Incest Pyaar - 100 Baar - Page 44 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar





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बैलून्स बाद में बनाये थे 😅
 
अपडेट 192 (3)

विवाह

साल 2004


अभी मौसम कितनी करवट लेने वाला था ये खबर खुद प्रकृति तक को न थी. दिल्ली की bheed-bhaad से सेंकडो किलोमीटर दूर आने के बाद भी ठंडक में कमी होने की जगह इजाफा हे हुआ था. बस ये रास्ता जरूर दिल्ली की व्यासतो सड़को से विपरीत बिलकुल निर्जन और वह के कंक्रीट जंगल की जगह सड़क दोनों तरफ बर्फ से ढंके पहाड़ो, गहरी खाई और cheed-devdar के जंगल से घिरा था.

इस मोटरसाइकिल सवार ने आखिरी वाहन कोई घंटे भर पहले देखा था वो भी फ़ौज की रसद पहुंचने वाले ट्रक के रूप में. रास्ता एक तरफ बदल लेने के बाद तोह जैसे अब वो भी दिखने की उम्मीद न थी. बर्फ से ढंकी श्वेत पहाड़ी चोटियां सर चढ़ आये सूरज की वजह से हीरे सी चमकती लेकिन इस सूरज में तपिश की जगह सार्ड एहसास हे था. चमड़े की भूरी जैकेट और वैसे हे गरम दस्ताने भरसक कोशिश कर रहे थे इस गतिमान युवक को गरम रखने में लेकिन उसको न गर्मी की जरुरत थी और न उस पर यहाँ के सार्ड वातावरण का हे कोई प्रभाव. आँखों पर चढ़े गहरे धुप के चश्मे के सिवा चेहरे पर घनी काली दाढ़ी और सर पे मजबूत हेलमेट.

"अंकल ये धनकर ताल (लेक) कितनी दूर है यहाँ से?", सड़क से हटाई गयी बर्फ किनारो पर अभी तक ऊँची तेह के रूप में जमा थी और बड़ी हे सावधानी से उस भरी भरकम मोटरसाइकिल को एक किनारे खड़ा करने के बाद युवक ने उस छोटी सी kachi-pakki दूकान के बहार खड़े बुजुर्ग से जानकारी लेनी चाही. पहाड़ो में दिन भी समतल इलाको से कही पहले हे निकल आता है और सुबह के 11 बजे तोह लगभग ये दोपहर हे थी इस इलाके में. सर पे खरगोश के बालो की गरम टोपी पहने अलाव सकते इस बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए एक भरपूर निगाह इस lambe-tagde नौजवान पर करने के बाद उसको आग के हे पास बैठने का इशारा दिया. दादी में फंसे बर्फ के महीन कानन युवक की हालत बता रहे थे. जैकेट की जेब से क्सक्सक्स रम का प्लास्टिक का अद्धा निकलते हुए युवक इत्मीनान से उस अलाव के सामने जमीन पर पंजो के भार आ बैठा.

"बहोत दूर से आ रहे हो बीटा लेकिन रास्तो से अजनाभि भी हो. तुम्हारी मंज़िल ज्यादा दूर नहीं है लेकिन दुर्गम रास्तो पर सफर रुक रुक कर करना चाहिए.", बूढ़े ने उस मोटरसाइकिल को देखते हुए जानकारी के साथ अपनी अनुभवी नजरो का सही वर्णन किया था. चस्मा आँखों से हटते हुए युवक ने वही रखा साफ़ चाय का गिलास लेने की इत्छा जताई तोह बूढ़े ने 2 गिलास उसके सामने रख कर अपने दिल का हाल भी बता दिया. गालो पर चश्मे के गहरे निशाँ बन चुके थे ढके होने की वजह से. युवक ने फीकी मुस्कान के साथ दोनों हे गिलास लगभग आधे उस गहरे लाल तरल से भर दिए. बूढ़े ने अल्मुनियम की केतली से गरम पानी अपने गिलास में भरने के बाद वैसा हे युवक के गिलास में करना चाहा तोह उसने हाथ से गिलास धक् कर मन कर दिया.

"रस्ते में हे आराम करने से अक्सर मंज़िल देरी से मिलती है अंकल. और रही बात की मैं दूर से आ रहा हु तोह इसका क्या जवाब दू? कॉलेज से तोह रात को 7 बजे निकला था और अभी सिर्फ 11 हे बजे है. वैसे यहाँ लोग नहीं रहते क्या ज्यादा?", युवक ने हलके से बुजुर्ग के गिलास के साथ अपना गिलास टकराने के बाद एक सांस में हे वो अपने हलक से निचे उड़ेल लिया. क्षण मात्रा के लिए हे चेहरे पर गर्मी के भाव दिखे फिर वो सहज हो गया. बुजुर्ग ने दस्ताने हटा कर दोनों हाथ रगड़ने के बाद ठीक युवक के हे अंदाज में गिलास खली करके अपनी peeli-safed मूंछे साफ़ की और उठ कर दूकान के भीतर चला गया. जल्दी हे वो वापिस अपनी जगह था और इस बार 2 खली गिलासों के करीब हे भाप उड़ाती सब्जी की कटोरी थी. बुजुर्ग ने बड़े हक़ से दोनों गिलास वैसे हे भरे जैसे पहले युवक ने बनाये थे.

"आबादी सड़क किनारे थोड़ी रहेगी बीटा इन पहाड़ो में. वो उस तरफ तलहटी में गाँव है जहा 8 घर बास्ते है. मेरा भी घर वही है लेकिन मुझे इधर रहना ज्यादा पसंद है जबसे मेरी बीवी भगवन के पास चली गयी. 2-3 रोज में अक्सर कोई न कोई मिल हे जाता है यहाँ बात करने को जैसे तुम मिल गए आज. बर्फ गिरने के पूरे 5 दिन बाद कोई आया है इधर. पहले वो फ़ौज की गाडी आयी थी सड़क साफ़ करने लेकिन वो रुकी नहीं इधर. बूढ़े व्यक्ति के चेहरे पर इतनी अधिक झुर्रियां थी की कही कही से खाल आधा इंच तक लटकी जान पड़ती. फिर भी वो हंसमुख और ज़िंदादिल था बेशक जीवन के आठवे दशक में होने पर. युवक ने इस बार उस मदिरा की हलकी सी चुस्की लेते हुए आसपास नजर दौड़ाई तोह ऐसा प्रतीत हुआ जैसे यहाँ पर समय रुक चूका है. कोई हवा का हल्का सा एहसास तक न था.

"बड़ी मुश्किल होती होगी यहाँ जीने में अंकल जी? इधर आते हुए डेढ़ घंटा पहले एक फौजी से भेंट हुई थी और उसने हे बताया था के उस जगह के बाद अगला पेट्रोल पंप 200 किलोमीटर पर है और वह ईंधन मिलने की उम्मीद उतनी हे होगी जितनी उस फौजी से मुलाकात की थी मुझे. कैसे कोई गुजरा कर सकता है इस दुर्गम जगह?"

"ज़िन्दगी के लिए सोना चंडी न चाहिए होता बीटा. 2 वक़्त का खाना और कुछ अपनों का साथ हे बहोत है. फिर फरक नहीं पड़ता के तुम चाँद पर हो या दिल्ली में. लोग सुखी है यहाँ और जीने के लिए परिश्रम तोह करना हे पड़ता है. 40 भेद (शीप) है मेरे घर और उन 8 घरो का मुखिया भी मैं हे हु बीटा. खाने लायक खेती गर्मी के मौसम में हो जाती है जो कुछ पैसे देने के साथ सर्दियों को निकलने में मदद करती है. अगर मैं तुम्हारी तरह सोचता तोह क्या उन 8 घरो का आज वजूद होता? कुदरत क्या दिखती है इस से फरक नहीं पड़ना चाहिए. हम कुदरत के बीच रह कर खुद को उसके हिसाब से ढाल ले तोह ज्यादा सही होगा. वैसे धनकर ताल जाने के पीछे कोई ख़ास मकसद? ताल देखने जा रहे हो तोह रहने दो और अगर किसी से मिलने जाना है तोह कोशिश करना समय रहते पहुंच जाओ. तलहटी में अँधेरा जल्दी होता है.", बुजुर्ग और उस युवक ने अपने अपने गिलास खली कर लिए थे और अलाव से बीड़ी सुलगा कर बुजुर्ग आदमी गहरा काश खींचते हुए सूरज के आगे आ चुके बादलो को देखने लगा. पहाड़ो की यही तोह कहानी थी जो समझ से बहार थी. कब मौसम कैसा हो जाए पता न चलता था.

"बीटा, चाहो तोह कमरे में ठहर सकते हो. बिस्टेर जरूर महंगा नहीं है लेकिन बचाव तोह कर हे देगा. कुछ हे समय में फिर से बर्फ गिरने लगेगी.", युवक अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ और उठने से पहले बूढ़े के गिलास को फिर से भर चूका था. बाकी बची हुई शराब बोतल से हे मुँह पे लगा कर ख़तम करता हुआ वो अपने दस्ताने पहन मोटरसाइकिल पर जा बैठा.

"अंकल आपने हे कहा है अभी अभी. हालात के साथ हमको ढालना चाहिए. मेरी मंज़िल करीब हे है और मैंने आराम भी कर लिया. किस्मत में मिलना लिखा होगा तोह वापसी में भी आपके पास जरूर रुकूंगा.", 2 बार किक लगते हुए वो मोटरसाइकिल हलकी गर्जना करती हुई चालू हो गयी. जैकेट की चैन गले तक बन्दे करने के बाद युवक ने चस्मा पहना और आगे बढ़ गया. हेलमेट एक पल भी उसके सर से अलग न हुआ था. आसमान में बारिश के आसार थे या बुजुर्ग के हिसाब से फिर से हाली बर्फ़बारी के.

'महाकाल रक्षा करे तुम्हारी बीटा. कुदरत कब किसको अपनी गॉड में छुपा ले ये कोई नहीं जानता.', अब बुजुर्ग भी बिना हे पानी मिलाये उस शराब को चखते हुए युवक को नजरो से ओझल होने तक देखता रहा. मदिरा ख़तम होने तक आसमान भी पूरी तरह बादलो से पत् चूका था और दिन के लगभग 12 बजे हे शाम सा माहौल था. उधर वो युवक पहले की तरह एक बार फिर गतिमान था जिसको इस मौसम से जैसे कुछ लेना देना न था. हर गुजरते पल के साथ आसमान गहराने लगा और फिर वो वक़्त भी आ गया जब हलकी बूंदा बांदी ने सड़क का रंग गहरा करना शुरू कर दिया. अपनी मंज़िल पर पहुंचते पहुंचते वो बहोत हद्द तक भीग चूका था लेकिन इस सबसे बेपरवाह वो आखिर कर वह था जहा 8-10 दुकाने हे इस कसबे सी जगह की मार्किट थी और उनसे कुछ आगे झोपडी की छत जैसे पक्के दर्जन भर मकान. एक दूकान से वो अपनी मंज़िल का सही पता पूछ उन घरो की तरफ बढ़ चला.

'Thakk-Thakk' की दस्तक उस लकड़ी के बंद दरवाजे पर देने के साथ युवक रूई सी बरसती हुई नन्ही नन्ही बर्फ को घर के बहार लगे कई दर्जन सेब के वृक्षों पर गिरता देखने लगा. ये घर चारो तरफ से ईंट की दीवारों से घिरा था और जिस लोहे के दरवाजे को खोल वो अंदर आया था वह भी बाकी जगह जैसी गहरी ख़ामोशी. एक बार और दस्तक देने के साथ हे किवाड़ खुल गए जहा लालटेन लिए उसके सामने वो खूबसूरत मंज़िल कड़ी थी जिसके चेहरे पर हैरत के अनेको भावो के साथ साथ ज़माने भर की ख़ुशी थी.

"ओह अर्जुन.. तुम सचमुच चले आये? कैसे? और कब निकले थे तुम? बहार मौसम कितना खराब है और तुम तोह भीग भी चुके हो.", वो खूबसूरत महिला लगभग 28-29 बरस की होगी जिसका शरीर फिलहाल गरम शाल से ढाका थे. भेड़िये जैसा लम्बे बालो वाला कुत्ता कमरे के भीतर बैठा हलके से गुर्राया पर अपनी जगह से उठने की कोई चेष्टा तक न की.

"आप जो पूछना चाहो पूछ लेना. पहले एक टोलिया तोह दो और ये नहीं बताओगी की आखिर ये सब क्या चल रहा है? पिछले साल पता लगा था के ाकि शादी हो गयी और फिर कल हॉस्टल फ़ोन करके मुझे बता रही हो की आप यहाँ रह रही हो. ये कोई जगह है रहने की?", अर्जुन ने जैकेट उतार कर लड़की की कुर्सी पर टांगने के बाद खुद हे एक तरफ लटका वो टोलिया उठा कर चेहरा साफ़ करते हुए पूछताछ शुरू की. कमरे के भीतर चिमनी जल रही थी जिस वजह से यहाँ भरपूर गरमी थी. दिवार पर कुछ पूरी तोह कुछ अधूरी पेंटिंग तंगी बता रही थी की एकाकीपन में ये महिला इनके साथ जी रही है. 2 कमरों के इस घर में शायद ये जगह बैठक और कलाकारी के लिए हे आरक्षित थी. जूते खोलने के बाद जीन्स भी उतार कर अर्जुन ने वही कुर्सी पर लटका दी. जिस्म पर गरम पजामा था जो शायद उतना गीला न हुआ. नंगे पाँव हे वो उस मटमैले से लम्बे सोफे पर जा बैठा, टाँगे सीधे करने के लिए. वो yuvti/mahila तोह बस निरंतर उसको देखे हे जा रही थी जैसे जुबान बोलना हे भूल गयी हो. फिर होश आया तोह तुरंत अंदर हे बानी रसोई की तरफ लपकी और बहार आयी तोह ट्रे में निवाया पानी था. कुछ घूँट भरने के बाद अर्जुन ने उस मासूम से चेहरे को देखा तोह पाया वो पहले से काफी बदल चूका था.

"बोलना भी भूल गयी क्या आप? मैं इतनी दूर से सिर्फ आपको देखने नहीं आया. जान ने आया हु की आखिर हुआ क्या है और हुसैन अंकल तक की खबर किसी के पास नहीं. आपकी फॅमिली कहा गयी और एक साल तक आप थी कहा? आपके पति कहा है?", अर्जुन जिसके पास इतनी दूर से बिना रस्ते की परवाह किये निरन्तर चलता आया था उस ज़ुबैदा के पास जैसे अर्जुन के किसी सवाल का जवाब हे न था. अर्जुन उठ कर खुद हे ज़ुबैदा के करीब आया तोह वो किसी टूटी दाल सी उसकी बाहों में हे झूल गयी. जाने कितना दर्द रोके थी वो आँखें जो पल भर में हे किसी ध्वस्त होते बांध की तरह आंसुओं का बहाव बहार गिरती गयी. वो खामोश रोना जल्द हे तेज सिसकियों में बदल गया और नाक गीली होने पर जैसे ज़ुबैदा को सांस लेने में भी तकलीफ हो रही थी. अर्जुन ने उसी तोलिये से वो प्यारा लेकिन दर्द में डूबा चेहरा साफ़ करने के बाद दोनों आँखों को चूम कर ज़ुबैदा को फिर से अपनी बाहों में भर लिया.

