Incest Pyaar - 100 Baar - Page 22 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 123

प्रभाव - 3


"कहा आवारागर्दी करता घूम रहा है तू?", घर के अंदर अभी आया हे था अर्जुन की ऋतू ने थोड़े तीखे अंदाज में स्वागत किया. वक़्त से थोड़ा लेट होने पर स्वागत तोह ऐसे हे होता था उसका लेकिन ये बात उसको दादी हे कहती थी. और कौशल्या जी, जो किसी काम से आँगन में थी वो भी ऋतू की ऊँची आवाज सुन्न कर वही देखने लगी.

"वो यही पास में था लेकिन टाइम का पता नहीं चला सॉरी.", अर्जुन कभी ऋतू से बहस नहीं करता था क्योंकि वो बड़ी थी और उस से बेइंतेहा प्यार करती थी.

"कार की चाबी इधर ला और आइंदा 8 बजे घर मतलब घर. तेरे पास मोटरसाइकिल और साइकिल है अगर अकेले हे जाना हो तोह. कार बता कर और सिर्फ जब जरुरी हो तभी. चल जा के mooh-hath धो मैं खाना लगाती हु.", अर्जुन ने भी जेब से कार की चाबी उन्हें थमा दी जिसको लेने के बाद वो खुद हे अर्जुन के लिए नलका चलने लगी. हाथ मुँह धोने के बाद टोलिया भी ऋतू दीदी ने हे दिया और रसोई में चली गयी. कुछ सोच कर कौशल्या जी खाने की मेज पर हे बैठ गयी जहा फ़िलहाल सिर्फ अर्जुन हे था.

"तू इतना भी छोटा नहीं है उस से फिर कभी कुछ बोलता क्यों नहीं पलट कर?", कौशल्या जी ने बात बड़े आराम से कही थी जो अर्जुन के सिवा सिर्फ ऋतू को सुनाई दी, जो खम्बे के पास कड़ी प्लेट साफ़ कर रही थी.

"छोटा तोह अगर 1 मिनट भी होता तब भी वो बड़ी हे रहती दादी. गलती तोह मेरी हे है के मैं देर से आया और उन्हें भी डर लगता है क्योंकि कार लेके गया था.", अर्जुन ने गिलास में पानी दाल कर अपनी दादी की तरफ बढ़ाया जिनके हाथ में अजवाइन थी.

"कार जब ली है तोह चलाएगा हे, तभी तोह हाथ साफ़ होगा. और तेरी कार के अगर कुछ होता है तोह उसको टेंशन क्यों हुई भला?", कौशल्या जी कहने को तोह दिखा रही थी की वो अर्जुन का साथ दे रही है और ऋतू की बात का बुरा लगा उन्हें. लेकिन वो ऐसे हे कोई बात नहीं करती थी और वो भी ऋतू के लिए जो उनकी जान थी.

"कार तोह और आ जाएगी दादी लेकिन मैं? मुझे कुछ हुआ तोह फिर? बस उनकी यही चिंता है और गलती से मैं बता कर भी नहीं गया था. सॉरी और दीदी नाराज नहीं है वो बस मुझे ले कर थोड़ा ज्यादा घबरा जाती है जैसे आप खुद. आप भी तोह वैसी हे हो जो जानते हुए वही सवाल कर रही हो क्योंकि ये सब तोह आप कहने वाली थी अगर ऋतू दीदी न कहती.", कौशल्या जी मुस्कुराती हुई कड़ी हो गयी. पानी का गिलास अंदर ले जाने से पहले उन्होंने अपनी लाड़ली पौती को गले लगते हुए माथा चूमा और अनजाने हे मुँह से अनचाही इत्छा निकल gayi.'Shivji जोड़ी बनाये रखे' लेकिन ये बात जैसे वो बुदबुदा गयी थी बस.

"चल खाना खा ले उसके बाद रुपाली के साथ थोड़ा पढ़ लेना.", ऋतू दीदी ने खाना लगाया हे था और विन्नी दीदी के साथ आरती, तारा और अलका भी आ बैठी. विन्नी ने तोह आते हे अर्जुन के बराबर वाली सीट हथिया ली थी और दूसरी तरफ आरती.

"आज कोई padhai-vadhai नहीं बोल देती हु. ये आज मेरे साथ टाइम स्पेंड करेगा फिर चाहे फिल्म देख के या फिर बातें कर के.", विन्नी दीदी ने अर्जुन के कंधे पर हाथ रखते हुए ऋतू से कहा तोह वो बस मुस्कुरा दी.

"हाँ ठीक है कर लो आप भी इसके साथ टाइम स्पेंड फिर कल इसके प्यारे भैया आ जायेंगे तोह ये किसी के पास नहीं बैठने वाला.", अलका ने जैसे हे संजीव भैया का जीकर किया तोह अर्जुन के चेहरे पर चमक आ गयी.

"वाओ. ये तोह सचमुच ऐसे खुश हो रहा है जैसे भैया न हुए कोई कुम्भ का मेला हो गया. कोई बात नहीं वैसे भी कल मैंने वापिस जाना है तोह आज इस मुन्ना की हे टांग खिंचाई कर लेते है.", विन्नी दीदी ने भी एक प्लेट में खाना डालने के साथ हे उसको आरती की तरफ बढ़ा दिया. और अलका ने ऐसा हे तारा के लिए किया. फिर अपना भी खाना लगते हुए सभी हलकी फुलकी बातें करते भोजन का लुत्फ़ लेने लगे लेकिन पंडित जी के कमरे में माहौल थोड़ा अलग था अभी.

"खुश भी हो और थोड़ा थोड़ा परेशां भी. थानेदारनी जी ऐसी रंगत आज पहली बार देखने को मिल रही है.", रामेश्वर जी आज थकान महसूस कर रहे थे तोह जल्दी हे बिस्टेर पर आ गए थे. अपनी बीवी को देख उन्होंने सवाल कर हे लिया.

"दिमाग और दिल कई बार अलग अलग चल पड़ते है तोह चौराहा बन्न जाता है जी. तब बात 2 नहीं 4 तरफ़ा हो जाती है और आज मेरे से भी यही हो गया.", कौशल्या जी ने अजवाइन और पानी अपने पति को देने के बाद हाथ कपडे से साफ़ किये और बिस्टेर के दूसरी तरफ जाने से पहले जीरो की रौशनी कर दी बड़ी तुबे बंद करते हुए.

"धर्मसंकट तोह कोई बड़ी बात नहीं है कौशल्या. एक तिनके के 2 हो जाये तोह roop-rekha बदलना स्वाभाविक हे है. अब कहो के दिमाग और दिल में ऐसा कौनसा द्वन्द चल गया जिसमे दिल को जीता रही हो और दिमाग को पीछे भी नहीं हटा पा रही.", पंडित जी भी गहरी जानकारी रखते थे इंसान और भावनाओ की.

"ये सब न आपकी हे कारस्तानी है जी और आपके कपूत की. मेरे दिमाग में जाने कैसे कैसे ख्याल बैठा दिए है आप लोगो ने और मैं खुद अनजाने हे प्रभावित हुए जा रही हु.", हलकी नाराजगी से कौशल्या जी ने इतना कहा और तकिया ठीक करके करवट के बल लेट गयी.

"देखो कौशल्या कोई भी किसी के मैं को नहीं बदल सकता अगर सामने वाला स्वीकार न करे. और इतना घुमा फिर कर बात क्यों कर रही हो, सीधा कहो के अर्जुन और मैंने ऐसा क्या कर दिया है जिसका तुम पर dush-prabhav हो रहा है?"

"मैंने कब कहा के ये गलत प्रभाव है? बस ये लड़की न उसके साथ वैसे हे बर्ताव करती है जैसे माँ या प्रेमिका हो उसकी. अर्जुन सामने से कभी जवाब तक नहीं देता चाहे बात वो कितनी बड़ी हे क्यों न कह दे. किसी और का होना न होना भी नहीं देखती.", अब रामेश्वर जी भी थोड़े गंभीर हो गए थे इतना सुन्न कर.

"जब शंकर ने कहा था के मैं अर्जुन को सांड बना रहा हु जो कल को मुझे हे भरी पड़ सकता है, तोह तुम्हे ध्यान है मैंने क्या कहा था? सांड कितना भी बड़ा क्यों न हो लेकिन वो एक मामूली सी रस्सी में बांध जाता है अगर दूसरा सीरा उसको प्यार करने वाले के हाथ में हो. तुम इसको झुठला नहीं सकती कौशल्या के अर्जुन को निस्वार्थ सिर्फ ऋतू हे नियंत्रित रखती है.", रामेश्वर जी की बात सुन्न कर उनकी धर्मपत्नी जी का स्वर भी थोड़ा सा चिंतित सा हो गया था.

"जी आप जानते हो के बचो में मैंने कभी फरक नहीं किया लेकिन ऋतू मेरे लिए भी ख़ास है. उसका एक पक्ष जो सबके सामने है वो बिलकुल अर्जुन जैसा है या उस से भी बेहतर. लक्ष्य के लिए हमेशा गंभीर, मेहनती, कड़े निर्णय लेने वाली और मर्यादित श्रेष्ठ संतान सा. वही अर्जुन के लिए वो इस सब से उलट है जैसे वो खुद हे अर्जुन को श्रेष्ठ बनाना चाहती है लेकिन सिर्फ अपने लिए.", इतनी गहरी बातें और अपनी बीवी की चिंता देख पंडित जी परिचित अंदाज में मुस्कुरा दिए.

"तुम वैसा नहीं चाहती क्या कौशल्या?", कौशल्या जी तोह ऐसे चौंक गयी जैसे उनकी चोरी पकड़ी गयी हो लेकिन रामेश्वर जी ने खुद हे बात आगे कही.

"देखो वो उसको बेहतर बना रही है लेकिन तुमने अगर ध्यान दिया हो तोह ऋतू ने अपने व्यक्तित्व के पहले पक्ष के साथ समझौता नहीं किया है. आज सवेरे भी अर्जुन की हालत तुम्हारे सामने हे थी की ऋतू उसको कही बेहतर निखारना जानती है. लेकिन ये एक अंदरूनी पक्ष जिस से तुम्हे डर या चिंता हो रही है तोह मेरी सलाह यही है के सब वक़्त पर छोड़ दो."

"आप ऐसे कैसे कह सकते हो जी की सब वक़्त पर छोड़ दो? वक़्त आने पर अपने हे पौटे का ब्याह पौती के साथ करवा सकते हो आप? मुझे तोह ये होता दिख रहा है क्योंकि अर्जुन की नजरो में ऋतू के लिए सिर्फ प्यार है और कोई सवाल तक नहीं. इतनी दुनिया तोह मैंने भी देखि है जो बता न सकू के ये प्यार कैसा है."

"तुम आशीर्वाद डौगी तोह मैं भी हाथ पीछे नहीं रखने वाला बस फिर अपनी ज़िन्दगी के निर्णय उन्हें हे लेने होंगे, सिर्फ उन्हें.", रामेश्वर जी को जैसे कुछ हद्द तक भविष्य पता था जो इतना सरल भी न था लेकिन हल निकला जा सकता था.

"यही गलती हुई है जी अभी थोड़ी देर पहले. दिल से अपने आप हे निकल गया के भगवन उनकी जोड़ी बनाये रखे और अब खुद पर हे गुस्सा आ रहा है एक ये मैं कैसे कर सकती हु. गलत में गलत होना समझदारी नहीं है."

"तुमने इस से भी बड़े बड़े आशीर्वाद और कस्मे दी है कौशल्या और जबतक तुम्हारा साथ है मैं सबकुछ कर सकता हु क्योंकि ये परिवार तुमने बसाया है. मैं खुद इसका हिस्सा हु क्योंकि इन्हे तुमने बिखरने देने की जगह मजबूती से बांधे रखा है. कीमत कई बार बहोत बड़ी चुकानी पड़ी लेकिन तुमने कुछ भी बिखरने नहीं दिया. और अब भी नहीं होने डौगी ये मुझे विश्वास है.", अपने पति के इस जवाब पर कौशल्या जी ने कितने हे वर्षो बाद आज उनके गाल को छु लिया था.

"Putra-moh में आपने भी बहुत कुछ किया है जी तोह ये दिन भी साथ मिल कर हे देखेंगे. बस अगर मैं पहले चली जाऊ तोह अर्जुन को अधूरा मैट रहने देना. बहोत सारे राज ऐसे है जो समय रहते हे बस ख़तम हो जाए और शंकर भी आपके जैसे निर्णय ले सके. रेखा मुझ से कही बेहतर है और वो अर्जुन को रोके रहेगी."

"तुम अभी न जाने लगी थानेदारनी. जो बात मुँह से निकली है वो मेरे साथ पूरी करना बस क्योंकि संतुलन तोह दोनों के साथ रहने से होगा. बाकी शंकर का दिल भी बहोत कुछ समझता है बस वो जाहिर नहीं करता. दुविधा में है के अभी बेटे को प्यार करे या बाद में...", रामेश्वर जी ने बात अधूरी छोड़ कर एक मुस्कराहट दी तोह कौशल्या जी भी हंसने लगी.

"हाँ जलोकदा है वो पूरा और हो भी क्यों न, बाप ने सबकुछ तोह उसको बिना मांगे दे दिया. अब दिक्कत हो रही है तोह या तोह बात करे या चुपचाप रहे. चलो आप आराम करो जी, मैं एक चक्कर लगा आती हु.", कौशल्या जी ने खड़े होने से पहले अपने पति को कमर तक चादर दी और बहार चली आयी पीछे दरवाजा वापिस बंद करके.

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हवेली पर लड़की के साथ साथ लड़के का भी ब्याह था और एक प्रतिष्ठा के साथ साथ ये अलग परंपरा भी थी जहा मर्दो के लिए मदिरापान का आयोजन भी होता था. बिजेन्दर ने तोह मन भी किया था अपनी माँ और दादी को इस सबके लिए लेकिन चंद्रो देवी ने खुद हे कहा के इस अवसर पर वो ये परंपरा भी शामिल रखेंगी. हवेली के सामने हे इनका ये आधा एकड़ का चारदीवारी किया नोहरा था जहा उन्होंने आयोजन के लिया बिजेन्दर को आदेश दिया.

7 बजे के बाद हे हलकी रौशनी में उस जगह desi-angrezi की छोटी छोटी महफ़िल जमने लगी जो बाद में 50 लोगो की एक बड़ी महफ़िल बन चुकी थी. Murga-mutton के साथ साथ हल्का संगीत भी डेक से बज रहा था और सब अपने अपने हिसाब से पीते हुए हवेली में होने वाले विवाह की शुभकामनाये दे रहे थे. 8 बजे के करीब उमेद सिंह इस बड़े नोहरे में चले आये तोह नौजवान लड़के संकोचवश 1-2 बोतल ले कर अपनी महफ़िल गाँव से बहार हे ले गए.

"सब ठीकठाक है न यहाँ? कोई कमी पेशी.", उमेद सिंह के इतना बोलते हे कुछ लोग हाथ जोड़ कर खड़े हो गए और बिजेन्दर भी उनके पास चला आया.

"न काका, सब ठीक है. मुझे पता न था के आपने ये सब भी मंगवा रखा है."

"बिजेन्दर बीटा, अब बरात में तोह सिर्फ तू खुश होवेगा. यहाँ इन्हे भी तोह खुश करना है.", उमेद काका की बात सुन्न कर बिजेन्दर लड़की सा शर्माने लगा तोह बाकी सब भी हंसने लगे. आधा घंटा वह लोगो से बतलाने के बाद उमेद अपने साथ हे बिजेन्दर को लिए सामने हवेली आ गए. बिजेन्दर तोह वैसे भी शराब से दूर हे रहता था और साथ हे कल के दिन जो जरुरी काम थे उनकी चर्चा भी करनी थी. उधर नोहरे में भी 2 घंटे में लगभग सभी लोग टुन्न हो कर अपने अपने घर चले गए थे. बिजेन्दर को दिल से धन्यवाद् करते हुए और उमेद सिंह सिग्रत्ते पीने हवेली की छत्त पर. चंद्रो देवी के सामने सिर्फ शंकर की हे इतनी हिम्मत थी या उमेद को कुछ झिझक थी.

"thak-thak." ये आवाज सांकल की थी जो किसी ने दरवाजे पर बजे थी. बिजेन्दर नहाने गया था और उमेद ऊपर थे. मधुलता के कहने पर ऋचा ने दरवाजा खोला तोह सामने खड़े व्यक्ति को हाथ जोड़ कर नमस्ते करती हुई बोली.

"जी मां, कोई काम था क्या इतनी रात को?", ये व्यक्ति था चंदरभान, ऋचा का मां और लता का ममेरा भाई. जो एक बार ऋचा को निहारने के बाद बोलै.

"ऋचा बिटिया, ठंडा पानी न है उधर और 1 खास दोस्त बैठा है तोह बस एक गड़वी ठंडा पानी भिजवा दे. फेर हम भी अपने घर चले.", चंदरभान लड़की का मां था और उसी हक़ से उसने अपनी बात कही थी. ऋचा भी उस छोटे दरवाजे को वैसा खुला छोड़ कर अंदर चली गयी. गुड्डी ताई को बता कर वो वापिस गेट पर आयी तोह मां वह नहीं दिखा. कुछ सोच कर वो 10 कदम दूर नोहरे की तरफ चल दी.

"मां, ये लो पानी. बर्फ भी दाल दी है इसमें.", हलकी आवाज में ऋचा ने गेट के पास से हे आवाज दी तोह सामने लकड़ी के तख़्त पर बैठा वो व्यक्ति बोलै.

"बिटिया, चन्दर हल्का होने गया है. पानी यहाँ रख दे मेरे हाथ मैले है थोड़े.", ऋचा हवेली की बेटी थी तोह निडर भी थी क्योंकि सभी उनके परिवार से नजरे नीची करके बात करते थे. लेकिन शायद उसको भी नहीं पता था के इस शराब ने तोह ाचे ाचे को बेइज्जत्त कर छोड़ा है और कितने हे दुनिया से जा चुके इसकी जड़ में आ कर. कदम नोहरे में रखती वो इस हलके अँधेरे की तरफ चल दी. ये व्यक्ति भी उसके हे मां की उम्र का था और अभी भी मुर्गे की टांग से बचा खुचा मंच उधेड़ने में व्यस्त था.

"ऋचा बिटिया ये लट्टू दिक्कत कर रहा था इसलिए बंद कर दिया. तू पानी ले आयी?", लोहे के गेट से अंदर आते चंदरभान ने लौटा रखती ऋचा को देखा तोह अँधेरे की वजह बताई. ाचे सुरूर में थे ये दोनों व्यक्ति जिस वजह से अब ऋचा को चलना हे उचित लगा. लेकिन सामने से चंदरभान ने आते हे भांजी के कंदेह पर हाथ रख दिया.

"ये भी तेरा मां हे लगता है ऋचा और मनबीर ये अपनी मुन्नी की बेटी है मेरी भांजी.", इस बात पर पहली बार व्यक्ति ने थोड़ा गौर से ऋचा को देखने की कोशिश की. बहार से आती रौशनी में हल्का चेहरा और शरीर देखा जा सकता था.

"हम्म्म. चोखी बात है चन्दर और बीत्या तोह माँ से भी सुथरी है. पहले न देख्या बिटिया को?", अब ऋचा भी मज़बूरी में ठिठक गयी थी लेकिन किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा माँ को सुन्दर कहना उसको जांचा नहीं.

"देख्या तोह मैंने भी आज हे है भाई 4-5 साल बाद. बहार पढ़ती है न तोह नजर न आयी. अब गाँव में है और मैं भी कुछ दिन इधर हे हु तोह भांजी को मां का पूरा प्यार दूंगा.", ये कहते हुए चंदरभान का हाथ फिसल कर कंधे से ऋचा के नितम्ब को रगड़ गया. शरीर में ये कैसी झरझरी सी दौड़ गयी थी. मां हो कर कैसे वो उसके साथ ये कर सकता था लेकिन सदमा तोह मनबीर की बात सुनकर लगा.

"मुन्नी वाला प्यार तोह बस पीछे पीछे था भाई, ये भांजी है तोह इसको पूरा देना पड़ेगा.", ऋचा नादान न थी जो ऐसी द्विअर्थी बातें न समझ सकती और उसको शांत खड़े देख चन्दर ने हद्द लांघते हुए जाएंगे के बीच हे पीछे से हाथ दाल कर दबा दिया.

"मन न करेगी मेरी भांजी.. आठ..", 'चटाक की आवाज के साथ हे चंदरभान की चीख निकल गयी और थप्पड़ की गूँज सुन्न कर 1 मिनट में हे उमेद सिंह इधर आ पंहुचा जहा से ऋचा उसकी हे तरफ आ रही थी. गुस्से के साथ रोटी हुई.

"रुक बेटी. क्या हुआ था यहाँ अभी?", ऋचा के साथ बहार उमेद सिंह को देखते हे ये दोनों व्यक्ति नशे में होने के बावजूद बड़ी तेजी से दिवार फांद कर खेतो की तरफ भाग निकले.

"चाचा, वो वो आदमी मेरा मां कैसे है? छियई.. कितनी घटिया हरकत और वो भी अपनी बेटी जैसी भांजी के साथ.", ऋचा के मुँह से इतना हे सुन्न पाया था उमेद सिंह और तुरंत बहार कड़ी जीप में अपनी भतीजी को बैठा वो निकल चला उस जगह जहा ये घिनोना मां मिल सकता था. लेकिन पीछे हवेली के गेट पर कड़ी लता के शरीर को जैसे लकवा मार गया था ये बातें सुन्न कर.

"मुन्नी, वह क्यों कड़ी है?", चंद्रो देवी की आवाज सुन्न कर वह घबराती हुई पलटी तोह इधर बिजेन्दर भी आँगन में आ गया था.

"वो माँ जी पता नहीं जेठ जी ऋचा को जीप में बैठा कर किधर ले गए. गुस्से में थे."

"ऋचा बहार कब गयी मुन्नी? उमेद भी कोई आवाज सुन्न कर हे गया था तोह मतलब वह कोई घटना हुई है? चल देख लेगा वो अपने आप तू काम कर."

"मैं कह रही थी की बिजेन्दर बस पीछे चला जाये तोह.."

"मुन्नी, उमेद गया है न. बिजेन्दर घर से बहार ब्याह वाले दिन हे निकलेगा अब.", घबराती हुई लता जैसे तैसे एक कोने में चूल्हे के पास जा बैठी. मैं अशांत था और दिल घट्ट रहा था ये सोच सोच कर की अनजाने में हे चन्दर ने काले राज खोल दिए तोह वो जीते जी मारी जाएगी. इसके साथ हे कही दूर एक पटाखा चलने की आवाज सुनाई दी जिस से इस हवेली के लोग तोह ाचे खासे वाकिफ थे. कोई 15 मिनट बाद उमेद और ऋचा वापिस आये तोह उमेद सिंह के चेहरे पर ख़ास भाव न थे. ऋचा भी सधी हुई चाल से अपने कमरे में चली गयी.

"ाचा ताई मैं चलता हु, कल हल्दी पे माँ और राजेश्वरी को लेके आ जाऊंगा. और 2-3 लोग गेट पे रखने शुरू करो, खेतो में अभी जरुरत नहीं है.", पाँव छू कर वो जाते हुए बिजेन्दर से भी थोड़ी बात करके गए. मधुलता अभी तक बेचैन थी और चंद्रो देवी बस अकेले बैठी मुस्कुरा रही थी. अपनी बेटी को दूध देने का बोल कर लता अंदर ऋचा के कमरे में आ गयी थी.

"बहार क्या हुआ था ऋचा?"

"थोड़ी देर में या सवेरे पता लग हे जायेगा आपको की क्या हुआ होगा. अब जान गयी हु के दादी और बिजेन्दर भैया क्यों पापा और उमेद चाचा को मर्द बोलते है.", ऋचा के जवाब ने लता को जैसे मिर्चे लगा दी थी.

"तू क्या बकवास कर रही है तुझे पता है? तू जवान हो रही है तोह क्या कुछ भी बकेगी?"

"आवाज निचे रखिये माँ. मर्द का मतलब सुरक्षा देने वाला भी होता है. सोच में कही तोह खराबी है और मैं ये जान कर रहूंगी.", ऋचा को पता था के ऐसे तोह माँ पीछा नहीं छोड़ने वाली तोह उठ कर वो दादी के पास आ गयी. लता बस हैरत से कड़ी देखती रही.

"दादी अबसे मैं आपके साथ हे सोया करुँगी या फिर बड़ी ताई जी के साथ.", ऋचा की बात सुन्न कर सुशीला ने पलट कर हे जवाब दे दिया.

"मेरे साथ. माँ जी नींद में बन्दूक उठा ले कुछ पता नहीं. तू मेरे साथ हे सोया कर अगर अकेले में दिक्कत है तोह.", लाड से वह उसका सर सहलाने लगी जिसके भीतर ऋचा न जाने क्या कुछ सोच रही थी. पिछले आधे घंटे में एक तरह से उसकी दुनिया हे ulat-palat गयी थी लेकिन वो शायद नतीजे पर नहीं पहुंची थी. और साथ साथ मधुलता भी जैसे एक अलग हे सदमे में आ गयी थी. उसकी बेटी ने कोई सवाल न किया था. लेकिन आवाज नीची रखने का जैसा आदेश दिया था उतनी हिम्मत तोह आज तक किसी का न हुई थी. इसको भी एक मूक संधि मान कर वो खामोश हे रह गयी.

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अर्जुन को आज खाने के बाद ऋतू दीदी ने पहली बार इस नए कमरे का परिचय करवाया. यहाँ उनकी ट्रेडमिल और एक आइना हे होता था जहा समय मिलने पर वो लोग खुद को तराशने के लिए म्हणत करती थी. लेकिन आज ये जगह अलग थी और कही बेहतर. अर्जुन इस 12क्ष14 के कमरे में आया तोह वह बस हैरत से देखने लगा. ये भविष्य में एक और bathroom-store के लिए छोड़ा गया हिस्सा था जो एक व्यायामशाला में तब्दील हो चूका था.

"जिस दिन स्टेडियम नहीं जाओगे उसदिन यहाँ 90 मिनट रहना होगा. वैसे तोह ये no एंट्री है किसी भी व्यक्ति के लिए लेकिन मैंने तुम्हारे लिए इसको बदल दिया है. अपना अलग मत भी ले आना जब मार्किट जाना हो क्योंकि हम सबके अलग अलग है, विथ नाम. संजीव भैया का सारा सामान इधर है और चाहो तोह ऐसा हे एक बेंच और ले लेना, कुछ वेइट्स के साथ.", कमरे में वही सब सामान ाचे से रखा था जो संजीव भैया कसरत में प्रयोग करते थे. डम्बल, 3 तरह की रोड, लोहे की विभिन्न प्लेट, एक वजनी इस्पात का गद्दी लगा टेबल और एक रोड जो लटकने के लिए अलका ने हे यहाँ लगवाया था.

"ये तोह अपने आप में हे एक गयम है. आप लोग ये सब भी करती हो क्या?", अर्जुन ने जिज्ञासावश पुछा तोह ऋतू से पहले अंदर आती तारा ने जवाब दिया.

"न लेकिन रोड उसे कर लेते है कभी कभी. लेकिन तू हलके वेट लेकर देगा तोह मैं तेरे साथ करने को रेडी हु. बाकी तोह बस रनिंग, स्ट्रेचिंग और जो Alka-Preeti सिखाती है वही सब होता है."

"करवाती हु तुझे तोह मैं इसके साथ एक्सरसाइज, बड़ी आयी डोले बनाने वाली. ये सब तुम अकेले करोगे और अगर जरुरत पड़े तोह कोमल दीदी या प्रीती को बुला सकते हो. बस अपना अलग मत जरूर ले आना.", ऋतू ने तारा का हाथ पकडे हुए हे अर्जुन को निर्देश दिए के वो यहाँ संजीव भैया को भी आमंत्रित नहीं कर सकता. अर्जुन ने भी सर हां में हिला दिया.

"चल अब अपने कमरे में जा और आराम कर. सवेरे 5 बजे मैं बुलाने आउंगी तोह तैयार मिलना. चल तारा अब पढ़ने का टाइम हो गया. पापा से बोल कर अब कंप्यूटर भी मंगवाना पड़ेगा.", कमरे को वापिस बंद करती ऋतू दीदी अपने साथ तारा को भी अपने कमरे में ले गयी. अर्जुन सर खुजाता हुआ अगले हिस्से में आया तोह कमरा बर्फ सा ठंडा हो रखा था लेकिन ऐसे में भी विन्नी दीदी के साथ Madhuri-Priyanka दीदी बैठी हुई ये फिल्म देख रही थी.

"थोड़ा तोह टेम्परेचर ठीक रखो दीदी, कुल्फी जमनी है क्या?", अर्जुन अंदर आते साथ हे रिमोट से तापमान बढ़ाते हुए बोलै तोह विन्नी दीदी ने आँख मार दी.

