Incest Pyaar - 100 Baar - Page 32 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 159

नया रूप (1)


"तुम्हे पता भी है तुम्हारी एक नादानी की वजह से आज तुम्हारे साथ क्या हो सकता था?", मंजू के मुँह पर पानी मारने के बावजूद उसको होश 20-25 मिनट बाद आया. कुछ पल आँखें बस धुंदला सा देख प् रही थी और अलका ने जब गीले रुमाल से उसका चेहरा फिर से साफ़ किया तोह मंजू को अपनी स्थिति का भान हुआ. सर हल्का सा भारी हो रहा था और उसकी बगल में अलका बड़े प्यार से उसको हे निहार रही थी. अर्जुन के शब्दों से वो एक पल खामोश डिकी और उसके बाद जहर जहर उसकी आँखों से आंसू बह निकले.

"शांत हो जाओ, मंजू.. शांत. जब तक अर्जुन है, तब तक तुम्हारे साथ कुछ भी बुरा नहीं हो सकता. भगवन भी नहीं चाहता की तुम्हे कोई दुःख मिले. अब रोना बंद करो और अर्जुन को बताओ ये सब हुआ कैसे.", अलका ने के बार फिर से मंजू का चेहरा साफ़ किया और पानी की बोतल होंठो से लगा दी. कुछ समय लगा मंजू को सहज होने में और फिर बड़ी मुश्किल से उसने बोलै शुरू किया.

"वो मेनका दीदी आज स्कूटी से गयी थी सेण्टर क्योंकि कार का टायर पंक्चर था. उन्होंने मुझे कहा भी था की वो मुझे तुम्हारे घर छोड़ देती है लेकिन मैंने सोचा सरदार जी के गैराज फ़ोन करके पहले कार बनवा लू. फिर प्रीती या ऋतू को बुला लुंगी साथ ले जाने के लिए. गैराज फ़ोन किया तोह अंकल जी ने भी कहा के वो 15 मिनट में लड़का भेज देंगे. 10 मिनट बाद 2 लोग आये जब घर की बेल्ल बजने पर मैंने गेट खोल कर देखा. मुझे लगा वो लोग गैराज से होंगे और मैंने उन्हें कार का टायर बदलने का बोल दिया. जब एक ने पानी के लिए कहा तोह मैं बस वापिस जाने के लिए मुड़ी हे थी और फिर कुछ याद नहीं.", मंजू की आँखें एक बार फिर नम्म होने लगी तोह अलका ने उसको अपने सीने से लगा लिया. अर्जुन भी ऐसा करना चाहता था लेकिन फिलहाल कुछ और ज्यादा जरुरी था उसके लिए.

"वैसे एक बात तोह बताओ मंजू, क्या हमारे घर से पापा या चाचा तुमसे मिलने आये थे क्या पिछले 2-3 दिन में?", अर्जुन को कुछ खटक रहा था और वो संतुष्ट नहीं था आज जो भी हुआ उस घटनाक्रम से. मंजुए ने उसकी तरफ देखते हुए स्वाभाविक तरीके से हाँ में गर्दन हिला दी.

"वो मौसी (रेखा) ने नरिंदर अंकल के हाथ कपडे भिजवाए थे वह मंदिर जाने के लिए. तुम शायद उस वक़्त घर नहीं थे और अंकल के साथ कोई विनोद अंकल भी आये थे. परोसो से पहले वाले दिन शाम की बात है ये. तुम्हे क्या उन अंकल पर शक है अर्जुन? वैसे भी वो पहले तोह अजीब तरह से देख रहे थे मुझे.", मंजू ने जैसा देखा वही बयान कर दिया था और अर्जुन फिर से सोच में पड़ गया. उसको ये बात हजम नहीं हो रही थी की उन्होंने मंजू को हे क्यों चुना? हाँ इसका घर यहाँ सुनसान सेक्टर में है और गली में मुश्किल से 4 हे घर बने हुए था और सबसे पहले वाला ये घर होने से इस काम को अंजाम देना इतना मुश्किल भी नहीं था पेशवर व्यक्ति के लिए.

"पहले देख रहे थे से क्या मतलब? बाद में क्या बात हुई थी और क्या चाचा अंदर भी आये थे घर में?", अर्जुन अपने चाचा को ाचे से जानता था की वो बचो से एक सामान प्यार करते है और मंजू से उनका सिर्फ एक रिश्ता तोह था नहीं.

"मेनका दीदी ने जिद्द करके उन्हें शरबत के लिए अंदर बुला लिया था क्यूंकि पिछली बार वो आरती को बहार से हे छोड़ कर चले गए थे. नरिंदर अंकल ने दीदी का परिचय अपनी छोटी बहिन के तौर पर दिया था और मेरा कुछ अलग.", मंजू भी कहते कहते कुछ सोचने लगी थी.

"क्या रिश्ता बताया उन्होंने?"

"पहले तोह यही कहा के ये मेरे लिए बिलकुल Aarti-Ritu जैसी है. फिर कहा के मैं राजेश मां की बिज़नेस पार्टनर हु और दलीप सिंह की बेटी. उसके बाद दूसरे अंकल ने मुझे उस नजर से नहीं देखा था जिस तरह वो गेट पर घूर रहे थे. बस कुछ पढाई और मेनका दीदी की बारे में बात की. घर पे और कौन रहता है जैसी नार्मल बात."

"धत्त तेरे की. ये नार्मल बात लगती है तुम्हे की एक आदमी तुम्हारी दिनचर्या के बारे में पहली मुलाकात में हे पूछ रहा है. मतलब उसको ये भी मालूम हो गया होगा की मेनका किस टाइम सेण्टर पर जाती है और कैसे जाती है. वो स्कूटी से गयी तोह समझ लो वो बच गयी मंजू. क्योंकि जिस तरह से तुम्हारा किडनैप किया गया है इसका मतलब है तुम पर कल से हे नजर राखी जा रही थी. हो सकता है वो तुम्हारे साथ मेनका को भी किडनैप कर लेते अगर उन्हें उस से प्रॉब्लम होने लगती. लेकिन वो निकल गयी तोह उनके लिए तुम्हे काबू करना कोई बड़ी बात नहीं थी. उनकी जगह मैं होता तोह कार के शीशे भी उसके रंग की तरह काले उसे करता. वैसे भी मुझे तुम दिखाई नहीं दी थी बस वो पाँव दिखे जिन्हे बाँध रखा था और उस कार का इतनी तेज स्पीड पर चलना. अब तुम ये बात किसी ने नहीं कहोगी, किसी से भी मतलब ऋतू दीदी से भी नहीं. अलका दीदी, जरा इसको गेट तक छोड़ देना. मंजू, शादी तक अबसे पूरा दिन तुम यही रहोगी और रात में वह पर कोई भी 2 बहने तुम्हारे साथ रहा करेंगी. छोटी सी भी बात को अनदेखा किया तोह सोच लेना.", अर्जुन ने जिस तरह से हिदायते देने के बाद घुड़की दी थी, पहली बार मंजू के चेहरे पर शर्म और मुस्कराहट डिकी. अलका ने सहारा देते हुए कार से निकलने में मदद की तोह मंजू ने हाँ में सर हिलाया.

"अलका, मैं चली जाउंगी. शायद तुम दोनों मार्किट के लिए निकले होंगे और मेरी वजह से देरी हो गयी.", मंजू अब बेहतर थी और उसकी बात सुन्न कर अलका मुस्कुराती हुई उसको हाथ हिला कर वापिस कार की अगली सीट पर जा बैठी. इस बीच कोई और भी था जिसने इन दोनों को ऊपर वाले कमरे से देख लिया जाते हुए.

"तोह अब क्या इरादा है मेरे मजनू?", अलका ने अर्जुन का मैं हल्का करने के इरादे से ऐसा कहा तोह अब तक अर्जुन भी बेहतर हो चूका था. उसके चेहरे पर फिर वही मुस्कराहट छा गयी.

"मंजू हमारे घर, सेण्टर के बाद मेनका भी इधर तोह हम दोनों उनके घर. समझ लो किडनैप की गहरी छानबीन करनी है.", अर्जुन के 'गहरी छानबीन' का मतलब अलका ाचे से समझ रही थी. कार को दूसरे रस्ते से घूमते हुए अर्जुन अपनी मंजिल की तरफ बढ़ चला. बबिता के साथ रात को तगड़ा मिलान करने के बावजूद उसको सुकून न था और अलका की तोह चाहत हे यही रहती थी की कब वो कुछ पल एकांत के अपने इस आशिक़ के साथ गुजरे.

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"अब सब फाइनल है तोह तुम परेशां क्यों हो विनोद? वैसे भी वो लोग मेरे भी साले हे हैं जैसे तुम तोह रिश्ते का वजन भारी रहेगा हे.", आँखों पर नजर का चस्मा लगाए ये अधेड़ व्यक्ति पूरा घाघ जान पड़ता था. विनोद अभी अपने इस बड़े जीजा के साथ उसके हे दफ्तर में बैठा था और मेज पर कुछ कागजो के साथ साथ जमीन के दस्तावेज रखे थे.

"जीजा ऐसा है की पैसे तोह हम 20 करोड़ लगा हे रहे है लेकिन राजेश जो है वो थोड़ा सनकी आदमी है. उसके साथ दलीप भी होगा जो बिलकुल उसके जैसा हे है और कही आपकी 51% वाली बात पर मसला न हो जाये. बात तोह आपकी ठीक है की हमारा कद्द एक इंच ऊपर हे रहना चाहिए लेकिन गरमा गर्मी न हो जाए. वैसे भी वो 2 लड़कियों वाले मामले में मुझे धमकी दे चूका है और यहाँ शर्त भी यही राखी है की मेरा भविष्य में किसी भी लड़की से चक्कर सुन्न ने में नहीं आना चाहिए.", विनोद ने अपनी परेशानी की वजह बताई तोह पप शर्मा भी एक पल को सोचने का नाटक करने लगा.

"हँ.. तोह तुम क्या चाहते हो वो बताओ?"

"मैं.. मैं सोच रहा था के जब जमीन पर परमिशन मिल जाए तोह हम होटल पर पूरा अधिकार हे कर ले.", विनोद ने अपनी गन्दी मंशा बताई तोह पप शर्मा के चेहरे पर भी कुटिल मुस्कान आ गयी.

"हाहाहा.. मतलब तुम अपने हे बड़े भाई के साथ देगा करने की सोच रहे हो?"

"न जीजा न. ऐसा मैं थोड़ी न करूँगा. ये होगा इक़बाल भाई की मदद से और इसमें शंकर का क्या लेना देना जब वो व्यापारी आदमी हे नहीं. उसको तोह अपने काम से मतलब है. यहाँ डील राजेश और हमारे बीच में होने वाली है. वो लोग यहाँ आएंगे तोह सबसे पहले उन्हें अपनी राजनीतिक और दहशतगर्दी वाली ताक़त बिना ज्यादा कुछ कहे दिखानी है. वैसे भी वो लोग इस जगह आ रहे है और मैं तोह एक तरह से मध्यस्थ वाली भूमिका में हु. पहले हमारा लोकल रुतबा दिखेगा और फिर कॉन्ट्रैक्ट सिग्न होगा."

"तुम क्या सोच कर बैठे हो विनोद? पूरी बात बताओ मुझे क्योंकि ऐसा लग रहा है जैसे तुम उन्हें किसी और तरह भी दबाने वाले हो.", शर्मा घाघ होने के साथ कुछ समझदार भी था या फिर वो अपने साले को ाचे से समझता था.

"ऐसा है जीजा की एक बार डील फाइनल हो जाये कल, फिर उसके बाद इक़बाल भाई राजेश और दलीप से नया करार करेंगे. मैं भी जानता हु की आपको भी अब इक़बाल से छुटकारा चाहिए लेकिन काम ऐसे होगा की इक़बाल भाई भी रस्ते से हट जायेगा और राजेश ये 5 सितारा होटल भी हमको चुपचाप सौंप देगा.", विनोद की इतनी खतरनाक बात सुन्न कर शर्मा ने कांच वाला दरवाजा चाबी से बंद करने के बाद आधी बोतल पानी की एक सांस में जातक ली.

"बहनचोद तू आग से खेलने की बात कर रहा है. इक़बाल चुटिया नहीं है के वो कुछ टट्टू से व्यापारियों के हाथो चढ़ जाए. मान लिया की मेरे लिए भी ये साला बवासीर हो चूका है पर हम इस से छुटकारा नहीं पा सकते. वो हमारी सुरक्षा संभालता है विनोद और हर आपराधिक काम को अपने ऊपर लेता है. ये होटल जमीन से हमको घंटा मुनाफा नहीं होता अगर इक़बाल नशे और jism-faroshi के काम में हमारा संरक्षक नहीं हो. हाँ अब उस कमीने को 40% देना मुझे भी अखरता है पर हम दोनों के लिए 60% बहोत है."

"अब हमको उसकी जरुरत नहीं रहेगा जीजा. मेरे पास अब अपने हे लोग है जो सुरक्षा भी देंगे और कमीशन भी 10%. आप नशा सम्भालो और मैं ये लड़कियां देखूंगा. राजेश की बिज़नेस पार्टनर जो दलीप की बेटी भी है वो अब मेरे कब्जे में है और अगले 1 महीने तक इस बात की खबर किसी को नहीं होगी. आपने भी जुबान खोली तोह..", विनोद ने अपने बड़े जीजा को हे साफ़ साफ़ धमकी दे दी थी मंजू के बारे में अगर उसने मुँह खोला तोह.

"बहनचोद, सही बता क्या करने वाला है तू?"

"गिल हमारे लिए काम करने को तैयार है जीजा. कल मीटिंग में कैसे भी करके बस हमको ऐसा दिखाना है के लड़कियों वाला धंदा इक़बाल संभालता है. उधर वो लड़की गायब है इसका जीकर नहीं करना फ़िलहाल. फिर कुछ सबूत इक़बाल के पास चिपकाने है और एक फ़ोन इक़बाल के अंदाज में राजेश और दलीप के पास जाएगा. होटल में राजेश वाला हिस्सा इक़बाल के नाम और बदले में वो उनकी बेटी वापिस कर देगा. अब 2 ताक़तवर लोगो में घमासान होगा तोह एक का मरना निश्चित है. इक़बाल मारा गया तोह वैसे भी हमको 30% का मुनाफा हे होगा और बच भी गया तोह लड़की उसके फार्महाउस से बरामद होगी जिधर मैं खुद पुलिस भिजवाऊंगा. ऐसा करने से होटल का 51 की जगह 100 हे अपना समझो. मतलब मैं मेरे बड़े भाई और राजेश की नजर में बिलकुल साफ़ और उनका अपना हो जाऊंगा. थोड़ा तुम भी ड्रामा कर देना की इक़बाल की ताक़त की वजह से हम उस से डब्ब के रहते थे और उसके इरादे ऐसे होंगे ये हमको भी मालूम न था. जब पता लगा तोह खुद पुलिस बुलवा दी.", विनोद की बातें सुन्न कर शर्मा का तोह दिमाग हे चक्र गया था. वो तोह खुद को सबसे अकल्मन्द समझता था लेकिन एक मूरख को maha-murakh के रूप में अपने से बड़ा बुद्धिमान दिख जाये तोह ये कोई बड़ी बात हे नहीं.

सच तोह ये था की विनोद के पतन की तारीख तोह खुद उसने तये कर ली थी ये होटल वाला सौदा मंजूर करते हे. जो लोग उसके पास कल आने वाले थे वो इन सभी को ठिकाने लगाने के मकसद से हे आ रहे थे जिसकी वजह jism-faroshi, गाँव की भोली लड़कियों का शोषण और hotel-farm पर पार्टी की आड़ में नशे की महफिले करवाने जैसे इनके घिनोने काम था. मंजू पर भी समय से पहले हे हाथ दाल कर विनोद ने अपनी maha-moorakhta का साफ़ प्रदर्शन किया था और उन्हें इसकी भनक तक न थी की आगे उनके साथ क्या होने वाला है और कौन कौन इनके साथ क्या क्या करेगा.

"दिमाग तोह सही लगाया है तुमने विनोद और निश्चिंत रहो मैं तोह तुम्हे अपना सबकुछ मानता हु. जो भी कर रहे हो वो हम दोनों के लिए हे कर रहे हो तोह मैं पीछे नहीं हटूंगा. वैसे रमन (विनोद का दूसरा जीजा) के लिए भी कुछ सोचो. बेचारा कब तक मैनेजर जैसी ज़िन्दगी जीता रहेगा? मेरा ऑफर तोह वो मान नहीं रहा, तुम बात करके देखो.", शर्मा ने माहौल को हल्का करने के अंदाज में ऐसा कहा था और विनोद उठ खड़ा हुआ.

"चलो पहले आप लंच करवा दो जरा दीदी के हाथो का बना गरमा गरम. फिर रमन जीजा को भी कुछ ढंग का काम देते है. वैसे भी रौशनी (रमन की बीवी) दीदी से ज्यादा चिंता मुझे अंजलि (विनोद की भांजी) बिटिया की रहती है. वैसे अभी घर पे कौन कौन होगा?", विनोद के साथ हे पप शर्मा भी उठ कर दफ्तर से बहार आ गया. एक बार फिर से दरवाजे पर टाला लगाने के बाद दोनों बगल वाले घर की तरफ बढ़ चले.

