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बाज़ीगर (1)
रात साढ़े 11 के वक़्त अर्जुन कमरे में दाखिल हुआ तोह अपनी माँ को उस मद्दिम रौशनी से भरे कमरे में दूसरी तरफ करवट के बल सोये देखा. सुर्ख लाल निघ्त्य में क़ैद वो अध्भुत्त काया बस देखने भर से किसी भी पुरुष को सम्मोहित कर सकती थी. अर्जुन ने आहिस्ता से दरवाजा की चिटकनी लगाने के बाद कुछ पल इस जहां ख़ामोशी में ये उत्तेजक दृश्य निहारा और आराम से अपनी माँ की बगल आ लेता. सभी हसरतो को लगाम देता वो आँखें बंद किये बस उस मनभावन महक को फेंफड़ो में भरता हुआ पीछे से माँ की कमर में हाथ दाल लिप्त रहा.
जहा निश्छल प्रेम हो वह कोई वासना कैसे असर दिखा सकती है? बेशक अर्जुन के परुषत्व का एक भाग जिस्मानी तौर पर आसक्त था रेखा के अतुलनीय roop-youvan से लेकिन ऐसा तोह हर उस प्रेमी के साथ होता है जिसकी चाहत सीमा से परे हो. सोने की कोशिश इस मखमली बदन के सामीप्य में महुआ के नशे में बदल चुकी थी. मदमस्त हठी छक्क कर महुआ पीने के बाद जिस तरह मस्ती में कसमसाता है वैसी हे स्थिति अर्जुन की हो चुकी थी.
सपाट नरम पेट पर रेंगता वो मजबूत हाथ फिसलता हुआ कठोर उभारो पर चला आया. 3 बचो का मातृत्व भी रेखा के वक्षो का यौवन ढीला न कर सका, अपितु इनमे गुजरते समय के साथ ज्यादा निखार हे आया. अर्जुन ने अपने बड़े पंजे में एक सतांन को प्यार से थमा तोह निप्पल का कड़ापन साफ़ महसूस हुआ. करवट लेने से रेखा के दोनों सुडोल चुचो का आधा भाग निघ्त्य से बहार निकल कर अर्जुन को अपनी चिकनाहट का प्रदर्शन करता लगा.
'माँ..', अर्जुन ने धीमी आवाज में सरगोशी सी की और रेखा बंद आँखों से बस मुस्कुरा कर खामोश रही. अर्जुन समझ चूका था के अब ये प्रेम मिलान का अलग हे खेल है. आज सबकुछ उसको हे करना था वो भी बिना ज्यादा आवाज किये. हाथ सामने की तरफ से निघ्त्य में सरकते हुए अर्जुन ने निर्वस्त्र उभार पंजे में दबोचा तोह रेखा के जिस्म में सरसराहट हुई. अपने होंठ kaat-ti हुई वो आन्दन्दित हो रही थी अर्जुन द्वारा निप्पल सहलाने और दबाने से. अर्जुन थोड़ा उचकता हुआ दूसरे हाथ से रेखा के कंधे से कपडा खिसकता उस चिकनी त्वचा को चूमने लगा तोह रेखा की न चाहते हुए भी सिसकी निकल गयी.
'Ummmm..aahh.', इस आह की आवाज ने अलग हे जादू किया. अर्जुन थोड़ा कसके उस मॉटे सतांन को दबाता हुआ रेखा की उजली पीठ को दांतो के बीच दबाने लगा. भारी कूल्हों के बीच उसका अकड़ा हुआ कामदण्ड तीसरी चोट पंहुचा रहा था रेखा के जिस्म पर. एक पल के लिए अर्जुन अलग हुआ तोह रेखा जैसे स्वर्ग से जमीन पर आ गिरी. लेकिन अर्जुन ने उस एक पल में हे रेखा के जिस्म को aavaran-mukt कर दिया था. सांचे में ढला वो reit-ghadi (hour-glass) सा जिस्म अब अर्जुन के सामने निर्वस्त्र था लेकिन रेखा अभी भी करवट के बल दूसरी तरफ मुँह किये लेती रही. अर्जुन खुद को कपड़ो से विमुक्त करके एक बार फिर से यथास्थान चला आया.
"माँ, आप जानती हो की आपको देखने भर से मैं होश में नहीं रहता? पता नहीं नानी ने आपको पैदा किया था या आप उन्हें वरदान से मिली. मुझे नहीं पता के क्या गलत क्या सही है लेकिन आपसे खूबसूरत कोई भी नहीं.", अर्जुन अपनी बात कहते हुए रेखा की नाभि से उन्नत चिकनी जांघो तक हाथ फिरता musal-saal गर्दन, गाल चूम रहा था. जांघो की जड़ में दबा रेखा का कॉमद्वार इतनी हरकत से हे रस बहाने लगा. चेहरा घूमती हुई वो एक कशिश से अर्जुन को जैसे पुकारने लगी थी. लरजते होंठो का निमंत्रण अर्जुन ने तुरंत स्वीकार किया. ये चुम्बन इस कदर गहरा था की रेखा के मखमली बदन पर अर्जुन पूरी तरह छा गया.
"उम्म्म.. मेरे लिए तोह तुम वरदान हो अर्जुन आह्ह्ह्ह... आराम से..", रेखा के होंठ आजाद हुए तोह वक्षो से रिस्ता दूध देख चेहरे की लालिमा कही गहरी हो गयी. अर्जुन दोनों वक्षो का मर्दन करता हर तरफ चूम रहा था. रेखा की जांघो के बीच प्रहार करता वो कठोर लिंग हलके से फूली हुई योनि के होंठो से टकराया तोह एक आह्हः निकल गयी. अर्जुन भी इस स्पर्श से आंदोलित होता कुछ निचे सरक कर एक चूचक मुँह में लिए चूसने लगा और दूसरे हाथ से रेखा का वो विशाल नितम्भ दबाता बाए पांव को ऊपर उठाने लगा. रेखा ने भी घुटना मोड़ते हुए पाँव बिस्टेर पर टिकाया, जिस से अर्जुन मनचाहा प्यार कर सके.
"वैसे आपका जिस्म अभी तक अछूता सा क्यों है? देख कर लगता हे नहीं हम आपके बचे होंगे.", अर्जुन ने निप्पल के आस पास बिखरा दूध साफ़ करते हुए एक सरसरी निगाह दोनों पर्वत से खड़े चुचो पर डाली और घुटनो के बल बैठ कर रेखा की योनि निहारने लगा. इतने तगड़े लुंड से सहवास होने के बावजूद वो फूली और उभरी हुई योनि बहार से पूरी तरह कासी थी. नरम मांस पर हलकी सिलवाते और तजा साफ़ किया आस पास का चमकता हिस्सा नवयौवना सा था. कॉमर्स उस दरार से महीन लकीर से चिपका अर्जुन को अपनी तरफ आकर्षित करने लगा और जल्द हे अर्जुन की जिव्हा निचे से ऊपर तक चलती वो सारा शहद समेत गयी.
"आह्ह्हह्ह्ह्ह.. इससष्ठ.. पहले ये म्हणत एक उम्मीद से शुरू की थी.. आह्हः.. फिर आदत हो गयी अर्जुन.. मैं भी चाहती हु की ये कसाव कुछ काम हो लेकिन अब ये सिर्फ तेरे बस में है.. आह्ह्ह्हह.. िस्स्सस्स... ये.. ये क्या .. उम्मम्मम", अर्जुन उन फांको को खोल कर बड़े इत्मीनान से अपनी हसरत पूरी करता रहा. मोटी चिकनी जाँघे उसके सर को दबाने लगी. रेखा का सखलन होना भी भयंकर बहाव के रूप में था. अर्जुन ने आज वो केंद्रबिंदु सेहला दिया था जिसको G-spot कहा जाता है. रेखा की साड़ी ताक़त जैसे योनि से बहार बिखर चुकी थी. अर्जुन मुस्कुराता हुआ अपनी माँ की बगल में आ गया. अपने सीने से लगाए वो रेखा को तबतक सहलाता रहा जब तक सांसें व्यवस्थित न हुई.
"उफ्फ्फ.. ये अभी अभी क्या हुआ था अर्जुन?", अपने बेटे की मजबूत छाती का उभार सहलाती रेखा इतना सुकून महसूस कर रही थी जैसे आज कुछ और जंजीरो से आजाद हुई हो. अर्जुन मुस्कुराता हुआ अपनी माँ के ठोस कूल्हों के बीच की दरार में उंगलिया फसता लचीले मॉस को दबाते हुए उन्हें अपने लिंग के करीब करने लगा.
"ाचा लगा न आपको? ये तीसरी बार में जा कर मिला मुझे. G-spot कहते है उस रफ़ पॉइंट को जिसको सहलाते हे आपकी हालत ऐसी हुई. उमाहहह.", अर्जुन ने अपनी माँ की चिकनी जांघ अपने ऊपर रखते हुए भीगी हुई योनि पर वो मोटा सूपड़ा सताया और मजबूती से कूल्हे को अपनी तरफ दबाते हुए एक गहरा धक्का जड़ दिया. रेखा अभी जवाब देती उस से पहले हे आवाज अर्जुन के होंठो से बंद हो गयी. करवट के बल होने से छूट कही ज्यादा संकरी और फांके बुरी तरह उस मॉटे तगड़े औजार से रगड़ती हुई चौड़ी हो गयी. एक हे धक्के में अर्जुन आधे से ज्यादा उस मखमली सुरंग में लुंड बैठा चूका था.
"ओह्ह्ह्हह.. माँ सचमुच आप कमाल की हो.. आठ.."
"आउच.. आह्हः.. आराम से Arjun...uff.. तेरा ये हर बार पहले से ज्यादा बड़ा महसूस होता है और meri....aahh", रेखा को अर्जुन से ऐसी जरा भी उम्मीद न थी की वो इतनी जल्दी और वो भी 2 धक्को में उसके गर्भ पर ठोकर मार देगा. अर्जुन पूरी गहराई मापने के साथ आज उस गरम गुदाद्वार को भी कुरेद रहा था जोह कूल्हों की गहरी दरार में इस वक़्त थोड़ा उभर चूका था. रेखा अपनी बात अधूरी रखती अर्जुन के सीने पर अपने दोनों उभार चिपकाये खुद को लुंड झेलने लायक बनाने लगी.
"मेरा बड़ा महसूस होता है और आपकी पहले से ज्यादा टाइट. यही कह रही थी न आप? वैसे मेरा तोह पता नै लेकिन आपकी सचमुच टाइट है.. आह्हः.. देखो अब हिल भी नहीं रहा, कितनी बुरी तरह जकड लिए है आपने.", अर्जुन की ऐसी चुहल मस्ती देख रेखा शर्म से लिपटी रही लेकिन योनि का कसाव कुछ काम कर दिया. अर्जुन ने हलके धक्के देने शुरू किये तोह इस मजबूत लुंड ने रेखा को भी आहें भरने पर विवश कर दिया. बहार से फूली हुई छूट का अंदरूनी कसाव इस लम्बे तगड़े मूसल से अलग हे मस्ती भर रहा था.
"उम्म्म.. ऐसे हे अर्जुन.. आअह्ह्ह..", रेखा आसक्त होती अर्जुन को पीठ के भार पलटने लगी तोह अर्जुन भी अपनी को कमान देता निचे हो गया. अब बिस्टेर पर वो कामुक दृश्य था जिसमे भरपूर यौवन समृद्धि से लड़ी रेखा अपने बेटे की जांघो के गिर्द जाँघे फैलाये वो पूरा मूसल लिए आगे पीछे हो रही थी. उन भरावदार कूल्हों के बीच मूसल से लिंग को लीलती फूली हुई योनि का फैलाव साफ़ बता रहा था के अब यहाँ कोई और लिंग असर करने से रहा. अर्जुन ने पीठ उठाते हुए दोनों चुचो थाम लिए और उन्हें चूसक्ता हुआ वो रेखा की कामुकता बढ़ने लगा. दोनों का सहवास हर मुलाकात के बाद अब बेहतर खुलने लगा था.
"आह्हः.. इन्हे खाली कर दो.. उम्म्म..", अर्जुन के कंधे पकडे रेखा तेजी से अपने मांसल कूल्हों को पटकने लगी. हर बार जड़ तक लुंड अंदर जाता और गर्भ पर लगती ठोकर से ये उत्तेजना चरम पर जाने लगी. कमरे में हलकी patt-patt की आवाज के साथ बस रेखा की सिसकारियां गूंजती रही. आज अर्जुन भी उन कैसे हुए मॉटे मॉटे चुचो को तबियत से दबाता हुआ खाली कर रहा था.
"मैं.. होने लगी हु.. आह्ह्ह्हह..", 5-6 बार जोर से उछलने के बाद रेखा ने अर्जुन को बुरी तरह अपने सीने से चिपका लिया. छूट से बेहटा गरम तरल संकेत था एक और सखलन का. लेकिन अर्जुन के विचार आज अलग थे. रेखा को मौका दिए बिना अब वो ऊपर और उसकी कमर पर टाँगे बंधे रेखा बिस्टेर पर थी.
"अब मेरी बारी.. उम्म्म", उतनी हे मजबूती से रेखा को जकड़े हुए अर्जुन ने अपनी माँ के होंठो पर अपने होंठो का टाला जड़ दिया. जहा पहले रेखा 3-4 इंच उछाल रही थी अब अर्जुन सुपडे तक लिंग बहार निकाल कर तूफानी रफ़्तार में कमर चलने लगा. मजबूत छाती के निचे दबे रेखा के उरोज भरपूर रगड़ से छिलने लगे थे. गुलाबी योनि हर धक्के से और फ़ैल कर लाल होने लगी.
"आअह्ह्ह्ह... धीरे बाबा.. उफ्फ्फ.. माँ.. करता रह अर्जुन..", रेखा को खुद नहीं पता था के वो उसको रोकना चाहती है या इस तेज रफ़्तार चुदाई में ऐसे हे बानी रहना. गुलाबी फांको से रिस्ता रास गुदाद्वार भिगोता बिस्टेर पर गिरने लगा लेकिन अर्जुन का जोश जरा भी हल्का न हुआ. अब आवाज बदल कर fach-fach और oooh-aaahh की गूँज रही थी.
"माह.. आप हे सेहन कर सकती हो मुझे.. आह्ह्ह्ह..", एक पल तोह ऐसा भी आया की रेखा का शरीर हवा में उठाये अर्जुन अपनी माँ की योनि को बुरी तरह फैलता हुआ अपने लिंग की जड़ तक चिपकने लगा. निप्पल मुँह के सामने दीखते हे धक्के कुछ धीमे हुए और उनकी चुसाई से रेखा को अपनी चीख खुद हे मुँह पर हाथ रख कर दबनी पड़ी. सही मायने में रेखा को आज पता लगा था के अर्जुन की कामकला उसकी सोच से कितनी आगे है. इस बार सखलन का स्राव अर्जुन की जांघो को भिगोने लगा.
"ोोूफ़्फ़... फट गयी है shayad..aahhhhh..", रेखा के इस कथन पर अर्जुन बिना अलग हुए फर्श पर खड़ा हो गया. रेखा का धड़ बिस्टेर पर और कमर हवा में उठाये अर्जुन फिर से ताबड़तोड़ धक्के लगाने लगा. दोनों चुके आज कही इतने हिलने लगे थे जैसे अर्जुन उनकी अकड़ कुछ काम करने में कामयाब रहा हो. एक वक़्त ऐसा भी आया जब रेखा को अपनी छूट की फांके चीरती हुई महसूस होने लगी लेकिन उतना हे तेज तूफ़ान सा योनि के ख़ास बिंदु पर हो रहा था. अर्जुन ने जिस तरह ये चुदाई मुद्रा बनाई थी, उसका सूपड़ा हर भार वही टकराता जहा चरम बिंदु या G-spot था.
"आह्ह्ह्ह माँ.. मैं आने लगा हु..", अर्जुन के जबड़े भींच चुके थे और इधर रेखा के साथ आज कुछ अलग हे हुआ. योनि के अंदर जहा कॉमर्स का ज्वार उठा वही yoni-nakh से एक तगड़ी फुहार (स्क्वरटिंग) अर्जुन की छाती तक बरसने लगी. ये mutra-tyaag न था क्योंकि इसका स्त्रोत वही था जहा अर्जुन का लिंग धंस कर गरम वीर्य खाली करने में लगा था. ये अनोखी कॉमर्स की फुहार कोई 15 सेकंड बरसी और जैसे हे अर्जुन अलग हुआ रेखा की बिस्टेर किनारे लटकी टांगो के बीच से वीर्य फर्श पर गिरने लगा. रेखा को होश न था के आज हुआ क्या है और ये सब क्या था. जब तक होश संभाला अर्जुन फर्श और खुद को साफ़ करने के बाद रेखा को भी गीले तोलिये से पांच चूका था.
"वो गलत नहीं था माँ, जैसा आप शायद सोच रही हो. आपने उरिनाते नहीं किया, वो बस आपका G-spot सेंसिटिव होने के बाद अलग लिक्विड निकला था.", अर्जुन ने माँ का गाल सहलाते हुए उन सवालिया निगाहो को जवाब दिया और अपने सीने से लगा लिया. कुछ देर तक दोनों खामोश रहे और रेखा अब बेहतर महसूस कर रही थी.
"ये सब कैसे सीखा? सच कहु तोह आज शायद मैं 5-6 बार हुई और बाद में तुम्हारा वो भी कुछ बड़ा लगने लगा था. सुबह फिर से चलने में परेशानी होगी मुझे. अभी से पाँव जोड़ नहीं पा रही.", रेखा को अपने नंगेपन की कोई परवाह न थी. इस से पहले वो हमेशा अपने कपडे पहन लेती थी, सहवास के बाद. आज कुछ अलग था और अर्जुन द्वारा इतने प्यार से जिस्म सहलाना थकावट ख़तम कर रहा था.
"बुक्स. लाइब्रेरी में हमेशा तोह कोर्स की किताबे नहीं पढता न माँ? जब कुछ नया टॉपिक दीखता है तोह पढ़ लेता हु. उसके बाद थोड़ा इंटरनेट से पता चला लेकिन पिछली 2 बारी में मुझे आपका वो पॉइंट मिला हे नै जो आज मिला. वैसे आप टेबलेट ले रही है न? और मुझे तोह ाचा लगता है जब आप थोड़ा शर्माती हुई चलती है.", अर्जुन के मुस्कुराने पर रेखा ने नयी नवेली प्रेमिका की तरह गुस्सा करते हुए उसके सीने पर नाखून गधा दिए.
"देना फिर जवाब अपनी दादी और ताई को. वैसे भी कल तुम्हारी बुआ और कई लोग आ रहे है. साड़ी पहन कर तोह चला भी नहीं जाएगा."
"ाचा फिर आप salwar-kameej पहन लेना और हो सके तोह नहाते वक़्त आइस थेरेपी. उमाहहह. चलो अब सोना चाहिए माँ, डेढ़ बज चूका है.", अर्जुन ने रेखा को ऐसे हे बाहों में भरा तोह रेखा भी अलग होना नहीं चाहती थी. लेकिन कुछ नियम थे जिन्हे भुलाया नहीं जा सकता था.
"कोमल साढ़े 4 या 5 बजे आ जाती है. इसलिए कपडे पहन ने जरुरी है अर्जुन.", अर्जुन भी समझ गया था के इस कमरे में वो मनचाहे नहीं रह सकते. अलमारी से साफ़ गाउन देता वो भी अपने कपडे पहन कर वापिस आ लेता. रेखा को गाउन की चैन न बंद करने देता वो अभी भी स्टैनो को सेहला रहा था.
"मैं नहीं भरा तेरा इनसे?"
"कभी नहीं भरेगा लेकिन बस हाथ रख के सोने दो.", अर्जुन के ऐसा कहते हे रेखा बस मुस्कुरा कर करवट के बल लेट गयी. अर्जुन पीछे से चिपका कुछ वक़्त तक दोनों उभर सहलाता रहा और जल्द हे नींद के आगोश में चल दिया.. आज का सहवास उसके जीवन का सबसे लम्बा मिलान था जिसमे करीब 40 मिनट तक वो अपनी माँ की योनि से अलग न हुआ था. इतनी म्हणत के बाद नींद गहरी हे होनी थी.