"बहार से आया है न इसलिए लग रहा है. तू कहा भटकता फिरता है हर वक़्त?", विन्नी दीदी के इस सवाल को अर्जुन ने अपने कमरे में जाते हुए सुना और अलमारी से पजामा टीशर्ट निकलते हुए बोलने लगा.

"ाची नींद के लिए भटकना तोह पड़ता हे है दीदी. वैसे बहार सचमुच एकदम से उमस जैसा हो गया है.", अर्जुन कंधे पर टोलिया टाँगे वापिस इस तरफ आया तोह कोमल दीदी अपनी जगह से कड़ी हो गयी.

"आ के नाहा लियो ारु, बारिश आ गयी तोह मेरी सहमत आ जाएगी. छत्त पर दरी, परदे धुप लगवाने के लिए रखे थे और भीग गए तोह दादी ने जान ले लेनी है.", वो अभी इतनी बात कहके हटी थी की तेज गर्जना ने उनकी बात को साबित कर दिया. अर्जुन उनसे पहले हे कमरे से बहार निकला और छत्त पर बढ़ गया. अभी तक बारिश शुरू नहीं हुई थी लेकिन आसमान घुट्ट गया था.

"तू उधर से समेत और मैं ये परदे उठती हु.", कोमल दीदी ने बिखरे हुए पर्दो को उठाना शुरू किया तोह अर्जुन उनसे दुगनी रफ़्तार से बाकी सब समेटने लगा. विन्नी दीदी भी इधर आ गयी थी जो कोमल की मदद करने लगी.

"वैसे ाचा हे है के बारिश आ जाये. 2-3 दिन से बादल आ रहे है लेकिन बरस नहीं रहे. चलो इधर का तोह हुआ, ये आप लेके चलो मैं बाकि लेके निचे आती हु.", विन्नी दीदी ने कोमल दीदी को उठाने लायक सामान देने के बाद अर्जुन द्वारा तेह किये परदे और चादर खुद उठा लिए. भारी दरी और कालीन अर्जुन खुद उठा कर उनके पीछे चल दिया. फ़िलहाल के लिए सबकुछ संजीव भैया के कमरे में रखते हुए तीनो ने रहत की सांस ली.

"सॉरी दीदी, आपसे भी काम करवाना पड़ा.", कोमल दीदी ने अर्जुन के तोलिये से हे विन्नी दीदी के हाथ साफ़ किये और फिर अपने भी करने के बाद टोलिया अर्जुन को देती गूडनिघत बोल कर निचे चली गयी. साढ़े 10 बज चुके थे और प्रियंका दीदी के साथ वह माधुरी दीदी काम करवा रही थी. कोमल दीदी बड़ी बहिन से काम नहीं करवाना चाहती थी इसलिए खुद हे रसोई में आ जुटी बर्तन साफ़ करने.

"बारिश में नहायेगा?", अर्जुन से जैसे हे विन्नी दीदी ने ये कहा वो उन्हें हैरत से देखने लगा.

"एक में बैठी थी आप इतनी देर से और अब इतनी रात को बारिश में नहाने की बात कर रही हो. बीमार पड़ गयी न फिर आपको तोह कोई कुछ नहीं कहेगा लेकिन मेरी शामत आ जाएगी. आप आराम से टेलीविज़न देखो मैं बाथरूम से नाहा कर आया.", अर्जुन ने इतना जवाब दिया और अंदर घुसते हुए दरवाजा बंद कर लिया.

"सहित. मेरी ुंडिएस... हो गयी एक और गलती तुझसे विन्नी.", अपने सर पे हाथ रखती विन्नी को ध्यान आया के कपडे बदलने के बाद वो अपने अधोवस्त्र अंदर हे छोड़ आयी थी. वो भी बेपर्दा और अर्जुन को जाते हे दिख जाने वाले है. शर्मिंदगी में यहाँ से गायब होने के सिवा कोई दूसरा चारा न था अब. अर्जुन की नजरो से बचने के लिए वह बहार निकली तोह मोटी मोटी बुँदे आँगन में टपक रही थी. सामने Ritu-Alka की तरफ कमरे बंद थे और निचले आँगन में भी ऐसा हे नजारा था सिवाए रसोईघर के. विन्नी अपनी हे सोच में खोयी सीढ़ियों से छत्त पर चली गयी.

'अब ये विन्नी दीदी कहा चली गयी?', अर्जुन नाहा कर 10 मिनट बाद बहार निकला तोह कमरा खाली था. बेध्यानी में वह अपने कमरे में आ कर बाल सही करने लगा तोह एक भयंकर गर्जना ने उसका ध्यान बहार बदले मौसम की तरफ कर दिया.

'ये पागल विन्नी दीदी चली गयी ऊपर बारिश में.', अर्जुन तुरंत गीला टोलिया लिए बहार निकल आया. निचले आँगन में Priyanka-Madhuri दीदी उसको कमरे में जाती दिखी और Ritu-Alka वाला कमरा भी बंद. बारिश अब एक झड़ी का रूप अख्तियार कर चुकी थी जिस से अर्जुन का दिल बैठ गया. सीढिया फांदता हुआ वो जैसे हे खुली छत पर पंहुचा, विन्नी दीदी को देख कर ठिठक गया.

"सचमुच पागल हे हो आप दीदी. मन करने के बाद भी आप यहाँ बारिश में भीगने आ हे गयी."

"हर रोज तोह बारिश नहीं होती न? मुझे ये पसंद है और साथ हे बिजलियों का कड़कना, वो चमक जो अँधेरे को एक पल के लिए ख़तम कर देती है. शुरू में तोह धरती का सेक बहार निकलता है लेकिन फिर जो ठंडक ये बारिश देती है उसका कोई जवाब नहीं.", इतनी घनी बारिश में दोनों बस एक दूसरे को स्याह साये की तरह देख भर सकते थे. अर्जुन कुछ आगे चलता थोड़ा करीब आया तोह विन्नी दीदी इस मूसलाधार बारिश में जैसे प्रभावहिर हे थी.

"आपको ये तीखी बुँदे चुभ नहीं रही?", अर्जुन भी अब उनके साथ भीग हे चूका था और वैसे भी बारिश तोह हमेशा हे उसको पसंद थी.

"ाची लग रही है अब तोह. बस शुरू में चेहरे पर जरूर चुभ रही थी लेकिन इसका भी अलग मजा है. वैसे पहले मुझे भीगना बिलकुल पसंद नहीं था.", विन्नी दीदी अपनी हथेलिया बरसते पानी के निचे फैलाती हुई वापिस उन बूंदो को ऊपर उछाल रही थी. किसी छोटी सी बची की तरह.

"जब पहले बारिश पसंद हे नहीं थी तोह ऐसा क्या हुआ के ये गरजती बिजली का भी डर ख़तम हो गया? क्योंकि ज्यादातर लड़कियों को ये डरा देती है.", अर्जुन भी कुछ सोच कर अब फर्श पर बैठ गया था, पाँव लम्बे पसार कर. एक नजर विन्नी दीदी ने अर्जुन को देखा और फिर वो भी कुछ दुरी पर वैसे हे बैठ गयी.

"वह जब अकेली थी तोह ये बारिश बहोत डरा देती थी. एक तोह अकेलापन क्योंकि अपने घर से इतनी दूर थी और दूसरा मुझे बाहरी दुनिया का कोई ज्ञान हे न था. लेकिन कितने दिन ऐसे रहती? 5 साल लगे मुझे खुद को हिम्मत देने में और जब मैं कमरे से बहार निकल कर अकेली ऐसी घनघोर बारिश में आ कड़ी हुई तोह कुछ पल के लिए मैं बस सुन्न रह गयी थी. डर, दर्द और असुरक्षा. मेरे से 4-5 साल छोटे 2 bhai-behan वैसी हे बारिश में uchal-kood करते हुए अपनी माँ के पीछे चल रहे थे खुली सड़क पर. उस दिन इन बूंदों से तोह डर ख़तम हो गया लेकिन लैटनिंग फिर भी डरा देती थी.", इतना कह कर विन्नी एकाएक खामोश हो गयी थी. आँखें मूंदे वह चेहरा ऊपर करती जैसे एक जुंग लड़ रही थी इन टपकती बूंदों से.

"फिर ये डर कैसे दूर हुआ आपका? शायद इस बार वजह उन बचो जैसी मासूम नहीं रही होगी.", अर्जुन ने भी हथेलिया पीछे फर्श पर रखते हुए खुली आँखों से ऊपर देखा तोह सचमुच ये चेहरे पर ाचा खासा वार कर रही थी. कैसी विन्नी दीदी इनको झेल रही होंगी अर्जुन ये सोच कर हे हैरान था और साथ हे एक डर ने भी घेर लिया था क्योंकि उसका सवाल गलत था.

"तुम्हे बताया नहीं मैंने लेकिन सच कहु तोह तुम पहले लड़के हो जो इंसान को अलग तरह से देखते और समझते हो. और ये भी सच है के इस डर को दूर करने की वजह एक ऐसा दर्द था जिसने मुझे बस काबिल बनाया, टूट के बिखरने से ाचा तोह यही है न.", विन्नी दीदी भी जैसे कई मौसम देख चुकी थी, dard-akelepan और समाज के.

"अगर बात ऐसी है तोह बेहतर रहेगा हम इस पर चर्चा न करे. आप फिर से उस दर्द को याद करेंगी तोह मुश्किल होगा."

"एक बार निकलना जरुरी है बस और तुम पर ट्रस्ट कर हे सकती हु.", जैसे विन्नी दीदी ने ये बात कही थी इस अँधेरे में भी उनकी मुस्कान जाहिर कर गयी की वो इस लड़के को कितना मान ने लगी है.

"हाँ ये भी बात ठीक है के दर्द से निकलने के लिए एक बार खुद को खाली करना बेहद जरुरी है. नहीं तोह हम ाची यादें नहीं बना सकते. फिर हर बारिश बस एक द्वन्द या टकराव सी लगेगी जिसमे मजे से ज्यादा खुद को साबित करना ऐसा लगता है जैसे खुद से हे भाग रहे हो.", अर्जुन की इतनी दूर की बात विन्नी दीदी को भी समझ आ गयी थी. बैठे हुए हे उनकी हथेली कुछ हद्द तक अर्जुन की ऊँगली से टकरा गयी जिस पर दोनों ने ध्यान न दिया.

"फर्स्ट ईयर में मुझे एक लड़के से अट्रैक्शन होने लगी थी. उसका नाम डर्क था, शामे क्लास में लोकल जर्मन लड़का. उस से पहले तोह स्कूल में हमेशा खुदसे हे उलझी रहती थी लेकिन डर्क खुद मेरा ध्यान रखता और मुझे मदद करता माहौल में पार्टिसिपेट करने में. एक साल में हम ाचे दोस्त बन्न गए और मैं उसके साथ हर बात शेयर करती. समय मिलने पर aas-pas हाईकिंग के लिए चले जाना, स्ट्रीट्स एक्स्प्लोर करना और लोगो से मिलना जुलना होने लगा. तब तक वो अट्रैक्शन एक ाचे फ्रेंड से भी थोड़ी ऊपर चली गयी थी. हम सेकंड ईयर भी हाफ कम्पलीट कर चुके थे.", विन्नी और अर्जुन को तोह अब इस बारिश का असर हे नहीं हो रहा था. वो चुपचाप बस सुन्न रहा था

"वीकेंड पर एक लोकल फ्रेंड के यहाँ पार्टी थी जहा मैं जाना नहीं चाहती थी लेकिन डर्क पार्टी करता था और वो लड़की उसकी भी दोस्त थी. एक room-mate के फाॅर्स करने पर मैं भी थोड़ी देरी से वह चली गयी जिसका शायद डर्क को अंदाजा नहीं था. पार्टी में वो कही नजर नहीं और मैं भी थोड़ा बोर होने के बाद घर के पिछले यार्ड में चली गयी जहा थोड़ा सुकून रहता था. वह मैंने डर्क और उसके एक फ्रेंड को एक लड़की के साथ इंटिमेट देखा तोह मुझे कुछ समझ नहीं आया. मैं सोच कर बैठी थी की नेक्स्ट डे संडे है और डर्क के प्रपोजल को एक्सेप्ट करके एक रिश्ता शुरू करुँगी लेकिन सब एक पल में हे खता हो गया.", विन्नी के आँखों में अगर इस वक़्त आंसू भी थे तोह वो दिख नहीं सकते थे. लेकिन आवाज की कम्पन्न अर्जुन समझ सकता था.

"लाइफ इस ूनप्रेडिक्टेबले विन्नी दी. आप जिस मदद से रोज गुजरो जरुरी नहीं के वो एक दिन वैसा हे रहेगा. वह 2 रस्ते भी बन्न सकते है जिसमे नए वाले पर चलना थोड़ा अंजना और कोरा सा होता है. खली खली सा.", अर्जुन की बात सुन्न कर विन्नी ने एक फीकी हंसी दी लेकिन आँखें सचमुच बह रही थी. हाथ अब ऊँगली की जगह अर्जुन की हथेली के ऊपर टिक गया था.

"बात इतनी हे नहीं थी अर्जुन. उसके दोस्त ने जो आगे से कहा वो बुरे सपने से भी बुरा था. डर्क उसके साथ मुझे शेयर करने वाला था जैसे वो अपनी गर्लफ्रेंड को डर्क के साथ मेरे सामने शेयर कर रहा था. उस वक़्त मुझे कुछ सुनाई न दिया और मैं रोटी हुई अगले 5 किलोमीटर चल कर हॉस्टल तक आयी. इस से भी ज्यादा बुरी बरसात में जहा गिरने को तोह ये आसमानी बिजली हर तरफ गिर रही थी लेकिन मेरे अंदर हाल उस से भी बुरा था. कितने हे दिन मैं कमरे में फिर से बंद रही और सोचती रही के एक फैंसला मैं खुद करने वाली थी और वही गलत साबित हो गया. मुझे बिलकुल नहीं पता था के दिल टूटना इतना ज्यादा दर्द दे सकता है. मेरी गलती हे क्या थी अर्जुन?", अब विन्नी की आवाज लड़खड़ा चुकी थी और अर्जुन के पास अब कोई रास्ता न था सिवाए उन्हें शांत करने का.

"जो इंसान अगर किसी सच्चे दिल को ठेस पहुँचता है न वो कभी भी एक ाची ज़िन्दगी नहीं जी सकता. आपने तोह इसमें कुछ गलत नहीं किया न और प्यार करना गुनाह या पाप नहीं है लेकिन उतना हे कठोर सच ये है के हम सही प्यार और इंसान की समझ नहीं रखते. मुझे तोह बिलकुल भी नहीं है और मैंने अनगिनत ऐसे फैंसले किये है जिनका परिणाम कही ज्यादा दुखदाई हो सकता है. सबसे जरुरी बात है के आपने खुद को संभाला और जीवन को सही दिशा दी. हर लड़की इतनी मजबूत नहीं होती.", विन्नी अब उसके सीने से लगी थी और अर्जुन एक संरक्षक की तरह उनके सर पर एक हाथ रखे उन्हें हौंसला दे रहा था. कुछ पल वो बस लिपटी रही और फिर धीमी आवाज में बोली.

"मुझे ठण्ड लग रही है अर्जुन. निचे चलते है.", बारिश में हवा का मिलान हो चूका था और इतनी देर से भीगने के बाद जब दोनों खड़े हुए तोह सचमुच रोये खड़े हो गए थे जिस्म पर.

"हाँ चलिए और अब इस बारे में बिलकुल भी मैट सोचना.", अर्जुन उनका हाथ पकडे हुए हे निचे लेके आया तोह दरवाजे पर आ कर रुक गया.

"आप चेंज कर लिए इतने मैं निचे से पानी ले कर आ रहा हु.", अर्जुन की बात सुन्न कर विन्नी दीदी ने बस हाँ में सर हिला दिया. रौशनी में आते हे खुद की हालत देख वो सकपका गयी थी. अलका की वो टीशर्ट उनके जिस्म पर त्वचा की तरह चिपकी थी जिसमे से कठोर चूचक बहार उभरे साफ़ दिख रहे थे. वैसा हे हाल नितम्ब और yoni-pradesh के पास था. सरपट वो बाथरूम में जा घुसी और चिटकनी लगते हे कपडे जिस्म से जुड़ा करती वो आईने में देखने लगी. चेहरा सफ़ेद सा दिख रहा था और पूरे शरीर पर रोये खड़े थे. निप्पल किसी छोटी सी घुंडी के रूप में कठोर हुए अपनी रंगत से अधिक गहरे. गीले बालो से पानी टपकता हुआ फर्श पर गिर रहा था.

'ओह्ह्ह.. सहित. कुछ भी कर बैठ टी हु.', इतना कहती वह कुछ याद आने पर फुहारे की तरफ देखने लगी तोह वह उनके अंगवस्त्र न दिखे. दरवाजे के पीछे लगी हक्क पर एक साफ़ तोलिये के पीछे वो दोनों कपडे सही से टंगे देख थोड़ा परेशां भी हुई लेकिन फिर मुस्कुरा उठी.

'कपडे तोह लेके नहीं आयी और तोलिये में बहार नहीं जाने वाली. पहले हे beda-garak कर चुकी हु.', अभी वह शरीर पांच कर इतना हे बोल रही थी की अर्जुन की आवाज सुनाई पड़ी.

"विन्नी दीदी, ये दरवाजे के हैंडल पर कोमल दीदी की टीशर्ट और लोअर टांग दिया है. आप ले लीजियेगा और मैं मेरे कमरे में हु.", इतना बोल कर अर्जुन दोनों कमरों के बीच वाला दरवाजा बंद करता अपने बिस्टेर पर आ गया था. अपने कपडे वो निचे हे बदल आया था माँ से ले कर. साढ़े 11 बज चुके थे और बरसात अब हलकी होने लगी थी. वही विन्नी के चेहरे पर अलग हे मुस्कराहट आ गयी थी.

'ये लड़का अब पसंद न आने की तोह कोई वजह देता हे नहीं. नहीं रुक पाएगी तू विन्नी जितना मर्जी जोर लगा ले. पता है ये सब गलत हो रहा है लेकिन हल क्या है? शादी तोह डर्क से भी नहीं होने वाली थी और इस से तोह मुमकिन भी नहीं. इस दिल को कौन समझाए अब.', खुद से बतियाती हुई वो टोलिया लपेटे बहार आयी तोह दोनों तरफ से दरवाजे बंद थे. बिना अधोवस्त्र के टीशर्ट और वो ढीला पजामा पहन कर विन्नी अपने बाल सूखने लगी. अर्जुन द्वारा पहल हे एक बंद करने के बावजूद शरीर अभी तक ठंडक महसूस कर रहा था.

"ओह हीरो, अब खोल भी दो ये दरवाजा.", बाल सूखने के बाद विन्नी ने अर्जुन को आवाज लगाई तोह एक मिनट बाद हे वो बीच का रास्ता खुल गया. अर्जुन वापिस अपनी कुर्सी पर जा बैठा और विन्नी दीदी 2 तकिये सर के निचे लगाती बीएड पर पसर गयी. किनारे राखी सफ़ेद चादर अपने शरीर पर लेने के बावजूद ठंडक वैसी हे बरक़रार रही.

"अब तुम रात में Ph.D करोगे क्या?"

"आप बताओ फिर क्या करे? ये आखिरी डायग्राम न 2 दिन से लटका हुआ है.", अर्जुन ने एक नजर विन्नी दीदी को देखा और उनके मासूम से चेहरे पर अकेलेपन के भाव. फिर बिना उनका जवाब सुने बिस्टेर पर अपनी तरफ आ लेता. कमरे में बस वही नाईट लैंप और जीरो की रौशनी थी जो पर्याप्त थी.

"मजाक कर रही थी बाबा. तुम कर लो डायग्राम पूरा, फाइल सबमिट भी करवानी होगी तुम्हे.", उन्होंने अर्जुन को 2 तकिये बीच में रखते देखा तोह उठा कर एक तरफ फेंक दिए. अर्जुन बस मुस्कुरा कर रह गया.

"और ये diwar-vivar नहीं बनानी बीच में. कह देती हु."

"फाइल तोह जुलाई में चेक होगी अब, वो तोह बस समय रहते ख़तम कर रहा था. वैसे परसो तोह आप खुद हे दिवार बना रही थी.", अर्जुन ने इतना कहा तोह विन्नी दीदी सरक कर उसके करीब आ गयी. दुरी मात्रा aadha-pauna फ़ीट थी बीच में.

"वो दिवार उस रात हे हटा दी थी मैंने और बाकी ऊपर छत पर. सच कहु तोह तुम मुझे कभी ेम्बरस फील नहीं करवाते, बेशक मुझसे अनजाने में गलती हो जाती है लेकिन तुम ढकने के बाद भी जाहिर नहीं करते.", अर्जुन समझ गया था के वो क्या ढकने की बात कर रही है.

"गलती नहीं सिर्फ भूल कहते है उसको और ऐसा सबके साथ होता है. मुझे तोह ख़ुशी हुई की आपने मुझे अपना समझा और भरोसा किया. आज भी आप हिचकिचाती है, हेसिताशन की जगह कॉन्फिडेंटली एक्ट करना चाहिए. कभी प्रॉब्लम नहीं होगी पर्सनल ग्राउंड पर. क्योंकि काम के प्रति तोह आप हैं हे बेस्ट.", अर्जुन ने अभी अपनी बात पूरी की हे थी और विन्नी दीदी ने उसके होंठो को तेजी से चूम लिया. बारिश की वजह से दोनों के हे होंठ कुछ उखड से गए थे लेकिन वो 5 सेकंड का स्पर्श बहोत कुछ कर गया.

"ऐसे एक्ट करने को तोह नहीं कहा था.", अर्जुन ने भोलेपन से उनकी तरफ देखा तोह वो शर्म होने के बावजूद खुली आँखों से उसको निहार रही थी.

"मैं तोह परसो रात हे तुम्हे किश करने वाली थी लेकिन तब मुझे बस ये एक अट्रैक्शन जैसा लग रहा था क्योंकि तुम सबका इतना ख़याल रखते हो और परवाह करते हो. हाँ हैंडसम हो इसलिए पहली नजर में तुम्हे देख कर इग्नोर कर दिया था, एक्चुअली जरुरत से ज्यादा हैंडसम हो. लेकिन सबसे अलग बात पता है अर्जुन, मैं तुमसे भाग रही थी और फिर सुकून भी मुझे तुम्हारे पास बैठ कर मिला. ऐसा लगा जैसे एक कन्धा मेरे पास भी है जिस पर मैं भरोसा कर सकती हु.", विन्नी दीदी ने आहिस्ता आहिस्ता अपना वो कोमल हाथ खिसका कर अर्जुन के निचले हाथ पर रख दिया.

"दीदी, सच कहु तोह ये दोनों के लिए ठीक नहीं रहेगा."

"प्रीती से प्यार करते हो इसलिए ऐसा कह रहे हो? मैं बीच में नहीं आ रही अर्जुन और मुझे भी वो प्यार सी लड़की तुम्हारे साथ ाची लगती है. बस मुझे अपने प्यार का थोड़ा सा सहारा दे दो जिस से मैं फिर कभी लड़खड़ा न सकू. उस रात जब मैं तुम्हारी बाहों में थी, मैं सालो बाद सुकून से सो पायी. और तुमने मुझे जैसे गॉड में उठाया था तोह मैं चाहती थी की वो 10 कदम का सफर थोड़ा लम्बा होता तोह बेहतर रहता. हर चाहत पूरी नहीं कर सकते तोह काम से काम अपने सीने से लगा का वैसी हे प्यारी नींद तो सोने दे सकते हो?", इस बार अर्जुन ने हे उन्हें अपनी तरफ खींच कर बगल में लिटा लिया. एक पल तोह शर्मा गयी लेकिन हैरान भी हुई के कितने आराम से अर्जुन ने ये कर दिया था.

"मुझे पता है के आप बीच में नहीं आ रही हो. और आपकी वो उलझन परसो रात हे मैंने सुन्न ली थी. बस कई बार हम वादा कर बैठते है जो निभा नहीं पाते. मैं आपको कमजोर नहीं करना चाहता दीदी. आपको बड़ी बहिन की तरह पूरा हक़ है लेकिन अगर इसकी जगह आपने एक ऐसा भविष्य मांग लिया जो मुमकिन न हो तोह ये सबके साथ विश्वासघात जैसा होगा. उस तरफ आगे बढ़ने पर शायद आप बीच मझदार में न फंस जाओ.", अर्जुन उनके नाम बालो को कान के पास से पीछे करते हुए किसी बड़े की तरह समझा रहा था. विन्नी दीदी को तोह इस एक पल में जैसे सबकुछ मिल गया था.

"थोड़ा सा विश्वासघात कर लेते है, इस बंद कमरे में हम दोनों बस बार्बी एंड केविन बहार तुम विन्नी के मुन्ना. सहित, थोड़ा नौघट साउंड कर रहा है बूत I'm okay विथ आईटी. और अगर कभी भी कुछ प्रॉब्लम हुई तोह विनीता सिंह इस अर्जुन शर्मा पर ऊँगली तक नहीं उठने देगी.", जैसे आँखें मटकते हुए विन्नी दीदी ने दोनों के नाम लिए अर्जुन हंसने लगा.

"पक्की ड्रामेबाज हो आप लेकिन फिर भी मैं कहता हु के इसको लिमिट में रखते है.", अर्जुन ने अब ऊपर वाला हाथ उनकी कमर पर रखते हुए कहा, जहा से टीशर्ट थोड़ी ऊपर हो चुकी थी. इस गरम स्पर्श से हे विन्नी किसी अदृश्य डोर से खींचती अर्जुन के होंठो पर आ रुकी. वो अपने आधार मजबूती से चिपकाये थी लेकिन जैसे उन्हें यही एक चुम्बन का ज्ञान था. लेकिन जिसके साथ वो ऐसा कर रही थी वो जैसे अंतरंग पालो का सर्वज्ञानी था. अर्जुन ने उनके निचले होंठ को मुँह में भर कर आराम से पीने के उपक्रम किया तोह विन्नी को लगा जैसे वो होंठो से उसकी आत्मा अपने अंदर खिंच रहा हो. इस नए अनुभव से जैसे हे विन्नी का मुँह थोड़ा खुला तोह होंठ को छोड़ कर अर्जुन उनकी गुलाबी मीठी जीभ को मुँह में लेते हुए पीने लगा. ये सब बस एक मिनट में चला था और इतने में हे विन्नी की सांसें उखड कर किसी धौंकनी सी तेज चलने लगी.

"ह्ह्हह्हुउउ.. ये क्या था अर्जुन?", बड़ी मासूमियत से इतना पूछ कर वो उसके सीने में सर रखती सब याद सा करने लगी. अर्जुन भी समझता था के बेशक दीदी डर्क को कभी पसंद करती थी लेकिन वो कभी उस हद्द से आगे न गयी जो लड़की को बदल देती है.

"आपने कहा था के आप बार्बी हो तोह केविन ने वैसे हे प्यार दिखाया. लेकिन एक बात पता लग गयी की आपने कुछ भी नहीं सीखा बहार रह कर भी.", अर्जुन उन्हें और ाचे से अपने साथ लगते हुए पीठ सहलाने लगा. विन्नी दीदी को तोह अपने सीने में भी आज अलग अलग तरंगे उठती महसूस हो रही थी. एक तरफ अर्जुन का निर्वस्त्र चौड़ा सीना और खुद वो बस एक पतली सी टीशर्ट में अपना यौवन आजाद किये. लेकिन जो अर्जुन ने कहा उस पर चुप रहना भी मंजूर न हुआ.

"तुमने तोह इसमें Ph.D. कर राखी है पक्का. ऐसे सिर्फ फिल्मो में देखा था लेकिन पता नहीं था के ये ऐसा महसूस होता है. प्रीती के साथ यही सब करते हो क्या?"

"आप खुद हे पूछ लीजियेगा के उसने क्या कुछ सिखाया है मुझे. वैसे सचमुच वो कोई बेवकूफ हे रहा होगा जो आप जैसी प्यारी लड़की को न संभल कर रख पाया. यू अरे रियली ब्यूटीफुल एंड पुरे दीदी.", अर्जुन के स्पर्श में विन्नी ने जरा भी वासना न महसूस की थी. कैसे वो एकाएक इतना शांत था उस गहरे चुम्बन के बाद. खुद हे ऊपर सरकते हुए वो जब अर्जुन के चेहरे तक आयी तोह नरम गुब्बारों ने अलग हे एहसास पाया उस रगड़ से. जैसे तैसे काबू करती विन्नी दीदी उसकी भूरी आँखों को देखने लगी.

"तुम हो क्या चीज जरा बताओगे.? एक जवान लड़की खुद तुम्हारे साथ लिपटी हुई है और तुम हो के तारीफ हे किये जा रहे हो. मैं इतनी बुरी भी नहीं दिखती शायद."

"आपको तोह मैंने पूरा हे देखा हुआ है और चाह कर भी भुला नहीं सकता इस ख़ूबसूरती को. लेकिन क्या ये ठीक रहेगा की सबकुछ ek-sath हे हो जाये.?", अर्जुन ने जिस तरह वो पल याद दिलवाया था विन्नी ने शरमाते हुए अपना गाल उसके होंठो से सत्ता दिए.

