगी.
"वैसे ाचा हे है के बारिश आ जाये. 2-3 दिन से बादल आ रहे है लेकिन बरस नहीं रहे. चलो इधर का तोह हुआ, ये आप लेके चलो मैं बाकि लेके निचे आती हु.", विन्नी दीदी ने कोमल दीदी को उठाने लायक सामान देने के बाद अर्जुन द्वारा तेह किये परदे और चादर खुद उठा लिए. भारी दरी और कालीन अर्जुन खुद उठा कर उनके पीछे चल दिया. फ़िलहाल के लिए सबकुछ संजीव भैया के कमरे में रखते हुए तीनो ने रहत की सांस ली.
"सॉरी दीदी, आपसे भी काम करवाना पड़ा.", कोमल दीदी ने अर्जुन के तोलिये से हे विन्नी दीदी के हाथ साफ़ किये और फिर अपने भी करने के बाद टोलिया अर्जुन को देती गूडनिघत बोल कर निचे चली गयी. साढ़े 10 बज चुके थे और प्रियंका दीदी के साथ वह माधुरी दीदी काम करवा रही थी. कोमल दीदी बड़ी बहिन से काम नहीं करवाना चाहती थी इसलिए खुद हे रसोई में आ जुटी बर्तन साफ़ करने.
"बारिश में नहायेगा?", अर्जुन से जैसे हे विन्नी दीदी ने ये कहा वो उन्हें हैरत से देखने लगा.
"एक में बैठी थी आप इतनी देर से और अब इतनी रात को बारिश में नहाने की बात कर रही हो. बीमार पड़ गयी न फिर आपको तोह कोई कुछ नहीं कहेगा लेकिन मेरी शामत आ जाएगी. आप आराम से टेलीविज़न देखो मैं बाथरूम से नाहा कर आया.", अर्जुन ने इतना जवाब दिया और अंदर घुसते हुए दरवाजा बंद कर लिया.
"सहित. मेरी ुंडिएस... हो गयी एक और गलती तुझसे विन्नी.", अपने सर पे हाथ रखती विन्नी को ध्यान आया के कपडे बदलने के बाद वो अपने अधोवस्त्र अंदर हे छोड़ आयी थी. वो भी बेपर्दा और अर्जुन को जाते हे दिख जाने वाले है. शर्मिंदगी में यहाँ से गायब होने के सिवा कोई दूसरा चारा न था अब. अर्जुन की नजरो से बचने के लिए वह बहार निकली तोह मोटी मोटी बुँदे आँगन में टपक रही थी. सामने Ritu-Alka की तरफ कमरे बंद थे और निचले आँगन में भी ऐसा हे नजारा था सिवाए रसोईघर के. विन्नी अपनी हे सोच में खोयी सीढ़ियों से छत्त पर चली गयी.
'अब ये विन्नी दीदी कहा चली गयी?', अर्जुन नाहा कर 10 मिनट बाद बहार निकला तोह कमरा खाली था. बेध्यानी में वह अपने कमरे में आ कर बाल सही करने लगा तोह एक भयंकर गर्जना ने उसका ध्यान बहार बदले मौसम की तरफ कर दिया.
'ये पागल विन्नी दीदी चली गयी ऊपर बारिश में.', अर्जुन तुरंत गीला टोलिया लिए बहार निकल आया. निचले आँगन में Priyanka-Madhuri दीदी उसको कमरे में जाती दिखी और Ritu-Alka वाला कमरा भी बंद. बारिश अब एक झड़ी का रूप अख्तियार कर चुकी थी जिस से अर्जुन का दिल बैठ गया. सीढिया फांदता हुआ वो जैसे हे खुली छत पर पंहुचा, विन्नी दीदी को देख कर ठिठक गया.
"सचमुच पागल हे हो आप दीदी. मन करने के बाद भी आप यहाँ बारिश में भीगने आ हे गयी."
"हर रोज तोह बारिश नहीं होती न? मुझे ये पसंद है और साथ हे बिजलियों का कड़कना, वो चमक जो अँधेरे को एक पल के लिए ख़तम कर देती है. शुरू में तोह धरती का सेक बहार निकलता है लेकिन फिर जो ठंडक ये बारिश देती है उसका कोई जवाब नहीं.", इतनी घनी बारिश में दोनों बस एक दूसरे को स्याह साये की तरह देख भर सकते थे. अर्जुन कुछ आगे चलता थोड़ा करीब आया तोह विन्नी दीदी इस मूसलाधार बारिश में जैसे प्रभावहिर हे थी.
"आपको ये तीखी बुँदे चुभ नहीं रही?", अर्जुन भी अब उनके साथ भीग हे चूका था और वैसे भी बारिश तोह हमेशा हे उसको पसंद थी.
"ाची लग रही है अब तोह. बस शुरू में चेहरे पर जरूर चुभ रही थी लेकिन इसका भी अलग मजा है. वैसे पहले मुझे भीगना बिलकुल पसंद नहीं था.", विन्नी दीदी अपनी हथेलिया बरसते पानी के निचे फैलाती हुई वापिस उन बूंदो को ऊपर उछाल रही थी. किसी छोटी सी बची की तरह.
"जब पहले बारिश पसंद हे नहीं थी तोह ऐसा क्या हुआ के ये गरजती बिजली का भी डर ख़तम हो गया? क्योंकि ज्यादातर लड़कियों को ये डरा देती है.", अर्जुन भी कुछ सोच कर अब फर्श पर बैठ गया था, पाँव लम्बे पसार कर. एक नजर विन्नी दीदी ने अर्जुन को देखा और फिर वो भी कुछ दुरी पर वैसे हे बैठ गयी.
