MANAV or DANAV sex story - part 1 - Page 19 - SexBaba
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MANAV or DANAV sex story - part 1

अपडेट 144

पब की बात सुन कर जुली के आशु बहा गए – सच में आप बहुत अच्छे है आपका ये अपनापन hi तो है. जो मुझको कुछ भी कर गुजने की शक्ति देता है. ी लव यू फॉरएवर… अब आप जाइये एक मेरी जैसी लड़की के साथ इसका मत फरमाइए नहीं तो घर पैर आपकी साडी बिबिया आपकी पिटाई कर degi….hahaha

पब अब जुली से कुछ न बोल सका को घर की और चल दिया. हवेली पहुंच कर वो डिनर करके सो गया. वैसे भी आदि रात ख़तम हो चुकी थी. और कल इनको दयासुर के पास भी जाना था.

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चलिए एक बार त्रिकाल के अड्डे पैर भी नजर मार लेते है की वह क्या हो रहा है.

संभु – गुरूजी ये क्या हो रहा है कोई नया और बुराई के अंत करने के लिए आ गया है. कोई दानवपुत्र है. साला कहता खुद को दानवपुत्र है और कर देवता वाले काम रहा है. सेल पे पास लड़कियों की एक फौज भी है. पहले से hi इस पंकज ने दिमाग ख़राब कर रखा है अब ये और आ गया.

त्रिकाल – अरे मुर्ख ये कोई और नहीं वही पंकज है. आज की पूरी घटना मेने देखि है. और ये जो इसके पास फौज है न ये वो hi लड़किया है जो भानु हमारे लिए तैयार करता था. अब उन लड़कियों को hi त्रिनेड करके उनको किडनेप करने वालो को मरने के लिए उसे कर रहा है.

संभु – ये तो बहुत बुरी बात है.

त्रिकाल – नहीं हमको इससे ज्यादा फरक नहीं पड़ेगा. बस तू 3 महीने की बलि के लिए 21 लड़किया मगवा ले ****** से. यदि ये वह भी पहुंच गया तो ये सड़ना पूरी नहीं हो पायेगी. और एक बार ये सड़ना पूरी हो गयी फिर पंकज जैसे हमारा कुछ नहीं बिगड़ पाएंगे. एक बार मुझको मेरी खोई हुई पावर मिल जाये. फिर मैं डलासुर के इस रूप को अपना गुलाम बना कर देवताओ पैर अटैक करुगा. और फिर सवर्ग हमारा होगा संभु … मैं होगा स्वर्ग का राजा और तू वह का सेनापति…. और वो सरे देवता और इस दुनिया का हर मानव होगा हमारा गुलाम … हहह ाहः ः

संभु – हाँ गुरूजी ऐसा hi होगा. इस बार हमको कोई नहीं रोक सकता. हमारा वो सपना अब जरूर पूरा होगा.

त्रिकाल – हाँ संभु ऐसा होगा जरूर होगा. बस ये पंकज अपने रस्ते का कांटा बना हुआ है. सेल के उप्पेर इतनी बार अटैक कर चुक्का हु फिर भी बच जाता है पता नहीं कैसे हर बार किस्मत इसका साथ दे जाती है. और हम केवल देखने के कुछ नहीं कर पते.

संभु – गुरूजी तो फिर से कोई अच्छा सा प्लान बनाइये न. वैसे भी अब दिन hi कितने बचे है बस 80 दिन में आपकी सदमा पूरी हो जाएगी. फिर तो ये वैसे भी आपके सामने नहीं आ पायेगा. आपके सामने तो आने की हिम्मत तो आज भी नहीं होगी इसमें.

त्रिकाल – नहीं संभु बात ये नहीं है की उसमे कितनी शक्ति है. बात ये है की यदि मेरी सड़ना पूरी होने से पहले उसने डलासुर के देव रूप को उस कैद से मुक्त करवा दिया तो मेरा वो वरदान बेकार हो जायेगा जिसके कहते डलासुर ये bête hi हमको प्रोटेक्ट करते है. और यदि ऐसा हो गया तो ये चारो भाई मिल कर डलासुर के दानव रूप को यहाँ से आजाद करवा कर ले जायेगे. और हम उनको रोक भी नहीं सकते.

संभु – ओह्ह ये तो बड़ी दुविद्या है. पैर क्या कोई इतने काम दिन में ये कर सकता है?? और क्या हम अभी कुछ नहीं कर सकते??

त्रिकाल – वैसे तो मेरे बनाये उस चक्रवेव को तोडना हर किसी के वश में नहीं है. पैर अभी तक पब ने जो पावर पायी है. वो उसे इसमें बहुत काम आएगी. और फिर इस सब में दस माँ उस लड़के की हेल्प कर रही है तो कुछ भी हो सकता है.

संभु – हम्म गुरूजी तो आप उसमे कुछ फेर बदल कर दीजिये. ताकि पब की पावर वह कुछ कर न पाए.

त्रिकाल – नहीं संभु मैं अभी उसमे कुछ भी चेंज नहीं कर सकता. हाँ यदि मेरी पावर मेरे पास होती तो बात अलग थी. वैसे भी पब उसको तोड़ सकता है इसके भी 10% के चांस है वो भी इसलिए की दस माँ खुद उसकी हेल्प कर रही है.

संभु – वो तो ठीक है गुरूजी पैर कुछ ऐसा नहीं हो सकता की यदि वो देव रूप को मुक्त भी करवा दे तब भी वो यहाँ अटैक न कर पाए??

त्रिकाल – ये कैसे हो सकता है संभु?? यदि दलारूर का देव रूप आज़ाद होगा तो उसके 4रो bête यहाँ से अशनि से डलासुर के दानव रूप को ले कर जा सकते है.

संभु – और यदि कुछ ऐसा हो की भीमासुर और पतासुर (दस माँ के bête) जो की हमको आज प्रोटेक्ट कर रहे है वो आगे भी हमको प्रोटेक्ट करते रहे. ये कभी यहाँ से जा hi न पाए??

त्रिकाल – संभु सोच तो तेरी बहुत अच्छी है यदि ये हो गया तो फिर पंकज हमारा कुछ नहीं बिगड़ पायेगा. और न hi मेरी इस सदमा में कोई परेशानी कड़ी हो सकेगी.

संभु – हाँ गुरूजी यदि ऐसा हो गया तो फिर आपकी बनायीं शील्ड और इन दोनों भाइयो के होते कोई भी कुछ नहीं कर पायेगा. और यदि कोसिस भी करेगा तो फिर हम दोनों यहाँ मौजूद है. हर वॉर के लिए. आपको हरा कर आपके सामने से डलासुर के दानव रूप को ले जाना केवल इन भाइयो के बस की hi बात है. पंकज आपके सामने से ये नहीं कर सकता. चाहे वो आपके उस चक्रवेव को तोड़ दे पैर आपके होते हुए वो यहाँ कभी नहीं आ सकता.

त्रिकाल – हाँ संभु ये तो है. हमको खतरा केवल इस बात का है की यदि इन चारो भाइयो की शक्ति एक जगह हो कर हम पैर वॉर केरे तो हम उस वॉर का सामना नहीं कर सकते. नहीं तो हमारा कोई कुछ नहीं बिगड़ सकता.

संभु – तो क्यों न इन दोनों भाइयो को hi पैसा लिया जाये. यदि ये हमारी सुरक्षा का वचन दे दे तो फिर हमको किसी का दर नहीं.

त्रिकाल – हाँ और ये काम तुमको करना होगा. इन दोनों को बातो में पैसा कर इनसे वचन लेना होगा.

संभु – ठीक है आज hi मैं ये तरय करता हु.

फिर ये अपने इस प्लान को और सोचते है की क्या करना चाहिए. और क्या नहीं और फिर संभु त्रिकाल की चल रही सड़ना के लिए इन्तजार करके बहार की और आता है. ये उसका रोज का काम था. डेली वो त्रिकाल के लिए सरे ाररेंग्मेंट खुद करता था. और फिर चला जाता था. और जब ये भोर में वह से निकला तो अपने प्लान को अंजाम देने के लिए गेट पर रुक गया जहा पैर भीमासुर और पतासुर खड़े थे. और आज उनसे बात करने लगा. ये वो पहले भी करता था जब त्रिकाल कोमा में था.

संभु – प्रदम भीमासुर जी …. प्रदम पतासुर जी….

भीमासुर – क्या बात बहुत दिन बाद आज हमरे प्रदम किया जा रहा है.

संभु – नहीं ऐसी कोई बात नहीं है. आप जानते है जब से गुरूजी होश में आये है तब से मैं कुछ जयादा hi बिजी हो गया हु. और वो अभी अपनी सड़ना भी कर रहे है तो उसका सारा ाररेंग्मेंट भी करना होता है. पहले तो मैं फिर था ताका प लोगो से बात हो जाती थी. पैर अब थोड़ा सा बिजी हु. इसलिए आपसे माफ़ी मांगता हु.

पतासुर – कोई बात नहीं संभु.. वैसे भी हमारा तो काम है यहाँ की सुरखा करना. पैर आज तक कोई आया hi नहीं जिससे लड़ना पड़े.

संभु – हाँ ये तो है गुरूजी के दर से आ भी कोण सकता है. पैर फिर भी आप दोनों धन्य है जो इतने सालो से हमको सेफ किया हुआ है.

पतासुर – नहीं इसमें धन्य होने वाली कोण सी बात है. तुम्हारे गुरूजी के वरदान का फल है ये तो…

संभु – अच्छा क्या मैं आपसे कुछ पूछ सकता हु??

पतासुर – हाँ बोलो

संभु – क्या कभी ऐसा हो सकता है की कोई वरदान निष्फल हो जाये??

भीमासुर – ऐसा कैसे हो सकता है. यदि वरदान देने वाले के पास में वो होगा नहीं तो वो वरदान देने से पहले hi मन कर देगा. वरदान देने के बाद निष्फल होने का क्या मतलब..

संभु – क्यों ऐसा क्यों नहीं हो सकता ???? आप इस वरदान को hi ले लो. जिसकी वजह से आप दोनों यहाँ है. डलासुर जी को तो ये बता था की उनके पुत्र उनके वरदान का मन रखेंगे. पैर यदि आप लोग ऐसा न करते तो??

पतासुर – संभु अपने शव्दो को सोच कर बोलो. हम अपने पिताजी के वर को कभी निष्फल नहीं होने देते..

संभु – तो क्या आप हमेशा यहाँ हमको प्रोटेक्ट करते रहेंगे??

भीमासुर – जब तक तुम्हारे गुरूजी के पास ये वर है तब तक हम यही है.

संभु (मन में – सेल बातो में पेशे hi नहीं. फिर से तरय करना होगा) – अच्छा और यदि कभी फ्यूचर में कोई आ कर आपको बहका दे. तो फिर तो आप अपने पिताजी के वर को निष्फल करके चले जायेगे क्या??

पतासुर – हमको बच्चा समजा है क्या जो कोई भी हमको बहका देगा.

संभु – हाँ हर माँ के लिए उनके पुत्र हमेशा बच्चे hi होते है. क्या पता कल को आपकी माँ hi आपको आ कर बहका दे.

भीमासुर – संभु अपनी जवान को लगाम दो. तुम दानव रानी के वेयर में बात कर रहे हो.

संभु – आपको बुरा लगा हो तो माफ़ी चाहता हु. पैर ये क्यों नहीं हो सकता?? कल को वो आ कर आप दोनों से कहे की तुम दोनों डलासुर जी के पुत्र नहीं हो. तो फिर क्यों उनके वर का मन रख रहे हो. तब क्या होगा???

पतासुर – (तेज़ आवाज में) संभु अपनी जेवा को रोक ले… तूने बहुत गलत बात बोल दी है. तू अभी तक जिन्दा है कियोकि हम यहाँ तेरी और त्रिकाल की सुरक्षा कर रहे है.

संभु – हाँ हाँ यही तो कहा रहा हु. कल को आवेश में आ कर या किसी के बहकावे में आ कर आप दोनों अपने पिता के वर को भूल जाये. तो क्या ये निष्फल नहीं हो जायेगा. और वैसे भी इतिहास गव्हा है देवताओ में भी पिता और पुत्र के भी लड़ाईया हो चुकी है. तो तुम हो फिर भी दानव हो…

भीमासुर – नहीं हम उन लोगो में से नहीं है जो अपने दिए हुए वर और वचनो को भूल जाये.

संभु – हाँ मंटा हु आप उनमे से नहीं है पैर ये वर आपके पिताजी ने दिया है. यदि आपका दिया होता तो मैं ये सवाल hi नहीं करता.

भीमासुर – ठीक है यदि ऐसी बात है तो “हम दोनों वचन देते है जब तक हम जीवित है हम इस जगह की सुरक्षा करते रहेंगे”

संभु – आप दोनों सच में धन्य हो. जो पिता के वर को अपने वचन से और मजबूत कर दिया है. आप जैसा पिता भक्त पुत्र शायद hi कोई और हो. आप दोनों की शदा hi जय हो…..

ये कहा कर संभु एक ख़ुशी मन में लिए वह से निकल गया. इन दोनों भाइयो को पता भी नहीं चला की ये ठगे जा चुके है. पैर इसका आभाष दयासुर को हो गया था. किकोकि अभी जो टाइम था इस टाइम दयासुर अपनी आराध्ना केर होता था. तो उसे अपने डायन में hi अपने भाई का वचन सुनाई दे गया. और ये सुनते hi वो हड़बड़ा कर उदा और एक गहरी सोच में दुब गया. जब उसके नहीं समाज आया तो चल दिया अपनी माता जी यानि की दस माँ के पास. वह जब दस माँ ने दयासुर का फेस देखा तो वो समाज गयी की इसको भी उस वचन का आभाष हो चुक्का है. दुखी तो दस माँ भी थी. पैर कुछ किया तो नहीं जा सकता न. कियोकि वचन दिने वाले ने वचन दे दिया. और मुँह से निकले शब्द कभी वापिस नहीं आते.