"तेरी दीदी का तोह मैं क्या हे कहु विनोद. वो और उसके saas-bahu वाले ड्रामा हे चलते रहते है 24 घंटे. हाँ आँचल (पप शर्मा की बेटी) के लिए रिश्ता ढून्ढ रहे है अब और तेरी नजर में कोई ढंग का कारोबारी लड़का हो तोह मां होने का फ़र्ज़ निभाओ.", पप शर्मा के भी सिर्फ एक हे औलाद थी जो बा करने के बाद अब कंप्यूटर का कोर्स कर रही थी. 23 साल की आँचल पंजाब में पाली बढ़ी होने से एक गदराई हुई tej-tarraar लड़की थी. दोनों जीजा साला घर में दाखिल हुए तोह उम्मीद की मुताबिक रौशनी शर्मा हॉल में सोफे पर बैठी टेलीविज़न पर अपनी पसंद का कार्यक्रम देख रही थी. 45 साल की दामिनी भी मांसल शरीर की मालकिन थी. सीना कही से भी 40-42 से काम न होगा और उतना हे जानलेवा भरी भरकम पिछवाड़ा. ज्यादा काम न करने की वजह से हल्का उभरा पेट भी इस औरत पर जंचता था.

"अरे, तू कब आया बिनोदि? आ बैठ यहाँ मेरे पास और जी आप अगर इसके साथ हे थे तोह बता नहीं सकते थे की ये भी आ रहा है.? मैं मेरे लाडले के लिए खीर हे बना देती.", विनोद को अपने गले से लगते हुए दामिनी ने शिकायती लहजे में कहा तोह सिंगल सोफे पर बैठते हुए शर्मा ने हँसते हुए जवाब दिया.

"भगवान, आखिरी बार रसोई में कब गयी थी तुम्हे याद भी है? वैसे हम दोनों ने हे बहार जाना था लेकिन पार्टी का फ़ोन नहीं आया इसलिए घर चले आये खाना खाने. तैयार है या समय लगेगा?"

"नमस्ते मां. ये लीजिये पानी और पापा खाना तैयार है आप लोग टेबल पर बैठिये मैं लगवाती हु.", आँचल ट्रे में पानी लिए अपने मां के सामने थोड़ा झुकी तोह बिना दुपट्टे के उसके कमीज से झांकते उन दूधिया उभारो की गहरी घाटी विनोद को ाचे से दिखी. बगल में बैठी दामिनी ने ये भांप लिया लेकिन फ़िलहाल कुछ न कहा क्यूंकि बेटी को तोह मां के इरादों का पता भी न था.

"जाओ जी आप हाथ मुँह धो लो.", दामिनी ने अपनी बेटी के जाते हे अपने पति से कहा तोह शर्मा अंदर की तरफ चल दिया. उसके कमरे में हे बाथरूम था और उसके जाते हे दामिनी ने दबी हुई आवाज में विनोद को लताड़ा.

"मां है तू उसका लेकिन शायद तू हर जवान लड़की को देख कर रिश्ते भूल जाता है.", विनोद के चेहरे पर पहले तोह थोड़ी शर्मिंदगी सी आयी लेकिन तुरंत बड़ी ढिठाई से बोल उठा.

"दीदी, मां हु इसलिए तोह सिर्फ देख रहा था. आप तोह जीजा से ब्याही होते हुए भी इक़बाल का हर तीसरे दिन लेती हो. देख लेना जितनी जवानी आँचल पर आ रही है न तोह हफ्ते महीने में ये किसी न किसी के बिस्टेर पर मिलने वाली है. मैंने भी सुना था वह फार्महाउस पर जब इक़बाल ने आपने आँचल की दिलवाने के बदले डायमंड का हार देने का ऑफर दिया था. उसको तोह आपने कहा था के सोच कर बताउंगी.", विनोद द्वारा अपना हे cheer-haran होते देख दामिनी ने पैंतरा बदला.

"तेरे जीजा यही थे विनोद और आँचल ऐसी वैसी नहीं है. इक़बाल के कहने के बाद जब मैंने इसके सामने उसकी कुछ तारीफ करनी शुरू की तोह जानता है इसने क्या किया?", दामिनी ने सही किया था शिक्षिका की नौकरी छोड़ कर. ऐसी निर्लज्ज कोई महिला शिक्षिका हो भी कैसे सकती है.

"क्या किया था जरा मैं भी तोह सुनु? वैसे मुझे तोह लगा था के आपने अब तक इसका टांका खुलवा दिया होगा.", दोनों को पता था के आँचल को अभी कुछ टाइम और लगेगा इतने लोगो के लिए खाना परोसने में क्योंकि वो अभी भी रसोई में रोटी बना रही थी.

"मेरे मुँह पर पांचो उंगलियां छाप दी थी इसने और बोलै के अगर खुद रंडी हु तोह इसका मतलब ये नहीं की सभी मेरी जैसी होंगी. वो दिन है और आज का दिन, हमारी ठीक से बात न हुई. इसने तोह यहाँ तक कह दिया के इसको मेरे और शंकर के बारे में भी मालूम है. बस इसलिए तुझे रोक रही थी.", दामिनी कुछ खामोश हुई तोह विनोद सोच में पड़ गया.

"ये जीजा की बेटी नहीं है न? झूठ मैट बोलना दीदी, ब्याह से पहले से हे शंकर भैया तुम्हारी ले रहे थे? बाबू (निकेतन) के नामकरण के समय भी तुम चारे वाले कमरे में थी शंकर भैया के साथ, मैंने खुद देखा था तुम्हे.", विनोद के स्वर में इतनी नाराजगी देख दामिनी ने पलके झपका दी.

"हाँ. उसने मुझे गोपाल के साथ देख लिया था जब मैं पहली बार शादी से पहले इस चक्कर में पड़ी थी. गोपाल तोह किसी की आवाज से डर कर भाग गया था लेकिन शंकर ने मेरा चेहरा देखे बिना हे मुझे पेल दिया था. उसके बाद हम दोनों की मर्जी से ये सब एक महीने तक चलता रहा. फिर शादी हो गयी और 8 महीने बाद आँचल.", दामिनी के इतने बड़े खुलासे से विनोद की झांटे सुलग गयी. वो हैरत से अपनी बड़ी बहिन को बस घूरे जा रहा था. खुल कर कुछ बोल नहीं सकता था क्योंकि घर में जीजा और भांजी मौजूद थे. इतने में हे फ़ोन की घंटी ghan-ghanai तोह अंदर वाले कमरे में मौजूद पप शर्मा ने हे बात की.

"आँचल, तुम्हारे सेण्टर से फ़ोन था मैडम का. वो तुम्हारा कोई टेस्ट है 2 बजे आज.", शर्मा ने कपडे बदल लिए थे और जैसे हे अपनी बेटी को ये सुचना दी वो भी रसोई से तुरंत बहार निकल आयी.

"एक काम कीजिये पापा, मैं 2 मिनट में हे कपडे बदल कर आती हु आप प्लीज मुझे सेण्टर छोड़ दीजिये.", आँचल ने जाने से पहले टेबल पर खाने का सामान परोस दिया था और शर्मा ने भी बिना किसी hil-hujjat के अपनी प्लेट में 2 रोटी और सब्जी रखने के साथ निगलना शुरू कर दिया. ये दोनों bhai-behan दिखने के लिए इधर उधर की बातें कर रहे थे पर विनोद का आज मौका मिल चूका था अपनी बहिन से खुल कर बात करने का. अगले 10 मिनट में हे घर में बस यही दोनों बचे थे. जाने से पहले शर्मा ने बता दिया था के उसको भी कचहरी में कुछ काम है तोह वो आँचल को अपने साथ हे लेता आएगा.

"आपने ऐसा क्यों किया दीदी? और वो शंकर भैया बड़ी दलीले देते है परिवार और िज्जात्त की लेकिन उन्होंने अपनी हे बहिन के साथ ये सब कर डाला.? एक तरह तोह आँचल का जीकर करने पर आप मुझे रिश्ते की दुहाई दे रही थी और इतने सालो से आपका खुद का चक्कर अपने भाई से चल रहा है. मान लिया इक़बाल के साथ आपका जिस्मानी सम्बन्ध जीजा की कमजोरी या किसी और वजह से हो पर ये सब करके आपने ठीक नहीं किया.", विनोद भड़क रहा था.

"मुँह मैट खुलवा तू मेरा विनोद. जानबूझ कर जो तू मेरे सोये होने पर वो सब हरकते करता था क्या मुझे पता नहीं चलता था? रौशनी के साथ तोह तू इतना आगे बढ़ गया था की उस दिन पापा खेत से वापिस न आये होते तोह तू तोह चढ़ हे गया था उसके ऊपर. कितनी लड़कियों के साथ तूने वहशीपना किया क्या मुझे खबर नहीं.? शंकर ने जो किया था वो एक लड़की के साथ उसकी मर्जी से किया और जब चेहरे देखा तोह वो शर्मिंदा था. लेकिन उसकी मर्दानगी की वजह से मैंने हे रिश्ता आगे बरकरार रखा. और तू ये कमजोर लड़कियों के साथ हे ऐसा क्यों करता है पता है? तू औरत को ठंडा हे नहीं कर सकता इसलिए बस गाँव की भोली भली लड़कियों को ताक़त से दबाया और अपनी हवस पूरी करके निकल लिया अपने रास्ते. एक औरत बता जो तेरी दीवानी हो? जो खुद से कहे के विनोद तू सच्चा मर्द है?", दामिनी के इस तरह भड़कने से विनोद बगले झाँकने लगा. वो अवसादग्रस्त ऐसा भेड़िया था जो सिर्फ लड़की के कौमार्य भेदन से हे खुश होता था. शायद उनकी तकलीफ देख वो अपनी तकलीफ काम करने वाला दरिंदा था.

रौशनी दीदी वाली बात अलग है लेकिन आपने ठीक नहीं किया."

"हाँ मैंने नहीं किया ठीक और अब कुछ हो भी नहीं सकता. मैं कुछ बदल नहीं सकती और न मैं चाहती हु के ऐसा कुछ हो.", दोनों का हे खाना ठंडा हो रहा था लेकिन अब भूख बची हे नहीं थी. दामिनी को अपने भाई की हैवानियत और कुकर्मो पर गुस्सा था और विनोद व्यथित था की उसकी बहिन सामने से खुद शंकर के साथ रिश्ता बनाने की हामी भर चुकी थी.

"ठीक है फिर अगर ऐसा है तोह हम तीनो हे गलत हुए. लेकिन शंकर भैया ने आपसे सम्बन्ध बनाये तोह इसका खामियाजा उन्हें भी भुगतना होगा. मैं आँचल को भी अपने बिस्टेर पर लाऊंगा और उनकी होनेवाली बहु को भी. इस बार कोई जबरदस्ती नहीं करूँगा लेकिन ये दोनों लड़कियां ऐसा करने पर मजबूर हो जाएँगी. देखती रहना बस आप.", कहने को तोह विनोद गुस्से में इतनी बड़ी बात कह गया लेकिन दामिनी दांत निकाल कर हंसने लगी अपने भाई की बात सुन्न कर.

"तेरी बीवी कहा बिनोदिये? रही बात आँचल की तोह वो तेरे हाथ आने नहीं वाली और शंकर भैया की बहु तक पहुंचने के लिए तुझे ताऊजी से हो कर गुजरना होगा. पहले तोह खेतो से घर तक तुझे छड़ी से लाल करते लाये थे और इस बार कोई गलती की तोह उनके शहर से हमारा शहर बहोत दूर है. रस्ते में हे दम टॉड देगा. अपनी बीवी की चिंता कर जिसको माँ बनाने में हे तुझे 5 साल लग गए और अगर वो वह किसी मर्द के निचे आ गयी तोह 9 महीने बाद तू फिर से बाप बन्न जायेगा.", दामिनी ने अपने भरी कूल्हे सोफे से उठाते हुए टेबल का रुख किया और विनोद गुस्से से भरा बिना आगे कोई बात किये घर से निकल चला. उसकी बड़ी बहिन ने जिस तरह उसकी बेइज्जत्ती की थी उस से विनोद के आत्मसम्मान को गहरी ठेस लगी थी. अपने गुस्से को वो सिर्फ दारु या लड़की से हे ठंडा कर सकता था लेकिन आज कोई शिकार न था इसलिए होटल में शराब का सहारा हे मुमकिन लगा.

'माँ की छूट इन सबकी. साले सभी की गांड फाड़ूंगा और ये देखते रह जाएंगे इनके साथ हुआ क्या. पहले तोह साली वो कुटिया छुड़ेगी कल रात. दलीप की लोंड़िया से ले कर शंकर की हर बेटी की छूट न सड़क पर नीलाम की तोह मैं भी अपने बाप का नहीं.', विनोद बड़बड़ाता हुआ कार में होटल की तरफ निकल लिया. उसको शायद अंदाजा भी नहीं था के आने वाले 2 दिन में उसके साथ क्या कुछ होने वाला है. शायद उसको अपने असली बाप का नाम भी पता चल जाए.

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मंजूबाला के घर में तोह साड़ी दुनिया से कुछ अलग हे खेल जारी थी इस समय पर. हलकी फुलकी chhed-chhaad जो बहार हॉल से शुरू हुई थी, जल्द हे घेरि होने लगी. अलका को सुडोल लम्बी टांगो को ठीक कूल्हों के निचे से बाहों के घेरे में लेते हुए अर्जुन मेनका के कमरे में आ रुका. उसका चेहरा अलका के लाल कैसे हुए कमीज के ऊपर उन मॉटे उभारो के बीच दबा गरम सांसें छोड़ रहा था.

"उम्म्म्म.. बेदर्दी कितना तड़पते हो अपनी लवर को? आठ.. आज देखो मैं तुम्हारी क्या हालत करने वाली हु.", अलका ने बिस्टेर पर गिरने के साथ हे अर्जुन को भी अपने ऊपर खींच लिया. लम्बे बालो में बंधा लाल रबर तोह बहार टेबल पर हे उतार फेंका था अर्जुन ने. अलका के कमर से निचे तक लम्बे बाल बिस्टेर पर उसके निचे फैले अलग हे आभा प्रकट कर रहे थे. उन गहरी आँखों के सामने चेहरे किये अर्जुन बड़े ध्यान से अलका की शिकायत उसके चेहरे से पढ़ रहा था.

एक लमस सी उन गुलाबी होंठो पर थी और दीवानगी उन आँखों में जो अर्जुन को अपना खाविंद तक मान कर उसपे खुद को निसार कर चुकी थी. अर्जुन इस ख़ूबसूरती के जादू से बहार निकलता उस से पहले हे अलका का जादू उस पर गहरा हो गया. आज अर्जुन के साथ उलटी गंगा बही थी और उसको खुद मालूम न चला के वो कब बिस्टेर पर पीठ के बल आ लेता. मजे की इन्तहा से आँखें बंद होती चली गयी जब अलका के होंठो ने अपना रास अर्जुन को पिलाना शुरू किया. रेशमी कमीज के दोनों तरफ अलका की कमर मजबूती से थामे वो बस दुनिया के अंतत तक इस लम्हे में रहने को तैयार लगा. ये शुरुआत से गहरा चुम्बन अब कही ज्यादा हे गहरा और उत्तेजक होने लगा. दोनों हाथ से अर्जुन का चेहरा पकडे हुए अलका उस पर हावी होती जा रही थी. आज जैसे अर्जुन तड़पती प्रेमिका और उस से कही ज्यादा भूखा प्रेमी अलका थी.

"उफ़.. मारने का इरादा है क्या जान? आह्हः..", अर्जुन के निचले होंठ पर अलका की मीठी लार के साथ खुद उसका खून उभर आया था लेकिन तगड़े नशे में प्रतीत होती अलका जैसे इस लहू को देख अलग हे जोश से भर उठी. अपने होंठो पर जीभ फिरती हुई वो एक बार फिर से अर्जुन के होंठो पर टूट पड़ी. बस इस बार वो जानवर की जगह बेहद उत्तेजक अंदाज में उसके होंठो पर जीभ फिरती, कभी मुँह में अपनी जीभ की नोक घुमा कर उसके दांतो से जुंग लड़ती हुई आखिर में जैसे अर्जुन को ऑक्सीजन हे देने लगी. अर्जुन इतना मादक चुम्बन सेहन न कर सका और उस लाल कमीज को झटके से ऊपर की तरफ खींच दिया.

"आठ.. लाख कोशिश कर लो बच्चू, आज नहीं बचने वाले. ये सूट जोर से नहीं दिमाग से खुलेगा. जानवर कही के.", अलका खुद उसके सीने से ऊपर होती हुई अपने कढ़ाईदार लाल कमीज की चैन पीछे से खोल कर थोड़ी मेहनत से जिस्म का ऊपर हिस्सा नुमाया करती हुई अर्जुन को जैसे परेशान कर रही थी. निचे सिर्फ लाल ब्रा में क़ैद उसके वो ख़ास उभार जिन पर अलका ने खासी म्हणत की थी, अलग हे केहर बरपा रहे थे. सीने से निचे बिलकुल अंदर की तरफ धंसा गोरा सुत्वा पेट और वो 26-27 की कमर. अर्जुन के पास कोई अल्फाज न था इस तराशे हुए जिस्म के लिए.

"ओह अलका.. तुम सचमुच जानलेवा हो. इतना भी कोई खुद को कैसे निखार सकता है?", अर्जुन ने लरजते हाथों से उसके चिकने पेट को सहलाते हुए हाथ ऊपर ले जा कर जैसे हे एक उभर को पकड़ा, ब्रा उसके पंजे में आ गयी. अलका पीछे से हुक खोल चुकी थी और अब मंजर और भी dil-faroz था. सच्चे मोटी से अकार के दोनों गुलाबी निप्पल अकड़ कर सीधे खड़े थे. गोर वक्षो पर आया गुलाबीपन स्वाभाविक शरीर गुणवत्ता नुकमाया करता लगा.

