Incest Baadshah ~ The Tales of Debauchery - Page 3 - SexBaba
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Incest Baadshah ~ The Tales of Debauchery

अपडेट - 12 ~ शॉपिंग

अब तक...

वो लड़की कमरे में बैठे बैठे hi कुछ कुछ सोच रही थी. न जाने क्या चल रहा था उसके दिमाग में.

उसने एक आखिरी झलक फिरसे अपने फ़ोन में नए कांटेक्ट वीर पर डाली और फिर अपना फ़ोन बंद कर वो बाथरूम में घुस गयी.


अब आगे...

पारी से वीर को 60 पॉइंट्स मिले थे, जिनमे से 50 पॉइंट्स उसने स्किल खरीदने में लगा दिए थे. और बाकी के पॉइंट्स अपने स्टैट्स में लगा दिए थे.

उसने 5 पॉइंट्स स्ट्रेंथ में डाले, 3 पॉइंट्स इंटेलिजेंस और 2 पॉइंट्स अपीयरेंस में.

अब उसके स्टैट्स कुछ इस प्रकार थे.

[ स्टैट्स :

स्ट्रेंथ - 15/100

इंटेलिजेंस -11/100

अगिलिटी - 3/100

ेंदुराने - 7/100

अपीयरेंस - 9/100]

अगली सुबह वीर को अपने आप में हल्का फुल्का चेंज महसूस हुआ और आज श्रेया ने जब उससे देखा तोह वो भी उससे देख के सवाल करने लगी थी.

श्रेया : ोये! रात को फेसवाश पॉट के सोया था क्या? कुछ खिला खिला सा लग रहा है चेहरा.

वीर : नहीं तोह!!!

नाश्ते के टाइम निधि नाश्ता सर्वे करते हुए कॉलेज जाने के लिए रेडी थी और वो भी बस नाश्ता करने बैठने hi वाली थी.

डाइनिंग टेबल पर वीर और श्रेया को वो पहले hi सर्वे कर चुकी थी और साथ में बैठते हुए उसने अपना नाश्ता शुरू किया.

जूही पहले hi स्कूल जा चुकी थी तोह उसकी कोई टेंशन नहीं थी. ऑटो आता था और जूही को ले जाता था.

अभी निधि खा hi रही थी की उससे अपने ऊपर किसी की नज़रो का आभास हुआ और उसने चेहरा उठाते हुए देखा तोह पाया की वीर उससे hi देख रहा था. दोनों की नज़रे मिलते hi वीर ने अपनी नज़रे झुका ली और निधि ने भी यही किया.

कल से पता नहीं क्यों, वो वीर का सामना नहीं करना चाहती थी. वो चाहती थी की सब कुछ पहले जैसा हो जाए और वो नोर्मल्ली बात करने लगे बूत उसके बावजूद उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी की वो वीर से बात कर पाए.

उससे बड़ा hi अटपटा लग रहा था. कैसे वो जाए और वीर से फिरसे नोर्मल्ली बाते करे. पर कल के उस सन के बाद से निधि बेचारी बिलकुल भी हिम्मत नहीं कर पा रही थी.

और यही हाल वीर का भी था. वो निधि से बात करना चाह रहा था पर वो खुद इस कन्वर्सेशन को कैसे स्टार्ट करे उससे समझ में नहीं आ रहा था.

हर्र बार वो मुँह खोलता कुछ कहने के लिए पर अलफ़ाज़ निकलते hi नहीं थे.

"में चलती हु." और निधि अगले पल hi अपनी नाश्ता ख़तम कर उठ गयी.

कुछ ज़्यादा hi जल्दी में थी वो, जैसे जल्द से जल्द घर से निकलना चाहती थी.

वीर एक बार फिर कहने के लिए हुआ पर उसके होंठ खुलते hi बंद हो गए और निधि उसकी नज़रो से दरवाज़े से बाहर निकल के ओझल हो गयी.

'दमन आईटी!'

मैं में उसने अपने आप को कोसा...

सिर्फ बात hi तोह करनी थी. फिर क्यों उसमे हिम्मत नहीं आ रही थी? ग्लानि सबको आखिर बाँध hi देती है.

***

इधर निधि कुछ देरर बाद कॉलेज पहुँच चुकी थी पर उसके मैं में न जाने क्या चल रहा था.

वीर की क्लास में वो एंटर करते हुए पहला लेक्चर लेने लगी. ब्लैक बोर्ड में हाथ तोह ज़रूर चल रहे थे उसके पर ध्यान कही और hi था.

"Ma'am! आपने 4तह स्टेप गलत किया है..."

उसके कानो में एक लड़की की आवाज़ पड़ी. पलट के उसने उससे देखा और फिर वापस से अपने लिखे गए सलूशन को. और वाक़ई, उसने गलत सोल्वे कर दी थी एक ेकशन.

"ओह्ह! सॉरी! स्टूडेंट्स! ये स्टेप गलत है. सॉरी!"

कहते हुए उसने वो मिटारा और वापस से उससे सोल्वे कर सही कर दिया की तभी,

"Ma'am! 6तह स्टेप भी गलत है..."

"हँ??"

निधि ने फिरसे अपने सलूशन पर गौर किया और फिरसे उसने मिस्टेक सही करते हुए दुबारा से सुधार किया.

"सॉरी! स्टूडेंट्स!"

"Ma'am आप ठीक हो न? कुछ परेशान सी लग रही हो."

सामने बैठी उसी लड़की ने उस से सवाल किया तोह निधि भी उसकी डेस्क के पास आ गयी.

निधि : इतना ऑब्वियस दिख रहा है?

लड़की : हां Ma'am! साफ़ दिख रहा है आप परेशान हो.

निधि (सर झुकाते हुए) : हां बीटा! बस थोड़ी इधर उधर की बातें दिमाग में चलती रहती है.

लड़की : It's okay! Ma'am! सभी की लाइफ में ये रहता है. आप यदि चाहो तोह रेस्ट कर सकती हो. हम सभी अपना वर्क कर लेंगे.

निधि : सच? कोई शिकायत तोह नहीं होगी न तुमलोगो को?

लड़की : No ma'am! वैसे भी बोहत पेंडिंग वर्क है हमारे पास.

और निधि ने फिर सारे स्टूडेंट्स से कन्फर्म कर उन्हें अपने पीरियड फ्री पीरियड के रूप में दे दिया. बच्चे अपना कोई भी वर्क कर सकते थे. निधि वही सामने रखे पोडियम के पास hi कड़ी रही और अपने विचारो में खोयी हुई थी.

लंच हुआ और वो स्टाफ रूम में अपनी सीट पर बैठे लंच करने hi जा रही थी की तभी उसके कानो में किसी मर्द की आवाज़ पड़ी,

"कैसे रहे मॉर्निंग लेक्टर्स निधि जी!"

पलट के निधि ने देखा तोह पाया एक उसके hi जितनी उम्र का प्रोफेसर उसके पीछे खड़े हुए था.

ये भी शामे डिपार्टमेंट में था.

निधि : अच्छे थे विकास सर!

विकास ने एक झलक निधि को नीचे से ऊपर देखा. लाल और काली साडी में गज़ब की लग रही थी वह. बिलकुल क़यामत. ऊपर से अभी अभी पाकी हुई थी. विकास जानता था निधि की मैरिड लाइफ अस्त व्यस्त है. उससे भी ये डाउट रहता था की साला ऐसा माल चोरर के आदमी कैसे रह सकता है भला?

भले hi विकास ने बड़ी चतुराई से निधि के जिस्म पर नज़र मारी थी पर निधि थी तोह एक औरत. एक hi झटके में उसने विकास की नज़रो को पकड़ लिया था की वो कहा घूम रही थी. और उसका आभास होते hi निधि के चेहरे पर पल भर के लिए घृणा के भाव आये पर अगले hi पल उसने अपने आप को वापस से नार्मल कर लिया.

विकास : आज स्वीटी मिस, जतिन सर, कोमल Ma'am, इन् सभी को में पार्टी दे रहा हु कैंटीन में. चलिए आप भी!

निधि ने एक स्माइल दी और बोली,

"सॉरी विकास सर! में आज वैसे hi थोड़ी थकी हुई हु. और टिफ़िन भी ऐसे में वास्ते हो जाएगा."

विकास : अरे! आपका टिफ़िन में वास्ते नहीं होने दूंगा. लाइए! आपके हाथो का खाना आज में खा लूंगा. और आप सभी आज जो बोलोगे वो कैंटीन में में खिलवाऊंगा.

निधि : बात वो नहीं है सर! मेने कहा न, आज में काफी थक गयी हु. तोह आप रहने दीजिये...

इस से पहले की वो अपनी बात पूरी कर पाती, विकास ने उससे बीच में hi काट दिया.

विकास : चलिए! आप थक गयी है न? और टिफ़िन भी वास्ते नहीं होने देना चाहती. तोह में आपके लिए यहाँ कैंटीन से पैक करवा के लाता हु और आपका ये टिफ़िन में यहाँ बैठ के आपके साथ खा लूंगा. अब ठीक? इसमें तोह कोई दिक्कत नहीं है?

बेचारी निधि अब बड़ी hi दुविधा में फस्स चुकी थी. ये विकास तोह उसका पीछा hi नहीं चोरर रहा था.

अभी वो कुछ उत्तर दे पाती उसके पहले hi उससे कंधे पर एक हाथ महसूस हुआ जो की किसी और का नहीं विकास का था.

और हाथ को महसूस करते हुए वो एकदम से पीछे हो गयी,

निधि : ये क्या कर रहे हो आप?

विकास : में तोह बस आपको कम्फर्ट दे रहा था.

निधि : No! I'm फाइन! आपको कोई ज़रुरत नहीं है.

विकास : फाइन! फाइन!

विकास अपने दोनों हाथ खड़े कर वह से निकल गया.

और निधि इधर बोहत hi बेकार फील कर रही थी. कैसे देख रहा था वो विकास उससे. ऊपर से तब जब वो खुद आलरेडी शादी शुदा है.

निधि ने नज़रे दौड़ाई तोह पाया की कुछ लेडी टीचर्स बैठ के उससे देख देख के खुसपुसाते हुए बातें कर रही थी.

ये सभी दिखने में बिलकुल भी सुन्दर न थी और जब इन्होने देखा की कैसे विकास सर उस निधि के पास जा जा कर उससे मन रहे थे और कैसे उस निधि ने उन्हें मन कर दिया तोह भला ये बात किये बिना कैसे रह सकती थी?

टीचर 1 : देखा तुमने? विकास सर आके उससे कितना मनाये फिर भी हरकते देखो उसकी... मुँह पे मन कर दिया.

टीचर 2 : और नहीं तोह क्या... भाव कितना खाती है ये. खुद को बड़ी hi एक्ट्रेस समझती है. नकचढ़ी कही की.

टीचर 3 : पति भी चोरर के चला गया इसका तोह... अब में समझ गयी क्यों गया... इसकी हरकते hi ऐसी है.

टीचर 1 : हां! ऐटिटूड तोह देखा इसका. एक तोह सर यहाँ तक लाने के लिए लंच तैयार थे पर देखो तोह...

टीचर 2 : ऐसी औरते होती hi ऐसी ह... अपने हुस्न से दुसरो को फसाती है. और सामने ऐसा दिखाएंगी जैसे बिलकुल रानी हो पर पीठ पीछे न जाने क्या क्या करती है...

भले hi ये तीनो टीचर्स धीरे बात कर रही थी. पर उसके बावजूद निधि को सब कुछ सुनाई दे रहा था.

अपना निचला होंठ दातो से दबाये वो उठी और बिना लंच किये hi वाशरूम में चली गयी.

अंदर वाशरूम में जाते hi उसने गेट बंद किया. उसकी आँखों से एक आसुओ की धार निकल, गाल से फिसलते हुए नीचे गिरी और उसकी रुलाई चूत पड़ी.

सर झुकाये और अपने निचले होंठ को जोरर से दातो टेल दबाये वो आँखें भींचते हुए उन्ही सब बातो को सोचने लगी.

विकास की वो गन्दी नज़र...

उसका उससे हाथ लगाना...

उन् टीचर्स की बातें...

फिर उससे अचानक hi वीर के साथ वो पल याद आया जब उसने उस से कुछ बातें कही थी...

'तुम्हारी आँखें कभी भी नहीं भटकी... एंड that's व्हाई... ी बिलीव यू!'

ये वाक्य उसने वीर को कहा था. वो पल याद करते hi निधि का दिल शांत सा होने लगा. आराम सा महसूस करने लगा. वो अनजाने में hi मुस्कुराने लगी.

और फिर अचानक से उससे कल का सन याद आया,

वो वीर के गले में लगे होंठो के निशाँ....

ये सोचते hi उसने अपना सर ज़र्रों से हिलाया.

'व्हाट इस रॉंग विथ में? वो मेरा छोटा भाई जैसा है. और इस उम्र में तोह ये सब होता hi है. कोई होगी उसकी गफ जो उसने कल बनायीं होगी. मुझे क्या करना? इनफैक्ट मुझे तोह खुश होना चाहिए उसके लिए. फाइनली, उससे कोई मिला और अब उसका साथी बना. फिर में क्यों इतना टेंशन ले रही हु? राइट! ी नीड तो कोंफ्रोंट हिम.'

और यु hi आज का दिन उसका इन् सब से गुज़रा.

***

शाम को निधि जब थक हार के वापस लौटी तोह तीनो वीर, श्रेया और जूही आपस में hi गपशप में लगे हुए थे.

निधि : क्या बातें हो रही है?

श्रेया : कुछ नहीं! बस ावायी

जूही : मम्मी!! आज स्पेशल डिनर बनेगा न??

निधि : ओह्ह नूवो....

जूही की बात से उससे याद आता है की वो तोह सामान खरीद के लायी hi नहीं.

निधि : में आती हु सामान लेके...

तभी वीर खड़ा हो जाता है,

वीर : Ma'am! आप रहने दीजिये... में चला जाता हु. आप थक गयी होंगी...

निधि : नहीं! तुम्हे नहीं पता होगा क्या लाना है और कैसे देख के लाना है.

वीर : उम्... श्रेया जी को पता है?

निधि : उसने तोह अपने जीवन में आज तक सब्ज़ी भी न ली होगी.

श्रेया : हैययययय! मेने एक बार ली है okay?

निधि : और वो भी खराब लेके आयी थी...

श्रेया (ब्लशेस) : सबके सामने बताना ज़रूरी था क्या?

एक गहरी सास लेते हुए, निधि खुद जाने hi वाली थी की वीर फिर से बोल पड़ा,

"तोह फिर में ड्राइव करता हु Ma'am. आप पीछे बैठ जाना. आप थक गयी होंगी. आप बताती जाना वो वो सामान में रखवा लूंगा."

उसकी बात सुन्न पल भर के लिए निधि उससे देखि...

निधि : ो... Okay!!

बड़ी hi धीमी आवाज़ में वो बोली और कुछ hi पालो में वो दोनों अब रास्ते में थे. निधि वीर के पीछे बैठी हुई थी और उसकी स्कूटी वीर ड्राइव कर रहा था.

पर दोनों के बीच डिस्टेंस था, जो निधि ने जान बुझ के बनाया था. वो वीर से काफी दूर बैठी हुई थी. वीर को ऐसा लग रहा था जैसे मानो पीछे कोई बैठा hi नहीं है.

'पारी! निधि Ma'am की फवौराबिलिटी कितनी है?'

[Utni hi hai master! 25]

'सहित! वो मुझसे ज़रूर नाराज़ है. कुछ न कुछ करना hi होगा.'

***

इस वक़्त निधि और वीर मार्ट में से khareed-daari कर रहे थे. वैसे तोह निधि बाहर से कुछ माँगा के खिला सकती थी बूत अब जब उसने पहले hi बोल के रखा था तोह भला वो अपने वाडे से पीछे कैसे हट सकती थी?

वीर मसाले के कुछ पैकेट्स ढूंढ रहा था तोह वही दूसरी जगह निधि कुछ और सामान ढूंढ़ने में लगी थी और दोनों hi काउंटर एक दूसरे से अलग अलग जगह थे.

आप भी यदि बड़े मार्ट में जाते होंगे शॉपिंग करने तोह आपने देखा hi होगा की कैसे अलग अलग स्टैंड्स में सामान रखे रहते है और लोग अपनी अपनी ट्राली लिए घूमते है और सामान उठाते है जो उन्हें चाहिए रहता है.

निधि ने वीर को कुछ सामान बता दिए थे जिनमे उससे ढूंढ़ने में दिक्कत नहीं जाने वाली थी.

अभी निधि एक पैकेट में उसकी मैन्युफैक्चरिंग डेट देख रही थी की तभी उसकी ट्राली पर किसी ने हाथ रखा और उसके कानो में एक जानी पहचानी आवाज़ पड़ी,

"क्या hi इत्तेफ़ाक़ है. मुझे नहीं पता था आप भी यहाँ होंगी निधि जी!"

निधि नई नज़रे उठायी और अगले पल hi उसकी बॉहे चिंता के मारे सिकुड़ गयी.

"विकास सर आप यहाँ?"

वो जिसे बिलकुल भी नहीं देखना चाहती थी वो शख्स उसके सामने खड़ा था.

विकास : आपने दिन में हमे बोहत hi बुरी तरह ठुकराया था... ी मैं हमारे इनविटेशन को...

निधि : मेरा कोई गलत इंटेंशन नहीं था. में अच्छा फील नहीं कर रही थी उस वक़्त और इसलिए...

विकास : इसलिए तोह हम आपकी बातो का बुरा नहीं मानते है, निधि जी! हम जानते है नाआ...

उसने कहते हुए नज़रे एक बार फिर निधि के बदन पर डाली और उससे नीचे से ऊपर तक टाडा.

उनकंफर्टबले फील करते हुए निधि थोड़ा पीछे हटी पर बोली कुछ नहीं.

विकास : वैसे आपने अभी तक कपडे भी नहीं बदले?

निधि (बॉहे सिकोड़ते हुए) : कपडे तोह आपने भी नहीं बदले है.

विकास (हस्ते हुए) : जी हां! जी हां! क्या करू? बीवी की बात maan'ni पड़ती है निधि जी! और घर में खाने में भी हेल्प करनी पड़ती है वर्ण घर से बाहर...

निधि : तोह ये तोह अच्छा है न? घर में पति पत्नी को एक दूसरे की मदद करनी hi चाहिए...

विकास (पास झुकते हुए) : यदि अआप्के जैसी बीवी हो तोह में तोह खुद खाना बनाऊ आपके लिए...

उसकी बात सुन्न निधि एकदम झेप सी गयी...

निधि : जी???????

विकास : मेरा मतलब है... आप कितनी केयरिंग हो... देखिये! आप तुरंत यहाँ काम से chuuth'te hi शॉपिंग करने आ गयी. और वह मेरी वाइफ है जो बस काम पे काम दिए जाती है. उससे भी आपकी तरह होना चाहिए...

निधि (पीछे खिसकते हुए) : जो खुबिया उनमे है वो मुझमे नहीं... हर्र व्यक्ति का स्वभाव अलग होता है.

विकास : हमसे पूछिए... आपमें साड़ी खुबिया है...

विकास की बात सुन्न निधि गन्दा सा मुँह बनाते हुए उससे देखती है, विकास की नज़रे उसके स्तनों पर थी...

विकास : वो साड़ी खुबिया जो एक मर्द को चाहिए...

निधि : क्या कहा आपने?

निधि तोह वैसे यहाँ छाता मारना चाहती थी उससे पर वो जानती थी इसका अंजाम क्या होने वाला था और इसलिए उसने विकास की बात को यु अनसुना कर उस से सवाल किया ताकि विकास को होश आये की वो कितनी घिनौनी हरकत कर रहा है.

विकास : मेरा मतलब... आप में हर्र वो क्वालिटी है निधि जी, जो एक महिला में होनी चाहिए.

निधि ने बिना जवाब दिए, वह से आगे बढ़ना hi बेहतर समझा...

"जी! अब में चलती हु."

बोलके वो आ तोह गयी अगले स्टैंड पर ये सोच के की विकास चला जाएगा पर उससे क्या पता था की जहा जहा वो जाएगी वही वही विकास आ जाएगा.

जिस भी स्टैंड पर वो जाती, विकास उसके बगल से आके कुछ न कुछ सामान टटोलने लगता और ट्राली में रख लेता.

निधि कुछ बोल भी नहीं सकती थी. भले hi विकास वो सारा सामान बाद में वापस स्टैंड पर रख दे पर अभी तोह वह उसकी ट्राली में था और ऐसे में वो उससे ये नहीं बोल सकती थी की वो उसका पीछा करना बंद कर दे.

क्युकी विकास सामान ट्राली में डालता जा रहा था.

निधि की नज़रे इस वक़्त वीर को पूरी बेकरारी से ढूंढ रही थी. पर वो किसी भी स्टैंड के आस पास दिखाई नहीं दे रहा था.

'जस्ट वेयर इस हे????'

हाथो को यु आपस में उलझाए वो चलती जा रही थी और नज़रे दौड़ाती जा रही थी पर वीर कही नज़र नहीं आ रहा था.

अभी वो वीर को ढूंढ़ना जारी रखती तभी उसके कंधे पे एक हाथ पड़ा,

"आप ये क्यों नहीं ले जाती???"

विकास उसका कन्धा थामे एक किड्स के कोई प्रोडक्ट की ऑर्डर इशारा कर रहा था.

और अगले hi पल निधि ने खुद को उसके हाथो के स्पर्श से मुक्त करते हुए खुद को पीछे किया.

निधि : जी नहीं! मुझे पसंद नहीं है ये!

विकास : अच्छा? एक बार आप अपनी बेटी को देना. मेरा बीटा तोह मांगता hi रहता है ये.

विकास की तरफ वो अपनी पीठ कर आगे बढ़ने लगी की तभी फिरसे एक हाथ उसके कंधे पर पड़ा और बस...

उससे अब गुस्सा आ चूका था...

"जस्ट लीव में अलोन...."

उसने थोड़ा तेज़्ज़ स्वर में चिल्लाया...

"हँ???"

और तभी निधि को एक झटका लगा, फिर थोड़ी राहत सी महसूस हुयी, फिर थोड़ी ख़ुशी, फिर ग्लानि और अंत में उससे अब अटपटा सा लगने लगा.

सामने वीर खड़ा हुआ था. उसका हाथ hi उसके कंधो पर था.

वीर : वो में तोह बस...

कहते हुए वो अपना हाथ निधि के कंधे से उठाने लगा की तभी निधि ने अपने हाथ से उसका हाथ थामा और वापस अपने कंधे पर रखवा लिया. उससे खुद इस बात का अंदाजा नहीं था अभी की वो क्या कर रही थी. ये सब जैसे अपने आप हो रहा था.

वो जैसे चाह रही थी...

की विकास के गंदे हाथो का स्पर्श वीर के हाथ के स्पर्श से मिट जाए.

और इसलिए वो वीर का हाथ यु थामे थी. न जाने वो कबसे वीर को तलाश रही थी, और अंत में वो आ hi गया.

विकास पीछे खड़े थोड़ा झेप से गया क्युकी उसने देखा कैसे निधि एकदम से भड़क गयी थी. अभी वो खुद इस हमले का शिकार हो जाता यदि वो अपनी लिमिट क्रॉस करता. पर उसके मैं में एक hi सवाल था की ये बाँदा है कौन?

निधि : कब से ढूंढ रही थी तुम्हे...

वीर : वो सब चोरडिये आप ठीक तोह हो न?

निधि (नॉड्स) : I'm फाइन!

वीर निधि को घूरता है और तभी उसके मैं में आवाज़ गूंजती है,

[I think wo peeche waala banda Nidhi ko harrass kar raha tha master.]

और अगले hi पल वीर पीछे मुद विकास को देखा.

वीर : अन्य प्रॉब्लम??

विकास : No! वैसे आपने बताया नहीं निधि जी! ये है कोण?

वीर : I'm हेर...

निधि : He's लिखे माय बरोथेर...

इस से पहले की वीर कुछ कह पाटा निधि ने पहले hi अपना उत्तर रख दिया, जिससे सुन्न कही न कही वीर को अच्छा नहीं लगा.

विकास : हाहाहा! अच्छा! मतलब रियल भाई नहीं हो...

वीर : रियल भाई नहीं हु बूत भाई की तरह हिफाज़त करना अच्छे से जानता हु.

और ये वाक्य सुनते hi अगले hi पल निधि ने अपना निचला होंठ दांत से दबा लिया. अब उससे कही न कही लग रहा था जैसे उससे वो उत्तर नहीं देना चाहिए था. पर उसकी कोई गलती नहीं थी...

जैसे वीर के गले में लगी वो लिपस्टिक वाले सन ने उससे मजबूर कर दिया था वो कहने के लिए.

विकास : अच्छी बात है! ऐसा hi होना चाहिए! चलिए! निधि! जी! चलता हु में...

और इतना बोल विकास वह से चला गया.

वीर : आपने विरोध क्यों नहीं किया???

निधि : क्या?

वीर : अनजान मत बनिए ma'am! वो घिनोना आदमी आपके साथ ऐसा कर रहा था और आपने कुछ नहीं कहा? वो तोह यदि पारी मुझे न.... ी मैं यदि मेरी नज़र न पड़ती तोह वो न जाने क्या क्या हरकत कर सकता था...

निधि : It's... It's okay! जाने दो!

वीर : एंड you're फाइन? रियली?

निधि (चिल्लाते हुए) : नूवो! नॉट ात आल!!! I'm नॉट फाइन!!!!

वह मौजूद सभी लोग निधि को घर के देखने लगे...

और निधि वीर को पकड़ सामान खरीद के बाहर ले गयी...

इस वक़्त दोनों hi गाडी पर सवार थे. दोनों में से कोई कुछ नहीं कह रहा था.

पर एक बात अलग थी.

इस बार निधि एकदम पीछे नहीं बल्कि उस से सत् के बैठी थी.

और इस बार...

वीर निधि का हाथ अपने कंधे पे और साथ hi साथ उसके स्तन अपनी पीठ पे, भली भाति फील कर सकता था.

'पारी! फवौराबिलिटी कितनी है?'

[Nidhi ki favourability ab 30 ho gayi hai master.]

और वीर के चेहरे पे इस बार मुस्कान आ गयी.

'ात लीस्ट! पहले से सब बेटर है.'

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आज के लिए इतना hi गाइस!


धन्यवाद!!
 
अपडेट - 13 ~ विजिटिंग कॉलेज

अब तक...

'पारी! फवौराबिलिटी कितनी है?'

[Nidhi ki favourability ab 30 ho gayi hai master.]

और वीर के चेहरे पे इस बार मुस्कान आ गयी.

'ात लीस्ट! पहले से सब बेटर है.'


अब आगे...

विकास ने जो कुछ भी हरकते निधि के साथ की थी, वीर उन् हरकतों के बारे में jaan'ne के बाद बोहत hi गुस्से में था.

वीर उस विकास को भली भाति जानता था. आखिर विकास उसी के डिपार्टमेंट में जो था. पर विकास वीर को नहीं जानता था. वीर एक लोनर जो था. अकेले बैठना, लोगो से दूर रहना, बात चीत न करना और उसका इतना साधारण सा चेहरा जैसे लोगो को उस पर नज़र डालने से रोकता था.

वही दूसरी ऑर्डर विकास की बनावटी चार्मिंग पर्सनालिटी जो मैडम से लेकर कॉलेज की लड़कियों तक मशहूर थी, वो भला कहा वीर जेसो पर ध्यान देने वाला था. यही कारण था की जब उसने वीर को निधि के साथ देखा तोह वो उससे पहचान न सका. ऊपर से वीर ने अपने अपीयरेंस में भी कुछ पॉइंट्स ऐड किये हुए थे, जिसके चलते उसके चेहरे पर अब हल्का निखार सा झलकता था.

शॉपिंग से आने के बाद निधि और वीर में कई साड़ी बातें हुई. अब दोनों hi पहले से बेहतर महसूस कर रहे थे और बात करने में कम्फर्टेबले थे.

पर बातो hi बातो में निधि ने वीर को एक आदेश दे डाला. और वो ये था की वीर अपनी पढ़ाई न चोर्रे. और कल से hi वो कॉलेज में उसके साथ जाए.

अब दिक्कत ये थी की गाडी थी एक. और जाने वाले दो. फीस की टेंशन थी नहीं वीर को क्युकी उसके पिता बृजेश ने सेशन की स्टार्टिंग में hi इखट्टी फी भर दी थी उसके कॉलेज की.

तोह ये साल तोह वो बिना पैसो की टेंशन लिए कॉलेज जा सकता था.

पर दिक्कत थी उसका और निधि का एक साथ गाडी में जाना. ऊपर से तब जब ये सभी जानते थे की निधि की मैरिड लाइफ खराब चल रही है और उसका डिवोर्स पेंडिंग पर है.

ऐसे में न जाने किसी किसी बातें करेंगे लोग उनको देख के और कैसे वो बातें निधि को मानसिक रूप से प्रताड़ित कर सकती है, इन्ही बातो को लेकर आज सुबह वीर और निधि में बहस हो रही थी.

निधि : मेने कहा न... तुम चलो. और लोग क्या सोचेंगे उसकी फ़िक़र मत करो.

वीर : Ma'am! आप खामखा तकलीफ उठा रही हो. कल उस विकास की हरकत में देख hi चूका हु...

इस से पहले की वो कुछ और बोलता निधि उसके होंठो पे अपने कोमल हाथ रख देती है. और वो कोमल स्पर्श का एहसास करते hi उसकी बोलती अपने आप बंद हो गयी.

निधि : ससष्ठ! श्रेया वाशरूम में है. उसके सामने ये सब बातें मत करना प्लीज. वर्ण, वो दंगा खड़ा कर देगी. और मुझे खुद वो विकास की घिनौनी हरकतों से चिढ है. पर वीर... तुम समझो. उसकी एक पहचान है अलग hi पूरे डिपार्टमेंट में. यदि में विरोध करुँगी न तोह बोहत साड़ी दिक्कतें आएंगी. जिन्हे बाद में मुझे hi भुगतना होगा.

वीर : तोह वो आपको ऐसे टच करता है तोह आपको प्रॉब्लम नहीं होती???

निधि : क्या तुम मुझे ऐसा समझते हो वीर!??

उसने नाराज़गी भरी नज़रो से देखते हुए कहा...

वीर : नहीं! मेरा मतलब वो नहीं था...

निधि : में hi जानती हु, की जब वो मुझे अपने घिनोने हाथो से छूटा है तोह मुझे केसा फील होता है. मैं तोह करता है की वही उससे सरे आम तमाचा मार दू. पर मेरी मजबूरी है वीर. में ये नौकरी... बिलकुल भी नहीं खो सकती वीर. बिलकुल भी नहीं...

उसने अपनी आँखें गड़ाए वीर की आँखों में देखा. उन् आँखों में केवल सच्चाई झलक रही थी इस वक़्त. साथ hi साथ अत्यंत दर्द...

और एक मजबूरी...

निधि : अब चलो! रेडी हो जाओ. में नाश्ता बना देती हु.

निधि उसके कंधे को थप थापा कर किचन की ऑर्डर चली गयी और इधर वीर उससे केवल जाता हुआ देखता रहा.

'I'll डेफिनिटेली सोल्वे योर प्रॉब्लम Ma'am. आपने इतनी मेरी मदद की है. आपकी लाइफ इतनी बेहतर कर दूंगा में की आपको ये दर्द भरे पल कभी याद hi न आएँगे.'

[ :अप्प्रोवे: ]

***

जाव वीर और निधि एक साथ कॉलेज पहुचे. तोह ज़ाहिर सी बात थी की लोगो की नज़रे उन् पर जानी hi थी और बातें भी होनी hi थी.

अभी वो पार्किंग में hi थे पर इन् कुछ hi सेकण्ड्स में उन् दोनों को लेकर लोगो की बीच अफवाहे bann'na शुरू हो चूका था. यही तोह है असल ज़िन्दगी. अफवाह bann'ne में समय नहीं लगता.

चर्चे चिढ चुके थे, और वीर और निधि इस वक़्त लोगो के बीच एक हॉट टॉपिक बन्न चुके थे.

निधि आखिर एक टंच माल थी. उसकी सुंदरता के किस्से पूरे कॉलेज में मशहूर थे.

निधि बिना किसी से नज़रे मिलाये वीर को देखि और बोली,

निधि : उनपे फोकस मत करो. लेट थम टॉक. अपनी क्लास में जाओ, पहला लेक्चर मेरा hi है. आल्सो, I'm योर क्लास टीचर.

वीर (स्माइल्स) : ी क्नोव Ma'am.

निधि (स्माइल्स) : गुड! नाउ जो!

वीर को क्लास में जाने के लिए बोल निधि स्टाफ रूम में चली गयी. इधर जब वीर क्लास में एंटर किया तोह एकदम से सन्नाटा सा छा गया.

बिना कुछ बोले, बिना किसी से नज़रे मिलाये, वीर ने आते हुए सबसे पीछे की सीट पकड़ी और उसमे अकेले बैठ गया.

"ोये! ये तोह....?"

"अबे क्या नाम था इसका??"

"अबे ये जाना पहचाना सा लग रहा!"

"वीर है वो मादरचोदो!"

"वीर? वो लोनर? आज इतने दिनों बाद इससे कॉलेज की याद कैसे आ गयी?

"He's चेंज्ड राइट? ी सी सम डिफरेंसेस."

"लवडे का डिफरेंसेस. पहले की hi तरह तोह है. क्या चंगेस आ गए भैया!?"

"आज भी वही हाल है इसका... ः~"

ऐसी तमाम लोगो की बातें वीर के कानो में पद रही थी. पर वो चुपचाप बस बैठा रहा.

[What the hell? How dare they disrespect you? Unhe pata nahi hai ki ab aap pehle jese nahi rahe master.]

'It's okay पारी! डोंट वोर्री!'

समय बीतने में देरर न लगी और कुछ hi पालो में निधि भी क्लास में प्रवेश करि.

अंदर घुसते hi उसकी नज़र सबसे पहले इतने चेहरों में से ढूंढ़ते हुए वीर के चेहरे पर पड़ी. और उससे देख उसने एक हलकी सी हामी भरी और पढ़ाना स्टार्ट किया.

लौंडे लपाड़े सभी उससे अलग अलग एंगल से उसके जिस्म को ताड़ने में लगे हुए थे, जो की वीर भली भाति देख पा रहा था. और हर्र गुज़रते वक़्त उसकी मुट्ठी कस्सति जा रही थी.

बोर्ड पे क्वेश्चन लिख वो एक रौ से दूसरी रौ में जाती और देखती की स्टूडेंट्स सोल्वे कर रहे है या नहीं?