"बहोत गंदे हो तुम. क्या सचमुच तुमने मुझे पूरा देखा था.?", वो नजरे नीचे किये वैसे हे लेती थी. अर्जुन की गरम साँसे गाल से टकराती हर तरफ एक नयी आग लगाने लगी.

"सचमुच पूरा. आप हसीं हो इसलिए तोह कह रहा था के वो बेवकूफ हे होगा जो आपको न देख पाया. अंदर और ज्यादा अंदर से. उमाह.", गाल पर अपने होंठ दबाते हुए अर्जुन ने पहली बार अपना हाथ कमर से खिसकते हुए नरम लचीले पेट पर फिराया. कांच पर गिरे पानी सी फिसलन को दोनों ने हे एहसास किया. विन्नी का चेहरा मस्ती में थोड़ा ऊपर हुआ और इस बार वो खुद अपने सुर्ख होंठो को अर्जुन से जोड़ती रेगिस्तान के प्यासे सी पीने लगी. वो मरदाना हाथ कभी पेट की तलहटी पर जाता तोह कभी घुमावदार नाभि पर. एक तान खुद हे अर्जुन के ऊपर रखती वो हाथ को दबाने लगी थी.

"हम गलत कर रहे है फिर भी ये गलत नहीं लग रहा Arjun..aahh.. सच कहु तोह कुछ गलत नहीं बस बेनाम बेवजह के बंधन है. तुम मुझे मुक्त कर दो इन बंधनो से. ये सोच कर हे की मैं आजाद होना चाहती हु.", विन्नी ने वो हाथ खुद हे अंदर सरकते हुए अपने एक उभार पर टिका दिया. इतना सुकून और ख़ास एहसास था ये उसके लिए की वो अर्जुन के साथ इस सफर पर आगे जाना चाहती थी. वही अर्जुन भी उस नरम उभर की संरचना का जायजा लेता बड़े इत्मीनान से अपनी बड़ी दीदी के होंठो को चूमता उस वक्ष को सहलाने लगा. ये सतांन अछूते और बिलकुल कोरे थे, 24 की उम्र के बावजूद.

"आज सबकुछ मुमकिन नहीं होगा दीदी. आप बस मेरे साथ प्यार से चिपक कर आराम कीजिये. हाँ हम दोनों कपडे उतार सकते है जिस से आपको ऐसा नहीं लगेगा की मैं आगे नहीं बढ़ना चाहता. बस इस सबके लिए समय काम भी है और सुबह आप फंस जाओगी.", अर्जुन ने उनकी दुविधा दूर करते हुए अपना पजामा हटा दिए. विन्नी जहा ये सोच रहे थी की अर्जुन बीच मझदार में छोड़ कर जा रहा है वही अब वो उस झूलते हुए 9 इंच के असाधारण लिंग को देख सकते में आ गए.

"अरे यू रियल?"

"जस्ट कलम डाउन. आप ये ले सकती है लेकिन साढ़े 12 हो चुके है अभी और फिर जानती है न के आपको घर भी जाना है कल. थोड़ा मुश्किल हो जायेगा.", अर्जुन ने खुद हे वो टीशर्ट विन्नी दीदी के जिस्म से अलग करते हुए दोनों गुब्बारों को बरी बारी से चूम लिया.

"आठ.. सेह लुंगी यार. बड़ा तोह सचमुच बहुत है."

"आपको प्यार से हे सुलाऊँगा दीदी. आज बस फील कीजिये.", अर्जुन ने सुविधा के लिए वो जीरो बल्ब भी बंद कर दिया. कुछ हे पल बाद विन्नी उस सफ़ेद चादर के भीतर निर्वस्त्र लिपटी थी अर्जुन से और जांघो के बीच उस कामदण्ड की 2-3 रगड़ ने हे उन्हें पागल कर दिया था.

"ोुछ.. ये क्या सेंसेशंस है अर्जुन.. आह्हः..", अर्जुन के शरीर की गर्मी और छोटे छोटे चुम्बन के साथ वो आज पहली बार लिंग को भी अपने यौवन कुंड पर दस्तक देते महसूस कर रही थी. अर्जुन ने उन्हें निराश न करते हुए अपने साथ लगाए हे 10-12 बार दबा कर उस अक्षत छूट के होंठो पर अपना विकराल लिंग फिराया तोह उत्तेजजना में विन्नी की हलकी चीख हे निकल गयी. यौनकुंड ने इतनी जल्दी अपना रस बहार उड़ेल दिया था. विन्नी दीदी बेचारगी से अर्जुन को लैंप की रौशनी में देख रही थी.

"ाःह.. ये क्या था अर्जुन? कुछ किया भी नहीं और.. आठ.. I'm स्टिल लॉकिंग एंड थी गूसबम्प्स."

"अब आपको ाचे से नींद आएगी दीदी. जरुरी नहीं के हम वो सब हे करे. ये तब ाचा लगेगा जब कुछ और दीवारे भी देह जाये."

"लव यू अर्जुन. यू अरे रियली ओने ड्रीम गाए एंड I'm हैप्पी तहत ी ऍम हेरे, विथ यू. उमाठ. स्लीप वेल केविन.", एक दीर्घ चुम्बन करती विन्नी ने अपने मांसल चुके अर्जुन के साथ लगते हुए आँखें बंद कर ली.

"लव यू लिटिल बार्बी. आप आराम कीजिये, मैं साथ हु.", अर्जुन ने माथे पर होंठ लगते हुए उन्हें एहसास करवाया के वो इस बंद कमरे में उनसे बड़ा है और परवाह करने वाला भी. चाहता तोह वो आज सभी हद्द पर कर सकता था लेकिन अब बिना ऋतू या कोमल दीदी की मर्जी के वह इस घर में ऐसा कुछ नहीं करने वाला था. और कैसे वो ठेस पंहुचा सकता था खुदको? विन्नी दीदी आज भावनाओ के प्रभाव में शायद वो सब कर जाती जो नयी सुबह एक पश्चाताप का रूप ले सकती थी. ऐसे हे उन्हें बाहो में लिए वो नींद के आगोश में जाने लगा था. लिंग अपने सामान्य अकार में आता बता गया के वासना पर काबू करना अर्जुन सीख रहा है.

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"दोनों लाश वैसे हे दिखानी है जैसे निर्देश दिए थे. लग्न चाहिए के शराब के बाद झगड़ा हुआ है.", संजीव ने इतनी हिदायत दी थी की अँधेरे में 2 लाशो को उन हवलदारों ने बड़ी म्हणत से एक आपसी रंजिश का रूप दे दिया था. खेतो के बीच सबकुछ सही तरीके से व्यवस्थित करके संजीव अब चलता हुआ अपने उमेद चाचा के पास आ खड़ा हुआ.

"लो जी, हो गया सब तैयार. हूटर हमारे जाते हे बजेगा. वैसे मामला समझ नहीं आया चाचा.", संजीव उनकी कार में बैठ कर सिग्रत्ती सुलगता हुआ बोलै तोह उमेद सिंह मुस्कुराने लगा.

"लल्ला, अब न भोले को भूतनाथ उसकी बेटी बनाये तोह ज्यादा बेहतर होगा. बात तोह मुझे भी kachi-pakki पता है इसलिए एक की गर्दन तोड़ी और दूसरे को गोली मारी. मां हो के इसने मेरी लाड़ली का हाथ पकड़ा, अपनी भांजी का तोह बात इतनी तोह नहीं होने वाली. चल दारू पीते है हवेली पे और इनको बोल के गाँव में शोर मचाये.", उमेद सिंह की बात सुन्न कर संजीव ने हँसते हुए बहार 5 मिनट का इशारा किया और वो दोनों यहाँ से निकल गए.

मनबीर और चंदरभान सिंह शराब पीने के बाद आपस में लड़ के मारे गए. गाँव से बहार, पूलि के पास दोनों की लाशें गश्ती पुलिस ने बरामद की. पूरी रिपोर्ट पोस्टमॉर्टम और जांच के बाद. गहरी स्याह रात में बारिश ने भी अपना काम बखूबी किया था जो दो निर्जीव जिस्मो को मटियामेट करके बचे खूहे सबूत भी मिटा गयी थी. रात एक बजे पुलिस जीप ने एक खेतवाले से पहचान करवाने के बाद जब स्वर्गीय पांच ईश्वर सिंह का दरवाजा खटखटाया तोह लाजवंती के पाँव टेल जमीन खिसक गयी.

"जी चंदरभान सिंह आपके भाई के सुपुत्र है?"

"हांजी. क्या हुआ? वो आज हे आया है यहाँ कुछ दिन रहने के लिए. कुछ गड़बड़ की है क्या?"

"आया था कहे तोह बेहतर रहेगा. पहचान होने पर हे आपके पास आये. चंदरभान और एक अज्ञात व्यक्ति के बीच मुठभेड़ में दोनों की मृत्यु हो गयी है. घर में कोई पुरुष है तोह वो साथ चले नहीं तोह शिनाख्त के लिए आप सुबह सरकारी हॉस्पिटल आ सकती है क्योंकि फ़िलहाल महिला पुलिस हमारे साथ नहीं है.", कांस्टेबल ने पूरी बात बताई तोह लाजवंती की हालत हे ख़राब हो गयी. वो कांस्टेबल चला गया था लेकिन लाजवंती तोह बहार की तरफ जैसे शुन्य में देख रही थी. होश आया तोह बिना सोचे समझे हवेली का नंबर मिला दिया. आँखों से आंसू बह रहे थे लेकिन बुरी किस्मत ये थी की आज फ़ोन भी खराब था.

'जब सब रस्ते बंद होते है तोह फिर एक साथ हे होते है.', इतना कहती वो पैदल हे हवेली की और निकल चली, बिना परवाह किये कीचड और अँधेरे की. 15 मिनट में वो भारी कदमो के साथ हवेली के द्वार पहुंची थी की चेतना वापिस आयी. कैसे कहे और क्या कहे? लेकिन कुछ तोह कहना हे था क्योंकि अब उसकी बेटी हे तोह एक सहारा थी इस गाँव में उसका. सांकल खड़कते हुए दरवाजा बजाय तोह 2-3 मिनट बाद बिजेन्दर ने हे वो छोटा द्वार खोला.

"काकी इतनी रात को? सब खैरियत तोह है?", उन्हें अंदर लता वो पूछने लगा. चारपाई उसकी भी गलियारे में लगी थी जहा बारिश से भीग भी नहीं सकता था लेकिन घर पर नजर भी रख सकता था.

"बीटा वो चन्दर घर पे बोल के आया था के यहाँ आज महफ़िल है लेकिन उसके बाद पुलिस को उसकी लाश मिली वो भी गाँव से बहार खेतो में.", बिजेन्दर इतना सुनते हे भोचक्का रह गया. रह रह कर कुछ बुँदे गिर रही थी लेकिन उनसे परे दोनों गलियारे तक आ पहुंचे और इधर मधुलता के साथ साथ गुड्डी, ऋचा और बबिता भी यहाँ आ गयी थी.

"नानी, इतनी रात में आप यहाँ?", ऋचा ने हे सवाल किया था रोटी हुई लाजवंती से.

"मुन्नी, चन्दर हमारे बीच न रहा. पुलिस अभी बता कर गयी है. उसकी लाश सरकारी हॉस्पिटल में है बेटी, मेरे साथ चल के ले आ उसको.", फफकती हुई लाजवंती की बात सुन्न कर मधुलता, गुड्डी के चेहरे के तोह रंग हे उड़द गए थे. लेकिन मुस्कुराती हुई ऋचा को देख बिजेन्दर कुछ शांत हे रहा.

"माँ ये सब कैसे हुआ? भैया यही से तोह 4 घंटे पहले गए थे.", लता की तोह आप रुलाई निकलने लगी थी.

"जो होगा नानी वो सुबह हे होगा. रात तोह पोस्टमॉर्टम करके वो डेड बॉडी देने से रहे. आप यहाँ आराम से सो जाओ सुबह चली जाना माँ को लेके.", ऋचा ने तोह ये तक न कहा के वो चलेगी साथ. स्पष्ट ना.

"क्या बक्ति है तू? मेरा भाई मारा गया, तेरा मां और तू ऐसी बात कर रही है. माँ मई शंकर का नंबर मिलती हु, वो कुछ करेंगे."

"हाँ बेटी, शंकर सरकारी बड़ा डॉक्टर है, वो सब कर देगा.", लाजवंती ने अभी इतना हे कहा था के ऋचा ने बात काट दी.

"ऐसी गलती भी मैट करना माँ. नहीं तोह नंबर मैं मिलाऊँगी इस बार शंकर चाचा का. और नानी सुना है माँ का बहोत गहरा प्यार था इस मां के साथ. चुपचाप इस हवेली से वापिस अपने घर चली जाओ. और ये अगर उस शैतान के संस्कार पर भी आयी तोह फिर वही रहेंगी. गूडनिघत और बिजेन्दर भैया गेट तक छोड़ आये नानी को आप, माँ जाना चाहे तोह उन्हें भी.", ऋचा इतना बोल कर अंदर चली गयी लेकिन बबिता की ऐसे मौके पर भी हंसी छूट गयी.

"बिज्जू छोड़ आ भाई, दादी जाग गयी तोह आज दुलारी 2 बार चालेगी. ऋचा शायद अपने से ज्यादा जान गयी कुछ.", इस बात का असर तुरंत हे हुआ और गर्दन झुकाये लाजवंती बहार की और चलने लगी.

"काकी, रात यही रहो. सवेरे मैं भिजवा दूंगा आपको हॉस्पिटल. चची ले जाओ अपने साथ और ऐसा कुछ न करना के जिसका दुःख हो बाद में.", बिजेन्दर ने बड़प्पन दिखते हुए उन्हें घर के भीतर किया तोह भीगी आँखों से लाजवंती अपनी बेटी के साथ उसके कमरे में चली गयी. ऋचा अपनी ताई सुशीला के पास आ गयी थी और पीछे पीछे बबिता भी.

"इसने सीप लगा दी माँ पक्की वाली. या छोरी शायद कोई बड़ा राज जान गयी है और मैंने लगे है अगर तू इसके साथ न रही तोह या मारी जाएगी.", हंसी से बात शुरू करते हुए बबिता ने एकदम हे बड़ी बात कह दी थी. सुशीला सिंह न हिम्मत होते हुए भी बिस्टेर पर बैठ गयी थी.

"ये रात कोई मजाक तोह नहीं कर रही तू बबिता? बिजेन्दर कहा है और ऋचा तू इधर आ.", सुशीला ने तुरंत हे ऋचा को बगल में बुला लिया.

"मैं इधर हे हु माँ, वो बात ऐसी है के मुन्नी काकी का ममेरा भाई चन्दर मारा गया है ऐसा पुलिस ने बताया है."

"तोह जाना चाहिए न मुन्नी को और ऋचा को."

"ताई, शांत रहो. इस हवेली से जो भी उधर गया न तोह सच कहती हु पापा से बुरा कोई न होगा फिर. उमेद चाचा से तोह आप ru-ba-ru हो न, उन्होंने हे दोनों को ऊपर पहुंचाया है क्योंकि उस शैतान ने मेरे हाथ लगाया था. लेकिन कोई कुछ नहीं बोलेगा, हिसाब हो चूका है.", ऋचा ने अपनी ताई को जबरदस्ती साथ लगते हुए लेता लिया तोह बिजेन्दर ने भी सहमति जाता दी.

"उमेद न इज्जत पे बात आ जाये तोह फिर सोचता न कुछ मेरी बची. वो गोली की आवाज सबने सुनी थी और माँ जी को भी पता है के किसी ने तेरे साथ कुछ गलत हे किया होआ. शंकर अलग है, वह गाँव के आग लगा देगा अगर तुझे किसी ने हाथ लगाया. चल अब सो जा, ऐसी बहोत गोलियां देखि है हमने.", सुशीला सिंह ने भी ख़ामोशी से अपनी भतीजी को गले लगते हुए दूसरी तरफ बबिता को सोने का इशारा किया. आज रात कुछ लोगो के लिए लम्बी होने वाली थी.
 
भाई 404 एक बड़े गाँव में ढाणी, कलां और खुर्द भी होते है जो पुराने समय थे अब वो कसबे जैसा हो चुके है.

और भाई कई लोग बोल रहे है के गुड्डी जी का रंग क्यों सफ़ेद हुआ? भोली भली औरत रात को ऐसी वारदात होने पर लाजमी डरेगी हे भाई.

और जहा तक बात है लता और चन्दर के बीच हुई करतूत की वो उमेद को न पता चली होगी आज. ऋचा ने बताया वही जो यहाँ लिखा. लेकिन उसको अभी तक जो शक था, अपनी माँ के व्यवहार को देख थोड़ा पक्का हो चूका है.

रही बात की मधुलता बुरी फांसी है तोह इतना हे कहूंगा की जो रामेश्वर जी और शंकर तक के हाथे न चढ़ी वो इन बचो से कहा डरेगी. समय की मार और अनहोनी की वजह से थोड़ी सदमे में है बस. नहीं तोह कहानी के इस भाग में पांच ईश्वर सिंह भी स्वर्गीय बताये गए है.

और शादी 4 तारिक को है, 3 शुरू हुई है रात को. आज haldi-ubtan लगाएंगे भाई. महिलाओं का भोज रहेगा क्योंकि बरात में वो तोह नहीं जाती न सिवाय bua-behan के.
 
अपडेट 124

गहरी चाल - 1


इस स्याह काली रात में कुछ लोग चैन से सोये थे कुछ दुनिया से बेखबर प्यार भरे आगोश में लेकिन सबका नसीब ऐसा हो ये मुमकिन नहीं. उमेद सिंह 2 घंटे पीने के बावजूद खिड़की के पास बैठा तब तक जागता रहा जब तक आसमान में लाली न होने लगी थी. कुछ गलत भी हो सकता था जो कुछ रात उसके हाथो हुआ उस घटना से. एक लड़की और वो भी इतने करीब वाली के साथ उसके हे मां, चाहे दूर का हे सही लेकिन रिश्ता तोह रिश्ता है. कैसे इतनी हिमाकत कर गया वो इंसान? चन्दर एक धूर्त किस्म का व्यक्ति है ये उमेद जानता था लेकिन यही बात गले नहीं उतर रही थी की वो ऋचा पर कैसे हाथ दाल सकता है? जोश और गुस्से में आ कर उसने बिना बातचीत किये उसको गोली मार दी थी. बात करने के बाद भी अगर वही सजा देता तोह शायद बुरा न लगता. भतीजी ऋचा से कुछ पूछना कदाचित गलत होगा. जाने कब बैठे बैठे हे आँख लग गयी थी.

वही सोमबीर सिंह की हवेली में भी किसी की हालत ठीक वैसी हे थी लेकिन सोच बहोत अलग. मधुलता उर्फ़ मुन्नी ने अपनी माँ को तोह नींद की दवा दे कर सुला दिया था लेकिन आँखों में नींद की दस्तक तक न हुई थी उसके. बहार आँगन में अकेली बैठी वो अब रो नहीं रही थी लेकिन पीड़ा भरपूर थी उस खूबसूरत चेहरे पर. भोर होने से पहले किसी समय उसकी बेटी ऋचा लघुशंका के लिए उठ कर इस तरफ आयी तोह अपनी माँ को ऐसे बैठे देख एक पल के लिए ठिठक गयी.

"तुम्हे जो ठीक लगता है वही करो मैं सवाल नहीं करुँगी.", लता ने सिर्फ इतना हे कहा और बहार खुले आँगन को देखने लगी. ऋचा मासूम थी और उसको भी लगा के माँ से तोह उसने बात तक न की थी जो भी हुआ या सुना उस बारे में. उसकी माँ हे तोह इतने साल साथ थी उसके या फिर शंकर जी, जिनका वास्तविक परिचय खुद माँ ने हे करवाया था.

"आप ये इसलिए कह रही हो जिस से मैं बात शुरू कर सकू! तोह बताओ आपका और चंदरभान का सच क्या है? कौन था वो मनबीर जिसको आपके कृत्या का पता है वो भी ऐसा जो भगवन न करे किसी को कबि पता चले. क्यों आप हमेशा तभी नानी के घर जाती थी जब चंदरभान आया होता था? आप कल रात वह दरवाजे पर कड़ी परेशां थी लेकिन मेरी वजह से नहीं. बोलो क्या सच है फिर मैं अपना फैंसला लुंगी.", ऋचा ने भी माहौल और ख़ामोशी को देखते हुए अपनी आवाज नीची राखी लेकिन कड़वाहट और दर्द फिर भी शामिल था. लता शुन्य भाव से बस सामने देखती अपनी बेटी के सवाल सुन्न रही थी.

"चंदरभान. ठीक है तोह ऐसे हे सही. मेरे पिता तोह कभी ghar-pariwar की जिम्मेवारी लेते नहीं थे लेकिन मेरे विवाह के बाद तोह उन्होंने माँ से अलग रहना हे शुरू कर दिया. चन्दर भैया ने सब जिम्मेवारिया उठाई और माँ भी पति की अनदेखी, भैया के प्यार की वजह से उनके करीब हो गयी. अकेली औरत की भी कुछ िचाये होती है और चन्दर भैया परिवार से थे तोह वो गलत फायदा उठाने वालो में से तोह नहीं थे. आज तक उन्होंने सिर्फ इसलिए ब्याह नहीं किया क्योंकि मेरी माँ की अनदेखी न हो.", लता अपनी अलग हे कहानी सुना रही थी जिस से ऋचा ने असहमत होते हुए बीच में हे टोक दिया.

"ये इतिहास नहीं सुन्न न मैंने माँ. साफ़ है के नानी के उनसे जिस्मानी ताल्लुकात अभी तक रहे और अब आप वो बताओ जो मैंने पुछा. आपके उनसे जिस्मानी तालुकात क्यों बने? क्या पापा में भी नाना जी जैसी कमी है? इतनी समझ है मुझमे और फिर आपका वो लाडला बड़ा भाई आपकी हे बेटी पर हाथ दाल रहा था तब भी आपको गलत नहीं लगा?"

"मेरे कोई जिस्मानी तालुकात नहीं थे उनके साथ. और तुम कौनसे पापा की बात कर रही हो? जो मर्डर गए वो या जो महीने में 2 बार हाजरी लगा के चले जाते है वो? मेरे भैया ने जो किया वो गलत होगा लेकिन इंसान नशे में गलत हरकत कर देता है. उसके लिए सजा दी जा सकती है लेकिन मौत नहीं.", लता की आँखों में आंसू और गुस्सा भरा था लेकिन ऋचा शांत थी.

"सवाल वही है और जवाब फिर गलत. जानती हो शराब पीने के बाद इंसान गलत हरकत तभी करता है जब उसको कुछ याद आ जाता है. प्यार, वासना या दर्द जैसा कुछ और फिर एक शराबी तोह झूठ भी नहीं बोलता. मनबीर ने जो कहा था वो मैं अपनी माँ के तोह सामने नहीं कह सकती लेकिन आपकी दलील बेबुनियाद है. निश्चिंत रहिये और घबराइए मत. सबके सामने आप मेरी माँ हे रहेंगी लेकिन मुझे tab-tak चैन नहीं मिलेगा जब तक मैं आखिरी किनारे तक नहीं पहुंच जाती. ये हवेली पुराणी है तोह राज भी यही दफ़न मिलेंगे. चलती हु, आप अपना सोच लेना बस. अपनी माँ के घर जाना है या यहाँ हवेली में रहना. चन्दर की लाश लेने गयी तोह दरवाजे से अंदर वापिस मैट आना.", ऋचा ने इतनी बड़ी बात एकाएक तमाचे की तरह अपनी माँ के मुँह पर मार दी थी.

"तू होती कौन है हुकुम देने वाली?"

"आवाज नीचे माँ, रात को भी कहा था मैंने. हवेली की मालकिन मैं हु और ऐसी वसीयत दादा जी ने हे तैयार की थी, पता नहीं किसके कहने पर लेकिन ये हवेली 6 साल से मेरी है और मेरी असली पहचान भी ये परिवार है. आइंदा आप या तोह सच बोलेंगी या कुछ भी नहीं. दादी उतने वाली है तोह चूल्हा बाल लो.", ऋचा इतना कह कर सधी हुई चाल से बाथरूम की तरफ चल दी लेकिन लता के मिर्चे लग चुकी थी.

'साली कुटिया इस दिन के लिए बड़ी की थी? हवेली दिलवाई मैंने और मुझपे हे रौब. चन्दर की मौत का बदला ऐसा लुंगी रांड तुझसे की हवेली में 13 दिन रोटी न बनेगी.', मैं में हे बहुत कुछ ठान चुकी थी ये भोली सी दिखने वाली क्रूर महिला. शायद एक बड़ी जुंग की नीव रख दी गयी थी जिसका व्यापक असर होने वाला था.

"गुड्डी, चा रख दे और बाकी सबको भी जगा दे. मुन्नी, तू अपनी माँ के साथ कही जा रही है क्या?", ओढ़नी ठीक करती हुई चंद्रो देवी बहार आयी तोह अपनी बहु को यु अकेले बैठे देख पूछ लिया. मल्टी उर्फ़ गुड्डी भी सर को ढकने के बाद चूल्हे की तरफ चली गयी थी.

"न माँ जी. वो कल रात चन्दर भैया किसी रंजिश का शिकार हो गए तोह माँ संदेसा देने आयी थी. दिन निकलते हे वो राजू के साथ हॉस्पिटल चली जाएँगी. भैया की सूचना दे दी थी मां जी को तोह वो लोग 6 बजे तक इधर हे आ जायेंगे. संस्कार तोह उनके हे गाँव में होगा तोह मैं कही नहीं जाने वाली.", सामने आ कड़ी हुई ऋचा ये सुन्न कर मुस्कुरा उठी. और चंद्रो देवी ने आत्मा की शान्ति के लिए कुछ शब्द बुदबुदाए, फिर स्नानघर की तरफ बढ़ गयी. उन्हें जान कर थोड़ा दुःख हुआ था लेकिन जब मुन्नी ने हे कह दिया था के वो यही रहेंगी तोह चंद्रो देवी ने कोई sawal-jawaab न किया.

"ताई जी, मेरी चाय मत बनाना, मैं अभी बड़ी ताई जी के साथ थोड़ा और सोऊंगी. रात नींद पूरी नहीं हुई.", ऋचा अंगड़ाई लेती हुई जाते जाते अपनी माँ को फिर चिड़ा गयी थी. उसको भी पता था के अब माँ मुठी में हे रहने वाली है.

'कर ले सीना चौड़ा लेकिन परिवार मेरा भी है. ऐसी नींद मिलेगी जैसी तेरे नाना को दी थी, वो भी मेरे रस्ते आया था और तू भी आ गयी.', लता वह से कड़ी हो कर पिछले हिस्से में काम करने वालो को उठाने चली गयी. बेबस थी फ़िलहाल लेकिन ज़िद्दी अपनी बेटी से ज्यादा.

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अर्जुन अपने सवेरे वाले ling-tanaav की वजह से उठा तोह सोई हुई विन्नी दीदी के मासूम चेहरे पर आयी मुस्कराहट देख खुद भी मुस्कुराने लगा. अभी भी दोनों निर्वस्त्र चिपके थे और अर्जुन के अलग होने पर वो दोनों मॉटे उरोज बेपर्दा सामने आ गए.

'अब खूबसूरत है तोह है. चलिए इन्हे गुड मॉर्निंग बोल हे देता हु.', गुलाबी निप्पल अभी अकड़े हुए न थे जिन्हे बड़े आराम से अर्जुन ने चूम लिया. शरीर में हलकी सी कमपन्न हुई विन्नी दीदी के लेकिन जैसे वह किसी मीठे ख्वाब में खोयी थी. चादर समेत उन्हें अपनी बाहों में उठाया तोह वो गहरी चमकदार आँखें भी खुल गयी.

"क्यों सत्ता रहे हो इतनी रात में? सोने दो न प्लीज.", अपने हाथ दीदी ने भी अर्जुन के गले में दाल लिए. उन्हें एहसास हो गया था के वो भीतर से निर्वस्त्र हे है.

"इस हालत में आपको ऋतू दीदी ने देख लिया तोह आज मेरा भी boriya-bister घर से बहार. वापिस सो जायेगा इस कमरे में, कपडे पहन कर. वैसे हो तोह आप भी बिलकुल अप्सरा सी.", अर्जुन ने तारा वाले बिस्टेर पर लिटाते हुए उनके होंठो को प्यार किया तोह विन्नी दीदी ने भी उसको अपने ऊपर खींच लिया. 1 मिनट बाद दोनों अलग हुए तोह वो निरंतर उसको हे देख रही थी.

