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पब ने गुरु को अपने पास बुलाया और अपनी गोद में बेथ कर बोलै – मेरी गुरुपित, मेरी पहली दरमपत्नी आज आपकी बरी है. आज हमारा मिलान होगा. न जाने कब से मैं इस दिन का इन्तजार कर रहा था. पैर आज मुझको मेरी गुरुपित मिल जाएगी.. मिलेगी न??
गुरु – हम्म
पब – ये क्या रुखा रुखा हम्म्म… क्या तुम ये नहीं चाहती??
गुरु – नहीं मेने भी इस दिन का सालो से इतंजार किया है तो आज जब वो दिन आ गया है तो दिल में एक बेचैनी सी है. पता नहीं क्यों पर कुछ चूब रहा है दिल में…
पब – गुरु क्या आज मैं तुमसे कुछ मांगू??
गुरु – आप कहा कर तो देखिये..
पब – गुरुपित आज तुम मुझको अपने सरे गम दे दो.. मुझको अपना वो घायल दिल दिखा दो जिस पैर आज तक किसी ने मलहम नहीं लगाया केवल वक्त ने उसको धक् दिया और अंदर hi अंदर वो घाव नासूर बन कर तुम्हारे दिल में चुभ रहे है..
पब की बात सुन कर गुरु रो पड़ी और पब से एक बच्ची की तरह चिपक गयी. आज पहली बार था जब गुरु इस तरह से रोई थी किसी के सामने. पब ने भी उसको चुप करवाने की कोई कोसिस न की. जब बहुत देर तक गुरु रोटी रही और पब उसके बालो पैर हाथ फेर कर उसे अपने से चुपकाये बैठा रहा.
जब गुरु का रोना बंद हुआ तब पब बोलै – जितना रोना है आज रो लो गुरुपित कियोकि मैं आज के बाद इन आखों में कभी आशु देखना नहीं चाहुगा….
बहुत देर तक गुरु और पब एक दूसरे से जुड़े बैठे रहे तब तक वो सब भी फ्रेश हो कर आ गए. एक बार एरिका ने गुरु की तरफ मुँह करके कुछ बोलना चाहा तो सविता ने इशारे से उसे मन कर दिया. और कामिनी डेरे से बोली – उनको कोई डिस्टर्बे मत करना आज पहली बार दीदी अपने दुःख को बहार लायी है. और ये hi दीदी के बर्षो के दर्द को ख़तम कर सकते है.. सच में ये बहुत अच्छे है एक hi रात में इन्होने इस कामिनी को पूरा बदल दिया. ये कामिनी इनके प्यार में दुब कर अपना आज तक का सभी गम भूल चुकी है और जो तुम्हारे सामने कामिनी है वो केवल पब की देवानी बैठी है जिसकी सोच पब ने सुरु और उन पैर hi ख़तम है…….
ीदार धिरे से पब – गुरु चल रूम में चलते है आज मुझको अपने गुरु का हर दर्द देखना है. जानती हो गुरु मैं जाने कब से ये करना चाहता था पैर तुम्हारे जखमो पैर प्यार का लेप लगाने के लिए मैं तैयार नहीं था इसलिए आज तक इस दिन का इन्तजार करता रहा पैर आज मैं अपनी गुरुपित के हर दर्द को देखना चाहता हु. उसके हर जखम पैर प्यार का मलहम लगाना चाहता हु…
गुरु – पहले ब्रेकफास्ट फिर सब…
पब – वादा…???
गुरु – पक्का वादा … मैं भी तो कब से इस इन्तजार में हु की कोई मेरा भी हो जो मेरे इन जख्मो पैर अपने प्यार का मलहम लगाए…..
फिर ये दोनों भी सभी के साथ बर्फ करने आते है और सभी बर्फ करके लग जाते है अपने अपने काम पर. और गुरु और पब चले जाते है पब के रूम में. पब गुरु को बीएड पर अपनी गोद में बैठा लेता है और फिर गुरु पब को एक किश करके बोलना सुरु करती है.
गुरु – आज मैं तुमको बताने जा रही हु ये मेरे अलावा कोई नहीं जनता. ये मेरी जिंदगी की वो कड़वी यादे है जिनको मेने अपने सीने में दफना किया हुआ है.