वो आखिर तक चलती हुई वीर के पास आयी. उसने देखा की वीर का पूरा ध्यान उसके दिए गए क्वेश्चन को सोल्वे करने में था. ये देख उसका मैं इतना प्रफ्फुलित हो उठा की उसके होंठो पर एक मुस्कान आ गयी.

कहा यही वीर कितना टूटा हुआ सा था पहले, न कोई जोश, न कोई उल्लास नज़र आता था उसके चेहरे पर. न hi उसका मैं पढ़ाई में लगता था. पर आज वो उसके कहने पे कॉलेज भी आया और उसके सवाल को हल भी कर रहा था.

उसने देखा की वीर काफी हद्द तक सही सोल्वे कर रहा था. उसके बस एक स्टेप गलत था जिसके चलते आंसर सही नहीं आ रहा था.

अगले hi पल वो झुकी और वीर के हाथो से उसने पेन लिया. उसके कोमल हाथो का स्पर्श यु अचानक अनुभव करके वीर भी थोड़ा झटक गया.

निधि की बदन से आती वो मनमोहक सुगंध उससे पागल सा कर रही थी.

"अध्भुत..." उसने धीरे से बुदबुदाया.

"हँ!??" निधि उसकी हलकी आवाज़ सुन्न उससे प्रश्न भरी नज़रो से देखि, "कुछ कहा वीर!?"

'फ़क!! She's तू क्लोज! तू क्लोज!'

निधि अनजाने में वीर से बिलकुल वैसा hi बेहवे कर रही थी जैसा वो घर पर किया करती थी. जैसे मानो वो भूल गयी थी की वो घर पर नहीं बल्कि क्लास में है.

वीर (ब्लशेस) : नथिंग Ma'am!

निधि (नॉड्स) : Okay!! अच्छा यहाँ देखो! तुमने यहाँ पे गलती की थी.

वो और पास आते हुए वीर को समझाने लगी. हर्र पल उसके हाथ वीर के हाथ से, तोह कभी उसकी उंगलिया वीर की उंगलियों से यु टकरा रही थी और निधि को जैसे ये सब नार्मल लग रहा था.

पर उससे क्या पता था की वीर के दिल की धड़कन इस वक़्त ट्रैन के माफ़िक़ तेज़्ज़ हो चुकी थी.

'सहित! अभी नहीं... अभी मत खड़े होना बी...'

[ :ब्लश:]

अब ये वाक्य वीर किस से कह रहा था ये तोह समझदार को इशारा काफी था.

आस पास के लोग वीर की किस्मत को कोस रहे थे. निधि जैसी टीचर उसके इतना पास थी ये देख उनकी गंदे जल रही थी.

आज तक कभी निधि ने उनके साथ ऐसा न किया फिर ये कौन होता था निधि के साथ इतना पास रहने वाला? उनके मैं में यही सवाल दौड़ रहे थे.

अभी वो वीर को मैं में गाली बकने में लगे हुए थे की इतने में hi निधि ने कुछ ऐसा किया जिसके चलते उनकी पहले से hi जाली गांड पूरी तरह जल के राख हो गयी.

समझाते समझाते hi निधि ठीक वीर की hi बेंच पर उसके बगल से बैठ गयी. और वो इतना सत् के बैठे हुए थी की उसके कुछ अंग वीर के बदन से लगे हुए थे. आज वो डार्क ग्रीन साड़ी पहने हुए थी. वो हरे रंग का ब्लाउज जो उसकी गोर गोर स्तनों को छुपाये हुए था, उनका साइड व्यू वीर को घायल रहा था.

"और ये लो! आ गया आंसर! सी कितना सिंपल था."

उसने वीर की तरफ सर मोड़ते हुए कहा तोह पाया की वीर लम्बी लम्बी सासें ले रहा था.

वीर : जी! बोहत... बोहत सिंपल था.

'फ़क!!!!'

निधि : क्या हुआ वीर?

वीर : I'm गुड... Ma'am!!!

निधि मुस्कुरायी और बोली,

"ऐसे hi पढ़ना वीर. कभी भी पढ़ाई मत चोरर्ण okay?"

और वो अपनी इतनी प्यारी मुस्कान चोरर वीर के बगल से उठ के चली गयी और यहाँ वीर उसकी इस अदा को देखता रह गया. एंटी प्यारी सी मुस्कान उसने निधि के चेहरे पे पहली बार देखि थी.

उस मुस्कान में कोई चिंता, कोई नाराज़गी, कोई दर्द नहीं था.

बस था तोह केवल प्यार, अनुकूलता और अपनापन.

'She's तू पुरे!! शी मस्ट बे प्रोटेक्टेड ात आल कॉस्ट.'

*रिंग*

घंटी बजी और निधि का लेक्चर ओवर हो चूका था.

***

जहा वीर कॉलेज में व्यस्त था वही एक बड़ी सी बिल्डिंग में एक केबिन में एक बेहद hi ख़ूबसूरत लड़की लैपटॉप में किसी काम में लगी हुई थी.

उसकी उंगलिया फटाफट कीबोर्ड पर चल रही थी. उसने वाइट शर्ट के ऊपर एक ग्रे ब्लेजर पहना हुआ था. और नीचे उसने ग्रे कलर की तुबे स्कर्ट.

पूरी प्रोफेशनल लेडी लग रही थी वह.

उसका और ऐसा था जो बड़ी सी बड़ी हस्तियों को मात दे दे. उसके सामने नार्मल लड़किया ऐसी लगती थी जैसे मानो किसी छोटी सी बस्ती से आयी हो.

इसमें उसकी कोई गलती नहीं थी. शुरू से hi वो एक बड़े घराने से रही है और शुरू से hi एक mahatvakansha-vaadi लड़की थी.

अपने सपनो को पूरा करने वाली लड़की.

और आज वो इस मुकाम पर थी की उसके पास क्या नहीं था. दुनिया भर के ऐशो आराम जो आदमी अपने सपनो में देखता है उन्हें जीने के लिए. उन् ऐयाशियों के साथ जीना उसका रोज़ का जीवन था. पर उसके बावजूद उसमे अभी भी लालसा थी. जो की ज़रूरी थी.

लालसा और कुछ पाने की. वो आग अभी भी उसमे थी. और वो बिलकुल भी नहीं रुकने वाली थी.

अभी वो टाइप कर hi रही थी की इतने में उसके केबिन का दरवाज़ा खुला और एक आदमी ने अपना सर अंदर की ऑर्डर करते हुए पूछा,

"मई ी के इन मैडम?"

लड़की (स्माइल्स) : यस! आइये! और आप कबसे ये रूल्स फॉलो करने लगे? आपको तोह पूरा फ्रीडम है मेरे केबिन में आने का. हां! जब में मन करू तब का चोरर के...

उसने फिर से मुस्कुराते हुए कहा तोह वो आदमी भी अंदर आते हुए मुस्कुरा दिया.

आदमी : बस! यही! सोचा... आज हम परमिशन लेके अंदर जाएंगे...

लड़की : आपके चेहरे की मुस्कराहट बता रही है की काम हो गया है. है न? जल्दी बता दीजिये अब. वेट न करवाइये...

आदमी : बिलकुल मैडम! मेने कहा था न आपसे. थोड़ा सा समय बस लगेगा लेकिन काम हो जाएगा. और देखिये! काम हो गया!

कहते हुए उसने एक फाइल उस लड़की को पास करते हुए कहा.

बिना कोई समय गवाए उस लड़की ने फाइल खोली और जो कुछ भी उसने उस फाइल के अंदर देखा, पहले तोह उसकी आँखों में एक चमक आयी, फिर हैरानी और फिर कुछ पल के लिए वो डगमगायी... पर अगले पल hi उनमे वापस से वही स्थिरता आ गयी.

"आप जा सकते हो! थैंक यू!"

उसने हां में सर हिलाते हुए कहा तोह वो आदमी भी अपना सर हिलाते हुए बाहर निकल गया.

'इंटरेस्टिंग... शुड ी पाय ा विजिट और शुड ी कॉल?'

सोचते हुए उसने वही फाइल फिर से खोली और देखि. न जाने क्या था उसमे ऐसा जो उससे दुबारा वो फाइल देखने पर मजबूर कर दिया. पर जो भी था, यदि वो ऐसी लड़की को मजबूर कर रहा था देखने के लिए तोह ये कहना मुश्किल नहीं था की उस फाइल में कुछ बोहत hi दिलचस्प था.

'ओह्ह्ह्ह! ी हैवे ान आईडिया...'

उसने एक शरारती सी स्माइल लेते हुए अपना मैं में कहा,

'I'll पाय ा विजिट. It's डीडेड थें.'

और उसने फाइल बंद कर अपनी डेस्क के ड्रावर में दाल दी.

***

इधर कॉलेज में निधि के लेक्चर के बाद 3 लेक्चर और निकल चुके थे और अब रेसस्स हो चूका था.

वीर अपने क्लासरूम से बाहर निकला और वाशरूम जा रहा था पर उसकी फ्लोर का वाशरूम काफी भरा हुआ था. सारे लौंडे लगता काफी देरर से टंकी भर भर के बैठे थे और अब धार पे धार चोरर रहे थे.

एक थकान भरी आह भरते हुए वीर नीचे की ऑर्डर जाने लगा. उसने सोचा की नीचे का वाशरूम hi उसे कर लेगा.

वाशरूम में टंकी खाली करने के बाद वो बाहर निकल के कुछ कदम hi चला था की तभी उसके कानो में एक जानी पहचानी सी आवाज़ पड़ी.

एक मधुर, चंचल और बेहद hi प्यारी आवाज़.

जिससे सुनके वीर के परर वही थम गए.

"वीर भैया!!!?"

वीर ने palat'te हुए देखा और उसके सामने एक जाना पहचाना और बेहद hi परिचित चेहरा उसके सामने था.

काव्य!!!

उसकी चची की छोटी लड़की और उसकी छोटी बहिन.

वीर ने देखा की वो बोहत hi चिंतित नज़र आ रही थी. उसकी आँखों में चिंता तोह वो देख सकता था पर कुछ और भी था जो शायद वीर को इस वक़्त नज़र न आया.

भले hi वीर काव्य को अच्छा मानता था और वो जानता था की काव्य बेक़सूर है और उसकी घर में नहीं चलती, साथ hi साथ वो अभी अभी कॉलेज में आयी थी और अभी ज़्यादा दुनिया दारी भी नहीं देखि हुई थी उसने.

पर इन् सब के बावजूद वो ये नहीं भुला पा रहा था की जब वो अकेला दर बदर भटक रहा था, तब काव्य ने कुछ न किया. जब हॉस्पिटल से उसके लिए फ़ोन लगाया गया था तब काव्य ने फ़ोन नहीं उठाया था. और यही सब याद करते हुए वीर को न चाहते हुए भी गुस्सा आ रहा था. काव्य से वो खफा कहफा सा महसूस कर रहा था.

"कुछ काम था?"

वीर ने बिलकुल hi नार्मल सी आवाज़ में कहा.

और उसका ये रुखा सा व्यवहार देखते hi काव्य की आँखें नम्म हो गयी और उसने अपना निचला होंठ दातो से दबा लिया.

बोलना चाहा...

पर शब्द न निकले उसके मुँह से...

बेचारी...

वीर को देख के तरस तोह आ रहा था पर पता नहीं क्यों वो जैसे इस कठोरता को बनाये रखना चाहता था. जैसे वो चाहता था की उसके लोगो को भी फील होये की उसने क्या क्या सहा है.

काव्य : आप... आप... कैसे हो?

बेचारी को ये भी न सूझा की इस वक़्त क्या सवाल करना चाहिए. वो बस उस से थोड़ी दूर कड़ी उससे hi देख रही थी और बड़ी hi मुश्किल से अपने मुँह से शब्द निकाल पा रही थी.

"ज़िंदा हु..."

वीर ने कहते हुए नज़रे फेरर ली. जैसे ये सब बातें उसके लिए कोई ज़्यादा इंटरेस्ट की नहीं थी.

काव्य : मेने... मेने आपको व्हत्सप्प पर मैसेज भेजा था...

वीर : ी don't हैवे अन्य फ़ोन. खराब हो गया वह.

काव्य ने बड़ी हिम्मत कर के फिरसे एक सवाल पूछा.

काव्य : आप... आप कहा रह रहे हो?

वीर : ये बताना में ज़रूरी नहीं समझता...

और ये बात सुन्न काव्य ने अपना होंठ डाट से और जोरर से भींच लिया. ये दर्शा रहा था की वीर की बातें कितनी बुरी तरह उसके दिल पर लग रही थी. वीर इतना कठोर कभी नहीं था, खासकर काव्य के प्रति पर आज जैसे वो किसी अलग hi मूड में था.

काव्य : मुझे भी नहीं? मुझे भी बताना ज़रूरी नहीं समझते आप?

वो बोली और बस...

अगले hi पल उसके गालो से एक ासु की बूँद बहते हुए नीचे जा गिरी.

वीर अंदर hi अंदर पिघल गया था पर बाहर से नहीं. उसने कुछ देरर काव्य को देखा...

आस पास से जो लोग गुज़र रहे थे वो भी बीच करिडोरर में रो रही लड़की को ज़रूर देखते जा रहे थे.

"नहीं!"

और बस...

एक शब्द hi काव्य को इतनी जोरर से अपने दिल पर लगा की वो सर झुकाये वही रोने लगी.

वीर पलट के बाहर निकल कैंटीन की ऑर्डर जाने लगा.

ये करना ज़रूरी था. काव्य अभी नादान थी. और उससे इस बात से अवगत कराना ज़रूरी था की केसा महसूस होता है जब आप हर्र किसी से नकारे जाओ.

अभी वो कुछ कदम hi चलके बाहर आया था की तभी उसके कानो में एक और जानी पहचानी सी आवाज़ पड़ी,

"क्यों बे चूज़े!!!! तू फिर आ गया!???"

और अगले hi पल उसके कदम वही थम गए. मुट्ठी कस गयी और एक ज़ोरदार गुस्से का ज्वालामुखी जो अंदर hi अंदर कब से पनप रहा था वो फट उठा...

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आज के लिए इतना hi गाइस!


धन्यवाद!
 
मेगा अपडेट

अपडेट - 14 ~ कोंफ्रोंटेशन


अब तक...

अभी वो कुछ कदम hi चलके बाहर आया था की तभी उसके कानो में एक और जानी पहचानी सी आवाज़ पड़ी,

"क्यों बे चूज़े!!!! तू फिर आ गया!???"

और अगले hi पल उसके कदम वही थम गए. मुट्ठी कस गयी और एक ज़ोरदार गुस्से का ज्वालामुखी जो अंदर hi अंदर कब से पनप रहा था वो फट उठा...


अब आगे...

अपनी नज़रे ऊपर कर जब वीर ने सामने देखा तोह उससे एक और जाना पहचाना चेहरा दिखाई दिया.

अजय!

वही लड़का जिसने उससे बुरी तरह पिटवाया था. वीर को एक hi पल में वो साड़ी बीती वारदातें याद आने लगी. वो कॉलेज के पीछे की सुनसान सड़क पर उसकी पिटाई, अजय का उसके मुँह में लोल्लिपोप ठूसना, अपने जूते से उसके सर पर दबाव बनाना, वो बारिश की बूंदे जो उसके घावों पर थपेड़े मारते हुए उससे और दर्द दे रही थी.

वो सब कुछ वीर को एक hi झटके में याद आ गया. अपनी मुट्ठी को जोरर से उसने कैसा और स्थिर आँखों से उस अजय को घुरा जो हाथो में फुटबॉल लिए हुए था.

अजय और उसके पंटर पूरे रौब के साथ वीर के क़रीब आये और ये चहल पहल देख सभी की नज़रे उनपर जाने लगी.

कैंपस में सभी अपना अपना काम चोरर अब बस वीर और अजय को घर रहे थे जैसे वो किसी फिल्म को देखने आये हो और बस क्लाइमेक्स का वेट कर रहे हो.

अपने हाथो में फुटबॉल लिए अजय वीर के गोल गोल घूमने लगा और वीर केवल अपनी आँखों से उससे hi घूरता रहा.

तभी उसके मैं में आवाज़ गुंजी...

*डिंग*

[Mission - Take revenge from Ajay.

Rewards - ?? Points

Time limit - 3 days]

'इसी का तोह इंतज़ार था मुझे...'

[Dhyaan rahe master! Revenge jitne acche se loge points bhi ussi hisaab se milenge.]

'ी सी! पारी...'

[Yes master!]

'क्या में अजय के स्टैट्स देख सकता हु? उसकी कितनी स्ट्रेंथ है, कितनी अगिलिटी है...!?'

[Sorry master! Ye abhi possible nahi hai. Aapko mujhe level 3 pe karna hoga uske liye.]

'दमन!!!'

[But mein bata sakti hu ki Ajay ke stats aap se zyaada hi honge master. Kyuki abhi aapne apne stats me points zyaada daale hi nahi hai master. Aapke stats kuch iss prakaar hai ~]

[ स्टैट्स :

स्ट्रेंथ - 15/100

इंटेलिजेंस -11/100

अगिलिटी - 3/100

ेंदुराने - 7/100

अपीयरेंस - 9/100]

'ये काम है अजय से निपटने के लिए?'

[Haa master! 15 strength me kuch bhi nahi hone wala.]

'तुम्हे क्या लगता है अजय की स्ट्रेंथ कितनी होगी?'

[I think above 20... Above 30 bhi ho sakti hai master.]

'सहित! क्या किसी की स्ट्रेंथ 100 तक होती है?'

[Yes master! 100 tak pohuchna possible hai aapke iss world me. Insaan 100 ki strength tak pohuch sakta hai. Par koi bhi pohucha nahi hai abhi master. Bruce Lee jese kuch martial artists the aur hai jinki strength 90 above hogi. Baaki maybe kaho koi pohuch gaya ho but hume pata na ho unke baare me.]

'ी सी...'

[Jab hum unhe aankho se dekhenge tab hi confirm kar paenge.]

अभी वीर पारी से और जानकारी लेता इस से पहले hi उसके कानो में फिरसे आवाज़ पड़ी,

"क्यों बे चूज़े! मेने कुछ पूछा तेरे से. मुँह में दही जम्म गया है क्या? बोल! तू फिर आ गया यहाँ? तेरी हिम्मत कैसे हुई?"

अजय के जोरर से चिल्लाने से वह मौजूद सभी लोग शांत पद गए. अजय ने जैसे सबका ध्यान अपनी ऑर्डर खींच लिया था.

तभी वह दूसरी बिल्डिंग से एक शख्स निकला अपने दोस्तों के साथ, और सामने का नज़ारा देख के उसकी आँखों में अचानक hi चमक आ गयी.

"प्रांजल भाई! सामने लफड़ा हो गया लगता."

ये कोई और नहीं प्रांजल hi था जो अपने दोस्तों के साथ बगल की बिल्डिंग से बाहर आया था.

प्रांजल : चलो चुतियो! अभी मज़ा आने वाला है बोहत.

और प्रांजल अपने दोस्तों को समेत के वही कैंटीन में ले गया जहा से पूरा नज़ारा देखा जा सकता था.

काव्य बेचारी अपने ासु पोछते हुए जब बाहर आयी तोह उसने देखा की वीर और कोई लड़का आपस में बहस कर रहे थे. उसके आस पास इतनी भीड़ थी की बेचारी वो उचक उचक के देखने की कोशिश कर रही थी पर लौंडो की हाइट इतनी थी की वो सही से देख नहीं पा रही थी.

और कैंटीन में hi दो आँखें ऐसी भी थी जो वीर से बचपन से परिचित थी. ये आँखें भी सामने हो रहे दृश्य को देख रही थी.

आरोही!

कैंटीन में बैठे वो बॉहे सिकोड़े सामने सन को देख रही थी. न जाने क्या चल रहा था उसके मैं में.

अजय को घूरते हुए वीर ने अपनी मुट्ठी ढीली चोरर दी.

वीर : कॉलेज आना या न आना ये मेरी चॉइस है. इसमें तुम कोण होते हो ये डीडे करने वाले?

वीर के जवाब से अजय और उसके पंटर हैरान रह गए. वो ये सोच में पद गए की ये चूज़े में आखिर इतनी हिम्मत कैसे आ गयी. कल तक पीटने वाला वीर आज अचानक कैसे उछलने लगा?

"क्या बोलै बे!?" अजय ने उससे आँख दिखाते हुए पूछा पर वीर को जैसे इस बार कोई फरक hi नहीं पड़ने वाला था.

वीर : शायद तुमने सुना नहीं. मेने कहा की मेरा कॉलेज आना या न आना तुम्हारे कहने पर देपेंद नहीं करता.

अजय (गुस्से में) : लगता है उस दिन की मार तू भूल गया है साले. तुझे एक और दोसे देना hi पड़ेगा. तभी तेरे को अकाल आएगी.

उधर प्रांजल की ख़ुशी का जैसे कोई ठिकाना नहीं था. वो तोह जैसे चाह hi रहा था की कब वीर लातो और घुसो का शिकार होये और कब उसकी बेइज़्ज़ती सबके सामने खुले आम होये.

पूरे कैंपस में यदि कोई सबसे एक्ससिटेड था तोह वह प्रांजल hi था.

अजय गुस्से में आगे बढ़ते हुए वीर की कल्लोर पकड़ने hi वाला था और इधर वीर आने वाले हमले के लिए तैयार hi था की तभी,

"Nahiiiiiiiiiii...."

एक प्यारी सी लड़की वीर के सामने आके दोनों हाथ फैलाये उसके लिए जैसे दीवार बन्न के कड़ी हो गयी.

"कव... काव्य???"

वीर ने हैरान होते हुए हलकी आवाज़ में बुदबुदाया.

उसके सामने उसकी छोटी बहिन अजय से उससे बचाने के लिए शील्ड की तरह सीना ताने कड़ी हुई थी.

ज़ाहिर सी बात थी वीर हैरान था, और सिर्फ वीर hi नहीं आरोही से लेके प्रांजल तक, यहाँ तक की अजय खुद हैरान था.

अजय तोह प्रांजल का hi आदमी था तोह वह काव्य और आरोही को जानता था और इसलिए वो हैरान था. यदि प्रांजल ने वीर को मारने कहा था तोह फिर प्रांजल की छोटी बहिन यहाँ वीर का बचाव क्यों कर रही है? उसके मैं में ये सवाल आ रहा था.

अब वो दुविधा में फस्स चूका था.

'सहित! ये काव्य वह क्या कर रही है?'

प्रांजल अपनी जगह से फौरन hi खड़ा हुआ और आगे बढ़ने लगा.

भले hi वीर से वो नफरत करता था पर काव्य उसकी छोटी बहिन थी और उससे बचाने में वो पीछे नहीं हटने वाला था.

यही काम आरोही ने किया. काव्य उसकी सिर्फ प्यारी छोटी बहिन नहीं थी बल्कि उसकी बेस्ट फ्रेंड भी थी और भले hi आरोही काम बोलती थी पर काव्य के साथ जब जब वो अकेली रहती थी तोह सबसे ज़्यादा बात वही करती थी.

और कॉलेज में सुपर सीनियर होने के नाते और तोह और अपनी बहिन को वह देख आरोही ने एक सेकंड भी वास्ते न किया और वो चल दी जहा वीर और काव्य मौजूद थे.

साड़ी भीड़ इखट्टा होक बस अजय, वीर और काव्य को घर रही थी.

पर वीर की नज़रे केवल एक hi शख्स पर तिकी हुई थी. और वो शख्स था ~ काव्य!

'चेक!'

उसने अगले hi पल मैं में कहा और तभी,

*डिंग*

काव्य के सर्र के ऊपर उसकी स्टेटस स्क्रीन प्रकट हो गयी को सिर्फ और सिर्फ वीर hi देख सकता था.

[ नाम - काव्य

आगे - 18

स्टेटस - गिलटी यंग गर्ल.

बायो - काव्य एक बोहत hi सवेंदनशील और चंचल लड़की है. उसका सपना है एक बोहत hi अच्छी और बड़ी कंपनी में जॉब करना. एक ख्वाइश है जिसकी वो हमेशा भगवान् से प्रार्थना करती है. वो है की उसके परिवार के सभी सदस्य एक साथ मिलके रहे. ग्लानि के भाव इतने है की कभी कभी रात में वो रोटी भी है. उससे एक सहारे की ज़रुरत है.

फवौराबिलिटी - 58

रिलेशनशिप - कजिन.]

काव्य का स्टेटस देख के वीर के होश hi उड़द गए. सबसे पहला झटका जो उससे लगा था वो था फवौराबिलिटी देख के.

58 की फवौराबिलिटी!!!!

'शी... शी...'

[Yes master! Wo aapko ek bade bhai ke roop me hi dekhti hai. Aur aapko apna bhai hi maanti hai. Aapke baaki family ki tarah nahi hai wo...]

वीर इतना तोह जानता था की काव्य ने कभी उसका बुरा नहीं चाहा. पर उससे ये बात बिलकुल भी न पता थी की उसकजी ये छोटी बहिन उसके लिए इतनी फीलिंग्स रखती है. और ये तब थी, जब दोनों में बोहत hi काम बातें होती थी.

क्युकी, घर पे तोह कभी भी काव्य घरवालों के सामने बात न करती थी उस से.

पर जब भी वो दोनों अकेले एक दूसरे के रास्ते क्रॉस करते थे तोह दोनों में बातें ज़रूर होती थी. और पहल काव्य hi करती थी.

आज शायद वीर ने उससे कुछ ज़्यादा hi जोरर से धुत्कार दिया था, जिस कारण वो रोई भी और अब उसके सामने उससे बचाने के लिए कड़ी थी.

"मेरे भैया को टच करने की हिम्मत भी मत करना..."

काव्य ने जोरर से कहा. उसकी चंचलता जैसे कही खो चुकी थी और सामने था तोह बस दृढ़ता.

दृढ़ता अपने बड़े भाई को बचाने की.

अब वीर को ग्लानि महसूस हो रही थी.

'कुछ ज़्यादा hi जोरर से दांत दिया क्या मेने उससे?'

[No master! Don't worry! Wo zaroori tha. But ab bhul jaaiye usse. Aur ek naya relationship shuru kijiye...]

वीर ने अगले hi पल काव्य का कन्धा थामा और उसके हाँथ स्पर्श होते hi काव्य को एक हल्का झटका लगा. वो पलटी और अपने बड़े भाई को देखि...

"It's okay काव्य! और तुम कबसे मुझे बचाने लगी? ये काम तोह भाई का होता है ः~"

कहते हुए वीर ने काव्य को अपने पीछे कर लिया.

काव्य की आँखों में एक चमक सी आ गयी थी. एक ऐसी चमक जो न जाने कितने अर्सो बाद उसमे दिखाई दी थी.

एक आशा से भरी थी वो चमक...

अपने बड़े भाई के पीछे खड़े वो वीर की पीठ को घूरे जा रही थी.

'कभी मेने आपकी मदद न की वीर भैया... कभी नहीं... में करना चाहती थी... पर दरर्ति थी... घर में जो मौहौल था... वो मुझे आपके पास जाने से रोक देता था. जब मेने आपको मैसेज भेजा था मुझे उम्मीद थी आप वो पढोगे क्युकी आपकी और मेरी बातें हुआ करती थी. पर आपने वो न पढ़ा... में इतना रोई थी उस दिन... आज आपको देख कितना खुश थी में... पर आपने... आपने मुझे इस तरह क्यों धुतकारा भैया? क्यों??? मेरी कोई कसूर नहीं है... जिस तरह अभी आपने मेरा कन्धा थामा था उसी तरह मुझसे रहना भैया...'

काव्य अपने hi मैं में न जाने क्या क्या बोले जा रही थी.

"देखो! में तुम्हारी धमकी से..."

अभी वीर बोल hi रहा था की तभी पीछे से काव्य ने अपने दोनों हाथ उसकी कमर पर बांधते हुए उससे जकड लिया.

वीर : काव्य...!???

काव्य : I'm सॉरी भैया! I'm सॉरी...

वो कहते हुए सुबकने लगी...

और वह खड़ा अजय और दुविधा में पद गया.

यहाँ तोह पास उल्टा hi पड़ता जा रहा था. अब ऐसे में वो भला वीर की कुटाई कैसे कर सकता था?

वो अब पूरा कन्फ्यूज्ड हो चूका था की तभी उसका कन्फूसिओं जैसे यु गायब हो गया जब उसने बगल से आते हुए प्रांजल को देखा.

"काव्य!???"

प्रांजल ने आते हुए अपनी बहिन को देखा और फिर वीर को जो उससे घर के देख रहा था.

और फिर वही अपनी भेडियो वाली मुस्कराहट देते हुए वो वीर की तरफ बढ़ा,

"मेरे छोटे भाई!! क्या हो गया? किसी से झगड़ा हो गया क्या?"

तभी काव्य ने अपना चेहरा जो वीर की पीठ में दहस्सा हुआ था और आसुओ से भरा हुआ था उससे बाहर निकालते हुए प्रांजल को देखा और बोली,

"देखो न प्रांजल भैया! ये भैया वीर भैया को धमका रहे थे और लड़ाई करने वाले थे..."

अपनी छोटी बहिन की रोटी सूरत देख प्रांजल मुस्कुराया और अजय को देखते हुए बोलै,

"मुझे तोह जानते hi होंगे!?? ये मेरा छोटा भाई है! जो भी बात करनी है मुझसे करो..."

प्रांजल ने एकदम सफ़ेद झूठ बोलते हुए अजय को देखा जिसने हां में मुंडी हिलायी.

वीर केवल खड़े प्रांजल की हर्र एक हरकत को देख रहा था. वो जानता था की यही है जिसने अजय से उससे पिटवाया था और यही वो इंसान है जिसने कहो अजय को भेजा हो.

आस पास के लोग प्रांजल की बात सुन्न उसकी तारीफों के पुल्ल बाँधने लगे. की देखो, कैसे एक बड़ा भाई अपने दोनों छोटे भाई और बहनो को बचाने आया.

ऊपर से प्रांजल था भी मशहूर. पर ये बात कोई न जानता था की अजय उसी का साथी था, सिवाए उसके और उसके कुछ ख़ास साथियो के.

प्रांजल अभी भी इसी धोके में था की वीर को कुछ नहीं पता चला होगा. पर वीर जानता था...

जानता था की सब कुछ इसी की किया धरा है...

अभी उनमे से कोई कुछ कहता की तभी वह आरोही भी आ गयी,

"काव्य??"

आरोही ने देखा की कैसे उसकी प्यारी छोटी बहिन वीर की कमर में अपने हाथ कैसे उससे जकड़े हुए थी. और सबसे ज़्यादा हैरानी उससे इस बात से हुई की उसके आ जाने के बावजूद भी काव्य उसके पास न आयी. वो अभी भी वीर से hi चिपकी हुई थी...

और ये देख...

उसकी बॉहे एक अजीब hi चिंता के मारे सिकुड़ गयी.

न चाहते हुए भी प्रांजल को अजय को पकड़ते हुए ले जाना पड़ा.

और भीड़ देख इधर गार्ड भी सीटी मारते हुए सबको हटाने लगा.

अब केवल वीर, काव्य और आरोही hi वह खड़े हुए थे.

बाकी सभी लोग अपने अपने कामो में लग गए पर एक न एक नज़र उन् पर ज़रूर मार रहे थे.

आरोही : काव्य?

काव्य : हां दी??

आरोही : चलो!

उसने चिंतित भाव से देखते हुए बोलै और फिर वीर पे नज़रे डाली. दोनों की नज़रे एक दूसरे से टकराई पर दोनों के hi मुँह से कोई अलफ़ाज़ न निकले.

काव्य : आप चलिए! में चली जाउंगी अपनी क्लास में.

उसकी बात सुन्न आरोही ने आगे बढ़ वीर की कमर से उसका हाथ पकड़ हटाना चाहा पर तभी वीर ने उसका हाथ थाम लिया.

एक दूसरे के हाथो का स्पर्श पाते hi एक बार फिर दोनों की नज़रे आपस में मिल गयी.

जहा वीर आरोही के कोमल हाथो को फील कर सकता था तोह वही आरोही अपने हाथ पर वीर के उन् रफ़ मेनली हाथो को फील कर रही थी.

वीर : काव्य बच्ची नहीं है. वो खुद चलाई जाएगी अपनी क्लास में. में जाऊंगा उससे चौररने...

वीर की बात सुन्न आरोही ने फौरन hi विरोध करना चाहा पर होंठ खुलते hi एक शब्द भी बाहर न आया. निचले होंठ को जोरर से दांत से दबाते हुए वो वीर को देखि, फिर काव्य को और फिर न चाहते हुए भी वो पलट गयी,

'चेक!!'

[ नाम - आरोही

आगे - 22

बायो - आरोही एक बेहद hi शांत प्रवत्ति की लड़की है. काम बोलना शुरू से hi उसके व्यवहार में रहा है. उसका सपना है एक ऐसे पद पे पहुचना जहा उसके पास पावर हो. अपनी छोटी बहिन से सबसे ज़्यादा प्यार करती है. कुछ ग्लानि के भाव है मैं में तोह कुछ शंकाये भी. और बीते दिनों से कुछ टेंशन में चल रही है. उससे एक ऐसा व्यक्ति चाहिए जो उससे सही रास्ता दिखाए और उसके इक्वल पावर का हो.

फवौराबिलिटी - 20

रिलेशनशिप - कजिन.]

आरोही को यु जाता देख वीर ने उसका स्टेटस तोह देख लिया था पर फवौराबिलिटी के अंक देख वो खुद चिंता में था और थोड़ा उदास भी.

'इस से ज़्यादा तोह निधि Ma'am की फवौराबिलिटी है मेरे लिए जिनसे जान पहचान हुए मुझे कुछ hi वक़्त बीता है.'

अपना सर्र नाराज़गी में हिलाते हुए उसने काव्य के हाथो को पकड़ उससे अपने सामने किया, दोनों अंगूठे से उसके आसुओ को पोछा और बोलै,

"रोना नहीं है! चलो! तेरी क्लास तक तुझे चोरर दू."

"हम्म!!"

वो मुस्कुराते हुए बोली. वो खुद भी अकेली जा सकती थी पर जैसे अपने वीर भैया के साथ जाने के लिए ये उसका बहाना था.

उससे पता लग चूका था की अब उसके और उसके वीर भैया का रिश्ता पहले से कई गुना बेहतर हो चूका था. वो जानती थी की ये रिश्ता आगे आगे और भी बेहतर होएगा. और वो ये मौका नहीं खोने देना चाहती थी. आज वो खुद पे प्राउड महसूस कर रही थी. उससे खुद के किये पर hi ख़ुशी हो रही थी की आज उसने कितना अच्छा किया जो वीर की मदद करने के लिए आगे बढ़ी. उससे उसके भैया भी मिल गए. अब वो खुद को कोस रही थी की यही काम उसने परिवार वालो के सामने hi क्यों न किया?

