Incest Pyaar - 100 Baar - Page 33 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 161

बाज़ीगर (1)

रात साढ़े 11 के वक़्त अर्जुन कमरे में दाखिल हुआ तोह अपनी माँ को उस मद्दिम रौशनी से भरे कमरे में दूसरी तरफ करवट के बल सोये देखा. सुर्ख लाल निघ्त्य में क़ैद वो अध्भुत्त काया बस देखने भर से किसी भी पुरुष को सम्मोहित कर सकती थी. अर्जुन ने आहिस्ता से दरवाजा की चिटकनी लगाने के बाद कुछ पल इस जहां ख़ामोशी में ये उत्तेजक दृश्य निहारा और आराम से अपनी माँ की बगल आ लेता. सभी हसरतो को लगाम देता वो आँखें बंद किये बस उस मनभावन महक को फेंफड़ो में भरता हुआ पीछे से माँ की कमर में हाथ दाल लिप्त रहा.

जहा निश्छल प्रेम हो वह कोई वासना कैसे असर दिखा सकती है? बेशक अर्जुन के परुषत्व का एक भाग जिस्मानी तौर पर आसक्त था रेखा के अतुलनीय roop-youvan से लेकिन ऐसा तोह हर उस प्रेमी के साथ होता है जिसकी चाहत सीमा से परे हो. सोने की कोशिश इस मखमली बदन के सामीप्य में महुआ के नशे में बदल चुकी थी. मदमस्त हठी छक्क कर महुआ पीने के बाद जिस तरह मस्ती में कसमसाता है वैसी हे स्थिति अर्जुन की हो चुकी थी.

सपाट नरम पेट पर रेंगता वो मजबूत हाथ फिसलता हुआ कठोर उभारो पर चला आया. 3 बचो का मातृत्व भी रेखा के वक्षो का यौवन ढीला न कर सका, अपितु इनमे गुजरते समय के साथ ज्यादा निखार हे आया. अर्जुन ने अपने बड़े पंजे में एक सतांन को प्यार से थमा तोह निप्पल का कड़ापन साफ़ महसूस हुआ. करवट लेने से रेखा के दोनों सुडोल चुचो का आधा भाग निघ्त्य से बहार निकल कर अर्जुन को अपनी चिकनाहट का प्रदर्शन करता लगा.

'माँ..', अर्जुन ने धीमी आवाज में सरगोशी सी की और रेखा बंद आँखों से बस मुस्कुरा कर खामोश रही. अर्जुन समझ चूका था के अब ये प्रेम मिलान का अलग हे खेल है. आज सबकुछ उसको हे करना था वो भी बिना ज्यादा आवाज किये. हाथ सामने की तरफ से निघ्त्य में सरकते हुए अर्जुन ने निर्वस्त्र उभार पंजे में दबोचा तोह रेखा के जिस्म में सरसराहट हुई. अपने होंठ kaat-ti हुई वो आन्दन्दित हो रही थी अर्जुन द्वारा निप्पल सहलाने और दबाने से. अर्जुन थोड़ा उचकता हुआ दूसरे हाथ से रेखा के कंधे से कपडा खिसकता उस चिकनी त्वचा को चूमने लगा तोह रेखा की न चाहते हुए भी सिसकी निकल गयी.

'Ummmm..aahh.', इस आह की आवाज ने अलग हे जादू किया. अर्जुन थोड़ा कसके उस मॉटे सतांन को दबाता हुआ रेखा की उजली पीठ को दांतो के बीच दबाने लगा. भारी कूल्हों के बीच उसका अकड़ा हुआ कामदण्ड तीसरी चोट पंहुचा रहा था रेखा के जिस्म पर. एक पल के लिए अर्जुन अलग हुआ तोह रेखा जैसे स्वर्ग से जमीन पर आ गिरी. लेकिन अर्जुन ने उस एक पल में हे रेखा के जिस्म को aavaran-mukt कर दिया था. सांचे में ढला वो reit-ghadi (hour-glass) सा जिस्म अब अर्जुन के सामने निर्वस्त्र था लेकिन रेखा अभी भी करवट के बल दूसरी तरफ मुँह किये लेती रही. अर्जुन खुद को कपड़ो से विमुक्त करके एक बार फिर से यथास्थान चला आया.

"माँ, आप जानती हो की आपको देखने भर से मैं होश में नहीं रहता? पता नहीं नानी ने आपको पैदा किया था या आप उन्हें वरदान से मिली. मुझे नहीं पता के क्या गलत क्या सही है लेकिन आपसे खूबसूरत कोई भी नहीं.", अर्जुन अपनी बात कहते हुए रेखा की नाभि से उन्नत चिकनी जांघो तक हाथ फिरता musal-saal गर्दन, गाल चूम रहा था. जांघो की जड़ में दबा रेखा का कॉमद्वार इतनी हरकत से हे रस बहाने लगा. चेहरा घूमती हुई वो एक कशिश से अर्जुन को जैसे पुकारने लगी थी. लरजते होंठो का निमंत्रण अर्जुन ने तुरंत स्वीकार किया. ये चुम्बन इस कदर गहरा था की रेखा के मखमली बदन पर अर्जुन पूरी तरह छा गया.

"उम्म्म.. मेरे लिए तोह तुम वरदान हो अर्जुन आह्ह्ह्ह... आराम से..", रेखा के होंठ आजाद हुए तोह वक्षो से रिस्ता दूध देख चेहरे की लालिमा कही गहरी हो गयी. अर्जुन दोनों वक्षो का मर्दन करता हर तरफ चूम रहा था. रेखा की जांघो के बीच प्रहार करता वो कठोर लिंग हलके से फूली हुई योनि के होंठो से टकराया तोह एक आह्हः निकल गयी. अर्जुन भी इस स्पर्श से आंदोलित होता कुछ निचे सरक कर एक चूचक मुँह में लिए चूसने लगा और दूसरे हाथ से रेखा का वो विशाल नितम्भ दबाता बाए पांव को ऊपर उठाने लगा. रेखा ने भी घुटना मोड़ते हुए पाँव बिस्टेर पर टिकाया, जिस से अर्जुन मनचाहा प्यार कर सके.

"वैसे आपका जिस्म अभी तक अछूता सा क्यों है? देख कर लगता हे नहीं हम आपके बचे होंगे.", अर्जुन ने निप्पल के आस पास बिखरा दूध साफ़ करते हुए एक सरसरी निगाह दोनों पर्वत से खड़े चुचो पर डाली और घुटनो के बल बैठ कर रेखा की योनि निहारने लगा. इतने तगड़े लुंड से सहवास होने के बावजूद वो फूली और उभरी हुई योनि बहार से पूरी तरह कासी थी. नरम मांस पर हलकी सिलवाते और तजा साफ़ किया आस पास का चमकता हिस्सा नवयौवना सा था. कॉमर्स उस दरार से महीन लकीर से चिपका अर्जुन को अपनी तरफ आकर्षित करने लगा और जल्द हे अर्जुन की जिव्हा निचे से ऊपर तक चलती वो सारा शहद समेत गयी.

"आह्ह्हह्ह्ह्ह.. इससष्ठ.. पहले ये म्हणत एक उम्मीद से शुरू की थी.. आह्हः.. फिर आदत हो गयी अर्जुन.. मैं भी चाहती हु की ये कसाव कुछ काम हो लेकिन अब ये सिर्फ तेरे बस में है.. आह्ह्ह्हह.. िस्स्सस्स... ये.. ये क्या .. उम्मम्मम", अर्जुन उन फांको को खोल कर बड़े इत्मीनान से अपनी हसरत पूरी करता रहा. मोटी चिकनी जाँघे उसके सर को दबाने लगी. रेखा का सखलन होना भी भयंकर बहाव के रूप में था. अर्जुन ने आज वो केंद्रबिंदु सेहला दिया था जिसको G-spot कहा जाता है. रेखा की साड़ी ताक़त जैसे योनि से बहार बिखर चुकी थी. अर्जुन मुस्कुराता हुआ अपनी माँ की बगल में आ गया. अपने सीने से लगाए वो रेखा को तबतक सहलाता रहा जब तक सांसें व्यवस्थित न हुई.

"उफ्फ्फ.. ये अभी अभी क्या हुआ था अर्जुन?", अपने बेटे की मजबूत छाती का उभार सहलाती रेखा इतना सुकून महसूस कर रही थी जैसे आज कुछ और जंजीरो से आजाद हुई हो. अर्जुन मुस्कुराता हुआ अपनी माँ के ठोस कूल्हों के बीच की दरार में उंगलिया फसता लचीले मॉस को दबाते हुए उन्हें अपने लिंग के करीब करने लगा.

"ाचा लगा न आपको? ये तीसरी बार में जा कर मिला मुझे. G-spot कहते है उस रफ़ पॉइंट को जिसको सहलाते हे आपकी हालत ऐसी हुई. उमाहहह.", अर्जुन ने अपनी माँ की चिकनी जांघ अपने ऊपर रखते हुए भीगी हुई योनि पर वो मोटा सूपड़ा सताया और मजबूती से कूल्हे को अपनी तरफ दबाते हुए एक गहरा धक्का जड़ दिया. रेखा अभी जवाब देती उस से पहले हे आवाज अर्जुन के होंठो से बंद हो गयी. करवट के बल होने से छूट कही ज्यादा संकरी और फांके बुरी तरह उस मॉटे तगड़े औजार से रगड़ती हुई चौड़ी हो गयी. एक हे धक्के में अर्जुन आधे से ज्यादा उस मखमली सुरंग में लुंड बैठा चूका था.

"ओह्ह्ह्हह.. माँ सचमुच आप कमाल की हो.. आठ.."

"आउच.. आह्हः.. आराम से Arjun...uff.. तेरा ये हर बार पहले से ज्यादा बड़ा महसूस होता है और meri....aahh", रेखा को अर्जुन से ऐसी जरा भी उम्मीद न थी की वो इतनी जल्दी और वो भी 2 धक्को में उसके गर्भ पर ठोकर मार देगा. अर्जुन पूरी गहराई मापने के साथ आज उस गरम गुदाद्वार को भी कुरेद रहा था जोह कूल्हों की गहरी दरार में इस वक़्त थोड़ा उभर चूका था. रेखा अपनी बात अधूरी रखती अर्जुन के सीने पर अपने दोनों उभार चिपकाये खुद को लुंड झेलने लायक बनाने लगी.

"मेरा बड़ा महसूस होता है और आपकी पहले से ज्यादा टाइट. यही कह रही थी न आप? वैसे मेरा तोह पता नै लेकिन आपकी सचमुच टाइट है.. आह्हः.. देखो अब हिल भी नहीं रहा, कितनी बुरी तरह जकड लिए है आपने.", अर्जुन की ऐसी चुहल मस्ती देख रेखा शर्म से लिपटी रही लेकिन योनि का कसाव कुछ काम कर दिया. अर्जुन ने हलके धक्के देने शुरू किये तोह इस मजबूत लुंड ने रेखा को भी आहें भरने पर विवश कर दिया. बहार से फूली हुई छूट का अंदरूनी कसाव इस लम्बे तगड़े मूसल से अलग हे मस्ती भर रहा था.

"उम्म्म.. ऐसे हे अर्जुन.. आअह्ह्ह..", रेखा आसक्त होती अर्जुन को पीठ के भार पलटने लगी तोह अर्जुन भी अपनी को कमान देता निचे हो गया. अब बिस्टेर पर वो कामुक दृश्य था जिसमे भरपूर यौवन समृद्धि से लड़ी रेखा अपने बेटे की जांघो के गिर्द जाँघे फैलाये वो पूरा मूसल लिए आगे पीछे हो रही थी. उन भरावदार कूल्हों के बीच मूसल से लिंग को लीलती फूली हुई योनि का फैलाव साफ़ बता रहा था के अब यहाँ कोई और लिंग असर करने से रहा. अर्जुन ने पीठ उठाते हुए दोनों चुचो थाम लिए और उन्हें चूसक्ता हुआ वो रेखा की कामुकता बढ़ने लगा. दोनों का सहवास हर मुलाकात के बाद अब बेहतर खुलने लगा था.

"आह्हः.. इन्हे खाली कर दो.. उम्म्म..", अर्जुन के कंधे पकडे रेखा तेजी से अपने मांसल कूल्हों को पटकने लगी. हर बार जड़ तक लुंड अंदर जाता और गर्भ पर लगती ठोकर से ये उत्तेजना चरम पर जाने लगी. कमरे में हलकी patt-patt की आवाज के साथ बस रेखा की सिसकारियां गूंजती रही. आज अर्जुन भी उन कैसे हुए मॉटे मॉटे चुचो को तबियत से दबाता हुआ खाली कर रहा था.

"मैं.. होने लगी हु.. आह्ह्ह्हह..", 5-6 बार जोर से उछलने के बाद रेखा ने अर्जुन को बुरी तरह अपने सीने से चिपका लिया. छूट से बेहटा गरम तरल संकेत था एक और सखलन का. लेकिन अर्जुन के विचार आज अलग थे. रेखा को मौका दिए बिना अब वो ऊपर और उसकी कमर पर टाँगे बंधे रेखा बिस्टेर पर थी.

"अब मेरी बारी.. उम्म्म", उतनी हे मजबूती से रेखा को जकड़े हुए अर्जुन ने अपनी माँ के होंठो पर अपने होंठो का टाला जड़ दिया. जहा पहले रेखा 3-4 इंच उछाल रही थी अब अर्जुन सुपडे तक लिंग बहार निकाल कर तूफानी रफ़्तार में कमर चलने लगा. मजबूत छाती के निचे दबे रेखा के उरोज भरपूर रगड़ से छिलने लगे थे. गुलाबी योनि हर धक्के से और फ़ैल कर लाल होने लगी.

"आअह्ह्ह्ह... धीरे बाबा.. उफ्फ्फ.. माँ.. करता रह अर्जुन..", रेखा को खुद नहीं पता था के वो उसको रोकना चाहती है या इस तेज रफ़्तार चुदाई में ऐसे हे बानी रहना. गुलाबी फांको से रिस्ता रास गुदाद्वार भिगोता बिस्टेर पर गिरने लगा लेकिन अर्जुन का जोश जरा भी हल्का न हुआ. अब आवाज बदल कर fach-fach और oooh-aaahh की गूँज रही थी.

"माह.. आप हे सेहन कर सकती हो मुझे.. आह्ह्ह्ह..", एक पल तोह ऐसा भी आया की रेखा का शरीर हवा में उठाये अर्जुन अपनी माँ की योनि को बुरी तरह फैलता हुआ अपने लिंग की जड़ तक चिपकने लगा. निप्पल मुँह के सामने दीखते हे धक्के कुछ धीमे हुए और उनकी चुसाई से रेखा को अपनी चीख खुद हे मुँह पर हाथ रख कर दबनी पड़ी. सही मायने में रेखा को आज पता लगा था के अर्जुन की कामकला उसकी सोच से कितनी आगे है. इस बार सखलन का स्राव अर्जुन की जांघो को भिगोने लगा.

"ोोूफ़्फ़... फट गयी है shayad..aahhhhh..", रेखा के इस कथन पर अर्जुन बिना अलग हुए फर्श पर खड़ा हो गया. रेखा का धड़ बिस्टेर पर और कमर हवा में उठाये अर्जुन फिर से ताबड़तोड़ धक्के लगाने लगा. दोनों चुके आज कही इतने हिलने लगे थे जैसे अर्जुन उनकी अकड़ कुछ काम करने में कामयाब रहा हो. एक वक़्त ऐसा भी आया जब रेखा को अपनी छूट की फांके चीरती हुई महसूस होने लगी लेकिन उतना हे तेज तूफ़ान सा योनि के ख़ास बिंदु पर हो रहा था. अर्जुन ने जिस तरह ये चुदाई मुद्रा बनाई थी, उसका सूपड़ा हर भार वही टकराता जहा चरम बिंदु या G-spot था.

"आह्ह्ह्ह माँ.. मैं आने लगा हु..", अर्जुन के जबड़े भींच चुके थे और इधर रेखा के साथ आज कुछ अलग हे हुआ. योनि के अंदर जहा कॉमर्स का ज्वार उठा वही yoni-nakh से एक तगड़ी फुहार (स्क्वरटिंग) अर्जुन की छाती तक बरसने लगी. ये mutra-tyaag न था क्योंकि इसका स्त्रोत वही था जहा अर्जुन का लिंग धंस कर गरम वीर्य खाली करने में लगा था. ये अनोखी कॉमर्स की फुहार कोई 15 सेकंड बरसी और जैसे हे अर्जुन अलग हुआ रेखा की बिस्टेर किनारे लटकी टांगो के बीच से वीर्य फर्श पर गिरने लगा. रेखा को होश न था के आज हुआ क्या है और ये सब क्या था. जब तक होश संभाला अर्जुन फर्श और खुद को साफ़ करने के बाद रेखा को भी गीले तोलिये से पांच चूका था.

"वो गलत नहीं था माँ, जैसा आप शायद सोच रही हो. आपने उरिनाते नहीं किया, वो बस आपका G-spot सेंसिटिव होने के बाद अलग लिक्विड निकला था.", अर्जुन ने माँ का गाल सहलाते हुए उन सवालिया निगाहो को जवाब दिया और अपने सीने से लगा लिया. कुछ देर तक दोनों खामोश रहे और रेखा अब बेहतर महसूस कर रही थी.

"ये सब कैसे सीखा? सच कहु तोह आज शायद मैं 5-6 बार हुई और बाद में तुम्हारा वो भी कुछ बड़ा लगने लगा था. सुबह फिर से चलने में परेशानी होगी मुझे. अभी से पाँव जोड़ नहीं पा रही.", रेखा को अपने नंगेपन की कोई परवाह न थी. इस से पहले वो हमेशा अपने कपडे पहन लेती थी, सहवास के बाद. आज कुछ अलग था और अर्जुन द्वारा इतने प्यार से जिस्म सहलाना थकावट ख़तम कर रहा था.

"बुक्स. लाइब्रेरी में हमेशा तोह कोर्स की किताबे नहीं पढता न माँ? जब कुछ नया टॉपिक दीखता है तोह पढ़ लेता हु. उसके बाद थोड़ा इंटरनेट से पता चला लेकिन पिछली 2 बारी में मुझे आपका वो पॉइंट मिला हे नै जो आज मिला. वैसे आप टेबलेट ले रही है न? और मुझे तोह ाचा लगता है जब आप थोड़ा शर्माती हुई चलती है.", अर्जुन के मुस्कुराने पर रेखा ने नयी नवेली प्रेमिका की तरह गुस्सा करते हुए उसके सीने पर नाखून गधा दिए.

"देना फिर जवाब अपनी दादी और ताई को. वैसे भी कल तुम्हारी बुआ और कई लोग आ रहे है. साड़ी पहन कर तोह चला भी नहीं जाएगा."

"ाचा फिर आप salwar-kameej पहन लेना और हो सके तोह नहाते वक़्त आइस थेरेपी. उमाहहह. चलो अब सोना चाहिए माँ, डेढ़ बज चूका है.", अर्जुन ने रेखा को ऐसे हे बाहों में भरा तोह रेखा भी अलग होना नहीं चाहती थी. लेकिन कुछ नियम थे जिन्हे भुलाया नहीं जा सकता था.

"कोमल साढ़े 4 या 5 बजे आ जाती है. इसलिए कपडे पहन ने जरुरी है अर्जुन.", अर्जुन भी समझ गया था के इस कमरे में वो मनचाहे नहीं रह सकते. अलमारी से साफ़ गाउन देता वो भी अपने कपडे पहन कर वापिस आ लेता. रेखा को गाउन की चैन न बंद करने देता वो अभी भी स्टैनो को सेहला रहा था.

"मैं नहीं भरा तेरा इनसे?"

"कभी नहीं भरेगा लेकिन बस हाथ रख के सोने दो.", अर्जुन के ऐसा कहते हे रेखा बस मुस्कुरा कर करवट के बल लेट गयी. अर्जुन पीछे से चिपका कुछ वक़्त तक दोनों उभर सहलाता रहा और जल्द हे नींद के आगोश में चल दिया.. आज का सहवास उसके जीवन का सबसे लम्बा मिलान था जिसमे करीब 40 मिनट तक वो अपनी माँ की योनि से अलग न हुआ था. इतनी म्हणत के बाद नींद गहरी हे होनी थी.

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"तुम्हारा लाडला दिखाई नहीं दे रहा आज?", रामेश्वर जी अपनी दिनचर्या के अनुसार दाढ़ी बना रहे थे pooja-paath से फारिग हो कर. घर के ज्यादातर बड़े सदस्य बिस्टेर त्याग कर अपने दैनिक कार्यो में लगे थे और कौशल्या जी जब चाय ले कर बहार आँगन में आयी तोह उबासी लेते हुए नरिंदर जी भी अपने माता पिता के बगल में आ बैठे. शंकर नहाने के बाद कपडे बदल रहा था.

"उसका वो हे जाने और साल में होली दिवाली भी तोह होते है. सोने दो अगर उसकी इत्छा है तोह. वैसे भी उसका दिन लम्बा हे होने वाला है. रेणुका के साथ मार्किट जाना है और फिर शालिनी भी बुला कर गयी है. विनीता साथ हे आएगी उसके वापिस.", कौशल्या जी ने एक कप नरिंदर को थमते हुए सर पे हाथ फेरा तोह वो कप एक तरफ रखते अपनी माँ की गॉड में सर रख वही पसर गए.

"हाँ सही कहती हो भगवान. जब उसके baap-chacha हे बड़े नहीं हुए तोह वो तोह doodh-peeta बचा है. चलो ाची बात है वो आराम कर रहा है. मैं भी नाश्ते के बाद जरा शास्त्री जी की तरफ जा रहा हु. तुम्हारा क्या प्रोग्राम है महाराजा एंडर्सन?", रामेश्वर जी के ऐसे व्यंग पर नरिंदर के चेहरे पर भी शरारत आ गयी.

"आज तोह माँ ने मुझे कुछ भी करने से मन किया है पापा. ये कह रही थी की मैं बस आराम करू इनके पास. हाँ शंकर जरूर काम से बहार रहेगा और बाकी सब तोह राजू भाई और अर्जुन करने हे लगे है."

"हाँ, तुम तोह आराम हे करो बीटा. वो सरपंच जी के घर तोह तुम्हारी अम्मा जायेगी न? कृष्णा अब ठीक है और उसको भी ले जाओ अपने पीहर. मंदरी में मिलना कोई मिलना तोह नहीं हुआ न? शाम तक तुम्हारी लाड़ली बहिन भी आ जाएगी फिर तोह तुम कही जाने से रहे उसके बिना.", अपने पिता की बात सुन्न कर नरिंदर तुरंत सीधा बैठ गया. खुद हे सर खुजाते हुए बोलै.

"भूल गया था और परसो कृष्णा ने कहा भी था की आरती नानी से मिलने का बोल रही है. पहले तोह कह रही थी की अर्जुन ले जाएगा."

"अबे मूर्खनंद, तेरे ससुर के पास तू जाएगा अपनी बीवी को लेकर या अर्जुन? दोनों एक जैसे हे हो. शंकर हर हफ्ते ससुराल घूम आएगा लेकिन न बीवी बचो के लेके जाता है और न बताता है. यारी दोस्ती से भी अलग रिश्ते है तुम्हारे उन परिवारों में. चल चाय पी कर त्यार हो और फिर बहु और दोनों बच्चियों को भी नाश्ते के बाद लेके निकल. और जनाब, तुम किधर चले इतनी सवेरे?", यहाँ शंकर तोह चकाचक सफ़ेद कमीज और भूरी पतलून पहने पूरी तरह तैयार प्रकट हुआ. अपने पिता की बात सुन्न कर एक पल तोह जवाब सोचता रहा लेकिन यहाँ इन्दर ने हे बात संभाली.

"भाई, ऋचा को घर छोड़ने के बाद हॉस्पिटल जाएगा. कोई सर्जरी है 8 बजे इसकी और फिर दोपहर को राजेश के साथ वो जगह देखने जाना है जहा काम शुरू करवाना है. शायद रात वापिस भी ना आये.", अब शंकर मुस्कुरा रहा था नरिंदर के जवाब पर लेकिन दोनों की मुस्कराहट तुरंत काफूर हो गयी.

"हाँ, तुमने पैदा किया है न मुझे जो तुम कहो वो मैं मान लू. जिस दिन ये पूरी आस्तीन की कमीज पहनता है उस दिन ये कौनसी सर्जरी करता है मुझे पता है. नवाब साहब, जो भी करो इस बूढ़े की िज्जात्त का ध्यान रखना. और चंद्रो भाभी से कहना की अगर समय हो तोह दर्शन दे जाए.", शंकर अभी आगे कुछ कहता ऋचा तैयार हो कर इधर चली आयी.

"चले चाचा जी?", अब दबी डाभी हंसी कौशल्या जी के चेहरे पर थी और शंकर झेंपता हुआ बिना कुछ कहे इलो में बैठ कर अपनी बेटी के साथ निकल लिया. रात से भरा बैठा था और आज मुन्नी की मुनिया से मिलने की कुछ ज्यादा हे जल्दी थी. ऋचा बेचारी अब 2 दिन गाँव में हे रहने वाली थी अपने बाप की वजह से.

"अब चाय ठंडी करेगा या तेल टपकौ?", रामेश्वर जी ने फिर से नरिंदर को लपका तोह वो चाय उठा कर अंदर हे चल दिया.

"आप भी, अभी तक इन बचो को झिडकते रेहतो हो. बड़े हो गए है ये दोनों लेकिन आपको तोह ये अभी तक वही कॉलेज वाले लगते है.", कौशल्या जी ने बचो की तरफदारी की तोह रामेश्वर जी के चेहरे पर ये तंजभरी मुस्क़ुआन आ गयी.

"थानेदारनी जी, इनके साथ साथ शायद आप भी 25 साल पीछे हे हो. ये घोड़े सुधरने का नाम हे लेते और जो अभी गया है वो जरूर किसी न किसी की मय्याट्ट बना कर वापिस आएगा. सवाल बड़े से करो तोह जवाब छोटा और दोनों पकडे जाए तोह फिर उनकी माँ की ममता. लगाए रखो अपने पल्लू से इन्हे, तुम्हारा हे नाम रोशन करेंगे किसी दिन.", अब कौशल्या जी भी बुरा सा मुँह बनती चल दी और पंडित जी हंसने लगे. यही तोह होता था अक्सर जब बचो की वजह से इन दोनों में ये तुनक भरी बातें होती थी.

"माँ, ये ारु कब सोया था आपके पास? 11 बजे तोह ये ऊपर था छोटी चची के साथ.", ऋतू अपनी माँ के कमरे से बहार आयी जहाँ अभी तक अर्जुन गहरी नींद में पसरा था. 6 बज चुके थे लेकिन वो टास से मास्स न हुआ था. वही रसोई में काम करती रेखा जी के चेहरे पर आया नूर अलग कहानी बता रहा था जिसकी समझ अभी ऋतू को न थी. सलवार कमीज में केहर बरपाती रेखा जी अपनी बेटी की बात पर उसको कॉफ़ी पकड़ती बताने लगी.

"उसके थोड़ी देर बाद हे आया था लेकिन सोया देर से था शायद. जा कर उठा दो अपने भाई को.", ऋतू कप ले कर कमरे में वापिस आयी लेकिन उठाने की जगह खुद भी उसकी बगल में लेट गयी, झप्पी दाल के. नींद में हे अर्जुन ने उसको अपने आगोश में लिया तोह आँखें मीचे ऋतू उसके सीने से लगी मुस्कुराने लगी. अभी इस लम्हे को 5 मिनट हे गुजरे थे और कमरे में आयी रुपाली और तारा हैरानी से इन दोनों को देखने लगी. अवस्था आपत्तिजनक तोह नहीं थी बस ऋतू का सर अर्जुन की ब्याह पे और चेहरे उसके सीने में धंसा था.

"ये मैडम, नहाने के बाद फिर से सो रही है?", तारा ने रुपाली को देखते हुए कहा

"पता नहीं लेकिन अर्जुन तोह इस वक़्त घर पे होता नहीं और होता भी है तोह बहार दादा जी के पास. उठाओ इस ऋतू को मंदिर चलने के लिए.", रुपाली ऐसा खुद भी कर सकती थी लेकिन उसने तारा से कहा.

"मैं रिस्क नहीं लेती जब वो अर्जुन के पास हो. मामी या कोमल दीदी को हे बोल नहीं तोह तू दिखा जरा इसको उठा कर.", रुपाली चुपचाप बहार हे निकल गयी जैसे उसको ऋतू की नाराजगी का पता हो. तारा वही कुर्सी पर बैठ टेबल पर कोहनी टिकाये इन दोनों को देखती हुई ऋतू की जगह खुद को सोचने लगी. कमरे में रेखा जी आयी और टेबल पर कॉफ़ी का कप, बिस्टेर पर Arjun-Ritu और उन्हें टकटकी बांधे देखती तारा पर नजर पड़ी तोह सर पे हाथ रख लिया.

"काम से काम तुम तोह हिला दो इस आफत को. ये दोनों जाने कब बड़े होंगे और वैसे ये ऋतू सारा दिन अर्जुन को परेशां करती रहेगी लेकिन प्यार भी सबसे ज्यादा अपने भाई से है.", रेखा जी ने कप उठाया तोह तारा ने हाथ खड़े कर दिए.

"मामी, अपने को तोह किसी की नींद डिस्टर्ब नहीं करनी. दोनों आराम से सोये हुए हे ठीक है और ऋतू 1 बजे तक पढ़ रही थी इसलिए सोने हे दो.", अब तारा भी बहार चल दी हंसती हुई लेकिन एक और शख्स था जो अर्जुन की तलाश में इधर आ पंहुचा. थानेदारनी साहिबा.

"रेखा, तू इस सलवार कमीज में जाँच रही है. वैसे तेरे लाडला इधर हे सोया पड़ा है क्या?", वो अभी कमरे के बहार हे थी और रेखा जी ने अपनी सास को इशारा किया और खुद एक तरफ हो गयी.

"हे राम. एक तोह ये बैलबुद्धि और दूसरी सी बलूंगड़ी. पड़े रहने दे इन्हे, जब उठेंगे तब उठेंगे. कौनसा इनकी जरुरत है अभी.", अब हैरान होने की बारी रेखा जी की थी. उनकी सास के चेहरे पर पहले जो भाव आये थे वो अलग थे लेकिन बाद में मुस्कुराना और इन दोनों को सोये रहने का बोलना गले नहीं उतरा.

"पता नहीं माँ जी ये ऋतू कब बड़ी होगी? इसका अपने भाई से कुछ ज्यादा हे मोह है और बढ़ती उम्र के साथ ये ज्यादा बचपना करने लगी है. अर्जुन भी इसको टोकता नहीं.", रेखा ये बात बहोत धीमी आवाज में कर रही थी कौशल्या जी से. इस वक़्त रसोई में यही दोनों थे, कोमल सबके लिए चाय ले कर जा चुकी थी.

"तुम तोह माँ हो रेखा, तुम्हे तोह खुश होना चाहिए इन दोनों का प्यार देख कर.", कौशल्या जी जैसे मुद्दे की बात घुमा रही थी जो रेखा को चिंतित कर रही थी.

"माँ जी, मुझे दोनों के प्यार से ऐतराज नहीं है. लेकिन कई बार प्यार की सीरत और सूरत सही से पता नहीं चलती. इन दोनों में कुछ अलग है जो मुझे चिंतित करता है. कभी परवरिश पर सवाल आया तोह..", रेखा अपनी बात कहते कहते गाला रुंधने पर दुपट्टे से आँखें साफ़ करने लगी. वो जो कहना छह रही थी वो चाह कर भी बोल न सकीय लेकिन कौशल्या जी ने अपनी बहु की चिंता और परिवार के प्रति समर्पण देख मुस्कुराते हुए अपने सीने से लगा लिया.

"मैं ये बात तुझसे करती रेखा क्योंकि जो तू सोच रही है वो मैं भी सोचती थी. फिर अर्जुन ने जब Subhadhra-Arjun का वर्णन किया तोह अनजाने में हे उसने जैसे ये कबूल कर लिया की वो ऋतू के बिना अधूरा है. एक नजर से तोह वो भाई बहिन की अटूट प्रेम की डोर है लेकिन इसका असल स्वरुप अर्जुन को नहीं पता. ऋतू के दिल को सब पता है और तुम या मैं कुछ भी नहीं कर सकते. बचे समझदार है और इनके प्यार पर संदेह करके हम भगवान् का हे अनादर करेंगे. तुम्हारे पापा तोह यही कहते है की जो नियति को मंजूर, वही होगा. बड़े बाबा भी प्रीती और ऋतू को वो चला दे कर गए थे जो 2 अलग अंगूठी होने के बावजूद आपस में जुड़ने पर एक हो जाता है. हर इशारा यही कहता है की इनका प्रेम हम सामाजिक लोगो से ऊपर और साफ़ है.", बात कहते कहते एक पल को तोह कौशल्या जी भी कमजोर पड़ने लगी थी लेकिन वो हिम्मती थी.

"ये आप कह रही है माँ जी?"

"तुझे किसी और की आवाज सुनाई दी क्या? तेरा खसम भी जानता है ये सब और इसलिए उस दिन मैंने कहा था के प्रीती और ऋतू को मैं कभी अलग नहीं होने दूंगी जब वो ऋतू को बिनावजह तंग कर रहा था. मेरे लिए सभी बचे बराबर है रेखा लेकिन ऋतू सर्वोपरि है. ये तुम भी जानती हो की उसके जनम के बाद इस घर में खुशियां हे आयी है फिर वो चाहे अर्जुन के हे रूप में क्यों नहीं. बाकी तुम उनकी माँ हो, फैंसला ले सकती हो.", कौशल्या जी की इतनी बड़ी बात सुन्न कर रेखा ने उनका हाथ थाम लिया.

"आपने कभी गलत नहीं कहा माँ जी और पैदा करने भर से मैं माँ नहीं कहला सकती. बचो को पला भी आपने है और इनको jiwan-anushashan भी आपने दिया. बस समाज में ऐसे रिश्ते कलंक...

"तेरा कलंक आँखों में काजल की तरह लगा के ख़तम कर दूंगी मैं. समाज की तोह मैंने 15 बरस की उम्र में न सुनी फिर अपने बचो के लिए तोह समाज से अलग होना भी मंजूर. वैसे भी बहोत समय है 5-6 साल में दुनिया 1500 बार घूम जाती है, बचो के भी कुछ समझ आ जाये तब तक. नहीं तोह शंकर कन्यादान करेगा और तू बहु ले आईओ.", माहौल को हल्का करने के इरादे से कौशल्या जी ने ऐसा कहा तोह भीगी आँखों से भी रेखा के चेहरे पर हलकी मुस्कान आ गयी.

"वैसे बचे तेरे 21-22 साल के होने लगे और तू ढलने का नाम हे न ले रही.", कौशल्या जी ने जो सवाल किया था अब इसका रेखा क्या जवाब देती. बेटी और माँ का दिल एक हे लड़के के पास है और माँ को तोह वो deh-sukh देने भी लगा है.

"हाँ माँ जी, ये बात तोह बिलकुल सही की आपने. रेखा की कार तोह उलट चलने लगी है. मेरे बाल सफ़ेद हो गए और ये वैसी बनती जा रही है जैसी घर में ब्याह के आयी थी. मोटी तोह मैंने ये अर्जुन के पैदा होने पे हे देखि थी.", ललिता जी अपने हे अंदाज में रहती थी जब हंसी मजाक की बात हो.