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"तुम्हारा लाडला दिखाई नहीं दे रहा आज?", रामेश्वर जी अपनी दिनचर्या के अनुसार दाढ़ी बना रहे थे pooja-paath से फारिग हो कर. घर के ज्यादातर बड़े सदस्य बिस्टेर त्याग कर अपने दैनिक कार्यो में लगे थे और कौशल्या जी जब चाय ले कर बहार आँगन में आयी तोह उबासी लेते हुए नरिंदर जी भी अपने माता पिता के बगल में आ बैठे. शंकर नहाने के बाद कपडे बदल रहा था.
"उसका वो हे जाने और साल में होली दिवाली भी तोह होते है. सोने दो अगर उसकी इत्छा है तोह. वैसे भी उसका दिन लम्बा हे होने वाला है. रेणुका के साथ मार्किट जाना है और फिर शालिनी भी बुला कर गयी है. विनीता साथ हे आएगी उसके वापिस.", कौशल्या जी ने एक कप नरिंदर को थमते हुए सर पे हाथ फेरा तोह वो कप एक तरफ रखते अपनी माँ की गॉड में सर रख वही पसर गए.
"हाँ सही कहती हो भगवान. जब उसके baap-chacha हे बड़े नहीं हुए तोह वो तोह doodh-peeta बचा है. चलो ाची बात है वो आराम कर रहा है. मैं भी नाश्ते के बाद जरा शास्त्री जी की तरफ जा रहा हु. तुम्हारा क्या प्रोग्राम है महाराजा एंडर्सन?", रामेश्वर जी के ऐसे व्यंग पर नरिंदर के चेहरे पर भी शरारत आ गयी.
"आज तोह माँ ने मुझे कुछ भी करने से मन किया है पापा. ये कह रही थी की मैं बस आराम करू इनके पास. हाँ शंकर जरूर काम से बहार रहेगा और बाकी सब तोह राजू भाई और अर्जुन करने हे लगे है."
"हाँ, तुम तोह आराम हे करो बीटा. वो सरपंच जी के घर तोह तुम्हारी अम्मा जायेगी न? कृष्णा अब ठीक है और उसको भी ले जाओ अपने पीहर. मंदरी में मिलना कोई मिलना तोह नहीं हुआ न? शाम तक तुम्हारी लाड़ली बहिन भी आ जाएगी फिर तोह तुम कही जाने से रहे उसके बिना.", अपने पिता की बात सुन्न कर नरिंदर तुरंत सीधा बैठ गया. खुद हे सर खुजाते हुए बोलै.
"भूल गया था और परसो कृष्णा ने कहा भी था की आरती नानी से मिलने का बोल रही है. पहले तोह कह रही थी की अर्जुन ले जाएगा."
"अबे मूर्खनंद, तेरे ससुर के पास तू जाएगा अपनी बीवी को लेकर या अर्जुन? दोनों एक जैसे हे हो. शंकर हर हफ्ते ससुराल घूम आएगा लेकिन न बीवी बचो के लेके जाता है और न बताता है. यारी दोस्ती से भी अलग रिश्ते है तुम्हारे उन परिवारों में. चल चाय पी कर त्यार हो और फिर बहु और दोनों बच्चियों को भी नाश्ते के बाद लेके निकल. और जनाब, तुम किधर चले इतनी सवेरे?", यहाँ शंकर तोह चकाचक सफ़ेद कमीज और भूरी पतलून पहने पूरी तरह तैयार प्रकट हुआ. अपने पिता की बात सुन्न कर एक पल तोह जवाब सोचता रहा लेकिन यहाँ इन्दर ने हे बात संभाली.
"भाई, ऋचा को घर छोड़ने के बाद हॉस्पिटल जाएगा. कोई सर्जरी है 8 बजे इसकी और फिर दोपहर को राजेश के साथ वो जगह देखने जाना है जहा काम शुरू करवाना है. शायद रात वापिस भी ना आये.", अब शंकर मुस्कुरा रहा था नरिंदर के जवाब पर लेकिन दोनों की मुस्कराहट तुरंत काफूर हो गयी.
"हाँ, तुमने पैदा किया है न मुझे जो तुम कहो वो मैं मान लू. जिस दिन ये पूरी आस्तीन की कमीज पहनता है उस दिन ये कौनसी सर्जरी करता है मुझे पता है. नवाब साहब, जो भी करो इस बूढ़े की िज्जात्त का ध्यान रखना. और चंद्रो भाभी से कहना की अगर समय हो तोह दर्शन दे जाए.", शंकर अभी आगे कुछ कहता ऋचा तैयार हो कर इधर चली आयी.
"चले चाचा जी?", अब दबी डाभी हंसी कौशल्या जी के चेहरे पर थी और शंकर झेंपता हुआ बिना कुछ कहे इलो में बैठ कर अपनी बेटी के साथ निकल लिया. रात से भरा बैठा था और आज मुन्नी की मुनिया से मिलने की कुछ ज्यादा हे जल्दी थी. ऋचा बेचारी अब 2 दिन गाँव में हे रहने वाली थी अपने बाप की वजह से.
"अब चाय ठंडी करेगा या तेल टपकौ?", रामेश्वर जी ने फिर से नरिंदर को लपका तोह वो चाय उठा कर अंदर हे चल दिया.
"आप भी, अभी तक इन बचो को झिडकते रेहतो हो. बड़े हो गए है ये दोनों लेकिन आपको तोह ये अभी तक वही कॉलेज वाले लगते है.", कौशल्या जी ने बचो की तरफदारी की तोह रामेश्वर जी के चेहरे पर ये तंजभरी मुस्क़ुआन आ गयी.
"थानेदारनी जी, इनके साथ साथ शायद आप भी 25 साल पीछे हे हो. ये घोड़े सुधरने का नाम हे लेते और जो अभी गया है वो जरूर किसी न किसी की मय्याट्ट बना कर वापिस आएगा. सवाल बड़े से करो तोह जवाब छोटा और दोनों पकडे जाए तोह फिर उनकी माँ की ममता. लगाए रखो अपने पल्लू से इन्हे, तुम्हारा हे नाम रोशन करेंगे किसी दिन.", अब कौशल्या जी भी बुरा सा मुँह बनती चल दी और पंडित जी हंसने लगे. यही तोह होता था अक्सर जब बचो की वजह से इन दोनों में ये तुनक भरी बातें होती थी.
"माँ, ये ारु कब सोया था आपके पास? 11 बजे तोह ये ऊपर था छोटी चची के साथ.", ऋतू अपनी माँ के कमरे से बहार आयी जहाँ अभी तक अर्जुन गहरी नींद में पसरा था. 6 बज चुके थे लेकिन वो टास से मास्स न हुआ था. वही रसोई में काम करती रेखा जी के चेहरे पर आया नूर अलग कहानी बता रहा था जिसकी समझ अभी ऋतू को न थी. सलवार कमीज में केहर बरपाती रेखा जी अपनी बेटी की बात पर उसको कॉफ़ी पकड़ती बताने लगी.
"उसके थोड़ी देर बाद हे आया था लेकिन सोया देर से था शायद. जा कर उठा दो अपने भाई को.", ऋतू कप ले कर कमरे में वापिस आयी लेकिन उठाने की जगह खुद भी उसकी बगल में लेट गयी, झप्पी दाल के. नींद में हे अर्जुन ने उसको अपने आगोश में लिया तोह आँखें मीचे ऋतू उसके सीने से लगी मुस्कुराने लगी. अभी इस लम्हे को 5 मिनट हे गुजरे थे और कमरे में आयी रुपाली और तारा हैरानी से इन दोनों को देखने लगी. अवस्था आपत्तिजनक तोह नहीं थी बस ऋतू का सर अर्जुन की ब्याह पे और चेहरे उसके सीने में धंसा था.
"ये मैडम, नहाने के बाद फिर से सो रही है?", तारा ने रुपाली को देखते हुए कहा
"पता नहीं लेकिन अर्जुन तोह इस वक़्त घर पे होता नहीं और होता भी है तोह बहार दादा जी के पास. उठाओ इस ऋतू को मंदिर चलने के लिए.", रुपाली ऐसा खुद भी कर सकती थी लेकिन उसने तारा से कहा.
"मैं रिस्क नहीं लेती जब वो अर्जुन के पास हो. मामी या कोमल दीदी को हे बोल नहीं तोह तू दिखा जरा इसको उठा कर.", रुपाली चुपचाप बहार हे निकल गयी जैसे उसको ऋतू की नाराजगी का पता हो. तारा वही कुर्सी पर बैठ टेबल पर कोहनी टिकाये इन दोनों को देखती हुई ऋतू की जगह खुद को सोचने लगी. कमरे में रेखा जी आयी और टेबल पर कॉफ़ी का कप, बिस्टेर पर Arjun-Ritu और उन्हें टकटकी बांधे देखती तारा पर नजर पड़ी तोह सर पे हाथ रख लिया.
"काम से काम तुम तोह हिला दो इस आफत को. ये दोनों जाने कब बड़े होंगे और वैसे ये ऋतू सारा दिन अर्जुन को परेशां करती रहेगी लेकिन प्यार भी सबसे ज्यादा अपने भाई से है.", रेखा जी ने कप उठाया तोह तारा ने हाथ खड़े कर दिए.
"मामी, अपने को तोह किसी की नींद डिस्टर्ब नहीं करनी. दोनों आराम से सोये हुए हे ठीक है और ऋतू 1 बजे तक पढ़ रही थी इसलिए सोने हे दो.", अब तारा भी बहार चल दी हंसती हुई लेकिन एक और शख्स था जो अर्जुन की तलाश में इधर आ पंहुचा. थानेदारनी साहिबा.
"रेखा, तू इस सलवार कमीज में जाँच रही है. वैसे तेरे लाडला इधर हे सोया पड़ा है क्या?", वो अभी कमरे के बहार हे थी और रेखा जी ने अपनी सास को इशारा किया और खुद एक तरफ हो गयी.
"हे राम. एक तोह ये बैलबुद्धि और दूसरी सी बलूंगड़ी. पड़े रहने दे इन्हे, जब उठेंगे तब उठेंगे. कौनसा इनकी जरुरत है अभी.", अब हैरान होने की बारी रेखा जी की थी. उनकी सास के चेहरे पर पहले जो भाव आये थे वो अलग थे लेकिन बाद में मुस्कुराना और इन दोनों को सोये रहने का बोलना गले नहीं उतरा.
"पता नहीं माँ जी ये ऋतू कब बड़ी होगी? इसका अपने भाई से कुछ ज्यादा हे मोह है और बढ़ती उम्र के साथ ये ज्यादा बचपना करने लगी है. अर्जुन भी इसको टोकता नहीं.", रेखा ये बात बहोत धीमी आवाज में कर रही थी कौशल्या जी से. इस वक़्त रसोई में यही दोनों थे, कोमल सबके लिए चाय ले कर जा चुकी थी.
"तुम तोह माँ हो रेखा, तुम्हे तोह खुश होना चाहिए इन दोनों का प्यार देख कर.", कौशल्या जी जैसे मुद्दे की बात घुमा रही थी जो रेखा को चिंतित कर रही थी.
"माँ जी, मुझे दोनों के प्यार से ऐतराज नहीं है. लेकिन कई बार प्यार की सीरत और सूरत सही से पता नहीं चलती. इन दोनों में कुछ अलग है जो मुझे चिंतित करता है. कभी परवरिश पर सवाल आया तोह..", रेखा अपनी बात कहते कहते गाला रुंधने पर दुपट्टे से आँखें साफ़ करने लगी. वो जो कहना छह रही थी वो चाह कर भी बोल न सकीय लेकिन कौशल्या जी ने अपनी बहु की चिंता और परिवार के प्रति समर्पण देख मुस्कुराते हुए अपने सीने से लगा लिया.
"मैं ये बात तुझसे करती रेखा क्योंकि जो तू सोच रही है वो मैं भी सोचती थी. फिर अर्जुन ने जब Subhadhra-Arjun का वर्णन किया तोह अनजाने में हे उसने जैसे ये कबूल कर लिया की वो ऋतू के बिना अधूरा है. एक नजर से तोह वो भाई बहिन की अटूट प्रेम की डोर है लेकिन इसका असल स्वरुप अर्जुन को नहीं पता. ऋतू के दिल को सब पता है और तुम या मैं कुछ भी नहीं कर सकते. बचे समझदार है और इनके प्यार पर संदेह करके हम भगवान् का हे अनादर करेंगे. तुम्हारे पापा तोह यही कहते है की जो नियति को मंजूर, वही होगा. बड़े बाबा भी प्रीती और ऋतू को वो चला दे कर गए थे जो 2 अलग अंगूठी होने के बावजूद आपस में जुड़ने पर एक हो जाता है. हर इशारा यही कहता है की इनका प्रेम हम सामाजिक लोगो से ऊपर और साफ़ है.", बात कहते कहते एक पल को तोह कौशल्या जी भी कमजोर पड़ने लगी थी लेकिन वो हिम्मती थी.
"ये आप कह रही है माँ जी?"
"तुझे किसी और की आवाज सुनाई दी क्या? तेरा खसम भी जानता है ये सब और इसलिए उस दिन मैंने कहा था के प्रीती और ऋतू को मैं कभी अलग नहीं होने दूंगी जब वो ऋतू को बिनावजह तंग कर रहा था. मेरे लिए सभी बचे बराबर है रेखा लेकिन ऋतू सर्वोपरि है. ये तुम भी जानती हो की उसके जनम के बाद इस घर में खुशियां हे आयी है फिर वो चाहे अर्जुन के हे रूप में क्यों नहीं. बाकी तुम उनकी माँ हो, फैंसला ले सकती हो.", कौशल्या जी की इतनी बड़ी बात सुन्न कर रेखा ने उनका हाथ थाम लिया.
"आपने कभी गलत नहीं कहा माँ जी और पैदा करने भर से मैं माँ नहीं कहला सकती. बचो को पला भी आपने है और इनको jiwan-anushashan भी आपने दिया. बस समाज में ऐसे रिश्ते कलंक...
"तेरा कलंक आँखों में काजल की तरह लगा के ख़तम कर दूंगी मैं. समाज की तोह मैंने 15 बरस की उम्र में न सुनी फिर अपने बचो के लिए तोह समाज से अलग होना भी मंजूर. वैसे भी बहोत समय है 5-6 साल में दुनिया 1500 बार घूम जाती है, बचो के भी कुछ समझ आ जाये तब तक. नहीं तोह शंकर कन्यादान करेगा और तू बहु ले आईओ.", माहौल को हल्का करने के इरादे से कौशल्या जी ने ऐसा कहा तोह भीगी आँखों से भी रेखा के चेहरे पर हलकी मुस्कान आ गयी.
"वैसे बचे तेरे 21-22 साल के होने लगे और तू ढलने का नाम हे न ले रही.", कौशल्या जी ने जो सवाल किया था अब इसका रेखा क्या जवाब देती. बेटी और माँ का दिल एक हे लड़के के पास है और माँ को तोह वो deh-sukh देने भी लगा है.
"हाँ माँ जी, ये बात तोह बिलकुल सही की आपने. रेखा की कार तोह उलट चलने लगी है. मेरे बाल सफ़ेद हो गए और ये वैसी बनती जा रही है जैसी घर में ब्याह के आयी थी. मोटी तोह मैंने ये अर्जुन के पैदा होने पे हे देखि थी.", ललिता जी अपने हे अंदाज में रहती थी जब हंसी मजाक की बात हो.
"तब तोह होना भी जरुरी था ललिता, साढ़े 3 किलो का बचा पैदा करने के लिए 15 किलो बढ़ाना भी पड़ता है. बस उसके बाद से ये उम्र रोक गयी और वैध की बेटी हो के मैं भी पता न लगा पायी के ये कौनसी jadi-booti खा रही. इसकी माँ सुनंदा से हे पूछूँगी, जब वो कल आएगी. खैर बुढ़ापे में भी वो भी बूढी न हो रही तोह इसके खून में भी गुण तोह होंगे हे. बाकी शंकर की माया.", कौशल्या जी ने जहा आज रेखा को एक गहरा सच बताया था वही वो इसके बाद उसका मैं हल्का करने में सफल रही थी. रसोई से निकल कर वो अपने पति की तरफ चल दी थी और अब वह बस रेखा और ललिता जी हे थे.
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"जीजा, सत्यानाश हो गया.", सुबह के 7 बज रहे थे और विनोद परेशान सा पप शर्मा के घर आ पंहुचा. शर्मा तैयार हो कर अभी अखबार हे पढ़ रहा था और आँचल रसोई में चाय बना रही थी. अपने साले को इतनी सवेरे घर आया देख वो भी हैरान था. शराब और शबाब में चूर रहने वाला विनोद अक्सर 8 बजे तो सो कर उठता था.
"अब क्या बादल फट पड़ा साले साहब? जरा बैठ कर तसल्ली से बताओ के मामला क्या है.", शर्मा ने वही हॉल में विनोद को अपने साथ सोफे पर बैठते हुए पूछा.
"वो मैंने बताया था न के उस लड़की को कब्जे में ले लिया है? रवि और करतार की गाडी सड़क से निचे पलटी मिली है वह की पुलिस को. रवि की तोह हालत फिर भी नाजुक है लेकिन करतार से मेरी 6 बजे बात हुई थी अभी. उसने पुलिस को तोह यही बताया है की गाडी का बैलेंस बिगड़ने से वो पलट कर 6 फ़ीट निचे गिर गयी.", विनोद ने बात कहते कहते टेबल पर राखी बोतल से एक बड़ा घूँट पानी का गले में उतरा और फिर कुछ गहरी सांस लेते हुए बोलै.
"करतार ने बताया की काली लांसर में सवा 6 फ़ीट का एक पहलवान उनसे टकराया था और उसने करतार को उठा कर सड़क पर पटक मारा. उसके बाद वो कुछ वक़्त बेहोश रहा लेकिन इतनी देर में रवि को उसने बहोत बुरी तरह से तोडा. बाद में कार के साथ इन दोनों को निचे फेंक कर वो लड़की लेके चलता बना. पन्गा हो गया जीजा ये तोह और जितनी मैं समझ रखता हु वो लड़का और कार ख़ास है.", विनोद का डर देख एक बार तोह शर्मा भी घबरा गया लेकिन उम्रदराज और जमीन का व्यापारी था पप शर्मा.
"तोह एक सवा 6 फ़ीट का पहलवान लड़का हमारा क्या बिगाड़ सकता है विनोद? वैसे भी लड़की की जरुरत हे नहीं थी हमको. इक़बाल को तोह हम रास्ते से हटा हे देंगे बस उसके फार्महाउस पर गाँव की भोली भली लड़कियां पंहुचा कर पुलिस और राजेश को इतिल्ला करना है. संजोग से वो कोई लड़का होगा जिसकी नजर पड़ गयी होगी कार में बंधी लड़की पर."
"ओह मेरे प्यारे जीजा, बात इतनी भी सीढ़ी नहीं है. वो लड़का है अर्जुन शर्मा, मेरा भतीजा क्योंकि वही ऐसा पहलवान है और वो कार भी उसकी है. करतार ने ये भी बताया था के उसके साथ एक खूबसूरत सी लड़की भी थी, मतलब मेरी कोई भतीजी. अर्जुन शंकर भैया का बीटा है लेकिन साले को मैं तोह घरेलु चुटिया सा समझ रहा था. ये नहीं पता था के इतना तगड़ा निकलेगा की रवि की हड्डियां टॉड कर हॉस्पिटल पंहुचा देगा. मान भी लू की वो किसी से कुछ नहीं कहेगा लेकिन मैं उधर शादी में तोह जाऊंगा हे?"
"ये तोह सचमुच समस्या हो गयी विनोद. और अर्जुन तुम्हारा भतीजा है जो इतना ताक़तवर भी है की रवि जैसे पहलवान को थोक गया, वो भी अकेला. तुम ताई से बात करके देखो जरा. वैसे जितना मैं पंडित जी को जानता हु, वो परिवार के बीच तोह कभी रंजिश पैदा न होने दे फिर चाहे गलती तुम्हारी हे क्यों न हो. बहनचोद ये शंकर का लोंदा इतना बड़ा हो गया है क्या?", शर्मा की तोह गरारी हे अटक चुकी थी इस लड़के पर.
"बड़ा तोह वो है हे लेकिन साला हब्शी जैसा पूरा झोटा भी है. नरिंदर बता रहा था के खुद ताऊजी और कोच संधू जी उसको प्रशिक्षित कर रहे है. लेकिन वो सीधा तोह मुझ पर कुछ नहीं करेगा?", विनोद अभी दुविधा में हे था और आँचल ढीली टीशर्ट और चुस्त पाजामे में बिना सीना ढके दोनों के लिए चाय रख कर चली गयी. उसकी थिरकती चाल देख एक पल को विनोद सब भूल गया फिर सहसा हे चौंकते हुए बोलै.
