अपडेट 184 (2)
Vivaah-Purva
संजीव की होने वाली बीवी राधिका के परिवार का संक्षिप्त परिचय.
सोमनाथ दत्त (55)राधिका के ताऊजी /Vidhayak-Karbori
मिनाक्षी दत्त (50) राधिका के ताईजी /कारोबारी महिला
मोहित दत्त (30) beta/karobar में maa-baap के साथ
विद्या दत्त (29) बहु
निकिता दत्त (27) beti/Naami 5 सितारा होटल की मालकिन
सुभाष चन्दर दत्त (51) राधिका के Pita/Prakhyat दवा कारोबारी
देविका दत्त (47) राधिका की Maa/Karobari महिला
राधिका दत्त (26) beti/Police अधिकारी
अखिल दत्त (24) बीटा/ मनमौजी
उर्वशी गौर - देविका दत्त की behan/Radhika की छोटी मौसी
सुरेश गौर - सुभाष दत्त का सहधू और राजेश शर्मा (अर्जुन के मां) का साला.
पीहू गौर (19) - Suresh-Urvashi की एकलौती संतान और राधिका की मौसेरी बहिन
पार्थिव वशिष्ट - (44) देविका और उर्वशी का भाई. राधिका के मां
माला वशिष्ठ - (39) पार्थिव की पत्नी और राधिका की मामी
जहाँ पंडित जी के परिवार में mehandi-haldi की रसम उनके घर पे हे हो रही थी, सेज सम्बन्धियों के बीच वही दत्त परिवार ने अपनी बिटिया की इन सब रस्मो के लिए क्सक्सक्सक्स शहर से बहार अपने बड़े फार्महाउस को चुना था. दिल्ली मार्ग पर थोड़ा अंदर की तरफ स्थित उनका ये विशाल फार्महाउस जितना हराभरा था उतनी हे बेहतरीन इमारत ठीक बीच में बानी थी. कई एकड़ में फैला हुआ फार्महाउस लगभग 100 से ज्यादा लोगो की chehal-pehal का गवाह था. आम, धाक, आंवले, शीशम, पॉपुलर और नीम जैसे वृक्षों का गंतत्व इतना अधिक था की बाहरी की गर्मी से जैसे ये जगह अछोटी हे थी.
घुमावदार सड़क जो पठार से बानी थी, उसका फैलाव लगभर हर तरफ था. इस पर हे चल कर करीब 30 कार एक निर्धारित जगह बड़े हे करने से कड़ी की गयी थी और आलिशान ईमारत से पहले हे टेनिस और बैडमिंटन के कोर्ट बने थे, जो फ़िलहाल निष्प्राण से थे. नीली टाइल से बना एक बहोत हे लम्बा चौड़ा तरणताल ठीक ईमारत की बगल में था लेकिन कोर्ट की तरह शांत न हो कर ये फिलहाल chatri-table आदि से सजाया जा रहा था.
सुभाष जी ने बेशक ये फार्महाउस एक आरामगाह की तरह बनाया था लेकिन समय समय पर इसमें बदलाव करते रहने से ये एक आलिशान संपत्ति का रूप ले चूका था. एक हजार गज से ऊपर रकबे में बानी 2 मंजिला ईमारत में 5 सितारा होटल जैसा वातावरण था और यही पर मधुर संगीत के साथ साथ सभी लोग राधिका की मेहंदी रसम का लुत्फ़ उठा रहे थे. दर्जनों खाने के स्टाल, उतने हे बैरे जो लोगो को thanda-garam के साथ साथ chaat-pakwaan आदि पंहुचा रहे थे.
"बड़े पापा, इसकी क्या जरुरत थी? देखिये मेरे लिए सबसे जरुरी था आपका आना और पहले हे आपने बहोत कुछ गिफ्ट कर दिया है तोह अब ये क्यों?", सोमनाथ दत्त जो इस परिवार के मुखिया सी हैसियत रखते थे, चाहे घर अलग अलग शहरों था, उन्होंने अंदर प्रवेश करते के साथ सबसे पहली मुलाक़ात अपनी भतीजी से हे की थी. राधिका एक आलिशान से गद्दे पर 2 मेहंदी लगाने वाली युवतियों के बीच बैठी किसी अप्सरा सी लग रही थी. उसके ird-gird उसकी कुछ सहेलियां और रिश्ते की बहने भी बड़े चाव से मेहंदी लगवाती दिखी. सोमनाथ जी ने किसी और से भेंट किये बिना सबसे पहले राधिका को हे 5-6 गहनों के डिब्बे सुपुर्द किये और एक थाली भर के नोट. अब तक सुभाष जी के साथ उनकी धर्मपत्नी देविका जी और सोमनाथ जी की बीवी मिनाक्षी भी मुस्कुराती हुई यहाँ आ चुकी थी.
"हम काम से समझौता कर सकते है बिटिया लेकिन तुम्हारे ख़ास पल में हे अगर हम शामिल न हो तोह फिर बड़े पापा कैसे कहलायेंगे? और ये गिफ्ट नहीं है, प्यार है जो आजकल के सुनार डिब्बों में बंद कर देते है. हाँ ये थाली में शगुन है जो हमारी बिटिया अपने हाथो से देवी माँ के मंदिर का पहला दान देंगी.", सोमनाथ बेशक राजनीति में एक मजबूत हस्ती था लेकिन गाहे बगाहे वो पारिवारिक shagal-mele में भी शामिल हो जाता था. आज तोह उसकी एकलौती भतीजी की रसम थी जिसका ख़ास महत्व था.