दयासुर – माँ क्या ये सच है की भीमा भैया ने संभु को वचन दिया है.

दस माँ – हाँ बीटा ये सच है.

दयासुर – ये तो बहुत बड़ी गड़बड़ हो गयी. अब क्या होगा माँ?? अब त्रिकाल को ऐसे रोका जायेगा???

दस माँ – आदिक आदिर न हो पुत्र. ये सब नियति का खेल है. और नियति की आगे किसी की नहीं चलती. और यदि नियति चाहेगी तो सब कुछ ठीक हो जायेगा पुत्र. और यदि मेरे उन पुत्रो की वीरगति hi इस सब का अंत है तो भी हम कुछ नहीं कर सकते. (और ये कहते हुए दस माँ की आखों में भी आशु तेर गए)

दयासुर – ये क्या कहा रही है माँ??? अपने मुझको इसलिए पिताजी को मुक्त करवाने को नहीं जाने दिया की मुझको अपने भाइयो से युद्ध करना होगा. और आज आप खुद hi उसकी वीरगति की बात कर रही है. नहीं माँ मेरे भाइयो को कुछ नहीं होगा.

दस माँ – बीटा तुम जानते हो की मैं और तुम्हारे पिताजी क्यों शांत है. और अब तुम कुछ ऐसा मत करना की फिर से कोई नया संकट आ खड़ा हो. नियति ने इस काम के लिए जिसे चुनना होगा. उसका चयन खुद नियति hi करेगी. अब वक्त का इन्तजार करो. यदि तुमको युद्ध में भाग लेना होगा तो तुम भाग नहीं पाओगे. हमारे प्रभु भोले बाबा ने जैसा रच रखा है होगा तो वैसा hi.

फिर दस माँ दयासुर को और भी बहुत कुछ समजा कर बापिस भेज देती है. आज दस माँ ने दयासुर को एक राज से भी अवगत करा दिया था की – मणि शंकर तुम्हारे सबसे बड़े भाई का पुनःजन्म है.
 
अपडेट 145

दस माँ – बीटा तुम जानते हो की मैं और तुम्हारे पिताजी क्यों शांत है. और अब तुम कुछ ऐसा मत करना की फिर से कोई नया संकट आ खड़ा हो. नियति ने इस काम के लिए जिसे चुनना होगा. उसका चयन खुद नियति hi करेगी. अब वक्त का इन्तजार करो. यदि तुमको युद्ध में भाग लेना होगा तो तुम भाग नहीं पाओगे. हमारे प्रभु भोले बाबा ने जैसा रच रखा है होगा तो वैसा hi.

फिर दस माँ दयासुर को और भी बहुत कुछ समजा कर बापिस भेज देती है. आज दस माँ ने दयासुर को एक राज से भी अवगत करा दिया था की – मणि शंकर तुम्हारे सबसे बड़े भाई का पुनःजन्म है.

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पब और सलोनी अभी दयासुर जी के पास पहुंच चुके थे. दयासुर जी ने उस बात को अपने अंदर दफ़न कर लिया था. उनके फेस पैर उस बात का कोई अक्षर नहीं था. सलोनी दयासुर जी को कल वाली पूरी घटना (रखा वाली) बता रही थी की क्या-2 हुआ. दयासुर जी के फेस पैर सब सुन कर एक ार्थ पूर्ण मुस्कान थी. जैसे सलोनी वो बता रही हो जो की उनको पता हो. फिर भी दयासुर जी शांति के साथ अपनी बेटी की हर बात को सुन रहे थे. और जब सलोनी ने कामिनी के बारे में बताया तब दयासुर जी चौक गए. उनको भी बहुत ख़ुशी हुयी. की उनकी बेटी को उसकी बहन मिल गयी.

दयासुर – बीटा ये तो बहुत अच्छी बात है. तुमको तुम्हारी बहन मिल गयी. मैं भी कब से उससे मिलना चाहता हु. एक बार उसको देखना चाहता हु जिसके लिए मेरी काँटी हमेशा रोटी थी.

सलोनी – क्यों नहीं बाबा. आप जब कहेगे हम दीदी को भी साथ ले आएंगे.

पब – गुरूजी क्या कुछ पुछु आपसे??

दयासुर – हाँ बीटा निसंकोच पूछो..

पब – गुरूजी जब सलोनी ने आपको रखा के साथ हुयी घटना के बारे में बताया तो आपके फेस पैर ऐसे भाव थे जैसे आप सब पहले से जानते हो. पैर जब उसने कामिनी के बारे में बताया तो आप चौक गए. केसा क्यों??

दयासुर – वो इसलिए कियोकि हमने अपनी दिव्यद्रष्टि से वो घटना पूरी देखि थी. पैर कामिनी hi सलोनी की बहन है ये इसको यहाँ से जाने के बाद hi पता चला होगा. तब हम तुम दोनों को नहीं देख सकते थे. मणि जी ने हवेली को शील्ड से कवर किया हुआ है न.

पब – इसका मतलब की और भी जैसी जगह होगी जहा ये दिया दृष्टि काम नहीं करती होगी??

दयासुर – हाँ बिलकुल ये जगह भी वैसी hi है. यहाँ पैर किसी की दिव्या दृष्टि काम नहीं कर सकती. त्रिकाल ने भी अपने अड्डे को एक बहुत मजबूत शील्ड से कवर किया हुआ है. और गुरु सत्यानंद जी का आश्रम भी वैसा hi है.

पब – हम्म फिर तो ये सब जगह सेफ है. पैर फिर इस दिव्या ड्रास्टिक का फायदा क्या है??

दयासुर – बहुत फायदे है बीटा. तुम जिस चीज को इन आखों से नहीं देख सकते उनको इस ड्रास्टिक से देखा जा सकता है. हर चलवा हर प्रकार के मंत्रो से अभिमंत्रित चीज को पहचाना जा सकता है. किसी का भी बहुत काल में घटित घटना को देखा जा सकता है. कुछ जगहों को छोड़ कर कही भी घटित हो रही घटनाओ को एक जगह पैर बेथ कर देखा जा सकता है. जैसे तुम उसका लाइव टेलीकास्ट देख रहे हो. वैसे hi मेने कल तुम्हारा रखा से युद्ध देखा था. बहुत hi अच्छा सबक दिया है तुमने. और ये भी अच्छा किया की इसको न्यूज़ पैर ले आये अब हर अपरादि डरेगा.

पब – फिर तो ये दिव्या दृष्टि की पावर मेरे पास भी होनी चाहिए.

दयासुर – हाँ बिलकुल ये आने वाले समय में तुम्हारे बहुत काम आएगी. और ये पावर तुमको उस ब्लेंड लड़की से शादी करके मिलेगी.

पब – हम्म्म (पब एक और लड़की से शादी की बात दयासुर के मुँह से सुन कर हिच्चक रहा था.)

दयासुर – बीटा मैं सब जनता हु तुम्हारे वेयर में. तो संकोच क्यों. इस लड़की से शादी तुम्हारी नियति है. इसके बात और 3 शादिया तुमको करनी है.

पब – गुरूजी ये तो ठीक है पैर अभी जिस प्रॉब्लम को ले कर हम आपके पास आये है उसका तो कोई उपपाये बताइये.

दयासुर – क्यों क्या हुआ?? क्या प्रॉब्लम है??

पब – जब अपने कल का सब देखा है तो ये भी देखा होगा की मैं किस तरह बेकाबू हो गया था. और मुझको कण्ट्रोल में करने के लिए सलोनी को कितना दर्द सहा था. ये फिर से न हो इसके वेयर में बताइये

दयासुर – उसके लिए तो तुमको दयँ लगाना होगा. और ये सलोनी को पता है की कैसे दयँ लगाती है. सलोनी ने ये बचपन से किया है. तभी तो सलोनी की दानवीय शक्ति उसके पूरी तरह कण्ट्रोल में है.

सलोनी – हाँ वो तो मुझको पता है. पैर बाबा इनकी साडी दानवीय शक्ति एक साथ एक्टिव हुई है और ये पुरे दानव भी नहीं है. उस तरह डायन लग कर इनको काबू करने की कोसिस की तो बहुत टाइम लग जायेगा. और आप जानते है इनको कहा जाना है.

दयासुर – हाँ ये तो है. इसके बारे में कुछ सोचना होगा.

पब – गुरूजी माफ़ी चाहुगा. पैर दस माँ ने ये पावर एक्टिव करवाई hi क्यों है. न ये एक्टिव होती और न hi ये प्रॉब्लम होती.

दयासुर – बीटा हमेशा याद रखना जो भी हो रहा है वो सब नियति का एक खेल है. और हम सब इसके मोहरे है. ये नियति कब क्या कर दे किसी को नहीं पता (दयासुर जी को अपने भाइयो वाली बात याद आ जाती है तो उनकी आखें नाम हो जाती है). पैर इसके पीछे ये बहुत जरुरी बात है. और वो ये है की तुम्हारे अंदर ये पावर बहुत पहले से है और वो धिरे-2 एक्टिव भी होती. पैर जब तुम उस त्रिकाल के चक्रवेव में जाओगे. तो ये एक साथ एक्टिव हो जाएगी. और तुम वह पैर इनको कण्ट्रोल नहीं कर पाओगे. और पुरे दानव बन केर उसी चक्रवेव में फांसी रहा सकते हो. और यदि ये एक्टिव नहीं हुई तो तुम वो चक्रवेव कभी नहीं तोड़ पाओगे. कियोकि वह इतने खतरनाक काम तुमको करने होंगे की तुम्हारा ये मानव मन उसके लिए कभी नहीं मानेगा.

पब – ोुह्ह्ह्ह ये बात है. पैर ऐसा क्या है इस चक्रवेव में??

दयासुर – बीटा ये उसने अपनी सभी सक्तियो को इस्तेमाल करके बनाया था. पता नहीं इसमें क्या -2 है. ये पूरा इस तरह से कवर्ड है की उसके अंदर घुसने के बाद तुमको लगेगा की तुम कही और hi हो. बस उसका एक भाग खुला है और इसी भाग में पिता जी कैद है. पता नहीं क्या सोच कर त्रिकाल ने इसको खुला छोड़ा है. ये hi हिस्सा है जो दिव्या दृष्टि से देखा जा सकता है. देखो में तुमको वो दिखता हु

फिर दयासुर जी अपनी आखें बंद कर लेते है और जब फिर खोलते है तो उनकी आखों से एक रौशनी निकल कर सामने की देवर पैर पड़ती है. और वह पैर ये प्रोजेक्टर की तरह एक पिछ उभर आती है.

ये स्कीन एक गाओं का लग रहा था. उसके पास में एक तालाब था. तालाब से कुछ दुरी पैर 2 दानव खड़े थे. और उस तालाब के पास में खुला एरिया था. उस खुले एरिया में बहुत सरे लोग सेक्स कर रहे थे. वो सब केवल सेक्स करने में मग्न थे. कोई भी किसी के भी साथ कर रहा था. इनके तगड़ 100 से तो ज्यादा hi थी. उस तालाब के एक और कुछ घर बने हुए थे. ये स्कीन किसी घटिया ब्लू फिल्म का ग्रुप सेक्स स्कीन जैसा था. जिसको देख कर सलोनी और पब की हालत भी बुरी हो रही थी. दयासुर जी के सामने केसा कुछ देखना उनको अच्छा नहीं लग रहा था. पैर फिर भी दोनों उत्तेजित हो रहे थे. 3-4 मं के स्कीन के बाद वो सब गायब हो गया. कियोकि दयासुर जी ने अपनी आखें फिर से बंद कर ली थी. स्कीन ख़तम होने के बाद भी कोई कुछ नहीं बोलै. पब तो अपनी उत्तेजना को जल्दी hi काबू में कर लिया. पैर सलोनी की पंतय गीली हो चुकी थी. उसे शर्म भी बहुत आ रही थी. पैर अभी वो नजरे निचे करके शांत बैठने के अलावा कुछ नहीं कर सकती थी. जब ख़ामोशी काफी देर की हो गयी तब उसे दयासुर जी ने hi तोडा.

दयासुर – केसा लगा bête. कुछ समाज में आया की वह क्या हो रहा है.

पब – गुरूजी मुझको तो ये सब किसी ऐसे गाओं का स्कीन लगा जहा सेक्स बेपर्दा है. और यहाँ के लोग बहुत hi बाहियात है. और तो कुछ भी समाज नहीं आया मेरे…..

दयासुर – मेने कहा था न की यहाँ पिता जी यानि दानव राज डलासुर का देव रूप कैद है. मैं उसके बारे मैं पूछ रहा हु. समाज आया की वो कहा और क्यों कैद है??

पब तो ये बात भूल hi गया इतने कामुक स्कीन को देख कर मंद में केवल सेक्स का एक खुमार रा था. सलोनी की हालत ऐसी थी की उनकी पंतय पूरी गीली हो चुकी थी. और अपने पति की और बड़ी उम्मीद भरी नजरो से देख रही थी. वो भूल गयी थी की वो अपने बाबा के सामने बैठी है उसके मंद में केवल सेक्स hi सेक्स घूम रहा था. उसे अपनी सुहागरात के पल याद आ रहे थे. और उसको लग रहा था की वो उन पालो को जी रही है. खुली आखों से चुदाई के सपने देख रही थी. उसका एक हाथ अपनी छूट पैर पहुंच चुक्का था. दयासुर जी का डायन जब सलोनी पैर गया तो उसके फेस के भावो को देख कर hi वो समाज गए की सलोनी को क्या हुआ है. पब दयासुर जी की बात का कोई जवाब दे पता उससे पहले दयासुर जी बोले

दयासुर – बीटा एक काम करो पहले सलोनी को रूम में छोड़ आओ. और फिर कुछ देर बाद मणि जी को भी बुला लाना तब hi बातो को आगे बढ़ाएंगे. मुझको लगता है सलोनी की तबियत ठीक नहीं है. इसको आराम की जरुरत है.