गुरु की कहानी गुरु की जुबानी –
मैं अपने माँ बाप के साथ दिल्ली से करीब 40 कम दूर एक छोटे से गाओं राजगंज में रहती थी. दिल्ली पास में था तो गाओं की तैराकी भी हो राखी थी. मेरे 2 छोटे भाई भी थे. मैं बचपन से hi संलि थी. पैर नयननक्श ठीक थे. पैर मेरी जिनगी की बर्बादी तो मेरे बचपन से hi सुरु हो गयी थी. जब मैं केवल 6 साल की थी तब मुझको फालिश का अटैक पड़ा और मेरा मुँह टेड़ा हो गया. माँ बाप में बहुत दवा करवाई तो बोलने की परेशानी तो दूर हो गयी पैर मुँह में थोड़ा टेढ़ापन आ चुक्का था. फिर जब मैं 8 साल के करीब थी तब मुझको माता हो गयी. और मेरे पुरे सरीर पैर डेन हो गए. फिर से माँ बाप ने दवा करवाई, मैं ठीक तो हो गयी पैर दानो के निशान मेरे पुरे सरीर पैर रहा गए. अब जो भी मुझको देखता नफरत की नजर से hi देखता. देखने में में बहुत बदसुररात हो चुकी थी. गाओं में सभी बच्चे मुझको डायन, भूतनी, चुड़ैल, और न जाने क्या क्या कहा कर चिढ़ाने लगे जो मेरी सहेलिया थी वो भी मुझसे नफरत करने लगी कोई मेरे पास बैठना पसंद नहीं करता था. हर दिन के साथ में लोगो के लिए मज़ाक का के जरिया बन गयी. उसका एक कारन ये भी था की मेरे उप्पेर इलाज में पिताजी ने इतने रस. लगा दिए थे की उनकी हालत अब खस्ता हो गयी थी. मैं अपनी माँ की लाड़ली थी तो माँ की वजह से hi पिताजी ने मेरा इलाज करवाया नहीं तो वो तो मुझको मर hi जाए देते. इतनी काम उम्र में सभी की नफरत झेलने से बचने के लिए मेने घर से निकलना hi बंद कर दिया सरे दिन माँ के साथ काम करती और अपने दोनों छोटे भाइयो का धयान रखती. मेरी दुनिया इन 3 लोगो के बिच hi रहा गयी थी. वक्त के साथ भाई बड़े हुए तो उन्होंने भी मुझसे कन्नी काटना सुरु कर दिया ये देख कर मेरा दिल बहुत रोटा. अक्सर रात के डेरे में मैं रोटी रहती.
शायद भगवन को भी मुज पैर दया आ गयी तो उन्होंने मेरे लिए सन्ति भाभी को भेज दिया. तब मैं 12 साल की थी जब शांति भाभी हमारे पडोसी पंडित जी के बड़े लड़के के साथ शादी करके यहाँ आयी थी. शादी किध हम में भी मैं न गयी पैर अपने भाई और माँ बाप से सुना की शांति भाभी बहुत खूबसूरत है तो उनको देखने की दिल में एक इच्छा सी हुयी और मैं अपने गेट से सालो बाद निकल कर पंडित जी के गेट पैर कड़ी हो गयी. तभी भाभी भी मेरे सामने से गुजरी तो उनको देख कर मैं देखती hi रहा गयी. कितनी सुन्दर थी वो 19 साल की एक जवानी से भरपूर 16 सिंगर में दूध जैसी गोली लड़की को देख कर में सूद बड hi भूल गयी. मैं उनके गेट पैर कड़ी ये सोचने लगी की क्या मैं भी उनके जैसी हो सकती हु. पैर तभी मुझको उनकी मदुर आवाज कानो में पड़ी – कोण हो तुम, किसी से मिलना है क्या??