"जीजा, एक बार अनामिका से बात करके देखु की वह का माहौल कैसा है?", ये बात शर्म को भी जांची. अगर कुछ भी ऐसा वैसा हुआ है तोह जरूर कान में तोह बात पड़ी हे होगी. पास में हे रखा वो हरे रंग का टेलीफोन खिसकते हुए विनोद ने पंडित जी के घर का नंबर लगा दिया. 3-4 घंटी हे गयी थी और उधर से फ़ोन रुपाली ने उठाया.
"Hello", रुपाली ने बिना हे नंबर देखे ऐसा कहा.
"हाँ बिटिया हम विनोद शर्मा बोल रहे है. तुम्हारी चची अनामिका से बात करवा सकती हो?", अब तारा को छोड़ कर तोह सभी भतीजी हे लगती थी विनोद की इसलिए बात ज्यादा न खींचते हुए सीधा मुद्दे की बात करि.
"एक मिनट चाचा जी, चची इधर हे हैं.", अनामिका नाश्ता करके बस उठी हे थी. 'चची, आपके लिए विनोद चाचा का फ़ोन है.', रुपाली की आवाज पर अनामिका तुरंत इस तरफ चली आयी. उन्हें फ़ोन दे कर वो भी बहार चल दी, नाश्ता करने. इस वक़्त कमरे में बस अनामिका हे थी.
"Hello, नमस्ते जी.", अनामिका की आवाज सुन्न कर विनोद कुछ चैन सा मिला. अपनी पति से बात करते हुए अनामिका थोड़ा सेहम जाती थी हमेशा.
"नमस्ते नमस्ते. और सुनाओ तुम कैसी हो? हमारा बीटा कैसा है?", विनोद ने भरसक मीठा होने की कोशिश की थी और वो सफल भी रहा.
"जी मैं भी ठीक हु और निकेतन अभी बड़ी माँ के पास है बहार आँगन में. यहाँ सभी उसको प्यार करते है और ध्यान भी रखते है. आप आ रहे है?", अनामिका ने वही सवाल किया जिसकी वजह से वो थोड़ा असहज हो रही थी. इधर अर्जुन भी चची को अकेले फ़ोन पर लगे देख अंदर चला आया, जाली का दरवाजा ढालते हुए. शरारत करने के हिसाब से उसने चची की गोरी कमर सहलाई और बगल में लेट गया.
"आउच.. क्या करते हो अर्जुन?", अनामिका ने दबी आवाज में हँसते हुए उसको मन किया और अर्जुन करीब लेता अब ब्लाउज और साड़ी के बीच वाले गदराये गोर पेट पर उंगलियों से सितार बजने की क्रिया करने लगा. फ़ोन के दूसरी तरफ विनोद ने भी हलकी आवाज में अर्जुन का नाम सुना था और अपनी बीवी की आह भी. सबर जवाब दे गया और झांटे सुलग गयी.
"हहहह.. तुम अकेली हो अनामिका?"
"जी, वो अभी अर्जुन आया था और गलती से ऊँगली पर पाँव रखा गया.", अनामिका झूठ बोल रही थी और इधर अर्जुन अपना पूरा पंजा उस चिकने पेट पर रखे फ़ोन से आती हलकी आवाज सुन्न ने लगा. अनामिका को पता भी नहीं चल रहा था के आखिर हो क्या रहा है. फ़ोन पर पति था और इधर अर्जुन की हरकते उसको उत्तेजित कर रही थी.
"ाचा ठीक है. वैसे जवान लड़का है तोह थोड़ा मर्यादा में रहना. शहर की हवा में रहा है तोह.. वैसे मैं 19 को आऊंगा माँ बाबू जी के साथ.", अभी विनोद आने का कार्यक्रम बता रहा था लेकिन इधर कुछ और हे कार्यक्रम चलने लगा. अर्जुन की ऊँगली अनामिका की नाभि में रेंग रही थी और वो अनजाने में हे अर्जुन के चेहरे तक अपना सीना ले आयी. शरारत अब उत्तेजिट करने लगी तोह अनामिका की सांसें उखाड़ने लगी. अर्जुन ने हे हाथ हटाया.
"ओह चची, बात कर लो उधर चाचा कुछ बोल रहे है. ", अर्जुन ने ये सब इस तरह कहा था जिस से विनोद ाचे से उसकी आवाज सुन्न सके. अनामिका भी भोलेपन से बोल गयी.
"जी, बड़ी दीदी और जीजा जी नहीं आ रहे आपके साथ?", यहाँ विनोद की अर्जुन की बात सुन्न कर टाइट हो चुकी थी और इधर उसकी बीवी अभी भी ऐसी बातें कर रही थी.
"हाँ.. वो लोग भी शादी के दिन आएंगे. तुम अपना और बेटे का ख़याल रखना. वैसे ये अर्जुन तुम्हारी ज्यादा हे सेवा नहीं कर रहा?", विनोद के स्वर की तल्खी अनामिका समझ न सकीय लेकिन अर्जुन अब उसकी गॉड में सर रखे लेता मुस्कुरा रहा था. उसकी इस हरकत पर अनामिका का हाथ भी स्वतः अर्जुन का सर सहलाने लगा और वो फ़ोन पर जवाब देने लगी.
"सेवा तोह सभी करते है जी, बिलकुल बेटी की तरह रखा है बड़ी माँ और सभी दीदी ने. हाँ अर्जुन मेरे दूध और खाने का पूरा ध्यान रखता है और हमारे बेटे की भी सभी जरुरत का. पाउडर, कपडे, तेल ये खुद हे ले आया था.", विनोद की बोलती हे बंद हो चुकी थी अर्जुन पुराण सुन्न कर और इधर अर्जुन के अलग हे गृह घूम रहे थे. चची की गॉड में लेटने पर वो साफ़ उस जानी पहचानी महक को साँसों में उतार रहा था जिसमे मातृत्व वाले दूध का समावेश हो. एक बार अनजाने हे उसकी नाक उन दूध से भरे कलश से टकराई तोह वो बेहाल होने लगा. चेहरा घुमाया तोह अनामिका की सांस उखड गयी, अर्जुन का मुँह और गरम सांसें अपने पेट पे महसूस करते हे.
"हाँ ाची बात है लेकिन थोड़ा सीमा बरकरार रखना तुम. पहलवान सा है तोह शायद दिमाग काम हो और कुछ उल्टा सीधा हो गया तोह.. ", विनोद पहले हे परेशां था मंजू के मामले से और इधर उसको अंदेशा था कही अब उसकी बीवी पर वो घोडा न चढ़ जाए. बदला लेने के चक्कर में ऐसा कर भी सकता था क्योंकि अनामिका bholi-bhali सी महिला थी.
"जी, वो खुद हे मर्यादा में रहता है. वैसे कुछ जरुरी बात करनी थी .. उम्म्म्म", अनामिका की योनि में खिंचाव उत्पन्न होने लगा था उन गरम साँसों से और इस तरह का स्पर्श आज पहली बार हे हुआ था उसके जिस्म पर. मजे की अधिकता में उसने खुद हे अर्जुन का सर दबा लिया.
"वो.. ऐसा कुछ ख़ास नहीं था बस तुमसे हालचाल लेना था. चलो रखता हु, काम भी देखना है.", फ़ोन रखते हे अनामिका ने अपनी हालत देखि. चेहरे पर हलकी शर्म के साथ उसने अर्जुन का कान उमेठा तोह वो झट्ट उठ खड़ा हुआ.
"बहोत बदमाशी नहीं कर रहे थे तुम? और अपनी भाभी से ऐसी चुहल कौन करता है भला?", अनामिका झूठा नखरा दिखा रही थी लेकिन वो साफ़ कैसे कहती की उसकी हालत खराब हो चुकी है और अगर अर्जुन थोड़ा सा भी आगे बढ़ता तोह वो उसको टोकती भी नहीं.
"आप इतनी प्यारी हो चची की बस दिल किया के आपकी गॉड में सर रख के लेता राहु. लेकिन उतनी हे ाची महक भी आती है आपसे तोह गलती अपने आप हे हो गयी. वैसे आपको बुरा लगा क्या?"
"बुरा नहीं लगा लेकिन कुछ अलग सा था. ऐसे में कोई देख सकता है ये भी नहीं सोचा हमने. चलो मैं बाद में बात करती हु, निकेतन को नहलाना भी है और फिर उसको भूख भी लगी होगी.", अनामिका उठने लगी तोह अर्जुन ने एक और तीर चला दिया.
"जिस चीज की भूख है उसकी हे खुशबु आ रही थी चची.. सॉरी भाभी.", और एक बार फिर से वो चची का गाल चूम कर बहार दौड़ गया. अनामिका को ये सब हंसी मजाक और प्यारी हरकते बड़ी सुहा रही थी. अभी तक के जीवन में ऐसा तोह उसके साथ कभी न हुआ था लेकिन आज उसको हिंदी फिल्मो वाला prem-romance याद आने लगा. शर्माती मुस्कुराती हुई वो आँगन की तरफ चल दी और दिमाग में अर्जुन द्वारा कही दूध की महक वाली बात पर एक बार फिर से पेट से निचे सिहरन दौड़ने लगी. उधर विनोद की हालत देख शर्मा भी चिंतित हो गया.
"क्या लगता है तुम्हे?"
"जीजा लग्न वागना छोडो जीजा, यहाँ मेरी लग्ग गयी है शायद. बात से तोह साफ़ पता चलता है के उधर अर्जुन ने ऐसी कोई जीकर नहीं किया लेकिन वो हमारी सोच से ज्यादा शातिर है."
"ऐसा क्या पता लगा तुम्हे? मेरे सामने तोह साधारण हे बात हो रही थी बस एक बार तुमने ये जरूर पुछा के अर्जुन क्या कर रहा है.", शर्मा ने कुरेदा तोह विनोद ने बता दिया.
"वो सिसकारी ऐसी थी जैसी आप समझ रहे है न जीजा? अनामिका ने सफाई से झूठ कहा के अर्जुन चला गया है लेकिन वो हलके हलके 2-3 बार आहें भरी थी. और शायद अर्जुन उस से चिपका हुआ था क्योंकि मेरी बीवी सही से जवाब भी नहीं दे रही थी जैसे कही खोयी हो. वो मेरी हरकत का बदला अब अनामिका के साथ कुछ गलत करके न ले? साला है भी हब्शी और मेरी बीवी नाजुक सी.", विनोद के मैं में तोह यहाँ तक ख़याल आ रहे थे की कही अर्जुन के निचे दबी बकरी सी अनामिका की दुर्गति न हो जाए.
"खयालो से बहार आओ मुंगेरीलाल. वो पंडित जी का घर है और तुम्हारा भतीजा ऐसा वैसा कुछ नहीं कर सकता. इतने लोग घर में रहते है लेकिन तुम्हारे मैं में खोट है इसलिए तुम मजाक मस्ती को ऐसे ले रहे हो. घर में फ़ोन जानते हो न कहा होता है? ऐसी हरकत वो भी शादी ब्याह वाले भरे पूरे घर में कोई क्यूँकर कर सकता है? और अर्जुन को किसने बताया होगा की वो सब तुमने किया है?", शर्मा के ऐसे खुलासे पर विनोद भी निरुत्तर हो गया. विनोद के ये सभी बातें सच हे लगी क्योंकि घर तोह वो भी होकर आया था अभी कुछ दिन पहले. अर्जुन ऐसा नहीं कर सकता सबके सामने. लेकिन उसको क्या पता था के अर्जुन क्या कर सकता है क्या नहीं.
"हाँ सही कहा आपने जीजा. वो अगर कुछ करता तोह सबसे पहल ताऊजी को बताता और वो मुझे फ़ोन करते या पापा को. और करतार तोह बेहोश हो गया था और रवि की हालत नाजुक है जिसका मतलब अर्जुन ने बिना पूछे हे उसकी ठुकाई कर दी होगी गुस्से में. पुलिस का लफड़ा न पड़े इसलिए वो दौड़ गया होगा नहीं तोह बुलाता जरूर इतनी बड़ी बात पर. आप सचमुच समझदार व्यक्ति हो जीजा.", अब एक मूरख दूसरे की तारीफ कर रहा था और दोनों खुश हो रहे थे. अर्जुन क्या कर चूका है ये तोह उनके साथ साथ शंकर और रामेश्वर जी को भी भनक न थी. अनामिका चची के साथ उसका वो प्यार भरा खेल इस मामले से अलग था.
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दिन नियत गति से आगे बढ़ने लगा था. चंद्रो देवी की हवेली पर पेट और उस से निचे की आग शांत करके शंकर जी भी अपने काम पर निकल चले और नरिंदर भी बीवी और दोनों बेटियों को लिए अपनी ससुराल की राह पर बढ़ गए. रामेश्वर जी इनसे पहले हे आचार्य जी के घर जा चुके थे जहा से वो लोग कही और जाने वाले थे. अर्जुन तैयार हो कर रेणुका को लिए महिला डॉक्टर की तरफ चल दिया. रोमिला ने पुछा भी था के वो लोग कहा जा रहे है लेकिन रेणुका ने आ कर बताने की बात कही थी.
हमेशा की तरह रेणुका खुश थी अर्जुन के सामीप्य में और अगले 2 घंटे अर्जुन हमेशा की तरह कभी प्रेमी तोह कभी एक पति के अवतार में रहा. डॉक्टर से भी हर टेस्ट और khaan-paan की जानकारी उसने रेणुका के साथ बैठ कर हे ली. आने वाले समय में लगने वाले इंजेक्शन और जरुरी टेस्ट का ब्यौरा अर्जुन ने अपने दिमाग में छाप लिया था. बहार आये थे तोह समय का सदुपयोग करते हुए वो रेणुका को कुछ और आरामदायक कपड़ो के साथ साथ फल और चॉकलेट का डिब्बा भी दिलवाता लाया.
अर्जुन अभी से वो सब जानकारी एकत्रित कर रहा था जो उसके आने वाले जीवन में काम की थी. रेणुका भी इस दौरान भरपूर खुश थी और समय को समझते हुए दोनों हे 11 बजे तक वापिस लौट आये. गेट से अंदर जाते हे रेणुका को सबसे पहले प्रीती ने हे छेड़ा था.
"बुआ, आपकी लिपस्टिक गायब है. माँ के देखने से पहले ठीक कर लीजिये.", हंसती हुई वो ऋतू की तरफ चली गयी थी रेणुका को परेशां करके. घर के बहार हे संजीव भैया और अर्जुन को बात करते देख वो बस भैया के पीछे से एक हवाई चुम्बन अर्जुन को देती अंदर चली गयी थी लेकिन कार के शीशे से ये हरकत पोलिसिअ जेठ देख चूका था.
"तोह अब तुम क्या करने वाले हो इस बारे में?", संजीव भैया अर्जुन के कहने पर उसकी कार में बैठ चुके थे. धीमी रफ़्तार में चलता अर्जुन कुछ पल खामोश रहा और फिर उसने अपनी बात केहनी शुरू की.
"आज मंजू पर हाथ डाला है और कल को शायद ऋतू या अलका दीदी के साथ वो ऐसा कर सकते है. यहाँ बाकी सभी समझदार लोग ये क्यों नहीं देख पा रहे की रमन शर्मा (दामिनी का pati/Vinod का छोटा जीजा) बारमेर से है और जिस तरह से वो दबा हुआ जीवन जी रहा है, मुझे वो आदमी एक हम मोहरा लगता है भैया. विनोद चाचा में दिमाग नहीं है बस घमंड है रुतबे का. वो ताक़त पाना चाहता और मंजू का प्रयोग शायद दलीप मौसा को दबाने में करता.", अर्जुन ने जब ऋतू अलका का जीकर किया तोह शांत रहने वाले संजीव की आँखों में भी लहू उतर आया. उसके लिए तोह बहिन मतलब देवी और घर की प्रतिष्ठा थी. फिर भी अर्जुन द्वारा लिए रमन शर्मा के नाम से वो संभल गया.
"देख, तू कुछ भी गलत नहीं करता और न करेगा. लेकिन एक बात पता चली है की आज रात शंकर चाचा विनोद के साथ कुछ बड़ा करने वाले है. ये बात मुझे बहार से हे पता चली है. वैसे तू कल हुए हादसे के बाद अभी तक शांत तोह नहीं बैठ सकता. बताने का कष्ट करेगा की अब क्या खेल रचाया है और ये रमन शर्मा तोह फूफा लगता है अपना."
"इस फूफे को नंगा करना है भैया और विनोद चाचा का तोह समझो बेडा पार हो जाएगा कल सवेरे तक. जगतार भैया ने बताया था मुझे उनके होटल में चलने वाले काळा कारनामो के बारे में और लड़कियों के साथ जो व्यभिचार चाचा करते है. आज रात को होटल पर छपा पड़ेगा और सबूत ऐसे मिलेंगे की होटल सील. विनोद चाचा बच जाएंगे क्योंकि होटल में क्या होता है इस से मालिक हमेशा मुकरेगा और नाम मैनेजर पर आता है. ये चोट जरुरी है उनका दौलत वाला घमडं तोड़ने के लिए. फिर शादी के बाद मैं गाँव जा हे रहा हु, बाकी जड़ वह काट दूंगा. वैसे पापा भी तोह हमारा हे काम कर रहे है.", अब संजीव का माथा ठनका की अर्जुन शायद इस मुद्दे पर बहोत पहले हे काम कर चूका है. मंजू वाले किस्से का बदला वो होटल से ले रहा है.
"तू चाचा वाले प्लान के बारे में जानता है?"
"राजेश मां को मैंने हे पहुंचाया था उस लड़की तक जो बच गयी थी. जगतार भैया ने बताया था मुझे की 2 लड़किया खिलाफ हुई थी विनोद चाचा और पप शर्मा के जिसमे से एक को तोह मार दिया गया और दूसरी को रपे का वीडियो दिखा कर चुप करवा दिया गया. उस लड़की ने हे विनोद चाचा की पोल्ल खोली थी मां के सामने. वो ये सब अकेले करने वाले थे जिस से घर में टकराव हो सकता था लेकिन अब पापा तोह ऐसे लोगो को बख्सते नहीं और इसमें शामिल उमेद चाचा को भी करवा दिया क्योंकि वह मामला संगीन भी हो सकता है.", अर्जुन के इस रहस्योघाटन से संजीव लाजवाब था.
"और उन लोगो को ये पता भी नहीं की इस सबके पीछे तू है?", संजीव की बात पर अर्जुन ने कार मार्किट की पार्किंग में रोक दी. दोनों पनवाड़ी तक चले आये तोह अर्जुन ने बताया.
"राजेश मां मेरे पार्टनर है भैया और ये बात किसी को नहीं पता सिवाए धर्मवीर अंकल और अब आपके. पापा की तरह ऑपरेशन ब्लेड कौन चला सकता है?", अब संजीव का दिमाग ठनका और उसको करम सिंह वाली वारदात याद आ गयी.
"मतलब.. मतलब वो सब उसको ढून्ढ रहे है जो उनके साथ हे हैं? राजेश मां से गाडी कोई मांग कर लेके हे नहीं गया था और इस बात के गवाह धर्मवीर जी है की राजेश तोह उनके साथ था. लेकिन तुम ये बात चाचा से क्यों छिपा रहे हो?"
"पापा है वो मेरे और कुछ सच उनके सामने नहीं आने चाहिए भैया. जो भी हो मैं उनका दिल नहीं दुख सकता. असली टीम तोह हम दोनों हे है लेकिन न मैं आपको ऐसे काम करते देख सकता हु जिस से आपकी वर्दी पर बात आये और न मैं खुद गलत करके परिवार का विश्वास टॉड सकता हु. अब जिनको इस सबकी आदत है और लाइसेंस है उन्हें करने देते है ये सब. बस अब आप इस रमन शर्मा का कुछ पता लगवाओ. शेरो की लड़ाई में अक्सर गीदड़ फायदा उठा लेते है.", संजीव ने अब सिग्गटे सुलगा ली थी और अर्जुन निम्बू सोडा का गिलास थामे कुछ गंभीर था.
"जगतार से मिलवा सकता है मुझे?"
"वो तोह चले गए होंगे बॉम्बे आंटी जी के साथ लेकिन शादी के बाद वो दोनों हे हमारे घर आएंगे. सच कहु तोह देखने में वो रईस शांत से सरदार है लेकिन नेटवर्क बहोत सॉलिड है. आपको तोह शायद जानते भी हो क्योंकि उनका असली घर तोह अपने गाँव के साथ वाले कसबे में हे है. उन्हें हमारी फॅमिली का ाचे से पता है.", अर्जुन ने हर बात बताई तोह संजीव कुछ सोच में पड़ गया. जगतार नाम उसने सुना था लेकिन कहा याद नै.
