Incest Katha Chodampur Ki - Page 20 - SexBaba
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Incest Katha Chodampur Ki





आपको और आपके परिवार को परिवारिक चुदाई संग्रह और पूरे चोदमपुर की ओर से दीपावली की ढेर सारी शुभकामनाएं। आपके परिवार में स्नेह और खुशी इसी तरह बनी रहे।





हैप्पी दिवाली
 
तै फिर भी कुछ नहीं बोली न hi कुछ ऐसा जताया की कुछ हो रहा है बस पापा से बातें किये जा रही थी मुझे उनकी बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी... मेरी दिलचस्पी तो बस तै की बड़ी गुब्बारे जैसी छूछीयों में थी.. जिन्हे मैं खूब मसल रहा था..

अपडेट 118
इधर पापा मेरी बातों से बेखबर अपनी बातों में लगे हुए थे..

पापा- क्या कहती हो भौजी इस बार बाघ के किनारे वाले खेत में किसकी खेती की जाये मैं तो सोच रहा हूँ तरबूज कर लिए जाएं...

मंजू तै- क्यों बाबू तरबूज में ऐसा क्या फायदा..

पापा- तरबूज मुझे बहुत पसंद हैं भौजी बड़े बड़े रसीले रसीले..

में- हाँ पापा तरबूज तो मुझे भी बहुत पसंद हैं कितने बड़े होते हैं... और रसीले भी.

मैंने तै की छुच्छी को ब्लाउज के ऊपर से hi मसलते हुए और उन दोनों की बातों में शामिल होते हुए कहा..

पापा- क्या कहती हो भाभी सही रहेगा..?

मंजू तै- तरबूज भी ठीक है पर मेरी मनो तो गन्ने करलो बाबू...

पापा- गन्ने में क्या है भौजी ऐसा?

मंजू तै- हमें गणना बहुत पसंद है.. खासकर बड़े बड़े रास से भरे हुए गन्ने देखकर मन करता है पूरा चूस जाएं.. और सारा रास पि जाएं..

पापा- सच भाभी इतना पसंद है तुम्हे चूसना.... गणना..

मंजू तै- और क्या बाबू गन्ने चूसना तो हमें हमेशा से hi पसंद रहा है..

पापा- तो इस बार भाभी तुम हमारा गणना ज़रूर चूसना...

मंजू तै- बिलकुल पर एक बात है..

Papa-kya

मंजू तै- गन्ने हमें मोठे और रास भरे hi पसंद हैं...

पापा- अरे भाभी एक बार चूस कर तो देखो ज़िन्दगी भर हमारा गणना hi मांगोगी..

मेरा लुंड तो इन दोनों की बातें सुनकर लोहे का hi हो गया था समझो... ऊपर से हाथ में तै जी के तरबूज... मेरा मतलब है बड़ी बड़ी छुछियां...

मैं तो उत्तेजना में पागल सा हो गया... मेरा लुंड पंत के अंदर दर्द करने लगा था... मैं इतने जोश में आ गया की मैंने अपना हाथ तै के ब्लाउज के अंदर घुसकर उनकी नंगी छुच्छी को पकड़ लिए और मसलने लगा पर तै जी का अब भी कोई विरोध या प्रतिक्रिया नहीं थी जिससे मुझे तो जैसे खुली छूट मिल गयी...

नीचे से मेरा लुंड पंत में दर्द कर रहा था मैं खूब उसे आगे पीछे करके एडजस्ट करने की कोशिश कर रहा था पर आगे साला तै का बड़ा सा चूतड़ उसमे लगके लुंड और फड़कने लगता खैर कोई रास्ता न बचने पर मैंने रिस्क लिए और अपने चूतड़ों को सीट से थोड़ा सा उठाकर अपनी पंत की चैन को खोलने की कोशिश की और किस्मत से कामयाब भी हो गया... और फिर बापिस बैठ गया.... अब अगला पड़ाव था मुक्ति... उसकी कोशिश करने लगा पर साला बैठकर ये भी नहीं हो रहा था तो एक बार और खतरों का खिलाडी बना और फिर से चूतड़ों को सीट से थोड़ा ऊपर किआ और हाथों की पूरी कलाकारी दिखते हुए लुंड को खुली चैन से किसी तरह से बहार निकल लिए और क्यूंकि शर्ट बहार लटकी हुई थी तो लुंड धक् भी gaya...aur बापिस बैठ गया..

अह्ह्ह्हह क्या सुकून मिला और क्या सुखद एहसास था वो चलती मोटरसाइकिल पर लुंड पर जब हवा लग रही थी तो वो ठंडा ठंडा एहसास क्या सुख दे रहा tha...idhar हाथों ने अपना काम बापिस संभल लिए और तै की छूछीयो को मसलने लगे तै और पापा की बातचीत अब भी जारी थी...

तै का एक हाथ मेरी पीठ पर था और एक पापा की कमर par...ab मुझे लगने लगा था की मेरा ये सब करना तै को भी ाचा लग रहा है शायद इसीलिए मुझे रोक नहीं रही बस फिर क्या था मैं पेट से लेकर छूछीयो तक हाथों को खूब अचे से फिरने लगा साथ hi ब्लाउज के ऊपर के दो बटन भी खोल दिए जिससे तै की आधी से ज्यादा छुछियां बहार झलकने लगी.. और उसका सीधा असर मेरे लुंड पर हो रहा था मेरा लुंड फूलने लगा... उस वक़्त में इतनी कामुकता या उत्तेजना थी या शायद सुबह से न झड़ने की वजह से मुझे मेरा रास मेरे लुंड में भरता हुआ महसूस होने लगा और मैं अपना आप खोने लगा..

मैंने तै को कसकर पकड़ लिए और मेरे चूतड़ अपने आप सीट से थोड़ा सा ऊपर उठ गए जिससे मेरा नंगा लुंड तै की नंगी कमर से टकराने लगा और जिसका एहसास होते hi मेरे अंदर करंट सा दौड़ने लगा

और शायद तै को भी हुआ उन्होंने एक बार मुझे मुद कर देखा और फिर से आगे की तरफ देखने लगी...

मैंने इसे तै की सहमति समझते हुए अपनी कमर को हिलने लगा और मेरा लुंड तै के गदराये पेट पर घिसने लगा... लुंड का टोपा उनकी कमर से गगिस्ते हुए पेट के आगे के हिस्से तक जाता और फिर बापिस आता चलती बाइक पर ऐसे करने में मुझे बहुत मजा ा रहा था... मैंने लुंड को उनके पेट पर घिसने की वजह से तै को थोड़ा टाइट पकड़ लिए जिससे तै थोड़ी हिल गयी और आगे की तरफ हो गयी और उनका हाथ जो पापा की कमर पर था वो जांघ पर चला गया... जिससे पापा को भी थोड़ी हैरानी हुई और ाचा भी लगा पर वो मोटरसाइकिल चलते रहे...

तै बेचारी अपने पेट पर मेरे लुंड का घिसाव महसूस करते हुए पापा से बायत कर रही थी... मेरे लुंड के टोपे की खाल जब तै के पेट से घिसती तो मुझे बेहद आनंद मिलता और उसका नतीजा ये निकला की ऐसे hi कुछ देर घिसने के बाद मेरा लुंड पिचकारियां मरने लगा.. मैंने लुंड को बिलकुल तै के पेट से चिपका दिया मेरे लुंड से निकलती धारों से तै का पेट गीला होने लगा... एक के बाद एक धार से तै का पेट भीगने लगा मैं तो कसकर तै को पकडे हुए अपने स्खलन का आनंद ले रहा था... तै मेरे झड़ने से खुद भी गरम हो गयी थी इधर तभी मोटरसाइकिल एक घड़े की वजह से थोड़ा उछली और मैं जो तै के पेट से चिपका हुआ था बापिस सीट पर आ गया... पर मेरा काम हो चूका था मैं झाड़ चूका था तै का पूरा पेट गीला हो चूका था, पर उस गड्ढे की वजह से सिर्फ मैं hi सीट पर नहीं गिरा था कुछ और भी हुआ था, गड्ढे में उछलने की वजह से तै का जो हाथ पापा की जांघ के ऊपर था वो फिसल कर पापा की पंत के ऊपर से hi उनके लुंड पर चला गया था और पापा का लुंड तो तै के जांघ पर हाथ होने से पहले hi खड़ा हुआ था... अपने लुंड पर तै का हाथ महसूस करते hi पापा तो मज़े में आ गए ...वहीं तै भी पापा का खड़ा लुंड हाथ में पाकर और गरम हो गयी...

पर मैं पीछे आराम से था मेरा काम पूरा हो चूका था पर एक टेंशन थी की तै क्या बोलेंगी और सबसे बड़ी बात अपने पेट और कमर के गीले होने की क्या वजह बताएंगी... या कैसे छिपाएँगी, वैसे साड़ी से छुप तो जायेगा..

मैं मन में ये सब सोचते हुए चल रहा था वहीं हम लोग शहर में घुस चुके the...jis कारन तै ने होश में आते हुए अपना हाथ पापा के लुंड से हटा लिए साथ hi मैंने भी अपना अभी सिकुड़े हुए लुंड को बापिस पंत में कैद कर लिए था...

शहर में आकर पापा ने एक दुकान पर जाकर मोटरसाइकिल रोकी तो मैं जल्दी से उतरा और फिर तै भी उतरी पर उतारते के साथ hi तै ने अपनी साड़ी को संभाला और ठीक किआ और अपने पेट और कमर को ढँक लिए...

मेरा लुंड दोबारा ये सोच कर खड़ा होने लगा की तै मेरा रास अपने पेट पर लेकर शहर में घूमेगी...

उतरने के बाद भी तै का व्यवहार बिलकुल साधारण hi था मुझे कोई चिंता वाली बात नहीं लगी...

खैर हम बीज की दुकान के बहार थे... अंदर गए और फिर शुरू हुआ पापा का लेक्चर अचे बीजों की विशेषता क्या होती है पहचान क्या होती है... दुकान वाला बीच बीच में तै के उभारों से अपनी नज़रें चुप चुप के सेक रहा था वहीं तै साड़ी को थामे हुए अपने गीले पेट को छुपा रही थी...

इसी तरह से वहां का काम ख़तम हुआ और बीज लेकर हम लोग बहार निकले..

Papa-ab बताओ भाभी क्या लेना है..

मंजू तै- अरे लेना क्या है कुछ कपडे चाहिए बाबू... ले चलो किसी कपडे की दुकान पर...

पापा- अरे कपडे तो चौक पर बहुत बढ़िया दुकान है, गजब की साड़ी रखता है चलते हैं वहीं..

मंजू तै- अरे बाबू साड़ी नहीं कुछ और कपडे चाहिए..