ये पहली बार था की किसी ने मुझसे सीडी मुँह बात की हो जब से मेरा मु टेड़ा हुआ था तब से लोगो ने मेरे लिए मुँह टेड़े कर लिए थे. एक बार तो मैं दर गयी पैर फिर उनकी प्यार भरी बातो ने मुझको खुश कर दिया उस दिन मैं इतनी खुश थी की जैसे मेरे आज दुनिया जीत ली हो एक खूबसूरत लड़की ने बात करके मुझको बहुत ख़ुशी हो रही थी. फिर जब भी मौका मिलता मैं उनसे बात करती. उन्होंने मुझको बहुत संजय दुनिया के सामने खड़े होने की टक्कट दी. उनकी एक बात मेरे दिल में चाप गयी “ सरीर से खूबसूरत होने से क्या होता है खूबसूरत बनना है तो दिल से खूबसूरत बनो. सदा दुसरो के काम आओ”
उनसे मिलने के बाद तो मेरी दुनिया मैं केवल 2 लोग hi रह गे ीक शांति भाभी और एक मेरी माँ. वो एक दिन मुझको गुरु सत्यानंद जी के आश्रम भी ले गयी और फिर मैं वह से जुड़ती hi गयी. समय के साथ मेरा जुड़ाव आश्रम को भाभी से बढ़ता hi गया. अब मुजमे दुनिया से लड़ने की हिम्मत आ चुकी थी. कोई कुछ भी कहता अब मैं रोटी नहीं थी बस उसको अनसुना करके अपने में hi मस्त रहती. इस बिच भाभी को एक लड़का हुआ. और वो होने के कुछ दिन बाद hi मार गया. तो भाभी टूट गयी उस टाइम मेने भाभी को सहारा दिया. उसके 1 साल बाद hi भाभी को फिर एक लड़की हुयी वो भी उनके जैसी hi सुन्दर थी. धिरे धिरे वो बड़ी होने लगी और मैं जवान होने लगी. भाभी ने अपनी बेटी का नाम अल्पना रखा था. बीतते वक्त के साथ भाभी 2 बार और पेट से हुयी पैर उनका बच्चा पेट मैं hi ख़तम हो जाता. भैया के 2 छोटे भाई थे और 1 बहन सभी की सधी हो गयी थी. उन सभी को 2-3 बच्चे भी हो गए. जब भाभी को अल्पना के अलावा कोई बच्चा नहीं हुआ तो उनके घर वालो ने उनको भी अलग कर दिया. भैया भाभी से बहुत प्यार करते थे उन्होंने अपनी पत्नी को चढ़ने की जगह माँ बाप को छोड़ कर अपनी अलग दुनिया बसा ली. तो मेरा उनके यहाँ जाना भी बाद गया तो गाओं में ये हवा हो गयी की भाभी मुझसे मिलती है इन लिए उनको और कोई औलाद नहीं हो रही. जब मेने ये सुना तो मेने उनके यहाँ जाना बंद कर दिया. पैर भाभी ने फिर भी मेरा साथ नहीं छोड़ा और मुझसे मिलने खुद आने लगी.
अभी मैं 18 साल की हुयी थी की मेरे बाप में मुझको घर से विदा कर दिया. न तो मेरी पसंद पूछी गयी और न ये पूछा गया की मैं शादी करना चाहती हु या नहीं… बस कुछ रिश्तेदार बुला कर कर दिया विदा. मेरी सुसराल दिल्ली में ***** कॉलोनी में थी. पैर फिर भी मैं खुश थी की चलो अब मुझको एक प्यार करने वाला मिलेगा. वो समजेगा मुझको. जिंदगी को एक नए सिरे से सुरु करेंगे.. पैर सुहागरात की सेज पैर hi मेरा सपना टूट गया. एक 30 साल का कला आदमी फुल नशे में मेरे पास आया और मेरी पर बेथ कर मुझको हवस भरी नजरो से देखने लगा. मेने घुगट किया हुआ था. जैसे hi उसने मेरा घुगट हटाया पहले तो उसने अपनी आँखें फेर ली जैसे की अक्सर सभी करते थे मेरे साथ फिर बोलै – हैट साली पूरा नशा hi उतर दिया. साला पैसो के चक्कर में किस चुड़ैल को अपने घर ले आया मैं.. ाआट्ठ्हुउउउउ….
