- Joined
- Dec 5, 2013
- Messages
- 31,779
पापा ने घी उठाने के लिए खुद को उठाया और आगे हुए तो उनका शरीर बिलकुल भाभी के शरीर से सात गया और पापा का खड़ा लुंड भाभी के पेट पर पाजामे के अंदर से चुभने लगा… जिससे भाभी के अंदर से एक आह निकल गयी..
अपडेट 131
पापा ने घी का डिब्बा उतर कर नीचे स्लिप पर रखते हुए कहा- क्या हुआ बहु तेरी आह क्यों निकली?
प भाभी: कुछ नहीं चाचाजी वो वो घर का काम करते हुए थोड़ी कमर लचक गयी शायद तो उसी में हल्का हल्का सा दर्द है.
पापा- अरे कमर लचक गयी और तू यहाँ भी काम कर रही है मालिश की?
प भाभी: क्या करू चाचाजी काम भी तो ज़रूरी है न..
पापा- पर शरीर का ख्याल रखना भी तो ज़रूरी है, मालिश की?
प भाभी: नहीं चाचाजी घर पर कोई था hi नहीं मुझसे लगती नहीं पीछे है न… और पल्ली और चची भी नहीं हैं जिनसे लगवा लेती..
पापा- वो सब तो ठीक हैं बीटा पर अगर बाम नहीं लगवायेगी तो ये दर्द बढ़ता जायेगा. और फिर बिलकुल नहीं कर पायेगी कुछ भी झुकना भी मुशील हो जायेगा… तेरी चची की भी लचक गयी थी एक बार तीन दिन तक झुकना तक मुश्किल हो गया बेचारी का..
प भाभी: है ढैय्या तीन दिन में तो मेरी जान hi निकल जाएगी..
भाभी ने अपनी कमर पर हाथ रखते हुए कहा जैसे उन्हें दर्द हो रहा हो…
पापा- तभी तो बोल रहे हैं बहु, की मालिश करवले, नहीं तो परेशानी बढ़ जाएगी.
प भाभी: पर कैसे कोई घर नहीं है यहाँ पर भी चची नहीं है…
पापा: वो तो है बीटा पर अभी मज़बूरी है क्या कर सकते हैं.
प भाभी: चाचाजी अगर आप बुरा न माने तो आप कर देंगे मालिश..
पापा तो जैसे ये hi सुनने के लिए बेक़रार बैठे थे, और मन hi मन खुश हो गए पर अपनी ख़ुशी को सँभालते हुए बोले- हमें तो कोई परेशानी नहीं है बहु तुझे तो कोई आपत्ति नहीं?
प भाभी: परेशानी तो मेरी है चाचाजी बस थोड़ी शर्म आ रही है..
पापा- शर्मा मत बहु वैसे भी दर्द का इलाज़ पहले ज़रूरी है.
प भाभी: ग चाचाजी पर ये बात बहार किसी को पता न लगे नहीं तो लोग क्या समझेंगे..
पापा- चिंता मत कर बहु किसी को कुछ नहीं पता चलेगा.. वैसे भी न तू बताएगी और न हम.. तो कैसे पता छलेगा
प भाभी: ठीक चाचाजी तो आप खाना खा लीजिये तब तक मैं यहाँ का कान निपटा देती हूँ फिर कर देना..
पापा- जैसी तेरी ीचा बहु..
पापा खुश होकर बहार आंगन में आकर बैठ गए और भाभी ने उन्हें खाना दिया जिसे पापा ने जितनी जल्दी हो सकता था खाने की कोशिश करने लगे.
उधर जब तक पापा ने खाना ख़त्म किआ तब तक भाभी ने भी रसोई की साफ़ सफाई कर दी… इधर पापा खाकर तैयार थे भाभी बहार आई आंगन में तो देखा पापा बिलकुल तैयार खड़े थे..
भाभी ने पापा के पास से बर्तन उठाये और अंदर रसोई में रखकर आई.. और फिर बहार पापा के सामने आ गयी पर कुछ बोलने से शर्मा रही थी,
पापा भी कुछ देर तक कुछ नहीं बोले पर समय निकलता देख उनसे रहा नहीं गया और खुद बोल पड़े: बहु चलें फिर तेरी मालिश कर दें.