"तब तोह होना भी जरुरी था ललिता, साढ़े 3 किलो का बचा पैदा करने के लिए 15 किलो बढ़ाना भी पड़ता है. बस उसके बाद से ये उम्र रोक गयी और वैध की बेटी हो के मैं भी पता न लगा पायी के ये कौनसी jadi-booti खा रही. इसकी माँ सुनंदा से हे पूछूँगी, जब वो कल आएगी. खैर बुढ़ापे में भी वो भी बूढी न हो रही तोह इसके खून में भी गुण तोह होंगे हे. बाकी शंकर की माया.", कौशल्या जी ने जहा आज रेखा को एक गहरा सच बताया था वही वो इसके बाद उसका मैं हल्का करने में सफल रही थी. रसोई से निकल कर वो अपने पति की तरफ चल दी थी और अब वह बस रेखा और ललिता जी हे थे.

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"जीजा, सत्यानाश हो गया.", सुबह के 7 बज रहे थे और विनोद परेशान सा पप शर्मा के घर आ पंहुचा. शर्मा तैयार हो कर अभी अखबार हे पढ़ रहा था और आँचल रसोई में चाय बना रही थी. अपने साले को इतनी सवेरे घर आया देख वो भी हैरान था. शराब और शबाब में चूर रहने वाला विनोद अक्सर 8 बजे तो सो कर उठता था.

"अब क्या बादल फट पड़ा साले साहब? जरा बैठ कर तसल्ली से बताओ के मामला क्या है.", शर्मा ने वही हॉल में विनोद को अपने साथ सोफे पर बैठते हुए पूछा.

"वो मैंने बताया था न के उस लड़की को कब्जे में ले लिया है? रवि और करतार की गाडी सड़क से निचे पलटी मिली है वह की पुलिस को. रवि की तोह हालत फिर भी नाजुक है लेकिन करतार से मेरी 6 बजे बात हुई थी अभी. उसने पुलिस को तोह यही बताया है की गाडी का बैलेंस बिगड़ने से वो पलट कर 6 फ़ीट निचे गिर गयी.", विनोद ने बात कहते कहते टेबल पर राखी बोतल से एक बड़ा घूँट पानी का गले में उतरा और फिर कुछ गहरी सांस लेते हुए बोलै.

"करतार ने बताया की काली लांसर में सवा 6 फ़ीट का एक पहलवान उनसे टकराया था और उसने करतार को उठा कर सड़क पर पटक मारा. उसके बाद वो कुछ वक़्त बेहोश रहा लेकिन इतनी देर में रवि को उसने बहोत बुरी तरह से तोडा. बाद में कार के साथ इन दोनों को निचे फेंक कर वो लड़की लेके चलता बना. पन्गा हो गया जीजा ये तोह और जितनी मैं समझ रखता हु वो लड़का और कार ख़ास है.", विनोद का डर देख एक बार तोह शर्मा भी घबरा गया लेकिन उम्रदराज और जमीन का व्यापारी था पप शर्मा.

"तोह एक सवा 6 फ़ीट का पहलवान लड़का हमारा क्या बिगाड़ सकता है विनोद? वैसे भी लड़की की जरुरत हे नहीं थी हमको. इक़बाल को तोह हम रास्ते से हटा हे देंगे बस उसके फार्महाउस पर गाँव की भोली भली लड़कियां पंहुचा कर पुलिस और राजेश को इतिल्ला करना है. संजोग से वो कोई लड़का होगा जिसकी नजर पड़ गयी होगी कार में बंधी लड़की पर."

"ओह मेरे प्यारे जीजा, बात इतनी भी सीढ़ी नहीं है. वो लड़का है अर्जुन शर्मा, मेरा भतीजा क्योंकि वही ऐसा पहलवान है और वो कार भी उसकी है. करतार ने ये भी बताया था के उसके साथ एक खूबसूरत सी लड़की भी थी, मतलब मेरी कोई भतीजी. अर्जुन शंकर भैया का बीटा है लेकिन साले को मैं तोह घरेलु चुटिया सा समझ रहा था. ये नहीं पता था के इतना तगड़ा निकलेगा की रवि की हड्डियां टॉड कर हॉस्पिटल पंहुचा देगा. मान भी लू की वो किसी से कुछ नहीं कहेगा लेकिन मैं उधर शादी में तोह जाऊंगा हे?"

"ये तोह सचमुच समस्या हो गयी विनोद. और अर्जुन तुम्हारा भतीजा है जो इतना ताक़तवर भी है की रवि जैसे पहलवान को थोक गया, वो भी अकेला. तुम ताई से बात करके देखो जरा. वैसे जितना मैं पंडित जी को जानता हु, वो परिवार के बीच तोह कभी रंजिश पैदा न होने दे फिर चाहे गलती तुम्हारी हे क्यों न हो. बहनचोद ये शंकर का लोंदा इतना बड़ा हो गया है क्या?", शर्मा की तोह गरारी हे अटक चुकी थी इस लड़के पर.

"बड़ा तोह वो है हे लेकिन साला हब्शी जैसा पूरा झोटा भी है. नरिंदर बता रहा था के खुद ताऊजी और कोच संधू जी उसको प्रशिक्षित कर रहे है. लेकिन वो सीधा तोह मुझ पर कुछ नहीं करेगा?", विनोद अभी दुविधा में हे था और आँचल ढीली टीशर्ट और चुस्त पाजामे में बिना सीना ढके दोनों के लिए चाय रख कर चली गयी. उसकी थिरकती चाल देख एक पल को विनोद सब भूल गया फिर सहसा हे चौंकते हुए बोलै.

"जीजा, एक बार अनामिका से बात करके देखु की वह का माहौल कैसा है?", ये बात शर्म को भी जांची. अगर कुछ भी ऐसा वैसा हुआ है तोह जरूर कान में तोह बात पड़ी हे होगी. पास में हे रखा वो हरे रंग का टेलीफोन खिसकते हुए विनोद ने पंडित जी के घर का नंबर लगा दिया. 3-4 घंटी हे गयी थी और उधर से फ़ोन रुपाली ने उठाया.

"Hello", रुपाली ने बिना हे नंबर देखे ऐसा कहा.

"हाँ बिटिया हम विनोद शर्मा बोल रहे है. तुम्हारी चची अनामिका से बात करवा सकती हो?", अब तारा को छोड़ कर तोह सभी भतीजी हे लगती थी विनोद की इसलिए बात ज्यादा न खींचते हुए सीधा मुद्दे की बात करि.

"एक मिनट चाचा जी, चची इधर हे हैं.", अनामिका नाश्ता करके बस उठी हे थी. 'चची, आपके लिए विनोद चाचा का फ़ोन है.', रुपाली की आवाज पर अनामिका तुरंत इस तरफ चली आयी. उन्हें फ़ोन दे कर वो भी बहार चल दी, नाश्ता करने. इस वक़्त कमरे में बस अनामिका हे थी.

"Hello, नमस्ते जी.", अनामिका की आवाज सुन्न कर विनोद कुछ चैन सा मिला. अपनी पति से बात करते हुए अनामिका थोड़ा सेहम जाती थी हमेशा.

"नमस्ते नमस्ते. और सुनाओ तुम कैसी हो? हमारा बीटा कैसा है?", विनोद ने भरसक मीठा होने की कोशिश की थी और वो सफल भी रहा.

"जी मैं भी ठीक हु और निकेतन अभी बड़ी माँ के पास है बहार आँगन में. यहाँ सभी उसको प्यार करते है और ध्यान भी रखते है. आप आ रहे है?", अनामिका ने वही सवाल किया जिसकी वजह से वो थोड़ा असहज हो रही थी. इधर अर्जुन भी चची को अकेले फ़ोन पर लगे देख अंदर चला आया, जाली का दरवाजा ढालते हुए. शरारत करने के हिसाब से उसने चची की गोरी कमर सहलाई और बगल में लेट गया.

"आउच.. क्या करते हो अर्जुन?", अनामिका ने दबी आवाज में हँसते हुए उसको मन किया और अर्जुन करीब लेता अब ब्लाउज और साड़ी के बीच वाले गदराये गोर पेट पर उंगलियों से सितार बजने की क्रिया करने लगा. फ़ोन के दूसरी तरफ विनोद ने भी हलकी आवाज में अर्जुन का नाम सुना था और अपनी बीवी की आह भी. सबर जवाब दे गया और झांटे सुलग गयी.

"हहहह.. तुम अकेली हो अनामिका?"

"जी, वो अभी अर्जुन आया था और गलती से ऊँगली पर पाँव रखा गया.", अनामिका झूठ बोल रही थी और इधर अर्जुन अपना पूरा पंजा उस चिकने पेट पर रखे फ़ोन से आती हलकी आवाज सुन्न ने लगा. अनामिका को पता भी नहीं चल रहा था के आखिर हो क्या रहा है. फ़ोन पर पति था और इधर अर्जुन की हरकते उसको उत्तेजित कर रही थी.

"ाचा ठीक है. वैसे जवान लड़का है तोह थोड़ा मर्यादा में रहना. शहर की हवा में रहा है तोह.. वैसे मैं 19 को आऊंगा माँ बाबू जी के साथ.", अभी विनोद आने का कार्यक्रम बता रहा था लेकिन इधर कुछ और हे कार्यक्रम चलने लगा. अर्जुन की ऊँगली अनामिका की नाभि में रेंग रही थी और वो अनजाने में हे अर्जुन के चेहरे तक अपना सीना ले आयी. शरारत अब उत्तेजिट करने लगी तोह अनामिका की सांसें उखाड़ने लगी. अर्जुन ने हे हाथ हटाया.

"ओह चची, बात कर लो उधर चाचा कुछ बोल रहे है. ", अर्जुन ने ये सब इस तरह कहा था जिस से विनोद ाचे से उसकी आवाज सुन्न सके. अनामिका भी भोलेपन से बोल गयी.

"जी, बड़ी दीदी और जीजा जी नहीं आ रहे आपके साथ?", यहाँ विनोद की अर्जुन की बात सुन्न कर टाइट हो चुकी थी और इधर उसकी बीवी अभी भी ऐसी बातें कर रही थी.

"हाँ.. वो लोग भी शादी के दिन आएंगे. तुम अपना और बेटे का ख़याल रखना. वैसे ये अर्जुन तुम्हारी ज्यादा हे सेवा नहीं कर रहा?", विनोद के स्वर की तल्खी अनामिका समझ न सकीय लेकिन अर्जुन अब उसकी गॉड में सर रखे लेता मुस्कुरा रहा था. उसकी इस हरकत पर अनामिका का हाथ भी स्वतः अर्जुन का सर सहलाने लगा और वो फ़ोन पर जवाब देने लगी.

"सेवा तोह सभी करते है जी, बिलकुल बेटी की तरह रखा है बड़ी माँ और सभी दीदी ने. हाँ अर्जुन मेरे दूध और खाने का पूरा ध्यान रखता है और हमारे बेटे की भी सभी जरुरत का. पाउडर, कपडे, तेल ये खुद हे ले आया था.", विनोद की बोलती हे बंद हो चुकी थी अर्जुन पुराण सुन्न कर और इधर अर्जुन के अलग हे गृह घूम रहे थे. चची की गॉड में लेटने पर वो साफ़ उस जानी पहचानी महक को साँसों में उतार रहा था जिसमे मातृत्व वाले दूध का समावेश हो. एक बार अनजाने हे उसकी नाक उन दूध से भरे कलश से टकराई तोह वो बेहाल होने लगा. चेहरा घुमाया तोह अनामिका की सांस उखड गयी, अर्जुन का मुँह और गरम सांसें अपने पेट पे महसूस करते हे.

"हाँ ाची बात है लेकिन थोड़ा सीमा बरकरार रखना तुम. पहलवान सा है तोह शायद दिमाग काम हो और कुछ उल्टा सीधा हो गया तोह.. ", विनोद पहले हे परेशां था मंजू के मामले से और इधर उसको अंदेशा था कही अब उसकी बीवी पर वो घोडा न चढ़ जाए. बदला लेने के चक्कर में ऐसा कर भी सकता था क्योंकि अनामिका bholi-bhali सी महिला थी.

"जी, वो खुद हे मर्यादा में रहता है. वैसे कुछ जरुरी बात करनी थी .. उम्म्म्म", अनामिका की योनि में खिंचाव उत्पन्न होने लगा था उन गरम साँसों से और इस तरह का स्पर्श आज पहली बार हे हुआ था उसके जिस्म पर. मजे की अधिकता में उसने खुद हे अर्जुन का सर दबा लिया.

"वो.. ऐसा कुछ ख़ास नहीं था बस तुमसे हालचाल लेना था. चलो रखता हु, काम भी देखना है.", फ़ोन रखते हे अनामिका ने अपनी हालत देखि. चेहरे पर हलकी शर्म के साथ उसने अर्जुन का कान उमेठा तोह वो झट्ट उठ खड़ा हुआ.

"बहोत बदमाशी नहीं कर रहे थे तुम? और अपनी भाभी से ऐसी चुहल कौन करता है भला?", अनामिका झूठा नखरा दिखा रही थी लेकिन वो साफ़ कैसे कहती की उसकी हालत खराब हो चुकी है और अगर अर्जुन थोड़ा सा भी आगे बढ़ता तोह वो उसको टोकती भी नहीं.

"आप इतनी प्यारी हो चची की बस दिल किया के आपकी गॉड में सर रख के लेता राहु. लेकिन उतनी हे ाची महक भी आती है आपसे तोह गलती अपने आप हे हो गयी. वैसे आपको बुरा लगा क्या?"

"बुरा नहीं लगा लेकिन कुछ अलग सा था. ऐसे में कोई देख सकता है ये भी नहीं सोचा हमने. चलो मैं बाद में बात करती हु, निकेतन को नहलाना भी है और फिर उसको भूख भी लगी होगी.", अनामिका उठने लगी तोह अर्जुन ने एक और तीर चला दिया.

"जिस चीज की भूख है उसकी हे खुशबु आ रही थी चची.. सॉरी भाभी.", और एक बार फिर से वो चची का गाल चूम कर बहार दौड़ गया. अनामिका को ये सब हंसी मजाक और प्यारी हरकते बड़ी सुहा रही थी. अभी तक के जीवन में ऐसा तोह उसके साथ कभी न हुआ था लेकिन आज उसको हिंदी फिल्मो वाला prem-romance याद आने लगा. शर्माती मुस्कुराती हुई वो आँगन की तरफ चल दी और दिमाग में अर्जुन द्वारा कही दूध की महक वाली बात पर एक बार फिर से पेट से निचे सिहरन दौड़ने लगी. उधर विनोद की हालत देख शर्मा भी चिंतित हो गया.

"क्या लगता है तुम्हे?"

"जीजा लग्न वागना छोडो जीजा, यहाँ मेरी लग्ग गयी है शायद. बात से तोह साफ़ पता चलता है के उधर अर्जुन ने ऐसी कोई जीकर नहीं किया लेकिन वो हमारी सोच से ज्यादा शातिर है."

"ऐसा क्या पता लगा तुम्हे? मेरे सामने तोह साधारण हे बात हो रही थी बस एक बार तुमने ये जरूर पुछा के अर्जुन क्या कर रहा है.", शर्मा ने कुरेदा तोह विनोद ने बता दिया.

"वो सिसकारी ऐसी थी जैसी आप समझ रहे है न जीजा? अनामिका ने सफाई से झूठ कहा के अर्जुन चला गया है लेकिन वो हलके हलके 2-3 बार आहें भरी थी. और शायद अर्जुन उस से चिपका हुआ था क्योंकि मेरी बीवी सही से जवाब भी नहीं दे रही थी जैसे कही खोयी हो. वो मेरी हरकत का बदला अब अनामिका के साथ कुछ गलत करके न ले? साला है भी हब्शी और मेरी बीवी नाजुक सी.", विनोद के मैं में तोह यहाँ तक ख़याल आ रहे थे की कही अर्जुन के निचे दबी बकरी सी अनामिका की दुर्गति न हो जाए.

"खयालो से बहार आओ मुंगेरीलाल. वो पंडित जी का घर है और तुम्हारा भतीजा ऐसा वैसा कुछ नहीं कर सकता. इतने लोग घर में रहते है लेकिन तुम्हारे मैं में खोट है इसलिए तुम मजाक मस्ती को ऐसे ले रहे हो. घर में फ़ोन जानते हो न कहा होता है? ऐसी हरकत वो भी शादी ब्याह वाले भरे पूरे घर में कोई क्यूँकर कर सकता है? और अर्जुन को किसने बताया होगा की वो सब तुमने किया है?", शर्मा के ऐसे खुलासे पर विनोद भी निरुत्तर हो गया. विनोद के ये सभी बातें सच हे लगी क्योंकि घर तोह वो भी होकर आया था अभी कुछ दिन पहले. अर्जुन ऐसा नहीं कर सकता सबके सामने. लेकिन उसको क्या पता था के अर्जुन क्या कर सकता है क्या नहीं.

"हाँ सही कहा आपने जीजा. वो अगर कुछ करता तोह सबसे पहल ताऊजी को बताता और वो मुझे फ़ोन करते या पापा को. और करतार तोह बेहोश हो गया था और रवि की हालत नाजुक है जिसका मतलब अर्जुन ने बिना पूछे हे उसकी ठुकाई कर दी होगी गुस्से में. पुलिस का लफड़ा न पड़े इसलिए वो दौड़ गया होगा नहीं तोह बुलाता जरूर इतनी बड़ी बात पर. आप सचमुच समझदार व्यक्ति हो जीजा.", अब एक मूरख दूसरे की तारीफ कर रहा था और दोनों खुश हो रहे थे. अर्जुन क्या कर चूका है ये तोह उनके साथ साथ शंकर और रामेश्वर जी को भी भनक न थी. अनामिका चची के साथ उसका वो प्यार भरा खेल इस मामले से अलग था.

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दिन नियत गति से आगे बढ़ने लगा था. चंद्रो देवी की हवेली पर पेट और उस से निचे की आग शांत करके शंकर जी भी अपने काम पर निकल चले और नरिंदर भी बीवी और दोनों बेटियों को लिए अपनी ससुराल की राह पर बढ़ गए. रामेश्वर जी इनसे पहले हे आचार्य जी के घर जा चुके थे जहा से वो लोग कही और जाने वाले थे. अर्जुन तैयार हो कर रेणुका को लिए महिला डॉक्टर की तरफ चल दिया. रोमिला ने पुछा भी था के वो लोग कहा जा रहे है लेकिन रेणुका ने आ कर बताने की बात कही थी.

हमेशा की तरह रेणुका खुश थी अर्जुन के सामीप्य में और अगले 2 घंटे अर्जुन हमेशा की तरह कभी प्रेमी तोह कभी एक पति के अवतार में रहा. डॉक्टर से भी हर टेस्ट और khaan-paan की जानकारी उसने रेणुका के साथ बैठ कर हे ली. आने वाले समय में लगने वाले इंजेक्शन और जरुरी टेस्ट का ब्यौरा अर्जुन ने अपने दिमाग में छाप लिया था. बहार आये थे तोह समय का सदुपयोग करते हुए वो रेणुका को कुछ और आरामदायक कपड़ो के साथ साथ फल और चॉकलेट का डिब्बा भी दिलवाता लाया.

अर्जुन अभी से वो सब जानकारी एकत्रित कर रहा था जो उसके आने वाले जीवन में काम की थी. रेणुका भी इस दौरान भरपूर खुश थी और समय को समझते हुए दोनों हे 11 बजे तक वापिस लौट आये. गेट से अंदर जाते हे रेणुका को सबसे पहले प्रीती ने हे छेड़ा था.

"बुआ, आपकी लिपस्टिक गायब है. माँ के देखने से पहले ठीक कर लीजिये.", हंसती हुई वो ऋतू की तरफ चली गयी थी रेणुका को परेशां करके. घर के बहार हे संजीव भैया और अर्जुन को बात करते देख वो बस भैया के पीछे से एक हवाई चुम्बन अर्जुन को देती अंदर चली गयी थी लेकिन कार के शीशे से ये हरकत पोलिसिअ जेठ देख चूका था.

"तोह अब तुम क्या करने वाले हो इस बारे में?", संजीव भैया अर्जुन के कहने पर उसकी कार में बैठ चुके थे. धीमी रफ़्तार में चलता अर्जुन कुछ पल खामोश रहा और फिर उसने अपनी बात केहनी शुरू की.

"आज मंजू पर हाथ डाला है और कल को शायद ऋतू या अलका दीदी के साथ वो ऐसा कर सकते है. यहाँ बाकी सभी समझदार लोग ये क्यों नहीं देख पा रहे की रमन शर्मा (दामिनी का pati/Vinod का छोटा जीजा) बारमेर से है और जिस तरह से वो दबा हुआ जीवन जी रहा है, मुझे वो आदमी एक हम मोहरा लगता है भैया. विनोद चाचा में दिमाग नहीं है बस घमंड है रुतबे का. वो ताक़त पाना चाहता और मंजू का प्रयोग शायद दलीप मौसा को दबाने में करता.", अर्जुन ने जब ऋतू अलका का जीकर किया तोह शांत रहने वाले संजीव की आँखों में भी लहू उतर आया. उसके लिए तोह बहिन मतलब देवी और घर की प्रतिष्ठा थी. फिर भी अर्जुन द्वारा लिए रमन शर्मा के नाम से वो संभल गया.

"देख, तू कुछ भी गलत नहीं करता और न करेगा. लेकिन एक बात पता चली है की आज रात शंकर चाचा विनोद के साथ कुछ बड़ा करने वाले है. ये बात मुझे बहार से हे पता चली है. वैसे तू कल हुए हादसे के बाद अभी तक शांत तोह नहीं बैठ सकता. बताने का कष्ट करेगा की अब क्या खेल रचाया है और ये रमन शर्मा तोह फूफा लगता है अपना."

"इस फूफे को नंगा करना है भैया और विनोद चाचा का तोह समझो बेडा पार हो जाएगा कल सवेरे तक. जगतार भैया ने बताया था मुझे उनके होटल में चलने वाले काळा कारनामो के बारे में और लड़कियों के साथ जो व्यभिचार चाचा करते है. आज रात को होटल पर छपा पड़ेगा और सबूत ऐसे मिलेंगे की होटल सील. विनोद चाचा बच जाएंगे क्योंकि होटल में क्या होता है इस से मालिक हमेशा मुकरेगा और नाम मैनेजर पर आता है. ये चोट जरुरी है उनका दौलत वाला घमडं तोड़ने के लिए. फिर शादी के बाद मैं गाँव जा हे रहा हु, बाकी जड़ वह काट दूंगा. वैसे पापा भी तोह हमारा हे काम कर रहे है.", अब संजीव का माथा ठनका की अर्जुन शायद इस मुद्दे पर बहोत पहले हे काम कर चूका है. मंजू वाले किस्से का बदला वो होटल से ले रहा है.

"तू चाचा वाले प्लान के बारे में जानता है?"

"राजेश मां को मैंने हे पहुंचाया था उस लड़की तक जो बच गयी थी. जगतार भैया ने बताया था मुझे की 2 लड़किया खिलाफ हुई थी विनोद चाचा और पप शर्मा के जिसमे से एक को तोह मार दिया गया और दूसरी को रपे का वीडियो दिखा कर चुप करवा दिया गया. उस लड़की ने हे विनोद चाचा की पोल्ल खोली थी मां के सामने. वो ये सब अकेले करने वाले थे जिस से घर में टकराव हो सकता था लेकिन अब पापा तोह ऐसे लोगो को बख्सते नहीं और इसमें शामिल उमेद चाचा को भी करवा दिया क्योंकि वह मामला संगीन भी हो सकता है.", अर्जुन के इस रहस्योघाटन से संजीव लाजवाब था.

"और उन लोगो को ये पता भी नहीं की इस सबके पीछे तू है?", संजीव की बात पर अर्जुन ने कार मार्किट की पार्किंग में रोक दी. दोनों पनवाड़ी तक चले आये तोह अर्जुन ने बताया.

"राजेश मां मेरे पार्टनर है भैया और ये बात किसी को नहीं पता सिवाए धर्मवीर अंकल और अब आपके. पापा की तरह ऑपरेशन ब्लेड कौन चला सकता है?", अब संजीव का दिमाग ठनका और उसको करम सिंह वाली वारदात याद आ गयी.

"मतलब.. मतलब वो सब उसको ढून्ढ रहे है जो उनके साथ हे हैं? राजेश मां से गाडी कोई मांग कर लेके हे नहीं गया था और इस बात के गवाह धर्मवीर जी है की राजेश तोह उनके साथ था. लेकिन तुम ये बात चाचा से क्यों छिपा रहे हो?"

"पापा है वो मेरे और कुछ सच उनके सामने नहीं आने चाहिए भैया. जो भी हो मैं उनका दिल नहीं दुख सकता. असली टीम तोह हम दोनों हे है लेकिन न मैं आपको ऐसे काम करते देख सकता हु जिस से आपकी वर्दी पर बात आये और न मैं खुद गलत करके परिवार का विश्वास टॉड सकता हु. अब जिनको इस सबकी आदत है और लाइसेंस है उन्हें करने देते है ये सब. बस अब आप इस रमन शर्मा का कुछ पता लगवाओ. शेरो की लड़ाई में अक्सर गीदड़ फायदा उठा लेते है.", संजीव ने अब सिग्गटे सुलगा ली थी और अर्जुन निम्बू सोडा का गिलास थामे कुछ गंभीर था.

"जगतार से मिलवा सकता है मुझे?"

"वो तोह चले गए होंगे बॉम्बे आंटी जी के साथ लेकिन शादी के बाद वो दोनों हे हमारे घर आएंगे. सच कहु तोह देखने में वो रईस शांत से सरदार है लेकिन नेटवर्क बहोत सॉलिड है. आपको तोह शायद जानते भी हो क्योंकि उनका असली घर तोह अपने गाँव के साथ वाले कसबे में हे है. उन्हें हमारी फॅमिली का ाचे से पता है.", अर्जुन ने हर बात बताई तोह संजीव कुछ सोच में पड़ गया. जगतार नाम उसने सुना था लेकिन कहा याद नै.

"चल, जब आएगा तोह मिल हे लूंगा. वैसे तू मुझे शायद सबकुछ नहीं बताता.", संजीव भैया ने नाराजगी से कहा था बेशक झूठी.

"आपसे तोह कुछ छिपता भी नहीं भैया लेकिन जब मुझे सही वक़्त लगता है मैं पूरी बात बताता हु आपको. अधूरी से हम दोनों हे परेशां होंगे. वैसे छिपा तोह आप भी रहे है आजकल.", अर्जुन ने जैसे हे ये कहा संजीव गौर से उसको देखने लगा. संजीव तोह हर बात बताता था अर्जुन को

"तुम्हे ऐसा क्यों लगा?"

"वो आप न उस पीसीओ में स्टूल लगा कर बैठे हुए थे आज 9 बजे."

"हाहाहा.. कमीने, तेरी भाभी से हे बात कर रहा था. और तू क्या कर रहा था इस तरफ?"

"काम से आया था लेकिन फिर सोचा क्यों रंग में भांग दालु. वैसे आप तोह रोमांटिक भी हो जो ऐसे घर से बहार बंद केबिन में बिना गर्मी की परवाह किये इतनी देर तक बातों में लगे रहते हो.", अर्जुन अब मजे ले रहा था और संजीव के चेहरे पर बड़े होते हुए भी शर्म आने लगी थी.

"तेरी भाभी को तू अभी जानता नहीं बच्चू. मैं तोह शांत आदमी हु लेकिन वो बिलकुल उलट है. प्यार में भी अनुशाशन और नियम की लिस्ट बना के रखती है. वैसे तुझसे जब मिलेगी तब उसको झटका लगने वाला है.", संजीव ने ये बात अभी न बताई और अर्जुन भी हँसते हुए उनके साथ कुछ वक़्त यही बातें करता रहा. घडी में 12 बजते हे दोनों घर वापिस निकल चले. अर्जुन ने कपडे बदल कर उमेद चाचा की हवेली जाना था.

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"सब तैयारी है न राजेश?", शंकर और राजेश ने अपनी अपनी कार हॉस्पिटल में हे रहने दी. पार्टी की शान बढ़ने का सामान लिए दोनों उमेद की मेर्सेडस में बैठे तोह उमेद ने यही सवाल किया.

"निश्चिंत रहो जीजा जी, आपके लिए ख़ास खंजर और शंकर जीजा जी के लिए आधा दर्जन सर्जिकल ब्लेड के साथ साथ शैम्पेन खोलने वाले ओपनर ले लिए है. ये रुस्सियन रिवॉल्वर भी मेरी बगल में रहेगी. वैसे वह कुछ ज्यादा हे गरम माहौल मिलने की आशा है मुझे.", राजेश ने एक बार वो बक्सा खोल कर दिखाया और पिछली सीट पर पसर कर बैठ गया.

"हाँ, ऐसी उम्मीद तोह मुझे भी है क्योंकि विनोद से ज्यादा अकड़ इक़बाल और विमल कपूर दिखने की कोशिश करेंगे. अब जो बाँदा नशे का इतना बड़ा काम करता हो वो कुछ तोह रसूख रखता हे होगा. और इक़बाल एक तरह से इन सबका सेनापति है जिस पर मेरे सिवा कोई हाथ नहीं डालेगा.", शंकर के इस कथन पर उमेद ने कार मुख्या मार्ग पर डालते हुए कहा.

"तू देख लियो इक़बाल और उसके गुर्गो को भोले, ये कपूर की आरती मैं हे उतरूंगा. साला नशे का काम करके खुद को राजनीतिक गुंडा समझते है लेकिन गुंडई मैं खून में लिए पैदा हुआ हु. राजेश अपना सलाद काटने में माहिर है और ये सब संभाल लेगा. बस विनोद और वह मौजूद किसी घरवाले पर जानलेवा हुम्ला नहीं करना ये ध्यान रखना राजेश. विनोद या कोई जीजा foon-faan करे तोह तबियत से समझा देना. लड़कियों का क्या हुआ शंकर?", उमेद हर पहलु पर विचार करता था और यही उसको एक लीडर बनती थी.

"दोनों लड़कियां ट्रेनिंग कर चुकी है गज्जू और काबिल है. पोस्टिंग अगले महीने से होने वाली है उनकी लेकिन आज हे मिशन शुरू करवा दिया मैंने. अब लड़कियों से बलात्कार करने वालो को उनके हाथो सजा दिलवाना भी नेक काम हे हैं. अंकिता और सुजाता नाम है दोनों का और दीपक ने हे तैयार किया है उन्हें. 8 बजे वो बताई जगह मौजूद मिलेंगी.", शंकर की बात पर उमेद अब कुछ सहज हुआ लेकिन उसको कुछ परेशानी और भी थी जो शंकर से छिप न सकीय.

"वैसे तू कुछ सोच रहा है जो इस मामले से अलग बात है गज्जू. चाहे तोह बोल सकता है.", उमेद ने एक फीकी मुस्कान से शंकर को देखा और फिर सड़क पर निगाह कर ली.

"आइशा थोड़ा अलग सा व्यवहार कर रही है कुछ समय से भोले. और कल शाम से शालिनी भी बदली बदली सी है. शालिनी का तोह चलो मूड ाचा है और वो माँ की हर बात मान रही है, हंस बोल भी रही है लेकिन आइशा में आया बदलाव चिंताजनक है.", उमेद ने अपनी बहिन और भांजी का जीकर किया तोह शंकर के साथ साथ राजेश भी चिंतित और उत्सुक लगे.

"ऐसा क्या बदलाव नजर आया भाई? बची बड़ी हो रही है और हो सकता है ये वैसा हे बदलाव हो. कॉलेज जाने वाली है वो और ये नया जीवन होता है जिसमे परिवर्तन और व्यवहार अलग बात नहीं."

"हाँ उमेद जीजा जी. वो मेरी बिटिया को हे देखो. 12तह क्लास तक तोह स्वाति हमेशा हे कंचन के सिवा किसी से बात नहीं करती थी, अब वो कपडे भी खरीदती है, सबसे हंसती बोलती भी है और अपनी माँ के साथ भी सहेली जैसी है. हाँ ये सब बदलाव चिंता वाले नहीं है और आपकी बात से लगता है ऐसा मामला नहीं है.", राजेश जैसे परेशानी समझ रहा था लेकिन असलियत उसको भी पता नहीं थी बात कुछ और हे है.

"वो कल सुबह भी खाने की मेज पर अर्जुन को घूर रही थी और पहली बार उसने अर्जुन को घर आने का न्योता दिया. जानता है न वो लड़की अपने में हे खोयी रहती है और ज्यादा से ज्यादा माँ (पूर्णिमा) से लाड प्यार जताती है. अपने कमरे में अधिकतर रहने वाली आइशा को अब गुनगुनाते देखने लगा हु मैं और सबसे बड़ी बात उसके कमरे में ये मिला मुझे.", उमेद ने बायीं जेब से एक कागज़ निकाल कर शंकर को थमा दिया. शंकर की तोह धड़कन हे बढ़ चुकी थी अर्जुन के जीकर से और ये कागज़ जैसे आग में लिप्त हो. हिम्मतत करके खोला तोह दिल में aar-par तीर का चित्र जहा ी लव यू अर्जुन लिखा था और उसके निचे अनगिनत होंठो के निशाँ. सबसे आखिर में लिखा था , 'लेकिन कह नहीं सकती'

"ओह्ह्ह्हह्ह जीजा जी.. ये तोह बहोत बड़ी गड़बड़ हो गयी.", राजेश ने वो देख तोह सर पीट लिया. मामला एकतरफा प्यार का होने के साथ साथ bhai-behan का भी था. और ये दोनों तोह मिले हे अभी थी जिसमे अर्जुन की कभी बात न हुई थी आइशा से.

"इस अर्जुन को मैं बहार हे भिजवा देता हु 5-6 साल के लिए. साला एक गांडपंगा ख़तम नहीं होता और 10 शुरू. अब ये भी नहीं सोचा के वो बहिन है उसकी.", शंकर को क्रोधित होते देख उमेद ने बड़े प्यार से सर सहलाते हुए कहा.

"ओह मेरे भोले, तू न समझता बाद में है फैंसले पहले कर लेता है. अर्जुन तोह आजतक बोलै भी नहीं है आइशा से और यहाँ लिखा हुआ तुझे समझ नहीं आया? आइशा एकतरफा चाहने लगी है अर्जुन को जिसका खुद अर्जुन को पता भी नहीं. लेकिन अगर ये बात जीजा (शालिनी के पति) तक गयी तोह वो आइशा की बात मान लेंगे. परेशां मैं आइशा से हु, अर्जुन तोह परेशानी से निकलने वाला इंसान है.", अब शंकर के दिमाग ने भी कुछ समझा इस बात को और मामले की संगिनियत को.

"लेकिन लफड़े वाला काम तोह हो गया है भाई. आइशा ज़िद्दी भी है और बात मनवाने में माहिर भी. अर्जुन का पहले हे 2-2 जगह चक्कर है और जिसमे से प्रीती के साथ उसकी शादी पक्की है.", शंकर का 2-2 कहना इन्हे समझ न आया और राजेश अनजाने हे बोल उठा.

"लेकिन मंजू बिटिया के साथ तोह वो आत्मिक तौर पर है न जीजा जी. सहारे की तरह और प्रीती तोह बचपन से उसकी हैं.", अब शंकर बोले भी तोह क्या. उसका दुखड़ा इन्हे समझना उसके बस से बहार हे था.

"वैसे अर्जुन हे आइशा को समझा सकता है भोले. उस लड़के को बात करने और समझने का सलीका है. मैंने ये बात किसी को नहीं कही सिवाए विन्नी के. वो बड़ी भी है और अर्जुन के साथ उसकी ाची जमती है. विन्नी की मदद से अर्जुन समझा हे देगा जितना मैं जानता हु. बस ऐसा होना नहीं चाहिए था भाई. लड़की के मैं में जो पहली तस्वीर छपती है उसको दूर करना आसान नहीं होता. खैर यहाँ मामला सिर्फ अट्रैक्शन का है तोह सफल होने की आशा रखनी हे पड़ेगी.", उमेद ने इस विषय को बंद करते हुए अब जरुरी बातों पर चर्चा शुरू की. कार अब थोड़ी सही रफ़्तार से हाईवे पर दौड़ रही थी.