वो मेरे उप्पेर ठु कर चला गया मेरे सपने मेरे अरमान मेरी आने वाली जिंदगी के पालो में थूक कर वो चला गया और मैं केवल अपनी किस्मत पैर रोटी रही. रट रट कब सुबह हो गयी पता भी नहीं चला. मेरी बाद किस्मती हमेशा मेरे साथ रही मेरी बदसूरती बन कर. सुबह होते hi मेरे पति कमल की माँ ने मुज पैर होकुम चलने सुरु कर दिए. हर बीतते दिन के साथ मेरे पति और उनकी माँ का जुर्म बढ़ता गया. और मुझको लोगो के घरो में choka-bartan के काम पैर लगा दिया. पहले अपने घर का पूरा काम करती फिर दुसरो के घरो में काम करने जाती. फिर आते hi फिर से घर के कामो में लग जाती. और इसके बदले में मुझको मेरे पति के घुसे और लात hi मिलती थी. और जब उसकी माँ का मन करता वो भी बिना बात के बजा जाती थी. कामके बदले मिलने वाले सभी पैसे भी मेरे पास नहीं rehte.maar और काम ये hi मेरी जिंदगी बन गयी थी. मेरी शादी को 6 महीने hi हुए थे की मेरी माँ भी चल बसी. अब मेरा दुःख पूछने वाला भी कोई नहीं था. ऐसे hi जेए जा रही थी. पैर इस बिच मेने अपना एक नियम बना लिया गुरु सत्यानंद जी के आश्रम जाने का. एक वो hi ऐसी जगह थी जहा मुझको मेरे दुखो में मुक्ति मिलती थी. कुछ पालो के लिए hi सही पैर मैं भी जीवन में शांति महसूस करती. वह मैं पिछले 5-6 सालो से जा रही थी और गुरूजी की मुज पैर कृपा भी हुयी थी. तुमको पता है जब मैं 4 या 5वि बार भाभी के साथ आश्रम गयी थी तब गुरु सत्यानंद जी ने मुझको दुखी देख कर कहा था – तुझको एक बहुत बड़ा कार्य करना है मेरी बच्ची.. कठनाइयां सदा तेरे साथ रहेगी. पैर तू वो सब पायेगी जो तू चाहती है. बस तू कभी हिम्मत मत हारना कियोकि तुझको तो उसकी हिम्मत बनना है जिसकी हिम्मत दुनिया का भविष्य तय करेगी.”
पब ने गुरु को अपने पास बुलाया और अपनी गोद में बेथ कर बोलै – मेरी गुरुपित, मेरी पहली दरमपत्नी आज आपकी बरी है. आज हमारा मिलान होगा. न जाने कब से मैं इस दिन का इन्तजार कर रहा था. पैर आज मुझको मेरी गुरुपित मिल जाएगी.. मिलेगी न??
गुरु – हम्म
पब – ये क्या रुखा रुखा हम्म्म… क्या तुम ये नहीं चाहती??
गुरु – नहीं मेने भी इस दिन का सालो से इतंजार किया है तो आज जब वो दिन आ गया है तो दिल में एक बेचैनी सी है. पता नहीं क्यों पर कुछ चूब रहा है दिल में…
पब – गुरु क्या आज मैं तुमसे कुछ मांगू??
गुरु – आप कहा कर तो देखिये..
पब – गुरुपित आज तुम मुझको अपने सरे गम दे दो.. मुझको अपना वो घायल दिल दिखा दो जिस पैर आज तक किसी ने मलहम नहीं लगाया केवल वक्त ने उसको धक् दिया और अंदर hi अंदर वो घाव नासूर बन कर तुम्हारे दिल में चुभ रहे है..
पब की बात सुन कर गुरु रो पड़ी और पब से एक बच्ची की तरह चिपक गयी. आज पहली बार था जब गुरु इस तरह से रोई थी किसी के सामने. पब ने भी उसको चुप करवाने की कोई कोसिस न की. जब बहुत देर तक गुरु रोटी रही और पब उसके बालो पैर हाथ फेर कर उसे अपने से चुपकाये बैठा रहा.
जब गुरु का रोना बंद हुआ तब पब बोलै – जितना रोना है आज रो लो गुरुपित कियोकि मैं आज के बाद इन आखों में कभी आशु देखना नहीं चाहुगा….