प भाभी- चाचाजी मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा क्या ये सही रहेगा.
पापा को बात बिगड़ती दिखी तो तुरंत बोले- अरे बीटा कुछ गलत थोड़े hi कर रहे हैं हाँ अगर नहीं किआ तो गलत होगा और तेरा दर्द और बढ़ जायेगा.. चल अब ज्यादा मत सोच बहु.
प भाभी- ग चाचाजी, तो फिर कहाँ यहीं पर.
पापा- यहाँ नहीं मेरे हमारे कमरे में चल वहीं राखी है बाम भी तेरी चची कभी कभी लगाती हैं न.
भाभी अकेले पापा के साथ कमरे में जाने की बात सुनकर थोड़ा असहज भी हुई पर साथ hi उनकी उत्तेजना भी बढ़ने लगी.. वहीं पापा तो बस भाभी के चेहरे के भावों को देखकर समझने की कोशिश क्र रहे थे की उनका प्रयास कितना कामयाब हो रहा है
प भाभी- ठीक है चाचाजी चलिए..
पापा भाभी की हाँ सुनकर जल्दी से कमरे की और चल दिए भाभी ने उन्हें जाते देखा और भाभी चेहरे पर एक शरारती मुस्कराहट आ गयी.
कमरे में पापा जल्दी से इधर उधर बाम देखने लगे वही भाभी भी पीछे पीछे पीछे कमरे में दाखिल हुई.. कुछ hi पालो में पापा ने बाम ढूंढ निकली और भाभी को देखते हुए बोले- ऐसा कर बहु तू बिस्टेर पर लेट जा मैं लगा देता हूँ..
प भाभी- ठीक है चाचाजी
और भाभी बिस्तर पर पेट के बल लेट गयी, पापा भी बड़ी जल्दी से उनके पास बिस्तर के किनारे बैठ गए… पापा की नज़र भाभी की चिकनी पीठ जो की साड़ी और ब्लाउज के बीच नज़र आ रही थी उस पर hi रुक गयी थी… गोरी गोरी चिकनी माखन जैसी त्वचा..

pix host
पापा ने बाम की डिब्बी खोल ली और बाम को अपनी उँगलियों से लगाया और बोले- बहु?
प भाभी- हनमं
पापा- लगाऊं?
प Bhabhi-haan चाचाजी…
बस भाभी की सहमति मिलते hi पापा ने अपने हाथ चलने शुरू कर दिए.. अपने हाथों को वो भाभी की चिकनी पीठ पर चलते हुए बोले- किस तरफ दर्द है बहु..
प भाभी- थोड़ा सा नीचे की और चाचाजी.
पापा ने जहाँ साड़ी बंधी थी उसके बिलकुल किनारे अपनी उँगलियों को फिराया और पुछा यहाँ??
प भाभी- थोड़ा सा और नीचे…
पापा- बहु यहाँ तो साड़ी बंधी है इसके नीचे हटाने के लिए साड़ी हटानी होगी.
प भाभी- हाँ? ओह्ह्ह ठीक चाचाजी..
ये बोलकर भाभी ने अपने हाथ थोड़े पीछे किये और अपनी साड़ी को नीचे खिसका दिया थोड़ा सा… पापा का लुंड भाभी के बदन को देखकर बिलकुल कड़क हो चूका था…
पापा ने फिर जितनी साड़ी नीचे खिसकी थी उतनी जगह पर बाम मलना शुरू कर दिया.. या कहो हाथों से hi भाभी के चिकने बदन को भोगने लगे..
भाभी थोड़ी देर तो ऐसे hi लेते हुए मालिश करवाती रही पर थोड़ी देर बाद बोली- चाचाजी थोड़ा सा और नीचे दर्द हो रहा है..
पापा थोड़ा सा हैरान हुए पर जब बात समझ आई तो खुश होते हुए बोले- पर बहु यहाँ तो साड़ी बंधी है इससे नीचे बाम लगाने के लिए तो तुझे साड़ी हटानी होगी.
प भाभी- ुहँन ाचा चाचाजी ये कहकर भाभी थोड़ा सा सोचने लगी और फिर बोली- चाचाजी आप थोड़ी देर के लिए बाहर चले जायेंगे?