"ी लव यू. और मुझे तुम्हारे साथ सचमुच ाचा लगा अर्जुन. कोई पछतावा जैसा नहीं, बस एक सुरक्षा और ढेर सारा प्यार मिला. ी विल वेट फॉर थे डे व्हेन यू विल होल्ड में बियॉन्ड रेस्ट्रिक्शन्स.", अब उनका सीना चादर से बहार था और दोनों की हे नजरे इस तरफ न थी. अर्जुन ने हौले से गाल पर हाथ फिराया और हाँ में सर हिला कर सहमति दे दी. सोने से पहले विन्नी दीदी ने वो कपडे ानिटचा से पहन लिए लेकिन एक बार और अपने सीने से अर्जुन को लगाने के बाद.

"आप भी बहोत प्यारी है दीदी. आपकी हर ख्वाहिश पूरी होगी और अब आराम कीजिये मैं तैयार होता हु. गूडनिघत वन्स अगेन.", इतना कहता वो बाथरूम चला गया और विन्नी अपनी किस्मत पर खुश होती फिर से नींद के आगोश में चली गयी. ठीक 4:50 पर अर्जुन ने हे ऋतू दीदी के दरवाजे पर दस्तक दी तोह दरवाजे के उधर अलसाई सी आरती दीदी को खड़ा पाया. रक्तिम गौरवर्ण वो भी एक प्यारी लड़की थी, भरे शरीर के साथ जो अब निखरता जा रहा था.

"उम्मम्माह्ह. कैसी हो आप?", अर्जुन ने बिस्टेर पर सोई अलका को देखने के बाद उन्हें बाहों में लेके बड़े प्यार से होंठो को चूमा तोह आरती दीदी भी इस बंद कमरे में उसके सीने से लग गयी. झीनी सी निघ्त्य में वो अंदर से आजाद थी और दोनों मांसल कबूतर अर्जुन की छाती पर चोंच मारते लगे.

"गुड मॉर्निंग. मैं ाची हु और तुम्हे देखने के बाद अब ज्यादा ाची. ऋतू बाथरूम में तैयार हो रही है तबतक तुम यही बैठ जाओ.", वो अलग न होते हुए खुद भी अर्जुन से चिपक कर अपनी चाहत जाता रही थी.

"ऐसे ज्यादा ाचा लग रहा है तोह बैठना क्यों. आप कैसे इतनी जल्दी उठ गयी?", बात करते हुए अर्जुन उनके नरम कूल्हों को भी सेहला रहा था जिस से आरती को कोई परेशानी न थी. वो तोह खुद चाहती थी की अर्जुन बस करीब रहे. इस बार खुदसे हे एक चुम्बन देती वह अर्जुन के कंधे पकडे एड़ी पर कड़ी हो गयी. अर्जुन की उंगलिया गोलाकार कूल्हों की दरार में चलती अलग हे मजा दे रही थी.

"ऋतू और मैं जल्दी सो गए थे, अलका और तारा 2 बजे सोई. तुम बताओ तुम्हारे इरादे कुछ और हे लगते है. सब ठीक है न?", उनके ऐसा पूछने पर अर्जुन ने ना में गर्दन हिला दी.

"आपको पंजाब वाले प्यार के बदले में अपना प्यार देने का इरादा है मेरा."

"रोक कौन रहा है फिर? 11 बजे तुम्हारे कमरे में. उमाह.", आरती दीदी ने सामने से हे अर्जुन को समय और जगह बता दी. वो थोड़ा हैरान भी हुआ लेकिन अपनी बात कहना ठीक लगा.

"रात तक कुछ ज्यादा देर नहीं होगी?"

"दिन में 11 बजे उल्लू. विन्नी दीदी के घर से उन्हें लेने ताऊजी 8 बजे आएंगे और तारा कार से Alka-Ritu और प्रीती को ले कर हिमानी के घर जाने वाली है 10 बजे. बोलो क्या कहते हो?"

"रिस्क है लेकिन आप साढ़े 10 तैयार रहना. हम बहार चलेंगे."

"पागल हो क्या अर्जुन? ये सब बहार नहीं. मैं पंजाब चलने का इन्तजार हे कर लुंगी.", आरती दीदी ने साफ़ इंकार हे कर दिया.

"कुछ जगह घर के जैसी घर से बहार भी तोह हो सकती है? आप बस तैयार रहना, पंजाब का वह जाने के बाद देखेंगे.", अर्जुन ने एक उभर पर हाथ रखा हे था के आरती मुस्कुराती हुई दूर हट गयी. बाथरूम का दरवाजा खुला तोह ऋतू बहार आ गयी. आरती दीदी के भी कान तेज हो गए थे ये देख अर्जुन मुस्कुरा दिया.

"हो गया तेरा हंसना तोह चले अब?", ऋतू दीदी को ऐसे नाराज देख अर्जुन को अजीब लगा लेकिन वो जूते पहन कर उसका हाथ पकड़ कर बहार निकल चली. आरती दीदी हंसती हुई तैयार होने बाथरूम में. आजकल इन्होने खुद हे 2-2 की टीम बना कर रसोई भी सम्भालनि शुरू कर दी थी, अर्जुन पर ध्यान देने के साथ हे.

"आज बहार कीचड होगा दीदी और पार्क भी गीला.", अर्जुन ने वही प्रीती वाली साइकिल गेट से निकलते हुए ऋतू दीदी से कहा तोह वो भी गीली सड़क देख कर दुविधा में पड़ गयी.

"तोह अब ये मैट कहना के आज तुम एक्सरसाइज नहीं करोगे."

"वो वह आँगन में कुर्सी पर टोलिया रखा है, वो उठा लाओ आप बस. एक्सरसाइज ज्यादा ाची करेंगे आज.", अर्जुन की बात पर अजीब सा चेहरा बनती ऋतू दीदी जल्द हे टोलिया लिए वापिस आ गयी.

"अब?"

"अब आप पीछे बैठो बस. साइकिल से हे शुरुआत करते है.", अर्जुन उन्हें पीछे बैठा कर निकल चला अगले सेक्टर की तरफ और जैसे हे वो अपने सेक्टर से बहार पहुंचे उसने बात शुरू की.

"विन्नी दीदी के बारे में पता है आपको?"

"हाँ पता है?", ऋतू दीदी के ऐसे सपाट जवाब पर अर्जुन चौंक गया लेकिन ऋतू दीदी ने हे बात आगे बधाई.

"वो तुझे पसंद करती है, जान बूझ कर अवॉयड करती है लेकिन फिर भी उनका ध्यान तुझपे हे रहता है. उन्हें समझ नहीं आ रहा के वो तुझे कैसे एप्रोच करे और क्या ऐसा करना ठीक रहेगा, क्योंकि वो बड़ी है और एक रिश्ता और भी है उनका तुम्हारे साथ. तुझसे बात करके शायद वह कोई हल निकले या निकाल भी चुकी हो. अब तू बता.", अब अर्जुन क्या हे बोलता. वो पैदल मारता इधर उधर देख रहा था, सड़क साफ़ थी लेकिन 5 बजे भी पूरा उजाला न था.

"रात वो मेरे साथ सोई थी?"

"ोये उल्लू की डूम, कही कर तोह नहीं दिया वो सब जिसमे तू माहिर है?", ऋतू दीदी ने उसकी टीशर्ट जोर से खींची तोह अर्जुन ने साइकिल रोक हे दी.

"आपको इस बात की हे टेंशन थी न बाथरूम से बहार आते हुए भी और अभी मेरे साथ बात करते वक़्त भी?", अब बारी ऋतू की थी खामोश होने की. टीशर्ट छोड़ते हे नजरे नीची हो गयी उनकी.

"सॉरी यार. मैंने सोचा के तुम रुक नहीं पाओगे चाहे वो इजहार करे या दोस्ती. लेकिन तुम्हारी बात सुन्न कर लगता है के तुमने वो नहीं किया जिस से मुझे टेंशन है."

"वो पहले हे इतनी टूटी हुई थी की मैं ऐसा चाह कर भी नहीं कर सकता था. और बता देता हु के मैं कण्ट्रोल से बहार सिर्फ आपके साथ होता हु. चाहे प्रीती मुझ पर हावी हो या अलका बराबर साथ दे.", अर्जुन की इस बात पर ऋतू ने एक प्यारी मुस्कान देते हुए यही वीरान सड़क पर हे उसका गाल चूम लिया. बेशक कुछ घर थे लेकिन वो इन्हे देख तोह नहीं सकते थे. दोनों फिर से अर्जुन की अनजान मंजिल की तरफ चल पड़े.

"और मैं चाहती हु के ऐसा हे हो. तुम ऐसे हे रहो ारु हमेशा. प्रीती का हक़ है इसलिए वो तुम्हे अपने कण्ट्रोल में रखती है और अलका तोह जैसे तुम कहो वह वैसे करेगी क्योंकि उसको तुम पसंद हो. हाँ हमारा कनेक्शन थोड़ा डिस्टर्बिंग है, मुझसे भी कण्ट्रोल नहीं होता.", हंसने के साथ साथ वह अपनी हे बात पर शर्मा रही थी.

"तोह अब विन्नी दीदी को अगले कुछ दिन तक तोह ताल दिया. लेकिन वो दूर नहीं होंगी और शायद अगली बार मैं भी उनका साथ दू.", अर्जुन ने थोड़ी चिंता से कहा था.

"हाँ तोह कौनसा मैं तुम्हे रोक रही हु. अपने घर वापिस जाने की हालत में नहीं रहती वो अर्जुन और फिर एकदम इतना आगे जाना भी ठीक नहीं था. इसलिए ज्यादा टेंशन थी. नेक्स्ट टाइम तुम जानो और विन्नी दीदी, बस मुझे कुछ मत बताना. और ये हम जा किधर रहे है? यहाँ तोह सेक्टर भी ख़तम हो गया."

"सब ख़तम होने के बाद हे तोह मंजिल आएगी."

"और इस मंजिल पर पहले तुम्हारे साथ कौन आया था? बोलो बोलो.", शरारत से ऋतू ने ऐसा कहा तोह अर्जुन भी हंसने लगा.

"आपकी पार्टनर को लेके आया था मैं यहाँ. और तभी मेरा दिल था के यहाँ कोई और नहीं आएगा.", अर्जुन अब उस कच्चे रस्ते पर आया तोह वो इतनी बारिश के बावजूद सही सलामत था. ठोस और बस हल्का गीला.

"फिर मुझे क्यों लेके आये यहाँ?"

"क्योंकि मैं अकेला तोह आ हे सकता हु. मतलब आप हर उस जगह जा सकती है न जहा मैं जाओ?", थोड़ा आगे आते हे नजर लबालब बहती नहर पर पड़ी तोह अर्जुन ने इशारा किया उस और. पानी आज हमेशा से कही ज्यादा हे ऊपर तक था, ईंट की दिवार के ऊपर तक.

"वाह. ये जगह तोह सचमुच बड़ी अनोखी है और इधर कोई आता जाता नै क्या?"

"जंगल में कौन आएगा वो भी जहा जमीन सरकारी हो? लेकिन कंकर मार कर हे खुश नहीं होना आपने, अंदर उतरना भी है.", अर्जुन को टीशर्ट उतारते देख ऋतू के वो हाथ वही रुक गए जिन से वह पानी में छोटे पत्थर फेंकने लगी थी.

"पागल हो क्या? न मुझे स्विमिंग आती है और न मैं इतनी जल्दी डूब कर मरना चाहती हु. प्रीती और तुम्हे हे मुबारक ये बेहटा दरिया.", ऋतू दीदी के इतने गंभीर चेहरे को देख अर्जुन हंसने हे लगा था. जूते खोलने के बाद उसने ट्रैक पजामा भी उस झाडी के ऊपर लटका दिया जो 4-5 फ़ीट ऊँची थी. हलकी रौशनी में अर्जुन को लगभग निर्वस्त्र देख ऋतू के चेहरे की भी रंगत बदलने लगी थी. लेकिन 'छपाक' की आवाज के साथ ध्यान दिया तोह अर्जुन पानी में कूद चूका था और उसकी गर्दन पूरी बहार थी.

"दरिया नहीं नहर है ये वो भी मुश्किल से 5 फ़ीट गहरी. सबसे जरुरी बात ये है के क्या मैं अपनी जान खुद ले सकता हु?", उस बहाव का कोई ख़ास प्रभाव न देख ऋतू भी सम्मोहित सी आगे बढ़ने लगी. अर्जुन है तोह फिर डर किस बात का.

"ओह hello, नींद में चल रही हो क्या आप? कपडे उतार कर वह उस दिवार से आ जाओ, मैं पकड़ता हु आपको.", अर्जुन की आवाज से ध्यान आया के वह कैसे जाने लगी थी और इधर से तोह नहर भी 'व्' अकार में थी जहा चोट लग सकती थी. लेकिन अर्जुन बहाव के विपरीत चलता हुआ इस खुली टंकी जैसी जगह आया तोह ऋतू अब इधर उधर देखने लगी. निर्वस्त्र और वो भी खुले में.

"यार यहाँ कपडे उतारू? तुम चलो यहाँ से, ये मुझसे नहीं होगा."

"ऋतू, दूर दूर तक तुम्हे सिर्फ मैं देखने वाला हु यहाँ या फिर ये घने वृक्ष और किस्मत ाची रही किसी नीलगाय, सियार या खरगोश की तोह वो. मैं अपनी आँखों के सिवा किसी और की नजरे कैसे तुम्हारे ऊपर आने दे सकता हु.?", अर्जुन के बात ख़तम करने से पहले ऋतू ने भी हँसते हुए अपनी टीशर्ट उतार कर अर्जुन के कपड़ो पर दाल दी. सफ़ेद ब्रा में कैसे वो अध्भुत कलश पानी के अंदर भी अर्जुन को गर्मी देने लगे. उसको ख़ास नजरो से देखते हुए ऋतू ने अपना पजामा और जूते भी उतार कर रखे तोह अर्जुन का लिंग पानी में भी कड़ा हो चूका था. झुकने पर आते वो कटाव, अर्धनग्न उरूज और चिकनी गोरी गोल जांघो के बीच वो उजली सफ़ेद पंतय.

"देखना बंद करो नहीं तोह मैं नहीं आने वाली.", अर्जुन इस बात से थोड़ा मायूस हो गया लेकिन होंठो को दबती ऋतू ने एक शन्न में हे वो दोनों सफ़ेद वस्त्र भी उतार फेंके. अर्जुन तोह फिर भी कच्चे में था, लेकिन ऋतू जन्मजात अवस्था में नंगे पाँव गीली सतह पर मन्दाकिनी सी चलती उस ठन्डे पानी में आधा इंच डूबी दिवार पर आ कड़ी हुई. दोनों ने समय मिलने पर ाचा खासा संसर्ग किया था लेकिन ऋतू का यौवन ज्यू का त्यों सर उठाये खड़ा था, बेदाग़ और कोरा.

"आप चीज क्या हो? पहले से भी और हसीं या यु कहु के मैं बता नहीं सकता."

"चीज नहीं तुम्हारा प्यार हु. और प्यार निखरता है बस. अब गिराया तोह यही प्यार काल बन जायेगा.", अर्जुन को हाथ देती वह उसके करीब आयी तोह अर्जुन ने कमर से पकड़ते हुए अपने जिस्म से सत्ता कर ठन्डे पानी में उतार लिया.

"आउच. यार ारु क्या करवा रहे हो तुम? आह्हः.. कितना ठंडा पानी है और यहाँ कोई saanp-vaanp तोह नहीं न?", ऋतू ने कस के अर्जुन को पकड़ लिया था. लेकिन तुरंत हे चेहरे पर दिलकश हंसी आ गयी जब पता लगा के सांप घर से उनके साथ हे आया है.

"कमीने हो तुम, ये खड़ा किये हो यहाँ पानी के अंदर. इतने ठन्डे पानी में भी तुम ये कैसे कर सकते हो.?", अर्जुन ने जवाब देने की जगह होंठो से होंठ मिलते हुए उनके सुडोल कूल्हों को जोर से दबा लिया. लम्बे बाल भी पानी की सतह पर भीगने लगे थे. धीरे धीरे खुद ऋतू भी इस बहाव में शामिल हो कर अर्जुन के प्यार की नाव में सवार होने लगी. नहर की अंदरूनी सतह साफ़ थी जहा खड़े होने पर कोई परेशानी नहीं हुई. दोनों के होंठ जुड़ा हुए तोह अब ऋतू की आँखों में वही तड़प थी हमेशा अर्जुन के साथ एकांत मिलने पर दिखती थी. लेकिन फिर भी वह शायद खुद को रोकना चाहती थी.

"तुम स्विमिंग करो मैं इस दिवार पर बैठती हु.", वो अलग होने लगी तोह अर्जुन ने ना में गर्दन हिला दी.

"अब उसके लिए देरी हो चुकी है ऋतू. घर से निकलते हे ऐसा हो गया था और आप भी ऐसा चाहती है."

"लेकिन न करने की एक वजह है अर्जुन जो मैं बता नहीं सकती अभी."

"उस वजह को मैं संभल लूंगा लेकिन अब दिल को नहीं संभल सकता.", अर्जुन ने कूल्हों के निचे हाथ रखते हुए ऋतू के जिस्म को ऊपर उठाया तोह दोनों कड़े निप्पल छाती पर घिसते हुए उसके चूचक के बराबर आ रुके. इतना बहोत था ऋतू का धारिया ख़तम करने के लिए.

"आह्हः.. लेकिन यहाँ पानी में ठीक नहीं रहेगा अर्जुन.. उम्म्म्म.. इन्फेक्शन हो सकता है.", अर्जुन उनका डर समझते हुए नाक से नाक लगाने लगा जैसे ऋतू खुद उसके साथ बचपन में करती थी.

"बेहटा पानी है और इतना साफ़ लेकिन मैं भी नहीं चाहता के आपको यहाँ परेशानी हो. आप न घर में बंद रह कर कुछ ज्यादा हे डरने लगी हो.", गॉड से उतार कर ऋतू दीदी को वापिस उस दिवार पर बैठाया तोह वह हंसने लगी.

"तुम ज्यादा हे दिलेर नहीं हो गए बहार निकल कर? वैसे ये दिवार भी ाची जगह है, क्या कहते हो? अंदर इस तरफ से पानी भी काम गहरा होगा.", ऐसी हे टंकी तोह वह गाँव में थी जहा अर्जुन काजल के साथ संसर्ग करता था लेकिन वो कुछ और हे सोच कर बैठा था.

"न यहाँ नहीं. मुझे पता है के ये पानी की वजह से सपाट है लेकिन फिर भी ठीक नहीं. पहले नहाना था जो हो गया और अब खाना है तोह जमीन ज्यादा सही रहेगी.", अर्जुन दिवार पकड़ कर ऊपर आ गया तोह ऋतू भी देखने लगी की वह क्या करने लगा है. अर्जुन चलता हुआ इस बड़े सफेदे के वृक्ष के करीब आ रुका और मदद कर ऋतू को देखने लगा.

"जमीन का मतलब ये नहीं था के हम मिटटी में लेटने वाले है.", 5-6 कदम ऋतू भी चलती उसके पास आ गयी. भीगा बदन अब ज्यादा कामुक लग रहा था इन वृक्षों के झुरमुट और नहर किनारे.

"तुम्हारी कितनी फंतासी है ऐसी? पागल कही के.", ऋतू ने पलभर व्यर्थ न करते हुए अर्जुन से लिपटना हे बेहतर समझा. अर्जुन अपने साथ साथ उसको भी ये अलग दुनिया दिखा रहा था. भीगा अंडरवियर अब जमीन पर गिरा था और दोनों हे एक दूसरे के होंठो को चूसते हुए अपने अपने हाथ से एक दूसरे के खास अंगो को सेहला रहे थे. ऋतू एड़ी उचकाने लगी तोह अर्जुन भी समझ गया के वो सीधा अंतरंग होना हे चाहती है, बिना ज्यादा कुछ किये.

"आठ.. आपके साथ मेरे ऐसे हजारो सपने है जो मैं पूरा करना चाहता हु. लेकिन ज्यादातर के लिए तोह शादी तक हे रुकना पड़ेगा.", अपनी पीठ उस मुलायम सफेदे से टिकते हुए अर्जुन ने ऋतू को ऊपर उठा लिया. शरीर गीला होना इसको मुश्किल बना रहा था लेकिन ऋतू ने भी पकड़ कमजोर न होने दी. जाँघे फैलते हे योनि का संकरा चीरा थोड़ा बेहतर खुल गया. लिंग भी देरी न करता अपनी मेहबूबा से चिपका और खुदे ऋतू ने नितम्ब थोड़ा निचे गिरा दिए. एक तेज आह के साथ हे वो सूपड़ा अंदर समाहित कर चुकी थी. दोनों वैसे हे रुक कर एक दूसरे को काबू कर रहे थे.

"आह्हः.. कर लेना सब, मैं भी चाहती हु की सबकुछ सिर्फ char-diwari में हे न हो. यहाँ ऐसे खुले में तोह मुझे भी अलग से सेंसेशन हो रहे है. थोड़ा डर और ज्यादा एक्ससिटेमेंट. आउच. .. गधे आराम से आठ.. यहाँ चीख निकली तोह दूर तक जायेगी.. ाःह..", मजबूती से अर्जुन की गर्दन में दोनों हाथो से शिकंजा बनाये वह जमीन से 3 फ़ीट ऊपर थी. 36 के कूल्हों के बीच उस गुलाबी योनि में आधे से ज्यादा लिंग समाया था. इतनी बार संसर्ग के बाद भी योनि के होंठ वैसे हे कसाव लिए सामान रंगत के थे. ज्यादातर के तोह ये गहरे हो जाते है.

"उम्मम्मम.. आपके साथ नहीं करूँगा तोह किसके साथ करूँगा?", अर्जुन सिर्फ होंठो को हे चूम सकता था इस अवस्था में और वही कर रहा था. ऋतू खुद आहिस्ता आहिस्ता कमर हिला रही थी.

"आह्ह्ह्ह.. प्रीती के साथ करना, वो तोह खुद चाहती है के तुम उसके साथ पूल में डुबकी लगाओ.. आउच.. बेशरम मैट बनाओ ज्यादा मुझे...", ऋतू कुछ सोच कर ऊपर उठी और लिंग बहार निकल कर कपड़ो की तरफ चल दी. अर्जुन हैरत से बस खड़े लुंड के साथ उन्हें जाता देख रहा था. लेकिन जल्द हे वापिस आयी और निचे वो 3क्ष2 का टोलिया बिछाती लेट गयी.

"इधर आ जाओ, देखा जायेगा अगर कोई कीड़ा हुआ भी तोह.", अर्जुन भी समझ गया था के वो कहा झिझक रही है और साथ हे ये सुविधाजनक भी था. अब वह उनके ऊपर आते हुए दोनों मॉटे दूध दबाता 2-3 धक्को में हे अंदर समां गया था.

"नहीं बनता बेशरम आपको.. आह्ह्ह्ह.. लेकिन प्रीती के साथ डुबकी शादी की रात.. उम्म्म..", बड़े प्यार से उनका सतांन मर्दन करते हुए वह यहाँ जंगली घास पर बिछे तोलिये पर लेती ऋतू को प्यार के सफर और आगे ले जाने लगा था. योनि का कसाव अब चिकनाहट की वजह से आड़े नहीं आ रहा था. गोर सतांन जल्द हे ज्यादा कसाव लेते लाल होने लगे और ऋतू की टाँगे भी कमर पर मजबूती से कस गयी.

"आजाद कर दो न अर्जुन उसको इस वचन से. आह्ह्ह्ह.. तुम बहोत गलत कर रहे हो उसके साथ... उम्म्म्म", अर्जुन के धक्के गहरे होते गए ऋतू का हर लफ्ज़ सुन्न ने के साथ. दोनों में यही खूबी थी की कभी पागलपन होता था तोह कभी गहरी बातें. आज दूसरी तरह ये मिलान चल रहा था. ऋतू भी अलका की तरह स्खलन होने के बावजूद बिना रुके अर्जुन को अपने चुचो पर झुका रही थी.

"उम्म्म.. वो समय आने पर मैं खुद हे कर दूंगा.. आह्हः.. सही समय का इन्तजार है बस्सस..", कसमसाता अर्जुन आज ऋतू की ये अलग सी पकड़ को बर्दाश्त न कर सका. पहली बार वो 15 मिनट में निबट चूका था और हुंकार भरता उनके पेट पर अपना कॉमर्स छोड़ कर निर्वस्त्र हे नहर में जा कूड़ा.

"पागल हो तुम, पूरे पागल. लेकिन मैं जानती हु तुम्हे हैंडल करना.", ऋतू चलती हुई वही नहर किनारे आ गयी. पिंडली पर स्कूल चुभने से खून बेहटा हुआ पंजे की तरफ जा रहा था जिस पर अर्जुन की नजर जरा देरी से पड़ी. टोलिया झाड़ कर अपने कंधे पर रखती वह दिवार का सहारा लिए नहर में उतरने हे वाली थी की अर्जुन ने उन्हें पकड़ लिया.

"पागल आप हो. ये क्या हालत की है आपने अपनी.?", पानी गिरते हुए अर्जुन ने वो लम्बा कांटा बहार निकला और वह होंठ लगा दिए. ऋतू बस मुस्कुरा रही थी.

"हो जाता है ऐसा और जरुरी नहीं के दर्द हो. अब फिर से नहाना पड़ेगा.", उनकी बात सुन्न कर अर्जुन ने उन्हें आराम से वह उतार दिया. खुद हे उन्हें पानी से साफ़ करके 2-3 डुबकी लगता वो भी बहार निकल आया.

"आप पहले पांच लो.", अर्जुन ने कहने के साथ साथ अपने हाथो से उनका शरीर साफ़ किया और ऋतू बस अर्जुन का प्यार देख खुश हो रही थी.

"एक कांटा लगने पर हे घबरा गए. दिलेर देखो जरा.", खिलखिलाती हुई वो कपड़ो के पास भाग आयी और अर्जुन खुद को सही करने लगा. 10 मिनट बाद दोनों हे पैदल चलते साइकिल के साथ इस जंगल से बहार आ गए. ऋतू अभी तक अपने बाल सूखा रही थी.

"मुझे मंजू के घर छोड़ देना अर्जुन और घर पर कोई पूछे तोह बता देना के तुम नहर पर जाने से पहले मुझे वही उतार गए थे. प्रीती को फ़ोन कर दूंगी घंटे बाद तोह वो लेने आ जाएगी.", साइकिल के पीछे बैठ कर ऋतू दीदी ने उसको समझा दिया था.

"हम्म्म. वैसे आपके साथ बिस्टेर वाला हे ठीक है. और आज आपने कुछ अलग हे किया na?",Arjun पैदल चला रहा था और ऋतू हंस रही थी.

"बच्चू, ये लड़की पर भी देपेंद होता है के कण्ट्रोल अपने हाथ में कैसे ले. वही प्रैक्टिकल तुम्हारे साथ किया बस. और सच कहु तोह मुझे ाचा तोह लगा यहाँ तुम्हारे साथ लेकिन जगह कम्फर्टेबले नहीं थी. वो बारिश और छत्त वाला हे बेस्ट था.", ऋतू दीदी की बात पर अर्जुन को भी याद आ गयी थी वो रात. दोनों हलकी मस्ती करते अगले सेक्टर तक आ गए जहा दीदी को मंजू के घर के बहार छोड़ अर्जुन अपने घर निकल गया.

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"चंदरभान सिंह एक धृत व्यक्ति था और मनबीर उसका लंगोटिया, वो लता की शादी से भी बहोत पहले से साथ थे. आपस में लड़ कर तोह नहीं मर्डर सकते.", रामेश्वर जी बगीचे में बैठे चाय पर चर्चा कर रहे थे अपने धरम भाई छोल साहब के साथ और कौशल्या जी भी उधर हे थी. अर्जुन नाहा धो कर सब्जियां लेने गया था प्रीती, तारा और रेणुका के साथ.

"तोह यही बताने के लिए बड़ी भाभी का फ़ोन आया था क्या आपको?", कौशल्या जी ने ये सवाल किया तोह रामेश्वर जी ने ना में गर्दन हिला दी.

"ये उमेद ने बताया था अभी जब मैं कपडे पहन रहा था तब. फ़ोन पे ज्यादा बात नहीं हुई क्योंकि वह थोड़ी हे देर में यहाँ आने वाला है. लेकिन बड़ी भाभी ने इसका जीकर क्यों नहीं किया ये बात ज्यादा अजीब है.", रामेश्वर जी ने चाय का कप एक घूँट लेने के बाद निचे रखा तोह अब छोल साहब ने बात आगे बधाई.

"एक तोह जहा तक मुझे पता है भाई साहब वो उनके परिवार से नहीं है. दूसरा ब्याह शादी का समय है तोह वो भी नहीं चाहती होंगी की आप फिर से पोलिसिअ दिमाग लगाओ.", इस से ज्यादा अब वह कह भी नहीं सकते थे कुछ.

"देवर जी, इनका दिमाग जहा चल रहा है वो आप नहीं समझ प् रहे. ईश्वर सिंह एक भला और सर्वप्रिय इंसान था जिसकी मौत सांप के काटने से हुई थी. तब भी यही 2 लोग सबसे पहले लाश तक पहुंचे थे और सागा बीटा न होने की वजह से चंदरभान ने हे चिटा को आग दी थी. कोई पोस्टमॉर्टम तक नहीं होने दिया था और न ज्यादा लोगो को पता चला था. अपनी मज़बूरी में इन्होने वह हाथ नहीं डाला लेकिन अब ये घटना हुई है तोह पुराणी के साथ जरूर जोड़ेंगे ये.", इस बार हँसते हुए रामेश्वर जी ने हाँ भरी.