"वह जब अकेली थी तोह ये बारिश बहोत डरा देती थी. एक तोह अकेलापन क्योंकि अपने घर से इतनी दूर थी और दूसरा मुझे बाहरी दुनिया का कोई ज्ञान हे न था. लेकिन कितने दिन ऐसे रहती? 5 साल लगे मुझे खुद को हिम्मत देने में और जब मैं कमरे से बहार निकल कर अकेली ऐसी घनघोर बारिश में आ कड़ी हुई तोह कुछ पल के लिए मैं बस सुन्न रह गयी थी. डर, दर्द और असुरक्षा. मेरे से 4-5 साल छोटे 2 bhai-behan वैसी हे बारिश में uchal-kood करते हुए अपनी माँ के पीछे चल रहे थे खुली सड़क पर. उस दिन इन बूंदों से तोह डर ख़तम हो गया लेकिन लैटनिंग फिर भी डरा देती थी.", इतना कह कर विन्नी एकाएक खामोश हो गयी थी. आँखें मूंदे वह चेहरा ऊपर करती जैसे एक जुंग लड़ रही थी इन टपकती बूंदों से.
"फिर ये डर कैसे दूर हुआ आपका? शायद इस बार वजह उन बचो जैसी मासूम नहीं रही होगी.", अर्जुन ने भी हथेलिया पीछे फर्श पर रखते हुए खुली आँखों से ऊपर देखा तोह सचमुच ये चेहरे पर ाचा खासा वार कर रही थी. कैसी विन्नी दीदी इनको झेल रही होंगी अर्जुन ये सोच कर हे हैरान था और साथ हे एक डर ने भी घेर लिया था क्योंकि उसका सवाल गलत था.
"तुम्हे बताया नहीं मैंने लेकिन सच कहु तोह तुम पहले लड़के हो जो इंसान को अलग तरह से देखते और समझते हो. और ये भी सच है के इस डर को दूर करने की वजह एक ऐसा दर्द था जिसने मुझे बस काबिल बनाया, टूट के बिखरने से ाचा तोह यही है न.", विन्नी दीदी भी जैसे कई मौसम देख चुकी थी, dard-akelepan और समाज के.
"अगर बात ऐसी है तोह बेहतर रहेगा हम इस पर चर्चा न करे. आप फिर से उस दर्द को याद करेंगी तोह मुश्किल होगा."
"एक बार निकलना जरुरी है बस और तुम पर ट्रस्ट कर हे सकती हु.", जैसे विन्नी दीदी ने ये बात कही थी इस अँधेरे में भी उनकी मुस्कान जाहिर कर गयी की वो इस लड़के को कितना मान ने लगी है.
"हाँ ये भी बात ठीक है के दर्द से निकलने के लिए एक बार खुद को खाली करना बेहद जरुरी है. नहीं तोह हम ाची यादें नहीं बना सकते. फिर हर बारिश बस एक द्वन्द या टकराव सी लगेगी जिसमे मजे से ज्यादा खुद को साबित करना ऐसा लगता है जैसे खुद से हे भाग रहे हो.", अर्जुन की इतनी दूर की बात विन्नी दीदी को भी समझ आ गयी थी. बैठे हुए हे उनकी हथेली कुछ हद्द तक अर्जुन की ऊँगली से टकरा गयी जिस पर दोनों ने ध्यान न दिया.
"फर्स्ट ईयर में मुझे एक लड़के से अट्रैक्शन होने लगी थी. उसका नाम डर्क था, शामे क्लास में लोकल जर्मन लड़का. उस से पहले तोह स्कूल में हमेशा खुदसे हे उलझी रहती थी लेकिन डर्क खुद मेरा ध्यान रखता और मुझे मदद करता माहौल में पार्टिसिपेट करने में. एक साल में हम ाचे दोस्त बन्न गए और मैं उसके साथ हर बात शेयर करती. समय मिलने पर aas-pas हाईकिंग के लिए चले जाना, स्ट्रीट्स एक्स्प्लोर करना और लोगो से मिलना जुलना होने लगा. तब तक वो अट्रैक्शन एक ाचे फ्रेंड से भी थोड़ी ऊपर चली गयी थी. हम सेकंड ईयर भी हाफ कम्पलीट कर चुके थे.", विन्नी और अर्जुन को तोह अब इस बारिश का असर हे नहीं हो रहा था. वो चुपचाप बस सुन्न रहा था
"वीकेंड पर एक लोकल फ्रेंड के यहाँ पार्टी थी जहा मैं जाना नहीं चाहती थी लेकिन डर्क पार्टी करता था और वो लड़की उसकी भी दोस्त थी. एक room-mate के फाॅर्स करने पर मैं भी थोड़ी देरी से वह चली गयी जिसका शायद डर्क को अंदाजा नहीं था. पार्टी में वो कही नजर नहीं और मैं भी थोड़ा बोर होने के बाद घर के पिछले यार्ड में चली गयी जहा थोड़ा सुकून रहता था. वह मैंने डर्क और उसके एक फ्रेंड को एक लड़की के साथ इंटिमेट देखा तोह मुझे कुछ समझ नहीं आया. मैं सोच कर बैठी थी की नेक्स्ट डे संडे है और डर्क के प्रपोजल को एक्सेप्ट करके एक रिश्ता शुरू करुँगी लेकिन सब एक पल में हे खता हो गया.", विन्नी के आँखों में अगर इस वक़्त आंसू भी थे तोह वो दिख नहीं सकते थे. लेकिन आवाज की कम्पन्न अर्जुन समझ सकता था.