"मंदिर? अब कौनसे मंदिर में जाना है हमने बड़े पापा?", राधिका के गाल पर आये बालो को निक्की ने हे मुस्कुराते हुए पीछे किया और वो भी सुन्न ने लगी थी की उसके पिता जी क्या कह रहे है. आमंत्रित मेहमान तोह उपहार आदि देने के बाद कही बिज़नेस की चर्चा में लगे थे तोह कही महिलाये अपने किस्सों में उलझी थी. इस सबके बीच एक बात सामान थी के हरेक व्यक्ति खाने का भरपूर लुत्फ़ ले रहा था. लड़की वाले थे और अगले दिन विवाह, जिस वजह से ये कार्यक्रम दिन में हे रखा गया था और सिर्फ ख़ास ख़ास लोग हे आमंत्रित थे.
"बिटिया, मंदिर में जाना नहीं है. मंदिर बनवाना है और हम ये ऐसा इस लिए कर रहे है क्योंकि मन्नत मांगी थी. जब भी घर की कोई बेटी ब्याह कर जायेगी तोह हम देवी माँ के नाम से आश्रम और मंदिर का निर्माण करवाएंगे. जितने यहाँ थाली में है उतने की पर्ची मैं सुभाष (राधिका के पिता) की जेब से भी वह लगवाउँगा. हाहाहा..", एक सुरक्षाकर्मी बहोत बड़ा laal-safed गुलाब का गुलदस्ता लिए इनके करीब आ खड़ा हुआ तोह सोमनाथ ने वो अपने हाथो से अपने छोटे भाई और उसकी बीवी की तरफ बढ़ाया.
"भाई साहब.", सुभाष जी ने बस इतना हे कहा था के सोमनाथ ने ना में गर्दन हिला कर वही उनकी बात काट दी.
"101 फूल है सुभाष और सभी जीवित. आज के दिन की याद में ये सभी इस फार्महाउस के उद्यान में लगवा दो भाई. हमारी क्यारी का सबसे खूबसूरत फूल तोह हमारी दोनों बेटियां है लेकिन इन्हे पानी देते आता रहूँगा यही सोच कर की इनका सम्बन्ध हमारी राधिका बिटिया से है. मिनाक्षी तुम विद्या बहु को बुलवा कर उसके मेहंदी लगवाओ. देविका, बिज़नेस के मसले तोह चलते हे रहने है लेकिन ये दिन आज है और सिर्फ आज.", सोमनाथ विचारो से बेशक एक कट्टर व्यक्ति था और राजनीतिक मुनाफे के लिए जातीय विचार रखता था पर उसका riti-riwajo में अटूट विश्वास था. अपने भाई की बीवी को भी जैसे इशारा कर दिया था के घर में हर ब्याहत के भी मेहंदी लगेगी है.
"जी जेठ जी. आइये दीदी और निक्की तुम भी आ जाओ विद्या बिटिया को ले कर.", देविका मेहमानो के देखरेख करना चाहती थी लेकिन अब उसको भी जैसे पुरुषो से अलग करके एक जगह हे सिमित कर दिया था.
"हाँ तोह सुभाष, गर्मी इतनी है और तुमने यार यहाँ व्हिस्की चलवा राखी है?"
"भाई साहब सभी करीब दोस्त और पार्टनर्स है. छुट्टी के साथ साथ बेटी के फंक्शन में शामिल हो रहे है..."
"अरे भाई तुम हो निरे हे झंडू. गर्मी का मतलब तोह यही हुआ न के ठंडी बियर वीर मंगवाओ भाई, उसके बाद खाने पीने का इंतजाम देखते है. ये दिल्ली वाले सिंगला कैटरर्स है न?", अब सुभाष जी भी हंस दिए थे अपने बड़े भाई के ऐसे मस्ती भर मजाक पर. इतने गंभीर माहौल के बाद जैसे इसकी कल्पना न थी उन्हें और इसके साथ हे आज्ञा का तुरंत पालन हुआ. घुमते टहलते हुए सोमनाथ का परिचय खुद सुभाष जी सभी से करवा रहे थे. सिक्योरिटी वालो को यहाँ से बहार करके खाने पीने का आदेश दे दिया गया था.
"ए मुन्ना.. अरे तुम तोह बड़े टाइम बाद नजर आये.", सुरेश गौर ने इन्हे देखते हे राह बदलने की सोची थी लेकिन देर से. तब तक सोमनाथ ने उसको देख कर पहचान लिया था और आवाज भी ऐसे दी की पूरे हाल में सबको सुनाई पड़ी. अपनी बीवी उर्वशी और बेटी पीहू के साथ वो झूठी मुस्कान लिए इधर आ चला.
"पाए लागू भाई साहब.", खिसियाता सो वो इतना हे बोल पाया था और उर्वशी अपने जीजा सुभाष को नमस्ते करती हुई हंस कर एक तरफ हो गयी. उसकी बेटी पीहू के भी सर पे हाथ फिरते हुए सोमनाथ ने आशीर्वाद देने के साथ कहा.
"जग जग जियो अपने पिता का खून पियो. हमारी गुड़िया रानी तोह सचमुच बड़ी हो गयी है. वो उधर देखो तुम्हारी राधिका और निकिता दीदी के मेहंदी लग रही है, चलो इन प्यारे प्यारे हाथो पे तुम भी लगवाओ. लगाओगी न?", सोमनाथ जी का कहने का अंदाज हे इतना निराला था के पीहू के साथ साथ सुभाष जी भी हंसने लगे.