और ये सच भी था सलोनी वासना की आग में तड़प रही थी. पब के पास तो अपने उप्पेर कण्ट्रोल करने की पावर थी. पैर सलोनी के पास ऐसा कुछ नहीं था. और जो स्कीन इन लोगो ने देखा था वो इतना कामुक था की मुर्दे को भी चुदाई के लिए पागल कर दे. ये तो फिर भी एक जवान लड़की थी. और भी कुछ ऐसा था जिसकी वजह से सलोनी इतनी कामुक हो गयी थी. (वो अभी थोड़ी देर में पता चलेगा).

दयासुर की बात सुन कर पब सलोनी की और देखता है. उसे देकते hi पब को सलोनी के हाल का अंदाजा हो जाता है. तो वो सलोनी को लेकर अंदर रूम मैं चला गया. वैसे भी पब को भी कुछ पल की शांति चाहिए थी अपने आप को पूरी तरह कण्ट्रोल करने के लिए. पैर जैसे hi ये दोनों रूम में पहुंचते है सलोनी रूम का दूर बंद कर पब से जैसी लता की तरह चिपक जाती है. और उसके होंटो को मुँह में ले कर चूसने लगती है. उसका हाथ पब की पेण्ट के अंदर पल भर में होता है. सलोनी पब के लुंड को मसलती है एक हाथ से और दूसरा हाथ पब के सर के पीछे रख कर उसके होंटो को चुस्ती रहती है. जब दोनों की सांसे टूटने लगती है तब दोनों अलग होते है. इतनी देर मसलने से पब का लुंड भी खड़ा हो चुक्का था. अलग होते hi सलोनी निचे बेथ कर उसकी पेण्ट और अंडरवियर को एक साथ निचे कर उसके लुंड को पकड़ लेती है. और चूसने लगती है.

पब – ोुह्ह्ह्ह क्या कर रही हो सलोनी… खुद को सम्भालो…. (पब के मुँह से सिसकिया निकलने लगी थी. सलोनी ने पूरी जान से लुंड को चूसना सुरु कर दिया था.)

सलोनी मुँह से लुंड निकल कर बोली – नहीं जान आज ये मुझको चाहिए. मैं तड़प रही हु. जल्दी कुछ करो नहीं तो मैं पागल हो जोगी….. chhhaaapppp….chhhaapppp… (फिर से चूसते हुए)

पब – अच्छा ये बात है तो लाओ मैं तुमको खली कर देता हु. और तुम मुझको….

ये बोल कर पब सलोनी को 69 की पोजीशन में कर देता है और फिर सलोनी की साड़ी को उसके पेट तक उदा कर उसकी छूट पैर अपने होंठ रख देता है. और उसके चुत्तड़ दबाने लगता है. पब के ठन्डे होंठ अपनी छूट पैर फील होते hi सलोनी झाड़ जाती है. फिर भी पब सलोनी की छूट को नहीं छोड़ता. और न hi सलोनी रूकती है. कुछ देर की चटाई और चूसै से दोनों झाड़ जाते है. सलोनी का तो जैसे मूत hi छूट गया हो.

सलोनी को संतुस्ट कर पब खुद फ्रेश हो कर मणि जी के पास जाने की सोच कर टेलिपोर्ट हो कर उनके आश्रम के बहार पहुंच जाता है. दयासुर जी ने मणि जी को पहले hi बता दिया था. पैर ये न बोलै की आप मेरे बड़े भाई है. ये मैं जान चुक्का हु. पब के मन में बहुत से सवाल थे की ऐसा क्या था उस स्कीन में की सलोनी और मैं इतने उत्तेजित हो गए. कियोकि उसे तो वो एक बर्फ से ज्यादा कुछ नहीं लगा था. उसने हवेली के बेसमेंट में भी बहुत साडी नंगी लड़किया एक साथ देखि थी. और तब तो उसके पास वरदान भी नहीं था फिर भी वो इतना उत्तेजित नहीं हुआ था. पैर उसे पता था की इन सभी सवालो के जवाब केवल ये दोनों (मणि और दयासुर जी) hi दे सकते थे. तो वो मणि जी को ले कर पहुंच गया दयासुर जी के पास. जब दयासुर जी ने मणि जी को देखा तो आगे आ कर पहले उनके पेअर छुए. पब भी एक बार चुका कियोकि इससे पहले भी ये लोग मिले थे. तब ऐसा नहीं हुआ था. पैर पब कुछ बोलै नहीं. और दयासुर जी और मणि जी मन hi मन एक दूसरे से अपने दिल की बात करते रहे. और जब मांईजी को पता चल गया की दयासुर जी अब जानते है उनके रिश्ते को. तो मणि जी आखों में ख़ुशी के आशु लिए दयासुर जी के गले लग गए. ये 2 भाइयो का मिलान था. जो ये दोनों hi जानते थे. वह मौजूद पब और सलोनी को इस बारे में नहीं पता था. दोनों hi इस मिलान को समाज नहीं प् रहे थे. पैर बोल भी नहीं प् रहे थे. मिलान में अपने 2 भाइयो के वचन को लेकर दुःख भी था. तो 2 भाइयो के मिलने की ख़ुशी भी. मणि जी को भी उस वचन का आभाष हो गया था. और उन्होंने भी दस माँ से दयासुर जी की तरह बात भी की थी. पैर अभी कुछ नहीं हो सकता था. पता नहीं नियति को क्या मंजूर था. ये तो नियति hi जान सकती थी…..
 
सही कहा भाई वचन जगह के लिए HI है. और इस जगह पैर कैद है डलासुर का दानव रूप. और पब को 1सत टारगेट HI डलासुर के देव रूप को कैद मुक्त करवाने का मिला है. त्रिकाल को मरने की बात तो उसके गुरु (मणि या दयासुर) ने कही HI नहीं है.

त्रिकाल को तो पब अपनी माँ का बदला लेने के लिए मरना चाहता है.

भाई अभी बहुत कुछ बाकि है......

थैंक्स फॉर योर कमेंट. अपने एक दम ठीक पॉइंट पकड़ा है......
 
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ये 2 भाइयो का मिलान था. जो ये दोनों hi जानते थे. वह मौजूद पब और सलोनी को इस बारे में नहीं पता था. दोनों hi इस मिलान को समाज नहीं प् रहे थे. पैर बोल भी नहीं प् रहे थे. मिलान में अपने 2 भाइयो के वचन को लेकर दुःख भी था. तो 2 भाइयो के मिलने की ख़ुशी भी. मणि जी को भी उस वचन का आभाष हो गया था. और उन्होंने भी दस माँ से दयासुर जी की तरह बात भी की थी. पैर अभी कुछ नहीं हो सकता था. पता नहीं नियति को क्या मंजूर था. ये तो नियति hi जान सकती थी…..

जब ये भारत मिलाप पूरा हुआ. तो उन दोनों ने देखा की सलोनी और पब सवालो वाली नजर से दोनों को देख रहे थे. दोनों ने एक दूसरे की और देखा और फिर मुस्कुरा दिए. एक बार मणि जी ने आखें बंद कर दस माँ को याद कर किसी बात के लिए आज्ञा ली. तो माँ ने भी हाँ कहा दिया. फिर अपनी आखें खोल कर मणि जी बोले

मणि – पब तुम जा कर गुरु और कामिनी को भी ले आओ. उनका भी आज यहाँ होना जरुरी है.

पब बिना कुछ बोले टेलिपोर्ट हो कर हवेली पहुंच गया. और उन दोनों को अपने रूम में बुला लिया. जब दोनों वह पहुंची तो पब दोनों को ले कर टेलिपोर्ट हो गया और जा पंहुचा उस जगह पैर जहा आज कुछ नया और कुछ बड़ा होने या पता चलने वाला था. जब गुरु और कामिनी ने दयासुर और मणि जी को देखा तो उनके पेअर छू लिए. कामिनी को देख कर दयासुर जी को अपनी पत्नी की याद आ गयी. जब उन्होंने काँटी को पहली बार देखा था तब वो लगभग कामिनी के जैसी hi थी. अपनी बेटी को देख दयासुर जी खुश थे. तो कामिनी भी यहाँ आ कर खुश थी की जिस इंसान ने उसकी माँ को सहारा दिया. जिसने उनकी जिंदगी में फिर से खुशियों के रंग भरे वो आज उनके सामने थी. आज वो उस जगह थी. जहा आज भी काँटी बस्ती थी. कामिनी को वह आ कर ऐसा लगा की जैसे बर्षो बाद वो आपने मायके आयी हो. और एक लड़की के दिल में मायके जाने की कितनी ख़ुशी होती है ये तो सभी जानते है.

जब सभी का मिलना मिलाना हो गया तो सभी लोग बेथ गए. और सब शांति से मणि जी या दयासुर जी के बोलने का इन्तजार करने लगे. कुछ मं. की शांति के बात दयासुर जी ने बोलना सुरु किया.

दयासुर जी – देखो आज मैं जो बताने जा रहा हु. वो एक बहुत पुराणी और सच्ची कहानी है. आज तुम सब जिस चीज का हिस्सा हो ये आज की या 20-30 साल पहले की बात नहीं है. ये घटना क्रम बहुत पुराण है. और आज तक इसमें बहुत कुछ घाट चुक्का है. और ये समय है उस बरसो प्यूरीन घटना क्रम के अंत का. और देखना है की इसका अंत कैसे और क्या होता है. बर्षो से देवता भी इसके अंत का इन्तजार कर रहे है. और इसके अंत से हम सबका जीवन भी जुड़ा हुआ है. इसके अंत के साथ किस-2 के जीवन का अंत होगा. और कोण बचेगा ये तो नियति hi तय करेगी. किसको हाशिल होगा और कोण अपना सब कुछ खो देगा. ये भी अभी कोई नहीं जनता. पैर अब अंत निश्चित है कियोकि अंत hi एक नए अध्धय को प्रारम्भ करेगा.

(भियो के पूरी स्टोरी मेने मन की कल्पना है यहाँ लिखा एक -2 शव्द कल्पना है ये किसी भी धर्म ग्रन्थ का हिश्शा नहीं है. हाँ कुछ नाम जरूर अपने हिन्दू दरम ग्रन्थ से लिए गए है. पैर उन नामो का किसी भी प्रकार से मजाक नहीं बनाया गया है. फिर भी किसी भाई के दिल को ठेस पहुंचे तो माफ़ी चाहता हु.)

दयासुर जी की स्टोरी – ये बात है महाभारत के अंत के समय की. जब ये महँ युद्ध समाप्त हो चुक्का था. तो कलयुग ने अपने पेअर पसारने शुरू कर दिए थे. कलयुग का प्रारम्भ hi देवताओ की चिंताओं का विषय भी था. कियोकि कलयुग में दैविये शक्तिया बहुत बाद जाती है. और आदरम का पल्ला भरी होने लगता है. डर्टी पैर धरम के संतुलन को ले कर hi सभी देव चिंतित थे. और अपने नित करम भी कर रहे थे. तो सभी देव इखट्टा हो कर देवो के देव महादेव के पास पहुंच गए. और अपनी संशय बताई. भगवन शिव ने भी उनको अपने करम करते रहने को कहा. और कहा की नियति खुद hi अपना संतुलन बना लेती है. इसलिए आप लोग चिंता छोड़ कर केवल अपने कर्मो को करते रहे. संतुलन बनाना के लिए नियति खुद hi चयन करेगी. और खुद hi उस घटना क्रम का आरम्भ भी करेगी. जिससे ये संतुलन बनाया जा सके. महादेव की बाते सुन कर सभी देव अपने लोक को लोट गए. और अपने नित्य कर्मो को करते रहे.

इन दिनों दानवो का काल और देवता का रक्षक हुआ करता था एक देवगुन – दाल्भया. दाल्भ्य एक कुशल योद्धा था. उसके पास बहुत सी शक्तिया थी. दाल्भया के पिता दिव्यांश भी देव सेना में hi थे. पैर दाल्भया ने बालपन में hi तपश्या सुरु कर दी थी. उसका मकसद देव सेना का सदर्न सिपाही रहना नहीं था. वो एक कुशल योद्धा बनना चाहता था. इसलिए hi उसने बालपन में hi त्रिदेव की तपश्या में लीं हो गया. उस बालक की िस्चल भक्ति और उसका उदेशय जान कर त्रिदेवो उससे खुश हो गए. और उसको अपने आशीर्वाद के रूप में बहुत सी शक्तिया प्रदान की. पैर वोन ा रुका और फिर त्रिदेवी को प्रश्न करने को तप पर बेथ गया. और जब उन त्रिदेविओ ने वर में उसे अपनी शक्तिया प्रदान करि तक वो संतुष्ट हो कर अपने लोक को लोट गया. पैर इस सब में उइके जीवन का एक भाग समाप्त हो गया था. उसने न माँ की ममता को महसूस किया और न hi उभरती जवानी की सररतो को किया. और जब वो इंद्रा के पास पंहुचा तो इंद्रा ने भी उसको अपनी सेना में एक प्रमुख स्थान दिया. और आज हर युद्ध में दाल्भया hi देवता का प्रतिनिडी होने लगा.

