भैया के मोटे गन्ने का मज़ा

बहुत मन करता था किसी दिन अरविन्द के साथ, गन्ने के खेत में, दिन दहाड़े,...
लेकिन सब ज्यादा किस्से सुनाती थीं चमेलिया और उसके टोले वाली वाली।
रोपनी के बाद से चमेलिया से गितवा की पक्की दोस्ती हो गयी थी, आखिर दोनों की झिल्ली अरविन्द ने फाड़ी थी,.. और उस टोली में फुलवा की ननदिया,... कुछ चमेलिया की साथ की,... और वो सब तो ऐसे ऐसे किस्से रोज सुनाती थीं की गीता की बुर लासा हो जाती थी कई तो इसमें दिन में दो तीन बार गन्ने के खेत में टांग फैला के, दिन में खेत काम करने जातीं तो कोई बबउआने वाला गन्ने के खेत में खींच लेता,

और शाम को किसी यार से मिलना होता तो, वो भी गन्ने के खेत में बुलाता और फिर दो बार से कम खूब रगड़ रगड़ के,...
और वो सब गीता को खूब उकसाती भी थीं,..
अरे जब तक दिन दहाड़े यार से गन्ने के खेत में न चुदवाया,... फिर तोहार तो यार भी है सगा भाई भी है तू तो एकदमे,...
और ये सब सुन के गीता की बिल में ऐसे मोटे मोटे चींटे काटते,... और जब से उसके भाई अरविन्द ने उसे आम की बाग़ में जबरदस्त खड़े खड़े चोदा था, तब से तो और,...
बस दो दिन बाद ही मौका मिल गया। माँ ने ही भेजा उसे,... गन्ने के खेत में और दस बार निहोरा भी किया, जल्दी कोई नहीं है लौटने की, आज बहुत दिन बाद थोड़ी धूप निकली है,... दो ढाई घंटे के बाद ही आना, थोड़ा घूम टहल के,... मैं भी तोहरे ग्वालिन भौजी के साथ बाजार जा रही हूँ, ढाई घंटे के बाद ही लौटूंगी।

बात ये थी की भाई उसका अरविन्द, सुबह मुंह अँधेरे निकल गया था खेत में कुछ काम था,... बिना कुछ खाये और तिझहरिया को ही लौटता,
तो माँ ने अरविन्द के के लिए ही खाना भेजा था, वैसे भी गाँव में काम के समय औरतें काम करने वालों के लिए दोपहर में कुछ कुछ ले कर जाती थीं। माँ ने गीता से दस बार कहा
तेरा भाई पागल है, उसे खाना देकर लौट आएगी तो वो काम के चक्कर में खाना भूल जाएगा और शाम को बर्तन लाना भी,... तो तू उसे अपने सामने, अपने हाथ से खिलाना,... और जब खा ले तो उसके बाद ही,... वैसे भी ढाई घंटे तक तो मैं भी नहीं हूँ।
बस गीता चल दी.
और अरविन्द वहीँ गन्ने के खेत में सामने ही मिल गया, धान के खेत से सटा जहाँ गीता दो दिन रोपनी के लिए गयी थी उसी खेत के पास, वही गन्ने का खेत जहाँ उसने फुलवा की ननदिया की फाड़ी थी,...

वही कुछ काम करने वालों को समझा रहा था,... और जो वो खेत में आता तो बस एक बनियान और छोटा सा लोवर पहन के, बस वही पहने,... सारी अखाड़े की कसरती मसल्स साफ़ साफ़ दिख रही थीं और गीता तो अपने मन की आँखों से लोवर के अंदर की मसल्स भी देख रही थी , पनिया रही थी.
आज गीता ने साड़ी एकदम कूल्हे के नीचे से और बहुत कस कस के बाँधी थी, जिससे उसके मटकते छोटे छोटे चूतड़ एकदम साफ़ दिख रहे थे, चोली तो दर्जिन भौजी ने सब ऐसी सिली थी की दोनों जोबना छलक के बाहर ही कूदते रहते थे, और ऊपर से गीता ने आँचल की बस एक रस्सी सी दोनों पहाड़ों के बीच , देख के ही अरविन्द की हालत खराब,... रोज ही तो अपनी बहना की चूँचियों को रगड़ता मसलता था, चूसता था, काटता था, फिर भी जब भी उन्हें चोली में बंद देखता था उसका हाथ खुजलाने लगता था,...