"जी दद्दा जी. फिर मैं लगवाने के बाद सबसे पहले आपको दिखाउंगी.", पीहू इतना कह कर हाथ हिलती हुई वही चल दी जहा बाकी सभी थी.
"मद साहब नहीं आये सुरेश बाबू?", अब थोड़ा गंभीर लहजे में सोमनाथ ने कहा था और एक चुस्की लेते हुए उनकी आँखें बड़े ध्यान से सुरेश को देख रही थी.
"जी पापा बॉम्बे से चले है थोड़ी देर पहले. वैसे आप आने वाले थे पापा से मिलने?", सुरेश की तरफ खुद हे सुभाष जी ने बियर का गिलास बढ़ाया जिसके पीछे खुद सोमनाथ जी की मर्जी थी. ठंडा गिलास पकड़ते हे जैसे सुरेश थोड़ा सहज हुआ.
"वो काम उनसे नहीं होगा सुरेश क्योंकि मैं उन्हें ाचे से जानता हु. कलेक्टर रेट से 50 गुना ऊपर दाम देने को तैयार हु लेकिन तुमसे जमीन का वो छोटा सा टुकड़ा नहीं निकलवाया गया? हम जमीन और इस से जुड़े कारोबार में दखल नहीं रखते और यही वजह है की तुम्हारे कारोबार को हमेशा समर्थन दिया है. उसके मालिक मोतीलाल को मरे भी कितने हे साल हो चुके है, कागज़ निकलवाए थे हमने भी 5 साल पहले. कब्जे वाला केस होता तोह हम तुम्हे कहते भी न लेकिन इतने बड़े व्यवसायी हो, bhu-maafiya की तरह और ये काम नहीं हो रहा.", सोमनाथ बात करते करते अपने भाई और सुरेश को हॉल से कुछ बहार ले आया था. सुभाष जी भी बड़े गौर से सुन्न रहे थे इस मसले को. सुरेश से तोह कुछ कहते हे न बन प् रहा था.
"मैं कुछ मदद कर सकता हु भाई साहब? रिलेशन तोह मेरे भी है कुछ हुडा और ददा में अगर जमीन इन दोनों में से किसी एक के दायरे में आती है तोह.", सुभाष जी के कहते के साथ हे सुरेश ने जवाब दिया.
"भाई साहब, क्सक्सक्सक्स में मैंने वो 40 एकड़ जमीन 2 दिन में आपके लिए तैयार करवा दी थी क्योंकि वह मेरे साथ प्रशाशन भी था और पैसे का जोर भी. ये डेढ़ एकड़ का टुकड़ा न प्रशाशन दिला सकता है और न पैसा. आप मुझ पर जो मर्जी पेनल्टी लगा दीजिये, पार्टी फण्ड में 5-6 करोड़ तोह मैं अभी दे देता हु लेकिन उस जमीन के मामले से खुद पापा ने मुझे दूर रहने को कहा है जबसे उसके नए मालिक का पता लगा है.", सुरेश ने इसके बाद एक सांस में हे बाकी बची बियर खली की और अगला गिलास बैरे से ले लिया.
"कौन है ये नया मालिक और किसी के मरने के बाद ऐसे कैसे कोई दवा थोक सकता है? हम तोह खुद सर्कार में है यहाँ भी और राजस्थान में भी. भजन भाई साहब तक बातचीत है हमारी बेशक शेखावत जी के माध्यम से लेकिन कई बार लम्बी मुलाकात भी हुई है. नए मालिक को जानते हो तुम?"
"भाई साहब, मोतीलाल शर्मा पिता था रामेश्वर शर्मा के और वारिस की जगह उन्हें उस जमीन का care-taker हे दिखाया गया था. पावर ऑफ़ अटॉर्नी उनके पास थी और अब उसका मालिक है उनका पौता अर्जुन शर्मा. ये रामेश्वर शर्मा वही है जिनके परिवार में राधिका जा रही है और अर्जुन उसका देवर होगा कल से.", सुरेश ने दांत पीसते हुए जब ये बात कही तोह सोमनाथ के चेहरे पर अलग हे चमक आ गयी.
"वाह रे किस्मत. दिए टेल अँधेरा वाली बात हो गयी. वैसे एक बात तोह मान नई पड़ेगी की वो परिवार दौलत में हमसे और तुमसे कही काम होगा लेकिन जहाँ बात ताक़त, रसूख और प्रशाशन सहयोग की होती है तोह उनका कोई टॉड नहीं. वो शंकर.. डॉ शंकर हे हैं न पंडित रामेश्वर जी का बीटा?" , सोमनाथ जी ने जिस तरह अपने छोटे भाई की तरफ देखते हुए ये नाम लिया था तत्काल उन्होंने हाँ में गर्दन हिला दी.
"छोटा मुँह और बड़ी बात भाई साहब लेकिन अगर मामला शंकर भाई से जुड़ा है तोह बात बिना मध्यस्त के हे की जाए तोह बेहतर रहेगा. मैं उनके बेटे से भी मिला हु जिसका नाम सुरेश ने लिया. अर्जुन शंकर भाई का हे बीटा है. एक बार तोह मैंने उसको अपनी दिया बिटिया के लिए मांगने का भी विचार बनाया था. आप शादी के बाद खुद हे मुलाकात कर लीजियेगा शंकर भाई से.", सुभाष जी ने इस दौरान दूर से हे अपने आते हुए मेहमानो का अभिवादन किया. सुरेश भी सर हिला रहा था.