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अर्जुन सांझ में 5 बजे वापिस निकला था उमेद चाचा की हवेली से. मैं कुछ वक़्त अजीब हुआ था लेकिन शालिनी बुआ और आइशा के हँसते हँसते विदा लेने पर वो भी बेहतर महसूस करने लगा था. पूर्णिमा जी ने आज उसको अज्जू चाचा की चैन पहनाई थी और जितने प्यार से अपने हाथो से खाना खिलाया था वो अर्जुन के जेहन में एक खुशनुमा एहसास सा बना चूका था.

"क्या सोच रहे हो?", विन्नी ने अर्जुन को ये दूसरी तरफ से कार ले जाते हुए भी अलग बात कही. उसको बस अर्जुन के साथ एकांत चाहिए था और इस रास्ते का तोह यही मतलब था की अर्जुन भी उसकी हालत समझ रहा है. घर में भी आज 2-3 प्यारे चुम्बन दोनों के बीच हुए थे, हवेली भ्रमण के वक़्त लेकिन वो सब बस हलकी फुलकी मस्ती थी.

"ऐसा को बुरा लगा होगा न दीदी?"

"पागल हो तुम. न तोह तुमने उसको ये कहा की वो तुमसे प्यार न करे और न हे उसके दिल को ठेस पहुंचे. तुमने सच बतया न की तुम्हारे रिश्ते की कोई मंजिल नहीं हो सकती अगर वो तुमसे ऐसे हे एकतरफा प्यार करती रहे. और दोस्त बन्न ने के बाद वो कितनी खुश थी. सचमुच तुम बहोत समझदार हो अर्जुन.", विन्नी ने दोनों तरफ घने पेड़ और सुनसान सड़क देख अर्जुन के गाल पर होंठ टिका दिए.

"एक्सीडेंट करवाऊंगी आप. वैसे इरादे ठीक नहीं लग रहे आपके?", अर्जुन ने ये बात हँसते हुए कही थी और विन्नी ने कार की रफ़्तार धीमी होती देख अपनी बाहों का घेरा उसके गले में दाल दिया. उन मॉटे और नरम कबूतरों का एहसास अपनी ब्याह पर होते हे अर्जुन ने कार एक तरफ लगा दी. इस बार वो भी पलट कर विन्नी को बाहों में भर चूका था. एक पल दोनों की नजरे टकराई और फिर चेहरे नजदीक आते चले गए जबतक विन्नी के लाल होंठ अर्जुन के होंठो से न जा मिले. बड़े प्यार से शुरू हुआ ये चुम्बन हर गुजरते लम्हे से गहराने लगे. टॉप के ऊपर से हे अर्जुन ने एक बड़े बूब को पकड़ते हुए उनका अकार जांचा तोह वो विन्नी के छरहरे शरीर पर लगभग कोमल दीदी के सामान बड़े और कैसे हुए थे. विन्नी अर्जुन की इस हरकत से जोश में आती उसके होंठो को चबाने हे लगी थी.

"उफ्फ्फ्फ़.. यहाँ करना ठीक रहेगा?", विन्नी अलग होते हे टॉप निकलने लगी थी और अर्जुन ने तुरंत हाथ पकड़ लिया.

"पागल हो दीदी? ये सड़क अभी सुनसान है इसका ये मतलब नहीं की यहाँ कोई आएगा नहीं. ये तोह बस आपको मैं बता रहा था के मैं भी आपसे उतना हे प्यार करता हु और सब समझता भी हु. जो आप चाहती है वो हम कल आराम से करेंगे. मेरे पास अपनी ख़ास जगह है, सेफ भी और कम्फर्टेबले भी.", अर्जुन ने एक बार और उन भीगे हुए होंठो को चूमा तोह विन्नी थोड़ा शर्माती हुई सामने देखने लगी. मतलब कल अर्जुन उसकी चाहत पूरी करेगा वो भी सुकून से.

"वैसे तुम्हे ये लग रहा था के हम यही वो सब करेंगे?"

"रहने दो आप अब बातें बनाना. दिख रहा था के आप अभी रूकती नहीं अगर मैं न रोकता. वैसे अंदर का सब मैं देख चूका हु.", कार आगे बढ़ता हुआ अर्जुन मंद मंद हंस रहा था और विन्नी उसके कंधे पर हाथ मारती हुई नाराज होने का दिखावा करने लगी.

"बड़े आये सब देखने वाले. चलो आज का इन्तजार भी बेकार हे गया.", विन्नी के ऐसे कटाक्ष से अर्जुन ने गंभीरता से कहा.

"दीदी, करने को तोह अभी भी वो सब हो सकता है लेकिन आपको ऐसे समझ नहीं आएगा की मैं क्यों जल्दबाजी नहीं कर रहा. कल हम सवेरे हे चलेंगे और देख लेना आप दोपहर तक खुद वापिस घर आने से मन करोगी.", अर्जुन की बात सुन्न कर विन्नी को वो नजारा याद आ गया जब बबिता के साथ वो सहवास कर रहा था. सचमुच उस तगड़े मूसल से कौमार्य भेदन करवाने के बाद हालत खराब होने वाली थी उसकी.

"हाँ ठीक है ठीक है. सामने देख कर चलाओ और ये सड़क वैसे हैं तोह बड़ी शांत और साफ़ सुथरी. बस ज्यादा चौड़ी नहीं है.", अर्जुन को तोह जैसे इस बात में भी मजाक सूझ गया.

"सही समय आने पर ये भी चौड़ी हो जाएगी दीदी. संकरी हैं इस वजह से तोह सुनसान है. सही कनेक्शन होने दो फिर ट्रक भी चलेगा यहाँ."

"कमीने कही के. बहोत गंदे हो तुम.. छियई..", विन्नी को जब मतलब समझ आया तोह वो हाथ से उसकी बाजू पर मारने लगी लेकिन अगले हे पल उसकी हंसी गायब हो गयी जब अर्जुन ने गियर वाले हाथ से विन्नी का हाथ पकड़ कर अपनी पंत की ज़िप पर हथेली रखवा दी. विन्नी को ये गोल डंडा अपनी कलाई से भी कही ज्यादा मोटा और गरम महसूस हुआ. दिल की धड़कन बढ़ने लगी थी और वो हाथ हटाना चाहती थी. अर्जुन ने भी तरस खाते हुए कलाई छोड़ दी.

"अब तोह समझ गयी होंगी की क्यों मैं सड़क पर ट्रक नहीं दौड़ा रहा? Aas-pas toot-foot हो जाएगी तोह रिपेयर में टाइम भी लगेगा. आपकी तोह वैसे भी बंद गली है.", अर्जुन की ऐसी कामुक और खुली बात सुन्न कर विन्नी को अपने जिस्म पर लाल चींटिया रेंगती महसूस हुई. फिर हिम्मत करते हुए उसने खुद हे अर्जुन का औजार थाम लिया.

"सब संभाल लुंगी मैं, तुम बस खुद का ध्यान रखना. सड़क को तोह एक बार तकलीफ होगी, ट्रक न एक्सीडेंट हो जाये.", विन्नी कहने को तोह निडर होने का दिखावा कर रही थी लेकिन हाथ में वो मोटा मूसल जिस तरह से फड़क रहा था उसकी टांगो के बीच करंट सा लगने लगा. विन्नी ने सहलाते हुए पूरी लम्बाई मापनी चाही तोह वो लिंग उसकी दोनों हथेलियों की चौड़ाई से लम्बा था.

"हाथ हटा लो विन्नी दीदी, मेरा सचमुच ध्यान भटक रहा है.", विन्नी ने अपनी हसरत काबू करते हुए हाथ हटा लिया. अब कार कुछ रफ़्तार से दौड़ रही थी लेकिन दोनों बात करते रहे.

"वैसे बबिता दीदी ने भी ये झेला था न तोह उनकी हालत नहीं खराब हुई?"

"वो उन्होंने बताया हे होगा आपको. वैसे वो प्रेग्नेंट हो गयी है, कल हे पता चला था मुझे.", अर्जुन ने सपाट उत्तर दिया और विन्नी का मुँह खुला हे रह गया. उसको ये तोह पता था के बबिता शादी से पहले से हे अर्जुन के साथ हमबिस्तर हो रही है लेकिन गर्भवती होना ताज्जुब की बात थी. कार अब शहर में दाखिल हो चुकी थी इसलिए दोनों ने अपनी बातें सकरात्मक विषयो पर घुमाई और अर्जुन ने कद पर गाने चालू कर दिए.

'मुझको गलत न समझना, मैं नहीं बादल आवारा

दिल की दीवारों पे अपनी, नाम लिखा है तुम्हारा...'

और ऐसे हे कुछ बाज़ीगर अपनी मंज़िल से कुछ दुरी पर इस होटल के कमरे में ख़ास मुलाकात के लिए तैयार हो रहे थे. काली बदन उघडू ड्रेस में एक जानलेवा हसीना और दूसरी सफ़ेद लम्बे गाउन में मादक अप्सरा सी. उमेद के जिस्म पर पूरी आस्तीन का कला कुरता, गले में मोटी संगल सी सोने की चैन और कलाई में महंगी विदेशी घडी. जीजा साला तोह सफ़ेद कमीज के ऊपर नीला महीन कोट पहने कुछ विशेष हे लग रहे थे. विनोद ने अपनी लंका में आग लगवाने के लिए इन दरिंदो को 8 बजे का न्योता दिया था और 7:30 हो चुके थे.

"कोई रेहम नहीं.", उमेद ने दोनों लड़कियों से कहा

"जरा भी नहीं.", दोनों का स्वर एक जैसा था. खेल अब ऐसा होने वाला था जिस से अखबारों में सनसनी फैलनी लाजमी थी. सबसे खामोश था शंकर जो अक्सर शराब पीने से पहले गंभीर हे रहता था और उसके बाद जल्लाद. इस से बड़ा बाज़ीगर तोह अभी तक रामेश्वर जी ने भी नहीं देखा था. हारना हो तोह एक से भी हार जाए, अपनी आयी पर आया तोह पूरी फ़ौज पर भारी. बस ऐसा हे तोह था ये भोला जल्लाद बाज़ीगर.
 
मैं अपडेट कल भी दे सकता हु दोस्तों लेकिन जरुरी काम है तोह भरोसे नहीं रखना चाहता. अगले कुछ पल बहोत खतरनाक होने वाले उम्मीद से पृथक. लिखने में समय भी लगेगा और फीलिंग्स भी. मेरे लिए अभिव्यक्ति आसान नहीं. परसो का इन्तजार कीजिये
 
कहने को मैं सर्वज्ञता हु

काश ये सोचना सच होता. ..

वो फैंसले यु भार न लगते

जिनकी परवाह अपनों से ज्यादा थी..!!
 
अपडेट 162

बाज़ीगर (2)

जुलाई 2004


"तोह तुम दोनों ने फैंसला ले लिया है? मुझे उम्मीद थी की काम से काम तुम बड़ी और परिपक्व होने के नाते sahi-galat समझोगी.", इस बंद कमरे में 6 लोग मौजूद थे जिनमे से 3 सोफे पर बैठे थे और बाकी 3 उनके सामने खड़े. वक़्त के थपेड़ो ने जहाँ पंडित रामेश्वर शर्मा को कुछ कमजोर किया था वही उनके सामने खड़ा अर्जुन कही ज्यादा हे मजबूत और गंभीर बन्न चूका था. उसकी अगल बगल कड़ी Preeti-Ritu जैसे अब जुड़वाँ हे लगने लगी थी लेकिन उनके खूबसूरत चेहरों पर भी चिंता और गंभीरता छायी थी. सामने दादा जी, पिता और आचार्य जी विराजमान थे जो इनसे कुछ अलग न थे.

"आपने भी एक शर्त राखी थी दादा जी. पिछले 4 साल मैंने ारु से कोई वास्ता न रखा क्योंकि आप मुझे परखना चाहते थे. इन 4 सालो में सिर्फ मैं और अर्जुन हे दूर नहीं हुए, प्रीती ने भी बराबर ये वनवास भोगा. फैंसला तोह आपको करना है, वो भी तीनो का.", पहली बार हुआ था की पंडित जी की नजरे पल भर के लिए झुकी थी. बचो को अनजाने हे उन्होंने ऐसी सजा दी थी जिसका पछतावा हर गुजरते दिन के साथ बढ़ता रहा था. नजरे तोह खुद शंकर जी भी नहीं मिला रहे थे क्योंकि कही न कही पंडित जी की उस सजा के पीछे इनका भी योगदान रहा था.

"जिसके साथ तुम दोनों जीवन बिताना चाहती हो, क्या वो तुम्हारे साथ वफादार है?", Ritu-Arjun ने नजरे चुराते हुए ये बात शंकर जी ने प्रीती को देखते हुए कही. इस बार आचार्य जी ने अपना चेहरा झुकाते हुए हाथ से धक् लिया. इतने बरसो बाद भी ऐसा सवाल करना कहा जायज था.

"अगर बात वफ़ादारी की है तोह मैं बस इतना हे कहूँगी की इस परिवार और हर सदस्य के साथ अगर कोई वफादार रहा है तोह वो सिर्फ अर्जुन हे हैं अंकल. हर इंसान की परेशानी, जरुरत, चाहत को पूरी करने के साथ साथ इसने कभी अपना सुख न देखते हुए सबके दर्द अपना लिए. वफ़ादारी तोह आपने खुद हे देखि थी जब आपके ऊपर चली गोली इसने अपने ऊपर ली थी. चलने वाला भी आपका और झेलने वाला भी आपका. दोनों में से आपने गलत को हे क्यों चुना था? बता सकते है की यहाँ वफ़ादारी की आपकी परिभाषा क्या है?", अर्जुन प्रीती को बोलने से रोकना चाहता था लेकिन उसका कलाई पकड़ना भी काम न आया. अब सामने बैठे 2 लोगो के पास जवाब न था. बचे सिर्फ आचार्य जी और वो सवाल नहीं करना चाहते थे.

"समाज में रहना है तोह उसके नियम maan-ne पड़ते है अर्जुन. तुम नहीं मानते और मुझे यही बात तुम्हारी ाची लगती है. इन चार सालो में मैंने सिर्फ तुम्हारे दुःख और दर्द को हे देखा है, नकली हंसी का मुखौटा पहने तुम्हारा चेहरा उतना ख़ास नहीं था जितना इस वक़्त ये मायाजाल सा लग रहा है. जीवन तुमने जीना है, सही गलत की समझ तुम रखते हे हो लेकिन एक घर में 2 धर्मपत्नी? पंडित जी की प्रतिष्ठा के लिए तुमसे अधिक समर्पित इंसान कोई नहीं है और ऐसा मैं मेरे लिए भी कह सकता हु. मैं कर्जदार हु तुम्हारा लेकिन रिश्ता वही है जिसमे ऐसी बात कहना ठीक नहीं.", कुछ वक़्त रुक कर आचार्य जी ने पंडित जी की तरफ देखा जैसे वो अपनी बात कहने की स्वीकृति चाहते हो.

"जिसको घर के बड़ो ने चुना है वो घर की बहु बनेगी और जिसने तुम्हारे लिए तपस्या की है वो उसकी जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी. ऋतू घर की बेटी है और वो यहाँ इस रिश्ते से हे रहेगी. नियम तोड़ने की सजा तोह होती हे है इसलिए ऋतू को पाने के लिए खुद को साबित करना होगा जिसमे ऋतू तुम्हारी मदद नहीं कर सकती. साबित करने के बाद तुम दोनों एक और घर बना सकते हो, सिर्फ तुम दोनों की म्हणत का. कामयाब रहे तोह इन दोनों के साथ हे सही नियम से विवाहित जीवन जी सकते हो. ये सिर्फ मेरे शब्द नहीं है, उन सभी के है जो इस कमरे में मौजूद नहीं. शायद वो तुम तीनो के सामने ये कह नहीं सकते थे.", आचार्य जी ने बखूबी अपनी आँखों को बहने से रोके रखा. आज जैसे उनके जीवन का सबसे कठिन समय था ये. उनकी भाभी कौशल्या जी ने अगर उनसे मदद न मांगी होती तोह वो कदापि ये सब न कहते जिसमे उनके बचे का दिल दुखी हो.

एक पल के लिए जहां सन्नाटा छ गया था इस कमरे में. 3 चेहरे जहाँ झुके हुए थे वही 2 चेहरे कुछ दुःख के साथ अपने बीच खड़े शख्स को हे देखते रहे. अर्जुन कुछ सोच कर आगे बढ़ा और अपने दादा जी के चरणों में बैठता हुआ उनकी गॉड में वो मोटी फाइल रखने के बाद उनका हाथ थाम कर बोलै.

"वचन, समाज और नियम का मूल्य मैंने आपसे हे सीखा है बाउजी. रही बात खुद को साबित करने की तोह मुझे ये भी मंजूर है और इसकी पहल स्वरुप मैं वो सबकुछ वापिस करता हु जो मुझे सौंपा गया था. जमीन, घर, कारोबार, गाडी और बैंक में जमा एक एक पैसा मैं परिवार को सौंप चूका हु. एक साल बाद वापिस आऊंगा प्रीती को इस घर की बहु बनाने और ऋतू को यहाँ से उस दूसरे घर ले जाने. बात सही है के एक जगह 2 देवियों को रखना ठीक नहीं. विवाह के बाद हर 3 दिन मैं यहाँ रहूँगा और बाकी अपने काम के दौरान ऋतू के साथ. वो यहाँ आएगी तोह घर की बेटी के तौर पर. प्रीती जब चाहे दूसरे आशियाने में आ सकती है आप सबकी इजाजत से. आपसे कोई शिकायत नहीं और आचार्य दादा जी से. अब चलता हु और एक साल में खुद को साबित न कर सका तोह इन दोनों के लिए आप सही घर तलाश कर लीजियेगा.", रामेश्वर जी कुछ समझ पाते उस से पहले हे अर्जुन बाकी सभी को हैरत में छोड़ बहार वाले दरवाजे से निकल कर जा चूका था.

ऋतू और प्रीती की आँखों में आये उन आंसुओं और दर्द के ताप से रामेश्वर जी भी व्यथित होते हुए खुद का रोना रोक न सके. ऐसा हे हाल कुछ शास्त्री जी का था जो भीगी आँखों के बावजूद अपने परम मित्र को सांत्वना दे रहे थे. रोटी हुई वो दोनों लड़कियां अर्जुन के रास्ते बढ़ी लेकिन बहार कड़ी कौशल्या जी हालत देख उनसे लिपट गयी. अर्जुन जा चूका था वो सबकुछ सौंप कर जो इस घर ने उसको दिया था.

"आप रोक भी तोह सकते थे?", शंकर ने अपने पिता से जब ये कहा तोह कमरे में अब कुछ और लोग आ चुके थे. राजकुमार जी के साथ ललिता जी, मधु, कृष्णा जी और संजीव.

"रुक तोह सबकुछ सकता था चाचा जी, रुक तोह सबकुछ सकता था. वो मासूम था, छोटा बचा सा मासूम. पहले दादा जी के सम्मान को बचने के साथ वो उन्हें उनके हे अपनों से बचता रहा, फिर आपकी आँखों पर बंधी पट्टी को न खोल कर आपके लिए खुदको क़ुर्बान कर गया. बात जब बलिदान देने की आयी तोह हम सभी अंगूठा कटा कर शहीद हुए लेकिन वो खुद की बलि दे कर भी गलत साबित हुआ. रुक सकता था न ये सब? रोका क्यों नहीं किसी ने? मेरे भाई को अगर कुछ भी हुआ तोह इस घर में आप लोगो का नाम ज़िंदा रखने वाला दूसरा वारिस भी नहीं रहेगा. माफ़ कीजियेगा इन कड़े शब्दों के लिए लेकिन इस घर का हर शक्श अर्जुन का कर्जदार है.", संजीव ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर वही अपने दादा के सामने पड़ी टेबल पर रख दी थी.

"एक साल के लिए मैं अवकाश पर हु तोह इसको भी आप अपने पास हे संभल कर रख लीजिये. वैसे भी अर्जुन के होते हुए इसकी कभी जरुरत तोह पड़ी नहीं थी.", संजीव की आँखों से टपका पानी रामेश्वर जी के चरणों पर गिरा और जब तक वो अपने इस आज्ञाकारी बेटे को कुछ कह पाते वो घर के अंदर जा चूका था, गुमनाम होने के लिए. बाकी सभी बस खामोश खड़े नजरो से हे सवाल कर रहे थे. आज धर्मराज की अदालत में बेगुनाह ने खुद को हे मुजरिम मान कर ऐसी सजा दी थी जिसका असर हर व्यक्ति पर गहराने हे वाला था काम होने की जगह.

"ारु कहा है?", घर में ख़ुशी से दाखिल हुई कोमल अगले हे पल वह आँगन में हे जड़ हो गयी. Ritu-Preeti अपना चेहरा साफ़ करती हुई उस से लिपट कर फिर से रोने लगी थी लेकिन अबतक इस मामले में खामोश और बहार रही कौशल्या जी बैठक के भीतर चली आयी.

"मैंने एक बात कही थी तुम सबसे लेकिन मजाल हो की किसी के दिमाग में अपने सिवा कुछ चल रहा हो. मेरा नाम, मेरा सम्मान, मैं फलाना- मैं ढिमकाना. सांप क्यों सूंघ गया तुझे डॉक्टर? हाँ तोह कानून के हितेषी पंडित जी, रोने से सब ठीक हो जाएगा? ये राजकुमार तोह पैदा हे गूंगा किया था मैंने लेकिन इस मधु के मुँह में तोह जुबान है. मैं मरी तोह तुम में से कोई मेरी अर्थी को कन्धा नहीं देगा. ये हक़ सिर्फ संजीव और अर्जुन का है अब और अगर वो भी न हुए तोह दाग ऋतू देगी.", कौशल्या जी की ये दहाड़ बहोत थी सबके आंसू सूखने के लिए. अब तक कोमल अंदर आ चुकी थी जो अपनी दादी को गले लगाती हुई उन्हें शांत करने लगी.

"माँ.."

"शंकर, कोई सफाई नहीं.", कौशल्या जी जैसे किसी की सफाई सुन्न न हे नहीं चाहती थी.

"तुमने खुद कहा था कौशल्या की ये समाज के खिलाफ है."

"6 साल पहले कहा था जी. और उसके बाद आपने इस शंकर के कहने पर 4 साल की जो सजा दी उसके बाद भी समझ नहीं आया आपको की प्यार सच है या सिर्फ आकर्षण? समाज के खिलाफ है तोह रास्ता भी सुझाया था मैंने. ऋतू को करने दो नौकरी और यहाँ प्रीती है. मेरा बीटा दोनों को समय दे सकता है लेकिन आपके इस काबिल डॉक्टर को तोह ये मंजूर हे नहीं था. आप चाहे एक औरत को सोमबीर सिंह की हवेली अपना नाम दिए बैठा हो 30 बरस से, हमारी बहु यहाँ घर में होते हुए भी. तब समाज न आड़े आया? और वो बहार वाली 30 बरस में भी सगी हुई क्या तेरी? भाई साहब, जैसे 4 साल तक आपने अर्जुन का ध्यान रखा है, वैसे हे एक साल और ये कष्ट उठा लीजिये.", कौशल्या जी ने सबको आइना दिखने के बाद हाथ जोड़ कर शास्त्री जी से गुजारिश की तोह वो खड़े हो गए.

"भाभी जी, जो हुआ वो गलत हुआ या सही, मैं कोई टिपण्णी नहीं करूँगा. आपको हाथ जोड़ने की जरुरत नहीं है लेकिन अर्जुन बोल कर गया है की वो एक साल बाद हे आएगा. मैं उस से मिलने की हर संभव कोशिश करूँगा, आप निश्चिन्त रहिये.", आचार्य जी इतना कह कर बहार जाने लगे थे की कौशल्या जी ने मुट्ठी में दबोचा मोबाइल फ़ोन उनके सामने कर दिया.

"इस बार वो सबकुछ लौटा गया है भाई साहब. रोटी के पैसे भी होंगे या नहीं मेरे बचे के पास?", कौशल्या जी फिर से रोने लगी थी और उधर रामेश्वर जी ने उस फाइल के उभार को देखा तोह खोलने पर अर्जुन का बटुआ भी उसमे हे पड़ा था.

"मैं पता करवाता हु, पापा.", शंकर ने भी ये बटुआ देख लिया था जिसको खोलने पर वह रेखा और कृष्णा की हे तस्वीर थी. एक नजर अपनी भाभी को देखने के बाद शंकर से जो कहता बना वही कहा.

"हो सके तोह घर पे ध्यान दो बीटा. वक़्त आ गया है तुम्हे ये समझने का की अब जिम्मेवारियां उठाने का दम मुझमे नहीं रहा. अर्जुन ने जो भी हम सबके लिए किया, हम बदले में उसके लिए एक काम भी न कर सके. वो स्वाभिमानी बन्न चूका है क्योंकि अब वो सबकुछ ऋतू और प्रीती के लिए कर रहा है. पता नहीं सब मिल कर इस घर को बचा सकोगे या नहीं. वो अकेला हे ये सब इतने बरसो तक करता रहा और आज संजीव ने भी खुद को क़ैद कर लिया है.", रामेश्वर जी हमेशा की तरह आज भी किसी को दोष देने की जगह घर के मुखिया के तौर पर सब जिम्मेवारी खुद ले रहे थे.

"4 साल बाद मेरा बचा पढाई पूरी करके घर आया था लेकिन 6 घंटे भी न रुकने दिया तुम लोगो ने. खैर, तुम सबने हमेशा वही किया है जो तुम्हे ठीक लगा लेकिन इस घर में आज के बाद हर फैंसला मैं करुँगी. सबसे पहला फैंसला हैं की शंकर और राजकुमार एक रात के लिए भी घर से बहार नहीं रहेंगे और अगले एक साल तक ये कमरा हे तुम दोनों के रहने की जगह होगा. मधु, तुम तभी आना जब इस घर में अगली शादी हो और तीनो बहु अगर मायके जाना चाहे तोह जा सकती है. गलती होने की सूरत में तुम दोनों हे अपना नाम हटवा लेना मेरे परिवार से. और बाकी सबको मुँह लटकने की जरुरत नहीं, करारा जवाब हे मिलेगा उन सबको जिन्होंने ये सब किया है.", कौशल्या जी के इतने बड़े फैंसले से दोनों हे भाई भोचक्के रह गए थे. कौशल्या जी ने इस तरह सभी को इस एक वर्ष की कड़ी सजा दी थी अर्जुन के वियोग में.

"माँ का फैंसला बिलकुल एकतरफा नहीं है पापा?", शंकर को जैसे ये सब सेहन नहीं हो रहा था. मैं दुखी था लेकिन माँ के कड़वे बोल कही ज्यादा व्यथित कर गए थे.

"वो हमेशा एकतरफा फैंसले हे करती है शंकर. उसकी नजरो में जो सही है फिर वो बाकी किसी की नहीं सुनती. माफ़ करना, अब मैं भी कुछ नहीं कर सकता. कभी तुम्हारे लिए वो दिवार की तरह सामने कड़ी होती थी, बेशक तुम्हारी गलती होने के बावजूद. लेकिन आज वो सही के साथ है और हम सभी दूसरी तरफ.", रामेश्वर जी बूढ़े शरीर को सोफे से उठाते हुए एक गहरी सांस लेने के बाद मेहमान कमरे की तरफ बढ़ गए.

"जेठ जी, अब जो हो गया है उसको बदलना तोह मुमकिन नहीं लेकिन परिवार को जोड़ कर तोह रखा जा हे सकता है. ऋतू चंडीगढ़ जाने वाली है और अगर हो सके तोह उसको रोक लीजिये. वो अर्जुन की तरह इस घर को संभल सकती है.", कृष्णा जी ने ये गुजारिश कर तोह दी लेकिन क्या शंकर अपनी बेटी को मन सकेगा?

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14 मई, 1998

इधर अर्जुन विन्नी को लिए अपने घर वापिस आया तोह ये महंगी कार देख कर समझ गया की उसकी बुआ आ चुकी है. विन्नी गलियारे की तरफ अकेली चली गयी और अर्जुन बैठक की तरफ. उसके फूफा अशोक के साथ यहाँ राजकुमार जी और दादा जी बैठे थे.

"नमस्ते फूफा जी. कैसे है आप?", अर्जुन ने पाँव छूने के साथ हलचल पूछा तोह एक पल अशोक जी इस लम्बे तगड़े भतीजे को निहारने लगे

"भाई तुम जैसा तोह बिलकुल नहीं हु लेकिन बाकी सब ठीक है. वैसे अर्जुन मिया, इतना भी कद न बढ़ाओ की चौखट बढ़ानी पड़ी. पापा, स्पेशल फाॅर्स की तैयारी करवा रहे हो क्या अपने लाडले की? इसके सामने तोह इन्दर भी मुझे कमजोर दिख रहा है.", अशोक जी खासे प्रभावित थे अर्जुन की deh-kaya से, जैसा अधिकतर सभी होते थे.

"ऐसा तोह कुछ नहीं है फूफा जी. बस गेन्स की बात है और मेरे मामले में शायद padd-dada जी और नाना जी के गुण है थोड़े.", रामेश्वर जी थोड़ा हैरान हुए अपने पिता का जीकर सुन्न कर लेकिन बोले कुछ नहीं. मोतीलाल जी शांत व्यक्ति थे लेकिन उनकी सबसे अलग बात थी सवा 6 फ़ीट की लम्बाई और पहलवान सा शरीर. लेकिन उतने हे खामोश तबियत के व्यक्ति थे रामेश्वर जी के पिता. वही रंग और लम्बाई के मामले में कुन्दनलाल जी भी अपने आप में अलग हे थे.

"हाहाहा.. सही बात कही तुमने लेकिन साथ साथ शंकर जैसी हे आँखें है तुम्हारी. तुम्हारी बुआ पिछले एक घंटे से राह देख रही है. मिल लो उनसे भी."

"और हिमांशु? वो कहा है?", अर्जुन ने भाई के लिए पुछा तोह अशोक जी ने सर हाँ में हिला दिया.

"अपनी नानी के पास हे बैठा है तुम्हारा भाई.", उनकी बात सुन्न कर अर्जुन दादा जी वाले कमरे में आया तोह वह कोई न दिखा लेकिन पिछले आँगन से आती आवाजों ने बता दिया था के सभी लोग वही बैठे है. वैसे भी चाय का समय था और बुआ के होने पर सब लोग महफ़िल लगा चुके होंगे. अर्जुन इधर आया तोह बुआ उसकी तरफ पीठ किये हे बैठी थी कुर्सी पर और वो चुपके से उनकी आँखे बंद करता खड़ा हो गया.

"तू सिर्फ खड़ा भी हो जाता तोह मैं बता देती की अर्जुन हे हैं. वैसे मैं नाराज हु तुझसे.", मधु बुआ ने एक पल में हे ये बता दिया था और अर्जुन ऐसे हे पीछे से उनके गले में बाहें डालता हुआ गाल चूम कर बोलै.

"नरिंदर चाचा भी तोह हो सकते थे बुआ? और आपकी नाराजगी जायज है लेकिन फ़ोन पर आप भी नहीं मिली 2 बार.", अर्जुन ने जब फ़ोन का जीकर किया तोह मधु बुआ ने भी उसके दोनों हाथ अपने हाथ में लेते हुए हाँ में सर हिलाया.

"चल फिर नाराजगी ख़तम और इन्दर भैया की इतनी हिम्मत है नहीं.", अभी बुआ बोल हे रही थी की अर्जुन ने टेबल के दूसरी तरफ बैठे उस लड़के को अपनी तरफ देखते पाया. वो बड़े ध्यान से अर्जुन को देख रहा था जो उसकी माँ के साथ इतना खुल कर लाड जाता रहा था, सबकी मौजदगी में.

"कैसे हो हिमांशु? तुम्हे देख कर लगता है बोर्डिंग में सिर्फ पढ़ाई हे करते रहे हो भाई.", अर्जुन बुआ से अलग हो कर इस तरफ आया और हिमांशु से हाथ मिला कर मिलने लगा तोह हिमांशु ने उठने की जेहमत न करते हुए औपचारिक सा हाथ मिलाया. जाने उसका स्वभाव हे ऐसा था या उसको अर्जुन पसंद नहीं आया.

"पढ़ने हे तोह जाते है न बोर्डिंग में? सुना है तुम भी बोर्डिंग थे लेकिन शायद पढाई के अलावा सब किया है.", अर्जुन इस बात पर थोड़ा खुल कर हंसने लगा था और कौशल्या जी ने भी बचो के बीच आने की कोई चेष्टा नहीं की.

"हाँ भाई, मेरी दादी ने कहा था के दादा जी अपने आप नंबर दिलवा देंगे एग्जाम में इसलिए सिर्फ खेल कूद कर हे टाइम बिताया. सुना है बड़े ाचे फोटो निकलते हो तुम? जो ाचा लगता है वो करना चाहिए हिमांशु.", अर्जुन ने जैसे हे हिमांशु के शौक का जीकर किया तोह वो पहली बार थोड़ा खुश दिखा.

"मैं तोह और भी ाची फोटो निकल सकता हु. तुम मम्मी से बोल कर मेरी पसंद का कैमरा और लेंस दिलवा दो. देखो फिर शादी में मैं कैसे बेस्ट फोटोज निकलता हु. वैसे मैं गिटार भी बजा लेता हु.", हिमांशु ये भूल हे गया था के यहाँ और लोग भी है.

"ये बात तोह फिर तुम्हे मेरे पापा से या चाचा से केहनी चाहिए. मां लगते है तुम्हारे और जब तारा को लाख रुपये की शॉपिंग करवा सकते है तोह तुम्हे भी कैमरा मिल हे जाएगा.", अर्जुन ने ये बात बताई हे थी की पीछे से तारा ने उसकी कमीज खींच ली.

"और बिगाड़ दो इसको. जबसे वह आया है न तबसे सिर्फ वीडियो गेम के साथ कमरे में रहता है, माँ ने बताया मुझे. कैमरा और गिटार मिलते हे भूल जाओ के ये दिखेगा भी कही. कौन कह देगा ये 12तह में है? 40 किलो वजन है इसका और चिप्स cold-drink इसकी डाइट."

"बीच में बोलने के लिए किसने कहा? तुम्हे तुम्हारी चीज मिल गयी न, तोह अब इसको भी मिलेगी. हाँ वो चिप्स cold-drink वाली बात हम बाद में ठीक कर लेंगे.", तारा को जिस तरह अर्जुन ने समझाया था वो नजरे झुक कर रसोई की तरफ चल दी. प्यार करती थी और सामने से सवाल जवाब करना तोह कबसे बंद हो चूका था.

"यार, एक बात तोह बताओ जरा. ये दीदी तोह किसी की नहीं सुनती और कोई ज्यादा बोले तोह गाल लाल कर देती है. तुम्हारी बात सुन्न कर भीगी बिल्ली कैसे बन्न गयी?", हिमांशु कुछ याद करके अपना गाल सहलाता हुआ बोलै था और इस बार जवाब उसकी नानी ने दिया.

"तेरी माँ कौनसा काम थी लेकिन देखा bua-bhatije का प्यार? बस ये सब परवाह और प्यार है बीटा. चल तू मेरे साथ आ, तेरा मां तेरी पसंद का कैमरा दिल्ली से ले आया था. अब रख ले संभाल के.", कौशल्या जी ने ये खुशखबरी दी तोह हिमांशु सब भुला कर झूमता हुआ सा अपनी नानी का हाथ पकड़ के अंदर चल दिया. अर्जुन ने वही कुर्सी पर बैठकर माँ, चची और बुआ से कुछ वक़्त बात की और अपना doodh-khuraak लेने के बाद जल्दी वापिस आने का बोल कर बहार चल दिया.