तै ने शरमाते हुए कहा..

पापा- कुछ और क्या भाभी...

मंजू तै- अरे अंदर के कपडे..

पापा- ाचा ाचा चलो चलते हैं...

हम तीनो लोग बापिस बैठे और फिर से गाड़ी चल पड़ी...

पापा ने एक दुकान के सामने जाकर मोटरसाइकिल रोक दी और उतर गए..

पापा- कर्मा बीटा तू यहीं रुक मैं भाभी को सामान दिला कर आता हूँ...

पता सोच रहे थे जैसे मुझे नहीं पता अंदर का सामान क्या होता है... कितना भोला समझते हैं मुझे पापा..

खैर मैंने हाँ मैं सर हिलाया और मोटरसाइकिल पर बैठ गया... पापा और तै अंदर चले गए...

(अस 3रद पर्सन)

अंदर दुकान में एक लड़का बैठा था पापा ने उससे जाकर बोलै की अंदर के कपडे दिखाए तो उस लड़के ने आवाज़ दी और अंदर से एक औरत आई और वो लड़का अंदर चला गया, वो औरत तै जी को लेजाकर ब्रा और कच्ची दिखने लगी पापा वहीं पड़ी कुर्सी पर बैठ गए..

थोड़ी देर में उस औरत ने पापा को अपनी तरफ बुलाया... जहाँ वो तै को कच्ची दिखा रही थी..

औरत- इधर आइयें भाई साहब...

पापा- ग कहिये क्या बात है...

औरत- बहन ग को इन दोनों रंग में से समझ hi नहीं आ रहा तो आप hi मदद कर दें..

पापा- अरे इसमें मैं कैसे मदद कर सकता हूँ..

औरत- अरे भाई साब अपनी पत्नी की मदद आप नहीं करेंगे तो कौन करेगा..

वो गलती से तै और पापा को पति पत्नी समझ बैठी...

मंजू तै- अरे रहने दीजिये हम बता देंगे..

औरत- अरे बहन जी भाई साहब की पसंद भी तो देख लीजिये..

पापा के मन में तो लड्डू फूटने लगे...

वैसे दोनों में से किसी ने ये नहीं बताया की वो गलत समझ रही है और वो पति पत्नी नहीं है... दोनों hi अपनीईई अपनी ठरक में व्यस्त थे ..

पापा- हाँ मैं मदद करता हूँ..

और ये बोलकर पापा पूरे जोश के साथ तै के लिए कच्ची और ब्रा देखकर पसंद करने लगे...

तै भी शरमाते हुए पापा की पसंद देख रही थी... खैर जब दोनों की पसंद के अनुसार सब ले लिए तो तै ने उस औरत से पेशाबघर पुछा तो वो औरत तै को अपने साथ पीछे की तरफ ले गयी जहाँ तै ने बाथरूम में जाकर पहले अपने पेट पर से मेरा रास साफ़ किआ और फिर साड़ी से पेट को अचे से पौंछकर पेशाब करके बहार आ गयी...

तब तक पापा ने उस लड़के को कपडे के पैसे दे दिए थे..

बहार आकर तै जी ने थोड़ा न नुकर की पैसे क्यों दिए वगेरा वगेरा पर पापा ने मज़ाक में कहा अपनी बीवी को दिलाएं हैं पैसे तो देने पड़ेंगे...

मंजू तै- अरे बाबू बहुत दुष्ट हो तुम मतलब की उसने समझ लिए तो तुमने उसको बताया भी नहीं...

पापा- हम कैसे दुष्ट भाभी बताया तो तुमने भी नहीं..

मंजू तै- हम को तो शर्म आ रही थी...

पापा- कैसी शर्म भाभी..

ये सब बातें करते हुए वो दोनों लोग मोटरसाइकिल तक आ गए...

(कर्मा की ज़ुबानी)

इतना क्या खरीदना था तै को जो इतना टाइम लगा दिया वैसे बड़े खुश लग रहे हैं दोनों लोग न जाने क्यों... खैर छोडो...

पास आकर पापा मुझसे बोले- चलें बीटा अब ऐसा कर अब मोटरसाइकिल तू चला मैं थक गया..

Me-theek है पापा बैठो..

मैंने हैंडल थम लिए और फिर उन दोनों लोगो को भी बिठा लिए... फिर पापा के कहने पर एक चाट वाला. जो काफी मशहूर था उसकी दुकान पर गए... और स्वादिष्ट चाट खाई... सूरज ढल hi चूका था... खा पि कर जब तक चलने को हुए अँधेरा होने लगा था... मैंने दोनों को बिठाया... बैठने की जगह वैसी hi थी मैं फिर बीच में तै और फिर पापा बीज और सामान वगेरा मैंने हैंडल पर तंग लिए था...

शहर के बहार आते आते काफी अँधेरा हो चूका था... और रोड तो वैसे भी इस समय तक सुन सायं हो जाती थी...

तो पापा ने मुझे आराम से चलने की हिदायत दी क्यूंकि रात के समय जानवर भी रोड पर आ जाते थे...

तो मैं बिलकुल आराम और सावधानी से मोटरसाइकिल लेकर गाओं की तरफ बढ़ने लगा...

( अस 3रद पर्सन)

जहाँ कर्मा का ध्यान गाड़ी चलने पर था वहीं उसके पीछे पापा और तै का ध्यान कहीं और hi था... पापा की हालत वही थी जो शहर जाते वक़्त कर्मा की थी... क्यूंकि बार बार उनका लुंड तै के एक तरफ जांघ और चूतड़ों से रगड़ रहा था जिस कारन सख्त हो चूका था...

पापा तो जाते हुए तै के लुंड पर हाथ पड़ने से hi गरम थे और उसके बाद कछियां लेना तै के लिए पापा की उत्तेजना बढाती hi जा रही थी और पापा ने भी अँधेरा का फायदा उठाना शुरू कर दिया था और अपना हाथ तै के पेट पर रख कर सहलाने lage...sath hi तै से बातें भी करते जा रहे थे ये देखने के लिए की कहीं तै के मन में कोई विरोध तो नहीं...

पर तै बिलकुल साधारण होकर बात कर रही थी.. जैसे कुछ हो hi नहीं रहा बस पापा को और क्या चाहिए था पापा ने हिम्मत दिखते हुए तै के पल्लू को पकड़ा और धीरे से नीचे खिसकने लगे और कुछ hi पलों में तै का पल्लू नीचे उनकी गॉड में जा गिरा... और उनका ब्लाउज और पेट नंगा हो गया ..

तै ने भी गिरे हुए पल्लू को उठाने की कोई न कोई कोशिश की और न hi उस पर कोई प्रतिक्रिया दी...

पापा को इससे ाचा मौका और क्या मिलता और उन्होंने अपने हाथ को तै के नंगे पेट पर रख दिया और कुछ पल रखने के बाद तै के भाव देखे और कुछ गलत न लगने पर धीरे धीरे हाथ चलने शुरू कर दिए..

तै के गदराये पेट पर पापा का हाथ चलने लगा.. जिससे तै और पापा दोनों गरम होने लगे... कर्मा इससे बेखबर होकर मोटरसाइकिल चला रहा था...

पापा- भाभी सच में तुम्हे तरबूज नहीं पसंद मुझे तो बहुत पसंद हैं...

पापा ने धीरे से अपने हाथ को तै के ब्लाउज पर रखते हुए कहा...

मंजू तै- पसंद हैं पर गणना ज़्यादा पसंद है...

तै ने अपनी जांघ पर पापा के खड़े लुंड की चुभन को महसूस करते हुए कहा...

पापा- ठीक है भाभी जैसे मैंने बोलै था आपको हमारा गणना खिलाना है इस बार...

मंजू तै- ाचा तो फिर तरबूज तो हमारे खेत में भी हैं तुम हमारे तरबूज खा लेना बाबू...

कर्मा को ये बातचीत थोड़ी अलग और दो अर्थी तो लग रही थी पर उसने कोई ज़्यादा भाव नहीं दिया.. और मोटरसाइकिल चलता रहा...

पापा- अरे ये तो बहुत अछि बात कही भाभी.. तुम हमारा गणना चूस लेना और हम तुम्हारे तरबूजों का रास पी लेंगे..

ये कहकर पापा ब्लाउज के ऊपर से hi तै की बड़ी बड़ी छूछीयों को मसलने लगे... जिससे तै उत्तेजित होने लगी...

और गरम होने की वजह से उनका हाथ जो कर्मा की पीठ पर था धीरे धीरे उसकी कमर पर आ गया और सहलाने लगा...

जिससे कर्मा को भी ाचा लगने लगा.. और शरीर में सनसनी फैलने लगी...

पीछे पापा का लालच हर पल के साथ बढ़ता जा रहा था.. और उसी लालच के चलते पापा ने तै के ब्लाउज के हुक खोलना शुरू कर दिया अँधेरा होने की वजह से कोई कुछ देख सकता नहीं था दूसरी बात कोई होता तो देखता न रोड सुनसान पड़ा था...... इधर बाप बेटे के बीच चलती गाड़ी में एड़ी हालत होने पर तै जी बेहद गरम होती जा रही थी... और उनकी छूट गीली होकर बाह रही थी...

पापा एक के बाद एक हुक खोले जा रहे थे और उन्हें भी ये सोच सोचकर उत्तेजना हो रही थी की चलती गाड़ी पर अपने बेटे के होते हुए वो तै के साथ ये सब कर रहे हैं उनका लुंड कड़क होकर तै की जांघ में घुसता जा रहा था...

और कुछ hi पालो में तै के ब्लाउज के सरे हुक पापा ने खोल दिए.. और दोनों पाटों को अलग कर दिया तै की बड़ी बड़ी छुछियां ब्लाउज में क़ैद बहार लटकने लगी पापा ने बड़ी सावधानी से एक भरी भरकम छुच्छी को पकड़ा और ब्रा एक कप से बहार निकल lia...apani छुच्छी पर पापा का हाथ महसूस करके तै की एक दबी हुई सिसकी निकल गयी..

उधर पापा भी अपने हाथ में तै की नंगी चुकी का एहसास पाकर गंगना उठे... और बिना इंतज़ार के मसलना शुरू कर दिया... तै तो छुच्छी मसाले जाने से बिलकुल पागल सी होने लगी और अपना काबू खोने लगी... उनका हाथ जो अब तक कर्मा की कमर और पेट को सहला रहा था नीचे सरक कर उसकी जांघ तक पहुँच गया जिसका एहसास होते hi कर्मा भी सिहर उठा..

पीछे पापा ने तै की दूसरी छुच्छी को भी ब्रा को नीचे करके बहार निकल लिए तै अब चलती मोटरसाइकिल पर अपनी दोनों छूछीयों को नंगी करके बैठी थी और पापा बरी बरी से दोनों को मसल रहे थे...