"हाँ यही ठीक रहेगा भाई. वैसे भी शेर के साथ सीढ़ी बात के सिवा कोई दूसरा रास्ता भी नहीं होता. चलो काम से काम सुरेश तुमने आधा काम तोह किया. सुभाष तुम जरा बाकी मेहमानो का जायजा लो, मेरे भी कुछ पहचान वाले आ रहे है तोह मैं उन्हें समय देता हु. सुरेश, तुमने ाचा काम किया.", सोमनाथ वही गिलास लिए आगे बढ़ गए लेकिन सुरेश के चेहरे पर नाखुशी साफ़ झलक रही थी. वो भी अपना सा मुँह लिए एक पहचान वाले व्यवसायी की तरफ चल दिया जबकि सुभाष जी बस मुस्कुराते रहे. जैसे उन्हें पता था की शेर से सीढ़ी मुलाकात भी शेर हे कर सकता है और एक नेता अक्सर यही चूक करता है.
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"तुम तोह अपने ससुराल में सभी को जानती होगी राधिका?", मेहंदी के शतान पर अब कई आसान लग चुके थे. सभी महिलाये कटे हुए फलो, चाट और ठन्डे का लुत्फ़ लेती हुई बातों के साथ साथ मेहंदी भी लगवा रही थी. यहाँ राधिका की दोनों बाहें कोहनी तक गहरी मेहंदी से सजी थी और अब उसके खूबसूरत पेरो पर ये दोहराया जा रहा था. उसके करीब इस वक़्त उर्वशी, निक्की और राधिका की 2 सहेलियां थी. हर युवती आधुनिक होने के साथ साथ गौरवर्ण और किसी अप्सरा हे थी. पैसे की चमक दमक के साथ हर तरह का ऐश्वर्या जो था इनके यहाँ. उर्वशी की बात सुन्न कर राधिका ने आँखे नचाहते हुए हाँ में सर हिलाया.
"अब ससुराल में जो है उन्हें तोह जान न जरुरी हे होगा मौसी. वैसे मेरे से पहले तोह शायद आप हे परिचित होंगी वह से. संजीव की चची के मायके में हे तोह आपकी ननद विवाहित है न?", राधिका के बात सुन्न कर निक्की की भी दिलचस्पी बढ़ी और वो थोड़ा करीब आ बैठी जैसे ये गुफ्तगू राजदार होने वाले हो.
"हाँ वो पूजा दीदी की शादी रेखा जी के बड़े भैया से हो राखी है न. लेकिन मैं ज्यादा किसी को नहीं जानती सिवाए रेखा दीदी, उनके हस्बैंड और बेटे अर्जुन के. हस्बैंड और बेटे से तोह मिली भी सिर्फ 2 हे बार हु. लेकिन परिवार के बारे में बहोत सुना है. वैसे तुम्हारी मेहंदी हद्द से ज्यादा सुन्दर लगी है राधिका. फोटो तोह बनती है इसकी.", उर्वशी हंसमुख महिला थी और बड़े घराने की बहु होने का कुछ प्रभाव छोड़ कर वो जिंदादिल घुलने मिलने वाली महिला थी.
"मौसी, यहाँ हर तरफ ये कैमरा वाले घूम तोह रहे है. अभी अभी 2-3 फोटो निकाले है आपके पीछे खड़े फोटोग्राफर ने. हाँ तोह आपने क्या सुना है उनके परिवार में और ये अर्जुन ारु एक हे इंसान है न?", राधिका सब भुला कर बड़े ध्यान से अपनी मौसी को देखने लगी. उसकी सहेलियां भी इस चर्चा का हिस्सा बन्न ने लगी जब लड़के का जीकर हुआ.
"हाँ वो उसके घर का नाम है ारु और सच कहु तोह तुम दिया के बराबर होती तोह पक्का अर्जुन पर marr-mitt जाती.. हाहाहा.. मजाक कर रही हु क्योंकि हम दोस्त भी है. रेखा दीदी जैसे दिल की बड़ी ाची है वैसे हे उनका बीटा भी है. और सचमुच हैंडसम भी बहोत है वो. तुम नहीं मिली?", राधिका ने तोह स्पष्ट ना हे कर दी.
"क्या वो लड़का सचमुच इतना हैंडसम है आंटी? और राधिका तूने बताया नहीं की तेरा देवर भी है जिसकी तारीफ उसको न जान ने वाले भी कर रहे है? थोड़ी देर पहले यही नाम तोह तेरे पापा ले रहे थे जब मैं इधर आ रही थी. अर्जुन!", ये राधिका की आधुनिक सहेली थी जो सफ़ेद फ्रॉक सूट में किसी पारी सी दिख रही थी. निक्की तोह उसको ऐसे घूरने लगी जैसी खा हे जायेगी.
"वो तेरे टाइप का नहीं है अर्शी. शरीफ सा काम उम्र लड़का है, स्कूल गोइंग.", निक्की ने खुलासा किया तोह राधिका की भानवे चढ़ गयी.
"ओहो, मतलब मुझे छोड़ कर सभी को पता है उसके बारे में. और मौसी आपने तोह परिवार के बारे में आगे बताया भी नहीं.", राधिका ने फिर से उर्वशी पर ध्यान किया जो मुस्कुरा रही थी.