काम से काम उन् ग्लानि के भावो से तोह बच जाती वह जो अभी भी कही न कही उसके अंदर मंडरा रहे थे.

काव्य को क्लास में चौररने के लिए वीर उसके साथ आ गया.

क्लास के बाहर hi वो कड़ी वीर को निहार रही थी. उसका मैं अपने वापस से मिले भैया को bye कहने का कर hi नहीं रहा था.

"जाओ अंदर!"

वीर ने इशारा करते हुए कहा.

काव्य : वो... हम फिरसे बात तोह...

वीर : Don't वोर्री! पागल! हम बातें भी करेंगे और जो भी अनकही बातें है, उन्हें सॉर्ट आउट भी करेंगे...

और बस..

उसके इतना कहते hi काव्य ख़ुशी से झूमती हुई एक बार फिर उससे बाहो में भर ली...

काव्य : थैंक यू भैया!!!

वीर ने प्यार से उसका सर थप तपाया और मुस्कुराते हुए कहा,

"चल चल! जा अब! सब तुझे hi देख रहे है. वो सोचेंगे की तूने बॉयफ्रेंड बना लिया."

"हहै~ तोह सोचने दो..."

काव्य भी हस्ते हुए बोली पर उसकी ये बात वीर को थोड़ी अजीब सी लगी.

और यु उससे अपनी क्लास में चोरर वीर अपनी क्लास की ऑर्डर निकल गया.

*डिंग*

[5 points have been rewarded.]

'गुड! ः~ ऐड थम तो माय स्ट्रेंथ.'

[Are you sure master?]

'यस!'

*डिंग*

[5 points has been added to Strength.]

[Inka effect aapko...]

'ी क्नोव... कल सुबह देखने को मिलेगा.'

वो क्लास में जा hi रहा था की उसकी नज़र सीढ़ियों पे खड़े अजय पर गयी जो बड़ी hi टेंशन में लग रहा था.

वीर ने देखा की वो किसी लड़की से बात कर रहा था और आगे बढ़ उसने देखा की ये वही लड़की थी जिसके कारण उसकी पिटाई की गयी थी.

चुपके से कान लगाते हुए उसने दोनों की बाते sunn'ne का प्रयास किया...

प्रज्ञा : ये सब क्या था? मुझे लगा तुम सेंसिबल बन्दे हो यार... एंड यू दीद थिस?

अजय : प्रज्ञा मेरी बात सुनो...

प्रज्ञा : क्या सुनु यार? मेने खुद अपनी आँखों से देखा है. मेरा तोह मैं कर रहा था वही बीच में कूद पदु और तुमको घसीट के ले जाऊ वह से...

अजय : ऐसी बात नहीं है प्रज्ञा... लिसेन...

प्रज्ञा : यार वो बाँदा चुप चाप खड़ा था और तुम्हे उस से प्रॉब्लम hi क्या थी? में तुम्हे hi देख रही थी. वो बाँदा आया और अचानक hi तुम उसके पास पहुँच गए... उसकी कल्लोर पकड़ने वाले थे की उसकी बहिन आ गयी बीच में.

अजय : हां! वो में मानता हु की में उसकी कल्लोर पकड़ने वाला था बूत...

प्रज्ञा : बूत क्या यार? वो तोह अच्छा हुआ उसकी बहिन के आने के बाद तुमने कोई गलत कदम नहीं उठाया वर्ण मेरी नज़रो में तोह तुम पूरी तरह से गिर जाते.

अजय : I'm सॉरी न यार! हो गयी गलती... इतना बुरा मानोगी तोह मेरा क्या होगा?

प्रज्ञा : हम्फ! इस बार माफ़ कर रही हु. आगे से नहीं करुँगी...

अजय : बिलकुल!!!

और दोनों फिर वापस से हस्सी मज़ाक करते हुए ऊपर की फ्लोर पे चले गए.

पर नीचे...

उन्हें नहीं पता था की उनकी बातें कोई तीसरा भी सुन्न रहा था.

वीर के चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कराहट थी.

एक ऐसी मुस्कराहट जो किसी डेविल की मुस्कान से काम नहीं थी.

'पारी!!!'

[Yes master!]

'अजय से बदला लेने के लिए रेडी हो न?'

[Mein toh hamesha aapki sewa me ready rehti hu master.]

'ग्रेट!!!'

और वही मुस्कराहट अपने होंठो पर सजाये वो वह से अपनी क्लास में चला गया.

न जाने क्या प्लान कर रखा था उसने.

***

मुंबई के hi शहर में एक बड़ी सी होटल के एक लक्ज़री कमरे में साड़ी लक्ज़री चीज़े राखी हुई थी.

होटल hi 5 स्टार थी.

अंदर बाथरूम में एक बड़ा सा जकूज़ी था जिसमे पानी में एक आदमी बैठा हुआ था और उसके अगल बगल दो नंगी लड़किया उसकी खिदमत करने में लगी हुई थी.

बाथरूम में hi एक लड़का भी था जो सर झुकाये खड़ा हुआ था.

"कुछ पता चला? कोई फाल्ट मिला?"

उस आदमी ने कहा.

तोह वो सर झुकाया लड़का ना में सर हिलाया और बोलै,

"भौ! सिक्योरिटी बोहत टाइट है! चाह के भी हम घुस न पाए."

आदमी : उस दिन साली हराम ज़ादी बच गयी... पूरे प्लान का कबाड़ा हो गया था.

गुस्से में आते हुए उसने वही राखी अपनी हॉकी स्टिक उठायी और लड़की के गर्दन में लपेट के उससे अपने लुंड की ऑर्डर खींचा,

"अच्छे से चूस... ये डर डर के करि न तोह यही भेजा उदा दूंगा समझी?"

बेचारी लड़की सेहमते हुए कापते हुए हां में सर हिलायी और उस आदमी का लुंड चूसने लगी जो पानी से बस थोड़ी ऊपर था.

वही दूसरी लड़की उस आदमी के सीने पर हलकी हलकी किस्सेस करे जा रही थी. डर उससे भी बोहत लग रहा था.

आदमी : रंगा!!!!

उस आदमी ने उस लड़के का नाम लेते हुए पुकारा,

रंगा : जी भौ!!!!

आदमी : तुम फाल्ट ढूंढ़ना जारी रखो. और में दूसरी तकनीक तोह लगा hi रहा हु.

रंगा : जी भौ! मेने आदमियों को बोल के रखा है.

आदमी : हम्म!

रंगा : भौ? क्या ये काम बोहत ज़रूरी है?

उसने थोड़ा सेहमते हुए पूछा. उससे डर था की कही उसके इस सवाल पे उसकी hi गर्दन न काट जाए.

आदमी : ये सवाल दुबारा मत पूछना कभी. स्लोगन दादा ने कहा है, मतलब करना है. और वैसे भी... उन्होंने इतने सालो बाद मुझे कोई काम सौपा है.

रंगा : क्या... क्या... क्या में पूछ सकता हु की ये स्लोगन दादा कौन है भौ?

एक बार फिर रंगा ने कांपते हुए पूछा. उसकी नज़रे एकदम नीचे hi थी. और उसके दिल की धड़कन एकदम तेज़्ज़. एक डर था की कही अचानक से एक बुलेट आके उसका भेजा hi न उदा दे.

आदमी : मेरे आदमी हो इसलिए उनका नाम सुन्न पा रहे हो. उनके बारे में jaan'na अभी तुम्हारी औकात से बाहर है. समझे?

रंगा : ज... जी भौ!

और कुछ पल के लिए शान्ति सी छा गयी. बस आवाज़ आ रही थी तोह केवल उन् लड़कियों के होंठो की जो उस आदमी के लुंड पर चले रहे थे और पानी की छाप छाप की...

उस आदमी ने अगले hi पल अपना वीर्य उस लड़की के मुँह में चोर्रा और एक लम्बी सास लेते हुए दोनों को अपने बगल से लगाते हुए वो सर्र टिका के बैठ गया.

आदमी : कुछ तोह करना होगा.

रंगा : भौ...!?

आदमी : हम्म??

रंगा : मुझे अभी याद आया... वो जो आपने तरकीब लगाई थी न... दूसरी लड़की के ज़रिये जो आपने इस लड़की तक पोहकहने का आईडिया लगाया था न... मुझे पता चला है की वो दूसरी लड़की कुछ दिनों से काफी डील्स कर रही है.

आदमी : हम्म? तोह तुम्हारा मतलब क्या है?

रंगा : यदि... हम... उन्ही किसी कंपनी के ज़रिये उस दूसरी लड़की के पास जाए और फिर उस दूसरी लड़की के ज़रिये उस पहली लड़की के पास... तोह??

और उसके इतना कहते hi उस आदमी की आँखों में एक चमक आ गयी... और फिर वो जोरर जोरर से हस्सन लगा.

आदमी : रंगा! तूने आज प्रूफ कर दिया की तू मेरा hi आदमी है. हाहाहाहाहा~

रंगा खुश होते हुए अभी भी सर्र झुकाये खड़ा रहा.

कोण थी आखिर ये पहली और दूसरी लड़किया? ये तोह वही दोनों जानते थे.

आदमी : बिलकुल! इसके लिए भी उपाय है मेरे पास... और सिक्योरिटी के चलते हम यही उपाय अपनाएंगे.

रंगा : जी... जी भौ!

आदमी : कम्पनीज के बारे में एक लिस्ट तैयार करो. जो जो कम्पनीज उस लड़की के पास आयी है डील के लिए. चाहे डील हुई हो या नहीं उस से फ़र्क़ नहीं पड़ता. जितनी भी आयी है, उनके बारे में दो दिन के अंदर मुझे एक लिस्ट चाहिए! समझे?

रंगा : जी भौ!

आदमी : बाकी क्या करना है... वो में देख लूंगा.

और वो मुस्कुराते हुए अपनी आँखें बंद कर वही सर्र टिकाये लेत गया.

***

अगला दिन...

रात का वक़्त था. और चाँद की चमकती हुई रौशनी एक बंगले की खिड़कियों से टकरा के वर्तित होते हुए बीएड पर लेती एक ख़ूबसूरत लड़की के चेहरे पर पद रही थी.

वो इस वक़्त किसी पारी से काम नहीं लग रही थी.

वाइट कलर की नाईट ड्रेस में वो किसी स्वर्ग लोक से आयी अप्सरा जैसी अपने बीएड पर लेते कुछ और hi ख्वाबो में खोयी हुई थी.

अपने फ़ोन की कांटेक्ट लिस्ट में वो एक नाम को देख को देख उस इंसान के बारे में सोचने लगी.

'िफ़ ओनली लाइफ वोउल्ड हैवे बीन जस्ट लिखे बिफोर.'

वो मैं में न जाने किस के बारे में सोच रही थी. पर इतना तोह ज़रूर था की वो इस वक़्त मायूस ज़रूर थी.

उसने वो नाम हटाते हुए एक और नाम पे अपना फोकस डाला...

ये कांटेक्ट नया भी था और नाम होते हुए भी अननोन था...

'शुड ी कॉल?? No... व्हाट ऍम ी इवन थिंकिंग?'

वो सर्र न में हिलाते हुए अपनी नींद में चली गयी.

पर उससे नहीं पता था...

की आने वाला समय...

उसके लिए क्या क्या लाने वाला था.

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आज के लिए इतना hi गाइस!

वर्ड काउंट ~ 4296

क्युकी मेरे हाथ दुखने लगे थे टाइप करते करते. :िडक1: इतना hi लो अभी के लिए. :अक्षय:


धन्यवाद!!
 
अपडेट - 15 ~ ान ऑय फॉर ान ऑय

अब तक...

'शुड ी कॉल?? No... व्हाट ऍम ी इवन थिंकिंग?'

वो सर्र न में हिलाते हुए अपनी नींद में चली गयी.

पर उससे नहीं पता था...

की आने वाला समय...

उसके लिए क्या क्या लाने वाला था.


अब आगे...

घर में अपनी माँ की आवाज़ सुन्न नींद के अघोष से एक लड़का सुबह सुबह उठा. ऐसे hi उसके दिनचर्या की शुरुआत होती थी.

अपनी धुन में मगन वो नाहा धो के कॉलेज जाने के लिए तैयार था.

जल्दबाज़ी में नाश्ता करते हुए वो अपने फ़ोन पर बिजी था और उसकी यही गन्दी आदत पर उसकी माँ उससे सुनाने लगी,

"कितनी बार कहा है की नाश्ते के वक़्त फ़ोन मत चलाया करो पर तुम हो की सुनते hi नहीं? और इतनी क्या जल्दी है बीटा की नाश्ता करने के लिए भी टाइम नहीं है? अरे, 2-4 मिनट लेट भी पहुँचोगे तोह टीचर भगा नहीं देंगे तुम्हे बीटा."

वो औरत अपनी बॉहे सिकोड़े अपने बेटे की हरकत से नाखुश होते हुए बोली.

पर उसके बेटे को तोह जैसे कोई फ़र्क़ hi नहीं पद रहा था. इस कान से सुन्न उस लड़के ने अपनी माँ की बातें अपने दूसरे कान से निकाल दी.

और बस, मुँह में नाश्ता भरे, चबाते हुए उसकी नज़रे एक तक फ़ोन में लगी हुई थी.

औरत : पढ़ाई का क्या हुआ? एक्साम्स आने वाले है न? कुछ पढ़ते हो रात में रूम में? या पूरे टाइम वोई पुबज खेलते रहते हो??

लड़का : अरे हो जाएगी न यार माँ. क्यों टेंशन लेती हो?

औरत : पता नहीं कब सुधरोगे तुम...

वो उदास होते हुए उठ के अंदर किचन में गयी और एक वाटर बोतल लाते हुए अपने बेटे के बैग में रख दी जो वही सोफे पर पड़ा हुआ था.

अगले पल hi वो लड़का नाश्ता ख़तम कर खड़ा हुआ अपना बैग उठाया और बोतल साइड में फास्सी देख उससे निकाला और बाहर चल दिया,

"अरे बोतल क्यों रोज़ रोज़ निकाल देता है? पानी नहीं पियोगे क्या?"

वो चिल्लाते हुए बाहर आयी जहा उसका बीटा अपनी ढुके बाइक निकालने में बिजी था.

लड़का : अरे माँ! कितनी बार बताऊ, दोस्त लोग रहते है न... सब के सब बोतल लाते है. ये फ़ालतू में रख के क्यों अपने बैग का बोझ बढ़ाऊ? तुम टेंशन न लो यार... अब जाओ अंदर.

औरत : अजेय्यी... कुछ भूल तोह नहीं रहा न??

पर अपनी माँ की आवाज़ को अनसुना कर वो बस अपनी hi धुन में खोया हुआ था और घर से यु हवा के झोके की तरह निकल गया.

ये और कोई नहीं, वीर की पिटाई करने वाला वही लड़का था ~ अजय.

अजय की माँ सुषमा वही दरवाज़े पर कड़ी कड़ी अपने hi ख्यालो में घूम हो गयी. चिंता, शिकन उसके चेहरे पर साफ़ नज़र आ रही थी.

अपने बीटा का ऐसा रवैया उससे हमेशा सोच में डालने पर मजबूर कर देता था और उसका अपने आप से बस एक hi सवाल रहता था.

की आखिर कब उसके बेटे की ये आदतें छूटेंगी? और कब वो उसकी बातो पर ध्यान देना शुरू करेगा?

चाहे अजय जैसा भी था, था तोह उसका बीटा. उसका अपना कलेजा... उसमे सुषमा की जान बस्ती थी.

और शायद यही एक कारण भी था की वो ज़्यादा जोरर से उससे दांत भी नहीं पाती थी क्युकी वो एकमात्र औलाद जो थी उसकी और उसके पति की.

एक गंभीर आह चोरर वो वापस दरवाज़ा लगाते हुए अंदर चली गयी.

***

इधर अजय बिना अपने माँ के प्रति रवैय्ये पर ध्यान दिए अपने hi विचारो में लीं था.

काफी खुश सा भी लग रहा था वह. न जाने ऐसा क्या कारण था?

बड़े hi जोश से भरपूर और एक्ससिटेड होते हुए वो कॉलेज में प्रवेश किया.

अपने अपने पंटरों से उसकी मुलाक़ात हुई. सभी को हाई फाइव देते हुए वो अपनी क्लास में घुसा.

आखिर वो दादा था अपनी क्लास का. 3रद ईयर था ये उसका कॉलेज में और पूरी क्लास में उसका रौब था. एक इमेज थी उसकी. एक बडबोय की इमेज.

जिसकी पीछे अक्सर लड़किया भागती थी. पर केवल वही लड़किया जिन्हे पटना बेहद आसान होता था और उनमे ज़्यादा कोई खुबिया नहीं होती थी.

एक ऐसी लड़की जो समझदार हो और साथ hi साथ तीक्ष्ण बूझ वाली हो वो कभी भी ऐसे लड़को पर अपना टाइम वास्ते नहीं करेगी.

शायद यही कारण था जो प्रज्ञा को उन् सब लड़कियों में से अलग बनाता था. अजय के कई बार प्रोपोज़ करने के बाद भी, प्रज्ञा ने उससे सिर्फ अस ा फ्रेंड hi बनाये रखा था.

और इसलिए अजय उससे और भी ज़्यादा पाना चाहता था. जितना कोई चीज़ आपसे दूर भागती है, उससे पाने की लालसा आपकी और भी बढ़ जाती है. यही हाल था अजय का.

प्रज्ञा की अदा, उसकी वो कारेफ़री पर्सनालिटी और इजी गोइंग ऐटिटूड जैसे उससे बाकी साड़ी लड़कियों से अलग कर देता था अजय की नज़रो में.

उससे और कोई लड़की भाति hi नहीं थी. बस प्रज्ञा hi उसके दिमाग में घूमती रहती थी.

आज भी ऐसा hi कुछ था. आज प्रज्ञा कॉलेज नहीं आयी हुई थी पर उसके बावजूद अजय का ध्यान तोह जैसे उसपे hi लगा हुआ था.

उसकी हर्र एक इमेज अजय के मैं में आ रही थी. उसका हस्सना, बातें करना, अद्विसेस देना, सब कुछ उससे बड़ा याद आ रहा था.

पर अजय जानता था. आज कुछ काम था उससे. जिसके चलते वो आज कॉलेज नहीं आयी थी.

उसके बारे में सोच अजय ने अपनी सीट पर बैठे अपना फ़ोन निकाला और वो प्रज्ञा को कॉल करने hi वाला था की तभी उसके फ़ोन पे एक अननोन नंबर से मैसेज आया,

'आज बोर हो रहे हो न?'

मैसेज पढ़ अजय सोच में पद गया. ये भला अननोन नंबर से उसके फ़ोन पे मैसेज कहा से आ गया? और भला ऐसा मैसेज क्यों आया उससे? कही रॉंग नंबर पे तोह मैसेज नहीं भेज दिया सेन्डर ने?

उसने कन्फ्यूज्ड होते हुए रिप्लाई भेजा,

'कौन??'

और अगले hi पल उससे फिरसे मैसेज आया,

'ओह होऊ!! तुमने रियली मुझसे ये सवाल किया? यू डेसेर्वे ा पनिशमेंट.'

मैसेज पढ़ भले hi अजय कन्फ्यूज्ड था पर इस अननोन सेन्डर से बातें करते हुए जैसे अब उससे इंटरेस्ट सा आने लगा था.

उसने फिरसे एक मैसेज भेजा...

'में नहीं जानता आप कौन हो. शायद रॉंग नंबर लग गया है आपका. अपना नाम बताइये!'

उसने ऐसा लिखते हुए मैसेज भेजा पर कुछ देरर तक कोई रिप्लाई न आया और वो लगातार अपनी मोबाइल की स्क्रीन पर टीचर से बच बच के देखता जा रहा था.

कुछ मिनट के बाद hi उससे रिप्लाई आया,

'मुझसे पूछ रहे हो कौन हु में? बीटा इतना मारूंगी न...'

और उससे पढ़ते hi पता नहीं क्यों पर अजय के चेहरे पर एक मुस्कान आ गयी. अब उससे इतना तोह पता चल गया था की ये जो भी है एक लड़की है.

उसने फटाफट एक मैसेज टाइप किया और भेज दिया,

अजय : अच्छा चलो नहीं पूछता. पर अब ये तोह बता दो की मुझे मैसेज क्यों किया है?

अननोन : अच्छा बच्चू? ऊपर पढ़ो न क्या लिख के भेजी थी में.

अजय ने सबसे पहला मैसेज पढ़ा जिसमे लिखा था,

'आज बोर हो रहे हो न?'

और उससे पढ़ने के बाद उसने रिप्लाई दिया,

अजय : हां! पढ़ा मेने. और आपको कैसे पता में बोर हो रहा हु?

अननोन : ऑब्वियस्ली ी क्नोव... तुम्हारी राग राग से वाक़िफ़ हु में.

एक बार फिर अजय मैसेज पढ़ बड़ा hi कंफ्यूज हो गया. आखिर कौन थी ये बंदी जो उससे ऐसे मेस्सगेस भेज रही थी?

कौन थी ऐसी वो लड़की जो उसकी राग राग से वाक़िफ़ थी?

उसने सोचने का प्रयास किया की आखिर कौन हो सकती है ये लड़की पर इतना सोचने के बाद भी उससे कोई जवाब न मिला.

बस एक hi जान था जो उसकी राग राग से वाक़िफ़ था कॉलेज में और वो लड़की थी प्रज्ञा.

प्रज्ञा के बारे में सोचते hi उसके दिमाग में एक घंटी सी बजी. प्रज्ञा hi तोह एक लड़की थी जो उसकी बेस्ट फ्रेंड थी एकदम.

वही तोह उससे बखूबी जानती थी. और वही तोह ऐसे बात करती थी उस से?

जैसे hi अजय ने ऊपर के सारे मेस्सगेस पढ़े, उससे 70% लगने लगा की ये बंदी प्रज्ञा hi थी.

पर उसके पास प्रज्ञा का नंबर तोह पहले से hi था फिर वह भला अननोन नंबर से उससे मैसेज क्यों भेजेगी?

और यही सोच उसने एक और मैसेज भेजा...

अजय : तुम प्रज्ञा? तेल्ल में! ी क्नोव मेने सही कहा है. अब झूठ मत बोलना...

अननोन : अरे यार! सही में... ी थॉट की थोड़ा तोह मज़े लू तुम्हारे. इतनी जल्दी गेस करने की क्या ज़रुरत थी पागल.

और अगले hi पल अजय के चेहरे पे मुस्कान आ गयी.

उसकी मुस्कान अलग hi बया कर रही थी की वो पूरी तरह से इस शख्स को पहचान गया है.

अजय : ये अननोन नंबर से मैसेज क्यों कर रही हो?

प्रज्ञा : अरे यार... मेने तुम्हे क्या बताया था कल?

अजय : यही की तुम्हे कल चाचा के घर जाना है?

प्रज्ञा : हां! तोह वही हु. वो चाचा आज नई सिम लाये थे तोह मेने सोचा क्यों न तुम्हारे साथ मस्ती की जाए नई सिम से ः~

अजय : तू भी न यार! 😅

प्रज्ञा : मुझे पता था तुम बोर हो रहे होंगे. में तोह गयी नहीं आज. तुम्हारे वे दो चार फ्रेंड्स तुम्हे पका रहे होंगे और तुम मुझे मिस कर रहे होंगे.

अजय : ये बात तोह है. मिस तोह बड़ा कर रहा हु तुम्हे. और ये बात तुम भी जानती hi हो ☺

प्रज्ञा : फ़्लर्ट कर रहे हो? पागल कही के...

अजय : ः~ तुम्हारा प्लान फ़ैल हो गया बूत...

प्रज्ञा : ी क्नोव!!! तुम और तुम्हारी आदत... अच्छा सुनो...

अजय : ??

प्रज्ञा : उस दिन मेने तुमसे उस लड़के के बारे में बात की थी न?

अजय : कौन?

प्रज्ञा : अरे पागल जिससे तुम मारने वाले थे...

अजय : ओह्ह! हाहाहा~ वो चूज़ा? उसके बारे में क्या?

प्रज्ञा : वो मेरे पास आया था.

अजय : व्हाट?

प्रज्ञा : यस! और वे बातें तुमसे करनी है और एक और सरप्राइज है तुम्हारे लिए.

अजय : सरप्राइज? सरप्राइज चोर्रो और उस चूतिये की हिम्मत कैसे हुई तुम्हारे पास आने की?

प्रज्ञा : व्हाट थे हेलल? उससे क्या अपॉइंटमेंट लेना पड़ेगा मेरे पास आने के लिए? हे जस्ट चामे...

अजय : बूत क्यूँउउ?????

प्रज्ञा : तुमसे रिलेटेड hi बात थी...

अजय : क्या??

प्रज्ञा : वो बाद में बताउंगी न... अभी सुनो! इस नंबर पे कॉल मत करना okay? ये चाचा का नंबर है.

अजय : Okay! बूत... बताओगी कब?

प्रज्ञा : कहा न! सरप्राइज भी देना है. जब में खुद इस नंबर से मैसेज करुँगी बस पढ़ते जाना और बिलकुल वैसा hi करना okay? No सवाल! वर्ण पनिशमेंट मिलेगी.

अजय : अच्छा जी! जैसा आप कहोगी बिलकुल वैसा hi होगा.

प्रज्ञा : गुड! शाम में बात करती हु. अभी चाचा को फ़ोन चाहिए है. तब तक कॉलेज भी चूत जाएगा.

और इतना बोल प्रज्ञा ने दुबारा कोई मैसेज न भेजा.

अजय मुस्कुराते हुए कॉलेज के लेक्टर्स तोह कही अपने दोस्तों के साथ बकचोदी में व्यस्त हो गया.

आज भले hi प्रज्ञा नहीं आयी थी कॉलेज पर उसके साथ यु इस तरह से बातें कर के वो ख़ुशी से फुला नहीं समां रहा था.

आज ये पहली बार था जब प्रज्ञा ने ऐसा कुछ उसके साथ किया था. आज तोह वो जैसे सातवे आसमान पर था.

आज उसका दिल गार्डन गार्डन हो चला था. और बस अंदर एक hi गाने की पंक्तिया गूँज रही थी,

उड़ता hi फिरू... इन् हवाओं में कही...

या में झूल जाऊ... इन् घटाओं में कही...

पहला नशा... पहला खुमार...

नया प्यार है... नया इंतज़ार...

अजय यु पंक्तियों को गुनगुनाते हुए अपने पंटरों के सर्र पर तपली भी मार रहा था, मज़ाकिया ढंग में. वो जैसे बिलकुल खो सा गया था आज.

कॉलेज का डिपार्चर हो चूका था और वो पार्किंग में से अपनी बाइक निकाल रहा था. शुरू से अंत तक उसके चेहरे पर मुस्कान थी. यहाँ तक की आज उसके दोस्त भी उससे 'प्यार में पागल हो गया है' कह कह के उससे चेरर रहे थे और न चाहते हुए भी अजय बस शर्म के मारे शर्माता जा रहा था.

न जाने क्या hi सरप्राइज प्लान किया हुआ था उसकी प्रज्ञा ने. उससे सोचते सोचते वो बाइक पार्किंग से बाहर लाया और साइड में गाडी रोकते हुए उसने एक बार अपना फ़ोन चेक किया क्युकी एक पल के लिए वो विबरते हुआ था.

और स्क्रीन पर नोटिफिकेशन देखते hi उसके चेहरे पर फिरसे एक मुस्कान आ गयी.

प्रज्ञा का मैसेज आया हुआ था...

प्रज्ञा : ोये! सुनो! अब सरप्राइज की बात करले? हां तोह वो क्सक्सक्सक्सक्सक्सक्सक्स चौराहे पर गिफ्ट शॉप देखि है न? काफी फेमस है यार वो तोह... अब ना मत कह देना.

मैसेज पढ़ते hi न चाहते हुए भी अजय की हस्सी चूत गयी. अपने सर्र के पीछे पर बालो में हाथ फरते हुए उसने बाइक में बैठे बैठे hi रिप्लाई किया,

अजय : जी! टीचर जी! जी! मुझे पता है.

प्रज्ञा : थैंक गॉड! Okay! अब जाओ वह पे...

अजय : वह पे? बूत क्यों?

प्रज्ञा : कहा न जाओ! मेने कहा था न बाबा... No सवाल एंड आल...

अजय : जी! जी! जो हुकुम आपका देवी!!

और मुस्कुराते हुए अजय अपने ख्यालो में डूबे गाने गाते हुए बाइक से चल दिया प्रज्ञा की बतायी हुई डेस्टिनेशन की ऑर्डर.

सवाल तोह कई सारे थे उसके मैं में पर अब उससे भी जैसे ये खेल खेलने में मज़ा सा आने लगा था. और तोह और वो काफी एक्ससिटेड भी था ये सरप्राइज लेके...

कुछ hi मिनट बाद वो पहुँच चूका था उस गिफ्ट शॉप पर जो प्रज्ञा ने बतायी थी.

तभी उसका फ़ोन फिरसे विबरते हुआ...

प्रज्ञा : पहुँच गए???

अजय : यस!!! अगला हुकुम दीजिये देवी जी!

प्रज्ञा : हम्म! अब अगला हुकुम है की... बुय ा रोज फ्लावर फ्रॉम तेरे...

ये पढ़ते hi अजय के दिल की धड़कने तेज़्ज़ हो गयी...

अजय (मैं में) : क्या वो मुझे...!?

उसने पूछना चाहा की ये किसलिए पर दूसरी साइड से बस एक hi जवाब आया~

'जैसा बोल रही हु वैसा करो'

और बस! फिर क्या था. फिर तोह जैसा जैसा प्रज्ञा ने बोलै अजय ने ठीक वैसा hi किया.

एक प्यारा सा रोज का फूल लेते हुए वो बाहर आया और उसके प्रज्ञा को मैसेज भेजा की उसने फ्लावर ले लिया है.

और अगले hi पल उससे एक और मैसेज आया,

प्रज्ञा : ले लिया न... अब जाओ क्सक्सक्सक्सक्सक्सक्सक्स शॉप पे. वह से क्सक्सक्सक्सक्सक्स चॉकलेट खरीदो.

और प्रज्ञा का अगला हुकुम पाके अजय चल दिया दूसरी दूकान की ऑर्डर. पर जैसे जैसे काम प्रज्ञा उस से करवा रही थी, वैसे वैसे hi उसकी दिल की धड़कने बढ़ती जा रही थी.

कही ये वही पल तोह नहीं था? जिसका उससे बेसब्री से इंतज़ार था? कही प्रज्ञा उसके प्रपोजल को एक्सेप्ट तोह नहीं करने वाली थी? कही इसलिए तोह नहीं वो उस से ये सब करवा रही थी? क्या वो फिरसे चाहती थी की अजय उससे प्रोपोज़ करे और इस बार वो उसका प्रपोजल एक्सेप्ट कारे?

न जाने कितने सवालों से अजय का दिमाग घिरा हुआ था पर इन् सब का जवाब तोह केवल प्रज्ञा hi दे सकती थी.

दूसरी दूकान में पहुँच कर, अजय ने बतायी गयी चॉकलेट खरीदी और इतना खरीदते hi उससे एक और मैसेज आ गया,

प्रज्ञा : अब क्सक्सक्सक्सक्सक्सक्सक्स तोय शॉप जाओ और वह से एक पिंक टेडी खरीदो...

उसकी बात पढ़ अब तोह जैसे अजय को पूरा कन्फर्म सा हो गया था की जो वो सोच रहा था शायद वही होने वाला था और ये सोचते hi उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था.

तीसरी दूकान जाके उसने वह से निर्देश अनुसार एक पिंक टेडी लिया और सब कुछ लेके वो अपनी बाइक पे सवार हो गया.

प्रज्ञा : ले लिया न?

अजय : अब और कितना सामान ख़रीदवाओगी यार? तीनो दुकाने इतनी दूर दूर थी. बूत तुम्हारे लिए इन् दूरियों की परवाह नहीं की मेने...

प्रज्ञा : ॉव! सो स्वीट! अब सुनो... फौरन hi मुझे कॉलेज की पीछे वाली रोड पर मिलो. ी हैवे ा सरप्राइज फॉर यू... में इधर hi हु...

अजय : व्हाट? तुम वह? बूत वह क्यों मिलना है? पागल! तुम्हारे गिफ्ट्स के चक्कर में 6:30 बज गया. और तुम वह क्या कर रही हो? वो रोड सेफ नहीं प्रज्ञा!

प्रज्ञा : इतनी hi परवाह है मेरी तोह फिर आओ न जल्दी.

अजय : फाइन! में आता हु!

मैसेज भेज अजय तेज़्ज़ रफ़्तार में अपनी बाइक भगाते हुए कॉलेज के पीछे की सड़क पर जाने लगा. एक्ससिटेमेंट तोह कूट कूट कर भरता जा रहा था उसमे...

और कुछ hi समय बाद वो सारा सामान लेके वह पहुचा तोह फिर से उससे एक मैसेज आया,

प्रज्ञा : वो बोर्ड लगा है न... डायरेक्शन वाला. उसके पास आओ.

और मैसेज पढ़ अजय थोड़ा आगे लगे उस बोर्ड के पास पहुँच गया. उसने गाडी रोकी और वो बाइक से उतरा. सामान की थैली उसकी बाइक के हैंडल पर hi तंगी हुई थी.

तभी एक बार फिर उसका मोबाइल विबरते हुआ और उसने मैसेज पढ़ा,

प्रज्ञा : यू सी थे ट्री? तुम्हारे लेफ्ट वाला? I'm जस्ट बिहाइंड आईटी.

और इतना बोल प्रज्ञा ने फिर कोई मैसेज न भेजा.

अपने दिल की तेज़्ज़ धड़कने लिए अजय उस पेड़ की तरफ बढ़ने लगा. और अगले hi पल उसकी आँखों में एक चमक आ गयी...

उससे पेड़ के पीछे से...

एक पिंक कलर की चुनरी का हिस्सा हवा में लहराता हुआ दिखाई दिया. भले hi शाम के 6:45 बज रहे थे पर इसके बावजूद इतना सब कुछ आराम से देखा जा सकता था.

हल्का हल्का अँधेरा बस छाया हुआ था. एक आशा लिए वो आगे बढ़ा...

और उसने पेड़ के बगल से अपना सर आगे बढ़ाते हुए पेड़ के पीछे देखने का प्रयास किया...

की तभी...

"सरप्राइज मोथेरफुचका..."

*पाउ*

एक तेज़्ज़ ज़ररदार घुसा उसके जबड़े पे किसी ट्रैन की रफ़्तार जितनी तेज़्ज़ी में आते हुए पड़ा और अगले hi पल वो थोड़ा उचकते हुए पीछे की ऑर्डर रोड पर धड़ाम से जा गिरा.