"इसलिए तुम्हारी भाभी को थानेदार कहता हु सतीश. मान लो ये है 1, ये है 2 , ये है 3 और ये है 4. शुरू से शुरू करते है और कौशल्या तुम जरा ध्यान रखना.", रामेश्वर जी ने अख़बार के एक थोड़े से कोरे हिस्से पर चार गोले बना दिए, क्रमांक के साथ.

"निश्चिन्त रहिये."

"हाँ तोह ये 1 है Ajju-Shillu वाली दुर्घटना. जहा लता बेहोश मिली थी चंदरभान और मनबीर को, बंद स्कूल में. उन्होंने मन था के वह वह चिल्लम पीने जाते थे और उस दिन भी वही करने गए थे. ट्रैन की पटरी स्कूल की चारदीवारी से 100 गज दूर भी नहीं थी. अब आओ दूसरी घटना पर जो उस वीभत्स घटना के बाद सोमबीर भाई की हवेली पर संधि के वक़्त हुई. लता ने अपनी जगह चंदरभान को अपने पिता की संपत्ति का वारिस बनाने की पेशकश राखी थी जिसपर ईश्वर सिंह ने साफ़ मन करते हुए ये कहा था के अगर चंद्रो देवी सामने से शंकर को उनके घर के बचे बड़े होने तक वारिस रख रही है तोह ईश्वर सिंह के लिए भी शंकर उनकी संपत्ति का वारिस है. वह लाजवंती के साथ साथ चंदरभान को भी ये बात चुभी थी और उन्होंने हस्तक्षेप भी किया लेकिन लता के एक बार कहते हे वो खामोश हो गए. तीसरी और ध्यान देने वाली घटना.", इतना कह कर एक पल के लिए रामेश्वर जी खामोश हो गए और छोल साहब बड़े ध्यान से उन्हें देखने लगे.

"बिंदु का आखिरी बार चंदरभान और मनबीर के साथ दिखना, उसके बाद वह देश से बहार हे चली गयी थी. क्यों जी यही बोलने वाले थे न आप.?", कौशल्या जी ने सही निशाने पर तीर लगाया था और अब छोल साहब भी मान गए थे की उनके बड़े भाई सचमुच अपनी धर्मपत्नी के साथ एक एक पल साँझा करते है.

"और फिर चौथी बात वही, ईश्वर सिंह की मौत. मतलब ये इतना जटिल है की घूम फिर के बात आ रही है लता पर और उस से हम सवाल नहीं कर सकते क्योंकि ये वचन दिया हुआ है. और वो दोनों नहीं रहे तोह पीछे सुराग तलाशना इतना आसान नहीं होने वाला. अब उमेद को ये खबर है तोह उस से सबकुछ साँझा करना जरुरी हो गया है नहीं तोह मुझे आशंका है के कुछ बड़ा हो जायेगा."

"शंकर से इस बारे में बात क्यों नहीं करते आप भाई साहब?"

"देखो भाई, जटिल का मतलब शंकर भी है. हम लता के लिए उसको कुछ नहीं कहेंगे हमारे घर से बहार और अगर कुछ बताना है तोह वह दिखाना हे पड़ेगा जिसके सबूत चावल से चीनी अलग करने जैसा है. कल तक मुझे इन्तजार कर लेना चाहिए शायद, दिल कह रहा है के एक दिन उमेद के साथ बात को ताल दिया जाये और आज बस उसकी सुनते है.", रामेश्वर जी ने एकाएक अपना हे कथन बदला तोह कौशल्या जी रहसयमयी तरीके से मुस्कुराई.

"तोह फिर से प्यादे को वजीर बनाने वाले हो आप?"

"वो राजा है कौशल्या, हम तोह बस अड़ने से बूढ़े मंत्री है जो इस किशोर राजा को सब समझा रहे है. लेकिन इस से वचन भी न टूटेगा और वो बात भी पता चल सकती है जिसको संभाले मुझे 25 साल होने वाले है.", रामेश्वर जी का लहजा बेशक नरम था लेकिन चेहरे पर क्रोध के बदल आ गए थे कुछ पल के लिए. फिर शांत हो कर उन्होंने उस 1 वाले क्रमांक से पहले एक गोला खींच कर उसपर प्रश्नचिन्ह लगा दिया जिसको देख कर बाकी दोनों के चेहरे पर भी हैरत नजर आने लगी. मतलब कुछ कौशल्या जी को भी नहीं पता था और अब सवाल मुनासिब भी नहीं था.

"फिर तोह आपने बहुत धीरज रखा है भाई साहब क्योंकि इतनी प्रतीक्षा की वजह छोटी नहीं होगी और आपको ख़ास पल का इन्तजार रहा होगा.", छोल साहब ने भी सवाल नहीं किया जो की पंडित जो को भी ाचा लगा और कौशल्या जी को भी.

"हाँ भाई, इसको इतंजार कहो या अतिरिक्त इन्द्रिय सन्देश जो मुझे हमेशा बताता था के एक सही समय जरूर आएगा. कभी कभी परिश्थितियां चुप करवा देती और कभी फैंसले. समय बदलता है लेकिन एक बार जरूर वो ठीक उसी जगह आता है जब सबकुछ एक कतार (लाइन) में सामने हो. पृथ्वी अपनी कक्षा में 24 घंटे लेती है सूरज की ird-gird 365 दिन. यही तोह नियति का सिद्धांत है लेकिन वापसी जरूर होती है.", पंडित जी ने एक नजर बहार देखा तोह तारा वापिस आ गयी थी और अर्जुन 3-4 झोले सब्जिया उठाये दयनीय स्थिति में उसके पीछे चल रहा था साथ हे हंसती खेलती प्रीती किसी बात पर अपनी बुआ के साथ लगी हुई थी.

"चलो जी, नाश्ता देखती हु मैं चल कर और आप लोग भी बैठक में आ जाना फुर्सत मिले तोह. आपका राजा अभी नौकर बना दिख रहा है और ये लड़कियां जरा तरस नहीं खाती मेरे बचे पर.", कौशल्या जी ट्रे उठाने लगी तोह अपने पति की बात सुन्न कर खुद भी हंसने लगी.

"उसको अभी से पता चलना चाहिए के शादी के बाद प्रीती यही सब करवाने वाली है इस बैलबुद्धि से.", छोल साहब भी इस बात पर ठहाका लगते हंसने लगे थे. ये वातावरण हे तोह ताक़त था इस संसार की जहा हर पल को ख़ुशी से स्वीकारा जाता था बिना शिकायत के. अर्जुन सब सामान रसोईघर में रखने के बाद खुद को दुरुस्त करने ऊपर चला गया था और अब Manju-Ritu के साथ मेनका भी यहाँ आ चुकी थी.

"हीरो, अब शायद मैं हफ्ते से पहले इधर न औ. टाइम मिले तोह मिलने आ जाना.", अर्जुन फ़िलहाल इस जीन्स में था जब विन्नी दीदी पीछे से उसके निर्वस्त्र चौड़े सीने पर हाथ फिरती चिपक गयी थी. अब उतनी झिझक न थी और वो इस एकांत में उसके कंधे से गाल लगाए कुछ और भी सोच रही थी.

"इतना परेशां मत होइए आप. मैं अभी भी आपके सामने हु और जब आएँगी तब भी कुछ ज्यादा नहीं बदलने वाला.", अर्जुन ने उनका दिल की तरफ रखा हाथ अपने हाथ से दबाते हुए आईने में देख कर कहा.

"तुम आसान लग रहा है लेकिन मुझे तोह एक रात ऐसी लगी जैसे बरसो से हम साथ थे. ये हफ्ता वनवास न बन्न जाये."

"आप फ़ोन कर देना बस और चाचा आते रहते है. उम्माह.", पलट कर अर्जुन ने जैसे विन्नी दीदी की मैं की मुराद पूरी कर दी थी. दोनों के होंठ एक पल ाचे से जुड़े और फिर विन्नी दीदी रुक न सकीय वह. शर्माती हुई वो विद्युतगति से निचे भाग गयी. अर्जुन एक लाल टीशर्ट पहन कर अब खुद को छुपा चूका था. घडी, जूते पहन ने के बाद कमरा ठीक करके वो भी वही आ गया जहा सब बैठे थे या काम में लगे थे. ये पतली सी gori-aadhunik सी लड़की उसको बड़े ध्यान से देख रही थी.

"आइशा ये है अर्जुन, मेरा छोटा भाई. और अर्जुन ये है शालिनी बुआ की बेटी आइशा. हम कल हे मिले थे.", ऋतू दीदी ने परिचय करवाया तोह अर्जुन ने भी औपचारिक शिष्टाचार में गरदारन हिला कर hello कर दिया. पास बैठी मेनका आज ाचे मूड में थी और अर्जुन भी अपने दायरे में रह कर उनके साथ हंसी मजाक में लग गया. रह रह कर वो कभी काम में लगी मंजू को देखता तोह कभी अपनी माँ रेखा जी को. ाचा taal-mel बना चुकी थी दोनों.

"मेनका दीदी, ये अर्जुन बेमतलब इतना प्यार नहीं दिखता. पक्का फरमाइश आने वाली है कोई.", प्रीती ने ये चुगली की तोह वो भी आइशा के निशाने पर आ गयी जो अभी भी नजर बचा कर बस इधर हे देख रही थी.

"फरमाइश तोह तू पूरी किया कर इसकी नहीं तोह कही और हे न भाग जाये.", मेनका ने अर्जुन की जगह प्रीती को हे लपेट लिया था. और अलका, ऋतू के साथ साथ मंजू और प्रियंका दीदी भी ये सुन्न कर हंसने लगे.

"अब कोई शिकायत भी करे तोह आप उल्टा उसकी हे टांग खींचोगी? कल तक तोह मैं हे आपकी लाड़ली थी.", प्रीती भी अब पहले वाली न रही थी जो खुलकर टक्कर ले रही थी.

"तेरे और अर्जुन में कुछ अलग है क्या मेरी गुड़िया? वैसे मुझे ये जरा भी पसंद नहीं बस शकल देख कर तरस आ जाता है. इसलिए दिल रखने के लिए इसकी तरफदारी कर देती हु.", मेनका ने भी पक्ष बदल लिया था लेकिन कौशल्या जी की आवाज सुनते हे वो तुरंत अंदर वाले कमरे में चली गयी.

"Hello, वो लड़की तुम्हे हे देखे जा रही है.", प्रीती ने ये बात कान में कही तोह अर्जुन उसकी फ़िक्र देख ख़ामोशी से उधर हे देखने लगा जहा आइशा ने नजरे हटा ली थी. लेकिन फिर एक बार देख कर फिर ऋतू के साथ बात में लग गयी.

"टेंशन मत लो, दीदी संभल लेगी. वैसे तुम न तैयारी कर लो, घर चलना है 3 दिन बाद.", अर्जुन ने जैसे ये कहा प्रीती भी वह से उठ कर रसोई की तरफ चल दी. सभी मेहमानो की आवभगत में लगे थे और अर्जुन नाश्ता करता बस अपने हे विचारो में खोया था.

"शालिनी बिटिया, ये है अर्जुन. इन्हे जानते हो अर्जुन?", कौशल्या जी इस खूबसूरत महिला को ले कर अर्जुन के पास आयी तोह दूसरी तरफ आइशा भी आ कड़ी हुई. शालिनी जी तोह बड़े ध्यान से उसको ऐसे देख रही थी जैसे मैं में बहोत कुछ उथल पुथल मच गयी हो. और अर्जुन ने भी एक नजर में हे इस चमकदार शख्सियत को जांच लिया था. तहजीब से ली हुई गहरे हरे रंग की रेशमी महंगी साड़ी, नाम मात्रा मेकअप, कलाई में सिर्फ एक कड़ा और दूसरी में चमड़े के पत्ते वाली सुनहरी घडी. लम्बाई लगभग ऋतू दीदी जितनी थी.

"नमस्ते बुआ जी. आपको सामने देख कर बड़ा ाचा लगा.", अर्जुन ने पाँव छूने से पहले अपने हाथ ाचे से साफ़ किये थे और शालिनी थोड़ा हैरान थी उसको आशीर्वाद देते हुए.

"हम पहले कब मिले है अर्जुन?", टेबल के एकतरफ खड़े ये लोग एक दूसरे को देख रहे थे और जवाब अर्जुन ने हे दिया.

"आप मुझसे पहली बार हे मिल रही है लेकिन मैंने आपको पहले भी देखा है. मेरा बोर्डिंग आपके ससुराल के करीब हे था और 2 साल पहले उमेद चाचा आपको कार में बैठा कर मुझे स्कूल गेट पर सामान देके गए थे. आपको अपने साथ ले जाते समय.", शालिनी जी ने अपने दिमाग पर थोड़ा जोर डाला तोह कुछ याद आ गया.

"तोह भैया के वो दोस्त तुम हो? ाची यादाश्त है तुम्हारी, मुझे भी ाचा लगा तुमसे मिल कर. तोह बोर्डिंग पसंद नहीं आया फिर?", शालिनी के शांत चेहरे पर पहली बार मुस्कान आयी थी.

"बेहतर रहेगा अगर ये कहे की दादी जी ने सजा माफ़ कर दी मेरी.", अर्जुन ने भी माहौल को खुशनुमा करते हुए अपनी दादी को भी मुस्कुराने पर मजबूर कर दिया.

"ये ऐसा हे है शालिनी, जल्दी हर किसी से जुड़ जाता है इसलिए घर में रखती हु मेरे बचे को. अर्जुन तुम्हारी बुआ शादी तक अपने घर (हवेली) हे है, जिम्मेवारी लेना थोड़ी बहोत क्योंकि उमेद और शंकर भी काम के साथ विवाह में उलझे रहेंगे. ये मेरी मधु है और मधु पूर्णिमा की शालिनी.", कौशल्या जी ने स्नेह वाश शालिनी जी के सर पर हाथ फिरते हुए कहा तोह उन्होंने भी उतने हे प्रेम से अपनी चची के गले में एक ब्याह दाल दी.

"वैसे तुम्हे परेशानी नहीं होने दूंगी. आना जाना होगा तोह ड्राइवर का इस्तेमाल कर लेंगे. बाकी यहाँ शहर में तुम मदद कर सकते हो.", अर्जुन कुछ जवाब देता उस से पहले कौशल्या जी ने ना में गर्दन हिला दी.

"घरवालों के साथ मतलब अपनों के साथ. हवेली से यहाँ तक कोई कोताही नहीं शालिनी."

"चची अब समय बदल चूका है. आप बिलावजह परेशां होती हो, आधा घंटा लगता है और सड़क साफ़ है."

"समय जरूर बदला है लेकिन इंसान नहीं बेटी. माँ हो अब तोह माँ का डर समझो और तू कान खोल कर सुन्न ले जो मैंने कहा है. 10 तारीख के बाद हर वक़्त नजरो के सामने जिनते काम न बताऊ.", शालिनी जी को अपने साथ ले जाते हुए उन्होंने अर्जुन से कहा तोह वह बस हंस दिया.

"नानी, बॉडीबिल्डर है क्या ये आपका मुन्ना?", आइशा ने जाते जाते इतना कहा तोह शालिनी ने अपनी लाड़ली के सर पर चपत जमा दी. अर्जुन फ़िलहाल अनजान था के बैठक में उसके दादा जी के साथ संजीव भैया और उमेद चाचा किसी गहरी गुफ्तगू में लगे है. माँ ने उसको एक बार फिर घर से बहार भेज दिया था सामान की पर्ची दे कर और इस बार वो अकेला हे गया था 2 घंटे में वापिस आने का बोल कर. किसी और को भी समय दिया हुआ था आज का जहा सारा दिन मुनासिब न था लेकिन हाजरी लगाई जा सकती थी.

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रविवार को भी शंकर जी ड्यूटी पर हे थे लेकिन आज यहाँ इनके केबिन में 3 और लोग इनके साथ बैठे थे. सरकारी हॉस्पिटल में इस दिन सिर्फ इमरजेंसी केस हे लिए जाते थे तोह इतना काम न था. यही सोच कर ये मीटिंग राखी गयी थी. दलीप सिंह, मेहुल गुलाटी, भूपिंदर और शंकर के बीच राखी टेबल पर ये कई कागज़ बिखरे थे.

"देख शंकर, काम सचमुच टेढ़ा है. भुप्पी कुंडली तोह ले आया उस दसप की लेकिन नरोत्तम दस तक ये भी नहीं पहुंच पाया.", मेहुल ने स्टेपलर लगे वो 4 पैन पढ़ने के बाद अपनी राये राखी जिस पर बात आगे दलीप ने बधाई.

"गुलाटी भाई, अब जरा मेरा हिसाब भी देख लो थोड़ा. ये है दसप सम्पत का बीटा मोनू, ये है दीपू जिसके बाप के 50 शराब के ठेके और गोदाम है, ये लड़का है सतबीर उर्फ़ सत्तू जो फाजिल्का से नशा इस बेल्ट पर संभालता है. मतलब प्रतीक उर्फ़ बॉबी को मिलकर हुए 4 लोग और चारो रईस नशेड़ी. 2 लड़कियां और गायब हुई थी इन दोनों वारदात के बीच और उनका कोई सुराग नहीं. अब पन्गा जो है वह सिर्फ नरोत्तम दस से नहीं बल्कि 4 बड़े मगरमच्छो से है. दीपू के बाप पर जितने आपराधिक मामले थे वह सब साफ़ हो चुके है तोह इसका मतलब सर्कार और कानून में बहोत मोटी दखल है. हम 4 लोगो से ये नहीं संभलेगा. या तोह चारा फेंका जाये और सबूत सीधा कपूर और सीड तक पहुचाये जाये नहीं तोह फिर शंकर का प्रिय काम. गांड में ऑपरेशन ब्लेड से पेट तक चीरा इन चारो के."

"दलीप भाई, अब पता चला के क्यों शंकर आपको इतना मानता है. साला 24 घंटे में इतनी रिपोर्ट निकाल दी. वैसे बात से मैं भी सहमत हु के बिना सर्कार को शामिल किये सीधा थोक दिया जाए तोह बेहतर रहेगा.", भुप्पी अब काफी बेहतर हालत में था और उत्तेजित भी. इतने टाइम बाद जो काम करने को मिला था.

"ये चारो की प्रॉपर्टी कितनी होगी दलीप?", शंकर का तोह सवाल हे अलग था. और बाकी तीनो बड़े ध्यान से उसको देखने लगे. लेकिन दलीप ने जवाब दिया.

"दसप सम्पत का तोह कुछ ख़ास नहीं 5-6 करोड़ तक लेकिन नरोत्तम दस है 80-85 करोड़ से ऊपर और दीपू के बाप की होगी कोई 200 करोड़. सत्तू का पैसा एक सिस्टम से घूमता है तोह कहना मुश्किल होगा लेकिन हिसाब हफ्ते की हफ्ते होता है तोह सही समय पर 2-3 करोड़ कॅश उसके पास भी मिलेगा हे. करना क्या चाहता है भाई तू.?"

"वो मेरे भाई को इलेक्शन फण्ड के लिए कितना पैसा बहोत रहेगा यही सोच रहा हु. इस सबका 10% भी बहोत है वैसे. चल अब जरा रेकी करवा भाई इस नरोत्तम दस की. बाप गया तोह बेटे बेसहारा और कानून से बहार निकलेगा सम्पत लेकिन उसका बीटा होगा हमारे पास. फिर न इस तस्कर को उठाना, पैसे नहीं ड्रग्स चाहिए इस से. लो फिर लपेटे में इस शराब किंग को. इसकी माँ का गोदाम साले ऐसे पैसे का तोह होना हे पाप है."

"भाई शंकर, तू जानता है के तू क्या करने के लिए कह रहा है?", मेहुल कुछ मामलो में ज्यादा विचार करता था, सांगवान से उलट जो अभी यहाँ था नहीं.

"हाँ और नरोत्तम का वो मुनासिब एक मिनट मिला तोह सबकुछ 2 घंटे में करके दिखता हु जैसे मैं और दलीप पहले करते आये है. लेकिन मामला बड़ा है तोह टीम भी बड़ी होगी. राजेश दलीप से थोड़ी देर में हे मिल लेगा और भुप्पी करेगा इस सत्तू से सेटिंग, बैकअप के साथ. तेरे फार्महाउस पर इस सम्पत के पिल्लै को रखना है गुलाटी और फिर दीपू के पप्पा से बात करेगा उमेद. कल रात तक सब खाखा तैयार कर लेना है.", शंकर जैसे फैंसला कर चूका था किसी बड़ी तबाही की.

"सांगवान भी आज रात आ जायेगा शंकर.", गुलाटी ने बिना सोचे हे कह दिया.

"उसको शामिल नहीं करना. बेटी और बीवी के साथ आ रहा है तोह कुछ दिन वैसे हे जीने दे भाई उसको."

"शंकर, सम्पत का लोंदा एक इंसान चुटकी बजाते हे गायब कर सकता है.", दलीप ने कुछ विचार करने के बाद ये कहा था.

"संजीव को भी इस सब में नहीं मिलाना दलीप."

"मैं बात अर्जुन की कर रहा हु शंकर.", एक पल के लिए तोह बाकी तीनो को सांप सूंघ गया था ये नाम सुन्न कर.

"ऐसे क्या घूर रहे हो तुम लोग. वो ये काम चुटकी बजाते हे कर देगा और जानता मैं भी हु के वो इस कमरे में बैठे हम चारो से शातिर और ताक़तवर है. मोनू यूनिवर्सिटी में हे रहता है 5 दिन, चाहे कक्षा चालू हो या बंद. ये घटनाये संयोग से shanivar-itwaar की है बस आखिरी वाली को छोड़ कर क्योंकि उस दिन ये काम बाकी तीनो ने किया होगा. क्या कहते हो भाई?"

"एक बार तोह सब वैसे हे करो जैसा तये हुआ है. मुझे नहीं लगता के अर्जुन को यहाँ शामिल करना ठीक होगा लेकिन इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखता हु के यूनिवर्सिटी के अंदर वो जरूर कुछ दम रखता है. कल रात को देखते है अगर कुछ fer-badal की गुंजाइश हुई तोह. लेकिन अभी दिमाग में वही रखना जो मैंने कहा है."

"आदमी और कोई शामिल नहीं होगा सिवाए उमेद के. हथियार और गाडी मेरा जिम्मा.", भुप्पी ने भी मोहर लगा दी थी पहले वाले प्लान पर.

"रिकार्ड्स बनवाना और लड़के को क़ैद करना मेरा काम है.", गुलाटी ने भी हामी भर दी थी.

"बस फिर मंगलवार को मंगल काम करते है. जरुरत पड़ने पर शायद हमको इस बार बड़ी होली खेलनी पड़ सकती है लेकिन इस से फटनी सबकी चाहिए जो भी ऐसा काम करते है और जो लोग उनको शह देते है. पीछे सांगवान चाचा जिंदाबाद. वो भी कह रहे थे की रिवॉल्वर पर पकड़ बन्न रही है वापिस.", शंकर ने चुहल करते हुए सबको साफ़ कर दिया आगे क्या करना है. इनकी ये अलग हे शतरंज चल रही थी जहा hathi-ghode-oont सामने वाले को बिना पते चला पूरी सल्तनत उखाड़ने वाले थे. ऐसी हे बाजी तोह खेलनी आती थी दिल से सोचने वाले शंकर को. दिमाग से तोह एक अकेला खेल कर 2 सल्तनत आपस में लाडवा देता है.
 
ये आज सबको हुआ क्या है जो एक इंसान को भूल चुके हो.?

Shankar-Narinder को कॉलेज के वक़्त से कौन जानता है?

कौन है जो अब परिवार का सदस्य है लेकिन ज्यादा बातें नहीं हुई उनके बारे में?

किसके प्रति रेखा सर्वस्व त्याग सकती है?

5 साल तोह वो व्यक्ति उनके साथ हे कॉलेज रहा है. घर का सबसे खामोश इंसान लेकिन अर्जुन के प्रति सम्पूर्ण लगाव वाला.
 
ये aka3829 भाई Professsor साहब Billi420 Tony stark Iron Man जैसे धुरंधर आज दिख नहीं रहे. कोई चिठ्ठी वीथी लिखो जरा इन्हे भाई
 
भाई बाप बेटे एक साथ हे आ जाये तोह दुश्मन के खिलाफ?
 
अपडेट 125

गहरी चाल - 2


"तोह मेरे लाडले को हे अब सब जिम्मेवारिया उठानी पड़ रही है, वो भी अकेले अकेले?", अर्जुन सामान ले कर घर आया तोह आते आते 10 बज हे गए थे. उमेद जी का परिवार वापिस जाने लगा था और अर्जुन उन सबसे आँगन में हे मिला. हमेशा की तरह उमेद जी ने उसको सीने से लगा कर पीठ पर थपकी दी थी और जिस तरह से पूर्णिमा जी ने उसका माथा चूम कर कुछ पल अपने सीने से लगाया था ये दृश्य शालिनी जी और आइशा को अजीब लगा था. वही राजेश्वर जी ने भी गाल पर हाथ फेर कर आशीर्वाद दिया और विन्नी तोह अब वैसे भी उसकी ख़ास सबसे बड़ी बहिन थी.

"ऐसा चाचा जी, मुझे तोह ये लगता है जान बूझ कर मुझे ऐसे कामो में व्यस्त रखा जाता है. नहीं तोह आप घर में आते हे मुझसे जरूर मिलते, मतलब आप भी सबके साथ हो.", अर्जुन जब ये कह रहा था विन्नी निसंकोच अर्जुन का हाथ पकडे कड़ी थी. लेकिन अर्जुन के जवाब से उमेद सिंह जी को ठसका लगते देख उसने हे बात काटी.

"Hello, अब तुम ये बताओ के उधर वाले घर कब आ रहे हो? काम नहीं करवाएंगे यकीन करो.", विन्नी दीदी की ये बात सुन्न कर अर्जुन अपनी दादी की तरफ देखने लगा.

"मुझसे क्या पूछ रहा है तू? तेरी बड़ी बहिन और तेरे बीच न पड़ती मैं. कहे तोह अभी झोला दू कपड़ो का?", कौशल्या जी की बात पर अर्जुन ने हे दीदी को कहा.

"शादी के बाद पक्का आऊंगा दीदी. आपके सामने हे है सबकुछ लेकिन आप ऐसा करो के इन सबको जाने दो, आप यही रुक जाओ.", अर्जुन ने जैसे हे ये कहा उमेद सिंह ने खुद हे हाँ कह दी.

"ठीक है, विनीता बेटी तुम्हे ड्रामा करने की जरुरत नहीं है अगर इधर हे रहना है.", विन्नी दीदी तोह हैरत से अपने पापा को देखने लगी जिन्होंने अर्जुन के इतना कहते हे स्वीकृति दे दी थी.

"नहीं पापा, आने के बाद आपसे तोह मिली भी नहीं हु और bua-Aaisha के साथ भी रहना है. ऐसा करते है के नेक्स्ट वीक जब आप दिल्ली जाओगे तब मुझे यही छोड़ देना और आइशा को भी.", विन्नी के सर पर हाथ रखते हुए शालिनी जी ने झूठी नाराजगी आँखें दिखाई.

"वह पीछे लोग हे कितने बचते है फिर? और तुमसे पहले तोह ये घर मेरा है, देखु कैसे आती हो यहाँ मुझे छोड़ कर.", रामेश्वर जी भी इस नोकझोक का लुत्फ़ ले रहे थे लेकिन बात बच्चों के बीच हे रख कर.

"चलो भाई सब आ जाना और जिसका मैं हो वो उधर आ सकता मैं न्योता नहीं देनी वाली किसी को. मुन्ना कह रहा है के वो शादी के बाद वह आएगा तोह मतलब है रुकने के लिए आएगा. समझो थोड़ा और बीटा तेरा हे घर है.", पूर्णिमा जी ने सबको शांत करने के बाद अब रामेश्वर जी से भी विदा ली और कौशल्या जी से भी. आइशा यहाँ भी देख रही थी की अर्जुन के साथ विन्नी दीदी कितना करीब है और उसके मां, नानी भी. साथ हे खुश भी थी क्योंकि यहाँ वाली नानी ने ढेरो उपहार जो दिए थे उसको.

"जल्द हे मिलते है चाचा जी.", शालिनी जी ने भी जाने से पहले रामेश्वर जी के गले लगते हुए कहा तोह अर्जुन देख रहा था के उसके दादा जी सचमुच उन्हें मधु बुआ जैसे हे प्यार करते है. अपनी लाड़ली के लिए दरवाजा तक उसके दादा जी ने खोला था और सर पे हाथ फेर कर खुद भी हवेली आने का आश्वासन दिया. उमेद जी को अर्जुन ने चुपके से फ़ोन पर बात करने का इशारा किया और वह भी थोड़ी गंभीरता से हामी भरने के बाद कार में बैठ गए.