"चल, जब आएगा तोह मिल हे लूंगा. वैसे तू मुझे शायद सबकुछ नहीं बताता.", संजीव भैया ने नाराजगी से कहा था बेशक झूठी.
"आपसे तोह कुछ छिपता भी नहीं भैया लेकिन जब मुझे सही वक़्त लगता है मैं पूरी बात बताता हु आपको. अधूरी से हम दोनों हे परेशां होंगे. वैसे छिपा तोह आप भी रहे है आजकल.", अर्जुन ने जैसे हे ये कहा संजीव गौर से उसको देखने लगा. संजीव तोह हर बात बताता था अर्जुन को
"तुम्हे ऐसा क्यों लगा?"
"वो आप न उस पीसीओ में स्टूल लगा कर बैठे हुए थे आज 9 बजे."
"हाहाहा.. कमीने, तेरी भाभी से हे बात कर रहा था. और तू क्या कर रहा था इस तरफ?"
"काम से आया था लेकिन फिर सोचा क्यों रंग में भांग दालु. वैसे आप तोह रोमांटिक भी हो जो ऐसे घर से बहार बंद केबिन में बिना गर्मी की परवाह किये इतनी देर तक बातों में लगे रहते हो.", अर्जुन अब मजे ले रहा था और संजीव के चेहरे पर बड़े होते हुए भी शर्म आने लगी थी.
"तेरी भाभी को तू अभी जानता नहीं बच्चू. मैं तोह शांत आदमी हु लेकिन वो बिलकुल उलट है. प्यार में भी अनुशाशन और नियम की लिस्ट बना के रखती है. वैसे तुझसे जब मिलेगी तब उसको झटका लगने वाला है.", संजीव ने ये बात अभी न बताई और अर्जुन भी हँसते हुए उनके साथ कुछ वक़्त यही बातें करता रहा. घडी में 12 बजते हे दोनों घर वापिस निकल चले. अर्जुन ने कपडे बदल कर उमेद चाचा की हवेली जाना था.
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"सब तैयारी है न राजेश?", शंकर और राजेश ने अपनी अपनी कार हॉस्पिटल में हे रहने दी. पार्टी की शान बढ़ने का सामान लिए दोनों उमेद की मेर्सेडस में बैठे तोह उमेद ने यही सवाल किया.
"निश्चिंत रहो जीजा जी, आपके लिए ख़ास खंजर और शंकर जीजा जी के लिए आधा दर्जन सर्जिकल ब्लेड के साथ साथ शैम्पेन खोलने वाले ओपनर ले लिए है. ये रुस्सियन रिवॉल्वर भी मेरी बगल में रहेगी. वैसे वह कुछ ज्यादा हे गरम माहौल मिलने की आशा है मुझे.", राजेश ने एक बार वो बक्सा खोल कर दिखाया और पिछली सीट पर पसर कर बैठ गया.
"हाँ, ऐसी उम्मीद तोह मुझे भी है क्योंकि विनोद से ज्यादा अकड़ इक़बाल और विमल कपूर दिखने की कोशिश करेंगे. अब जो बाँदा नशे का इतना बड़ा काम करता हो वो कुछ तोह रसूख रखता हे होगा. और इक़बाल एक तरह से इन सबका सेनापति है जिस पर मेरे सिवा कोई हाथ नहीं डालेगा.", शंकर के इस कथन पर उमेद ने कार मुख्या मार्ग पर डालते हुए कहा.
"तू देख लियो इक़बाल और उसके गुर्गो को भोले, ये कपूर की आरती मैं हे उतरूंगा. साला नशे का काम करके खुद को राजनीतिक गुंडा समझते है लेकिन गुंडई मैं खून में लिए पैदा हुआ हु. राजेश अपना सलाद काटने में माहिर है और ये सब संभाल लेगा. बस विनोद और वह मौजूद किसी घरवाले पर जानलेवा हुम्ला नहीं करना ये ध्यान रखना राजेश. विनोद या कोई जीजा foon-faan करे तोह तबियत से समझा देना. लड़कियों का क्या हुआ शंकर?", उमेद हर पहलु पर विचार करता था और यही उसको एक लीडर बनती थी.
"दोनों लड़कियां ट्रेनिंग कर चुकी है गज्जू और काबिल है. पोस्टिंग अगले महीने से होने वाली है उनकी लेकिन आज हे मिशन शुरू करवा दिया मैंने. अब लड़कियों से बलात्कार करने वालो को उनके हाथो सजा दिलवाना भी नेक काम हे हैं. अंकिता और सुजाता नाम है दोनों का और दीपक ने हे तैयार किया है उन्हें. 8 बजे वो बताई जगह मौजूद मिलेंगी.", शंकर की बात पर उमेद अब कुछ सहज हुआ लेकिन उसको कुछ परेशानी और भी थी जो शंकर से छिप न सकीय.
"वैसे तू कुछ सोच रहा है जो इस मामले से अलग बात है गज्जू. चाहे तोह बोल सकता है.", उमेद ने एक फीकी मुस्कान से शंकर को देखा और फिर सड़क पर निगाह कर ली.
"आइशा थोड़ा अलग सा व्यवहार कर रही है कुछ समय से भोले. और कल शाम से शालिनी भी बदली बदली सी है. शालिनी का तोह चलो मूड ाचा है और वो माँ की हर बात मान रही है, हंस बोल भी रही है लेकिन आइशा में आया बदलाव चिंताजनक है.", उमेद ने अपनी बहिन और भांजी का जीकर किया तोह शंकर के साथ साथ राजेश भी चिंतित और उत्सुक लगे.
"ऐसा क्या बदलाव नजर आया भाई? बची बड़ी हो रही है और हो सकता है ये वैसा हे बदलाव हो. कॉलेज जाने वाली है वो और ये नया जीवन होता है जिसमे परिवर्तन और व्यवहार अलग बात नहीं."
"हाँ उमेद जीजा जी. वो मेरी बिटिया को हे देखो. 12तह क्लास तक तोह स्वाति हमेशा हे कंचन के सिवा किसी से बात नहीं करती थी, अब वो कपडे भी खरीदती है, सबसे हंसती बोलती भी है और अपनी माँ के साथ भी सहेली जैसी है. हाँ ये सब बदलाव चिंता वाले नहीं है और आपकी बात से लगता है ऐसा मामला नहीं है.", राजेश जैसे परेशानी समझ रहा था लेकिन असलियत उसको भी पता नहीं थी बात कुछ और हे है.
"वो कल सुबह भी खाने की मेज पर अर्जुन को घूर रही थी और पहली बार उसने अर्जुन को घर आने का न्योता दिया. जानता है न वो लड़की अपने में हे खोयी रहती है और ज्यादा से ज्यादा माँ (पूर्णिमा) से लाड प्यार जताती है. अपने कमरे में अधिकतर रहने वाली आइशा को अब गुनगुनाते देखने लगा हु मैं और सबसे बड़ी बात उसके कमरे में ये मिला मुझे.", उमेद ने बायीं जेब से एक कागज़ निकाल कर शंकर को थमा दिया. शंकर की तोह धड़कन हे बढ़ चुकी थी अर्जुन के जीकर से और ये कागज़ जैसे आग में लिप्त हो. हिम्मतत करके खोला तोह दिल में aar-par तीर का चित्र जहा ी लव यू अर्जुन लिखा था और उसके निचे अनगिनत होंठो के निशाँ. सबसे आखिर में लिखा था , 'लेकिन कह नहीं सकती'
"ओह्ह्ह्हह्ह जीजा जी.. ये तोह बहोत बड़ी गड़बड़ हो गयी.", राजेश ने वो देख तोह सर पीट लिया. मामला एकतरफा प्यार का होने के साथ साथ bhai-behan का भी था. और ये दोनों तोह मिले हे अभी थी जिसमे अर्जुन की कभी बात न हुई थी आइशा से.
"इस अर्जुन को मैं बहार हे भिजवा देता हु 5-6 साल के लिए. साला एक गांडपंगा ख़तम नहीं होता और 10 शुरू. अब ये भी नहीं सोचा के वो बहिन है उसकी.", शंकर को क्रोधित होते देख उमेद ने बड़े प्यार से सर सहलाते हुए कहा.
"ओह मेरे भोले, तू न समझता बाद में है फैंसले पहले कर लेता है. अर्जुन तोह आजतक बोलै भी नहीं है आइशा से और यहाँ लिखा हुआ तुझे समझ नहीं आया? आइशा एकतरफा चाहने लगी है अर्जुन को जिसका खुद अर्जुन को पता भी नहीं. लेकिन अगर ये बात जीजा (शालिनी के पति) तक गयी तोह वो आइशा की बात मान लेंगे. परेशां मैं आइशा से हु, अर्जुन तोह परेशानी से निकलने वाला इंसान है.", अब शंकर के दिमाग ने भी कुछ समझा इस बात को और मामले की संगिनियत को.
"लेकिन लफड़े वाला काम तोह हो गया है भाई. आइशा ज़िद्दी भी है और बात मनवाने में माहिर भी. अर्जुन का पहले हे 2-2 जगह चक्कर है और जिसमे से प्रीती के साथ उसकी शादी पक्की है.", शंकर का 2-2 कहना इन्हे समझ न आया और राजेश अनजाने हे बोल उठा.
"लेकिन मंजू बिटिया के साथ तोह वो आत्मिक तौर पर है न जीजा जी. सहारे की तरह और प्रीती तोह बचपन से उसकी हैं.", अब शंकर बोले भी तोह क्या. उसका दुखड़ा इन्हे समझना उसके बस से बहार हे था.
"वैसे अर्जुन हे आइशा को समझा सकता है भोले. उस लड़के को बात करने और समझने का सलीका है. मैंने ये बात किसी को नहीं कही सिवाए विन्नी के. वो बड़ी भी है और अर्जुन के साथ उसकी ाची जमती है. विन्नी की मदद से अर्जुन समझा हे देगा जितना मैं जानता हु. बस ऐसा होना नहीं चाहिए था भाई. लड़की के मैं में जो पहली तस्वीर छपती है उसको दूर करना आसान नहीं होता. खैर यहाँ मामला सिर्फ अट्रैक्शन का है तोह सफल होने की आशा रखनी हे पड़ेगी.", उमेद ने इस विषय को बंद करते हुए अब जरुरी बातों पर चर्चा शुरू की. कार अब थोड़ी सही रफ़्तार से हाईवे पर दौड़ रही थी.
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अर्जुन सांझ में 5 बजे वापिस निकला था उमेद चाचा की हवेली से. मैं कुछ वक़्त अजीब हुआ था लेकिन शालिनी बुआ और आइशा के हँसते हँसते विदा लेने पर वो भी बेहतर महसूस करने लगा था. पूर्णिमा जी ने आज उसको अज्जू चाचा की चैन पहनाई थी और जितने प्यार से अपने हाथो से खाना खिलाया था वो अर्जुन के जेहन में एक खुशनुमा एहसास सा बना चूका था.
"क्या सोच रहे हो?", विन्नी ने अर्जुन को ये दूसरी तरफ से कार ले जाते हुए भी अलग बात कही. उसको बस अर्जुन के साथ एकांत चाहिए था और इस रास्ते का तोह यही मतलब था की अर्जुन भी उसकी हालत समझ रहा है. घर में भी आज 2-3 प्यारे चुम्बन दोनों के बीच हुए थे, हवेली भ्रमण के वक़्त लेकिन वो सब बस हलकी फुलकी मस्ती थी.
"ऐसा को बुरा लगा होगा न दीदी?"
"पागल हो तुम. न तोह तुमने उसको ये कहा की वो तुमसे प्यार न करे और न हे उसके दिल को ठेस पहुंचे. तुमने सच बतया न की तुम्हारे रिश्ते की कोई मंजिल नहीं हो सकती अगर वो तुमसे ऐसे हे एकतरफा प्यार करती रहे. और दोस्त बन्न ने के बाद वो कितनी खुश थी. सचमुच तुम बहोत समझदार हो अर्जुन.", विन्नी ने दोनों तरफ घने पेड़ और सुनसान सड़क देख अर्जुन के गाल पर होंठ टिका दिए.
"एक्सीडेंट करवाऊंगी आप. वैसे इरादे ठीक नहीं लग रहे आपके?", अर्जुन ने ये बात हँसते हुए कही थी और विन्नी ने कार की रफ़्तार धीमी होती देख अपनी बाहों का घेरा उसके गले में दाल दिया. उन मॉटे और नरम कबूतरों का एहसास अपनी ब्याह पर होते हे अर्जुन ने कार एक तरफ लगा दी. इस बार वो भी पलट कर विन्नी को बाहों में भर चूका था. एक पल दोनों की नजरे टकराई और फिर चेहरे नजदीक आते चले गए जबतक विन्नी के लाल होंठ अर्जुन के होंठो से न जा मिले. बड़े प्यार से शुरू हुआ ये चुम्बन हर गुजरते लम्हे से गहराने लगे. टॉप के ऊपर से हे अर्जुन ने एक बड़े बूब को पकड़ते हुए उनका अकार जांचा तोह वो विन्नी के छरहरे शरीर पर लगभग कोमल दीदी के सामान बड़े और कैसे हुए थे. विन्नी अर्जुन की इस हरकत से जोश में आती उसके होंठो को चबाने हे लगी थी.
"उफ्फ्फ्फ़.. यहाँ करना ठीक रहेगा?", विन्नी अलग होते हे टॉप निकलने लगी थी और अर्जुन ने तुरंत हाथ पकड़ लिया.
"पागल हो दीदी? ये सड़क अभी सुनसान है इसका ये मतलब नहीं की यहाँ कोई आएगा नहीं. ये तोह बस आपको मैं बता रहा था के मैं भी आपसे उतना हे प्यार करता हु और सब समझता भी हु. जो आप चाहती है वो हम कल आराम से करेंगे. मेरे पास अपनी ख़ास जगह है, सेफ भी और कम्फर्टेबले भी.", अर्जुन ने एक बार और उन भीगे हुए होंठो को चूमा तोह विन्नी थोड़ा शर्माती हुई सामने देखने लगी. मतलब कल अर्जुन उसकी चाहत पूरी करेगा वो भी सुकून से.
"वैसे तुम्हे ये लग रहा था के हम यही वो सब करेंगे?"
"रहने दो आप अब बातें बनाना. दिख रहा था के आप अभी रूकती नहीं अगर मैं न रोकता. वैसे अंदर का सब मैं देख चूका हु.", कार आगे बढ़ता हुआ अर्जुन मंद मंद हंस रहा था और विन्नी उसके कंधे पर हाथ मारती हुई नाराज होने का दिखावा करने लगी.
"बड़े आये सब देखने वाले. चलो आज का इन्तजार भी बेकार हे गया.", विन्नी के ऐसे कटाक्ष से अर्जुन ने गंभीरता से कहा.
"दीदी, करने को तोह अभी भी वो सब हो सकता है लेकिन आपको ऐसे समझ नहीं आएगा की मैं क्यों जल्दबाजी नहीं कर रहा. कल हम सवेरे हे चलेंगे और देख लेना आप दोपहर तक खुद वापिस घर आने से मन करोगी.", अर्जुन की बात सुन्न कर विन्नी को वो नजारा याद आ गया जब बबिता के साथ वो सहवास कर रहा था. सचमुच उस तगड़े मूसल से कौमार्य भेदन करवाने के बाद हालत खराब होने वाली थी उसकी.
"हाँ ठीक है ठीक है. सामने देख कर चलाओ और ये सड़क वैसे हैं तोह बड़ी शांत और साफ़ सुथरी. बस ज्यादा चौड़ी नहीं है.", अर्जुन को तोह जैसे इस बात में भी मजाक सूझ गया.
"सही समय आने पर ये भी चौड़ी हो जाएगी दीदी. संकरी हैं इस वजह से तोह सुनसान है. सही कनेक्शन होने दो फिर ट्रक भी चलेगा यहाँ."
"कमीने कही के. बहोत गंदे हो तुम.. छियई..", विन्नी को जब मतलब समझ आया तोह वो हाथ से उसकी बाजू पर मारने लगी लेकिन अगले हे पल उसकी हंसी गायब हो गयी जब अर्जुन ने गियर वाले हाथ से विन्नी का हाथ पकड़ कर अपनी पंत की ज़िप पर हथेली रखवा दी. विन्नी को ये गोल डंडा अपनी कलाई से भी कही ज्यादा मोटा और गरम महसूस हुआ. दिल की धड़कन बढ़ने लगी थी और वो हाथ हटाना चाहती थी. अर्जुन ने भी तरस खाते हुए कलाई छोड़ दी.
"अब तोह समझ गयी होंगी की क्यों मैं सड़क पर ट्रक नहीं दौड़ा रहा? Aas-pas toot-foot हो जाएगी तोह रिपेयर में टाइम भी लगेगा. आपकी तोह वैसे भी बंद गली है.", अर्जुन की ऐसी कामुक और खुली बात सुन्न कर विन्नी को अपने जिस्म पर लाल चींटिया रेंगती महसूस हुई. फिर हिम्मत करते हुए उसने खुद हे अर्जुन का औजार थाम लिया.
"सब संभाल लुंगी मैं, तुम बस खुद का ध्यान रखना. सड़क को तोह एक बार तकलीफ होगी, ट्रक न एक्सीडेंट हो जाये.", विन्नी कहने को तोह निडर होने का दिखावा कर रही थी लेकिन हाथ में वो मोटा मूसल जिस तरह से फड़क रहा था उसकी टांगो के बीच करंट सा लगने लगा. विन्नी ने सहलाते हुए पूरी लम्बाई मापनी चाही तोह वो लिंग उसकी दोनों हथेलियों की चौड़ाई से लम्बा था.
"हाथ हटा लो विन्नी दीदी, मेरा सचमुच ध्यान भटक रहा है.", विन्नी ने अपनी हसरत काबू करते हुए हाथ हटा लिया. अब कार कुछ रफ़्तार से दौड़ रही थी लेकिन दोनों बात करते रहे.
"वैसे बबिता दीदी ने भी ये झेला था न तोह उनकी हालत नहीं खराब हुई?"
"वो उन्होंने बताया हे होगा आपको. वैसे वो प्रेग्नेंट हो गयी है, कल हे पता चला था मुझे.", अर्जुन ने सपाट उत्तर दिया और विन्नी का मुँह खुला हे रह गया. उसको ये तोह पता था के बबिता शादी से पहले से हे अर्जुन के साथ हमबिस्तर हो रही है लेकिन गर्भवती होना ताज्जुब की बात थी. कार अब शहर में दाखिल हो चुकी थी इसलिए दोनों ने अपनी बातें सकरात्मक विषयो पर घुमाई और अर्जुन ने कद पर गाने चालू कर दिए.
'मुझको गलत न समझना, मैं नहीं बादल आवारा
दिल की दीवारों पे अपनी, नाम लिखा है तुम्हारा...'
और ऐसे हे कुछ बाज़ीगर अपनी मंज़िल से कुछ दुरी पर इस होटल के कमरे में ख़ास मुलाकात के लिए तैयार हो रहे थे. काली बदन उघडू ड्रेस में एक जानलेवा हसीना और दूसरी सफ़ेद लम्बे गाउन में मादक अप्सरा सी. उमेद के जिस्म पर पूरी आस्तीन का कला कुरता, गले में मोटी संगल सी सोने की चैन और कलाई में महंगी विदेशी घडी. जीजा साला तोह सफ़ेद कमीज के ऊपर नीला महीन कोट पहने कुछ विशेष हे लग रहे थे. विनोद ने अपनी लंका में आग लगवाने के लिए इन दरिंदो को 8 बजे का न्योता दिया था और 7:30 हो चुके थे.
"कोई रेहम नहीं.", उमेद ने दोनों लड़कियों से कहा
"जरा भी नहीं.", दोनों का स्वर एक जैसा था. खेल अब ऐसा होने वाला था जिस से अखबारों में सनसनी फैलनी लाजमी थी. सबसे खामोश था शंकर जो अक्सर शराब पीने से पहले गंभीर हे रहता था और उसके बाद जल्लाद. इस से बड़ा बाज़ीगर तोह अभी तक रामेश्वर जी ने भी नहीं देखा था. हारना हो तोह एक से भी हार जाए, अपनी आयी पर आया तोह पूरी फ़ौज पर भारी. बस ऐसा हे तोह था ये भोला जल्लाद बाज़ीगर.