"लाइफ इस ूनप्रेडिक्टेबले विन्नी दी. आप जिस मदद से रोज गुजरो जरुरी नहीं के वो एक दिन वैसा हे रहेगा. वह 2 रस्ते भी बन्न सकते है जिसमे नए वाले पर चलना थोड़ा अंजना और कोरा सा होता है. खली खली सा.", अर्जुन की बात सुन्न कर विन्नी ने एक फीकी हंसी दी लेकिन आँखें सचमुच बह रही थी. हाथ अब ऊँगली की जगह अर्जुन की हथेली के ऊपर टिक गया था.
"बात इतनी हे नहीं थी अर्जुन. उसके दोस्त ने जो आगे से कहा वो बुरे सपने से भी बुरा था. डर्क उसके साथ मुझे शेयर करने वाला था जैसे वो अपनी गर्लफ्रेंड को डर्क के साथ मेरे सामने शेयर कर रहा था. उस वक़्त मुझे कुछ सुनाई न दिया और मैं रोटी हुई अगले 5 किलोमीटर चल कर हॉस्टल तक आयी. इस से भी ज्यादा बुरी बरसात में जहा गिरने को तोह ये आसमानी बिजली हर तरफ गिर रही थी लेकिन मेरे अंदर हाल उस से भी बुरा था. कितने हे दिन मैं कमरे में फिर से बंद रही और सोचती रही के एक फैंसला मैं खुद करने वाली थी और वही गलत साबित हो गया. मुझे बिलकुल नहीं पता था के दिल टूटना इतना ज्यादा दर्द दे सकता है. मेरी गलती हे क्या थी अर्जुन?", अब विन्नी की आवाज लड़खड़ा चुकी थी और अर्जुन के पास अब कोई रास्ता न था सिवाए उन्हें शांत करने का.
"जो इंसान अगर किसी सच्चे दिल को ठेस पहुँचता है न वो कभी भी एक ाची ज़िन्दगी नहीं जी सकता. आपने तोह इसमें कुछ गलत नहीं किया न और प्यार करना गुनाह या पाप नहीं है लेकिन उतना हे कठोर सच ये है के हम सही प्यार और इंसान की समझ नहीं रखते. मुझे तोह बिलकुल भी नहीं है और मैंने अनगिनत ऐसे फैंसले किये है जिनका परिणाम कही ज्यादा दुखदाई हो सकता है. सबसे जरुरी बात है के आपने खुद को संभाला और जीवन को सही दिशा दी. हर लड़की इतनी मजबूत नहीं होती.", विन्नी अब उसके सीने से लगी थी और अर्जुन एक संरक्षक की तरह उनके सर पर एक हाथ रखे उन्हें हौंसला दे रहा था. कुछ पल वो बस लिपटी रही और फिर धीमी आवाज में बोली.
"मुझे ठण्ड लग रही है अर्जुन. निचे चलते है.", बारिश में हवा का मिलान हो चूका था और इतनी देर से भीगने के बाद जब दोनों खड़े हुए तोह सचमुच रोये खड़े हो गए थे जिस्म पर.
"हाँ चलिए और अब इस बारे में बिलकुल भी मैट सोचना.", अर्जुन उनका हाथ पकडे हुए हे निचे लेके आया तोह दरवाजे पर आ कर रुक गया.
"आप चेंज कर लिए इतने मैं निचे से पानी ले कर आ रहा हु.", अर्जुन की बात सुन्न कर विन्नी दीदी ने बस हाँ में सर हिला दिया. रौशनी में आते हे खुद की हालत देख वो सकपका गयी थी. अलका की वो टीशर्ट उनके जिस्म पर त्वचा की तरह चिपकी थी जिसमे से कठोर चूचक बहार उभरे साफ़ दिख रहे थे. वैसा हे हाल नितम्ब और yoni-pradesh के पास था. सरपट वो बाथरूम में जा घुसी और चिटकनी लगते हे कपडे जिस्म से जुड़ा करती वो आईने में देखने लगी. चेहरा सफ़ेद सा दिख रहा था और पूरे शरीर पर रोये खड़े थे. निप्पल किसी छोटी सी घुंडी के रूप में कठोर हुए अपनी रंगत से अधिक गहरे. गीले बालो से पानी टपकता हुआ फर्श पर गिर रहा था.
'ओह्ह्ह.. सहित. कुछ भी कर बैठ टी हु.', इतना कहती वह कुछ याद आने पर फुहारे की तरफ देखने लगी तोह वह उनके अंगवस्त्र न दिखे. दरवाजे के पीछे लगी हक्क पर एक साफ़ तोलिये के पीछे वो दोनों कपडे सही से टंगे देख थोड़ा परेशां भी हुई लेकिन फिर मुस्कुरा उठी.
'कपडे तोह लेके नहीं आयी और तोलिये में बहार नहीं जाने वाली. पहले हे beda-garak कर चुकी हु.', अभी वह शरीर पांच कर इतना हे बोल रही थी की अर्जुन की आवाज सुनाई पड़ी.
"विन्नी दीदी, ये दरवाजे के हैंडल पर कोमल दीदी की टीशर्ट और लोअर टांग दिया है. आप ले लीजियेगा और मैं मेरे कमरे में हु.", इतना बोल कर अर्जुन दोनों कमरों के बीच वाला दरवाजा बंद करता अपने बिस्टेर पर आ गया था. अपने कपडे वो निचे हे बदल आया था माँ से ले कर. साढ़े 11 बज चुके थे और बरसात अब हलकी होने लगी थी. वही विन्नी के चेहरे पर अलग हे मुस्कराहट आ गयी थी.