तै का हाथ कर्मा की जांघ पर घूम रहा था जिससे उसका लुंड पंत फाड़ कर बहार आने को बेताब था...

पापा- भाभी मेरे से तो सबर नहीं होता भाभी आपके तरबूज खाने का...

और ये कहकर पापा ने सर झुककर तै की एक छुच्छी को अपने मुँह में भर लिए...

तै ने बड़ी मुश्किल से खुद को सिसकने से रोका

तै- खा लेना बाबू आराम से खा लेना सब तुम्हारा hi तो है...

और छुच्छी चूसे जाने पर तै जी खुद को रोक नहीं पाई और जो हाथ उनका कर्मा की जांघ पर था वो उसके खड़े और सख्त लुंड पर आ गया.. हालाँकि पंत के ऊपर से hi पर तै ने कर्मा के लुंड को पकड़ लिए जिससे कर्मा एक पल को तो काबू खो बैठा पर किसी तरह से खुद को सँभालते हुए मोटरसाइकिल चलना जारी रखा...

पीछे पापा पूरे मज़े ले रहे थे थे और बदल बदल कर तै की छूछीयो को बड़े मज़े से पि रहे the...papa का लुंड फटने को हो रहा था... उधर तै की हालत भी ख़राब होती जा रही थी.... उनकी छूट पूरी तरह गीली हो चुकी थी...

और जब तै से बर्दाश्त नहीं हुआ तो उन्होंने धीरे से बोलै- उम्म्म कर्मा बचुआ थोड़ा रोक दे किनारे पर...

में- क्या हुआ तै सब ठीक तो है न?

पापा- हाँ भाभी क्या हुआ पापा ने तै की छुच्छी को मुँह से निकलते हुए कहा..

मंजू तै- अरे बस पेशाब जाना था...

कर्मा ने ये सुनकर मोटरसाइकिल को एक किनारे रोक दिया तब तक तै ने अपनी साड़ी के पल्लू को ऊपर कर लिए जिससे उनका खुला ब्लाउज और छुछियां न दिखें वैसे भी इतने अँधेरे में क्या दीखता बस मोटरसाइकिल की लाइट के सामने आने पर दिख रहा था कुछ भी...

खैर रुकने पर तीनो लोग उतर गए तै की छूट गीली थी वहीं मेरे और पापा के पंत में तम्बू बने हुए थे...

शुक्र था अबधेरे का की कोई कुछ देख नहीं सकता था...

तै एक तरफ जहाँ झाड़ियां थी उस तरफ बढ़ने लगी तो पापा बोले- भाभी अँधेरे का समय है अकेले झाड़ियों में जाना ठीक नहीं.. रुको मैं चलता हूँ मैं झाड़ियों के बहार खड़ा रहूँगा तुम खेत में चली जाना...

मंजू तै- अरे बाबू सही कह रहे हो दर सा तो हम को भी लग रहा था..

पापा- कर्मा बीटा तू यहीं रुक मैं भाभी को करा के लता हूँ..

में- ठीक है पापा...

और कर्मा मोटरसाइकिल बंद करके बैठ गया इधर पापा और तै झाड़ियों में एक घुस गए...

झाड़ियों में थोड़ा अंदर जाकर पापा ने तै को बोलै की वो पेशाब कर लें.. अब न जाने दर की वजह से या किसी और वजह से तै बस दो मीटर आगे बढ़ कर पापा की तरफ पीठ करके अपनी साड़ी उठाकर बैठ गई...

पापा का लुंड जो पहले से hi लोहा बन गया था और कड़क हो गया हालाँकि अँधेरे की वजह से बिलकुल साफ़ तो नहीं पर तै के बड़े बड़े चूतड़ों की हलकी हलकी आकृति पापा को दिखने लगी जिन्हे देखकर पापा काबू खोने लगे और उन्होंने फ़ौरन अपने पंत की चैन खोलकर अपने लुंड को आज़ाद कर दिया जो बहार आते hi ठुमके मरने लगा...

पापा को जैसे सुकून मिल गया लुंड को बहार निकल के और वो तै की चूतड़ों की हलकी सी आकृति को देखकर लुंड पर हाथ चलने लगे...

की तभी पापा के कानो में एक सररररर के साथ सीटी की आवाज़ गयी... जो की तै जे के मूतने की वजह से थी बस ये आवाज़ कानो में पड़ते hi और ये एहसास होते hi की कहाँ से आ रही है पापा अपना आप खो बैठे और उनके कदम अपने आप तै जी की और बढ़ने लगे...

तै जी भी उत्तेजित थी पर उनकी छूट में मूट का दबाद कुछ ज़्यादा था जिसे वो खली कर रही थी... पर उन्हें इस बात का एहसास था की वो पापा के बिलकुल सामने बैठकर मूट रही हैं जिससे उनकी उत्तेजना और बढ़ रही थी... क्या बाबू को मेरे चूतड़ दिख रहे होंगे... मोटरसाइकिल पर जो हुआ उसका क्या असर हुआ होगा.. क्यों मैं इतना बहक गयी की खुद को और उनको रोक नहीं पाई .. तै जी ये सब सोचते हुए मूट रही थी.. की अचानक से उनके चेहरे पर कुछ टकराया उन्होंने चौंक कर ऊपर देखा तो वो और हैरान रह गयी... देखा की पापा उनके बगल में खड़े हैं लुंड चैन के बहार है जिसे वो अपने एक हाथ से पकड़ कर तै के चेहरे पर घिस रहे हैं...

और जब तक तै को ये एहसास हुआ की ये क्या हो रहा है तभी पापा ने लुंड के टोपे को तै के रसीले होंठों पर लेकर एक धक्का दिया जिससे तै का मुँह खुल गया और पापा का लुंड का टोपा तै के मुँह में घुस गया...

Papa-aahhhhh bhabhiiiiiiiiii..

तै तो हैरानी से मुँह खोले बैठी थी उनकी छूट से पेशाब की धार निकल रही थी पापा ने अपना एक हाथ तै के सर के पीछे रखा और धीरे धीरे से अपनी कमर हिलने लगे जिससे पापा का लुंड तै के मुँह में अंदर बहार होने लगा...

तै भी बेहद गर्म हो गयी थी तो वो भी सब भूल कर पापा के गरम और कड़क लुंड को चूसने लगी उनके टोपे पर अपनी जीभ फिरने लगी... तै का मूतना अब बंद होने लगा उनकी टंकी खली हो चुकी थी पर तै उठी नहीं वैसे बैठे बैठे hi पापा से अपना मुँह छुड़वा रही थी...

कर्मा मोटरसाइकिल पर बैठे दोनों का इंतज़ार कर रहा था...

पर उसे क्या पता की देवर भाभी में अंदर क्या खेल चल रहा था, पापा वैसे भी इतने गरम हो चुके थे की उनके धक्के और तेज़ होने लगे थे और धीरे धीरे पापा का लुंड तै के गले तक पहुँचने लगा था...

तै के मुँह से घू घू की आवाज़ आ रही थी...

सुर ऐसा कुछ देर हुआ की पापा की कमर रुक गयी और लुंड को पापा ने तै के गले तक ठूंस दिया और रुक गए और फिर उनका लुंड तै के गले में रास की बारिश करने लगा जिसे तै धीरे धीरे गटकने lagi...akhiri बूँद जब निकल गयी तब तक पापा ने लुंड को तै के मुँह में घुसा के रखा और जब संतुष्ट हो गए तो निकला... तै बुरी तरह से हांफ रही थी ..

फिर भी उन्होंने अपनी जीभ बहार निकल कर पापा के लुंड के टोपे को एक आखिरी बार छठा और फिर कड़ी हो गयी पापा ने भी अपने लुंड को पंत के अंदर कर लिए तै भी कड़ी हुई और अपने कपडे सही करते हुए ब्लाउज के हुक लगाए और पूरी तरह से ठीक होकर बहार की तरफ चलने लगी पापा भी पीछे पीछे चल पड़े...

झाड़ियों से बहार निकले तो कर्मा इंतज़ार hi कर रहा था..

पापा- बीटा तुझे भी करनी हो तो कर आ...

में- नहीं पापा अब चलते हैं देर हो रही है...

फिर से उसी क्रम में बैठ गए और कर्मा मोटरसाइकिल दौड़ने लगा...

पीछे बैठे पापा तो अपना लुंड तै से चुसवा कर और उन्हें अपना पानी पीला कर संतुष्ट थे... पर बगल में तै जैसी गदराई घोड़ी होतो कोई खुद को कैसे रोके.. और पापा एक हाथ को पीछे लेजाकर साड़ी के ऊपर से hi तै के चूतड़ों को मसल रहे थे जिससे तै बेचारी गरम होती जा रही थी...

बैठे होने की वजह से पूरे चूतड़ तो नहीं पर फिर भी पापा को जितना मिल रहा था उतने का पूरा आनंद उठा रहे थे...

तै उत्तेजना में इधर उधर हाथ मार रही थी और उसी उत्तेजना में एक बार फिर से उनका हाथ कर्मा के लुंड पर आ गया पर इस बार उन्हें एक झटका लगा क्यूंकि जब वो मूतने गयी थी तो अपने खड़े लुंड को रहत देने के लिए कर्मा ने लुंड को बहार निकल लिए था तो तै के हाथ में कर्मा का नंगा और गरम लुंड आ गया...

जिसके छुटे hi तै के बदन में करंट सा दौड़ने लगा...

तै का हाथ खुद बा खुद कर्मा के लुंड पर कास गया जिससे कर्मा की एक दबी हुई आठ निकल गयी.

तै ये सोच सोचकर गरम होती जा रही थी की अभी कुछ देर पहले बाप का लुंड चूसा और अब बेटे का लुंड हाथ में है...

वहीं बाप के हाथ चूतड़ों को मसलने में लगे हैं... बाप और बेटे के साथ एक साथ यूँ हवस के खेल में लिप्त होना तै को गरम कर रहा था...

खैर ये खेल कुछ और देर तक चलता की तब तक गाओं आ गया...

(कर्मा की ज़ुबानी)

गाओं में आकर मैंने मोटरसाइकिल को अपने बाघ के किनारे पर रोका तो जाकर तै ने मेरे लुंड को छोड़ा

में- पापा तुम घर चले जाओ मैं तै को घर छोड़कर आता हूँ...

पापा- ठीक है तुझे जाना हो तो बता मैं छोड़ आता हूँ भाभी को...

में- नहीं पापा घर जाओ तुम मैं छोड़ आऊंगा थक गए होंगे...