"इसशहहह.. इसको निखारने वाला हे ये सवाल कर रहा है? उम्.. बस अभी तुम इन्हे कुछ नहीं करोगे ारु, जो करुँगी वो मैं.", अर्जुन का हाथ अपने मॉटे चुके से हटा कर अलका बिस्टेर पर एक तरफ पलट गयी. अर्जुन के जिस्म पर फांसी टीशर्ट निकालने के साथ हे अलका ने बेल्ट और चैन खोलकर जीन्स भी निचे सरकाई तोह अंडरवियर से 3 इंच बहार निकला वो दहकता सूपड़ा देख बिल्ली सी झपटी.

"उफ़.. आराम से..", अलका का ये रूप देख अर्जुन उठना चाहता था लेकिन एक हाथ के लम्बे नाखून उसके सीने पर दबाव बनाते हुए उसको वापिस लेटने पर मजबूर कर गए. अलका एक हाथ से वो छोटा सा निप्पल कुरेदने के साथ दूसरे में अब वो पूरा 9 इंच का बांस सा मोटा औजार निपुणता से थामे थे. उसकी मजबूत पकड़ बता रही थी की आज अर्जुन ने जो कहा था वैसा अलका हे उसके साथ करने वाली थी. बाजी पलट कर इतना तोह साबित कर हे दिया था के अब तक अर्जुन अपने चाहने वाली का ये रूप देख न पाया था.

"पहले भी तरय किया था लेकिन सॉरी तब साथ न दे सकीय थी. आज कोई शिकायत नहीं होने दूंगी तुम्हे और न इसको जो अपने आपको जाने क्या समझता है. देखो अब कैसे मासूम बना हुआ है और जब आजाद होता है तोह ये तक नहीं देखता के सामने वाला दर्द में है या मजे में.", अलका अर्जुन के लुंड से बातें करती हुई उसके सुपडे पर तर्जनी ऊँगली के नाखून से हलकी रगड़ देने लगी. ये बिलकुल नया एहसास था उसके लिए और मजे से अर्जुन की सिसकारी छूट गयी. लुंड जैसे फटने की हालत में होता हुआ अपने प्रचंड रूप में आया और कुछ समझने से पहले आधा हिस्सा अलका के गरम और गीले मुँह में उतर गया.

"उफ़.. अलका...", अर्जुन के पेट की सभी मांसपेशिया जकड सी गयी थी. मुखमैथुन और वो भी इतने बड़े लुंड का अभी तक कोई भी पूरी तरह न कर पायी थी. अलका का आज वाला अंदाज सबसे अलग था. वो इस तरह से उसके ऊपर झुकी थी जिस से मुँह और गाला एक सिधाई में हो. 8-10 बार आधा लिंग आगे पीछे करने के बाद अलका ने रुक कर एक गहरी सांस लेते हुए अर्जुन को आँख मारी और अगले हे पल उसके कंठ में बहार से भी उस मॉटे लुंड का उभर नजर आने लगा. मुँह बुरी तरह से फ़ैल कर लुंड की जड़ से चिपका था और अर्जुन के जबड़े कस कर भींच गए.

"ओह्ह्ह्ह.. अलका ये क्या कर रही हो जान.. ? उम्म्म.. ", अर्जुन नशे में खुद हे अलका का सर सहलाने लगा और ये लचकदार खूबसूरत बाला अपने मुँह को एक लयबद्ध तरीके से ऊपर निचे करने लग पड़ी. हर बार गले में उस मॉटे सुपडे की दस्तक पर सांस लेने में कठिनाई होती पर अलका ने जाहिर न किया. अर्जुन के बड़े अंडकोष भी लार से पूरी तरह सन्न गए. लुंड पर तोह चिकनाई की बरसात ने बाढ़ का रूप अख्तियार कर लिया था और अलका ने लुंड की अकड़न में इजाफा महसूस किया तोह तुरंत अलग हो गयी.

गहरी सांसें लेती हुई वो अर्जुन को ख़ास हंसी से देख रही थी. अर्जुन अपने चरम से बस एक मिनट दूर था और अलका ने जैसे उसका सुकून छीन लिया. लेकिन अगले हे पल अर्जुन के चेहरे पर फिर से वही सुकून लौट आया जब अलका ने अपनी सलवार और लाल पंतय निकल कर वो दुर्लभ फूले हुए नितम्भ अर्जुन के चेहरे की दोनों तरफ पेश किये.

"जानती हु की तुम्हारी आँखें इन्हे सबसे ज्यादा पसंद करती है. चलो तुम अपना प्यार दिखाओ मैं अपने दिल की करती हु.", अलका ने कामसूत्र की वो प्रमुख उनहत्तर (69) वाली मुद्रा बनाते हुए लम्बी चिकनी टाँगे मोड़ते हुए अपना महकता यौवन अर्जुन के चेहरे पर टिका दिया. उसकी मुट्ठी में एक बार फिर से अर्जुन का वो विकराल मूसल था जिसपर अलका की लम्बी उँगलियाँ भी पूरा घेरा बना पाने में असमर्थ थी. मुँह में दर्द होने के बावजूद अलका ने एक बार फिर से उस गुलाबी सुपडे से इश्क़ जाताना शुरू कर दिया.

इस बार ये पहले की तरह प्रबल न होते हुए बेहद कामुक था. कभी सुपडे को चूमती तोह कभी उसको होंठो में दबा कर लार से भीगोंगे लगती. हाथ निरंतर ऊपर निचे हिलाते हुई वो पूरे लुंड को प्यार करने में लगी थी. एकाएक एक मदद्भरी सिसकारी अलका के होंठो से निकली और अपनी छूट को अर्जुन द्वारा चूसे जाने पर वो साखळीत होने लगी. ये इतनी देर से रोके हुए बाँध का दिवार देहना अर्जुन के लिए भी मजेदार रहा. वो निरंतर अलका के गुलाबी यौवन पर जीभ, होंठो से कलाकारी करता एक एक कतरे को निचोड़ने लगा. 69 की मुद्रा अब एक तरफ से विभाजित हो गयी थी.

"आह्हः.. ऐसे हे अर्जुन.. ऐसे हे प्यार से उम्म्म्म.. आह्ह्ह्ह..", अलका से अब और तपिश न सहते बानी तोह वो बिस्टेर पर लुढ़क गयी. अर्जुन सहज भाव से घूम कर उसके ऊपर आ गया.

"स्टैमिना तोह ाचा है तुम्हारा और एक बार तोह लगा था के तुम जीत गयी.", अर्जुन ने एक हाथ से अलका की चिकनी टांग फैलते हुए दूसरे हाथ से चिकना सतांन पकड़ कर दबाते हुए कहा तोह अलका बोझिल नजरो से मुस्कुराई.

"इसमें हार जीत नहीं होती अर्जुन. समर्पण होता है और सिर्फ समर्पण. तुम्हारा होने वाला था इसलिए मैं अलग हुई. अब तुम बिना कुछ और कहे अपनी अलका को बस प्यार करो.", अलका ने अर्जुन को निरुत्तर करते हुए खुद हे अपने यौवन द्वार पर उसका अकड़ा हुआ गीला सूपड़ा भिड़ा दिया.

"ी लव अलका.", अर्जुन ने झुकते हुए कोई करारा धक्का न लगाया और बस होंठो से होंठ मिलते हुए दोनों के कॉमर्स की चिकनाहट का प्रयोग करते हुए बड़े प्यार से अलका की छूट को खोलने का उपक्रम किया. एक बार के लिए अलका के जिस्म में दर्द की भीषण लहरें उठी और उसने खुद हे कमर उचकाते हुए अपनी छूट को अर्जुन के मूसल की जड़ से चिपका दिए. एक भीषण दर्द को सेहन करती वो उस से चिपक कर आने वाले सुखद समय का इंजतार करने लगी.

"पागल कही की.. aahhh..",Arjun को जबतक पता लगा तबतक काम हो चूका था.

"अरे, ये ऐसी हे तोह है और जानती है तुम्हारे पेनिस को. आअह्ह्ह.. अब बस रुकना नहीं क्योंकि ये राउंड लम्बा नहीं चलने वाला.", अलका के कहने का मतलब अर्जुन समझ रहा था लेकिन शायद वो इस बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता था. दोनों बेजोड़ मॉटे और सख्त चुचो को हथेली में पकड़ कर दबाते हुए अर्जुन ने आधा लुंड बहार निकला तोह औंस की बूंदे बहती अलका की कासी हुई छूट का गुलाबी हिस्सा भी लुंड के साथ बहार आता दिखा. अलका के कूल्हों की वो गहरी दरार के मुहाने से गलबी गांड का छेड़ भी कॉमर्स से भीगा बंद छोटे से फूल सा था.

"आह्हः.. ऐसे हे जान.. ये सचमुच बहोत बड़ा है.. aahh..",Arjun को सर सहलाती हुई अलका खुद हे अपने चुके चुसाई के साथ ये मजबूत घर्षण छूट में झेलती हुई कसमसाने लगी. लम्बी टाँगे अर्जुन की कमर पर लपेटे वो जड़ तक उस मॉटे मूसल को अंदर लेती हुई खुल कर आहें भरने लगी. एकांत घर जो अंदर से बंद था, एकदम सही जगह थी पूर्ण मिलान की. न कोई रोकटोक और न खुद को रोकने की जेहमत.

"उम्म्म.. सचमुच अलका, तुम बहोत ख़ास हो.. आठ.. हर बार ऐसा लगता है के तुम्हारे साथ ये पहली बार hai...ummm", एक निप्पल को चूस चूस कर अर्जुन ने लाल करने के बाद दूसरे वाले को मुँह में भर लिया. कमर निरंतर उस फूली हुई baal-vihin गोरी छूट का हुलिया दुरुस्त कर रही थी. हर गहरी धक्के से ठप्प की आवाज उन मॉटे कूल्हों से निकलती और अलका ने जैसे हे गुदाद्वार के भीतर जाती ऊँगली महसूस की, वो खुल कर झड़ने लगी.

"एआईईईई.. मर्डर गयी यार.. आह्हः. वह ऐसा क्या बटन है .. आह्ह्ह्ह.. उम्म्म..", अर्जुन तुरंत धक्के लगाना रोकक कर एक ऊँगली से वो टाइट गुलाबी गुदाद्वार ढीला करने लग पड़ा. ये सही समय था जब छूट से निकलता कॉमर्स इस कैसे हुए छेड़ को चिकना कर रहा था. एक ऊँगली अंदर उतारने के साथ हे अर्जुन ने अलका के होंठ चूमते हुए दूसरी वाली भी तिरछी करते हुए उसमे समाहित कर दी. सचमुच अलका के कूल्हों की तरह गुदाद्वार भी लचीला था जो इतनी मोटी 2 उँगलियाँ अंदर लील गया. दर्द जरूर हुआ लेकिन पल भर के लिए.

"उफ़... मतलब पहले हे राउंड में बैकडोर को भी खोलने वाले हो? आह्हः.."

"तुमने हे कहा था न के मुझे ये सबसे प्यारे लगते है? सच कहु तोह तुम किसी यूरोपियन मॉडल से भी ज्यादा बेहतर हो अलका. ऐसे हिप्स किसी के भी नहीं है. उमाहहह..", अर्जुन अपनी बात कहने के साथ फिर से हलके धक्के लगते हुए अलका की छूट को सुकून और लुंड से भरने में जुट गया. एक हाथ चुचो को मसल रहा था और दूसरा निरंतर उन मादक कूल्हों के बीच उस कैसे हुए गांड के छल्ले को ढीला करता रहा. अलका के जिस्म पर चौतरफा हमले भी स्वर्ग सा मजा दे रहे थे.

"आह्हः.. आ जाओ अपनी फवौरीते जगह.. आह्हः..", मॉटे चुके निरंतर मर्दन से लाल हो चुके थे और निप्पल फूल कर दोगे मॉटे. अर्जुन अलका की बात सुन्न कर अलग हुआ तोह वही मीठा दर्द छूट में भर गया जरुरत से ज्यादा हे बड़े सुपडे के बहार निकलते हे.

"आह्हः.. ऐसे हे करोगे?", अलका ने अर्जुन की इत्छा पूछते हुए अपनी छूट पर हथेली राखी और आँखें मजे से बंद कर ली. अर्जुन को अलका पर इतना प्यार आ रहा था के एक पल को उसने अपनी इत्छा त्यागने का इरादा बनाते हुए बिस्टेर पर अलका की बगल में करवट ले ली. लम्बे बालो को संवारता हुआ वो उसके गाल पर होंठ रखे बस प्यार जताने लगा. अलका ने भी इस प्यारभरे एहसास से अर्जुन की तरफ चेहरा किया और उसकी मंशा जान कर होंठो पर हलके से चुम्बन जड़ दिया.

"रहने दो न अलका, हम आगे हे करते है.", अर्जुन ने खुद पर अलका को सवार होते देख रोकना चाहा.

"मुझे भी मजा आता है और तुम वह पहले भी कर चुके हो. एक बार तोह एक हे रात में 3 बार. उफ़.. दर्द सिर्फ ये मोटा मशरुम जैसा part अंदर जाते हुए होता है.. आठ", अर्जुन की मजे की इन्तहा हो चुकी थी अलका की हिम्मत और फिर अपने लुंड को उस गरम कैसे हुए छेड़ में धंसते हुए महसूस करके. इतने मॉटे मूसल को हर गांड नहीं झेल सकती थी लेकिन अलका सबसे अलग जो थी इस मामले में.

"आठ.. इधर आओ..", अर्जुन ने अलका को बाहों में भर लिया जब आधे से ज्यादा लुंड वो अंदर ले चुकी. गांड का वो चवन्नी से भी छोटा सा गुलाबी बंद छेड़ बुरी तरह उस मूसल को जकड़े था. और जल्द हे अलका की कमर अर्जुन के धक्को के बराबर हिलने लगी. मजबूत छाती से रगड़ते उसके मॉटे चुचो भी हर धक्के से आनंदति होने लगे. अलका अब खुल कर तेज आहें ले रही थी. हर धक्के के साथ वो 'ी लव यू' उम्म्म्म 'मेरी जान' और तेज और तेज की आवाजें निकलती हुई एक तरह से अर्जुन पर फिर से हावी हो गयी.

"ी लव यू अलका.. aahhh..mera होने वाला है आह्ह्ह्ह..", अर्जुन ने मजबूती से दोनों फूले हुए कूल्हों को दबोचते हुए दुमदार धक्के लगाने लगा था. लुंड भी इतनी घातक और कासी हुई चुदाई से बुरी तरह लाल पड़ने लगा. नसों में जब तूफानी उबाल भरने लगा तोह अलका का जिस्म भी मस्ती से अकड़ने लगा.

"ोुह्ह्ह्ह.. अर्जुनंनं.. मैं भी आइइइइइ. ... माहहहह...", गरम वीर्य की बौछार ने जो सिकाई करनी शुरू की, अलका भी अर्जुन के पेट के निचले हिस्से पर रगड़ खाती छूट से सुनेहरा कॉमर्स बरसाने लगी. ये वाला सखलन उसका अर्जुन के सामान हे चला. शरीर एक दूसरे से बुरी तरह लिपट चुके थे और अर्जुन ने भी लुंड बहार निकलने की जेहमत न करि. उस 1 मिनट पहले रोके सखलन के बावजूद अर्जुन ने दोनों छेड़ो की 30 मिनट तक ाची चुदाई करि थी. गांड से लुंड निकलने पर दोनों के चरम में रुकावट आना लाजमी था. अगले आधे घंटे अलका उसके ऊपर ऐसे हे आराम करती रही, आँख लगने के साथ. एक पल के लिए शरीर ने झटका खाया था जब वो मूसल नरम हो कर बहार निकला. अभी तोह इनके पास डेढ़ घंटे से अधिक समय बाकी था और अलका की दूसरी बार वाली हसरत अर्जुन बाथरूम में पूरी करने वाला था.

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"शालिनी, तुम्हे क्या हुआ है? सुबह से देख रही हु की खामोश हो और जबसे वापिस आये है तुम अपने कमरे से बहार नहीं निकली?", ये हवेली में राजेश्वर जी थी जो अपनी ननद को खाने के लिए बुलाने आयी थी. बेशक दोपहर के 3 बज चुके थे और आज देरी हो गयी थी लेकिन शालिनी का यु सबसे अलग और अकेले रहना राजेश्वरी को व्यथित कर रहा था.

"नहीं भाभी मैं तोह बिलकुल ठीक हु बस रात नींद पूरी नहीं हुई और फिर सफर. आपको तोह पता हे है के नाश्ते के बाद मुझे सफर करना पसंद नहीं. इसलिए बस आराम कर रही थी और मैं ठीक हु.", शालिनी ने एक झूठी मुस्कान देते हुए बिस्टेर छोड़ा और अलमारी से सलवार कमीज निकालने लगी, घर पर पहन ने के लिए. राजेश्वर बड़े ध्यान से देख रही थी अपनी ननद को. सलवार कमीज का ढेर लगा था अलमारी में लेकिन शालिनी को कभी उन वस्त्रो में किसी ने देखा नहीं था. शादी के बाद से हे वो सिर्फ साड़ी और रात में सोने के वक़्त पूरी लम्बाई का गाउन हे पहनती थी. ये सब उसने बस सिल्वा लिए थे और पिछले 20 वर्षो में इनकी गिनती में इजाफा होता रहा पर अलमारी में बंद हे रहे.