कुछ सेकण्ड्स तक तोह उससे कुछ समझ hi ना आया. फिर जैसे उससे भयानक दर्द उठा अपने जबड़े में और गाल पे...

और फिर उसने आँखें खोल ऊपर नज़रे करते हुए देखा तोह पहले तोह सही से नज़र न आया. तारे जो छा गए थे आँखों के सामने वो ज़ोरदार घुसा खाने के बाद.

जब फाइनली उससे सही से नज़र आया तोह उसने देखा की एक जाना पहचाना चेहरा उसके सामने खड़ा हुआ था.

ये कोई और नहीं वीर hi था.

उसके गले में एक पिंक कलर की चुनरी किसी मफलर की तरह बंधी हुई थी.

जैसे hi अजय ने वीर को देखा उसका गुस्सा सातवे आसमान पर पहुँच गया. वो उठा...

अजय : चूज़े तू? तेरी ये मजाल?

और गुर्राया...

पर कोई फायदा नहीं...

*पाउ*

एक लात ठीक उसके सीने पर आकर पड़ी जिससे खाते hi वो हवा में उछाल पीछे की ऑर्डर जा गिरा.

दर्द में कराहते हुए अजय जैसे तैसे खड़ा हुआ पर इस बार तोह जैसे लात और घुसो की झड़ी लग चुकी थी...

अजय ने हमलो को काउंटर तोह किया पर कोई फायदा नहीं...

*पाउ*

"ये घुसा... मेरी पिटवायी करवाने के लिए."

*पाउ*

"ये लात... मेरी बेइज़्ज़ती करने के लिए."

*पाउ*

"ये घुसा... मेरा मज़ाक बनाने के लिए."

वीर के हर्र प्रहार पर उसकी आवाज़ तेज़्ज़ होती जा रही थी. गुस्सा उसकी आवाज़ में साफ़ झलक रहा था.

और हर्र एक वार उसका पूरी ताक़त से भरपूर था.

अजय की हालत पीटते पीटते बत्तर होती जा रही थी.

और अगले hi पल वो ज़मीन पर गिर पड़ा.

तभी उसके गिरते hi...

वीर ने अपना परर उठाया और उसके सर्र पर जोरर से दबाव बनाते हुए रखा,

"अअअअअअअरररररग्ग्घहहहहहह!!!"

एक तेज़्ज़ कराह अजय के मुँह से निकली.

जूता उसके सर्र पर टिकाये हुए वीर बोलै,

"ौलेलेलेले बच्चे को दर्द हो रहा है? रुको अभी दर्द दूर कर देता हु."

ये वही बोल थे जब अजय ने ठीक इसी तरह इसी जगह पर इसी वक़्त वीर के सर्र पर ऐसे लात रख के बोले थे. और आज वो खुद वीर के अपने जूतों के नीचे था.

अभी दर्द से अजय चींख hi रहा था की तभी उसके मुँह में कुछ ज़बरदस्ती ठूस दिया गया...

और जैसे अगले hi पल उससे अंदाजा लग गया की वो क्या चीज़ थी...

एक लोल्लिपोप!!!!

वीर : तुझे पता है में ये लोल्लिपोप लेके क्यों घूमता हु हमेशा? ताकि तुझ जैसे बच्चे जब उधम करने लगते है न तोह उनकी अकाल ठिकाने लगा सकू.

ये वही बोल थे...

अजय के खुद के बोल...

जिन्हे वीर ने अपने ज़ेहन में अब तक बैठाये हुए थे ठीक इसी वक़्त पर उन्हें चुकाने के लिए.

और अगले hi पल न चाहते हुए भी, दर्द के मारे और अपनी इस हालत की अनभूति होने के चलते, अजय के ासु निकलने लगे.

*ठयऊ*

और फिर अचानक hi उसके ऊपर वीर का थूक गिरा.

ऐसे hi उसने वीर के ऊपर थूका था.

ये तोह बदला था.

वीर का बदला.

शायद अब उससे समझ आ रहा था की कभी मार खाते हुए कैसा लगता है.

"क... कैसे!?"

अजय ने वीर के परर पकड़ अपनी अधखुली आंखों से उससे देखा. उसके होंठ काँप रहे थे...

वीर : कैसे? आईटी वास् में आल अलोंग यू इडियट! वो प्रज्ञा नहीं... में hi था. ी मेड यू ा फूल...

अजय को इस बात का बोध होते hi और गुस्सा आने लगा. कितना गलत था वह.

इतना बेवक़ूफ़ कोई आखिर कैसे बन्न सकता था?

पर वो बना था...

और वो भी वीर के हाथो, जो उसकी नज़रो में बस एक चूज़ा था.

*पाउ*

और अचानक hi वीर ने कुछ और हमले किये, जिसके चलते अजय पूरी तरह बेहोश हो गया.

उससे घसीट कर वीर उसकी बाइक के पास लाया और उसकी बाइक भी गिराते हुए वही उसके क़रीब दाल दी. ताकि लोगो को लगे की वो भिड़ने के चलते बेहोश हो गया.

वीर ने सारा सामान उसकी बाइक से उठाया और जाते जाते उसने एक आखिरी बार बेहोश हुए अजय पर डाली...

"ी प्रॉमिस्ड समवन... की अब से यदि जियूँगा तोह एक राजा की तरह... और यदि मरूंगा भी... तोह भी एक राजा की hi तरह..."

[ :ब्लश: ]

धीमी आवाज़ में वो खुद से इतना बोल वह से चल दिया...

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आज के लिए इतना hi गाइस!


धन्यवाद!
 
अपडेट - 16 ~ बाद टाइमिंग

अब तक...

वीर ने सारा सामान उसकी बाइक से उठाया और जाते जाते उसने एक आखिरी बार बेहोश हुए अजय पर डाली...


"ी प्रॉमिस्ड समवन... की अब से यदि जियूँगा तोह एक राजा की तरह... और यदि मरूंगा भी... तोह भी एक राजा की hi तरह..."

[ :ब्लश: ]

धीमी आवाज़ में वो खुद से इतना बोल वह से चल दिया...


अब आगे...

"ायर्घ्हहहह!!!!" अचानक hi उसकी एक कराह निकली. शरीर में जगह जगह दर्द का एहसास हो रहा था. उससे अपने चेहरे पर कुछ गीला गीला महसूस हुआ.


पलके झपकी, और धीरे धीरे उससे सामने का नज़ारा आया. दो अनजान आदमी झुक के उससे hi देख रहे थे और एक हाथ से बोतल लेके पानी के छींटे उसके चेहरे पर मार रहा था.

"हां हां उठ गया... उठ गया."

"उठा? और डालो थोड़ा..."

उनकी बातें सुन्न वो लड़का कुछ कह पाटा की तभी एक और बार पानी का छीटा उसके चेहरे पर पड़ा और अगले hi पल उसने जोरर से सर्र दाए बाए हिलाया और उन्हें रोकने के लिए अपने हाथ आगे बढाए.

दोनों hi आदमी उसका इशारा देख ृक्क गए.

"अरे भाई! ठीक हो?"

उस लड़के न हां में गर्दन हिलायी और दोनों ने उससे पकड़ के उठाया.

"क्या नाम है भाई?"

उनमे से एक आदमी ने पूछा तोह लड़के ने अपना नाम बताया, "अजय!"

आदमी : ऐसे रस्ते में डेल थे भैया तुम. नशे में थे क्या?

अजय : नहीं! वो में... कुछ नहीं बैलेंस बिगड़ गया था इसलिए गिर गया.

आदमी : कमाल है भाई! इतनी खाली सड़क पे बैलेंस बिगड़ गया? तुम तोह बड़े हैवी ड्राइवर निकले भाई. कोणु करतब करतब कर रहे थे क्या बीच रास्ते में?

अजय : नहीं! वो सामान था ज़्यादा इसलिए...

इतना बोल जैसे hi अजय ने अपनी बाइक पर नज़र डाली उससे एक और झटका लगा. उसका सारा सामान गायब था. वो महंगी चॉकलेट का डब्बा, वो पिंक टेडी, वो रोज, सब कुछ गायब था.

और उससे जैसे hi ये ध्यान में आया की ये हरकत किसकी होगी, उसका पारा चढ़ गया. अपनी मुट्ठी कस्ते हुए वो वीर को याद करते hi अपने दांत पीसने लगा.

आदमी : सामान? कोण सा सामान? यहाँ कोई सामान नहीं मिला है हमे तुम्हारा. लगता है कोई लेके भाग गया. बताओ...

आदमी 2 : आज का ज़माना ऐसा hi है भाई. वो तोह हम लोग थे जो तुम्हे देख के फौरन आये.

अजय : जी! थैंक यू! मेरी मदद करने के लिए.

आदमी : कोई बात नहीं! संभल के चलाया करो.

अजय : जी!

और इतना बोल वो दोनों आदमी अपनी बाइक पर बैठ निकल गए.

इधर अजय अपनी बाइक की तरफ आया. उसने फ़ोन निकाल के देखा, तोह पाया की 7:30 हो रहा था. और उसका फ़ोन साइलेंट में होने के कारण न जाने कितने मिस्ड कॉल्स उसकी माँ, सुषमा के डेल हुए थे.

उसने अपनी बाइक उठायी, और एक बार फिर कराहते हुए सीट पे बैठा.

'याद रखूँगा में ये चूज़े. याद रखूँगा. हर्र एक हिसाब चुकाऊंगा.'

अपने आप से मैं में संकल्प बांधे वो बाइक उठा के वह से निकल गया.

***

इधर जब वीर अजय को सूतने के बाद, हाथो में सामान लिए, रास्ते में चलते हुए जा रहा था तभी उससे मिशन कम्पलीट करने के लिए सिस्टम की तरफ 30 पॉइंट्स मिले थे.

जो अभी तक उसने ऐड नहीं किये थे किसी भी स्टेट में.

अभी वो रास्ते में चलते हुए hi जा रहा था. पैसे तोह थे नहीं उसके पास, और निधि से उसने पैसे लिए नहीं थे. निधि ने कुछ पैसे देने का प्रयास किया था उससे पर उसने ये कह के मन कर दिया, की अभी ज़रुरत नहीं है, जब बोहत ज़रूरी होगा तोह वो खुद मांग लेगा.

वीर जानता था निधि के घर की स्थिति. वो इतना जानता था की निधि पैसा इखट्टा कर रही है. किस कारणवश? ये उससे नहीं पता था. पर इतना ज़रूर पता था उससे की कोई कारण है जिसके चलते निधि जल्द से जल्द पैसा इखट्टा करना चाहती है.

और शायद इसलिए वो अपनी जॉब कैसे भी करके नहीं चोरर्ण चाहती. इसलिए, वो विकास की हरकतों को बर्दाश्त करती रहती है.

और यही कारण था की वीर ने अभी तक निधि से पैसे नहीं लिए थे. वो यहाँ तक आया भी था तोह लिफ्ट ले ले के. और अभी भी वो लिफ्ट का hi इंतज़ार कर रहा था चलते चलते.

भले hi वीर ने निधि की बात काट दी थी, पर निधि ने ज़बरदस्ती उससे अपना एक पुराना फ़ोन पकड़ा hi दिया था. इसी फ़ोन की मदद से तोह वीर ने अजय को चोमू बनाया था.

अपनी वही पुरानी सिम दाल के वो इससे उसे कर रहा था. अब उसकी बात काव्य से भी व्हत्सप्प पर होने लगी थी.

अभी वो चलते चलते जा रहा था और आखिर कार उससे लिफ्ट मांगने पर एक भले व्यक्ति ने उससे लिफ्ट दी और उसने वीर को निधि के घर से बस कुछ दूर मोड़ पर चोरर दिया.

यहाँ से घर थोड़ा सा hi दूर था, तोह वीर को अब कोई टेंशन नहीं थी पैदल जाने में. वो निधि की गाडी लेकर नहीं आया था, इनफैक्ट वो घर में कुछ बता के भी नहीं आया था. और इसलिए निधि के 3-4 मिस्ड कॉल्स पड़े हुए थे उसके फ़ोन में.

'Ma'am आज फिर गुस्सा करेंगी लगता.'

[Zaahir sii baat hai master. Wo aapki fiqr karti hai. Wo aapko hospital se apne ghar laayi thi. Aur, wo aapko khud ki ek zimmedaari ke roop me dekhti hai shayad. Isliye, aapki tension unhe lagi rehti hai. Upar se wo ek maa bhi hai toh wo aapki maa ka dard bhi samajh sakti hongi.]

'मेरी माँ? ः~ वो माँ जो मेरी घर में ऐसी हो रही दुर्दशा देखती रही? पर कुछ न बोलती थी? वो माँ, जिसने कभी मुझसे प्यार से बात तक ना की? वो माँ, जो मुझे घर से निकाले जाने पर भी चुप रही? वो माँ नहीं है पारी. वो एक अनजान औरत है मेरे लिए.'

वीर की बात सुन्न, पारी उसके दिल में हो रहे फ्लुक्टुअटिओन्स को महसूस कर पा रही थी.

[Mera matlab aapki sauteli Maa se nahi tha master. Mera matlab aapki asli Maa se tha.]

पारी की बात सुन्न, वीर का हाथ अपने आप hi अपने गले में टंगे उस लॉकेट पर चला गया जो उसकी असली माँ की एक आखिरी निशानी थी.

'क्या पता वो ज़िंदा भी है या नहीं!?'

[Aisa bhi toh ho sakta hai na master, ki wo zinda hai aur issi duniya me kahi par maujood hai. Aapke lakshyo me se ek lakshya aapka ye bhi hona chaahiye master. Apni asli Maa ke baare me jaan'na. Akhir unhone hi toh aapko janm diya hai.]

'तुम ठीक कहती हो पारी. में उनके बारे में jaan'ne की कोशिश ज़रूर करूँगा.'

[Hmm! Wese, aap points invest kar rahe ho!?]

'रात को करूँगा.'

[Okay master!]

वीर अभी चल hi रहा था की थोड़ी देरर बाद अचानक hi वो चलते चलते जोरर जोरर से हस्सन लगा.

"हाहाहाःहाहा~"

[Master?]

"हाहाहाहाहा~"

[Master kya hua? Aise kyu hass rahe ho? Raat ho rahi hai, colony ke aas paas ke log sab aapko hi dekh rahe hai.]

पारी की बात सुन्न, वीर ने थोड़ी देरर बाद अपना हस्सना बंद किया और फिर बोलै,

'पारी!! हाहाहा~ मुझे दरअसल ये याद आ गया की कैसे हमने अजय को चुटिया बनाया. हाहाहा~'

[Ohhh!!]

'थैंक्स तो यू! वो लड़कियों वाले डायलॉग्स मुझे सुग्गेस्ट करने के लिए. वो चुटिया मुझे सच में लड़की समझ रहा था हाहाहा~ क्या क्या ख्वाब सजा रहा होगा मैं में ः~ सोच रहा होगा आज माल मिलेगा पर मिला क्या? पिटाई! हहै!'

[Isme thanks kesa? Ye toh mere liye baaye haath ka khel tha.]

'वैसे! तुमने कहा था तुम गेन्देरलेस हो. फिर इतनी अच्छी तरह लड़कियों के डायलॉग्स कैसे सुग्गेस्ट किये तुमने मुझे?'

[I'm not genderless. I'm a girl master.]

'व्हाटटटटटटट?? पर... पर तुमने तोह...'

[I lied to you.]

'व्हाट थे फ़क????'

[ :रोल: ]

'क्यों?????'

[Aise hi... Tab mera mann ni tha sach bataane ka.]

'थे हेलल????? बूत तुम तोह एक सिस्टम हो और फिर... सिस्टम का जेंडर कैसे हो सकता है? ी मैं....'

[Aap iss se adhik jaan'ne ke kiye abhi qualified nahi ho master.]

'जितना मेने सोचा था, ये सिस्टम उस से भी ज़्यादा पेचीदा निकला.' उसने मैं में खुद से सोचा.

[Yes! Mein samajhne me complicated hu... :smile2: ]

'सहित! ी फॉरगॉट की तुम मेरी मैं की हर्र एक बात सुन्न सकती हो.'

[Hmm! Isliye, mere baare me koi buri baat nahi bolne ka master.]

'जैसा आप कहो मेरी प्यारी पारी! मेरी कुटी पारी! मेरी...'

[Bas bas master! Itni makkhan bhi nahi lagaana hai.]

'पारी!!!'

[Hmm?]

'थैंक यू!' वीर ने इस बार बड़ी hi सॉफ्ट सी आवाज़ में मुस्कुराते हुए कहा. और उसके यु बोलने पर पारी एकदम शांत सी पद गयी.

कुछ देरर बाद फिर उसकी आवाज़ वीर के मैं में आयी,

[Kisliye master!?]

'फॉर हेल्पिंग में आउट, पारी! कल क्लब में जाके तुम्हारे कहने पर मेने वो किस्सेस करि थी उन् ड्रंक लड़कियों के साथ, एंट्री भी तुमने करवाई थी बड़ी hi चापलूसी से. मुझे शुरू में वो सब बिलकुल अच्छा तोह नहीं लगा था बूत उसी के कारण मुझे पॉइंट्स मिले थे. और में अपनी स्ट्रेंथ बढ़ा पाया. वर्ण में ये मिशन कभी नहीं कर पाटा, एंड ी वोउल्ड हैवे लॉस्ट यू.'

[It's okay master! You don't have to be so emotional. 😊 ]

वीर मुस्कुराया और यु बातो hi बातो में वो घर पहुँच चूका था.

ऊपर फ्लोर पर आते hi जैसे hi उसने घर के बाहर से दूर बेल्ल बजायी, गेट निधि ने hi खोला.

और वीर को देखते hi उसकी आँखे फटी की फटी रह गयी.

और क्यों न फटी रह जाएंगी?

वीर के गले में उसकी चुनरी जो बंधी हुई थी.

निधि : वीर?

वीर : I'm सॉरी Ma'am! में बता के नहीं गया आपसे. दरअसल, काम hi ऐसा था.

उसकी बात सुन्न एक बार फिरसे निधि ने उसके गले में बंधी अपनी चुनरी को देखा और सोच में पड़ गयी. ये किस टाइप का काम करने गया था वीर?

[Master! You are fucked! :roll:]

'हँ? क्या हुआ?'

[Apne gale par haath ferro...]

पारी की बात सुन्न जैसे hi वीर ने अपने गले पर हाथ फेर्रा एक मुलायम सा कपडा उसके हाथो से स्पर्श हुआ. और उस स्पर्श का एहसास होते hi अगले hi पल उसकी आंखें फटी की फटी रह गयी.

'Fuuuuccckkkkkkkkkk!!!!'

निधि और वीर दोनों आँखें फाड़े बस एक दूसरे को घूर रहे थे. माहौल इतना ावक्वार्ड था की न तोह निधि में ये पूछने की हिम्मत थी की उसकी चुनरी वीर के गले में क्या कर रही थी. और, न hi वीर में जवाब देने की कोई हिम्मत थी.

दरअसल, कॉलेज से लौटने के बाद जब निधि फ्रेश होने गयी थी, तब hi वीर घर से निकल लिया था.

उसके जाने के बाद निधि पिंक कलर का अपना सूट पहन कर बाहर निकली थी. न जाने कब से वो इस चुनरी को ढूंढ रही थी पर उससे मिल नहीं रही थी. और अब जब मिली तोह कहा?

वीर के गले में...

बिना कुछ कहे उसने वीर को अंदर आने के लिए रास्ता दिया. ावक्वार्डली, वीर अंदर आया और बड़ी hi बेकार सी स्माइल दी उसने जिसके बदले में निधि केवल सर्र झुका ली और दरवाज़ा बंद करने लगी.

'फुकककककक! ये मत कहना वो कुछ गलत सोच रही है. I'm नॉट गे! पारी! I'm नॉट गे...'

[I know master!]

'मेरे ऐसे कोई भी शौक नहीं है...'

सोचते हुए उसने फौरन hi वो चुनरी उतारी और आगे बढ़ निधि के सामने अपने हाथ बढ़ाते हुए उससे देने लगा,

वीर : वो ये... Ma'am!

और निधि ने वो चुनरी लेते हुए अपने ऊपर दाल ली.

निधि : मेने पहले भी कहा है वीर. काम से काम बता के जाय करो... और ये...

वीर : ी क्नोव Ma'am! उसके लिए सॉरी... और ये... ये में गलती से ले गया था.

निधि : गलती से?

वीर : हाँ Ma'am! जाते वक़्त ये मेरी जीन्स में कही फस्स गयी थी.

निधि : पर कैसे? में तोह कब से इससे ढूंढ रही थी...

वीर : वो...

'फुक्कक्ककककक में!!!! मेरे साथ hi ऐसा क्यों होता है? इतनी गांडू टाइमिंग क्यों है मेरी?'

[ :सिप: ]

वीर : वो... शायद बीएड पर राखी थी ये आपके. में आपको बताने आया था की में जा रहा हु. पर आप वाशरूम में थी और श्रेया जी भी तब वाशरूम में थी. इसलिए, में निकल आया था. और शायद निकलते वक़्त hi ये मेरे जीन्स में फास्सी और में जब बाहर लिफ्ट तक पहुचा तब मुझे ध्यान आया. फिर वापस आने की बजाये में इससे लेके hi चला गया था. सॉरी!

'फ़क थिस! कोण बिलीव करेगा ये चुटिया स्टोरी पर? में खुद न करू.'

पर अगले hi पल वीर को एक झटका लगा जब उसने निधि के शब्द सुने,

निधि : ो... Okay! ी बिलीव यू!

वो हल्का सा मुस्कुराते हुए बोली और तुरंत hi वीर का चेहरा गरमाने लगा.

उसके गाल लाल हो गए और मुँह थोड़ा खुला का खुला रह गया.

'दमन आईटी! She's तू पुरे पारी! She's तू पुरे. मुझे यकीन नहीं होता की Ma'am जैसी औरत की ज़िन्दगी भी इतनी दुखदायी है.'

अभी दोनी के बीच कुछ और बातें होती की तभी अंदर से जूही दौड़ती हुई आयी और वीर के पेर्रो को जोरर से पकड़ ली.

अपना सर्र ऊपर कर वो वीर को देखि और बोली, "वीर मां... क्या लाये मेरे लिए?"

[ :लाफिंग: ]

'ये श्रेया के कारण... मां मां sunn'na पद रहा है.'

वीर : आपके लिए बोहत बढ़िया चीज़ लाया हु में. पर पहले एक प्रॉमिस करो.

जूही : बोलो...

वीर : की श्रेया जी को आप श्रेया मौसी कहके बुलाओगी.

जूही : ोकाआआअययययय!

वीर (लौघ्स) : हाहाहा~ ये लो फिर.

और इतना बोल वीर ने उसी थैली में से चॉकलेट और टेडी निकाल के जूही को पकड़ा दिया.

चॉकलेट और टेडी देख के जूही की आँखों में चमक आ गयी. वो अपने हाथो में लेते हुए उछालने लगी, उसने वीर को नीचे झुकाया और अगले hi पल उसके गाल पे एक प्यारी सी पप्पी जड़ दी.

जूही : थैंक यू वीर मां!

बोल के वो अंदर की ऑर्डर भाग गयी.

इधर वीर अपना गाल सहलाता हुआ उस नन्ही सी क्यूट सी बच्ची को जाता देखता रहा. फिर, जैसे hi उसने निधि पर नज़र डाली...

उसने देखा...

की निधि मुस्कुराते हुए जूही को जाता हुआ देख रही थी. उसके चेहरे पर एक सच्ची मुस्कराहट थी.

कोई दर्द या कोई झूठापन नहीं था उस मुस्कान में. वो एक माँ की मुस्कान थी अपनी बच्ची की ख़ुशी के प्रति.

जब निधि ने पलट के देखा तोह पाया की वीर उससे hi एक तक देख रहा था.

और उसकी नज़रे अपने ऊपर पाते hi उसने चौंकते हुए एक सांस भरी.

वीर : आपके ऊपर यही स्माइल अच्छी लगती है Ma'am!

निधि (ब्लशेस) : हँ!?

वीर (स्माइल्स) : आप ऐसे hi स्माइल करती रहा करो.

निधि (ब्लशेस) : ये तुम... वो सब चोर्रो! और ये बताओ...

वीर : हम्म?

निधि : वो... वो... ये सब टेडी बेयर, चॉकलेट्स? ी मैं... तुम्हारी डेट थी क्या? अच्छी नहीं गयी क्या डेट? क्युकी... ी कैन गेस ये तुम अपनी डेट के लिए hi ले गए होंगे.

वीर : ेहः? डेट? पफ्फफ्टत्त~ हाहाहा~

निधि : क... क्या हुआ? ऐसे क्यों हस्स रहे हो? कुछ गलत कहा क्या मेने?

वीर : आपको किसने कहा की में डेट पे गया था?

निधि (सुरप्रीसेड) : यू didn't?

वीर : No!!! नॉट ात आल! बस, ये समझ लीजिये की... में ये लेना चाहता था तोह ले लिया. और ये जूही के लिए hi था.

निधि : बूत तुम्हारे पास पैसे...!?

वीर : वो... मेरी कजिन ने दिए.

और उससे झूठ बोलना hi पड़ा.

निधि : कजिन? तोह... इसका मतलब...

वीर : यस! भले hi मुझे उस घर से निकाल दिया गया है. पर, मेरी एक छोटी बहिन है काव्य. वो मुझे वाक़ई अपना भाई मानती है और भाई जैसे प्यार भी करती है.

निधि (स्माइल्स) : ये तोह... ये तोह बेहद hi ख़ुशी की बात है वीर. एटलीस्ट, अब तुम्हे अकेलापन महसूस नहीं होएगा. एटलीस्ट कोई तोह है अपना जिस से अब तुम बातें कर सकते हो.

वीर : यस! बी थे वे... क्या आप कभी डेट पे गयी हो?

निधि : हँ? में?

वीर : हम्म!

निधि (गिगल्स) : ः~ डेट क्या होती है. ये में नहीं जानती. में कभी नहीं गयी.

वीर (सुरप्रीसेड) : ी don't बिलीव आईटी. आपके जैसी ख़ूबसूरत लेडी को तोह न जाने कितने प्रपोजल आये होंगे डेट्स के.

निधि (ब्लशेस) : हँ? ी मैं... वेल, थैंक यू बूत... इवन थौघ प्रोपोज़ल्स आये थे तोह... ी नेवर एक्चुअली वेंट. समय बीत गया और फिर घरवालों ने शादी करवा दी. बस!

वीर : तोह? आप कभी अपने हस्बैंड के साथ...!?

निधि : No... में कभी नहीं गयी.

वीर : आप... आप कहती हो तोह मान लेता हु. वैसे... वो...

निधि : हम्म??

वीर ने थैली खोल, उसमे रखे रोज का फूल निकाला और निधि को हाथ आगे बढ़ाते हुए उससे देने लगा,

वीर (ब्लशेस) : ये वो... जूही के लिए में वो लाया था... सो... आपके लिए ये...

निधि (ब्लशेस) : अहह?? ये...

निधि इसके लिए तैयार न थी. न जाने कब उससे गुलाब का फूल मिला था. Teacher's डे में तोह सभी लौंडे लपाड़े उससे फूल दिया करते थे पर ऐसे यु अचानक से शायद hi पहले उससे किसी ने फूल दिया था. और ये तोह वीर था. उसका अपना स्टूडेंट.

वीर : ये... अस ा ग्रटीटुडे मेरी तरफ से... मेरी इतनी हेल्प करने के लिए... एक ब्यूटीफुल लेडी के लिए... एक ब्यूटीफुल फ्लावर...

निधि (ब्लशेस) : ी... ी...

निधि के मुँह से लफ्ज़ hi न निकले. वो बस वीर को देखती और फिर उसके हाथ में उस गुलाब के फूल को. क्या ये सही था? क्या वीर के हाथ से फूल लेना सही था?

वो थोड़ी सी दुविधा में थी. पर अभी तोह वीर ने कहा था की वो ये ग्रटीटुडे व्यक्त करने के लिए दे रहा है और तोह और वीर उस टाइप का इंसान बिलकुल भी नहीं है. वीर की नज़रो से भली भाति वाक़िफ़ थी निधि.

अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए उसने फाइनली, वीर के हाथो से वो गुलाब का फूल ले लिया.

वीर : भले hi हम दोनों ने अपनी लाइफ में डेट एक्सपीरियंस न करि हो, पर में आपको ये फूल तोह दे hi सकता हु न?

निधि (ब्लशेस) : हम्म! ी नेवर गोत तो एक्सपीरियंस आईटी. बूत जो भी होता है, अच्छे के लिए hi होता है. मय्बे गॉड है प्लांड समथिंग ेल्स फॉर में!? अच्छा वो सब चोर्रो... फ्रेश हो लो, में खाना लगाती हु. और, इस फ्लावर के लिए थैंक यू वीर.

वो बोल के उठी और अपने दोनों हाथो में फूल को पकड़ अंदर जाने लगी की तभी,

*डिंग*

[Mission : Go on a Date with Nidhi.

Rewards : ??

Time limit - 1 month]

और मिशन पढ़ते hi वीर की गांड फट के चार हो गयी.

'पारी कह दो की ये मज़ाक है.'

[It's not master!]

'पारी! देखो... चाहे मेरी गांड मार लो, पर कह दो की ये झूठ है.'

[No master! Ye mission hai.]

'क्यूँउउउउ? क्यों मेरी किस्मत इतनी गांडू है? क्योऊ? हाँ? निधि Ma'am के साथ डेट? मेरे लौड़े लग जाएंगे पारी... में उनके साथ बिलकुल बात नहीं बिगाड़ना चाहता. कितनी फवौराबिलिटी है उनकी?'

[Nidhi ki favourability 40 hai aapke prati master.]

'देखा! कितनी बढ़ गयी है. ये चुटिया से मिशन के कारण जीरो पे न गिर जाए. उनकी नाराज़गी में सेहन नहीं कर पाउँगा पारी.'

[I can't help it master!]

'फुसक्कक्ककककककककक!!'

वीर बस अपनी किस्मत को कोस hi सकता था. उसकी किस्मत वाक़ई गांडू थी. यदि कोई अच्छा काम किस्मत ने किया था तोह वो था पारी का उसके शरीर में प्रवेश होना.

'पारी!!!'

[Yes! Master!]

'शो में माय स्टैट्स'

[Abhi lo master.]

[ स्टैट्स :

स्ट्रेंथ - 37/100

इंटेलिजेंस -11/100

अगिलिटी - 3/100

ेंदुराने - 7/100

अपीयरेंस - 9/100]

कल पारी की बात maan'ne के बाद वीर बेमानन क्लब में गया था और वह जो जो हरकते उसने नशे में पड़ी लड़कियों के साथ की थी उसके कारण उससे 17 पॉइंट्स मिले थे जो उसने अपनी पूरी स्ट्रेंथ में दाल दिए थे. कोई ऐसी ज़बरदस्ती वाली हरकते नहीं की थी उसने. केवल किस्सेस और थोड़े ऊपर से hi बूब प्रेस जो की वह क्लब में आम बात थी.

भले hi वीर को वो तरीक़ा पसंद नहीं आया था पर उसी तरीके के चलते उससे पॉइंट्स मिले थे और वो अजय को धो पाया था. यानी की अजय की स्ट्रेंथ 37 से काम थी.

'पारी!'

[Yes master!]

'8 पॉइंट्स मेरी स्ट्रेंथ में डालो. 9 पॉइंट्स मेरे इंटेलिजेंस में, 7 मेरी अगिलिटी में, और 3-3 मेरे अपीयरेंस और ेंदुराने में.'

[Okay master!]

*डिंग*

[ स्टैट्स :

स्ट्रेंथ - 45/
100

इंटेलिजेंस -20/100

अगिलिटी - 10/100

ेंदुराने - 10/100

अपीयरेंस - 12/100]

'गुड! गुड!'

वीर मुस्कुराया और अंदर फ्रेश होने के लिए चल दिया.

***

*थुड़*

एक टेबल पर एक आदमी ने फाइल पटकी और सामने खड़े लड़के को देखते हुए वो बोलै,

"बढ़िया! मेने जिन जिन पे गोला लगाया है, उनके बारे में पता करो. और ध्यान रहे, पुरानी तकनीक के साथ hi हमे चलना है. समझे?"

"जी... जी भौ!" उस लड़के ने कहा.

आदमी : शाबाश! काम करो तोह इतना बड़ा करो, की अपने आप नाम हो जाए हाहाहा~

वो आदमी सिगरेट का धुआँ अपने मुँह से निकाल के हस्सन लगा.

उसके सामने hi एक और आदमी बैठा हुआ था जो उससे देख के नकली हस्सी में हस्सन लगा.

आदमी : आप क्यों हस्स रहे हो प्रसाद लाल?

प्रसाद लाल : वो... वो... जी... जीई.. आप हिस्से इसलिए में हिस्सा ः~

आदमी : अच्छा!? कुछ समझ में आया मेने क्या कहा?

प्रसाद लाल : जी की काम इतना बड़ा करो की नाम अपने आप हो जाए...

आदमी : हम्म! हम्म! पर तुमने अभी जो काम किया न!? उसके कारण मेरा मूड खराब हो गया.

प्रसाद लाल : हँ???

और तभी उस आदमी ने दो बार ताली बजायी और अगले hi पल उसके पीछे खड़े दो हट्टे काटते आदमी ने प्रसाद लाल को उठाया और अंदर रूम में ले जाने लगे.

"नहीं! भौ... भौ... इसमें मेरी क्या गलती!? मुझे माफ़ कार्डो... मुझे माफ़ कार्डो भौ... प्लीज! मुझे बचाओ..."

प्रसाद लाल गिड़गिड़ाता रहा पर उसकी एक न सुनी गयी. और उससे घसीट के अंदर एक कमरे में ले गए.

वो आदमी अपनी चेयर से उठा, सर पर सफ़ेद हैट डाली, अपनी हॉकी उठायी और अपना माउथ ऑर्गन पंत की जेब में डालते हुए वो कमरे की खिड़की की तरफ आगे बढ़ा.

आदमी : जान से नहीं मारना. प्रसाद लाल से हमे अभी काफी काम है...

और अगले hi पल वो कमरे का दरवाज़ा बंद हुआ और अंदर से प्रसाद लाल की रौंगटे खड़े कर देने वाली चींखे सुनाई देने लगी.

न जाने क्या सुलूक हो रहा था उसके साथ अंदर.

आदमी : रंगा!

रंगा : जी... जी... भौ!

आदमी : फाइल उठाओ! मेने पहले hi गोला लगा दिया है. केवल उनपे hi ध्यान दो. 6 कम्पनीज hi है. मुझे दो दिन के अंदर सब कुछ चाहिए.

रंगा : जी भौ! हो जाएगा!