और आज तो रोज से भी ज्यादा मन कर रहा था बहन को पेलने का,...
ऊपर से गीता ने साफ़ साफ बोल दिया, ' मा ने बोला है की अपने सामने खिला के बर्तन ले आना और दो घंटे से पहले नहीं, वो भौजी के साथ बजार गयी हैं। "
बस, अरविन्द ने गीता का हाथ पकड़ा और बोला, चलो खेत में बैठ के खाते हैं और बहन का हाथ पकड़ के गन्ने के ऊँचे से खेत में धंस गया. गन्ने इतने ऊँचे की उनमें हाथी छुप जाए,...
अरविन्द ने अपनी बहन गीता का हाथ कस के पकड़ रखा था, और उसके हाथ को छूते ही गीता के बदन में एक सरसराहट सी दौड़ गयी, और बीस पच्चीस कदम भी वो अंदर नहीं घुसी होगी, उसने पीछे मुड़ के देखा,... और जहाँ से वो और अरविन्द अंदर घुसे थे, .. कुछ भी नहीं दिख रहा था सिर्फ गन्ने ऊँचे ऊँचे, अगल बगल भी कुछ नहीं, उनकी पत्तियां उसकी देह को सहरा रही थीं,रगड़ रही थी,
उसको चमेलिया की बात याद आ रही थी, गन्ने के खेतवा में घुसते खुदे मन करता है नाड़ा खोल दें, ढेरो किस्से जो गीता ने सुने थे अपनी सहेलियों से सब याद आ रहे थे, सोच सोच के उसकी बुर पनिया रही थी, बस,यही मन कर रहा था आज उसका भाई अरविन्द इसी खेत में उसे पटक कर चोद दे तो कल वो भी अपनी सहेलियों को किस्से सुनाएगी,...
और सौ डेढ़ सौ कदम अंदर घुसने के बाद, एक जगह दिखी जहाँ से लगता है २०-२५ गन्ने किसी ने तोड़ लिए हों,... थोड़ी सी खुली जगह, ... वहां पर गन्ने की सूखी पत्तियां, और मिट्टी,... अरविन्द कुछ सोचता, गीता ने झट पेटीकोट में खोंसी अपनी साड़ी खींच के उतार दी और वहीँ मिट्टी पे बिछाती हुयी बोली,
"ऐसे भैया बैठ और चल पहले चुप चाप खाना खा, आज मैंने बनाया है जैसा भी हो चुप चाप खा लेना और तारीफ़ भी करना। "
गीता अपनी सहेली की भौजी की बात कभी नहीं भूलती थी की पहल हमेशा लड़कियों को ही करनी पड़ती है वरना लड़के तो यही सोचते रहते हैं की बात की शुरआत कैसे करें,... और साड़ी इसलिए उसने खुद उतार दी।
पर उसका भाई अरविन्द भी कम खिलाड़ी नहीं था और उस दिन आम की बाग़ में चोदने में के बाद उस की धड़क खुल गयी थी, और इस गन्ने के खेत में उसने गाँव की दर्जनों लड़कियों की चोद के झिल्ली फाड़ी थी,...
उसने खींच के अपनी बहन को गोद में बिठा लिया। और गीता के नरम नरम चूतड़ों का टच पा के उसका खूंटा फनफनाने लगा,... और गीता भी कम बदमाश नहीं थी, वो अपने चूतड़ रगड़ रगड़ के और अरविन्द के मूसल को जगा रही थी। जैसे कुछ वो शरारत कर ही नहीं रही हो इस तरह से उसने खाने का डब्बा खोला और अपने हाथ से कौर बना के भाई के मुंह में और बोली,
" चुपचाप मेरे हाथ से खा लो, अपने हाथ से खा के हाथ गन्दा करोगे और फिर उसी हाथ से मुझे यहाँ वहां छुओगे। "
और जब गितवा ने खुद ही कह दिया, 'यहाँ वहां छुओगे' तो अरविन्द काहे रुकता।
गीता कभी अपने हाथ से कभी होंठों से उसे कौर खिलाती और अरविन्द के दोनों हाथ पहले तो चोली के ऊपर से बहन के जोबन का हाल चाल लेते रहते, फिर चोली उतर के जमीन पर बिखरी पसरी साड़ी के पास पहुंच गयी,... और बहन के दोनों उभार भाई के हाथों में,... क्या कस के रगड़ता मसलता था वो, कोई भी औरत पानी फेंक देती और गीता तो,...