"रेखा भाभी, अर्जुन कुछ अलग सा लग रहा था?", मधु ने अर्जुन के घर से जाते हे ये बात कही जिसका सही जवाब तोह रेखा के पास भी न था.

"बुआ, ऐसा कुछ नहीं है. वो आज सुबह से हे काम में लगा है तोह शायद अभी कुछ देर टहल कर फ्रेश हो जायेगा. वैसे आज रात तोह आप यही रुकने वाली है है न? ये मंजू कह रही है के आपको साथ लेके जायेगी.", कोमल ने जवाब के साथ हे बुआ से रुकने के बारे में सवाल किया तोह मधु बुआ मंजू की तरफ देख कर मुस्कुराने लगी.

"आज तोह इसके साथ हे रुकना है और अब जितने दिन यहाँ हु, हर रात मैं मंजू के घर और दिन में यहाँ. संजीव वही गया हुआ है अलका और मेनका के साथ, सारा सामान लगाने.", मधु बुआ जैसे ये सब पहले हे तये करके आयी थी की वो घर में ऐसा कुछ नहीं करेगी जिस से अर्जुन और उनकी िज्जात्त पर बात आये. और Menaka-Manju भी इस दौरान यही रहने वाली थी या कुछ दिन दलीप के घर.

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इस भव्य से 6 एकड़ के फार्महाउस पर लगा वो बड़ा रौशनी बिखेरता नाम अपने आप में हे बताता था के ये जगह shaadi-vivaah आदि कार्यक्रमों के साथ मनोरंजन स्थान है. शर्मा फार्म्स नाम का ये स्थल शहर से 2 किलोमीटर बहार हे मुख्या मार्ग पर बना था. हर तरफ एक ख़ास वर्ग में लगे घने विरक्षो के साथ साथ अंदर बड़ा पार्टी हॉल, लगभग 30 शानदार कमरे, तरणताल और आगे घने जंगल से हिस्से में ख़ास झोपड़ियां बानी थी, शायद संसर्ग स्थान.

"आओ, उमेद भाई. कैसे हो राजेश भाई साहब? शंकर भाई तोह पहले भी आये है यहाँ लेकिन आप दोनों भी इस गरीब के आशियाने को देख लीजिये.", विनोद भरपूर चाशनी से सभी का स्वागत कर रहा था, रिसेप्शन द्वार पर हे. आज इस जगह 'क्लोज' का बड़ा सा बोर्ड लगाया गया था इस ख़ास मीटिंग की वजह से लेकिन फिर भी बहार कड़ी 8-9 गाड़ियां बता रही थी की यहाँ जरुरत से ज्यादा हे लोग है. पप शर्मा भी उतने हे सेवाभाव से मिला लेकिन जैसे हे नजर शंकर की बगल में कड़ी उस युवती पर गयी, मुँह में पानी आ गया. अंकिता एक काली पश्चिमी पोशाक में बिजलिया गिरा रही थी और राजेश की बगल में कड़ी सुजाता उस सफ़ेद लम्बे वस्त्र में अप्सरा सी.

"भाई, दरवाजे पर हे रोके रखना है शर्मा जी या कुछ jal-paan भी करवाओगे.?", शंकर की बात पर शर्मा खिसियाता सा हाथ के इशारे से उन्हें आगे चलने का निमंत्रण देने लगा. रमन शर्मा से बस हाथ हे मिलाया गया था क्योंकि वो खुद हे दब्बू किस्म का इंसान था. यहाँ से निकलते हे सामना इस तगड़े सांड से सरदार से हुआ. राजेश की उम्र का ये व्यक्ति देखने में हे जानवर सा लग रहा था.

"बड़ा सुना है भाई साहब आपके बारे में बिनोद से. Jal-paan की क्या बात करते हो, आज तोह आपके लिए ख़ास महफ़िल सजी, सिर्फ आप लोगो के लिए.", ये इक़बाल सिंह था और शंकर से मिलने के दौरान हे उसने जैसे गले लगने के साथ कमर और पीठ की तलाशी ले ली. लेकिन उमेद ने ऐसा हे कुछ इक़बाल के साथ किया और महसूस हुआ उसकी कमर पर रिवॉल्वर का उभार.

"सरदार जी, फिर देरी किस बात की. पेग शेग के साथ करते है बिज़नेस की बात. अब आप हे तोह करता धर्ता हो यहाँ, जैसा विनोद ने बताया.", इक़बाल घाघ था जो उमेद की कारस्तानी समझ भी गया और चेहरे पर आयी थोड़ी परेशानी भी. राजेश की तलाशी न हुई क्योंकि वो विमल कपूर से परिचय होने के बाद उसके भी गले लगा और उसके साथ कड़ी 2 अधनंगी सी लड़कियों के भी. इन सभी ने जब ये सुनिश्चित कर लिया की ये 3 लोग और दोनों मासूम सी बलए कुछ भी ऐसा वैसा लिए हुए नहीं है, 12-13 निजी गुर्गो की सुरक्षा में सभी उस ख़ास हॉल की तरफ बढ़ चले जहा सब सौदे बाजी होनी थी.

यहाँ भी तक़रीबन 6 लड़कियां जो सिर्फ यौवन छुपाने लायक वस्त्रो में थी और उनके साथ 10 और पहलवान से दिखने वाले युवक मौजूद मिले. लकड़ी की चमकदार बड़ी मेज के गिर्द 8 कुर्सियां सजी थी और वह पूरा इंतजाम था महफ़िल में रंग डालने का.

"शर्मा बिज़नेस में मैं 40 का हक़दार हु राजेश भाई. और अपने विमल जी मुख्या इन्वेस्टर है इस कंट्री फार्म के. आप सबने तोह देख हे लिया हमारी थोड़ी बहोत दौलत को. आप इनसे मिलो ये है हमारी सियासत के ख़ास वजीर सुखबीर सिंह जी. कहने को तोह आप विपक्षी पार्टी के सचिव है लेकिन दोनों हे पार्टियों में इनका दखल बहोत गहरा है.", इक़बाल ने राजेश के हाथ से वो छोटा ब्रीफ़केस ले कर टेबल पर रखते हुए इस 55-56 वर्षीया घिनोने से व्यक्ति से परिचय करवाया तोह सुखबीर ने राजेश से हाथ मिलाने के साथ साथ शंकर को बड़े ध्यान से देखा.

"कैसे हो सुखी भाई साहब? बरसो बाद मुलाकात हुई है इस बार. पिछली बार तोह मेले में मिले थे हम.", शंकर ने अपने कोट के दोनों बटन खोलने के साथ हे आगे बढ़ कर सुखबीर को गले लगाया तोह वैसी हे गर्मजोशी से सुखबीर ने भी पीठ थपकी.

"इक़बाल, विनोद.. ये सब क्या है भाई? शंकर हमारा छोटा भाई है और हम तोह कर्जदार रहे है इसके. ये सब सुरक्षा तुमने हमारे भाई के डर से भाड़े है क्या?", अब जैसा तये हुआ था उस से विपरीत तरीके से बैठने का क्रम बना और इक़बाल तोह बगले झाँकने लगा जब उनकी गैंग के लीडर ने शंकर को भाई और इस सुरक्षा को गैरजरूरी बताया. सुखबीर की बगल में शंकर के बैठने से अंकिता भी शंकर के साथ सत् कर बैठ गयी. खिसियाता हुआ विनोद इस चौथी सीट पर इस आस से बैठ गया की कही वो भी इस हसीना पर हाथ फिर सके.

"सुखबीर भाई साहब, ये सब इंतजाम तोह हम सबके लिए किये गए है. वो क्या है की कपूर साहब ने आज माल भी मँगवाय हुआ है फाजिल्का से तोह लोगो की जरुरत तोह पड़नी हे थी. आओ शर्मा जी, आप और उमेद भाई साहब भी यहाँ बैठो. मैडम आप भी बैठिये.", अब सामने वाली तरफ की चारो कुर्सियों पर राजेश के साथ ये लोग बैठे तोह इक़बाल के लिए जगह न बची. शंकर ने ये देख लिया था और खुद हे 7 गिलास में पूरी बोतल उस महंगी शराब की ख़तम करने के साथ सिर्फ बर्फ मिला कर वह मौजूद ख़ास व्यक्तियों की तरफ बढ़ा दिए.

"सूजी डार्लिंग, तुम जरा कमर हिला लो फिर विनोद भी तुम्हे ज्वाइन कर लेगा.", राजेश ने सुजाता से जैसे हे विनोद का जीकर किया विनोद गिलास भिड़ने के बाद दारु चूसक्ता बड़ी चाहत से इस हूर को देखने लगा.

"सर, आप यहाँ बैठिये. हम लोग इस साथ वाली टेबल पर बैठ जाती है.", सुजाता और अंकिता ने कपूर और इक़बाल के लिए अपनी जगह छोड़ने के साथ हे विनोद को एक दिलकश नजर से देखा और पप शर्मा भी मैं हे मैं विनोद से जलन करने लगा. यहाँ कपूर और इक़बाल भी बैठ चुके थे और जाम के साथ अब काम की बात भी होनी शुरू हो गयी.

"ऐसा है इक़बाल जी, अपने विनोद की चाहत है 5 स्टार होटल और मेरे पास यहाँ एक जमीन भी है ठीक शहर के बीच. ये रहा उसका नक्शा और ये है उस होटल का. बात सीढ़ी करता हु की ये प्रोजेक्ट है तक़रीबन 120 करोड़ का और जमीन के साथ साथ मैं इसमें 70 करोड़ लगा रहा हु जिसमे उमेद सिंह का भी आधा पैसा है. अब प्रोजेक्ट बड़ा है और हम लोग कारोबारी अपनी अपनी जगह के. तोह बाकी का बचा हुआ आप लोग अपने हिसाब से देखिये कैसे मैनेज करना है और सब सँभालने के एवज में हम बिज़नेस 50-50 रखेंगे.", राजेश ने सभी कागज टेबल पर फैलते हुए अपनी बात कह दी. राजेश और उमेद द्वारा लगाए जाने वाले पैसे का सुन्न कर हे इक़बाल, शर्मा और कपूर के कान खड़े हो गए. मतलब साफ़ था की 120 में से 80 करोड़ वो लगा रहे थे और दूसरी तरफ के लोगो को इनका आधा हे लगाना था.

"हाँ तोह इतना तोह आपका बनता हे है राजेश जी. अब पैसा आप ज्यादा लगा रहे है तोह हमको बाकी काम भी देखना होगा. जैसे होटल की पासिंग, खिलाना पिलाना और बाकी जो ताक़त लगेगी सो alag.",Iqbaal भी दिमाग से पैदल था और उसकी बात सुन्न कर सुखबीर ने पहले तोह वह मौजूद मुस्टंडो को बहार जाने का इशारा किया और फिर जुबान खोली.

"इक़बाल, तुम थोड़ा सोच कर बोलै करो. यहाँ ऐसा कौन है जो पहुंच नहीं रखता? नक्शा पास है, कागज लिए बैठे है ये लोग और खुद सर्कार में इनका हस्तक्षेप है. बात कहने से पहले जरा सभी कागज तोह देख लो. राजेश, बुरा मैट मान न इक़बाल थोड़ा जज्बाती व्यक्ति है लेकिन मेरे लिए छोटा भाई हे है. मैं 20 करोड़ लगता हु इसमें और इतने हे कपूर लगाएगा. जमीन के दाम भी तुम्हे विनोद देगा जिस से इतना बोझ न पड़े किसी पर. बिज़नेस चलता है आपसी व्यवहार से.", सुखबीर शकल से जितना अजीब था बातें उतनी हे ाची थी उसकी. राजेश ने कपूर और सुखबीर से एक बार फिर हाथ मिलाया तोह कपूर हाथ को जैसे जांचने लगा लेकिन तुरंत छोड़ भी दिया.

"बात कागज की नहीं सुखबीर जी और जैसा आपने कहा मैं 20 करोड़ लगाने को भी तैयार हु. लेकिन ये लोग बयाना दे कर बात को पुख्ता करे तोह और मजा आये. विनोद हमारा बिचोला है जिसके पास ये चाहे फ़िलहाल एक करोड़ रख कर बात की पुष्टि कर दे. खाली हाथ तोह इतनी दूर आये नहीं होंगे?", कपूर बातों से हे इंसान को निचा दिखने की कोशिश कर रहा था लेकिन यहाँ ये लोग खाली हाथ कहा थे.

"विनोद, तुम जरा किसी को साथ ले जाओ हमारी कार तक. ाँकि (अंकिता) डार्लिंग, इनके साथ कार से बैग निकल लाओ. और कपूर साहब हम भी काम ऐसे हे करने में यकीन रखते है. 20 करोड़ यही टेबल पर होगा अगले 2 मिनट में और अब आपकी श्रद्धा है की बयाना बिचोलियो को कितना देना है. लाख का भी चलेगा अगर आपको काम करना है तोह.", ये बात उमेद ने बड़े हे नरम लहजे में कही थी और टेबल पर मौजूद सभी बड़े सम्मान से उमेद को देखने लगे सिवाए कपूर के. अंकिता, विनोद वह से जा चुके थे 2 आदमियों के साथ ले कर. एक बार फिर से शंकर ने नयी बोतल सभी गिलासों में घुमाई और ये जाम होटल के नाम बोल कर सभी ने एक हे सांस में ये पटियाला पेग से बड़ा जाम हलक में उड़ेल लिया. इक़बाल इत्मीनान से अपनी रिवॉल्वर टेबल पर रखता हुआ मुर्गा उधेड़ रहा था और उमेद ने सिग्गटे सुलगने से पहले उस से अनुमति ली तोह वो कुछ ज्यादा हे खुस हुआ.

"जो दिल करे वो पीयो भाई साहब. महफ़िल है और आज तोह सच्ची दिल खुस कर दिया बिनोद ने आप जैसे मित्रो से मिला कर.", इक़बाल की बात पूरी होते हे उमेद के साथ हे कपूर ने भी सफ़ेद रंग की अलग सी सिग्गट जला ली.

"मेरे 20 भी अभी इस टेबल पर होंगे उमेद जी. वैसे चरस पीने का शुआक रखते है तोह ये तरय कीजिये, ख़ास पहाड़ो का माल है."

"ये इधर दो कपूर भाई, उमेद फक्की सिग्गट हे पीटा है. इसके शौक़ीन हम है.", शंकर ने वो सिग्गट लेने के साथ हे काश लगाया और फिर कपूर की तरफ देखा.

"हाहाहा.. बुरा मैट मान न शंकर भाई, मैं तोह जांच रहा था के कही आप लोगो को इस सबसे परेशानी न हो. होटल में मुनाफा इन चीजों से हे तोह होता है और मेरा पैसा इस धंदे की दें है. खुद मैं भी चरस नहीं पीटा लेकिन आपको अगली बार जरूर ख़ास माल pilayenge.",Iske साथ हे कपूर ने अपने एक आदमी को बुला कर कुछ कहा तोह वो गर्दन हिलता वह से चला गया. विनोद हँसता हुआ सुजाता के साथ बात करता आ रहा था और उनके पीछे 2 लोग नोटों के भरे बैग लिए.

"लो जी, आ गया माल भी. वैसे थोड़ा गण वाना हो jaaye,light धीमी करके.?", विनोद ने ये बात कहने के साथ एक बार सुजाता की तरफ भी देखा. जैसे वो इस लड़की का साथ चाहता हो.

"बैठ जाओ भाई कुछ देर जरा. 3-3 पेग हुए है तोह दोस्ती का चौथा लेने के साथ हम भी शंकर की संगिनी के जलवे देखे.", इतना सुरूर हो हे चूका था सुखबीर को इन 3 तगड़े जाम में की वो हलकी ठंडी हवा से मदहोश हो कर ये सब कहने लगा. शंकर के इशारे पर अंकिता उस भड़कीली पोशाक में इठलाती हुई सुखबीर की जांघ पर आ बैठी.

"चौथा जाम आपको मैं हे पीला देती अपने हाथ से, अगर इजाजत हो तोह.?", अंकिता ने ठीक शंकर के हिसाब से बोतल सभी गिलासों में घुमाई और सुखबीर उसके उघडे हुए पेट और जांघ पर हाथ फिरने लगा. कपूर बड़े ध्यान से सब देख रहा था और इक़बाल अपनी हे धुन्न में तंदूरी मुर्गा खाता हुआ एक महिला वेटर को गॉड में लिए दोहरा लुत्फ़ उठता रहा. कपूर का आदमी भी बैग ले कर इधर चला आया था और सभी बैग चैन खोल कर देखने के बाद बगल वाली टेबल पर रख दिए गए. किसी ने गौर नहीं किया जब अंकिता ने वो जाम बनाये तोह उलटी पहनी अंगूठी से एक ख़ास पाउडर वो 3 गिलास में मिला चुकी थी. कपूर, सुखबीर और शर्मा के गिलास थे वो. सुखबीर को अपने हाथ से शराब पिलाती वो खुद हे इस ठरकी के गाल सहलाने लगी.

"जितनी ठंडी शराब है शंकर, उतनी गरम ये लोंड़िया है. समझ नहीं आ रहा के नशा किस्मे ज्यादा हैं.", सुखबीर की बहकी बातें और सुजाता को करीब खड़ा देख कपूर का तम्बू भी उठने लगा था. थोड़े जोश में उसने सुजाता को अपनी गॉड में खींचा तोह विनोद hakka-bakka रह गया. सुजाता भी नखरा करती हुई उसके गले में बाहें दाल बैठ गयी.

"आउच.. क्या करते हो? प्यार से कीजिये, मन थोड़ी किया है.", सुजाता के बदन की महक और ये तेज शराब जल्दी हे असर कर गयी.

"मुझे ये प्यार व्यार करना नहीं आता डार्लिंग. सरे आम चुदाई करता हु जब मैं करता है.. हिककक... ये जाम तुम्हारे से ज्यादा नशीला नहीं है.", कपूर की आँखें हिलने लगी थी, नशे की अधिकता से और इस बीच राजेश कुर्सी से उठ गया.

"यार कोई बाथरूम तक चलेगा. प्रेशर लगा है."

"राजेश भाई, इसके साथ चले जाए.", विनोद ने जलते दिल से कपूर को देखा और एक गुर्गे के साथ राजेश को वह से विदा करने लगा.

"रुको साले साहब, टंकी हमारी भी भर गयी है. साथ हे चलता हु. वैसे इक़बाल भाई, आपको तोह लघुशंका नहीं लगी.?", शंकर ने लड़खड़ाते हुए ऐसा कहा तोह इक़बाल ने गॉड में बैठी उस दुबली सी लड़की के उभर को मसलते हुए उठाया और साथ चल दिया. रिवॉल्वर वही टेबल पर रह गयी थी इक़बाल की. अब यहाँ बस कपूर, इक़बाल, शर्मा के साथ दोनों लड़कियां और Umed-Vinod बचे थे.

"वो चरस का कुछ कह रहे थे तुम कपूर?", उमेद ने बगल वाली कुर्सी पर बैठते हुए कपूर से पुछा तोह सुजाता के गाल पर हाथ फिरता कपूर थोड़ी अकड़ से बोलै.

"चरस? मैं ये फुद्दू नशो का सौदागर नहीं हु उमेद.. हिक्क.. हीरोइन, कोक और ब्राउन शुगर का बडशाह हु मैं इस तरफ. 20 करोड़ कहे थे न तुमने, हिककक.. इतना मैं 10 दिन में कमाता हु. और ये सुखबीर भाई साहब को फंडिंग कौन करता है? मैं.. साला ये होटल मेरे काले पैसे को सफ़ेद करने का सही काम hai..aahhhhhh...", हलकी सी चीख हे निकली थी कपूर के मुँह से और सुजाता के चेहरे पर खून की लम्बी धार जा गिरी. कपूर को हिलने का मौका दिए बगैर उमेद ने वो तेज धार खंजर से गले को आधी गहराई तक काट कर रख दिया.

"हिलना भी मैट बिनोद या विनोद, जो भी हो तुम.", शर्मा तोह वैसे हे खुजादा था और इधर विनोद की गर्दन पर अंकिता ब्लेड लगाए थी. 5-6 लोग इस तरफ दौड़े आये तोह वो महिला वेटर बेहोश पड़ी थी जमीन पर. उमेद आराम से सुखबीर की कनपटी पर रिवॉल्वर लगाए टांग पर टांग रखे बैठा उन्हें देखता रहा.

"बच के नहीं जाओगे.", एक पहलवान सरीखा व्यक्ति दहाड़ा तोह उसके पीछे वाले ने पलट कर देखा.

"हाँ, तुम लोग बच कर नहीं जाओगे.", ये जल्लाद शंकर था जिसके दोनों हाथ में ख़ास ब्लेड थे और इस पलटने वाले का गाल से गाल तक का हिस्सा इतनी तेजी से कटा की एक पल सिर्फ सफ़ेद मांस नजर आया. वह से खून निकलता उस से पहले हे दूसरे ब्लेड से पूरी गर्दन 360 के कोण में काट कर धरती पर गिरा दी. इतनी दरिंदगी देख कर 5 के 5 अपनी जगह जम्म चुके थे. उन्हें समझ हे नहीं आया के ये क्या हुआ. सर कटा धड़ जमीन पर अलग फड़क रहा था और वो खोपड़ी की खुली आँखों में अलग हे दहशत.

"कोई चालाकी नहीं डॉ, कोई चालाकी नहीं. तुम हिले तोह सभी मारे जाओगे.", इक़बाल निहत्था हे था और रिवॉल्वर तलाश करता हुआ शंकर को धमकाने लगा लेकिन उसकी परवाह न करते हुए शंकर ने धमकी देने वाले पहलवान के गले से कमर तक के भाग को खोल कर रख दिया. सफ़ेद कमीज सामे से फुहारे की तरह बरसते खून से लाल हो गयी. वो आदमी जोर से चीखना चाहता था लेकिन यही तोह दरिंदगी थी इस डॉक्टर की जिसने गले का ध्वनि यन्त्र से लेकर अंडकोष तक का हिस्सा 2 भाग में बाँट दिया था. विनोद के मुँह से डर के मारे लार गिरने लगी थी और हाथ आँखों पर रख लिए.

"इक़बाल सिंह, तू dehshat-gard है न बहोत बड़ा? इसको कुर्सी पर बैठाओ अंकिता और शर्मा तुम्हारी आँखें एक बार भी बंद हुई तोह फिर कभी खुलेंगी नहीं.", शंकर ने यहाँ पप शर्मा को धमकाया और उधर एक तगड़े पहलवान ने भरपूर वार कर दिया शंकर की पीठ पर. लड़खड़ाता हुआ शंकर आगे गिरते गिरते तुरंत संभल गया. पीछे खड़े चारों बदमाश अब नींद से जाग चुके थे.

"हाहाहा... तू इक़बाल के 2-3 आदमी काट कर टॉप बन्न रहा है..", इक़बाल बात पूरी करता उस से पहले हे जिसने शंकर पर वार किया था उसको चूड कर बाकी तीनो अपना गाला मजबूती से पकडे जमीन पर बैठ गए. खून को रोकने का असफल प्रयास था ये और उसको भयंकर बनाया शंकर ने जब इन तीनो के सामने घुटने पर बैठ कर शंकर ने वो सभी उँगलियाँ घांस की तरह हाथ से अलग कर दी. फर्श पर bhal-bhal करता लहू फैलने लगा था और इक़बाल अपनी जगह पठार.

"ये ब्लेड रख दिए मैंने. चल दिखा तू कितना बड़ा पहलवान है?", शंकर ने आस्तीन मोड़ते हुए उस पहलवान को अपनी तरफ बुलाया और उसके पीछे 4 आदमी दौड़े हुए आये लेकिन सभी के माथे के ठीक बीच में बिंदी बन्न चुकी थी.

"ऐसा है, या तोह भोले को जमीन पर गिरा दो नहीं तोह मेरी गोली अंधेर में भी निशाना नहीं चूकती. इक़बाल, पतलून गीली हो गयी न तेरी? अभी पीली भी होगी.", उमेद सिंह घात लगाया शेर था जो शांत रह कर शिकार करता था. उस पहलवान ने ज़िन्दगी की जुंग लड़ने का सोच कर शंकर पर पूरी ताक़त से हुम्ला किया था. दिखने में शंकर से डेढ़ गुना वो व्यक्ति दहाड़ मार के चीख उठा जब निचे झुक कर शंकर ने उसका वो bhari-bharkam शरीर उस बड़ी टेबल पर पटक मारा. कांच की खाली भरी बोतल, गिलास आदि उसके जिस्म से घुस चुके थे सिवाए उमेद के गिलास के. इतनी ताक़त देख कर इक़बाल का दिल हे बैठ गया. ये डॉक्टर हे है या यमराज.?

"ओह बिनोदिये, आँखें खोल नहीं तोह लुल्ली काट दूंगा तेरी. शर्मा जी, आपको अलग से कहु क्या?", राजेश ने इधर आते के साथ मुँह में फंसा खून टपकता ब्लेड निकाल कर विनोद के सामने वो कटा हुआ सर रखा तोह विनोद ने उस चेहरे पर उलटी हे कर दी. अंकिता तोह पहले हे मुँह पर कपडा रखे थी और सुजाता एक कौन में डुबकी हुई.

"जीजा, वो रमन को बेहोश कर दिया है मैंने लेकिन गिनती 24 की थी और 10 मैंने उधर गिराए, एक ये सामने रखा है.. 1 2 3 ....10 यहाँ पड़े है.. Hello कपूर साहब.. ओह कपूर साहब, चले गए क्या? 11.. उमेद जीजा ये भी जाते जाते दान कर गए 20 करोड़ और ऐसा अभी विनोद भी करेगा. क्यों भैया बिनोदिये? हाँ या हाँ?", राजेश ने ऐसा कहने के साथ हे पप शर्मा की हथेली के ब्लेड aar-paar कर दिया. 2 लोग जोर से चीखे, जीजा साला.

"हाँ.. हैं.. सब लेलो.. यही रखा है ऊपर वाले कमरे में.", विनोद के नशे उतर चुके थे और उमेद ने इशारे से उसको पैसे लेकर आने को कहा तोह वो बिना देखे हे उस तरफ दौड़ गया.

"जीजा, बाकी सबको न जल्दबाजी में मारना पड़ा. इस इक़बाल को मैं आराम से मारु? क्यों इक़बाल भाई.. Hello.. कुछ परमिशन मान रहा हु आपसे. यस ? ठीक से बोलै न क्या कह रहे हो?", राजेश के खून से लिस्डे चेहरे और आँखों के सफ़ेद हिस्से को देख कर इक़बाल जैसे सदमे में जा चूका था. राजेश ने अपने मुँह पर लगा खून इक़बाल के चेहरे पर छिड़का तोह वो कुछ होश में आया.

"रब्ब दी सौ, मेनू छड़ दो साहब.. मैं कुछ नई जांदा.", वो हाथ जोड़ने लगा तोह राजेश ने बगल से रिवॉल्वर अंकिता को देते हुए कहा.

"तुम दोनों जरा ये खिलोने ले कर राउंड लगा आओ. हाँ चाहो तोह इस विनोद को भी साथ ले जाना, जीजा का भाई है तोह विश्वास करने लायक आदमी है ये.", राजेश से पिस्तौल लेते हुए भी अंकिता को डर लग रहा था. लड़की दिलेर थी जो बेहोश नहीं हुई और जब उस तरफ से सुजाता उठी तोह उसकी टाँगे और वह की जमीन भीगी हुई थी.

"तोह maan-niya सुखबीर सिंह जी उर्फ़ हिघ्कामान. जीजा को छोटे भाई बुला रहे थे और अब देखो मुँह से आवाज हे नहीं निकल रही. जानते हो इक़बाल क्यों नहीं बोल रहे ये? हमने दवा दी है इन्हे क्योंकि ाचे आदमी लगे ये हमको. जीजा, आप इस टेबल पर आज लाइव पोस्टमॉर्टम करके दिखाओ इक़बाल सिंह जी को.", राजेश के ऐसा कहते हे उमेद ने टेबल पर तड़पती लाश सरका कर निचे गिरा दी और अगले हे पल सुखबीर सिंह वह लेता हुआ अपने हाथ पाँव पटक रहा था. शरीर से कुरता पायजामा कब अलग हुआ पता भी न चला सुखबीर को और थुलथुल पेट, सीने पर उगे सफ़ेद काली बाल के साथ उसका शरीर भी बेडोल सा था. राजेश इक़बाल के मुँह में ब्लेड लगता हुआ उसको विवश कर रहा था सामने का दृश्य देखने के लिए.

"ध्यान से देख इक़बाल, कुछ भी चूका तोह फिर तुम देख नहीं पाओगे.", शंकर ने पहले एप चेहरे पर सोडा छिड़का और बोतल से लमबा घूँट शराब का लेते हुए उमेद को देखा जो सुखबीर के हाथ पाँव टेबल के चारो पायो से बांध चूका था, कपडे की मदद से. इस बीच 3-4 गोली चलने की आवाज भी आयी जिसकी तरफ इन्होने ध्यान हे न दिया.

"वो शैम्पेन वाला ओपनर जीजा जी?", राजेश ने जैसे हे उस औजार की याद दिलाई, उमेद ने शंकर की तरफ देखा जो स्टील की नुकीली घुमावदार चीज बेल्ट की तरफ से निकलते हुए ठीक सुखबीर के दायी आँख के ऊपर ले आया.

"इस से दुनिया देखनी होती है मादरचोद", आँख के अंदर वो औजार धंसते हे इक़बाल की चीख गूँज उठी और सुखबीर के तड़पते शरीर से आवाज उमेद ने बहार न आने दी. गर्दन को पकडे वो उसके मुँह में शराब की बोतल फंसाये था.

"देखो शर्मा जी, ये आँख है न ठीक इसके पीछे हे दिमाग. इसको ऐसे गोला घुमाओ तोह ये अंदर धंसता हुआ वह तक जाएगा जहा साड़ी गंदगी भरी है.", शर्मा बेहोश हो चूका था और उधर एक बार फिर से 2 गोली चली. इक़बाल को चीखने की सजा स्वरुप राजेश उसका निचला होंठ काट कर जमीन पर गिरा चूका था और इतनी लाशो के बीच बस 3 लोग हे कुशल थे यहाँ.

"यार मैं बोर हो रहा हु भोले.", उमेद ने सुखबीर के मुँह में धंसी बोतल पर मुक्का मारते हुए बात ख़तम करि और लाइटर से आग लगा दी. ऐसा हे उसके शरीर के साथ किया और इक़बाल के सामने आ खड़ा हुआ. यहाँ टेबल पर जिन्दा आदमी जल रहा था, वैसे दिमाग से मर्डर चूका था और शंकर नाराजगी से उमेद से पहले हे इक़बाल की तरफ लपका.

"माफ़ करना, भाई को जल्दी है और मैं भी अब यहाँ रुकना नहीं चाहता. बहोत खौफ देख लिया तुमने इक़बाल, अब कभी नहीं मिलेंगे. वादा करता हु.", उमेद के हाथो रिवॉल्वर लेते हुए शंकर ने दुर्गन्ध छोड़ते इक़बाल की ठुड्डी के निचे टिका कर लगातार 2 बार चला दी. सर के ठीक ऊपर से ज्वालामुखी विस्फोट हुआ और इक़बाल खुली आँखों से दुनिया छोड़ चला.

"ध्यान से सुनो प्रीत पल शर्मा, आइंदा तुम्हारा कही भी जीकर सुना तोह मैं भूल जाऊंगा की रिश्तेदार हो. राजेश, ये सब गाडी में रखवा और विनोद के साथ रमन और इस भड़वे को भेज यहाँ से. मैं और उमेद इस लंका को राख करके आते hai.",Shankar ने उमेद के हाथो दारु की एक घूँट लेने के बाद ध्यान से इस जगह को देखा. अब तक अंकिता, सुजाता के साथ जख्मी विनोद भी इधर आ चूका था.

"सर, उधर तोह एक झोपडी पूरी ड्रग्स से भरी थी. वैसे आग लगा दी है मैंने और 4 मजदूर मारने पड़े इस बीच. बाकी सभी लड़कियों को बहार निकाल दिया है बस ये बेहोश है.", अंकिता ने कार्यवाही का ब्यौरा दिया तोह उमेद ने बैग की तरफ इशारा किया.

"इन्हे भी कार में रखवा दो तुम लोग और विनोद हिम्मत वाला है, अपने दोनों जीजा को घर ले जाएगा.", आनन् फानन में सबकुछ 15 मिनट में निबटा कर उमेद और शंकर इस हाल में हमेशा की तरह शार्ट सर्किट और लकड़ी के टेबल पर आग लगाने के बाद बहार निकल चले. विनोद की हालत कुछ खराब थी और वैसा हे कुछ हाल शर्मा का था. बहार खड़े वो अपनी आँखों से रिसेप्शन से हॉल तक आग लगते देख रहे थे.

"बात जरा भी मुँह से निकली तोह............", शंकर ने विनोद को उसकी कार की सीट पर धकेलता हुआ इतना हे कहा था और उसकी जगह इतनी देर से खामोश बैठा शर्मा बोल उठा.

"हमे कुछ नहीं पता शंकर. यहाँ हम लोग थे हे नहीं और ये आग लगी कैसे इसकी भी खबर नहीं हमको."

"शादी में जरूर आना शर्मा जी परिवार के साथ, नहीं तोह मुझे बुरा लगेगा. और आज के बाद कही भी रपे या ड्रग्स की खबर मिली तोह अगला दिन देखना नसीब न होगा. विनोद, घर संभाल अब इसके बाद कोई मौका नहीं.", शंकर ने जाने से पहले उसका कन्धा थपथपाया और उमेद की बगल में जा बैठा. पिछली सीट पर राजेश दोनों लड़कियों के बीच चेहरा धोये आराम से पसरा हुआ था.

"अब कहा जाना है जीजा?"

"इन्हे छोड़ कर फिर घर हे चलेंगे साले साहब. एक दिन में 20 करोड़ का 70 कर लिया है तोह अब एक महीना शांत रहेंगे.", यहाँ ये तीनो हँसते हुए जा रहे थे वह विनोद स्टीयरिंग पर बैठा दर्द और गुस्से में आंसू बहा रहा था.

"अब इसकी सजा शंकर के साथ साथ इन तीनो के परिवार भुगतेंगे जीजा. चाहे बरसो लगे लेकिन ये खेल ऐसे ख़तम नहीं होगा.", विनोद की बात सुन्न कर शर्मा ने ज्यादा कुछ ख़ास न कहा.

"बाज़ीगर से जितने के लिए बड़ा बाज़ीगर बन्न विनोद. समय ले और फिर कमजोरी पकड़. जो भी करना है इनके करीब रह कर हे होगा. भूल जा के अभी अहा क्या हुआ लेकिन याद रखना है की किसने किया. जब पूरा परिवार एक साथ होगा न तब देखेंगे इनको.", शर्मा भी आहात था और बात भी सही थी उसकी. बदला ठंडी खीर की तरह होना चाहिए, समय लगाओ. अँधेरी रात में वो दोनों हे देख रहे थे की कैसे छोटी सी आग ने भयंकर लपटों का रूप अख्तियार कर लिया. पिछली सीट पर बेहोश पड़ा रमन तोह अनभिज्ञ था इस सबसे. विनोद ने कार गाँव की तरफ बढ़ा दी जहा उसका एक अलग घर था.