बहुत देर तक गुरु और पब एक दूसरे से जुड़े बैठे रहे तब तक वो सब भी फ्रेश हो कर आ गए. एक बार एरिका ने गुरु की तरफ मुँह करके कुछ बोलना चाहा तो सविता ने इशारे से उसे मन कर दिया. और कामिनी डेरे से बोली – उनको कोई डिस्टर्बे मत करना आज पहली बार दीदी अपने दुःख को बहार लायी है. और ये hi दीदी के बर्षो के दर्द को ख़तम कर सकते है.. सच में ये बहुत अच्छे है एक hi रात में इन्होने इस कामिनी को पूरा बदल दिया. ये कामिनी इनके प्यार में दुब कर अपना आज तक का सभी गम भूल चुकी है और जो तुम्हारे सामने कामिनी है वो केवल पब की देवानी बैठी है जिसकी सोच पब ने सुरु और उन पैर hi ख़तम है…….
ीदार धिरे से पब – गुरु चल रूम में चलते है आज मुझको अपने गुरु का हर दर्द देखना है. जानती हो गुरु मैं जाने कब से ये करना चाहता था पैर तुम्हारे जखमो पैर प्यार का लेप लगाने के लिए मैं तैयार नहीं था इसलिए आज तक इस दिन का इन्तजार करता रहा पैर आज मैं अपनी गुरुपित के हर दर्द को देखना चाहता हु. उसके हर जखम पैर प्यार का मलहम लगाना चाहता हु…
गुरु – पहले ब्रेकफास्ट फिर सब…
पब – वादा…???
गुरु – पक्का वादा … मैं भी तो कब से इस इन्तजार में हु की कोई मेरा भी हो जो मेरे इन जख्मो पैर अपने प्यार का मलहम लगाए…..
फिर ये दोनों भी सभी के साथ बर्फ करने आते है और सभी बर्फ करके लग जाते है अपने अपने काम पर. और गुरु और पब चले जाते है पब के रूम में. पब गुरु को बीएड पर अपनी गोद में बैठा लेता है और फिर गुरु पब को एक किश करके बोलना सुरु करती है.
गुरु – आज मैं तुमको बताने जा रही हु ये मेरे अलावा कोई नहीं जनता. ये मेरी जिंदगी की वो कड़वी यादे है जिनको मेने अपने सीने में दफना किया हुआ है.
गुरु की कहानी गुरु की जुबानी –
मैं अपने माँ बाप के साथ दिल्ली से करीब 40 कम दूर एक छोटे से गाओं राजगंज में रहती थी. दिल्ली पास में था तो गाओं की तैराकी भी हो राखी थी. मेरे 2 छोटे भाई भी थे. मैं बचपन से hi संलि थी. पैर नयननक्श ठीक थे. पैर मेरी जिनगी की बर्बादी तो मेरे बचपन से hi सुरु हो गयी थी. जब मैं केवल 6 साल की थी तब मुझको फालिश का अटैक पड़ा और मेरा मुँह टेड़ा हो गया. माँ बाप में बहुत दवा करवाई तो बोलने की परेशानी तो दूर हो गयी पैर मुँह में थोड़ा टेढ़ापन आ चुक्का था. फिर जब मैं 8 साल के करीब थी तब मुझको माता हो गयी. और मेरे पुरे सरीर पैर डेन हो गए. फिर से माँ बाप ने दवा करवाई, मैं ठीक तो हो गयी पैर दानो के निशान मेरे पुरे सरीर पैर रहा गए. अब जो भी मुझको देखता नफरत की नजर से hi देखता. देखने में में बहुत बदसुररात हो चुकी थी. गाओं में सभी बच्चे मुझको डायन, भूतनी, चुड़ैल, और न जाने क्या क्या कहा कर चिढ़ाने लगे जो मेरी सहेलिया थी वो भी मुझसे नफरत करने लगी कोई मेरे पास बैठना पसंद नहीं करता था. हर दिन के साथ में लोगो के लिए मज़ाक का के जरिया बन गयी. उसका एक कारन ये भी था की मेरे उप्पेर इलाज में पिताजी ने इतने रस. लगा दिए थे की उनकी हालत अब खस्ता हो गयी थी. मैं अपनी माँ की लाड़ली थी तो माँ की वजह से hi पिताजी ने मेरा इलाज करवाया नहीं तो वो तो मुझको मर hi जाए देते. इतनी काम उम्र में सभी की नफरत झेलने से बचने के लिए मेने घर से निकलना hi बंद कर दिया सरे दिन माँ के साथ काम करती और अपने दोनों छोटे भाइयो का धयान रखती. मेरी दुनिया इन 3 लोगो के बिच hi रहा गयी थी. वक्त के साथ भाई बड़े हुए तो उन्होंने भी मुझसे कन्नी काटना सुरु कर दिया ये देख कर मेरा दिल बहुत रोटा. अक्सर रात के डेरे में मैं रोटी रहती.