आदमी : गुड! तुम्हे तोह पता hi है की क्या करना है?

रंगा : जी भौ!

आदमी : कमज़ोर कड़ी को ढूंढो, रास्ता अपने आप मिल जाता है.

रंगा : जी भौ!

आदमी : प्रसाद लाल को अब समझ आ जाएगा की किन लोगो के साथ मज़ाक बिलकुल भी नहीं करना चाहिए.

कहते हुए वो कमरे से बाहर जाने लगा.

आदमी : यदि फिर भी न माने, तोह दो चार दोसे और देना उसको... तब समझ आ जाएगा उससे की आतिश भौ कोण है.

रंगा : जी भौ!

और आतिश रंगा को इतना बोल कमरे से बाहर नीचे की ऑर्डर चला गया.

इधर रंगा ने उसके जाते hi अपने माथे ओर से पसीना पोछा और फाइल उठा के लाल मार्कर से बनाये गए गोले पर ध्यान दिया जो की कुल 6 नामो के ऊपर लगाए गए थे.

उससे तोह जैसे पता था की आगे उससे अपने भौ के लिए करना है. और यही सोच वो फौरन hi अपने काम में लग गया.

***

इसी रात वीर के घर यानी निधि के घर से कई किलोमीटर्स की दुरी पर एक बेहतरीन होटल में एक सुन्दर सी महिला किसी से फ़ोन पे बात कर रही थी.

कुछ देरर बात करने के बाद उसने फ़ोन काटा और वो अपनी जगह से उठ कड़ी हुई.

वो अपने केबिन से निकली और अपने बगल के केबिन में गयी. अंदर जाते hi उससे एक बेहद hi ख़ूबसूरत सी लड़की के दर्शन हुए. उससे देखते hi उस औरत के चेहरे पर एक मुस्कान आ गयी.

"हो गया काम?" उसने पूछा तोह केबिन में बैठी वो लड़की उससे देखि और उससे देखते hi वो भी मुस्कुरायी,

लड़की : हां माँ!

अंदर आते हुए उस महिला ने सामने चेयर खींची और उसपे बैठ गयी,

औरत : बस! कुछ समय और फिर उसके बाद देखना, हमारे पास भी हमारा हिस्सा होगा. हम निश्चिन्त होक रह पाएंगे.

लड़की : ी क्नोव माँ! पर...

औरत : पर क्या भूमि!??

जी हां! ये औरत और ये लड़की वीर की सौतेली माँ और उसकी स्टेप सिस्टर थी. यानी को श्वेता और भूमिका.

और इस वक़्त वो अपनी hi होटल में बैठे हुए बाते कर रही थी.

भूमिका : माँ! क्या हम जो कर रहे है वो सही है?

औरत : सही!? क्यों नहीं!?

भूमिका : उनका... उनका अपना बीटा घर से निकाल दिया गया. और...

औरत (सुरप्रीसेड) : भूमिइइइ!?? क्या तुम उसके बारे में सोच रही हो अब? कही हमदर्दी तोह नहीं होने लगी तुम्हे उस से?

भूमिका (बॉहे सिकोड़ते हुए) : माँ! पहले नहीं होती थी. पर आजकल पता नहीं क्यों, जैसे जैसे समय बीत रहा है. मुझे अंदर से कुछ सही नहीं लग रहा.

श्वेता : पर ऐसा क्यों भूमि बीटा? हम इतना आगे आ चुके है. और पहले कभी तोह तुम्हारे मैं में उसके लिए ऐसा कुछ नहीं आया न? फिर ये अचानक से क्यों?

भूमिका : शायद इसलिए माँ, क्युकी कभी भी उसने हमारे साथ गलत व्यवहार नहीं किया. वो जैसा भी था, काम से काम उसने हमारे बीच में कभी खलल नहीं डाली. न hi हम उस से बात करते थे और न hi उससे कभी अपना मानते थे. पर इन् सब के बावजूद, उसने कभी इन् बातो का विरोध नहीं किया. और इसलिए, अब जब उससे घर से निकाल दिया गया है, वो मेरे सपनो में आता है माँ. उसका चेहरा मेरे सपनो में दीखता है. और मुझे ऐसा लगता है जैसे मेने hi उससे घर से निकलवाया है.

श्वेता : तू भूल जा बेटी इन् सब बातो को. वो तोह जा चूका है अब. अब जहा भी वो हो, अपना जीवन जैसे उससे जीना है जी लेगा. पर हमे हमारे बारे में सोचना होगा. क्युकी तुम और में, बस हम दोनों hi है एक दूसरे के लिए.

भूमिका : ी क्नोव माँ... It's जस्ट!

श्वेता : अपने आप को काम में व्यस्त रखा करो. Okay?

भूमिका : जी!

श्वेता (स्माइल्स) : हम्म! चलो! अब चलते है.

ये रात तोह सभी के लिए जैसे तैसे गुज़र गयी. पर आने वाला समय न जाने सबकी ज़िन्दगी में क्या लाने वाला था. जो भी होने वाला था, इतना तोह तय था की वीर के लिए आने वाला समय संघर्ष से भरपूर होने वाला था.

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आज के लिए इतना hi गाइस!


धन्यवाद!
 
अपडेट - 17 ~ कैप्चर्ड

अब तक...

श्वेता : अपने आप को काम में व्यस्त रखा करो. Okay?

भूमिका : जी!

श्वेता (स्माइल्स) : हम्म! चलो! अब चलते है.

ये रात तोह सभी के लिए जैसे तैसे गुज़र गयी. पर आने वाला समय न जाने सबकी ज़िन्दगी में क्या लाने वाला था. जो भी होने वाला था, इतना तोह तय था की वीर के लिए आने वाला समय संघर्ष से भरपूर होने वाला था.


अब आगे...

दो दिन गुज़र चुके थे. और इन् दो दिनों में वीर की लाइफ में जो भी बदलाव आया था वो था पॉइंट्स बढ़ाने के बाद उसका शारीरिक बदलाव.

निधि के साथ भी अब उसकी अच्छी जमने लगी थी. निधि भी वीर को जैसे अब अपने hi परिवार का सदस्य maan'ne लगी थी. वो उसके साथ शॉपिंग पर जाती, कभी कोई भी सामान लेना होता वो और वीर साथ साथ जाते और एक दूसरे की मदद करते.

वीर के आने से भले hi उसके खाने पीने का खर्चा बढ़ गया था पर वीर उसकी बोहत मदद भी कर देता था. ये बात निधि को खुद भी महसूस हो रही थी. उसके ऊपर से जैसे काम का लोड काम सा हो गया था.

जूही के साथ भी वीर की अच्छी दोस्ती हो चुकी थी. वीर टाइम तो टाइम जूही के साथ खेलता तोह कभी उससे पढ़ाता, उसके आने के बाद से hi निधि के घर का माहौल एकदम खुशनुमा सा हो गया था.

चहल पहल बढ़ गयी थी. घर में अब बात चीत हुआ करती थी. बोरियत नाम की तोह जैसे कोई चीज़ hi नहीं थी अब निधि के घर में. न hi उससे अब उतना अकेलापन महसूस होता था.

बस यदि कुछ बचा था तोह वो था वीर और श्रेया का एक दूसरे को जवाब देना चोरर्ण.

दोनों hi बस एक दूसरे के पीछे पड़े रहते थे. कही श्रेया वीर की टांग खींचती तोह कही वीर श्रेया की. और उन् दोनों का यु झगड़ना भी कही न कही निधि को अच्छा लगने लगा था. उससे ऐसा लगता था जैसे वो दोनों ज़िद्दी भाई बहिन है जो बस एक दूसरे से लड़ते झगड़ते रहते है.

निधि ने अपने घर में भी ये बात बता के राखी हुई थी की उसके साथ उसका एक स्टूडेंट भी रह रहा है. हलाकि, शुरूआती समय में उसके घरवालों ने इसका विरोध ज़रूर किया था की एक नौजवान लड़के को अपने साथ रखना सही नहीं है पर जैसे जैसे कुछ दिन बीते और निधि ने रोज़ की डेली रिपोर्ट अपने घरवालों को दी, तोह उनका डर भी अंदर से काम हो गया और वीर पे उनका विश्वाश भी कई हद्द तक बढ़ गया था.

भले hi वीर की ज़िन्दगी यहाँ पहले से काफी बेहतर हो चुकी थी पर यही बात वीर के घर के लिए कहना थोड़ा मुश्किल था.

वीर के बंगले में इस वक़्त एक बेहद hi ख़ूबसूरत औरत सामने शीशे में देख अपने बाल बना रही थी. उसका सौंदर्य अलग hi स्टारर पे थे. अपनी घनी ज़ुल्फो में वो इस तरह अपने हाथ चला रही थी जैसे मानो वो ज़ुल्फ़े नहीं, पानी की लहरें हो. उसके तीखे नैन ऐसे प्रतीत हो रहे थे की किसी को भी नशीला बना दे. उसकी एक झलक अच्छे से अच्छे सन्यासी को मदहोश कर दे.

और ये कोई और नहीं, वीर के बड़े भाई की पत्नी, यानी की उसकी भाभी~ रागिनी थी.

रागिनी अपने आप को सजाते हुए ड्रेसिंग टेबल से उठी और वो बाहर निकलने hi वाली थी की तभी उसका बीएड पर रखा फ़ोन बजा.

*रिंग* *रिंग*

आगे बढ़ते हुए, रागिनी ने अपना फ़ोन उठाया और स्क्रीन पे पापा लिखा देखते hi उसके चेहरे पे मुस्कान आ गयी.

उसने फ़ोन उठा के अपने कानो में लगाया पर कुछ सेकंड बाद hi उसकी वो मुस्कान उसके चेहरे से गायब हो गयी. और चेहरे पे बस शिकन, टेंशन और डर छा गया.

जैसे hi उसने फ़ोन उठा के hello बोलै तभी दूसरी तरफ से आवाज़ आयी,

"बीटा!!! सब कुछ लूट गया, बर्बाद हो गया... लूट गया बीटा में..."

अपने पापा की ऐसी आवाज़ सुन्न रागिनी की रूह काँप गयी. उसके पापा दिनेश की ऐसी आवाज़ शायद hi पहले रागिनी ने कभी सुनी होगी.

रागिनी (घबराते हुए) : पापा!!! क्या कह रहे हो आप? क्या हुआ? बताइये!!

दिनेश : बेटी!!! सब कुछ बर्बाद हो गया मेरी बच्ची!! सब कुछ बर्बाद हो गया.

और दिनेश की अचानक रोने की आवाज़ रागिनी को सुनाई देने लगी.

बेचैनी में वो उठी और रूम में इर्द गिर्द घूमने लगी,

रागिनी : पापा! आप डराइए मत मुझे. प्लीज बताइये मुझे! सब कुछ ठीक तोह है न!?

उसके बाद दिनेश अपनी आपबीती अपनी बच्ची रागिनी को सुनाता है जिससे सुन्न के रागिनी के खुद के होश उड़द जाते है. वो भौचक्की सी बस कड़ी अपने पापा की बात सुनती रहती है पर जैसे उसका ध्यान कही और hi था. जैसे मानो सदमा सा लग गया हो उससे.

रागिनी : नहीं!! ये नहीं हो सकता... ऐसा कैसे भला!? आपने पुलिस में...!?

दिनेश : बीटा! क्या कहूंगा पुलिस में!? पुलिस सबूत मांगती है. और कुछ नहीं देखती. मेने उन्हें सच बताया है पर वो तोह जैसे मेरी बात sunn'ne तैयार hi नहीं है बेटी. सब कुछ चला गया बीटा सब कुछ...

रागिनी : ऐसे कैसे पापा... ऐसे थोड़ी... में... आप आप... हां! हम शहर के सर्वश्रेष्ठ लॉयर को हिरे करेंगे... भला ऐसे कैसे पुलिस हमारी बात नहीं मानेगी? हम F.I.R करेंगे पापा... जांच पड़ताल में सब कुछ बाहर निकल आएगा देखना... और आखिर हिम्मत कैसे हुई पुलिस की हमे इग्नोर करने की?

दिनेश : नहीं बीटा! कुछ नहीं हो सकता अब. मेने थोड़ी देरर पहले hi न जाने कितने शहर के जाने माने लॉयर लोगो से बात करि. सभी पीछे हट गए बेटी. जैसे मानो वो जानते हो की उनका जीतना नामुमकिन है. वो लोग बड़े hi खतरनाक प्रतीत होते है बीटा. अब तोह यदि कोई कुछ कर सकता है तोह वह विवेक hi है. ज़रा बोलो बेटी... उसकी अच्छी पकड़ है और पहचान भी.

रागिनी : इतना सब कुछ हो गया पापा और ये बात आप मुझे अब बता रहे हो??

दिनेश : बीटा! सब कुछ अचानक हुआ बीटा... सब कुछ अचानक. पहले जो काम सबसे ज़रूरी था वही किया. मुझे लगा था पुलिस हमारी मदद करेगी पर यहाँ तोह वो sunn'ne तैयार नहीं है. विवेक hi अब कुछ कर सकता है बीटा... ज़रा बात करना हो सके तोह उस से...

रागिनी : ये भी कोई कहने की बात है पापा? बिलकुल! में... में अभी जा के उनसे बोलती. में खुद जाती हु कंपनी में और इनसे बात करती हु. ठीक? आप... आप बिलकुल टेंशन मत लेना पापा. कुछ नहीं होगा okay? सब सही हो जाएगा. ये है न... देखना! अभी सब सुलझ जाएगा... में... में अभी जाती हु...

और इतना बोल रागिनी कॉल कट करके फ़टाफ़ट उन्ही कपड़ो में बाहर निकल, विवेक की कंपनी की ऑर्डर कार निकाल के अकेले चल देती है.

कुछ मिनट की दुरी तय करने के बाद, जैसे hi वो कंपनी पहुचती है तोह उसकी मुलाक़ात रिसेप्शनिस्ट से होती है.

और कुछ hi पालो के इंतज़ार के बाद वो फाइनली अपने पति विवेक से मिलती है. जैसी जैसी बातें उससे पता चली दिनेश से वो सब कुछ वैसे hi विवेक को बता देती है, जिससे सुन्न विवेक भी काफी टेंशन में आ जाता है.

विवेक : ये तोह बोहत hi सीरियस मामला है. इतना सब कुछ हो गया और ये बात अब बता रहे है वो?

रागिनी : मेने उनसे यही बात बोली थी डिअर... बूत तब शायद हालात hi कुछ ऐसे थे... मय्बे वो हमे टेंशन में नहीं डालना चाहते थे. में जानती हु पापा को अच्छे से...

विवेक : ठीक है! तुम टेंशन मत लो. में बात करता हु.

रागिनी : थैंक यू डिअर!

रागिनी अपनी आँखों में ासु लाते हुए बोली. और उसने फ़ोन लगा के अपने पापा को आस्वाशन दिया की जल्द hi विवेक कुछ न कुछ हल ज़रूर निकाल लेगा उनकी परेशानी का.

अब ऐसा क्या हो गया था अचानक की दिनेश के कारण रागिनी संग विवेक भी भारी टेंशन में आ पड़े.

तोह आइये नज़र डालते है,..

पिछली रात...

मौसम हल्का ठंडा था. ठंडी मंद मंद हवाएं वातावरण में फैली हुई थी और रात के 11:30 बज रहे थे.

दिनेश, रागिनी के पिता इस वक़्त अपने T.V.S के एक शोरूम से बाहर निकल रहे थे.

आज कागज़ी काम और डील्स वगैरह कुछ ज़्यादा hi हुई थी जिस कारण से उन्हें आज रुकना पद गया. गार्ड्स तोह थे hi शोरूम के लिए और साथ hi कुछ वर्कर्स भी, जिनको वो शोरूम बंद करने का बोल के शोरूम से बाहर निकल आया.

अपनी कार में बैठने के बाद दिनेश अपने घर की ऑर्डर प्रस्थान किया.

आज वो बेहद खुश था. कई सारे लोगो ने आज गाड़िया खरीदी थी साथ hi साथ उसकी आज कई लोगो से अच्छी खासी डील्स भी हुई. आज के अच्छे दिन के बारे में सोच के वो मैं hi मैं प्रफुल्लित हो उठा.

ऐसी अच्छी खासी कमाई वाले दिन केवल वर्ण त्योहारों में hi अक्सर आते रहे.

दिनेश खुश होते हुए गाडी चला रहा था. उसका घर थोड़ा दूर पड़ता था और वो ड्राइवर प्रेफर नहीं करता था. वो खुद hi ड्राइव करना प्रेफर करता था हमेशा. उसका maan'na था की ड्राइविंग के मामले में आप केवल अपनी खुद को ड्राइविंग स्किल्स पर भरोसा कर सकते हो, किसी दूसरे की नहीं.

घर की ऑर्डर आने जाने वाला रास्ता थोड़ा सा सुनसान जगह से होक भी गुज़रता था. सुनसान तोह नहीं कहेंगे पर हां ये कहना की वो एरिया थोड़ा आउटर एरिया लगता था ये गलत नहीं होगा.

आधी रात होने को आ रही थी और दिनेश ने तभी गाडी रोकी, अपने जेब से फ़ोन निकाला और कॉलर का नाम देख वो सर हिलाते हुए मुस्कुराया. उसकी पत्नी रोहिणी का कॉल था. शादी के इतने साल गुज़र गए फिर भी रोहिणी को हमेशा दिनेश की बोहत चिंता लगी रहती थी. 11 बजे नहीं की कॉल आना शुरू.

मुस्कुराते हुए दिनेश ने वही साइड में गाडी रोक फ़ोन उठाया,

"कहिये मैडम जी! क्या हुआ?"

रोहिणी : क्या हुआ? अरे कितना बज रहा है? समय भी तोह देखना चाहिए! न जाने कब से राह देख रही हु आपकी. पर आप हो की कोई फ़ोन hi नहीं उठाते. एक बार कॉल करके बता तोह देना चाहिए न की आने में देरर हो जाएगी.

दिनेश : अरे! हो जाता है कभी कभी लेट. आज कमाई अच्छी हुई न, और डील्स भी हुई कई. थोड़ा समय लग गया.

रोहिणी : हम्म! चलो अच्छा आ जाओ अभी. फिर बात करते है.

दिनेश : हां हां! बस आ रहा हु.

और कॉल कट करके वो अभी गाडी चालु hi करने वाला था की तभी ड्राइवर सीट की विंडो से एक हाथ आया और सीधा उसका गाला दबोच लिया.

सकपकाते हुए दिनेश अपने गले पर हाथ की पकड़ को हटाने का प्रयास करने लगा. डर के भाव उसके चेहरे पर साफ़ झलक रहे थे. उसने तोह बस कुछ पल के लिए विंडो खोली थी जब वो रोहिणी से बात कर रहा था. उससे क्या पता था की ऐसा कुछ हो जाएगा.

पर अगले hi पल उसका विरोध पूरा का पूरा समाप्त हप गया. क्यों??

कारण था उसकी कनपटी पर रखा रिवाल्वर. इससे देखने के बाद तोह अच्छे अच्छा के पसीने छूटने लगते है और फिर दिनेश तोह एक साधारण सा शोरूम का मालिक था. लड़ाई झगडे से कोसो दूर.

उस पर तना रिवाल्वर उसके विरोध को चूर चूर कर दिया. बोलती बंद और कापते हुए हाथो से वो बस आँख टेडी करके आदमी को देख रहा था जो दिखने में एक नार्मल 28 29 साल का लड़का लग रहा था.

"बोहत अच्छे! यदि ज़्यादा और हिलता न, तोह तेरा ये भेजा को मेने कही और भेज दिया होता. समझा!?"

उस लड़के की ऐटिटूड से भरपूर आवाज़ दिनेश के कानो में पड़ी. और उसने अपनी मुंडी हां में हिलायी,

लड़का ने अगले hi पल गेट खोला, उससे बाहर निकाला, उसका मोबाइल ज़ब्त करके, उससे बंद करके अपने जेब में डाला और वापस से दिनेश को ड्राइविंग सीट पर बैठा दिया.

यहाँ क्या हो रहा था कोई दूर दूर तक देखने वाला नहीं था. पहला कारण था इतनी रात का समय और दूसरा कारण की वो एक आउटर एरिया था.

उस लड़के ने दिनेश को बैठा के बगल का दूर खोला और उसकी बगल की सीट से बैठ गया.

दिनेश ने देखा की ये लड़का अकेला hi था, यदि जैसे तैसे करके वो उसका रिवाल्वर छिना ले तोह बाज़ी पलट सकती थी.

पर अगले hi पल उसने अपना ये ख़याल मैं से निकाल दिया. क्युकी अगले hi सेकंड एक स्कार्पियो उसके बगल से आके कड़ी हुई जिसमे 4 से 5 लौंडे और आदमी घुसे पड़े थे. और सबके हाथो में एक एक रिवाल्वर था.

और यहाँ दिनेश उस आदमी से रिवाल्वर छीनने के बारे में सोच रहा था. उसने अपना थूक निगला और ऊपर वाले को धन्यवाद दिया की हे भगवान् तुमने मुझे अंतिम पल में कुछ गलत करने से बचा लिया. वर्ण अब तक तोह उसका भेजा उड़द चूका होता.

दिनेश : दे... देखो! देखो! तुम्हे जो भी चाहिए वो में दूंगा. मुझे चोरर दो. जो भी चाहिए वो बताओ, में सब दे दूंगा... बस... बस मुझे चोरर दो.

अपनी जान किसको प्यारी नहीं होती भला?

और जब अपनी जान पे आती है तोह बड़े सा बड़ा आदमी केवल गुहार hi लगा सकता है ऐसी स्थिति में.

यही काम दिनेश ने भी किया.

लड़का : बिलकुल बिलकुल! वो भी लेंगे... उसी के लिए तोह हम है यहाँ. चल! फ़टाफ़ट! गाडी बढ़ा आगे. और घर चल अपने.

दिनेश : घ... घर!? घर क्यों जाना है?? में... जो... जो बोलोगे वो दे दूंगा... पर घर...

लड़का : साले! जितना में बोल रहा हु उतना कर समझा?

दिनेश : बीटा! देखो! क्या मिलेगा तुम्हे मुझ जैसे बूढ़े आदमी को लूट के? में कोई हस्ती नहीं हु. केवल शोरूम का मालिक हु. और...

लड़का : ैय्येई चुप्प!!

उस लड़के ने इतनी जोरर से चिल्लाया की दिनेश की शरीर सिहर उठा.

लड़का : अब बात को ध्यान से सुन्न! समझा? चुप चाप जैसा जैसा में कहु, वैसा वैसा कर. वर्ण तू तोह जाएगा hi, पर शायद तेरे साथ तेरी पत्नी का टिकट भी कटेगा लगता है...

दिनेश : नहीं!! नहीं!!! मेरी पत्नी नहीं... उससे कुछ मत करना... में... में... जैसा जैसा कहोगे वैसा hi करूँगा.

लड़का : हम्म! अब चुप चाप अपने घर की ऑर्डर गाडी ले. और हां!!! ज़्यादा स्मार्ट नहीं bann'na ठीक? घर बोलै है तोह घर की तरफ hi लेना. यदि तूने एक भी मोड़ गलत लिया, तोह तेरा गेम बज्ज जाएगा समझा!?

दिनेश : हआ हा!!

कापते हुए दिनेश ने अपना सर हिलाया. अब उससे ये बात सताये जा रही थी की कही... कही... रोहिणी को कुछ न हो जाए.

रोहिणी उसका बेसब्री से घर पर इंतज़ार कर रही थी. और न जाने आगे क्या होने वाला था. ये सोचते hi दिनेश की हालत बिगड़ती जा रही थी.

गाडी स्टार्ट हुई, और दिनेश ने ठीक वैसा hi किया जैसा उससे बताया गया था.

कुछ मिनट की दुरी तय करने के बाद hi वो अपने घर के बाहर पहुँच चूका था और उसका दिल ज़र्रों से धड़क रहा था.

हालात hi ऐसे थे की वो चाह के भी कुछ नहीं कर पा रहा था.

लड़का : बढ़िया! अब सुन्न! में और तू अंदर जाएंगे एरे घर में... समझा!? तू अपनी पत्नी को ये बोलेगा की में कुछ कागज़ी काम के चलते तेरे घर आया हु. और उससे ज़रा भी शक न होने पाए की क्या चल रहा है. समझा? यदि ज़रा सी भी मुझे भनक हुई की तू पुलिस को कॉल कर रहा है या कोई इशारा कर रहा है. तोह तू तोह जाएगा hi, तेरे साथ तेरी पत्नी भी मारेगी...

दिनेश : नहीं! नहीं! में... में ऐसा कुछ भी नहीं करूँगा.

लड़का : बढ़िया! चल, अब गाडी अंदर ले घर के. तेरे घर के बाहर गार्ड को भी नहीं पता चलना चाहिए समझा!?

दिनेश : हां! हां!

धीरे धीरे गाडी को अंदर करने के बाद जैसे hi लड़का और दिनेश गाडी से उतरे, तोह गार्ड भी थोड़ा हैरान था. इतनी रात गए, दिनेश किसी आदमी के साथ कार में!? सवाल तोह ज़रूर आया था उसके मैं में पर वो जानता था की ये पहली बार नहीं था, और इसके पहले भी कुछ काम की वजह से कई बार दिनेश लोगो के साथ रात में आय चूका है. तोह गार्ड ने अपने मैं से वो सवाल अगले hi पल निकाल दिया.

दोनों दिनेश और वो लड़का अंदर आये और जैसे hi रोहिणी ने दरवाज़ा खोला वो दिनेश को देख के मुस्कुरायी पर फिर बगल में खड़े लड़के को देख के वो थोड़ा हैरान रह गयी.

रोहिणी (इशारा करते हुए) : ये... कौन!??

दिनेश : अरे! हाहाहाहा~ ये...!? ये... है...

लड़का : नमस्ते जी! जी हमारी टायर्स की कंपनी नई अभी. आज बॉस ने डील करि थी सर के साथ. उसी के कुछ कागज़ चाहिए थे, जो शायद सर लाना भूल गए थे. इसलिए, में लेने आया हु उनके साथ hi.

रोहिणी : ओह्ह्ह! पर... इतनी रात... में...

रोहिणी कभी उस लड़के को देखती तोह कभी अपने पति को... उसकी समझ नहीं आ रहा था की भला इतनी रात गए कागज़ लेने क्यों आया है ये बाँदा? कागज़ तोह कल भी ले सकता था!?

इस से पहले की दिनेश जवाब दे पाटा, उस लड़के ने फौरन बोल डाला,

लड़का : आंटी जी! ऐसा है की... कल बॉस लंदन जा रहे है. और उनके साथ उनकी टीम भी. ज़रूरी काम से. में तोह केवल एक वर्कर हु वह पे. उन्होंने कहा की मुझे जल्द से जल्द कागज़ चाहिए क्युकी में यहाँ फिर नेक्स्ट मंथ आऊंगा. और इसलिए उन्होंने मुझे बेझा है... अब इसमें में क्या hi करू आंटी? आप hi बताइये!

रोहिणी : ओह्ह! अच्छा! नई नई... सही बात है. सुनिए! आप जो भी कागज़ है, इन्हे देदो...

दिनेश : हां! हां! में वो...

और रोहिणी ने hatt'te हुए अंदर आने के लिए रास्ता दिया. वो लड़का अंदर आके सोफे पर बैठ गया, और दिनेश ठीक उसके सामने खड़ा हो गया. उसकी समझ नहीं आ रहा था की क्या करे. बार बार वो अपनी शर्ट की आस्तीन से बस अपना पसीना पोछी जा रहा था.

एक गलत कदम और उसके साथ साथ उसकी बीवी भी मौत के घात उतार दी जाएगी.

लड़का : आंटी पानी मिलेगा क्या?

रोहिणी : हँ? हां बीटा! में लाती हु...

जैसे hi रोहिणी अंदर गयी, वो लड़का सोफे से कूद के उठा और अपना रिवाल्वर शर्ट के नीचे से निकाल सीधे दिनेश के माथे पर टिका दिया,

लड़का : सुन्न बे! अंदर जा, और अपने दोनों शोरूम्स के कागज़ात लेके बाहर आ समझा? एक अच्छा पन्ना ले और उसमे अच्छे से लिख की तू अपने होशो हवास में ये दोनों शोरूम आतिश खन्ना के नाम कर रहा है! समझा!? उसमे लिख... की मेरे साथ कोई ज़बरदस्ती नहीं की गयी है, ये में अपनी इच्छा से उन्हें सौप रहा हु. समझा? जितने भी पेपर है सब ला और जहा जहा सिग्न लगने है, सब में सिग्न कर समझा!? यदि एक भी गलती मुझे बाद में मिली तोह तेरी बीवी गयी...

दिनेश : नहीं! नहीं! रोहिणी... रोहिणी को कुछ मत करना... में... में लाता हु...

दिनेश तेज़्ज़ कदमो के साथ जैसे hi अंदर गया, रोहिणी पानी लेके किचन से बाहर निकली,

रोहिणी : अरे!? ये कहा गए?

लड़का : आंटी जी! वो पेपर्स लेने गए है.

रोहिणी : अच्छा! ये लो बीटा पानी!

लड़का : हां आंटी!

रोहिणी : वैसे क्या नाम लिखते हो बीटा?

लड़का : में!? जी मेरा नाम रंगा है...

उसका नाम सुन्न रोहिणी थोड़ा सोच में पद जाती है. ये नाम तोह बड़ा hi अटपटा सा था. खासकर उस आदमी के लिए जो एक कंपनी में काम कर रहा हो...

रंगा : हाहाहा~ दरअसल, बात ये है की मुझे बचपन से hi रंगो का खूब शौक था, तोह माँ बाप ने नाम रंगा रख दिया, फिर तोह गली मोहल्ले में यही नाम से में फेमस हो गया.

रोहिणी : ओह्ह! अच्छा!?

रंगा : हां आंटी! मेरे बॉस अक्सर कहते है की... काम करो तोह इतना बड़ा करो की नाम अपने आप हो जाए.

रोहिणी : ओह्ह! बोहत hi ुचे विचार है बीटा आपके बॉस के तोह... तब तोह कोई जानी मानी हस्ती hi होंगे...

रंगा : हाहाहा~ बिलकुल बिलकुल... बोहत बड़े आदमी है वो आंटी, बोहत स्ट्रिक्ट है. ज़्यादा गुस्सा आता है तोह सीधा उड़ा डालते है...

रोहिणी : हँ?

रंगा : नौकरी से... नौकरी से उड़ा देते है.

रोहिणी : अच्छा! काफी hi स्ट्रिक्ट है बीटा. और थोड़ा स्ट्रिक्ट होना ज़रूरी भी है वैसे... मेने इनको भी बोलै है की इनके स्टाफ में भी कई लोग ऐसे hi जो कामचोर है. ये मेरी बात सुनते hi नहीं...

रंगा : अब सब सुनेंगे आंटी. और वैसे भी... अब सर के बस में नहीं होगा कुछ...

रोहिणी : हम्म?

रंगा : कुछ लोग सुधरते नहीं है न आंटी! तोह अब सर के बस में नहीं है उन्हें सुधारना. बस, ऐसे लोगो को सीधा उड़ा दो... मेरा मतलब है नौकरी से हटा दो...

रोहिणी : हम्म! सही कहा बीटा तुमने.

इनकी बातें चल hi रही थी की दिनेश कागज़ लेते हुए बाहर आया. वो चाहता तोह अंदर से पुलिस को कॉल कर सकता था पर उसने रिस्क न लिया. क्युकी बाहर वो लड़का उसकी पत्नी के साथ बैठा हुआ था. अंजाम क्या होता, इसका वो अनुमान भी नहीं लगाना चाहता था.

सोफे पर बैठते हुए दिनेश अपने कापते हुए हांथो से शोरूम की साड़ी ओनरशिप किसी अनजान आदमी के हाथ देने जा रहा था.

जिस आदमी को वो जानता भी नहीं था, न कभी उसने उस आदमी को देखा न उसके बारे में सुना, वो आदमी रातो रात उसके दोनों शोरूम्स का मालिक bann'ne जा रहा था.

रोहिणी : आपके हाथ क्यों काँप रहे है?

रंगा : आंटी इन्हे ठण्ड लग गयी है. कार चलाते वक़्त विंडो खोल के रखे थे. मेने समझाया भी था पर सर है की सुने hi नहीं...

रोहिणी : क्याआ?? ठण्ड लग गयी? मेने कितनी बार कहा है की विंडो हमेशा बंद रखा करो. क्या पता किस टाइप का आदमी कब आके क्या कर दे...

रंगा : हाहाहाहा~ आंटी आपकी बात से पूरी तरह में सहमत हु.

रोहिणी : देखा न आपने!? अब ये काम कर लीजिये फिर सीधा आराम करना अब. और कल जाने की कोई ज़रुरत नहीं है. स्वास्थ पहले है...

रंगा : बिलकुल! अब तोह इन्हे वैसे भी घर में रहना पड़ेगा...

रोहिणी : हम्म?

रंगा : मतलब जब तक सर की तबियत ठीक न हो जाए, आंटी आप बिलकुल भी निकलने मत देना...

रोहिणी : हां! तुम सही कहते हो...

इधर दिनेश को उस लड़के की चापलूसी पर इतना तेज़्ज़ गुस्सा आ रहा था पर हालात के मारे वो मजबूर था. रोहिणी को वो चाह के भी कोस नहीं सकता था. वो तोह साड़ी बातो से अनजान थी. वो तोह केवल उसकी चिंता hi कर रही थी. काश...

काश उसने विंडो का गिलास बंद किया रहता तोह ये सब न होता.

पर अब बीती गलती के बारे में सोचने से क्या फायदा? अब तोह जो हो गया वो हो गया. अब इस सिचुएशन से बाहर साफल्य कैसे आया जाए, यही दिनेश की टॉप प्रायोरिटी थी.

कुछ hi मिनट के अंदर सारा इम्पोर्टेन्ट काम ख़तम हुआ और रंगा मुस्कुराते हुए बाहर जाने लगा.

रंगा : चलिए आंटी! यदि मौका मिला तोह दुबारा मुलाक़ात ज़रूर होगी.

रोहिणी : ठीक बीटा! आते रहना... अब तोह हमारे से डील हो गयी है आपकी.

रंगा : हाहाहाहा~ बिलकुल! आप बड़ी hi अच्छी हो आंटी! आपसे बात करके मुझे बोहत अच्छा लगा.

रोहिणी : बिलकुल बीटा! मुझे भी तुमसे बात करके अच्छा लगा.

रंगा : चलिए चलता हु....

पर जैसे hi वो जाने लगा, उससे कुछ याद आया...