उधर अर्जुन की तरफ आज अलग हे दृश्य था. उसके बिस्टेर पर बगल में अनामिका चची करवट लिए लेती उस से बातें कर रही थी और अर्जुन की छाती पर निकेतन नींद में जा चूका था. अनामिका ने अपने बेटे को पालने में दाल कर फिर से वही मुद्रा अपना ली. बातें करते हुए वो अर्जुन के हाथ को अपने हाथ में लिए थी. चची भतीजा अब देवर भाभी से कही आगे तोह नहीं जा रहे?
 
स्टिल स्लिंगटली डाउन एंड सॉरी ी ऍम ुनाबले तो रिप्लाई अन्य टेक्स्ट और मैसेज. गिव में ात लीस्ट ा वीक एंड ी विल बे बैक हेरे. टिल थान जस्ट कीप थिस फॅमिली गोइंग. लॉट्स ऑफ़ लव एंड प्रेयर्स.

🙏🌱
 
यु दूर नहीं हु

पर पतनग भी नहीं,

कभी कभी ज़िन्दगी..

लाज़मी हो जाती है
 
आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये 🙏🌱💚

इतने प्यार और साथ के लिए दिल से शुक्रिया दोस्तों

अपडेट 18 तारिख से शुरू करूँगा 🙏

अपना ध्यान रखिये और परिवार के साथ रहिये. खुश रहिये और यही कामना है की सभी का जीवन सरल रहे

शुभरात्रि 🌺🌼
 




नाम योर फेवरेट करैक्टर

एंड आस्क योर questions/doubts. I'm ऑनलाइन फॉर नेक्स्ट ओने ऑवर.
 
अपडेट 163

Kaam-Kaaj (1)

अभी कुछ समय हे गुजरा था की ज़िन्दगी के sukh-dukh बतियाती अनामिका चची की अलसाई आँखें नींद से बंद हो गयी. अर्जुन ने एक पल उन्हें देखा और फिर उनके हाथ के निचे तकिया रख कर दबे पाँव निचे चल दिया. अभी उसने बहार वाले मुख्या दरवाजे की आवाज सुनी थी. गहरी खामोश रात में ये आवाज भी धीमी थी लेकिन सतर्क अर्जुन को सुनाई पड़ी.

"आप सोये नहीं भैया?", घर के बहार अँधेरे में संजीव भैया को अकेले बैठे देख अर्जुन भी वही बने चबूतरे पर उनकी बगल में आ बैठा. सिग्गटे का अलाव मुट्ठी में छिपाये संजीव अपने छोटे भाई को देख हलके से मुस्कुराया.

"बस नींद नहीं आ रही थी छोटे. वैसे तेरे कान बड़े तेज है जो मेरी इतनी सावधानी के बावजूद तुझे मालूम चल गया.", संजीव भैया को ाचे से पता था के उनका ये भाई कितना काबिल है और नींद में भी इसके कान काम करते रहते है. फिर भी वो मजे ले रहे थे.

"मैं क्या कह रहा था भैया की आप शायद परेशां है किसी बात से? हाँ बताना नहीं तोह वो अलग बात है.", अर्जुन की कुटिल मुस्कान संजीव भैया अँधेरे में हे देख सकते थे और ऐसा हुआ भी.

"तू दिमाग ज्यादा मत चलाया कर छोटे. वैसे मैं सचमुच एक दुविधा में हु भाई. क्या होगा अगर तेरी सोच सार्थक साबित हुई तोह? जैसा सभी सबूत देख कर लग रहा है इस से तोह छोटे दादा ने कुछ तगड़ा हे काण्ड किया है और अपने थानेदार जी इसको सेहन नहीं कर पाए तोह?", मुस्कुराते संजीव भैया के चेहरे पर एकाएक गंभीर भाव आ गए. अर्जुन भी समझ चूका था की उनकी आशंका सही है और रामेश्वर जी को तगड़ा आघात लगेगा असलियत जान कर.

"भैया, सबसे पहले तोह फिर राइड रुकवानी पड़ेगी कल सुबह वाली. और मुझे आपकी बात सही लग रही है जिसका मतलब ये है की हमको ये राज अब राज हे रखना चाहिए. मैंने कुछ और भी पता लगवाया है जो इस बात को पुख्ता साबित करता है की दमयंती और छोटे दादा जी का सम्बन्ध था. और बिंदिया उनकी हे बेटी है.", अर्जुन ने ये धमाका किया तोह संजीव के हाथ से सिग्रत्ती छिटक कर निचे जा गिरी. इस बात का हे तोह डर था उन्हें.

"हे भगवन.. मतलब ये सिर्फ इतनी सी बात नहीं है अर्जुन. जल्दी स्कूटर निकाल भाई और मेरा दिल कहता है के यही शुरुवात थी सब काण्ड की.", अर्जुन ने भी तेजी दिखते हुए सबसे पास की तरफ खड़े उस वेस्पा को बिना चालू किये हे निकला और दरवाजा लगा कर दोनों गली तक चुपचाप स्कूटर घसीट कर चलते रहे.

"तू पीछे बैठ और मेरी बात सुन्न.", संजीव भैया ने अँधेरी गली में आते हे दुपहिया को चालू किया तोह दोनों भाई सेक्टर से बहार की तरफ निकल चले.

"दमयंती उधर वनवास में थी सबकी नजरो से छिप कर और लाजवंती की जड़ इशारा करती है शाही खानदान, सारंग और फिर राजस्थान की तरफ. मतलब यहाँ एक तरह से दमयंती उसके चंगुल में क़ैद थी."

"बिलकुल सही कहा आपने लेकिन बात कही न कही रघुवीर दादा जी से भी जुडी है तोह हमारे कुछ सवालों के जवाब नहीं मिल सकते या फिर हम ये बात दादा जी तोह पूछने की गलती करेंगे नहीं. सबसे पहले मौका मिलते हे सारंग ने निकला अपनी बहिन दमयंती को जिस दिन अज्जू चाचा की हत्या हुई. लेकिन सारंग ने छोटे दादा से झगड़ा क्यों नहीं किया? इतना ताक़तवर इंसान अपनी बहिन के लिए उनकी जान भी ले सकता था पर उसने झगड़ा किया दादा जी, रघुवीर दादा जी के साथ. क्यों?", अर्जुन के जवाब के बाद इस सवाल से संजीव की भी दिमाग की बत्ती जल उठी. ये दोनों हे एक बड़ी मुसीबत को अब टालना चाहते थे जो इस खोजबीन में उनके सामने आ हे चुकी थी.

"ओह बहनचोद.. ये कहानी उस से भी पहले की है बे अर्जुन.", एक होटल के बहार पीसीओ खुली देख संजीव ने वही स्कूटर लगा दिया. पीसीओ वाले को इशारा करके रुकने का बोल वो वापिस अर्जुन की तरफ देखने लगे.

"हाँ तोह ये बात दादा जी ने बताई तोह थी भैया. महारनी प्रभा देवी के साथ उनकी बेटी और बहु को मार दिया गया था और उन्ही पर षड़यंत्र का आरोप लगाया गया था. मतलब कही ऐसा तोह नहीं की इसमें छोटे दादा जी शामिल थे?", अर्जुन की धड़कन एकदम से बढ़ चुकी थी और उसकी हालत देख संजीव भैया ने बड़े प्यार से उसके सर पे हाथ फेरते हुए कहा.

"मुझे भी अब यही लग रहा है अर्जुन. खेल सारंग ने अकेले नहीं खेला भाई और खुद हे सोच की raj-mehal में ऐसे nau-jawaan और जोशीले लोग हे कुछ कर सकते थे क्योंकि इन पर कोई शक भी नहीं कर सकता और वह की हर चीज से ये लोग वाकिफ होंगे. मेरा दिमाग तोह यही कहता है जो तू सोच रहा है. अपने दादा जी तोह वह मौजूद भी नहीं थे. इन सबमे वो बड़े थे और राजकुमारी से शादी होना मतलब सबकुछ उनके हवाले हो जाता क्योंकि वो सबसे बड़ी रानी की बड़ी बेटी थी और अपने दादा जी के साथ खुद महाराज भी इस रिश्ते के लिए राजी थे. ये बवंडर अगर सही से खुल गया तोह इस बार शायद केहर मचा देगा भाई.", संजीव गुत्थी खोलने के करीब पहुंच कर पहली बार कदम पीछे ले रहा था और ऐसा करना सही भी था इनके लिए.

"तोह दादा जी को क्या कहेंगे भैया?", संजीव को फ़ोन बूथ में घुसते देख वो भी अंदर हे आ गया. नंबर मिलाने के बाद संजीव ने बस इतना हे कहा की जो काम बोलै गया था उसको रोक दो. अब विनोद के होटल को बचा कर वो दोनों भाई होटल के बहार हे सीढ़ियों पर जा बैठे. अगली तारीख शुरू हो चुकी थी रात के 12 बजे.

"अज्जू चाचा वाली गुत्थी हे सुलझाते है भाई. माधलता, चंद्रो देवी, शालिनी बुआ और नीलिमा बहोत कुछ जानती है लेकिन तुम्हारा साथ बिंदिया भी दे रही है शबनम के कहने पर. सबसे पहले तोह हमको वो सभी सबूत तुम्हारे हॉस्टल में रखने है और जाहिर यही करना है की वो गायब हो गए. हमारी एक फाइल दादा जी के पास है जिस से वो ज्यादा कुछ नहीं जान पाएंगे कृष्ण दादा जी वाले मामले में तोह अब हम सिर्फ अज्जू चाचा पर उनका ध्यान दिलवाएंगे, शादी के बाद.", संजीव ने एक सिग्रत्ती जलाते हुए कहा.

"आधे अफ़साने तोह हम उन्हें सुना हे चुके है भैया. सबूत वाला काम करते है और फिर मैं कोशिश करता हु जो सुधर सकता है सुको सुधरने की. नीलिमा से मिलते हे राज खुल जाएगा क्योंकि वही एक है जो सही नाम बताएगी हमको. चलो अब हमने अगले एक महीने तक ऐसा कुछ नहीं करना और ये विनोद चाचा को खुद दादा जी हे देखे तोह बेहतर है. गलती से मैंने कोई ऊंच नीच कर दी तोह डॉ दांग ने देश निकला हे दे देना है इस बार.", अर्जुन ने हँसते हुए अपने पिता का वो मजाक वाला नाम लिया तोह संजीव भी हँसता हुआ साथ चल दिया. इस बार स्कूटर अर्जुन चला रहा था.

"वैसे छोटे तुझे क्या लगता है? वैसे हे पूछ रहा हु."

"सारंग और छोटे दादा दोस्तों से बढ़ कर है. उन दोनों ने हे वो सब किया होगा किसी के बहकावे में आ कर जिस से हमारे दादा जी का विवाह वह न हो. लाजवंती सिर्फ प्यादा नहीं है और अज्जू चाचा को सारंग ने नहीं मारा बेशक सारंग ने बाकी बहोत से लोगो को मारा है. हाँ मारने की कोशिश तोह की होगी सारंग ने लेकिन जितना पता लगा है वो भी बेबस था उनके जोर के सामने. वो कंगन कटे हुए हाथ में मिला तोह मतलब उस औरत को अपनी तरफ खींचते हुए वो चाचा के हाथ में आया होगा. मरे हुए इंसान की मुट्ठी बंद तोह की नहीं जा सकती जैसा वह तुरंत वाला माहौल होगा. चाकू जिसने मर्जी मारा हो लेकिन वह कोई और भी महिला थी जिसको बचने में उनकी मौत हुई. चलो इस मुद्दे को यही ख़तम करते है भैया, अगले महीने नीलिमा से मिलने जाऊंगा तोह पता लग हे जाएगा..", दोनों भाई घर भी चोरो की तरह हे वापिस आये थे और संजीव भैया को कमरे में जाते देख अर्जुन भी टाला लगा कर सबसे ऊपर वाली छत्त पर चल दिया जहा उसके पीछे माधुरी दीदी भी दबे पाँव पहुंच चुकी थी.

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अभी भोर होने में कुछ समय बाकी था लेकिन कौशल्या जी की आँख बहार गली में रुकी 407 की आवाज से खुल चुकी थी. करवट लेते हुए उन्होंने पानी का गिलास उठा कर समय देखा तोह ठीक 4 बजे थे. प्रभु का नाम लेती हुई वो कपडे ठीक करके बिस्टेर से उठी और बेसुध सोई मेनका को देख मुस्कुरा दी. ठीक तभी मेहमान कमरे का दरवाजा बहार आँगन में खुलने पर वो उधर हे चल पड़ी.

"तुम्हे आराम करना चाहिए था कौशल्या. शायद हलवाई आये है अपना सामान ले कर.", रामेश्वर जी उनसे पहले हे बहार आ चुके थे और आँगन की तुबेलिघ्त जला कर वो टाला खोलने बढ़ चले.

"हाँ, जैसे आपको आराम की जरुरत नहीं. वैसे इन्हे इतनी सवेरे क्यों बुलवाया?", कौशल्या जी भी उनके साथ हे बहार आयी तोह पंडित जी का अनुमान सही निकला. एक bhari-bharkam पक्के रंग का व्यक्ति हाथ जोड़े उनके सामने खड़ा था.

"प्रणाम पंडित जी. आपको असुविधा हुई हो तोह क्षमा चाहता हु लेकिन अगर आज से हे कार्यक्रम है तोह 2-3 घंटे हमको भी चाहिए सब सामान व्यवस्थित करने के लिए."

"अरे भाई यहाँ कोई फ़ौज के नियम तोह नहीं जिस से हमको परेशानी हो. उल्टा तुमने तोह हमारा साथ हे देना है और समय पर आ कर एक परेशानी तोह ख़तम हे कर दी. वैसे क्या नाम है तुम्हारा और कितने लोग है फ़िलहाल तुम्हारे साथ.?", कौशल्या जी तोह ये देख कर वापिस अंदर चली गयी थी रसोईघर में इनकी चाय का इंतजाम करने और पंडित जी इस व्यक्ति के साथ चलते हुए बगल वाले प्लाट की तरफ आ खड़े हुए. यहाँ जमीन समतल की जा चुकी थी और शामियाना दोनों घर के बीच बांध कर छाया बनाई गयी थी.

"जी मेरा नाम.. जी मेरा नाम असगर है और अगर आपको परेशानी है तोह मेरे ये बाकी 4 साथी सब काम देख लेंगे.", इस व्यक्ति की बात पर पंडित जी ठहाका लगा कर हँसते हुए उसके कंधे पर हाथ रख इस खली जगह आ गए.

"मिया असगर जी हमारे वालिद ने कभी हमको मंदिर मस्जिद में फरक नहीं करवाया और तुम्हे सकुचाना नहीं चाहिए ऐसे. बेफिक्र रहो और अब अगले 10 दिन तुम हमारे पास हो. देखो ये 500 गज जगह है जहा nashta-khana बनेगा और तुम्हे अगर ये जगह न जांचे तोह उस तरफ हमारा एक दूसरा घर भी है लेकिन मुख्या mehmaan-rishteydar इन दोनों घरो में होंगे तोह वह जाना आना दिक्कत करेगा.", पंडित जी अभी भी असगर के कंधे पर हाथ रखे सब समझा रहे थे और इस bhari-bharkam व्यक्ति के चेहरे पर एक ख़ुशी साफ़ झलक रही थी. इतना बड़ा व्यक्ति उसको अपने साथ लगाए खड़ा था.

"जी पंडित जी ये जगह उम्मीद से भी ज्यादा बड़ी है और खुली भी. भट्टी और चूल्हा वह आखिर में लगवा देता हु थोड़ा पर्दा ऊपर से हटा कर. यहाँ मेहमान कुर्सियों पर बैठ कर खा पी सकेंगे और gaadi-vaadi डालनी हुई तोह रात में अगला हिस्सा खली रहेगा. बाबूलाल, अड्डा उधर आगे बनवाओ बाकी सबके साथ.", असगर एक 45 वर्षीया अनुभवी व्यक्ति था और यही वजह थी की उसको यहाँ प्रमुख के रूप में भेजा गया था.

"ाची बात है भाई, जैसा तुम चाहो वैसा उपयोग करो. जितना सामान लिखवाया गया था वो सब मंगवाया जा चूका है. पानी का कनेक्शन भी वही आखिर में है और एक नल यहाँ बगीचे में भी है अगर आवश्यकता हो तोह. वैसे तुम्हारा सोने का इंतजाम ....

"पंडित जी अलग से इंतजाम की आवश्यकता नहीं है. हमारे बिस्टेर हम साथ हे ले कर आये है और ये बिलकुल मुनासिब जगह है हमारे सोने -आराम करने के लिए. बरसात के तोह आसार है नहीं इसलिए चिंता नहीं है. बस शौचालय का देख लीजिये.", असगर के लोग तुरंत हे सामान उतार कर लगाने लगे थे.

"ये गली के साथ वाला घर खली है अब जिसकी चाभी कल रात हे मेरे पास आयी थी. चाहो तोह वह रह भी सकते हो तुम लोग और उतनी टेंशन वाली बात भी नहीं है क्योंकि अपने ख़ास मित्र का घर है. यहाँ makhi-machhar में सोना ठीक नहीं रहेगा.", रामेश्वर जी ने धर्मपाल के घर की तरफ इशारा करते हुए उस घर के बारे में बताया जहा वरिंदर रहता था. इतने समय में कौशल्या जी भी 6 कप चाय लिए इधर चली आयी थी.

"आपने क्यों कष्ट किया माता जी? चाय तोह हम बना हे लेते वो भी आप सभी के लिए भी."

"अभी तुम घर आये हो बीटा तोह इतना तोह कर हे सकती हु. कोई भी बात हो तोह मुझसे करना और ये चाबी रखो अपने पास. 3 कमरे है जो शायद तुम 5 लोगो के लिए पर्याप्त होंगे. थोड़ी देर में मेरा पौता तुम्हे ले जाएगा उधर. नाहा धो कर आराम से 7 साढ़े 7 तक काम शुरू करना.", कौशल्या जी भी अपने पति जैसी हे थी बेशक थोड़ी ज्यादा सख्त लेकिन इंसान को पूरी िज्जात्त देने वाली.

"जी माता जी. आपकी बहोत मेहरबानी और चाय सचमुच हमसे बेहतर आपने बनाई है.", इधर जम्हाई लेता हुआ नरिंदर भी चला आया था जो ट्रे से चाय का कप उठा कर इधर उधर देखने लगा.

"मुझे बुला लिया होता आपने पापा? हाँ भाई तोह तुम्हे भेजा है सब काम के लिए.", रामेश्वर जी हँसते हुए अपने बेटे की हरकत देख रहे थे जिसने उनके हिस्से की चाय उठा ली थी और अब नौटंकी कर रहा था.

"जा इसको धर्मपाल के साथ वाला घर दिखा के आ. बाकी लोग इधर सामान लगा रहे है तब तक यही कर दे और कप साथ लेता ाइयो.", कौशल्या जी ने झिड़की दी तोह नरिंदर बिना जवाब दिए असगर को साथ लिए आगे चल दिया. बाकी 4 लोग भी लकड़ी का टेबल खोल कर उसपर चाय के कप रखते हुए सोच विचार करने लगे.

"चलो भाई, तुम लोग भी घंटा भर आराम करके ये सब कर लेना. सेंटर को इस तरफ हे लगा दो, कप कोई भी ले जायेगा.", रामेश्वर जी सभी को निर्देश देने के बाद अपनी धर्मपत्नी के संग घर वापिस चले आये.

"साढ़े 4 हो गए और ये अर्जुन अभी सो रहा है क्या? रात 12 के लगभग ये दोनों भाई घर से भागे थे और कोई पौने घंटे बाद वापिस लौटे थे.", रामेश्वर जी के इस खुलासे से कौशल्या जी एक पल हैरान हुई फिर हंसने लगी.

"वो दोनों अगर घर से निकले थे तोह चोरी छिपे हे गए होंगे पर आपने फिर भी पकड़ लिया?"

"पुलिस हॉस्टल से मैं भी दौड़ता था भगवान्, रात में. लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए के बूढा पोलिसवाले उस कुत्ते जैसा होता है जिसकी नींद किसी की सांस से भी खुल जाती है. लेकिन मुझे इतना पता है की दोनों भाई कुछ गलत नहीं करते. खरी सोने दो उन्हें थोड़ी देर और संजीव को तोह 7 बजे तक उठाना भी मत. मैं नाहा लेता हु और तुम भी अपने भगवन का सिमरन कर लो. नहाने के बाद रसोईघर पता नहीं कितने साल बाद गयी होगी आज बिना पाठ किये.", पंडित जी की बात पर कौशल्या जी भी मुस्कुराती हुई नलके पर हाथ धो कर pooja-kaksh की तरफ बढ़ गयी और वो बहार वाले बाथरूम में.

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ये सब होने की दौरान छत पर एक अलग हे नजारा था. मध्यरात्रि के बाद घर आने पर अर्जुन और माधुरी दीदी के बीच एक जोरदार संसर्ग अभी तक sakshya-maujood था. भोर से पहले की हलकी ठंडक में ये 2 बेजोड़ जिस्म अभी तक आपस में चिपके थे. माधुरी दीदी के गोलाकार सुडोल वक्षो के अकड़े हुए चूचक कपडे से बहार अर्जुन के सीने में दबे भरपूर गर्माइश से लबरेज थे. उन्नत्त चिकनी जांघ अर्जुन के ऊपर रखे होने से फूली हुई योनि में जमा सफ़ेद वीर्य साक्षी था उनके मिलान का.

सुबह सवेरे पुरुषो में होने वाले स्वाभाविक लिंग उठान की वजह से अर्जुन का लिंग भी अपने उचित अकार में माधुरी की योनि पर किसी प्रहरी सा खड़ा था. कुनमुनाते हुए माधुरी दीदी ने थोड़ा कस कर अर्जुन को अपने आगोश लिया तोह उनका शरीर एक गहरे गरम स्पर्श से आनंदित हो उठा. गीली मोटी फांको के बीच अर्जुन का सूपड़ा थोड़ा अंदर सरक चूका था.

'उम्म्म्म.. पूरा घोडा है ये आह्हः...' खुद से इतना कहती माधुरी ने बिना पल गवाए अपनी रास बहती योनि में वो असाधारण मोटाई आधी समेत ली. अर्जुन भी अपने लिंग पर इस अत्यधिक गरम और गीले शिकंजे की पकड़ महसूस करके जाग चूका था. एक बार दोनों की आँखें 4 हुई तोह कुछ घंटे वाला खेल फिर से शुरू हो चूका था. इस बार भी बस दबी घुटी चीख और आहों के बीच अगले 20 मिनट तक दोनों बेहद नरमी से एक दूसरे को पूर्ण deh-sukh देते रहे.

'अंदर हे.. उम्म्म्म', माधुरी के ऐसा कहते हे अर्जुन ने उन्हें कस के अपने बाहुपाश में भर लिया. रुक रुक कर उसका हिलता शरीर झटके लेते हुए जब शांत हुआ तोह दोनों मुस्कुराने के बाद एक लघु चुम्बन करके पृथक हुए.

'बहार शायद कोई गाडी रुकी है दीदी. पहले मैं कपडे पहन कर अपने कमरे में जाता हु, फिर आप भी अपने कमरे में चली जाना.', अर्जुन ने धीमी आवाज में अपनी बड़ी दीदी से कहा और इस बीच अभी भी वो उनके खरबूजे से गोलाकार और मॉटे स्टैनो को सहलाता रहा.

'इन्हे छोड़ दे भाई. देख क्या हालत की है इनकी. आह.. मैं अभी कुछ देर यही आराम कर रही हु.', माधुरी ने मुस्कुराते हुए अर्जुन के हाथ अपने वक्षो से हटा कर जैसे तैसे गाउन पहना और वापिस पसर गयी. अर्जुन इस दौरान अपना पजामा टीशर्ट पहन चूका था.

'वैसे आप अगर अभी निचे चली जाओ तोह अगले 2-3 घंटे आराम कर सकती हो. अभी 4 बजे है लेकिन अगले एक घंटे में लगभग सभी बड़े जाग चुके होंगे.', अर्जुन ने जाने से पहले चेताया तोह माधुरी दीदी को भी अपने छोटे भाई की बात वाजिब लगी. बेवजह घरवालों से tark-vitark को ध्यान में रखते हुए वो भी लड़खड़ाती हुई अर्जुन के संग निचे चल दी. इस वक़्त कौशल्या जी बहार से आने के बाद स्नानघर में थी और माधुरी सफलतापूर्वक वापिस अपने कक्ष में लौट चुकी थी.

अर्जुन ने एक पल अपने कमरे में सोई अनामिका चची को देखा और ख़ामोशी से बाथरूम चल दिया. अगले 15 मिनट बाद वो अपनी घरेलु व्यायामशाला में कसरत करता हुआ अनिगिनत खयालो में डूबा रहा. आज हे शायद जसलीन और बाकी लड़कियां पंजाब से आने वाली थी. विन्नी दीदी को भी उसने अपने साथ बहार ले जाने के बारे में सोचा था. वही मधु बुआ भी अब मौजूद थी और उनके रहते शायद हे हर चीज अपने मुताबिक होने वाली थी.

"उमाह.. क्या बात है जो एक्सरसाइज करने की जगह बेंच पर बैठे अलग हे दुनिया में खोये हो?", ये प्यारी सी आवाज ऋतू की थी और उसके सिवा भला कौन अर्जुन को ऐसे निर्भीक चूम सकता था? शायद पिछले 10-15 मिनट से अर्जुन अपनी सोच के सागर में हे डूबा था जो उसको ऋतू के आने का एहसास तक न हुआ. अपने होंठो में इस मीठे चुम्बन और आँखों के सामने hu-ba-hu अपनी आँखे देख अर्जुन एक पल में जैसे बहरी दुनिया से alag-thalag हो गया.

"ऐसे क्या देख रहे हो? सॉरी, तुम्हे तोह पता हे है की अभी माहौल हम दोनों के लिए ठीक नहीं है. बस bhaiya-didi के शादी के बाद मैं तुम्हे शिकायत का कोई मौका नहीं दूंगी.", ऋतू के शब्दों में प्रेम और मनुहार था जिसकी शायद अभी जरुरत भी न थी. अर्जुन तोह बस उसके चेहरे को इतने करीब देखने की कल्पना तक से दूर था. साक्षात् अपने दिल को सामने देख उसने जो हरकत की वो ऋतू ने भी नहीं सोचा था. कमर से पकड़ कर अपनी जांघ पर बैठते हुए अर्जुन ने उसके गाल पर अपने आधार जमा दिए.

"गुड मॉर्निंग..", अर्जुन द्वारा कहे ये 2 शब्द भी ऋतू से उसकी हालत न छिपा सके. सफ़ेद तोलिये से उसका चेहरा और चौड़ा सीना साफ़ करती वो खुद हे सरक कर उसके करीब हो गयी. ये दिन दिहाड़े दोनों का पहला मौका था जिसमे वो सिर्फ bhai-behan न थे.

"उल्लू उसको बनाना जो तुम्हे जानता न हो. हालत देखो जरा अपनी जैसे एक्सरसाइज रात से कर रहे हो. अब चुपचाप बोलो की तुम क्या सोच रहे थे मेरे आने से पहले? अगर ये कुछ भी ऐसा वैसा करने का ख़याल है तोह बोल देती हु की टाँगे टॉड दूंगी तुम्हारी. अगले 6 दिन गलती से भी कुछ ऐसा मैट करना जिस से कोई बहाना मार कर बिस्टेर पर दिखे. और दूसरी बात ये है की तुम्हे खुद को साबित करना है अर्जुन. यही मौका है जब सभी लोग कहेंगे की तुम बस घर पे रहो और बाकी काम papa-chacha जी या संजीव भैया को देखने दो. उन सबके पास और भी जिम्मेदारियां है लेकिन इस दौरान अगर तुम सब हैंडल करते हो तोह..", ऋतू अपनी बात को विस्तार से कहती चली गयी जबतक अर्जुन ने उसके होंठो को हलके से चूम न लिया.

"समझ गया जी मैं आपकी बात. शायद मैं इन्तजार करता की कोई मुझे छोटे मॉटे काम कहे और मैं अपना वही घर वाला रोजाना का काम हे करता राहु. सच कहु तोह शायद मैं आज वही गलती करने वाला था जो तुम कह रही थी. अब नहीं करूँगा चाहे उन्हें बुरा लगे. मैं नाहा कर सभी काम देखता हु जो होने है और दादा जी से बात करता हु.", अर्जुन के ऐसे फैंसले पर ऋतू ने भी उसके अंदाज में वैसा हे एक छोटा सा चुम्बन जड़ दिया.

"जिनकी जुगत तुम साजिश बना रहे थे उन्हें हम कबका टपका चुके. मेरे कच्चे अमरुद अभी न तुम टेंशन फ्री रह कर घर के काम सम्भालो और जितना मुझसे होगा मैं भी करुँगी. अब जाओ बहार और दादी की हेल्प करो जो अकेली परेशां हो रही है. पापा भी घर नहीं है और tauji-chacha जी सब्जी मंडी गए हुए है.", ऋतू ने अर्जुन की जांघ से उठते हुए sneh-purvak जो आदेश दिया उसको अर्जुन नकार कैसे देता. विन्नी दीदी का नाम सुन्न कर उसको इतना तोह पता लग चूका था की वो जितना मर्जी तेज हो, ऋतू उस से 2 कदम आगे हे रहती थी. घर में उसके नेटवर्क से ज्यादा मजबूत ऋतू का जाल था जिसकी पहुंच दादी से ले कर खुद अर्जुन तक थी.

"वैसे सच कहु तोह मैं चाहता हु तुम हर सुबह मुझसे यहाँ मिलो. मैं खुदसे इतने बेहतर फैंसले नहीं ले सकता ऋतू लेकिन बस एक बार समझने के बाद कोई गलती भी नहीं करता, उस दिन में.", ऋतू इस बात पर कंधे के ऊपर सिर्फ स्टील रोड रखती हुई पलटी और एक गहरी मुस्कराहट के साथ चाँद लम्हे बस अर्जुन को निहारती रही, जो अपनी गीली टीशर्ट हाथ में लिए उसको हे देख रहा था.

"हमारे फैंसले मुझको हे तोह करने होंगे ारु, बड़ी जो हु तुमसे. हमारा आज अगर बेहतर होगा तभी हम आने वाले कल में साथ चल सकेंगे. सिर्फ हर सुबह हे नहीं, अब से हर रात सोने से पहले मैं तुमसे मिलूंगी. अब जाओ और नहाने के बाद निचे सबसे मिलो फिर नाश्ता साथ करेंगे.", ऋतू की बात अर्जुन के कुछ पल्ले पड़ी और कुछ बैलबुद्धि के सर के ऊपर से निकल गयी. फिर भी वो अपने प्यार से दिन शुरू और ख़तम होने की बात पर खुश होता हुआ वह से निकल चला.

'मेरा बुद्धूराम कही का. सब जो भी कहे लेकिन हमको रुकना नहीं है जान. साबित करना हे होगा और आने वाले समय में हर मोती एक धागे में पिरो कर बरकरार रखना हे हमारी जिम्मेवारी है.', खुद से हे सबकुछ बतलाती हुई ऋतू अपनी खूबसूरत काया पर म्हणत करने लगी. पिछले कुछ हे दिनों में वो जैसे अर्जुन के समकक्ष या उस से बेहतर हे होती जा रही थी, काम से काम पारिवारिक स्तर पर तोह यही हाल था.

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आधे घंटे बाद अर्जुन नाहा धो कर निचे खाने की मेज पर आया तोह उसकी खुराक लिए रेखा जी पहले हे मौजूद मिली. अब तक घर के लगभग सभी सदस्य उठ चुके थे और सभी अपनी दिनचर्या में लगे थे. रसोईघर से कांच के 2 बड़े गिलास में अलग हे रंग का जूस लिए कौशल्या जी भी अर्जुन के बराबर वाली कुर्सी पर आ बैठी.

"हाँ तोह ये दूध और खुराक लेने के बाद तेरा क्या विचार है?", अभी अर्जुन अपनी माँ की ख़ूबसूरती निहार कर हटा हे था की दादी की आवाज से वो उनकी तरफ देखने लगा. कौशल्या जी दोनों गिलास में कुछ डालने के बाद चम्मच से मिला रही थी. गहरी बैंगनी रंग का वो तरल अलग हे था.

"जी दादी फिलहाल तोह मैं खुद यही पूछना चाहता था के आप सभी जरुरी कामो की लिस्ट मुझे बता दो. आज से और rishteydar-mehmaan आने लगेंगे और फिर कल भैया के भी नजर बाँध दी जायेगी तोह सबकुछ समय से पहले हे निबट जाए तोह बेहतर रहेगा.", अर्जुन के ऐसे जवाब पर कौशल्या जी एकटक उसको देखने लगी थी और इस बीच दादी की बगल में बैठती मंजू और विनीता दीदी को देख अर्जुन ने दोनों को हलके से गर्दन हिला कर अभिवादन किया.

"हँ.. बुला फिर उसको जिसने तुझे ये सब समझाया है.", कौशल्या जी के ऐसा कहते हे ऋतू भी चेहरा तोलिये से पौंछती हुई अलका के साथ प्रकट हो गयी. जहा पहले आयी दोनों लड़कियां कॉफ़ी पीने लगी थी वही ऋतू और अलका की तरफ दादी ने वो दोनों गिलास बढ़ा दिए.

"ऐसा है दादी जानी, अब इसको आराम सिर्फ एक हे बार देना है. कपिल अंकल वाला घर भी खाली है जहा टेंट हाउस से बिस्टेर ले कर लगवाने है तोह ारु वही से शुरू करेगा. और अगले 3 दिन जो भी खाना बनेगा, cold-drink, कॉफ़ी, शरबत के साथ नमकीन ेट्स भी चाहिए होंगी तोह वो सब mandi-bajaar से ये लेता आएगा. लिस्ट तारा ने बना ली थी कल हे और फिर लाइट भी लगवानी है दोनों घर में जो अरोरा अंकल के पास जा कर ये इंतजाम करवा लेगा.", ऋतू गिलास लिए बोलती हे जा रही थी की कृष्णा जी ने उसके कंधे पर हलके से चपत जमा कर उसको रोका.

"एक हे दिन में सब करवाना है क्या मेरे बेटे से? माँ जी जो भी जरुरी है वो काम सब मिल बाँट कर देख लेंगे.", कृष्णा जी अभी बात आगे बढाती उस से पहले रेखा जी उन्हें वह से ले कर रसोई में चल दी.

"हाँ तोह ये सब तोह दोपहर से पहले हे हो जायेगा दादी. इसके अलावा अभी तोह ढेरो काम होंगे. हल्दी की रसम है, मेहंदी भी होगी और इन सबका ब्यूटी पार्लर वाला झंझट भी होगा. कुछ मेहमान अपनी इत्छा भी जताएंगे और मौके पर बहोत से लोगो को ड्रेस पसंद नहीं आने वाली.", अर्जुन ने ऐसा तंज़ अलका को देख कर किया था जो अबतक ख़ुशी से वो जूस पी रही थी लेकिन इस बात से उसकी भी बोहेन चढ़ चुकी थी.

"बीटा शगुन के ढेरो सामान है, आये गए के हिसाब से सभी के लिए उचित मेहमानवाजी भी देखनी पड़ेगी. भजन भाई ने भी कहा था के वो सब देख लेंगे लेकिन हमको यहाँ के ख़ास लोगो का ध्यान रखना हे पड़ेगा. ऋतू ने सही कहा जो तुझे समझाया. चल टेंट, राशन, मेवों और बाकी सामान की लिस्ट मैं तुझे देती हु और बैंक से पैसे भी निकलवा लियो. मधु भी थोड़ी देर में आने वाली है और उसने विन्नी, मेनका और मंजू को अपने साथ बड़ी मार्किट लेके जाना है. ये सब होने के बाद तू एक बार तेरे बाउजी से मिल लियो बाकी तारा के साथ ऋतू और मैं देख लुंगी.", अर्जुन हैरान हुआ जब उसको विन्नी के मार्किट जाने की खबर लगी. मतलब एक तरह से अब सबको व्यस्त कर दिया गया था.