'ये लड़का अब पसंद न आने की तोह कोई वजह देता हे नहीं. नहीं रुक पाएगी तू विन्नी जितना मर्जी जोर लगा ले. पता है ये सब गलत हो रहा है लेकिन हल क्या है? शादी तोह डर्क से भी नहीं होने वाली थी और इस से तोह मुमकिन भी नहीं. इस दिल को कौन समझाए अब.', खुद से बतियाती हुई वो टोलिया लपेटे बहार आयी तोह दोनों तरफ से दरवाजे बंद थे. बिना अधोवस्त्र के टीशर्ट और वो ढीला पजामा पहन कर विन्नी अपने बाल सूखने लगी. अर्जुन द्वारा पहल हे एक बंद करने के बावजूद शरीर अभी तक ठंडक महसूस कर रहा था.
"ओह हीरो, अब खोल भी दो ये दरवाजा.", बाल सूखने के बाद विन्नी ने अर्जुन को आवाज लगाई तोह एक मिनट बाद हे वो बीच का रास्ता खुल गया. अर्जुन वापिस अपनी कुर्सी पर जा बैठा और विन्नी दीदी 2 तकिये सर के निचे लगाती बीएड पर पसर गयी. किनारे राखी सफ़ेद चादर अपने शरीर पर लेने के बावजूद ठंडक वैसी हे बरक़रार रही.
"अब तुम रात में Ph.D करोगे क्या?"
"आप बताओ फिर क्या करे? ये आखिरी डायग्राम न 2 दिन से लटका हुआ है.", अर्जुन ने एक नजर विन्नी दीदी को देखा और उनके मासूम से चेहरे पर अकेलेपन के भाव. फिर बिना उनका जवाब सुने बिस्टेर पर अपनी तरफ आ लेता. कमरे में बस वही नाईट लैंप और जीरो की रौशनी थी जो पर्याप्त थी.
"मजाक कर रही थी बाबा. तुम कर लो डायग्राम पूरा, फाइल सबमिट भी करवानी होगी तुम्हे.", उन्होंने अर्जुन को 2 तकिये बीच में रखते देखा तोह उठा कर एक तरफ फेंक दिए. अर्जुन बस मुस्कुरा कर रह गया.
"और ये diwar-vivar नहीं बनानी बीच में. कह देती हु."
"फाइल तोह जुलाई में चेक होगी अब, वो तोह बस समय रहते ख़तम कर रहा था. वैसे परसो तोह आप खुद हे दिवार बना रही थी.", अर्जुन ने इतना कहा तोह विन्नी दीदी सरक कर उसके करीब आ गयी. दुरी मात्रा aadha-pauna फ़ीट थी बीच में.
"वो दिवार उस रात हे हटा दी थी मैंने और बाकी ऊपर छत पर. सच कहु तोह तुम मुझे कभी ेम्बरस फील नहीं करवाते, बेशक मुझसे अनजाने में गलती हो जाती है लेकिन तुम ढकने के बाद भी जाहिर नहीं करते.", अर्जुन समझ गया था के वो क्या ढकने की बात कर रही है.
"गलती नहीं सिर्फ भूल कहते है उसको और ऐसा सबके साथ होता है. मुझे तोह ख़ुशी हुई की आपने मुझे अपना समझा और भरोसा किया. आज भी आप हिचकिचाती है, हेसिताशन की जगह कॉन्फिडेंटली एक्ट करना चाहिए. कभी प्रॉब्लम नहीं होगी पर्सनल ग्राउंड पर. क्योंकि काम के प्रति तोह आप हैं हे बेस्ट.", अर्जुन ने अभी अपनी बात पूरी की हे थी और विन्नी दीदी ने उसके होंठो को तेजी से चूम लिया. बारिश की वजह से दोनों के हे होंठ कुछ उखड से गए थे लेकिन वो 5 सेकंड का स्पर्श बहोत कुछ कर गया.
"ऐसे एक्ट करने को तोह नहीं कहा था.", अर्जुन ने भोलेपन से उनकी तरफ देखा तोह वो शर्म होने के बावजूद खुली आँखों से उसको निहार रही थी.
"मैं तोह परसो रात हे तुम्हे किश करने वाली थी लेकिन तब मुझे बस ये एक अट्रैक्शन जैसा लग रहा था क्योंकि तुम सबका इतना ख़याल रखते हो और परवाह करते हो. हाँ हैंडसम हो इसलिए पहली नजर में तुम्हे देख कर इग्नोर कर दिया था, एक्चुअली जरुरत से ज्यादा हैंडसम हो. लेकिन सबसे अलग बात पता है अर्जुन, मैं तुमसे भाग रही थी और फिर सुकून भी मुझे तुम्हारे पास बैठ कर मिला. ऐसा लगा जैसे एक कन्धा मेरे पास भी है जिस पर मैं भरोसा कर सकती हु.", विन्नी दीदी ने आहिस्ता आहिस्ता अपना वो कोमल हाथ खिसका कर अर्जुन के निचले हाथ पर रख दिया.
"दीदी, सच कहु तोह ये दोनों के लिए ठीक नहीं रहेगा."
"प्रीती से प्यार करते हो इसलिए ऐसा कह रहे हो? मैं बीच में नहीं आ रही अर्जुन और मुझे भी वो प्यार सी लड़की तुम्हारे साथ ाची लगती है. बस मुझे अपने प्यार का थोड़ा सा सहारा दे दो जिस से मैं फिर कभी लड़खड़ा न सकू. उस रात जब मैं तुम्हारी बाहों में थी, मैं सालो बाद सुकून से सो पायी. और तुमने मुझे जैसे गॉड में उठाया था तोह मैं चाहती थी की वो 10 कदम का सफर थोड़ा लम्बा होता तोह बेहतर रहता. हर चाहत पूरी नहीं कर सकते तोह काम से काम अपने सीने से लगा का वैसी हे प्यारी नींद तो सोने दे सकते हो?", इस बार अर्जुन ने हे उन्हें अपनी तरफ खींच कर बगल में लिटा लिया. एक पल तोह शर्मा गयी लेकिन हैरान भी हुई के कितने आराम से अर्जुन ने ये कर दिया था.