"अपने हे घर में सुना है मैंने तेरे ससुराल के बारे में. पापा (ससुर) खुद कहते है की वो घर अपने आप में एक मिसाल है और उस घर का हर व्यक्ति समाज में योगदान देने वाला जो हर किसी की सहयता करता है. सुना तोह ये भी है की लोग जैसे अपनी पहोच का बखान करते है वही ये बड़ी शक्शीयते श रामेश्वर जी से सलाह करती अक्सर नजर आती है. संस्कार के साथ साथ शिक्षा और हरेक व्यक्ति को अपने फैंसले रखने की प्राथमिकता है उधर. कुल मिला के मैंने सिर्फ और सिर्फ ाचा हे सुना है वह के बारे में. हाँ अर्शी, अर्जुन को देखने से कही भी ये नहीं लगेगा के वो एक 18-19 साल का लड़का है. जीजा जी (सुभाष जी) से भी आधा फुट ऊँचा होगा और जैसी किसी कहानी से निकल कर कोई योद्धा सामने आ खड़ा हो.", उर्वशी ने आँख मारते हुए राधिका की सहेली से ऐसा कहा था जो अब और जान ने को उत्सुक हो रही थी लेकिन देविका जी, जो पीछे कड़ी अभी अभी की बात सुन्न रही थी उन्होंने अपनी बहिन को वह से चलने को कहा.
"उर्वशी, मेरे साथ चल जरा. दोनों एक एक हाथ पर हीना लगवाते है. दूसरे से काम भी करने पड़ेंगे और मैंने कुछ बातें भी करनी है.", देविका जी के ऐसा करने पर राधिका रोकती रही लेकिन उसकी माँ ने धैर्य रखने का इशारा दिया और चली गयी.
"हहह.. और निक्की की बची अब सच सच बता सबकुछ.", राधिका ने बिना लाग लपेट का कहा था.
"I've ा हूजे क्रश ों हिम. हे don't गेट एंग्री. दोस्त है बस और हाँ मैंने जिसके बारे में तुझे बताया था वो यही है. लेकिन बस दोस्ती तक हे है. बाकी कल मिलने हे वाली और साथ रहेगी हे. अर्शी, तेरी दाल नहीं गलने वाली राधिका के देवर के साथ. बहोत पहुंची हुई चीज है वो और उसका रिश्ता भी पहले से हो चूका है. चल वो फोटोग्राफर बुला रहा है तुझे तेरे मेहंदी शूट के लिए.", राधिका कुछ कहती उस से पहले निक्की ने सभी बातों पर विराम लगते हुए उसको उठने का कहा. ये भी एक नया शौक चढ़ा था अमीरो को जिसमे हर रसम की अलग फोटोग्राफी की जाने लगी थी. राधिका के साथ उसकी सहेलियां भी चल दी, उसके गाउन को घुटने तक ऊपर उठाये. अब देविका जी की तरफ वैसी हे चर्चा चालू थी.
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घर के बहार वाले आँगन में इस वक़्त हुसैन साहब उमेद और नरिंदर से किसी चर्चा में व्यस्त थे. उनके पास बराबर हे कुर्सी पर वालिए जी और दलीप जी भी विराजमान थे जैसे कुछ मजेदार बातें जारी हो. सबके चेहरे पर मुस्कान थी और हाथो में ठंडा शरबत. गलियारे से ज़ुबैदा एक सुर्ख लाल कमीज और चुस्त सफ़ेद सलवार पहने बहार निकली तोह आते के साथ उसने नरिंदर जी से सवाल किया.
"नरिंदर चाचा जी, ये अर्जुन कहा होगा? अंदर दिखा था लेकिन फिर जाने कहा गायब हो गया?", सभी को हाथ जोड़ नमस्ते करती हुई ज़ुबैदा नजरो से अर्जुन को हे ढून्ढ रही थी. पहली बार था की उसने सर से ओढ़ कर सफ़ेद दुपट्टा गले में लिया हुआ था. अक्सर वो अपने हिसाब से हे रहती थी लेकिन यहाँ के माहौल को देख वो वैसे हे ढलने की कोशिश में थी.
"ज़ूबी बिटिया, तुम्हे वो दिखे तोह पकड़ कर इधर हे ले आना. मैंने भी अंदर जाते हे देखा था और काम से आवाज भी लगाईं लेकिन पता नहीं कहा गायब हो गया?", नरिंदर जी प्यार से उसको ज़ूबी हे बुलाते थे और ज़ुबैदा भी उनके सामने जैसे कोई औपचारिकता न करती.
"ऐसा क्या काम पड़ गया हमारी शहजादी को अर्जुन मियां से? अरे हमे तोह अपनी दूसरी गुड़िया को देख कर हैरत हो रही है. हमेशा डुबकी रहने वाली ाफसु भी कुछ देर पहले यहाँ से हंसती खेलती जा रही थी. इन्दर भाई, उसको तोह कुछ दिन यही रख लो और ये अर्जुन मेरे वह भेजो. हमारी बेगम तक हमसे दुआ सलाम करने की जगह भतीजे के साथ गप्पे लड़ा रही थी.", हुसैन जी ने ये बात कहने के साथ सीढ़ियों की तरफ नजर की तोह मुँह से बस इतना हे निकला 'masha-allah'
अर्जुन एक आधी ब्याह की चुस्त सफ़ेद कमीज, जो शायद तगड़े शरीर की वजह से चुस्त हे लग रही थी और कासी हुई नीली जीन्स पहने इनकी हे तरफ चला आया. गीले घुंगराले बाल बता रहे थे की वो अभी नाहा कर हे आया है और कुण्डल हिलते हुए उनकी लम्बाई का खुलासा कर रहे थे.