शायद भगवन को भी मुज पैर दया आ गयी तो उन्होंने मेरे लिए सन्ति भाभी को भेज दिया. तब मैं 12 साल की थी जब शांति भाभी हमारे पडोसी पंडित जी के बड़े लड़के के साथ शादी करके यहाँ आयी थी. शादी किध हम में भी मैं न गयी पैर अपने भाई और माँ बाप से सुना की शांति भाभी बहुत खूबसूरत है तो उनको देखने की दिल में एक इच्छा सी हुयी और मैं अपने गेट से सालो बाद निकल कर पंडित जी के गेट पैर कड़ी हो गयी. तभी भाभी भी मेरे सामने से गुजरी तो उनको देख कर मैं देखती hi रहा गयी. कितनी सुन्दर थी वो 19 साल की एक जवानी से भरपूर 16 सिंगर में दूध जैसी गोली लड़की को देख कर में सूद बड hi भूल गयी. मैं उनके गेट पैर कड़ी ये सोचने लगी की क्या मैं भी उनके जैसी हो सकती हु. पैर तभी मुझको उनकी मदुर आवाज कानो में पड़ी – कोण हो तुम, किसी से मिलना है क्या??
ये पहली बार था की किसी ने मुझसे सीडी मुँह बात की हो जब से मेरा मु टेड़ा हुआ था तब से लोगो ने मेरे लिए मुँह टेड़े कर लिए थे. एक बार तो मैं दर गयी पैर फिर उनकी प्यार भरी बातो ने मुझको खुश कर दिया उस दिन मैं इतनी खुश थी की जैसे मेरे आज दुनिया जीत ली हो एक खूबसूरत लड़की ने बात करके मुझको बहुत ख़ुशी हो रही थी. फिर जब भी मौका मिलता मैं उनसे बात करती. उन्होंने मुझको बहुत संजय दुनिया के सामने खड़े होने की टक्कट दी. उनकी एक बात मेरे दिल में चाप गयी “ सरीर से खूबसूरत होने से क्या होता है खूबसूरत बनना है तो दिल से खूबसूरत बनो. सदा दुसरो के काम आओ”
उनसे मिलने के बाद तो मेरी दुनिया मैं केवल 2 लोग hi रह गे ीक शांति भाभी और एक मेरी माँ. वो एक दिन मुझको गुरु सत्यानंद जी के आश्रम भी ले गयी और फिर मैं वह से जुड़ती hi गयी. समय के साथ मेरा जुड़ाव आश्रम को भाभी से बढ़ता hi गया. अब मुजमे दुनिया से लड़ने की हिम्मत आ चुकी थी. कोई कुछ भी कहता अब मैं रोटी नहीं थी बस उसको अनसुना करके अपने में hi मस्त रहती. इस बिच भाभी को एक लड़का हुआ. और वो होने के कुछ दिन बाद hi मार गया. तो भाभी टूट गयी उस टाइम मेने भाभी को सहारा दिया. उसके 1 साल बाद hi भाभी को फिर एक लड़की हुयी वो भी उनके जैसी hi सुन्दर थी. धिरे धिरे वो बड़ी होने लगी और मैं जवान होने लगी. भाभी ने अपनी बेटी का नाम अल्पना रखा था. बीतते वक्त के साथ भाभी 2 बार और पेट से हुयी पैर उनका बच्चा पेट मैं hi ख़तम हो जाता. भैया के 2 छोटे भाई थे और 1 बहन सभी की सधी हो गयी थी. उन सभी को 2-3 बच्चे भी हो गए. जब भाभी को अल्पना के अलावा कोई बच्चा नहीं हुआ तो उनके घर वालो ने उनको भी अलग कर दिया. भैया भाभी से बहुत प्यार करते थे उन्होंने अपनी पत्नी को चढ़ने की जगह माँ बाप को छोड़ कर अपनी अलग दुनिया बसा ली. तो मेरा उनके यहाँ जाना भी बाद गया तो गाओं में ये हवा हो गयी की भाभी मुझसे मिलती है इन लिए उनको और कोई औलाद नहीं हो रही. जब मेने ये सुना तो मेने उनके यहाँ जाना बंद कर दिया. पैर भाभी ने फिर भी मेरा साथ नहीं छोड़ा और मुझसे मिलने खुद आने लगी.