आज भी इंद्रा की सभा लगी हुई थी. अपशराये नाच रही थी. सभी देव उसका आनंद ले रहे थे. स्वर्ग तो स्वर्ग है. मैं उसके बारे में क्या लिख सकता हु. स्वर्ग में इंद्रा की सभा में बैठे सभी देव स्वर्ग के सुखो से आनंदित हो रहे थे. पैर उसी टाइम वह पैर दाल्भया उस सभा में आ गया. और इंद्रा का अभिवादन कर वह अपने निश्चित स्थान पैर बेथ गया. आज तक ये देव नारी जाती से दूर hi था. इसको कोई भी नारी अपनी और लुभा नहीं पायी थी. आज भी उन अपशराओ को देख कर भी अनदेखा कर इंद्रा से जरुरी बात कर खड़ा हो जाता है. वो चलने को होता है की तभी उसकी नजर एक ाप्षरे से जा मिलती है. वो उसके रूप सुंदर में खो जाता है. आज पहली बार जैसा हुआ था की किसी नारी ने उसके मन को मोहित कर लिया था. वो उसी स्तन पैर खड़ा उस ाप्षरे को देखता रहता है. वो उसको देखने में इतना खो गया की उसको समय का बहन hi न रहा और होश में जब आया जब की साडी अपशराये वह से चली गयी. होश में आने पैर भी उसे उस ाप्षरे को देखने की ललक थी. वो ठगा सा वह से निकल गया. पैर अब उसका मन किसी में नहीं लग रहा था. उसको चारो और बस वो ाप्षरे hi नजर आ रही थी. उसके मन में प्रेम का अंकुर फुट चुक्का था. पैर वो अपने आप से ये स्वीकार भी नहीं कर प् रहा था की वो एक नारी के प्रेम में पद चुक्का है. कई दिन तक वो उसको भूलने की कोसिस में लगा रहा. पैर अब उसका मन उसके साथ नहीं था. वो किसी भी हल में उस सुंदरी के दर्शन के लिए व्याकुल था. अंत में अपने दिल से हार कर वो योद्धा अपशराओ की निवेश स्थान की और चल दिया. उसको वह देख कर अपशराओ की दशिया भी चकित रहा गई. कियोकि एक देव हो कर भी उसने अपने कदम आज तक उस और नहीं रखे थे. देव लोग में हर कोई उससे परचित था. उसके बल और पराक्रम की प्रशंशा हर देव करता था. वो स्वर्ग में रहते हुए भी एक सन्यासी की तरह hi रहता आया था. जब वो अपशरो के निवेश िस्थान पैर पंहुचा तो एक ाप्षरे ने बहार आ कर उसका वेलकम किया. और उससे यहाँ आने का कारन पूछा. अब हिचक के कारन वो उसे कुछ बता भी नहीं पाया. और बोलै की बस टहलते हुए यहाँ आ गया था. और फिर अपने निवेश स्थान की और लोट गया.

इस बिच एक महाबलशाली दानव ने डर्टी पैर अपना आतंक मचाना सुरु कर दिया. इंद्रा के कहने पैर वो उस दानव को उसके कर्मो का फल दे कर फिर से इंद्रा की सभा में पहुंच गया. पैर आज सभा ने नाच गण नहीं हो रहा था. उसका मन बहुत ाधिर हो चुक्का था उस ाप्षरे से पुनः मिलने के लिए. पैर यहाँ भी आज उसको वोन ा मिली. तो उसकी व्याकुलता उसके फेस पैर दिखने लगी.

इंद्रा - दाल्भ्य तुमने बहुत hi अच्छा काम किया. और दानवो को मार कर मानवो की रक्षा कर सदा देवताओ का मान बढ़ाते आये हो….

दाल्भ्य – जी देवराज ये तो मेरा फर्ज है. मेरा कार्य ये hi तो है ……

इंद्रा – हम्म फिर भी आज तक तुम अपने कार्य को बखूबी करते आये हो. और हर बार रणभूमि से आने के बाद तुम्हारे चेहरे पैर एक चमक होती है. तो फिर आज ये व्याकुलता क्यों है??? युद्ध में कुछ हुआ क्या???

दाल्भ्य – नहीं -2 देवराज ऐसा कुछ नहीं है.

इंद्रा – देखो हम देवराज है और एक देव के मन की व्याकुलता को अच्छे से समाज सकते है. तो नई संकोच तुम अपनी व्याकुलता को हमे बता सकते हो.

दाल्भ्य – देवराज बात ये है की…… आप नाराज हो जायेगे मेरी बात से…..

इंद्रा – हमने कहा न तुम अपनी बात को निसंकोच कहा सकते हो… हम वचन देते है की हम नाराज नहीं होंगे.

दाल्भ्य – वो बात ये है की पिछली बार जब हम सभा में ए थे तब यहाँ अपश्रये भी थी. जैसे की आप जानते है मेने कभी भी उनमे कोई रूचि नहीं ली. पैर उस दिन मेरी नजर एक ाप्षरे पैर पद गयी और उस दिन से hi मेरा दिल उसको देखने के लिए व्याकुल हो रहा है. मैं क्षमा प्रार्थी हु इस के लिए….

इंद्रा – हाहाहाःहाहा…. तुम इतने बड़े योद्धा हो कर भी … हाहाहाहा… यदि तुमको पाषंड आयी तो तुमको उसे कहना चाहिए था. देखो जीवन में हर किसी को एक साथी की जरुरत होती है. जीवन साथी के बिना हम देवो का जीवन भी बेकार है. …… तुम रुको हम अभी तुम्हारे लिए कुछ करते है….

फिर इंद्रा देव अपनी आखें बंद कर उस दिन के दृश्ये को फिर से देखने लगते है. और फिर मेनका को उस ाप्षरे को सभा में लेन का आदेश दे देते है.

इंद्रा – देखो दाल्भ्य हमने आपकी प्रेमिका को बुला दिया है. पैर अब हम बिच में नहीं बोलेगे. जो भी बात करनी है तुमको खुद hi करनी होगी. और हाँ मैं इतना कहा सकता हु की वो तुम्हारी जीवन संगनी बनने योग्य है…

दाल्भ्य की तो दिल की दध्कन hi बाद गयी ये सुन कर. एक शर्म भी थी देवराज के सामने उससे बात करनी पड़ेगी. और दिल खुश हो रहा था की आज फिर न जाने कितने दिनों के बाद उस सुंदरी के उस सुन्दर सरीर के फिर से दर्शन हो सकगे. कुछ hi देर में मेनका के साथ वो ाप्षरे भी सभा में आ पहुंची. और दोनों ने देवराज को प्रदम किया.

मेनका – आज्ञा करे देव इस देशी के लिए क्या आज्ञा है.

इंद्रा – हमने आपको अपनी आज्ञा के लिए नहीं बुलाया है देवी. आज आपको कष्ट देना का कारन तो हमारे महँ योद्धा दाल्भ्य है.

ये बोल कर इंद्रा दाल्भ्य की और इशारा करते है. पैर ये क्या दाल्भया तो वह हो कर भी नहीं थे. और एहि हल उस ाप्षरे का भी था. दोनों एक दूसरे की आखों में खो चुके थे. वो ाप्षरे तो दाल्भ्य से भली भाटी परचित थी. पैर आज पहली बार उसने भी अपने लिए किसी की ाशों में इतना प्रेम देखा था. और उन आखों के प्रेम का hi ाशर था की वो भी इस प्रेम में खोने लगी थी. दोनों एक दूसरे में खो चुके थे. दोनों भूल गए थे की वह पैर देवराज भी मौजूद है. इंद्रा भी ये देख कर मुस्कुरा जाते है. और मेनका को कुछ निर्देश दे कर जाने के लिए कहा देते है. मेनका उस ाप्षरे को ले कर जाने लगती है. फिर इस बार भी दाल्भ्य उससे कुछ नहीं कहा पते.
 
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वो ाप्षरे तो दाल्भ्य से भली भाटी परचित थी. पैर आज पहली बार उसने भी अपने लिए किसी की ाशों में इतना प्रेम देखा था. और उन आखों के प्रेम का hi ाशर था की वो भी इस प्रेम में खोने लगी थी. दोनों एक दूसरे में खो चुके थे. दोनों भूल गए थे की वह पैर देवराज भी मौजूद है. इंद्रा भी ये देख कर मुस्कुरा जाते है. और मेनका को कुछ निर्देश दे कर जाने के लिए कहा देते है. मेनका उस ाप्षरे को ले कर जाने लगती है. फिर इस बार भी दाल्भ्य उससे कुछ नहीं कहा पते. जब वो जा रही थी. तभी इंद्रा देव बोलते है.

इंद्रा – दाल्भ्य तुम क्यों रुके हो जाओ. और उससे बात करो. हम जानते है की तुम उससे हमारे सामने बात नहीं कर पाओगे.

दाल्भ्य भी इंद्रा की बात से खुश हो कर इंद्रा को प्रदम कर उनके पीछे चले जाते है. और कुछ hi दुरी परपहुच कर वो उनको देखे दे जाती है. तो दाल्भ्य अब हिम्मत करके मेनका से बोलते है.

दाल्भ्य – देवी क्या हम अपने 2 मं बात कर सकते है.

मेनका – देवो के महँ योद्धा दाल्भ्य को सवर्ग की ाप्षरे मेनका का प्रदम… कहिये देव हम हमसे क्या कहना चाहते है.

दाल्भ्य – देवी आपके साथ में ये सुंदरी कोण है. क्या नाम है इसका?? मेने अपने पुरे जीवन काल में इनके जैसी सुंदरी और कोई नहीं देखि.

मेनका (इतराते हुए) – देव ये कहा कर तो आप हमरा अपमान कर रहे है. क्या ये आपको हमसे भी आदिक सुन्दर लगती है.

दाल्भ्य – नहीं-2 देवी.. ऐसा कुछ नहीं है. हम तो… हम तो…. (दाल्भ्य मरे हिचक के कुछ बोल hi नहीं प् रहे थे)

मेनका – हाहाहाहा… रहने दीजिये देव हम जानते है आपके कहने का क्या ार्थ था. अच्छा हम चलते है. आप खुद hi इनसे पूछ लेना जो भी पूछना है. और जो भी करना है….. हाहाहाःहाहा

और फिर मेनका उन दोनों को वह छोड़ कर जाने लगती है. और फिर पीछे मुद कर बोलती है – वैसे देवराज ने आप दोनों के विवहा की अनुमति दे दी है….. हाहाहाहाहा..

मेनका के जाने के बाद दाल्भ्य फिर से उस ाप्षरे को देखने में खो जाता है. और वो भी उसमे खो जाती है. कुछ देर बाद इस शांत माहौल में उस ाप्षरे के सवद गुजते है

ाप्षरे – जी कहिये देवा प हमसे क्या पूछना चाहते थे..

उस ाप्षरे की मधुर आवाज में तो एक जादो था. जो योद्धा बड़े -2 दानवो से चित नहीं हुआ था आज वो इस आवाज से चित हो गया था. उसका मन मेयर नाच रहा था. वो खोया सा उसे बिना पलके जपकाये एक तक देखे जा रहा था. उसने कोई जवाब भी न दिया. और वो ाप्षरे दाल्भ्य की ये दशा देख कर खुश भी थी और उसे एबीएस हराम भी आ रही थी. इसलिए उसने अपनी बात फिर से तेज़ आवाज दोहराई. और अपनी नजरे झुका ली. तब दाल्भ्य का डायन टुटा और उन्होंने कहा

दाल्भ्य – कोण है आप सुंदरी…?? आपको देखने के बाद से हमारा मन हमारे काबू में नहीं रहा है. पता नहीं ये कोण सा जादू है. की मन केवल आपको देखने के लिए पागल रहता है.

ाप्षरे – जी मेरा नाम – दक्षणा है. और मैं एक ाप्षरे हु. मेरा काम देवो की सेवा करना है. बताइये मैं आपकी क्या सेवा कर सकती हु..

दाल्भ्य – जी सेवा?? हाँ आप hi अब कुछ कर सकती है. शायद मुझको प्रे महो गया है. क्या आप मेरे इस पर्म को अपना कर मुझको दांया बना सकती है. आप जैसी जीवनसंगनी प् कर मेरा जीवन सफल हो जायेगा.

दक्षणा ये सुन कर मरे शर्म के निचे देखने लगती है. वो अंदर hi अंदर खुश भी थी. कियोकि उसको भी दाल्भ्य पाषंड था. और उसकी बहादुरी के चर्चे तो चारो और थे. दाल्भ्य जब दक्षणा को शरमाते हुए देखते है तो वो अपनी बहे पेला देते है. दक्षणा भी उनके चोदे सीने से लग जाती है. और कुछ पल रुक कर भाग जाती है. दाल्भ्य को तो समाज hi नहीं आया की हुआ क्या. पैर मेनका ने ये सब देख लिया था. वो गयी नहीं थी बस जाने का नाटक कर रही थी.

फिर क्या था मेनका देवराज की आज्ञा अनुसार दोनों का विवहा करवा देती है. अब दाल्भ्य और दक्षणा के जीवन का एक नया सवेरा हो चुक्का था. दोनों अपने में इतने मस्त हो चुके थे. की बस दोनों को एक दूसरे के अलावा कोई नहीं देखता था. देवराज ने भी कुछ दिनों के लिए दाल्भ्य को किसी भी काम से नहीं भेजा. पैर कुछ दिन बाद दाल्भ्य अपने कर्त्तव्य के लिए खुद hi देवराज के पास पहुंच गया. ये देख कर देवराज भी खुश हुए. फिर क्या था दोनों के जीवन केवल खुशिया hi खुशिया थी. दोनों का प्रेम दिन प्रति दिन बढ़ता hi जा रहा था.