पापा फिर अध्मान से ठीक है बोलकर घर की तरफ निकल गए. और मैंने मोटरसाइकिल को आगे बढ़ा दिया और फिर मुझे जैसे hi लगा पापा मेरी आँखों से ओझल हो गए मैंने मोटरसाइकिल रोक दी सड़क किनारे hi..

तै- क्या हुआ बचुआ रोक क्यों दी...

Me-ek काम है तै ज़रा उतरना ..

Tai-kaisa काम.

ये कहकर तै उतर गयी मैं भी मोटरसाइकिल से उतरा और स्टैंड पर लगाडी...

और मैंने तै को अपनी बाहों में भर लिए... और सीधा उनकी बड़ी बड़ी छूछीयों को मसलने लगा...

तै- हाय दिया कर्मा बचुआ क्या कर रहा है ये...

में- बस तै जी अब रहा नहीं जा रहा...

Tai-nahi बीटा देर हो रही है घर के लिए...

ये बात मुझे भी ध्यान आई की देर तो हो रही है...

तो मैंने तै को जल्दी से घुमा दिए और मोटरसाइकिल को पकड़ कर झुका दिया... और पीछे से उनकी साड़ी को उठाकर उनकी कमर तक कर दिया मेरे सामने तै के बड़े बड़े चूतड़ आ गए... एक पल को तो मैं उनकी खूबसूरती में खो गया और मन किआ उनके बीच में मुँह घुसेड़ दूँ पर समय की कमी थी इधर तै भी लगातार बोले जा रही थी..

मंजू तै- अरे बचुआ का कर रहा है सड़क पर हमको नंगी कहे कर रहा है...

मैंने तै की बातों को सुनते हुए अपने लुंड को पकड़ा और तै के चूतड़ों की दरार में घुसा दिया और ऊपर नीचे घिसने laga...mere लुंड को अपनी छूट पर महसूस कर के तै सीसीएनए लगी..

मंजू तै- आह्हः शहहह nahiiiiiiiiiiiii बचूणा ीे गलत है... उउउउइइइइइ

तै इसके आगे कुछ बोलती की मेरा लुंड उनकी छूट की गरम दीवारों को चीरता हुआ अंदर घुस गया...

मैं भी क्या करता इतनी देर से गरम था लुंड फटने को हो रहा था तो और रहा नहीं गया और लुंड छूट में समां गया... अह्ह्ह्ह मज़ा आने लगा.... तै की गरम छूट ने मेरे लुंड को कसकर पकड़ लिया... मुझे तो जैसे सुकून मिल गया..

मंजू तै- अह्ह्ह्हह्हह ुहम्मम्मम्मा ढैय्या माआआअह्ह्ह मार दियाःहहहहह रीई..

में- तै आराम से रात का वक़्त है कोई सुन लेगा...

मंजू तै- अरे नाश्पीटे आह्हः इतनाअहहह बड़ा मुसल एक बार में पुराहहहह घुसा दिया... आह्ह्ह्हह और बोलल रहा हैईईई आराम से..

Me-kyaaa करूँ तै तुम्हे देख कर रुका hi नहीं गया...

मैंने तै की कमर को पकड़ कर हलके हलके धक्के लगाने शुरू किये..

मंजू तै- अह्ह्ह्ह उईईईईई ककीतना बड़आहहह है री तेरा आराम से आह्ह्ह्हह्ह..

में- आराम का समय नहीं है तै..

मैंने थोड़ा गति को बढ़ाते हुए कहा..





मंजू तै- आअह्ह्ह्हह अह्ह्ह अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्हह्ह्ह्हह बचूणा ीे मज़ा आ रहा है आईसीईई hiiiiiiiiiii बेटाःह्ह्ह्हह्ह मार माआआअह्ह्ह...

अब तै को भी मेरे लुंड से मज़ा आने लगा वहीं मैं तो फुल जन्नत में था... और ये सोचकर थोड़ा और उत्तेजित हो रहा था की मैं जग्गू की माँ छोड़ रहा हूँ...

यही सोच सोच कर मेरा लुंड तै की छूट में फूलता जा रहा था... और मेरी गति भी बढाती जा रही थी...

ठप्प्प ठप्प ठप्प्प की आवाज़ रोड पर फैली शांति को भांग कर रही थी...

साथ hi मंजू तै के कराहने की आवाज़... मेरे लुंड को और पहला रही थी...

मंजू तै- अह्ह्ह्हह्हह ुहम्मम्मम्मा ढैय्या माआआअह्ह्ह ohhhhhhhhhhhh आईसीईई hiiiiiiiiiii अह्ह्ह्हह बाछहाआअ आअह्ह्ह्हह मार डालाः हाय कूट अपनी तै की निगोड़ी छूट को...

में- हाँ तै क्या गरम चूऊऊत पाई है तुमने अह्ह्ह्हह्ह्ह्हह कबसे मरना चाहता थाआ आअज मौका दिया है ...

मंजू तै- अगर आह्ह्ह्हह पटाहहहह होताहा इतना मज़ा डेगाआ तेरा मुसल तो कबकाआ छुड़वा लेती तुझसी...

तै ये भी सोचकर उत्तेजित हो रही थी की अभी कुछ देर पहले बाप का लुंड चूसा और बेटे से चुद रही हैं...

मैंने तै के दोनों चूतड़ों को थामकर आखिरी गियर दाल दिया और ताबड़तोड़ धक्के मरने लगा... धीरे होना न मैं चाहता था और न hi मेरे बस में था...

मेरे तूफानी धक्कों की वजह से और काफी उत्तेजित होने की वजह से तै ज़्यादा देर नहीं रुक पाई और थोड़ी hi देर में मेरे लुंड पर एक आह की चीख के साथ झड़ने लगी...

अपने लुंड पर तै की छूट को कसता महसूस कर और फिर रास को बहता हुआ महसूस कर मैं भी खुद को रोक नहीं पाया और सटासट 10 जानलेवा धक्के लगाए तै की छूट में और फिर अपना रास छोड़ने लगा...

एक के बाद एक धार ने तै की छूट को भर दिया... मैंने तै की कमर को कास के पकड़ कर अपने से चिपका रखा था जिससे वो आगे गिर न जाएं और तब तक ऐसे hi चिपकाये रखा जब तक मेरे लुंड से रास की एक एक बूँद तै की छूट में न गिर गई तब तक तै भी थोड़ा शांत हो गयी थी... मैंने धीरे से लुंड को बहार निकला तो लुंड के साथ मेरा रास भी बहकर बहार आने लगा...

मेरा लुंड निकलते hi तै भी झट से कड़ी हो गयी और अपनी साड़ी नीचे कर ली...

मैंने भी अभी के लिए संतुष्ट लुंड को अपने पंत में दाल लिए...

और मोटरसाइकिल पर बैठ कर स्टार्ट की

में- बैठो तै..

तै बिना कुछ बोले आ कर बैठ गयी मैंने उनके घर की तरफ बढ़ा दी..

में- मज़ा आया न तै...

तै ने कोई जवाब नहीं दिया मुझे अजीब लगा की हमेशा बकर बकर करने वाली तै आज चुप हो गयी फिर सोचा की जो कुछ हुआ वो भी तो नया था थोड़ा टाइम देते हैं इन्हे भी सोचने का इसलिए और कुछ नहीं बोलै..

और फिर उनका घर आ गया तो तै सीधा उतर कर अंदर चली गयी पर गाड़ी की आवाज़ से जग्गू बहार आ गया था तो थोड़ी देर उससे बातें करने लगा थोड़ा अजीब तो लग रहा था की अभी इसकी माँ छोड़ी है और अभी इससे बात पर खुद को समझाया और फिर अपने घर की और निकल आया...

इसके बाद क्या हुआ अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्.
 
Dosto aise hi dimag mein chull mach rahi thi to socha aap logon se sanjha kar lun, kya mujhe ye story Hinglish mein hi continue karni chahiye ya Devnagiri yani Hindi mein aage likhna chahiye। Kya kahte ho aap log?



दोस्तों ऐसे ही दिमाग में चुल्ल मच रही थी तो सोचा आपके दिमाग में भी मचा दूं,


तो सवाल ये है की मुझे इस कहानी को आगे Hinglish में ही जारी रखना चाहिए या दवनागिरी में आगे बढ़ाया जाए अपने विचार ज़रूर बताएं।
 
परिवारिक चुदाई संग्रह में नई और लंड खड़ा कर देने वाली, चूत की गर्मी बढ़ा देने वाली पारिवारिक चुदाई की कुछ कृतियां पोस्ट की हैं, कृप्या आनंद लें एवं स्नेह बरसाएं।

धन्यवाद
 
और फिर उनका घर आ गया तो तै सीधा उतर कर अंदर चली गयी पर गाड़ी की आवाज़ से जग्गू बहार आ गया था तो थोड़ी देर उससे बातें करने लगा थोड़ा अजीब तो लग रहा था की अभी इसकी माँ छोड़ी है और अभी इससे बात पर खुद को समझाया और फिर अपने घर की और निकल आया...

अपडेट 119

तै के घर से आकर मैं घर पहुंचा तो देखा की सब खाने के लिए बैठे थे मेरा hi इंतज़ार कर रहे थे, मैंने भी जल्दी से हाथ पेअर धोये और कपडे बदल कर सबके साथ बैठ गया खाने के लिए...

कहते हुए सबने ढेर साडी बातें की खासकर परसों हमें कालक गाओं के लिए निकलना था उस बारे में...

खाने के थोड़ी देर बाद तक बातें चलती रही.. और फिर सब धीरे धीरे अपने अपने बिस्तर की और चलने लगे.

सिवाय माँ के जो की दूध गरम करने के लिए रसोई में गयी...

मैंने भी खाना खाया और बर्तन रखने के बहाने रसोई में गया और मौका देखकर माँ को पीछे से पकड़ लिया...

माँ- कर्मा बीटा छोड़ कोई देख लेगा तो फंस जायेंगे..

में- माँ बहुत मन कर रहा है तुमसे प्यार करने का...

मैं माँ के गदराये मांसल पेट को मसलते हुए बोलै...

माँ- बीटा नहीं अभी नहीं ये समय सही नहीं है...

मैंने माँ को फिर भी नहीं छोड़ा और उनकी बड़ी बड़ी छूछीयों को ब्लाउज के ऊपर से मसलने लगा...

माँ न न करते हुए मेरे हाथों में कसमसाने लगी..

मैंने माँ के होंठों का रास पीने के लिए उन्हें घुमाया तो माँ चालाकी दिखते हुए मुझे धक्का देकर निकल गयी...

और रसोई के बहार जाकर मुझे चिढ़ाते हुए भाग गयी...

माँ भी न कभी कभी बिलकुल बच्ची बन जाती है... उन्हें इस तरह देख कर बहुत ख़ुशी होती है...