"मुझे पता है के आप बीच में नहीं आ रही हो. और आपकी वो उलझन परसो रात हे मैंने सुन्न ली थी. बस कई बार हम वादा कर बैठते है जो निभा नहीं पाते. मैं आपको कमजोर नहीं करना चाहता दीदी. आपको बड़ी बहिन की तरह पूरा हक़ है लेकिन अगर इसकी जगह आपने एक ऐसा भविष्य मांग लिया जो मुमकिन न हो तोह ये सबके साथ विश्वासघात जैसा होगा. उस तरफ आगे बढ़ने पर शायद आप बीच मझदार में न फंस जाओ.", अर्जुन उनके नाम बालो को कान के पास से पीछे करते हुए किसी बड़े की तरह समझा रहा था. विन्नी दीदी को तोह इस एक पल में जैसे सबकुछ मिल गया था.
"थोड़ा सा विश्वासघात कर लेते है, इस बंद कमरे में हम दोनों बस बार्बी एंड केविन बहार तुम विन्नी के मुन्ना. सहित, थोड़ा नौघट साउंड कर रहा है बूत I'm okay विथ आईटी. और अगर कभी भी कुछ प्रॉब्लम हुई तोह विनीता सिंह इस अर्जुन शर्मा पर ऊँगली तक नहीं उठने देगी.", जैसे आँखें मटकते हुए विन्नी दीदी ने दोनों के नाम लिए अर्जुन हंसने लगा.
"पक्की ड्रामेबाज हो आप लेकिन फिर भी मैं कहता हु के इसको लिमिट में रखते है.", अर्जुन ने अब ऊपर वाला हाथ उनकी कमर पर रखते हुए कहा, जहा से टीशर्ट थोड़ी ऊपर हो चुकी थी. इस गरम स्पर्श से हे विन्नी किसी अदृश्य डोर से खींचती अर्जुन के होंठो पर आ रुकी. वो अपने आधार मजबूती से चिपकाये थी लेकिन जैसे उन्हें यही एक चुम्बन का ज्ञान था. लेकिन जिसके साथ वो ऐसा कर रही थी वो जैसे अंतरंग पालो का सर्वज्ञानी था. अर्जुन ने उनके निचले होंठ को मुँह में भर कर आराम से पीने के उपक्रम किया तोह विन्नी को लगा जैसे वो होंठो से उसकी आत्मा अपने अंदर खिंच रहा हो. इस नए अनुभव से जैसे हे विन्नी का मुँह थोड़ा खुला तोह होंठ को छोड़ कर अर्जुन उनकी गुलाबी मीठी जीभ को मुँह में लेते हुए पीने लगा. ये सब बस एक मिनट में चला था और इतने में हे विन्नी की सांसें उखड कर किसी धौंकनी सी तेज चलने लगी.
"ह्ह्हह्हुउउ.. ये क्या था अर्जुन?", बड़ी मासूमियत से इतना पूछ कर वो उसके सीने में सर रखती सब याद सा करने लगी. अर्जुन भी समझता था के बेशक दीदी डर्क को कभी पसंद करती थी लेकिन वो कभी उस हद्द से आगे न गयी जो लड़की को बदल देती है.
"आपने कहा था के आप बार्बी हो तोह केविन ने वैसे हे प्यार दिखाया. लेकिन एक बात पता लग गयी की आपने कुछ भी नहीं सीखा बहार रह कर भी.", अर्जुन उन्हें और ाचे से अपने साथ लगते हुए पीठ सहलाने लगा. विन्नी दीदी को तोह अपने सीने में भी आज अलग अलग तरंगे उठती महसूस हो रही थी. एक तरफ अर्जुन का निर्वस्त्र चौड़ा सीना और खुद वो बस एक पतली सी टीशर्ट में अपना यौवन आजाद किये. लेकिन जो अर्जुन ने कहा उस पर चुप रहना भी मंजूर न हुआ.
"तुमने तोह इसमें Ph.D. कर राखी है पक्का. ऐसे सिर्फ फिल्मो में देखा था लेकिन पता नहीं था के ये ऐसा महसूस होता है. प्रीती के साथ यही सब करते हो क्या?"
"आप खुद हे पूछ लीजियेगा के उसने क्या कुछ सिखाया है मुझे. वैसे सचमुच वो कोई बेवकूफ हे रहा होगा जो आप जैसी प्यारी लड़की को न संभल कर रख पाया. यू अरे रियली ब्यूटीफुल एंड पुरे दीदी.", अर्जुन के स्पर्श में विन्नी ने जरा भी वासना न महसूस की थी. कैसे वो एकाएक इतना शांत था उस गहरे चुम्बन के बाद. खुद हे ऊपर सरकते हुए वो जब अर्जुन के चेहरे तक आयी तोह नरम गुब्बारों ने अलग हे एहसास पाया उस रगड़ से. जैसे तैसे काबू करती विन्नी दीदी उसकी भूरी आँखों को देखने लगी.
"तुम हो क्या चीज जरा बताओगे.? एक जवान लड़की खुद तुम्हारे साथ लिपटी हुई है और तुम हो के तारीफ हे किये जा रहे हो. मैं इतनी बुरी भी नहीं दिखती शायद."