"वैसे ये दोनों क्या पी रही है दादी?", अर्जुन ने आखिर पूछ हे लिया ऋतू और अलका की तरफ देखते हुए.

"वो इनकी खुराक है जो इन्होने मुझसे बनवाई है. कहा तोह मैंने तारा और आरती को भी था शुरू करने के लिए लेकिन अभी जोश में है न वो दोनों. जब कमजोरी आएगी तोह पता लगेगा उन्हें. लड़कियों का शरीर अलग होता है बीटा जिसको खनिज के साथ अधिक खून की भी जरुरत होती है. अब बेटियां बीटा बन्न रही है तोह ध्यान रखना मेरा भी फ़र्ज़ है. चल तू दूध ख़तम कर और फिर एक नजर बहार हलवाइयों पर भी लगा.", कौशल्या जी की बात सुन्न कर अर्जुन भी उठ खड़ा हुआ लेकिन उसके बहार जाने से पहले हे तारा ने पुकारा.

"वो अपनी कार बहार निकल देना अर्जुन. मैं सफारी साफ़ करवा लुंगी बाई जी से क्योंकि नाश्ते के बाद हमको भी मार्किट जाना है.", अर्जुन तुरंत पलट गया तारा के बहार जाने वाली बात पर.

"तुम्हे मार्किट जाना है? मैं जा तोह रहा हु."

"कुछ सामान बाकी लोगो ने भी लेना है ारु. बाद में मुश्किल से टाइम मिलेगा और फिर हम लोगो को इधर वाले कमरे में सेट करके अपना सामान पिछले घर में रखना है, जो भी वह चाहिए होगा. ये सब बड़ी गाडी में मैनेज हो जायेगा और हम लोग खुद हे कर लेंगी.", अलका के ऐसा कहते हे अर्जुन गर्दन हिलता हुआ घर से बहार चल दिया. आज उसको समझ आ रहा था के वो बहोत से मामलो में अभी तक छोटा हे है और सभी उस पर म्हणत करके उसको काबिल बनाना चाहते है.

"नवाब साहब की सवारी इतनी सवेरे कहा की तरफ?", अर्जुन को कार में बैठते देख ये सवाल हमेशा की तरह उसके दादा जी की तरफ से आया जहा उनके साथ छोल साहब कुछ विचार कर रहे थे.

"बस दादा जी कार बहार निकाल रहा था और उसके बाद देखना है की हलवाई वाली तरफ सामान पूरा है या नहीं.", अर्जुन की बात सुन्न कर पंडित जी कुर्सी से खड़े होते छोल साहब को लिए बहार की तरफ आ गए. अर्जुन ने अपनी काली लांसर एक तरफ कड़ी करते हुए पहले छोल साहब का आशीर्वाद लिया और फिर अपने दादा जी के साथ बगल वाले प्लाट की तरफ बढ़ने लगा.

"तुम ये सब छोड़ कर अंदर के काम देखो. बाकी पढ़ने और स्टेडियम का समय ध्यान रखना."

"अगले एक हफ्ते मैं सभी काम देखूंगा बाउजी और आप भी हर काम मुझे कहेंगे. घर के बड़ो को तोह सभी मेहमानो से मिलना होगा और इस तरह के काम में आप कोई बहार सहायता लेंगे तोह ाची बात नहीं.", अर्जुन चलते हुए असगर वाली तरफ आया तोह यहाँ एक तरफ बड़ा पतीला भट्टी पर चढ़ा था और दूसरी तरफ आता गूंथा जा रहा था. 2 आदमी सब्जियां cheel-kaat कर साफ़ बर्तन में भर रहे थे वही हर छोटी बात का पूरा ध्यान रखा जा रहा था.

"ाची बात है अगर तुम शामिल होना चाहते हो तोह. वैसे ज्यादातर काम तुम कर चुके हो और अब..

"रहने दीजिये न दादा जी. अभी बात हुई है मेरी दादी जी से और ज्यादा नहीं तोह 7-8 लिस्ट निकलेंगी कामो की. कल से घर की सजवाट और 70-80 लोगो का खाना भी शुरू हो जायेगा. कपिल अंकल वाला घर भी तैयार करवाना है और हल्दी, मेहंदी के साथ संगीत वाले कार्यक्रम के लिए भी बहोत कुछ बाकी है.", इन सब बातों के बीच अर्जुन ने वो सब भी गिनवा दिया जिसकी आशा अभी तक रामेश्वर जी के साथ साथ घर के बाकी सदस्यों तक को न थी. हर विवाह में होने वाले हर बारीक से बारीक काम उसकी नजर में थे. रामेश्वर जी का दिल भर आया अपने पौटे की संजीदगी देख.

"हाँ बीटा, काम हैं तोह बहुत और ज्यादा नहीं तोह 100 लोगो का khaan-paan, रहना आदि कल से देखना पड़ेगा. बचे सभी तोह पिछले घर में जा रहे है, इन लोगो (हलवाई) को मैंने तुम्हारे दोस्त के बगल वाला घर दे दिया है. कपिल के घर भी 8 कमरे है और घर नया है तोह बस gadde-bister के साथ वह बाथरूम में प्रयोग होने वाला सामान भी देख लेना. पानी आदि की व्यवस्था करवा कर अपने घर से 4 कूलर भी उधर लगवा देना, गर्मी का मौसम है.", ऐसी हे बातों के बीच प्रीती उनके करीब से गुजरी और दूसरी तरफ अशोक जी और मधु बुआ भी तैयार हो कर नाश्ते के लिए आ चुके थे.

"चल बीटा तू थोड़ा इधर ध्यान दे, मैं तेरे फूफा से मिल लू. आज नाश्ते में ये लोग तंदूरी और तवा, दोनों तरह के पराठे के साथ पिट्ठी वाली पूरी भी बना रहे है. टेंट वाले अभी कुर्सियां और बड़ा कूलर लगाने आएंगे इधर. बाकी 2 बैरे भी बोले है मैंने उन्हें लोगो को खाना परोसने के लिए.", रामेश्वर जी सब समझा कर वह से विदा हुए तोह आदतन अर्जुन पहुंच गया असगर और उसकी मण्डली का सर खाने.

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"यार गज्जू, अब जो भी हो जाये फ़िलहाल तोह घर पे हे ध्यान देना है. तू भी हमको उतार कर चची और भाभी के साथ वही आ जाना.", यहाँ ये लोग तैयार हो कर 'संसार' के लिए निकले तोह राजेश अभी तक ुनिन्दा सा पिछली सीट पर ऊंघ रहा था. कार की कमान फ़िलहाल शंकर के हाथ थी और रात भर मौज करने के बाद ये 2 घंटे पहले हे निकल लिए थे घर के लिए.

"हाँ भाई निकलने से पहले माँ से बात हुई थी. 3 दिन तक तोह रोज हे सवेरे तेरी तरफ आना है और रात को वापसी लेकिन उसके बाद 3 दिन वही रहना है. तू भी कुछ चुतियापा मत करियो इस बीच. वैसे काम तोह आज भी बहोत होंगे और वह चाचा जी अकेले हे परेशां हो रहे होंगे."

"नहीं बे उधर राजू भाई और इन्दर देख लेंगे सबकुछ. और बस एक दिन की हे तोह बात थी फिर हमने सारा काम चुटकी बजा कर निबटा देना.", शंकर ने चलती कार में पानी का एक लम्बा घूँट भरने के बाद फिर से नजरे सड़क पर जमाई.

"कर लियो चुटकी बजा कर भोले. पता भी है की सोमनाथ दत्त राधिका बिटिया का ताऊ है और ऊपर से अभिषेक (माधुरी का जेठ) की तरफ भी हमको पूरी mehmaan-nawaji दिखानी पड़ेगी. तेरे सर्किल के आते हे तू तोह sharaab-kabaab में घुल जायेगा और ऐसा हे हाल मेरा, इन्दर का होने वाला है. काम कौन देखेगा जब मौका होगा? मेरी मान तोह आज से ले कर संगीत तक हम हर काम 0 से 100 तक निबटा देते है.", उमेद की बात शंकर के पल्ले तोह पड़ी लेकिन कुछ याद भी आ गया.

"यार वो सोमनाथ की तरफ से कुछ ऐसा वैसा न हो जाये? वैसे चांस काम हे है लेकिन साला पागल आदमी है वो."

"तू ये भूल रहा है की तूने भल्ला को भी ामान्तरण दे दिया था. दिल्ली से भी ज्यादा नहीं तोह 4-5 विधायक मौजूद होंगे वह लेकिन इस सबको भजन मां देख लेंगे. बचो का बाप बन्न के रहना है हमे और अगर तूने कही भी लार टपकाई तोह फिर भूल जइयो की मैं चची से कुछ भी छिपाऊँगा. वैसे तुझे रेखा भाभी को लेकर उनके पीहर भी जाना चाहिए.", यहाँ एक अलग हे बात कह दी थी उमेद ने लेकिन शंकर ाचे मूड में था कल रात से.

"हाँ तोह वही करूँगा मैं आज दोपहर में. बचो के साथ हे ससुराल चक्कर लगाऊंगा और बिट्टू से भी बहोत सी बातें करनी है. बड़ा साला है लेकिन भाई जैसा है मेरे. वैसे इस पैसे का क्या करना है अब?", शंकर ने मुद्दा फिर घुमा दिया था.

"इसको सफ़ेद करना है बे और ये लगा दे राजेश के कॉलेज वाले काम पे. मतलब की ये रकम राजेश दिखायेगा किसान के हिसाब से और डलवाएगा अर्जुन के अकाउंट में. जमीन का आधा हिस्सा इसके नाम जो हुआ है.", उमेद का इस सबमे दिमाग कही ज्यादा हे तेज चलता था. हर छोटी बड़ी बात पर एक पैनी निगाह किसी शातिर व्यापारी की तरह.

"हाँ और फिर उसको हम लगाएंगे दिल्ली वाले प्रोजेक्ट पर."

"भोले वह सफ़ेद क्यों लगाना है? भाई, वो गोदाम वाले 33 करोड़ और धर्मपाल भाई के 16 के साथ साथ मेरे पास भी कुछ 25 काले में पड़े है. वो सब उधर हे ठिकाने लगेगा. गजेंद्र भल्ला को किसलिए भागीदार बनाया है? ये पैसा अर्जुन के काम हे आएगा der-saver. वैसे तू एक बात सच सच बताएगा?", उमेद ने विवरण देने के साथ हे सवाल दाग दिया. राजेश इस वक़्त निश्चिंत सो चूका था.

"पूछ."

"तू कह रहा था के अर्जुन 2-2 के साथ बंधा है. प्रीती के अलावा वो दूसरी कौन है जिसका जीकर बिना नाम लिए करने पर भी तेरे माथे पर बल पड़ गए थे?", शंकर को अंदेशा तोह था की एक न एक दिन उमेद ये सवाल जरूर करेगा क्योंकि वो शंकर के साथ आत्मा से जुड़ा था. लेकिन इतनी जल्दी पूछ लेगा ये कहा पता था. शंकर को एकटक सामने की तरफ देखते हुए उमेद को भी बेचैनी होने लगी.

"माफ़ करना भाई अगर बात इतनी गंभीर है तोह. बस मैं तुझे परेशां नहीं देख सकता और अगर तू परेशां तोह मतलब कुछ बहोत बड़ी बात है. चिंता है इसलिए पूछा लेकिन ...

"ऋतू.. मैं खुद तुझे ये बताना चाहता था गज्जू लेकिन फिर तू कहता के मैं पति के साथ साथ बाप के रूप में भी विफल हो गया. लेकिन मैं जानता हु तू मुझे कभी आंकता नहीं क्योंकि हमारे बीच खून से बढ़ कर रिश्ता है.", इतनी धीमी आवाज से जो नाम शंकर ने लिया था वो सुन्न कर उमेद का चेहरा हे सफ़ेद पड़ गया. इसके बाद शंकर ने जो भी कहा वो सब ऊपर से गया और उमेद शुन्य में बस शंकर वाली हालत में सामने देखता जड़ हो गया.

"बात सिर्फ इतनी हे नहीं है भाई. उन दोनों का वो अटूट प्यार जो बचपन से जारी है उसकी स्वीकृति एक तरह से माँ भी दे चुकी है. मैं जानता हु की अर्जुन गलत नहीं है और जहा तक ऋतू की बात है तोह उसकी दुनिया.. उसकी दुनिया कभी अर्जुन के सिवा कुछ और थी भी नहीं. लेकिन इसकी परिभाषा न मेरी डिग्री में है न माँ की दुनियादारी में.", शंकर की बात सुन्न कर उमेद ने अपना चेहरा साफ़ करते हुए एक गहरी आह भरी.

"यार भोले ये तोह.. ये तोह बात बहोत हे ज्यादा.. पता नहीं क्या हो गया है लेकिन मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं. अर्जुन अगर वैसा हे चाहता है तोह फिर समझाना भी बेकार हे होगा लेकिन समाज..", उमेद के दिमाग ने जवाब दे दिया था इस परिस्थिति में और एक फीकी मुस्कान शंकर के चेहरे पर छ गयी.

"वो न भी चाहे लेकिन ऋतू की चाहत वो है और ऋतू के प्रति उसका समर्पण शायद पापा के समकक्ष या ज्यादा हे होगा. वो उसके सामने जब होता है तोह वो वो नहीं होता जो हम जानते है या देखते है. वह ताक़त ऋतू और शरीर अर्जुन होता है. वो उसके लिए समर्पित है गज्जू और यही चीज माँ ने देखि थी. मेरी नाजुक सी गुड़िया आज बुलेट चलती है, ghar-bahar के काम देखती है लेकिन इस सबके साथ साथ वो अपनी पढ़ाई में कुछ वर्ष आगे हे चल रही है. समझता है इस सबका मतलब?", शंकर की बात पर उमेद के जड़ दिमाग में भी बत्ती जाली.

"वो आने वाले वक़्त के लिए तैयार है और कमान ऋतू के हाथो में हे हैं. उसकी छाया अर्जुन है जो तेरे मुताबिक उसके सामने दुनिया से काट जाता है.? लेकिन इसके परिणाम बहोत घातक होंगे भोले. इस बात को यही दफना दे भाई और जो भविष्य में होगा उसकी तभी देखेंगे. इसका हल नहीं है मेरे पास."

"मेरे पास भी नहीं है और जितना मैं मेरी बेटी को जानता हु तोह उसकी ज़िद्द कोरी नहीं होती. माँ भी ऋतू से दबती है और मुझे बस एक हे डर है की जब वो वक़्त आएगा तब मैं क्या करूँगा?"

"भोले, तू शांत हे रह भाई. भगवान् न करे की कुछ गलत हो और अगर किस्मत में वो है जो हम नहीं चाहते तोह भी कुछ बदलेगा नहीं. बता तू अर्जुन को बेदखल कर सकता है?"

"फिर तोह वो अधिकार से ऐसा करेगा गज्जू. उसको बेदखल करू या ऋतू को, मन्नत तोह उन्ही की पूरी होगी."

"किसी एक को..", उमेद कहते कहते रुक सा गया.

"क्या किसी एक को?"

"नहीं नहीं भोले. अर्जुन गलत काम नहीं करता और मैं भी उसका बाप हे हु. ऐसा वक़्त आया तोह तू मुझे अर्जुन सौंप देना, फिर मैं मेरे बेटे का विवाह उसकी मर्जी से करूँगा.", उमेद के जजबाई होने पर शंकर की आँखे न्यास हे चमक उठी.

"उसकी जगह तू ऋतू को..

"जो तुझे ठीक लगे भोले बस ध्यान रखना की कुछ गलत कदम न उठा बैठे तू. अब भूल जा जो भी अभी हमारे बीच बात हुई.", गाला सूखने के बावजूद उमेद ने सिग्गट सुलगा ली और इस बार शंकर भी अपनी तालाब न रोक सका. कुछ हे वक़्त में राजेश भी इस तीव्र गंध से उठ चूका था.

"कहा पहुंचे जीजा?"

"साले साहब, हॉस्पिटल. चलो अपनी अपनी कार उठा कर निकलते है. दिन में आऊंगा मैं उधर और भोले, तू जल्दी आना.", शंकर ने कार एक तरफ लगते हुए किसी इत्छा से ऐसा कहा था और उमेद ने गर्दन हिला कर हामी भरी. तीनो हे अपनी अपनी दिशा में निकल चले थे 5 मिनट बाद. शंकर का दिल अब उतना भी अशांत न था लेकिन अभी भी बाप का दिल बेशक कही साथ था बचो के पर समाज हावी था इस पर.

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जहाँ नाश्ते आदि के बाद 'संसार' में खासी चहल पहल थी, ख़ास लोगो की मण्डली अपनी अपनी तरफ महफ़िल में बैठी सब vichar-gappe लड़ा रही थी वही अर्जुन टेंट, राशन आदि काम निबटा कर संदीप को लिए पुराणी मार्किट आ चूका था. आचार्य जी द्वारा बतायी जगह पर वो उस व्यक्ति से मिलने आया था जिसने पूरे घर, बगीचे के साथ साथ कम्युनिटी हॉल को भी लाइट से सजाना था.

"ओह भाई अर्जुन.. वो देख रे क्या जलवा है?", सड़क के दूसरी तरफ वो दूकान थी और रोड पार करते हुए संदीप की नजर आगे सड़क किनारे कड़ी जेन कार और उसके बराबर थोड़ी परेशां सी दिखती खूबसूरत युवती पर पड़ी. अर्जुन उसकी बात को दरकिनार करता आगे हे बढ़ रहा था की अपने नाम को jaani-pehchani मीठी आवाज में सुन्न कर ठिठक सा गया.

"ओह भाई, वो तोह तुझे हे बुला रही है. अबे है कौन बे ये चलती फिरती आग?", अर्जुन इस बार संदीप की बात सुन्न कर उधर हे देखने लगा. अगले हे पल वो हैरत से अपने सीने से लगी युवती को देखने लगा जो तुरंत अलग हो चुकी थी.

"जस.. जसलीन तुम यहाँ और वो भी इतनी परेशां?", अर्जुन उसको लिए एक तरफ आया तोह एक नजर कार में बैठी 3 जोड़ी आँखों को देखने के बाद इस सेहमी सी जसलीन को देखने लगा.

"वो.. वो कार के पीछे काफी देर से एक गाडी लगी हुई थी. यहाँ पीसीओ से तुम्हारा नंबर मिलते हुए भी वो लोग सामने खड़े घूर रहे थे. नंबर बिजी था और डर की वजह से किसी लोकल से पूछने का ध्यान नहीं रहा.", एक सांस में जसलीन सबकुछ बोल गयी और अर्जुन के तेवर बदल चुके थे. चाय के ठेले से एक पानी की बोतल बक्से से निकाल कर पहले उसने जसलीन की तरफ बधाई और फिर बड़े ध्यान से उस तरफ देखने लगा जहा 4क्ष4 क्लासिक में बैठे 5 हट्टे काटते 25-30 वर्षीया युवक निरंतर इन्हे घूर रहे थे.

"ाची बात है की तुमने कार रस्ते में नहीं रोकी और शहर पहुंच गयी. संदीप, कार चला लेता है न तू?", अर्जुन ने फिर से कार में बैठी गुरदीप, अफसाना और कीर्ति को नजर भर देखा जो शायद जीवन के एक नए अनचाहे घटनाक्रम से मुखातिब हुई थी. उधर संदीप सब समझते हुए बस इतना हे बोलै.

"कार तोह चला लेता हु भाई लेकिन वो 5 हैं."

"हम कुछ ऐसा वैसा नहीं कर रहे और तू निश्चिन्त रह मैं यहाँ का काम करवा कर जल्दी आता हु.", इतना कहने के साथ हे वो कार के पास पहुंच कर बहार से हे बाकी तीनो को मुस्कुराकर hello बोलै. हर बात को दरकिनार करते हुए अर्जुन बस मुस्कुरा कर तीनो का हालचाल लेता रहा और आखिर में उन्हें संदीप के साथ विदा करके 'मंगल इलेक्ट्रिकल' नाम की उस बड़ी दूकान की तरफ चलने लगा जो इनसे 30 कदम दूर थी.

"ओह फुलझड़ी, तोह इस आशिक़ से मिलने आयी थी तू? बाकी सबको भेज दिया लेकिन हम तोह तेरे हे दीवाने है.", मुँह से गुटखा थूक कर एक दाढ़ी वाला तुरंत जीप से कूद कर उनकी तरफ आते हुए बोलै. उसके पीछे 2 और युवक भी थे जिनको देख जसलीन ने मजबूती से अर्जुन का हाथ थाम लिया.

"वैसे भी साली एक तोह बुर्क़े में थी और एक तिल्ली सी पतली. हाँ वो तगड़ी घोड़ी भी काम चलने लायक थी लेकिन तू जानलेवा है डार्लिंग. ोये महाभारत के अर्जुन, चल तू अपनी गली पकड़ और भाई को छमिया से बात करने दे. 60 किलोमीटर सिर्फ इसके लिए हे आना पड़ा.", अर्जुन के लम्बे कुण्डल से बालो का मजाक उडाता ये दूसरा भी घनी दाढ़ी वाला तगड़ा दुरुस्त सा युवक था जिसकी बात की खिल्ली उडाता अर्जुन चुपचाप जसलीन को लिए थोड़ा आगे बढ़ गया.

"तुम चलने से पहले हे फ़ोन कर देती तोह पापा या दादा जी किसी न किसी को लेने भेज देते इधर. वैसे तुम्हे इन छोटी मोती बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए.", अर्जुन हँसता हुआ अभी कुछ कदम हे आगे बढ़ा था और वो तीनो उसके रस्ते के बीच आ खड़े हुए.

"घाना चालक समझे है खुदको? बागड़ी भाई का नाम इस शहर में भी िज्जात्त और डर से लिया जाता है. एक बार बोलै के चल निकल तोह निकल और तू छममिया ज्यादा उड़द रही है. कार जितनी मर्जी तेज भगा ले, देख हम तोह सामने आ हे गए.", उसकी इस बात पर अर्जुन के होंठो पर एक तीखी मुस्कान छा गयी जिस पर इनका प्रमुख वो बागड़ी चौड़ा होता हुआ अर्जुन के सीने पर हाथ रख कर गुस्से से घूरने लगा. मार्किट में ऐसा कुछ हो और किसी की नजर न पड़े ये मुमकिन न था.

"ओह भोस्डिके, तू कौन है बे?", इस आवाज को सुन्न कर उन युवको के चेहरे पर गुस्से के तेज भाव आये जो पल में हे काफूर हो चुके थे. 2 सितारा वर्दी वाला पोलिसिअ उनके सामने था.

"अनिल बागड़ी नाम है मेरा थानेदार. क्सक्सक्सक्स के सरपंच का बीटा और ताऊ मेरा भी थानेदार है.", बागड़ी ने अपना परिचय दिया तोह इस बार अर्जुन के साथ वो पुलिस वाला भी मुस्कुरा रहा था जो अब अर्जुन के कंधे पर हाथ रखे खड़ा था.

"जहा से आया है वही निकल ले लड़के नहीं तोह ऐसा केस दबा के अंदर ठोकूंगा के सरपंच के साथ मला भी आया तोह रिहाई न होगी. अजमेर सिंह नाम है मेरा और ये है अपने गुरु जी का पौता. बोल दियो तेरे बाप को की पंडित जी के साथ उलझने का दिल है तेरा और तुम सारे भी सुन्न लो रे. बन्दर जैसी लाल कर दूंगा जे फेर दिखाई दिए इस तरफ.", अजमेर सिंह की दहाड़ से बागड़ी ये तोह समझ गया था की लड़का कुछ ख़ास है लेकिन ऐसा कौन है जिसकी तरफदारी राह चलता सी लेने लगा.

"मंदिर के पंडित की जितनी मर्जी तरफदारी कर लो थानेदार जी, जो मेरी नजर में खटक गया तोह खटक गया.", बागड़ी अभी इतना बोल कर मुदा हे था और अर्जुन ने उसका कन्धा इतनी मजबूती से दबाया की घुटने मोड़ते हुए वो जमीन पर बैठ गया.

"मंदिर के पुजारी होते तोह फिर भी कुछ चांस था तुम्हारा लेकिन वो कानून के पंडित है. रही बात खटकने की तोह बस इतना हे कहूंगा की दोबारा मेरी नजरो में मैट खटकना.", अर्जुन ने कंधे के पास वाली हंसली पकड़ कर जरा खींची हे थी की अनिल बागड़ी जोरो से चीख पड़ा.

"जाने दे भतीजे जाने दे. कई बार बस समझा के छोड़ देना चाहिए बाकी ये घर जा के अपने ताऊ से पूछ लेगा. गुड़िया, भाषा के लिए क्षमा करना. पुलिस में इतने को नरम हे मन जाता है.", जसलीन अब मुस्कुरा रही थी और 3-4 हवलदार इस तरफ आ चुके थे.

"अंकल, आपने तोह फिर भी कुछ ज्यादा नहीं कहा. जरा पंजाब पुलिस की महफ़िल देखना ऐसे मजनुओं के साथ.", इस बात पर वो सभी खिलखिलाने लगे और अनिल के दोस्त उसको लिए जीप की तरफ बढ़ गए. अर्जुन मंगल इलेक्ट्रिकल की तरफ चल दिया अजमेर सिंह का धन्यवाद करने के बाद.

"बागड़ी भाई, लड़का तगड़ा था लेकिन लगता है बैकग्राउंड ज्यादा हे जोरदार है जो रह चलता S.I. उसके साथ इतना ख़ास दिखा.", एक युवक ने इतना कह कर बीड़ी जलाते हुए बागड़ी की तरफ बधाई जो कन्धा थामे दर्द जज्ब करने की असफल कोशिश कर रहा था.

"बीटा, निकल लो यहाँ से जल्दी. वो तोह फिर भी चला गया लेकिन सी साहब देखो फ़ोन मिलाये बैठे है.", अपनी दूकान में जाने से पहले इस व्यक्ति ने इन युवको से जब ये कहा तोह एक भड़क उठा.

"क्यों बे बुढऊ ऐसी क्या टॉप है रे वो सी और ये लोंदा? ज्यादा chu-chaa मैट कर."

"गांड तोह तुम्हारी ये मार्किट भी मार देगी लोदु लेकिन धंदे का टाइम है अभी. और वो राह चलता चुटिया नहीं है तुम जैसा, रामेश्वर जी का पौता है. उसके बाप तक खबर गयी तोह अपने घर क्या भोसड़ीवाले 100 कदम दूर न निकल सकोगे. बहिन के लौड़े साले..", अधेड़ ने जिस तरह हड़काया था इन सबकी सिटी पित्ती गम हो चुकी थी लेकिन शायद ये अंतत नहीं था क्योंकि अब सचमुच सामने लकी अरोरा अपने दलबल के साथ मौजूद था.

"डालो इन सबको गाडी में.", और अर्जुन वह अपनी हे मंत्रणा में लगा था और इधर ये पांचो अपनी ससुराल की तरफ जा रहे थे, डरे सहमे. अब बेहतर हालात में जसलीन के साथ अर्जुन भी घर की तरफ निकल चूका था, काम काज निबटा कर अगले काम के लिए.
 
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Kaam-Kaaj (2)

"गर जीवन गतिमान हे नहीं है तोह फिर तुम चाहे पर्वत से विशाल हे क्यों न हो, तुम वजूद दिखा सकते हो लेकिन हांसिल कुछ भी नहीं कर सकते. मैं तोह पंडित जी की बात से पूर्ण इत्तेफ़ाक़ रखता हु भाई की जबतक सांस ले रहे हो, gati-maan रहो. बाकी तुम लोग आज की पीढ़ी हो तोह शायद जीवन के कायदे बदल गए हो कुछ.", अभी दोपहर के भोजन में काफी समय था और बैठक में 3 पीढ़ियों के स्वरुप एकत्रित थे.

एक तरफ बड़े सोफे पर पंडित जी के दाए बाये धर्मवीर सांगवान जी और छोल साहब उपस्थित थे तोह वैसे हे 2 बड़े सोफों में से एक पर शंकर, उमेद और मधु विराजमान थे. इनके बीच दीवान पर आचार्य जी की बगल में अर्जुन और संजीव की जोड़ी थी तोह 2 छोटे सोफे और एक बड़े पर नरिंदर, रेणुका, विनीता, ऋतू और आरती के साथ बुर्क़े में अफसाना. अभी जीवन नामक विषय पर शंकर के विचार सुन्न ने के बाद आचार्य जी ने अपनी बात राखी थी और उनकी बात पर आधे मत उनके पक्ष में गए.

"चाचा जी, बात अगर गतिमान या काइनेटिक रहने की है तोह ये जरुरी तोह नहीं की ऐसा हर समय जरुरी हो. ऊर्जा तभी हांसिल होती जब आप रुके हुए हो और आराम भी जरुरी है. मैं तोह शंकर की बात से इत्तेफ़ाक़ रखती हु की एक समय के बाद सब छोड़ कर बस आराम से जीवन बिताया जाए. अब रिटायरमेंट का मतलब यही तोह हुआ की आपकी ज़िन्दगी भर की म्हणत के बाद ये वक़्त सिर्फ आप अपने लिए जिए.?", मधु हमेशा हे अपने बड़े भाइयों को नाम से हे बुलाती थी और इस वक़्त ऐसा करते हुए वो उनके हे पक्ष में दिखी. जिस तरह की मुस्कान उमेद, शंकर और नरिंदर के चेहरे पर आयी थी उस से रामेश्वर जी भी थोड़ा हंस दिए लेकिन बोले कुछ नहीं. सभी ने अपने सामने रखा शरबत लगभग पी लिया था सिवाए संजीव, आचार्य जी और अफसाना के, जो खामोश तबियत थी हमेशा की तरह.

"मेरे हिसाब से तोह रिटायरमेंट का मतलब कुछ और हे है मधु दीदी. मतलब आप इतना टाइम नौकरी और सबकी सेवा करने के बाद जब मुक्त होते है तोह ये समय अब बिना किसी बंधन के अपने साथ साथ अपनों के लिए जीना चाहिए. यहाँ आराम जैसा तोह कुछ विरोध है हे नहीं क्योंकि नौकरी भी तोह दिन के सिमित घंटो पर होती है. आप एक्टिव है और वो सब करते है जिस से परिवार, समाज और आप खुद खुश रहे तोह जीवन सही मायने में सफल मन जाएगा. सांस का क्या है ये तोह 15 की उम्र भी रुक सकती है और न रुके तोह 100 तक भी नहीं. क्या विचार है संजीव?", रेणुका ने मुस्कुराते हुए जो दलील दी थी उस से मधु लाजवाब हो गयी थी और उसके साथ बाकी सभी बड़े भी मुस्कुराने लगे. यहाँ संजीव, जो हमेशा खामोश हे दीखता था लेकिन अब वो भी बदल रहा था.

"सच बात है बुआ आपकी और मैं भी मानता हु की जीवन हमेशा घडी के कांटो सा होना चाइये. आप हर रोज शायद एक हे जैसा रूटीन जीते रहो लेकिन मिलते आप सभी प्रकार के लोगो, परेशानियों, खुशियों और ज्ञान से हो. रुकने के मतलब हे क्या? बंद घडी कभी ाची लगती है क्या?", संजीव ने चाँद शब्दों में हे एक तगड़ा उदहारण दिया था परन्तु कोई था जो शायद बंद घडी वाली बात सुन्न कर ना में गर्दन हिलने लगा.

"तोह तुम कहते हो के तुम्हारा बड़ा भाई पूरी तरह सही नहीं कह रहा? बोलो बरखुरदार और गुड़िया अब तुम यहाँ अपने dada-chacha के बीच हो तोह जरा khush-tabiyat रहो. यहाँ बचे और पौधे खुले में सांस लेते है, जैसे वो चाहे.", रामेश्वर जी के ऐसा कहने पर झेंपते हुए अफसाना ने चेहरा नुमाया किया तोह ऋतू और विनीता एकटक उसको देखती हे रह गयी. ऐसा हे कुछ मधु जी के चेहरे पर था और प्रशंशा सांगवान जी भी ख़ामोशी से करते रहे.

"ये अपनी हे बची डॉक्टर साहब. क्सक्सक्सक्स वाले हुसैन बेटे की छोटी राजकुमारी हैं ये अफसाना, सतीश तोह मिला हे है उस से.", परिचय भी खुद रामेश्वर जी ने दिया था और अफसाना को ये देख दिल से ख़ुशी हुई थी की वो यहाँ कोई बहरी मेहमान भर नहीं है. अब चेहरे पर उतनी सेहमियत न थी बल्कि दोनों हाथ जोड़ कर वो सबसे मुखातिब भी हुई.

"हाँ भाई साहब ये आपने सच कहा बिटिया के लिए. वैसे यहाँ पर तुम्हे बहोत साड़ी सहेलियां और बहने मिलेंगी अफ़सा बेटी.", छोल साहब ने मुस्कुरा कर अभिवादन स्वीकार किया तोह अफसाना दोनों हाथ गॉड में 'क्ष' की तरह रखती हुई थोड़ा सिकुड़ कर मुस्कुरा दी.

"चलो अब वापिस आओ बात पर दादा जी. ारु ने संजीव भैया वाली बात पर गर्दन ना में कैसे हिलाई? और अफसाना तुम भी बोल सकती हो अगर दिल करे तोह. आरती के भी जुबान आ चुकी यहाँ रहने से.", ऋतू अपनी आदत के मुताबिक धड़ल्ले से बोल रही थी और उसके कंधे पर हाथ रख कर बैठे नरिंदर जी भी हंस दिए.

"हाँ भाई नटवरलाल तुम तोह बुरे फंसे हो. पहले तोह अपने पिता वाली बात पर ना, फिर बुआ वाली पे भी और अब उनसे अलग बात कह रहे तुम्हारे आदरणीय संजीव की भी बात पसंद नहीं आयी. चाहते क्या हो जरा हम भी सुने?", अर्जुन ने वह मौजूद सभी नजरे खुद पर देख एक बार आचार्य जो को ऐसे नजर किया जैसे कहने से पहले गुस्ताखी के लिए माफ़ी मांग रहा हो.

"निर्भीक कहो बीटा. मैं तोह जानता हु के तुम बाघी हो समाज की नजरो में लेकिन विचार गलत नहीं होंगे.", आचार्य जी के साथ साथ संजीव भैया से भी अनुमति मिलते हे अर्जुन ने एक दृष्टि मधु बुआ पर करते हुए अपने दादा जी को देख कर बात शुरू की.

"हम मशीन नहीं क्योंकि हम किसी बहरी मदद के बिना चलते है और इस तरह से हमारा जीवन कही ज्यादा जटिल है. मुझे भैया की बात से जरा भी ऐतराज नहीं था लेकिन उदहारण को ाचे से खोलना जरुरी है. गतिमान जीवन.. ऐसा कहना और सुन्न न ाचा लग सकता है लेकिन क्या ये वास्तविक क्रिया है? सबसे पहले तोह मैं दादा जी के जीवन से हे शुरू करता हु और माफ़ी चाहता हु के आपका उदहारण रख रहा हु.", अर्जुन के लिए वो कितना मायने रखते थे वो यहाँ बैठे तक़रीबन हर शख्स को पता था. पंडित जी के हामी भरते हे वो किसी प्रवक्ता की तरह शुरू हो गया.