कुछ समय ऐसे hi बिट गया. एक दिन दाल्भ्य पृत्वी की सुंदरता के बारे में दक्षणा को बता रहे थे. दक्षणा कभी पृत्वी पैर ज्यादा नहीं घूमी थी. आयी तो थी और देखा भी था बहुत कुछ पैर ये थोड़ा बहुत hi था. तो दक्षणा ने आज पृत्वी पैर घूमने की अपनी इच्छा प्रकट की. तो दोनों चल दिए पृथ्वी की और. कुछ देर बाद ये एक झरने के किनारे रुके. बहुत hi सुन्दर प्राकर्तिक नजारा था. झरने के चारो और बहुत hi सुन्दर फॉलो के पेड़ (ट्री) थे. कुछ छायादार ट्री भी थे. पानी की कल -2 करती आवाज. चिडियो की चहचाने की आवाज और उन फॉलो की महक उस सुन्दर नज़ारे को और भी आलोकिक बना रहे थे. कुछ देर तक उस झरने के किनारे वो बैठे अपने प्रेम को बढ़ाते रहे. और जब दोनों को बर्दाश नहीं हुआ तो दोनों वही पैर प्रेम लीला (चुदाई) करने लगे. दोनों की आवाजे भी तेज़ थी. दोनों खुले आश्मान में ये सुख पुरे मन से उदा रहे थे. दोनों hi किसी भी बात के लिए खुद को नहीं रोक रहे थे. दोनों की सिसकिया पुरे जंगल में गूंज रही थी. इनदोनो को लगा था की यहाँ कोई भी नहीं है. इसलिए दीनदुनिया से बे खबर ये दोनों एक दुषरे के साथ लगे हुए थे.

वही इस झरने के पास hi एक महँ तपश्वी आहिल अपनी तपश्या में लगे थे. और कई बर्षो से तप कर रहे थे. वो एक सिद्ध पुरुष थे. उनके पास तप का आशिम बल था. पैर आज आहिल जी की तपश्या में इन दोनों की सिसकिया बढ़ा बन रही थी. कई बार उन्होंने अपने मन को भटकने से रोकने की कोसिस की. पैर ये एक ाप्षरे की कामुक सिसकियों की आवाज थी. जब उनको नहीं रहा गया तो इन्होने देखा की ये सिसकिया किसकी है. और जब उन्होंने पाया की ये आवाजे एक देव योद्धा और एक ाप्षरे के मिलान से उत्पन हो रही है. तो उनको लगा की ये देवराज के कहने पैर जान कर इनकी तपश्या को भांग करना चाहते है. इसलिए hi ये सब कर रहे है. फिर भी उन्होंने अपने आप को शांत कर उनको वह से जाने के लिए एक आवाज लगाई. पैर इन दोनों ने वो आवाज सुनी hi नहीं. फिर आहिल जी का क्रोध बाद गया. फिर वो स्वाम उन दोनों के पास पहुंच गए. और बोले – वो दुष्ट पापी देव और निर्लज ाप्षरे रुक जाओ और यहाँ से चले जाओ नहीं तो हम तुम दोनों को सराप देने पैर विवश हो जायेगे.

जैसे hi दोनों ने किसी की आवाज सुनी तो दोनों की नज़र उस और उड़ गयी. पैर एक दोनों उस पड़ाव पैर थे की रुक नहींसकते थे. दोनों hi झड़ने के बहुत hi नजदीक थे. यहाँ नज़ारे उडी वह दाल्भ्य के लुंड ने पानी छोड़ना सुरु कर दिया. और उसके गरम वीर्य को महसूर कर दक्षणा की योनि का पानी भी फुट पड़ा. दोनों की नज़ारे तो उड़ चुकी थी. पैर उनके सरीर अंतिम कड़ी को महसूस करते हुए खुद hi चल रहे थे. आहिल जी को ये अपना अपमान लगा. उनको लगा की ये दोनों वाष्ण में कितने अपधे हो चुके है की हमारी आखों में देखते हुए भी ये सब कर रहे है. उनका गुस्सा अब सातवे आश्मान पैर था. वो अपने गुस्से को अब कण्ट्रोल नहीं कर सकते थे. इसलिए वो गरजे – तुम दोनों ने लाज और शर्म की सभी मड़ियादो को तोड़ दिया है. तुम दोनों हवस में इतने अंडे हो चुके हो की साधु और तपश्वियों का सामान करना भी भूल चुके हो. तुम दोनों ने वाष्ण की साडी हदो को पर कर दिया है. लोग जिस कार्य को घर की चार दीवारी में चुप चाप करते है. तुम उसी कार्य को यहाँ खुले में एक तपश्वी के सामने कर रहे हो. ये ाप्रद माफ़ करने लायक नहीं है. इसलिए मैं आहिल अपने तपोबल से तुम दोनों को सराप देता हु – जिस वाष्ण की आग में होने के कारन तुम दोनों ने हमारा अपमान किया है तुम सदा उस वाष्ण की आग में जलते रहोगे. और अभी इससे समय तुम दोनों देव की जगह दानव बन जाओगे. और दानव बन कर जितना अपनी वाष्ण की आग को शांत करने की कोसिस करोगे ये उतनी hi बढ़ती जाएगी……..

आहिल जी ने ये सराप दे कर वह से जाने लगे. तो ये दोनों उनसे माफ़ी मांगने लगे. पैर अभी आहिल जी का गुस्सा शांत hi नहीं हुआ था. वो बोले – हम तुम दोनों को माफ़ नहीं कर सकते तुम दोनों ने सभी मड़ियादो को तोड़ कर एक तपश्वी का अपमान किया है. उसके कहने के बाद भी तुम उसी कार्य में लगे रहे. जाओ और जीवन भर इस कार्य को hi करते रहो……

आहिल जी तो चले गए पैर ये दोनों दुखी हो कर वही बैठे रहा गए. कुछ hi देर में दोनों का सरीर बदलने लगा. और दोनों दानव बन बाये और दोनों की दैविये प्रवति hi जागृत हो गयी. और हर बीतते पल के साथ दोनों वाष्ण की आग में जलने लगे. दोनों को खुद से hi दर लग रहा था की कही ये खुद कुछ गलत न कर दे. जिस देव ने दानवो को उनके कर्मो का फल देने का बीड़ा उड़ाया था आज वो खुद दानव बन चुक्का था. और उनका मन दानवो की तरह उत्पात मशीन को मचल रहा था. तो ये दोनों वह से सिदा पातळ पहुंच गए.
 
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आहिल जी तो चले गए पैर ये दोनों दुखी हो कर वही बैठे रहा गए. कुछ hi देर में दोनों का सरीर बदलने लगा. और दोनों दानव बन बाये और दोनों की दैविये प्रवति hi जागृत हो गयी. और हर बीतते पल के साथ दोनों वाष्ण की आग में जलने लगे. दोनों को खुद से hi दर लग रहा था की कही ये खुद कुछ गलत न कर दे. जिस देव ने दानवो को उनके कर्मो का फल देने का बीड़ा उड़ाया था आज वो खुद दानव बन चुक्का था. और उनका मन दानवो की तरह उत्पात मशीन को मचल रहा था. तो ये दोनों वह से सिदा पातळ पहुंच गए.

पटल में मौजूद दानवो को देख कर दाल्भ्य ने अपना आतंक मचाना सुरु कर दिया. और वह के बहुत से दानवो को मर गिराया. पैर अभी भी इसका मन शांत नहीं हुआ था. कियोकि ये तो वाष्ण की आग थी जो शांत होनी hi नेह थी. पैर दानव दर कर यहाँ वह भाग रहे थे. तब दानवो के गुरु वह प्रकट हुए.

डी. गुरु – तुम्हारा सवागत है डलासुर और दक्षसूरी…..

दोनों ये नाम सुन कर चौक गए. तो फिर डी. गुरु बोले – हाँ आज से ये hi तुम दोनों का नाम है अब तुम दोनों दानव हो तो दानवो को hi क्यों मार रहे हो. तुमने अभी यहाँ मौजूद सभी दानवो को हरा दिया है इसलिए आज से तुम दानवो के राजा hoge…or तुम दानव समाज की भलाई के लिए hi कार्य करोगे.

तभी वह मौजूद सभी दानव नारी लगाने लगे – दानवराज डलासुर की जय हो. दानव रानी दक्षसूरी की जय हो…

कुछ hi देर में दोनों को दानवराज के सिंघासन पर बिता कर उनका राज्याभिषेक किया गया. और इस राज्याभिषेक से hi दोनों के अंदर दानवो की काली शक्ति अपने आप आ गयी. और दोनों अपने देव रूप को भूल कर पूरी तरह दानव बन गए.

यहाँ जब देवराज को इसके बारे में पता चला तो वो भी दुखी हुए. पैर उन्होंने इसके लिए कुछ नहीं किया. कर भी क्या सकते थे. एक तपश्वी के श्राप को भी नहीं झुटला सकते थे. देवराज ये सोच कर hi चुप रहा गए. पैर शायद उन्होंने इस घटनाक्रम का भविष्य में क्या परिडाम होगा ये नहीं सोचा और ये इनकी एक बड़ी भूल भी साबित हुयी.

डलासुर और दक्षसूरी पुरे दानव बनते hi वाष्ण की ाधिर होने लगे. और इसलिए दोनों अपने रूम में चले गए. और लग गए चुदाई में. जितनी ये चुदाई करते उनकी काम अग्नि और भड़कने लगती. और जब ये रुकते तो इनकी दानवीय प्रवति इनके उप्पेर हावी हो जाती. और ये कही भी आतंक मचा कर फिर से अपनी रक्षा लीला में लग जाते. ऐसे hi समय बीतता गया. और इनकी वाष्ण भी बढ़ती गयी. अब ये आलम था की दिन में 18 हॉर्स ये चुदाई कर रहे होते. दक्षसूरी ने इसी दुराण एक बच्चे को जनम भी दिया. पैर वो अपनी वाष्ण की आग में उस बच्चे पैर भी डायन न दे पायी और दानव दशियो ने hi उस बच्चे को संभाला. अब दानवो का अत्तंक बढ़ने लगा था. जो भी कोई दानवो को रोकता डलासुर जा कर उसे पल भर में मार देते और फिर अपनी पत्नी के साथ लग जाते.

समय के साथ दक्षसूरी को और 5 बेटे हुए. पैर इनको भी दशियो ने hi संभाला. दक्षसूरी को तो अपनी काम वाष्ण में ये याद hi नहीं था की उनके अपने bête भी है. यहाँ तक की ये दोनों अपने देव होने को भी भूल चुके थे. डलासुर को ये भी याद नहीं रहा की वो देवलोक का एक योद्धा है जिसका काम बुराई को मिटाना था. इन दोनों के वाष्ण इतनी बाद गयी थी की इनके अस्स पास का जीव भी वाष्ण में ग्रषित हो जाता. अभी तो कलयुग की सुरबत hi थी. पैर लग रहा था की कलयुग के सुरु होते hi वाष्ण ने अपना खेल दिखना सुरु कर दिया है. जहा भी ये दोनों जाते वह लोगो में वाष्ण का भूत चढ़ जाता. धरती पैर और पटल में अब वाष्ण का तूफ़ान सा आ गया था. वो तो डलासुर ने देवताओ की और कुछ नहीं की थी. नहीं तो शायद देवता भी इस आग में जलने लगते.

जो ऋषि मुनि थे. जो तपश्वी थे वो ये सब देख कर दुखी हो रहे थे. वाष्ण का नंगा नाच हो रहा था हर और. और अब देवता भी चिंतित थे. पैर सब जानते थे की डलासुर को अब हराना उनके बस की बात नहीं है. एक तो वो पहले hi बहुत आदिक शक्तिया त्रिदेवो और त्रिदेवियों से ले चुक्का था और अब दानवीय शरती भी उसकी गुलाम थी. वो इतना खतरनाक कॉम्बो बन चुक्का था की देवता कुसके पास जाने से डरते थे. और वैसे भी उसके पास जो भी जाता था वो वाष्ण में आधा हो जाता था. देवताओ की सबसे बड़ी चिंता का कारन थे डलासुर के वो 6 पुत्र जो की अपने बालपन में भी बहुत शक्ति शैली थे. वो डलासुर की पावर्स के साथ hi पैदा हुए थे. माँ बाप का तो साया इन लड़को पैर था नहीं उप्पेर से दानव. जहा जाते अपनी मन मणि करते. देवताओ को दर था की यदि डलासुर और दक्षसूरी ऐसे hi लगे रहे तो पता नहीं और कितने बालको को जनम देंगे. और इन दानव पुत्रो को कोण देव रोकेगा. डलासुर और दक्षसूरी तो भी अपने आप में hi लगे रहते थे. पैर ये 6 तो केवल पृथ्वी पैर आतंक मचते थे.

पूरी धरती पैर वाष्ण और दर का माहौल था. चारो और त्राहि -2 मची हुयी थी. इसके समादन के लिए इंद्रा ने सभा बुलाई. और सब ये सोचने लगे की क्या किया जाये. तब देव गुरु ने देवराज से कहा की देवराज से आपकी hi गलती का नतीजा है. जैसे hi दाल्भ्य को श्राप मिला था यदि आप तब hi कुछ करते तो ये दिन देखना hi न पड़ता.