पापा ने कुछ सोचा और फिर बोले
पापा- हाँ हाँ क्यों नहीं
और पापा कमरे से बहार चले गए और बहार जाकर खड़े होकर सोचने लगे की कहीं इसे बुरा तो नहीं लग गया, या की मैं कुछ ज़्यादा बोल गया, इतना मज़ा आ रहा था क्या चिकना बदन है बहु का ये हाथ से नहीं जाना चाहिए ..
पापा ये सब hi सोच रहे थे की अंदर से भाभी की आवाज़ आई- चाचाजी आ जाओ अंदर.
पापा तुरंत अंदर गए और जैसे hi उनकी नज़र अंदर के नज़ारे पर पड़ी पापा की आँखें फटी की फटी रह गयी, उनके पेअर वहीं के वहीं जैम गए, सामने भाभी बिना साड़ी के सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में कड़ी थी और उनका बदन इतना मादक और कामुक लग रहा था की पापा का मन कर रहा था अभी जाकर भोग लें… पापा का लुंड अकड़ कर झटके खाने लगा… पर उनका ध्यान तो सिर्फ भाभी पर था, गहरी गोल कामुक नाभि चिकना सपाट पेट और उसके ऊपर ब्लाउज में कैद बड़ी बड़ी छुछियां जो आधी ब्लाउज के बहार झाँक रही थी.

पापा को ऐसे अपने बदन को घूरते हुए देख भाभी के चेहरे पर एक अलग सी मुस्कान थी और फिर वो बोली- चाचाजी अब हो जाएगी न मालिश आराम से?
पापा- उह्ह्ह? हैं?? हाँ हाँ हाँ बहु अब आराम से हो जाएगी टी.. टी टट्टू लेट जा न..
पापा ने एक बार फिर से भाभी के पूरे बदन को आँखों में उतारते हुए कहा तभी पापा को एक बात थोड़ा अलग लगी.. और सोचने लगे की बहु ने साड़ी तो उतरी है पर ब्लाउज के ये दो ऊपर के हुक भी तो खुले हुए हैं.. ये पहले तो लगे हुए थे जहाँ तक मुझे याद है.. कमर की मालिश के लिए ब्लाउज के हुक क्यों खोलना… फिर पापा ने खुद hi मन में कहा की क्या सोच रहे हैं हम भी इतनी गदराई जवान औरत हमारे सामने है और खोला hi है बंद नहीं किआ तो मज़े लो इस हुस्न पारी बहु के साथ..
इतनी देर में भाभी लेट चुकी थी पीठ के बल और पापा भी बगल में आकर बैठ गए और फिर भाभी की कमर को मसलने लगे पापा की नज़रें रह रह कर भाभी की नंगी गोरी पीठ से लेकर नीचे पेटीकोट में उभरे हुए चूतड़ों पर दौड़ रही थी, साथ hi उनके हाथ मालिश के बहाने भाभी की पीठ पर घूम रहे थे, चची के मुँह से हलकी हलकी ुहम्म्म्म जैसी सिसकियाँ निकल रही थी…
पापा का लुंड पाजामे में बेहद कड़क हो चूका था और झटके पर झटके देकर बहार आने को फड़फड़ा रहा था …
पापा थोड़ी हिम्मत करते हुए अपने हाथों को पीठ के साथ साथ थोड़ी बगल में भाभी की कमर तक ले जाने लग्र धीरे धीरे पापा की उंगलिया भाभी की कमर तक जा रही थी जिसपर भाभी की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न मिलने पर पापा खुश थे, और आगे बढ़ रहे थे
भाभी का पेटीकोट उनकी पीठ के बिलकुल निचले हिस्से पर था जिससे की पापा पीठ पर अचे से मालिश कर सकें अगर पेटीकोट को थोड़ा सा और नीचे सरका दिया जाता तो भाभी के चूतड़ों की मांग नज़र आ सकती थी.. पापा के मन में भी भाभी के चूतड़ों को देखने की एक जिज्ञासा जागने lagin…aur वो मालिश करते हुए पेटीकोट को धीरे धीरे उँगलियों से नीचे खिसकने की कोशिश करने लगे पर क्यूंकि पेटीकोट भाभी के पेट से दबा हुआ था इसलिए कामयाब नहीं हो रहे थे… फिर भी पापा ने हिम्मत नहीं हरी और कोशिश करते रहे..