खैर वहां से निकल कर मैं भी चल दिया बिस्तर की तरफ यानि मौसी के कमरे की तरफ...

जहाँ जाकर देखा मौसी और अनुज पहले से hi लेते हुए थे..

मेरे पहुंचते hi मौसी बीच में सरक गयी और मेरे लिए जगह बनाई...

खैर तीनो लोग आराम से बिस्तर पर लेट गए

मौसी कल के मुकाबले आज ज्यादा खुश लग रही थी... मैंने भी अपना हाथ उनके पेट पर रख कर उनकी तरफ करवट कर के लेट गया और फिर बिना मौसी से पूछे hi उनके ब्लाउज के हुक खोलने लगा जिस पर मौसी ने एक बार मुझे और एक बार मेरे हाथ को देखा.. और फिर ऊपर की तरफ देखने लगी ब्लाउज खोल के मैंने उनकी एक छुच्छी को बहार निकल लिए और फिर तुरंत अपने मुँह में भर के चूसने लगा..

मौसी का हाथ खुद बा खुद मेरे सर के पीछे आ गया और सहलाने लगा..

मुझे देख कर अनुज ने भी दूसरी चूची की अपने मुँह में भर लिए और चूसने लगा...

अब जो हम कर रहे थे समाज के लिए ाचा था या बुरा बस इतना था की हमें और मौसी को ाचा लग रहा था.... अब उनके मन में कैसी भावना थी ये तो वो hi जानती थी...

पर दोनों छुछियां साथ में चूसी जाएं तो कौन सी औरत गरम नहीं होगी...

पर अभी मौसी जिस दौर और परेशानी से गुजर रही थी मैं उन्हें बिलकुल भी और परेशान नहीं करना चाहता इसलिए खुद को काबू में रखते हुए मैंने सिर्फ अपने आप को मौसी की एक छुच्छी को चूसने तक सयम रखा... और न जाने कब उनकी छुच्छी की डोर को अपने मुँह से थामे हुए सपनो के आसमान में गोते खाने लगा...

(अस 3रद पर्सन)

जहाँ हमारा दोस्त अपनी मौसी की छुच्छी को चूसते हुए सपनो में खोया हुआ था वहीं एक जगह कुछ लग जाग रहे थे और कुछ आवाज़ें भी आ रही थी..

अह्ह्ह्ह भाभी क्या गरम छूट है तुम्हारी लगता है मेरा लुंड पूरा निचोड़ लेगी...

ारी ढैय्या बाबूउउउ आठ मार hi डालाअ मैं तो गईइइइइइ....

मेराआह्ह्ह्ह भी निकलने वाला है bhabhiiiiiiiiii...

बाबू भरदूआओ हुमारीय प्यासी छुट को...

और फिर कुछ गुर्राने और गहरी सांस लेने की आवाज़ आती है... और फिर माहौल थोड़ा शांत हो जाता है..

ये आवाज़ें और कहीं से नहीं बल्कि कर्मा के पापा और माँ के कमरे से आ रही थी.. देखते हैं ये लोग क्या कर रहे थे और क्या बातें करते हैं.

माँ- सच में तुमने मंजू जीजी के साथ ये सब किआ वो भी चलती मोटरसाइकिल पर... मुझे तो यकीन नहीं हो रहा..

पापा- यकीन करो मेरी रानी जबकि मुझे यकीन नहीं हो रहा की मेरे ये सब बताने के बाद भी तुम गुस्सा नहीं हो मुझसे...

माँ- गुस्सा क्यों होउंगी मैंने उस दिन जो बातें कहीं थी वो बिलकुल सच हैं... मैं चाहती हूँ की एक पति पत्नी से ज़्यादा हम लोग दोस्त की तरह खुल jayein...aur एक दुसरे से कुछ न छुपाएं..

पापा- मुझे भी याद है तभी तो आज मैंने तुम्हे बताने की हिम्मत की और उसी के लिए एक शुरुआत की.. पर मुझसे ज़्यादा तुमने पहले शुरुआत kardi..aA

माँ- मैंने कैसे..

पापा- सच बताने से ज़्यादा मुश्किल होता है सच सुन कर बर्दाश्त karna..wo तुमने कितने अचे से किआ.

माँ- अगर सच सुन नहीं पाऊँगी तो बताओगे कैसे.. वैसे जब तुम्हे लगे मुझे सब कुछ बता सकते हो तो बता देना मुझे इंतज़ार रहेगा शुरुआत तो हो चुकी है..

पापा- ज़रूर मेरी रानी और तुमसे भी मुझे यही उम्मीद है की हम एक दुसरे को समझें एक दुसरे की िछहों या बातें जानकर उस बारे में राइ न बनाएं...

माँ- चिंता मत करो ऐसा hi होगा, और चाहे जो भी हो मेरी नज़रों में न तुम्हारी इज़्ज़त काम होगी और न hi तुम्हारे लिए मेरा प्यार..

माँ की बात सुनकर पापा कुछ ज़्यादा न बोल सके बस आगे होकर उनके होंठों को चूम लिए और फिर ये दोनों लोग भी सो गए....

(अस कर्मा)

सुबह थोड़ा देर से उठा... मेरे उठने तक सब लोग उठ चुके थे मैं बिस्तर पर अकेला था... बहार जाकर देखा तो सब लोग चाय पि रहे थे आंगन में बैठ कर मैं भी जल्दी से ब्रश वगेरा करके आया और सबके साथ चाय लेकर बैठ गया...

आज काफी सरे काम थे कल निकलना था तो काफी साडी तैयारियां करनी थी सामान लाना था... पापा के खाने की समस्या तो राजन चाचा ने आकर चीन ली और उन्हें अपने घर खाने को कह दिए जब तक हम लोग न आ जाएं.. बाकि पापा तो थे hi...

मैं भी आज जो भी ऐसा काम थे जिसमे एक से ज़्यादा लोग लगमे थे वो निपटने की सोच रहा था ताकि पापा पर बाद में ज़्यादा दबाव न रहे...

तो सुबह का नाश्ता करके मैंने अनुज को साथ लिए और.. सरे काम करने लगा जैसे अगले कई दिनों के लिए भैंसों का चारा काट दिए... पानी के लिए रास्ता बना दिया...

बाघ में hi मौसी दोपहर में खाना ले आई जिसे साथ बैठकर खाया ..

खैर इसी तरह के काम करते हुए पूरा दिन निकल गया वहीं औरतों का पूरा दिन तयारी में गया... मंजू तै, माँ और मौसी मिलकर न जाने क्या क्या करती रही...

खैर मैं और अनुज जब कान निपटा के घर पहुंचे तो अँधेरा हो चूका था...

काफी थक गए थे घर आये तो बड़ी अच्छी खुशबु आ रही थी...

जिसे सूंघते hi पता चल गया की आज माँ ने खीर बनाई है..

जिसे सब ने बड़े चौ से खाया पूरा दिन काम करके भूख भी लगी थी...

खाना निपटा कर सब लोग वहीं आँगन में बैठ कर बातें करने लगे... की कल सुबह जितना जल्दी हो सके निकलना होगा...

पापा- घर बहुत सुना सुना हो जायेगा कुछ दिनों के liye...soch रहा हूँ सफेदा और भैंस को यहीं ले आऊं..

माँ- हाँ जी ये सही रहेगा.. ये बच्चे न सही वो भी तो हमारे hi बच्चे हैं... थोड़ी चहल पहल तब भी रहेगी...

पापा- कल hi ले आऊंगा.. तो फिर चलें फिर सोने..

मौसी- मैं क्या कह रही हूँ के कल जाना hi है तो सब साथ hi सोते आज रात...

अनुज- हाँ मज़ा आएगा...

माँ- साथ में कहाँ.?

Mausi-ye तो नहीं सोचा..

Me-sochna क्या है यही. आंगन में नीचे दरी बिछा कर बिस्तर लगा लेते हैं... सब साथ में सो जायेंगे...

मौसी- क्या कहते हो सब?

पापा- कहना क्या है जैसा सब का मन वैसे सोयेंगे.. अनुज जा अंदर से दरी उठा ला..

अनुज भाग कर गया दरी उठा लाया जिसे हमने मिलकर बिछाया फिर मैंने और अनुज ने सबके बिस्तर मिला मिलकर बिछाए..... सबके क्या दोही बिस्तर बिछाए एक पर मैं मौसी अनुज और दुसरे पर माँ पापा...

अनुज बिस्तर एक छोर पर लेट गया उसके बगल में मौसी और फिर मैं इसके थोड़ी देर बाद माँ मेरे बगल में और उनके बगल में और दुसरे छोर पर पापा...

लेट कर भी हम बातें hi कर रहे थे मेरा मन तो आज भी मौसी की छुच्छी को चूसने का मन कर रहा tha...par ऐसे में न जाने मौसी और बाकि सब के होते हुयी बड़ा रिस्क लग रहा था... इसलिए मैं खुद को रोक लिए..

तभी अचानक से अनुज झल्लाता हुआ उठा और अपनी टीशर्ट उतर कर ऊपर से नंगा हो गया और बोलै- गर्मी लग रही है...

Papa-haan गर्मी तो है और ये कहकर उन्होंने भी अपना कुरता उतर दिया...

माँ- तुम लोगो को सुविधा है गर्मी लगे तो कपडे उतर लो..

पापा- तो तुम्हे किसने रोका है...

माँ- हत्तो जी बच्चो के सामने कैसी बातें करते हो...

Me-to इसमें गलत क्या है माँ , ज़्यादा नहीं तो साड़ी हक उतर दो..

मौसी- यहाँ ऐसे कैसे..

में- सब घर के hi तो हैं मौसी.. क्या दिक्कत है...

माँ- हाँ ऋ शालू साड़ी में क्या जा रहा है मैं तो निकल रही हूँ..

ये कहते हुए माँ ने अपनी साड़ी उतर दी और ब्लाउज और पेटीकोट में आ गयी... अनुज की नज़र तो जैसे उन्ही पर तिकी रही जब तक माँ बापिस लेट न गयी...

Mausi-theek कह रही हो जीजी.... हम भी उतर रहे हैं...

और ये कहते हुए मौसी ने भी अपनी साड़ी उतर दी और मेरे बगल में लेट गयी... अब मेरे बगल में दो औरतें सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में लेती थी... जिनमे एक मेरी माँ थी और एक मौसी...

तो क्या गुल खिलायेगा इनका साथ सोना...

जानिए अगली अपडेट और क्या क्या बातें होगी सबकुछ अगली अपडेट में.. साथ

बनाएं रखें धन्यवाद्
 
और ये कहते हुए मौसी ने भी अपनी साड़ी उतर दी और मेरे बगल में लेट गयी... अब मेरे बगल में दो औरतें सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में लेती थी... जिनमे एक मेरी माँ थी और एक मौसी...