इंद्रा – गुरूजी आप सत्य कहा रहे है पैर उस समय भी मुझको ये समाज नहीं आया की क्या किया जा सकता है और आज भी इस्थिति वही है. बल्कि कहु तो और भी बुरी है. पैर करे क्या से समाज के परे है. कियोकि डलासुर बहुत शक्ति शैली है उसे युद्ध में हराना मुश्किल होगा. कियोकि उसके पास त्रिदेव और त्रिदेवियों की वो शक्तिया है जिनका ताड हमारे पास नहीं है. और यदि उसे रोका नहीं गया तो ये डर्टी समाप्त हो जाएगी इस वाष्ण की आग में.

देव गुरु – अब इसका उपाए केवल वो hi बता सकते है जिनके श्राप से डर्टी पैर ये संकट आया है. यदि वह भी कुछ न मिला तब तो फिर जगत के पालनहार नारायण के पास hi चलना होगा.

इंद्रा – आपकी बात उचित है गुरूजी. हम सभी आहिल जी के पास चलते है. शायद वो hi कोई मार्ग बता सके.

सभी देव कुछ देर तक vichar-vimash कर आहिल जी के पास पहुंच जाते है. इंद्रा देव को अपने सामने देख कर आहिल जी चकित रहा जाते है और उनका सवागत सत्कार करते है. जब ये सब निपट जाता है तो आहिल जी इंद्रा देव से उनके आने का कारन पूछते है.

आहिल – कहिये देवराज आज इस गरीब की कुटिया पैर कैसे पादरी है. आदेश दे की मैं आप सभी देवो के लिए क्या कर सकता हु??

इंद्रा – आहिल जी मैं यहाँ देवराज बन कर नहीं आया हु. मैं तो यहाँ आपसे एक समस्या के समादन की याचिका ले कर उपपस्थित हुआ हु.

आहिल – बताइये ऐसी कोण सी समस्या ाँ पड़ी है जो सयम देवराज भी हाल नहीं कर प् रहे है. और देवो के गुरु के साथ मेरे पास आ पहुंचे है.

इंद्रा – बात ये है की अपने जिस देव दाल्भ्य को श्राप दिया था. आज वो पुरे संसार पैर खतरा बन कर मद्र रहा है. और आप hi इसके कोई उपपाये बता सकते है. जिससे आपकी वाणी भी झूटी न हो और संसार पैर से संकट भी ताल जाये.

आहिल – मुझको खेद है देवराज उस समय करोड़ की ाग्नि ने मुझको घेर लिया था. याय ु भी कहा सकते है की उस घटना ने मुझको श्राप देने पर विवश कर दिया था. जब भी मैं उस घटना को याद करता हु तो मुझको समाज hi नहीं आता की गलती किसकी है. न तो वो दोनों दोषी थे. वो भी इस जंगल में अपने प्रेम का डीप जला रहे थे. उनको भी बहन न था की वो किसी तपश्वी के तप में बढ़ा उत्पन कर रहे है और न मैं खुद को दोषी कहा सकता हु कियोकि मेने कई प्रश् किये की वो लोट जाये यहाँ से. पैर सायद ये नियति का hi कोई खेल था जिसमे हम सब फस गए.

इंद्रा – आपकी बात एक दम सत्य है. पैर आज परिस्थिति बहुत गंभीर हो चुकी है. उनकी वाष्ण से संसार में वाष्ण का नंगा नाच हो रहा है. उनके दानव बनने से दानव बहुत शक्ति शैली हो कर सभी तपश्वी और sadhu-santo को परेशां कर रहे है. उनके सभी पुत्र तो संसार पैर कहर बर्षा रहे है. अब आप hi कोई समादन बताइये ….

आहिल – हम्म मैं भी इस इस्थिति से अवगत हु. और बहुत दिन से इस पैर विचार भी कर रहा हु. और मेरे समाज में इसका केवल एक hi उपपाये है.

इंद्रा – हम सब वो उपपाये hi जानना चाहते है..

आहिल – यदि किसी तरह डलासुर और दक्षसूरी को उस पटल लोक से निकल कर किसी ऐसी जगह रखा जाये जहा की सकारात्मक ऊर्जा (+ एनर्जी) अधिक हो. तो वो खुद को अपने काबू में कर सकते है. कियोकि मेने श्राप दिया था की वो जितना उस वाष्ण को शांत करने के लिए सम्भोग करेंगे ये उतनी hi बढ़ेगी. और यदि ये दोनों अपने आप पैर सयम रख कर सम्भोग hi न करे तो ये वाष्ण और नहीं बढ़ेगी. अभी ये दोनों पटल में है और वह की नकारात्मकता उनको सम्भोग के लिए और आदिक ुक्षती है. यदि वो सकारात्मक ऊर्जा वाली जगह होंगे तो वो अपने पैर काबू कर सकेंगे. और एक बार वो शांत हो गए तो वो दोनों अपने पुत्रो को भी सही ज्ञान दे कर इस आतंक को रोक सकगे. वो एक देव है और उसने इस संसार से बुराई को ख़तम करने का बीड़ा उड़ाया था. उसे उसकी पहचान याद दिलाओ. देखो फिर सब बदलने लगेगा.

इंद्रा – आपका उपाए तो सच में आदि उत्तम है. बस अब किसी तरह डलासुर को पटल से निकल कर किसी ऐसे िस्थान पैर लाना होगा. यहाँ सकारात्मकता आदिक हो.

आहिल – बिलकुल ठीक.. और मेरी नज़र में वो जगह है हिमालय की घटिया. आप सवम जा कर किसी अच्छे िस्थान को देख कर उन दोनों को वह बुला लो. फिर सब मंगलमय होगा. और यदि आप चाहे तो मैं भी आपके साथ चल सकता हु जब डलासुर को संजना हो.

इंद्रा – ये तो और भी अच्छा होगा. अब हमे आज्ञा दे की हम ये सभी व्यवस्था कर सके.

फिर इंद्रा और सभी देव स्वर्ग को लोट जाते है. पैर अब सभी के फेस पैर एक चमक थी. उनको अपनी समस्या का समादन मिल चुक्का था. सभी सभा में बैठे थे. तो इंद्रा ने एक देव को हिमालय में एक ऐसा िस्थान देखने को कहा जहा डलासुर और दक्षसूरी का निवेश बन सके. और फिर सब डलासुर को वह कैसे बुलाना है ये सोचने लगे. सभी जानते थे वो आज दानवराज है तो देव राज की बात तो सुनेगा नहीं. फिर भी एक देवदूत को इंद्रा का सन्देश ले कर डलासुर के पास भेजा. काम तो हुआ नहीं वो बिचारा भी वाष्ण की आग में जलने लगा. :lol1::lol1::lol1:
 
अपडेट 148

फिर इंद्रा और सभी देव स्वर्ग को लोट जाते है. पैर अब सभी के फेस पैर एक चमक थी. उनको अपनी समस्या का समादन मिल चुक्का था. सभी सभा में बैठे थे. तो इंद्रा ने एक देव को हिमालय में एक ऐसा िस्थान देखने को कहा जहा डलासुर और दक्षसूरी का निवेश बन सके. और फिर सब डलासुर को वह कैसे बुलाना है ये सोचने लगे. सभी जानते थे वो आज दानवराज है तो देव राज की बात तो सुनेगा नहीं. फिर भी एक देवदूत को इंद्रा का सन्देश ले कर डलासुर के पास भेजा. काम तो हुआ नहीं वो बिचारा भी वाष्ण की आग में जलने लगा. हाहाहाहा

कुछ देवो ने युद्ध का सुझाव दिया. पैर उससे भी कुछ नहीं होना था. तब इंद्रा देव ने अपनी कुछ अपशराओ को बुलाया को उनको पटल जा कर डलासुर को अपने रूप जाल में फसा कर हिमालय पैर लेन को कहा. और जब ये अपशराये वह पहुंची तो डलासुर पैर उनके रूप जाल का कोई ाशर hi न हुआ. उनके पास उनकी ाप्षरे दक्षणा जो थी. वैसे भी डलासुर ने कभी भी अपनी पत्नी को छोड़ किसी और की तरफ देखा तक नहीं था. उनकी वाष्ण की पूर्ति के लिए वो बहुत थी. ये अपश्रये भी वाष्ण के आदिर हो कर लोट गयी. पैर कुछ हल न निकला. (भाइयो मेने जान कर इन दोनों घटनाओ को शार्ट ने निपटाया है कियोकि इनसे फ्लैशबैक लम्बा होगा केवल)

अब सभी देव परेशां हो चुके थे. समस्या का समादन जान कर भी कुछ नहीं कर प् रहे थे. ये सब फिर से आहिल जी के पास जा पहुंचे. तब आहिल जी ने उनसे कहा की किसी ऐसे को भेजो जिसकी हर बात दाल्भ्य ने सदा मणि हो. जैसे की उनके माता पिता…. अब इंद्रा को सही मार्ग मिल चुक्का था. जब सब फिर से स्वर्ग की सभा में पहुंचे तो उन्होंने दाल्भ्य के पिता को बुलाया और साडी बात बताई. उसके पिता अपने पुत्र से फिर मिलने को सुन कर hi प्रश्न हो गए. और इंद्रा के कहे अनुसार जा पहुंचे पटल नगरी में. जब वो डलासुर के महल की और जाने लगे तो दानवो ने उनका रास्ता रोक लिया. तब उनके पिता ने बोलै – मैं एक देवदूत हु. और नाम है – दिव्यांश. एक बार अपने दानवराज से जा कर बोलो की दिव्यांश मिलने आया है.

दानव भी सोचने लगे की आज कल देवलोक से बहुत hi लोग पटल में आ रहे है. क्यों न इसकी सुचना डी. गुरु को भी कर दी जाये. इस लिए एक दानव डलासुर की के पास चला गया तो एक डी. गुरु के पास. जब दानव ने डलासुर को कहा की कोई देवदूत दिव्यांश आपसे मिलना चाहता है. तो डलासुर ये नाम सुन कर चौक गए. उनके मन कहने लगा की ये जो भी है. उनके लिए बहुत hi समानिये है. तो डलासुर ने उस दानव को कहा की जाओ और उस देवदूत को आदर सहित उसके पास ले कर आओ.

कुछ hi देर में बाप bête आमने सामने थे. अपने पुत्र को दानव रूप ने देख कर उनको दुःख हो रहा था. तो डलासुर अपने पिता को पहचानने की कोशिश कर रहा था. दक्षसूरी भी उनके पास hi थी. दोनों को hi अग्नि लगा की इनसे जरूर कोई रिश्ता है. पैर ये दोनों अपने पिता को पहचान नहीं प् रहे थे. कुछ देर के मोंक इ बाद दिव्यांश बोले

दिव्यांश – हे दानव राज मैं देवदूत दिव्यांश हु. और यहाँ मैं अपने देवराज का सन्देश ले कर आया हु. क्या मुझको आज्ञा है की मैं वो सन्देश आपको सुना सकू??

डलासुर – हे देवदूत आपको हम पहचान नहीं प् रहे है. न जाने क्यों लगता है की मेरा आपसे कोई पुराण रिश्ता है. पैर अभी एप क दूत है तो आप सन्देश सुना सकते है.

दिव्यांश – जी देवराज ने आपसे मिलने की इच्छा जताई है. वो आपसे हिमालय की पहाड़ियों में मिलना चाहते है. क्या आप और रानी दोनों देवराज से मिल कर उनकी इच्छा का सामना कर सकते है.

डलासुर – नहीं कदापि नहीं… हमको देवराज से मिलने जाने की कोई इच्छा नहीं है.

दिव्यांश – पैर मैं दिव्यांश भी ये चाहता हु की एप क बार उनसे जरूर मिले. और आपको मिलना hi होगा…..

दिव्यांश की बात और आवाज ने डलासुर के मन और दिमाग को हिला दिया. उसने अपने पिता की कभी भी कोई बात नहीं कटी थी. और आज उसके पिता फिर आज उसे कुछ कहा रहे थे. तो वो चाहा कर भी न नहीं कर पाया.

डलासुर – यदि आप ऐसा चाहते है तो हम दोनों जरूर देवराज से मिलने जायेगे. हम कल सुबह वह पहुंच जायेगे. आप ये देवराज को बता देना.

दिव्यांश डलासुर की बात से खुश हो कर चले जाते है और डी. गुरु वह पहुंच जाते है. और जब डी. गुरु को पूरी बात पता चलती है तो वो सोचने पर साजबूर हो जाते है की ऐसा क्या है की देवराज दानवराज से हिमालये पैर hi मिलना चाहते है. डी. गुरु को भी ज्ञात था की डलासुर एक देव है. और एक श्राप के कारन दानव बन चुके है. और डी. गुरु भी डलासुर की वाष्ण से परेशां हो चुके थे. कियोकि डलासुर दानवो की भलाई के लिए कुछ नया नहीं कर रहे थे. और न hi अभी तक देवलोक पैर आक्रमण किया था. डी. गुरु को ये समय ाचा लगता है देवो से अपना पुराण बदला लेने का.

डी. गुरु – दानवराज इनमे हमको देवो की कोई चाल नजर आ रही है. कुछ तो है जिसके कारन ये देवराज आपसे मिलने को इतने वयाकुल है. मेरे हिसाब से आपको अपनी सेना को तैयार करके ले जाना चाहिए. वो आपके पीछे चुप कर रहेगी. यदि देवो ने कोई छल किया तो उसके लिए आपको सेना की जरुरत पड़ेगी..

डलासुर – आपकी बात उचित है गुरूजी. हम ऐसा hi करेंगे.

फिर डलासुर अपने सेनापति को बुला कर सेना तैयार करने को बोल देते है. ीदार डी. गुरु डलासुर के बेटो से मिलते है और एक अलग hi योजना तैयार करते है. पूरी रात तैयारियों में hi गुजर जाती है. ीदार इंद्रा देव ने भी आहिल जी के पास सुचना भेज दी थी.