"क्या बात ननद रानी, एक तरफ तोह आप सारा दिन सबसे अलग थलग रही और अब दूसरा झटका दे रही हो ये सलवार कमीज को अलमारी से निकाल कर.", शालिनी इस बार स्वाभाविक रूप से मुस्कुराई जैसे वो अब कुछ सोच चुकी थी.

"ऐसा है भाभी की अब मैं हु अपनी माँ के घर, आइंदा ये saree-varee नहीं पहन ने वाली मैं यहाँ घर में. जो कम्फर्टेबले है वही pehan-na ठीक और ये साड़ी से तोह ज्यादा हे ठीक है. आप खाना लगवाओ, मैं नाहा कर आती हु 5 मिनट में.", शालिनी जवाब देने के साथ हे बाथरूम में चली गयी, पीछे अपनी भाभी को हैरत में छोड़ के.

'ये कौनसा जादू हुआ है? सब बोलते रहे के सूट पहना करो तोह बस सिलवाती रही और आज इसको याद आया के ये अपनी माँ के घर है? माँ जी को बताना पड़ेगा की शालिनी का संतुलन हिल गया है.', राजेश्वरी सोचने के साथ हे हंसती हुई कमरे से बहार चली गयी लेकिन अंदर इस आलिशान बाथरूम में साड़ी खोलने के बाद सिर्फ सफ़ेद ब्रा और पंतय में कड़ी शालिनी खुद को आईने में निहार रही थी. 40 पार होने के बावजूद वो किसी नवब्याहता सी थी और समतल पेट के साथ कासी हुई छाती और उतना हे बहार को निकला हुआ पृष्ठ भाग. लम्बाई तोह जैसे इस घर को वरदान हे थी और विन्नी के सामान शालिनी भी 5'7" की लम्बाई और खूबसूरत काया की मालकिन थी.

'पागल कर हे दिया न मुझे? सुबह से खुद को देखने से बच रही हु और तुम्हारे होंठो का ये निशाँ आग लगा रहा है. िस्स्सस्स.. गलती मेरी हे है लेकिन ऐसी गलती हर बार होगी जब जब तुम मेरे पास होंगे. सॉरी लेकिन कल जरूर कुछ वक़्त तुम्हारे साथ रहूंगी.', शालिनी के उन ठोस उभारो के ऊपर एक नीला निशाँ बना था जैसे वह किसी ने गहरा स्पर्श दिया हो होंठो से. एक पल में हे वो दोनों अंगवस्त्र फर्श पर पड़े थे और शालिनी अपने कैसे हुए बदन की नुमाइश सी करती 5 कदम दूर उस फुहारे के निचे जा कड़ी हुई. सामने योनि पर बालो का साया था जिस पर हाथ फिरते हे वो होंठ टेढ़े करके खुद से हे कहने लगी.

'तुम्हे भी जाना होगा अब. मुझे ाचा नहीं लगा जब उसका हाथ यहाँ था और तुम बीच में आ गए... आह्हः.. सचमुच तुम वही हो जिस से मैं बचपन से प्यार करती आयी हु. आह्हः.. बस आज के लिए इतना हे बाकी जब तुम मिलोगे तब तुम्हारी शालू पूरी तुम्हारी.', शालिनी ने भीगा बदन तोलिये से लपेटा और आईने के सामने कड़ी हो कर अपने जिस्म को देख कर पौंछने लगी. पिछली रात उसने खुद हे अर्जुन के जिस्म पर खुद को ुधा दिया था. बस सीने पर एक गहरे चुम्बन और छूट पर अनजानी रगड़ से हे शालिनी का वजूद हिल गया था. लेकिन अब वो पीछे हटने वाली नहीं थी. उसने सोच लिया था के झूठ के आवरण से वो अब बहार हे रहेगी.

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अपडेट 160

नया रूप 2ा


"चलो मैडम जी, बहोत आराम हो गया. और मुझे अभी स्टेडियम भी जाना है.", अर्जुन ने पिछले आधे घंटे से सोई अलका को बड़े प्यार से गाल सहलाते हुए उठाया तोह अलका के चेहरे पर अलग हे चमक छायी थी. पिछले 3 घंटे में दोनों हे 2 बार जोरदार संसर्ग कर चुके थे. दूसरी बार तोह अर्जुन ने सिर्फ आगे हे किया था और अलका को तबियत से ढीला किया था बाथरूम में हर मुमकिन मुद्रा में. ये इस जोरदार मिलान से आयी चमक थी और आँखों में खुमार साफ़ बता रहा था के अलका सुकून में है.

"तुमने तोह कमरा हे दुरुस्त कर दिया?", अर्जुन इस बात पर बस मुस्कुरा भर दिया. उसने आराम किये बिना पूरा घर वैसे हे कर दिया था जैसा उनके आने से पहले था. यहाँ तक की बहार टेबल से रबर उठा कर उसने अलका के बाल भी बाँध दिए थे.

"अगर दर्द हो तोह पेनकिलर ले सकती हो?", अर्जुन ने अलका की चाल में थोड़ा बदलाव देखा तोह वो हंसने लगी.

"ये दर्द नहीं है डार्लिंग. असर है हमारे प्यार का और अभी थोड़ी देर में हे ठीक हो जायेगा. वैसे शॉपिंग का बहाना करके हम सुबह से बहार है. इस बारे में शायद दोनों ने सोचा भी नहीं.", घर से बहार आते हुए अर्जुन ने टाला लगाया और कार की डिक्की खोल कर 4 पैकेट अलका को थमा दिए. अलका को सवाल का जवाब मिल चूका था. अर्जुन पूरी तैयारी से हे उसके साथ था और शॉपिंग की बात उसने इसलिए हे कही थी क्योंकि सामान पहले से हे उसके पास था.

"तोह ये सब सिर्फ मेरे लिए खरीद कर रखा था तुमने?", अलका ने पैकेट खोलने की जेहमत हे न की. कार की अगली सीट पर बैठते हुए भी उसको अपनी जांघो के बीच आयी सूजन ने सिसकने पर मजबूर कर दिया था. लेकिन उसको इसमें भी अलग हे मजा मिल रहा था.

"सबके लिए है ये और एक्सरसाइज के टाइम पहन सकते है इन्हे. देख लेना जिसको जो ठीक लगे बस ये येलो वाला पैकेट ऋतू और तुम्हारा है.", अर्जुन ने आँखों पर कला चश्मा लगाया और उसकी नक़ल में अलका ने भी लड़कियों वाला थोड़े बड़े फ्रेम का चस्मा चढ़ाया और दोनों घर की तरफ निकल लिए. सेक्टर की मार्किट से हे दोनों ने इस बीच हल्का फुल्का खाना कार में बैठ कर खाया था और पौने 4 बजे वो अपने घर में थे. जहाँ रुपाली के साथ रेणुका बुआ कुछ बात करती दिखी और उनके साथ हे अनामिका चची भी कड़ी थी. उनका बीटा शायद सो रहा था या किसी न किसी के पास खेल रहा होगा.

"ये आ गया ारु. आप हे बात कर लो और अलका अकेले हे शोप्पिंग करने चली गयी न तुम?", रुपाली ने तुनक कर कहा तोह अलका हंसती हुई उसके हाथ में सभी पैकेट देती हुई उसको लिए अंदर चली गयी. अपनी चाल को वो काबू कर चुकी थी अब तक.

"हाँ बुआ. आप प्रीती या किसी को भी भेज देती. इस वक़्त तोह आपको आराम करना होता है.", अर्जुन की बात में न चाहते हुए भी वो फ़िक्र थी जो सिर्फ रेणुका समझ सकती थी. चेहरे पर हलकी सी लाली जरूर आयी लेकिन अनामिका की मौजदगी में वो संभल गयी.

"आराम कर लिया था मैंने जल्दी लङ्क करने के बाद. वैसे मुझे खुद हे बात करनी थी तुमसे इसलिए किसी को भेजना ठीक नहीं लगा. भाभी, वो बड़ी माँ को बुला दीजिये उनके कमरे में. मैं वही जा रही हु.", कौशल्या जी शायद पिछले आँगन में थी और रेणुका को जो बात करनी थी वो शायद अनामिका की मौजदगी में मुमकिन भी न थी. अनामिका तुरंत सर हिला कर चली गयी और उसके गलियारे में जाते हे रेणुका अर्जुन को लिए थोड़ा बगीचे की तरफ चल दी.

"वो कल मेरी डॉक्टर से अपॉइंटमेंट है. 2 मंथ कम्पलीट हो गए है और तुम्हसे साथ चलना होगा. मैं किसी और के साथ नहीं जाने वाली, पहले हे कह देती हु.", रेणुका पूरी तरह पत्नी वाले अवतार में थी और अर्जुन को भी सुन्न कर ाचा लगा था के वो इतना गहरा लगाव रखती है उसके साथ.

"ठीक है, तुम 9 बजे तैयार रहना. मैं भी चाहता हु के अगर तुम्हे कही भी जाना हो तोह कार मेरे हाथ में हो. और ये चमड़े वाली चप्पल?", एकाएक अर्जुन ने जो सवाल किया तोह रेणुका की नजरे झुक गयी अपनी इस गलती पर.

"सॉरी, जल्दी में."

"ठीक है, तुम दादी से मिल लो और मुझे भी स्टेडियम जाना है. सुबह ढीले कपड़ो में हे चलना.", अर्जुन के समझने पर रेणुका हामी भर्ती हुई अंदर बैठक की तरफ चली गयी लेकिन इन दोनों ने हे ध्यान नहीं दिया था के बैठक में इस तरफ की खिड़की के पास बैठे संजीव के कानो में इनकी बातचीत जा चुकी थी. रेणुका बुआ को अपनी दादी के कमरे में जाता देख संजीव तुरंत बहार निकल आया. अर्जुन तबतक सीढ़ियों से अपने कमरे में जा चूका था कपडे बदलने.

"आज मैं भी साथ चलता हु छोटे. तुम प्रैक्टिस कर लेना और इतने मैं थोड़ी पूछताछ कर लूंगा हॉस्टल वार्डन से एक केस के सिलसिले में.", अंदर अर्जुन का बलिष्ट बदन देख एक पल तोह संजीव की आँखों में भी जमाने भर की हैरत आ गई थी. सवा 6 फ़ीट की लम्बाई के बावजूद अर्जुन के तगड़े शरीर पर कही भी वासा न थी. हर तरफ चमकदार मांसपेशिया और 'व्' अकार का उसका ऊपरी धड़ तोह किसी को भी तारीफ के लिए मजबूर कर दे. स्क्सल माप की वो ढीली टीशर्ट भी उसके सीने और बाजूं पर पूरी तरह कासी थी. 16-17 इंच के डोले जिनकी अंडकार मछलियां बताती थी की इस शरीर को बनाने में जाने कितना परिश्रम किया होगा इस लड़के ने.

"हाँ भैया, इस बहाने कार से चलने को मिलेगा तोह मुझे तोह मजा हे आएगा. वैसे आप सारा दिन से घर हे थे क्या?", अर्जुन ने कार की बात करते हुए पाजामे की जगह घुटनो तक की अभ्यास वाली निक्कर पहन ली. जूते पहन ने में भी एक मिनट न लगा और एक साफ़ टोलिया लिए वो भैया के साथ बहार निकल चला.

"कहा नसीब अपना जो घर में रहने को मिले? थानेदार जी पहले तोह पुलिस लाइन ले गए और वह बेवजह ये केस मिल गया. उसके बाद बिट्टू मां से थोड़ी बहोत बातें हुई और लंच करने के बाद अभी घर आया था तेरे से कुछ पहले हे. वैसे तेरा शरीर तोह बहोत बदल गया है छोटे. बॉडी बिल्डिंग की तैयारी तोह नहीं कर रहा?", इलो में बैठते हुए संजीव भैया ने हँसते हुए ऐसा कहा था और अर्जुन भी बाल संवारता उनकी बगल वाली सीट पर बैठ गया.

"नहीं भैया कोई कम्पटीशन नहीं. बस अभी इम्प्रूव कर रहा हु और इस से ज्यादा बढ़ने नहीं देना बॉडी को. वैसे स्टेडियम में ऐसी क्या बात हो गयी जो उन्हें इतने बड़े अफसर की सेवा लेनी पड़ रही है.?", अर्जुन की बात को समझते हुए संजीव भैया ने बेहद हे धीमी आवाज में एक सूफियाना गण चला दिया.

"बास्केटबॉल का head-coach और कुछ सीनियर लड़कियों पर गहरे इल्जाम है छोटे और अब तोह जैसे उनके खिलाफ सबूत और गवाह भी मौजूद है. लेकिन मामला बिट्टू मां के थाने की हद्द में होने के बावजूद कुछ बड़े लोग इस मामले को दबाने में लगे है. मां ने दिग अंकल से बात की थी और दादा जी से भी लेकिन मामला में S.A.I. के बड़े नाम भी शामिल है और वो लोग स्टेडियम प्रबंधन पर दबाव बना रहे है. मैं तोह हु हे अंडरकवर इसलिए ये काम मुझे सौंप दिया.", संजीव बात को पूरी बताने से हिचक रहा था.

"ये मोलेस्टेशन वाला केस तोह नहीं भैया?", अर्जुन ने इतना हे पुछा था और संजीव को पूरी बात कहना हे ठीक लगा.

"असलियत में ये मल्टीप्ल फ्रेमलेस के साथ जबरदस्ती सेक्स और उन्हें और लोगो से भी जिस्मानी सम्बन्ध बनाने के लिए विवश करने का केस है. शायद ये सब बहोत पहले से हे हो रहा था लेकिन कुछ समय पहले एक लड़की ने टेनिस कोच के कहने पर अपने रपे की पुष्टि करवा दी मेडिकल पेश करके. मां ने भी इन्क्वायरी बैठे थी इस मामले में और स्टेडियम ने सपोर्ट भी दिया लेकिन फिर जो कुमार साहब थे उन्हें 3 दिन पहले दिल्ली भिजवा दिया और वो टेनिस कोच जो था वो गायब है. उन्होंने ाचा काम ये किया था के उस लड़की को सुरक्षा में पहचा दिया था ये सब होने से पहले. उसने किसी चांदनी नाम की लड़की पर आरोप लगाया है, जो और भी कई लड़कियों को कोच के बिस्टेर तक भेज चुकी है. ख़ास कार्यक्रमों में कोच साई वालो को भी खुश करता रहता है इसलिए इस मामले को दबाया जा रहा है.", अर्जुन तोह चांदनी का नाम सुन्न कर हे चौंक गया. वो लड़की इतनी घिनौनी हरकत भी कर सकती है? बेशक वो अर्जुन पर बुरी तरह आसक्त थी लेकिन ऐसे काम.

"भैया, चांदनी को मैं जानता हु और आपकी मैडम मेरी पहचान के कुछ लोग dilo-jaan से करेंगे. बस आप जरा कूल रहना, मेरे बड़े भाई की तरह. पूछताछ कही से भी सरकारी नहीं लगनी चाहिए. अगर मामला ऐसा है तोह वार्डन भी शामिल होगी और कुछ बताने नहीं वाली.", संजीव अपने भाई की बात से ऐतबार रखता था और उसका मतलब भी समझ चूका था.

"इतने विश्वास के लोग है तेरे पास जो अपने हे लोगो की जानकारी दे सके?"

"चलो तोह सही आप, खुद हे देख लेना.", अर्जुन के कहने पर संजीव मुस्कुरा दिया और कार में कुछ पल ख़ामोशी छायी रही जिसको खुद संजीव ने इस धमाके के साथ खोला.

"रेणुका बुआ को माँ तुमने बनाया है छोटे?", अर्जुन के रोंगटे खड़े हो गए थे लेकिन चेहरे पर वो काबू किये था.

"आपको ये कैसे सूझा एकदम से.?", अर्जुन ने पलट कर सवाल किया तोह सामने देखते हुए संजीव भैया ने जो सुना था वही बोल दिया.

"तुम उन्हें जिस तरह बुला रहे थे ऐसा तोह कोई प्रेमी या पति हे करता है. वैसे सच कहु तोह रेणुका बुआ कभी भी मुझे अमर्यादित स्त्री नहीं लगी. शायद इसके पीछे भी जरूर कोई बड़ी वजह रही होगी और तुम जब सबको इतना maan-sammaan देते हो तोह तुम पर शक करना भी ठीक नहीं.", संजीव का अपने छोटे भाई से ये अलग हे अटूट सा रिश्ता था जिसमे वो देखने के बावजूद उसकी हे तरफदारी कर रहे थे.

"जिसका सबकुछ लूट गया हो और फिर जीने की आस हे न बची हो भैया, क्या उसको ज़िन्दगी जीने का मकसद गलत है? रेणुका बुआ के साथ मेरा पहला रिश्ता तोह वही बुआ भतीजे वाला है लेकिन उनके दर्द भरे अकेलेपन को मैंने दूर करने की वो कोशिश की जिसमे मैं समाज का गुनेहगार बन्न गया. हाँ वो मेरी हे औलाद है जो उनके जीने, हंसने और सभी हसरतो को पूरा करने की शक्ति दे रही है. अकेले में वो मेरी प्रेमिका हे है जिसका अतीत इतना बुरा है की वह शायद आत्मा भी सलामत न रही. उन्हें सहारा दे कर अगर मैं गुनेहगार हु तोह ये भी मंजूर है भैया लेकिन जीवन से बढ़ कर कुछ नहीं है और एक मासूम इंसान के लिए तोह मैं खुद को भी कुर्बान कर सकता हु.", अर्जुन के लफ्ज़ो में कही से भी बगावत न थी और एक कड़वा सच था जिसको संजीव भी नकार न सका.