बाज़ीगर (1)
रात साढ़े 11 के वक़्त अर्जुन कमरे में दाखिल हुआ तोह अपनी माँ को उस मद्दिम रौशनी से भरे कमरे में दूसरी तरफ करवट के बल सोये देखा. सुर्ख लाल निघ्त्य में क़ैद वो अध्भुत्त काया बस देखने भर से किसी भी पुरुष को सम्मोहित कर सकती थी. अर्जुन ने आहिस्ता से दरवाजा की चिटकनी लगाने के बाद कुछ पल इस जहां ख़ामोशी में ये उत्तेजक दृश्य निहारा और आराम से अपनी माँ की बगल आ लेता. सभी हसरतो को लगाम देता वो आँखें बंद किये बस उस मनभावन महक को फेंफड़ो में भरता हुआ पीछे से माँ की कमर में हाथ दाल लिप्त रहा.
जहा निश्छल प्रेम हो वह कोई वासना कैसे असर दिखा सकती है? बेशक अर्जुन के परुषत्व का एक भाग जिस्मानी तौर पर आसक्त था रेखा के अतुलनीय roop-youvan से लेकिन ऐसा तोह हर उस प्रेमी के साथ होता है जिसकी चाहत सीमा से परे हो. सोने की कोशिश इस मखमली बदन के सामीप्य में महुआ के नशे में बदल चुकी थी. मदमस्त हठी छक्क कर महुआ पीने के बाद जिस तरह मस्ती में कसमसाता है वैसी हे स्थिति अर्जुन की हो चुकी थी.
सपाट नरम पेट पर रेंगता वो मजबूत हाथ फिसलता हुआ कठोर उभारो पर चला आया. 3 बचो का मातृत्व भी रेखा के वक्षो का यौवन ढीला न कर सका, अपितु इनमे गुजरते समय के साथ ज्यादा निखार हे आया. अर्जुन ने अपने बड़े पंजे में एक सतांन को प्यार से थमा तोह निप्पल का कड़ापन साफ़ महसूस हुआ. करवट लेने से रेखा के दोनों सुडोल चुचो का आधा भाग निघ्त्य से बहार निकल कर अर्जुन को अपनी चिकनाहट का प्रदर्शन करता लगा.
'माँ..', अर्जुन ने धीमी आवाज में सरगोशी सी की और रेखा बंद आँखों से बस मुस्कुरा कर खामोश रही. अर्जुन समझ चूका था के अब ये प्रेम मिलान का अलग हे खेल है. आज सबकुछ उसको हे करना था वो भी बिना ज्यादा आवाज किये. हाथ सामने की तरफ से निघ्त्य में सरकते हुए अर्जुन ने निर्वस्त्र उभार पंजे में दबोचा तोह रेखा के जिस्म में सरसराहट हुई. अपने होंठ kaat-ti हुई वो आन्दन्दित हो रही थी अर्जुन द्वारा निप्पल सहलाने और दबाने से. अर्जुन थोड़ा उचकता हुआ दूसरे हाथ से रेखा के कंधे से कपडा खिसकता उस चिकनी त्वचा को चूमने लगा तोह रेखा की न चाहते हुए भी सिसकी निकल गयी.
'Ummmm..aahh.', इस आह की आवाज ने अलग हे जादू किया. अर्जुन थोड़ा कसके उस मॉटे सतांन को दबाता हुआ रेखा की उजली पीठ को दांतो के बीच दबाने लगा. भारी कूल्हों के बीच उसका अकड़ा हुआ कामदण्ड तीसरी चोट पंहुचा रहा था रेखा के जिस्म पर. एक पल के लिए अर्जुन अलग हुआ तोह रेखा जैसे स्वर्ग से जमीन पर आ गिरी. लेकिन अर्जुन ने उस एक पल में हे रेखा के जिस्म को aavaran-mukt कर दिया था. सांचे में ढला वो reit-ghadi (hour-glass) सा जिस्म अब अर्जुन के सामने निर्वस्त्र था लेकिन रेखा अभी भी करवट के बल दूसरी तरफ मुँह किये लेती रही. अर्जुन खुद को कपड़ो से विमुक्त करके एक बार फिर से यथास्थान चला आया.
"माँ, आप जानती हो की आपको देखने भर से मैं होश में नहीं रहता? पता नहीं नानी ने आपको पैदा किया था या आप उन्हें वरदान से मिली. मुझे नहीं पता के क्या गलत क्या सही है लेकिन आपसे खूबसूरत कोई भी नहीं.", अर्जुन अपनी बात कहते हुए रेखा की नाभि से उन्नत चिकनी जांघो तक हाथ फिरता musal-saal गर्दन, गाल चूम रहा था. जांघो की जड़ में दबा रेखा का कॉमद्वार इतनी हरकत से हे रस बहाने लगा. चेहरा घूमती हुई वो एक कशिश से अर्जुन को जैसे पुकारने लगी थी. लरजते होंठो का निमंत्रण अर्जुन ने तुरंत स्वीकार किया. ये चुम्बन इस कदर गहरा था की रेखा के मखमली बदन पर अर्जुन पूरी तरह छा गया.
"उम्म्म.. मेरे लिए तोह तुम वरदान हो अर्जुन आह्ह्ह्ह... आराम से..", रेखा के होंठ आजाद हुए तोह वक्षो से रिस्ता दूध देख चेहरे की लालिमा कही गहरी हो गयी. अर्जुन दोनों वक्षो का मर्दन करता हर तरफ चूम रहा था. रेखा की जांघो के बीच प्रहार करता वो कठोर लिंग हलके से फूली हुई योनि के होंठो से टकराया तोह एक आह्हः निकल गयी. अर्जुन भी इस स्पर्श से आंदोलित होता कुछ निचे सरक कर एक चूचक मुँह में लिए चूसने लगा और दूसरे हाथ से रेखा का वो विशाल नितम्भ दबाता बाए पांव को ऊपर उठाने लगा. रेखा ने भी घुटना मोड़ते हुए पाँव बिस्टेर पर टिकाया, जिस से अर्जुन मनचाहा प्यार कर सके.
"वैसे आपका जिस्म अभी तक अछूता सा क्यों है? देख कर लगता हे नहीं हम आपके बचे होंगे.", अर्जुन ने निप्पल के आस पास बिखरा दूध साफ़ करते हुए एक सरसरी निगाह दोनों पर्वत से खड़े चुचो पर डाली और घुटनो के बल बैठ कर रेखा की योनि निहारने लगा. इतने तगड़े लुंड से सहवास होने के बावजूद वो फूली और उभरी हुई योनि बहार से पूरी तरह कासी थी. नरम मांस पर हलकी सिलवाते और तजा साफ़ किया आस पास का चमकता हिस्सा नवयौवना सा था. कॉमर्स उस दरार से महीन लकीर से चिपका अर्जुन को अपनी तरफ आकर्षित करने लगा और जल्द हे अर्जुन की जिव्हा निचे से ऊपर तक चलती वो सारा शहद समेत गयी.
"आह्ह्हह्ह्ह्ह.. इससष्ठ.. पहले ये म्हणत एक उम्मीद से शुरू की थी.. आह्हः.. फिर आदत हो गयी अर्जुन.. मैं भी चाहती हु की ये कसाव कुछ काम हो लेकिन अब ये सिर्फ तेरे बस में है.. आह्ह्ह्हह.. िस्स्सस्स... ये.. ये क्या .. उम्मम्मम", अर्जुन उन फांको को खोल कर बड़े इत्मीनान से अपनी हसरत पूरी करता रहा. मोटी चिकनी जाँघे उसके सर को दबाने लगी. रेखा का सखलन होना भी भयंकर बहाव के रूप में था. अर्जुन ने आज वो केंद्रबिंदु सेहला दिया था जिसको G-spot कहा जाता है. रेखा की साड़ी ताक़त जैसे योनि से बहार बिखर चुकी थी. अर्जुन मुस्कुराता हुआ अपनी माँ की बगल में आ गया. अपने सीने से लगाए वो रेखा को तबतक सहलाता रहा जब तक सांसें व्यवस्थित न हुई.
"उफ्फ्फ.. ये अभी अभी क्या हुआ था अर्जुन?", अपने बेटे की मजबूत छाती का उभार सहलाती रेखा इतना सुकून महसूस कर रही थी जैसे आज कुछ और जंजीरो से आजाद हुई हो. अर्जुन मुस्कुराता हुआ अपनी माँ के ठोस कूल्हों के बीच की दरार में उंगलिया फसता लचीले मॉस को दबाते हुए उन्हें अपने लिंग के करीब करने लगा.
"ाचा लगा न आपको? ये तीसरी बार में जा कर मिला मुझे. G-spot कहते है उस रफ़ पॉइंट को जिसको सहलाते हे आपकी हालत ऐसी हुई. उमाहहह.", अर्जुन ने अपनी माँ की चिकनी जांघ अपने ऊपर रखते हुए भीगी हुई योनि पर वो मोटा सूपड़ा सताया और मजबूती से कूल्हे को अपनी तरफ दबाते हुए एक गहरा धक्का जड़ दिया. रेखा अभी जवाब देती उस से पहले हे आवाज अर्जुन के होंठो से बंद हो गयी. करवट के बल होने से छूट कही ज्यादा संकरी और फांके बुरी तरह उस मॉटे तगड़े औजार से रगड़ती हुई चौड़ी हो गयी. एक हे धक्के में अर्जुन आधे से ज्यादा उस मखमली सुरंग में लुंड बैठा चूका था.
"ओह्ह्ह्हह.. माँ सचमुच आप कमाल की हो.. आठ.."
"आउच.. आह्हः.. आराम से Arjun...uff.. तेरा ये हर बार पहले से ज्यादा बड़ा महसूस होता है और meri....aahh", रेखा को अर्जुन से ऐसी जरा भी उम्मीद न थी की वो इतनी जल्दी और वो भी 2 धक्को में उसके गर्भ पर ठोकर मार देगा. अर्जुन पूरी गहराई मापने के साथ आज उस गरम गुदाद्वार को भी कुरेद रहा था जोह कूल्हों की गहरी दरार में इस वक़्त थोड़ा उभर चूका था. रेखा अपनी बात अधूरी रखती अर्जुन के सीने पर अपने दोनों उभार चिपकाये खुद को लुंड झेलने लायक बनाने लगी.
"मेरा बड़ा महसूस होता है और आपकी पहले से ज्यादा टाइट. यही कह रही थी न आप? वैसे मेरा तोह पता नै लेकिन आपकी सचमुच टाइट है.. आह्हः.. देखो अब हिल भी नहीं रहा, कितनी बुरी तरह जकड लिए है आपने.", अर्जुन की ऐसी चुहल मस्ती देख रेखा शर्म से लिपटी रही लेकिन योनि का कसाव कुछ काम कर दिया. अर्जुन ने हलके धक्के देने शुरू किये तोह इस मजबूत लुंड ने रेखा को भी आहें भरने पर विवश कर दिया. बहार से फूली हुई छूट का अंदरूनी कसाव इस लम्बे तगड़े मूसल से अलग हे मस्ती भर रहा था.
"उम्म्म.. ऐसे हे अर्जुन.. आअह्ह्ह..", रेखा आसक्त होती अर्जुन को पीठ के भार पलटने लगी तोह अर्जुन भी अपनी को कमान देता निचे हो गया. अब बिस्टेर पर वो कामुक दृश्य था जिसमे भरपूर यौवन समृद्धि से लड़ी रेखा अपने बेटे की जांघो के गिर्द जाँघे फैलाये वो पूरा मूसल लिए आगे पीछे हो रही थी. उन भरावदार कूल्हों के बीच मूसल से लिंग को लीलती फूली हुई योनि का फैलाव साफ़ बता रहा था के अब यहाँ कोई और लिंग असर करने से रहा. अर्जुन ने पीठ उठाते हुए दोनों चुचो थाम लिए और उन्हें चूसक्ता हुआ वो रेखा की कामुकता बढ़ने लगा. दोनों का सहवास हर मुलाकात के बाद अब बेहतर खुलने लगा था.
"आह्हः.. इन्हे खाली कर दो.. उम्म्म..", अर्जुन के कंधे पकडे रेखा तेजी से अपने मांसल कूल्हों को पटकने लगी. हर बार जड़ तक लुंड अंदर जाता और गर्भ पर लगती ठोकर से ये उत्तेजना चरम पर जाने लगी. कमरे में हलकी patt-patt की आवाज के साथ बस रेखा की सिसकारियां गूंजती रही. आज अर्जुन भी उन कैसे हुए मॉटे मॉटे चुचो को तबियत से दबाता हुआ खाली कर रहा था.
"मैं.. होने लगी हु.. आह्ह्ह्हह..", 5-6 बार जोर से उछलने के बाद रेखा ने अर्जुन को बुरी तरह अपने सीने से चिपका लिया. छूट से बेहटा गरम तरल संकेत था एक और सखलन का. लेकिन अर्जुन के विचार आज अलग थे. रेखा को मौका दिए बिना अब वो ऊपर और उसकी कमर पर टाँगे बंधे रेखा बिस्टेर पर थी.
"अब मेरी बारी.. उम्म्म", उतनी हे मजबूती से रेखा को जकड़े हुए अर्जुन ने अपनी माँ के होंठो पर अपने होंठो का टाला जड़ दिया. जहा पहले रेखा 3-4 इंच उछाल रही थी अब अर्जुन सुपडे तक लिंग बहार निकाल कर तूफानी रफ़्तार में कमर चलने लगा. मजबूत छाती के निचे दबे रेखा के उरोज भरपूर रगड़ से छिलने लगे थे. गुलाबी योनि हर धक्के से और फ़ैल कर लाल होने लगी.
"आअह्ह्ह्ह... धीरे बाबा.. उफ्फ्फ.. माँ.. करता रह अर्जुन..", रेखा को खुद नहीं पता था के वो उसको रोकना चाहती है या इस तेज रफ़्तार चुदाई में ऐसे हे बानी रहना. गुलाबी फांको से रिस्ता रास गुदाद्वार भिगोता बिस्टेर पर गिरने लगा लेकिन अर्जुन का जोश जरा भी हल्का न हुआ. अब आवाज बदल कर fach-fach और oooh-aaahh की गूँज रही थी.
"माह.. आप हे सेहन कर सकती हो मुझे.. आह्ह्ह्ह..", एक पल तोह ऐसा भी आया की रेखा का शरीर हवा में उठाये अर्जुन अपनी माँ की योनि को बुरी तरह फैलता हुआ अपने लिंग की जड़ तक चिपकने लगा. निप्पल मुँह के सामने दीखते हे धक्के कुछ धीमे हुए और उनकी चुसाई से रेखा को अपनी चीख खुद हे मुँह पर हाथ रख कर दबनी पड़ी. सही मायने में रेखा को आज पता लगा था के अर्जुन की कामकला उसकी सोच से कितनी आगे है. इस बार सखलन का स्राव अर्जुन की जांघो को भिगोने लगा.
"ोोूफ़्फ़... फट गयी है shayad..aahhhhh..", रेखा के इस कथन पर अर्जुन बिना अलग हुए फर्श पर खड़ा हो गया. रेखा का धड़ बिस्टेर पर और कमर हवा में उठाये अर्जुन फिर से ताबड़तोड़ धक्के लगाने लगा. दोनों चुके आज कही इतने हिलने लगे थे जैसे अर्जुन उनकी अकड़ कुछ काम करने में कामयाब रहा हो. एक वक़्त ऐसा भी आया जब रेखा को अपनी छूट की फांके चीरती हुई महसूस होने लगी लेकिन उतना हे तेज तूफ़ान सा योनि के ख़ास बिंदु पर हो रहा था. अर्जुन ने जिस तरह ये चुदाई मुद्रा बनाई थी, उसका सूपड़ा हर भार वही टकराता जहा चरम बिंदु या G-spot था.
"आह्ह्ह्ह माँ.. मैं आने लगा हु..", अर्जुन के जबड़े भींच चुके थे और इधर रेखा के साथ आज कुछ अलग हे हुआ. योनि के अंदर जहा कॉमर्स का ज्वार उठा वही yoni-nakh से एक तगड़ी फुहार (स्क्वरटिंग) अर्जुन की छाती तक बरसने लगी. ये mutra-tyaag न था क्योंकि इसका स्त्रोत वही था जहा अर्जुन का लिंग धंस कर गरम वीर्य खाली करने में लगा था. ये अनोखी कॉमर्स की फुहार कोई 15 सेकंड बरसी और जैसे हे अर्जुन अलग हुआ रेखा की बिस्टेर किनारे लटकी टांगो के बीच से वीर्य फर्श पर गिरने लगा. रेखा को होश न था के आज हुआ क्या है और ये सब क्या था. जब तक होश संभाला अर्जुन फर्श और खुद को साफ़ करने के बाद रेखा को भी गीले तोलिये से पांच चूका था.
"वो गलत नहीं था माँ, जैसा आप शायद सोच रही हो. आपने उरिनाते नहीं किया, वो बस आपका G-spot सेंसिटिव होने के बाद अलग लिक्विड निकला था.", अर्जुन ने माँ का गाल सहलाते हुए उन सवालिया निगाहो को जवाब दिया और अपने सीने से लगा लिया. कुछ देर तक दोनों खामोश रहे और रेखा अब बेहतर महसूस कर रही थी.
"ये सब कैसे सीखा? सच कहु तोह आज शायद मैं 5-6 बार हुई और बाद में तुम्हारा वो भी कुछ बड़ा लगने लगा था. सुबह फिर से चलने में परेशानी होगी मुझे. अभी से पाँव जोड़ नहीं पा रही.", रेखा को अपने नंगेपन की कोई परवाह न थी. इस से पहले वो हमेशा अपने कपडे पहन लेती थी, सहवास के बाद. आज कुछ अलग था और अर्जुन द्वारा इतने प्यार से जिस्म सहलाना थकावट ख़तम कर रहा था.
"बुक्स. लाइब्रेरी में हमेशा तोह कोर्स की किताबे नहीं पढता न माँ? जब कुछ नया टॉपिक दीखता है तोह पढ़ लेता हु. उसके बाद थोड़ा इंटरनेट से पता चला लेकिन पिछली 2 बारी में मुझे आपका वो पॉइंट मिला हे नै जो आज मिला. वैसे आप टेबलेट ले रही है न? और मुझे तोह ाचा लगता है जब आप थोड़ा शर्माती हुई चलती है.", अर्जुन के मुस्कुराने पर रेखा ने नयी नवेली प्रेमिका की तरह गुस्सा करते हुए उसके सीने पर नाखून गधा दिए.
"देना फिर जवाब अपनी दादी और ताई को. वैसे भी कल तुम्हारी बुआ और कई लोग आ रहे है. साड़ी पहन कर तोह चला भी नहीं जाएगा."
"ाचा फिर आप salwar-kameej पहन लेना और हो सके तोह नहाते वक़्त आइस थेरेपी. उमाहहह. चलो अब सोना चाहिए माँ, डेढ़ बज चूका है.", अर्जुन ने रेखा को ऐसे हे बाहों में भरा तोह रेखा भी अलग होना नहीं चाहती थी. लेकिन कुछ नियम थे जिन्हे भुलाया नहीं जा सकता था.
"कोमल साढ़े 4 या 5 बजे आ जाती है. इसलिए कपडे पहन ने जरुरी है अर्जुन.", अर्जुन भी समझ गया था के इस कमरे में वो मनचाहे नहीं रह सकते. अलमारी से साफ़ गाउन देता वो भी अपने कपडे पहन कर वापिस आ लेता. रेखा को गाउन की चैन न बंद करने देता वो अभी भी स्टैनो को सेहला रहा था.
"मैं नहीं भरा तेरा इनसे?"
"कभी नहीं भरेगा लेकिन बस हाथ रख के सोने दो.", अर्जुन के ऐसा कहते हे रेखा बस मुस्कुरा कर करवट के बल लेट गयी. अर्जुन पीछे से चिपका कुछ वक़्त तक दोनों उभर सहलाता रहा और जल्द हे नींद के आगोश में चल दिया.. आज का सहवास उसके जीवन का सबसे लम्बा मिलान था जिसमे करीब 40 मिनट तक वो अपनी माँ की योनि से अलग न हुआ था. इतनी म्हणत के बाद नींद गहरी हे होनी थी.