"कुछ भी मैट कहो आप कुछ भी मैट कहो. मैं जिस ज़ुबैदा हुसैन से परिचित था वो शायद अब ज़िंदा हे नहीं है. लेकिन अगर आप चाहो तोह इस ज़ुबैदा को मैंने जीने में मदद कर सकता हु.", वो झबरैला सा कुत्ता भी इन दोनों के साथ सत् चूका था. उसकी मालकिन दर्द में थी जिसको समझ कर वो खुद हे अपना शरीर उसके साथ रगड़ कर जैसे दिलासा देने लगा. अपनी जगह ज़ुबैदा को बिठा कर अर्जुन ने वही गरम पानी उन कांपते होंठो से लगा कर कुछ तसल्ली दी और बाकी आंसू फिर से साफ़ किये.

"तुम्हे यहाँ नहीं आना चाहिए था अर्जुन. मैं मनहूस हु और कही ये साया अब तुम्हारे नसीब भी न बदल दे. मेरी मनहूसियत मेरे पापा को खा गयी. मेरी जान से प्यारी बहिन आज मुझसे इतनी नफरत करती है की वो मेरी आवाज तक नहीं सुन्न न चाहती. तुम पूछ रहे हो न की मेरा परिवार कहा है तोह तुम्हारे सामने हे है मेरा परिवार.", इतने लम्बे अंतराल बाद अफसाना का बेनाम जीकर सुन्न कर अर्जुन के दिल में भी एक सूई सी चुभी जिसके दर्द को वो जज्ब कर गया. वो उस चेहरे और उस से बंधी अदृश्य डोर से अभी तक बंधा था या उलझा हुआ, खुद उसको भी खबर न थी.

"शहहह.. मैं आपका परिवार हु ज़ुबैदा और ये बात मैंने उस दिन भी कही थी जब आपने मुझे हे खुदसे दूर कर दिया था. मैंने यही कहा था ने आप मुझसे प्यार करती है लेकिन शायद उस सच के डर से आपने खुद की हे तकलीफ बढ़ा ली थी मुझे दूर करके. लेकिन दुरी हमारे बीच आयी थी परिवारों के तोह नहीं. आपने पापा या दादा जी को क्यों नहीं कुछ बताया? आपकी शादी हुई थी ये मुझे चची से पता चला था लेकिन उसके बाद आपके परिवार या आपकी कोई खबर नहीं मिली."

"निकाह तोह हुआ लेकिन वलीमे की रात से अगली सुबह पापा न देख सके. उसके बाद मेरे शौहर के सामने हे मुश्ताक़ मां ने मुझे बेआबरू कर दिया ये कह कर की मेरे पिता की मौत की जिम्मेवार मैं और मेरे अनगिनत लोगो से जिस्मानी सम्बन्ध है. माँ तोह सदमे में थी और हैदराबाद इतनी दूर था की मैं किसी तक पहुंच हे न सकीय."

"अंकल को हुआ क्या था?"

"वलीमे वाली रात मैं पापा से उनके कमरे में बात करने गयी थी अर्जुन. उन्होंने मेरी नाखुशी की वजह पूछी थी अपनी कसम दे कर. और मैं सिर्फ इतना हे कह पायी की ये विवाह मुझ पर दबाव से करवाया गया. पापा भी जानते थे और मैंने उन्हें दिलासा दे कर यही कहा था के मैं कभी उनकी िज्जात्त रुस्वा न होने दूंगी. उनके कमरे से बहार निकल कर मैं सेहन में हे दाखिल हुई थी अपने कमरे में जाए के लिए की वह अँधेरे की वजह से मुझे पीछे से किसी ने जकड लिया. मुझे भी लगा की ये मेरे शौहर हे होंगे क्यों की वह किसी और के होने का सवाल हे न था. मैंने निकलने की कोशिश की थी लेकिन मजबूत पकड़ से मुश्किल था और अफसाना जब चिल्लाई तोह उस आदमी ने हाथ हटा लिए. पलट कर मेरे हाथ उसके गिरेबान पर थे और वो शख्स मुश्ताक़ मां का साला असलम था. अफसाना की आवाज सुन्न कर मां, माँ और खिड़की से पापा ने भी ये देखा और वही असलम ने मुझे हे दोषी बना दिया. उसका कहना था के मैं हमेशा से हे उसके पीछे पड़ी थी और पापा सदमा सेहन न कर पाए. निकाह की वजह से बड़े मां भी मरककेश से आये हुए थे जो पापा के जनाजे के बाद माँ और अफसाना को साथ ले गए. इधर मेरे ससुराल ने मुझे अपनाने से मन कर दिया. बहोत दूर थी मैं अर्जुन और उन हालात में कमजोर भी इतनी की कुछ सूझा हे नहीं. मामी ने जाली कटी सुनाने के बाद इतनी मदद तोह की जिस से मैं पंजाब लौट गयी. तुम्हारे घर बात न कर सकीय क्योंकि वह तुम थे और कमजोर हालात में तुम्हारे सामने आना गुजरा न था. फिर ज़िन्दगी की डोर कहा किसी के साथ बंधी होती है?", अब अर्जुन की आँखों में आंसू थे ये सब सुन्न कर और वो बस अपलक ज़ुबैदा को देखता हुआ उसकी ज़िन्दगी का वो अंजना समय सुन्न रहा था जिस से शायद वो उसको बचा सकता.

"बैंक में जमा पैसो से और अपने पुराने संपर्क से मैंने अकेले हे ये नया जीवन शुरू किया. घर मेरे हे नाम था तोह पैसे की उतनी परेशानी नहीं आयी लेकिन वह रह नहीं सकती इसलिए वो सब बेचकर छोटा सा ठिकाना चंडीगढ़ के हे करीब ले लिया गुरदीप की मदद se.Jaanti हु उसने भी तुम्हे मेरे बारे में नहीं बताया क्योंकि मैंने उसको तुम्हारी हे कसम दी थी. फिर वह भी दिल नहीं लगा तोह 4 महीने पहले इधर चली आयी. हफ्ता भर पहले गुरदीप से हे तुम्हारा जीकर हुआ तोह कल फ़ोन करने से खुदको रोक न सकीय. बहोत खाली सा महसूस हो रहा था अर्जुन जैसे मुझमे कुछ बचा हे न हो. एक शादी ने मेरा सबकुछ हे छीन लिया और अगर मैं उस दिन तुम्हे सच बता देती तोह शायद खुदको दूर न करती. प्यार तोह उसी दिन हो गया था जब तुम मेरी बगल में बैठे उन पेंटिंग में खुद को देख रहे थे. तुम्हारे साथ बिताये वो हर पल सिर्फ खुशियों और प्यार से भरे थे अर्जुन लेकिन एक साल भी मैं उनके साथ न निकाल सकीय. नहीं बहार निकल पायी मैं तुम्हारे प्यार से अर्जुन बहोत कोशिश की मैंने.", अब एक बार फिर ज़ुबैदा अर्जुन की बाहों में थी और उसको अपने दिल से लगये नम्म आँखों में भी अर्जुन कुछ खुश था जैसे बरसो बाद उसके दर्द पर मलहम लगी हो.

"अब 'तुम' मेरे साथ दिल्ली चलोगी ज़ूबी. कल हे हम निकलेंगे और 6 महीने बचे है कॉलेज के जो बहोत है तुम्हे तुम्हारा असली प्यार और मुकाम दिलवाने के लिए. मैंने तुम्हारी दिल्ली वाली एक्सहिबिशन देखि थी जुलाई में और तुम्हारे करीब भी आया था पर उस सरदार को तुम पहचान न सकीय. अब इन अंधेरो और गुमनामी में जीने की कोई जरुरत नहीं. मैं पहले भी दिल से साथ देना चाहता था और आज भी मैं वही अर्जुन हु. मैं में तुमने मुझसे तभी शादी कर ली थी जब संजीव भैया की शादी में हम मंडप के गिर्द खेल रहे थे. मैं भूला नहीं हु तुम्हारी वो हरकत.", अब भीगी आँखों के बावजूद ज़ुबैदा हैरत से अर्जुन को देखने लगी थी. दोनों अभी भी एकदूसरे के आगोश में खड़े थे लेकिन अर्जुन की आँखों में वो सच देख ज़ुबैदा ने नजरे झुका ली.

"आप से सीधा तुम पर?"

"बुरा लगा तोह आइंदा नहीं कहूंगा. दिल ने कहा की शायद यही चाहती हो आप और बाकी जवाब खुद हे दे दिया जब मेरी बातों पर सवाल हे नहीं किया. सच कह रहा हु न मैं?"

"तुम कमरे में आराम करो, मैं खाने के लिए कुछ बनती हुई तब तक. और मैं दिल्ली नहीं जाने वाली तुम्हारे साथ. मौसम बदलने के बाद वापिस चंडीगढ़ चली जाउंगी. बहोत से आर्टवर्क पूरे करने है जिनका आर्डर मिला हुआ है. तुम्हारा तोह कुछ पक्का है हे नहीं तोह मैं रिस्क नहीं लेने वाली.", ज़ुबैदा पलट कर रसोई की तरफ बढ़ी हे थी की इस बार अर्जुन ने उसको पीछे से हे अपनी मजबूत बाहों में दबोच लिया. नरम गालो पर अपनी दाढ़ी धीरे से रगड़ते हुए उसने ज़ुबैदा के गुलाबी गाल को बेहद रूमानी अंदाज में चूमा तोह उसका शरीर साथ हे छोड़ गया.

"मैंने कहा है की हम कल दिल्ली चल रहे है. आपकी असली मंज़िल न मैं हु न कोई और. ज़ुबैदा का नाम रंगो से भरे अनिगिनत कैनवास पर अमर होना चाहिए. और अगर प्यार नहीं करती तोह मैं अभी भी निकल सकता हु. वैसे भी अकेली हो लेकिन अमीर भी. ज़िन्दगी तोह आराम से काट हे लोगी.", अब अर्जुन अलग हुआ तोह दृश्य पहले जैसा हे था लेकिन इस बार पीठ पर ज़ुबैदा लिपटी थी.

"मैं आज भी कमजोर हु अर्जुन और तुम जो कहोगे मुझे मंजूर है. वो खेल वाला निकाह मेरे असली वाले से ज्यादा सच्चा था. बस मैं तुम्हारी ज़िन्दगी खराब नहीं करना चाहती."

"साथ देने की हे तोह बात कर रहा हु और प्यार में शर्ते नहीं होती ग़ालिब, किस्से होते है. अब तुम्हारी देखभाल हमारी जिम्मेवारी है बेगम.", अर्जुन ने पलट कर बड़े हे सलीके से दोनों हाथ ज़ुबैदा के भरे हुए कमर से निचले हिस्से पर रखने के बाद सहलाते हुए पीठ तक रोके और शोखी से उस चेहरे को देखने लगा जो कुछ देर पहले रेगिस्तान सा सूखा पड़ा था. बेगम लफ्ज़ सुन्न कर ज़ुबैदा के गालो पर लाली कही ज्यादा हे बढ़ चुकी थी. अर्जुन उसके होंठो पर झुकता चला गया और ज़ुबैदा भी पंजे के भार उठती हुई उन ठन्डे होंठो पर अपने होंठ लगा कर जड़ हो गयी. उसकी आँखें बंद होते हे अर्जुन दूर हो गया. ज़ुबैदा उखड़ी सांसें संभालती आश्चर्य से उसको देखने लगी जो मुस्कुरा रहा था.

"बाज आ जाओ अपनी इन हरकतों से. और कपडे बदल कर आराम कर लो लास्ट रूम में.", वो अब शर्मा भी रही थी और निर्देश भी दे रही थी. उसके हिलते सीने को सिर्फ एक बार देख अर्जुन ढिटाई से मुस्कुराया.

"और कुछ बेगम?"

"बेगम वेगम कुछ नहीं. और ये दाढ़ी तुम पर नहीं जचती चाहे छोटे बालो में तुम ठीक दीखते हो. शराब कबसे रास आने लगी तुम्हे?"

"गाल नहीं चूमने को मिलेंगे, बता देता हु. और ये दाढ़ी फिलहाल तोह कॉलेज ख़तम होने तक यही रहेगी. वैसे इस आलसी कुत्ते का नाम क्या है? जब से आया हु साला एक हे जगह पसरा हुआ है जैसे ये तुम्हारी सुरक्षा नहीं तुम इसकी करती हो.", अर्जुन ने आहिस्ता से उस गद्दी कुत्ते पर हाथ फिराया तोह वो लकड़ी के फर्श पर और ज्यादा हे पसर गया. उसको अर्जुन के सहलाने पर मजा आ रहा था और वो जान भी गया था के ये व्यक्ति किसी को नुक्सान नहीं पहुंचने वाला. शराब वाली बात का जीकर वो ताल गया था फिलहाल.

"साला नहीं है वो और न हे आलसी. अर्जुन नाम है इसका.", अब अर्जुन हैरानी से पलट कर ज़ुबैदा को देखने लगा जो ठीक वैसी हे नजर आ रही थी जैसे 5-6 साल पहले वाली. ज़िंदादिल और हमेशा मस्ती मजाक करने वाली.

"क्या कहा तुमने? इसको तुमने अर्जुन नाम दिया?"

"सॉरी बाबा.. इसका नाम भालू है और ये मुझे इस घर के साथ हे मिला था. हाँ इसके साथ मैंने तुम्हारी ढेरो बातें की है. और था हे कौन मेरे पास."

"इधर तोह एक हे बीएड है ज़ूबी.", अर्जुन उसकी बात पर खुश होता हुआ कमरे में गया तोह जानबूझ कर उसने ऐसा कहा.

"एक हे रात की तोह बात है. तुम अभी आराम कर लो और रात में सोफे पर सो जाना. बीएड पर मैं और भालू मैनेज कर लेंगे.", ऊँची आवाज में ज़ुबैदा न रसोई से कहा और वो हंसती हुई बेहद हे प्यारी लग रही थी.