"दादा जी और दादी ने मन किया था बुआ की शादी कौशल से करवाने के लिए. शायद रेणुका बुआ को हे वो आर्मी वाला जीवन पसंद न था. फिर भी वो हो गया जो होना नहीं चाहिए था. छोटे, मैंने करीब से देख है उनके दर्द और अकेलेपन को जब भी वो यहाँ आती थी अपने ससुराल से. मैं तेरे जितना जिगर नहीं रखता की लोगो से उनके दर्द की वजह पूछ सकू और सच कहु तोह मैं इंट्रोवर्ट था जिसको तूने हे आज बोलचाल के लायक सामाजिक इंसान बनाया है. वैसे ये बात प्रीती को पता चली तोह जानता है क्या हो सकता है आने वाले समय में?"

"उसने हे कहा था के वो अपनी बुआ को दर्द में नहीं देख सकती. सिर्फ उसकी खातिर मैं सबकुछ भूल कर बस रेणुका बुआ को एक नया जीवन दू जिसमे वो भी हर महिला की तरह खुद को सम्पूर्ण पा सके. मुझसे ज्यादा हिम्मत तोह प्रीती ने दिखाई और मैं उस से कुछ भी नहीं छिपता. आप भी तोह प्रीती जैसे हे है भैया."

"हट कमीने. कुछ भी बोलता है और मैं लड़की नहीं हु बता दे रहा हु तुझे कही गलत ख्याल ले आये.", संजीव भैया ने हँसते हुए माहौल को खुशनुमा किया तोह अर्जुन भी हंसने लगा.

"मेरा मतलब था के आप तोह मुझे उस से भी ज्यादा प्यार करते हो भैया और मुझे बिना कहे हे आपसे सबकुछ मिला है. मैं गलती करू तब भी आपने कभी फटकारा नहीं और समझाया तोह वो भी अलग हे तरीके से जिस से मुझे पता भी न लगे और दुःख भी न हो. सच कहता हु भैया की मेरा शरीर जितना मर्जी बड़ा हो लेकिन इसकी रीढ़ बस आप हो जो मुझे मजबूत रखती है.", अर्जुन के इस कथन पर संजीव भैया ने बड़े लाड से उसके बालो में हाथ फिरते हुए कहा.

"तू कभी गलत हो हे नहीं सकता रे बेशक देखने वाले की आँखें जो चाहे देखे. और मैं भी अपने भाई का अपने लिए प्यार ाचे से जानता हु. कोई और होता तोह शायद झूठ बोलता, गुस्सा करता या दलीले देता लेकिन तुम वैसे नहीं हो अर्जुन. वैसे ये चांदनी अपने नाम की तरह हे उजाला फ़ैलाने वाली है या इसके विपरीत?", संजीव भैया स्टेडियम से पहले वाली लाल बत्ती पर रुक चुके थे.

"पता नहीं भैया. जिस गली जाना नहीं वह का रास्ता क्यों पूछना. मेरे पीछे पड़ी थी काफी समय से और मैंने लास्ट टाइम उसको ाचे से समझा दिया था. फिर बस 2 हे बार आया हु स्टेडियम लेकिन वो दिखी नहीं. एक सहेली है उसकी और वो अपने ख़ास दोस्त की प्रेमिका भी है जिसके साथ मैं भी ाचे से बात कर लेता हु. वो चांदनी की हॉस्टल और क्लासमेट भी है. सुमन नाम है उसका और वो जरूर मदद करेगी.", कार अब स्टेडियम की तरफ बढ़ चली थी. अर्जुन को अगली सीट पर देख गॉर्ड बस हाथ हिला कर मुस्कुरा दिया.

"बड़ी चलती है छोटे तेरी यहाँ. उधर यूनिवर्सिटी में भी तेरा जलवा देखा था लेकिन इतने बड़े स्टेडियम में भी वैसा हे हाल है. चल मिलवा जरा इन सुमन जी से. शायद ये हमारी मदद कर हे दे जिस तरह तू बता रहा है. चांदनी हाथ में आ गयी तोह मॅनॅग्मेंट की गांड मैं इस तरह से मारूंगा की उन्हें खुद चल कर मुजरिम कानून के हवाले करने पड़ेंगे.", अर्जुन ने इशारे से एक तरफ पार्किंग में कार लगाने को कहा और दोनों भाई आराम से उस पत्थर की टाइल वाली पगडण्डी पर चलते हुए बास्केटबॉल के कोर्ट के पास पहुंच गए. यहाँ फिलहाल जितने भी चेहरे थे वो बेशक अर्जुन को जानते थे लेकिन अर्जुन ने उन्हें ध्यान से देखा नहीं था.

"किसको ढून्ढ रहे हो हीरो? मंजू का तोह तुम्हे पता हे होगा और मुस्कान ने मॉर्निंग टाइम करवा लिया है प्रैक्टिस का अपने भैया के साथ.", ये लड़की खुद हे अर्जुन की तरफ चली आयी थी. नीली घुटने तक की स्कर्ट और कमर से निचे तक की सफ़ेद ढीली टीशर्ट बता रही थी की शरीर अंदर से अलग है.

"सॉरी मुझे आपका नाम नहीं पता लेकिन आप बता सकती है सुमन जी कहा मिलेंगी.", संजीव इन दोनों से 10 कदम दूर बस इधर उधर देखता हुआ टहल रहा था. ये सांवली सी कजरारी आँखों वाली लड़की भी चुलबुली थी.

"छोडो ji-vi लगाना यार. मंजू के बॉयफ्रेंड हो तोह मेरे जीजा हे लगे. वैसे भी सलहज लगती हु तोह बिंदास बोलो. और ये सुमन भी आ गयी, उधर देखो. वैसे मेरा नाम सुगंधा है, सुगंधा राठी.", इस बार लड़की ने हाथ आगे बढ़ाया तोह अर्जुन ने बड़ी नरमी से हाथ मिला लिया. उसको इस लड़की का स्वाभाव कही से भी चांदनी या किसी बिगड़ी लड़की सा न लगा.

"थैंक यू.", अर्जुन ने इतना हे कहा था और सुमन इनके पास आ कड़ी हुई.

"भाभी, आपको हे ढूंढ रहा था और इस बहाने सुगंधा जी से भी मुलाकात हो गयी.", खुद को भाभी कहे जाने अपर सुमन शर्म के साथ साथ थोड़ा हंसने लगी थी.

"मिल लिए सुगंधा .. जी.. से देवर जी? वैसे इस नाचीज की कैसे याद आयी? तुम्हारे भैया भी बता रहे थे की तुम घर में व्यस्त हो 23-24 तारीख तक."

"हाँ वो एक साथ 2-2 शादी है न घर में इसलिए बिजी था लेकिन अबसे तोह रोज आऊंगा सैटरडे तक. सुगंधा जी, बस 5 मिनट दीजियेगा.", अर्जुन के ऐसा कहते हे वो लड़की मुस्कुराती हुई वापिस कोर्ट की तरफ चली गयी. अर्जुन सुमन को लिए अपने भैया के करीब आया और दोनों का परिचय करवाने लगा.

"भैया आप है सुमन जी, बलबीर भाई की मंगेतर और भाभी ये है मेरे बड़े भैया संजीव शर्मा. इन्हे आपसे कुछ जानकारी चाहिए थी चांदनी के मामले में.", अर्जुन ने बिना लाग लपेट सीधा मुद्दे की हे बात कर दी. सुमन एक पल इस गठीले से साढ़े 5 फ़ीट से ऊपर के व्यक्ति को देखने लगी और फिर हाँ में सर हिला कर सहमति दे दी.

"थैंक यू मिस सुमन. दरअसल मुझे किसी ने हिरे किया है एक गुमशुदा लड़की का पता लगाने के लिए. फर्स्ट ईयर की लड़की थी मुक्ति धवन, जो बास्केटबॉल की खिलाडी भी थी और चांदनी के संपर्क में भी रही थी गायब होने से पहले. चांदनी की कोई खबर नहीं है पिछले 5 दिनों से. कुछ बता सकती हो इन दोनों लड़कियों के बारे में?", संजीव ने पूछना शुरू किया था और इतने में हे बलबीर हलकी दौड़ लगता हुआ अर्जुन और सुमन को देख इस तरफ हे चला आया.

"नमस्ते भैया, पहचाना? गाँव में मिले थे न विकास भाई के उधर शादी में? आप अर्जुन के बड़े भाई हो न?", बलबीर के आते हे अर्जुन ने उसका परिचय दिया और फिर भैया के आने का कारण बताया तोह बलबीर ने समझदारी दिखते हुए कहा.

"भैया जी, आप निश्चिन्त हो कर सुमन से जानकारी लो लेकिन वो उधर वाली बेंच पर बैठ जाओ तोह सही रहेगा. एडमिन काम्प्लेक्स है न तोह आप आराम से बात कर सकोगे. सुमन, ये तेरे जेठ जी है ध्यान से हर बात बताना इन्हे.", बलबीर की बात पर संजीव भैया ने खुश होते हुए उसका कन्धा थपथपाया और ये दोनों अपनी प्रैक्टिस के लिए चल दिए और सुमन के साथ संजीव भैया इस हिस्से से अलग दूसरी तरफ.

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करीब 6 बजे राजकुमार जी अपने छोटे भाई नरिंदर के साथ घर वापिस आये तोह सारे दिन का विवरण देने के लिए अपने पिता के साथ बहार आँगन में हे बैठ गए. यहाँ पंडित जी के साथ इस वक़्त आरती और प्रीती hans-bol रही थी और अपनी पोतियों के साथ पंडित जी भी जहां भर की बातों में लीं थे. उनका ये परिवर्तन भी नया था सबके लिए लेकिन सकरात्मक भी. बचो की परवाह तोह वो पहले भी करते थे लेकिन आजकल वो उनके साथ ाचा खासा समय गुजरने लगे थे.

"ये सही है पापा. मुझे तोह लगा था के आप आज भी कही golf-meeting पर होंगे लेकिन यहाँ तोह बचो के साथ लगे हुए हो.", नरिंदर जी भी वही चटाई पर हे बैठ गए अपने पिता के सामने और प्रीती झट्ट से उठ कर अंदर चली गयी. यहाँ आरती और रामेश्वर जी 0 और क्ष वाला खेल खेल रहे थे एक सफ़ेद पैन पर. अपने बेटे की बात सुन्न कर वो भी मुस्कुराये और राजकुमार को कुर्सी पर बैठने का इशारा दिया.

"अगले 10 दिन तोह मैं तुम्हे यही दिखने वाला हु इन्दर, अपने बचो के साथ परिवार में. हाँ अगर तुम ये खेलने वाली बात कर रहे हो तोह ऐसा तोह मैं तुम लोगो के साथ भी करता था पर ज्यादातर गुड्डू (मधु) हे घर पे होती थी क्योंकि तुम तीनो भाइयों के तोह पाँव में पहिये लगे थे जो टिकते नहीं थे. खैर बताओ आज कितना काम पूरा किया?", इधर प्रीती 3 गिलास पानी ले आयी थी और सबको देने के बाद वो आरती की बगल में हे बैठ गयी, वही खेल खेलने.

"हाँ वो सारे निमंत्रण तोह दे दिए है जो बचे थे. हलवाई परसो से बगल वाले प्लाट में लग जाएंगे और राशन आधा सफारी में रखा है और बाकी सवेरे पंहुचा देगा बनिया. गुड्डू भी कल शाम को आने का कह रही थी जीजा जी और हिमांशु (तारा का भाई) के साथ. बाकी सभी लोग उनके घर से 19 को आएंगे. अब देखना ये भी है के सबको ठहरने का इंतजाम कैसे करवाना है?", नरिंदर जी ने असली मुद्दे पर आते हुए कहा तोह राजकुमार जी ने अपनी बात राखी.

"वो पिछले घर में चार कमरे तोह पूरे तैयार हे है और फिर वह का हाल भी बड़ा है और छत भी. अशोक जी का परिवार वह रह सकता है आराम से.", उनके ऐसा कहते हे आरती के कान खड़े हो गए.

"ताऊजी, बुआ तोह मंजू के घर रहने वाली है जैसा उन्होंने कहा था जाने से पहले. और मंजू के साथ मेनका दीदी भी हमारे हे साथ रहेंगी. पिंकी दीदी और मेरी कुछ सहेलियां पंजाब से आने वाली है. तारा और प्रीती की भी फ्रेंड्स चंडीगढ़, दिल्ली से आ रही है. हम सभी इतने वह शिफ्ट हो जाएंगी. ऊपर वाले सभी कमरे फ्री हो जाएंगे अगर और भी लोग रहने आये तोह. ठीक कहा न दादा जी?", आरती के ऐसा कहने पर नरिंदर जी भी खुश हुए की ये लड़की भी खुल कर बोलने तोह लगी. पंडित जी ने भी हलके से उसका कान खिंचा और हँसते हुए बोले.

"अब तुम लोगो ने पहले हे सब प्लान बना रखा है तोह मैं क्या कह सकता हु. वैसे सभी का सामान एक कमरे में रख कर उसको टाला जरूर लगा देना. इन्दर, अर्जुन का कमरा छोड़ कर बड़ा हॉल और इन लड़कियों की तरफ के 2 कमरे रिश्तेदारों के लिए बहोत रहेंगे. बाकी नीचे भी बैठक, ये वाला कमरा और पिछली तरफ भी ek-do कमरे बचते है. घर में तोह अपने हे लोग रुकेंगे और इतने कमरे बहोत है सबके लिए. बाकी सतीश का होटल है, धर्मवीर जी का फार्महाउस भी है जहाँ शादी के समय ख़ास लोग ठहर जाएंगे.", रामेश्वर जी ने तुरंत हे निबटा दिया इस परेशानी को लेकिन जैसे नरिंदर जी कुछ असहमत थे.

"वो राजू भाई, मेरे और शंकर के भी कुछ दोस्त बहार से आएंगे. हम सोच रहे थे की पिछले घर उनके और हमारे लिए ठीक रहता."

"तुम इतना ज्यादा भी मत सोचा करो चित्रगुप्त. हमको पता है तुमने वह क्या गुल खिलने है shagan-mele के नाम पर. वैसे भी मेहुल ने तुम सब लोगो का इंतजाम तोह उसके हे फार्महाउस पर रखा है. दिन में बात हुई थी मेरी उस से और शंकर ने भी वही कहा है. लेकिन घर के काम अपने समय पर पूरे होंगे और हर कार्यक्रम में तुम लोग आखिर तक बने रहोगे.", रामेश्वर जी अपने बचो और उनके दोस्तों को जैसे ाचे से जानते थे और अब राजकुमार जी भी नरिंदर के जैसे बगले झाँक रहे थे क्योंकि बाप ने कह दिया था की वो कोई फर्लो नहीं मारेंगे. अभी बात जारी हे थी की घर के बहार हे कार कड़ी करके संजीव अपने भाई के साथ अंदर चला आया. अर्जुन का शरीर उन वस्त्रो में बखूबी नुमाया था.

"लो जी ये दोनों भी आ गए तोह इनसे भी चर्चा कर लेते है.", रामेश्वर जी ने दोनों को हे फर्श पर बैठने को कहा तोह अर्जुन एक तरफ बैठ कर जूते खोलने लगा और सजीव अपने पिता की कुर्सी के करीब हे बैठ गया.

"बताओ फिर दादा जी कैसी चर्चा करनी है आपने?", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए ये सवाल किया तोह रामेश्वर जी ने उसके कंधे पर एक तगड़ी थपकी जमा दी.

"मेरे बैल, तेरे चाचा कह रहे थे के मेहमानो को तेरा और संजीव वाला कमरा देना पड़ सकता है. संजीव तोह चलो यहाँ निचे मेरे साथ सो जाया करेगा लेकिन तुम्हारी परेशानी है.", रामेश्वर जी जैसे अपने छोटे पौटे की टांग खींच रहे थे.

"हाँ लेकिन शादी भैया की हो रही है तोह उनका कमरा तोह देना ठीक बात नहीं दादा जी. वैसे भी मैं तोह उसको ाचा बनाने की सोच रहा था और साथ साथ हॉल को भी. कल को भाभी भी रहेंगी वह तोह थोड़ा उस हिसाब से लग्न भी चाहिए. मेरा कमरा जिसको चाहे दे दीजिये बस मेरा सामान मैं कल अलमारी में सेट करके लॉक कर दू. लोगो का आना जाना रहेगा तोह kitabe-kapde भी सेफ होने चाहिए न?", अर्जुन ने तोह अपने दादा के मजाक को ख़तम हे कर दिया था इतना कह कर. वही संजीव भैया निचे चेहरा करके शर्मा रही थे किसी लड़की की तरह.

"वाह ये सच कहा ारु ने दादा जी. इधर वाले फ्लोर को थोड़ा तोह रेनोवेट करना हे चाहिए. और अर्जुन इतने दिन तक पिछले घर की पहरेदारी भी कर सकता है. वह एकतरफ गाये के चारे वाला कमरा है उसमे कूलर लगवा देंगे इसके लिए, मांजी के साथ.", आरती ने यहाँ ाचे से अर्जुन की खिंचाई की थी लेकिन इसके पीछे उसका अपना भी मतलब था. सभी ठहाका लगा कर हंसने लगे थे बस प्रीती झूठमूठ का साथ दे रही थी.