"संजीव भैया, आप चलो मेरे साथ अभी के अभी.", अर्जुन ने भीतर आँगन में आते हे चाय का कप उठाते अपने बड़े भाई को हाथ पकड़ कर उठाते हुए कहा. न कोई गले मिलना न haal-chal बस सीधा उन्हें लेके बहार चलने लगा.

"उसको चाय तोह पीने दे लल्ला और कहा जा रहे हो तुम दोनों? हे भगवन रेखा जरा देख इन दोनों को. वो लम्पट भी इतने दिन बाद आया है लेकिन मुन्ना के नाड़े से बंधा बहार चला गया.", ललिता जी कहती रही और दोनों लड़के आँगन में कड़ी इलो ले कर बहार निकल गए. रेखा जी तोह जवाब भी क्या देती वो तोह खुद अनजान थी अर्जुन के मैं से. और इधर ये लड़किया भी तैयार हो कर हिमानी के घर जाने का बोलती हुई धड़ल्ले से सफारी गाडी ले कर निकल गयी. कौशल्या जी उन्हें टोकती उस से पहले हे तारा ने बता दिया के वो लोग दोपहर के खाने के बाद आ जाएँगी आचार्य जी के घर से.

"पहले न इस घर में पत्ता मेरी मर्जी बिना न हिलता था लेकिन अब 4 छक्के (टायर) उठा कर ये छोरी (तारा) घर हिला के निकल जाती है.", कौशल्या जी बड़बड़ा रही थी और कमरे में बैठे रामेश्वर जी हंस रहे थे.

"भगवन, उसकी माँ न तुमसे काबू हुई तोह वो कहा सुनेगी तुम्हारी. समझदार है वो और यही पड़ोस में गयी है. चलो तुम भी तैयार हो जाओ फिर सतीश के साथ मार्किट चलना है, उपहार लेने बचो की शादी के. कुछ कार्ड भी देते आएंगे इस बहाने. बाकी जो दूर दराज भेजने है उनकी लिस्ट मैंने बना दी है, पते (एड्रेस) के साथ. माधुरी और कोमल बैठ कर सब लिख देंगी लिफाफों पर और संजीव या अर्जुन कर देंगे डाक.", रामेश्वर जी ने सब विस्तार से बताया तोह कौशल्या जी अलमारी से अपनी ख़ास साड़ी निकलने लगी. मेनका और मंजू भी Madhuri-Komal के साथ उनके कमरे में थी और वही आरती अपनी बड़ी माँ के साथ उनके कमरे में. रुपाली और प्रियंका दीदी अपने कर्रम बोर्ड पर लगी थी इन सबसे अलग.

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"तुझे इतना कैसे पता है अर्जुन? खुल कर बता और ये बात अगर इतनी बड़ी है तोह मुझे क्यों पता नहीं लगी?", संजीव भैया लोहे की ग्रिल पर बैठे सिग्रत्ते का काश लगा रहे थे और विचार कर रहे थे उन बातों पर जो अभी अर्जुन ने उनसे साँझा की थी. अर्जुन भी थोड़ा गंभीर था और एक तिनके के छोटे छोटे टुकड़े करता ग्रिल पर रखे nimbu-soda के गिलास को देखे जा रहा था.

"बात बड़ी है क्यों की आप यही समझ लो के बिट्टू मां ने भी समय दीदी को मदद करने का आश्वासन देने के बावजूद 10 दिन में जवाब नहीं दिया. ये लड़की nimn-madhyamvargiya परिवार से थी. यूनिवर्सिटी में आरक्षण से दाखिला मिला था और कुछ किताबे लाइब्रेरी में वापिस करने अपने गाँव से इधर आयी थी. अब वो गायब है भैया और #### शहर की पुलिस सहायता नहीं कर रही. पापा भी तोह वही थे न यहाँ आने से पहले?", अर्जुन के सवाल पर संजीव भैया ने हामी भरी और सिग्रत्ते की राख झाड़ने लगे.

"वैसे तू इतना क्यों परेशां हो रहा है छोटे? हादसे होते रहते है और समय की सहेली है और जब बिट्टू मां हे कुछ नहीं कर रहे तोह हम बेवजह क्यों टेंशन ले? कोई और ऊंच नीच हो गयी तोह खामख्वाह अपने पर इल्जाम आ जायेगा. वैसे भी घर में इतने सालो बाद कुछ ाचा माहौल बना है.", संजीव भैया ने जवाब तो दे दिया कहने को लेकिन अर्जुन उन्ही पर मुस्कुरा दिया.

"मतलब लकी भैया गायब हो जाये तोह आप उन्हें नहीं ढूंढेंगे? या फिर मुझे हे कुछ हो जाये या हमारी कोई बहिन गायब हो जाये तब भी?"

"भूल के भी ऐसा मत सोचना भाई.. मेरा ये मतलब नहीं था छोटे देख मेरी अपनी हद्द है और तू समझ के मैं फ़िलहाल क़ैद हे हु. लेकिन तेरी भी बात सही है के ऐसा कुछ हमारे साथ हो जाये तोह हम ऐसे तोह नहीं बैठे रह सकते. #### शहर है मेरी दखल से बहार लेकिन कुछ जरुरी बातें पता चले तोह हम ख़ामोशी से काम कर सकते है. कौन लड़की है, आखिरी बार कहा दिखी, कोई ऐसा व्यक्ति जिस पर संदेह हो या यूनिवर्सिटी में पढ़ती थी तोह किसी के साथ mann-mutaav हुआ हो. ये सब जरुरी है पता लग्न."

"ये लीजिये भैया. इस में वही सब सवाल और जवाब है जो मैंने भी समय दीदी से किये थे और उनके पास कोई बड़ी फोटो नहीं थी बस ये पिछले जन्मदिन पर उनकी फोटो इस लड़की के साथ थी एल्बम में वही उन्होंने मुझे दी है.", संजीव भाइये हँसते हुए सर पर हाथ मारने लगे.

"मतलब तू इतनी देर से पहले मुझे हे परख रहा था के मैं तेरा साथ दूंगा या नहीं? वाह मेरे चीते, पोलिसवाले का हे इंटेरोगेशन कर रहा था. हम्म्म.. विदुषी जांगिड़, गांव *****, tehsil/shehar ####. क्सक्सक्सक्स फाइनल ईयर, यूनिवर्सिटी. आखिरी बार 24 अप्रैल को शाम 7 बजे बस स्टैंड पर समय द्वारा हे छोड़ा गया था. छोटे इसका मतलब वो आखिरी बस से गयी थी या फिर बस से गयी हे नहीं?", संजीव भैया को अब एक कौतहूल ने जकड लिया था और सिग्रत्ते फेंक कर वो अर्जुन को लिए फ़ोन बूथ में घुस गए. नंबर मिलाया तोह कुछ समय बाद शंकर जी ने हे उठाया.

"चाचा जी, #### शहर में आपकी ाची पकड़ है न?", संजीव का सवाल सुनते हे उस तरफ शंकर जी का भी रंग एक पल के लिए उड़द गया के अब ये क्या करने वाला है.

"ऐसा क्या हो गया जो मेरी पकड़ की जरुरत पड़ गयी? घर आ गए हो तोह अब छुट्टियां मनाओ यार वह तुम्हारा kaleja-dil तुम्हारे साथ है."

"सुनो, मामला थोड़ा सीरियस है और जहा तक मुझे लगता है आप और दलीप चाचा हे जड़ तक पहुंच सकते हो. एक लड़की गायब हुई है जो ***** गांव/#### शहर की थी. यहाँ अपने शहर की यूनिवर्सिटी में पढ़ती रही है. विदुषी जांगिड़ नाम है उसका और 24 अप्रैल, शुक्रवार शाम 7 बजे के बाद उसका कोई पता नहीं लगा.", संजीव ने तोह उनकी बात को अनसुना करते हुए पूरी राम कथा हे कह डाली.

"ये लड़की अभी तक लापता हे है संजीव और आज हे सवेरे मुझे उसकी तस्वीर डिटेल के साथ दलीप ने दी है. तुम्हारी निजी दिलचस्पी की वजह क्या है जान सकता हु? वैसे इतना हे कहूंगा के तुम दूर हे रहना इस सबसे और मैं खुद हे इसकी तेह तक जाने की कोशिश कर रहा हु. कुल 4 लड़किया है जिनमे से 2 की डेड बॉडी मिली लेकिन फाइल बंद और विदुषी के साथ साथ एक और लड़की है जो लापता है.", शंकर जी के मस्तिष्क में भूचाल आ चूका था क्योंकि ये मामला तोह संजीव तक जाना हे नहीं था किसी हाल में.

"मैं तोह दूर हे इस सब से चाचा जी लेकिन आप न आजकल मुझे ज्यादा हे प्यार कर रहे हो लगता है. ये लड़की छोटी बहिन की सहेली है इतना हे कहूंगा. अब आप बताओ के आपके निशाने पर कितने और कौन लोग है. मैं बीच में नहीं आऊंगा विश्वास दिलाता हु.", अब संजीव ने आश्वासन दिया तोह शंकर जी ने भी काम शब्दों में हे कहानी बता दी. रंग उड़ने की बारी अब संजीव की थी जो बस सुन्न कर खामोश हे हो गया था.

"Hello.. Hello.. संजीव तभी कह रहा हु के तुम दूर रहो इस सब से.", संजीव को सिर्फ हूँ कहते सुन्न कर शंकर जी ने स्नेह से समझाया के वो संभल लेंगे.

"जी चाचा जी, वैसे क्या ये सब शादी के बाद नहीं किया जा सकता? बात उतनी भी छोटी नहीं है चाचा जी."

"तेरा चाचा भी इतना कमजोर नहीं है बीटा. ऐसे मौके जीवन में बहोत काम मिलते है जहा इतने राक्षश एक साथ काटने को मिले. तुम्हारी शादी तक तोह 2-3 मासूम और भी अपने जीवन से हाथ धो सकती है. मैं अकेला नहीं हु और तुम अपना ध्यान रखो बस. कल सवेरे घर आऊंगा और फिर मेरे साथ तुम भी चलना अनुपमा का कन्यादान करना है कल दिन में और रात में इस काम पर एक मीटिंग है बाकी सबसे.", शंकर जी ने लाइन काट दी थी संजीव के 'जी' कहते हे.

"तेरे gaand-pange कभी साधारण भी होते है क्या छोटे? तू मेरे पास जो धागा लेके आया है न वो डोर बहोत बड़ी बड़ी पतंगों तक बंधी है. मामला सिर्फ लड़की के गायब होने का नहीं है और जहा तक मुझे लग रहा है ये ज़िंदा नहीं मिलने वाली.", संजीव भैया ने बहार आते हे एक और सिग्रत्ते सुलगा ली. वो ये गन्दी आदत काम कर चुके थे लेकिन आज पिछले 15 मिनट में हे ये दूसरी जलनि पड़ी उन्हें.

"आप भैया मुझे दूसरी तरफ का कोई भी एक सिरा बता दो इस डोर का, चरखड़ी लपेट कर आपके सामने रख दूंगा 24 घंटे में. मैंने समय दीदी से वादा किया है के मैं उनका साथ दूंगा.", अर्जुन का आत्मविश्वास देख संजीव भैया के गंभीर चेहरे पर भी हंसी आ गयी.

"ये पहलवानी वाला खेल या आमने सामने गोली चलने वाली बात नहीं है भाई. यहाँ पैसा, दिमाग और राजनीतिक dum-kham का bol-bala है जिसमे हम सब कुछ मायने नहीं रखते जब तक बराबर ताक़त और पुख्ता सबूत पास न हो. वैसे शंकर चाचा खुद तहकीकात में लगे क्योंकि उनके डिपार्टमेंट के भी लोग अपराधियों के साथ है. चल घर चलते है और थोड़ा सोने के बाद वीडियो गेम के मैच लगते है.", ड्राइवर सीट की तरफ जाने से पहले आधी सिग्रत्ते जमीन पर गिराने के बाद उन्होंने अपने चेहरे को शीशे में देखा तोह पीछे अर्जुन आ खड़ा हुआ.

"भैया रिक्वेस्ट है आपसे और मैं सच कहता हु के मैं किसी दलदल में नहीं घुसूंगा. एक नाम बस और फिर मैं भी तोह घर हे चल रहा हु. समय को बताने के लिए एक सच्चा नाम."

"मुनीश उर्फ़ मोनू. चल अब बैठ और ठंडा कर अपना दिमाग. चाय भी नहीं पीने दी इतने दिन बाद घर आया हु तब भी.", कार स्टार्ट करते हे वो तोह इसकी तारीफ कर रहे थे और अर्जुन कार उन्हें हे रखने का बोल कर बहार सड़क पर देखने लगा.

"ये कार मैं रख लू? पागल है क्या?"

"आप कौन हो?"

"मतलब छोटे?"

"मतलब भैया के आप मेरा सबकुछ हो तोह ये आपकी हे हुई. वैसे भी मुझे ये चलनी हे नहीं क्योंकि मुझे वो लांसर पसंद है. अब आप न इसको रखो लेकिन वो केयरिंग मत बदलना बस. दादा जी वैसे भी यही करने वाले थे तोह मैंने पहले हे बता दिया. सेफ भी है ये वाली उस जेन या एस्टीम से.", अर्जुन ने आखिरी बात में उनकी सुरक्षा की चिंता की तोह संजीव भैया ने मुस्कुराते हुए अपने लादले छोटे भाई को चलती गाडी में हे एक तरफ से कंधे पर लगा लिया.

"मैं तोह सोच रहा था तू मुझे वो काली लांसर देने वाला है? चल ये सफ़ेद हठी भी मुझे मंजूर है."

"उसकी तोह चाबी हे छीन ली मेरे से ऋतू दीदी ने. सिर्फ काम से हे मिलेगी अब और वो भी अगर कोई साथ जायेगा तभी.", अर्जुन ने लाचारी से कहा तोह संजीव भैया हैरत से देखने लगे.

"तू कार चलने लगा है अकेले?"

"हाँ तोह वो कार मैं हे लेके आया था न शोरूम से, दादा जी को पीछे बैठा के. और अब उसपे हक़ जमा दिया है Ritu-Alka दीदी ने. वापिस साइकिल वाला बना के छोड़ दिया.", अर्जुन की बातें सुन्न कर संजीव इतने दिन बाद बहुत खुश था लेकिन भूल गया था के एक सिरा उस डोर का पकड़ा बैठा है वह इस बैलबुद्धि को. दोनों हे बातें करते अपने घर चले आये और नाश्ता करने के बाद संजीव भैया सोने के लिए बोल कर अपने कमरे में चले गए और अर्जुन चुपके से आरती दीदी को लेकर उड़न छू हो गया. थोड़ा लेट सही लेकिन वो उन्हें निराश करने वाला नहीं था.

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"देख ऋचा, वैसे तोह मैं हु अपनी ज़िन्दगी में मस्त रहने वाली और किसके बगल में खाज है या किसका सर कौन फोड़े इस सब में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं. लेकिन तू है एक जज्बाती जवान लड़की बिलकुल अपने बाप जैसी. सामने वाला सॉरी बोल दे तोह सब साफ़ और गुस्सा आ जाये तोह सत्यानाश. लेकिन तू है तोह मेरी बहिन न?", बबिता हवेली की दूसरी मंजिल पर बने इस अलग कमरे के अंदर ऋचा के साथ बंद थी. यहाँ वैसे भी कभी कोई आता हे नहीं था और आज भी ये दोनों यहाँ इसलिए थी की ऋचा अपनी बहिन के शरीर को थोड़ा निखारना चाहती थी हल्दी की रसम से पहले. शरीर वैसे हे सुन्दर और बेदाग़ था लेकिन हाथ पर हलके काले रोये भी ऋचा हटाने वाली थी.

"आप क्या कह रही हो दीदी? सीधा सीधा बात करो और ये पेट के पास से सलवार थोड़ी ढीली करो.", ऋचा की बात पर बबिता ने एक बार वो शहद जैसा तरल देखा जो बर्तन में था और कैंची से कपडे की लीर बनती ऋचा को. खिड़की दरवाजे सब ाचे से बंद देख बबिता ने झटके से अपने दोनों हे वस्त्र उतार कर एक तरफ रख दिए. अब वो एक सफ़ेद ब्रा और उजली कच्ची में हे थी, असाधारण रूप से बड़ी. ऋचा तोह खुद हे हैरान हो गयी थी ये जिस्म और बहिन की दिलेरी देख कर.

"टुकुर टुकुर न देख तेरे भी यही सब है बस मेरे थोड़े बड़े है. हाँ तोह मेरा मतलब ये है के जो तू हिम्मत दिखा रही है न वो तरीका कभी काम नहीं करता. तू कितना जानती है अपनी माँ को? रही तोह आधी से ज्यादा ज़िन्दगी तू भी यहाँ से बहार हे है. मुन्नी काकी रहती है खामोश सबकी नजर में लेकिन वो जो दिखती है बिलकुल वैसी नहीं है. तुझे कुछ खोजबीन करनी हे थी तोह उनसे झगड़ने की बजाये दिमाग से काम लेना था.", बबिता ने नाभि से निचे की खाल को थोड़ा खिंचा और ऋचा ने वो तरल में लिपटी पट्टी बड़ी सफाई से वह पर उभरे महीन बालो पर चिपका दी. बबिता के चेहरे पर थोड़े मादक भाव आ गए थे और ऋचा भी हाथ को दबा कर चलती पट्टी ाचे से चिपकने लगी.

"मतलब आप माँ के बारे में कुछ ऐसा जानती हो जो मुझे या किसी और को नहीं पता.? और आपको तोह मैंने बताया भी था के उस आदमी ने क्या हरकत की थी मेरे साथ और ऊपर से माँ ने तोह वह खड़े हो कर सुना भी. झूट भी बोलै जब मैंने बात करनी चाही तोह. कैसे चुपचाप राहु इतना होने के बाद?", और झटके से वो पट्टी खींच दी. चमड़ी से सारे बाल गायब हो गए थे वो जगह माखन सी चिकनी दिखने लगी थी.

"आठ.. के कर दिया बावली? तू आज एक्सपेरिमेंट मेरे से हे करेगी के? करती रह, मजा भी आ रहा है यार. वैसे तेरा गुस्सा जायज है है बेबे. लेकिन मैं मुन्नी चच्ची के पास बचपन में हे रही हु तोह उतना जानती हु जितना उस समय देखा. कभी कभी मोहर मां के साथ मिलने आते रहे लेकिन वो भी बंद हो गया था बाद में. मुन्नी काकी और बिंदु, जो सबसे छोटी बहु थी परिवार की वो दोनों सहेली थी, एकदम पक्की. जो उस दिन बिजेन्दर बोल रहा था न शंकर काका के सामने उसकी वजह मर्दो की लड़ाई न थी ऋचा, सुलगती हुई 2 औरतो का ऐसा जाल था जिसमे सब मारे गए और उनसे तोह पूछा तक नहीं किसी ने.", इतना बड़ा खुलासा सुन्न कर ऋचा के तोह हाथ जहा के तहा रुक गए. वो हैरानी से बस बबिता को देख रही थी जो थोड़ी गंभीर थी इस वक़्त.

"लगा न ये पट्टी थोड़ी आगे, वह ज्यादा जरुरत है. और जो कहा उसका एक एक लफ्ज़ सच्चा है, था तोह बिजेन्दर भी तब यही लेकिन वो मोटी बूढी बस सुन्न के भूल जाता था था या कुत्तो को बताने की कोशिश करता रहता था. उस से तोह कुछ होना न था और बाप एक मारे जाने के बाद मेरे मुँह पे तोह पक्का टाला लग गया कही तेरी maa-Bindu और वो लोग मेरे भाई और माँ को भी न मार दे. बाद में अलग हो गए तोह हो गए, शंकर काका सलामत थे और रामेश्वर दादा घर से बहार मेरे और बिजेन्दर से मिलते रहते थे. इतने में हे खुश थे हम और सोचा के चलो अब यही ज़िन्दगी है तोह यही सही. लेकिन मेरी माँ बदला लेने के चक्कर में फस्स गयी बिंदु के जाल में और उलटे सीधे काम किये जिनका नतीजा एक हे निकला, फ़ैल. आखिर में अर्जुन को घेर के मारने लगे तोह वो अकेला हे इन सब पे भरी पड़ गया लेकिन माँ की ज़िन्दगी भी बचाई और कितने हे शमशान पंहुचा दिए."

"इस सबमे माँ कहा थी दीदी?", ऋचा उत्सुकता से सब सुन्न रही थी और साथ हे साथ योनि के ऊपर के घने बाल छोड़ कर बाकी जिस्म को निखारने में लगी रही.

"वही तोह तू सोच. बिंदु यहाँ इस देश में रहती नहीं, मेरी माँ में बिजेन्दर का भी आधा दिमाग है, शीला भी चालू खोपड़ी थी लेकिन उतनी नहीं जितनी मेरी मुन्नी काकी. वो तोह कभी सामने आयी हे नहीं लेकिन उनकी माँ के घर से उधर वाली हवेली पर फ़ोन जरूर आता था या बिंदु काकी जिक्र करती थी. मेरी सीड है अक्षरा वह हवेली में जिसने एक हे फ़ोन के 2 और डब्बे लगा रखे है. नजर हमेशा रही थी मेरी माँ के ऊपर क्योंकि मैं उन्हें खोना नहीं चाहती थी. सब पकडे गए, मारे गए या सुधर गए लेकिन मुन्नी काकी न किसी के हाथे चढ़ी, न किसी ने उनसे कभी सवाल किया और न वो सबूत छोड़ने वालो में से. चल अब ये काख वाले भी उखाड़ दे, क्या पता यहाँ भी चाट ले जब निचे मुँह मार सकता है तोह.", बबिता भी अलग हे मिटटी की बानी थी. गंभीर बात करते हुए भी एकाएक कुछ अलग बोल कर इंसान को दुविधा में दाल देती थी.

"अब ये क्या था दीदी? माँ की बात से अब कहा बात ले आयी? मैं कोशिश करुँगी की गलती सुधर लू और माँ भी मान जाएगी क्योंकि वो भी मेरी परवाह तोह करती हे है. अब आप ये बताओ के आपने क्या शादी से पहले हे अपना सबकुछ गोलू जीजा जी को सौंप दिया.? और ये निचे वाले बाल उतने ज्यादा भी नहीं जैसे थोड़े टाइम पहले हे साफ़ किये हो.", ऋचा ने उस बड़ी पंतय को झिझकते हुए थोड़ा खिसकाया तोह वह कुछ रेशरे थे, लम्बे घने बाल नहीं और आगे बिलकुल हे कोरा हिस्सा योनि से पहले. बेखयाली में इतना तोह खिसका दिया था लेकिन ख़ास अंग कपडे और मोटी जांघो के बीच हे दबा रहा.

"पहले मेरी बात पूरी सुन्न ले डिटेक्टिव ऋचा. तेरे पास न तोह नेटवर्क है, न सपोर्ट और न सेफ्टी. काकी से सीधा भी माफ़ी मैट मांग लियो क्योंकि तू चोट मार चुकी है उन्हें. ऐसे दिखा के तू उन पर एहसान कर रही है लेकिन वो अगर सुधारना चाहे तोह तू उनका साथ देगी. सच तोह सारे मुझे भी नहीं पता के कौन क्या है. अब जरा ये बता के तेरे पापा के मरने के बाद शंकर चाचा कैसे तेरे माँ को पेलने लगे? कैसे तू पैदा हुई जब बाप मरे हे साल से ज्यादा हो गया था और रविंदर बेचारा उमेद काका के संरक्षण में क्यों है? वो तोह अभी भी 1 साल का बचा है 25 का होने पर भी."

"आप तोह गन्दी बातें भी करती हो यार. और बात आपकी बिलकुल ठीक है के मेरे पास तोह बैकअप हे नहीं है कोई और न बात करने वाला क्योंकि आप भी कल चली जाओगी, बिजेन्दर भैया की ज़िन्दगी वैसे भी अब बदल गयी है तोह ऑप्शन हे नहीं बचे मेरे पास. वैसे कितनी अजीब बात है के शंकर पापा और माँ का रिश्ता दादी ने कैसे कबूल कर रखा है. और मुझे पैदा भी किया लेकिन उनकी तोह उधर भी बीवी है जो सचमुच बहोत ाची है. दिमाग हे खराब कर दिया आपने तोह मेरा. वैसे अब पेलने वाली बात आपने की है तोह बताओ के आपने ब्याह से पहले ये सब कैसे कर दिया.? जीजा जी तोह सुना है अभी तक इलाज करवा रहे है."

"अर्जुन.", बबिता ने विस्फोट हे कर दिया था ऋचा पर ये नाम बोल कर.

"क्या कह रही हो आप? वो मुझसे भी 5 साल छोटा है दीदी."

"ओह मेरी भोली बन्नो. तेरा साथ अगर कोई दे सकता है वो है अर्जुन क्योंकि उसका कारनामा तोह माँ ने भी बताया था न और छोटी की हालत भी उसने हे खराब की. छोटा न है वह, जंगली घोडा है वो भी दिमाग, ताक़त और प्यार से भरा. कल वो आएगा तोह थोड़ा ाचे से बात करियो और हो सके तोह कुछ दिन उनके वह चली जाना मेरी शादी के बाद. तुझे सब प्यार हे करेंगे उनके घर क्योंकि वह सबको यही आता है. अब ये हिस्सा भी साफ़ कर दे क्या पता थोड़ा ज्यादा हे मेहरबानी कर दे साफ़ हाईवे देख के मेरा घोडा.", बबिता ने खुद हे अपनी कच्ची को छूट की लकीर के करीब तक निचे करके इत्छा बताई. अब तक तोह बाकी का शरीर पूरा चमक रहा था बस वो बड़े बड़े पहाड़ ढंके थे.

"हाँ, ठीक है और अब तोह यही सही रहेगा के कुछ दिन इधर से दूर हे राहु. वैसे हो तोह आप सचमुच कमाल की लेकिन ऐसे शरीर के लिए मर्द भी भैया से तगड़ा चाहिए. जाने ये गोलू जीजा जी क्या गुल खिलाएंगे और आपको संभल भी लेंगे या नहीं.", ऋचा ने भी मूड ठीक करते हुए मस्ती में कहा तोह बबिता ने एकदम से उसका एक उभर भींच दिया.

"आउच. दीदी ये क्या करती हो? Chiii...Aah दर्द होता है.", ऋचा का चेहरा लाल हो गया था क्योंकि ये उम्मीद के परे था उसकी और पहली बार किसी ने उसके जिस्म पर हाथ लगाया था वो भी ऐसे. चंदरभान ने जो किया था वो अभद्रता और वासना थी लेकिन यहाँ तोह दो बहनो के बीच मादक chhed-chhad ने उसको शर्म से लाल कर दिया था.

"ऐसे दिमाग चलाया कर डार्लिंग. गोलू का गुल्ला तोह गोली की वजह से महीना चलने नहीं वाला. ये रहमो करम तोह मेरे तगड़े घोड़े के है. सच केथी हु के अगर मर्द हो तोह ऐसा जो मेरी जैसी को भी गॉड में उठा के पेल दे. बुखार आ गया था जैसे उसने मुझे लड़की से औरत बनाया. लेकिन ज़िन्दगी का अगर सबसे ख़ास दिन भी तोह वही था बस. तेरे अनार भी मॉटे हो रहे है, छिलका उतरवा ले नहीं तोह किसी काम का न रहने वाले अगर सही मर्द न मिला तोह.", इस बार खुद हे बबिता ने वो योनि के ऊपरी हिस्से पर चिपकी पट्टी ाचे से दबाने के साथ हाथ अंदरूनी हिस्से तक पंहुचा दिया. मजे में आँखें हे बंद हो गयी थी अर्जुन को याद करके. लेकिन ऋचा हैरान भी थी की दीदी ने शादी से कुछ हे दिन पहले ये किस घोड़े को अपने ऊपर चढ़वा लिया था.

"कौन.. कौन था वो दीदी जिसने आपको ी मैं आपके साथ सेक्स किया? और जब आपने इतने साल कुछ नहीं किया तोह फिर शादी से हे पहले उसके साथ वो सब क्यों?"

"बन्नो, उसका तोह कर्ज भी न उतार सकती अगर सबकुछ वार दू तोह भी. गिफ्ट देने गयी थी लेकिन उल्टा वो मुझे हे ऐसा गिफ्ट दे गया के ज़िन्दगी ाची लगने लगी है. सचमुच ऋचा, उम्र तोह मेरी बहोत ज्यादा है और सही समय पर शादी होती तोह आज 8-9 साल के बचे होते मेरे लेकिन उस लड़के ने तोह मुझे ऐसा प्यार दिखाया जैसे मैं कल हे 18 की हुई और काली से फूल बन्न गयी. भगवन ने जितना दिया उतने में हे संतुष्टि है बाकी मुलाकात तोह होती रहेगी अब."