नेक्स्ट डे मॉर्निंग में hi डलासुर और दक्षसूरी बताये हुए स्थान पर पहुंच जाते है. उनकी सेना भी आ रही थी. जो अभी पीछे hi थी. सेना में उनके 6 पुत्र भी थे. ीदार इंद्रा देव, देव गुरु, मेनका, दिव्यांश और आहिल जी भी वह पहुंच चुके थे. इंद्रा देव ने इस िस्थान पैर रहने की पूरी व्यवश्था करवा दी थी. आहिल जी ने एक हवन भी सुरु कर दिया था. जिससे वह का वातावरण और भी आदिक (+) एनर्जी वाला हो गया था. जैसे hi डलासुर और दक्षसूरी वह पहुंचे तो वह के वातवरद का उन पैर प्रभाब पड़ने लगा. उनको अपनी वाष्ण को रोक कर यहाँ आने में जो प्रॉब्लम हो रही थी. वो वाष्ण अब काम होने लगी थी. दोनों का दिमाग काम करने लगा था.

इंद्रा – आओ दाल्भ्य और दक्षणा.. ऐसे हो तुम दोनों??

ये दोनों अपने ये नाम सुन कर एक बार चौक गए. उनको तो अपना देव रूप का नाम भी याद नहीं था. पैर जब इंद्रा ने इनको इनके अश्ली नाम से पुकारा तब इनको कुछ कुछ याद आने लगा. एक तो यहाँ के वातावरण में मंद काम कर रहा था दूसरा कोई भी अपने नाम को जल्दी hi पहचान लेता है. अपना नाम याद करते हुए ये दोनों वही पैर बेथ गए. और अपने बाईट हुए दिनों को याद करने लगे. सामने सभी फेस जाने पहचाने लग रहे थे. पैर याद कुछ भी नहीं आ रहा था और जो याद आ रहा था वो सब डुंडला था. जब कुछ देर तक उनको सब कुछ पूरी तरह याद नेह आया तो इंद्रा देव और मेनका उनको उनकी पुराणी बाते बता कर याद दिलाने लगे. पैर कोई फायदा नहीं हो रहा था. तब आहिल जी ने दोनों को हवन कुंड की आगे बेथ कर एक डायन करने का नया तरीका बताया. तो दोनों उनकी बताये अनुशार डायन में बेथ गए. और धिरे -2 उनके अंदर की वाष्ण काम होने लगी और उनके मंद पर पड़ी धूल हटने लगी. और दोनों को सब याद आ गया. और ये भी याद आ गया की पिछले कुछ सालो से वो दोनों क्या बन गए थे और क्या कर रहे थे. उनको अपने पुत्रो का भी पता चल चुक्का था. अब दोनों की आखों से आशु बहा रहे थे. फिर दोनों जान सभी से माफ़ी मांगने लगे. जब ये सब हो गया तब इंद्रा देव बोले

इंद्रा – दाल्भ्य चाहे तुम दानव बन चुके हो पैर तुम अपने करम से अपना मुँह नहीं मोड़ सकते. मानव कल्याण hi तुम्हारा लक्ष्य होना चाहिए.

डलासुर – जी देव केसा hi होगा. पैर हम दोनों अपनी वाष्ण को अभी भी काबू नहीं कर प् रहे है. इसको शांत करने का कोई उपपाये बताइये.

आहिल – बीटा ये मेरे श्राप का hi ाशर है. तुम दोनों जितना काम सम्भोग करोगे. ये वाष्ण उतनी hi काम होती जाएगी. अपना मन दयँ में लगाओ. और अपने देव रूप को फिर से जागृत करो. जब तुम अपने देव रूप को जागृत कर लोगे तो तुम अपने आप को 2 भाग में विभाजित कर लोगे. पैर ये वाष्ण तुम्हारे अंदर सदा बानी रहेगी. इनको काम तो किया जा सकता है पैर ख़तम नहीं किया जा सकता. और जितना तुम्हारा देव रूप बलशाली होगा. ऊंट्ना hi कमजोर तुम्हारा दानव रूप होगा. तुम अपने दानव रूप को अपने देव रूप के नियंत्रण में रखोगे तो वाष्ण की आग भी तुमको काम सताएगी. ये 1-2 दिन में सम्भब नहीं होगा. तुम दोनों जितना डायन लगाओगे उतना hi ये तुम्हारे वश में होने लगेगी. और जब तुम सम्भोग तयाग डोज. तो ये फिर बढ़ेगी भी नहीं.

डलासुर – पैर गुरूजी ये हम दोनों को सदा ऐसे hi परेशां करती रहेगी. तब तो हम कभी भी सकूँ से नहीं रहा पाएंगे. और यदि दिमाग में ये वाष्ण hi रहेगी तो जनकल्याण कैसे होगा??? ऐसे हम ुटित और अनुचित पहचानेगे. कैसे हमारा मन किसी अच्छे कार्य ने ागेगा. ?????? वाष्ण में तड़पता व्यक्ति किसी भी सात करम को नहीं कर सकता. उसके लिए उसकी वाष्ण की पूर्ति की उसका प्रथम धर्म बन जाती है. वाष्ण से युक्त मन और दीमक कभी न्याय नहीं कर सकता. फिर कैसे????
 
अपडेट 149

डलासुर – पैर गुरूजी ये हम दोनों को सदा ऐसे hi परेशां करती रहेगी. तब तो हम कभी भी सकूँ से नहीं रहा पाएंगे. और यदि दिमाग में ये वाष्ण hi रहेगी तो जनकल्याण कैसे होगा??? ऐसे हम ुटित और अनुचित पहचानेगे. कैसे हमारा मन किसी अच्छे कार्य ने ागेगा. ?????? वाष्ण में तड़पता व्यक्ति किसी भी सात करम को नहीं कर सकता. उसके लिए उसकी वाष्ण की पूर्ति की उसका प्रथम धर्म बन जाती है. वाष्ण से युक्त मन और दीमक कभी न्याय नहीं कर सकता.

इंद्रा – उसका हल है मेरे पास. तुम दानव राज हो. और तुमको खुश करने के लिए मानव सदा तत्पर रहते है. और ये मानव hi तुमको सकूँ दिलबाने में सहायक होंगे. जब भी कोई मानव तुम दोनों के ांश को अपने अंदर बुला कर सम्भोग किरिया करेगा. तब उस सम्भोग से तुम्हारी वाष्ण बहुत हद तक शांत हो जाया करेगी. पैर इसका अंत नहीं हो सकता कियोकि एक तपश्वी का वचन झूठा नहीं हो सकता.

डलासुर – ये भी हम दोनों के लिए बहुत होगा देवराज. पैर कोई मानव ये किरिया करेगा hi क्यों???

इंद्रा – जिससे की वो तुमसे कुछ प् सके. हाँ यहाँ तुमको याद रखना होगा की कोई अनुचित वर न दे देना.

डलासुर – मैं याद रखुगा देवराज…

दक्षसूरी – पैर देवराज क्या हम सदा ऐसे hi तड़पते रहेंगे. या कभी हमको मुक्ति भी मिलेगी.

इंद्रा – मत भूलो की हर चीज का अंत निश्चित है.

आहिल – तुम दोनों ये मेरे श्राप के कारन hi रहा रहे हो इसलिए में तुम दोनों को वर देता हु – “तुम दोनों को मेरे सराप से मुक्त एक पतिव्रता नारी का पुत्र करवाएगा, जो की दक्षसूरी का भी पुत्र होगा. वो HI इस घटनाक्रम की आखरी करि होगा”

डलासुर – आपका बहुत -2 दन्यवाद. हम दोनों आज से सब कुछ तयाग कर अपने डायन में लीं हो जायेगे.

इंद्रा – नहीं पुत्र ऐसा मत करना. जान कल्याण भी तुम्हारी hi जिम्मेदारी है. और ये सदा तुमको निभानी hi होगी.

डलासुर – ऐसी आपकी ेगा देवराज

आहिल – मैं तुम दोनों को अपना तपोबल भी प्रदान करता हु ये तुमको डायन लगाने में मदत करेगा.

और ये कहा कर आहिल जी के सरीर से एक रौशनी निकलती है. और उन दोनों में समां जाती है.

आहिल – अब मेरे प्राश्चित का समय आ चुक्का है इस लिए में अपनी ये देह का तयाग करता हु. तुम दोनों का कल्याण हो….

ये कहा कर hi आहिल जी वही पैर अपने प्राण तयाग देते है. सब आहिल जी के इस कदम से सकते में आ चुके थे. सभी आहिल जी के मरे हुए शरीर को देख रहे थे. की दानवो का अटैक हो जाता है. हुआ ये था की बहुत देर से दानव सेना के साथ डी. गुरु और डलासुर के सरे bête ये सब देख और सुन रहे थे. ये सब देख कर डलासुर के 5 बेटे तो पीछे हैट गए वो अपने माँ बाप के हर फेशल के साथ थे. पैर सबसे बड़े bête को डी. गुरु ने इस तरह बड़का दिया था की उसे अपने माँ बाप भी दानव जाती के दुश्मन नजर आ रहे थे. और वो hi हाल उस सेनापति का भी था. इस दोनों को ये मौका सही लगा अटैक करने का तो एक साथ सभी दानव वह खड़े सभी लोगो पैर टूट पड़े. पैर ये सब ये भूल गए की सामने स्वाम दानवराज और देवराज है. इनसे जीत पाना इस सब के बस में नहीं था. डलासुर, दक्षसूरी और देवराज ने hi सभी का सामना किया. देवराज के ब्रज के प्रहार से डलासुर का बीटा वीरगति को प्राप्त हो गया. और सेनापति को डलासुर ने मर गिराया. इन दोनों के मरते hi दानव िस्दार उदार भाग गए. और सब पटल में जा कर चुप गए. डी. गुरु ने जब देखा की उनका पल्ला कमजोर पड़ने लगा है तो वो भी निकल लिए. अपनी तपश्या के लिए. अब दानव गुरु को किसी ऐसे दानव वीर की तलाश थी जो डलासुर को हरा कर दानवराज बन कर उनके सपने को साकार करने में उनकी मदत करे. पैर शायद ये होना अभी सम्भब नहीं था.

अपने bête की मूट से डलासुर और दक्षसूरी दोनों hi दुखी थे. पैर वो कुछ कर भी नहीं सकते थे. इस युद्ध की समाप्ति के बाद देवराज बहुत खुश थे की अब कलयुग में जो दानव जाती से उनको भय था वो डलासुर के रहते कभी भी उनके पास नहीं आएगा. देवराज दोनों को आशीर्वाद दे कर चले गए. और सभी दानवो में ये बात आग की तरह फेल गयी की दानवराज ने अपने bête के खिलाफ युद्ध किया और उसमे वो मारा गया. अब सब दानव और भी ज्यादा डरने लगे.

अब डलासुर और दक्षसूरी को अपने बेटो का भी बहन हो चुक्का था. और ये 5 बेटे उनके निकट आ गए थे. अपने bête को देख कर उन दोनों के दिल में प्यार पैदा हो रहा था bête इतने बड़े हो गए और कभी उन्होंने ऍक्ने बच्चो की सूत भी न ली इस बात का दुःख भी था. और आज पहली बार था उन बच्चो के लिए जो वो अपने माँ बाप के इतने करीब थे. सब ख़ुशी और दुःख के मिले जुले भावो के साथ रो रहे थे. एक बीटा अभी भी मारा हुआ पास में hi था. इसका दुःख भी इन दोनों को खा रहा था. दोनों को अपने आप से एक नफरत सी होने लगी. वाष्ण से छिड़ सी होने लगी. दक्षसूरी ने अपने सभी बेटो को अपने पास बुला कर गले से लगा लिया. आज पहली बार वो एक माता होते का अनुभव कर प् रही थी ये अनुभव उनको कितना सुख और शांति दे रहा था ये तो कोई नहीं बता सकता. डलासुर भी अपने बेटो को देख कर हर्षित हो रहे थे. उनको दुःख था की वो एक अच्छे पिता न बन सके. और उसका परिदम उन्होंने अपने एक bête की मूट के रूप में मिल चुक्का था. किसी के मुँह से अभी तक कोई भी शव्द नहीं निकला था. बस आखों से hi एक दूसरे के प्रति अपना प्रेम देखा रहे थे. ानाथो की जिंदगी जीने वाले उन बच्चो ने आज पहली बार अपने उप्पेर माँ बाप का साया महसूस किया था. कितनी hi देर सभी ऐसे hi चुप आपस में मिलते रहे. एक दूसरे पैर अपना प्यार लुटाते रहे. अंत में ये छुपी एक माँ ने hi तोड़ी..