और उसने जेब से एक मोबाइल निकाला और दिनेश को पकड़ा दिया,

रंगा : सर! आप मोबाइल कार में hi भूल गए थे. ये रहा आपका फ़ोन. चलता हु.

और वो मुस्कुराते हुए घर से बाहर निकल गया.

बाहर निकलते hi वही स्कार्पियो आयी, उसमे वो बैठा और वह से रफू चक्कर हो गए सभी.

इधर उसके जाने के बाद रोहिणी ने गेट बंद किया,

रोहिणी : कितना ईमानदार भी था है न?? चाहता तोह वो फ़ोन रख सकता था... पर उसने लौटा दिया.

पर दिनेश की जैसी बोलती hi बंद थी. उससे जैसे सदमा सा लग गया था.

रोहिणी : आप सुन्न रहे हो? कहा खो गए आप?

और रोहिणी के उससे हिलाते hi दिनेश फुट फुट कर रोने लगा. बेचारी रोहिणी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था की अचानक से दिनेश को क्या हो गया.

वो टेंशन में आ गयी, पर दिनेश तोह बस रोटा जा रहा था.

फिर अचानक hi उठ के उसने रोहिणी को उसके कंधो से पकड़ा और सब कुछ बताया, जिससे सुन्न बेचारी रोहिणी की आँखें फटी की फटी रह गयी. उसके ासु भी बहाना शुरू हो गए.

जिस लड़के को वो इतना अच्छा समझ रही थी अभी कुछ देरर पहले, वही उनकी बर्बादी का कारण था. ऊपर से वो खुद न्योता दे रही थी उससे...

ये जानते hi रोहिणी के पेर्रो टेल जैसे ज़मीन खिसक गयी. न जाने कितनी बातें कर ली होंगी उसने उस लड़के से...

वो कहते है न, की इंसान की शकल पे कभी नहीं जाना चाहिए.

रोहिणी ने रट हुए पुलिस को कॉल करने के लिए कहा, जो दिनेश ने किया.

दिनेश ने साड़ी बात पुलिस को जैसी की टेसी बता दी.

कुछ देरर में hi पुलिस आयी, साड़ी बातें उन्होंने सुनी और अपनी राय भी दी.

अब चुकी ये किडनेपिंग या लाइफ ात सटाके केस नहीं था इसलिए दिनेश को पुलिस ने सुबह अपनी F.I.R दर्ज करने को कहा.

फिलहाल के लिए तोह दिनेश सेफ था. उसपे कोई भी हमला नहीं हुआ था.

और अगले hi दिन दिनेश ने बिलकुल वैसा hi किया. पर कोई फायदा नहीं. उसकी उम्मीद जैसे अब मर्डर चुकी थी.

और आज यही दिन था जब उसने रागिनी को फ़ोन करके बताया था. न जाने आगे क्या होने वाला था. उसकी आखिरी उम्मीद अब बस उसका दामाद hi था.

***

इसी दिन निधि के घर में अलग सन चल रहा था...

"क्या वीर मां! आपसे ित्तु सा भी नहीं आता हहै~"

जूही वीर की गॉड में बैठ इस वक़्त टीवी में गेम खेल रही थी. और वो वीर को बार बार हराये जा रही थी, या यु कहे की वीर बार बार खुद hi हारे जा रहा था.

रात हो चुकी थी और अभी सब का डिनर रेडी हो रहा था, जो की निधि और श्रेया दोनों मिलके किचन में तैयार कर रही थी. और इधर वीर की ज़िम्मेदारी थी जूही को एंटरटेन करना जो की वो बखूबी कर रहा था.

वो हस्सी मज़ाक में लगा hi हुआ था की तभी अंदर उसके मैं में एक घंटी बजी,

*डिंग*

[Mission : Save Ragini!

Rewards : ?? Points

Time limit : 4 hours

Location : xxxxxxxx basement, near xxxxxxx road.]

'हँ?????'

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आज के लिए इतना hi गाइस!


धन्यवाद!
 
अपडेट - 18 ~ ट्रबल

अब तक...

वो हस्सी मज़ाक में लगा hi हुआ था की तभी अंदर उसके मैं में एक घंटी बजी,


*डिंग*

[Mission : Save Ragini!

Rewards : ?? Points

Time limit : 4 hours

Location : xxxxxxxx basement, near xxxxxxx road.]


'हँ?????'

अब आगे...


*टक*

*टक*

*टक*

एक आदमी के क़दमों के चलने की आवाज़ उस जगह पर गूँज रही थी. पेर्रो में डी एंड ग के वो काले जेन्युइन लाठर वाले फॉर्मल शूज जिनकी कीमत लाख के भी ऊपर होगी. वो ऐसे चमक रहे थे जैसे बस कुछ सेकण्ड्स पहले hi पोलिश होकर आये हो. फ्लोर पर उन् जूतों के चलने की आवाज़ साफ़ साफ़ एकदम क्रिस्प और फ्रेश सुनाई दे रही थी. और वो आवाज़ पहले से hi वह के भयानक मौहौल को और भी तीव्र बना रही थी.

उसने एक सफ़ेद कोट और सफ़ेद पंत पहना हुआ था. अंदर एक ब्लू शर्ट, कोट की ब्रैस्ट पॉकेट में एक गुलाब का फूल और सर्र पर सफ़ेद हैट.

वो दाए से बाए और बाए से दाए यु चलता जा रहा था की अचानक hi वो रुका और...

*थुड़*

एक ज़ोरदार आवाज़ उस फ्लोर पर एक स्टिक के पटकने से आयी जो उसके हाथो ने जकड राखी थी.

और सब कुछ एकदम से शांत हो गया.

उसने अपनी हॉकी स्टिक उठायी और सामने व्यक्ति की ऑर्डर अपनी स्टिक तानते हुए उस से बोलै,

"अब समझ आया न!? कैसे काम करते है?"

"ज... जी भौ!" सामने खड़े एक लड़के ने दररते हुए कहा.

"कितनी बार मेने तुमसे कहा है रंगा!? ये काम ऐसे नहीं होते. हमारे देश में इतने चोचले है की एक बार में कोई काम होता hi नहीं है."

रंगा ने अपना सर्र हिलाया और अपने भौ की बात में हां में हां मिलाई,

आतिश : तुम्हे क्या लगा था? की तुम दिनेश का शोरूम बस उस से ऐसे लिखवा के ले आओगे, सिग्न करवा लोगे और शोरूम मेरा हो गया? अरे ऐसे नहीं होता मेरे चेले... ऐसे काम होने लगा अपने देश में तोह न जाने कहा पहुँच जाऊ में.

अपने बॉस की दांत सुन्न रंगा ने अपना सर्र झुका लिया.

आतिश : आतिश है मेरा नाम... क्या? आतिश! और तुम तोह जानते hi हो मेरे नाम का मतलब...!?

उसने अपना सर्र थोड़ी निराशा में हिलाया और एक गहरी लम्बी सास ली.

फिर आँखें बंद कर, सास चोरर उसने दुबारा आँखें खोलते हुए रंगा को देखा जो अभी भी सर्र झुकाए खड़ा हुआ था.

आतिश : रंगा तुम भले hi दिनेश से पावती बनवाकर, उस से लिखवा के सिग्न करवा के ले आये पर इन् सब के बावजूद दिनेश अभी भी चाहता तोह बोहत कुछ कर सकता था. वो मेरे खिलाफ F.I.R कर सकता था, लॉयर्स ढूंढ सकता था, मुक़दमा दर्ज़ कर सकता था, क्या कुछ नहीं कर सकता था अगर...

कहते हुए वो ृक्क गया.

रंगा : अगर?

और उसका सवाल सुन्न आतिश मुस्कुराया. उसकी मुस्कान किसी शैतान के जैसी प्रतीत हो रही थी.

वो मुस्कान ऐसी थी जो साफ़ साफ़ अपनी जीत को बया कर रही थी.

आतिश : अगर उसकी औकात होती तोह... और यदि उसका पाला मुझसे न पड़ा होता तोह.

उसके इतना बोल, रंगा केवल शांत रहा. न कुछ बोलै, न कुछ किया.

आतिश : पुलिस हो चाहे वकील हो चाहे नेता हो या चाहे कोई भी हो. यदि वो मुंबई के इलाक़ो से भली भाति वाक़िफ़ है तोह वो जानता hi होगा की आतिश कौन है और उस से क्यों नहीं भिड़ना चाहिए.

उसने बोलते हुए दुबारा टहलना शुरू किया और एक बार फिर उसके जूतों की आवाज़ उस जगह में गूंजने लगी, पर इस बार साथ hi साथ उसके बोल भी गूँज रहे थे.

प्रतीत हो रहा था की आतिश और उसके साथी किसी अबंदोनेद बिल्डिंग की बेसमेंट में थे जो कुछ सफ़ेद लेद लाइट्स से जगमग हुआ पड़ा था.

रंगा : पर भौ... ये दिनेश तोह आपकी F.I.R करने गया था.

आतिश : हम्म! गया तोह था. क्यों है न? मिस्टर दिनेश? गए थे न?

आतिश ने अगले hi पल मुस्कुराते हुए अपना सर्र साइड में करते हुए देखा जहा पर एक व्यक्ति पहले से hi कुर्सी पर रस्सियों से बंधे हुए बैठा था.

"मंममपहहहह.... Mmmmmmmmmm"

वो आदमी और कोई नहीं बल्कि दिनेश hi था जिसके मुँह पर इस वक़्त पट्टी बंधी हुई थी और वो बस छटपटाते हुए रस्सी से छूटने की नाकाम कोशिशे कर रहा था.

आतिश : अरे रे... देखो अंकल बेचारे डर गए.

धीरे धीरे आतिश दिनेश की ऑर्डर बढ़ा और क़रीब आते hi उसका जबड़ा अपने एक हाथ में पकड़ते हुए बोलै,

"मुझे तुमसे कोई निजी दुश्मनी नहीं थी पता. पर क्या है न जो रास्ता में ढूंढ रहा था वो मुझे मिला नहीं. और, जो मिला वो तुम्हारे से होते हुए जा रहा था. इसलिए, तुम्हारे साथ ये सब हो रहा है."

"Mmmmmmphhhhhhhhhh..."

पर दिनेश ये सब सुनके केवल हिलने डुलने का प्रयत्न hi कर सकता था.

आतिश : न न न न... तुम गए थे न पुलिस में? मेरी F.I.R करने? क्या हुआ? कुछ नहीं न? लॉयर? वो भी नहीं मिले?? अरे रे...

उसने दिनेश के सर्र पर हाथ फरते हुए उससे बड़े hi प्यार से पुचकारा जैसे मानो वो कोई बच्चा हो,

"पता क्यों नहीं हुआ कुछ? क्युकी वो सब न मुझे जानते है.... हाँ! वो मुझे जानते है... वो जानते है की आतिश भौ से पन्गा नहीं लेना है चाहे कुछ भी हो जाए. क्यों??? पूछो पूछो..."

"मममममममममपप्पह्ह्ह्ह..."

आतिश : अरे रे... कैसे पूछोगे? मुँह में पट्टी जो बंधी हुई है. पर चलो में hi बता देता हु. मुझ से न ये पुलिस के छोटे मोठे लोग, ये छोटे मोठे वकील ये सब पन्गा नहीं लेते. क्युकी वो जानते है की जिस दिन मेरे खिलाफ गए, उस दिन उनके घर में उनकी फोटो तंग जाएगी. समझे अब?

"ममममममपफहहहहह...."

आतिश : अरे यार... ये बार बार बिलबिलाना बंद कार्डो समझे? वर्ण बस ट्रिगर दबाना है मुझे... फिर तुम्हारा ये किकियाने भी कोई न सुन्न पाएगा...

कहते हुए आतिश दिनेश को चोरर पीछे हटा पर फिर दुबारा कुछ सोचते हुए पलटा और उससे देखा,

आतिश : अरे! हाहाहा~ में ये कैसे भूल गया? आओ तुम्हे एक तोहफा देता हु.

*क्लैप*

*क्लैप*

और अगले hi पल उसने दो बार ताली बजायी जिसकी आवाज़ सुनते hi बेसमेंट में एक गेट खुला और एक आदमी एक चेयर को धक्का देते हुए आगे ला रहा था.

चेयर के नीचे पहिये लगे हुए थे, जिस से आसानी से वो चेयर को आगे बढ़ा पा रहा था. पर उस चेयर में कुछ अलग बात थी...

वो ये की उसमे एक औरत बिलकुल दिनेश की hi तरह रस्सियों से लिपटी हुई थी और उसके भी मुँह में पट्टी बंधी हुई थी.

और जैसे hi दिनेश की नज़र उस औरत पर गयी, उसके पेर्रो टेल ज़मीन खिसक गयी. वो देख पा रहा था उस औरत की आँखों में ासु थे, आँखें रो रो कर लाल हो चुकी थी. उन् आँखों में मजबूरी, डर, aasha-heenta साफ़ झलक रही थी.

और वो औरत कोई और नहीं उसकी अपनी बेटी, रागिनी थी.

आतिश : पसंद आया तोहफा? हाहाहा~

हस्ते हुए आतिश ने वही राखी एक कुर्सी ली और उसपे बैठ गया.

आतिश : रंगा!???

रंगा : जी भौ!

आतिश : अब समझ आया तुम्हे की काम हमेशा पूरा क्यों करना चाहिए!?

रंगा : जी... जी भौ!

आतिश : उस दिन तुमने बोहत बड़ी गलती करि थी रंगा. यदि तुम उस दिन वो दो नए नवेले लड़के सीढ़ियों पे खड़े नहीं करते तोह वो लड़की भाग hi नहीं पाती. और में ये दावे के साथ कह सकता हु की वो वही से भागी थी तुम्हारे नए लड़के को चकमा देते हुए.

रंगा : सॉरी! सॉरी भौ! आगे से ऐसा नहीं होगा...

आतिश : हम्म!! इसलिए कहता हु की काम पूरा करो. आधा अधूरा नहीं...

रंगा : जी भौ!

आतिश : इधर दिनेश सुबह मेरी F.I.R करने जा रहा था बेचारा, जो मेने उससे करने दी. भाई ताकि उससे भी तोह तसल्ली रहे की उसने पुलिस में अपनी तरफ से बोल दिया है... हाहाहा~ और उसके बाद मेने उससे दबोचवा लिया...

रंगा : भौ? अब आगे का क्या प्लान है!?

आतिश : वही बता रहा हु रंगा. उसके बाद उसकी बेटी जिसकी हम तलाश में थे वो फास्सी और फिर फाइनली...

*क्लैप*

*क्लैप*

एक बार फिर उसने दो बार अपनी ताली बजायी और फिर एक बार बेसमेंट का दूर खुला और दूसरा आदमी एक चेयर धकेलते हुए आगे लाया.

इस चेयर पर भी एक शख्स था जो इस वक़्त उसी हाल में था जिस हाल में दिनेश और रागिनी थे.

जैसे hi रागिनी और दिनेश की नज़रे उस शख्स पर पड़ी, दोनों की आँखें फटी की फटी रह गयी. रागिनी छटपटाई पर कोई फायदा नहीं. रस्सिया इतनी टाइट बंधी हुई थी की उसकी हर्र एक कोशिश नाकाम थी.

सामने लाया गया शख्स उसका अपना पति, विवेक था.

आतिश (स्माइल्स) : इसकी उम्मीद नहीं थी है न? पर हमे तोह इसी मछली की तलाश थी, या यु कहे की इसी मछली के ज़रिये हमे बड़ी मछली हासिल होएगी.

रंगा : भौ!? इसके ज़रिये... के... कैसे?

रंगा ने थोड़ा कन्फ्यूज्ड होते हुए पूछा. कई बार तोह वह आसानी से अपने भौ के प्लान्स समझ जाता था पर कई बार तोह जैसे बातें उसके सर्र के ऊपर से निकल जाती थी.

आतिश : मेने तुमसे कहा है न रंगा. कमज़ोर कड़ी को पकड़ो, रास्ता अपने आप मिलता है...

रंगा : ??????

आतिश : मुझे उस लड़की की तलाश है जो उस दिन क्लब से भाग गयी थी. और उसके पास हम यदि आसानी से पहुँच सकते है तोह वो रास्ता है उस दूसरी लड़की के पास पहुचना...

रंगा : फिर?

आतिश : फिर क्या? यही पर तोह दिक्कत आ रही थी रंगा. की हम वो दूसरी लड़की के पास नहीं पहुँच पा रहे थे. तुम सिक्योरिटी तोड़ नहीं पाए इसलिए मुझे ये रास्ता ढूंढ़ना पड़ा.

रंगा : हँ???

आतिश (स्माइल्स) : दूसरी लड़की... वो कम्पनीज से डील्स करने में बिजी है कई दिनों से. मेने तुमसे कम्पनीज के नाम मांगे थे न? और उनकी साड़ी डिटेल्स भी?

रंगा : जी... जी भौ!

आतिश : बस! उधर से hi तोह रास्ता मिला है रंगा. उन् 6 की 6 कम्पनीज में से सबसे इजी टारगेट... इस चूतिये की कंपनी....

आतिश ने कहते हुए विवेक की तरफ इशारा किया और मुस्कुराया. विवेक केवल गुर्राते हुए हिल hi सकता था. मुँह पे टेप जो चिपका हुआ था और हाथ पेर्रो में रस्सी बंधी हुई थी.

आतिश : और यही मेरा प्लान था रंगा. की, इसकी कंपनी इसके हाथ से लूंगा, फिर इस कंपनी के ज़रिये उस दूसरी लड़की के पास डील लेके जाऊंगा. और जैसे hi सिक्योरिटी से गुज़रते हुए वो हाथ में आएगी, फिर उससे दबोचूँगा... और अंत में... उस के ज़रिये वो क्लब वाली लड़की को...

रंगा ने अपना थूक निगला और बोलै, "भौ! इतना सॉलिड प्लान?? पर मेरी ये समझ नहीं आया की हमे दूसरी लड़की की ज़रुरत क्यों है उस क्लब वाली को ढूंढ़ने के लिए?"

आतिश : बस इतना जान लो, की दोनों के बीच एक कनेक्शन है. यदि ये मिल गयी तोह क्लब वाली आराम से मिल जाएगी...

रंगा : ओह्ह्ह्हह्ह!

आतिश : पर... इस विवेक की कंपनी पाने के लिए मुझे इसकी कमज़ोर कड़ी को पकड़ना था... जो की थी इसकी पत्नी... और इसकी पत्नी की कमज़ोर कड़ी???

रंगा : इसके माँ बाप!??

आतिश : हाहाहा~ बिलकुल सही! सीख रहे हो अब तुम... गुड! गुड!

उसकी बातें सुन्न, रागिनी जोरर जोरर से हिलने का प्रयत्न करने लगी, खुद को झंझोरते हुए वो कुर्सी में बैठे हुए रस्सियों से छूटने का प्रयास करने लगी तोह उसकी ये हरकत देख एक बार फिर आतिश मुस्कुराया,

आतिश : मैडम के मुँह से ज़रा टेप हटाओ, लगता है कुछ कहना चाहती है.

रंगा ने बात सुन्न, फौरन hi रागिनी के मुँह से टेप निकाला और टेप निकालते hi रागिनी शुरू हो गयी,

रागिनी (चिल्लाते हुए) : कुत्त्तीीे.... कमीनी... तुझे फूटी कौड़ी तक नहीं मिलेगी... तू क्या सोच रहा है की ऐसे हमे बाँध कर तुझे सब कुछ मिल जाएगा? एक रूपया नहीं मिलेगा तुझे देखना, अभी पुलिस आएगी और तुझे सलाखों के पीछे दाल देगी...

"हहहहहहह~"

उसकी बात अभी ख़तम hi नहीं हुई थी की आतिश जोरर जोरर से ठहाके लगाते हुए हस्सन लगा. पूरे बेसमेंट में उसकी हस्सी गूंजने लगी. और उसके आदमी केवल खड़े हुए उससे देखते रहे.

आतिश : ये लड़की बड़ी मज़ाकिया है यार. कहा से सीखी रे तू? हाँ? कॉमेडी करना? हेहेहे~

वो अपनी आँखे मलते हुए पेट पकड़ के हस्सन लगा, जिससे देख उसके आदमी भी धीरे धीरे डाट निपोरने लगे.

पर अगले hi पल...

*Chataaaaaaaaaakkkkk*

एक ज़ोरदार थप्पड़ की गूँज पूरे बेसमेंट में फेल गयी और सभी हस्स रहे आदमी एकदम शांत हो गए. उनके रौंगटे खड़े हो गए.

एक ज़ोरदार तमाचा आके सीधे रागिनी को पड़ा, जो आतिश ने अपने उलटे हाथ से उसके गालो पर मारा.

डर!

शायद अब रागिनी को समझ आ रहा था की वो किसी ऐर्रे जर्रे आदमी के सामने नहीं बैठी हुई थी.

अचानक hi आतिश ने उसकी गर्दन के पीछे एक हाथ ले जाके उसकी गर्दन पकड़ी और उसके कानो की तरफ बढ़ते हुए बोलै,

"मुझे न... मुझे न लोगो का विश्वाश तोड़ने में बोहत मज़ा आता है. मतलब बोहत ज़्यादा... जब... जब उनकी वो शकल बनती है न, बाद में जब उनका विश्वाश toot'ta है, और फिर वो बिना कोई आशा वाला चेहरा बनाते है न... वो... उससे देख के न... उससे देख के न... पता नहीं क्यों पर... पर मुझे बोहत ज़्यादा सुकून मिलता है. मुझे मज़ा आता है..."

एक एक शब्द आतिश के मुँह से रागिनी के कानो में घुस रहा था और बेचारी रागिनी डर के मारे ासु बहाते जा रही थी. सिसकी लेते हुए वो बस खुद के शरीर को कापने से रोकने की कोशिश कर रही थी. पर कोई फायदा नहीं. उसके शरीर की thar-tharaahat जैसे बंद होने के नाम hi नहीं ले रही थी.

अगले hi पल आतिश उठा और अपने कोट के अंदर की जेब से उसने अपना रिवाल्वर निकाला. उसने रागिनी को देखा और बोलै,

"अभी दिखाता हु तुम्हे की में लोगो का विश्वाश कैसे तोड़ता हु."

बोलते हुए वो सीधा विवेक के पास आया और उसके मुँह से टेप निकाल दिया.

आतिश : दो ऑप्शन है तुम्हारे पास. या तोह तुम्हारी जान या तोह तुम्हारी बीवी की जान... बोलो किस्से बचाओ? तुम्हे या तुम्हारी बीवी को?

विवेक ये सुनते hi एक चक्रव्यूह में फस्स गया. उसकी बीवी और उसके ससुर उसके बगल से hi बैठे हुए थे. जैसे hi उसने रागिनी पर नज़र डाली वो चिल्ला उठी,

रागिनी : न्यूऊऊओ!!! लीव हिम अलोन... चोर्रो उससे...

उसकी चींखे सुनते hi आतिश ने एक इशारा किया और रंगा ने आगे बढ़ फौरन hi दुबारा से वही टेप रागिनी के मुँह पे चिपका दिया.

"ममममममपफहहहहह"

अब केवल उसकी हलकी हलकी विद्रोह की आवाज़ hi आ रही थी.

आतिश : बोल जल्दी लड़के... तेरी जान या तेरी बीवी की? किस्से बचाओ?

पर विवेक कुछ न बोलै और अगले hi पल,

*बंग*

"आआआआरररररररगगगगठ्ठ"

एक तीव्र आवाज़ गोली चलने की आयी और पीछे कई आदमियों में से एक आदमी अपना परर पकड़ वही नीचे गिर पड़ा. वो इधर उधर मचलते हुए ज़मीन में दर्द से चींखने लगा पर न hi उससे किसी ने उठाया और न hi उसकी किसी ने मदद की.

और कुछ hi पालो में उसका परर लहू लहान हो गया.

गोली आतिश के रिवाल्वर से निकली थी जिसकी मुज़्ज़ले से अभी हल्का हल्का धुँआ बाहर निकल रहा था.

आतिश : अब बोलोगे??? नहीं तोह अगला परर तुम्हारा होगा.

उसने फिरसे विवेक को देखते हुए पूछा. पर इस बार असर अलग था. विवेक काँप रहा था. उस आदमी की दर्द से बिलबिलाते हुई चींखे उसके कानो में पड़ रही थी, तोह विवेक के शरीर का thar-tharaana तोह लाज़मी था.

विवेक ने एक बार फिर रागिनी को देखा जिसकी आँखों में ासु थे और साथ hi साथ खौफ भी, उसकी पूरी आँखें लाल पद चुकी थी...

रिवाल्वर का मुज़्ज़ले विवेक के माथे पर टिका हुआ था. उसने ये देख अपना सर्र झुकाते हुए निचला होंठ जोरर से दातो टेल दबाया और एक आवाज़ में जोरर से बोलै,

"मुझे मत मारो... मुझे चोरर दो!!!"

*साइलेंस*

जहा ये सुनते hi आतिश के चेहरे पर मुस्कान आ गयी, वही दूसरी तरफ रागिनी की आँखें ये सुनते hi फटी की फटी रह गयी.

"आआअह्हह्ह्ह्ह! एसससससस!!! थिस इस थे फीलिंग!!!!!"

अपने दोनों हाथ हवा में फैलाते हुए और सर्र ऊपर कर आतिश वही गोल गोल घूमने लगा जैसे मानो बारिश की बूंदो का एहसास कर रहा हो जो आसमान से टपक रही हो.

अगले hi पल वो एक बार फिर रागिनी के पास आया और उसके कानो की तरफ झुकते हुए उस से बोलै,

"मेने कहा था न? मुझे विश्वाश तोड़ने में बोहत ज़्यादा मज़ा आता है. और तुम्हारा चेहरा... सससससस.... उफ्फ्फ्फ़! यही... यही चेहरा तोह में देखना चाहता था... पूरी तरह से टूटा हुआ... जिसमे आशा की एक किरण तक न हो.... एसससससस! थिस इस आईटी. दिल को इतना सुकून मिल रहा है न की पूछो मत. टूटा न? तुम्हारा विश्वाश टूटा न? देखो कैसे बिखर गया टूट के... है न? मज़ा आया न? हाँ?"

उसकी बात रागिनी के कानो में पद तोह रही थी पर जैसे उससे कुछ सुनाई hi नहीं दे रहा था. वो बस भौचक्की सी अपनी आँखें फाड़े विवेक को घर रही थी, जो सर्र झुकाए वह बैठा हुआ था.

आतिश पीछे हटा और रंगा को देखते हुए बोलै,

"इन् दोनों बाप बेटो की वीडियो बनवाओ जिसमे ये क़ुबूल करे की ये अपनी कंपनी और शोरूम्स मेरे हवाले कर रहे है और इन् सब में कोई ज़बरदस्ती नहीं है. रही बात वकील और पुलिस की और कागज़ी कामो की तोह वो सब में देख लूंगा. 2 दिन में सब हो जाएगा. फिर हमे इनकी कोई ज़रुरत नहीं है, इन्हे जाने देना... कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे ये..."

और इतना बोल वो वह से जाने लगा.

पर जाते जाते...

उसके माउथ ऑर्गन की वही धुन्न पूरे बेसमेंट में गूँज गयी...

***

कुछ देरर पहले...

रागिनी ने जब विवेक को अपनी परेशानी उसकी कंपनी में जाके बतायी थी उसके बाद से hi विवेक कही पुलिस तोह कही अपने सोर्स लगा के कोई जुगाड़ लगाने की कोशिश कर रहा था. पर जैसे hi उससे ये पता चला की इन् सब के पीछे आतिश का हाथ था तोह उसने अपने हाथ खड़े कर दिए.

उसने रागिनी को ये कहते हुए समझाया की शोरूम तोह बाद में भी बनवा सकते है, जिससे सुन्न रागिनी भड़क उठी और उससे खरी खोटी सुनाने लगी.

बस! इसी वक़्त रागिनी को एक अननोन नंबर से कॉल आया था जो किसी और का नहीं आतिश का hi था.

जब दिनेश F.I.R करके लौट रहा था तोह उसको उठवा के वो अपने बेसमेंट में ले गया था.

कॉल उठाते hi रागिनी को जब पता चला की उसके डैड को अगवा कर लिया गया है तोह बेचारी इतना डर गयी की वो सीधा सीधा आतिश के प्लान में जा फास्सी.

आतिश तोह चाह hi रहा था की रागिनी अकेली बेसमेंट में आये और इसलिए उसने रागिनी को फ़ोन पे डर्राया की यदि अकेली नहीं आयी तोह उसके पिता को गोली मार दी जाएगी.

इतनी टेंशन में अच्छे अच्छा का दिमाग नहीं चलता और रागिनी का भी यही सन था. वो विवेक से लड़ झगड़ के बेसमेंट की ऑर्डर निकल पड़ी पर उससे ऐसे यु जाते देख विवेक खुद अपनी गाडी निकल के उसका पीछा करने लगा.

और नतीजा?

दोनों के दोनों बेसमेंट में पकडे गए और दोनों को hi बंधी बना लिया गया.

विवेक तोह बुय 1 गेट 1 फ्री ऑफर की तरह आतिश की झोली में आके गिर पड़ा. आतिश ने खुद ये नहीं सोचा था की रागिनी के साथ hi उससे विवेक भी मिल जाएगा. ये तोह सोने पे सुहागा था उसके लिए.

अब उसका काम और आसान हो चूका था...

***

इधर वीर शाम को जूही के साथ खेल रहा था जब उसके दिमाग में अचानक hi घंटी बजी थी और उससे मिशन मिला था.

'हँ??'

[Master!!! Lagta hai aapki Bhabhi kisi musibat me hai.]

'मेरी भाभी!? हम्फ! उन्होंने तोह मुझसे आज तक बात नहीं की. वो भी उन्ही लोगो में से है पारी.'

[Wo jaisi bhi ho, but abhi aapko usse bachaana hai.]

'हँ?! में क्यों बचाओ उन्हें भला? और ऐसी कोण सी मुसीबत आ गयी उनपे भला?'

[Arre master!!! Nahi bachaaya toh aap mujhe kho doge na?? It's a mission.]

'सहित! में तोह भूल hi गया था. मिशन नहीं किया तोह तुम हमेशा हमेशा के लिए चली जाओगी.'

[Yes!]

'पर मुझे एक बात समझ नहीं आयी. तुम्हे लोकेशन कैसे पता चली? तुम तोह मेरे अंदर हो.'

[Master! Abhi aap ye jaan'ne ke liye qualified nahi ho. Level 3 pe pohuchaiye mujhe, uske baad hi kuch sawaal ke uttar milenge.]

'फ़क थिस! हर्र बार में क्वालिफाइड hi नहीं रहता...'

[Hurry master!]

इस से पहले की वीर पारी को जवाब दे पाटा अंदर से श्रेया एक कटोरी लेते हुए बाहर निकली और जूही और उसके सामने आके कड़ी हो गयी,

श्रेया : ोये!!! ज़रा टास्ते कर और बता कैसे बने है छोले?

वीर ने श्रेया से कटोरी हाथ में लेते हुए एक स्पून से टास्ते किया और फिर उससे देखते हुए बोलै,

"एक नंबर... और आपने तोह बनायीं नहीं होगी है न?!"

श्रेया : हँ? व्हाट दो यू मैं??? मेने और दी ने मिलके बनायी है.

वीर : जिसमे आपने उनकी बोहत मदद करि है न?

श्रेया (नॉड्स) : हम्म! हम्म!

वीर : जैसे की मसाले पकड़ाना और छोटा मोटा सामान देना है न?

श्रेया (नॉड्स) : हम्म! हम्म!.... हँ? व्हाट थे हेलल?

वीर : हाहाहाहाहा~

जूही : वीर मामू... मासी से कुछ नहीं आता... मम्मी hi बनाती है सारा खाना...

वीर : पफ्फफ्टत्त हाहाहाःहाहा~

श्रेया : जुहीईईई तुममममम....

वो खीजते हुए कटोरी लेके अंदर जाने hi वाली थी की इतने में hi जूही ने कटोरी पकड़ ली,

जूही : मुझे भी खानी...

श्रेया : जूही चोर्रो! वो स्पून तुम्हारे वीर मामू की जूठी हो चुकी है... अंदर आके टास्ते कर लो...

जूही : तोह क्या होता? में वीर मामू का जूठा खा लुंगी...

और उसने चम्मच उठाते हुए वीर की hi चम्मच से एक बार टास्ते किया और मुंडी हां में हिलाते हुए वो टास्ते का मज़ा लेते हुए वापस से वीर की गोदी में आके बैठ गयी.

इधर बेचारी श्रेया हक्की बक्की सी कड़ी केवल जूही को देखती रह गयी.

आज तक जूही ने उसका जूठा कभी नहीं खाया था, वो केवल अपनी मम्मी का hi जूठा खाती थी. पर आज उसने वीर का जूठा खाया. ये बात श्रेया को बिलकुल भी हज़म नहीं हो रही थी...

श्रेया : तुम दोनों... दोनों मिले हुए हो...

खीजते हुए वो अंदर चली गयी और वीर केवल हस्ता रहा.

[Master!???]

'ी क्नोव पारी!'

उसने एक गहरी सास ली...

'आज फिर यु मुझे बीच में जाना पड़ेगा. कितने प्यार से निधि Ma'am आज स्पेशल डिनर बना रही है. फिरसे उन्हें टेंशन होएगी... और फिरसे एक बार डिनर में में नहीं रहूँगा...'

[I know Master! But ye abhi zaroori hai.]

'राइट!'

और वो उठा और अंदर किचन में गया जहा उससे निधि के दर्शन हुए जो जल्दी जल्दी अपने हाथो को चलाते हुए डिशेस बनाने में लगी हुई थी.

साथ hi श्रेया जो उसकी मदद करती जा रही थी.

उसने बड़ी hi नरम आवाज़ में निधि को पुकारा,

वीर : Ma'am!!

पर निधि बिना पालते हुए hi बोली,

"बस बैठो वीर! 10 मिनट और.... फिर फटाफट सबको थाली लगाती हु."

पर उसके ये बोल वीर को जाने से और बाँध रहे थे.

मायूस होते हुए वो आगे बढ़ा और एक बार फिर उसने धीरे से पुकारा,

"Ma'am!?!"

इस बार उसकी आवाज़ सुन्न दोनों hi निधि और श्रेया पलटी...

क्युकी इस बार...

उसकी आवाज़ में वो अलग बात थी...

पुकारते वक़्त उसकी आवाज़ में वो कोमलता, वो नरम सा एहसास इस बार न केवल निधि को बल्कि श्रेया को भी महसूस हुआ.

और दोनों hi जब पलटी तोह दोनों hi ashcharya-chakit रह गयी.

क्युकी वीर का बोहत hi मायूस सा चेहरा उनकी नज़रो के सामने था.

निधि : हँ!?

वीर : ी हैवे तो जो... कुछ अर्जेंट काम है Ma'am.