"हाहाहा.. वो तोह मैं वैसे भी करने हे वाला था गुड़िया रानी. अब तुम इतनी लड़कियां वह रहोगी तोह रात में रखवाली के लिए तोह कोई चाहिए न. वैसे मेरे बचे को गाये वाले कमरे में नहीं रखना. इसके लिए वह की लम्बी चौड़ी छत्त ठीक रहेगी. रास्ता भी अलग है तोह तुम लोगो को भी परेशानी नहीं. हाँ इसका यहाँ वाला कमरा ऐसे हे रहेगा क्योंकि वो इसका है और nahana-padhna तोह ये यही करेगा. चलो भाई तुम जा कर नाहा धो लो और अपनी खुराक लो.", दादा जी की बात सुन्न कर अर्जुन यही बहार वाले बाथरूम की तरफ बढ़ चला.

"वैसे दादा जी, कुछ रिलेटिव्स हमारे घर भी रह सकते है. बैकीदे वाले 3 रूम्स तोह वैसे हे खाली है और मैं भी Aarti-Ritu दीदी के साथ रहूंगी दूसरे घर में तोह मेरा रूम..", प्रीती ने जैसे हे अपने कमरे की बात कही तोह रामेश्वर जी ने स्नेह से उसके सर पे हाथ रखते हुए ना में सर हिला दिया.

"तुम्हारा कमरा मतलब हमारी बेटी का कमरा. उसमे कोई भी बाहरी व्यक्ति नहीं रह सकता और पिछले कमरों की साफ़ सफाई भी चल रही है जहा तुम्हारे भी कुछ रिलेटिव्स आएंगे तोह वही रहेंगे. Aarti-Ritu वाले कमरों में भी शालिनी और राजेश्वरी बिटिया के सिवा कोई और नहीं रहने वाला. खैर तुम लोग भी अंदर जाओ, तुम्हारी दादी सबको मार्किट ले जा रही हैं तोह तैयारी करो. संजीव तुम और इन्दर 2 गाड़ियों से इन बच्चों और बहु को ले जाओ फिर माधुरी बिटिया के जाने पर रोक लग जाएगी.", रामेश्वर जी ने जैसे हे ये सूचना दी ये दोनों तुरंत हे अंदर दौड़ गयी खुश हो कर. यहाँ भी कुछ देर बातचीत चली और रामेश्वर जी उठ कर अपने मित्र भाई छोल साहब की तरफ चल दिए.

अर्जुन भी नहाने के बाद इधर से हे ऊपर अपने कमरे में जा चूका था जिसके पीछे संजीव भी कपडे बदलने चल दिया. नरिंदर जी तोह आराम के इरादे से घर आये थे लेकिन अब बात माँ के साथ जाने की थी तोह उन्हें भी मौका मिल गया था कौशल्या जी के पैसे खरचवाने का.

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भाई लोगो, अपडेट आधा था. मैं अभी भी बहार हु
 
हाँ वो बड़े आँगन अब नहीं रहे...

न वो गाँव मोहल्ले दीखते है..

कुछ याद सा करता हु धुंदली तस्वीरों को..

बैठा तनहा इन चार दीवारी में...

वो सर सहलाने वाले दर्जन हाथ...

अब बड़े शहरों में नहीं रहे..

दादा दादी की बरगद सी छाया ..

चाची ताई का ममतामयी आँचल..

बाप की फटकार से बचने वाले..

चाचा ताऊ का था मैं कायल..

प्रदेश के इन 2 कमरों को कमाकर..

खो दिया असली संसार का जीवन..

हाँ वो बड़े आँगन अब नहीं रहे..

बचपन की बरसात भली थी. ..

साथ जो मिटटी की खुशबु लाती..

अब तोह वो भी कीचड लगती..

चेहरे पे गिरती आंसू छुपाती..

चूल्हे सिगड़ी, दाल चूरमा...

शैतानी पर बहिन का घूरना..

डर के मारे छत्त पे दुबकना..

अब वो सब किस से कहे?

जब बड़े आँगन हे नहीं रहे..
 
अपडेट 160

नया रूप 2बी

"चची, आप कितना जानती है अपने परिवार को? मेरा मतलब है विनोद चाचा, दोनों बुआ और छोटे दादा जी और दादी को?", इस वक़्त घर में ज्यादा लोग नहीं थे. रामेश्वर जी बहार थे छोल साहब और मल्होत्रा जी के साथ तोह ललिता जी भी सामने वाले घर गयी हुई थी, सरोज की सास से मिलने. बाकी सभी लोग मार्किट गए थे और अनामिका ने खुदसे हे घर रहने का कहा था अपनी बड़ी सास से. इस वक़्त अर्जुन को दूध और उसकी ख़ास खुराक देने के साथ खुद भी चाय पी रही थी यहाँ तारा वाले kamre-hall में. नवजात बीटा आराम से बग्गी में सोया हुआ था.

"मैं तोह हमेशा घर पे हे रही हु अर्जुन और तुम्हारे चाचा का कुछ पता नहीं मुझे ज्यादा. हाँ इतना जानती हु के वो बिलकुल वैसे नहीं है जैसी परिवार की प्रतिष्ठा है. शायद उसका कारण भी बड़े पापा है. वह घर में तोह मैं रसोई और कमरे में हे रहती हु ज्यादातर. बहार आँगन में तोह घूंघट चेहरे से बड़ा होता है. वैसे तुम कभी क्यों नहीं आये हमारे वह?", अनामिका बात कहते हुए झिझक भी रही थी और शायद वो अर्जुन से वो सब नहीं कह पा रही थी जो वो सेहती थी वह.

"जानती है अगर घर का कोई छोटा सदस्य गलत करता है तोह इसकी वजह होती है गलत परवरिश. मुझे नहीं लगता की छोटे दादा ऐसे होंगे पर विनोद चाचा से आपकी शादी करवा कर उन्होंने सचमुच बहोत बड़ी गलती कर दी चची. मैं जानता हु के आप खुश नहीं है उधर और मुझे ज्यादा जानती नहीं इसलिए बताएंगी भी नहीं. वैसे मुझे भी शायद इसलिए गाँव नहीं भेजते दादा जी क्योंकि वह का माहौल ठीक नहीं होगा.", अर्जुन ने चाँद शब्दों में हे अनामिका से सबकुछ कह दिया था जो वो खुद न कह सकीय. कुछ पल शांत रहने के बाद वो हिम्मत करके बोलने लगी.

"ऐसा है अर्जुन, कहने को तोह तुम मेरे भतीजे हो लेकिन मैं तुम्हे देवर हे समझती हु. कुछ रिश्तो को उमरभर नहीं समझ सकते चाहे वो पति पत्नी का क्यों न हो और कुछ की पहचान के लिए एक मुलाकात हे बहुत. तुम्हारे छोटे दादा ने मुझे एक बार देखा भर था और मेरे पिता जी ने सिर्फ इतना कहा था के ये मेरी बेटी अनामिका है. अगले हे दिन रिश्ता पक्का. तुम कहते हो की तुम्हारे छोटे दादा जी संस्कारी व्यक्ति होंगे क्योंकि वो बड़े पापा के भाई जो है लेकिन तुम्हारी दूसरी बात में हे इसका जवाब है. परवरिश में दोनों तरफ दिन रात का अंतर है अर्जुन.", अनामिका इतना कहने के साथ हे चाय का कप रखती हुई कुछ पल चुप हुई फिर आगे कहने लगी.

"विनोद जी, शादी की पहली हे रात नशे में धुत्त आये थे और उनसे किसी ने सवाल तक नहीं किया. मैंने इसका जीकर जब अपनी सास से किया तोह उनका कहना था के वो मर्द है और शादी में ऐसा सभी करते है, पहले हे दिन से मैं शिकायत न करना शुरू करू. तुम्हारे छोटे दादा जी तोह घर पे सिर्फ सोने आते है सुबह नाश्ते के बाद निकल कर. उनके संस्कार के किस्से सबको नहीं पता क्योंकि एक तोह परिवार का दबदबा, ऊपर से चेहरे पर सबकी भलाई का नक़ाब और जिसके साथ भी वो संकारी काम करते है वो लाचार हे होता है. मैंने 4 साल में उन्हें कभी कुछ गलत करते नहीं देखा इसलिए घर में मुझे वो सबसे भले लगते थे और सच कहु तोह हफ्ते 10 दिन में मेरे लिए ढंग के कपडे, जेवर आदि बनवाते रहते थे. रसोई के सिवा मुझसे कभी और काम नहीं करवाया उन्होंने लेकिन इंसान जितना भी दयालु होने का दिखावा करते रहे, कभी न कभी गलती हो हे जाती है.", अर्जुन के चेहरे पर आये अप्रत्याक्षित भाव देख कर अनमिके के सरल से भोले चेहरे पर एक फीकी मुस्कान आ गयी.

"हैरान हो रहे हो न?"

"हां.. हाँ चची लेकिन आपकी बात पर मुझे पूरा विश्वास है. ऐसा क्या देखा आपने जिस से आपका नजरिया बदल गया?", अर्जुन ने सकुचाते हुए पुछा.

"साल भर पहले इन्होने कुछ गरीब लड़कियों की शादी करवाई थी अर्जुन और वो ऐसा करते रहते है इसलिए समाज में ाची इज्जत है उनकी. हम सभी वह गए थे और मंदिर में शादी करवाने के बाद धर्मशाला में उन लड़कियों को khush-haal भविष्य के लिए daan-dahej भी दिया गया था. तुम्हारे छोटे दादा जी ने ाचा इंतजाम किया था सभी के खाने पीने का और सभी उनकी प्रशंशा कर रहे थे. फिर दोपहर को हम सभी लोग घर के लिए निकल गए लेकिन पापा (कृष्णेश्वर) ने कहा की उन्हें यहाँ धर्मशाला की भी मरम्मत्त के लिए ठेकेदार से बात करनी है जिसके बाद वो सीधा खेत चले जाएंगे.", अर्जुन पूरी दिलचस्पी से ये नयी कहानी सुन्न रहा था जिसके बारे में शायद चची के सिवा कोई जानता हे न हो.

"फिर चची?", अर्जुन अब बिस्टेर पर चौकड़ी लगा कर बैठ चूका था और उसकी अधीरता देख अनामिका भी भोलेपन से मुकुरै.

"हम धर्मशाला से कुछ आगे हे आये थे की माँ जी अपना बैग धर्मशाला के कमरे में भूल गयी थी और ये ध्यान आते हे उन्होंने ड्राइवर को गाडी वापिस घूमने को कहा. 5-6 किलोमीटर जाने के बाद वापिस आये तोह उन्होंने मुझे वो बैग लाने को कहा क्योंकि उस कमरे में हे मैं भी तैयार हुई थी उनके साथ. जब धर्मशाला के अंदर आयी तोह हॉल में सफाई हो रही थी और मैं सीढ़ियों से सीधा ऊपर उस कमरे की तरफ चल दी. दरवाजा खोलती उस से पहले हे कमरे के अंदर से पापा की आवाज सुनाई दी और वो किसी को शांत रहने का कह रहे थे. उसके बाद वह जो हो रहा था वो हर विवाहित व्यक्ति आसानी से समझ सकता है. कोई 5 मिनट बाद कमरे से एक लड़की बहार निकली जिसकी हालत ठीक नहीं थी और वो उनमे से हे थी जिनकी थोड़ी देर पहले शादी करवाई गयी थी.", अर्जुन जहा अपनी चची के andaaj-e-baya से प्रभावित हुआ वही ये सुन्न कर कान गरम हो गए थे की एक बूढा व्यक्ति जिसकी समाज में ाची प्रतिष्ठा है वो ऐसे घिनोने काम भी करता होगा.

"वो इतने बूढ़े और सम्माननीय होने के बावजूद ऐसा कुछ करते है?", अर्जुन और क्या कह सकता था इसके सिवा.? बेशक अनामिका चची उसको देवर की तरह हे समझती थी लेकिन शब्दों का चुनाव दोनों हे सोच विचार कर कर रहे थे.

"बूढ़े होने से क्या वासना शांत हो जाती है? बंद कमरों में कैसा सम्मान दीखता है? ढिठाई तोह मैंने अपनी आँखों से देखि थी जब मैं सीधा कमरे में दाखिल हुई और मुझे सामने देख वो एक पल के लिए हड़बड़ाए पर मेरी नजरो का गुस्सा देख मुझ पर हंसने लगे. वो जान गए थे की मुझे पता चल चूका है और मैं बैग उठा कर जाने लगी तोह उन्होंने बस इतना कहा के 'इस लड़की का नाम भी अनामिका था बहु'. मैं उस दिन समझ गयी थी की इंसान का सही स्वरुप वैसा नहीं होता जैसे हरेक इंसान बहार से देखता है. बंद कमरों में हे असलियत दिखती है बेशक वो कमरे हमारी पहुंच से दूर होते है.", अनामिका की बातों में जो गहराई थी वो सचमुच किसी बुजुर्ग ग्यानी व्यक्ति सी थी. अर्जुन भी तोह लोगो के कई सच ऐसे हे जान पाया था.

"फिर आपने ये बात किस से कही?"

"मैं किस से कहती ये सब? निचे वही लड़की कड़ी थी जिसको मेरी सास कुछ समझा रही थी जिसका साफ़ मतलब था के वो भी जान गयी होंगी. तुम्हारे चाचा तोह ये सब डंके की चोट पर करते है अपनी माँ और जीजा की शह में.", अर्जुन समझ गया था के अनामिका चची कैसे मुँह नहीं खोल सकती और अगर वो बहार किसी को ये सब बताये तोह लोग उल्टा उसके हे चरित्र पर सवाल उठा देंगे क्योंकि सबूत तोह कही है हे नहीं.

"अबसे ऐसा नहीं होगा चची, मैं वादा करता हु आपसे. आपके घरवाले ने लाख गलतियां की हो पहले लेकिन आज जो उन्होंने किया है न उसकी सजा उनके साथ साथ वो सभी भुगतेंगे जिन्होंने उनका साथ दिया है. आपको मेरी बात सुन्न कर बुरा लग रहा होगा या गुस्सा भी आ रहा होगा पर मैं आपका पूरा सम्मान करता हु. विनोद चाचा ने आज मंजू को अगवाह करने की साजिश की थी और वो कामयाब भी हो हे जाते जो किस्मत मेरा साथ न देती.", अर्जुन ने पूरी बात कहते हुए एक बार भी शब्द ऊँचे नहीं किये थे लेकिन अनामिका के भोले चेहरे पर अब घेरा डर आ चूका था.

"वो कैसे हैं तुम अभी जानते नहीं हो अर्जुन. और मैं तुम्हारी बात से बिलकुल गुस्सा नहीं हु क्यूंकि मैं अपने पति की काली करतूते तुमसे बेहतर जानती हु. तुम समझदार जरूर हो लेकिन साफदिल हो. तुम्हारे चाचा तुम्हे भी नुक्सान पंहुचा सकते है बिना पता लगे. हो सके तोह ये बात तुम्हे अपने पिता या दादा जी से करनी चाहिए. मैं तोह यहाँ कुछ दिन की मेहमान हु इसलिए शायद हमारा रिश्ता उतना मजबूत नहीं लेकिन मुझे तुम्हरी फ़िक्र है.", अनामिका की बात सुन्न कर अर्जुन ने शरारत से उनका गाल चूम लिया और बिस्टेर से उठ खड़ा हुआ.

"चची तोह सबके सामने हो न आप. अकेले में तोह आपने देवर बनाया है मुझे. बेफिक्र रहिये बस और देखिये कैसे मैं लंका में आग लगता हु वो भी किसी को कानो कान खबर हुए बिना. कुछ रिश्ते बरसो साथ रहने पर नहीं बन्न पाते लेकिन कुछ एक मुलाकात में जुड़ जाते है.", अर्जुन ने अनामिका का डायलाग उस पर हे चिपका दिया जो अपना गाल चूमे जाने पर जहा कुछ देर हैरान थी अब वही शर्माती हुई अर्जुन की कमर पर थप्पड़ मारने का नाटक करने लगी.

"सही कहती है बड़ी माँ, तुम फंदेबाज हो अर्जुन. चची को चूम लिया?"

"आपको बुरा लगा क्या?", अर्जुन ने एकदम से चेहरे को गंभीर करते हुए माफ़ी मांगने के अंदाज से कहा तोह अनामिका भी चिंतित होती कड़ी हो गयी.

"नहीं नहीं.. हमारा ये मतलब नहीं था अर्जुन. एक तुम्ही तोह हो जिसके साथ हम हंस बोल लेते है. तुम्हारी किसी हरकत से हमको बुरा नहीं लगा और तुम गलत भावना भी तोह नहीं ...", अनामिका आगे कुछ बोलती उस से पहले अर्जुन ने दूसरी तरफ का गाल भी चूम लिया. बात कहते कहते वो फिर से हैरान हुई तोह हँसता हुआ अर्जुन दरवाजे से बहार भाग चला.

"मेरी भोली चाची. आदत दाल लो इन शरारतो की, करता रहूँगा अब तोह.", जाने से पहले अर्जुन ने ऐसा कहा तोह अनामिका सब भूल कर वैसे हे मुस्कुराने लगी जैसे कोई भाभी अपने लाडले देवर के नटखटपन पर करती है. उम्र का ज्यादा फरक न होना भी इन दोनों में चची भतीजे की जगह देवर भाभी जैसा सम्बन्ध बना रहा था. अर्जुन हे तोह वो पहला व्यक्ति था जिसने अनामिका की सुविधा के लिए वो सब कपडे दिलवाये थे जो हर पति को अपनी बीवी के लिए लेने चाहिए. देवर भी ऐसा कर हे सकता है और जितना ख़याल वो सबका रखता था उतना हे समय अर्जुन ने अनामिका और उसके बेटे को भी दिया था.