"आपको तोह मैंने पूरा हे देखा हुआ है और चाह कर भी भुला नहीं सकता इस ख़ूबसूरती को. लेकिन क्या ये ठीक रहेगा की सबकुछ ek-sath हे हो जाये.?", अर्जुन ने जिस तरह वो पल याद दिलवाया था विन्नी ने शरमाते हुए अपना गाल उसके होंठो से सत्ता दिए.
"बहोत गंदे हो तुम. क्या सचमुच तुमने मुझे पूरा देखा था.?", वो नजरे नीचे किये वैसे हे लेती थी. अर्जुन की गरम साँसे गाल से टकराती हर तरफ एक नयी आग लगाने लगी.
"सचमुच पूरा. आप हसीं हो इसलिए तोह कह रहा था के वो बेवकूफ हे होगा जो आपको न देख पाया. अंदर और ज्यादा अंदर से. उमाह.", गाल पर अपने होंठ दबाते हुए अर्जुन ने पहली बार अपना हाथ कमर से खिसकते हुए नरम लचीले पेट पर फिराया. कांच पर गिरे पानी सी फिसलन को दोनों ने हे एहसास किया. विन्नी का चेहरा मस्ती में थोड़ा ऊपर हुआ और इस बार वो खुद अपने सुर्ख होंठो को अर्जुन से जोड़ती रेगिस्तान के प्यासे सी पीने लगी. वो मरदाना हाथ कभी पेट की तलहटी पर जाता तोह कभी घुमावदार नाभि पर. एक तान खुद हे अर्जुन के ऊपर रखती वो हाथ को दबाने लगी थी.
"हम गलत कर रहे है फिर भी ये गलत नहीं लग रहा Arjun..aahh.. सच कहु तोह कुछ गलत नहीं बस बेनाम बेवजह के बंधन है. तुम मुझे मुक्त कर दो इन बंधनो से. ये सोच कर हे की मैं आजाद होना चाहती हु.", विन्नी ने वो हाथ खुद हे अंदर सरकते हुए अपने एक उभार पर टिका दिया. इतना सुकून और ख़ास एहसास था ये उसके लिए की वो अर्जुन के साथ इस सफर पर आगे जाना चाहती थी. वही अर्जुन भी उस नरम उभर की संरचना का जायजा लेता बड़े इत्मीनान से अपनी बड़ी दीदी के होंठो को चूमता उस वक्ष को सहलाने लगा. ये सतांन अछूते और बिलकुल कोरे थे, 24 की उम्र के बावजूद.
"आज सबकुछ मुमकिन नहीं होगा दीदी. आप बस मेरे साथ प्यार से चिपक कर आराम कीजिये. हाँ हम दोनों कपडे उतार सकते है जिस से आपको ऐसा नहीं लगेगा की मैं आगे नहीं बढ़ना चाहता. बस इस सबके लिए समय काम भी है और सुबह आप फंस जाओगी.", अर्जुन ने उनकी दुविधा दूर करते हुए अपना पजामा हटा दिए. विन्नी जहा ये सोच रहे थी की अर्जुन बीच मझदार में छोड़ कर जा रहा है वही अब वो उस झूलते हुए 9 इंच के असाधारण लिंग को देख सकते में आ गए.
"अरे यू रियल?"
"जस्ट कलम डाउन. आप ये ले सकती है लेकिन साढ़े 12 हो चुके है अभी और फिर जानती है न के आपको घर भी जाना है कल. थोड़ा मुश्किल हो जायेगा.", अर्जुन ने खुद हे वो टीशर्ट विन्नी दीदी के जिस्म से अलग करते हुए दोनों गुब्बारों को बरी बारी से चूम लिया.
"आठ.. सेह लुंगी यार. बड़ा तोह सचमुच बहुत है."
"आपको प्यार से हे सुलाऊँगा दीदी. आज बस फील कीजिये.", अर्जुन ने सुविधा के लिए वो जीरो बल्ब भी बंद कर दिया. कुछ हे पल बाद विन्नी उस सफ़ेद चादर के भीतर निर्वस्त्र लिपटी थी अर्जुन से और जांघो के बीच उस कामदण्ड की 2-3 रगड़ ने हे उन्हें पागल कर दिया था.
"ोुछ.. ये क्या सेंसेशंस है अर्जुन.. आह्हः..", अर्जुन के शरीर की गर्मी और छोटे छोटे चुम्बन के साथ वो आज पहली बार लिंग को भी अपने यौवन कुंड पर दस्तक देते महसूस कर रही थी. अर्जुन ने उन्हें निराश न करते हुए अपने साथ लगाए हे 10-12 बार दबा कर उस अक्षत छूट के होंठो पर अपना विकराल लिंग फिराया तोह उत्तेजजना में विन्नी की हलकी चीख हे निकल गयी. यौनकुंड ने इतनी जल्दी अपना रस बहार उड़ेल दिया था. विन्नी दीदी बेचारगी से अर्जुन को लैंप की रौशनी में देख रही थी.
"ाःह.. ये क्या था अर्जुन? कुछ किया भी नहीं और.. आठ.. I'm स्टिल लॉकिंग एंड थी गूसबम्प्स."
"अब आपको ाचे से नींद आएगी दीदी. जरुरी नहीं के हम वो सब हे करे. ये तब ाचा लगेगा जब कुछ और दीवारे भी देह जाये."
"लव यू अर्जुन. यू अरे रियली ओने ड्रीम गाए एंड I'm हैप्पी तहत ी ऍम हेरे, विथ यू. उमाठ. स्लीप वेल केविन.", एक दीर्घ चुम्बन करती विन्नी ने अपने मांसल चुके अर्जुन के साथ लगते हुए आँखें बंद कर ली.