"आराम तोह दिल्ली में हे करूँगा और ये भालू बिस्टेर पर नहीं, जहाँ है वह रहेगा. फेरे तुमने अपने तरीके से लिए थे तोह आज सुहागरात मेरी मर्जी से. वासी बहार अभी से रात हो चुकी है जो लगता है लम्बी होने वाली है. चलो ाचा है न 15-16 घंटे की रात होना.", अब ज़ुबैदा शर्म के मारे कुछ न कह सकीय. वो ख़ामोशी से मंद मंद मुस्कुराती हुई खाना गरम करने लगी जो उसने अर्जुन के आने से पहले अपने लिए बनाया था लेकिन खाया नहीं था. अर्जुन ने जो कहा था वो खुद ज़ुबैदा की चाहत थी लेकिन समाज के अक्सर खिलाफ रहने वाली ज़ुबैदा ने बीते वक़्त में अपनी हे चाहत को ख़तम कर दिया था पर आज वो एक नयी ज़ुबैदा थी जिसने जीना था और हर चाहत को पूरा करके जीना था.

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साल 1998

शादी की जगह बस कुछ गिने चुने हे लोग दज पर थिरक रहे थे जो ज्यादातर संजीव के बहार से आये हुए दोस्त थे या फिर Radhika-Gorav की तरफ से आये हु. सिर्फ युवक हे थे जिन्होंने ने मस्ती में थोड़ी बहोत लगा ली थी और खाने के बाद नाच कर अपनी ख़ुशी जाहिर कर रहे थे. कही भी किसी ने कोई अभद्रता न की थी. अर्जुन अपनी दोनों बहनो के साथ बड़े हॉल में आया तोह यहाँ तक़रीबन 60-65 लोगो के लिए गोलाकार लम्बी टेबल सजा दी गयी थी. एक कोने पर Sanjiv-Radhika विराजमान थे और दूसरी तरफ माधुरी के साथ गौरव. घर परिवार के बड़े लोग बाकी मेहमानो से मिल रहे थे जिन्होंने अब वापिस जाना था.

अर्जुन के ननिहाल से भी अधिकतर लोग जा चुके थे और यहाँ की देख रेख उमेद के साथ मिल कर सुभाष जी और अभिषेक देखने लगे. राधिका की तरफ से आये कुछ मेहमान और परिवार वाले तोह खा पी कर कमरों में हे आराम करने चले गए थे फेरे होने में समय जो था. ऐसे हे खुद कौशल्या जी भी यशोदा जी, देवकी, पूर्णिमा जी और अपनी समकक्ष महिलाओ के साथ पैलेस में आरक्षित कमरों में आराम कर रही थी. इधर संजीव को उसकी सालियों ने घेर रखा था तोह माधुरी की तरफ भी प्रियंका, विनीता, समय, रुपाली आदि गौरव को अपनी बातों में उलझाए थी. कोमल और ऋतू मैं हे मैं आहात थी लेकिन अपने भाई और इस शादी की वजह से वो दोनों भी मुँह पर नक़ाब ओढ़े इन सबमे शामिल हो गयी.

"अर्जुन बीटा, तू जरा बाकी सभी को बुला ले और फिर खाने के बाद जरुरी काम भी शुरू होने है.", नरिंदर जी ने अर्जुन को समझते हुए कहा था और उनके साथ हुसैन जी भी थे जो खाने से फारिग होने के बाद अपने दोस्त के साथ यहाँ सब कुछ देख परख रहे थे.

"पापा तोह अभी आने वाले है चाचा जी कोमल दीदी ने बताया. बाकी लोग तोह इधर हे हैं. हाँ बुआ नहीं दिख रही.", अर्जुन ने मधु बुआ को अनुपस्थित देख बताया तोह नरिंदर जी ने थोड़ा प्यार से कहा.

"बीटा, यहाँ पर Renuka-Shalini भी नहीं है. तेरी चची से पूछ वो लोग कहा है और अपने दादा जी को भी बुला कर ला. उन्हें खाना खाते किसी ने नहीं देखा."

"वो तोह गेस्टहाउसे में है. मैं अभी बुला कर लता हु उन्हें.", अर्जुन वह से निकल लिया था और देविका जी के साथ ललिता जी और शिल्पा जी भी अपनी अपनी जगह बैठ चुकी थी. कृष्णा जी उनके हे करीब थी जो शायद रेखा को हे ढून्ढ रही थी. यहाँ से निकल कर अर्जुन ने जल्द हे अपनी तीनो बुआ को ढून्ढ लिया और आइशा, प्रीती भी वही थी रोमिला के साथ. उन्हें सन्देश दे कर जब अर्जुन गेस्टहाउसे की तरफ बढ़ रहा था तोह वो उसी जगह से गुजरा जहा रेखा जी के खून के निशाँ थे. वो उन्हें तरल समझ कर निकल गया.

"आओ आओ बरखुरदार. मुझे लगा के तुम तोह भूल हे गए की परिवार का कोई व्यक्ति वह नहीं है.", गेस्टहाउसे की बैठक में रामेश्वर जी अकेले हे बैठे थे एक कागज़ और कलम टेबल पर रखे. भीतर वाले कमरों में कृष्णेश्वर, हंसमुख, सांगवान जी और पंडित जी के आये हुए दोस्त फ़िलहाल आराम करने गए हुए थे जो बंद कमरों से पता चल रहा था. छोल साहब और शास्त्री जी अभी अभी पंडित को ले कर वेदी तैयार करवाने निकले थे जहा दोनों जोड़ो के लिए अलग अलग वेदी बन्न नई थी एक हे मंडप के निचे.

"भूला नहीं था दादा जी बस ये चाहता था की अगर आपको कुछ समय अपने आप के लिए चाहिए तोह मैं इसका सम्मान करू. अब बाकी सभी को तोह नहीं पता न की इस ख़ुशी के माहौल में सिर्फ आप हे है जो एक दर्द को अपने तक हे रोके हुए है. पापा भी जानते है लेकिन इस मामले में अंदर से तोह वो आपके हे जैसे है लेकिन बहार से वो दर्द से बचने के लिए लोगो के बीच रहना पसंद करते है."

"मेरे बचे मैं भी अकेला नहीं था. और मैंने उस बात की पूरी चर्चा यहाँ तुम्हारे छोटे दादा के साथ भी की है. दुःख तोह है की इस दुर्घटना के लिए ये दिन हे मुक़र्रर हुआ लेकिन कृष्णेश्वर भी सहमत है की जो भी हुआ वो उचित हुआ क्योंकि दबे लफ्ज़ो में तुम्हारी बुआ रौशनी ने भी कई बार तुम्हारे छोटे दादा से रमन के अलग स्वाभाव और जटिल सोच की बात चलाई थी. उसको किसी ने समझा नहीं लेकिन आज जब रौशनी ने हे कहा की अगर वो आजाद न होती तोह यहाँ जो होता सो होता, उसके साथ उसकी बेटी का जीवन भी रमन ने ख़तम कर देना था. लेकिन हम एक समाज का अभिन्न अंग है अर्जुन और वास्तविकता से भाग नहीं सकते की परिवार के साथ बुरा हुआ है.", रामेश्वर जी ने एक ठंडी आह भरी तोह अर्जुन ने ढाका हुआ पानी का गिलास उठा कर उनकी तरफ बढ़ाया.

"आपके फैंसले कभी भी गलत नहीं हो सकते बौ जी. पापा भी ये बात कहते है की उनके लिए आप धर्मराज हे है, मैंने खुद सुना है. और शायद ये आपकी न्याय करने की घुड़ प्रवर्ति हे है की बहोत बार खुद आपको हे दुःख झेलने पड़े. लेकिन आज के लिए जितना होना चाहिए था वो हो चूका. अब सभी लोग आपकी राह देख रहे है खाने पर. छोटे दादू और आचार्य दादा जी ने भी खाना नहीं खाया है, आपके साथ.", अपने पौटे की बात सुन्न कर रामेश्वर जी ने उसका हाथ पकड़ कर पूरे अपनेपन से उसको साथ हे सोफे पर बैठा लिया.

"तू बहोत कुछ दुसरो से ज्यादा समझता है मेरे बचे. और मैं कानून का रक्षक होने के साथ साथ इन्साफ को थोड़ा ऊपर रखता हु. फिर गलती हमारी हे क्यों न हो. अब रमन शर्मा भी तोह हमारे परिवार का हे हिस्सा था. वैसे तुझे भी ाची खबर रहती है aas-pas के हालात की. मुझे लगा था के नवीन सिर्फ मेरी हे नजरो में था या फिर तेरे पिता की. उस हालात में हम एक को भी जिन्दा नहीं पकड़ सकते थे. ाचा काम किया तुमने."

"दादा जी, वैसे इस राज्यवर्धन को आपसे इतनी परेशानी क्यों है? ये सब घटनाये कहने को तोह मां, पापा या करीबी के साथ होने जा रही थी लेकिन ये व्यक्ति सिर्फ आपको नुक्सान पहुंचना चाहता है. गलत तोह नहीं कह रहा न मैं?", नाम सुन्न कर पंडित जी ने कोई हैरत न दिखाई. उल्टा वो मुस्कुरा दिए.

"परेशानी नहीं है बीटा बस वैचारिक मतभेद है जिसमे वो खुद को बदलने को तैयार नहीं बेशक गाला हे सही और जो सही है उसके साथ मैं हमेशा रहूँगा. तुमने मुझसे पहले हे पूछताछ कर ली थी?"

"नहीं दादा जी लेकिन मुझे ये सब किसी और ने बताया जो खुद नहीं जानता की ये राज्यवर्धन है कौन. लेकिन मैं जानता हु इस नाम को. यही नाम मैंने पुष्पक चाचा की कार में रखे एक लेटर पर देखा था. कुमार राज्यवर्धन.", अर्जुन अपने दादा के साथ बात करते हुए टेबल पर रखे हुए पैन पर भी एक नजर दाल चूका था जहा मेहमानो की सूची बानी हुई थी.

"तुम फ़िलहाल ये शादी से फारिग हो जाओ बीटा और गाँव घूम आओ. Jiwan-garbh को समय से पहले जान लेने से बहोत से घटनाक्रम अस्थिर हो जाते है. एक गलत कदम और अनगिनत नए समीकरण. चलो देखे हमारे दूसरे नवाबजादे खुश भी है या आज भी चेहरे पर पुराणी गंभीरता बरक़रार है.", पंडित जी का यही तोह हास्यपक्ष था जिसमे उनका मजाक आज संजीव के प्रति था. अर्जुन भी मुस्कुराता हुआ अपने दादा का हाथ पकड़ कर यहाँ से चल दिया. अब तोह यहाँ हॉल का नजारा भी थोड़ा hara-bhara हो चूका था. Ghar-pariwar के सभी लोग पंडित जी को सामने देख सम्मान से उठ खड़े हुए.

"बैठो बैठो भाई. यहाँ कोई स्पीच नहीं देने आया. मेरे होनहार बेटे और प्यारी सी गुड़िया के भोज पर आप सभी के साथ 2 निवाले खाने आया हु, अगर बूढ़े को जगह देना चाहो तोह.", वो एक मजेदार अंदाज में चलते हुए संजीव के पीछे जा खड़े हुए थे और नरिंदर के साथ उमेद भी इनके द्वारा माहौल को नया रंग देने पर हँसते दिखे. Ghar-pariwar की बहुएं तोह कुछ हद्द तक हे परिचित थी पंडित जी के इस पक्ष से लेकिन सोमनाथ जी और सुभाष जी के परिवार वाले भी टेबल थपथपा कर जैसे उनके आने की घोसना करने लगे.

"अंकल जी, बस अब लगता है की हम उस परिवार में बैठे है जिसके बारे में जान ने के ितचुक सभी रहते है पर मौका नहीं मिलता.", सुभाष जी के कथन पर रामेश्वर जी ऐसे मुस्कुराये जैसे इसका जवाब कोई और देने वाला है. और हॉल में आते हुए Shankar-Rekha को देख उनसे पहले आये छोल साहब ने जवाब दिया.

"वैसे चर्चे भाई साहब से ज्यादा मेरे भतीजो के है और उनमे भी ये बाकी सबसे कुछ आगे होंगे. मिया बीवी बचो की शादी से अलग अपना हे जलवा बिखेर रहे.", अब रेखा जी तोह सिमट कर कृष्णा जी की बगल में आ बैठी जहा ललिता जी और देविका जी भी थी. लेकिन शंकर जी अपने पिता के लिए ठीक बीच वाली कुर्सी खिंच कर खड़े हो गए. ये 4 कुर्सियां इनके लिए हे थी.

"चाचा जी, हमारे चर्चे इसलिए है क्योंकि सर पे छाया पापा और आपकी बरक़रार है. नहीं तोह इस महफ़िल में हम तोह कोने में खड़े होते और हमारे भतीजे श्री के साथ ये सबके लाडले मुख्या आकर्षण. सॉरी इस तरह देरी से आने के लिए. रेखा का हाथ जरा टूटे आईने की वजह से जख्मी हो गया था तोह ड्रेसिंग करने में टाइम लग गया.", शंकर जी ने सबके बीच हे देरी से आने की वजह बता दी थी. और ऐसा करके ठीक भी किया नहीं तोह कोई और वजह बाद में बनती तोह सवाल ज्यादा होते. रेखा के हाथ पर भी अब कोई ज्यादा badi-moti पट्टी न थी. हथेली को कुशलता से सील कर शंकर जी ने अपने हुनर का बेजोड़ काम किया था जो सिर्फ थोड़ी सी रूई और बारीक पट्टी से वो चोट कुछ ख़ास नहीं लगती थी. कुछ हलचल लिया गया और सभी बैठने के बाद शास्त्री जी ने वो हरे रंग की बोतल खुद खोल कर 2 गिलास भरे. एक संजीव के सामने गया तोह दूसरा गौरव के.

"प्रारम्भ...", उन्होंने ये बात बड़े हे मजेदार तरीके से कही थी और बोतल शंकर जी की तरफ बढ़ा कर बता भी दिया था के अब इसको वो लोग हे संभाले. ये पहली बार हो रहा था के पंडित जी इतने लोगो के बीच खाने के दौरान हंस बोल रहे थे और उन्होंने लड़कियों को पूरी आजादी दी थी अपने अपने जीजा को परेशां करने के लिए. पीहू, निक्की और उसकी सहलियां जाने क्या क्या खिला रही थी संजीव को और वो बेचारा न न करते हुए भी बीवी की तरफ देख खता रहा. गौरव की हालत बेहतर थी जिसके साथ शिल्पा जी और इस घर की लड़कियां बस सेवा के साथ उनको जान ने में हे लगी रही. संजीव चाहता था की बगल में उसका भाई बैठे लेकिन ये सिर्फ चाहत हे थी और किसी को हटा कर ऐसा करना गलत हे होता. अर्जुन अपनी माँ का हलचल लेने के बाद जहा जा कर बैठा वह रोमिला जी का परिवार एक तरफ और दूसरी और एक कुर्सी खाली होने के बाद उर्वशी, राकेश और उसका परिवार था.