"15 की उम्र से गतिमान रहे और इसके साथ हे इन्होने कार्य, परिवार, समाज और सेवा में कभी भेदभाव न किया. 60 की उम्र तक आते हुए नौकरी से विमुक्त होने के बाद भी खुदको अलग नहीं किया लेकिन क्या दादा जी को हमेशा चलित (एक्टिव) रहने का कोई नुक्सान नहीं हुआ? लेकिन क्या कर सकते है जब जीवन एक साइकिल या चक्र में इतना गहरा ढल्ल जाये जिसमे आप रुक न सको? पीछे जाने की चाहत तोह हो लेकिन वो चक्र निकलने हे न दे?", अर्जुन ने बड़ी हिम्मत से ये शब्द कहे थे जिसकी समझ कुछ बुजुर्गो के साथ साथ शंकर और उमेद को भी हुई.

"पापा और चाचा जी का जीवन भी एक उदहारण है जो थोड़ा सा विपरीत होगा. शायद आप लोग शुरू से एक दूसरे के साथ है तोह कोई साइकिल तोह बानी नहीं होगी? दिमाग और दिल खुश रहते है जब साथ में कोई रहे और एक तरह से ठहरा हुआ जीवन भी गतिमान हे होता है उस पल में. पापा कार्य और म्हणत में शायद दादा जी के समकक्ष हे है क्योंकि दादा जी भी कहते है की इनसे बेहतर डॉक्टर कोई नहीं होगा. लेकिन 'लाइफ लिवेद इन ा ग्रुप' का सबसे बड़ा डिसादवंतागे या दुष्परिणाम यही है की इसमें फैंसले भी मिल कर होते है और सभी अपनी एक खासियत को हे निखार पाते है. क्योंकि वह ठहराव और चलना अनियमति है. जहा दादा जी के jiwan-chalan में पहिया एक हे था और सवार भी एक तोह सबकुछ इन्ही पर निर्भर हुआ और रुकना मुनासिब भी नहीं. पापा, चाचा जी या कहे बुआ जी भी मुलती डायमेंशन या bahu-kon में जीवन जिए या जी रहे है.", अर्जुन को इतना अधिक गंभीर देख और उसकी बातें सुन्न कर बैठक के माहौल गहरे साहिल सा खामोश हो गया. सभी अपने जीवन चक्र को शायद मैं में हे दोहरा रहे थे.

"आप हमेशा गतिमान रहे तोह फिर आप कुछ हे लम्हो में खुद को मजबूर पाएंगे लेकिन निराश नहीं. दूसीर तरफ आप एक हुनर और टारगेट पर केंद्रित रहे, जिसमे आपके साथ सहयोगी भी हो तोह आप उसमे श्रेष्ठ बनेंगे लेकिन अक्सर ऐसे life-cycle में डिफरेंसेस भी आते है और कई निर्णय या यु कहु की स्पेसिफिक इमोशनल मोमेंट्स पर आप रियेक्ट नहीं कर सकते. आप रुक जाते है क्योंकि इन्तजार होता है उस समय के निकल जाने का. जैसा बुआ जी ने कहा के आराम करना बहोत जरुरी है जब आप इतने समय तक काम हे करते रहे हो. पूरी तरह तोह बुआ जी भी गलत नहीं लेकिन इस से होगा कुछ ऐसा की आप फिर उस टाइम में जाएंगे जहा आप फैंसले नहीं कर पाए थे या फिर आपने रुकना ठीक समझा.", ऋतू के माथे पल हलके बल पड़ चुके थे जैसे उसको लगने लगा था के अर्जुन कही यही सबके सामने हे कोई ऐसी बात न कह दे जिस से माहौल गरमा जाए.

"होना चाहिए इसके उलट. अब जैसे पापा का एक्साम्प्ले दिया तोह ये चाह कर भी रुक नहीं पाएंगे क्योंकि ये श्रेष्ठ है अपने हुनर में लेकिन दिमाग कहता है की आराम लेना होगा जबकि दिल से ये गतिमान रह कर मेडिकल प्रैक्टिस जारी रखेंगे. दादा जी जीवन गतिमान रहा लेकिन अब वो हिम्मत करते है खुद को चलता रखने जबकि पुलिस सेवा से निवृत होने के बाद अब ये इसकी कोई प्राइवेट प्रैक्टिस तोह नहीं कर सकते न? या फिर कल को ये अपना हे स्टेशन खोल ले?", अर्जुन के ऐसा कहते हे माहौल में एकदम तेज ठहाके गूँज उठे. अब तोह शंकर जी भी तबियत से हंस रहे थे और रामेश्वर जी भी.

"तोह मेरे हिसाब से भैया ने जो घडी रुकने वाली बात कही वो इसलिए क्योंकि ये इन्हे भी पता है के एक दिन तोह इनकी भी ड्यूटी ख़तम होने वाली है. हाँ आचार्य दादा जी का कुछ नहीं किया जा सकता. इनके प्रश्न खुदसे है और जवाब खोजने वाला व्यक्ति एक स्थान पर रह कर भी गतिमान हे रहता है. वो एक ऐसा पर्वत बन्न जाता है जिस पर बड़ी बड़ी jiwan-shrinkhla बसरती है, jadi-bootiyan पायी जाती है (ज्ञान) और वो अपने प्रश्नो के जवाब में लोगो को ऐसा ज्ञान देता है जिस से अपने व्यक्तित्व का अलग और वास्तविक एहसास होता है. इंसान होने का एहसास, प्रेम का एहसास और bandhan-mukt गतिमान dil-dimaag का एहसास. ऐसी घडी के सेल कभी बंद नहीं होते.", अर्जुन ने तीसरे उदहारण में जब आचार्य जी को हे लपेट लिया तोह बाकी सभी के चेहरे पर उनके लिए अपार प्रशंशा थी और खुद शास्त्री जी आँखों में 2 बूँद आंसू जिसको छिपाते हुए उन्होंने अर्जुन को कस कर अपने सीने से लगा लिया.

"भाई साहब, इसलिए कहता हु की मेरा ये बचा समाज से बचा कर रखना जरुरी है. और अर्जुन हम कोई पर्वत नहीं वो छोटी सी शिला (चट्टान) है जिस पर नदी के निरंतर थपेड़े घिस कर चमका देते है. असलियत में वो हर गुजरते वक़्त के साथ घिस कर विलीन होती जाती है. हमारा जीवन भी कुछ ख़ास नहीं है.", आचार्य जी अपने दिल से अर्जुन को लगाए अभी कुछ बेहतर हे हुए थे की उस मीठी आवाज से बैठक का हर व्यक्ति सम्मोहित सा हो गया.

"ज़िन्दगी कोई पैमाइश तोह नहीं जिसको अल्फाजो और दलीलों से मुक़र्रर किया जाए? एक लम्हात में खुदा हमको वो दौलत निसार कर सकता है जिसके निस्बत हम ज़ेहन जुम्बिश हयात (स्वर्ग) बसर कर लेते है. सफर कब ख़तम होगा या सफर जरुरी भी है इसका फैंसला हमारे हाथ नहीं. आपने (अर्जुन) कहा की इंसान कोई aala-jarsaqeel (मशीन) नहीं लेकिन क्या आप बता पाएंगे किस निस्बत आप सब कर पा रहे है? बैरूनी (बाहरी ताक़त) बस दिखाई नहीं देती लेकिन वजूद तोह है बेशक हम फोरि इंकार करके दिलासा दे. दादा जी (आचार्य जी से मुखातिब होते हुए), खदान से निकला हीरा तराशे जाने पर अकार में काम हो जाता है लेकिन कीमत वजूद ऐ कोयला खदान सी महंगी होती है. आपसे हम अभी ru-ba-ru हो रहे है पर ये समझ सकते है की आप khuda-karam से पानी सामान है.", अफसाना बोल भी सकती है ये Aarti-Arjun के सिवा यहाँ किसी को मालूम न था और वो ऐसा ज्ञान रखती इसकी तोह अर्जुन ने कल्पना तक न की थी. आचार्य जी की तरफ जब उसने नजरे झुका कर हाथ जोड़े तोह उन्होंने न्यास हे अपने हाथ अफसाना के सर पे रख दिए. कुछ पल तोह सभी खामोश थे और ऋतू ने एक गहरी मुस्कान से अफसाना को देखते हुए आरती से अपनी जगह बदल ली.

"पता नहीं ये सब तुमने जो बोलै वो हिंदी में था या कुछ अलग लेकिन तुम सचमुच बहोत प्यारी हो और दिल करता है की बस तुम्हे सुनते रहे.", ऋतू ने सबकी तन्द्रा भांग करते हुए ये कहा तोह अफसाना फिर से शर्माने लगी और उसने माफ़ी भी मांगी अगर कुछ गलत कहा हो तोह.

"पैगाम भी सबको नहीं मिलते बिटिया और जो इतनी रुमानियत से ज़िन्दगी का फलसफा बयान कर दे वो भी इतनी काम उम्र में, ये शायद हम सिर्फ तीसरी बार देख रहे है. बहुत सुना था हमने तुम्हारे अब्बू जी से की अफसाना की तामील (शिक्षा) ऊपर वाले की दें है लेकिन आज देख भी लिया. Marrakesh-Safi (मोरक्को) में शायद कुछ ख़ास हे होगा.", आखिरी बात कह कर पंडित जी हंस दिए तोह इतनी देर में पहली बार उन पतले सुर्ख होंठो पर एक सम्मोहिनी से मुस्कराहट उभरी और ऋतू खुद को रोक न सकीय इतने लोगो में उस चेहरे को हथेली में थामने से. अफसाना ने एक पल अपनी सुनहरी आँखों से ऋतू की भी बेमिसाल नजरे देखि और फिर जैसे एक खामोश संवाद हुआ.

"चलो आप लोग करो ये क्वेश्चन क्वेश्चन का गेम. मैं और आरती तोह चले बाकी फ्रेंड्स से मिलने और अफसाना को सबसे मिलाने. आरती कह रही थी की अफसाना पहली बार घर से बहार आयी है अकेले तोह इसका अकेलापन ख़तम करते है. चलो विन्नी दीदी.", ऋतू ने जिस तरह से खड़े होते हुए अफसाना का हाथ थमा था वो भी बिना कुछ कहे उसके साथ हे चल दी, गर्दन झुकाये और उन दोनों के साथ हंसती हुई आरती और विन्नी.

"बड़ी प्यारी बची है पंडित जी और उतनी हे संवेदनशील होने के साथ साथ समझदार भी.", सांगवान जी ये कह रहे थे और उधर उमेद ने शंकर के कान में कुछ कहा जिस पर शंकर ने नजरो से हे हामी भरी. यहाँ भी बात अफसाना के मामले में हे थी लेकिन क्या ये बस उन दोनों को हे पता था.

"इजाजत दीजिये पंडित जी, घर पे जाना होगा फिलहाल लेकिन शाम को भाभी जी के हाथ की चाय पीने जरूर आऊंगा. हाँ शंकर, वो संगीत कार्यक्रम के लिए सब काम हो चूका है लेकिन फिर भी कल तुम उपलब्ध रहना जब आयोजन की पूरी वार्तालाप हो.", खड़े होते हुए शास्त्री जी ने शंकर को सम्बोधित किया तोह बाकी सब भी खड़े हो गए. इस बीच रामेश्वर जी ने आदतन ये बात कही.

"फाइनल तोह हो गया शास्त्री जी लेकिन अभी यही नहीं पता की कितने लोग आमंत्रित करने है और फिर पता नहीं बचो को पसंद हो या नहीं. उन्हें भी शामिल कर लेंगे कल."

"वो सब उन्होंने हे किया है पंडित जी. हिमानी के पास तारा, अलका और संजीव आये थे 9 बजे और इन्होने हे सब मेनू, दज और स्टेज सजाने वाली हर बात कर ली. शंकर से तोह बात इसलिए करनी है की ये लोग भी चह्वाण होंगे कुछ ख़ास इंतजाम के और मैं चाहता हु आप इन्हे मंजूरी देने में आनाकानी मत कीजियेगा.", आचार्य जी का जिस तरफ इशारा था वो सभी समझ चुके थे और नरिंदर के चेहरे पर एक गहरी हंसी छा चुकी थी.

"आपने जब कह दिया तोह फिर क्या आनाकानी लेकिन शंकर उमेद, तुम्हे हर चीज का ध्यान रखना है. और शास्त्री जी, धर्मवीर जी चाहते है की शाम को आप और सतीश जरा इनके द्वार भी दर्शन दे.", इस बात पर जहाँ शंकर, उमेद और नरिंदर ख़ुशी से बहार चल दिए वही संजीव फ़ोन की घंटी सुन्न कर उधर लपका. धर्मवीर जी ने हाथ जोड़े तोह शास्त्री जी ने हाथ अपने हाथो में पकड़ लिए.

"आपका आदेश है तोह जरूर लेकिन वह हम प्रमोद शास्त्री और आपके मित्र स्वरुप आएंगे, सतीश भाई के साथ पंडित जी हमको घर से हे ले लेंगे.", उन्होंने अपने लपेटे में पंडित जी को भी लिया तोह बाकी दोनों खुश हो गए.

"चलिए अगर ऐसा है तोह आज की ये शाम हम भी शामिल होंगे. अगले 5 दिन आप सभी 3 समय यही हमारे साथ रहेंगे.", ये 4 लोग इस तरह बातें करते हुए बहार निकल चले और Madhu-Renuka भी उठ कर पिछली तरफ.

"ोये, तू बता दिया कर की कोई काण्ड हुआ है? अभी ये लकी का फ़ोन था और वो कौन थे जिन्हे तू वैसे हे छोड़ रहा था? चल अब शादी से पहले मैं थोड़े हाथ सेक लू. सफारी बहार हे है तोह वही स्टार्ट कर, मैं आया तैयार हो कर.", अर्जुन अपने भाई की बात सुन्न कर समझ चूका था के ये बागड़ी वाला हे मामला है.

"लकी भैया भी न... ऐसा तोह कुछ मसला भी नहीं था भैया."

"चल तोह सही फिर देखते है की असलियत क्या है. घर पे बोल दे की हम मार्किट से हे लंच करके आएंगे.", संजीव भैया अर्जुन के कंधे पर बन्दूक तान कर हँसते हुए चले गए और अर्जुन भी क्या जवाब देता.

'सही कहा है किसी ने की छोटे हो तोह छोटे क्यों हो और बड़े हो तोह बड़े क्यों.', बुदबुदाता हुआ अर्जुन बहार की तरफ चल दिया लेकिन आँगन में अपने सामने आसमानी कुर्ती और सफ़ेद झल्लर वाली सलवार में pur-kashish प्रीती को देख वही ठिठक गया. बगीचे से आगे जहा 4 दादा खड़े थे वही गलियारे के पास उसके papa-chacha. शायद इसलिए हे प्रीती इस तरफ से आ रही थी लेकिन इस उजाले में उसका ये खिला हुआ स्वरुप और वही पानी से neeli-hari आँखें देख वो भूल चूका था की उसको भैया ने कुछ काम भी कहा है.

'अर्जुन.. सब यही है. वैसे मैं तुम्हे हे बुलाने आ रही थी.' प्रीती ने हलकी शर्म से नजरे हिलाते हुए अर्जुन से धीमी आवाज में कहा तोह वो बस होंठ हिला कर रह गया. आवाज जैसे अस्तित्व में हे नहीं थी. क्यों आज वो प्रीती को इस तरह देख कर खो गया था? ये कैसी अनियंत्रित सी चाहत हुई थी जो वो इतना खो गया.

"अर्जुन, मुझे मार्किट चलना है.", इस बार अर्जुन की चेतना लौटी और लड़खड़ाती जुबान से बोल उठा.

"हाँ तोह चलो.. जहा भी तुम कहो हम चलते है.", अर्जुन का गाला खुश्क हो चूका था और बिना किसी की तरफ देखे वो प्रीती से एक कदम आगे चलता अपनी काली कार तक आ पंहुचा. उधर संजीव भैया भी आ चुके थे लेकिन इन दोनों को देख वो बस मुस्कुरा भर दिए.

"अर्जुन, मैं इन्दर चाचा के साथ जा रहा हु. तुम्हे कही जाना है?", भैया की बात सुन्न कर और इतने लोगो को देख अर्जुन सेहम सा गया.

"भैया, एक्चुअली मुझे जाना था और अगर अर्जुन फ्री है तोह क्या मैं इसको साथ ले जाऊ?", अर्जुन की हालत देख कर प्रीती ने हे हिम्मतत दिखाई और इस बार शंकर जी के साथ उमेद जी के भी चेहरे पर मुस्कान थी.

"हाँ जाओ तुम लोग जहा जाना बस कार ध्यान से चलना अर्जुन.", ये हिदायत पंडित जी की तरफ से आयी थी जो बड़े सांगवान जी और छोल साहब के साथ अंदर आ रहे थे. अर्जुन तुरंत कार का दरवाजा प्रीती के लिए खोलने के बाद अपनी तरफ से स्टीयरिंग के पीछे जा बैठा. हालत अभी भी ठीक नहीं थी और बाकी सभी हंस रहे थे जैसे वो अभी दिख रहा था.

'हुआ क्या है तुम्हे? बहार तोह चलो मैं बताती हु तुम्हे, फत्तू कही के.' प्रीती की घुड़की सुन्न कर अर्जुन ने गहरी सांस भरी और फिर कुछ सहज होता कार पीछे की तरफ करते हुए घर से निकल चला.

"इसकी तोह हालत देख कर मुझे चिंता हो रही है भाई.", नरिंदर जी की बात सुन्न कर इतनी देर से शांत दीखते संजीव भैया भी हंस दिए.

"छोटा है न वो चाचा जी और शायद कुछ परेशां भी. आप चलो मेरे साथ मैं बताता हु वजह.", संजीव उन्हें लिए सफारी की तरफ बढ़ा तोह शंकर जी भी बिना निमंत्रण उमेद को लिए उनके साथ हो लिए.

"मैं भी तोह देखु कौनसी वजह है जिस से मेरा बीटा परेशां है.", अब संजीव फंस चूका था लेकिन जाना तोह था हे.

"चाचा जी, आप भी चलिए लेकिन पहले सबकुछ समझना और कोशिश करना की आपका गुस्सा बहार न निकले.", अब तोह शंकर जी ने खुद हे स्टीयरिंग संभल लिया था.

"चल फिर आज तू बिरयानी खिलाएगी इस बात पर. जुम्मा है और raja-gali में biryaani-rayeta खाना बनता है.", इस बार बाकी तीनो भी सहमत थे.

"दोने. बस बाकी सब मुझे देखने दीजिएगा. कमी लगे तोह मैं आपको नहीं रोकूंगा.", संजीव भी पिछली सीट पर इन्दर चाचा के साथ बैठ गया और ये 4 लोग भी निकल लिए जहा लकी अपनी हिरासत में बागड़ी को पकडे था. जाने आज बागड़ी घर से क्या सोच कर इस शहर में दाखिल हुआ था? जब यमराज हे भैंसे (सफारी) पर बैठ उसकी तरफ आ रहा था तोह अब उसका मालिक सिर्फ ऊपरवाला हे था.

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"यार अलका तुम सचमुच सही कह रही थी. जसलीन, ग्रुप्रीत और कीर्ति तोह हैं हे खूबसूरत लेकिन ये क्या बाला है?", ऊपर वाले कमरे में लगभग सभी सामान अपनी जगह रखवाने के बाद ये लड़कियां बिस्टेर के साथ साथ 4 कुर्सियों पर महफ़िल लगाए थी और ऋतू, आरती, विन्नी के साथ वह अफसाना के आते हे परिचय के बाद तारा अफसाना के बिलकुल करीब आ कड़ी हुई.

"हम कोई मुजससम्मा है क्या? आप खुद इतनी बेहतरीन और खूबसूरत है शायद इसलिए हमारी तारीफ कर रही है. हमे तोह ऋतू आप भी सबकी निस्बत सबसे हसीं नजर आयी लेकिन आप लोग हमे खजूर खिला रही.", अफसाना की आवाज सुन्न कर तारा हैरत से थोड़ी पीछे हुई और इस माँ की गुड़िया को बोलते देख इधर उधर देखने सी लग पड़ी.

"ये तोह बोलती भी ऐसे है की मेरा दिल अब कबि किसी लड़के पे नहीं आने वाला. प्रीती को तोह ये ऋतू हड़प गयी लेकिन तुम्हे मैं आरती की नहीं होने दूंगी. और अलका दूर हे रहना इस से.", तारा के ऐसे कथन पर जहाँ सभी हंसने लगी वही अफसाना खौफजदा सी ऋतू को मनुहारी आँखों से देखने लगी.

"ोये, थोड़ा सोच समझ कर बोलै कर यार. अफसाना के बारे में अलका के साथ आरती ने भी बताया था न की इसको ध्यान से रखना है? तुम परेशान मैट हो अफसाना, ये तारा दिल की बहोत प्यारी है बस हम लोग थोड़ा खुलकर रहते है. तुम जैसे चाहो वैसे रह सकती हो लेकिन इसने गलत भी नहीं कहा. तुम्हे संभल के रखना पड़ेगा जैसे प्रीती को रखना पड़ता है. गुरदीप, तुम्हारे साथ भी ये ऐसे हे रहती है क्या?", ऋतू ने बेधड़क अफसाना को अपने साथ एक तरफ लगते हुए बिस्टेर पर बैठ कर कहा तोह वह सिर्फ लड़कियों को देख अफसाना कुछ हद्द तक संयमित रही.

"हमने तोह डिग्री में इसकी आवाज हे यदा कड़ा सुनी है और वो भी आरती के साथ. लेकिन गलत तोह कुछ भी नहीं कहा तुमने ऋतू और जरा इस प्रीती से भी मिलवाओ हमको. जसलीन बता रही थी की उसने आज एक पारी देखि और मुझे लगा वो तुम्हे कह रही होगी. पर अब तोह ऐसा लगता है की शादी में हर तरफ गुणमें रखने पड़ेंगे जब इतना असला सिर्फ इस घर में हे मौजूद है.", आदतन गुरदीप ने जो मजाक शुरू किया तोह माहौल खुशनुमा हो गया. जसलीन तोह इनकी बातें सुन्न कर मुस्कुराती हुई प्रियंका दीदी के साथ कुछ अलग हे गुफ्तगू कर रही थी.

"आ तोह यही रही थी वो लेकिन पता नहीं कहा रह गयी. वैसे अफसाना तुम प्रीती के साथ साथ हिमानी से भी मिलना, ाचा लगेगा तुम्हे. हाँ ये ऋतू न मेरे से थोड़ी काम हे हैं.", अलका ने जैसे हे आँख मार कर कहा उसकी पीठ पर कोमल ने चपत लगा दी जो कीर्ति के साथ वेस्ट होते हुए भी इनकी बातें सुन्न रही थी.

"सब यही है अलका और sundar-bura जैसा कुछ भी नहीं होता. तुम सचमुच ख़ास हो और ऐसे हे कीर्ति और जसलीन भी. मुझसे पूछो तोह फिर माँ हे सबसे सुन्दर होगी लेकिन उनके लिए कोई और होगा. आप चारो अभी पूरे 10 दिन यही पर हो और बेफिक्र रहना क्योंकि ये सभी का घर है. मैं निचे खाने का बोल कर आती हु, तुम लोग बातें करो.", कोमल दीदी जाने से पहले अफसाना के गाल पर ऐसे हाथ फिर गयी जैसे कोई माँ या बड़ी बहिन अपने बचे या बेहद छोटी बहिन को ये कहे की तुम हिफाजत से हो.

"इन आप के साथ हम रह सकते है क्या? और गर मुमकिन हो तोह मिलवाये हमको भी प्रीती जी से.", अफसाना की मासूमियत देख ऋतू अब खुदको रोक हे न सकीय और उसका गुलाबी केसर रंगत का गाल चूम हे लिया. वो कुछ कहती उस से पहले हे ऋतू बोल उठी.

"तुम न प्रीती के साथ हे रहना जानेमन क्योंकि वह इनमे से कोई तुम्हे परेशान करने नहीं पहुंचेगा. और आप की जगह कोमल दीदी को दीदी और बाकी मैं, अलका, तारा और जो भी आने वाली हो उन्हें नाम से बुलाना. कुछ दिन अपनी उर्दू को बरकरार रखो लेकिन हम बराबर है तोह सिर्फ नाम. सॉरी, दिल कर रहा था इसलिए गाल चूम कर देखा की तुम सचमुच की हो. वैसे कुछ भी हो जाये अलका और तारा के पास मैट सोना और लगता है जसलीन भी नेक ख़याल नहीं रखती.", अफसाना इतना सुन्न कर बस लाल हो रही थी लेकिन मुस्कराहट के साथ.

"हाँ यार ऋतू सही सुना था तुम्हारे बारे में. लेकिन मेरा ख़याल है की मैं तुम्हारे साथ सोउ तोह ठीक रहेगा.", जसलीन के बोलते हे अलका ऋतू को देखने लगी.

"हाँ ये भी ठीक है. तुम्हारे साथ मुझे और प्रियंका दीदी और तारा को भी ाचा लगेगा. वो सब बाद में देखते है पहले मेरी ये बात ध्यान में रख लो. कोई भी अपने मैं को नहीं रोकेगा और जो भी चाहिए हो या तोह साफ़ बोलना या खुद हे ले लेना.", ऋतू ने एक ाचे मेजबान की तरह ये बात राखी थी की गुरदीप बोल उठी.

"मुझे न जोरो की भूख लगी है लेकिन खाने के साथ में मुझे मीठी लस्सी या फिर कुछ मिठाई जरूर चाहिए.", आरती और प्रियंका ने अपने सर पे हाथ रख लिया इस रेडियो की बात सुनते हे जहा सभी हंस दिए.

"चलो अब सबके लिए यही खाना लगेगा और जिसने भी फ्रेश होना है वो ये बगल वाला बाथरूम, बहार वाला और वो सामने की तरफ भी एक है, उसे कर ले. मैं बाई जी को बोल कर आती हु, 10 मिनट में लंच करते है. शाम को मार्किट चलने के लिए तैयार रहना.", ऋतू ने अपने साथ इशारे से तारा और अलका को लिया और मुस्कुराती हुई बहार निकल चली. Aarti-Priyanka की ये सभी ख़ास थी इसलिए उनका वही उनके पास होना जरुरी था. विन्नी दीदी बड़ी थी जिन्हे ऋतू पूरा मान देती थी.

"वैसे अलका की हाइट और फिगर देखा तुमने कीर्ति? यार कोमल तोह है हे अपनी पिंकी जैसी या थोड़ी ज्यादा हे लेकिन अलका किसी मॉडल से काम नहीं और जरा तारा की चमक देख. ये विन्नी दीदी भी मॉडल जैसी है लेकिन सबसे खतरनाक तोह ऋतू है जो हर लड़के को पिग्ला दे लेकिन कॉन्फिडेंस में कही कही अर्जुन से भी आगे.", जसलीन अब कही मुँह खोल रही थी और इस बीच गॉड में तकिया रखे अफसाना बड़े ध्यान से सब सुन्न रही थी.

"तुम्हे आये अभी कुछ घंटे हे हुए है जसलीन. अर्जुन को अर्जुन बनाने वाली कोमल है और निखारने वाली ऋतू. बुलेट चलती है, लड़को का गाल लाल करते हुए मिनट नहीं लगाती और सबसे जरुरी है की वो सबके साथ ऐसा व्यवहार करती है की वो ख़ास है. ऋतू है तोह अर्जुन है और कोमल वजह है उन दोनों के ऐसा मिलनसार होने की. नहीं तोह जितना खतरनाक बचपन में अर्जुन था उतना कोई बचा नहीं होता और जितनी ज़िद्दी ऋतू, उतनी तोह मैं खुद भी नहीं थी.", विन्नी दीदी के मुँह से ये सब सुनते हे कुछ पल तोह सभी हैरान रही लेकिन इसके बाद जो जसलीन और गुरदीप ने बारी बारी से बताया उसको सुन्न कर सभी हैरान हे रहे सिवाए विन्नी दीदी के. ये बातें शायद आपस में जसलीन और गुरदीप को भी पता न थी और अफसाना को तोह इल्म हे न था.

"अर्जुन ऐसे है?", अफसाना के मुँह से बस इतना हे निकला जब वो maar-dhaad वाली बात निकली.

"नहीं नहीं अफसाना. अर्जुन का दिल बहोत नाजुक है लेकिन सिर्फ खुदके लिए. बात अगर किसी बेबस की या किसी गलत से टकराने की हो तोह फिर वो kaam-kaaji नहीं रहता. बचपन से वो रूद्र बनता आ रहा है और तुम लोगो ने तोह वो सब नहीं देखा या सुना जो मुझे पता है. बात जब किसी उसके करीबी की आये तोह अर्जुन जैसे ठान हे लेता है की वो इंसान कभी अपने कदमो पर खड़ा हे न हो. जान नहीं लेता लेकिन कुछ बाकी भी नहीं रहने देता. पर बहोत मौके देता है ऐसा करने से पहले. खुद भी मार खा लेगा.", इसके बार विन्नी दीदी ने उन्हें स्टेडियम वाली बात, भीम का किस्सा और कुछ प्यारे घटनाक्रम भी सुनाये.

"मैं जरा फ्रेश हो कर आती हु फिर लंच करते है.", जसलीन के ऐसा कहते हे कीर्ति भी उठ कड़ी हुई और उनके साथ गुरदीप, आरती और प्रियंका भी.

"हम आते है दीदी.", इतना बोल कर वो लोग अगले हिस्से की तरफ चल दिए सिवाए जसलीन के जो अंदर वाले बाथरूम में गयी थी और दरवाजा बंद था.

"आप सबकुछ जानती है आपि?", अफसाना अभी तक पूरी आस्तीन के उस गुलाबी जारी वाले लिबास में थी और उसके मासूम चेहरे को देख विन्नी दीदी ने बड़े प्यार से उसका गाल सहलाया.

"कोशिश कर रही हु जैसे तुम. वैसे क्या सचमुच तुम पहली हे बार अपने घर से बहार आयी हो ऐसे अकेले? मेरा मतलब सिर्फ दोस्तों के साथ.", विन्नी ने अपनी दिल की कहने के साथ साथ ये सवाल अनजाने हे कर दिया.

"जी, लेकिन ऐसा नहीं है के हम पहले नजरबन्द थे. हमे इल्म था की यहाँ चाचा जी और दादा जी है आरती और प्रियंका आपि के साथ इसलिए आ गए. आपको बुरा तोह नहीं लगेगा न अगर हम आपके पास रहे? वो हमारी ज़ुबैदा बाजी भी आपके जैसी हे है, थोड़ी थोड़ी.", अफसाना की मासूमियत देख विन्नी दीदी ने बड़े प्यार से उसको अपनी एक तरफ लगा लिया. कुछ लम्हो में हे अफसाना की आत्मीयता और साफ़दिली ने अपना असर यहाँ की हर लड़की पर किया था. अब बस देखना था तोह वो पल जब प्रीती से उसकी मुलाकात होगी.

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"ऋतू, तैयार हो जाओ. तुम्हारे पापा बोल कर गए है की हमको तुम्हारे nana-naani के घर चलना है 3 बजे. रात का खाना वही करके वापिस आना है और रुपाली भी कोमल के साथ तैयारी में लगी है.", रेखा जी ने जब अपनी बेटी को दोनों काम करने वाली महिलाओ के साथ खाना ऊपर ले जाते देखा तोह कहा.

"माँ, आपके साथ वह मंजू, मेनका दीदी और रुपाली जा रहे है. मैं और दीदी यही पर है क्योंकि अभी भी काम बाकी है. मेहमान भी आये हुए है. वैसे डिनर करके आना है तोह बुआ और फूफाजी को भी ले जाओ, हिमांशु के साथ साथ.", वही पर मधु बुआ भी कड़ी थी और ऋतू की बात सुन्न कर वो भी तुरंत मान गयी.

"सही है भाभी. चलते है आपके घर और ये दोनों भी वह चल कर मिल लेंगे सब से.", मधु बुआ की बात पर ऋतू ने आँख मार दी जैसे वो उनकी राजदार या करीबी हो.

"ये भी सही है मधु और तुम खाने के बाद मेरे कमरे में आ जाना. तुम्हारे लिए एक साड़ी ललिता दीदी और मैंने पसंद की थी, देख लो.", रेखा जी भी जैसे अकेले नहीं जाना चाहती थी क्योंकि Manju-Menaka तोह 2 दिन वही रुकने वाली थी अभी.

"हाँ मामी, ी वांट तो जो समवेयर अवे फ्रॉम थी क्राउड एंड हसल न बोस्टल. स्माइल.", हिमांशु ने ऐसा कहते हे सबकी तस्वीर निकाल ली. रेखा जी वापिस रओसीघर में जाने से पहले अपने साथ हिमांशु को भी ले गयी जो shakkar-ghee के साथ रोटी खाने की इत्छा जाता रहा था.

"रात हम देरी से आएंगे ऋतू.", मधु बुआ ने अपनी माँ की तरफ जाने से पहले जब ऐसा कहा तोह ऋतू ने उड़ता चुंबंन दे दिया.

"इत्मीनान से जाए बुआ और आपको नानी भी याद कर रही थी."

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"अबे लोदु तू सरपंच है? उमेद इस भोसड़ीवाले को याद है हमने कब धोया था?", यहाँ संजीव जब लकी अरोरा के पास आया तोह इस महफूज जगह के बहार वही जीप कड़ी थी और गलियारे में 15-20 लोग खड़े थे जो शायद अनिल बागड़ी की तरफ से थे. एक अधेड़ सा आदमी कुछ ज्यादा हे चिल्ला रहा था जिसको देख कर शंकर वही रुक गया. संजीव अपने साथ नरिंदर जी को ले कर लॉकअप वाली जगह बढ़ चूका था.

"परताप सिंह नाम है मेरा शंकर. तू पहले भी बेहूदा था और आज भी वैसा हे है. उमेद भाई, इस से कहो की मेरे मुँह न लगे और मेरा लौंडा यहाँ कुछ बेवकूफ चूतिये उठा लाये है जिसको ले कर मैं निकल जाऊंगा.", परताप सिंह की safed-kaali घनी मूछे बता रही थी की उसका भी अपनी तरफ कुछ नाम जरूर था लेकिन कितना बड़ा वो अभी पता लग्न बाकि था.

"देख भाई बागड़ी, तेरे बेटे से अपना कुछ लेना देना नहीं और जो अभी यहाँ से गया है वो मेरा भतीजा है. चल साथ.", उमेद ने बाकी सभी को दरकिनार करते हुए इस व्यक्ति को अपने साथ लिया और वही चल दिया जहा संजीव और नरिंदर गए थे. निचे तोह मामला कुछ उलट हे था परताप की उम्मीद से. उसके बेटे को जंजीर से लटकाया हुआ था और उसके 4 दोस्त औंधे मुँह जमीन पर पड़े थे.

"अबे थानेदार, तेरी माँ की साले. मेरे बेटे की ऐसी हालत का जवाब और हिसाब देना पड़ेगा तुझे.", लकी अरोरा इस आवाज को दरकिनार करता जब संजीव को कुछ समझने लगा तोह परताप सिंह ने उसकी कलाई पकड़ ली.

"देखो, आप जो भी हो ये मामला संगीन है. आपके बेटे ने सरे राह 4 लड़कियों की िज्जात्त पर हाथ डालने की कोशिश करने के साथ साथ उन्हें धमकया, बचने वाले के साथ बुरा व्यवहार किया और मार्किट वालो को भी हड़काया. मेरा हाथ पकड़ने से कुछ नहीं होगा और ये सब सी अजमेर सिंह की रिपोर्ट से बता रहा हु.", लकी अरोरा के स्वर से कही भी ऐसा नहीं लगा था के उसको अपने ओहदे का गुमान है.

"और कौन थी वो लड़कियां? कौन था लड़का?", परताप सिंह ने अपने कुर्ते की आस्तीन चढ़ाते हुए थोड़ा ऊँची आवाज में कहा.