"लव यू लिटिल बार्बी. आप आराम कीजिये, मैं साथ हु.", अर्जुन ने माथे पर होंठ लगते हुए उन्हें एहसास करवाया के वो इस बंद कमरे में उनसे बड़ा है और परवाह करने वाला भी. चाहता तोह वो आज सभी हद्द पर कर सकता था लेकिन अब बिना ऋतू या कोमल दीदी की मर्जी के वह इस घर में ऐसा कुछ नहीं करने वाला था. और कैसे वो ठेस पंहुचा सकता था खुदको? विन्नी दीदी आज भावनाओ के प्रभाव में शायद वो सब कर जाती जो नयी सुबह एक पश्चाताप का रूप ले सकती थी. ऐसे हे उन्हें बाहो में लिए वो नींद के आगोश में जाने लगा था. लिंग अपने सामान्य अकार में आता बता गया के वासना पर काबू करना अर्जुन सीख रहा है.
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"दोनों लाश वैसे हे दिखानी है जैसे निर्देश दिए थे. लग्न चाहिए के शराब के बाद झगड़ा हुआ है.", संजीव ने इतनी हिदायत दी थी की अँधेरे में 2 लाशो को उन हवलदारों ने बड़ी म्हणत से एक आपसी रंजिश का रूप दे दिया था. खेतो के बीच सबकुछ सही तरीके से व्यवस्थित करके संजीव अब चलता हुआ अपने उमेद चाचा के पास आ खड़ा हुआ.
"लो जी, हो गया सब तैयार. हूटर हमारे जाते हे बजेगा. वैसे मामला समझ नहीं आया चाचा.", संजीव उनकी कार में बैठ कर सिग्रत्ती सुलगता हुआ बोलै तोह उमेद सिंह मुस्कुराने लगा.
"लल्ला, अब न भोले को भूतनाथ उसकी बेटी बनाये तोह ज्यादा बेहतर होगा. बात तोह मुझे भी kachi-pakki पता है इसलिए एक की गर्दन तोड़ी और दूसरे को गोली मारी. मां हो के इसने मेरी लाड़ली का हाथ पकड़ा, अपनी भांजी का तोह बात इतनी तोह नहीं होने वाली. चल दारू पीते है हवेली पे और इनको बोल के गाँव में शोर मचाये.", उमेद सिंह की बात सुन्न कर संजीव ने हँसते हुए बहार 5 मिनट का इशारा किया और वो दोनों यहाँ से निकल गए.
मनबीर और चंदरभान सिंह शराब पीने के बाद आपस में लड़ के मारे गए. गाँव से बहार, पूलि के पास दोनों की लाशें गश्ती पुलिस ने बरामद की. पूरी रिपोर्ट पोस्टमॉर्टम और जांच के बाद. गहरी स्याह रात में बारिश ने भी अपना काम बखूबी किया था जो दो निर्जीव जिस्मो को मटियामेट करके बचे खूहे सबूत भी मिटा गयी थी. रात एक बजे पुलिस जीप ने एक खेतवाले से पहचान करवाने के बाद जब स्वर्गीय पांच ईश्वर सिंह का दरवाजा खटखटाया तोह लाजवंती के पाँव टेल जमीन खिसक गयी.
"जी चंदरभान सिंह आपके भाई के सुपुत्र है?"
"हांजी. क्या हुआ? वो आज हे आया है यहाँ कुछ दिन रहने के लिए. कुछ गड़बड़ की है क्या?"
"आया था कहे तोह बेहतर रहेगा. पहचान होने पर हे आपके पास आये. चंदरभान और एक अज्ञात व्यक्ति के बीच मुठभेड़ में दोनों की मृत्यु हो गयी है. घर में कोई पुरुष है तोह वो साथ चले नहीं तोह शिनाख्त के लिए आप सुबह सरकारी हॉस्पिटल आ सकती है क्योंकि फ़िलहाल महिला पुलिस हमारे साथ नहीं है.", कांस्टेबल ने पूरी बात बताई तोह लाजवंती की हालत हे ख़राब हो गयी. वो कांस्टेबल चला गया था लेकिन लाजवंती तोह बहार की तरफ जैसे शुन्य में देख रही थी. होश आया तोह बिना सोचे समझे हवेली का नंबर मिला दिया. आँखों से आंसू बह रहे थे लेकिन बुरी किस्मत ये थी की आज फ़ोन भी खराब था.
'जब सब रस्ते बंद होते है तोह फिर एक साथ हे होते है.', इतना कहती वो पैदल हे हवेली की और निकल चली, बिना परवाह किये कीचड और अँधेरे की. 15 मिनट में वो भारी कदमो के साथ हवेली के द्वार पहुंची थी की चेतना वापिस आयी. कैसे कहे और क्या कहे? लेकिन कुछ तोह कहना हे था क्योंकि अब उसकी बेटी हे तोह एक सहारा थी इस गाँव में उसका. सांकल खड़कते हुए दरवाजा बजाय तोह 2-3 मिनट बाद बिजेन्दर ने हे वो छोटा द्वार खोला.
"काकी इतनी रात को? सब खैरियत तोह है?", उन्हें अंदर लता वो पूछने लगा. चारपाई उसकी भी गलियारे में लगी थी जहा बारिश से भीग भी नहीं सकता था लेकिन घर पर नजर भी रख सकता था.