"अर्जुन. मतलब अगर मैं गलत नहीं हु तोह वो अर्जुन हे हैं न दीदी? लड़का तोह कोई करीब आ भी नहीं सकता हवेली की किसी लड़की के और आपने हे कहा था के आपका सबकुछ अर्जुन का हे है. अर्जुन ने हे आपके साथ ये सब किया है?", ऋचा के टूटते उड़द चुके थे ये सोच कर. उसने खुद भी तोह कहा था के बबिता दीदी को संभल सके ऐसा लड़का तोह वही लगता है लेकिन मजाक वाली बात तोह सच निकली.

"हाँ वो अर्जुन हे है ऋचा लेकिन उसने नहीं किया मेरे साथ. मैंने सामने से खुद उस को बुलाया और पूरी तैयारी के बाद अपने आप को उसके हवाले कर दिया. अब मैं तेरी नजरो में बुरी बन्न गयी हो तोह बुरी सही लेकिन ये मेरा फैंसला था और मैं खुद चाहती थी के सबको प्यार करने वाला यही लड़का मेरा मालिक बने. कुछ गलत नहीं लगा मुझे ये करना. जितनी भाभियो, सहेलियों से या फिल्मो से suna-dekha था वो सब कोरी बकवास या निहायती कमजोर बातें थी. संतुष्ट तोह मुझे वो औरत भी न मिली थी जो 4 बचे होने के बाद भी कहती थी की आग शांत हे नहीं होती. अर्जुन ने तोह 32 साल की उम्र वाली इस औरत जैसी लड़की को ऐसा तृप्त किया के शायद फिर कभी कोई कर हे न सके.", बबिता अब उत्तेजित न थी लेकिन बात कहते कहते अपने बाए उभर को खुद हे दबा दिया. उसकी मादक सिसकी सुन्न कर ऋचा को भी अपने अंदर कुछ अजीब सा रेंगता महसूस होने लगा.

"सचमुच क्या वो लड़का इतना काबिल है दीदी? मतलब मैंने उसको 2 बार देखा है और सिर्फ थोड़ी हे बात की है. मुझे तोह वो काम बातचीत करने वाला लेकिन एक संस्कारी जिम्मेवार लड़का हे दिखा. आप कहती है के वो प्यार करने के मामले में बेमिसाल है."

"पगली, तू बहिन भी है और राजदार भी. संस्कार तोह होने हे है उसमे और तुझे भी maan-sammaan देगा हे वह. लेकिन बहोत बोलता है वह और दिल का बड़ा साफ़ और भला है. हाँ बिस्टेर पर कोहराम मचा देता है, मुस्कान से पूछ लियो अगर मिलना हुआ तोह. मेरे से पहले तोह अर्जुन ने उसका हे दरवाजा तोड़ा था और वो तोह प्यार भी करती है उस से. अर्जुन अलग है, उस से प्यार करनी वाली मैं और मुस्कान हे नहीं है ये भी जान ले. लेकिन वो बहोत ख़याल रखता है मुस्कान का और सम्बन्ध आगे भी मुस्कान ने हे बढ़ाया. वो खुद से तोह ऐसा करने की हिमाकत भी नहीं करने वाला."

"ओह तेरी की. वो चीज क्या है? जानती हो उसका रिश्ता पहले से हे किसी लड़की के साथ पक्का है. पापा ने बताया था मुझे और मैं तोह खुद भी मिल चुकी हु उस लड़की से. सचमुच वो लड़की सबसे अलग है, नीली आँखों वाली लम्बी और पारी सी सुन्दर. फिर अर्जुन ऐसा कैसे कर सकता है?"

"प्यार के बदले प्यार हे तोह दे रहा है और जहा तक उस लड़के को मैं समझती हु तोह वह इस लड़की से हे सबसे ज्यादा प्यार करता होगा. क्योंकि न उसने मुस्कान को ी लव यू कहा न मुझे. चुदाई में तोह ऐसा हर लड़का बोल देता है क्यूंकि जुगाड़ रखना हे पड़ता है न. मतलब अर्जुन के लिए बस वही लड़की मायने रखती है हमसफ़र के रूप में. उनके घर तोह मैं भी जाने वाली हु ब्याह के टाइम, मिलूंगी उस लड़की से भी."

"हाँ मैं हे मिलवाउंगी आपको उस से. वैसे एक और बात बताती हु आपको, कोमल को तोह आपने देखा हे है न कितनी सुन्दर और साफ़ दिल की है. ऋतू से मिलना एक बार आप जरा, मैं तोह एक नजर देखते हे जल उठी थी की कोई इतना सुन्दर कैसे हो सकता है. वो रेखा आंटी भी बहोत सुन्दर है लगता भी नहीं के वो 3 बचो की माँ होंगी पर ऋतू सचमुच बहोत ख़ास है. अर्जुन का फीमेल वर्शन समझ लो लेकिन फुल ऑफ़ लाइफ. मुझे तोह बिना लाग लपेट के दोस्त बना लिया उसने बस अर्जुन हे थोड़ा अजीब व्यवहार कर रहा था.", ऋचा के मैं में चलती बात होंठो पर हे आ गयी.

"ऐसा न है लाडो. कुछ और वजह होगी और इतना तोह मैं शर्त लगा के कह सकती हु के तेरा दिल आप मचल रहा है उस से बात करने को. उस से ऋचा सिंह की तरह मिल एक बार, आधा सच तोह यही है. और थोड़ा डिस्टेंस मेन्टेन करके रखना डार्लिंग, मुन्नी काकी की इस मुनिया की चाल बदल जायेगा ज्यादा ाचे से जान ने के चक्कर में.", ऋचा की चुटकी लेते हुए बबिता हंसती हुई कड़ी हुई तोह ऋचा भी झेंप गयी. आदत न थी ऐसी खुली बातों की लेकिन फिर दोनों हे खामोश हो गयी. बबिता के खड़े होने से कच्ची निचे सरक गयी थी और ये नजारा देख ऋचा की नजर वही अटक गयी.

"ऐसे न दिखने वाली मेरी मुनिया. मांस है सांथाल पे, फॉर प्रोटेक्शन. तेरी वाली जैसी हे हैं अंदर से इतनी करिओउसीतय न दिखा.", कच्ची ऊपर करके हँसते हुए बबिता ने कपडे पहने तोह ऋचा अभी तक शर्मा रही थी.

"वैसे सच कहु तोह आज पता लगा दीदी के बड़ी बहिन का होना कितना जरुरी है. इतने साल न मैं अकेली हे थी बस और बहार भी बस नाम के फ्रेंड. और आप अब इतनी जल्दी जाने वाली हो."

"दूर नई जा रही तेरे से मैं. अब तोह फायदा हो जायेगा ये सोच. तू मेरे से मिलने वह आया करेगी और प्राइवेट में हम दोनों मौज करेंगे. यहाँ तोह निचे बुढ़िया मुँह से गोली चलती रहती है और माहौल ऐसा जैसे हर दिन किसी की मौत हुई हो. बिजेन्दर वाली भी बातूनी है लेकिन भोली है थोड़ी, ध्यान रखियो और वैसे तू उसके साथ मौज मार सकती है. बिसेक्सुअल है वो, मतलब दोनों लिंग के प्रति आकर्षण रखने वाली."

"Chhii..kuch भी बोलती रहती हो आप."

"अरे सचमुच पता उसको भी नहीं है लेकिन अक्षरा न रोज उसको मसलती थी जिस से उसका शरीर भर जाए. अब बिजेन्दर ज्यादा न रगड़े तोह किसी किसी दिन तू अपने पास सुला लियो अनुपमा को, नरम है वो और तू सख्त.", आँख मारती हुई बबिता ने गले में चुन्नी ली तोह ऋचा अपनी बहिन के गले लग गयी.

"यू अरे रियली ा गेम ऑफ़ ा पर्सन दीदी."

"ी क्नोव डार्लिंग. लेकिन तू अब ऐसी कोई गलती नहीं करेगी ऋचा जिस से तेरी जान चली जाए. मुन्नी काकी के लिए शायद कुछ मायने नहीं रखता और उनका आखिरी मकसद किसी को नहीं पता. शायद रामेश्वर दादा के परिवार का खत्म या फिर अपने अंतर्मन में जलती कोई बरसो पुराणी आग. इस हवेली में तू अगली पीढ़ी है और तेरी हिफाजत बहुत जरुरी है. मेरी माँ के सामने तोह तू सलामत रह सकती है लेकिन अगर ये मुँह पर स्पष्ट बोलना बंद न किया और सख्त तेवर अपनाये तोह तेरे साथ साथ मेरी माँ भी हादसे का शिकार हो जाएगी. समझ रही है न?", बबिता ने ऋचा को बाहों में लिए हे अपनी असली चिंता जाहिर की तोह ऋचा को उनका ये प्यार अंदर तक महसूस हुआ.

"जी दीदी और वैसे भी यहाँ बिजेन्दर भैया भी है मेरे पास. माँ को मैं निश्चिंत कर हे दूंगी.", दोनों हे खुद को व्यवस्थित करती हुई निचे आँगन में चली आयी तोह यहाँ हल्दी की रसम से पहले की तैयारी चल रही थी. गुड्डी काकी पड़ोस की महिलाओ के साथ काम कर रही थी और इधर सुशीला के साथ आज चंद्रो देवी भी उपस्थित थी. बिजेन्दर को भी आज हल्दी लगने वाली थी तोह पहला नंबर उसका हे लगने वाला था. पड़ोस की भाभियो के बीच वो बनियान पाजामे में कुर्सी पर बैठा लड़की सा शर्मा रहा था. वही मधुलता अंदर वाले कमरे में साफ़ चादर लेने के लिए गयी तोह ऋचा को तस्वीर निहारते देख ठिठक गयी. उसके कमरे में यही एक तस्वीर थी जिसमे हाथ में खिलौना पकडे 4 बरस की ऋचा अपनी माँ का गाल चूम रही थी.

"कुछ यादें हम चाह कर भी दिल से निकल नहीं सकते. इंसान को चाहे निकल दे.", लता की आवाज सुन्न कर ऋचा पलटी तोह अपनी बेटी की भीगी आँखें देख लता को भी दिल के किसी कोने में दर्द महसूस हुआ.

"इंसान अगर माँ हो न तोह ऐसा सपने में भी नहीं हो सकता माँ. गलती होने पर बस मान लेने भर से एक बचे का दिल सबकुछ भुला देता है आपने तोह वो भी न किया. लेकिन मैं छह कर भी सच नहीं बदल सकती की आपके बिना मेरा वजूद नहीं है.", ऋचा की ये बात जाने क्या असर करि लता के दिल पर की वो चादर निचे गिरती अपनी बेटी को पकड़ते हुए खुद से लगाए रोने हे लग पड़ी.

"जलील मैट कर मेरी बेटी मुझे, ज़माने में बस यही तोह मिला है मुझे. िचाये बड़ी थी लेकिन कुचलने वाले भी वही अपने. तुझसे अगर माफ़ी मांगती भी तोह ज्यादा बुरा लगता. तू मुझे छोड़ कर मैट जाना मैं गुलामी करने को भी तैयार हु तेरी."

"आप बस मेरी माँ बन कर रहिये उतना बहोत है माँ. ये परिवार हमारा सच है और इस से ज्यादा हमको कही सुकून नहीं मिलेगा. गलती जानबूझ कर हो या अनजाने में, सामने वाले का दिल बड़ा हो तोह माफ़ कर हे देता बस वो फिर से न हो.", ऋचा ने अपने आंसू साफ़ करते हुए नजरे घुमा ली. लता को भी पता था के ये दुरी ऐसे काम नहीं हो सकती क्योंकि एक लड़की के साथ बहुत कुछ गलत हुआ था और वो शामिल थी इसमें, चाहे मूक रूप से हे सही. ऋचा कमरे से निकल गयी तोह अब अलग परेशानी ने घेर लिया था लता को.

'बेटी तू नहीं जानती की मैं संवेदनशील हु, तुझ पर होने वाला वार तोह रुक भी सकता है लेकिन उस रेखा की मौत नहीं ताल सकती. सुपारी का तोह यही असूल है. तू जी ले मैं मरने से पहले हिसाब थोड़ा लम्बा बना कर जाउंगी.', खुद की आँखे साफ़ करती हुई मधुलता अब थोड़े हलके मैं से वापिस पिछले आँगन में चली गयी थी. रात के हादसे के बाद अभी तोह दोपहर के 12 हे बजे थे और इतनी हेर देर में वो जाने क्या क्या कदम उठा चुकी थी.

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इस बड़े कमरे के आरामदायक बिस्टेर की हालत वैसी न थी जैसी अक्सर अर्जुन की गैरमौजदगी में होती थी. हमेशा हे खामोश रहने वाला ये कमरा बंद आज भी था लेकिन सिसकारियों की गूँज इस सूनापन भांग करती बता रही थी की यहाँ कुछ ख़ास चल रहा है. फर्श पर बिखरे salwar-kameej और बिस्टेर के किनारे लटकती वो ब्रा के आगे अर्जुन के मांसल दैत्याकार जिस्म के साथ आरती अमरबेल सी लिपटी सिसक रही थी. बलशाली भुजाओ पर गाड़ते नाखून बता रहे थे के आरती को दर्द और मजे का ये सफर क्या रंग दिखा रहा था. मॉटे गोर कपोत (कबूतर) एक हाथ से दबाते हुए अर्जुन भी अपना भुजंग उस नरम योनि में पूरा उतार कर jaha-taha आरती की गर्दन गाल और होंठो को चूम रहा था.

"आठ.. बड़ा मुश्किल है ये लेकिन इतना अलग सा एहसास.. मममम. अर्जुन मार हे दो मुझे इस प्यार me...aahhh..", सुर्ख योनि पटल बुरी तरह चिपका हुआ था उस असाधारण से लिंग पर. छूट की 2 छोटी छोटी लाल फांके कॉमर्स से चमकती फड़क रही थी. उरोज आज महसूस कर रहे थे के असली स्पर्श और आशिक़ का प्यार क्या असर करता है. निप्पल खड़े हो कर अपने मसले जाने का जश्न मन रहे थे.

"सचमुच आसान नहीं है आरती.. आठ.. पहली बार तोह जल्दबाजी की वजह से हो गया था लेकिन इतनी टाइट हो की मेरा ये भी एक बार दर्द करने लगा था. आह्हः.. लेकिन अब बड़ा ाचा लग रहा है. आप सिर्फ प्यार करने के लिए हे बानी हो, हर हिस्सा और हर तरह से. उम्म्म.. ", दोनों के होंठ कुछ ज्यादा हे चल रहे थे जिस से लार होंठो के किनारे तक बहने लगी थी आरती के. अर्जुन वह जीभ फिरते हुए वो गोरी चिकिनी जांग अपने ऊपर रखते हुए हलके धक्को से ये मिलान शुरू करने लगा.

"आठ.. आठ.. ऐसे हे धीरे धीरे.. अर्जुन सचमुच वो मेरी गलती थी.. आठ. तुम्हारा हे तरीका सही है.. उम्म्म.. लेकिन वह निचे प्यार करके ाचा नहीं किया.. आउच.. बाबा दूदू मैट काटो, निशाँ दिख जायेंगे.. आठ..", अर्जुन एक गोल मटोल से उभर को मुँह में भर के पीते हुए सख्त लुंड को 3-4 इंच तक बहार निकल कर अंदर धकेलने लगा. छूट की कसावट किसी रबर के तंग चले जैसी थी कुछ ज्यादा हे रगड़ पैदा करता है. मोटा सूपड़ा शायद ज्यादा हे तैयार किया था अर्जुन ने जिस वजह से आरती की आँखों में आया पानी अभी तक पलकों पर था.

"आप मन कर रही थी न वह निचे मुँह लगाने से, सोचो अगर वैसा न करता तोह कितना दर्द होता. आह्हः.. सचमुच ढंग से तोह आज हे देखा है आपको, कितनी मुलायम हो और कपड़ो के होने पर ये भराव उतना नजर नहीं आता... उम्मम्मम्म..", अर्जुन तोह जैसे इन उरोजों का दीवाना हो गया था जिन्हे रह रह कर वो होंठो में दबा लेता या पंजे में पकड़ कर हौले हौले दबाते हुए आरती के बाकी जिस्म को महकने लगता. ये कहना अगर उचित न हो के आरती ऋतू के सामान न थी तोह ये भी अनुचित था के वो कुछ काम भी थी. चेहरा बस उतना संजीदा न था जितना हमेशा ऋतू का रहता था लेकिन हर अंग स्पष्ट मिलता था अपनी चचेरी हमउम्र बहिन से.

"आठ.. तुम्हे रोक नहीं रही थी.. आह्हः.. .बता रही थी की वो जगह अजीब है.. लेकिन उम्म्म्म.. तुम्हारी हर हरकत पागल कर रही है. विश्वास नहीं होता के इतना बड़ा मैंने ले कैसे लिया.. ोोोोीीीी.. .. वही हो रहा हैंण्ण्न.. आह्हः.", इस धीमी चुदाई से हे आरती का ये दूसरा ras-bahaav हुआ था. अर्जुन रुक कर उन्हें अपने साथ लगाए सर सहलाने लगा. एक तंग अर्जुन के ऊपर होने से दोनों के अंगो का ख़ास दृश्य दिख रहा था. 36 के सुडोल गोर कूल्हों के बीच गुदाद्वार तक नजर आ रहा था जिसकी बगल में बुरी तरह चौड़ी हुई छूट में वो मूसल सा कामदण्ड अपनी पूरी लम्बाई तक अंदर था. एक मिनट के अंतराल पर अर्जुन ने फिर से वही धीमी रफ़्तार वाले धक्के चालू किये तोह आरती ने प्यार से एक चुम्बन करने के बाद कहा.

"तुम सचमुच बहोत ध्यान रखते हो.. ाःह.. चाहो तोह पोजीशन बदल लो. I'm कम्फर्टेबले now...aahh.. वैसे तोह इसको लेने की आदत जल्दी नहीं पड़ने वाली.. बहोत बड़ा है.. आअह्ह्ह..", अभी दोनों हे आमने सामने लेते ये चुदाई कर रहे थे लेकिन आरती के कहने पर अर्जुन ने वो नरम मांसल बदन पूरी तरह अपने निचे लेते हुए अब ऊपर से धक्के देने शुरू कर दिए. गोल चुके एक ख़ास लाये में आगे पीछे हिल रहे थे और छूट भी इस मुद्रा में थोड़ा बेहतर झेल प् रही थी.

"अह्ह्ह्ह.. तुमने आठ.. क्या खाया है जो ऐसे लगे हुए हो..? आउच.. ufff..kahi किसी दिवार से लगता है तोह आठ.. जान निकलने लगती है.. मजे से..", टाँगे अपने आप हे ऊपर उठा ली थी आरती ने और अब अर्जुन ने दोनों हाथ उन गोल मोटी जांघो के बहार से निकलते हुए दोनों सतांन दबाते हुए रफ़्तार तेज कर दी. चेहरे पर पसीना आ गया था इतनी म्हणत से लेकिन वो बिना रुके आरती को अपने रंग में और गहरा रंगने लगा.

"आप ऊपर आओ अब.", इतना कहते हे अर्जुन ने लुंड बहार खिंचा तोह हलकी सी चीख निकल गयी आरती के मुँह से.

"आउच.. ये सामने से ज्यादा हे मोटा है.. और तुम एक हे बार में सब पोजीशन तरय करोगे क्या?", आरती ने अपनी छूट पर नजर डाली तोह वह वो बंद चीरा अब खुल कर 2 पतली गुलाबी फांके दिखा रहा था जहा से छूट खुल चुकी थी. अर्जुन का टमाटर सा सूपड़ा भी योरस से लिथड़ा ाचा खासा चमक रहा था. अर्जुन को यु सामने नंगा लेता देख अलग सा गुलाबीपन आ गया था आरती के गालो पर और वो थिरकता मोटा तगड़ा लिंग आज सिर्फ प्यारा दिख रहा था उसको.

"अब छोटा कैसे करू?", आरती को लिंग पकड़ कर अपनी जांघो के बीच करते देख अर्जुन ने हँसते हुआ कहा.

"मैं एडजस्ट कर लुंगी, चाहे ये और भी बड़ा क्यों न हो जाये. आठ.. अजीब लगता है लेकिन आदत हो जाएगी.. उम्म्म..", निचे होने लगी तोह अर्जुन ने भी दोनों कूल्हों पर हाथ रख दिए. धीरे धीरे पूरा लिंग अंदर समाहित हो गया तोह आरती ने गहरी सांस ली. अपने चुचो पर नजर पड़ते हे वो आगे हाथ रखने लगी लेकिन उसको अपनी तरफ झुकाते हुए अर्जुन ने एक उभर मुँह में पकड़ लिया.

"उफ़.. बचे हो kya..aahh.. आराम से बाबा.. सचमुच बचो की तरह पी रहे हो लेकिन इनसे कुछ नहीं आता."

"कहो तोह वो भी हो जायेगा.", अर्जुन ने दूसरे वाले को पकड़ते हुए पीने से पहले कहा तोह आरती मतलब समझ कर आँखे बंद किये कमर हिलने लगी.

"आठ.. मार खाओगे.. उम्म्म.. खुद बचे हो और मुझे माँ बनाने की बात कर रहे हो... पढ़ लिख लो थोड़ा और मेरी भी उम्र नहीं आठ.."

"फिर तोह ये सब बंद कर देते है."

"चुपचाप लेते रहो.. आह्हः.. जितना अभी है उतना हो रहा है.. और वह ऊँगली नहीं करनी.. िस्ष्ह...", गुदाद्वार से उसका हाथ झटक कर आरती ने भी छूट को दबाते हुए उसके लुंड को कास के जकड लिया. अर्जुन अब चुपचाप आरती के साथ ताल से ताल मिलते हुए इस सफर को अंजाम देने लगा. सचमुच किसी भूखे बचे की तरह वो दोनों चुचो को चूस चूस कर मोटा करने में लगा था.

"आह्हः.. bass...",Aarti एक तरफ लुढ़क गयी इस तगड़े स्खलन से और अर्जुन ने भी देरी किये बिना उसको बाँहों में लेते हुए 10-12 लम्बे धक्के लगा दिए. लुंड बहार निकलते हे पहली धार सीधा आरती के होंठो पे जा टकराई और उसके बाद 3-4 पिचकारियां गले, चुचो और पेट पर. मुस्कुराती हुई वो अर्जुन को आँखे दिखा रही.

"छी.. तुम बहोत गंदे हो सच में."

"अगली बार सीधा वही होंठ लगा देना."

"पक्का करुँगी और अब दूर हटो. एक तोह पता नहीं किसके हॉस्टल रूम में ले आये और ऊपर से दूध निकलने की बात कर रहे हो."

"मेरा हे रूम है और आप इतनी प्यारी हो तोह थोड़ा मस्ती भी नहीं करू?", आरती दरवाजा खोले हे बाथरूम में फुहारे के निचे कड़ी हो गयी जहा अर्जुन भी साथ आ गया. अपने हाथो से उनका जिस्म साफ़ करते हुए वह पीठ और गर्दन भी चूम रहा था.

"हॉस्टल में रूम वो भी ऐसा? क्या जरुरत पड़ी तुम्हे?", आरती को ाचा भी लग रहा था क्योंकि यहाँ आने तक किसी ने उन्हें टोका तक न था और जगह भी बिलकुल अलग और सुरक्षित थी.

"घर पे कितना पढ़ सकता हु और अब शादी वाले माहौल में भी ये काम हे आएगा. कंप्यूटर इंटरनेट है यहाँ और बाकी सबकुछ. इसलिए ये लिया है लेकिन सिर्फ आपको हे पता है इसके बारे में. गलती से किसी से जीकर मैट कर देना.", अर्जुन ने गोर चुचो को सहलाते हुए कहा. निप्पल कही ज्यादा हे सुजा दिए उसने और ऐसा हे हाल होंठो का था.

"वैसे मुझे यहाँ अकेला छोड़ कर आधे घंटे बहार क्या कर रहे थे तुम? मैं तब परेशान हो गयी थी."

"कुछ जरुरी काम था तब और वो करने के बाद मैंने कोई शिकायत का मौका तोह नहीं दिया न?"

"आठ.. निचे ऊँगली मैट करो, दुःख रहा है. चलो कुछ तोह ाचा काम किया तुमने जो ये जगह पढ़ने के लिए ली है. मुझे भी पसंद आयी और शायद कॉलेज स्टार्ट होने पर तुम्हारे साथ कंबाइंड स्टडीज करने मैं यहाँ आया करू.", आरती भी अर्जुन के अंग को हाथ से साफ़ करती हुई उसके सीने से लग गयी थी.

"जो दिल करे वो आप कर लेना और कॉलेज में अभी बहोत टाइम है. अब ये बताओ के वह दर्द के लिए मेडिसिन दू या आप ठीक हो?"

"ये प्यार वाला मीठा दर्द है अर्जुन, इसको मेरे साथ हे रहने दो. और अब हम लेट हो चुके है तोह बहाना सोच लेना.", तोलिये से पहले अर्जुन को साफ़ करती वह अपना सच्चा प्यार दिखा रही थी. अर्जुन ने भी एक छोटा सा चुम्बन करने के बाद बहार आ कर पहले आरती के कपडे अंदर पकड़ाए और फिर अपने पहन कर तैयार होने लगा. अगले 15 मिनट बाद हे दोनों लोग कमरा बंद करके बहार निकल चले थे. आरती ने हिम्मत दिखते हुए अपनी चाल को खराब न होने दिया.

"ये बैग आये थे तब तोह नहीं था तुम्हारे पास.?"

"हाँ, यही तोह बहाना है. बुक्स आपकी सेकंड ईयर की और कुछ लिटरेचर.", अर्जुन ने मोटरसाइकिल स्टार्ट की तोह आरती ने सर पे दुपट्टा लेने से पहले गर्दन पर किश कर दिया.

"ये तुम्हे एक बेहतर इंसान बनती है जो तुम हो. वैसे माँ और पापा भी 7 तारीख को आ रहे है, किताबो से याद आ गया के कल माँ से बात हुई थी.", आरती ने ये खुशखबरी दी तोह अर्जुन ने भी बराबर ख़ुशी जाहिर की.

"फिर मैं कृष्णा माँ के पास और आप अपनी बड़ी माँ के."

"ज्यादा चालू नहीं हो गए हो तुम. वैसे हक़ है तुम्हारा तोह मैं कुछ कह भी नहीं सकती. वैसे एक co-incidence सोचा है तुमने?", आरती सचमुच अब पातर पातर करने लगी थी जो अर्जुन को भी पसंद आने लगा था.

"बोलो क्योंकि बताये बिना तोह रहोगी नहीं आप."

"देखो कोमल दीदी है 21 साल की नवंबर बोर्न और प्रियंका दीदी भी 21 की नवंबर बोर्न. ऋतू है 19 की जो जुलाई बोर्न और मैं भी हु 19 की अगस्त बोर्न. ये बड़े पापा और पापा कुछ सोच विचार कर पैदा कर रहे थे क्या बचे?", अर्जुन तोह इस संयोग को सुन्न कर हैरान हे रह गया था. ये सच था की नरिंदर जी की और शंकर जी बेटियां लगभग सामान उम्र की हे थी.

"फिर मैं अकेला क्यों? मेरे साथ भी कोई भाई या बहिन प्लान नहीं किया या फिर नरिंदर चाचा 2 से हे खुश हो गए थे.?", अर्जुन ने उत्सुकता से कह दिया और आरती के मुँह से निकल गया जो की ऐसा कभी नहीं करती थी.

"हुआ तोह था एक भाई लेकिन वो बचा हे नहीं. तोह तुमने दोनों का दूध पीया.", अर्जुन की रफ़्तार एकेएक धीमी हो गयी थी ये सुन्न कर और आरती को भी लगा के शायद कुछ गलत कह दिया है.

"तुम इस बात को ले कर परेशां मैट होना अर्जुन, बात पुराणी है तोह अब कुछ कहने से शायद बुरा लगे घर पे. वैसे भी माँ के लिए तोह उनका सबकुछ तुम्ही हो और बड़े पापा ने भी कभी ऋतू या मुझमे फरक नहीं किया. न हे पापा ने प्रियंका दीदी और कोमल दीदी में. वो तोह यही कहते थे उधर पंजाब में भी की 4 बेटी और एक बीटा है पापा का.", अर्जुन को थोड़ा ाचा लगा ये सुन्न कर की वो इतना ख़ास है.

"ाचा सुनो तुम्हे ये सोच कर तोह बुरा नहीं लग रहा है के मैं तुम्हारी बहिन भी हु और लवर भी?"

"ये गुरदीप का असर हो गया क्या आप पे? मेरी बहिन प्यार करती है मुझसे तोह इसमें गलत क्या है? और मैं भी तोह आपसे उतना हे प्यार करता हु. जिस्म जुड़े या न जुड़े दिल तोह साथ है न. लेकिन देख रहा हु के अब सचमुच खुलकर बात करने लगी हो आप. ाची बात है के आप बोलती हो, पहले तोह बस चुपचाप आँखों से बातें करती थी या किताबो के साथ अकेली.", आरती ने अपना सर अर्जुन की पीठ पर रख दिया. बातें करते वो अपने सेक्टर तक आ पहुंचे थे.