"मैं तोह तुम्हारे हे साथ खाउंगी.", इस आवाज को सुन्न कर अर्जुन मुस्कुराया और ज़ुबैदा के लिए भी वेटर से प्लेट लगाने को बोलै. बगल में रोमिला और उसके आगे विवान थे जबकि प्रीती तोह अफसाना, ऋतू के साथ मेज के आखिरी हिस्से में माधुरी दीदी के करीब हे खाना खाने में लगी थी.

"ाचा हुआ की आपने तोह मेरी तरफ ध्यान दिया. वैसे मैं हे बिजी था या आप गायब थी यहाँ से.?", अर्जुन ने अलग प्लेट सामने राखी थी जिसको ज़ुबैदा ने एक तरफ सरका दिया.

"इतना नै खाना, बस थोड़ा बहोत वो भी तुम्हारे हे साथ. और मैं तोह इधर हे थी मस्ती करती हुई. कभी विन्नी के साथ तोह कभी Afsa-Preeti के साथ. डांस भी बहोत किया और खाना भी कुछ ज्यादा खाया लेकिन अभी थोड़ी जगह बची थी तोह तुम्हे कंपनी देने आ गयी. तुम्हारी वाली तोह तुमसे नाराज लगती है आज."

"न ऐसी कोई बात नहीं है. वो जो कर रही है फ्यूचर के हिसाब से वही ठीक है. खैर, अफसाना के बदलाव देखे आपने?", अर्जुन ने थोड़ा थोड़ा खाना खाते हुए एक बार निक्की को देखा जो मुँह बना रही थी जैसे उसको अर्जुन के पास बैठना हो लेकिन वो तोह खुद हे संजीव भैया की तरफ लगी थी और न हे उसने अर्जुन को पहले देखा था. अर्जुन की निगाह उधर देख ज़ुबैदा बोल हे पड़ी.

"कही पे निगाहे कही पे निशाना.."

"निशाना कभी कभी बगल में हे लगा दिया जाता है और जहा आप देख रही है वो लोग अपने जीजा की सेवा में लगे है खुद भूखे रह कर. वैसे ड्रेस बहोत ाची लग रही है आप पर. और वो भी शायद यही देख रही है के मैं कितना किस्मत वाला हु जो बेगम के साथ बैठा हु."

"begam-vegam नहीं हु मैं... मतलब पता नहीं और बोल देते हो जो दिल किया."

"हाहाहा.. आपकी जुबान में बेगम हे तोह कहते हैं न खूबसूरत लड़की को.? अंकल आंटी से यही बोल रहे थे जब मैंने सुना.", अर्जुन के जानबूझ कर किये गए बखान को सुन्न कर अब ज़ुबैदा कुछ शरमाई भी लेकिन वो खिलखिला कर हंसी भी. बचो को खुश देख शंकर जी भी शैम्पेन की चुस्किया लेने के बाद इधर हे टहलने लगे. वो अपने भाई और दोस्तों के साथ अलग खाने वाले थे जैसा हमेशा करते थे.

"बेवकूफ. वो उनकी बीवी है तोह बेगम हे कहेंगे न. एक बार अफसाना को बोल कर देखना और अगर तुमने ऐसा कर दिया तोह जो तुम कहोगे वो मैं करुँगी.", अर्जुन को ज़ुबैदा फंसा रही थी या मजाक था बस, इसकी अर्जुन को कोई परवाह तक न थी.

"खाना होने दो सबका फिर देखना मैं पक्का बोल के दिखाऊंगा. आप फेरो तक जागेंगी या सोने वाली है?"

"शादी में खाने के लिए नहीं शामिल होते. असली रौनक तोह वही लगती है जहा फेरे होते है. जूती छिपाई मजेदार होने वाली है और उसके बाद तुम देखना इस ज़ूबी का खेल.", आँखें नाचती हुई ज़ुबैदा उठ कड़ी हुई खाने का शुक्रिया अदा करती. भगवन हे जाने ये क्या क्या करती रहती थी और दिमाग में क्या हे चलता था ज़ुबैदा के लिए जितनी खुशदिल इंसान थी उतनी हे जीवन के करीब भी. अर्जुन अब रोमिला जी से बातें करने लगा था जो उसको अपने हे किस्से बता रही थी. कुछ लड़कियां अब यहाँ से निवृत हो कर मेहमानो को उठाने चली गयी थी क्योंकि अब फेरे थोड़ी हे देर में शुरू होने वाले थे. यहाँ एक तरफ हंसी मजाक के अलग अलग दौर जारी थे तोह वही इन सबकी देखरेख कर रहे उमेद, शंकर, नरिंदर जी और उनके दोस्त कैटरिंग वालो को खुश करने के बाद अपने लिए खाना लगाने का भी बोल चुके थे. बरात में जहा 1500 लोग थे अब फेरो के समय ये संख्या 200 भी न थी.
 




एक काले पैन पर सफ़ेद पेंसिल से कुछ कहने की मेरी एक कोशिश.
 




शुभप्रभात और होली पर्व की शुभकामनाये. 🙏💚
 
बिलकुल भी नहीं Anil23265 भाई. कल रात
 
भाई सॉरी. थोड़ा बिजी हु और हेल्थ भी ठीक नहीं
 
हाहाहा.. लाइन पे आओ जरा भाई. aka3829 भाई पूछो जरा फ्री हो तोह. XLNC को तोह कल लपेटेंगे इनकी शादी का लड्डू आज सही करते.
 




ये रंग हे हमे आपस में जोड़ कर रखते है. पानी से बेशक धूल जाए पर उनकी महक पूरा साल हमारे जेहन में रहती है. छोटो को प्यार और बड़ो को नमन. 🙏💚🌱🏵️🌺🌼🌹
 
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विवाह

"बीटा, तुम दोनों अपने साथ निक्की और पीहू को भी ले जाओ. ये सब सामान तुम्हारी माँ वाले कमरे में रखा है और बाकी खुद भी देख लेना.", सुभाष जी ने अपने भतीजे मोहित और बेटे अखिल को फेरो में जरुरी सामान ले कर आने के बारे में तफ्सील से समझते हुए अपने बड़े भाई साहब से भी चर्चा की थी. राकेश गौर भी इधर हे था लेकिन इस विवाह में जैसे वो मैं मार कर आया था वैसे हे फ़िलहाल वो अपने आप में हे खोया रहा. बचे अपने साथ और भी 2 सेवक ले कर चले गए थे और उधर मंडप में सभी तैयारी चरम पर थी. दोनों वेदी तैयार करने के साथ उन पर अलग अलग पंडित विराजमान थे जो आपस में बात करते हुए हवन में लकड़ी आदि सजा रहे थे.

दूसरी तरफ शास्त्री जी के साथ छोल साहब और Rajkumar-Lalita जी ने भी हर सामग्री के साथ उचित सामान वह रखवा दिया था. लोग जो आराम कर रहे थे वो भी अब कपडे आदि बदल कर मंडप में आ चुके थे. फर्श पर हे दर्जनों गद्दे बिछाने के साथ साथ कुर्सियां भी वेटर लगा कर कॉफ़ी चाय के तैयारी करने लगे जैसा उन्हें रामेश्वर जी से आदेश मिला था. कृष्णेश्वर जी तोह इधर आने से पहले हे हुक्का गुदगुदा चुके थे.

"यजमान, var-vadhu को बुलवाया जाए. महूरत का यही उचित समय है.", ये रामेश्वर जी की तरफ से आये पुजारी जी थे जिन्होंने माधुरी और गौरव के फेरे पढ़ने थे और उनकी बात से इत्तेफ़ाक़ रखते हुए सुभाष जी के साथ आये पुजारी जी ने भी दूसरे जोड़े को बुलवाने का कहा. अब तक उनकी तरफ से भी तैयारी हो चुकी थी. Madhuri-Radhika को जब लाया गया तोह राधिका के चेहरे पर हलकी थकान सी नजर आयी. दिन का सफर और इतनी तैयारी के बाद ऐसे bheed-bhaad वाले माहौल में ये होना लाजमी भी था.

"आप दोनों इधर बैठिये, कन्यादान कर रहे है आप दोनों.", राजकुमार जी इस बात पर अपने पिता की तरफ देखने लगे जो हामी भर कर उन्हें आश्वस्ति करते दिखे. ललिता जी भी सर पे साया करके अपने पति के बराबर हे बैठ गयी. दूसरी तरफ सुभाष जी के साथ देविका जी भी ऐसे हे बैठ चुकी थी जहा राधिका और संजीव के फेरे होने वाले थे. उमेद, दलीप, शंकर, नरिंदर, मेहुल, परम, भुप्पी आदि भी खाने से फारिग हो कर वेदी के करीब हे अपनी अपनी बीवियों के साथ थे और लम्बी मंत्रणा के बाद अग्नि प्रज्वलित करते हुए मंगल गान प्रारम्भ हुआ.

अर्जुन को कान में कौशल्या जी कुछ समझती रही दोनों तरफ अपनी पानी नजर रखे हुए. बगल में हे अर्जुन के पिता और माँ भी उसके साथ सत् कर हे बैठे थे. ढेरो वचन मनमाने के बाद तक़रीबन आधे घंटे बाद दोनों हे जोड़ो को अपनी अपनी वेदी के गिर्द एक प्रचलित नियम के तहत फेरे लेने का बताया गया, आपस में गठबंधन करके उन्हें जोड़ा बना कर. माहौल में मंडप के करीब तोह गंभीरता बरकरार थी लेकिन पीछे लड़कियों और bhabhi-aurato के बीच hansi-majaak, भविष्य के विवाह इत्यादि की अटकले चल रही थी. कही हलकी हंसी तोह कही एक दूसरे को चूंटी काट टी ये बालाएं अपने हे तरीके से इन फेरो का आनंद लेने लगी.

"शंकर, देख इसको जरा. बत्ती बुझ गयी तेरे लाल की.", ऐसा पहली बार हुआ था की अर्जुन किसी करए में शामिल था लेकिन आज उसकी भी आँखें नींद से बंद हो चुकी थी. रात के 3 बजे चलते फेरो के बीच हे वो अपने पिता के कंधे पर कब नींद में झूल गया उसको पता हे न चला. कौशल्या जी ध्यान इस तरफ गया तोह उन्होंने शंकर को आगाह किया जो बड़े गौर से फेरो पर ध्यान किये अपनी बीवी से कुछ बात कर रहे थे. अर्जुन के शरीर को सरकते देख और अपनी माँ की बात सुन्न कर उन्होंने हाथ से निश्चिंत रहने का इशारा दिया और अर्जुन की बगल में हाथ दाल कर उसको बड़े ध्यान से अपनी गॉड में सर रखते हुए लिटा लिया. कौशल्या जी ने भी अपनी पीठ पीछे राखी गद्दी अपने बेटे की तरफ बधाई तोह उन्होंने प्रतिउत्तर में मुस्कान देते हुए वो गद्दी अपनी जांघ पर रख कर अर्जुन का सर पहले से बेहतर अवस्था में उस पर टिका दिया. फेरो को देखते हुए वो अनजाने हे अपने बेटे के सर को थपकने लगे थे और अर्जुन भी और ज्यादा पसर कर बिलकुल अपने बिस्टेर की तरह वह सोया रहा.

"पापा चाय लीजिये. और ये फेरे देखने की जगह आपकी गॉड में पसरा हुआ है? उठ.."

"शहहह.. ये थका हुआ है बीटा. सोने दो थोड़ी देर नहीं तोह सर भरी रहेगा इसका बाद में.", रुपाली की बात का जवाब देते हुए उन्होंने दूसरे हाथ से चाय का गिलास ले लिया. मंत्र अभी भी जारी थे और हर फेरे के साथ एक नया वचन दोनों जोड़ो को शपथ रूप लेना पड़ता. आगे जहा भी जरुरत पड़ती राजकुमार जी अपनी पत्नी संग वो daan-samagri पेश करते. वैसा हे दूसरी और सुभाष जी के साथ देविका जी भी दोहराती. मांग में सिन्दूर भी भरा गया और मंगलसूत्र भी पहनाये गए. निरंतर ये कार्य कोई dedh-paune 2 घंटे चला था और पिछली तरफ भी कुछ लोग वही गड्डो पर सो चुके थे, स्वाभाविक था इतना जागने पर.

"राजकुमार जी, बिटिया अपने ससुराल जाने से पहले ghar-phera करके जाती है. वह की तैयारी?", पुजारी जी ने यहाँ फेरे पूर्ण होते हे राजकुमार जी से सवाल किया.

"हाँ वह की तैयारी पूरी है पुजारी जी. आप लोग इतने चाय लीजिये, लड़की की माँ, दादी और बुआ वह पहुंच जाती है. हम लोग साथ हे चल padenge.",Rajkumar जी से पहले पंडित जी ने हे जवाब दे दिया. सोमनाथ जी से उनकी यही बातचीत चल रही थी.

"जी और जितने संधान जी वह पहुंच कर इंतजाम देखती है इतने हम यही से हमारी बिटिया की विदाई भी करवाने का प्रबंध करते है. दोनों को समय भी मिल जाएगा और उधर माधुरी बिटिया ससुराल के लिए निकलेंगी तोह हमारी बिटिया grah-pravesh करेगी. ठीक है न राजकुमार जी?", सुभाष जी की बात से सभी सहमत थे और सुशीला बुआ ने अलग हे सुर छेड़ दिया.

"पहले दोनों तरफ से चलन कटवा लो भाई साहब. मैं लड़के की बड़ी बुआ हु और इधर लड़की की भी. सेहरे और फेरे पर पहला हक़ मेरा है. न तोह सोच लियो.", जहा महिलाओ के चेहरे पर अपनी बेटी के जाने की वजह से दुःख के भाव थे वही पुरुष थोड़े गंभीर लेकिन सुशीला जी की बात सुन्न कर सभी की हंसी निकल गयी. सोमनाथ जी ने तोह आगे बढ़ कर अपने हाथ का सोने का कड़ा हे सुशीला जी के आगे कर दिया जो उन्होंने फुर्ती से लेने के बाद एक बार देखा और फिर अखिल के हाथ में पहना दिया.

"फेरो में बड़ो के हाथ से सोना मिलना मतलब तुम्हारा भी रास्ता साफ़. मैंने बहिन जी से बात पूछी थी तोह पता चला के अब तुम्हे जिम्मेवार बीटा बन्न न है. ये तुम्हारे ताऊ जी ने एक तरह से अपना हाथ तुम्हारे हवाले कर दिया बीटा. सबके सामने.", सुशीला जी ने बात कहते कहते अखिल को वो कड़ा पहना भी दिया था जो हैरान था और उतने हे hairaan-khush उसके परिवार वाले.

"आंटी मैं तोह अभी...