बोलते हुए उसने एक फीकी सी स्माइल दी. उसकी बात सुन्न निधि उससे कुछ देरर तक देखती hi रही और फिर श्रेया ने खामोशी तोड़ी,

श्रेया : व्हाट??? अब तुम्हे ैंन टाइम पे कोनसा अर्जेंट काम याद आ गया? कही फिरसे लड़की के चक्कर काटने जा रहे हो क्या? में बता रही हु... हमारे घर में फिरसे वो सब करके मत आना...

निधि (जोरर से) : Shreyaaaaaaaaaa

श्रेया : ठीक तोह कहा मेने. अचानक खाने के टाइम इससे कोण सा काम याद आ गया भला?

वीर : It's अर्जेंट!

श्रेया : हम्फ! आ गया होगा बाबू शोना का फ़ोन तोह चल दिए... अब जाके गुल छर्रे उड़ाएंगे...

निधि : श्रेया तुम चुप रहो. और बाहर जाओ...

श्रेया हम्फ करते हुए वीर को घूरते हुए बाहर निकल गयी. और किचन में केवल निधि और वीर hi बच गए.

निधि ने सर्र झुकाया और पलट के वो अपने काम में लग गयी. फिर बड़ी hi धीमी आवाज़ में बोली,

"जल्दी आना..."

और बस...

उसका इतना hi कहना था की...

एक अत्यंत hi अजीब सा दर्द वीर को अपने अंदर महसूस हुआ. न तोह निधि ने उस से कुछ पूछा की वो कहा जा रहा है और न hi उससे रोका. बस इतना कहा की जल्दी आ जाना.

पता नहीं वीर को क्या हुआ की...

उसका हाथ अपने आप अचानक उठा और निधि के कंधे पर जाके थम गया.

*बेदुम्प*

अचानक hi मानो जैसे निधि के दिल ने एक धड़कन फांद ली हो...

वीर का हाथ उसके कंधे पर मैरून गाउन के ऊपर आधा रखा हुआ था. उसकी 2 उंगलिया और अंगूठा उसके नंगे कंधे को स्पर्श कर रहा था.

त्वचा से त्वचा का मेल हुआ शायद इसलिए निधि के दिल की धड़कन अचानक hi तेज़्ज़ हो गयी.

और अगले hi पल उसके कानो में वीर की आवाज़ पड़ी,

"में पूरी कोशिश करूँगा Ma'am. जितनी जल्दी हो सके... उतनी जल्दी आने की... और जैसा आप सोच रही है वैसा कुछ भी नहीं है. श्रेया जी की बातो को इग्नोर करियेगा... एंड... एंड... थैंक यू..."

निधि के होंठ खुले पर कोई शब्द न निकले. एक बार फिर उसने प्रयास किया पर फिर वही हुआ.

अंत में उसने palat'te हुए कुछ कहना चाहा पर...

वीर सामने नहीं था.

वो जा चूका था.

और बॉहे सिकोड़ते हुए वो वही कड़ी रही...

जब तक की कुछ देरर बाद वापस से काम में नहीं लग गयी.

***

*हफ़* *हफ़*

इधर वीर सड़क पर बस भागते भागते खुद को hi कोस्टा जा रहा था.

कैसे वो अच्छा ख़ासा घर का माहौल बिगाड़ के आ गया.

[Master! Run!!!!]

'फ़क!!! ी ऍम रनिंग पारी... हेलीकाप्टर थोड़ी हु...'

[Kaash aapne apni agility par dhyaan diya hota.]

'यदि मेने सारे पॉइंट्स अगिलिटी में डाले होते तोह में बोहत तेज़्ज़ हो जाता?'

[Bilkul! Boht tezz!]

'ओह्ह्ह! हाहाहा~ फिर तोह कोई टेंशन hi नहीं रहती... यु दौड़ के कही भी पहुँच जाता.'

[Itna easy samajh rahe ho? :roll: Yadi keval agility pe dhyaan diya hota toh khoob tezz bhaag toh lete par bhaagne ke baad jo maaspeshiyo me dard umadta usse kese bardaasht karte?]

'हँ??'

[Jitna tezz bhaagoge, andar ki maaspeshiyo par bhi utna hi zyaada pressure padega. Uske baad jo dard uthega usse kese bardaasht karoge? Issi ke liye toh endurance stat diya gaya hai. Aapki sehan sheelta. Jispar aapne shuru se dhyaan nahi diya... :roll:]

'व्हाट थे हेलल? पारी! इतने पॉइंट्स अब कहा कहा दालु. वैसे hi पॉइंट्स की तंगी चल रही है.'

[Ye toh kuch bhi nahi hai... :roll:]

'क्या मतलब?'

[Kuch bhi nahi! :smile2: Master! Wo raha basement ka raasta.]

न जाने कब वीर बातो hi बातो में कभी दौड़ते हुए, तोह कभी किसी से लिफ्ट लेते हुए अपनी मंज़िल पे आखिर पहुँच hi गया.

[Are you ready master? :eek1:]

'हम्म!!!'

[Brace yourself!]

'हम्म!!!'

[You'll have to kill.... ]

'हहहह???'

.

.

.

.

.

.

.

.

आज के लिए इतना hi गाइस!


धन्यवाद!

पसंद आये तोह लिखे कर दियो... :hi:
 
अपडेट - 19 ~ टैक्टिकल एप्रोच

अब तक...

न जाने कब वीर बातो hi बातो में कभी दौड़ते हुए तोह कभी किसी से लिफ्ट लेते हुए अपनी मंज़िल पे पहुँच गया.

[Are you ready master?]

'हम्म!!!'

[Brace yourself!]

'हम्म!!!'

[You'll have to kill....]

'हँ???'


अब आगे...

वीर को निधि के घर से गए आधे घंटे हो चुके थे. रात के 8:30 बज रहे थे और निधि इधर जूही और श्रेया को खाना परोस रही थी. पर उसकी खुद की थाली टेबल पर कही नज़र नहीं आ रही थी.

श्रेया : आप नहीं खा रही?

श्रेया के सवाल पर निधि ने खाने को बीच में hi परोसते हुए उससे देखा और उसके हाथ अचानक ृक्क गए. एक लम्बी सास लेते हुए वो बोली.

निधि : थोड़ी देरर वेट कर लेती हु. शायद अभी थोड़ी देरर में आ जाए. वर्ण फिर बेचारा अकेला बैठ के खाएगा...

श्रेया : हां तोह? हे टोटली डेसेर्वेस तहत. न तोह बता के गया की कब आएगा, न ये बता के गया की कहा गया है? अरे कहा गया होगा!? में पक्के से बता रही हु आपको, ये गया है अपनी किसी माशूका के पास, और देखना वह...

निधि : नहीं श्रेया! ऐसा कुछ भी नहीं है.

निधि ने विरोध करते हुए कहा. शायद उससे अपने मैं में वीर के वो बोल याद आ रहे थे.

'में पूरी कोशिश करूँगा Ma'am. जितनी जल्दी हो सके... उतनी जल्दी आने की... और जैसा आप सोच रही है वैसा कुछ भी नहीं है. श्रेया जी की बातो को इग्नोर करियेगा... एंड... एंड... थैंक यू.'

जो शब्द वीर ने कहे थे, उस से तोह यही प्रतीत हो रहा था की वो किसी ज़रूरी काम से hi गया था.

श्रेया : आपको कैसे पता ऐसा कुछ भी नहीं है? क्या आप देखने जा रही हो? की वो क्या कर रहा है? इतना कॉन्फिडेंस क्यों है आपको?

निधि : बिकॉज़ हे साइड तो में श्रेया... वो बस किसी अर्जेंट काम से गया है. आ जाएगा अभी थोड़ी देरर में... थोड़ी देरर वेट कर लेती हु. तुम दोनों खाओ न खाना...

श्रेया : देख लेना... एन्ड में आपको hi बुरा लगेगा... मेरी बात sunn'na hi नहीं है आपको.

अभी वो दोनों और बातें कर पाती की तभी निधि के फ़ोन के घंटी बजी, और निधि ने फ़ोन उठाते हुए स्क्रीन पर नाम देखा.

परन्तु नाम देखते hi उसकी बॉहे चिंता के मारे सिकुड़ गयी. अपनी नज़रे उठाते हुए उसने एक झलक श्रेया और जूही को देखा और फिर अंदर अपने कमरे में चली गयी.

अंदर आते hi उसने कॉल उठाया और अपने कानो से लगाया.

और दूसरी तरफ से उसके कानो में एक जानी पहचानी आवाज़ आयी. एक मर्द की आवाज़...

निधि : हे... Hello!?

आदमी : कल तुम्हे आना है.

निधि (फ्रोंस) : किस लिए!?

आदमी : बात करनी है. ज़रूरी बात.

निधि : पर जो कुछ भी है वो...

आदमी : मेने कहा न? घर पे आना है. दिन में... 2 बजे तक...

निधि : पर जब...

आदमी : हां या न!?

निधि : में...

आदमी (तेज़्ज़ आवाज़ में) : मेने पूछा... हां या न!? आओगी या नहीं!?

अपना निचला होंठ दातो टेल दबाये निधि ने अपनी मुट्ठी कस्सी और उस आदमी को जवाब दिया,

निधि : फाइन!! I'll के!

आदमी : हम्म! लेट मत करना...

निधि : हम्म...

*कॉल कट्स*

'कब तक!? कब तक ऐसे hi चलता रहेगा?? ी नीड तो मूव फॉरवर्ड. पर सब कुछ जैसे... में वीर को भी घर से ऐसे नहीं भेज सकती... खर्चा बढ़ गया है काफी बूत स्टिल... ी कन्नोत जस्ट... लीव हिम लिखे तहत. यदि उसका कोई रिलेटिव आ जाए तब तोह कोई बात hi नहीं है. बूत उसकी फॅमिली... कैसे करुँगी इतना सब में?? भगवान्!! अब तोह तुम hi कोई राह दिखाओ. में फस्स चुकी हु इस चक्रव्यूह में...'

निधि हाथो में फ़ोन लिए अपने मैं में hi सोचती जा रही थी की उसके ठीक पीछे से अचानक hi श्रेया की आवाज़ आयी,

"किसका फ़ोन था!?"

सुनते hi निधि चौकते हुए पीछे पलटी.

निधि : वो...

बोलते वक़्त उसका सर्र अपने आप नीचे झुक गया. और श्रेया जैसे समझ गयी की किसका फ़ोन था.

श्रेया : व्हाट दीद हे से!?

निधि (शिघ्स) : कल बुलाया है मुझे.

श्रेया (सुरप्रीसेड) : फॉर व्हाट!??

निधि : नहीं पता... बूत कल जाके hi पता लगेगी ये बात.

श्रेया : एंड यू टोल्ड हिम तहत यू अरे किंग!?

निधि : ऑफ़ कोर्स! और कोई ऑप्शन है मेरे पास!?

श्रेया : Kyuuuuuuuuuuu!????

निधि : श्रेयययआआ! ी हैवे तो... सब कुछ... इसी के लिए तोह कर रही हु... तुम भी देखती आ रही हो तबसे... मेने एक भी दिन ऐसा नहीं गवाया है जिधर मेने अपना लक्ष्य भुला दिया जो... बताओ तुम्ही...

श्रेया : ी क्नोव बूत...

निधि : Don't वोर्री! It's जस्ट तो टॉक. बात करके घर hi आना है.

श्रेया : फाइन!!!! I'll जो विथ यू.

निधि : नाहीईई! जूही को कौन देखेगा!? वो स्कूल से घर आएगी तोह किसी को तोह रहना होगा न!?

श्रेया : बूत आप अकेले...

निधि : चिल! एवरीथिंग विल बे फाइन...

श्रेया : ो... Okay!

और श्रेया मायूस भरा चेहरा लिए वह से चली गयी. यही हाल निधि का भी था. श्रेया के जाते hi उसका चेहरा अगले hi पल मुरझा सा गया. और वो अपने बिस्तर पर गिरते हुए बैठ गयी.

न जाने क्या उथल पुथल मची हुई थी उसके मैं में. सवाल भी थे, गुत्थियां भी जिन्हे वो सुलझाना चाहती थी, पर इन् सब के बावजूद वो अपनी छोटी बहिन से सब कुछ साझा नहीं कर पा रही थी. छोटी बहिन क्या, सिवाए खुद के वो सब के सामने अपनी असली प्रवत्ति को जैसे छुपा के राखी हुई थी.

जो कुछ भी था, इतना तोह तय था की आने वाला कल, उसके लिए आसान नहीं होने वाला था.

***

इधर वीर मिशन के लिए अपनी बतायी गयी डेस्टिनेशन पर पहुँच चूका था.

वो सुनसान सी सड़क, रात का अँधेरा और केवल चाँद की रोशिनी. सड़क के इधर उधर केवल पेड़ पौधे, ज़मीनो पर बिखरे पठार, सूखे पत्ते और धुल. और साथ hi साथ पेड़ पौधों के नज़दीक से आती झिंगहोरो की आवाज़. यही मंज़र था जो वीर को वह पॅहुचते हुए सबसे पहले दिखाई दिया.

कुछ देरर जब वो आगे बढ़ा तोह उससे कई बिल्डिंग छोटी तोह कुछ हलकी बड़ी नज़र आयी. कुछ बंद हो चुकी थी तोह कुछ पूरी तरह से अबंदोनेद थी और उनकी हालत किसी भूतिया जगह से काम नहीं थी.

बिल्डिंग के ढांचे ऐसे टूटे हुए बिखरे हुए कही ज़मीन पर डेल थे तोह कही किसी सहारे से लटके हुए थे. अंदर वो कंक्रीट से निकली हुई लोहे की रोडस जिनमे जंग लग चुकी थी उनकी व्यथा को बया कर रही थी.

टूटे शीशे, और ऊपर टेरेस से नीचे आती हुई पेड़ पौधों की वो जेड और लम्बी लम्बी शाखाये जो उस पहले से hi डरावनी जगह को और भी डरावना बना रही थी.

यदि कुछ था वह पे सबसे ज़्यादा मात्रा में तोह वो थी हरियाली.

रात में चाँद की रौशनी में ये अबंदोनेद बिल्डिंग्स क्या hi नज़र आ रही थी. आस पास के पेड़ पौधों ने जैसे बिल्डिंग को एक चादर की तरह लपेट लिया था.

वीर इसी बिल्डिंग के बाहर hi था. और देखने में ऐसा लग रहा था की ये बिल्डिंग शायद पहले कोई फैक्ट्री थी, जो की सालो पहले बंद पद चुकी थी. उसकी दूर दशा पूरी तरह से बत्तर हो चुकी थी और स्ट्रक्चर जैसे पूरा उजाड़ चूका था.

वीर बाहर खड़े बस अंदर जाने के लिए खुद को प्रेपर कर रहा था, क्युकी अभी अभी कुछ देरर पहले hi पारी ने उसकी कुछ चाँद शब्द कहके गांड पहाड़ी थी. और वो शब्दे थे की~ He'll हैवे तो किल.

'पारी! यू don't अंडरस्टैंड! ी हैवे नेवर किल्ड एनीवन. ये मज़ाक नहीं है पारी!'

[Master! Mein aapko ye nahi keh rahi hu ki aapko maarna hi hai. Mein bas aapko ye bata rahi hu ki ab se... Ab se yadi aapki jaan khatre me hogi aur yadi aapko koi maarne ka prayas kare ya aapki life ke liye threat ho then aapko usse maarna hi padega. Aur mein issi se aapko ye realize karwa rahi hu ki yadi situation bani toh aapko maarna hi padega warna aap sab kuch kho baithoge...]

बेचारे वीर को क्या hi पता था!? वो तोह जानता hi नहीं था की रागिनी किस टाइप की मुसीबत में फास्सी है. उसके माता पिता के साथ क्या हुआ है, और इस वक़्त वो अंदर किस हाल में है, किसके पास है? ये साड़ी बातो से तोह वीर बिलकुल hi अनजान था.

उससे तोह बस इतना पता था की रागिनी किसी मुसीबत में है और उससे बचाना है.

'ी... ी अंडरस्टैंड पारी... बूत ये रागिनी भाभी भला ऐसी जगह में क्या कर रही है!? वेट!!!! Don't तेल्ल में...!?'

जैसे hi उसको अब यहाँ आके ये रीलीज़ हुआ, उसकी आँखें फटी की फटी रह गयी.

[Yes! You may be right master. Mujhe bhi yahi lag raha hai. Aur isliye, satark rehne ke liye aap apna Phone silent me kar lijiye.]

'गुड आईडिया पारी! में वही याद करने की कोशिश कर रहा था की में क्या भूल रहा हु.'

फ़ोन को साइलेंट कर, उससे जेब में रख, वीर बिल्डिंग के नीचे बने बेसमेंट की ऑर्डर बढ़ा...

*बेदुम्प* *बेदुम्प*

उसका दिल ज़र्रों से धड़क रहा था. ये डर था अनजान का. नीचे क्या है!? कोण है? क्या चीज़ है? वो कुछ भी नहीं जानता था. और इसी कारण उस अनजान चीज़ का डर उसके दिल पर अपना असर दिखा रहा था.

'पारी! एवरीथिंग विल बे फाइन राइट!?'

[I'll guide you master. Bas dheere dheere aage badhiye. Dhyaan rahe, neeche ekdum dekh ke chalna, saath hi saath apne agal bagal bhi. Kisi bhi cheez se aap takrao na. Hume awaaz nahi karni hai.]

'ी क्नोव तहत... बूत थैंक्स फॉर रेमिन्डिंग में...'

वो जैसे hi बिल्डिंग के नीचे जाते उस स्लोप से नीचे आया तोह अंदर एक लेद बल्ब जल रहा था और ठीक साइड में एक स्कार्पियो गाडी कड़ी हुई थी.

'ये स्कार्पियो यहाँ क्या कर रही है!? कही इसी में रागिनी भाभी...!?'

[Yes master. I'm thinking the same. Andar situation kaafi critical bhi ho sakti hai. Mein suggest karungi ki aap ek hidden weapon dhund lijiye apna. Like koi rod wagarah, ya koi stick.]

'यूप! ी गोत तहत...'

अपने धीरे धीरे क़दम बढ़ाते हुए वीर ज़मीन पर इधर उधर अपनी नज़रे घुमाने लगा, की कही से बस कुछ ऐसा मिल जाए जो उसकी इमरजेंसी के वक़्त काम से काम हिफाज़त करने के काम आ सके.

नीचे इतने फत्तर और बिल्डिंग के टूटे हुए हिस्से पड़े हुए थे की वीर की देख के hi फट रही थी की कही ये ढांचा गिर hi न जाए.

जैसे तैसे कुछ सेकण्ड्स की मशक़्क़त के बाद उससे जो चाहिए था वो आखिर कार उससे मिल hi गया.

एक छोटी जंग लगी हुई रोड जो की वही साइड में पत्थरो के नीचे पड़ी हुई थी.

अपनी शर्ट को उठा के वीर ने उस रोड को अपनी पीठ की ऑर्डर ले जाते हुए पंत में खास ली और शर्ट वापस गिराते हुए उससे धक् ली. काम से काम उसके पास अब कुछ तोह था. वो खाली हाथ नहीं था.

और स्कार्पियो के आगे बढ़ते hi उसकी नज़र दरवाज़े पर गयी जो एकदम सामने था. वो लोहे का हल्का दमगढ़ दरवाज़ा जिससे देख के hi वीर बता सकता था की इसको यदि खोला तोह ये पक्के से छू चा की आवाज़ करने वाला था.

[Ekdum dheere se khol ke pehle andar nazar maariye master.]

'हम्म!!!'

पारी की बात सुन्न वीर ने बिलकुल वैसा hi किया और जैसे hi उसके हाथ दरवाज़े पर लगे और उसने दरवाज़ा धकेला वो छू चा की आवाज़ें करना शुरू कर दिया. और ये सुनते hi उसकी फटती, उससे लगा जैसे वो गया क्युकी अगले hi पल एक आवाज़ अंदर से आयी,

"कौंन है!???"

एक आदमी की आवाज़ अंदर से ऐसे गूंजी की वीर के हाथ जो दरवाज़े पर थे वो इतनी तेज़्ज़ी से हेट और अगले hi पल वो पीछे हटा और दरवाज़े के बगल की दिवार के पीछे छुप गया.

*स्कृन्च*

*स्कृन्च*

और तभी किसी के क़दमों की आवाज़ आने लगी जो ठीक उसकी तरफ hi बढ़ रही थी.

ज़मीन पर पड़े कचड़े, पठार के चलते उन् क़दमों की आवाज़ बड़ी hi जोरर से आ रही थी.

*बेदुम्प* *बेदुम्प*

जैसे जैसे वो क़दम आगे बढ़ रहे थे वीर दिवार से अपनी पीठ लगाए अपने दिल की धड़कनो को कण्ट्रोल में करने की कोशिश कर रहा था. ये कहना गलत नहीं था की क़दमों के साथ साथ उसकी दिल की धड़कने भी बढ़ती जा रही थी.

[Master....!]

पारी ने चिंता भरी आवाज़ में उससे पुकारा, क्युकी वो महसूस कर पा रही थी. वीर की धड़कने बोहत तेज़्ज़ जो हो गयी थी.

एक गलत क़दम और कुछ भी हो सकता था.

वीर इतना तोह भांप गया था की अंदर से जो भी आ रहा था वो उसका शुभचिंतक या दोस्त तोह कतई नहीं था. और जिस हिसाब से उसने अंदर से आवाज़ दी और अब आगे बढ़ रहा था. वीर जानता था की वो आदमी उससे देखते से hi क्या करने वाला था. और, बस इसी हमले को कॉउंटरटैक करने के लिए वीर खुद को तैयार कर रहा था.

और वो कॉउंटरटैक था ~ सरप्राइज अटैक.

दुश्मन तुमपे वार करे उसके पहले hi तुम उससे सरप्राइज करते हुए उस पर धावा बोल दो.

यही सब सोचते हुए उसने पारी की आवाज़ का कोई उत्तर न दिया जिसके चलते पारी एकदम hi बेचैन हो गयी. पर दुबारा कुछ न बोली,

*स्क्रीईएक्सछहहहहह*

और अगले hi पल...

वो लोहे का दरवाज़ा एक तीव्र आवाज़ करते हुए खुला और जैसे hi आदमी बाहर आया...

"Mmmmmmmphhhhhhhhhhhhh"

उस आदमी की आँखें फटी की फटी रह गयी क्युकी अचानक hi उसके मुँह पर एक हाथ आया और उसका मुँह पूरी तरह से सील कर दिया.

जब तक की वो आदमी कुछ समझ पाटा, दूसरा हाथ उसके एक हाथ को थाम चूका था और अगले hi पल किसी ने उससे पीछे से खींचा और अपने साथ hi नीचे गिरा लिया.

*कराआआष्ठठ*

नीचे जो भी कंकड़ पठार पड़े थे उसपे hi दोनों जा गिरे...

अपना दूसरा हाथ जो की उस आदमी का फ्री था, जैसे hi उसने उसका इस्तेमाल करने का सोचा की तभी एक परर का दबाव उसके दूसरे हाथ पर पड़ा और उसका वो हाथ भी किसी अनजान व्यक्ति ने परर में फसा के उसका विरोध नाकाम कर दिया.

अगले hi पल जैसे उस आदमी का पल भर के लिए एक हाथ छूता और उसने बिना कोई चांस गवाए जोरर से अपनी कोहनी से पीछे वाले व्यक्ति पर वार किये जिसके चलते उस बन्दे को चोट तोह आयी पर नेक्स्ट सेकंड hi...

*थुड़*

एक पठार का वार उसके सर्र पर हुवा और एक बार फिर...

*थुड़*

एक और वार और उसके सामने hi तुरंत hi अँधेरा छा गया.

*हफ्फ्फ्फ़* *हफ्फ्फ्फ़*

जोरर जोरर से लम्बी लम्बी सासें चोरर वीर उस आदमी को अपनी गिरफ्त से आज़ाद कर उसके नीचे से उठा और अपनी पसली को मलने लगा.

'सहित! तहत वास् ा बाद मूव. साले की कोहनी जोरर से लगी.... ायरगगह!!'

[Endurance...]

'ी क्नोव.... ी क्नोव... अब से ेंदुराने पर भी ध्यान दूंगा...'

'एक मिनट! पारी!? ये मर्रा तोह नहीं न!?'

[No master. Wo behosh hai. Nice move by the way. Apni surrounding ka istemaal kiya aapne. Neeche jo pathhar pade the unhi ke zariye aapne ek thikaane laga diya.]

'एअआहहह! रोड निकालने का टाइम नहीं था.'

[Check his pockets master. Kahi iske paas guns toh nahi!?]

पारी की बात सुन्न वीर ने फौरन hi उस बेहोश हो चुके आदमी को टटोलते हुए उसकी जेब चेक करि पर वीर को कोई भी हथियार नहीं मिला उसका सिवाए एक छोटी सी पॉकेट नाइफ के, जो वीर ने अपने जेब में दाल ली.

अब जब वीर ने उस आदमी को ध्यान से देखा तोह वो आदमी नहीं बल्कि 28-29 साल का hi कोई लड़का था और अनुमान लगाया की शायद ये यहाँ पे किसी के अंडर काम कर रहा था.

इधर वीर एक को बेहोश करने के बाद आगे बढ़ने की तैयारी कर रहा था पर अंदर तोह कुछ और hi सन चल रहा था.

रंगा विवेक का वीडियो बना चूका था जिसमे विवेक ने अपनी कंपनी आतिश को सौपने के बोल बोले थे.

और अभी रंगा दिनेश का वीडियो बनाने जा hi रहा था जब उससे बाहर से कुछ चहल पहल या हरकत होने की आवाज़ सुनाई दी.

रंगा : ज़रा देख के आना बाहर! आवाज़ सी आयी मुझे...

उसने एक लड़के को देखते हुए कहा तोह वो लड़का हां में सर्र हिलाते हुए बाहर जाने लगा.

*स्कृन्च* *स्कृन्च*

और इधर वीर को फिर से उन्ही पठारों पर चलने की आवाज़ सुनाई देने लगी और ये सुनते hi वो समझ गया...

समझ गया की अगला कोई आ रहा है.

वीर ने फौरन hi उस बेहोश पड़े आदमी को स्कार्पियो के पीछे खिसकाया और अभी वो कुछ और करता की तभी पारी की आवाज़ उसके सर्र में गूंजने लगी,

[Master! Go outside!]

'हँ?? क्यों???'

[Pehle aadmi ke chakkar me awaaz hui hai aur shayad isliye ye dusra achanak dekhne aaya. We cannot risk it master. Ab iske chakkar me andar ke saare log na aa jaaye. Baahar se isse bait kariye... Make him come oustide.]

'नीस आईडिया पारी!'

वीर जल्दी जल्दी वह से भागते हुए ऊपर चला गया, वापस से रोड पर...

पर उसके ऐसा करते hi उस लड़के को भली भाति आवाज़ सुनाई दे गयी.

और क्यों न देती!?

सन्नाटा hi इतना था वह की हलकी हलकी हरकतों तक की आवाज़ सुनाई दे जाती थी. और वीर तोह तेज़्ज़ दौड़ के गया था.

वीर के क़दमों की आवाज़ जैसे hi उस लड़के के कानो में गयी तोह वो भी दौड़ते हुए बाहर की ऑर्डर जाने लगा.

और स्लोप की चढ़ाएं चढ़ते hi जैसे hi वो बेसमेंट से बाहर रोड पे आया तोह उसने देखा की...

सब कुछ एकदम शांत पड़ा हुआ था.

पर उस लड़के ने साफ़ साफ़ किसी के भागने की आवाज़ सुनी थी. भले hi उसने किसी को देखा नहीं पर उससे अपने कानो पर पूरा विस्वाश था.

उससे यकीन था की साला कोई तोह यहाँ आया था और अभी अभी भागा है.

"काउंण्णन ही!??"

पर उसकी आवाज़ का और उसके सवाल का कोई उत्तर उससे न मिला.

"सामने आओ..."

एक बार फिर उसने पुकारा...

पर इस बार भी, कोई जवाब न आया. चाँद की जितनी रौशनी आ रही थी, उतनी hi रौशनी में देखना थोड़ा मुश्किल था पर नज़र काफी कुछ आ रहा था.

वो अपना सवाल फिरसे दोहराता की तभी रोड के सामने वाले पेड़ के पास उसने देखा की एक पेड़ की दाल अजीबो गरीब ढंग से हिल रही है.

जैसे मानो उससे कोई हिला रहा हो.

और सच कहा जाए तोह ये देख के उस लड़के की फटी तोह थी. भले hi वो भूतो पे विस्वाश नहीं करता था पर फिर भी ऐसे वक़्त पे ध्यान उधर चला hi जाता था. और जब स्थिति ऐसी हो तोह अच्छे से अच्छा इंसान डर जाता है. और यही इस लड़के के साथ भी हुआ,

"का... कौन?? कौन है!?"

वो बोलते बोलते धीरे धीरे आगे बढ़ता रहा. जैसे तैसे करके वो पेड़ के पास पहुचा जो बस अब कुछ hi दुरी पे था. उसने अपने हाथ में लिया डंडा आगे किया और जोरर से उस हिल रही दाल को मारा...

पर नतीजा!?

वह कुछ नहीं निकला...

उस लड़के की जैसे जान में जान आयी और वो इस बार बिना दर्रे उस पेड़ की दाल के पास जाने लगा.

और जैसे hi वो गया.

*थुड़*

एक ज़ररदार वार उसके पीछे सर्र पे हुआ और वो अपने होश वही खो बैठा...

*हफ्फ्फ्फ़*

'थिस ओने टूक ओनली ओने हिट...'

वीर ने अपनी रोड वापस से अपनी शर्ट में खुसाई और बिना कोई समय गवाए वो फिरसे अंदर चला गया.

इधर अंदर रंगा विवेक को बाँध के दिनेश की रस्सिया खोलने hi वाला था की तभी उससे ध्यान आया की उसने जिस लड़के को भेजा था वो अब तक आया नहीं था.

केवल वही बस अकेला बचा हुआ था रागिनी, दिनेश और विवेक के साथ.

दिनेश को उसी हालत में चोरर रंगा बाहर जाने का तय करता है.

वो एकदम अलर्ट होक चलने लगता है. क्युकी उसके दोनों hi लड़के काफी देरर से बाहर थे. और उससे भी कुछ हरकत की आवाज़ आयी थी.

जैसे hi वो दरवाज़े को खोलता है की उसकी नज़र स्लोप से नीचे आ रहे वीर पर पड़ती है.

और दोनों hi एक दूसरे को देख एक सेकंड के लिए जैसे वही ृक्क गए. एक झटका सा जो लगा था दोनों को.

"कौन है तू!?"

रंगा ने तेज़्ज़ स्वर में चिल्लाया पर फिर अचानक hi उसकी नज़र स्कार्पियो के पास गयी जहा पर उससे एक आदमी के थोड़े परर दिखाई दे रहे थे, और रंगा को समझने में देरर न लगी की बाहर क्या चल रहा था.

और अगले hi पल उसका हाथ अपनी जेब में खुसे रिवाल्वर पर गया और उसने उससे निकाल के ताना hi था पर तब तक देरर हो चुकी थी.

*थुड़*

"अअअअअररररह्ह्हह्ह्ह्ह!!!"

एक बड़ा सा पठार आके उसके हाथ पे लगा जिसके चलते उसकी एक कराह निकली और पत्थर के लगते hi उसके हाथ से उसका रिवाल्वर छुटक के पीछे जा गिरा.

वो अपने हाथ के दर्द से उभर पाटा की तभी...

*पुव्ववववव*

एक ज़ररदार घुसा आके सीधा उसके जबड़े पर पड़ा और उसका सारा निचला जबड़ा हिल के रह गया.

पावरफुल इम्पैक्ट के साथ वो घुसा जैसे hi पड़ा, रंगा तीन चार कदम की दुरी में उछलते हुए गिरा और बस...

वीर टूट पड़ा उसपे...

इधर उनके लड़ने से जो आवाज़ें बेसमेंट में गूँज रही थी, वो रागिनी, विवेक और दिनेश समेत सभी सुन्न पा रहे थे पर उन्हें ये नहीं पता था की उन्हें बचाने वाला वीर है.

रंगा ने सँभालते हुए वीर के अगले वारो का बखूबी सामना किया और बदले में धेरर सारे वार किये. कही पसली में, तोह कही पेट में, कही चेहरे में तोह कही सीने में...

दोनों एक दूसरे पर ऐसे jhapat'te हुए लड़ रहे थे और भिड़ते जा रा थे, तोह कही गिरते पड़ते जा रहे थे. कुछ hi पालो में जगह जगह उनके शरीर में छिलने के घाव आ चुके थे और खून निककणा शुरू हो गया था.

वो लड़ते हुए न जाने कब अंदर की ऑर्डर आ गए जिसके चलते रागिनी समेत बाकी सभी उन् दोनों को देख सकते थे.

और जैसे hi इधर रागिनी की आँखें वीर पर पड़ी, वो फटी की फटी रह गयी.

उससे एक झटका लगा था. ज़ररदार झटका.

ये उसने अपने पूरे जीवन में कभी उम्मीद न करि होगी की वीर यहाँ उससे बचाने आएगा.

और अगले hi पल...

जो आसुओ का बाँध अभी कुछ सेकण्ड्स से थमा हुआ था वो वीर को रंगा के साथ लड़ते देख hi टूट पड़ा और उसकी आँखों से मोठे मोठे ासु बहने लगे.

विवेक भी ये देख के एकदम हैरान था.

उससे भी खुद यकीन नहीं हो रहा था की वीर यहाँ उन्हें बचाने आएगा. मैं में इतने सारे सवाल उमड़ रहे थे दोनों hi रागिनी और विवेक के की पूछो मत.

पर इस वक़्त दोनों की नज़रे और ध्यान वीर और रंगा की लड़ाई पर था.

दिनेश भी खुद बस लड़ाई को देख रहा था और आशा कर रहा था की वीर को कुछ न हो.

पर कुछ hi पालो में जैसे उसकी आशा जैसे मिटटी में मिलने जा रही थी.

क्युकी रंगा इस वक़्त वीर के ऊपर बैठ अपने दोनों हाथो से उसी की रोड उसके गले में गड़ाए उसका गाला चोक कर रहा था.

"साली.... आज तू मरेगा मेरे हाथो... में नहीं.... ुघठ.... जानता तू कौन है... पर इतना ज़रूर जानता हु की तू इन्हे बचाने आया है और ये भी की तू मररेगा मेरे hi हाथो से.... मर्डर जाए साआली..."

वो चिलाया...

"उग्गहहहहहहहह"

वीर को अपने गले में अब बोहत ज़्यादा दबाव महसूस हो रहा था. किसी भी वक़्त उसका गाला चोक हो सकता था...