"कैसे हो अंकल? नमस्ते चाचा जी.", वालिए साहब को पीछे से गले लगाने के बाद उसने हुसैन साहब को प्रणाम किया और फिर दलीप जी को भी. उमेद जी ने तोह अर्जुन की कमर में हाथ दाल कर उसको अपनी गॉड में हे बैठा लिया था. उनके लिए तोह ये लड़का अभी भी उनका मुन्ना हे था.
"हुसैन साहब, सिर्फ आपकी बेगम हे नहीं. साहब ने तोह हमारी सरदारनी भी हमसे जुड़ा करदी है. जब ये आ जाये तोह हमारी कदर हे नहीं रहती. लेकिन मेरा शेर पुत्र है हे प्यार के लायक.", वालिए जी ने उसका गाल खिंच कर वैसे हे लाड जताया.
"मेरी तोह मैं बताऊंगा भी नहीं आप लोगो को. लेकिन है मेरा भी ये अजीज बीटा. मौसी से मिला या नहीं?", ये दलीप जी थे और अर्जुन ने उमेद जी की गॉड में बैठे हुए हे जवाब दिया.
"आप लोगो को आजादी दिलवा देता हु ये क्या काम है चाचा जी? पीठ पीछे यही तोह कहते रहते हो की मैं तोह अपनी वाली से परेशां हो गया.."
"हट बदमाश कही का.. चल खड़ा हो और ये जो कड़ी घूर रही है पहले इस से मिल ले.", नरिंदर जी ने पीठ पर ढोल जमाते हुए अर्जुन को खड़ा करके ज़ुबैदा की तरफ ध्यान करवाया तोह वो तुरंत गंभीर हो गया.
"मैंने कहा था न के 12 बजे मार्किट चलना है. देखो 12:30 हो चुके है और मुझे नहीं लगता के तुम मेरी हेल्प करने वाले हो.", ज़ुबैदा सचमुच थोड़ी गुस्सा थी और अर्जुन ने कान पकड़ कर अपनी कार की तरफ दौड़ लगा दी.
"मैं कार निकल रहा हु, आपने कुछ सामान लेके चलना है तोह ले लीजिये.", यहाँ अर्जुन अपनी काली लांसर की तरफ आया तोह उसके पीछे अशोक जी की कार कड़ी थी और वह चाभी भी नदारद थी. वो परेशां होता अभी इधर उधर हे देख रहा था की अपने पिता को अपनी तरफ आते देखा. जो शायद हाथ धोने जा रहे थे.
"तेरे 12 क्यों बजे हुए है?"
"पापा, वो फूफा जी ने कार यहाँ कड़ी कर दी और मेरी ऐसे निकल नहीं सकती. दीदी को मार्किट लेके जाना है.", अर्जुन ने ज़ुबैदा की तरफ देखते हुए कहा और शंकर जी ने हँसते हुए एक कार की चाभी उसकी तरफ बढ़ा दी.
"ऐसे टाइम में तेरी कार घर के अंदर क्यों कड़ी की है? तू ये ले जा और अपनी वाली की चाभी मुझे दे. मैं इन दोनों को बहार निकलवाता हु.", शंकर जी ने फोर्ड की चाभी दी थी और अर्जुन ने थैंक यू कहने के साथ हे ज़ुबैदा को चलने का कहा.
"पर्स है तेरी जेब में?", अब इस सवाल पर अर्जुन के पाँव वही रुक गए थे और वो अपने मुस्कुराते हुए पिता को देख झेंप गया जिनके हाथ में उसका पर्स था. शंकर जी देख रहे थे की आज भी वह Rekha-Krishna की हे तस्वीर थी.
"सॉरी पापा, वो कार में हे रह गया था.", अर्जुन ने पर्स पकड़ते हुए जवाब दिया.
"कोई बात नहीं मैं समझ सकता हु. जब भी काम ज्यादा हो तोह वही वक़्त होता है सावधान रहने का. आराम से जाना और मार्किट में टाइम लगे तोह दीदी को लंच करवा के लाना. फ़िलहाल घर में ज्यादा काम नहीं है और बाकी सब यहाँ है काम देखने के लिए.", शंकर जी ने बात कहते हुए अपने हाथ पे बंधी वो भूरे चमड़े की स्विस मेड घडी अपने बेटे की कलाई पर बांध दी. अर्जुन भोचक्का सा देख रहा था के ये क्या है. ये घडी तोह शंकर जी को इतनी अजीज थी की कभी किसी को हाथ तक लगाने न देते थे.
"जो बात मैंने अभी कही है वो अगर समझ ना आये तोह इस घडी को ध्यान में रखना. जब काम सेकण्ड्स का हो तोह पहले तैयारी में घंटे लगाना ताकि चूक न हो और अगर काम घंटे का हो तोह हर सेकंड की एहमियत समझना. ये कर लिया तोह छोटी मोती भूल नहीं होंगी. वैसे ये तुम पर ज्यादा जाँच रही है, मुझे मेटल वाली लेनी चाहिए.", शंकर जी ने ज्यादा न रोकते हुए अर्जुन की ब्याह थपकाइ और फिर हाथ धोने बाथरूम में चले गए. अर्जुन धन्यवाद न कह सका.
"चलो भी मिस्टर, मैं सब ले आयी हु.", अब तक ज़ुबैदा अपना पर्स लिए गेट पे आ कड़ी हुई थी. अर्जुन भी उसकी तरफ बढ़ा था ये मदहोश करने वाली गुलाब सी सुगंध जैसे साँसों में समां गयी. इन दोनों के सामने रोमिला आ प्रकट हुई. सफ़ेद ढीली सी बिना ब्याह की कुर्ती और पिंडलियों से निचे तक लम्बाई वाली आरामदायक स्कर्ट में. खुले महकते बाल और naam-matra सा मेकअप किये वो किसी भी स्वपनसुन्दरी पर भारी थी.