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"तुम्हारा लाडला दिखाई नहीं दे रहा आज?", रामेश्वर जी अपनी दिनचर्या के अनुसार दाढ़ी बना रहे थे pooja-paath से फारिग हो कर. घर के ज्यादातर बड़े सदस्य बिस्टेर त्याग कर अपने दैनिक कार्यो में लगे थे और कौशल्या जी जब चाय ले कर बहार आँगन में आयी तोह उबासी लेते हुए नरिंदर जी भी अपने माता पिता के बगल में आ बैठे. शंकर नहाने के बाद कपडे बदल रहा था.
"उसका वो हे जाने और साल में होली दिवाली भी तोह होते है. सोने दो अगर उसकी इत्छा है तोह. वैसे भी उसका दिन लम्बा हे होने वाला है. रेणुका के साथ मार्किट जाना है और फिर शालिनी भी बुला कर गयी है. विनीता साथ हे आएगी उसके वापिस.", कौशल्या जी ने एक कप नरिंदर को थमते हुए सर पे हाथ फेरा तोह वो कप एक तरफ रखते अपनी माँ की गॉड में सर रख वही पसर गए.
"हाँ सही कहती हो भगवान. जब उसके baap-chacha हे बड़े नहीं हुए तोह वो तोह doodh-peeta बचा है. चलो ाची बात है वो आराम कर रहा है. मैं भी नाश्ते के बाद जरा शास्त्री जी की तरफ जा रहा हु. तुम्हारा क्या प्रोग्राम है महाराजा एंडर्सन?", रामेश्वर जी के ऐसे व्यंग पर नरिंदर के चेहरे पर भी शरारत आ गयी.
"आज तोह माँ ने मुझे कुछ भी करने से मन किया है पापा. ये कह रही थी की मैं बस आराम करू इनके पास. हाँ शंकर जरूर काम से बहार रहेगा और बाकी सब तोह राजू भाई और अर्जुन करने हे लगे है."
"हाँ, तुम तोह आराम हे करो बीटा. वो सरपंच जी के घर तोह तुम्हारी अम्मा जायेगी न? कृष्णा अब ठीक है और उसको भी ले जाओ अपने पीहर. मंदरी में मिलना कोई मिलना तोह नहीं हुआ न? शाम तक तुम्हारी लाड़ली बहिन भी आ जाएगी फिर तोह तुम कही जाने से रहे उसके बिना.", अपने पिता की बात सुन्न कर नरिंदर तुरंत सीधा बैठ गया. खुद हे सर खुजाते हुए बोलै.
"भूल गया था और परसो कृष्णा ने कहा भी था की आरती नानी से मिलने का बोल रही है. पहले तोह कह रही थी की अर्जुन ले जाएगा."
"अबे मूर्खनंद, तेरे ससुर के पास तू जाएगा अपनी बीवी को लेकर या अर्जुन? दोनों एक जैसे हे हो. शंकर हर हफ्ते ससुराल घूम आएगा लेकिन न बीवी बचो के लेके जाता है और न बताता है. यारी दोस्ती से भी अलग रिश्ते है तुम्हारे उन परिवारों में. चल चाय पी कर त्यार हो और फिर बहु और दोनों बच्चियों को भी नाश्ते के बाद लेके निकल. और जनाब, तुम किधर चले इतनी सवेरे?", यहाँ शंकर तोह चकाचक सफ़ेद कमीज और भूरी पतलून पहने पूरी तरह तैयार प्रकट हुआ. अपने पिता की बात सुन्न कर एक पल तोह जवाब सोचता रहा लेकिन यहाँ इन्दर ने हे बात संभाली.
"भाई, ऋचा को घर छोड़ने के बाद हॉस्पिटल जाएगा. कोई सर्जरी है 8 बजे इसकी और फिर दोपहर को राजेश के साथ वो जगह देखने जाना है जहा काम शुरू करवाना है. शायद रात वापिस भी ना आये.", अब शंकर मुस्कुरा रहा था नरिंदर के जवाब पर लेकिन दोनों की मुस्कराहट तुरंत काफूर हो गयी.
"हाँ, तुमने पैदा किया है न मुझे जो तुम कहो वो मैं मान लू. जिस दिन ये पूरी आस्तीन की कमीज पहनता है उस दिन ये कौनसी सर्जरी करता है मुझे पता है. नवाब साहब, जो भी करो इस बूढ़े की िज्जात्त का ध्यान रखना. और चंद्रो भाभी से कहना की अगर समय हो तोह दर्शन दे जाए.", शंकर अभी आगे कुछ कहता ऋचा तैयार हो कर इधर चली आयी.
"चले चाचा जी?", अब दबी डाभी हंसी कौशल्या जी के चेहरे पर थी और शंकर झेंपता हुआ बिना कुछ कहे इलो में बैठ कर अपनी बेटी के साथ निकल लिया. रात से भरा बैठा था और आज मुन्नी की मुनिया से मिलने की कुछ ज्यादा हे जल्दी थी. ऋचा बेचारी अब 2 दिन गाँव में हे रहने वाली थी अपने बाप की वजह से.
"अब चाय ठंडी करेगा या तेल टपकौ?", रामेश्वर जी ने फिर से नरिंदर को लपका तोह वो चाय उठा कर अंदर हे चल दिया.
"आप भी, अभी तक इन बचो को झिडकते रेहतो हो. बड़े हो गए है ये दोनों लेकिन आपको तोह ये अभी तक वही कॉलेज वाले लगते है.", कौशल्या जी ने बचो की तरफदारी की तोह रामेश्वर जी के चेहरे पर ये तंजभरी मुस्क़ुआन आ गयी.
"थानेदारनी जी, इनके साथ साथ शायद आप भी 25 साल पीछे हे हो. ये घोड़े सुधरने का नाम हे लेते और जो अभी गया है वो जरूर किसी न किसी की मय्याट्ट बना कर वापिस आएगा. सवाल बड़े से करो तोह जवाब छोटा और दोनों पकडे जाए तोह फिर उनकी माँ की ममता. लगाए रखो अपने पल्लू से इन्हे, तुम्हारा हे नाम रोशन करेंगे किसी दिन.", अब कौशल्या जी भी बुरा सा मुँह बनती चल दी और पंडित जी हंसने लगे. यही तोह होता था अक्सर जब बचो की वजह से इन दोनों में ये तुनक भरी बातें होती थी.
"माँ, ये ारु कब सोया था आपके पास? 11 बजे तोह ये ऊपर था छोटी चची के साथ.", ऋतू अपनी माँ के कमरे से बहार आयी जहाँ अभी तक अर्जुन गहरी नींद में पसरा था. 6 बज चुके थे लेकिन वो टास से मास्स न हुआ था. वही रसोई में काम करती रेखा जी के चेहरे पर आया नूर अलग कहानी बता रहा था जिसकी समझ अभी ऋतू को न थी. सलवार कमीज में केहर बरपाती रेखा जी अपनी बेटी की बात पर उसको कॉफ़ी पकड़ती बताने लगी.
"उसके थोड़ी देर बाद हे आया था लेकिन सोया देर से था शायद. जा कर उठा दो अपने भाई को.", ऋतू कप ले कर कमरे में वापिस आयी लेकिन उठाने की जगह खुद भी उसकी बगल में लेट गयी, झप्पी दाल के. नींद में हे अर्जुन ने उसको अपने आगोश में लिया तोह आँखें मीचे ऋतू उसके सीने से लगी मुस्कुराने लगी. अभी इस लम्हे को 5 मिनट हे गुजरे थे और कमरे में आयी रुपाली और तारा हैरानी से इन दोनों को देखने लगी. अवस्था आपत्तिजनक तोह नहीं थी बस ऋतू का सर अर्जुन की ब्याह पे और चेहरे उसके सीने में धंसा था.
"ये मैडम, नहाने के बाद फिर से सो रही है?", तारा ने रुपाली को देखते हुए कहा
"पता नहीं लेकिन अर्जुन तोह इस वक़्त घर पे होता नहीं और होता भी है तोह बहार दादा जी के पास. उठाओ इस ऋतू को मंदिर चलने के लिए.", रुपाली ऐसा खुद भी कर सकती थी लेकिन उसने तारा से कहा.
"मैं रिस्क नहीं लेती जब वो अर्जुन के पास हो. मामी या कोमल दीदी को हे बोल नहीं तोह तू दिखा जरा इसको उठा कर.", रुपाली चुपचाप बहार हे निकल गयी जैसे उसको ऋतू की नाराजगी का पता हो. तारा वही कुर्सी पर बैठ टेबल पर कोहनी टिकाये इन दोनों को देखती हुई ऋतू की जगह खुद को सोचने लगी. कमरे में रेखा जी आयी और टेबल पर कॉफ़ी का कप, बिस्टेर पर Arjun-Ritu और उन्हें टकटकी बांधे देखती तारा पर नजर पड़ी तोह सर पे हाथ रख लिया.
"काम से काम तुम तोह हिला दो इस आफत को. ये दोनों जाने कब बड़े होंगे और वैसे ये ऋतू सारा दिन अर्जुन को परेशां करती रहेगी लेकिन प्यार भी सबसे ज्यादा अपने भाई से है.", रेखा जी ने कप उठाया तोह तारा ने हाथ खड़े कर दिए.
"मामी, अपने को तोह किसी की नींद डिस्टर्ब नहीं करनी. दोनों आराम से सोये हुए हे ठीक है और ऋतू 1 बजे तक पढ़ रही थी इसलिए सोने हे दो.", अब तारा भी बहार चल दी हंसती हुई लेकिन एक और शख्स था जो अर्जुन की तलाश में इधर आ पंहुचा. थानेदारनी साहिबा.
"रेखा, तू इस सलवार कमीज में जाँच रही है. वैसे तेरे लाडला इधर हे सोया पड़ा है क्या?", वो अभी कमरे के बहार हे थी और रेखा जी ने अपनी सास को इशारा किया और खुद एक तरफ हो गयी.
"हे राम. एक तोह ये बैलबुद्धि और दूसरी सी बलूंगड़ी. पड़े रहने दे इन्हे, जब उठेंगे तब उठेंगे. कौनसा इनकी जरुरत है अभी.", अब हैरान होने की बारी रेखा जी की थी. उनकी सास के चेहरे पर पहले जो भाव आये थे वो अलग थे लेकिन बाद में मुस्कुराना और इन दोनों को सोये रहने का बोलना गले नहीं उतरा.
"पता नहीं माँ जी ये ऋतू कब बड़ी होगी? इसका अपने भाई से कुछ ज्यादा हे मोह है और बढ़ती उम्र के साथ ये ज्यादा बचपना करने लगी है. अर्जुन भी इसको टोकता नहीं.", रेखा ये बात बहोत धीमी आवाज में कर रही थी कौशल्या जी से. इस वक़्त रसोई में यही दोनों थे, कोमल सबके लिए चाय ले कर जा चुकी थी.
"तुम तोह माँ हो रेखा, तुम्हे तोह खुश होना चाहिए इन दोनों का प्यार देख कर.", कौशल्या जी जैसे मुद्दे की बात घुमा रही थी जो रेखा को चिंतित कर रही थी.
"माँ जी, मुझे दोनों के प्यार से ऐतराज नहीं है. लेकिन कई बार प्यार की सीरत और सूरत सही से पता नहीं चलती. इन दोनों में कुछ अलग है जो मुझे चिंतित करता है. कभी परवरिश पर सवाल आया तोह..", रेखा अपनी बात कहते कहते गाला रुंधने पर दुपट्टे से आँखें साफ़ करने लगी. वो जो कहना छह रही थी वो चाह कर भी बोल न सकीय लेकिन कौशल्या जी ने अपनी बहु की चिंता और परिवार के प्रति समर्पण देख मुस्कुराते हुए अपने सीने से लगा लिया.
"मैं ये बात तुझसे करती रेखा क्योंकि जो तू सोच रही है वो मैं भी सोचती थी. फिर अर्जुन ने जब Subhadhra-Arjun का वर्णन किया तोह अनजाने में हे उसने जैसे ये कबूल कर लिया की वो ऋतू के बिना अधूरा है. एक नजर से तोह वो भाई बहिन की अटूट प्रेम की डोर है लेकिन इसका असल स्वरुप अर्जुन को नहीं पता. ऋतू के दिल को सब पता है और तुम या मैं कुछ भी नहीं कर सकते. बचे समझदार है और इनके प्यार पर संदेह करके हम भगवान् का हे अनादर करेंगे. तुम्हारे पापा तोह यही कहते है की जो नियति को मंजूर, वही होगा. बड़े बाबा भी प्रीती और ऋतू को वो चला दे कर गए थे जो 2 अलग अंगूठी होने के बावजूद आपस में जुड़ने पर एक हो जाता है. हर इशारा यही कहता है की इनका प्रेम हम सामाजिक लोगो से ऊपर और साफ़ है.", बात कहते कहते एक पल को तोह कौशल्या जी भी कमजोर पड़ने लगी थी लेकिन वो हिम्मती थी.
"ये आप कह रही है माँ जी?"
"तुझे किसी और की आवाज सुनाई दी क्या? तेरा खसम भी जानता है ये सब और इसलिए उस दिन मैंने कहा था के प्रीती और ऋतू को मैं कभी अलग नहीं होने दूंगी जब वो ऋतू को बिनावजह तंग कर रहा था. मेरे लिए सभी बचे बराबर है रेखा लेकिन ऋतू सर्वोपरि है. ये तुम भी जानती हो की उसके जनम के बाद इस घर में खुशियां हे आयी है फिर वो चाहे अर्जुन के हे रूप में क्यों नहीं. बाकी तुम उनकी माँ हो, फैंसला ले सकती हो.", कौशल्या जी की इतनी बड़ी बात सुन्न कर रेखा ने उनका हाथ थाम लिया.
"आपने कभी गलत नहीं कहा माँ जी और पैदा करने भर से मैं माँ नहीं कहला सकती. बचो को पला भी आपने है और इनको jiwan-anushashan भी आपने दिया. बस समाज में ऐसे रिश्ते कलंक...
"तेरा कलंक आँखों में काजल की तरह लगा के ख़तम कर दूंगी मैं. समाज की तोह मैंने 15 बरस की उम्र में न सुनी फिर अपने बचो के लिए तोह समाज से अलग होना भी मंजूर. वैसे भी बहोत समय है 5-6 साल में दुनिया 1500 बार घूम जाती है, बचो के भी कुछ समझ आ जाये तब तक. नहीं तोह शंकर कन्यादान करेगा और तू बहु ले आईओ.", माहौल को हल्का करने के इरादे से कौशल्या जी ने ऐसा कहा तोह भीगी आँखों से भी रेखा के चेहरे पर हलकी मुस्कान आ गयी.
"वैसे बचे तेरे 21-22 साल के होने लगे और तू ढलने का नाम हे न ले रही.", कौशल्या जी ने जो सवाल किया था अब इसका रेखा क्या जवाब देती. बेटी और माँ का दिल एक हे लड़के के पास है और माँ को तोह वो deh-sukh देने भी लगा है.
"हाँ माँ जी, ये बात तोह बिलकुल सही की आपने. रेखा की कार तोह उलट चलने लगी है. मेरे बाल सफ़ेद हो गए और ये वैसी बनती जा रही है जैसी घर में ब्याह के आयी थी. मोटी तोह मैंने ये अर्जुन के पैदा होने पे हे देखि थी.", ललिता जी अपने हे अंदाज में रहती थी जब हंसी मजाक की बात हो.
"तब तोह होना भी जरुरी था ललिता, साढ़े 3 किलो का बचा पैदा करने के लिए 15 किलो बढ़ाना भी पड़ता है. बस उसके बाद से ये उम्र रोक गयी और वैध की बेटी हो के मैं भी पता न लगा पायी के ये कौनसी jadi-booti खा रही. इसकी माँ सुनंदा से हे पूछूँगी, जब वो कल आएगी. खैर बुढ़ापे में भी वो भी बूढी न हो रही तोह इसके खून में भी गुण तोह होंगे हे. बाकी शंकर की माया.", कौशल्या जी ने जहा आज रेखा को एक गहरा सच बताया था वही वो इसके बाद उसका मैं हल्का करने में सफल रही थी. रसोई से निकल कर वो अपने पति की तरफ चल दी थी और अब वह बस रेखा और ललिता जी हे थे.
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"जीजा, सत्यानाश हो गया.", सुबह के 7 बज रहे थे और विनोद परेशान सा पप शर्मा के घर आ पंहुचा. शर्मा तैयार हो कर अभी अखबार हे पढ़ रहा था और आँचल रसोई में चाय बना रही थी. अपने साले को इतनी सवेरे घर आया देख वो भी हैरान था. शराब और शबाब में चूर रहने वाला विनोद अक्सर 8 बजे तो सो कर उठता था.
"अब क्या बादल फट पड़ा साले साहब? जरा बैठ कर तसल्ली से बताओ के मामला क्या है.", शर्मा ने वही हॉल में विनोद को अपने साथ सोफे पर बैठते हुए पूछा.
"वो मैंने बताया था न के उस लड़की को कब्जे में ले लिया है? रवि और करतार की गाडी सड़क से निचे पलटी मिली है वह की पुलिस को. रवि की तोह हालत फिर भी नाजुक है लेकिन करतार से मेरी 6 बजे बात हुई थी अभी. उसने पुलिस को तोह यही बताया है की गाडी का बैलेंस बिगड़ने से वो पलट कर 6 फ़ीट निचे गिर गयी.", विनोद ने बात कहते कहते टेबल पर राखी बोतल से एक बड़ा घूँट पानी का गले में उतरा और फिर कुछ गहरी सांस लेते हुए बोलै.
"करतार ने बताया की काली लांसर में सवा 6 फ़ीट का एक पहलवान उनसे टकराया था और उसने करतार को उठा कर सड़क पर पटक मारा. उसके बाद वो कुछ वक़्त बेहोश रहा लेकिन इतनी देर में रवि को उसने बहोत बुरी तरह से तोडा. बाद में कार के साथ इन दोनों को निचे फेंक कर वो लड़की लेके चलता बना. पन्गा हो गया जीजा ये तोह और जितनी मैं समझ रखता हु वो लड़का और कार ख़ास है.", विनोद का डर देख एक बार तोह शर्मा भी घबरा गया लेकिन उम्रदराज और जमीन का व्यापारी था पप शर्मा.
"तोह एक सवा 6 फ़ीट का पहलवान लड़का हमारा क्या बिगाड़ सकता है विनोद? वैसे भी लड़की की जरुरत हे नहीं थी हमको. इक़बाल को तोह हम रास्ते से हटा हे देंगे बस उसके फार्महाउस पर गाँव की भोली भली लड़कियां पंहुचा कर पुलिस और राजेश को इतिल्ला करना है. संजोग से वो कोई लड़का होगा जिसकी नजर पड़ गयी होगी कार में बंधी लड़की पर."
"ओह मेरे प्यारे जीजा, बात इतनी भी सीढ़ी नहीं है. वो लड़का है अर्जुन शर्मा, मेरा भतीजा क्योंकि वही ऐसा पहलवान है और वो कार भी उसकी है. करतार ने ये भी बताया था के उसके साथ एक खूबसूरत सी लड़की भी थी, मतलब मेरी कोई भतीजी. अर्जुन शंकर भैया का बीटा है लेकिन साले को मैं तोह घरेलु चुटिया सा समझ रहा था. ये नहीं पता था के इतना तगड़ा निकलेगा की रवि की हड्डियां टॉड कर हॉस्पिटल पंहुचा देगा. मान भी लू की वो किसी से कुछ नहीं कहेगा लेकिन मैं उधर शादी में तोह जाऊंगा हे?"
"ये तोह सचमुच समस्या हो गयी विनोद. और अर्जुन तुम्हारा भतीजा है जो इतना ताक़तवर भी है की रवि जैसे पहलवान को थोक गया, वो भी अकेला. तुम ताई से बात करके देखो जरा. वैसे जितना मैं पंडित जी को जानता हु, वो परिवार के बीच तोह कभी रंजिश पैदा न होने दे फिर चाहे गलती तुम्हारी हे क्यों न हो. बहनचोद ये शंकर का लोंदा इतना बड़ा हो गया है क्या?", शर्मा की तोह गरारी हे अटक चुकी थी इस लड़के पर.
"बड़ा तोह वो है हे लेकिन साला हब्शी जैसा पूरा झोटा भी है. नरिंदर बता रहा था के खुद ताऊजी और कोच संधू जी उसको प्रशिक्षित कर रहे है. लेकिन वो सीधा तोह मुझ पर कुछ नहीं करेगा?", विनोद अभी दुविधा में हे था और आँचल ढीली टीशर्ट और चुस्त पाजामे में बिना सीना ढके दोनों के लिए चाय रख कर चली गयी. उसकी थिरकती चाल देख एक पल को विनोद सब भूल गया फिर सहसा हे चौंकते हुए बोलै.