उसकी भी बुर पनिया रही थी लेकिन वो अपने ढंग से बदला ले रही थी, चूतड़ों से कस कस के भाई के पगलाते मूसल को रगड़ रगड़ के,...
और भाई ने अगर उसकी चोली उतारी तो,... सावन से भादों दूबर,... उसने भी अरविन्द की बनियान उतार के फेंक दी, और अब भाई बहन दोनों टॉपलेस।
और अपनी छुटकी बहिनिया के छोटे जोबना देख के अरविन्द तो बौरा गया,... खाना तो कब का ख़त्म हो गया था अब तो ये रसमलाई खानी थी, और अरविन्द से ज्यादा उसका मोटा मूसल पागल हो गया, गन्ने के खेत में कुंवारी चढ़ती जवानी वाली बहन की कच्ची अमिया देख के कौन भाई काबू में रहता और अरविन्द तो अब तक पंचायती सांड़ हो चुका था.
बस कभी उसके दोनों हाथ कस कस के बहन की छोटी छोटी चूँचियों को रगड़ते मसलते तो कभी उन्हें वो पागल हो के काटता चूसता।
बहन, गीता अरविन्द से भी समझदार थी, तभी तो न उसने सिर्फ अपने हाथ और होंठ से खाना खिलाया उसे बल्कि साफ़ साफ़ बता भी दिया।
" अपने हाथ से खिला रही हूँ , इसलिए की तुम पहले तो अपना हाथ गन्दा करोगे, फिर उसी हाथ से जगह जगह छुओगे " और उन्ही साफ़ हाथों से उसका भइआ अरविन्द अपनी बहन पे हाथ साफ़ कर रहा था.
जोबन पे हाथ लगने से तो कोई भी लड़की पिघल जाती, और अगर भाई का हाथ बहन के जोबन पे पड़ जाए तो वो खुद नाड़ा खोल देगी, ... और वही हुआ, गीता ने न सिर्फ अपने पेटीकोट का नाड़ा खोला बल्कि भाई का भी लोवर सरका दिया और जिस मस्ती से भाई उसके जोबन को पकड़ रहा था उसी तरह बहन ने भैया के एकम तन्नाए खूंटे को पकड़ लिया और प्यार से दबाने मसलने लगी, कभी अंगूठे से सुपाड़े के बेस पे रगड़ती तो कभी हलके हलके मुठियाती,...
और अब भैया से नहीं रहा गया, इस गन्ने के खेत में उसने कितनी कुंवारियों की झिल्ली फाड़ी थी, हर दूसरे तीसरे किसी न की किसी को अपना मोटा गन्ना खिलाता था, लेकिन उससे अब रहा नहीं जा रहा था , पहली बार उसकी सगी बहन उसके नीचे,...
गप्प से उसने पहले एक ऊँगली बहन की बुर में पेल दी,... बुर एकदम मस्ती से लसलसा रही थी,... वो समझ गया जमीन जुताई के लिए तैयार है, इतनी नमी आ गयी है इसमें,... फिर भी घचाघच अरविन्द बहन की कसी बुर में ऊँगली पेल रहा था, थोड़ी देर में मस्ती से बहन पागल हो गयी खुद ही लंड के लिए चूतड़ उछालने लगी,
बहन की बुर भाई का लंड मांग रही थी, सिसक रही थी तड़प रही थी,...
और अरविन्द ने अबकी दूसरी ऊँगली भी पेल दी,
और गीता चीख उठी, उईईईईई ओह्ह्ह्ह नहीं,... कुछ मजे से ज्यादा दर्द से,... महीने भर से उसकी बुर भाई का लंड खा रही थी लेकिन तब भी एक दम कसी टाइट थी, लेकिन अरविन्द जानता था की उसका लंड तो इतना मोटा है, गितवा की कलाई से भी ज्यादा, चार चार बच्चों की माँ, पक्की भोंसड़ी वालियां जो सैकड़ों लंड खा चुकी थी होती हैं वो भी पसीना छोड़ देती हैं और ये बेचारी तो अभी जवानी की चौखट डांक ही रही है,... इसलिए पूरी दो ऊँगली अंदर तक और देर तक गोल गोल,...
उसकी बहन की बुर अब एकदम गीली हो गयी थी, बुरी तरह पनिया रही थी, बीच बीच में बुर में घुसी ऊँगली की नक्लस से वो प्रेम गली के अंदर की नर्व्स को रगड़ के छेड़ छेड़ के बहन को पागल कर रहा था,...
आज गीता पहली बार गन्ने के खेत का मजा ले रही थी,... बस उसका यही मन कर रहा था की बस अब भैया पेल दे, टांग उठा के,