अभी मैं 18 साल की हुयी थी की मेरे बाप में मुझको घर से विदा कर दिया. न तो मेरी पसंद पूछी गयी और न ये पूछा गया की मैं शादी करना चाहती हु या नहीं… बस कुछ रिश्तेदार बुला कर कर दिया विदा. मेरी सुसराल दिल्ली में ***** कॉलोनी में थी. पैर फिर भी मैं खुश थी की चलो अब मुझको एक प्यार करने वाला मिलेगा. वो समजेगा मुझको. जिंदगी को एक नए सिरे से सुरु करेंगे.. पैर सुहागरात की सेज पैर hi मेरा सपना टूट गया. एक 30 साल का कला आदमी फुल नशे में मेरे पास आया और मेरी पर बेथ कर मुझको हवस भरी नजरो से देखने लगा. मेने घुगट किया हुआ था. जैसे hi उसने मेरा घुगट हटाया पहले तो उसने अपनी आँखें फेर ली जैसे की अक्सर सभी करते थे मेरे साथ फिर बोलै – हैट साली पूरा नशा hi उतर दिया. साला पैसो के चक्कर में किस चुड़ैल को अपने घर ले आया मैं.. ाआट्ठ्हुउउउउ….
वो मेरे उप्पेर ठु कर चला गया मेरे सपने मेरे अरमान मेरी आने वाली जिंदगी के पालो में थूक कर वो चला गया और मैं केवल अपनी किस्मत पैर रोटी रही. रट रट कब सुबह हो गयी पता भी नहीं चला. मेरी बाद किस्मती हमेशा मेरे साथ रही मेरी बदसूरती बन कर. सुबह होते hi मेरे पति कमल की माँ ने मुज पैर होकुम चलने सुरु कर दिए. हर बीतते दिन के साथ मेरे पति और उनकी माँ का जुर्म बढ़ता गया. और मुझको लोगो के घरो में choka-bartan के काम पैर लगा दिया. पहले अपने घर का पूरा काम करती फिर दुसरो के घरो में काम करने जाती. फिर आते hi फिर से घर के कामो में लग जाती. और इसके बदले में मुझको मेरे पति के घुसे और लात hi मिलती थी. और जब उसकी माँ का मन करता वो भी बिना बात के बजा जाती थी. कामके बदले मिलने वाले सभी पैसे भी मेरे पास नहीं rehte.maar और काम ये hi मेरी जिंदगी बन गयी थी. मेरी शादी को 6 महीने hi हुए थे की मेरी माँ भी चल बसी. अब मेरा दुःख पूछने वाला भी कोई नहीं था. ऐसे hi जेए जा रही थी. पैर इस बिच मेने अपना एक नियम बना लिया गुरु सत्यानंद जी के आश्रम जाने का. एक वो hi ऐसी जगह थी जहा मुझको मेरे दुखो में मुक्ति मिलती थी. कुछ पालो के लिए hi सही पैर मैं भी जीवन में शांति महसूस करती. वह मैं पिछले 5-6 सालो से जा रही थी और गुरूजी की मुज पैर कृपा भी हुयी थी. तुमको पता है जब मैं 4 या 5वि बार भाभी के साथ आश्रम गयी थी तब गुरु सत्यानंद जी ने मुझको दुखी देख कर कहा था – तुझको एक बहुत बड़ा कार्य करना है मेरी बच्ची.. कठनाइयां सदा तेरे साथ रहेगी. पैर तू वो सब पायेगी जो तू चाहती है. बस तू कभी हिम्मत मत हारना कियोकि तुझको तो उसकी हिम्मत बनना है जिसकी हिम्मत दुनिया का भविष्य तय करेगी.”