"जीजा, एक बार अनामिका से बात करके देखु की वह का माहौल कैसा है?", ये बात शर्म को भी जांची. अगर कुछ भी ऐसा वैसा हुआ है तोह जरूर कान में तोह बात पड़ी हे होगी. पास में हे रखा वो हरे रंग का टेलीफोन खिसकते हुए विनोद ने पंडित जी के घर का नंबर लगा दिया. 3-4 घंटी हे गयी थी और उधर से फ़ोन रुपाली ने उठाया.
"Hello", रुपाली ने बिना हे नंबर देखे ऐसा कहा.
"हाँ बिटिया हम विनोद शर्मा बोल रहे है. तुम्हारी चची अनामिका से बात करवा सकती हो?", अब तारा को छोड़ कर तोह सभी भतीजी हे लगती थी विनोद की इसलिए बात ज्यादा न खींचते हुए सीधा मुद्दे की बात करि.
"एक मिनट चाचा जी, चची इधर हे हैं.", अनामिका नाश्ता करके बस उठी हे थी. 'चची, आपके लिए विनोद चाचा का फ़ोन है.', रुपाली की आवाज पर अनामिका तुरंत इस तरफ चली आयी. उन्हें फ़ोन दे कर वो भी बहार चल दी, नाश्ता करने. इस वक़्त कमरे में बस अनामिका हे थी.
"Hello, नमस्ते जी.", अनामिका की आवाज सुन्न कर विनोद कुछ चैन सा मिला. अपनी पति से बात करते हुए अनामिका थोड़ा सेहम जाती थी हमेशा.
"नमस्ते नमस्ते. और सुनाओ तुम कैसी हो? हमारा बीटा कैसा है?", विनोद ने भरसक मीठा होने की कोशिश की थी और वो सफल भी रहा.
"जी मैं भी ठीक हु और निकेतन अभी बड़ी माँ के पास है बहार आँगन में. यहाँ सभी उसको प्यार करते है और ध्यान भी रखते है. आप आ रहे है?", अनामिका ने वही सवाल किया जिसकी वजह से वो थोड़ा असहज हो रही थी. इधर अर्जुन भी चची को अकेले फ़ोन पर लगे देख अंदर चला आया, जाली का दरवाजा ढालते हुए. शरारत करने के हिसाब से उसने चची की गोरी कमर सहलाई और बगल में लेट गया.
"आउच.. क्या करते हो अर्जुन?", अनामिका ने दबी आवाज में हँसते हुए उसको मन किया और अर्जुन करीब लेता अब ब्लाउज और साड़ी के बीच वाले गदराये गोर पेट पर उंगलियों से सितार बजने की क्रिया करने लगा. फ़ोन के दूसरी तरफ विनोद ने भी हलकी आवाज में अर्जुन का नाम सुना था और अपनी बीवी की आह भी. सबर जवाब दे गया और झांटे सुलग गयी.
"हहहह.. तुम अकेली हो अनामिका?"
"जी, वो अभी अर्जुन आया था और गलती से ऊँगली पर पाँव रखा गया.", अनामिका झूठ बोल रही थी और इधर अर्जुन अपना पूरा पंजा उस चिकने पेट पर रखे फ़ोन से आती हलकी आवाज सुन्न ने लगा. अनामिका को पता भी नहीं चल रहा था के आखिर हो क्या रहा है. फ़ोन पर पति था और इधर अर्जुन की हरकते उसको उत्तेजित कर रही थी.
"ाचा ठीक है. वैसे जवान लड़का है तोह थोड़ा मर्यादा में रहना. शहर की हवा में रहा है तोह.. वैसे मैं 19 को आऊंगा माँ बाबू जी के साथ.", अभी विनोद आने का कार्यक्रम बता रहा था लेकिन इधर कुछ और हे कार्यक्रम चलने लगा. अर्जुन की ऊँगली अनामिका की नाभि में रेंग रही थी और वो अनजाने में हे अर्जुन के चेहरे तक अपना सीना ले आयी. शरारत अब उत्तेजिट करने लगी तोह अनामिका की सांसें उखाड़ने लगी. अर्जुन ने हे हाथ हटाया.
"ओह चची, बात कर लो उधर चाचा कुछ बोल रहे है. ", अर्जुन ने ये सब इस तरह कहा था जिस से विनोद ाचे से उसकी आवाज सुन्न सके. अनामिका भी भोलेपन से बोल गयी.
"जी, बड़ी दीदी और जीजा जी नहीं आ रहे आपके साथ?", यहाँ विनोद की अर्जुन की बात सुन्न कर टाइट हो चुकी थी और इधर उसकी बीवी अभी भी ऐसी बातें कर रही थी.
"हाँ.. वो लोग भी शादी के दिन आएंगे. तुम अपना और बेटे का ख़याल रखना. वैसे ये अर्जुन तुम्हारी ज्यादा हे सेवा नहीं कर रहा?", विनोद के स्वर की तल्खी अनामिका समझ न सकीय लेकिन अर्जुन अब उसकी गॉड में सर रखे लेता मुस्कुरा रहा था. उसकी इस हरकत पर अनामिका का हाथ भी स्वतः अर्जुन का सर सहलाने लगा और वो फ़ोन पर जवाब देने लगी.
"सेवा तोह सभी करते है जी, बिलकुल बेटी की तरह रखा है बड़ी माँ और सभी दीदी ने. हाँ अर्जुन मेरे दूध और खाने का पूरा ध्यान रखता है और हमारे बेटे की भी सभी जरुरत का. पाउडर, कपडे, तेल ये खुद हे ले आया था.", विनोद की बोलती हे बंद हो चुकी थी अर्जुन पुराण सुन्न कर और इधर अर्जुन के अलग हे गृह घूम रहे थे. चची की गॉड में लेटने पर वो साफ़ उस जानी पहचानी महक को साँसों में उतार रहा था जिसमे मातृत्व वाले दूध का समावेश हो. एक बार अनजाने हे उसकी नाक उन दूध से भरे कलश से टकराई तोह वो बेहाल होने लगा. चेहरा घुमाया तोह अनामिका की सांस उखड गयी, अर्जुन का मुँह और गरम सांसें अपने पेट पे महसूस करते हे.
"हाँ ाची बात है लेकिन थोड़ा सीमा बरकरार रखना तुम. पहलवान सा है तोह शायद दिमाग काम हो और कुछ उल्टा सीधा हो गया तोह.. ", विनोद पहले हे परेशां था मंजू के मामले से और इधर उसको अंदेशा था कही अब उसकी बीवी पर वो घोडा न चढ़ जाए. बदला लेने के चक्कर में ऐसा कर भी सकता था क्योंकि अनामिका bholi-bhali सी महिला थी.
"जी, वो खुद हे मर्यादा में रहता है. वैसे कुछ जरुरी बात करनी थी .. उम्म्म्म", अनामिका की योनि में खिंचाव उत्पन्न होने लगा था उन गरम साँसों से और इस तरह का स्पर्श आज पहली बार हे हुआ था उसके जिस्म पर. मजे की अधिकता में उसने खुद हे अर्जुन का सर दबा लिया.
"वो.. ऐसा कुछ ख़ास नहीं था बस तुमसे हालचाल लेना था. चलो रखता हु, काम भी देखना है.", फ़ोन रखते हे अनामिका ने अपनी हालत देखि. चेहरे पर हलकी शर्म के साथ उसने अर्जुन का कान उमेठा तोह वो झट्ट उठ खड़ा हुआ.
"बहोत बदमाशी नहीं कर रहे थे तुम? और अपनी भाभी से ऐसी चुहल कौन करता है भला?", अनामिका झूठा नखरा दिखा रही थी लेकिन वो साफ़ कैसे कहती की उसकी हालत खराब हो चुकी है और अगर अर्जुन थोड़ा सा भी आगे बढ़ता तोह वो उसको टोकती भी नहीं.
"आप इतनी प्यारी हो चची की बस दिल किया के आपकी गॉड में सर रख के लेता राहु. लेकिन उतनी हे ाची महक भी आती है आपसे तोह गलती अपने आप हे हो गयी. वैसे आपको बुरा लगा क्या?"
"बुरा नहीं लगा लेकिन कुछ अलग सा था. ऐसे में कोई देख सकता है ये भी नहीं सोचा हमने. चलो मैं बाद में बात करती हु, निकेतन को नहलाना भी है और फिर उसको भूख भी लगी होगी.", अनामिका उठने लगी तोह अर्जुन ने एक और तीर चला दिया.
"जिस चीज की भूख है उसकी हे खुशबु आ रही थी चची.. सॉरी भाभी.", और एक बार फिर से वो चची का गाल चूम कर बहार दौड़ गया. अनामिका को ये सब हंसी मजाक और प्यारी हरकते बड़ी सुहा रही थी. अभी तक के जीवन में ऐसा तोह उसके साथ कभी न हुआ था लेकिन आज उसको हिंदी फिल्मो वाला prem-romance याद आने लगा. शर्माती मुस्कुराती हुई वो आँगन की तरफ चल दी और दिमाग में अर्जुन द्वारा कही दूध की महक वाली बात पर एक बार फिर से पेट से निचे सिहरन दौड़ने लगी. उधर विनोद की हालत देख शर्मा भी चिंतित हो गया.
"क्या लगता है तुम्हे?"
"जीजा लग्न वागना छोडो जीजा, यहाँ मेरी लग्ग गयी है शायद. बात से तोह साफ़ पता चलता है के उधर अर्जुन ने ऐसी कोई जीकर नहीं किया लेकिन वो हमारी सोच से ज्यादा शातिर है."
"ऐसा क्या पता लगा तुम्हे? मेरे सामने तोह साधारण हे बात हो रही थी बस एक बार तुमने ये जरूर पुछा के अर्जुन क्या कर रहा है.", शर्मा ने कुरेदा तोह विनोद ने बता दिया.
"वो सिसकारी ऐसी थी जैसी आप समझ रहे है न जीजा? अनामिका ने सफाई से झूठ कहा के अर्जुन चला गया है लेकिन वो हलके हलके 2-3 बार आहें भरी थी. और शायद अर्जुन उस से चिपका हुआ था क्योंकि मेरी बीवी सही से जवाब भी नहीं दे रही थी जैसे कही खोयी हो. वो मेरी हरकत का बदला अब अनामिका के साथ कुछ गलत करके न ले? साला है भी हब्शी और मेरी बीवी नाजुक सी.", विनोद के मैं में तोह यहाँ तक ख़याल आ रहे थे की कही अर्जुन के निचे दबी बकरी सी अनामिका की दुर्गति न हो जाए.
"खयालो से बहार आओ मुंगेरीलाल. वो पंडित जी का घर है और तुम्हारा भतीजा ऐसा वैसा कुछ नहीं कर सकता. इतने लोग घर में रहते है लेकिन तुम्हारे मैं में खोट है इसलिए तुम मजाक मस्ती को ऐसे ले रहे हो. घर में फ़ोन जानते हो न कहा होता है? ऐसी हरकत वो भी शादी ब्याह वाले भरे पूरे घर में कोई क्यूँकर कर सकता है? और अर्जुन को किसने बताया होगा की वो सब तुमने किया है?", शर्मा के ऐसे खुलासे पर विनोद भी निरुत्तर हो गया. विनोद के ये सभी बातें सच हे लगी क्योंकि घर तोह वो भी होकर आया था अभी कुछ दिन पहले. अर्जुन ऐसा नहीं कर सकता सबके सामने. लेकिन उसको क्या पता था के अर्जुन क्या कर सकता है क्या नहीं.
"हाँ सही कहा आपने जीजा. वो अगर कुछ करता तोह सबसे पहल ताऊजी को बताता और वो मुझे फ़ोन करते या पापा को. और करतार तोह बेहोश हो गया था और रवि की हालत नाजुक है जिसका मतलब अर्जुन ने बिना पूछे हे उसकी ठुकाई कर दी होगी गुस्से में. पुलिस का लफड़ा न पड़े इसलिए वो दौड़ गया होगा नहीं तोह बुलाता जरूर इतनी बड़ी बात पर. आप सचमुच समझदार व्यक्ति हो जीजा.", अब एक मूरख दूसरे की तारीफ कर रहा था और दोनों खुश हो रहे थे. अर्जुन क्या कर चूका है ये तोह उनके साथ साथ शंकर और रामेश्वर जी को भी भनक न थी. अनामिका चची के साथ उसका वो प्यार भरा खेल इस मामले से अलग था.
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दिन नियत गति से आगे बढ़ने लगा था. चंद्रो देवी की हवेली पर पेट और उस से निचे की आग शांत करके शंकर जी भी अपने काम पर निकल चले और नरिंदर भी बीवी और दोनों बेटियों को लिए अपनी ससुराल की राह पर बढ़ गए. रामेश्वर जी इनसे पहले हे आचार्य जी के घर जा चुके थे जहा से वो लोग कही और जाने वाले थे. अर्जुन तैयार हो कर रेणुका को लिए महिला डॉक्टर की तरफ चल दिया. रोमिला ने पुछा भी था के वो लोग कहा जा रहे है लेकिन रेणुका ने आ कर बताने की बात कही थी.
हमेशा की तरह रेणुका खुश थी अर्जुन के सामीप्य में और अगले 2 घंटे अर्जुन हमेशा की तरह कभी प्रेमी तोह कभी एक पति के अवतार में रहा. डॉक्टर से भी हर टेस्ट और khaan-paan की जानकारी उसने रेणुका के साथ बैठ कर हे ली. आने वाले समय में लगने वाले इंजेक्शन और जरुरी टेस्ट का ब्यौरा अर्जुन ने अपने दिमाग में छाप लिया था. बहार आये थे तोह समय का सदुपयोग करते हुए वो रेणुका को कुछ और आरामदायक कपड़ो के साथ साथ फल और चॉकलेट का डिब्बा भी दिलवाता लाया.
अर्जुन अभी से वो सब जानकारी एकत्रित कर रहा था जो उसके आने वाले जीवन में काम की थी. रेणुका भी इस दौरान भरपूर खुश थी और समय को समझते हुए दोनों हे 11 बजे तक वापिस लौट आये. गेट से अंदर जाते हे रेणुका को सबसे पहले प्रीती ने हे छेड़ा था.
"बुआ, आपकी लिपस्टिक गायब है. माँ के देखने से पहले ठीक कर लीजिये.", हंसती हुई वो ऋतू की तरफ चली गयी थी रेणुका को परेशां करके. घर के बहार हे संजीव भैया और अर्जुन को बात करते देख वो बस भैया के पीछे से एक हवाई चुम्बन अर्जुन को देती अंदर चली गयी थी लेकिन कार के शीशे से ये हरकत पोलिसिअ जेठ देख चूका था.
"तोह अब तुम क्या करने वाले हो इस बारे में?", संजीव भैया अर्जुन के कहने पर उसकी कार में बैठ चुके थे. धीमी रफ़्तार में चलता अर्जुन कुछ पल खामोश रहा और फिर उसने अपनी बात केहनी शुरू की.
"आज मंजू पर हाथ डाला है और कल को शायद ऋतू या अलका दीदी के साथ वो ऐसा कर सकते है. यहाँ बाकी सभी समझदार लोग ये क्यों नहीं देख पा रहे की रमन शर्मा (दामिनी का pati/Vinod का छोटा जीजा) बारमेर से है और जिस तरह से वो दबा हुआ जीवन जी रहा है, मुझे वो आदमी एक हम मोहरा लगता है भैया. विनोद चाचा में दिमाग नहीं है बस घमंड है रुतबे का. वो ताक़त पाना चाहता और मंजू का प्रयोग शायद दलीप मौसा को दबाने में करता.", अर्जुन ने जब ऋतू अलका का जीकर किया तोह शांत रहने वाले संजीव की आँखों में भी लहू उतर आया. उसके लिए तोह बहिन मतलब देवी और घर की प्रतिष्ठा थी. फिर भी अर्जुन द्वारा लिए रमन शर्मा के नाम से वो संभल गया.
"देख, तू कुछ भी गलत नहीं करता और न करेगा. लेकिन एक बात पता चली है की आज रात शंकर चाचा विनोद के साथ कुछ बड़ा करने वाले है. ये बात मुझे बहार से हे पता चली है. वैसे तू कल हुए हादसे के बाद अभी तक शांत तोह नहीं बैठ सकता. बताने का कष्ट करेगा की अब क्या खेल रचाया है और ये रमन शर्मा तोह फूफा लगता है अपना."
"इस फूफे को नंगा करना है भैया और विनोद चाचा का तोह समझो बेडा पार हो जाएगा कल सवेरे तक. जगतार भैया ने बताया था मुझे उनके होटल में चलने वाले काळा कारनामो के बारे में और लड़कियों के साथ जो व्यभिचार चाचा करते है. आज रात को होटल पर छपा पड़ेगा और सबूत ऐसे मिलेंगे की होटल सील. विनोद चाचा बच जाएंगे क्योंकि होटल में क्या होता है इस से मालिक हमेशा मुकरेगा और नाम मैनेजर पर आता है. ये चोट जरुरी है उनका दौलत वाला घमडं तोड़ने के लिए. फिर शादी के बाद मैं गाँव जा हे रहा हु, बाकी जड़ वह काट दूंगा. वैसे पापा भी तोह हमारा हे काम कर रहे है.", अब संजीव का माथा ठनका की अर्जुन शायद इस मुद्दे पर बहोत पहले हे काम कर चूका है. मंजू वाले किस्से का बदला वो होटल से ले रहा है.
"तू चाचा वाले प्लान के बारे में जानता है?"
"राजेश मां को मैंने हे पहुंचाया था उस लड़की तक जो बच गयी थी. जगतार भैया ने बताया था मुझे की 2 लड़किया खिलाफ हुई थी विनोद चाचा और पप शर्मा के जिसमे से एक को तोह मार दिया गया और दूसरी को रपे का वीडियो दिखा कर चुप करवा दिया गया. उस लड़की ने हे विनोद चाचा की पोल्ल खोली थी मां के सामने. वो ये सब अकेले करने वाले थे जिस से घर में टकराव हो सकता था लेकिन अब पापा तोह ऐसे लोगो को बख्सते नहीं और इसमें शामिल उमेद चाचा को भी करवा दिया क्योंकि वह मामला संगीन भी हो सकता है.", अर्जुन के इस रहस्योघाटन से संजीव लाजवाब था.
"और उन लोगो को ये पता भी नहीं की इस सबके पीछे तू है?", संजीव की बात पर अर्जुन ने कार मार्किट की पार्किंग में रोक दी. दोनों पनवाड़ी तक चले आये तोह अर्जुन ने बताया.
"राजेश मां मेरे पार्टनर है भैया और ये बात किसी को नहीं पता सिवाए धर्मवीर अंकल और अब आपके. पापा की तरह ऑपरेशन ब्लेड कौन चला सकता है?", अब संजीव का दिमाग ठनका और उसको करम सिंह वाली वारदात याद आ गयी.
"मतलब.. मतलब वो सब उसको ढून्ढ रहे है जो उनके साथ हे हैं? राजेश मां से गाडी कोई मांग कर लेके हे नहीं गया था और इस बात के गवाह धर्मवीर जी है की राजेश तोह उनके साथ था. लेकिन तुम ये बात चाचा से क्यों छिपा रहे हो?"
"पापा है वो मेरे और कुछ सच उनके सामने नहीं आने चाहिए भैया. जो भी हो मैं उनका दिल नहीं दुख सकता. असली टीम तोह हम दोनों हे है लेकिन न मैं आपको ऐसे काम करते देख सकता हु जिस से आपकी वर्दी पर बात आये और न मैं खुद गलत करके परिवार का विश्वास टॉड सकता हु. अब जिनको इस सबकी आदत है और लाइसेंस है उन्हें करने देते है ये सब. बस अब आप इस रमन शर्मा का कुछ पता लगवाओ. शेरो की लड़ाई में अक्सर गीदड़ फायदा उठा लेते है.", संजीव ने अब सिग्गटे सुलगा ली थी और अर्जुन निम्बू सोडा का गिलास थामे कुछ गंभीर था.
"जगतार से मिलवा सकता है मुझे?"
"वो तोह चले गए होंगे बॉम्बे आंटी जी के साथ लेकिन शादी के बाद वो दोनों हे हमारे घर आएंगे. सच कहु तोह देखने में वो रईस शांत से सरदार है लेकिन नेटवर्क बहोत सॉलिड है. आपको तोह शायद जानते भी हो क्योंकि उनका असली घर तोह अपने गाँव के साथ वाले कसबे में हे है. उन्हें हमारी फॅमिली का ाचे से पता है.", अर्जुन ने हर बात बताई तोह संजीव कुछ सोच में पड़ गया. जगतार नाम उसने सुना था लेकिन कहा याद नै.