"अर्जुन बीटा, अपनी आंटी को भी मार्किट ले जाओ. इन्हे भी अपने कपडे उठाने है वह से.", ये रेखा जी भी साथ हे थी जिनकी बात अर्जुन कभी ताल न सकता था.
"मैं विवान के साथ चली जाउंगी रेखा. बचो तुम लोग जाओ, मुझे वह काफी टाइम लग सकता है.", रोमिला ने इंकार किया तोह ज़ुबैदा बोलने से रुक न सकीय.
"नहीं आंटी जी, मुझे भी कंपनी मिल जाएगी. आप भी साथ हे चलिए.", अब रोमिला ने आगे कुछ न कहा और वो नीली फोर्ड की पिछली सीट पर आ बैठी. अर्जुन ड्राइवर सीट पर बैठने से पहले ज़ुबैदा के लिए दरवाजा खोल कर उसको बैठा चूका था. और इन तीनो को जाते हुए एक तरफ रेखा जी और प्रीती देख रहे थे वही छोल साहब के घर के बहार से विवान भी. रोमिला ने घर पे तैयार होते हुए भी अपने पति से बात न की थी लेकिन कुछ ऐसा भी न कहा था जिस से दिल दुखे.
इधर शंकर जी बाथरूम से हाथ धो कर बहार निकले तोह अपनी बीवी के साथ प्रीती को देख कर मुस्कुरा दिए. प्रीती भी तार से टोलिया उठा कर उनकी हे तरफ चल दी और रेखा जी घर के भीतर.
"मेरी बेटी तोह हर बात का ख़याल रखने लगी है अभी से. वैसे मैं नाराज हु tumse.",Shankar जी उसके हाथो से टोलिया ले कर हाथ मुँह साफ़ करते हुए बोले.
"वो क्यों भला अंकल?", विवान भी घर में दाखिल हो रहे थे और शंकर जी को देख गर्मजोशी से मिले.
"आप तोह जैसे उम्र को दरकिनार किये बैठे हो भैया. और क्या बातें हो रही है मेरी इस पारी के साथ?"
"कमरे में बंद रहने वाले बूढ़े होते है काका जी और ये तुम्हारी पारी न पहले मेरी बेटी है. वैसे होने वाली बहु भी. तू सुबह आया और अब उठ रहा है? ये चेहरे पे सफेदी नहीं खून की कमी हो गयी है. थोड़ा ध्यान रखा कर अपना और अपने टाइम टेबल का. प्रीती बीटा, तुम्हारी आंटी से कहो के aam-panna भिजवा दे.", प्रीती का सर सेहला कर उसको अंदर भेजते हुए वो विवान पूरी को साथ लिए वही चल दिए जहा उनके भाई बंधू बैठे थे. प्रीती अब उतना शर्माती नहीं थी ऐसे सम्बोधन पर लेकिन अपने पिता के सामने ये लफ्ज़ सुन्न कर वो गुलाबी होती हुई दौड़ गयी.
"क्या बताऊ शंकर भैया, बहार न संसाधनों की आदत लग जाती है. लाइफ उतनी प्रैक्टिकल नहीं रहती और बस यही वजह है आदत बिगड़ने की. कैसे हो इन्दर भैया.? Hello उमेद भाई.", अब तक 2 और कुर्सियां यहाँ लग चुकी थी जिन पर ये दोनों बैठे और विवान बैठने से पहले सभी से गले लग कर मिला था.
"तोह फिर क्यों पागल हो रहा है अमेरिका में? यहाँ क्या कमी है और अगर बिज़नेस हे शुरू करना है तोह इधर कर ले. काम से काम परिवार तोह साथ होगा.", शंकर ने समझने के हिसाब से ऐसा कहा था लेकिन बैठक से बहार निकलते रामेश्वर जी ने जैसे ये बात सुन्न ली थी. वो अभी धर्मपाल जी और कृष्णेश्वर को साथ लिए विवाह स्थल की तैयारी देखने निकल रहे थे. उनकी मुलाकात भी निर्धारित थी निर्मल सिंह और कपूर के साथ.
"हाँ तू इसको भी इधर हे बुला ले. वैसे विवान तेरे कान मैं आ कर खींचता हु.", विवान तुरंत उठ कर उनके चरण स्पर्श करके गले मिला.
"ओह ताऊ जी, कान भी इधर हे है और मैं भी. आप जितना चाहे खिंच लेना बाकी मेरी ताई मेरे साथ है. कैसी हो ताई जी.?", बैठक से कौशल्या जी भी पंडित जी का रुमाल और नजर का चस्मा लिए बहार आयी तोह वो भी अपने भतीजे से बड़े प्यार से मिली. नजर उतारने के बाद उन्होंने हे अपनी पति को जवाब दिया.
"हाँ मैं भी देखु तेरे कान खींचने वालो को. लो जी, अपने कान पे ये चस्मा चढ़ा लेना क्योंकि जरुरत पड़ेगी जब कागज पढोगे. तू चल मेरे साथ विवान और इन गप्पियों को लगाने दे अपनी महफ़िल.", कौशल्या जी हमेशा से ऐसे हे तोह रहती थी. बाकी सभी हंस दिए थे सिवाए रामेश्वर जी के. फिर आखिर में वो भी मुस्कुराते हुए बहार निकल चले.