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यहाँ मार्किट में आज पंडित जी के परिवार की अलग हे चहल पहल दिख रही थी. सभी बचो को उनकी पसंद के कुछ कपडे, saaj-sajja का सामान दिलाने के साथ कौशल्या जी ने कुछ साड़ी भी उपहार स्वरुप देने के लिए पैक करवा ली थी. अपनी बहुओं को लिए वो कपड़ो के उस बड़े शोरूम पर गयी तोह गल्ले पर बैठे लाला जी अपनी कुर्सी से खड़े हो कर हाथ जोड़ने लगे.

"आइयें आइयें चची जी. हमारा सौभाग्य के आपने आज गरीब की दूकान पर कदम रखे.", लाला जी को ऐसे हाथ जोड़ते देख उनके कुछ कर्मचारी तुरंत हे हरकत में आ गए. वो समझ चुके थे के ये बहोत हे ख़ास ग्राहक है और इन्हे पूरी सुविधा मिलनी चाहिए.

"अरे बैठो बबलू बीटा, वो तोह आज बचो के साथ मार्किट आयी तोह सोचा तुमसे भी मिल लू और बहुओं को शादी के लिए कपडे भी दिलवा दू. बच्चियां तोह अब खाने पीने में मगन है बहार तोह इतने समय ये काम भी कर लेते है. वैसे तुम्हारे चाचा तोह मिलते रहते है तुमसे और शादी में समय से पहुंच जाना.", अब जिस तरह इन लाला जी को उनके बचपन के नाम से बुला रही थी ये तोह बहुत खुश हुए लेकिन बाकी सभी समझ गए की थानेदारनी जी क्या मायने रखती है. 2-3 लड़कियां उनके करीब आ कड़ी हुई.

"बस चची जी, आपने दर्शन दे दिए बहोत है. शादी का निमंत्रण तोह राजू भाई पहले हे दे गए थे घर पे. बिटिया, मैडम को साथ ले जाओ और सबसे बेहतरीन साड़ी दिखाना. छोटू 5 गिलास जूस मंगवा, बिना मीठा डलवाये और जल्दी.", लाला ने तुरंत रेखा जी, कृष्णा, रोमिला को 3 लड़कियों के साथ भेज दिया और खुद कौशल्या जी के सामने सोफे पर बैठ गए. नरिंदर जी तोह अपनी हे धुन में हर तरफ घूम फिर कर सभी तरह के कपडे निहार रहे थे. कही शेरवानी, कही रेशम के कुर्ते पाजामे तोह कही एक से बढ़ कर एक coat-pant. एक तरह से ये 2 मंजिला शोरूम हरेक ख़ास परिधान से सजा था जिसकी चाहत प्रत्येक purush-mahila रखते है. उन्होंने तुरंत हे वो महीन कपडे का सफ़ेद coat-pant बहार निकलवाया जिस पर काली धारियां थी.

"ये कुछ अलग कपडा है दोस्त?", नरिंदर जी हमेशा हे ऐसे पेश आते थे सभ्य जगह पर और उनके द्वारा दोस्त कहने पर वो काउंटर के पीछे वाला लड़का भी मुस्कुरा दिया.

"जी सर, ये समर सूट है जो आप गर्मी में आराम से पहन सकते है. इसके साथ हे ये ice-blue (नीली) शर्ट है सर. और ये जूते हम बेचते नहीं लेकिन आप आईडिया ले सकते है इसके साथ जूते, बेल्ट और घडी का.", हाथ लगा कर देखते हुए नरिंदर जी को ये परिधान एक बार में हे जाँच चूका था. और अपनी पीठ पर हाथ का स्पर्श मिलते हे उन्होंने बिना देखे कहा.

"यार शंकर, ऐसे हे 5 सूट तैयार करवाए क्या शादी के लिए? तेरा, उमेद का, राजू भैया और अर्जुन का भी मेरे साथ साथ.", सचमुच ये बड़ा भाई हे था उनका जो सीधा हॉस्पिटल से फारिग हो कर बताई गयी जगह आ पंहुचा था. एक हे नजर में वो coat-pant उन्हें भी पसंद आ गया था.

"अर्जुन अपनी मर्जी से लेगा और उसका माप अपने को पता भी नहीं. और उमेद दिल्ली से काला पठानी सूट ले चूका है इसलिए 3 बनवा ले. छोटे, coat-pant के साथ ये पूरा सेट चाहिए सिवाए इस घडी के.", शंकर जी की बात सुन्न कर वो लड़का थोड़ा असहज हो गया क्योंकि वो चमड़े के ख़ास जूते और बेल्ट सिर्फ दर्शाने के लिए रखे गए थे.

"हाँ क्यों नहीं शंकर भाई, आप बेफिक्र रहिये और ये कोट पंत पहले से हे तैयार है बस आपका साइज देख लेते है और मैं परसो घर भिजवा दूंगा.", लाला खुद चल कर आये तोह शंकर और नरिंदर उनसे गले लग कर मिले. लड़का इन्हे नहीं जानता था और वो ख़ामोशी से एक तरफ हो गे.

"बबलू भैया, शोरूम तोह बहोत हे आलिशान बना लिया आपने. वैसे जूते के लिए परेशानी हो तोह हम देख लेंगे.", नरिंदर जी ने जैसे हे कहा तोह लाला ने हाथ जोड़ दिए.

"अरे मेरे मालिक ऐसी बात न कहो. बड़ा भाई भी मानते हो और फिर ऐसी बात? अपने मोनू का हे जूते का शोरूम है सामने वाली तरफ. ये हाथ से बने ख़ास चमड़े के जूते सिर्फ उसके हे पास है. बहु और बेटियों के हिसाब से भी वह सबकुछ है. दिन के समय आये तोह इत्मीनान से ढेरो ऑप्शन देख सकते है. शाम का व्यस्त समय है और उधर भीड़ में अपने बचे तंग हो ये मुझे भी ठीक नहीं लगता.", लाला के इस अपनेपन पर शंकर जी भी उनका हाथ दबाते हुए ख़ुशी दिखने लगे. संतरे का जूस लिए वो लड़का भी आ गया था और तीनो ने गिलास उठाने के बाद इधर उधर की बातें शुरू कर दी.

रेखा जी ने उधर अपनी जेठानी के साथ शालिनी, मधु, राजेश्वरी, रेणुका आदि के लिए भी ख़ास साड़ी पसंद कर ली थी और अब वो अपनी सास की बगल में बैठी उन्हें सब बता रही थी. साथ हे रोमिला और कृष्णा जी भी थी. इन्हे तोह कुछ भी समय नहीं लगा था. कौशल्या जी को भी ख़ुशी हुई थी उनकी बहुओं ने उनके और पूर्णिमा जी के लिए भी बड़ी हे शालीन साड़ी पसंद की थी.

"बबलू बीटा, बिल बनवा दो सबका.", कौशल्या जी की आवाज पर ये तीनो लोग उधर आये तोह अब लाला जी तोह ना में गर्दन हिलने लगे लेकिन अपनी चची की आँखों में नाराजगी देख बस इतना हे बोले.

"चची 50 हजार."

"ये झूठ बोल रहे है मम्मी. इतने के तोह हम तीनो के सूट हे होंगे. 10 साड़ी भी तोह ली होंगी न inhone?",Narinder जी के ऐसा कहते हे कौशल्या जी ने लाला का कान हलके से पकड़ लिया.

"बनिया दूकान पर व्यापार न करे तोह वो बेईमानी हुई बीटा. चल जो सही डिस्काउंट लगे वो दे और बाकी बता कितना हुआ. मेरी औलाद के साथ साथ मैं भी ाचा खासा कमाती हु.", कौशल्या जी के इस कथन पर लाला ने अनमने भाव से ऐसा हे झूठमूठ का गणित करते हुए एक लाख 40 हजार का बिल बना दिया जो शायद असल का भी आधा था.

"ये रख डेढ़ लाख और आइंदा ये दूसरी कक्षा का गणित मेरे सामने मैट करना.", कौशल्या जी की झिड़की पर लाला ख़ुशी से वो पैसे लेते हुए अपने लड़को से सारा सामान बहार गाडी में पहुंचने को बोलै.

"चची जी, कभी आप भी सोमवार को घर दर्शन दीजिये. दूकान उस दिन बंद रहती है तोह आपकी बहु और पौता पौती भी मिल लेंगे.", लाला सभी के साथ बहार तक चला आया था और पार्क के पास घर के बचे बर्फ के गोले, rabri-faluda खाते दिखे तोह नरिंदर जी यहाँ से पल्ला झाड़ कर उधर हे हो लिए.

"जरूर आउंगी बीटा बस शादी तक थोड़ा व्यस्त है फिर पक्का आउंगी. सभी को लेके आना है शादी में. शंकर, बचो को मस्ती करने दे. वो इन्दर और संजीव के साथ आ जायेंगे. तू हमको तेरी गाडी में ले चल घर.", कौशल्या जी ने सामने सभी को हँसते खेलते देखा तोह चेहरे पर प्रसन्नता आ गयी. शंकर जी भी देख रहे थे की उनकी बेटियां, भतीजा और भाई कैसे 3 रेहड़ियों को घेरे खड़े है.

"हाँ माँ, हम चलते है और इन्हे लगे रहने दो. वैसे भी खाना तोह ये लोग खाने नहीं वाले क्योंकि 8 बज चुके है. पापा और बाकी घरवालों का लेट हो रहा है. फिर खाने के बाद मुझे आराम भी करना है.", उनकी एस्टीम की डिक्की में सारा सामान रखवाया जा चूका था और लाला जी से विदा लेते हुए ये 5 लोग सबको बता कर घर की तरफ निकल चले. बाकी लोगो की अब पूरी मौज थी और अगर किसी की यहाँ कमी थी तोह वो अर्जुन था.

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इधर धर्मपाल जी के घर में संदीप और अर्जुन वीडियो गेम खेलने में इस कदर डूबे थे की उन्हें घर में किसी के होने न होने की परवाह तक न रही थी. जोर शोर से वो धड़ाधड़ बटन दबाते हुए रंगीन टेलीविज़न पर चलती इस वीडियो गेम में दुश्मनो का सफाया करने में जुटे रहे. धर्मपाल जी और उनकी धर्मपत्नी ने एक बार इस कमरे में झाँका और फिर मुस्कुराते हुए सेक्टर की मार्किट की तरफ निकल चले ज्योति को बता कर.

"पॉज कर भाई, एक घंटे से रोके बैठा हु. अभी बाथरूम जाना हे पड़ेगा.", संदीप ने अपना रिमोट का वो ख़ास बटन दबा कर गेम रोकी और पिछले कमरे के बाथरूम की तरफ दौड़ गया. अर्जुन उसकी हालत पर हंस रहा था लेकिन तुरंत खामोश हो गया जब ज्योति सलवार कमीज पहने सेहमी हुई सी उसके करीब आ कड़ी हुई. अर्जुन जहा सहज रहने की पूरी कोशिश कर रहा था वही ज्योति के होंठ कुछ बोलते बोलते रुक रहे थे.

"वो.. मुझे तुम्हारी हेल्प चाहिए अर्जुन. जानती हु मैं बहोत गलत लड़की हु और तुमने प्यार करने के साथ साथ हमेशा बड़ी बहिन की तरह मन मुझे.", बात कहते कहते ज्योति की हिरणी सी आँखें दबदबा गयी तोह अर्जुन ने तुरंत खड़े हो कर उसको अपनी बाहोने में भर लिया.

"दीदी, आपसे नाराज हु तोह इसका ये मतलब नहीं की मैं परेशानी में आपके साथ नहीं. आप बस एक बार अपने इस भाई को बता कर देखो, कभी परेशां नहीं होने दूंगा.", अर्जुन के सीने से महीनो बाद लगने पर ज्योति को महसूस हुआ था के बाकी सबसे अर्जुन क्यों अलग और ख़ास था. वो दिल से ज्योति से प्यार करता था और ज्योति ने उसके हे साथ विश्वासघात किया.

"भाई.. जबसे तू गया था मैं कभी किसी से नहीं मिली. लेकिन अभी कुछ दिन से वरिंदर भैया (पडोसी) मुझे धमकी दे रहे है की मैंने उनके साथ वो सब नहीं किया तोह वो मुझे बदनाम कर देंगे मेरे होने वाले saas-sasur को मेरे और उनके बारे में बता कर.", अर्जुन का दिमाग जो अक्सर शांत रहता था वो उबलने लगा था उस व्यक्ति की ऐसी धमकी सुन्न कर.

"इस वरिंदर साले की तोह मैं.. उसके घर कौन कौन है?", अर्जुन ने सिर्फ इतना हे सवाल किया था.

"उनकी बीवी 5 दिन पहले हे मायके गयी है और वो तभी से मेरे पीछे लगे है. जब भी कही अकेले दिखती हु यही बात और आज तोह मार्किट से घर आते हुए अगली गली में मेरा हाथ भी पकड़ लिया.", अर्जुन को जब पता लगा की वरिंदर भैया घर में अकेले हे हैं तोह वो संदीप के आने का इन्तजार करने लगा. एक मिनट बाद हे संदीप चेहरा धो कर कमरे में आया तोह अर्जुन ने उसको बस इतना हे कहा.

"मैं दीदी के साथ जरा पड़ोस वाली दूकान तक जा रहा हु. तुम घर पर हे रहना क्योंकि अंकल आंटी भी नहीं है. जल्दी आ जायेंगे.", अर्जुन के ऐसा कहते हे संदीप दोनों को देख कर कंधे उचकाते हुए बोलै.

"तुम साथ जा रहे हो तोह मुझे क्या फ़िक्र. वैसे भी मुझे कुछ काम करना है तोह घर पे हे रहूँगा.", अर्जुन को पता था के ये ठरकी अकेले में मुट्ठ हे मारेंगे. मैं में संदीप को कोस्टा हुआ वो ज्योति को लिए इनके साथ वाली गली में अगले घर के गेट तक आ पंहुचा. ज्योति अभी भी हैरान थी और उसको समझ नहीं आ रहा था के अर्जुन क्या करने वाला है.

"आप टेंशन मैट लो और मेरे पर भरोसा रखो बस.", अर्जुन ने लोहे के गेट के ऊपर लगा हैंडल घूमते हुए दरवाजा खोला और इस घर के अंदर चला आया. आँगन में एक मोटरसाइकिल कड़ी थी और इस एक कनाल के घर का ज्यादातर हिस्सा खाली हे था जहा सिर्फ 3 कमरे बने थे. पहले हे कमरे में टेलीविज़न की आवाज बता रही थी की वरिंदर इधर हे बैठा है. जाली वाला दरवाजा बेहिचक खोल अर्जुन अंदर दाखिल हुआ तोह बिस्टेर पर बैठा 25-26 साल का वो व्यक्ति झटके से उठ खड़ा हुआ. अकेले में वो रॉयल स्टैग शराब के पेग लगा कर जैसे अपनी वासना को हवा दे रहा था और ज्योति को इस लड़के के साथ अपने कमरे में देख जहा वो हैरान हुआ था वही अब उसके चेहरे पर कमीनी हंसी आ गयी.

"वाह, मेरी छम्मकछल्लो तोह तेरा ये इरादा था. पहले हे बता देती की तुझे एक के साथ मजा नहीं आता. मैं गाँव से 3-4 यार बुलवा लेता तेरी तगड़ी... आअह्ह्ह्ह.. behanchh...aahhhhh re..bachao...", वरिंदर और भी अभद्रता करता उस से पहले हे अर्जुन ने उसकी गर्दन दबोचते हुए फर्श पर पटक दिया.

"दीदी, दरवाजा बंद करो जरा आप. इसकी हवस मैं ाचे से शांत करता हु.", अर्जुन की ताक़त का हल्का सा नमूना देख कर वरिंदर फर्श पर गिरा अपने सर को दबाते हुए दूसरे हाथ से उसको दूर रहने को इशारा करने लगा. ज्योति ने दोनों दरवाजे बंद करने के बाद अविश्वास से अर्जुन और जमीन पर गिरे वरिंदर को देखा. अर्जुन उसकी छाती पर पाँव रखते हुए वरिंदर की निक्कर कच्चे समेत उतार कर दूर फेंक चूका था.

"अपने बालो से रबर देना दीदी.", अर्जुन का इरादा समझते हे जहा वरिंदर कसमसाने लगा वही ज्योति ने बिना देर किये निचे देखे बिना अर्जुन को अपने बालो से रबर निकाल कर थमा दिया. ज्योति पीठ घुमा कर कड़ी थी और टेलीविज़न पर चलती नीली फिल्म की तरफ किसी का ध्यान न था.

"देखो अर्जुन, तुम गलत कर रहे हो. मैं तुम्हारे भाई और baap....aahhhh..", उसकी सिकुड़ी हुई नुन्नी पर अर्जुन ने 3-4 बार घुमा कर रबर लपेटा तोह दर्द से वरिंदर दोहरा हो गया. गाल पर चटाक से 4 झापड़ पड़ते हे होंठ तक लहूलुहान थे.