"बीटा वो चन्दर घर पे बोल के आया था के यहाँ आज महफ़िल है लेकिन उसके बाद पुलिस को उसकी लाश मिली वो भी गाँव से बहार खेतो में.", बिजेन्दर इतना सुनते हे भोचक्का रह गया. रह रह कर कुछ बुँदे गिर रही थी लेकिन उनसे परे दोनों गलियारे तक आ पहुंचे और इधर मधुलता के साथ साथ गुड्डी, ऋचा और बबिता भी यहाँ आ गयी थी.
"नानी, इतनी रात में आप यहाँ?", ऋचा ने हे सवाल किया था रोटी हुई लाजवंती से.
"मुन्नी, चन्दर हमारे बीच न रहा. पुलिस अभी बता कर गयी है. उसकी लाश सरकारी हॉस्पिटल में है बेटी, मेरे साथ चल के ले आ उसको.", फफकती हुई लाजवंती की बात सुन्न कर मधुलता, गुड्डी के चेहरे के तोह रंग हे उड़द गए थे. लेकिन मुस्कुराती हुई ऋचा को देख बिजेन्दर कुछ शांत हे रहा.
"माँ ये सब कैसे हुआ? भैया यही से तोह 4 घंटे पहले गए थे.", लता की तोह आप रुलाई निकलने लगी थी.
"जो होगा नानी वो सुबह हे होगा. रात तोह पोस्टमॉर्टम करके वो डेड बॉडी देने से रहे. आप यहाँ आराम से सो जाओ सुबह चली जाना माँ को लेके.", ऋचा ने तोह ये तक न कहा के वो चलेगी साथ. स्पष्ट ना.
"क्या बक्ति है तू? मेरा भाई मारा गया, तेरा मां और तू ऐसी बात कर रही है. माँ मई शंकर का नंबर मिलती हु, वो कुछ करेंगे."
"हाँ बेटी, शंकर सरकारी बड़ा डॉक्टर है, वो सब कर देगा.", लाजवंती ने अभी इतना हे कहा था के ऋचा ने बात काट दी.
"ऐसी गलती भी मैट करना माँ. नहीं तोह नंबर मैं मिलाऊँगी इस बार शंकर चाचा का. और नानी सुना है माँ का बहोत गहरा प्यार था इस मां के साथ. चुपचाप इस हवेली से वापिस अपने घर चली जाओ. और ये अगर उस शैतान के संस्कार पर भी आयी तोह फिर वही रहेंगी. गूडनिघत और बिजेन्दर भैया गेट तक छोड़ आये नानी को आप, माँ जाना चाहे तोह उन्हें भी.", ऋचा इतना बोल कर अंदर चली गयी लेकिन बबिता की ऐसे मौके पर भी हंसी छूट गयी.
"बिज्जू छोड़ आ भाई, दादी जाग गयी तोह आज दुलारी 2 बार चालेगी. ऋचा शायद अपने से ज्यादा जान गयी कुछ.", इस बात का असर तुरंत हे हुआ और गर्दन झुकाये लाजवंती बहार की और चलने लगी.
"काकी, रात यही रहो. सवेरे मैं भिजवा दूंगा आपको हॉस्पिटल. चची ले जाओ अपने साथ और ऐसा कुछ न करना के जिसका दुःख हो बाद में.", बिजेन्दर ने बड़प्पन दिखते हुए उन्हें घर के भीतर किया तोह भीगी आँखों से लाजवंती अपनी बेटी के साथ उसके कमरे में चली गयी. ऋचा अपनी ताई सुशीला के पास आ गयी थी और पीछे पीछे बबिता भी.
"इसने सीप लगा दी माँ पक्की वाली. या छोरी शायद कोई बड़ा राज जान गयी है और मैंने लगे है अगर तू इसके साथ न रही तोह या मारी जाएगी.", हंसी से बात शुरू करते हुए बबिता ने एकदम हे बड़ी बात कह दी थी. सुशीला सिंह न हिम्मत होते हुए भी बिस्टेर पर बैठ गयी थी.
"ये रात कोई मजाक तोह नहीं कर रही तू बबिता? बिजेन्दर कहा है और ऋचा तू इधर आ.", सुशीला ने तुरंत हे ऋचा को बगल में बुला लिया.
"मैं इधर हे हु माँ, वो बात ऐसी है के मुन्नी काकी का ममेरा भाई चन्दर मारा गया है ऐसा पुलिस ने बताया है."
"तोह जाना चाहिए न मुन्नी को और ऋचा को."
"ताई, शांत रहो. इस हवेली से जो भी उधर गया न तोह सच कहती हु पापा से बुरा कोई न होगा फिर. उमेद चाचा से तोह आप ru-ba-ru हो न, उन्होंने हे दोनों को ऊपर पहुंचाया है क्योंकि उस शैतान ने मेरे हाथ लगाया था. लेकिन कोई कुछ नहीं बोलेगा, हिसाब हो चूका है.", ऋचा ने अपनी ताई को जबरदस्ती साथ लगते हुए लेता लिया तोह बिजेन्दर ने भी सहमति जाता दी.
"उमेद न इज्जत पे बात आ जाये तोह फिर सोचता न कुछ मेरी बची. वो गोली की आवाज सबने सुनी थी और माँ जी को भी पता है के किसी ने तेरे साथ कुछ गलत हे किया होआ. शंकर अलग है, वह गाँव के आग लगा देगा अगर तुझे किसी ने हाथ लगाया. चल अब सो जा, ऐसी बहोत गोलियां देखि है हमने.", सुशीला सिंह ने भी ख़ामोशी से अपनी भतीजी को गले लगते हुए दूसरी तरफ बबिता को सोने का इशारा किया. आज रात कुछ लोगो के लिए लम्बी होने वाली थी.