अपडेट 120

जैसा की उम्मीद थी लुंड तुरंत hi खड़ा हो गया, और मुझे पूरा यकीन था की सिर्फ मेरा hi नहीं बल्कि अनुज और पापा का भी यही हाल होगा...

कमरे में जल रहे बल्ब से हलकी सी रौशनी आ रही थी जिससे हल्का हल्का सब दिख रहा था...

थोड़े देर के लिए सब शांत थे क्यूंकि सब के मन में hi कुछ न कुछ चल रहा था..

मौसी- कितने दिनों बाद आज खुले में साथ में सो रहे हैं...

माँ- हाँ तारों के नीचे सोने का भी अलग hi मज़ा है..

में- हाँ छोटे पर ऐसे hi सोते थे और पापा कहानियां सुना कर हमें सुलाते थे...

अनुज- हाँ मुझे भी याद है.. बहुत मज़ा आता था..

पापा- सच में समय बहुत जल्दी निकल जाता है...

मौसी- सही में समय बहुत जल्दी निकलता है... और मज़ा तो पूरा परिवार साथ हो तभी आता है ..

मौसी की आवाज़ से उनका दुःख साफ़ झलक रहा था...

मैंने उनकी तरफ करवट लेकर अपना हाथ उनके नंगे पेट पर रख दिया और थोड़ा दबाया..

मौसी ने भी अपना हाथ मेरे हाथ पर रख लिए..

माँ- शालू सारा परिवार hi है तेरे साथ... रही बात अनुज के मौसा की तो वो भी जल्दी hi होंगे तू उदास मत हो..

पापा- वैसे भी सबसे ज़्यादा ज़रूरी करम होता है, आखिर वही उसकी पहचान होता है.. और वो अपने करम पर हैं तो इसमें दुःख कैसा ये तो ख़ुशी की बात है...

में- और क्या मौसी और हम सब हैं तो तुम्हारे साथ तो उदास होने की क्या है बात..

मैंने मौसी से प्यार से चिपकते हुए कहा...

मौसी ने भी एक हाथ खोल कर मुझे खुद से एक तरफ से चिपका लिए... पर इन सब में मैं ये भूल गया की मेरा लुंड कड़क था जो की मौसी की जांघ से टकराने लगा... और जो मौसी को भी महसूस हुआ होगा..

माँ- सही बोल रहा है कर्मा... हम सब हैं.. तू क्यों अकेला महसूस करती है..

मौसी- नहीं जीजी जीजाजी के तुम्हारे और खासकर मेरे बच्चों के होते हुए अकेली कैसे हो सकती हूँ मैं...

मौसी ने मुझे और अनुज को अपने से चिपकते हुए कहा...

माँ- बिलकुल सही...

पापा- अब सब सो जाओ कल जल्दी उठना पड़ेगा...

माँ- हाँ सो जाओ अब सब लोग...

खैर सब लोग शांत होकर लेट गए पर नींद शायद hi किसी को आ रही थी..

पिछले दिनों की वजह से मौसी की भी आदत बन गई थी छुछियां चुसवाते हुए सोने की उन्हें अच्छा लगता था और आज भी उनका मन यही छह रहा था... अनुज और मेरा हाल भी कुछ ऐसा hi था.. एक तो खड़ा लुंड ऊपर से मौसी बगल में और मेरे तो दूसरी तरफ माँ भी थी वो भी बिना साड़ी के नींद आये तो कैसे आये...

लुंड का बुरा हाल था... मैं कुछ देर यूँ hi तारों को देखते हुए लेता रहा.. तभी शायद लाइट चली गयी और कमरे का बल्ब बंद हो गया और आंगन में पूरा अँधेरा छ गया... मेरे मन में नए नए उपाय आने लगे..

मैंने अपनी दोनों तरफ देखने की कोशिश की तो कुछ भी साफ़ नहीं दिख रहा था जिसका फायदा उठाते हुए मैं मौसी की तरफ पलट गया और अपना हाथ उनके पेट पर रख दिया और फिरने लगा...

मौसी ने कुछ ख़ास प्रतिक्रिया तो नहीं दी पर मुझे लगा की वो भी जाग रही हैं..

मैं उनके पेट पर हाथ फिरते हुए उनकी नाभि को उंगली से छेड़ने लगा...

मौसी थोड़ा कसमसाने लगी... तभी न. जाने अचानक मुझे क्या हुआ मैं उठ कर बैठ गया और सर आगे झुककर अपनी जीभ मौसी की नाभि में घुसा दी और चूसने लगा...

मौसी की एक गहरी सांस की आवाज़ मुझे सुनाई दी साथ hi उनके हाथ मेरे सर के पीछे आ गए... पर उन्होंने मुझे हटाया नहीं मैं खुश होकर और शिद्दत से उनकी नाभि को चूसने लगा..

और जब मेरा मन भर गया तो अपनी जीभ हटाई... और बापिस अपनी जगह पर लेट गया पर हाथ को पेट पर फिरते हुए मैं ऊपर उनके ब्लाउज तक ले गया और ब्लाउज के हुक पर लेजा कर रुक गया... मैंने धीरे से एक हुक खोला तो मौसी ने मेरा हाथ पकड़ लिया और रोकने लगी...

मुझे उनका सर भी ना में हिलता हुआ महसूस हो रहा था.. मौसी सबके होने की वजह से घबरा रही थी...

मैं अपना मुँह मौसी के कान के बिलकुल पास ले गया और बहुत धीरे से फुसफुसा कर बोलै..

में- बहुत अँधेरा है मौसी किसी को कुछ नहीं दिखेगा

कुछ पल बाद मौसी के हाथ मेरे हाथ से हैट गए और एक एक करके मैंने उनके ब्लाउज के सरे हुक खोल दिए और एक पैट को साइड सरकाया तो मैं खुश हो गया क्यूंकि मौसी ने अंदर ब्रा नहीं पहनी थी... मौसी की नंगी छुच्छी मेरे हाथों में आ गयी...

मैं खुश हो गया और अपना मुँह आगे बढाकर मौसी की छुच्छी को मुँह में भर लिए और चूसने लगा साथ hi एक हाथ से दूसरी छुच्छी को भी मसलने लगा मेरा लुंड मौसी की जांघ में छेड़ करने पर तुला था...

मौसी की बड़ी बड़ी छूछीयों को चूसने में बहुत मज़ा आ रहा था... की तभी कुछ आवाज़ हुई तो मैं सीधा होकर लेट गया

मौसी ने भी खुद के ब्लाउज को धक् लिया.. हलके से आँख खोल कर देखा तो लाइट आ गयी थी वहीं मेरे बगल से कुछ आवाज़ें आ रही थी और फिर चुपके से देखा तो पहले पापा और फिर माँ उठ कर जा रहे थे..

मैं मौसी यूँ hi लेते रहे ताकि लगे की सो रहे हैं... और फिर कुछ पल बाद वो लाइट बंद हो गयी जिससे आंगन में रौशनी आ रही थी.. माँ पापा ने hi की होगी ये सोचकर की अगर हम मैं से कोई जगे तो कुछ न दिखे

और उन्होंने कमरे के अंदर का बल्ब जला दिए जिससे सिर्फ कमरे के अंदर उजाला रहे और रौशनी बहार न जाये...

कुछ देर तक मैं ऐसे hi लेता रहा मौसी भी अपने ब्लाउज को दबाये सोने का नाटक करती rahi..waise तो पता hi था की माँ पापा क्यों गए हैं खैर सोचा अब अकेले मौसी के साथ थोड़ी बहुत देर मस्ती हो जाएगी आराम से..

ये सब सोच hi रहा था की तभी आहात हुई तो हल्का सा आँख खोल कर देखा तो एक साया हिलता हुआ दिखा ध्यान से देखने पर पता चला अनुज था जो दबे पाऊँ जा रहा था...

मैंने सोचा इसे क्या हुआ ये कहाँ जा रहा है... देखा तो माँ पापा के कमरे की तरफ hi जा रहा था...

तभी मौसी ने फुसफुसाते हुए बोलै- ये अनुज कहाँ चला गया?? जीजी जीजाजी का तो समझ..

बस इतना बोल कर मौसी चुप हो गयी..

में- पता नहीं मौसी मुझे भी समझ नहीं आ रहा.. चल के देखें?

मौसी- चल पागल है क्या हम क्या देखेंगे..

मौसी ने मन तो किआ पर उनकी आवाज़ में एक अलग hi उत्साह लगा मुझे... मतलब मौसी जाना तो चाहती थी बस शर्मा रही थी...

मैं खड़ा हुआ और मौसी का हाथ पकड़कर उन्हें भी खींचने लगा चलो न मौसी..

मौसी भी न न करते हुए कड़ी हो गयी.. और हम लोग चुपचाप दबे पाऊँ माँ पापा के कमरे की और चल दिए.. कमरे के आस पास अनुज का कोई अत पता नहीं था..

मेरी टेंशन बढ़ने लगी की ये कहाँ गया होगा.... माँ पापा के कमरे और घर की आखिरी दीवार के अंत में थोड़ी जगह खली थी एक गल्लारी जैसी जिसमे हम अनाज वगेरा रखते थे और उसी तरफ एक छोटी सी खिड़की थी माँ पापा के कमरे की.. मुझे उसी का समझ आया... मैंने मौसी का हाथ पकड़ा और उन्हें उसी तरफ ले गया अनाज की बोरी के बगल से होते हुए हम खिड़की तक पहुँच गए... खिड़की से थोड़ी रौशनी आ रही थी जिससे आस पास नज़र आ रहा था...

पर हैरानी की बात ये थी की अनुज यहाँ भी नहीं था..

मैंने छोटी सी खिड़की से चुपचाप नज़र डाली तो जैसा सोचा था वैसा hi नज़ारा आँखों के सामने था...

माँ घुटनो पर बैठी थी उनका ब्लाउज दोनों तरफ खुला हुआ था दोनों छुछियां बहार नंगी झूल रही थी... वहीं पापा उनके सामने खड़े थे पापा का पजामा उनके घुटनों में अटका हुआ था और पापा का लुंड माँ के मुँह से अंदर बहार हो रहा था जिसे माँ बड़े चौ से चूस रही थी





भले hi ये नज़ारा मेरा कई बार देखा हुआ था पर देखते hi आँखें जैम गयी और लुंड फड़फड़ाने लगा...

तभी मौसी ने पीछे से पकड़ कर हिलाया और कान में फुसफुसाते हुए बोलै- क्या हो रहा है, अनुज कहाँ हैं और अंदर क्या देख रहा है तू...