की तभी पारी की आवाज़ गुंजी...

[Master!!!!! Your pocket...]

और अगले hi पल वीर ने एक हाथ चोरर अपनी पॉकेट टटोली पर ये मूव जानलेवा था...

रंगा का दबाव और बढ़ा और उसके गले पे बिलकुल वो रोड जैसे पूरी सत् चुकी थी.

बस देररि थी तोह कुछ सेकण्ड्स की और वीर इस दुनिया से उठ चूका होता अगर...

अगर उसके दूसरे हाथ में वो पॉकेट नाइफ ने आयी होती.

उससे खोलते hi वीर ने सीढ़ी वो नाइफ रंगा की पसली में घुसेड़ थी...

*सप्लरत*

"Aaaaaarrrrrrrrrrrrrrgggggghhhhhhhhhhh"

एक ज़ररदार चींख जिससे सुन्न आदमी की रूह काँप जाए पूरे बेसमेंट में फेल गयी.

रंगा अपनी पसली पकड़ जैसे hi साइड हुआ...

*थुड़*

सर्र पे एक वार आया और अगले hi पल उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया.

.

.

.

.

.

.

.

.

आज के लिए इतना hi गाइस!


धन्यवाद!
 
अपडेट - 20 ~ Ragini's ब्रेकआउट एंड ान अननोन विजिट.

अब तक...

उससे खोलते hi वीर सीढ़ी वो नाइफ रंगा की पसली में घुसेड़ थी...


*सप्लरत*

"Aaaaaarrrrrrrrrrrrrrgggggghhhhhhhhhhh"

एक ज़ररदार चींख जिससे सुन्न आदमी की रूह काँप जाए पूरे बेसमेंट में फेल गयी.

रंगा अपनी पसली पकड़ जैसे hi साइड हुआ...

*थुड़*


सर्र पे एक वार आया और अगले hi पल उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया.

अब आगे...

"हाआअह... हाआअह...." जोरर जोरर से लम्बी लम्बी सास लेते हुए वीर वही नीचे बैठे रंगा को देख रहा था, जो की इस वक़्त सर्र पर वार खाने के बाद बेहोश हो चूका था.

और अगले hi पल, वीर अपने हाथ से रोड को ज़मीन पर गिराते हुए, अपनी पीठ के बल धड़ाम से फ्लोर पर गिर पड़ा, वो लम्बी लम्बी सासें ले रहा था, यहाँ तक की काफी खासी भी आ रही थी उससे.

उसके पीछे से रागिनी समेत बाकी सब कुर्सी पर बंधे साइड मुँह करके उससे hi घूर रहे थे. रागिनी की आँखों में एक चिंता थी, साथ hi साथ डर, ग्लानि और न जाने कितने इमोशंस उसकी आँखें बया कर रही थी. और, वो ासु जो लगातार उसके चेहरे को भिगोये जा रहे थे, उसकी हालत को बखूबी दर्शा रहा थे.

'विययय!? जस्ट... जस्ट वियय!??' उसके मैं में यही सवाल बार बार आ रहा था. आखिर क्यों वीर यहाँ पे था!? ये बात तोह साफ़ थी की वो यहाँ उससे और बाकी सभी को इन् गुंडों के चंगुल से बचाने के लिए आया था. पर सवाल था क्यों!??

जो रवैय्या उसके घरवालों ने उसके साथ किया था उस हिसाब से तोह उससे यहाँ होना hi नहीं चाहिए था, उल्टा उससे तोह खुश होना चाहिए था. पर उन् सब के बावजूद वो यहाँ पर था.

जिस हिसाब से वो सासें ले रहा था, और उसके शरीर पर आये वो छिले हुए घाव जिनसे खून बह रहा था, ये देख के hi रागिनी को एक चिंता सी सत्ता रही थी. ऐसा होना नहीं चाहिए था क्युकी वीर से वो कभी बातें hi नहीं करती थी, उल्टा अपने पति के प्लान में जाने या अनजाने में शामिल रहती थी जिसके चलते वीर को हर्र बार फसाया जाता था.

पर आज वीर ने उससे बचाया, आज वो उसका एक सवियर था. वो तब आया जब उसने पूरी उम्मीद चोरर दी थी. शायद इसलिए!? शायद इसलिए आज रागिनी को उसकी ऐसी हालत देख थोड़ी चिंता हो रही थी!? अभी तोह उसने खुद नहीं रीलीज़ किया था की उसका मैं वीर की ऐसी हालत देख चिंता में है.

विवेक भी वीर को देख खुद हैरान था.

'ये!? ये यहाँ क्या कर रहा है!? इससे कैसे पता चला?? जो भी हो... इसके कारण आज में बच गया. अच्छा हुआ इससे नहीं पता है की प्रांजल के साथ में भी मिला हुआ हु. शायद इससे ये भी नहीं पता अभी की प्रांजल hi इसकी ये हालत का कारण है. हाहाहा~ गुड! गुड! ये सही है... ी जस्ट हैवे तो कंसोल रागिनी.'

वो अपने मैं में सोच अपने आगे के प्लान की तैयारी करने में अभी से बिजी हो चूका था.

दिनेश भी वीर को देख उससे मैं hi मैं धन्यवाद दे रहा था. उसके मैं में वीर के प्रति इज़्ज़त बढ़ चुकी थी. वही दूसरी ऑर्डर, विवेक की छवि उसके मैं में पूरी तरह से नीचे गिर चुकी थी. आज जो असली रंग विवेक ने अपना दिखाया था उससे देख वो महसूस कर सकता था की उसकी बेटी पर अभी क्या बीत रही होगी.

इधर वीर उन् सभी की नज़रो से अनजान अपने गले में दोनों हाथो को फेरर रहा था. उससे महसूस हुआ की कितना क्लोज था वो अपनी मौत के. यदि उसने वो पॉकेट नाइफ न उठायी होती तोह रंगा आज पक्का उसका गाला रोड से चोक कर के उससे मौत के घात उतार दिया होता.

और मौत के बारे में सोच के hi उसके अंदर एक सिहरन सी दौड़ गयी.

यदि पारी ने उससे उस आदमी की जेबे चेक करने न कहा होता, तोह वो पॉकेट नाइफ उससे मिलती hi नहीं, यदि पारी ने उससे एक सीक्रेट वेपन खोजने के लिए न कहा होता तोह उसके पास वो रोड होती hi नहीं. ये सब सोच के hi वीर के मैं में पारी के लिए इज़्ज़त बढ़ गयी.

[Master!? Are you okay!?]

'I'm... I'm फाइन पारी! थैंक्स! थैंक्स ा लोट! यदि तुम न होती तोह...'

[It's okay master. Don't say it like that. It's okay!]

वीर खुद की सासें कण्ट्रोल कर नीचे ज़मीन से उठा. और उसकी नज़र जैसे hi रंगा पे गयी...

'चेक!'

[ नाम - रंगा

आगे - 29

बायो - रंगा अपने भौ के लिए काम करता है.
पहले से hi वो अनाथ था और उसके भौ ने उससे सहारा दिया. अपने भौ के प्रति पूरा समर्पित है.



फवौराबिलिटी : -2

रिलेशनशिप : स्ट्रॉन्गेर्स.]

'भौ!?'

[Iska boss Master.]

'तोह क्या नाम नहीं जान सकता में!?'

[It's because I'm level 2 master. Level me up then see the magic.]

'येह! येह!'

'वेट!! ये माइनस में फवौराबिलिटी??'

[Yes master! Because aapne uspe hamla kiya toh favourability minus me toh jaane hi thi jab wo pehle se hi zero pe thi. Strangers ki favourability zero rehti hai na master. You remember!?]

'यह! यस! ी दो!'

उसके बाद थोड़ा कराहते हुए वीर उठा और धीरे धीरे आगे बढ़ वो सबसे पहले दिनेश के पास पोचचा.

दिनेश के मुँह से टेप निकालते हुए उसने उसके इर्द गिर्द बंधी रस्सिया खोली.

दिनेश : बीटा... बीटा आज तुम न आते तोह पता नहीं क्या होता.

वीर ने केवल अपना सर्र हां में हिलाया और उसके बगल में बैठी रागिनी की रस्सिया खोलने के लिए वो नीचे अपने एक घुटने पे बैठा और रस्सिया खोलने लगा.

रागिनी रट हुए उससे hi देखती जा रही थी. वो देख पा रही थी की कैसे जगह जगह उससे चोट आयी थी. पर वीर की नज़रे एक बार भी रागिनी की नज़रो से न टकराई. वो जैसे बस बिना कोई भाव के अपने हाथो से रस्सियों को खोलने में लगा हुआ था.

न hi उसने ऊपर मुँह करके रागिनी को देखा और न hi उस से कुछ कहा.

दिनेश इधर विवेक की रस्सियों को खोलने में जुट गया.

जैसे hi सभी उन् रस्सियों की क़ैद से आज़ाद हुए, रागिनी उठाते hi दौड़ते हुए दिनेश के गले से लग गयी और सिसक सिसक के रोने लगी.

ये सब कुछ उसके लिए बोहत ज़्यादा था. खासकर जब उससे आतिश का वो तमाचा पड़ा था, उसके बाद से hi रागिनी में एक डर बैठ गया था. वर्ण उसके पहले तोह वह यही सोच रही थी की पुलिस आके उन् सभी को बचा लेगी या ये गुंडे ज़्यादा कुछ नहीं करेंगे.

पर जब आतिश ने अपने hi आदमी के परर में गोली चलाई और बस...

ये देखते hi रागिनी को समझ में आ चूका था की वो कितनी बड़ी मुसीबत में फास्सी हुई है.

और उसी मुसीबत से उससे बचाने वीर किसी फ़रिश्ते की तरह आया. न केवल उसने उन् तीनो की जान बचाई बल्कि अब विवेक की कंपनी भी बच गयी थी और साथ hi साथ अब दिनेश के कागज़ भी वो वापस ले सकते थे और सारे एविडेंस मिटा सकते थे.

दिनेश अपनी बच्ची को गले से लगाए उसके चेहरे को देख रहा था. आतिश का तमाचा खाने के बाद बेचारी का पूरा गाल लाल हो चूका था. कैसे उसके मोठे मोठे ासु उसके गालो से बहते हुए गिर रहे थे, वो सब कुछ देख पा रहा था.

रागिनी : पापा...

दिनेश : मेरी बच्ची... तू ठीक है न!?

रागिनी : में ठीक हु पापा... आप ठीक है न!? उन्होंने आप के साथ कुछ किया तोह नहीं न!? कही चोट तोह नहीं आयी न आपको!?

दिनेश : में ठीक हु मेरी बच्ची! में ठीक हु... कुछ नहीं हुआ मुझे...

विवेक इधर दोनों बाप बेटी को देख अब नज़रे झुकाये खड़ा था. उससे समझ नहीं आ रहा था की कैसे वो रागिनी को फेस करे. उसने जो कुछ देरर पहले किया था उसके कारण रागिनी पक्के से बेहद खफा हो चुकी होगी उस से. और, विवेक को अब यही काम करना था ~ उससे रागिनी को मनाना था जैसे भी करके.

अभी वो कुछ कह पाटा की तभी वीर की आवाज़ उन् सभी के कानो में पड़ी,

वीर : हमारे पास समय नहीं है. हमे जल्द से जल्द यहाँ से निकलना होगा.

वीर की बात सुन्न दिनेश ने हां में सर्र हिलाया और वो फौरन hi वही टेबल में रखे सारे अपने कागज़ और मोबाइल में बने वीडियोस को उड़ाने लगा.

जब उसने सब कुछ देख लिया की सब सही है उसके बाद उसने वीर को निकलने का इशारा किया.

वीर भी ये जान के हैरान था की मामला कितना बड़ा था. यहाँ वो सोच रहा था की सिर्फ रागिनी hi मुसीबत में थी पर मामला तोह कई गुना पेचीदा था. रागिनी के साथ साथ विवेक और दिनेश भी यही थे और यहाँ तक की दिनेश के शोरूम्स तक छीन चुके थे.

अगले सेकंड hi सभी उस अबंदोनेद बिल्डिंग से बाहर निकल तेज़्ज़ तेज़्ज़ क़दमों के साथ मैं रोड की तरफ जाने लगे.

और कुछ hi देरर में वो रोड के पास आ चुके थे. अब उनकी नज़रो में कुछ कुछ गाड़िया रास्ते में चलती नज़र आने लगी थी.

अभी जो सबसे ज़्यादा प्रायोरिटी का काम था वो था यहाँ से निकलना. क्युकी किसी भी वक़्त उन् गुंडों को होश आ सकता था और वो वीर और उन्हें ढूंढ़ने आ सकते थे. इसलिए, जितना जल्दी यहाँ से निकला जाए उतना बेहतर था उनके लिए.

काफी देरर तक वो भागते हुए आगे बढे थे और अब बस केवल पैदल hi चल रहे थे क्युकी दिनेश थक चूका था.

वीर सबसे आगे चल रहा था और उसके पीछे पीछे रागिनी और बाकी सब.

अपने क़दमों की रफ़्तार तेज़्ज़ कर अचानक hi रागिनी वीर के बगल से आयी और उसकी चाल के साथ साथ चलने लगी.

रागिनी : वी... वीर!?

बड़ी hi धीमी सी आवाज़ में उसने पुकारा. पर वीर की तरफ से कोई रिएक्शन न मिला उससे. वो बस सामने देख चलता जा रहा था. जैसे मानो रागिनी उसके लिए बस हवा के सामान थी.

बॉहे सिकोड़ते हुए एक बार फिर रागिनी ने बेचैनी भरी आवाज़ में पुकारा,

"वीर!!"

पर नतीजा!?


वही...

वीर ने एक शब्द न कहा.

इधर विवेक अपनी पत्नी को वीर के बगल से देख हैरान था.

'ये!? ये उस से क्या बातें कर रही है!? दमन आईटी! मुझे... मामला सुलझाना होगा, वर्ण देरर हो जाएगी'

और अगले पल hi विवेक आगे बढ़ा और वीर के हाथ को थामते हुए उससे रोक लिया,

"छोटे भाई..."

उसने बड़ी hi विनम्रता से उससे पुकारा और ऐसे में वीर को रुकना hi पड़ा.

विवेक : छोटे भाई! आज तुमने हम सभी को बचाया है. में तुम्हारा ये एहसान कभी नहीं भूलूंगा भाई.

बगल में कड़ी रागिनी ने जैसे hi ये देखा उसकी आँखें फटी की फटी रह गयी. विवेक कितनी आसानी से झूठ बोल रहा था. मतलब एकदम सफ़ेद झूठ.

अब रागिनी को समझ आ रहा था की उसका पति किस किस्म का एकदम निहायती और घटिया इंसान था.

न केवल विवेक ने इतने सारे षडियंत्र बनाते हुए वीर को भगाने में साथ दिया बल्कि आज उसने अपनी hi पत्नी की जान की परवाह न कर सीधे सीधे उससे क़ुर्बान करने की ठान भी ली थी. और अब वो वीर को अपनी मीठी चिकनी चुपड़ी बातो में फिरसे फसा कर उससे बेहला रहा था.

'ी नेवर िमागिनेड यू वोउल्ड बे लिखे थिस...' वो मैं में सोच विवेक और वीर के बीच में hi कूदना चाहती थी और बताना चाहती थी की उसका पति कितना झूठा इंसान है, पर वीर ने उसकी बातें सुनी hi नहीं अभी कुछ देरर पहले hi...

'हे मस्ट क्नोव... हे मस्ट... उससे ये पता चलना hi चाहिए कैसे भी करके...' रागिनी ने जैसे ठान लिया था की आगे क्या करना है.

विवेक : छोटे भाई! में जानता हु ताऊ जी तुमसे बोहत नाराज़ है और तुम्हे घर से निकाल चुके है. पर इसका ये मतलब तोह नहीं न की में और बाकी सब तुम्हारी परवाह नहीं करते!? भले hi में घर में आवाज़ नहीं उठा सकता भाई... पर आज जो तुमने मेरे लिए किया है. उससे में कभी नहीं भूलूंगा. तुम्हे जब भी मेरी ज़रुरत पड़े भाई... बेझिजक मेरे पास आ जाना... और में अपनी पूरी कोशिश करूँगा की ताऊ जी को मन के तुम्हे वापस से घर में ला सकू. क्यों है न रागिनी!?

पर रागिनी उसकी बात सुन्न केवल उससे देखती रही, वो कुछ न बोली. और जैसे...

उसकी आँखों में एक गुस्सा था. जिससे देख विवेक ावक्वार्डली बस अपनी नज़रे इधर उधर फिराता रहा.

वीर : कोई ज़रुरत नहीं है. ी हद एनफ.

इतना बोल वो वापस से पलटा और कुछ कदम चला hi था की रागिनी भागते हुए उसके पीछे से आयी और उसके हाथ को थाम ली,

रागिनी : वियययय??? क्यों???? क्यों वीर!? क्यों बचाया तुमने हमे!?

उसने तेज़्ज़ आवाज़ में चिल्लाते हुए वीर को देखते हुए कहा.

और फाइनली...

वीर उसकी तरफ पलटा... दोनों की hi इस बार नज़रे मिली और रागिनी अचानक शांत पद गयी. उसके हाथो की पकड़ भी वीर के हाथ पर से ढीली पद गयी.

वीर : व्हाई!? क्युकी इसमें मेरा hi फायदा था. जस्ट फॉर माय सके.

रागिनी : कैसा फायदा!? क्या मिला तुम्ही!? तुम्हे तोह मुझे और बाकी सब को हेट करना चाहिए न!? फिर क्यूँउउ!? क्यों तुमने ऐसा किया!!!??

वीर : मेने कहा न! जस्ट फॉर माय सके...

रागिनी (चिल्लाते हुए) : ी don't बिलीव ितत्तत्त!!! ी doooon'ttt...

वीर : थें सो बे आईटी... एंड लीव में अलोन.

रागिनी : वियययययययय!???

पर इस बार उसके चिल्लाते hi वीर ने अपनी आँखें दिखाते हुए उससे देखा जिसके चलते बेचारी रागिनी थोड़ी डर गयी और उसकी आवाज़ अचानक hi बंद हो गयी.

वीर : ी won't रिपीट माइसेल्फ. लीव में फूकिंग अलोन...

पता नहीं क्यों... पर वीर के बोल सुन्न एक अजीब सा दर्द हुआ उससे अंदर hi अंदर. केसा लगेगा आपको जब आपकी कोई जान बचाने वाला व्यक्ति, आपके अपनों की जान बचाने वाला व्यक्ति आपसे ऐसा कहे तोह? यही हुआ था रागिनी के साथ.

अपना निचला होंठ दातो टेल दबाये वो बस वीर को घूरे जा रही थी. आँखों से मोठे मोठे ासु बह रहे थे. उससे अपने सवालों के उत्तर बस चाहिए थे, फिर भले hi वीर उससे धुत्कार देता.

पर उसने कुछ भी न बताया.

और यही सवाल रागिनी को अंदर hi अंदर खाये जा रहे थे. उसकी ग्लानि को बढ़ाते जा रहे थे. उसकी समझ में आ चूका था की कितना गलत किया था उसने वीर के साथ. कितनी बुरी बन्न गयी थी वो किसी के लिए.

जिस वीर से वो कभी बात करने के लिए इंटरेस्ट नहीं रखती थी आज उसी वीर से बात करने के लिए वो मर्री जा रही थी. बस एक बार बस वो उसके मुँह से जैसे sunn'na चाहती थी की आखिर क्यों किया उसने ये सब!?

वीर का कहना था ये उसका स्वार्थ था, पर इस बात पे रागिनी घंटा बिलीव करने वाली थी.

उससे लग रहा था की कोई और कारण है, और यही jaan'ne के लिए वो पागल हुई जा रही रही.

वीर : आप सभी जाइये... में चला जाऊंगा.

वीर ने दिनेश को देखते हुए कहा तोह दिनेश आगे बढ़ उसके पास आया.

दिनेश : बीटा... तुम... तुम चलो... मेरे साथ... घर में. तुमने हमारी जान बचाई है. ऐसे कैसे में तुम्हे जाने दे सकता हु? और ऐसे अकेले कैसे जाओगे!?

वीर : में अकेले hi तोह आया था न? Don't वोर्री! में चला जाऊंगा. आप लोग लेट मत करिये. वो लोग किसी भी वक़्त आ सकते है यहाँ. जल्द से जल्द टैक्सी लेके घर की ऑर्डर निकालिये.

कई बार दिनेश के मनाने पर भी जब वीर न माना तोह दिनेश ने अंत में कुछ पैसे निकाल वीर के हाथो में थमा दिए की वो भी टैक्सी लेके जल्द से जल्द यहाँ से निकल जाए.

जब टैक्सी में बैठने की बारी आयी तोह रागिनी ने एक बम और फोड़ दिया,

रागिनी : पापा! में आपके साथ आ रही हु...

और ये सुनते hi विवेक मानो डर सा गया...

'शी... She's नॉट लीविंग में राइट!?'

विवेक : रागिनी!? घर नहीं चल रही!?

रागिनी (स्तारेस) : घर hi जा रही हु.... अपने!!!!

विवेक : अच्छा!? ः~ ठीक है. आज... आज पापा जी के साथ hi रहो. में समझ सकता हु... ः~

और रागिनी दिनेश के साथ बैठ निकल गयी. इधर विवेक भी एक टैक्सी कर निकल गया और बचा था केवल वीर.

अंत में उसने भी एक टैक्सी करि और वो भी घर की ऑर्डर निकल गया.

रास्ते में रागिनी ने फौरन hi अपना फ़ोन निकाल किसी को कॉल लगाया,

रागिनी : Hello!?

दूसरी तरफ से : Hello!? हां भाभी!

रागिनी : काव्य!!! कहा हो तुम!?

काव्य : में तोह घर पे भाभी, पर आप कहा हो? कबसे आपको ढूंढ रहे है सब... मुझे लगा आप अपने पापा के घर गयी हो तोह मेने सबको वही बताया... आप वही हो न!?

रागिनी : ओह थैंक गॉड! हां! में वही हु... और सुनो न... मुझे तुमसे बोहत इम्पोर्टेन्ट काम है.

काव्य : क्या काम भाभी!?

रागिनी : क्या तुम्हारे पास वीर का नंबर है!?

काव्य (सुरप्रीसेड) : वीर भैया का!?

रागिनी : हां!

काव्य : हां... है तोह...

रागिनी : थैंक गॉड! प्लीज... काव्य... प्लीज... मुझे उसका नंबर सेंड कर दो जल्दी. It's अर्जेंट.

काव्य : ो... Okay!

रागिनी : हां! थैंक्स!

*कॉल एंड्स*

और कुछ hi सेकण्ड्स के अंदर hi काव्य की तरफ से एक मैसेज आया जिसमे वीर का नंबर था.

अपने फ़ोन में वीर का नंबर सेव कर वो अपनी सोच में पद गयी. टैक्सी में बैठे हुए उसकी नज़रे विंडो से बाहर रात में सड़क पर दौड़ रही गाड़ियों पर थी. पर ध्यान कही और...

'ी मस्ट तेल्ल हिम... मुझे बताना होगा उससे की क्या क्या उसके साथ हुआ है. जितना मुझे पता है... I'll हैवे तो... एंड विवेक... ी कैन नेवर बिलीव यू अगेन...'

***

निधि के घर पॅहुचते पॅहुचते वीर को 10:30 बज चुके थे. उसने दूर बेल्ल बजायी, और अंदर से निधि ने hi दरवाज़ा खोला.

जैसे hi निधि ने दूर खोल के वीर को देखा, उसकी आँखें आश्चर्य के मारे फट गयी.

वीर के चेहरे तोह कही हाथ में जगह जगह चोट के निशाँ थे, यहाँ तक कुछ छोटो से खून भी बह रहा था.

अपने दोनों हाथो से मुँह ढकते हुए वो वीर को स्तब्ध निगाहों से देखती रही,

निधि : वीएएएएएरररर!??? ये...

और उसका हाथ पकड़ वो खींचते हुए उससे अंदर लायी, उससे बैठायी और दरवाज़ा बंद कर भागते हुए अंदर से एक फर्स्ट अिध का डिब्बा लायी.

सोफे पर उसके बगल से बैठ निधि ने बिना कुछ कहे hi सबसे पहले उसकी फर्स्ट अिध करना शुरू किया,

दोनों ने hi न कुछ कहा और न hi एक दूसरे से नज़रे मिलाई.

वीर की नज़रे जहा नीचे थी तोह वही निधि की नज़रे उसकी छोटो पर...

एक अजीब सी पीड़ा वीर को अंदर से हो रही थी जिस कारण वो निधि से अपनी नज़रे नहीं मिला पा रहा था. एक तोह वो बिना कोई सच्चाई बताये घर से गया था और वो भी तब जब आज निधि ने बड़े hi प्यार से स्पेशल डिनर बनाया था.

डिनर चोरर के गया था वह. और अब जब लौटा तोह ऐसी हालत लेके. पर उसके बावजूद, निधि बिना कुछ पूछे उसकी इतनी परवाह कर रही थी. वो चाहती तोह ढेर्रो सवाल कर सकती थी की कहा से मार पीट करके आ रहे हो? वगैरह वगैरह.

पर जो सबसे पहला रिएक्शन था निधि का वो था चिंता... परवाह...

उसके प्रति...

और बस इसलिए वीर निधि से नज़रे नहीं मिला पा रहा था.

'She's तू पुरे... ी... ी can't...'

[She cares for you master...]

'ी...'

वीर मैं में भी कुछ न कह पाया. उससे जैसे रोना आ रहा था. कोई इंसान इतना अच्छा कैसे हो सकता है भला!?

न जाने कितने सवाल इधर निधि के अंदर भी उमड़ रहे थे जिन्हे पूछने के लिए वो बेचैन थी. पर अभी फर्स्ट अिध करना ज़्यादा ज़रूरी थी.

फर्स्ट अिध होने के बाद दोनों hi चुप चाप बस अगल बगल बैठे हुए थे.

और अंत में निधि ने खामोशी तोड़ hi दी...

निधि : वीर!? यू okay?

वीर (स्माइल्स) : I'm okay Ma'am! थैंक यू!

निधि (फ्रोंस) : थें!? क्या... क्या अब तुम बताओगे कैसे हुआ ये सब!? ी मैं... िफ़ यू डोंट वांट तो थें... It's... It's okay...

उसने बोलते हुए नज़रे नीचे कर ली पर तभी वीर ने उसके हाथ के ऊपर अपना हाथ रख दिया,

निधि : हँ???

वीर : ी...

उसने निधि का हाथ और कस के थामा और बोलै,

वीर : I'm सॉरी Ma'am. अर्जेंट था...

[Master! Keh dijiye ki kisi ladki ko gunde cherr rahe the and you helped her... Isliye aap ko ladte hue chot aa gayi.]

'नहीं पारी! में झूठ नहीं बोलना चाहता उनसे अब. कितना झूठ बोलू पारी उनसे!? लुक ात हेर... लुक ात हेर आईज... ी can't पारी... इस से अच्छा है की में कुछ न बताऊ...'

[Then tell her the truth!]

'हँ!?'

[Yeah! Why not!? Tell her the truth. Bas mere baare me chorr ke... Tell her everything.]

पारी की बात वीर को सही लगी और इसलिए उसने निधि को एक बार फिर देखा, उसका हाथ कस के थामा और बोलना शुरू किया,

वीर : Ma'am!!! बात ये है की...

और फिर वीर ने सब कुछ...

सब कुछ बता दिया की रागिनी कैसे वह गुंडों के चंगुल में थी और कैसे उसने उन् सभी को वह से बचाया.

सुनते सुनते निधि कभी चौंकती तोह कभी दरर्ति, तोह कभी रिलैक्स हो जाती की आखिर वो सभी सही सलामत थे.

निधि : इतना सब कुछ हुआ... और तुमने मुझे नहीं बताया!?

वीर : टाइम नहीं था Ma'am... वो....

अभी वो अपनी बात आगे रख पाटा की तभी अंदर से श्रेया आयी और उसकी नज़र वीर पे गयी और अगले hi पल वो हस्सन लगी,

श्रेया : पफ्फफ्फ्टत्त ~ हाहाहाहाहा~ देखा!? मेने आपको बोलै था न दी ये गया है अपनी माशूका के पास... पर लगता है आज इसकी धुलाई कर दी उसने या फिर उसके दूसरे बॉयफ्रेंड ने...

निधि : श्रेयययआआअ it's नॉट फनी! तुम्हे पता भी है क्या बात है!?

श्रेया : क्या!? ी कैन तेल्ल ैसिलय की ये कही से पिट के आया है. ोईई! बोलो!? ऐसा क्या कर दिया की तुम्हारी सुताई हो गयी!? हाँ!?

निधि से रहा न गया और उसने जोरर से चिल्लाते हुए सब कुछ बता डाला जिससे सुन्न श्रेया थोड़ी सन्न सी रह गयी...

श्रेया : ी... वो...

उसके मुँह से अब एक शब्द नहीं निकल रहा था.

उसकी ये हालत देख वीर ने प्यार से मुस्कुराते हुए उससे देखा पर इस बार...

श्रेया को उसकी मुस्कान बिलकुल भी अच्छी न लगी. उल्टा दर्द हुआ उससे...

"सॉरी!" वो कहते हुए अंदर तेज़्ज़ क़दमों के साथ चली गयी.

निधि : शी didn't मैं तो...

वीर : ी क्नोव Ma'am! It's okay! Don't वोर्री! बी थे वे... आपने खाना खाया!?

उसका सवाल सुन्न... निधि ने धीरे से ना में गर्दन हिला दी. ये देखते hi वीर को एक और झटका लगा और उसकी ग्लानि वाले भाव और भी बढ़ गए.

'िफ़ शी कीप्स दोंग ों तहत... थें... ी विल फॉल फॉर हेर पारी... इन्हे कोई समझाए की इतना अच्छा न रहे ये मेरी तरफ... वर्ण में इनके प्यार में डूब जाऊंगा...'

[Anything is fair in love and war master.]

'ी क्नोव... शी डेसेर्वेस बेटर थौघ. में तोह कुछ भी नहीं उनके लिए पारी...'

[Maybe you are the best for her!?😊]

पारी ने बुदबुदाते हुए कहा.

'हँ? कुछ कहा तुमने!?'

[Nothing master! :eek1: ]

अंत में दोनों निधि और वीर ने साथ में खाना खाया और आज की ये रात एक बेहद hi बड़ी मुसीबत ताल चुकी थी.

***

नया दिन...

नयी सुबह...

रोज़ की तरह निधि और वीर कॉलेज में थे. और अभी सुबह सुबह फर्स्ट लेक्चर लगने में थोड़ा टाइम बचा हुआ था.

वीर अपनी क्लास में सबसे पीछे की बेंच पर बैठा हुआ था पर वो अकेला नहीं था...

उसके साथ एक बेहद hi प्यारी और ख़ूबसूरत लड़की बैठी हुई थी.

"वीर भैयाआ!!! रखीयीए ना!!!!"

वीर : काव्य ी टोल्ड यू न!? मुझे नहीं चाहिए...

काव्य : आपने नहीं रखा तोह में उदास हो जाउंगी.

वीर : बूत...

काव्य : मेने कहा न रखिये... इतनी म्हणत से मेने घंटो तक ढूंढ ढूंढ के लिया है...

कहते हुए उसने एक बड़ी सा पैकेट वीर को थमा दिया.

इस पैकेट में वो अपने भाइये के लिए कई साड़ी टी शर्ट्स और बाकी सामान लायी हुई थी. ये उसने कल खुद अपने पैसो से लिया था. न जाने कितनी देरर शॉपिंग करि थी उसने मॉल में अपने भैया के लिए...

वीर : अरे बूत मुझे ज़रुरत नहीं है काव्य...

काव्य : क्या...!? क्या आप... क्या आप अब भी मुझे अपना नहीं मानते भैया...!?

उसके ऐसा कहने पर वीर ने एक सास भरी और उसको अपने बगल से चिपका लिया,

वीर : पगली है तू... ला दे... फाइन... अब तोह खुश है न!?

काव्य (गिगल्स) : हहै~ बोहत खुश...

वीर : जा अच्छा अब... अपनी क्लास में जा...

काव्य : हां... जाती हु... बूत एक बात और...

वीर : हम्म!?

काव्य : वो... कल... कल भाभी का कॉल आया था. उन्होंने मुझसे आप का नंबर माँगा था, एंड ी हैवे गिवेन हेर...

और इतना बोल वो भागते हुए बाहर निकल गयी.

वीर अपनी सोच में डूब गया पर वो नीचे चल रहे सन से अनजान था.

नीचे कॉलेज के कैंपस में एक ब्लैक कलर की रोल्स रोये आके जो कड़ी हुई थी.

सभी आस पास के स्टूडेंट्स फ़ोन निकाल के फोटो ले रहे थे तोह कोई बस देखता hi जा रहा था.

इतनी शानदार गाडी उनके कैंपस में क्या कर रही थी भला!?

पर जैसे ये गाडी तोह कुछ भी नहीं थी जब उस गाडी का दरवाज़ा खुला और अंदर से एक लड़की बाहर निकली...

और उससे देख वह खड़े हर्र लड़के के मुँह खुले के खुले रह गए. उसने एक तुबे स्कर्ट, अंदर एक शर्ट और ऊपर एक ब्लेजर डाला हुआ था. पूरी प्रोफेशनल लग रही थी वह.

तभी अंदर से hi एक लड़की और निकली... ये थोड़ी उम्र में बड़ी लग रही थी और इसने गोल्डन कलर की एक साड़ी पहनी हुई थी जो उसके शरीर से इतनी कस के बंधी थी की उसके अकार को बखूबी दिखा रही थी.

एक आदमी भी निकला जो उम्र में करीब 40-45 साल का प्रतीत हो रहा था.

लड़की : यही है न!?

आदमी : जी मैडम!

लड़की (स्माइल्स) : इंटरेस्टिंग...

दूसरी लड़की : देख लेना... याद है न मेने क्या कहा था!? वही होएगा...

लड़की : ी don't केयर... उसी के लिए तोह है हम यहाँ आखिर...

दूसरी लड़की : आईटी वास् जस्ट ा कोइंसिडेन्स... There's no नीड तो...

लड़की : स्टिल... ी वांट तो...

दूसरी लड़की : हम्फ! बाद में मुझसे मत कहना...

लड़की : प्रकाश अंकल!?

आदमी : जी!?


लड़की : जाइये...

आदमी : जी मैडम!!!

और अगले hi पल प्रकाश कैंपस से अंदर कॉलेज की बिल्डिंग में जाने लगा.

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आज के लिए इतना hi गाइस!


धन्यवाद!

लिखे कर दियो...
 
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