"बीटा तू खाया काम कर और सुना ज्यादा कर. तेरी बहिन को लेने तू आएगा न? सिक्योरिटी वाले तोह न उसके भाई लगते? अब तेरी बहिन को तभी घर भेजेंगे जब तू टाइम से वह से निकलेगा और खुद लेने आएगा. गलत कही क्या सोमनाथ जी?", अब तोह विधायक साहब भी खुश थे और सुभाष जी तोह अपनी बीवी के कान में साफ़ कहते सुने गए की जो 24 बरस में न हुआ वो देख लो कहा हुआ. राधिका तोह अखिल के गले लग्न चाहती थी लेकिन उसको मौका देरी से मिलना था. अब अखिल को उसकी माँ ने अपने पास बुला लिया तोह सुशीला बुआ ने राजकुमार जी की तरफ आँखें उचका कर देखा. इस बार तोह मधु, रुचिता, शालिनी आदि भी उनके साथ थी.

"देख लो राजू भाई अब बारी आपकी हे है और एक बालक तोह मैं इस तरफ का भी सुधरूंगी.", वो कह तोह रही थी लेकिन इस बीच उन्होंने ये भी देख लिया था के अर्जुन निश्चिंत अपने पिता की गॉड में सर टिकाये सोया हुआ था. राजकुमार जी ने भी इस अवसर पर कलाई में पहना कड़ा उतार देना चाहा तोह सुशीला जी ने मन कर दिया. बबिता भी अपनी माँ को ध्यान से देख रही थी.

"कड़ा न चाहिए भाई, वो तोह एक हो चूका. ललिता अपनी चादर प्रीती ने दे दिए grah-pravesh के बाद.", वैसे तोह प्रीती को लाल साया देने का हक़ रेखा को था और वो समय भी अभी दूर था जब प्रीती अपना करवाचौथ का व्रत रखती लेकिन सुशीला जी ने जैसे यहाँ सबके सामने हे अर्जुन का प्रीती के साथ रिश्ता घोषित हे कर दिया.

"मान ली तेरी ये शर्त भी. अब और कोई डिमांड तोह नहीं है सुशीला?", कौशल्या जी ने हँसते हुए कहा था और उन्होंने ये भी देखा था की प्रीती इस बारे में कोमल से पूछ रही थी और मतलब पता चलते हे वो उनकी आड़ में शर्म से सर दबती हुई सबसे कतराने लगी.

"न और तोह कुछ न चाहिए. बाकी दोनों दूल्हे अपनी अपनी जुट्टियाँ न बचा पाए.", मतलब सुशीला जी ने हे मदद कर दी थी लड़कियों की संजीव और गौरव की जूती गायब करवाने में.

"गौरव ने मंडप से लिकड़ना है तोह नेग देना पड़ेगा. और संजीव चाहे भाई लगता हो लेकिन हिसाब तोह इसने भी करना पड़ेगा लड़कियां का.", बबिता अर्थपूर्ण ढंग से अपनी बात कह कर कौशल्या जी के हे पास आ बैठी. इस बीच किसी ने अर्जुन को भी चुटकी काट कर जगा दिया था.

"हो क्या रहा है? सोने भी नहीं देते और चूंटी किसने काटी.?", वो आँख माल्टा हुआ खड़ा हुआ तोह अब सबके साथ साथ शंकर जी भी हंस रहे थे. वो जगह देख कर झेंपता हुआ सामने अपनी दादी से लिपट के जा बैठा.

"बैलबुद्धि, तेरे भाई के तोह फेरे भी हो गए और तू अपने कमरे में भी जा पंहुचा सपनो में.", कौशल्या जी अर्जुन को डपट रही थी और वो देख रहा था की ज़ुबैदा दूर कड़ी हुई विन्नी के साथ हंस रही थी और अर्जुन को जीभ चिड़ा कर बता रही थी की ये उसने हे किया था.

"डिमांड तोह कोई बोल नहीं रहा. जूती देनी है या अब ऐसे हे जाना पड़ेगा?", अभिषेक जी ने अपने भाई की तरफ से आवाज दी थी और सामने आयी अलका, आरती.

"जूती एक शरत पे मिलेगी जीजा जी. पैसे नहीं चाहिए बदले में सिर्फ प्रॉमिस."

"चलो भाई प्रॉमिस से बात बनती है तोह फिर यही सही. बताओ जो भी वादा चाहती हो आप लोग."

"गौरव जीजा जी 2 दिन के लिए दीदी के साथ हमारे यहाँ आएंगे वो भी नेक्स्ट वीक में.", अलका ने आरती की जगह जो जवाब दिया उस पर गौरव सेहरे से हे माधुरी को द्केहने लगा जहा बिना नजरे मिले माधुरी ने पलके झुका दी.

"वैसे तोह ये साफ़ साफ़ दबाव बनाया जा रहा है और गौरव को सिर्फ डेढ़ हे छुट्टियां मिलती है लेकिन चलो ये तैयार है. अब जूती तोह दो."

"जूती उठाई हे कब थी हमने? वो तोह वही राखी है जहा उतारी थी.", प्रियंका भी इनमे शामिल हो कर जब बताने लगी तोह सभी हंस दिए क्योंकि सचमुच किसी ने जूती ढूंढी हे नहीं थी और अब इस देखा देखि में संजीव की तरफ जब जूतियां ढूंढी गयी तोह जरूर गायब थी.

"आपको क्या लगता है हम इन जैसे है संजीव जीजा जी? हम वर्बल प्रॉमिस में बिलीव नहीं करते. अब तोह 21000 से एक रूपया काम न लेने वाले हम लोग.", पीहू चहक रही थी और उसकी हाँ में हाँ मिलती निक्की, उर्वशी जी और बाकी लोग.

"भैया को जूतियां चोरी हे नहीं हुई.", अर्जुन पहली बार बोलै था और उसकी बात सुन्न कर सभी एक दूसरे को देखने लगे वही संजीव भैया मंद मंद मुस्कुरा रहे थे अपनी बीवी की बगल में खड़े.

"हमारे पास हे है इनकी जूतियां. देख लो सबने ढूंढी लेकिन नहीं मिली न.?"

"वो इसलिए की भैया की जूतियां मैंने उठा ली थी और वह अपनी उतार दी थी. और वो आप लोगो ने नहीं चुराई, इसमें हमारा हे कोई मिला हुआ hai.",Arjun के जवाब से लड़कियों के चेहरे हे उतर गए थे और उसकी बहने शोर मचती हुई जैसे उनका मनोबल और गिराने लगी. अर्जुन नजरे उठा कर ज़ुबैदा को देखता रहा जो सकपका गयी.

"ज़ुबैदा दीदी, मेरी जूती हे मिली आपको चुराने के लिए.? मैंने सुना था आपको और निक्की दीदी को बात करते हुए.", अर्जुन ने दादी की कुर्सी के निचे से प्लास्टिक का बैग निकल कर भैया को जूतियां निकल उनके कदमो में रख दी. ऐसा करे के दौरान हे वो राधिका भाभी के पाँव भी स्पर्श कर गया.

'दे दो आशीर्वाद. वो सबसे पहले हम दोनों के पाँव छूने का मुझे बता चूका था.', संजीव भैया को तोह जूती पहनते हुए अर्जुन ने उनके चरण स्पर्श कर लिए थे और यहाँ राधिका दुविधा में थी की वो पहले बड़ो के पाँव छूने से पहले खुद आशीर्वाद कैसे दे दे.

"बेटी Devar-Bhabhi का रिश्ता ऐसा हे होता है.", शास्त्री जी ने भी ये देखा था और उनकी बात सुन्न कर राधिका ने नजरे झुकाये हे अर्जुन के सर पे हाथ रख दिया. निक्की और उनकी पार्टी के तोह चेहरे हे उतरे हुए थे जूतियां हारने पर और अब उमेद जी यहाँ से अपनी माँ, चची, ललिता जी और सुशीला जी को लिए घर की तरफ चल दिए. उन्हें वह तैयारी करनी थी और उनके पीछे हे छोल साहब का परिवार, दलीप जी भी Manju-Saroj के साथ और नरिंदर जी भी घर की बेटियों को अपनी बीवी के साथ लिए चले गए.

"इधर आप लोग राधिका बिटिया की भी बिदाई करवाए और मेरी माने तोह आप लोग घर भी आ जाये. रूढ़िवादी बात तोह मैं करूँगा नहीं तोह परिवार के सदस्यों की तरह आप लोग भी शामिल हो कर चाय नाश्ते के बाद हे विदा लेंगे तोह बेहतर रहेगा.", रामेश्वर जी ने राधिका के परिवार वालो को सपाट न्योता दे दिया था जिस पर सुभाष जी अपने भाई साहब से कुछ चर्चा करने के बाद बोले.

"इतने मान के लिए तोह हम आपके shukar-gujaar है पंडित जी लेकिन बिटिया की यहाँ से विदाई करने के बाद ढेरो कर्त्तव्य और भी है जैसे मेहमान और रिश्तेदार. लेकिन ये नाश्ता हमारा शनिवार के लिए तये रहा. माधुरी बिटिया से भी तभी मिल लेंगे और निश्चिंत हो कर परिवार में भी समय व्यतीत करेंगे. बाकी ये हमारा सिर्फ अनुरोध है."

"जैसा ठीक लगे मान्यवर. चलो भाई एक दूसरे का चेहरे क्या देख रहे हो.? मधु बिटिया, थोड़ा इनके साथ भी सहयोग करो.", मधु जी तोह अपने पिता की बात सुन्न कर देविका जी के साथ हे चली गयी. सभी लोग उस तरफ हे जाने लगे थे जहा राधिका का परिवार रुका था. उनके घर की बड़ी महिलाओं ने तैयारी कर राखी थी जहा कुछ रिवाज और लोकगीत के साथ दूल्हे और दुल्हन की आरती उतारी जाने लगी. वही इधर मंडप में अर्जुन अपनी जूतियां ज़ुबैदा से मांग रहा था जो इधर से उधर भाग कर कभी इस वेदी के सामने आ कड़ी होती तोह कभी दूसरी के. प्रीती के बगल में सर ढके कड़ी अफसाना भी ये खेल कूद देख रही थी.

"ये ज़ुबैदा दीदी कर क्या रही है?", प्रीती का ध्यान अचानक हे इस बात पर गया जिस तरह ज़ुबैदा जलती हुई वेदी के आगे घूम रही थी. देखने वाले को तोह यही लगता के वो अर्जुन को छका रही है लेकिन जैसे हे वो दूसरी वेदी की तरफ गयी तोह कुछ वक़्त जैसे अर्जुन उनके आगे भागता प्रतीत हुआ. प्रीती एक अलग हे गिनती में लगी थी और ठीक उसके अनुमान पर ज़ुबैदा अपनी जगह से मदद कर अर्जुन के सामने आ रुकी. Bhaag-daud से वो भारी सीना थिरक रहा था और ज़ुबैदा ने थोड़ा झुकते हुए अर्जुन के सामने वो दोनों जूतियां रख कर कान पकड़ लिए.

"सॉरी.. बस तुम्हारे मजे ले रही थी और अब मेरे में हिम्मत नहीं बची. तुम जीते मैं हारी."

'हार तोह बहोत सी गयी है इसके सामने लेकिन जिस तरह आप हारी हो मुझे तोह नहीं लगता के इस से अर्जुन जीता है.', प्रीती ने बड़बड़ाते हुए ऐसा कहा जो अफसाना को स्पष्ट सुनाई न दिया.

"ये बजी भी न मौका नहीं देखती कभी. आप हे देखे कैसे बचो जैसे खेलने में लगी है अर्जुन के साथ. और अर्जुन भी बड़े नहीं हुए अभी तक."

"वो तोह बहोत बड़ा हो चूका है अफसाना बस बचपना करने की आदत नहीं जा रही. आपको आंटी बुला रही है.", प्रीती ने जैसे हे अफसाना को ध्यान उधर करवाया जिधर उसकी माँ दोनों बहनो को बुला रही थी, ज़ुबैदा अफसाना से भी पहले उस तरफ दौड़ गयी. उनकी माँ ने पहले तोह धीमी आवाज में फटकार लगाईं फिर खुद हे अपनी बेटी का दुपट्टा स्नेह से सर पे सही से करते हुए दोनों का अपने साथ ले लिया.

"ऐ मिस्टर ये सब क्या था?"

"वो मेरी जूती ले कर भाग गयी थी ज़ुबैदा दीदी. उन्हें हे पकड़ रहा था. थक गयी तोह वापिस कर दी उन्होंने खुद हे."

"तुम चलो तोह सही घर फिर बताती हु के जूती पकड़ रहे थे या कुछ और."

"ऐसा क्यों बोल रही हो? तुमने देखा नहीं खुद?"

"बच्चू तुम्हे पता है तुम कहा खेल रहे थे? और कैसे?", अर्जुन का ध्यान जब वेदी की तरफ करवाया तोह वो अभी भी नासमझ की तरह प्रीती को सवालियां नजरो से देखे जा रहा था.

"मंडप में तुम जिस तरह भाग रहे थे, ज़ुबैदा दीदी ने इस तरफ 4 बार तुम्हे पीछे भगाया और फिर वो उधर 3 बार ऐसे घूमी थी की वो कुछ तुम्हरे पीछे रहे.", अर्जुन एक बार तोह हैरान हुआ इस समीक्षा से लेकिन फिर खुद हे प्रीती के करीब होते हुए उसके गाल पर हलकी सी चपत लगते हुए बोलै.

"बेवकूफ कही की. पहली बात तोह उन्हें इस सबका सही से पता नहीं और दूसरी बात ये है की 2 वेदियों पर ऐसी क्रिया नहीं हो सकती. वो वैसे हे शरारत कर रही थी अफसाना को दिखने के लिए तभी उन्होंने ठीक 7 बार ये किया. तुम्हे क्या लगता है ये सब ऐसे हे किया? खाने पर हे हमने ये बात की थी और मैं शरत हार गया था उनसे इसलिए वो अब अफसाना को सताएंगी यही कह कर जो उन्होंने दिखाया. तुम भी न? चलो कुछ दिखता हु तुम्हे.", अर्जुन प्रीती को साथ लिए उस तरफ चल दिया जहा बाकी सभी थे. संजीव भैया को आखिर उसने हे तोह लेके जाना था अपनी कार से. प्रीती अर्जुन के साथ उस जमघट पर पहुंची जहा गीत गाये जा चुके थे और अब सभी लोग राधिका को विदा करते आशीर्वाद देने में जुटे थे.

'धीरे से आवाज लगाओ 'बेगम', फिर देखना मजे.', अर्जुन ने यहाँ प्रीती को हे आगे कर दिया. वो हिचकिचा रही थी लेकिन अफसाना ज़ुबैदा कुछ दुरी पर थी Radhika-Sanjiv से इसलिए उसने ऐसा करने का सोच लिया. वैसे उसको मजा भी आ रहा अर्जुन के साथ मिल कर ऐसी शरारत करने में.