"मैं सरपंच हु लेकिन पहुंच मेरी भजन जी के प् तक है. मेरा भाई भी थानेदार है.", आगे बात पूरी करते हुए वो अपने बेटे की तरफ देखने लगा.

"लड़कियां इनकी मेहमान थी और वो लड़का श्रीमान शंकर शर्मा जी का बीटा. बाकी रिपोर्टिंग अफसर है संजीव Sharma,SP इस जगह के.", लकी अरोरा का इतना बोलना था की उमेद की बोहेन चढ़ गयी. जानबूझ कर लकी ने संजीव को आगे किया था, जो असलियत में इस डिपार्टमेंट का था भी नहीं.

"तेरी माँ की छूट मारु भोस्डिके. मेरे बेटे पर इसने हाथ डाला और साला कुछ खबर भी नहीं.", गर्जना सुन्न कर सबकी फट गयी थी. गज्जू का मतलब हे हाथी था जो आज पता चला लेकिन उमेद ने इतनी देर में वो चारो लड़के लातो से थोक दिए थे और अब वो लॉकअप के अंदर बंद अनिल की तरफ चल रहा था.

"माफ़ करदे शंकर. इसको रोक ले भाई, मेरा एक हे बीटा है.", यहाँ प्रताप गिड़गिड़ा रहा था वही उमेद के पीछे नरिंदर भी जा चूका था.

"तुमने देरी कर दी बागड़ी. ये बात ऊपर हे बोल देते तोह इन्हे मैं यहाँ नहीं आने देता. मेरा बीटा उन दोनों का बीटा ज्यादा है और सच कहु तोह तुम्हारी माँ जान बूझ कर चौड़ी गयी. मेरा बीटा तेरे 20 लोंदे थोक कर 10 मिनट में गायब हो जाए लेकिन जो अभी हो रहा है वो शायद कुछ ख़ास है.", यहाँ तोह सब उल्टा हो रहा था. शंकर बर्फ की मञिंदा शांत और उधर बागड़ी के बेटे पर उमेद के चांटे पड़ रहे थे.

"मैं अभी से तुम्हारी शरण में हु शंकर भाई. इन्हे रोक दो बस."

"ऐ, निकालो उसको बहार. गज्जू, आजा इधर और परताप के साथ साथ बाकी 18 सरपंच भी तेरे हुए.", शंकर के ऐसा कहते हे माहौल शांत हो गया. जहा ये सभी एकत्रित हुए वही अनिल बागड़ी के साथ उसके दोस्तों को भी आखिरी वार्निंग दे कर ऊपर वाले ताल पर भेज दिया गया.

"सुन्न. करना तोह कुछ ऐसा हे चाहते थे लेकिन तेरे लड़के ने गलती करके ये मौका खुद हे दे दिया. ये उमेद न अब सचिव बनेगा जिसके लिए चाहिए पूर्ण बहुमत. तेरे दोस्त है 8 सरपंच और बाकी 10 तू बना नहीं तोह इस बार न हवालात होगी और न इतना शांत जल्लाद. रही बात मेरे बेटे की तोह वो इतनी बकवास नहीं करेगा. फिर भी बचा के रखना अपने कपूत को क्योंकि अगर उसकी नजरो में ये आ चूका है तोह मतलब मेरा बीटा घर में शादी की वजह से रुक गया.", शंकर की चेतावनी सुन्न कर परताप अभी सम्भला भी नहीं था की संजीव गुर्रा उठा.

"आप जो भी हो, जहा के भी दयावान हो लेकिन ये बात है मेरे भाई की. माफ़ी मांगने के लिए अपने बेटे को तैयार रखना और मुझे इस राजनीति से कोई वास्ता नहीं. 18 सरपंच जमीन में गाड़ कर भी चुनाव जितवा दूंगा लेकिन मैं और मेरा भाई आपके गाँव आएंगे, मेरी शादी के अगले दिन. चलो चाचा जी, क्लीन चित नहीं दी है अभी.", संजीव के तेवर देख बाकी सभी सकते में थे क्योंकि हमेशा एक वही था जो दिमाग से काम लेता था लेकिन आज वो व्यथित था और शंकर जी समझ गए की बात पूरी जरूर करेगा और ऐसा न हुआ तोह काम खराब.

"सोचना मैट बागड़ी, अब करना है तुम्हे. हफ्ते बाद मैं खुद भी इनके साथ आऊंगा और संजीव को गोली चलने का पूरा लाइसेंस है किसी भी दोषी पर.", पूरी तरह से बागड़ी की फाड़ कर ये तीनो संजीव वाली दिशा में बढ़ चले. ये अकस्मात हे हो रहा था जो Umed-Shankar चाह रहे थे लेकिन उन्हें बहोत कुछ नया भी दिख रहा था इस बीच. आज उन्होंने ठंडा अर्जुन और गरम संजीव देखे थे इसका मतलब वो अभी भी कुछ ज्यादा नहीं जानते.

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"अभी कुछ वक़्त पहले तुम मुझे ऐसे क्यों देख रहे थे? फिर परेशां भी हो गए जैसे पहली बार सबने हमे एकसाथ देखा हो.", प्रीती ने सबसे पहले कद प्लेयर बंद किया और फिर अर्जुन का गियर पर रखा हाथ थामते हुए बड़े प्यार से पुछा. उसकी नजरो को अपने चेहरे पर महसूस करते हे अर्जुन भी हलके से मुस्कुराया.

"पता नहीं क्या हुआ था जब तुम एकदम से सामने आ रुकी. ऐसा लगा था जैसे मैं तुमसे बस आज हे मिला हु असलियत में और उस से पहले बस तुम्हारे ख्वाब हे देखता था. फिर सबको हमारी तरफ देखते हुए लगा की जैसी मेरी चोरी पकड़ी गयी हो. भूल गया था के तुम मेरी हो और उन सभी ने तोह हमारा रिश्ता पक्का किया था. कुछ समय से मुझे ऐसा लग रहा है जैसे तुम्हारे जाने के बाद क्या मैं इतना खुश रह सकूंगा. हफ्ते के 5 दिन तोह बहोत दूर की बात है, एक दिन भी तुम्हारे बिना जीना मुश्किल न हो जाए.", अर्जुन ने प्रीती का हाथ अपने दिल पर रखते हुए उसको अपने करीब कर लिया था. कार अब कुछ धीमी गति से सीढ़ी चल रही थी.

"जानती हु की हमे कुछ परेशानी होगी लेकिन मैं सिर्फ बहार हे नहीं हु. जहा ये हाथ रखा है न तुमने, वह भी मैं हे हु जान. और कॉलेज तोह तुमने भी जाना है इस क्लास के एक साल बाद. जगह अलग होने से हम दूर नहीं होंगे, फांसले दिल के होते है जो हमारा एक है. उमाह.", प्रीती ने हलके से अपने गुलाबी होंठो से अर्जुन का गाल चूम कर खुद को सही किया तोह अर्जुन भी मुस्कुराया.

"वैसे हम जा कहा रहे है?", अर्जुन ने फिर से हाथ थाम लिया था अपनी प्रेमिका का.

"तुम्हे अकेले काम नहीं करने देना. दादी जी ने बताया था की पहले कपडे वाली जगह पता करू की सबकी ड्रेसेस का क्या हाल है. फिर गहने भी पता करने है और वापिस जाते हुए मॉडल टाउन से अप्सरा पार्लर पर बोलना है की वो परसो से घर पे ठीक टाइम आने लगे. हाँ इस बीच तुम मुझे एअर रिंग्स दिलवा सकते हो अगर दिल करे तोह.", प्रीती की डिमांड सुन्न कर अर्जुन ने अपना बताऊ उठा कर उसकी हथेली पर रख दिया.

"जाओ मैं तुमसे बात नहीं करती. पैसे मेरे पास भी है लेकिन मैंने तुम्हारी पसंद की बात की थी. वैसे ये सब सामान भी लेना है और इसके पैसे अब तुम्हारी हे जेब से जाएंगे, दादी वाले मैं खुद रखूंगी.", प्रीती की नौटंकी पर अर्जुन ने हलके से उसके सर हाथ फिराया और कार मार्किट में वही रोक दी जहा विवाह के गहने bann-ne दिए गए थे.

"वो पैसे भी दादी के हे है डार्लिंग और glove-box में और भी रखे है जो बैंक से निकलवाए थे. वैसे ये लिस्ट किस चीज की है?", अर्जुन ने कार सही से लगाने के बाद बहार निकल कर प्रीती के लिए दरवाजा खोलने के साथ साथ उसका दुपट्टा भी जमीन पर लगने से बचाया जिसको आँखों से हे शुक्रिया कहते हुए प्रीती ने ठीक किया और अर्जुन का हाथ पकड़ कर इस बड़ी दूकान की तरफ चलने लगी.

"इसमें वही सब लिखा है जो श्रृंगार और रस्मो में उसे होगा. मेहंदी, हल्दी, कुछ नए bartan-kalash, साफ़ कपडे और ये पता नहीं क्या क्या है. बस ये पता है की सब सामान पोशाक वाले लाला जी मंगवा देंगे जब हम उनकी दूकान पर जाएंगे.", प्रीती से पहले अर्जुन ने दूकान में कदम रखा लेकिन काउंटर के दूसरी तरफ बैठे व्यक्ति ने पहले प्रीती का अभिवादन किया और फिर अर्जुन का लेकिन गौर से देखते हुए.

"अंकल जी, दादी जी ने कहा था की आपने सब तैयार करवा दिया है?", प्रीती उस gaddi-dar मुद्दे पर बैठी और एक लड़का 2 लम्बे कांच के गिलास में ठंडा पानी लिए आ गया.

"है बिटिया सब गहने और चूड़ियां तोह रेडी है लेकिन एक kundan-haar मधु बहिन ने थोड़े समय पहले हे आर्डर किया है जो परसो तक मिलेगा. वैसे मैंने आपको पहले भी देखा है बीटा.", लड़के को सब सामान लाने का बोल कर ये जनाब अर्जुन से मुखातिब हुए.

"अंकल, ये नोसेपिन जो प्रीती ने पहनी है वो याद है? हम दोनों आये थे आपके पास और उसके बाद मैं ये पेंडंट भी लेके गया था?", अर्जुन की बात पर सुनार ने सर हाँ में हिलाया लेकिन जैसे अभी वो कुछ और भी सोच रहा था.

"हाँ याद आ गया बीटा. वैसे तुम..

"ये अर्जुन शर्मा है, डॉक्टर अंकल के बेटे और मेरे..", अभी प्रीती ने इतना कहा तोह वो दुकानदार बीच में हे बोल उठा.

"हाँ भाई याद आ गया, याद आ गया. पहले तुमने परिचय नहीं दिया था और मैं हमेशा चेहरा याद करने की कोशिश करता था.", सुनार की आँखों में अब अर्जुन के प्रति स्नेह के साथ साथ खासी इजत्त भी नजर आ रही थी.

"पेमेंट अंकल जी.", अर्जुन ने बात ख़तम करते हुए मुद्दे की बात की और प्रीती सभी गहने ध्यान से जांच रही थी.

"वो हो चुकी है बीटा और जो बाकी होगा वो हम माता जी से बात कर लेंगे.", अर्जुन ने अब आगे कुछ नहीं कहा और वो भी प्रीती की तरफ देखते हुए गहनों पर गौर करने लगा. दादी ने सचमुच कुछ ज्यादा हे खर्चा किया था जो 13-14 चौकोर डिब्बे थे haar-chain के. प्रीती ने एक और पर्ची निकाल कर पेन से सभी गहनों का मिलान किया और गर्दन हिला कर सबकुछ पैक करने का मूक आदेश दिया.

"बड़ी समझदार हो गयी हो तुम तोह. इतना चेक मैं तोह नहीं करता अगर अकेला आता तोह."

"इसलिए मैं आयी हु लेकिन तुम्हे भी ये सब करना चाहिए. चलो अब फालूदा खिलाओ यहाँ से निकलते हे. आज लंच के लिए घर जाने में देरी होने वाली है."

"सचमुच हे बिल्ली हो तुम. चलो और अपने शेड्स (धुप का चश्मा) पहन लो. धुप भी है बहार.", सब सामान एक चैन वाले बैग में बंद हो चूका था और उसको लिए अर्जुन प्रीती के साथ उस तरफ चल दिया जहा वो चाहती थी. अगले 15 मिनट अर्जुन बस प्रीती की ख़ूबसूरती और उसको फालूदा खाते हे देख कर मुस्कुराता रहा.

"हो गया हो तोह अब चले यहाँ से मर मजनू. शर्म भी नहीं आती कैसे घूर रहे हो.", प्रीती की यही अदा तोह ख़ास थी जिसमे उसकी नौटंकी और प्यार भरपूर नजर आता था. अर्जुन ने थोड़ा करीब आते हुए उसके होंठो पर बानी दूध की बूँद को ऊँगली से साफ़ करने के बाद टिश्यू से हाथ सही किया और बस इन कुछ लम्हो में दोनों की हालत अब विपरीत हो चुकी थी.

"बस.. चलो यहाँ से..", प्रीती नजरे चुराती हुई शर्मा रही थी और अर्जुन लहराता हुआ उसके साथ साथ चलते हुए हंसने लगा. शादी के काम करना इतना खुशनुमा भी हो सकता है ये अर्जुन ने अब जाना था.

"वैसे मैं क्या कह रहा था मानो (बिल्ली), तुम न जिस तरह से फालूदा खा रही थी मुझे तोह कुछ अलग हे लग रहा था."

"छी.. गंदे कही के. मैं देख रही थी तुम्हे और अब ऐसी वैसी कोई बात नहीं करना.", मैं हे मैं प्रीती को भी ये पल और अर्जुन का साथ रास आ रहा था लेकिन nari-sulabh वो शर्मा ज्यादा रही थी. इस वक़्त उसके गोर चेहरे पर वो गहरा चस्मा कुछ ज्यादा हे क़यामत ध रहा था. कुछ लड़के बड़ी हसरत से इस चलती फिरती आग की तपिश में झुलस रहे थे लेकिन वो भी देख रहे थे की जो लड़का उसके साथ है वो यकीनन उसका प्रेमी है.

'भाई की किस्मत बहोत सुथरी है रे. ऐसी छोरी मैंने मिल जाए तोह बस घर से बहार हे न जान दू.', एक लड़के ने अपने साथी से ये कहा जब अर्जुन प्रीती उनके करीब से गुजरते हुए लाला की दूकान में जाने लगे. अर्जुन उनकी तरफ देख मुस्कुराया और अंदर चला गया.

"भाई, खागड (सांड) भी सुथरा है उस पटोले के साथ. तेरे मेरे से तोह एक हाथ ुचा होगा और चौड़ा भी. व उसके साथ हे ाची दिखे है, चाल गाम जाने का टेम हो गया, बस लिकड़ जेगी.", उसके दोस्त ने ये सब कहा तोह दोनों लड़के अपने रस्ते हो लिए.

"बीटा तुमने कपडे नहीं लेने क्या?", इन लाला जी ने अर्जुन को देखा तोह पहला सवाल यही किया और जवाब प्रीती ने दिया.

"इनकी शॉपिंग कल होगी अंकल जी और वैसे भी कुरता पायजामा हे पहनेंगे.", प्रीती अब मजे ले रही थी और साथ साथ वो blouse-choli के साथ साथ पुरुषो वाले कोट पंत भी देख रही थी जो शंकर जी आदि के थे और तैयार भी.

"हाहाहा.. सच कहु तोह इसके ऊपर जंचेगा भी बहुत. बीटा तुम विवाह के समय 2 ड्रेस तैयार करवाओ. एक पठानी कुरता और फिटिंग वाला पायजामा, मोजरी के साथ और एक गहरा टुक्सेडो. यही कहते है न मुरारी उस नए फैशन के पंत कोट को जिसमे वेस्ट भी शामिल होती है?", लाला की बात सुन्न कर उसके बेटे ने भी हाँ भरी और तुरंत हे उस पुतले की तरफ इशारा किया जहा कैसा हुआ 3 पीेछे कटपंत था बाउ के साथ और सफ़ेद कमीज.

"वाओ.. ये परफेक्ट है अंकल जी लेकिन गर्मिया है तोह क्या ऐसा हो सकता है की यही शर्ट, पंत, बेल्ट और शूज मिल जाए.?", प्रीती ने बड़े ध्यान से उस पोषक को हाथ लगा कर देखते हुए पुछा था. अर्जुन को ऐसा हे कुछ पसंद था लेकिन वो यहाँ प्रीती के हे दिल की चाहता था.

"हाँ हाँ बीटा जी क्यों नहीं हो सकता. ऐसा करो तुम कल आ जाओ, शनिवार है और कुछ बेहतर कपडा भी आ जायेगा. टेलर मास्टर जी 2 दिन में सब त्यार कर देंगे.", लाला जी यहाँ सब बता रहे थे और इस बीच सबकुछ पैक हो चूका था.

"ठीक है अंकल जी हम कल आ जायेंगे और ये सामान भी दादी जी ने मंगवाने का बोलै है तोह कल हे ले लेंगे.", अर्जुन अब मुरारी के साथ कुर्ते के विभिन्न प्रकार देख रहा था और प्रीती ने वो लिस्ट लाला जी को पकड़ा दी जो दादी ने दी थी. यहाँ का काम जल्द हे हो गया था और अब अर्जुन पूरी तरह बोझा धोता मजदूर लग रहा था 'पोषक' दूकान से निकल कर.

सबकुछ कार की डिक्की में रखने के बाद अर्जुन ने सवालियां नजरो से धुप में गुलाबी होती प्रीती को देखा तोह वो चस्मा उतार कर नजरो से हे पूछने लगी की वो क्या कह रहा है. जवाब में अर्जुन ने अपने कान को ऊँगली और अंगूठे से दबा कर इशारा किया तोह प्रीती की दिलकश मुस्कान ने समा कही ज्यादा हसीं कर दिया

"वैसे हम कल भी ले सकते है.", प्रीती ने थोड़ा झिझकते हुए कहा था लेकिन अर्जुन ने प्रतिउत्तर में उसका हाथ बड़े प्यार से थाम लिया.

"तुम्हारे साथ समय बड़ी मुश्किल से मिलता है जान. आज भी कुछ पसंद कर लो और कल तोह है हे हमारा.", अर्जुन जिस कल की बात कर रहा था वो प्रीती समझ कर बड़ी चंचलता से मदद कर उसको खींचती हुई दूसरी तरफ चल दी जहा उसकी पसंद की दुकाने मौजूद थी. अर्जुन भी इस प्रेम डोर में बंधा खुद को प्रीती के हवाले कर चूका था. ये प्रेम के वो अनमोल पल थे जिन्हे हर युगल हमेशा सहेज कर रखना चाहता है.

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महल सरीखी इस इमारत के बेहद हे शानदार और शाही हॉल में 20 व्यक्तियों की लम्बी टेबल पर सिर्फ 2 हे लोग विराजमान थे. राज्यवर्धन सिंह और उसका बड़ा भाई कुमार सारंग. दोपहर का भोजन yada-kada हे यहाँ होता था, व्यापार और अन्य कार्यो की वजह से. कुछ समय तक माहौल शांत रहा और एकाएक राज्यवर्धन ने अपने स्वर्णिम थाली एक तरफ सरका दी. चेहरे पर जैसे हार के निशाँ थे और गुस्से की पूर्ण झलक.

"हमने पहले हे चेताया था तुम्हे राज. भोजन पर गुस्सा होने की जगह इसको ग्रहण करो और फिर सोचो की एक असली राजा कैसे काम करता है. तुम्हारी पसंद का लाल मांस बना है और ये हांडी बटेर भी लजीज है.", सारंग खामोश तबियत से बिना क्रोधित हुए भोजन करते हुए अपने भाई को उसकी गलती समझा रहा था. कुछ पल खामोश रहने के बाद राज्यवर्धन ने एक घूँट पानी का पी कर बात शुरू की.

"माफ़ कर दीजिये भाई साहब, मुझे आपकी बात को गहराई से समझना चाहिए था. आप कभी भी किसी की प्रशंशा नहीं करते लेकिन आपने आगाह किया था की शंकर एक जानवर सरीखा व्यक्ति है. लेकिन जाने वो कैसा जानवर है जो अपने से बड़े बड़े दर्जन गुर्गो को सोच से ज्यादा बेहरमी से काट गया?", राज्यवर्धन को कंट्री फार्म वाले किस्से का पता कुछ घंटे पहले हे लगा था. वह से एक व्यक्ति ज़िंदा बच गया था जिसने विस्तार से रात का वो खौफनाक मंजर यहाँ बताया था.

"हमने पहले हे बताया था और सच कहे तोह शंकर, उमेद या इंदरजीत को 20-50 आदमी नहीं मार सकते अगर वो लोग एक साथ हो. दूर से गोली मारना हमारी हस्ती से इन्साफ नहीं करता इसलिए हमने तुम्हे यहाँ बुलवाया था. हम जानते थे की कल वो सब होगा लेकिन कपूर के जाने से हमारा करोडो का नुक्सान हुआ है और ये सब हम सूद समेत वसूल करेंगे. खैर ऐसी sheh-maat तोह चलती हे रहेगी राज लेकिन ये बाजी जल्दबाजी में मत देखो.", सारंग ने एक बोटी को बड़ी नजाकत से छुरी कांटे से काट कर कुछ हिस्सा चबाया और राज्यवर्धन की तरफ नजरे की.

"तोह भाई साहब किस तरह इस sheh-maat के खेल का भागिदार बनु? ऐसे तोह वो लोग उस तरफ हमारी दखल होने नहीं देंगे और इधर रह कर तोह हम बस वही कर सकते है जो कर रहे है. आपका हरयाणा, हिमाचल और पंजाब वाला सपना कैसे पूरा होगा कारोबार बढ़ने का? और अगर ऐसा करना है तोह कोई तगड़ी चोट तोह रामेश्वर के पर...", बात सारंग की आग उगलती नजरो से बीच में हे रह गयी राज्यवर्धन के मुँह में. गुस्ताखी जो कर दी थी उसने.

"हम कितनी बार याद दिलवाये तुम्हे राज? उनका नाम अगर लेना हो तोह 'जी' जरूर लगाना साथ में. पंडित रामेश्वर जी है वो और हमने उनकी शरण में सेंकडो सुखद पल बिताये है जैसे तुम हमारी छाया में आज तक जी रहे हो. हम आज भी उनकी देहलीज पर जा खड़े हो तोह वो गोली की जगह गले से हमारा स्वागत करेंगे क्योंकि रंजिश या दुश्मनी घर से बहार राखी जाती है.", इस बार सारंग गहरी सांस ले कर खुद को शांत कर रहा था और उसके भाई का सर शर्मिंदगी से झुका था.

"बस ध्यान रखना राज. आप हमारे अनुज (छोटे) है और जितना ये सबकुछ हमारा है उतना हे आपका भी. आचरण और व्यक्तित्व बरकरार रखना हमने रामेश्वर जी से हे सीखा है नहीं तोह हमारी बहिन और दोस्त के जीवन का नाश करने वाली उस do-muhi लाजो और उसके भाई को ज़िंदा दफ़न कर देते. औरत पर हम हाथ नहीं उठाते और अपने भाई की जान उसने महफूज राखी हमारी कमजोरी दबा कर. हो सके तोह तुम भी रामेश्वर जी के परिवार की किसी भी महिला या बची से अभद्रता मैट करना.", सारंग कहते कहते कुछ विचारो में खो सा गया था और उसकी हालत देख राज्यवर्धन ने हे ये शान्ति भांग की.

"उसका भाई तोह मरवा नहीं दिया था आपने भैया? और क्या आपकी वो कमजोरी आज भी लाजो के पास है?"

"वैश्य के भाई नहीं होते कुंवर सा. हमारी माता जी से बस यही एक गलती हुई थी जीवन में जो उन्होंने लाजो को सेविका बनाया. आज वो देखने को बेबस, बेसहारा जरूर दिखती होगी लेकिन उस से शातिर महिला हमने अपने जीवनकाल में नहीं देखि. और मनीराम को उसने धरती के किस कोने में छिपाया है ये हम पता लगाने में विफल रहे है. रामेश्वर जी फिर भी एक शेर है जो हमेशा सामने खड़े होने में विश्वास रखते है लेकिन लाजो वो मकड़ी है जिसके जाल का तब तक नहीं पता चलता जबतक आप उसके जाल में फंस कर बेबस न हो जाए.", अभी भी सारंग जैसे अतीत की खिड़की में देख कर बोल रहा था.

"मतलब उसने कुछ ऐसा भी किया है जिसका हमको संज्ञान नहीं भाई साहब? कही उसकी हे वजह से तोह हम.."

"हाँ राज और उसने जो जाल बना था वो इतनी दूर का सोच कर बना था की हम उसमे तब फंसे जब खुद हमारे बचे बड़े हो रहे थे. परिणाम तुम्हारे सामने हे है जो आज हम नानी माँ के साम्राज्य पर आसीन है. हमने जवानी के जोश में होश खोया था और परिणाम तुम्हारे सामने है. न बड़ी माँ के साथ वो दुर्घटना होती और न सब बिखरता. गलतियां इंसान से हे होती है लेकिन सबसे ज्यादा तब होती है जब आप किसी शातिर महिला या युवती के साथ हमबिस्तर होने पर उसके षड़यंत्र में शामिल हो जाओ और आपको खुद पता भी न हो. जानते हो लाजो उस वक़्त 14 बरस की थी और मनीराम 16 का. वो दोनों छोटी माँ को कब्ज़ा कर उस छोटी सी उम्र में हमारा भी शिकार कर गए.", सारंग के लफ्ज़ो में एक सच्चा पछतावा था परन्तु तुरंत हे वो चेहरा हमेशा की तरह सख्त हो गया.

"राज, अब समय लगाओ और सिर्फ रामेश्वर जी की ताक़त और उनके बेटो की कमजोरी का पता लगाओ. ध्यान रखना की इस शतरंज में हमले की कोशिश नहीं करनी सिर्फ घेराव करना है. 4-5 बार मात भी मिले तोह सेह लेना लेकिन जहा घेरा पूरा कैसा हो वह वो व्यक्ति ऐसी मौत मरना चाहिए की दूसरी तरफ से राजा खुद सामने आये. हमे बस एक बार रामेश्वर जी की चुप्पी तोड़नी है. भरे हुए तोह वो भी बैठे है बरसो से लेकिन उनकी शान्ति तभी भांग होगी जब उनका कोई सबसे अजीज हमारे हाथो यमपुरी जाए. और ऐसा व्यक्ति है शंकर, जिसका तांडव तुम खुद सुन्न हे चुके हो.", सारंग ने जिस तरह से नाम लिया था राज्यवर्धन के चेहरे पर घिनौनी मुस्कान आ गयी.

"उसकी भी एक कमजोरी है भाई साहब. लाजो की बिटिया..."

नहीं राज, कदापि नहीं. हम jism-faroshi वाले दलाल नहीं है जो ऐसा कुछ करे. हुम्ला दिमाग से भी करो तोह सीने पर और पता लग्न चाहिए की ये तोहफा कुमार सारंग की तरफ से दिया गया है.", सारंग की बात सुन्न कर राज्यवर्धन ने अपनी बात को अब दूसरे तरीके से कहा.

"भाई साहब, हम औरत पर हुम्ला करने वाली बात नहीं कह रहे. हुम्ला अगर वो औरत हे शंकर पर करे तोह? इस से एक बार में 3 तरफ़ा प्रहार होगा भाई साहब. शंकर की मौत, लाजो की बिटिया के फंसने पर उसको बचने के एवज में मनीराम और तीसरा निशाना लगेगा पंडित रामेश्वर जी पर.."

"हाहाहा.. तोह तुम भी रघुवीर सिंह का शिकार वाला तरीका अपनाने की सोच रहे हो बस निशाने पर उस Munni-bai को रखते हुए. खैर अगर तुम ऐसा कर पाए तोह हम तुम्हे 15% से 30% का मालिक बना देंगे. लेकिन मनीराम इस पेशकश का जरुरी भाग है और अगर कही भी रेत हाथ से फँसली तोह ध्यान रखना की शंकर इस रेगिस्तान में तुम्हारे पीछे आएगा."

"यही तोह मेरा दूसरा प्लान है भाई साहब. इतना समझ चूका हु मैं उस व्यक्ति को और वो जख्मी होने के बाद जोश में यही करेगा. रेत हाथ से फिसल कर उसके शरीर पर गिरेगी और दफ़न भी वो यही रेगिस्तान में होगा. आपकी बात ध्यान में रहेगी और अब कोई ऐसा काम नहीं जिसमे हमारे लोग मारे जाए या उन्हें खबर हो की एक सेनापति अपने गुप्तचरों के साथ उनके वह सेंध लगा चूका है. इजाजत दीजिये.", राज्यवर्धन ने खड़े होने के बाद दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम किया तोह बदले में सारंग ने एक हाथ हिला कर किसी राजा की तरह हे आज्ञा प्रदान की.

'भाई साहब, आप बड़े थे और अगर हमसे गलती हुई भी थी तोह आपको हमारे चेहरे परे थप्पड़ नहीं मारना चाहिए था. देखिये आपने कितना कुछ खो दिया और हमने भी लेकिन अब सिर्फ आप हे खोएंगे. आपके सीने में गोली पेवस्त करने से पहले माफ़ी मांग लूंगा.', खुद से हे बात करता हुए सारंग सचमुच हे एक गहराई वाला व्यक्ति था और नियमो का कठोर भी. वो बेहतर था और इसका सबूत उसके खुद के इस मुकाम पर काबिज होना था.

"कुंवर सा, बड़ी बीबी की तबियत बिगड़ गयी है. डॉक्टर कह रही है की उन्हें तुरंत हॉस्पिटल ले जाना होगा.", ये घूंघट ओढ़े एक सेविका थी जिसने एक बार में हे ये सूचना दी और सारंग का शरीर हरकत में आया.

"दिलावर से कहो की हमारी सवारी देहलीज पर ले आये. हम अनामिका को ले कर आ रहे है.", इस उम्र में भी वो किसी बाघ की तरह चलता हुआ अपने से आधी उम्र वालो को धत्ता साबित करता था. सारंग की बात सुन्न कर वो सेविका भी पल में नजरो से ओझल हो चुकी थी.

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आसमानी और सफ़ेद चूड़ियों के साथ साथ कानो में मोती के बुँदे पहनवा कर प्रीती को लिए अर्जुन जब घर पंहुचा तोह समय 5 का हो चूका था. घर पे फ़ोन करने पर दादी ने 2-3 अतिरिक्त काम जो बता दिए थे लेकिन इन दोनों को वो समय भी वरदान हे लगा. सारे रस्ते प्रीती और अर्जुन की उँगलियाँ आपस में प्यार से उलझती आयी थी लेकिन वो नूर जो घर से निकलते वक़्त प्रीती के चेहरे पर था इस समय कई गुना बढ़ चूका था.

"लंच की थैंक यू और ये सामान उतरवाने में मैं आपकी कोई हेल्प नहीं कर सकती मर अर्जुन शर्मा. ब्बये, मिलते है रात को.", प्रीती कुलांचे भर्ती हुई अपने घर की जगह अर्जुन के घर हे दाखिल हुई थी लेकिन फिर भी उसने शाम को मिलने का क्यों कहा ये अर्जुन न समझ सका. चेतना संजीव भैया की आवाज से लौटी.

"शादी मेरी होने वाली है और मजे तू ले रहा है छोटे. वैसे खुली आँखों से किसके सपने देख रहा था? प्रीती तोह अभी तेरे पास से हे गयी है.", संजीव भैया की इस बात पर अर्जुन नजरे झुकता शर्माने लगा.

"कुछ नहीं भैया. वैसे सोच तोह ये रहा था के आप अगर कही जाना चाहे तोह बस आज हे निकल सकते है. तोह क्या विचार है?"

"ओह मुंगेरीलाल और शेखचिल्ली, तुम दोनों कुछ कर नहीं रहे तोह काम से काम दरवाजे के बीच से कार तोह आगे पीछे कर लो. और अगर बाजार गए थे तोह सामान तुहाडा पयो कडडूगा गद्दी विचो.?", पंडित जी की जुबान पर पंजाबी आते हे अर्जुन बिजली की रफ़्तार से कार सही कड़ी करके डिक्की और पिछली सीट से एक के बाद एक सामान निकाल रखने लगा. दादा जी की बगल में कड़ी मधु बुआ और रेणुका बुआ भी अर्जुन की तरफ देख हंसने लगी थी.

"बुआ, आप ये गहनों वाला बैग दादी जी तक पंहुचा दो प्लीज. बाकी सामान मैं और भैया ले चलते है.", रेणुका आगे बढ़ी तोह रामेश्वर जी ने उन्हें रोक लिया.

"गुड्डू, जाओ वो बैग ले लो और रेनू बिटिया हम नहीं चाहते की अगले कुछ दिन तुम किसी भी काम में शामिल दिखो.", रेणुका ने नजरे झुका कर हाँ भरी और मधु द्वारा बैग उठाने पर वो दोनों हे वह से अंदर दाखिल हो गयी.

"दादा जी, ये 2 कार्टून में हलवाई का सामान है. इसका क्या करना है?"

"चूल्हे विच भर दे.. जेहड़ा सामान जित्थे चाहिदा उठे हे पहुंचना है. संजीव पुत्तर तू घर डा ख़याल राखी, मैं जरा सतीश दे नाल बहार चालल्या.", पंडित जी bann-thann के बहार निकले तोह दोनों भाई एक दूसरे को देख कर पहले तोह खामोश रहे फिर जोरो से हंस दिए.

"आज थानेदार जी पार्टी में जा रहे है इसलिए इतना बुलंद है. और अभी आपको बोल कर गए है घर रहने के लिए, जबकि आज हे आप बहार जा सकते हो.", अर्जुन के ऐसा कहते हे संजीव भी सोच में पड़ गया लेकिन फिर से सामान दोनों हाथो में लिए हंसने लगा.

"उनका यही मतलब था के मैं घूमने जाऊ क्यूंकि यहाँ पर सभी है ध्यान रखने के लिए. चल अब जल्दी निबटा ये सब, फिर तुझे आज जन्नत दिखा के लाता हु."

"मैं नहीं जा रहा कही भी आपके साथ. जन्नत के चक्कर में कुछ और हे दिखा लाये तोह मैं हे फसूंगा. वैसे आप चाचा की ले जाओ, उन्हें तोह मजा भी आता है महफ़िल में.", अर्जुन के ऐसा सुझाते हे संजीव भैया के चेहरे पर चमक आ गयी जैसे उन्हें कुछ ख़ास मिल गया हो.

"एक्साक्ट्ली. अब उन्हें हे लेके जाऊंगा.", यहाँ से सबकुछ साफ़ करने के बाद दोनों भाई चैन से सांस लेने हे लगे थी की मधु बुआ ने सावधानी से कुछ इशारा किया जो संजीव न देख सका पीठ होने की वजह से और अर्जुन ने भी पलके झपका दी. मतलब कुछ तोह कार्यक्रम था इन दोनों का.

वही प्रीती और अफसाना की नजरे आपस में ऐसे हे मिली थी और दोनों कुछ पल एक दूसरे को देखती रही. इस वक़्त वह इन दोनों के सिवा कोई न था क्योंकि बाकी सभी अगले हिस्से में टेलीविज़न के सामने थी और ऋतू को ढूंढ़ती आयी प्रीती की मुलाकात चेहरा धो कर तोलिये से पौंछती अफसाना से एकाएक टकराई.

"A...Afsana."

"प.. प्रीती..?"

दोनों की जुबान पर एक दूसरे का नाम तोह आया था लेकिन जहा प्रीती के स्वर में ज्ञात होने का समावेश था वही अफसाना का ये चाहत सा सवाल था.
 
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