"चल, जब आएगा तोह मिल हे लूंगा. वैसे तू मुझे शायद सबकुछ नहीं बताता.", संजीव भैया ने नाराजगी से कहा था बेशक झूठी.
"आपसे तोह कुछ छिपता भी नहीं भैया लेकिन जब मुझे सही वक़्त लगता है मैं पूरी बात बताता हु आपको. अधूरी से हम दोनों हे परेशां होंगे. वैसे छिपा तोह आप भी रहे है आजकल.", अर्जुन ने जैसे हे ये कहा संजीव गौर से उसको देखने लगा. संजीव तोह हर बात बताता था अर्जुन को
"तुम्हे ऐसा क्यों लगा?"
"वो आप न उस पीसीओ में स्टूल लगा कर बैठे हुए थे आज 9 बजे."
"हाहाहा.. कमीने, तेरी भाभी से हे बात कर रहा था. और तू क्या कर रहा था इस तरफ?"
"काम से आया था लेकिन फिर सोचा क्यों रंग में भांग दालु. वैसे आप तोह रोमांटिक भी हो जो ऐसे घर से बहार बंद केबिन में बिना गर्मी की परवाह किये इतनी देर तक बातों में लगे रहते हो.", अर्जुन अब मजे ले रहा था और संजीव के चेहरे पर बड़े होते हुए भी शर्म आने लगी थी.
"तेरी भाभी को तू अभी जानता नहीं बच्चू. मैं तोह शांत आदमी हु लेकिन वो बिलकुल उलट है. प्यार में भी अनुशाशन और नियम की लिस्ट बना के रखती है. वैसे तुझसे जब मिलेगी तब उसको झटका लगने वाला है.", संजीव ने ये बात अभी न बताई और अर्जुन भी हँसते हुए उनके साथ कुछ वक़्त यही बातें करता रहा. घडी में 12 बजते हे दोनों घर वापिस निकल चले. अर्जुन ने कपडे बदल कर उमेद चाचा की हवेली जाना था.
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"सब तैयारी है न राजेश?", शंकर और राजेश ने अपनी अपनी कार हॉस्पिटल में हे रहने दी. पार्टी की शान बढ़ने का सामान लिए दोनों उमेद की मेर्सेडस में बैठे तोह उमेद ने यही सवाल किया.
"निश्चिंत रहो जीजा जी, आपके लिए ख़ास खंजर और शंकर जीजा जी के लिए आधा दर्जन सर्जिकल ब्लेड के साथ साथ शैम्पेन खोलने वाले ओपनर ले लिए है. ये रुस्सियन रिवॉल्वर भी मेरी बगल में रहेगी. वैसे वह कुछ ज्यादा हे गरम माहौल मिलने की आशा है मुझे.", राजेश ने एक बार वो बक्सा खोल कर दिखाया और पिछली सीट पर पसर कर बैठ गया.
"हाँ, ऐसी उम्मीद तोह मुझे भी है क्योंकि विनोद से ज्यादा अकड़ इक़बाल और विमल कपूर दिखने की कोशिश करेंगे. अब जो बाँदा नशे का इतना बड़ा काम करता हो वो कुछ तोह रसूख रखता हे होगा. और इक़बाल एक तरह से इन सबका सेनापति है जिस पर मेरे सिवा कोई हाथ नहीं डालेगा.", शंकर के इस कथन पर उमेद ने कार मुख्या मार्ग पर डालते हुए कहा.
"तू देख लियो इक़बाल और उसके गुर्गो को भोले, ये कपूर की आरती मैं हे उतरूंगा. साला नशे का काम करके खुद को राजनीतिक गुंडा समझते है लेकिन गुंडई मैं खून में लिए पैदा हुआ हु. राजेश अपना सलाद काटने में माहिर है और ये सब संभाल लेगा. बस विनोद और वह मौजूद किसी घरवाले पर जानलेवा हुम्ला नहीं करना ये ध्यान रखना राजेश. विनोद या कोई जीजा foon-faan करे तोह तबियत से समझा देना. लड़कियों का क्या हुआ शंकर?", उमेद हर पहलु पर विचार करता था और यही उसको एक लीडर बनती थी.
"दोनों लड़कियां ट्रेनिंग कर चुकी है गज्जू और काबिल है. पोस्टिंग अगले महीने से होने वाली है उनकी लेकिन आज हे मिशन शुरू करवा दिया मैंने. अब लड़कियों से बलात्कार करने वालो को उनके हाथो सजा दिलवाना भी नेक काम हे हैं. अंकिता और सुजाता नाम है दोनों का और दीपक ने हे तैयार किया है उन्हें. 8 बजे वो बताई जगह मौजूद मिलेंगी.", शंकर की बात पर उमेद अब कुछ सहज हुआ लेकिन उसको कुछ परेशानी और भी थी जो शंकर से छिप न सकीय.
"वैसे तू कुछ सोच रहा है जो इस मामले से अलग बात है गज्जू. चाहे तोह बोल सकता है.", उमेद ने एक फीकी मुस्कान से शंकर को देखा और फिर सड़क पर निगाह कर ली.
"आइशा थोड़ा अलग सा व्यवहार कर रही है कुछ समय से भोले. और कल शाम से शालिनी भी बदली बदली सी है. शालिनी का तोह चलो मूड ाचा है और वो माँ की हर बात मान रही है, हंस बोल भी रही है लेकिन आइशा में आया बदलाव चिंताजनक है.", उमेद ने अपनी बहिन और भांजी का जीकर किया तोह शंकर के साथ साथ राजेश भी चिंतित और उत्सुक लगे.
"ऐसा क्या बदलाव नजर आया भाई? बची बड़ी हो रही है और हो सकता है ये वैसा हे बदलाव हो. कॉलेज जाने वाली है वो और ये नया जीवन होता है जिसमे परिवर्तन और व्यवहार अलग बात नहीं."
"हाँ उमेद जीजा जी. वो मेरी बिटिया को हे देखो. 12तह क्लास तक तोह स्वाति हमेशा हे कंचन के सिवा किसी से बात नहीं करती थी, अब वो कपडे भी खरीदती है, सबसे हंसती बोलती भी है और अपनी माँ के साथ भी सहेली जैसी है. हाँ ये सब बदलाव चिंता वाले नहीं है और आपकी बात से लगता है ऐसा मामला नहीं है.", राजेश जैसे परेशानी समझ रहा था लेकिन असलियत उसको भी पता नहीं थी बात कुछ और हे है.
"वो कल सुबह भी खाने की मेज पर अर्जुन को घूर रही थी और पहली बार उसने अर्जुन को घर आने का न्योता दिया. जानता है न वो लड़की अपने में हे खोयी रहती है और ज्यादा से ज्यादा माँ (पूर्णिमा) से लाड प्यार जताती है. अपने कमरे में अधिकतर रहने वाली आइशा को अब गुनगुनाते देखने लगा हु मैं और सबसे बड़ी बात उसके कमरे में ये मिला मुझे.", उमेद ने बायीं जेब से एक कागज़ निकाल कर शंकर को थमा दिया. शंकर की तोह धड़कन हे बढ़ चुकी थी अर्जुन के जीकर से और ये कागज़ जैसे आग में लिप्त हो. हिम्मतत करके खोला तोह दिल में aar-par तीर का चित्र जहा ी लव यू अर्जुन लिखा था और उसके निचे अनगिनत होंठो के निशाँ. सबसे आखिर में लिखा था , 'लेकिन कह नहीं सकती'
"ओह्ह्ह्हह्ह जीजा जी.. ये तोह बहोत बड़ी गड़बड़ हो गयी.", राजेश ने वो देख तोह सर पीट लिया. मामला एकतरफा प्यार का होने के साथ साथ bhai-behan का भी था. और ये दोनों तोह मिले हे अभी थी जिसमे अर्जुन की कभी बात न हुई थी आइशा से.
"इस अर्जुन को मैं बहार हे भिजवा देता हु 5-6 साल के लिए. साला एक गांडपंगा ख़तम नहीं होता और 10 शुरू. अब ये भी नहीं सोचा के वो बहिन है उसकी.", शंकर को क्रोधित होते देख उमेद ने बड़े प्यार से सर सहलाते हुए कहा.
"ओह मेरे भोले, तू न समझता बाद में है फैंसले पहले कर लेता है. अर्जुन तोह आजतक बोलै भी नहीं है आइशा से और यहाँ लिखा हुआ तुझे समझ नहीं आया? आइशा एकतरफा चाहने लगी है अर्जुन को जिसका खुद अर्जुन को पता भी नहीं. लेकिन अगर ये बात जीजा (शालिनी के पति) तक गयी तोह वो आइशा की बात मान लेंगे. परेशां मैं आइशा से हु, अर्जुन तोह परेशानी से निकलने वाला इंसान है.", अब शंकर के दिमाग ने भी कुछ समझा इस बात को और मामले की संगिनियत को.
"लेकिन लफड़े वाला काम तोह हो गया है भाई. आइशा ज़िद्दी भी है और बात मनवाने में माहिर भी. अर्जुन का पहले हे 2-2 जगह चक्कर है और जिसमे से प्रीती के साथ उसकी शादी पक्की है.", शंकर का 2-2 कहना इन्हे समझ न आया और राजेश अनजाने हे बोल उठा.
"लेकिन मंजू बिटिया के साथ तोह वो आत्मिक तौर पर है न जीजा जी. सहारे की तरह और प्रीती तोह बचपन से उसकी हैं.", अब शंकर बोले भी तोह क्या. उसका दुखड़ा इन्हे समझना उसके बस से बहार हे था.
"वैसे अर्जुन हे आइशा को समझा सकता है भोले. उस लड़के को बात करने और समझने का सलीका है. मैंने ये बात किसी को नहीं कही सिवाए विन्नी के. वो बड़ी भी है और अर्जुन के साथ उसकी ाची जमती है. विन्नी की मदद से अर्जुन समझा हे देगा जितना मैं जानता हु. बस ऐसा होना नहीं चाहिए था भाई. लड़की के मैं में जो पहली तस्वीर छपती है उसको दूर करना आसान नहीं होता. खैर यहाँ मामला सिर्फ अट्रैक्शन का है तोह सफल होने की आशा रखनी हे पड़ेगी.", उमेद ने इस विषय को बंद करते हुए अब जरुरी बातों पर चर्चा शुरू की. कार अब थोड़ी सही रफ़्तार से हाईवे पर दौड़ रही थी.
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अर्जुन सांझ में 5 बजे वापिस निकला था उमेद चाचा की हवेली से. मैं कुछ वक़्त अजीब हुआ था लेकिन शालिनी बुआ और आइशा के हँसते हँसते विदा लेने पर वो भी बेहतर महसूस करने लगा था. पूर्णिमा जी ने आज उसको अज्जू चाचा की चैन पहनाई थी और जितने प्यार से अपने हाथो से खाना खिलाया था वो अर्जुन के जेहन में एक खुशनुमा एहसास सा बना चूका था.
"क्या सोच रहे हो?", विन्नी ने अर्जुन को ये दूसरी तरफ से कार ले जाते हुए भी अलग बात कही. उसको बस अर्जुन के साथ एकांत चाहिए था और इस रास्ते का तोह यही मतलब था की अर्जुन भी उसकी हालत समझ रहा है. घर में भी आज 2-3 प्यारे चुम्बन दोनों के बीच हुए थे, हवेली भ्रमण के वक़्त लेकिन वो सब बस हलकी फुलकी मस्ती थी.
"ऐसा को बुरा लगा होगा न दीदी?"
"पागल हो तुम. न तोह तुमने उसको ये कहा की वो तुमसे प्यार न करे और न हे उसके दिल को ठेस पहुंचे. तुमने सच बतया न की तुम्हारे रिश्ते की कोई मंजिल नहीं हो सकती अगर वो तुमसे ऐसे हे एकतरफा प्यार करती रहे. और दोस्त बन्न ने के बाद वो कितनी खुश थी. सचमुच तुम बहोत समझदार हो अर्जुन.", विन्नी ने दोनों तरफ घने पेड़ और सुनसान सड़क देख अर्जुन के गाल पर होंठ टिका दिए.
"एक्सीडेंट करवाऊंगी आप. वैसे इरादे ठीक नहीं लग रहे आपके?", अर्जुन ने ये बात हँसते हुए कही थी और विन्नी ने कार की रफ़्तार धीमी होती देख अपनी बाहों का घेरा उसके गले में दाल दिया. उन मॉटे और नरम कबूतरों का एहसास अपनी ब्याह पर होते हे अर्जुन ने कार एक तरफ लगा दी. इस बार वो भी पलट कर विन्नी को बाहों में भर चूका था. एक पल दोनों की नजरे टकराई और फिर चेहरे नजदीक आते चले गए जबतक विन्नी के लाल होंठ अर्जुन के होंठो से न जा मिले. बड़े प्यार से शुरू हुआ ये चुम्बन हर गुजरते लम्हे से गहराने लगे. टॉप के ऊपर से हे अर्जुन ने एक बड़े बूब को पकड़ते हुए उनका अकार जांचा तोह वो विन्नी के छरहरे शरीर पर लगभग कोमल दीदी के सामान बड़े और कैसे हुए थे. विन्नी अर्जुन की इस हरकत से जोश में आती उसके होंठो को चबाने हे लगी थी.
"उफ्फ्फ्फ़.. यहाँ करना ठीक रहेगा?", विन्नी अलग होते हे टॉप निकलने लगी थी और अर्जुन ने तुरंत हाथ पकड़ लिया.
"पागल हो दीदी? ये सड़क अभी सुनसान है इसका ये मतलब नहीं की यहाँ कोई आएगा नहीं. ये तोह बस आपको मैं बता रहा था के मैं भी आपसे उतना हे प्यार करता हु और सब समझता भी हु. जो आप चाहती है वो हम कल आराम से करेंगे. मेरे पास अपनी ख़ास जगह है, सेफ भी और कम्फर्टेबले भी.", अर्जुन ने एक बार और उन भीगे हुए होंठो को चूमा तोह विन्नी थोड़ा शर्माती हुई सामने देखने लगी. मतलब कल अर्जुन उसकी चाहत पूरी करेगा वो भी सुकून से.
"वैसे तुम्हे ये लग रहा था के हम यही वो सब करेंगे?"
"रहने दो आप अब बातें बनाना. दिख रहा था के आप अभी रूकती नहीं अगर मैं न रोकता. वैसे अंदर का सब मैं देख चूका हु.", कार आगे बढ़ता हुआ अर्जुन मंद मंद हंस रहा था और विन्नी उसके कंधे पर हाथ मारती हुई नाराज होने का दिखावा करने लगी.
"बड़े आये सब देखने वाले. चलो आज का इन्तजार भी बेकार हे गया.", विन्नी के ऐसे कटाक्ष से अर्जुन ने गंभीरता से कहा.
"दीदी, करने को तोह अभी भी वो सब हो सकता है लेकिन आपको ऐसे समझ नहीं आएगा की मैं क्यों जल्दबाजी नहीं कर रहा. कल हम सवेरे हे चलेंगे और देख लेना आप दोपहर तक खुद वापिस घर आने से मन करोगी.", अर्जुन की बात सुन्न कर विन्नी को वो नजारा याद आ गया जब बबिता के साथ वो सहवास कर रहा था. सचमुच उस तगड़े मूसल से कौमार्य भेदन करवाने के बाद हालत खराब होने वाली थी उसकी.
"हाँ ठीक है ठीक है. सामने देख कर चलाओ और ये सड़क वैसे हैं तोह बड़ी शांत और साफ़ सुथरी. बस ज्यादा चौड़ी नहीं है.", अर्जुन को तोह जैसे इस बात में भी मजाक सूझ गया.
"सही समय आने पर ये भी चौड़ी हो जाएगी दीदी. संकरी हैं इस वजह से तोह सुनसान है. सही कनेक्शन होने दो फिर ट्रक भी चलेगा यहाँ."
"कमीने कही के. बहोत गंदे हो तुम.. छियई..", विन्नी को जब मतलब समझ आया तोह वो हाथ से उसकी बाजू पर मारने लगी लेकिन अगले हे पल उसकी हंसी गायब हो गयी जब अर्जुन ने गियर वाले हाथ से विन्नी का हाथ पकड़ कर अपनी पंत की ज़िप पर हथेली रखवा दी. विन्नी को ये गोल डंडा अपनी कलाई से भी कही ज्यादा मोटा और गरम महसूस हुआ. दिल की धड़कन बढ़ने लगी थी और वो हाथ हटाना चाहती थी. अर्जुन ने भी तरस खाते हुए कलाई छोड़ दी.
"अब तोह समझ गयी होंगी की क्यों मैं सड़क पर ट्रक नहीं दौड़ा रहा? Aas-pas toot-foot हो जाएगी तोह रिपेयर में टाइम भी लगेगा. आपकी तोह वैसे भी बंद गली है.", अर्जुन की ऐसी कामुक और खुली बात सुन्न कर विन्नी को अपने जिस्म पर लाल चींटिया रेंगती महसूस हुई. फिर हिम्मत करते हुए उसने खुद हे अर्जुन का औजार थाम लिया.
"सब संभाल लुंगी मैं, तुम बस खुद का ध्यान रखना. सड़क को तोह एक बार तकलीफ होगी, ट्रक न एक्सीडेंट हो जाये.", विन्नी कहने को तोह निडर होने का दिखावा कर रही थी लेकिन हाथ में वो मोटा मूसल जिस तरह से फड़क रहा था उसकी टांगो के बीच करंट सा लगने लगा. विन्नी ने सहलाते हुए पूरी लम्बाई मापनी चाही तोह वो लिंग उसकी दोनों हथेलियों की चौड़ाई से लम्बा था.
"हाथ हटा लो विन्नी दीदी, मेरा सचमुच ध्यान भटक रहा है.", विन्नी ने अपनी हसरत काबू करते हुए हाथ हटा लिया. अब कार कुछ रफ़्तार से दौड़ रही थी लेकिन दोनों बात करते रहे.
"वैसे बबिता दीदी ने भी ये झेला था न तोह उनकी हालत नहीं खराब हुई?"
"वो उन्होंने बताया हे होगा आपको. वैसे वो प्रेग्नेंट हो गयी है, कल हे पता चला था मुझे.", अर्जुन ने सपाट उत्तर दिया और विन्नी का मुँह खुला हे रह गया. उसको ये तोह पता था के बबिता शादी से पहले से हे अर्जुन के साथ हमबिस्तर हो रही है लेकिन गर्भवती होना ताज्जुब की बात थी. कार अब शहर में दाखिल हो चुकी थी इसलिए दोनों ने अपनी बातें सकरात्मक विषयो पर घुमाई और अर्जुन ने कद पर गाने चालू कर दिए.
'मुझको गलत न समझना, मैं नहीं बादल आवारा
दिल की दीवारों पे अपनी, नाम लिखा है तुम्हारा...'
और ऐसे हे कुछ बाज़ीगर अपनी मंज़िल से कुछ दुरी पर इस होटल के कमरे में ख़ास मुलाकात के लिए तैयार हो रहे थे. काली बदन उघडू ड्रेस में एक जानलेवा हसीना और दूसरी सफ़ेद लम्बे गाउन में मादक अप्सरा सी. उमेद के जिस्म पर पूरी आस्तीन का कला कुरता, गले में मोटी संगल सी सोने की चैन और कलाई में महंगी विदेशी घडी. जीजा साला तोह सफ़ेद कमीज के ऊपर नीला महीन कोट पहने कुछ विशेष हे लग रहे थे. विनोद ने अपनी लंका में आग लगवाने के लिए इन दरिंदो को 8 बजे का न्योता दिया था और 7:30 हो चुके थे.
"कोई रेहम नहीं.", उमेद ने दोनों लड़कियों से कहा
"जरा भी नहीं.", दोनों का स्वर एक जैसा था. खेल अब ऐसा होने वाला था जिस से अखबारों में सनसनी फैलनी लाजमी थी. सबसे खामोश था शंकर जो अक्सर शराब पीने से पहले गंभीर हे रहता था और उसके बाद जल्लाद. इस से बड़ा बाज़ीगर तोह अभी तक रामेश्वर जी ने भी नहीं देखा था. हारना हो तोह एक से भी हार जाए, अपनी आयी पर आया तोह पूरी फ़ौज पर भारी. बस ऐसा हे तोह था ये भोला जल्लाद बाज़ीगर.