'रुको.. बोलो अफसाना बेगम.', अर्जुन ने अब नाम भी जोड़ दिया था जिस पर प्रीती उसको पहले तोह हैरत से देखने लगी फिर हंस पड़ी. थोड़ा अफसाना के करीब हो कर प्रीती ने पहले तोह गाला खंखरा फिर आवाज अर्जुन की तरह थोड़ी मरदाना करते हुए अफसाना को पीछे से हे बोली.

"अफसाना बेगम.", और इतना कह कर वो अर्जुन के पीछे जा कड़ी हुई लेकिन अफसाना का तोह वजूद हे कैंप गया और जब पीछे अर्जुन को देखा तोह चेहरे पर पहले घबराहट और फिर शर्म की लाली. ये आवाज ज़ुबैदा को भी साफ़ सुनाई दी थी और अब वो भी अर्जुन को देख उतनी हे हैरान हुई. फिर अपनी बहिन को देखा जो ऊँगली से चुन्नी लपेटे जमीन को देखती हुई आहिस्ता से बोली.

"आप सिर्फ अफसाना भी पुकार सकते है न? बेगम कहना सही नहीं होता. कहिये हम क्या कर सकते है?", लरजती आवाज में बोलती हुई अफसाना को देख अर्जुन अपनी हंसी रोक हे न पाया और प्रीती को पकड़ कर दोनों के सामने कर दिया

"इसने की है ये मस्ती और ज़ुबैदा दीदी आप शरत हार गयी है.", अर्जुन प्रीती को हे फंसा कर भाग गया था कार की और लेकिन अब प्रीती को अफसाना ऐसे देख रही थी जैसे वो अभी रो देगी.

"सॉरी.. देखो ये सब ज़ुबैदा दीदी और अर्जुन ने पहले से हे मिल कर प्लान कर रखा था. अभी मुझे लगा था के मैं उसको फसा दूंगी तुम्हारे सामने लेकिन ये तोह मुझे हे आप दोनों के सामने छोड़ कर भाग खड़ा हुआ. घर चल कर इसकी तबियत से खिंचाई करते है.", प्रीती खिसकना चाहती थी लेकिन ज़ुबैदा ने ऐसा होने न दिया.

"तुम कहोगी और हम दोनों बहने मान लेंगी? अफ़सा जान.. ये प्रीती और अर्जुन न दोनों हे मिल कर हमे परेशां कर रहे है. कल वो मुझे भी कह रहा था के ज़ुबैदा बेगम, अफसाना बेगम नहीं दिखाई दे रही. और आज तोह उसने खुद हे तुम्हे बेगम बोलै लेकिन बात प्रीती पर दाल कर दिखा रहा है के वो साफ़ है. ये प्रीती भी काम नहीं है."

"हाँ वो हमे मालूम है बाजी. प्रीती ये बाजी और अर्जुन मिल कर हम दोनों से मजाक कर रहे है.", अफसाना प्रीती का हाथ पकडे वह से अलग हे हो चली अपनी बहिन को वही छोड़ कर.

"वाह बीटा.. हमारी बिल्ली हमसे हे मियॉं.. कोई न अफ़सा डार्लिंग.. बोलती तोह अर्जुन के सामने हे बंद होती है तुम्हारी. वो बेगम बोलै तोह गाल लाल हो गए.. आये हाय..", ज़ुबैदा अपने में हे हंसती हुई कहे जा रही थी और इधर शंकर जी के कहने के साथ हे बाकी लोग भी अपनी अपनी गाडी की तरफ बढ़ चले. अर्जुन की कार की पिछली सीट के दरवाजे को सुभाष जी ने खोला और राधिका के भाई ने अपनी बहिन को बैठने के बाद गले लग कर परसो लेने आने का वडा किया. कार के पीछे ढाका लगते हे बगल में बैठी मधु बुआ ने उसको कार आगे बढ़ने का आदेश दे दिया. पीछे देविका जी और उनकी जेठानी के साथ बाकी औरते चावल, सिक्के आदि उछाल रही थी. आँखों में बेटी को विदा करने पर एक स्वाभाविक नमी सबके थी और इनसे बात करते रामेश्वर जी कुछ वक़्त यहाँ मौजूद रहे.

"बुआ, मेरी नींद तोह पूरी नहीं हुई और अब माधुरी दीदी के साथ भी जाना है.", कार के भीतर की ख़ामोशी को अर्जुन ने हे भांग किया. पिछली सीट पर संजीव भैया के साथ अलका और राधिका भाभी ख़ामोशी से बैठे हुए थे और अर्जुन अपने से आगे चलती बाकी कार देखता हुआ आईने से अपनी भाभी को भी देखने की कोशिश कर रहा था. राधिका भाभी की आँखों से निकले आंसुओं से उनके गाल तक कुछ काजल बह आया था.

"तुझे माँ या पापा ने बोलै है क्या माधुरी के साथ जाने के लिए?", बुआ की बात सुन्न कर अर्जुन कुछ सकते में आ गया.

"नहीं तोह बुआ लेकिन ये भी तोह रसम हे होती है न?"

"होती होगी लेकिन परसो गौरव खुद आएगा माधुरी को यहाँ ले कर. फिर इधर से हे वो दोनों 5 दिन के लिए Dehradun-Nainital जाने वाले है. परसो हे तेरी भाभी के परिवार वाले भी आएंगे. तुझे 2 दिन कही नहीं जाना और तू घर चल कर जितना दिल करे आराम से सो. पता है उसके बाद तू भी गाँव निकल जाएगा पूरे एक महीने के लिए.", ये सुन्न कर अर्जुन के तोह अपनी दीदी के साथ बनाये सभी प्लान चौपट हे हो गए थे. वो तोह फैंसला हे किये बैठा था के घर जाते हे 2 जोड़ी कपडे ले कर वो दीदी के साथ उनके ससुराल निकल जाएगा.

"क्यों तुझे 2 दिन अपनी भाभी के पास नहीं रहना जो इतना उदास हो गया?", मधु बुआ भी आखिर कौशल्या जी की हे बेटी थी जो कटाक्ष और हंसी मजाक के मामले में उन पर हे गयी थी. अर्जुन उनकी बात सुन्न कर झेंप गया था लेकिन पीछे बैठे संजीव के चेहरे पर मुस्कान आ गयी.

"ये अगर जाना हे चाहता है तोह जाने दीजिये न बुआ जी. वैसे भी शिकायते तोह सिर्फ इसको हे होती है.", संजीव भैया ने जब मुँह खोला तोह मधु बुआ भी हंसी न रोक सकीय.

"सुन्न लिया तूने ullu-ram.? वैसे तोह मैंने पापा से कहा भी था के अर्जुन को यही रोक लो 10-12 दिन जिस से तू अपने भाई और भाभी के साथ समय बिता सके. लेकिन उन्होंने हे कहा के तुझे जाना चाहिए और संजीव भी परसो शाम को दिल्ली चला जायेगा तेरी भाभी के साथ और वह से केरला 10 दिन के लिए. पीछे घर में तेरे पापा, ताऊ जी और चाचा है हे इसलिए तुझ पर दबाव नहीं है. बस 2 दिन तू घर आराम कर और सबके साथ टाइम बिता फिर महीने बाद हे तुझसे मिल पाएंगे. राधिका बीटा, तुम बिलकुल भी मैट सोचना की तुम एक बहु हो अब. पापा ने पहले भी कहा है की उनके लिए तुम Komal-Madhuri की तरह घर की बेटी हे हो. हाँ अब बड़ी तुम हे हो तोह अपनी ननदो के साथ सहेली के साथ साथ मार्गदर्शक की तरह रहना.", मधु बुआ के कहने पर राधिका भाभी ने बस सर हिला दिया 'जी' के साथ. आगे ज्यादा बातें न हुई क्योंकि अर्जुन अब खुली सड़क पर अपनी पिता के साथ अघोष्त सी रेस लगा चूका था. शहर वाला पुल्ल आते आते शंकर जी भी अपनी कार की पिछले शीशे से अर्जुन को देख मुस्कुराते हुए 110 के पर कार ले जा चुके थे और ठीक पीछे अर्जुन भी उतनी हे रफ़्तार पर था. अर्जुन ने खुली सड़क देख जैसे हे रफ़्तार बधाई शंकर जी उस से पहले हे बाकी करो को पीछे छोड़ते अपनी बीवी और बेटियों के साथ नजरो से ओझल हो गए. अर्जुन ने हार मानते हुए 110 से रफ़्तार फिर से 70 हे कर दी. मधु बुआ मंद मंद मुस्कुरा रही थी.

"उन से नहीं जीत सकता तू बीटा. वो तेरे पिता है और ऐसा उन्होंने जानबूझ किया जिस से सफर जल्दी पूरा हो सके. पापा खुद कई बार उनकी ड्राइविंग का प्रयोग अपने केस में कर चुके है और तुम्हे तोह कार चलते महीना हे हुआ है.", मधु बुआ जैसे बिलकुल शंकर जी जैसी हे थी सोच के मामले में. वो उकसा रही थी अर्जुन को लेकिन आईने से देखते संजीव भैया ने ना में गर्दन हिला कर उसको शांत रहने का इशारा दिया.

"पापा से जीतना भी कौन चाहता है बुआ जी? और रही बात महीने वाली तोह मैं शायद उन्हें देख कर हे सीखा हु. जब कभी आपको कही जल्दी हो तोह बता दीजियेगा, शायद पापा के आसपास टाइम में हे पंहुचा दू. और भाभी, गाँव से आने के बाद आपका परमानेंट ड्राइवर मैं हे रहने वाला हु.", अर्जुन ने फिर से संजीव भैया को देख कर ये कहा था जिस पर न चाहते हुए भी राधिका की हंसी निकल गयी.

"आप ऐसे हे है देवर जी?", पहली बार वो बोली थी और लगभग घर भी आ हे चूका था.

"आप नहीं भाभी. अर्जुन.. और हम आ गए आपके परमानेंट ठिकाने पर. तैयार हो जाओ एक बार फिर से वो गीत सुन्न ने के लिए जिनका एक भी शब्द किसी को समझ नहीं आने वाला लेकिन सभी कोरस इस तरह करेंगे जैसे यही लोग है अविष्कार करने वाले.", अर्जुन ने देख लिया था के घर के बहार ललिता जी कलश रख रही थी और उनकी बगल में दादी कड़ी थी ढेरो महिलओं और उसकी बहनो के साथ. आरती ने आगे बढ़ कर भाभी की तरफ का दरवाजा खोला तोह साथ हे संजीव भैया भी उतरे. अर्जुन कार में बैठा हुआ हे सब देख रहा था. फिर से chawal-phool बरसाए गए और दोनों को daaye-bahe बराबर खड़ा करके भाभी के पाँव से कलश उड़ेल कर उन्हें अंदर ले जाया गया.

"ोये क्या देख रहे हो यहाँ अकेले बैठ कर.?", प्रीती तोह कपडे भी बदल आयी थी और वो कार के बराबर कड़ी अर्जुन से हे बात कर रही थी जो सामने देख मुस्कुरा रहा था.

"तुम बगल में रहती हो और हमारी शादी कही दूर होगी फिर तुम वापिस इस घर में आओगी और ये सब करोगी. रोना धोना भी होगा क्या? और उतनी दूर जाने की जरुरत भी क्या है जब घर साथ साथ है? ये बीच वाला प्लाट भी बना कर दोनों हे घर एक कर देते है."

"मैं तोह फिर भी बगल वाले घर से आउंगी लेकिन जरा अपनी बड़ी बीवी के बारे में इतना सब सोचना. शायद कोई सलूशन निकाल पाए हम लोग.", यहाँ तोह प्रीती उसपे हे पलट वॉर करके अंदर चली गयी थी. नाराज तोह वो थी हे अर्जुन से लेकिन प्यार और परवाह कही ज्यादा थी. अर्जुन मैं हे मैं बोलै.

'आज का कुछ पता नहीं और कल के प्लान बना लो. सही है मानो डार्लिंग. वैसे गलत तोह कुछ नहीं कहा. बेडा गरक हो इस समाज का. जंगल वाला कानून हे ठीक था. चहहीइ... यही ठीक है. जो होगा वो हो के हे रहेगा लेकिन दीदी से मिल लू पहले.' अर्जुन को जब ध्यान आया की अब माधुरी दीदी भी जाने वाली है तोह वो तुरंत बहार निकला.

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"आप गौरव से मिलने के बाद आराम कर लेना जी. साड़ी रात जाग कर निकली है और बढ़ती उम्र में ऐसा करना ठीक भी नहीं आपके लिए.", बैठक में सभी बुजुर्ग लोग बैठ थे और कुछ उनकी औलाद. कौशल्या जी ने बहु का गृहप्रवेश करवाने के बाद यहाँ chai-nashta लगवाते हुए धीमी आवाज में रामेश्वर जी से कहा तोह उन्होंने इशारो से हे कुछ वक़्त बाद बात करने का कहा.

"कृष्ण, तुम इसकी चर्चा अगर देवकी से भी कर लेते तोह हम कोई फैंसला ले पाते! सतीश और शास्त्री जी की भी यही राये है और अपने डॉक्टर साहब तोह इनसे भी अलग विचार रखते है.", यहाँ बैठक के किवाड़ अलग हे बंद थे जबकि बाकी घर में खूब तैयारियां हो रही थी. सभी अपनी नींद और थकावट भुला कर माधुरी के ससुराल वालो के साथ साथ संजीव और राधिका की देख रेख में लगे हुए थे. कौशल्या जी ने पूर्णिमा जी से हे चारो बचो को घर के मंदिर में आशीर्वाद दिलवाने की जिम्मेवारी दी थी. पूर्णिमा जी नाहा कर तैयार थी और चारो के तिलक आदि करके उन्होंने मंदिर में पारिवारिक रस्मे आरम्भ की. बैठक में अब शंकर, उमेद, विनोद, पप शर्मा एक साथ साथ रौशनी, दामिनी और देवकी जी को भी बैठा लिया गया था.

"आप क्या कहते है सांगवान साहब? बयान तोह छोटी गुड्डी (रौशनी) ने भी दिया है के रमन इसके साथ ठीक व्यवहार न कर रहा था. बिनोद ने तोह भैया को हे बता दिया था इस बारे में जो कल होने जा रहा था. कानून की समझ इस किसान को तोह बिलकुल भी नहीं है. बस परिवार का नाम खराब न हो, छोटी गुड्डी का भविष्य जो लिखा है सो अब वही है.", इस कमरे में माहौल कुछ गंभीर और कुछ गमगीन था.

"रमन का हिस्सा मैं तत्काल हे रौशनी और अंजलि के नाम करवा देता हु पिता जी. बाकी सरकारी काम और इस घटना के बारे में मेरे विचार भी आप जैसे हे है.", पप शर्मा ने अपना मैं बताया तोह दामिनी ने भी अपने पति को प्रशंशा से देखा.