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"तुमसे हेल्प चाहिए थी अर्जुन.", मार्किट में ज़ुबैदा को उसके मतलब की दुकान पर छोड़ कर अर्जुन रोमिला के साथ उस तरफ जा रहा था जहा रोमिला ने कपडे बन्न ने के लिए दिए थे. ऐसे एकांत में रोमिला ने गंभीर आवाज में चर्चा शुरू की. दोनों की हे आँखों पे धुप के गहरे चश्मे थे.
"आपको तोह बस कह देना चाहिए आंटी. आप जानती है मैं कभी भी मन नहीं करूँगा सिवाए एक काम के."
"तुम अभी तक वही अटके हुए हो? और वो मैं खुद कर लुंगी तुम्हारे साथ क्योंकि हक़ है मेरा. ये थोड़ी सीरियस बात है बीटा.", रोमिला ने जैसे हे बीटा कहा तोह अर्जुन की रफ़्तार काम हो गयी. अब वो बड़े ध्यान से रोमिला को देख रहा था जिसके चेहे पर नजरे ढकी होने के बावजूद अथाह दर्द के भाव थे जिन्हे चाह कर भी वो छुपा न सकीय.
"आप बस कहिये और मैं वो हर काम करने को तैयार हु जिस से आपके दिल का दर्द काम हो सके.", अर्जुन ने इस बार पैदल चलते हुए रोमिला का हाथ अपने हाथ में थाम लिया था.
"तुमसे मुझे बहोत पहले हे बात कर लेनी चाहिए थी अर्जुन लेकिन मुझे लगा था के सबकुछ ठीक हो जायेगा वक़्त के साथ. पर मैं गलत थी."
"ये प्रीती से जुडी है?"
"हाँ क्योंकि प्रीती मेरी और विवान की बेटी जो है. पता नहीं तुम इसको कैसे समझोगे या मेरे बारे में क्या राये अख्तियार करोगे लेकिन मैं एक असफल पत्नी हु और इस से बहोत कुछ खराब हो सकता है भविष्य में.", रोमिला बात कहने के साथ घेरि सांस भर कर जैसे हिम्मत जूता रही थी.
"मैं समझ चूका है आप कहा बोल रही है. लेकिन उसमे आप गलत नहीं हो सकती, किसी भी सूरत में आप गलत नहीं है. गलती अंकल और अलीशा आंटी से हुई है और जहाँ तक मैं समझ रहा हु ये गलती अभी भी हो रही है. रेणुका बुआ से मेरी थोड़ी हे देर पहले इस बारे में बात हुई थी. घर में सिर्फ आप हे नहीं गयी थी उस वक़्त, वो भी अपने कमरे में थी जब ये दोहराया गया लेकिन उन्होंने इसकी भनक नहीं लगने दी. और मुझसे कहा की मैं आपकी मदद करू. आप निश्चिन्त रहिये आंटी और शाम को संगीत में जरा मेरा साथ देना. अलीशा आंटी को विवान अंकल की नजरो में अगर खोल कर न रख दिया तोह मेरा नाम भी अर्जुन शंकर शर्मा नहीं. हो सकता इस तरह से उनकी नजरो में मैं गलत हो जाऊ लेकिन आपके और प्रीती पर उस आग को नहीं जाने दूंगा जिस से भविष्य पर संकट मंडराए.", रोमिला भौचक्की सी अपना तनाव भूल कर बस अर्जुन को हे घूरे जा रही थी. जिस बात को ले कर वो खुद इतने तनाव में थी अर्जुन पहले से हे उसके समाधान पर लग चूका था.
"तुम जोखिम ले रहे हो अर्जुन. कोई और हल भी हो सकता है इस प्रॉब्लम का. विवान ने अगर ये सेहन न किय तोह?"
"उन्हें करना हे होगा. वो एक जिम्मेवार पिता है और उस से पहले उन्हें साबित करना होगा की वो आपके पति है. आप दोनों ने प्यार किया था आंटी और अगर प्यार का अंजाम रिश्ता बनाने के बाद बिखरना है तोह फिर प्यार का वजूद कभी था हे नहीं. रास्ते से भटके हुए को वापिस लाया जा सकता है लेकिन जो जान बूझ कर वापिस ना आना चाहे उसको अलीशा कहते है.", अर्जुन ने चस्मा उतार कर आँख मारते हुए कहा तोह रोमिला के खूबसूरत चेहरे पर भी अब निराशा की जगह मुस्कान थी.
"वैसे मैं फिर भी हक़ ले कर रहूंगी."
"वो प्रीती डीडे करेगी आंटी. हाँ आप उस से न जुडी होती तोह शायद पहल मैं हे कर देता लेकिन इस रिश्ते में मेरी डोर प्रीती के हाथ है. चलिए आप यहाँ अपने कपडे चेक करवाए मैं वापसी में आपको लेने आता हु. ज़ुबैदा दीदी अकेली कही परेशां न हो जाए.", अर्जुन ने रोमिला को उसके गंतव्य पर पहुंचने के साथ हे वापसी का रुख किया. अर्जुन के भाव बता रहे थे के वो जैसे अलीशा के साथ ऐसी हे मुलाकात करने को आतुर था. ऋतू, प्रीती और अलका ने तोह अपनी अपनी तरह से पहले हे अलीशा का वर्णन तफ्सील से कर दिया था. आखिरी कील रेणुका बुआ ने जड़ दी थी कुछ समय पहले और अब अर्जुन के पास सिवाए मछली की आँख भेदने के दूसरा कोई लक्ष्य न था, शाम के कार्यक्रम में.