भाभी का पेटीकोट बिलकुल उनके चूतड़ों की सीमा तक पहुंच चूका था और पापा को यकीन था की अगर एक इंच भी और खिसकने में कामयब हुए तो भाभी के दोनों सुन्दर पर्वतों के बीच की वो घाटी की झलक ज़रूर पा लेंगे और इसके लिए उन्होंने इरादा भी पक्का कर लिए, भाभी बस आँखें मूंदे पापा के हाथों को अपने बदन पर चलता हुआ महसूस करके मज़े ले रही थी…
पापा ने इस बार सोच लिए की वो थोड़ा ज़ोर लगा कर पेटीकोट को नीचे खिसका hi देंगे और पहले वो हाथ ऊपर की तरफ ले गए और फिर नीचे की तरफ जैसे hi पेटीकोट को खिसकने के लिए लाये तभी…
खत खत खत… दरवाज़े पर आवाज़ हुई जिसे सुनकर पापा और भाभी चौंक गए और भाभी तो तुरंत उठ कर बैठ गयी वहीं पापा भी चौंक गए,
प भाभी- चाचाजी आप देखो मैं कपडे पहन कर आती हूँ..
पापा ये न तो ये चाहते थे की वो बहार जाएज और न hi ये की भाभी कपडे पहनें पर क्या कर सकते हैं.. पापा ने हामी भरी और भरी मन से कमरे से बहार निकल गए पर उससे पहले भाभी ने उनके पाजामे में बने तम्बू को ाचा से देख लिए… पापा की भाबी के चूतड़ों को देखने की ीचा पूरी नहीं हो पाई .
पापा ने गुस्से में जाकर दरवाज़ा खोला तो देखा रज्जो चची थी ,
रज्जो चची- भाई साहब तुम्हारी भैंस खुल गयी है खेत भर में दौड़ रही है, यही बताने आये थे.
पापा- अरे खुल गयी अभी जाकर बांधता हूँ निकम्मी को..
रज्जो चची- ठीक भाई जल्दी जाओ वैसे तो हम hi पकड़ लेते पर वो मुई मरखनी भी तो बहुत है इसलिए हम नहीं गए.
पापा- ाचा किआ रज्जो बेकार में मार वार देती.
रज्जो Chachi-acha भाई साब हम चलते हैं.
Papa-theek है.
ये कहकर रज्जो चची चली गयी और पापा भाग कर कमरे में आये तो देखा भाभी साड़ी पहन चुकी थी,
प भाभी- कौन था चाचाजी?
पापा- रज्जो थी दीनू की घरवाली, कह रही थी भैंस खुल गयी है..
प भाभी- अरे दिया..
पापा- एक काम करना बहु हम जा रहे हैं पकड़ने तू जाये तो टाला लगा कर चाबी दरवाज़े के ऊपर सच्चे में रख जाना.
प भाभी- ठीक चाचाजी अआप जाओ जल्दी.
पापा जल्दी से घर से निकल गए
(अस कर्मा)
वहीं दूसरी तरफ कालक गाओं में हम सब लोगो ने खूब देर तक बातें की और बात करते करते शाम हो गयी.. इसके बाद साल ऐसे hi अलग होकर घूमने लगे इधर उधर… मैं चित्रावती को ढूंढने लगा न जाने क्यों उससे बात करने को मन हो रहा था.. पर वो कहीं नहीं दिखी तो फिर जहाँ पहले पिल्लों के साथ देख रही थी वहां जाकर देखा तो वहां भी नहीं दिखी पर वो छोटे छोटे पिल्लै ज़रूर दिखे जिन्हे देखकर मुझे उनपर प्यार आने लगा और मैं उन्हें खिलने लगा. बहुत ाचा लग रहा था उनके साथ खेलने में की तभी अचानक से पिल्लै मुझे छोड़ कर एक तरफ भागने लगे…
मैंने मुद कर देखा तो पाया चित्रावती वहीं कड़ी थी

सरे पिल्लै उसकी तरफ दौड़ कर गए थे. उसने एक पिल्लै को गॉड में उठाया और मेरी तरफ आई..
चित्रावती- आकाश में जितने टारे हैं, ये सब उनसे भी ज़्यादा प्यारे है.
में- हाँ प्यारे तो बहुत हैं..