"तब भी तुमसे हे तोह बात करती थी. और तुम समझते भी थे इसलिए मैं चाहती थी की शादी से पहले मेरे बॉयफ्रेंड तुम हे बनो. ी लव यू ारु."

"ी लव यू तू ारु.", अर्जुन ने अपने हे नाम से आरती को बुलाया तोह वो सीढ़ी हो कर हंसने लगी.

"जरा सोचो तोह सही ऐसे नाम अगर हस्बैंड वाइफ के हो तोह."

"मुश्किल है."

"उधर पंजाब में ऐसा बहोत देखने को मिलता है. गगन वेड्स गगन, हरमन वेड्स हरमन.. हाहाहा.", आरती हंसती हुई हे आँगन में मोटरसाइकिल से उतरी तोह सामने खड़े शंकर जी को भी उसकी हंसी दिल तक छु गयी. वो दोपहर का खाना करने आ गए थे हॉस्पिटल से फारिग होने के बाद. अब वापसी सवेरे की हे थी क्योंकि biwi-beti को भी लेके जाना था.

"मेरी गुड़िया न ऐसे हे पसंद है मुझे. तू हंसती है तोह आधी थकान देख कर हे दूर हो जाती है बेटी.", शंकर जी ने स्नेह से आरती को गले लगाया तोह अर्जुन को भी ये देख कर बड़ा ाचा लगा था. वो भी आगे बढ़ कर पापा से मिला तोह शंकर जी ने दूसरी तरफ से अर्जुन को भी अपने साथ लगा लिया.

"बड़े पापा, मैं भी कल शादी में जाउंगी आपके साथ. और हाँ इसने बुक्स अभी से दिलवा दी है तोह आपने जो पैसे दिए थे उनका क्या करू?", आरती अभी लाड लड़ा हे रही थी की अर्जुन को हटा कर ऋतू उसकी जगह आ गयी. वो लोग भी वापिस आ गयी थी हिमानी के घर से.

"वो पैसे तुम ऋतू को दे दो बेटी, उसको पता है कैसे खर्च करने है.", ऋतू ने पापा की नक़ल उतारी तोह शंकर जी भी हंसने लगे और इधर तारा उन दोने के बीच हे अपने मां के गाल को चूमती कड़ी हो गयी.

"मां जी, ये आपकी लल्ली न सफारी सीखने का बोल रही है. पैसे तोह मैं खर्च कर लुंगी लेकिन पहले इसका हाथ साफ़ करवाओ, आज सारे ऊपर पंहुचा देती ये.", तारा ने जैसे हे शिकायत लगाई तोह शंकर जी ने भी देखा के सामने वाला बम्पर एक तरफ से थोड़ा अंदर दबा हुआ था.

"तुम लोग कार लेके हे मैट जाना. यही गाडी ठीक है और किसी पर चढ़ जाये तोह बस फ़ोन करके बता देना. चलाओगे तोह लग भी सकती है लेकिन डरना नहीं है.", शंकर जी के इतना कहते हे ऋतू जोर जोर से हंसने लगी.

"मैंने कहा था प्रीती को और वो बेचारी तोह बस चाबी लगा रही थी की ये खम्बे से लग कर रुक गयी. पापा उसको मनाओ, बड़ी मुश्किल से रोना बंद हुआ है.", प्रीती एक तरफ कड़ी थी और शंकर जी ये जान कर तीनो लड़कियों को अलग करते खुद हे उसके पास चले गए.

"बीटा किस बात से रोने लगी तुम? इतनी छोटी सी बात से की गाडी का थोड़ा सा रंग उतर गया? तुम ठीक हो मेरे लिए वही बहोत है. ऋतू, ये गलती दुबारा नहीं होनी चाहिए और तुमसे भी तारा.", शंकर जी ने एक नरम बाप की तरह प्रीती को अपने साथ लगाया तोह उसकी आँखों से फिर पानी बहने लगा. अर्जुन तोह बस एक तरफ खड़ा देख रहा था के उसके पापा ने Ritu-Tara को हे दांत दिया.

"सॉरी अंकल, दीदी की कोई गलती नहीं है.", सुबकियां हे निकलने लगी थी प्रीती के गले से. और अब अर्जुन बोल हे पड़ा बीच में.

"वो कह रहे है के प्रीती को पुराणी गाडी क्यों दी चलने के लिए. समझो थोड़ा और पापा अब तुम्हे नयी गाडी देने वाले है.", अर्जुन ने कहा तोह शरारत से हे था जिस से रट हुए भी प्रीती की हंसी छूट गयी.

"हाँ मैं दिला दूंगा मेरी बेटी को लेकिन तुम हमेशा ड्राइवर के साथ चलोगी बेटी. कभी कार के स्टीयरिंग पर नहीं आना.", शंकर जी को अलग हे चिंता खाये जा रही थी जो वो ऐसी बातें कर रहे थे.

"ठीक है पापा, हम में से कोई इसको ड्राइविंग सीट पर नहीं आने देगा.", ऋतू ने बात ख़तम करते हुए प्रीती का हाथ थाम लिया.

"चाचा जी का मतलब है उसको ड्राइवर के बिना बहार नहीं जाना, तुम अभी स्टीयरिंग हे सीख रही हो. आगे से ऐसा नहीं होगा चाचा जी और तारा की सिवा गाडी कोई नहीं चलाएगा.", अलका ने आश्वासन दिया तोह कही शंकर जी ने आराम की सांस ली.

"मैं भी यही कह रहा था के तुम चाहे कार टॉड कर घर ले आना बस ये उस वक़्त साथ न हो. वो पीछे खड़ा जो मुस्कुरा रहा है उसका हे रंग बदल जायेगा अगर कोई ऊंच नीच हुई. जाओ सब अंदर और जनाब आप जरा मेरे साथ चलो.", शंकर जी ने अब कही खुलासा किया था के अगर प्रीती को कोई नुक्सान हुआ तोह सबसे ज्यादा दिक्कत अर्जुन को हे होने वाली है. झेंपता हुआ वो अपने पापा के साथ वापिस सफारी में हे बैठ गया जिसमे वो ड्राइवर वाली तरफ से बैठ चुके थे.

"देख ले तेरे ससुर जी को, ड्राइवर के बिना नहीं चलने देंगे तुझे. और आज तेरे चक्कर में हम दोनों को दांत पड़ गयी.", ऋतू दीदी ने प्रीती को दबोच रखा था और ऐसे हे वो सब ऊपर की तरफ चलने लगी.

"ऐ आरती, तू ठीक है न?", तारा ने मजे लेते हुए कहा तोह आरती ने बैग हे घुमा दिया जो प्रीती के चेहरे के पास से निकल गया.

"सॉरी बाबा, ये तारा की बची अपने चक्कर में मेरी क्लास भी लगवा देती.", प्रीती अब हंस रही थी.

"बताया नहीं तारा को आरती, तू ऐसे क्यों चल रही.?", ऋतू ने भी तारा का साथ दिया और ये सभी ऊपर वाले कमरे में आ गयी थी.

"ले के देख लो फिर बता देना मेरी तरह भी चल के.", आरती ने कमरे के अंदर आते हे अपना दुपट्टा एक तरफ टांग दिया.

"दिलवा दो बस, मैं तोह लेती रहने को भी तैयार हु.", प्रीती ने जो जवाब दिया उसको सुन्न कर ऋतू और आरती जहा मुँह फाड़े उसको देख रही थी वही तारा बिस्टेर पर बैठ कर हंसने लगी. प्रीती भी उसकी बगल में बैठ कर ताली देने लगी तारा के हाथ पर.

"सुन्न लो जरा, ये तोह कह रही है के न खुद उठेगी न उठने देगी. सही है यार ये लड़की भी."

"इसकी भी इत्छा जल्द हे पूरी हो जाएगी, सुना है कुछ 3 दिन बाद.", आरती ने आँख मारते हुए कहा और बाथरूम में घुस गयी. प्रीती अवाक से इधर उधर देखने लगी थी. वही आज अर्जुन हैरान था के उसके पापा आये तोह खाना खाने थे लेकिन उसको लेके बहार हे चले आये.

"इतना क्या सोच रहे हो यार? अनिल के छोले भठूरे का दिल था और संडे को उस रेस्टोरेंट पर मजा भी आता है खाने का, लस्सी के साथ.", शंकर जी ने जो नाम लिया वो उनकी सबसे ख़ास जगह थी और उनका दोस्त हे था अनिल जिनकी दूकान आजादी से भी पहले की थी और आज एक प्रसिद्ध रेस्ट्रा बन्न चुकी थी.

"पापा इजाजत हो तोह कुछ कहु? आपको बुरा लगे तोह रोक देना.", अर्जुन ने जिस भाव से ये कहा था शंकर जी ने बड़े प्यार से अपने बेटे के सर पर हाथ फेर दिया.

"यार अर्जुन मेरे साथ न एक छोटी सी दिक्कत है अगर तू समझ सके तोह. एक तोह मुझे टीम में काम करने की आदत है और ऊपर से लीड करने की भी. अकेले न मेरा दिमाग अलग चलता है और दिल अलग. अब तू मुझसे बड़ा जूता पहन ने लगा है तोह थोड़ा दोस्त जैसे बात किया कर अकेले में. बाप तोह मुझे ऋतू की शकल देखने के बाद पता चलता है के मैं हु.", अपने पापा का ये अंदाज देख अर्जुन बस मुस्कुरा दिया.

"और तू न मेरा सबसे ाचा बचा है लेकिन प्रॉब्लम हो जाती है मुझसे अगर इन्दर साथ न हो और मैं अकेला हे कुछ कहने लागु. या कोई भी मेरे जैसा हे आस पास हो. बता क्या कहना चाहता था?", शंकर जी सचमुच हे अपनी कमी बेटे को बता रहे थे. अर्जुन हैरान था ये देख कर और थोड़ी देर पहले सिर्फ उसकी वजह से वो प्रीती के लिए डर गए थे.

"पापा आप जैसा तोह दादा जी की नजर में भी कोई इंसान नहीं है. वो कहते है के जीवन में अगर किसी को अपनी लगन का पक्का देखा तोह सिर्फ आप हे हैं. ऐसा और भी लोगो ने कहा है के डॉ शंकर शर्मा जैसा कोई उन्होंने नहीं देखा. आपने तोह #### शहर में कई लोगो के घर जा कर भी फ्री इलाज किया. विकास भैया तक का खर्चा आप उठाते रहे है तोह कोई कैसे आपको गलत कह सकता है. मैं थोड़ा आप जैसा हे बन्न न चाहता हु.", अब हैरान होने की बारी शंकर जी की थी. उनका बीटा सचमुच वो सच कह रहा था जो किसी और को नहीं पता था.

"थोड़ा मेरे जैसा मतलब?"

"क्योंकि बाकी तोह परिवार में और भी लोग है जो अपने आप में ख़ास है. दादा जी से लेके ऋतू दीदी तक. फोकस नरिंदर चाचा जैसा और रिएक्शन आपके जैसा. आप हिचकिचाते नहीं किसी समस्या या मुसीबत से.", अर्जुन ने गहरा हे जान लिया था अपने बाप को.

"पता नहीं इसका क्या जवाब दू लेकिन तुम कुछ पूछ रहे थे."

"हाँ और मैं जानता हु के आपको भी पता है मैं क्या पूछने वाला हु."

"यही बात करने के लिए तोह मैं तुम्हे बहार लाया हु. तुम जो चाहते हो मैं वही करूँगा लेकिन तुम घर पे ध्यान दो बस. संजीव भी इतने बेहतर हो जायेगा."

"और आप पापा? आपको कुछ हुआ तोह माँ और दीदी का क्या होगा आपने सोचा है? दादा जी आपको हमेशा मस्त हाथी बुलाते है जिसको देख कर उन्हें ख़ुशी होती है.", अर्जुन ने एक बड़े बेटे जैसी परवाह दिखाई थी और इधर रेस्ट्रा भी आ गया जहा भोजन का समय था तोह ाची खासी भीड़ थी. दोनों गाडी के अंदर हे बैठे रहे.

"अंजाम घर पे नींद में सोये हुए भी वैसा हो सकता है जिस से तुम डर रहे हो."

"तब दोष उम्र का होगा जो आपकी है नहीं."

"तुम्हारी माँ को क्या जवाब दूंगा अगर कुछ गलत हो गया तुम्हारे साथ."

"और माँ मेरे से यही कहे की मेरी वजह से आपको कुछ हो गया तोह.?", अर्जुन शायद दोस्ती लफ्ज़ में बहकर हे इतना बोल गया था और शंकर जी भी इस बात पर खामोश हो गए थे.

"क्या चाहते हो तुम? खुलकर बात करते है और मैं पहले हे कह दू के तुम्हे मैं शामिल नहीं करूँगा हाँ मदद कर सकते हो."

"मदद कर चूका हु अब आप लंच के बाद बस एक्सेक्यूटे करने की तैयारी करो.", अर्जुन गाडी से बहार निकल आया तोह शंकर जी सिग्रत्ते सुलगते हुए अपने बेटे के करीब आ खड़े हुए जो उनसे भी 3-4 इंच ऊँचा हे था.

"क्या कर चुके हो तुम?"

"मुनीश सम्पत उर्फ़ मोनू मेरे पास हे है. आप उसे कीजिये या अगर चाहे तोह जहा मदद चाहिए मैं कर सकता हु. हम कल कुछ नहीं कर पाएंगे बाकी आप बेहतर जानते है. कुछ गलत किया हो तोह मैं उसको आजाद कर दूंगा पर्सनल वजह पर पीट कर.", अर्जुन की खुलासे से शंकर जी के चेहरे पर दुनिया जहा की हैरानी आ गयी थी. वो लड़का ये भी समझ चूका था के उन्हें आभास हो गया होगा के संजीव बूथ में अकेला नहीं है और इस बात को 3 घंटे हुए जिसमे वो दसप के बेटे को अपने पास क़ैद बता रहा था.

"सब बिगड़ जायेगा ऐसे अगर तुम जैसा करने का सोच रहे हो वैसा किया तोह. तुम्हे सम्पत को छोड़ना पड़ेगा.", शंकर जी खुद हे उलझ गए थे अर्जुन के ऐसा करने पर.

"ये उसके दांत है पापा. दीपू, सतबीर उर्फ़ सत्तू और बॉबी नाम के लड़के है वो. ज़िंदा मैट छोड़ना किसी को भी, चाचा को फ़ोन कर लीजिये आप बस. वो लोग 3 बजे यूनिवर्सिटी लेने आने वाले है मुनीश को. उन्होंने समय दीदी की सहेली को मार कर जला दिया.", अर्जुन के चेहरे पर गुस्सा लेकिन आँखें नम्म हो गयी थी. हाथ में 2 दांत और एक जाड दिखता वह उनके सामने खड़ा था. अब सचमुच शंकर जी के सीने में अलग हे आग लग गयी थी ये सुन्न कर की वो लोग कहा कहा हाथ मार रहे थे.

"तू अंदर चल मैं आया. अगर ऐसा हे होना है तोह फिर यही सही. दिन दिहाड़े तोह वैसे भी कुछ किये समय गुजर गया. इस सम्पत की..", गाली देते हुए शंकर जी रुक गए लेकिन कदम रेस्ट्रा की तरफ बढ़ गए जहा उन्होंने उमेद का नंबर मिला दिया था. 30 मिनट का रास्ता ये व्यक्ति 20 मिनट में भी कर सकता था. शंकर की भूख अब बढ़ चुकी थी और अपने बेटे के सामने बैठे बस वो खाने में व्यस्त रहे.

"मतलब वो यूनिवर्सिटी में रखा है तुमने."

"आपकी बदौलत.", अर्जुन ने लस्सी का गिलास उठाते हुए इतना हे कहा.

"चल तू यहाँ से ऑटो ले कर निकल जाना बाकी मैं और उमेद देख लेंगे. दलीप सीधा #### शहर आएगा तोह बात अब किस तरफ जाती है पता नहीं.", शंकर जी आज पहली बार अपने बेटे के लिए कुछ करने जा रहे थे जिसमे न मेहुल साथ था न भुप्पी और एक मोहरा उनके बेटे ने हे पकड़ कर दिया था. बिल लेने से अनिल खुद मन कर रहा था और इधर मेरसेदेज़ का हॉर्न बजता उमेद बहार आ चूका था. पूरे 25 मिनट में.

"सफारी ले जायेगा न घर?", उमेद ने बिना शंकर को देखे कहा था.

"हाँ ले जाऊंगा चाचा जी. आप साथ जा रहे हो."

"हाँ रे मैं जा रहा हु और पता नहीं अबकी बार एक टांग जाती है या दोनों लेकिन भोले घर सही सलामत आएगा.", अपनी कमर से उमेद ने पिस्तौल शंकर की पंत में खोंसते हुए कहा और गाडी में बैठने से पहले सम्पत को फ़ोन कर दिया, इस बार अर्जुन बड़े सतर्क तरीके से इस सफारी की सीट पर बैठा था. जब से ली थी पहली बार. लेकिन चाचा की कार के जाते हे वो उतर कर वापिस फ़ोन की दिशा में चल दिया, पीसीओ के पास. इस बार वो कुछ 2-3 मिनट बात करता रहा.

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"कोई उमेद सिंह है और उसके पास मेरा बीटा है नरोत्तम.", ये 50 के पार का दसप इस बड़े गोदाम में बैठा था जहा बहार पुलिस और अंदर व्यक्तिगत सुरक्षा थी. एक दर्जन आदमियों की.

"मतलब क्या है सम्पत? तुम पर हाथ डालने की हिमाकत तोह कपूर और पत्रं तक नहीं कर सकते. घनश्याम (दीपू का बाप) भी आ रहा है इधर क्योंकि तुमने उसको भी फ़ोन किया था."

"वही तोह चिंता है भाई साहब, मेरा बीटा अभी तक किसी की नजर में नहीं आया था. आप बॉबी की सुरक्षा का पता कीजिये पहले.", दसप सम्पत की बात सुन्न कर नरोत्तम दस को आभास हुआ के बेशक वो सुरक्षा में रहता है लेकिन लड़का तोह आजाद पंछी है. तुरंत फ़ोन मिलाया तोह किसी ने जवाब नहीं दिया. फिर फ़ोन मिलाया जो घर का नंबर था तोह श्रीमती ने फ़ोन उठाया.

"ये बॉबी कहा है भगवान्?"

"जी 10 बजे हे वो मोनू के पास गया था. क्या हुआ?"

"कुछ नहीं. वो काम से बहार जाना था तोह उसको यहाँ थोड़ी देर बुला लेता.", नरोत्तम दस के नथुने फूल चुके थे. फ़ोन रखने के बाद खूंखार नजरो से सम्पत को देखा तोह वो खुद हे बोल उठा.

"सचमुच भाई मुझे नहीं पता के क्या हो रहा है."

"बीटा मेरा भी गायब है भोस्डिके पोलिसिये. आग लगा दूंगी सारे शहर पर दारु छिड़क के अगर दीपू को कुछ हुआ तोह.", अंदर आता ये व्यक्ति तोह 6 गनमैन साथ लिए था. लेकिन शरीर से भी कुछ काम न था ये. सुपारी सूट पहने सवा 6 फ़ीट ऊँचा घनश्याम दस एक रुतबे वाला खतरनाक आदमी था जो हर सरकार में मोटा चंदा देता था.

"भाई साहब, एक हे कड़ी यहाँ से गायब है. सतबीर. उसके साथ हे होंगे वो."

"भोस्डिके वो किडनैप है तेरे लोंदे के साथ. और वो नशेड़ी मादरचोद तोह अपने ठिकाने पर है हे नहीं. देख सम्पत मेरी बीवी की एक औलाद है और उसको कुछ हुआ तोह तेरी बीवी मैं सड़क पर नंगी लिटा दूंगा.", घनश्याम दस इनमे सबसे रसूख वाला और ताक़तवर व्यक्ति था. और सबसे बड़ी बात के उसका भी बीटा गायब था.

"दीपू मेरा भी उतना हे है जितना आपका भाई साहब लेकिन तीनो एक साथ कैसे गायब हो गए?", सम्पत की हवा सरक गयी थी.

"नरोत्तम जरा फ़ोन तोह लगा इस पत्रं को. सुने क्या विचार है इसके.", गद्दी पर बैठते हुए भी घनश्याम दस के हाथ में रिवॉल्वर थी. इधर फ़ोन की घंटी जाने लगी और 7-8 बजने के बाद व्यक्ति लाइन पर आया.

"हमारे बचे गायब है पत्रं, दसप का भी. हो क्या रहा है जरा बताओगे? 10 करोड़ लिए है तुमने."

"तुम फ़ोन काट हे दो तोह ाचा है. लाइन पर भजन जी है और मैं इस केस से बहार हु.", सामने वाले ने फ़ोन कटा तोह नरोत्तम दस को समझ आ गया था के प्रमुख लाइन काट दी गयी है.

"ये कोई बड़ा खेल हो रहा है घनश्याम. जितने फ़ोन करेंगे उतनी बार ना सुन्न ने को मिलेगी.", अभी वो इतना हे बोल पाया था के सामने से चलते हुए धर्मवीर सांगवान उनके पास आ खड़े हुए.

"ऐसा है के घड़ा भर गया है तुम्हारा. वो पिल्ला है न जो नशे की तस्करी करता था वो मेरे पास है. अब जरा बैठो दो बात करे.", धर्मवीर जी तोह बिना हे कुछ कहे बैठ गए थे. घनश्याम दस हैरत से देख रहा था के ये कौन है.

"तुम आ गए हो लेकिन वापिस न जा सकोगे. वो नशेड़ी हमारा आदमी नहीं है.", नरोत्तम दस ने फीकी हंसी दी तोह घनश्याम दास भी हंस दिया.

"तुम्हारी माँ सड़क पर लिटा कर मुझे भी छोड़ने का शौक नहीं भड़वो. धर्मवीर सांगवान एक से खुश है और वो नशेड़ी बयान दे चूका है. मैं तोह समझौता करने आया था यहाँ 3 जान के बदले 30 करोड़.", धर्मवीर सांगवान जी ने जेब से वो छोटी सी बोतल निकल कर एक घूँट ली और आँखे मूँद कर बैठ गए.

"मंजूर है. बचे हवाले कर दो पैसे मिल जायेंगे.", नरोत्तम दस ने हार मान ली थी इतनी बेइज्जती के बाद.

"पैसे दे दो बचे मिल जायेंगे. बहार मेरसेदेज़ खड़ी है, गोदाम यही है तुम्हारा और तिजोरी भी.", अब आँख खोल कर उन्होंने जो कहा तोह घनश्याम दस की भी अकड़ टूट गयी.

"तुम हो कौन बे. ज़िंदा नहीं बचोगे"

"हाँ पता है नहीं बचेंगे ज़िंदा. तुम्हारे बाप जो है वह बड़े भाई है हमारे और एक और बाप है तुम्हारा जो 3 मिनट बाद बेटे का भेजा उदा देगा.", धर्मवीर सांगवान की समय सीमा सुन्न कर तीनो की गांड फट चुकी थी.

"भरो रे पैसा बहार गाडी में. 30 का 40 दाल दो लेकिन काम न हो.", बंदूकधारी सभी लग गए थे पैसा उठाने और सांगवान जी बस अपने गाने गए रहे थे.

'चली तोह कबि न चली अब जब चलने लगी तोह रूकती नहीं. करू तोह क्या करू जब बीटा बाप बन गया..', 8 बोर पैसे के बहार लेके गए 16 आदमी और अंदर बचे सिर्फ 3.

"माँ चुड़ गयी बे तुम्हारी.", और इसके साथ हे तीन गोलिया बरसी बहार चलने वाली कई गोलियों के बाद. सांगवान जी फिर से वो छोटी सी बोतल पीते बहार निकले तोह उमेद खड़ा था दोनों हाथो में रिवॉल्वर लिए. शंकर ने भी जिम्मा संभल लिया था पूरा.

"चाल चलने में तुम्हारा बाप तुम्हारा बाप रहेगा शंकर. उमेद बीटा, अर्जुन को बोलना के हमको तोहफा पसंद आया. अपने बाप को भी सीखा दे जरा के इसके रिश्तेदार बहोत है जहा कम भी एक है.", सांगवान जी कार में बैठे तोह तीसों उन्हें प्यार करने लगा.

"बहनचोद गज्जू, ये क्या हथियार है तेरा? और साला इतना बड़ा नेटवर्क?"

"बोलै न भाई के वो दूसरा बाप है. वो पहले हे मुझे बता चूका था के तेरे को कुछ हुआ तोह वो फिर इतने नाम मिटाएगा जितने तू सोच नहीं सकता. सच बोलू तोह तू खुद हे याद कर के तूने उसको क्या सौंप दिया है जो उसने 10 मिनट में 4 लोग किडनैप कर लिए. यूनिवर्सिटी वाला तोह उसने किया बाकी सब?", उमेद की बात सुन्न कर अब शंकर को पसीने आ चुके थे.

"वह एक और चीज भी थी भाई."

"लता और रामेश्वर. ले मजे मेरे गज्जू. तू बुरा फंसा है और मैं इसलिए परेशां हु के तू फोटो गायब होने की बात कर रहा था लेकिन कुछ सोच कर तू अपने बाप और उस प्यार पर नजर रख रहा था. गेम ओवर."

"लता गलत नहीं है. और पापा भी."

"फैंसला समय पर छोड़ दे और वो पन्ना राख में भी चमक रहा था अर्जुन के हस्ताक्षर से. कड़ी जोड़ और सुलझा अपने आप. मैं साथ हु क्यूंकि मैं भी उतना हे जानता हु जितना तू. हाँ ऋचा के चक्कर में चंदरभान थोक दिया कल रात मैंने. साला बेटी पर हाथ दाल रहा था.", उमेद ने हवा हे बदल दी थी इस मामले के बाद. गाडी में 8 बोर पैसे पड़े थे लेकिन चेहरे पर दोनों के सोच. वही अर्जुन आराम से बैठा था संजीव भैया के साथ जहा 4 युवको का भेजा निर्मल सिंह खुद खोल चुके थे. रिपोर्ट तैयार थी, हमेशा की तरह. चाल चलने वाले सोचते रहे लेकिन जो बहार था वो इतने आराम से सब कर गया जिसका जवाब सामने वाला मांग भी न सकता था. शंकर ने फिर भी फ़ोन मिलाया बड़े सांगवान जी को.

"चाचा ये सब कैसे हुआ? आप इन्वॉल्व और वो भी इस हद तक?"

"तुझे कहा था शंकर, ये आएगा तब हमारे पास जवाब नहीं होगा. आज इसने मदद मांगी है क्योंकि तेरी परवाह है इसको. कल हथियार मैट उठाना, मेरा गाला पकड़ लेगा. उसको पता है के तू और मैं एक है. वो लड़का सब सेटिंग करे बैठा था बस हमारे हाथ मौत दी है उसने. चल कोई न, तुम चारो बूढ़े हो गए हो मुझे ये अकेला बहोत है. मरता भी नई और छोड़ता भी नई.", धर्मवीर जी ने इतना कहा तोह शंकर की सांस छूट गयी.

"बहनचोद गज्जू, ये मुझे बचने के साथ साथ सबके साथ खेल गया. अब मैं बांध गया हु तू समझ इस बात को."

"वो अपने बाप को घर ले जाने आया था शंकर. निराश मत करियो उसको. बाप कभी do-tarfa नहीं सोचता. तेरा बीटा तेरे साथ बहार आया था लेकिन अपने बाप को वापिस ले जाने. और खुद हे सोच कितनी म्हणत की होगी उसने क्योंकि वो अपनी माँ की आँखों में देख के हे आया होगा कुछ.", अब बरी शंकर की थी नजर झुकाने की. मतलब वो लड़का सचमुच अपने बाप को वापिस लेने आया था.

"गज्जू बाप तोह अब उसका घर हे जायेगा लेकिन ये साला खेल कोनसा खेलता है? यहाँ ये डर था के किसी एक के गोली लगेगी लेकिन वो बुद्धा अकेला 3 को पेल आया और बाकी सब वैसे हे मरने आ गए. इसके हाथ कहा तक है.?"

"तेरे मां भजन से लेके चची कौशल्या के बीच जो भी आता है वह तक. चल गांड मारा अपनी, गाली के बदले गाली और भाभी से कही दूर दिखा तोह सोच लियो.", उमेद घर के बहार हे शंकर को उतार कर जा चूका था. शंकर तोह अभी तक सदमे में था के जो काण्ड इतना बड़ा था वह ऐसे कैसे हल हो गया. चाल खेलने वाला सचमुच एक राजा हे था, जिसको हर दिशा का पता था. इतनी गहरी चाल भोले कहा समझ सकता है.
 
थे दो कॉल उस माउंटेन कपल्स. आग लगा देते है भाई स्पीति हो या खारदुंगला पास. ?
 
गूडनिघत भाई लोगो. चलते है फिर मिलेंगे
 
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