दक्षसूरी – बेटो तुम सब हम दोनों को माफ़ कार देना. तुम इतने बड़े हो गए और हमरे पास रहते हुए भी हमने तुमको कभी देखा तक नहीं. कभी वो प्यार नहीं दिया जो हर बच्चे का हक़ होता है. हम तुम सब के गुन्हेगार है मेरे बच्चो. (फिर से रोने लगती है)

1सत बीटा – नहीं माँ ऐसा नहीं कहते. हमने अभी सब सुन लिया था. देवराज की बाटे भी और उन तपश्वी की बाते भी. आप दोनों की कोई गलती नहीं है. जो भी हुआ उस श्राप के कारन हुआ. और कुछ गलती हमारी भी है माता. जो आपके पास होते हुए भी कभी आपके पास नहीं आये. (पैर ऐसा नहीं था की ये लोग कभी अपनी माँ के पास नहीं गए हो. पैर दशियो ने इनको कभी मिलने hi नहीं दिया. और मिलने भी कैसे देती ये दोनों हर टाइम तो सेक्स करते थे. तो मिलते भी तो किस टाइम)

डलासुर – तुम तो बहुत समझदार हो. हम जानते है की यदि तुम सब कभी आये भी होंगे तो तुमको मिलने नहीं दिया गया होगा. सच में मेरे bête बहुत hi समझदार है… (और फिर उसको गले लगा लिया)

फिर सब ये सब वह पड़े अपने मरे हुए bête के पास जा कर उसकी मूट पैर भी शोक करते है. और डलासुर कुछ दानवो को बुला कर उसका अंतिम संस्कार करवाता है. और सब लोग वह हिमालये पैर बने प्रप्रतिक महल में आ जाते है. देवराज ने ये डलासुर और दक्षसूरी के लिए hi बनवाया था.

दक्षसूरी – बेटो तुम सब अपना नाम तो बताओ. देखो मैं कितनी अभागी माँ हु जिसको अपने hi बच्चो का नाम भी नहीं पता. जबकि एक माँ hi अपने बच्चो को सब से परिचय करवाती है. और मैं खुद तुमसे तुम्हारा परिचय पूछ रही हु.

2ंद बीटा – माता देखि न हो. सब समय का खेल है. इसमें किसी का कोई दोष नहीं. अब हमको ये सब भूल कर ये सोचना चाहिए की आज सब साथ में है.

3रद बीटा – हाँ माता जी. भैया बिलकुल ठीक कहा रहे है. अब हम सब साथ में hi रहेंगे. इससे हमको भी अपने माँ बाप का प्यार मिलता रहेगा.

दक्षसूरी – हम्म अब साथ hi रहेगी. (साथ में कुछ सोच भी रही थी. कियोकि अभी भी उनको उनकी वाष्ण परेशां कर रही थी. सोच रही थी की यदि बच्चे साथ रहेंगे तो कैसे वो सब होगा जिसके बिना ये डोनर अहा भी नहीं सकते)

डलासुर – चलो पहले अपने नाम तो बता दो.

1सत बीटा – नकसुर

2ंद बीटा – भीमासुर

3रद बीटा – भलासुर

4तह बीटा – पतासुर

5तह बीटा – दयासुर

दक्षसूरी – बहुत hi सुन्दर नाम है मेरे बच्चो के (हर माँ को लगता है.. चाहे कितने भी ख़राब हो)
 
अपडेट 150

दक्षसूरी – बहुत hi सुन्दर नाम है मेरे बच्चो के (हर माँ को लगता है.. चाहे कितने भी ख़राब हो)

डलासुर – मेरे बच्चो अब हम सब यहाँ पैर hi रहेंगे. पैर अब मैं तुमको कुछ जिम्मेदारी भी दे रहा हु. तो क्या तुम अपनी जिम्मेदारी निभा पाओगे??

नकसुर – आप आदेश दे पिताजी. हम हर सम्भब प्रयाश करेंगे वो सब करने का.

डलासुर – बीटा अब तुम सबसे बड़े हो. दानवो के हिट और अहित का तुमको डायन रखना होगा. इसमें भलासुर तुम्हारा साथ देगा.

भलासुर – जो आज्ञा पिताजी.

डलासुर – नकसुर आज से तुम हो दानवो के नए सेनापति. पैर डायन रहे दानव कभी भी किसी पैर जुर्म न करे. यदि दानवो ने आतंक मचाया तो उसके जिम्मेदार तुम होंगे.

नकसुर – पिताजी में अपनी पूरी कोसिस करुगा की आपको कभी कोई शिकायत का मौका न मिले.

दयासुर – पिताजी मैं तो इस महल की सुरक्षा करुगा. अब मैं माँ को छोड़ कर कही नहीं जाने वाला.

डलासुर – जायेगा तो कोई भी नहीं. सभी यहाँ साथ में रहेंगे.

नकसुर – नहीं पिताजी हम सब यहाँ नहीं रहा सकते. हम सब जानते है की आप दोनों को एकांत की जरुरत है अपने आप को सँभालने के लिए. हम सब आप दोनों के अस पास hi होंगे. पैर इस महल में नहीं. यहाँ आप दोनों को भी अपना डायन लगाना है. और डायन लगते समय जितनी शांति हो उतना hi अच्छा होता है. हम आप दोनों से मिलते रहेंगे. पैर अभी साथ नहीं रहा सकते. दयासुर ने जब यहाँ की सुरक्षा का जिम्मा लिया है तो वाओ अहा पास मैं hi रहेगा. और हम भी इस जगह के चारो और अपने निवेश िस्थान बनायेगे. आप दोनों जब भी आदेश देंगे आपके पुत्र आपके पास होंगे.

नकसुर की बात सुन कर दोनों बहुत खुश हुए. वो अपने bête की इतनी समझदारी वाली बातो से बहुत प्रभावित हो चुके थे.

डलासुर – सच में तुम सब दिव्या बालक हो. सभी बहुत समझदार हो. मैं बहुत खुश हु तुमसबको देख कर.

पतासुर – ये गन भी तो आपसे hi आया है पिताजी हम सब में. आपकी शक्ति और ज्ञान से hi हम सब ऐसे है.

डलासुर – पतासुर और भीमासुर तुम जनकल्याण का काम करोगे. और तुम दोनों को एक काम और करना है. दानवराज को खुश करने की सम्भोग किरिया को पुराण रूप दे कर उसे सच्चे तांत्रिको और दानव भक्तो तक पहुंचना है.

पतासुर और भीमासुर – जी पिता जी…

फिर सब ऐसे hi बात करते रहे और समय अपनी जाती से चलता रहा. समय के साथ ये 5 भाई अपने सभी काम अच्छे से करने लगे. डलासुर और दक्षणा भी अपना अधिक से अधिक समय डायन लगाने में लगाने लगे. पैर वो अपनी काम वाष्ण को पूरी तरह से नियंत्रित नहीं कर प् रहे थे. जब वाष्ण उनके काबू ने न होती तो सम्भोग करते. पैर ऐसा करने से ये फिर और बड़कने लगते. डायन लगने में भी इनका मन नहीं लगता था. पैर जब सम्भोग क्रिया सुरु हुई. तब ये अपने आप को पूरी तरह संतुष्ट महसूस करते. पैर ये भी कुछ दिनों के लिए hi होता था. पैर इस दुराण ये अपना पूरा समय डायन लगाने में hi लगते थे. सम्भोग क्रिया से तांत्रिक इनसे कुछ पावर प् कर कभी अच्छे तो कभी बुरे काम करते. पैर ये सब भीमासुर और पतासुर संभल लेते थे. धिरे -2 इन दोनों के देव रूप जागृत हो गए. और ये अपने आप को 2 रूपों में विभाजित कर लेते थे. पैर अभी दानव रूप और देव रूप दोनों सामान बलशाली थे. समय के साथ इन दोनों ने अपने आप को ियन्त्रित करना सिख hi लिया. पैर एक कामवाशना इनके मन में सदा hi रहती थी. जो कभी न ख़तम होने वाली थी.

समय बीतता गया और कई 100 साल बीत गए. पैर इनकी वो वाष्ण की चिंगारी कभी न शांत हुयी. पैर अब ये दोनों खुद पैर इतना नियंतरण कर चुके थे की अब सम्भोग बंद हो चुक्का था. और वक्त गुजरता जा रहा था. देखते hi देखते कई शताब्दी बीत गयी. हर जुजरते हुए वक्त से ये दोनों चिंतित होने लगे.. पता नहीं कब तक ये तड़प और ये आग साहनी होगी और कब हमारी मुक्ति होगी. ये सोचते हुए hi उनका समय निकल रहा था. इनके बेटो ने भी कभी विवहा नहीं किया. वो अपने माँ बाप के कारन दर गए थे विवहा से.

एक दिन जब दोनों बहुत हताश थे. तब दक्षसूरी ने कहा – आप तो भविष्य देख सकते है तो क्यों नहीं देख लेते की हम दोनों के भविष्य में कब तक ऐसी hi जिंदगी लिखी है. कब हम इस श्राप से मुक्त होंगे??

डलासुर – नहीं रानी हम ऐसा नहीं कर सकते. जब त्रिदेव ने हमको ये शक्ति दी थी तब hi कहा दिया था की जब तक संसारी हो इस शक्ति का उपयोग नहीं करना. कियोकि जो भविष्य देख कर उसे बदलने की कोसिस करता है तो ये नियति ने छेद चढ़ कहलाती है. और नियति से छेद चढ़ यानि विदी के विद्वान में दखल. और इसके हमरा भयानक परिदम होते है.

दक्षसूरी – तो मैं कब आपको कुछ बदलने के लिए कहा रही हु. जो होना है वो तो होगा hi. पैर हम यदि ये देख ले की हमारी मुक्ति कब और कैसे होनी है तो काम से काम ये तो पता होगा की कब तक ऐसे hi जीना है.

डलासुर बहुत समजते है. कहते है की यदि भविष्य में कुछ ऐसा हुआ की जो हम कभी सोच भी नहीं सकते हो तो समय आने पैर अपने कर्मो से उसे बदल सकते है. भविष्य कर्मो से बदला जा सकता है पैर उसे देख कर उसे बदलना महा पाप है. पैर दक्षसूरी आज डलासुर की एक नहीं सुनती. इतने सालो के तड़फ जो रही थी.

तब डलासुर को hi दक्षसूरी की बात मान कर भविष्य देखने का सोचते है. और वो ये सब दक्षसूरी को भी दिखते है. जैसे hi दोनों अपने अंत को देखते है तो दक्षसूरी बहुत घवरा जाती है. और रोने लगती है. डलासुर तो फिर भी शांत थे. पैर दक्षसूरी का हाल बहुत ख़राब था.

दक्षसूरी – नहीं देव मैं ऐसा कभी नहीं होने दूगी. चाहे मुझको कभी भी मुक्ति न मिले पैर ये सब मैं नहीं सहा शक्ति. ये कैसे हो सकता है. इससे अच्छा तो इस तड़प के साथ जीना है. मेने सब जान लिया है तो अब मैं सब कुछ बदल दूगी.

दक्षसूरी ने यही कहा था की वह पैर नियति यानि माँ पारवती का वो रूप जो नियति कहा लता है, वो प्रकट होगा. दक्षसूरी तो उनके रूप को देख भी नहीं प् रही थी. डलासुर तो पहले भी माँ से वर ले चुक्का था तो उसको कोई प्रॉब्लम नहीं हुयी उनके दर्शन करने में.

नियति – दक्षसूरी तुम ऐसा कुछ नहीं करोगी. यदि तुमने भविष्य देखने की जिद न की होती तो शायद तुम दोनों के कर्म फल सब बदल देते. पैर अब तुम दोनों किसी सन्याशी की तरह रहोगे. आने वाले समय में तुम कोई भी अपनी और से प्रतिक्रिया नहीं करोगे. यदि तुमने नियति के नियमो से कोई भी छेद चढ़ की तो तुम खुद उसके लिए जिम्मेदार होंगे.

(भाइयो यहाँ इन दोनों ने ऐसा क्या देखा की दोनों अपनी मुक्ति की इच्छा भी ख़तम कर बैठे. ये आप सबको भी फ्यूचर में hi पता चलेगा. अभी नहीं बता सकता नहीं तो नियति नाराज हो jayegi….:lol1::lol1::lol1::lol1:)

इसके बाद उन दोनों ने सभी कामो से सच ने सन्याश ले लिया. किसी भी काम में कोई भी हस्तक्षेप नहीं करते. उन दोनों ने अपने लिए जैसे खुद hi कुछ नियम बना लिए. और नियमो का hi पालन करते हुए जीवन जीने लगे. उनको जहा भी लगता की नियति ये काम उनसे करवाना चाहती है बस वो hi काम वो करते. अब वाष्ण की चिंगारी उनके मन को इतना परेशां नहीं करती थी जितना की भविष्य में होने वाली घटना उनके दिल को तड़फा जाती थी.

समय बीतता गया और फिर त्रिकाल ने डलासुर जी को बंदी बना लिया. वो उसके मंसूबो को जान चुके थे. पैर फिर भी बिना किसी विरोद के उसके कैद में चले गए नहीं तो त्रिकाल जैसा डलासुर को बंदी बना ले और उनके 5 पुत्र और उनकी पत्नी हाथ पैर हाथ रख कर बैठे रहे ऐसा कैसे हो सकता है. नियति माँ के आदेश को न मन्ना डलासुर के वश में नहीं था. इसलिए ये दोनों अपने उप्पेर हो रही घटनाओ में भी बिना कुछ किये उनको अपनाते चले गए. न कोई विरोद और न कोई कोसिस कुछ भी बदलने की.

बैक इस एन्ड..
 
डिअर फ्रेंड्स....

मैं अपने हिसाब से सभी राज खोल चूका हु. केवल गुरु एक राज है. गुरु कोण है ये बचा है. यदि आप लोगो को लगता हो की और भी कुछ छूट रहा है तो प्लीज बताये. कोई भी ऐसी बात जो समाज में न आयी हो. स्टोरी में क्लियर न HO.AP बोल सकते है.....

पैर एक बहुत बड़ा सवाल है. की ऐसा क्या होने वाला है की जो दस माँ और डलासुर जी को मंजूर नहीं है. वो कई 100 सालो से मुक्ति के लिए तडफने वाले आज मुक्ति न मांग कर उसको होने से रोकना चाहते है.........

इस राज को जानने के लिए साथ बने रहिये............

थैंक्स
 
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