मैंने ये बोलै तो वो मुझे घूर के देखने लगी…
में- क्या हुआ, ओह्ह्ह हाँ ाचा समझा..
क्या फ़र्क़ पड़ता है कितने टारे आकाश में है,
मुझे तो बस इनसे प्यार है जो हमारे पास में हैं.
ये सुनकर उसके चेहरे पर एक बहुत hi सूंदर सी मुस्कान आ गयी..
चित्रावती- वैसे हिम्मत तो बहुत तुमने दिखलाई,
पर अफ्शोष आखिर में मात hi खाई.
में- तारीफ है ये या मज़ाक उदा रही हो,
मेरी हार पर तुम बहुत मुस्कुरा रही हो.
चित्रावती- नहीं हमारा मतलब वो नहीं था तुमने गलत हमें जाना है,
और वैसे भी तुम्हारी हार का मज़ाक उड़ाकर हमें क्या मिल जाना है.
में- हाँ बात तो ये भी सही है,
जो तुमने अभी कही है.
चित्रावती- बहुत hi बहादुरी दिखाई तुमने सच तुम्हे हम बताते हैं.
बहुत से लोग तो कालजंग को देख डरके बिना लाडे भाग जाते हैं.
में- फिर भी इस बहादुरी के बाद भी रोना है,
न जाने आगे के मुक़ाबले में और क्या होना है.
चित्रावती- ज़रूरी नहीं की जो बड़ा हो बल में..
वो hi बड़ा हो अकाल में.
चित्रावती की ये बात मेरे दिमाग में लगी यार बात तो सही है, वो मुझसे एक जगह यानि ताकत में ज़्यादा है पर हर चीज़ में तो नहीं आ सकता मैं चित्रावती की बात समझ कर मुस्कुराया फिर उसकी और देखकर बोलै- सिर्फ ये पिल्लै नहीं कोई और भी है जो तारों से भी प्यारा है,
किस्मत है हमारी जो उसने ये पल बुमरे है साथ गुजरा है.
चित्रावती ये सुनकर मेरी तरफ सवालिया नज़रों से देखने लगी पर जब मैंने कुछ नहीं बोलै तो बोली- बताओ वो है कौन,
जल्दी बोलो क्यों हो मौन?
में- क्या तुम इतनी भोली हो जितनी बनती हो?
मेरे और इन पिल्लों के अलावा यहाँ कौन है नहीं समझती हो?
चित्रावती- तो तुम्हारे हिसाब से मैं भोली और प्यारी हूँ.
ज़रा बच के रहो मेहमान मैं यहाँ की राजकुमारी हूँ.
चित्रावती ने हँसते हुए बोलै.
में- तो राजकुमारी जी आप ऐसे hi क्यों बतलाती हैं?
एक प्रश्न है की आप हर बात की तुक क्यों मिलती हैं?
चित्रावती- बचपन में हमारी गुरु ने हमें बतलाया था,
एक राजकुमारी की भाषा कैसी होनी चाहिए सिखलाया था.
में- पर ये ज़रूरी तो नहीं, वैसे भी तो बोलिये कभी.
चित्रावती- हमें ऐसे बात करना लगता आसान है,
तुकबंदी में बात करना hi अब हमारी पहचान है.
में- माफ़ कीजिये पर आप शायद इस बात से अनजान हैं.
बोली या जगह से नहीं बस आपसे आपकी पहचान है.
चित्रावती- हम समझे नहीं खुल के बताओ,
अपनी बात का मतलब समझाओ.
में- मतलब यही की ऐसे बात करने से hi सिर्फ आपकी पहचान नहीं है..
चित्रावती- पूरी बात बताओ
पर तुक तो मिलाओ.
में- नहीं राजकुमारी माफ़ कीजिये पर मैं तुक नहीं मिलाऊँगा पर मैं आपको ये समझाना छह रहा हूँ की इस जगह से या आपके तुक मिलाने से या आपके राज कुमारी होने से आपकी पहचान नहीं है.
चित्रावती काफी गंभीर होकर मुझे देखने लगी मैं सोचने लगा की कहीं कुछ ज़्यादा तो नहीं बोल गया..
चित्रावती- सही से बोलो, अपना मुँह खोलो.