"कानून की नजर में तोह जिस तरह ये सब हुआ है उस हिसाब से राजेश ने हमलावर को आत्मरक्षा में मार दिया. चलो सजा काम हो या बच भी जाए लेकिन एक केस बनता हे है उस तरह से. और सम्बन्ध जाहिर होंगे तोह परिवार का नाम भी आएगा. रौशनी मेरी भी बेटी है कृष्ण और इसका भविष्य शायद मैं तुमसे बेहतर दे सकता था लेकिन शायद तुम्हारे सलाह के ज्यादा पैसे लगते होंगे अपने इस नाचीज भाई के साथ.", रामेश्वर जी ने समझने के साथ जब तंज किया तोह कृष्णेश्वर की तोह शर्मिंदगी से नजरे हे झुक गयी और शंकर अपने पिता के हाथ पर हाथ रख उन्हें शांत रखने की कोशिश करने लगा.

"माफ़ करना जेठ जी, अब इंसान के चेहरे पर तोह नहीं लिखा होता की उसका चरित्र कैसा है? इतने बरस उसने मेरी बेटी को खुश भी तोह रखा था दामाद जी ने. Paisa-jayedaad चीज हे ऐसी है की कब ईमान दोल जाए.", देवकी ने ये बात इतने लोगो के बीच ऐसे कह दी थी जैसे रामेश्वर जी रिश्ते में उनसे छोटे हो और वो परिवार की मुखिया. इस बात पर जहा सभी हैरत में थे वही नरिंदर खुद को बोलने से न रोक सका.

"माफ़ करना चची आपको न पहले बात करने की तमीज थी और न आज है. और कोई बीच में नहीं बोलेगा जब मैं बोल रहा हु. चाचा, रमन का रिश्ता कौन लेके आया था? मेरी तरफ देख कर बात करना आप.", नरिंदर को कभी भी इन लोगो ने ऐसे न देखा था सिवाए शंकर और उमेद के. वो तोह वैसे भी अब बोलने वाले नहीं थे क्योंकि नरिंदर ऐसे तोह कुछ कहता भी न था. कृष्णेश्वर ने कोशिश तोह की थी अपनी बीवी की तरफ देखने की लेकिन अपने भतीजे का डर शायद कही ज्यादा था.

"देवकी का बड़ा भाई पुराण लेके आया था बीटा रमन का रिश्ता."

"और आपको पापा से सलाह करने से किसने रोका था? क्या जानते थे आप रमन के परिवार के बारे में और ये पुराण आखिरी बार आपसे कब मिला था haal-filhal में?", इतने सटीक सवाल और वो भी लगातार. एक बार रामेश्वर जी बीच में बोलने हे लगे थे और उनको छोल साहब ने ऊँगली से ना का इशारा कर दिया. देवकी के चेहरे पर heen-bhaav आ चुके थे लेकिन जैसे उनकी दोनों बेटियां भी सच जान न चाहती थी.

"छोडो बीटा इस सबको.. अब जो हो गया सो हो गया."

"मैं बताता हु आपको चाचा जी. पुराण मां ने पहले तोह इस बिनोदिये का दिमाग खराब किया था जब ये छोटा था. फिर पप शर्मा जी तोह चलो एक पारिवारिक इंसान है जिन्हे सबकी रजामंदी से पसंद किया गया लेकिन रमन सिंह? ओह रमन शर्मा मेरा मतलब था चची जी. वो आदमी खुदको ले कर आया था पुराण को दबाव में ले कर. बिनोदिया सुधर रहा था शर्मा जी के साथ shaadi-byaah वाले काम ले कर लेकिन रमन ने हे इन दोनों को वो होटल वाली सलाह दी. गलत कह रहा हु बिनोद? और उसका पक्ष किसने लिया जमीन बेचने में? आपने न चची? आप कहते हो छोडो तोह चलो ये सब छोड़ देता हु. रौशनी, अब बता तूने सबसे पहले कब मार खायी थी रमन से?", नरिंदर ने सर पे हाथ फेरते हुए अपनी चचेरी बहिन से संवेदना प्रकट की तोह वो रोने से खुद को रोक हे न सकीय. नरिंदर के गले लग कर वो हिचकियाँ लेने लगी थी.

"मैंने बोलै था माँ से के गलत आदमी से ब्याह दिया तुमने.. ुह्ह्ह्हह्ह.. भैया आप सब सच बोल रहे हो और मैंने इसलिए आपको हे फ़ोन किया जब इतने साल तक पिता जी यही कहते रहे की विवाह में ये सब चलता रहता है. माँ तोह सुनती हे नहीं थी कभी और जब रमन ने मुझसे अंजलि को मारने वाली बात कही तभी मैंने सोच लिया था के मैं अब आपको सच बता दूंगी."

"शांत हो जा मेरी बहिन. तेरा ये भाई जिन्दा है और जबतक ये है तबतक तुझे तोह कुछ होने नहीं देता बाकी जिन्होंने फैंसले करने थे वो पहले कर चुके. बस अब और नहीं. सुन्न लिया आपने चाचा जी.. अब फैंसला मेरे पापा करेंगे और बिनोद, अपनों पर विश्वास करना सीख. कमाई तू पहले भी ाची कर लेता था जब जीजा के साथ म्हणत करता था. रमन की राह पे चल कर पहले तू नुक्सान उठा गया और अब ये बहिन. दोनों माँ बेटी मारी जाती तोह क्या जवाब देता तू.?", बिनोदिये के तोह खुद आँखों से आंसू आ चुके थे लेकिन देवकी का चेहरा टास से मास्स न हुआ.

"इन्दर, बीटा अभी घर में मेहमान भी है और समय भी सही नहीं. तुम बताओ के तुम्हारे पास क्या हल है? मैं तोह आत्महत्या के पक्ष में हु."

"नहीं रखना कोई वास्ता पापा ऐसे इंसान से जिसकी मौत पर झूठा शुआक मानना पड़े. निर्मल अंकल को बोलो की लाश में गोली उतार दे और आप बयान देना की वो रमन शर्मा बन्न कर जालसाजी कर रहा था जिसकी सूचना आप पहले हे िग ऑफिस में दे चुके हो. यहाँ वो जो भी कला धंदा करने आया था उसमे पुलिस एनकाउंटर में वो मारा गया. आपकी दी हुई रिपोर्ट और मुजरिम की डिटेल मेल खाने पर आपने शिनाख्त करके पुष्टि कर दी. इस घर में वो इंसान कभी भी था हे नहीं.", एक सांस में नरिंदर ये फैंसला सुना गया था जिस पर न चाहते हुए भी शंकर के चेहरे पर मुस्कान आ हे गयी. सचमुच नरिंदर कभी भी आज के बारे में नहीं सोचता था. वो भविष्य की जांच पहले हे करके रखता था जिस से समय आने पर फैंसला लेने में परेशानी न हो. नरिंदर के कमरे से निकलते हे देवकी ने मुँह खोला.

"जो ठीक लगे सो करो आप लोग. बाकी पुराण नए साल पर हे घर आया था उसके बाद कोई बातचीत नहीं हुई."

"आइंदा हो भी नहीं सकती चची. रमन उन्हें मरवा चूका है लेकिन किसके कहने पर ये नहीं पता चला.", शंकर ने अलग हे धमाका कर दिया था यहाँ से जाने से पहले. फैंसला हो चूका था के रमन शर्मा उर्फ़ सिंह का परचा पिछली तारिख में दर्ज करवा कर उस से सम्बन्ध विच्छेद कर लिए जाएंगे और इस दुर्घटना को नए सिरे से पुलिस मुठभेड़ का परिणाम बताया जाए. रामेश्वर जी ने नरिंदर की तरफ गयी तीसरे हिस्से की जमीन अर्जुन के नाम से हटवा कर रौशनी और अंजलि के नाम करवाने का भी फैंसला दे दिया था. बिना जांच परख के किये गए एक गलत विवाह ने एक पल के लिए तोह पूरे परिवार को हे संकट में दाल दिया था परन्तु समय रहते जैसे इस विपदा को भी कही बेहतर तरीके से संभाला था इस परिवार ने.

"भैया, मैं भी आज गाँव निकलने की सोच रहा हु अगर कोई आवश्यक काम न हो तोह. और जो भी हुआ उसमे आपका दोषी मैं भी उतना हे हु जितना वो रमन.", कृष्णेश्वर ने दोनों हाथ जोड़ दिए थे जिन्हे खुद शास्त्री जी ने थाम लिया.

"आप मुझे छोटा भाई माने या बड़ा, लेकिन परिवार को तोह समझते हे होंगे कृष्णेश्वर जी? जैसा भाभी जी ने कहा की इंसान के चेहरे से उसका चरित्र नहीं पता लगता मैं भी मानता हु ये. आपने तोह बचो को बेहतर जीवन देने की हे चाहत राखी लेकिन हमारी एक रूढ़िवाद सोच अक्सर हावी हो जाती है की बेटी दूसरे घर चली गयी तोह हमारा उस से सामाजिक हक़ ख़तम हो गया. अपने खून से भला हम दूर हो सकते है? भाई साहब भी तोह आपके हे है और ये आपको दुखी कैसे देख सकते है भला? रात हे तोह बात हुई थी हमारी. आप आज यही रहिये और शाम को कुछ समय मेरे साथ भी व्यतीत कीजिये. फिर जब दिल करे तब चले जाना. इतने ये सब भी हल हो जाएगा.", शास्त्री जी की बात सुन्न कर रामेश्वर जी भी अपने भाई के करीब चले आये. पीठ थपथपते हुए वो बोले.

"तुम मेरे लिए माँ की धरोहर हो कृष्ण और उनकी हर वास्तु को हम sar-maathe लगा कर रखते है. तुम तोह उनके प्रिये थे इसलिए हमारा सबकुछ तुम हे हो. मैं को हल्का रखो और हंसमुख इन्तजार कर रहा है बहार तुम्हारा. बहु, दोनों बेटियों को भीतर ले जाओ और रौशनी फ़िलहाल यही रहेगी अंजलि बिटिया के साथ. बाकी बहु आयी है आज तोह ये उदासी घर से बहार हे रहे तोह बेहतर होगा. चलिए शास्त्री जी, आज आपको बगीचे में हे चाय पिलाते है. ये असगर वाली तोह मुझे भी पसंद नहीं. विनोद, तेरी ताई को बोल की 6-7 कप चाय अपनी रसोई से हे बगीचे में भिजवा दे. और तुमने जैसे कल हिम्मत दिखाई, हमेशा कोशिश करना के ऐसा कर सको.", विनोद की पीठ थपथपा कर वो बाकी सबके साथ बहार हे चल दिए. सुबह के 5 बज चुके थे और माधुरी के भी निकलने का वक़्त हो चूका था जिस से पंडित जी आँगन में हे मिलने वाले थे.

'ताऊ जी की बात सही है माँ. तुम हर बार अपने फैंसले पापा पे दबाव से मनवा लेती हो. अब घर जा के बात करूँगा मैं तुमसे.', विनोद अपनी माँ के कान में इतना बोल कर यही से बहार चल दिया. सिग्रत्ती की तालाब भी थी और दिमाग में हजारो सवाल भी. फ़िलहाल ज्यादा आसान तोह तालाब दूर करना हे था उसके लिए. पप शर्मा तोह अपनी बीवी के साथ अंदर हे हो लिया था ख़ामोशी से.

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माधुरी के घर से विदा होने के बाद Sanjiv-Radhika की कुछ रस्मे दोपहर और शाम को होने वाली थी जैसा कौशल्या जी ने कहा था. अब उनके कहने पर हे ललिता जी ने संजीव को अपने कमरे में आराम करने का कहा तोह वो न नुकुर करता दिखा. राधिका को विन्नी, अलका, तारा, कोमल ऊपर वाले कमरे में ले जा चुकी थी बाकी घर दिखने के बाद. बाथरूम से फ्रेश हो कर राधिका उस कमरे में दाखिल हुई तोह उसको इस तरह सजा देख गालो की शर्म दोगुनी हो गयी. अब ये सबकुछ जीवन में पहली बार हे तोह हो रहा था और वो भी अपने घर से अलग इस नए घर में जो अब हमेशा के लिए उसका था. किसी भी लड़की ने ज्यादा खिंचाई न करके हमेशा की तरह दोस्ताना और परवाह से भरा प्रेम हे दर्शाया था.

"भाभी, आप अब आराम करे. बाकी सभी लोग भी यही करने वाले है. कोमल दीदी और विन्नी दीदी इधर हे होंगी. हम लोग पिछले घर जा रहे है जो आपको बाद में दिखा देंगे. इस तरफ अब कोई भी नहीं रहने वाला. तीनो कमरे बस आपके हे है बाकी अर्जुन का कुछ पता नहीं.", अलका ने hall-kamre में कदमो की आहात सुनी तोह बाकी सभी के साथ इधर से निकल गयी. संजीव जैसे तैसे हे आया था और अपनी बहनो के चेहरे पर ख़ुशी देख थोड़ा घबरा कर एक तरफ हो गया.

"आप आराम कीजिये भैया और जब उठ जाओ तोह नाश्ते के लिए बोल दीजियेगा.", अलका सहजता से इतना हे कह कर चली गयी और संजीव ने यही से दरवाजा बंद कर दिया.

'हे भगवन इतना तोह इंटरव्यू पर नहीं घबराया जितना आज अपने हे घर में चलते हुए फट रही है. हर कोई ऐसे क्यों देख रहा था? चल बीटा संजीव अब 5-6 घंटे से पहले नहीं उठना.', संजीव अभी कमरे में दाखिल हे हुआ था की वजा की सजावट और बिस्टेर के बीच घूंघट निकले बैठी अपनी नयी नवेली दुल्हन को देख कदम वही रुक गए.

"वह क्यों खड़े हो? ये तुम्हारा हे तोह कमरा है न? मतलब आज से हमारा.", राधिका ने जब बहार वाले कमरे के बंद होने की आवाज के बाद यहाँ संजीव को देखा तोह वो आशवस्त हो गयी की इधर अब कोई नहीं है जैसा अलका ने बताया था.

"वो.. वो तोह ठीक है. लेकिन अगर तुम अकेले सोना चाहती हो तोह.. मैं इस कमरे में आराम कर लेता हु.", संजीव से तोह कुछ कहते हे न बन्न रहा था और राधिका के चेहरे पर मुस्कान बहोत कुछ बयान कर रही थी.

"अब से हर रोज तुम्हारे हे साथ तोह सोना है मुझे. फिर चाहे उस कमरे में या इस कमरे में. अलका ने बताया है की तीनो कमरे हमारे हे है. थकान मुझे भी है लेकिन अब तोह लाइसेंस है तुम्हारे साथ सोने का?", राधिका की ख़ुशी देख संजीव भी कुछ बेहतर महसूस करता हुआ एक तरफ अपनी जूती उतार कर कुर्ते के बटन खोल पाजामे और बनियान में बिस्टेर के किनारे आ बैठा.