"मेरे भाई को पता लगा न तोह वो गोली मार देगा तुझे हरामजादे. तेरी बीवी पेट से है न और तू ऐसे दुसरो की बेटी को मजबूर करता फिर रहा है अपने निचे लिटाने के लिए? रही बात की तू कौन है या मैं कौन हु तोह बस इतना जान ले की कल अगर तू इस घर में दिखा तोह न मेरा बाप तुझे बचने आएगा और न तेरा.", अर्जुन ने अपनी बात कहने के साथ साथ वरिंदर के उस औसत से लिंग को फूलते देख बिस्टेर पर रखे शराब के अढिये से बची हुई दारु उसके ऊपर उड़ेल दी. रबर के कसाव से जहा वो बुरी तरह फूल कर दुःख रहा था, वही स्पिरिट से उसमे असहनीय जलन उठने लगी.

"आअह्ह्ह्हह.. मैं सब मानूंगा.. आह्ह्ह्ह.. बस मुझे छोड़ दो..", वरिंदर पर तरस खा कर अर्जुन ने उसके सीने से पाँव हटा लिया. तुरंत उस रबर को जैसे तैसे खोल कर वरिंदर अपने लिंग पर ठंडा पानी उड़ेलने लगा. उसका शरीर सफ़ेद पड़ गया था इतने हे जुल्म से. ज्योति की उपस्थिति से उसने वो घुटने तक की निक्कर पहनते हे अपने दोनों हाथ ज्योति की तरफ जोड़ दिए.

"मुझे माफ़ कर दे ज्योति.", लेकिन यहाँ माफ़ी की जगह ज्योति ने अपनी शरीर की साड़ी जान एकत्रित करते हुए उसके सूझे हुए जबड़े पर करारा तमाचा जड़ दिया. अर्जुन ने टेलीविज़न बंद किया और घुटनो के बल बैठे वरिंदर के बाल मजबूती से पकड़ते हुए सार्ड लहजे में कहा.

"तुमने जो अपराध किया है उसकी सजा 7-8 साल भी हो सकती है या फिर मैं अभी तुम्हारा वो औजार काट सकता हु जिस पर तुम्हे घमंड है. मैंने जो भी कहा उसको समझने के बाद आशा करता हु तुम सवेरे इस घर में नहीं दिखोगे. ऐसा कर इसलिए नहीं रहा क्योंकि नादानी ज्योति दीदी से भी हुई थी लेकिन जब इंसान सुधारना चाहे तोह उसकी मदद करनी चाहिए, शोषण नहीं. इसकी शादी तुड़वाना तोह दूर, आइंदा ख़याल भी तुम्हारे मैं में आया तोह क्सक्सक्सक्स गाँव पहुंचने में मुझे आधे घंटे से ज्यादा नहीं लगेगा.", वरिंदर की आँखों से दर्द और घुटन की वजह से आंसू बहने लगे थे. अर्जुन ने उसको आइना दिखा कर बता दिया था के वो बलात्कारी हे हैं जिसकी सजा फ़िलहाल उसको नहीं मिल रही.

"किसी से इसका जीकर मैट करना अर्जुन. मेरी बीवी और माँ के जीने का सहारा मैं हे हु. आइंदा मैं इधर कभी नजर नहीं आऊंगा.", वरिंदर के दोनों हाथ जुड़े थे और इतनी हे देर में चेहरे की सूजन बढ़ने लगी थी. होंठो से निकलता खून ठुड्डी तक आ चला था.

"यही बेहतर होगा तुम्हारे लिए. मुझे तुम जैसे व्यक्ति से कोई हमदर्दी नहीं है. चलो दीदी.", अर्जुन ने वरिंदर को फर्श पर उसके हाल पर छोड़ते हुए दरवाजा खोला और ज्योति का हाथ थामे बहार निकल आया.

"तुम इतनी परवाह करते हो मेरी?", ज्योति ने बहार अँधेरे में रुंधे गले से ऐसा कहा तोह अर्जुन ने बड़े प्यार से उसका सर सेहला दिया.

"प्यार बदल तोह नहीं सकता न ज्योति? तुमने जो गलतियां की शायद उन्हें सुधरने में तुम्हे ये परेशानियां उठानी पड़ी लेकिन मेरे लिए तुम वही हो जो पहले थी. बस अब जो जीवन की सही राह चुनी है उस पर अटल रहना. तुम्हे अब वो ख़ुशी तोह नहीं दे सकता लेकिन एक भाई का फ़र्ज़ जीवनभर निभाता रहूँगा. चलो अब तुम निश्चिन्त हो कर घर जाओ, मैं भी निकलता हु.", अर्जुन की बात सुन्न कर ज्योति के बार कसके उसके गले लगी और जल्द हे अलग होती हुई अपने घर तक चली आयी.

"थैंक यू भाई."

"गूडनिघत. जल्द हे मिलता हु.", अर्जुन ने हाथ हिला कर अपने घर का रुख किया तोह ज्योति उसको तब तक देखती रही जबतक वो आँखों से ओझल न हो गया. अर्जुन उसके जीवन का तारणहार बन्न कर आया था ज्योति द्वारा अतीत में छले जाने के बावजूद.

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जबतक सभी लोग मार्किट से khaa-pee कर वापिस आये यहाँ घर के बाकी सदस्य ratri-bhoj से फारिग हो कर अपने अपने कक्ष में जा चुके थे. अगले आधे घंटे में ये लोग भी अपने बिस्टेर पर आ चुके थे. लड़कियां ऊपर वाली मंजिल के पाने पिछले हिस्से में कपडे बदल कर गप्पे हाँक रही थी और बहार बैठक वाले कक्ष में शंकर अपने भाई की बगल में लेता कुछ दुविधा में था.

"सो जा भाई, वैसे भी कल तुम्हारा बड़ा काम इन्तजार कर रहा है.", नरिंदर ने जैसे हे शंकर को विचारो में खोया देखा तोह हिलाते हुए कहा.

"यार, सोच रहा था के आज लता के पास चला जाऊ. फिर ये ख़याल आ रहा है की रेखा.."

"ओह भाई मेरे, वह गया तोह बापू तेरी लंका लगा देगा और चंद्रो ताई के घर इस वक़्त जाना ठीक भी नहीं. बिजेन्दर भी रहता है यार अब वह. और रेखा भाभी के पास आधे दिल से जा कर क्यों उन्हें दुखी करना चाहता है? तेरे घंटे में ये आग काबू करना सीख थोड़ा. वैसे भी उन्हें आराम करने दे, सवेरे 4 बजे से काम पर लग जाती है. चल सो जा नहीं तोह थानेदार ने फिर पंजाबी में हमारी मार लेनी है.", नरिंदर की बात पूरी तरह वाजिब थी और शंकर मैं मसोस कर लेट गया. संजीव आज अकेला मेहमान कमरे में सोया था काम की वजह से और पिछली तरफ रेखा नाहा कर अपने कमरे में आयी तोह न वह रुपाली थी और न ऋतू. फिर अर्जुन का ध्यान आया तोह जीरो का बल्ब जलने के बाद एक लाल रंग की ख़ास निघ्त्य पहन कर वो दरवाजा ढालने के बाद बिस्टेर पर लेट गयी.

"चची, आप भी आज निचे हे सो जाए माधुरी दीदी वाले कमरे में. वह सिर्फ दीदी हे हैं और आपको अकेले सोने की परेशानी भी नहीं होगी.", अर्जुन अनामिका चची के लिए दूध का गिलास लाया था और अब उनके करीब बैठा छोटे बचे को सीने से लगाए थपकी दे रहा था. निकेतन अपनी माँ का दूध पीने के बाद बस सोने हे लगा था और अर्जुन के सीने से लग कर वो भी सुकून में रहता था.

"अब अकेले में तुम भाभी हे कहा करो. हमारा कोई देवर नहीं है अर्जुन और निकेतन भी तुम्हे पसंद करता है. वैसे मेरा वजन बढ़ गया तोह बहोत परेशानी होगी.", अनामिका की बातें और भोलेपन पर अर्जुन भी सोचने लगता था की भगवन भी कई बार गलत फैंसले करवाता है लोगो से. इतनी प्यारी महिला को सौंपा भी तोह ऐसे इंसान को जो औरत को पाँव की जूती से अधिक कुछ समझता हे नहीं.

"चलो फिर प्यारी भाभी जी, आप निकेतन के साथ निचे माधुरी दीदी के कमरे में सोने चलिए. रही बात वजन बढ़ने की तोह वो जरुरी है और इतना मुझे भी पता है के चूल्हा- रसोई करने वाली आप जैसी युवती हमेशा फिट रहेगी. जितने यहाँ हो, इतने तोह खुद पर ध्यान दो. अब जल्दी दूध ख़तम करो आप क्योंकि 11 बज चुके है और इसके साथ आपकी नींद पूरी नहीं होती.", अर्जुन ने खड़े होते हुए बिस्टेर के एक तरफ रखा अनामिका का गाउन उठा लिया.

"अब ये क्या करने लगे तुम?"

"ओह भाभी, रात को साड़ी में सोयेंगी क्या? दीदी के कमरे में बदल लेना ये.", अर्जुन के ऐसा कहने पर अनामिका थोड़ा खुल कर मुस्कुराई. होंठो पर आये दूध के 2 कतरे इस भोली सूरत को भी उत्तेजक दिखा रहे थे.

"यहाँ बदल कर चलने में कोई परहेज है तुम्हे?", अब अर्जुन क्या जवाब देता.

"हाँ. आप बदल लो, मैं बहार चलता हु.", अर्जुन के ऐसा कहते हे वो किसी बची की तरह खिलखिला कर हंसने लगी.

"बड़े अजीब देवर हो और बिलकुल बैलबुद्धि, जैसा बड़ी माँ कहती है. हम बाथरूम से बदल कर आते है. तुम यही रुको.", अनामिका के ऐसा कहते हे अर्जुन ने शर्म से सर झुका लिया अपनी सोच पर. अनामिका जैसे हे बिस्टेर से उठी, वो हरे रंग का ब्लाउज साड़ी के सरकने से अर्जुन की नजरो के सामने आ गया. हक्क खुले होने पर वो gol-matol दूध से भरा गोरा सतांन गीले निप्पल के साथ बेपर्दा था. अब जहा अर्जुन का गाला सूख गया इस नज़ारे से वही अनामिका ने उसकी नजरो को जड़ देखते हुए उनका पीछा किया तोह एक तेज सिहरन पूरे शरीर में हो गयी. वो फुर्ती से साड़ी को सीने पर फैलाती हुई अर्जुन के हाथ से अपने वस्त्र लेती बाथरूम में दौड़ गयी.

"सॉरी. मुझे ऐसे नहीं देखना चाहिए था.", कपडे बदल कर अनामिका सकुचाती हुई बहार आयी तोह अर्जुन ने नजरे झुकाये बस इतना हे कहा.

"सॉरी. मुझे ध्यान रखना चाहिए था, गलती तुम्हारी नहीं है.", अनामिका ने बचे को लेने के लिए हाथ आगे बढ़ाये तोह एक बार फिर दोनों के शरीर कांप उठे. इस बार तोह दोनों उभारो पर अर्जुन के हाथ किनारो पर रगड़े गए.

"सॉरी.", दोनों ने जैसे हे ये लफ्ज़ एक साथ कहा तोह शर्म के साथ साथ चेहरे पर मुस्कान आ गई थी.

"देवर जी, इतना चलता है और बाकी पहले वाली तोह मेरी गलती थी. अब चलो यहाँ से कही तीसरी बार शायद सॉरी की जगह कुछ और हे न बोलना पड़ा.", अनामिका चची की इस बात पर अर्जुन सर खुजाता हुआ उनके पीछे पीछे चलने लगा था. इतनी कामुक घटनाये होने पर आज वो जान चूका था की माँ के साथ ये रात शांत नहीं जाने वाली. अनामिका चची के बारे में बेशक वो कुछ और ख़याल नहीं रखता था लेकिन उस नज़ारे ने अनजाने हे उसको उत्तेजिट कर हे दिया था जिसका खामियाजा अब उसकी माँ को भुगतना पड़ेगा.
 
देखिये आप सभी को मैं निराश नहीं करना चाहता था. ये part कल बी मिस्टेक डिलीट हो गया था और नोटपैड में कण्ट्रोल ज़ सिर्फ 2 बार काम करता है. आज का अपडेट फिर से लिखना पड़ा. अब जो एक्सपेक्टेड अपडेट है वो मैं कल रात पूरा दूंगा जिसमे ात लीस्ट 8 कन्वर्सेशन होंगे. मतलब क्रमश जारी वाला भी हो सकता है. उसके बाद अगले 3 दिन 2 अपडेट में और फिर सरप्राइज
 
दोस्तों कई बार बहोत ग्लानि महसूस होती है की सभी भाइयों को धन्यवाद भी नहीं कर पता. लेकिन उतनी हे ख़ुशी होती है जब सभी को एक दूसरे के जवाब, खिंचाई करते देकता हु.

काम का बोझ तोह सभी को है और मेरे साथ समस्या ऐसी है की घर से बहार लिख नहीं सकता और घर पर वक़्त देने के बाद रात में चोरी चोरी लिखता हु या फिर जब बीवी न हो तभी. कोविद टाइम ने हाथ बाँध दिए है इसलिए सिर्फ अपडेट देने के बाद आपके कमेंट लिखे हे कर पता हु.

जल्द हे सभी से बातें भी करूँगा और धन्यवाद भी.

एक पौधा रोज उगाये, कल की हमारे हे बचे उस छाव में रहेंगे. शुभरात्रि

❤️💚🌱
 
सबसे जरुरी है जीवन

फिर आपका खुश रहना

खुश भी 2 तरह से रहा जाता है

1 परिवार चिंतामुक्त हो और आपके साथ

2 आप जो भी करो उस से संतुष्ट भी हो और आपको किसी के सामने हाथ भी फ़ैलाने नहीं पड़े

फिर आती है बात संसाधनों की और काम, जगह और परिवार के हिसाब से वो उचित हो. किसान के पास ट्रेक्टर, व्यापारी के पास दूकान और विद्यार्थी के पास किताब.

मेरी किशोर अवस्था में लमल का स्कूटर मिला क्योंकि वो जरुरत के हिसाब से हर व्यक्ति प्रयोग करता था. फिर 18 पार होने पर मोटरसाइकिल, जो बेवजह चलनी मन थी. Aas-pados में जाने के लिए पैदल हे प्राथमिकता थी. कॉलेज ख़तम होने तक जो भी वाहन चलाये वो सभी घरवालों की दें थे.

कम्प्यूटर्स में डिग्री करने के बाद 2 साल तोह पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ज्यादा उपयोग किया घर से बहार. फिर शादी के समय अपनी बीवी को पहला तोहफा कार स्वरुप दिया क्योंकि हर व्यक्ति की चाहत होती है की उसकी बीवी आराम से और सुरक्षित रहे. नौकरी छोड़ कर मैंने अपना काम भी इसलिए शुरू किया क्योंकि आप जैसा मर्जी सोचिये पर पैसे की एहमियत बहोत है, वो भी जब वो आपका हो.

5 साल तोह मैं अपने बारे में सोच हे न पाया इस दौरान. हाँ परिवार को और ख़ास कर अपनी बीवी को पूरा समय दिया. फिर अपनी कला को तराशने लग गया क्योंकि बाकी सबकुछ तोह सुरक्षित कर दिया था. आज कला भी जीवन यापन में पूरा सहयोग करती है और बिज़नेस भी.

फिर आती है बात संसाधनों की और जैसा माहौल वैसा उपयोग. पहाड़ो में अकेला था तोह बुलेट से ज्यादा मैं एक्टिवा कस उपयोग करता था. शहर आने के लिए कार. बिज़नेस मीटिंग हो या क्लाइंट भी बड़ा व्यक्ति हो तोह आपको वैसा इम्प्रैशन देना जरुरी है. इसलिए बीवी द्वारा उपहार दी गयी बंव का प्रयोग कर लेता हु.

गाँव देहात में रहने जाता हु तोह वह इस सबकी जरुरत हे नहीं पड़ती. जमीन पर रहना है तोह खामख्वाह क्यों पर फ़ैलाने. बुलंद इमारतों को झुकना हो तोह उड़ान जरुरी है.

शिक्षा हमेशा वही चुनो जो पसंद हो. कोई भेद चाल नहीं फिर चाहे खेती करो या डेरी खोलो. दिल और जूनून का समावेश है तोह सही दिशा में पूरी म्हणत करो. दौलत, शोहरत मायने भी नहीं रखेंगे और खुद बा खुद सब मिलेगा. समय की कदर करो और सही उपयोग भी क्योंकि हम इंसान काम को टालने में माहिर है क्योंकि पूरी ज़िन्दगी पड़ी है न तोह कभी भी कर लेंगे?

जब्ब जवान हो तोह मस्ती मजाक के साथ अपना करियर बनाओ. किस्मत से प्यार हो जाए तोह उस से खुद को मजबूत करो क्योंकि फिर आप 2 लोग हो जाते हो, बिस्टेर शादी के बाद टॉड लेना पर ऐसे समय में मिल कर उस घर को बनो जहा बिस्टेर तोडना हो. 24 घंटे वाली कोई घडी नहीं. उचित खुराक, आराम और काम के साथ साथ अपनी का ख़याल रखो क्योंकि सबसे बड़ी दौलत जीवन हे तोह हैं.

स्पीच लम्बी हो गयी लेकिन शायद आप लोग समझेंगे मेरी बात का मतलब. आवरण भी जरुरी है और आत्मा भी. 50 की उम्र में या तोह मुस्कुराओगे या फिर ..

Shubh-prabhaat

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