उसने मेरी आँखों में देखते हुए बिलकुल गंभीरता से कहा एक पल को तो मैं थोड़ा डरा फिर बोलै- मैं बस इतना कह रहा हूँ राजकुमारी.
चित्रावती- बात सुनो हमारी, मत बोलो हमें राजकुमारी.
अब बोलते जाओ, हमें नाम से बुलाओ.
में- हाँ राज कुमा. नहीं चित्रावती बात ये है की मेरे अनुसार आपकी पहचान वो है जो ये राजकुमारी और तुकबंदी को हटाकर है.. आप चित्रावती हो… सिर्फ चित्रावती… आपकी पहचान आप हो न की ये राजकुमारी का पद या गुरुमा की सिखलाई हुई तुकबंदी.
चित्रावती मेरी तरफ देखते hi जा रही थी उसकी आँखें लग रहा था मेरे जिस्म को भेद कर निकल जाएँगी…
में- ाचा एक बात बताओ की क्या तुक बंदी से आप सब कुछ कह पति हो?
चित्रावती- हाँ सब कह जाती हूँ, सब कुछ बतलाती हूँ..
में- सच में वो सब जो तुम्हारे दिल में होता है, सब कुछ मन की हर एक बात, तुम्हे किस्से दर लगता है किस बात से ख़ुशी मिलती है कैसा लगता है सब कुछ.
इस बार चित्रावती की आँखें मुझसे हटकर. इधर उधर घूमने लगी..
चित्रावती- अगर हम बता भी पाएं तो उससे क्या होगा.
ये पहली बार था जब मेरे सामने चित्रावती ने कुछ बिना तुकबंदी के बोलै था..
में- उससे क्या होगा मतलब?
चित्रावती- मतलब यही की अगर हम कहेंगे भी तो सुनेगा कौन? कौन जानना चाहता है हमारे मन की बात, बड़ी माँ गाओं को अचे से कैसे चलना है इसमें लगी रहती हैं. वो बड़ी माँ बनने में इतनी खो गयी हैं की भूल गयी हैं की वो मेरी माँ भी हैं सिर्फ बड़ी माँ नहीं… दूसरा न हमारा कोई साथी है, बस है तो ये बेजुबान जानवर और ये पेड़ पौधे, अगर हम बोलेन भी तो किस्से बोलेन मन की बात.
मैं उसके इस तरह बोलने से हिल गया.. थोड़ी देर की चुप्पी के बाद बोलै
में- राजकुमारी का तो पता नहीं. पर चित्रावती का तो एक दोस्त है जो उसकी साडी बात सुन्ना चाहेगा..
चित्रावती- सच्ची कौन?
में- एक बहुत hi लम्बा चौड़ा दिखने में बहुत hi सुन्दर बांका नौजवान.
चित्रावती- ऐसा कौन है
में- तुम्हारे सामने खड़ा है..
मेरी बात सुनकर चित्रावती के चेहरे पर मुस्कान आए गयी..
चित्रावती – तो तुम हमारे दोस्त बनोगे सच्ची?
में- हाँ बिलकुल बनूँगा पक्का वाला पर चित्रावती का राजकुमारी का नहीं उससे मुझे दर लगता है..
चित्रावती- मुझसे नहीं लगता.
में- बिलकुल नहीं,
चित्रावती- क्यों?
में- तुम इतनी खूबसूरत हो अछि हो तुमसे क्यों दर लगेगा..
चित्रावती हंसी और बोली- नहीं बुद्धू, हमारा मतलब है क्यों बनना चाहते हो तुम हमारे दोस्त?
में- मैं बस तुम्हे जानना चाहता हूँ..
चित्रावती- तुम तो मुझे जानते हो फिर?
में- नहीं तुम्हे जानना चाहता हूँ, चित्रावती को, तुम्हारे मन की हर बात को, तुम्हारी सबसे अछि यादों से लेकर सबसे बुरी तक, तुम्हारी कर्मियों से लेकर तुम्हारी ताकत तक, तुम्हारे मन में चल रही उथल पुथल, तुम्हारे सपने तुम्हारी प्यारी सी मुस्कान के पीछे का राज. मैं तुम्हे जानना चाहता हूँ.