मुझे फिर मौसी का ख्याल आया की उन्हें क्या बोलूं दूसरी बात खिड़की थोड़ी सी ऊँची थी जिससे मैं तो उचक कर देख सकता था पर मौसी की पहुंच से तो काफी ऊपर थी..

में- कुछ नहीं मौसी..

मैंने उनके कान में फुसफुसाते हुए बोलै...

मौसी- कुछ तो देख रहा होगा अनुज कहाँ है मुझे भी देखने दे .

मैंने सोचा अब इन्हे कैसे दिखाऊं फिर सोचा क्या हर्ज़ है क्या पता देखकर मौसी और गरम हो जाएं और अपना कुछ काम hi बन जाये...

मैंने पहले तो सोचा की मौसी को उठा कर दिखा देता हूँ फिर सोचा अगर पल दो पल की बात हो तो बात अलग है.. और मौसी जैसी गदराई घोड़ी को उठाना नहीं भाई बिलकुल नहीं कुछ और सोच कर्मा भाई...

अपने आस पास देखने लगा पीछे घूम कर देखा तो आँखें चौड़ी हो गयी...

मेरे पीछे गेहूं से भरी कुछ बोरियां एक के ऊपर एक राखी हुई थी और बैठने की बड़ी आराम दायक कुर्सी बानी हुई थी....

मैंने मौसी को उसकी तरफ इशारा कर के बैठने को कहा...

मौसी भी बड़ी फुर्ती में ख़ुशी से एक हाथ से मेरा सहारा लेते हुए दुसरे हाथ से बोरियों को पकड़ कर बैठ गयी.. और थोड़ा पीछे होकर कमरे के अंदर देखने लगी और अंदर झांकते hi मौसी की आँखें चौड़ी हो गई.....

उनकी नज़र का पीछा करते हुए मैंने भी मुद कर अंदर देखा तो पाया.. की नज़ारा थोड़ा बदला हुआ था..

पापा पलंग पर पीठ के बल लेते हुए थे और माँ ऊपर से बिलकुल नंगी होकर पेटीकोट कमर तक उठा हुआ था और पापा का लुंड उपनि रसीली छूट में लेकर उछाल रही थी..





माँ की लटकती छूछीयो को उछलता देखकर मेरा मन ललचाने लगा तभी मौसी ने मेरा सर पकड़ कर एक तरफ कर दिया क्यूंकि मेरे देखने की वजह से मेरा सर बीच में आ रहा tha..jisse मौसी को दिखना बंद हो गया था...

मुझे हटाकर मौसी एक बार फिर अंदर देखने लगी... मेरे मन में अब भी एक सवाल था की ये अनुज कहाँ हैं फिर तो मैं मौसी को वैसे hi देखता छोड़ गल्लारी से बहार की तरफ आया और एक आखिरी शक था उसे भी देखने आया.. माँ पापा के कमरे से सत्ता हुआ बाथरूम... जिसका एक दरवाजा उनके कमरे के अंदर खुलता था और दूसरा बहार.. मैंने बाथरूम के दरवाज़े पर कान लगाकर सुना तो गहरी सांसो की आवाज़ साफ़ सुनाई दी .

मैं समझ गया अनुज यहीं हैं और माँ पापा की चुदाई देखकर मज़े ले रहा है... थोड़ा अजीब भी लगा फिर सोचा ये साधारण है... ये hi सोचकर बापिस गलियारे में गया जहाँ मौसी को छोड़ के आया था...

वहां पहुंच कर देखा तो मौसी की नज़र अब भी वहीं तिकी हुई है और थोड़ा गौर किआ तो देखा मौसी का एक हाथ उनकी छूछीयों को दबा रहा है...

मेरे रहते हुए भी मौसी को अपनी छुच्छी को खुद से दबाना पड़े तो थू है हमारे होने पर... मैंने जल्दी से बगल में खड़े होकर मौसी की छूछीयो पर हाथ जमा दिए और दबाने लगा...

मौसी ने चौंककर मेरी तरफ देखा और फिर बिना कुछ कहे बापिस कमरे में देखने लगी... मौसी काफी गरम हो चुकी थी और वही हाल मेरा था मेरा लुंड भी अपनी उत्सुकता को फुदक फुदक कर जाता रहा था...

मैंने मौसी की एक छुच्छी से हाथ हटाया और उसकी जगह अपना मुँह लगा दिया और चूसने लगा... मौसी के मुँह से एक दबी हुई aahhhhhhhhhh निकल गयी वहीं उनका हाथ मेरे सर के पीछे आ gaya...aur मुझको अपनी छूछीयो पर दबाने लगी...

मैं एक छुच्छी को चूसते हुए दूसरी को मसल रहा था...

मौसी अह्ह्ह्हह्ह्ह्हह अह्ह्ह की दबी हुई आवाज़ें निकल रही थी और मुझे अपनी छूछीयो पर दबा रही thi...mera लुंड पाजामे में परेशां कर रहा था तो मैंने सोचा रिस्क लेने का और अपने पाजामे को थोड़ा नीचे खिसका कर लुंड को बहार निकल लिए और मौसी की छूछीयो को चूसने पर लगा रहा... मौसी बैठी हुई अपनी छूछीयो को चुसवाते हुए अंदर का नज़ारा देख रही थी..

जिस हिसाब से मौसी गरम हो रही थी मैंने इस मौके का पूरा फायदा उठाने की सोची थोड़ा रिस्क था पर बिना रिस्क के कहाँ सफलता मिली है कभी... तो मन नजबुत कर मैं सोचने लगा क्या करना है... पहले तो देखना है मौसी कितनी उत्तेजित हैं और खुद से कुछ न करके बस मौसी को रह दिखानी है... आगे जाना न जाना उन पर छोड़ना है..

यही योजना सोचते सोचते मैंने हिम्मत दिखते हुए मौसी का एक हाथ पकड़ा और बिना उनकी छुच्छी को अपने मुँह से निकले hi उनके हाथ को पकड़ कर नीचे की और ले जाने laga...jahan मेरा लोहे की रोड जैसा लुंड इंतज़ार में था...

धीरे धीरे मैं मौसी के हाथ को अपने लुंड की और ले तो जा रहा था पर मेरी धड़कने भी बेहद तेज़ चल रही थी... लुंड के बिलकुल पास हाथ ले जाकर मैंने हाथ रोक दिया और मन में सोचा एक बार फिर से सोचले कर्मा... थोड़ा सा सोचने के बाद मन में कहा जो होगा देखा जायेगा और मौसी के हाथ को अपने लुंड पर रख दिया... उनकी उँगलियों का स्पर्श मैंने जैसे hi लुंड पर महसूस किआ, मौसी ने अचानक से अपना हाथ बापिस खींच लिए...

मैंने उनके चेहरे की तरफ देखा तो वो जल्दी से बोरियों से उतर गयी और जल्दी से मेरे कान में बोली- जीजी बहार जा रही हैं जल्दी चल...

मैं भी तुरंत फुर्ती में आया और मौसी का हाथ पकड़ कर बहार की और दबे पाऊँ भगा आंगन में देखा और देखा ऐसे की बाथरूम का दरवाज़ा खुला हुआ है और उसी से रौशनी हलकी हलकी आ रही है... अनुज की जगह पर कोई चादर ओढ़ कर लेता था मैं समझ गया ये अनुज hi होगा माँ पापा की चुदाई ख़तम होते hi भाग कर आ कर लेट गया होगा और चद्दर से मुँह इसलिए छुपाया है की किसी को शक न हो और ये लगे ये सो रहा है...

की तभी दरवाज़ा के खुलने की आवाज़ सी आई और मैं और मौसी हड़बड़ी में बिस्तर पर लेट गए और मैंने भी जल्दी से एक चादर सर पर तान ली...

वही मौसी ने किआ बस एक गड़बड़ कर दी... मौसी जो की पहले मेरे बायीं तरफ लेती थी हड़बड़ी में मेरे दे तरफ लेट गयी यानि पहले मौसी मेरे और अनुज के बीच में थी पर अब वो मेरे अनुज के बीच न लेटकर दूसरी तरफ जहाँ माँ लेती थी वहां लेट गयी... और मैं उन्हें बापिस उनकी जगह भेज पता इससे पहले दरवाज़ा खुल गया और किसी के कदमो की आहात आई जो हमारे पास hi आ रही थी.. और बिलकुल पास आकर रुक गयी... और कुछ पल शांति रही मैंने चुपचाप से चद्दर से बहार देखा तो माँ थी और खड़े होकर देख रही थी की जगह कैसे बदल गयी और अब वो कहाँ सोएं..

वो इसके आगे कुछ सोचती इससे पहले मैंने चादर से हाथ निकला और उनका हाथ पकड़ कर बिस्तर पर खींच लिए...

मुझे लगा की एक पल तो माँ कहीं चूख न दें पर ऐसा नहीं हुआ और माँ बिस्तर पर गयी मैंने उन्हें धक्का देकर जल्दी से अपने बगल में लिटा लिए और अपनी चद्दर से धक् लिए माँ कुछ कहना चाहती थी पर उससे पहले hi मैंने अपने होंठ उनके होठों से चिपका दिए..

अब हाल यूँ था की मैं और माँ एक hi चादर में थे मैंने और माँ ने एक hi तरफ करवट ले राखी थी... मैं पीछे से माँ से बिलकुल चिपका हुआ था... मेरा लुंड पेटीकोट के ऊपर से माँ के चूतड़ों में घुस रहा था... और माँ का चेहरा थोड़ा सा पीछे की और घूमा हुआ था जिस कारन मेरे और उनके होंठ जुड़े हुए थे...

माँ की जीभ को चूसते हुए hi मैंने अपना हाथ माँ के बदन पर फिरना शुरू किआ तो मुझे एक और सुखद समाचार मिला माँ कमर के ऊपर बिलकुल नंगी थी यानि पेटीकोट के ऊपर न ब्लाउज न ब्रा...

मैं तो हैरान रह गया ऐसा क्यों... चुदाई के बाद भी माँ ने ऊपर ब्लाउज या ब्रा नहीं पहनी ऐसा कैसे हो सकता है...

सोचा माँ से पूछूंगा इस बारे में बाद में पर माँ के इस तरह ऊपर नंगा होने के एहसास से hi मेरा खून का बहाव तेज़ हो गया और मेरा लुंड फटने को हो गया मैंने फिर बिलकुल भी देर न करते हुए हाथ को नीचे सरकाया और सरकते hi माँ की नाभि से नीचे मुझे पेटीकोट का एहसास हुआ जिसे मैंने बिना झिझक के नीचे की और सरका दिया साथ hi दुसरे हाथ की मदद से माँ के भरी चूतड़ों को थोड़ा उठाकर पेटीकोट को जांघों से नीचे सरका दिया अब माँ बिलकुल नंगी थी.. माँ ने ये अहसास होते hi की मैंने उनका पेटीकोट उतर दिया है अपने होंठ मेरे होंठों से हटाए और कुछ फुसफुसाते हुए कहने hi वाली थी की अचानक से रुक गयी और उनका मुँह खुला रह गया... माँ खामोश हो गयी..