"ये तोह ठीक कहा तुमने राधिका लेकिन तीनो नहीं 2 कमरे खली है. हमारी बगल वाला अर्जुन का है और वो उसका हे रहेगा. तुम भी फेरो के टाइम से हे थकी हुई लग रही हो और ऊपर से ये भरी भरी कपडे. अलका ने एक भी नहीं चलाया देखो.", संजीव ने रिमोट उठा कर एक चालू किया और राधिका भी अपनी नाथ को खोलने की कोशिश करने लगी.

"खोलने में मदद करना संजीव. पता नहीं कैसे बंद की है ये और मुझसे ये सब पहना भी नहीं जाता.", संजीव के तोह हाथ हे कैंप उठे राधिका के चेहरे से चाँद इंच अपना चेहरा करते हुए. जैसे तैसे वो नाथ को खोलने में लगा रहा लेकिन उसके कांपते हाथ देख राधिका पीछे हट गयी.

"तुमसे नहीं होने वाला.", मुस्कुराते हुए राधिका ने खुद हे थोड़ा जोर से नाथ का हक्क खोला तोह हलकी सी आह निकल गयी.

"राधिका.. तुम ठीक हो न? पता नहीं ये सब क्यों पहनते है ये घरवाले? देखो खून तोह नहीं आया न?", संजीव को इतना परेशां देख राधिका उचक कर उसकी गॉड में हे जा बैठी.

"ओह मेरे पोलिसिअ बालम, तुम न सचमुच हे बड़े फत्तू हो. नाथ हे खोली है कोई चाकू नहीं लगा. उमाहहह. बहोत ज्यादा हे परवाह नहीं करते तुम मेरी? अब लेटो इधर और जबतक मैं न उठु तुम हिलना भी मैट.", राधिका ने खुद हे संजीव को चूम लिया था जिस पर वो लड़की की तरह शर्माने लगा. फिर एक बार गले लग कर राधिका अलग हुई तोह संजीव तकिया सही करते हुए सीधा लेट गया. राधिका ने भी बिना hil-hujjatt के अपना सर उस बलिष्ट भुजा पर रखते हुए दूसरा हाथ संजीव की छाती पर रखते हुए आँखे मूँद ली. थकान इतनी थी की राधिका को एक पल न लगा गहरी नींद के आगोश में सामने में. संजीव कुछ पर बस छत को ताकता रहा और राधिका को जांचने के बाद उसको सही से दूसरी तरफ करवट देने के बाद उसके हाथ के निचे तकिया रख कर दबे पाँव कमरे से बहार निकल आया. बगल वाले कमरे का दरवाजा खोला तोह अंदर अर्जुन वैसे हे सोया हुआ था जैसे अभी संजीव राधिका को सुला कर आया था. इधर वाला तकिया हटा कर वो खुद अपने भाई की बगल में जा सोया. नींद में अर्जुन भी अपने भाई की बगल में आ दुबका. इस बार संजीव को जरा भी देर न लगी सोने में. वो राधिका को भी चैन से गहरी नींद लेने देना चाहता था और खुद को रोकना भी उस मिलान से जो दिन चढ़े करना ठीक न था. इस कमरे में इन दोनों को देख कोई कह हे नहीं सकता था के संजीव की शादी हुई है. हमेशा की तरह वो दोनों भाई बेजोड़ प्रेम से बंधे वैसे हे सोये थे.

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"रेखा, तुम्हे इस हाथ का थोड़ा ज्यादा हे ध्यान रखें होगा. नहाते वक़्त पॉलिथीन लपेटना और रसोई में बिलकुल भी नहीं जाना. कृष्णा, ये तोह नहीं मानेगी लेकिन तुम ध्यान देना इस बात का. कोमल बीटा, मेरे कपडे निकल दो. मुझे आज जरुरी काम से एक बार हॉस्पिटल जाना है लेकिन शाम तक लौट आऊंगा.", शंकर जी नाश्ता करने के बाद यहाँ अपने कमरे में कई दिन बाद इस तरह बैठे थे और उनके समीप हे रेखा जी, कृष्णा जी और मधु. नरिंदर भी एक कुर्सी पर बैठा अपने विचारो में खोया था. उमेद बगल वाले कमरे में सोया हुआ था थकान की वजह से. कोमल अपने पिता की बात सुन्न कर कपडे निकलने लगी.

"आप आराम कर लेते थोड़ा? शाम को तोह आपने दिल्ली भी जाना है जैसा उमेद भाई साहब बता रहे थे.", रेखा जी ने अपना हाथ 2 तकियो पर टिकाया हुआ था. हल्का बुखार था उन्हें चोट की वजह से.

"भाभी, इसको नींद की जरुरत नहीं है और उमेद अभी इसलिए सो रहा है ताकि ये रस्ते में सो सके. जाना मुझे था लेकिन हुसैन भाई को आज रोक लिया है तोह मेरी जगह शंकर जा रहा है. कृष्णा तुम भाभी के हे कमरे में रहना. वैसे अभी तक मुझे ये बात सही से किसी ने नहीं बताई के चोट लगी कैसे? आइना तोह भूल कर भी मैट बोलना कोई.", नरिंदर जी की बात सुन्न कर शंकर जी तोह कपडे ले कर बाथरूम की और चले गए हँसते हुए पीछे ये लोग रह गए जो रेखा से सही जवाब चाहते थे.

"आइना तोह इन्होने हे बोल दिया इन्दर. वह पिलर पर एल्युमीनियम चढ़ा था जहा हाथ रखने से जखम हो गया."

"भाभी, स्टेटमेंट रिकॉर्ड कर रहा हु आप बोलती जाओ बस.", अब जैसे नरिंदर की बात सुन्न कर रेखा ने करवट हे बदल ली.

"मैं भला क्यों झूठ बोलूंगी."

"वही तोह भाभी. और फिर लेडीज बाथरूम के बहार आपका खून थोड़ी न था. और वो tea-spot वाली जगह कुर्सियों के पास भी किसी ने मुर्गा कटा होगा. सही कह रहा हु न"

"बाथरूम भी इसलिए गयी थी की हाथ पानी के निचे कर दू और वह कुर्सी पर बैठ कर इनका इंतजार कर रहे थे चाहे तोह मेहुल भाई साहब से पूछ लेना. इतनी बड़ी बात भी नहीं है इन्दर."

"चलो फिर ऐसा हे सही भाभी. मधु, तुमने कब निकलना है?"

"Saas-sasur तोह चले भी गए मेरे. अब तोह तुम अपने जीजा से हे पूछो और वो तोह विवान के घर जाने क्या प्लान बना रहे है? कह तोह रहे थे की शाम को निकलेंगे.", मधु ने अपनी भाभी के गर्दन तक चादर उड़ाने के बाद हाथ भी सही से रखा. रेखा को नींद की दवा भी दी थी शंकर जी ने जिस वजह से वो सोने लगी थी.

"आज रुक जा बेबे. कल चली जइयो. घर एकदम से खली सा हो जायेगा तोह maa-papa को भी ाचा नहीं लगेगा. बाकि अशोक जी से मैं खुद बात कर लेता हु. हिमांशु की भी छुट्टियां पड़ी है तोह उसको हे छोड़ दे इधर."

"आज तोह रुकने का बन्न भी जायेगा भाई लेकिन तुम्हारे भांजे को वो पहले हे गाँव ले जा चुके है. एक बार के लिए तोह मुझे यहाँ 10 दिन भी छोड़ देंगे पर उसको फ़िलहाल अपने से दूर नहीं रखने वाले.", मधु की बात सुन्न कर नरिंदर जी मुस्कुराते हुए उठ गए.

"हाँ बेबे. बात तोह सही है तेरी. हमारे थानेदार को हे देख लो. अपने ब्याज को कही जाने न देते. खैर तुम लोग भी थोड़ा आराम कर लो, मैं उमेद के पास हे सो रहा हु. हुसैन भाई और भाभी पिंकी वाले कमरे में सोये है जब वो उठे तोह मुझे भी उठा देना."

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"तंग मत कर यार अलका. सोने दे थोड़ी देर फिर जो चाहे कर लियो.", बाकी लड़कियां अलग कमरों में घोड़े बेच कर सोई पड़ी थी और यहाँ एक कमरे में ऋतू ढीला सा पजामा और वैसी हे टीशर्ट पहने औंधे मुँह बिस्टेर पर पसरी थी जब अलका कपडे बदल कर उसके ऊपर जा लेती. पहले तोह ऋतू ने परवाह न की लेकिन जब अलका के दोनों हाथ उसकी टीशर्ट के निचले सीरो से होते हुए दोनों मांसल उभारो पर पकड़ बनाने लगे तोह वो कसमसा उठी. अलका ने हाथ न हटते हुए उनकी मालिश जारी राखी और फिर ऋतू का गाल चूम लिया. अब तोह ऋतू के दोनों निप्पल उसकी उँगलियों में दबे अकड़ने हे लगे थे.

"तू यहाँ बिस्टेर से मुनिया चिपकाये लेती हुई है और उधर वो अर्जुन. अरे कब हिम्मत दिखाएगी और कब तक बस लिप्त चिपटी तक रुकी रहेगी? परसो वो निकल जायेगा और तू उसकी याद में रोटी रहियो, पूरा एक महीना.", ये सुन्न कर ऋतू झट्ट पलट गयी. अलका ने भी हाथ हटा कर उसकी बगल में लेट कर हाथ कमर में दाल लिए. थकान के बावजूद ऋतू के चेहरे पर जो मासूमियत हमेशा दिखती थी वो अभी तक थी. उलझन से वो एकटक बस अलका को देखे जा रही थी.

"सोच मत डार्लिंग और कैसे भी करके आज की रात हाथ से जाने मैट दे. ये सभी मेहमान तोह 11-12 बजे तक निकल जाएँगी अपनी कार से और उधर अभी भी मेहमान है. भैया की तरफ तोह अर्जुन भी नहीं रहने वाला तोह तू बस इधर आ जाना ये बोल कर की मैं और तू यही सोने वाले है. अब अर्जुन को भी यही भेजेंगे दादा जी. Aarti-Tara को मैं ठिकाने लगा दूंगी, तू टेंशन मैट ले. कल अर्जुन न इधर आ पायेगा और न हम."

"यार दिल तोह मेरा हमेशा हे उसके पास रहने का करता है. और अगर Aarti-Tara मान भी जाए फिर भी प्रॉब्लम ख़तम नहीं होने वाली.", ऋतू ने भी अलका की पतली कमर पर हाथ रख लिया था. दोनों एक दूसरे को देखते हुए बातें कर रही थी.

"मुस्कान को दादी नहीं भेजने वाली इस तरफ. ज्यादा से ज्यादा प्रियंका दीदी आ सकती है जो नींद की पक्की है और इस से बुरा हो सकता है जब अफसाना और ज़ुबैदा यहाँ रुकी तोह. प्रीती कह रही थी की ज़ुबैदा दीदी भी अपने मुन्नालाल पर लट्टू है."

"वो सब तोह मैं हे देख लुंगी यार. और आज हुसैन अंकल रुकने वाले है परिवार के साथ. दीदी भी उनके साथ कल जाएंगी पर असली प्रॉब्लम है विन्नी दीदी और रुपाली. रुपाली यही आएगी अगर हम आये तोह. उसको आरती देख लेगी लेकिन विन्नी दीदी नहीं रुकने वाली अब क्योंकि शादी होने तक हे वो रुकी हुई थी."

"सचमुच यार.. बहनचोद यही प्रॉब्लम है के किसको किसको बांध के रखे. अभी तोह उधर वो बबिता दीदी भी रुकी हुई है सुशीला आंटी के साथ. प्रीती को बोल न के आज वो विन्नी दीदी और आरती को अपने घर ले जाए. आर्किटेक्ट का बहाना भी ाचा है. आरती के साथ रुपाली फ्री. बाकी मैं चक्कर चला हे लुंगी.", अलका ने चमकती आँखों से कहा तोह ऋतू ने उसको अपने सीने से लगा लिया

"एक बात तोह बता जरा. तू ये इतने तीर सिर्फ मेरे लिए तोह नहीं चला रही?"

"कमीनी क्या तेरा क्या मेरा? मैं बोलती नहीं लेकिन जैसे तुझे समजह्ती हु वैसे हे तू भी मेरी हालत जानती है."

"अर्जुन दोनों के साथ कम्फर्टेबले नहीं होने वाला और हम भी तोह एक दूसरे के साथ इतने हे कम्फर्टेबले है."

"ऋतू, तेरा दिमाग भी न जुंग खा गया. नींद की जरुरत है तुझे. वो यहाँ आएगा तोह कमरे तोह बदल हे सकते है? तू तेरी मर्जी का टाइम बिता बस मुझे थोड़ी देर चाहिए.. 3-4 घंटे बस."

"कमीनी.. 3-4 घंटे तू और फिर मैं बस उसके साथ सोने के लिए है न? कोई न तू कर इंतजाम और फिर 10 से 1 वो तेरे पास लेकिन एक के बाद सुबह तक इस कमरे में मेरे साथ."

"उमाठ. दोने. दिल खुश कर दिया तूने तोह मेरा. वैसे ज्यादा मजा तब आएगा जब तीनो.. क्या कहती है?"

"चीई.. चल सोने दे अब और ये आईडिया तेरे पास हे रख.", ऋतू शर्म से दोहरी होती मुँह पलटने लगी थी.

"सोच न ऋतू. एक हे बीएड पर हम तीनो. वैसे भी उसके टास्ते हम दोनों में डिफरेंट हे है. अकेले में तोह भरी पड़ जाता है लेकिन ऐसे शायद काबू आ जाये."

"सो जा अब बड़ी आयी टास्ते वाली. मैं कर लेती हु उसको कण्ट्रोल. हालत उसकी ख़राब होती है लास्ट में और अब तू एक भी बात नहीं कहेगी. चुप चाप सो जा. दिन चढ़ा नहीं रात की पहले सोच लो.", ऋतू की बात सुन्न कर अलका उसके साथ पीछे से चिपक कर लेट गयी. हाथ अभी भी ऋतू के उभारो पर हे थे जिन्हे वो बिना हिलाये लिपटी थी. इन दोनों के बीच जितना खुलापन और समर्पण था शायद हे बाकी किसी में था. आज रामेश्वर जी के परिवार में भी एक बेटी ब्याह करके रुखसत हुई थी और एक बहु ने कदम रखे थे. आने वाला समय भरपूर घटनाक्रम से भरा रहने वाला था जिस से पहले लगभग ज्यादातर लोग आराम फार्मा रहे थे और कुछ तैयारियों में जुटे थे, अपने दायित्व निभाते हुए.

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