चित्रावती बस मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी और कुछ सोच रही थी, न जाने उसके मन में क्या चल रहा था पर लग बहुत प्यारी रही थी

उसने ऐसे देखते हुए hi एक कदम लेकर मेरे और करीब आ गयी और बोली- सच्ची?
में- हाँ सच्ची हमेशा के लिए.
चित्रावती- हमेशा के लिए?
और ये कहकर उसने मेरा हाथ पकड़ लिए.. मुझे भी उसका मेरा हाथ पकड़ना बहुत ाचा लगा..
में- हाँ हमेशा के लिए.
मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा कुछ देर तक हम यूँ hi आँखों में देखते हुए खड़े रहे तभी एक पिल्लै के भौंकने की वजह से हमारा ध्यान टूटा.
उसने हंस कर उस पिल्लै को अपनी गॉड में उठा लिए और मैंने एक को और पहिए मैं उससे बोलै- तो अब शुरू हो जाओ
चित्रावती- मतलब
में- मतलब तुम्हारे बारे में जानना है मुझे सब कुछ बचपन से लेकर जो भी याद है सब बताओ.
चित्रावती- सचमें अभी?
में- हाँ अभी…
इसके बाद वो अपने बारे में बताती गयी और मैं सुनता गया जितना उसके बारे में जाना उतना hi उसके लिए लगाव और इज़्ज़त बढ़ती गयी.. हूँ करीब 2-3 घंटे तक बात करते रहे जब तक की हमें खाने पर न बुलाया गया…
इसके बाद क्या हुआ सब अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्
अपडेट 131
पापा ने घी का डिब्बा उतर कर नीचे स्लिप पर रखते हुए कहा- क्या हुआ बहु तेरी आह क्यों निकली?
प भाभी: कुछ नहीं चाचाजी वो वो घर का काम करते हुए थोड़ी कमर लचक गयी शायद तो उसी में हल्का हल्का सा दर्द है.
पापा- अरे कमर लचक गयी और तू यहाँ भी काम कर रही है मालिश की?
प भाभी: क्या करू चाचाजी काम भी तो ज़रूरी है न..
पापा- पर शरीर का ख्याल रखना भी तो ज़रूरी है, मालिश की?
प भाभी: नहीं चाचाजी घर पर कोई था hi नहीं मुझसे लगती नहीं पीछे है न… और पल्ली और चची भी नहीं हैं जिनसे लगवा लेती..
पापा- वो सब तो ठीक हैं बीटा पर अगर बाम नहीं लगवायेगी तो ये दर्द बढ़ता जायेगा. और फिर बिलकुल नहीं कर पायेगी कुछ भी झुकना भी मुशील हो जायेगा… तेरी चची की भी लचक गयी थी एक बार तीन दिन तक झुकना तक मुश्किल हो गया बेचारी का..
प भाभी: है ढैय्या तीन दिन में तो मेरी जान hi निकल जाएगी..
भाभी ने अपनी कमर पर हाथ रखते हुए कहा जैसे उन्हें दर्द हो रहा हो…
पापा- तभी तो बोल रहे हैं बहु, की मालिश करवले, नहीं तो परेशानी बढ़ जाएगी.
प भाभी: पर कैसे कोई घर नहीं है यहाँ पर भी चची नहीं है…
पापा: वो तो है बीटा पर अभी मज़बूरी है क्या कर सकते हैं.
प भाभी: चाचाजी अगर आप बुरा न माने तो आप कर देंगे मालिश..
पापा तो जैसे ये hi सुनने के लिए बेक़रार बैठे थे, और मन hi मन खुश हो गए पर अपनी ख़ुशी को सँभालते हुए बोले- हमें तो कोई परेशानी नहीं है बहु तुझे तो कोई आपत्ति नहीं?
प भाभी: परेशानी तो मेरी है चाचाजी बस थोड़ी शर्म आ रही है..
पापा- शर्मा मत बहु वैसे भी दर्द का इलाज़ पहले ज़रूरी है.
प भाभी: ग चाचाजी पर ये बात बहार किसी को पता न लगे नहीं तो लोग क्या समझेंगे..
पापा- चिंता मत कर बहु किसी को कुछ नहीं पता चलेगा.. वैसे भी न तू बताएगी और न हम.. तो कैसे पता छलेगा
प भाभी: ठीक चाचाजी तो आप खाना खा लीजिये तब तक मैं यहाँ का कान निपटा देती हूँ फिर कर देना..