ऐसा इसलिए हुआ, या माँ की ख़ामोशी की वजह थी.. मेरा लुंड जिसे मैंने पेटीकोट के नीचे होते hi माँ की छूट के द्वार पर टिका कर एक धक्का लगाकर अंदर सरका दिया....

एक पल को शांत रहने के बाद माँ कुछ कहने वाली थी की तभी दरवाज़ा खुलने की एक बार फिर से आवाज़ आई और... मैं और माँ दोनों बिलकुल शांत हो गए मेरा लुंड माँ की छूट में माँ बिलकुल मेरे से चिपकी हुई.... या मैंने पीछे से माँ को पकड़ कर खुद से चिपका रखा था..

मैं और माँ दोनों समझ गए की पापा हैं उनके कदमो की आवाज़ आई और हमारे करीब आकर रुक गयी और कुछ पल बाद उनके बैठने की आहात हुई... और फिर शायद वो भी लेट गए...

( अस 3रद पर्सन)

अब चादर के अंदर से सब कुछ तो हमारा दोस्त कर्मा नहीं देख सकता न तो आगे की दास्ताँ हमारी ज़ुबानी...

मौसी चादर ओढ़े लेती थी और लम्बी लम्बी सांसे ले रही थी इतनी गरम होने के बाद ठंडा होने का भी मौका नहीं मिला तभी उन्हें किसी के कदमो की आवाज़ आई जो सिरहाने आकर रुक गयी और कुछ पल बाद उन्हें ऐसा एहसास हुआ की कोई उनके पीछे लेट रहा है क्यूंकि वो कर्मा की और करवट लेकर लेती थी... अपने पीछे किसी के होने की आशंका से मौसी के दिल की धड़कने दौड़ने लगी...

की तभी अचानक से पीछे से कोई उनसे चिपक गया... और ये कोई और नहीं बल्कि मौसी के प्यारे जीजाजी यानि कर्मा के पिता थे...

और कर्मा के पिता ने आकर देखा की सब सो रहे हैं और उनकी जगह के बगल में उनकी प्यारी गदराई हुई चुड़क्कड़ पत्नी जिसे अभी छोड़ कर आये हैं चादर तन के सो रही hai...to उन्होंने सोचा हम भी इसकी चादर में घुस जाते हैं...

और ये hi सोचकर पापा ने पीछे से चादर उठाई उसमे घुस गए और पीछे से मौसी से चिपक गए साथ hi एक हाथ आगे लेजाकर नंगे पेट रख lia...aur अपनी साली को जिन्हे वो अपनी पत्नी समझ रहे थे हाँ मन साली आधी घरवाली होती है पर पूरी बनाने में बहुत फ़र्क़ होता है...

खैर पापा ने माँ के धोखे में मौसी को खुद से चिपका लिए और पेट वाला हाथ थोड़ा हिलाते हुए पेट पर फिरने लगे...

मौसी को तो मनो काटो तो खून नहीं... और बेचारी ने दर के अपने खुले हुए ब्लाउज के दोनों पतों को पकड़ कर खुद से चिपका रखा था वैसे वो ये तुरंत समझ गयी की ये उनके जीजाजी हैं पर अब क्या करें ये तो मुझे जीजी समझ रहे हैं क्या करूँ.. बोलूंगी तो बिना बात ड्रामा होगा और न जाने जीजा जी क्या सोचेंगे मेरे बारे में... मौसी इसी उधेड़बुन में लगी हुई थी...

वहीं पापा का हाथ मौसी के पेट पर घूम रहा था और घुमते घुमते थोड़ा ऊपर की तरफ आया तो मौसी के ब्लाउज को छू गया जिसे पापा ने एक बार अचे से पकड़ कर देखा और फिर धीरे से अपना मुँह मौसी के कान के पास लेकर फुसफुसाते हुए कहा..

पापा- बोलै तो था की ब्लाउज उतर कर सोना फिर क्यों पहना है रानी...

चलो कर्मा को तो जवाब नहीं मिला की उसकी माँ ऊपर से नंगी क्यों थी पर हमें तो मिल गया... तो ये इच्छा कर्मा के पापा की थी जो अपनी बीवी को नंगी करके उसके साथ सोना चाहते थे अपने बच्चों के बगल में...

मन्ना पड़ेगा कर्मा के पापा भी कर्मा से काम नहीं...

मौसी बेचारी तो बुरी फांसी हुई थी क्या कहती की जीजाजी मैं आपकी पत्नी नहीं साली hun...mausi की तो हालत ख़राब होती जा रही थी.. बेचारी ने दर से पापा की बात सुनकर उन्होंने अपने ब्लाउज को और कसकर पकड़ लिया...

पर पापा भी कहाँ मानाने वाले थे अपने दोनों हाथों को आगे लेजाकर मौसी के दोनों हाथों से ब्लाउज को छुड़वा दिया जिसे मौसी ने मजबूरी में छोड़ दिया वो ये नहीं दिखाना चाहती थी की वो उनकी पत्नी नहीं साली हैं क्यूंकि मौसी के मन में दर बैठ गया की अगर अब जीजाजी को पता चल जायेगा तो वो उनसे नज़रें कैसे मिला payengi..isse ाचा इन्हे सो जाने देती हूँ और जैसे hi नींद में जायेंगे उठ कर चली जाउंगी यही सोच कर मौसी ने ब्लाउज से हाथ हटा लिए उसके बाद का सारा काम पापा ने धीरे धीरे कर दिया और पहले एक बाजु और फिर दूसरी ऐसे करके ब्लाउज को मौसी के बदन से अलग कर दिया... अब वो भी अपनी बहन की तरह ऊपर से बिलकुल नंगी थी..

अरे बहन से याद आया देखते हैं उनकी बहन यानि कर्मा की माँ के क्या हाल हैं...

जैसे hi पापा के कदमो की आवाज़ बंद हुई और उनके लेटने की आहात हुई उसके कुछ देर तक कर्मा ने इंतज़ार किआ... और फिर उसके बाद अपनी कमर चलनी शुरू कर दी और अपने लुंड को माँ की छूट में हलके हलके से अंदर बहार करने लगा.. और अपनी माँ की मखमली छूट का आनंद लेने लगा कर्मा तो जन्नत में था क्यूंकि उसको जैसे मन चाही मुराद मिल गयी थी... कई दिनों से वैसे भी वो छह के भी माँ के करीब नहीं आ पाया था और अब कल सबके साथ जाना था तो कुछ भी होना मुश्किल था और कर्मा दिल hi दिल ये छह रहा था की जाने से पहले एक बार वो माँ को छोड़ले और उसकी इच्छा अभी पूरी हो रही थी...

वहीं कर्मा की माँ जो कुछ देर पहले पति से चुद रही थी अब बेटे का लुंड ले रही थी.. हालाँकि उन्हें अभी दर भी लग रहा था जिस हालत में वो अभी थे पर बेटे का लुम्बा कड़क लुंड छूट में पाकर वो भी उसके आनंद को अनदेखा नहीं कर प् रही थी और जिस तरह से कर्मा उन्हें छोड़ने के लिए तड़प रहा था उसी तरह उनके मन में भी ये दबी इच्जा थी की जाने से पहले एक बार कर्मा से छुडवां... बस किसी को पता नहीं थी... तो अब जब लुंड छूट में चला hi गया था और चुदाई हो hi रही थी तो माँ ने सोचा अब जब हो hi रहा है तो क्यों न पूरी तरह से आनंद लिए जाये...

और यही सोचकर माँ भी पूरी लगन से कर्मा के लुंड को छूट में उतरने लगी वहीं कर्मा भी अचे धक्के लगाकर चुदाई करने लगा पर इस बात का ध्यान रखते हुए की किसी तक आवाज़ न जाये एक हाथ से चुकी को मसलते हुए माँ को खुद से चिपकाये हुए कर्मा अपनी माँ को अपने भाई मौसी और सबसे बड़ी बात पापा के बगल में छोड़ रहा था..





माँ भी यही सोच कर उत्तेजित हो रही थी की वो अपनी बहन छोटे बेटे और पति के बगल में होते हुए भी अपने बड़े बेटे से चुद रही हूँ... चादर में उत्तेजना का तूफ़ान आया हुआ था जो माँ और बेटे दोनों को hi अपने साथ उदा रहा था...

वहीं दूसरी चादर में अलग गर्मी हो रही तहज..

ब्लाउज के उतारते hi पापा एक बार फिर से पीछे से मौसी की नंगी पीठ से चिपक गए और हाथ एक बार फिर से उनके पेट पर रख लिए... उनका आधा खड़ा लुंड पेटीकोट के ऊपर से मौसी के चूतड़ों को भेदने की कोशिश करने लगा...

मौसी बेचारी शर्म से गाड़ी जा रही थी अपने जीजाजी के साथ यूँ नंगी होकर... उनका मन कर रहा था की वो अभी धरती में hi समां जाएं पर बेचारी के पास कोई हल नहीं था.. सिवाय इंतज़ार के... पर हर पल के साथ एक नयी समस्या कड़ी हो रही थी..

पापा ने पेट पर हाथ घूमते हुए थोड़ा ऊपर ले गए और मौसी की एक छुच्छी को अपने हाथ में भर लिए...

मौसी की एक उँचाहि सी आह निकल गयी... वहीं पापा भी कुछ पल दबाने के बाद जैसे थे वैसे hi रुक गए..

पापा का माथा ठनका.. ये सभ्य की छुछियां तो नहीं हैं... पापा तुरंत पहचान गए अरे भाई पहचाने कैसे न... शादी कितने साल हो गए और इतने सैलून में शायद hi कोई ऐसी रात रही होगी जब इन हाथों में पत्नी की बड़ी बड़ी छुछियां न आई हो... तो पहचानते कैसे नहीं...

पापा का दिमाग चलने लगा अगर ये सभ्य नहीं है तो शालू hi हो सकती है.... अरे ये क्या हो गया... उसकी सांसो से ये तो पक्का है की वो सोइ नहीं है...

क्या सोचेगी वो मेरे बारे में अब अगर कहीं अपनी जीजी को बता दिया तो मेरा घर टूट जायेगा..

पापा का लुंड ये सब सोचते हुए मुरझा गया... पापा को समझ नहीं आ रहा था की अब क्या करें जैसे थे वैसे hi रुक गए हाथ वहीं छुच्छी पर रुका हुआ था...

इसके आगे क्या हुआ अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्...

बेचारे दोनों परेशां हो गए...
 
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