पापा- जैसी तेरी ीचा बहु..
पापा खुश होकर बहार आंगन में आकर बैठ गए और भाभी ने उन्हें खाना दिया जिसे पापा ने जितनी जल्दी हो सकता था खाने की कोशिश करने लगे.
उधर जब तक पापा ने खाना ख़त्म किआ तब तक भाभी ने भी रसोई की साफ़ सफाई कर दी… इधर पापा खाकर तैयार थे भाभी बहार आई आंगन में तो देखा पापा बिलकुल तैयार खड़े थे..
भाभी ने पापा के पास से बर्तन उठाये और अंदर रसोई में रखकर आई.. और फिर बहार पापा के सामने आ गयी पर कुछ बोलने से शर्मा रही थी,
पापा भी कुछ देर तक कुछ नहीं बोले पर समय निकलता देख उनसे रहा नहीं गया और खुद बोल पड़े: बहु चलें फिर तेरी मालिश कर दें.
प भाभी- चाचाजी मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा क्या ये सही रहेगा.
पापा को बात बिगड़ती दिखी तो तुरंत बोले- अरे बीटा कुछ गलत थोड़े hi कर रहे हैं हाँ अगर नहीं किआ तो गलत होगा और तेरा दर्द और बढ़ जायेगा.. चल अब ज्यादा मत सोच बहु.
प भाभी- ग चाचाजी, तो फिर कहाँ यहीं पर.
पापा- यहाँ नहीं मेरे हमारे कमरे में चल वहीं राखी है बाम भी तेरी चची कभी कभी लगाती हैं न.
भाभी अकेले पापा के साथ कमरे में जाने की बात सुनकर थोड़ा असहज भी हुई पर साथ hi उनकी उत्तेजना भी बढ़ने लगी.. वहीं पापा तो बस भाभी के चेहरे के भावों को देखकर समझने की कोशिश क्र रहे थे की उनका प्रयास कितना कामयाब हो रहा है
प भाभी- ठीक है चाचाजी चलिए..
पापा भाभी की हाँ सुनकर जल्दी से कमरे की और चल दिए भाभी ने उन्हें जाते देखा और भाभी चेहरे पर एक शरारती मुस्कराहट आ गयी.
कमरे में पापा जल्दी से इधर उधर बाम देखने लगे वही भाभी भी पीछे पीछे पीछे कमरे में दाखिल हुई.. कुछ hi पालो में पापा ने बाम ढूंढ निकली और भाभी को देखते हुए बोले- ऐसा कर बहु तू बिस्टेर पर लेट जा मैं लगा देता हूँ..
प भाभी- ठीक है चाचाजी
और भाभी बिस्तर पर पेट के बल लेट गयी, पापा भी बड़ी जल्दी से उनके पास बिस्तर के किनारे बैठ गए… पापा की नज़र भाभी की चिकनी पीठ जो की साड़ी और ब्लाउज के बीच नज़र आ रही थी उस पर hi रुक गयी थी… गोरी गोरी चिकनी माखन जैसी त्वचा..

pix host
पापा ने बाम की डिब्बी खोल ली और बाम को अपनी उँगलियों से लगाया और बोले- बहु?
प भाभी- हनमं
पापा- लगाऊं?
प Bhabhi-haan चाचाजी…
बस भाभी की सहमति मिलते hi पापा ने अपने हाथ चलने शुरू कर दिए.. अपने हाथों को वो भाभी की चिकनी पीठ पर चलते हुए बोले- किस तरफ दर्द है बहु..
प भाभी- थोड़ा सा नीचे की और चाचाजी.
पापा ने जहाँ साड़ी बंधी थी उसके बिलकुल किनारे अपनी उँगलियों को फिराया और पुछा यहाँ??
प भाभी- थोड़ा सा और नीचे…
पापा- बहु यहाँ तो साड़ी बंधी है इसके नीचे हटाने के लिए साड़ी हटानी होगी.
प भाभी- हाँ? ओह्ह्ह ठीक चाचाजी..
ये बोलकर भाभी ने अपने हाथ थोड़े पीछे किये और अपनी साड़ी को नीचे खिसका दिया थोड़ा सा… पापा का लुंड भाभी के बदन को देखकर बिलकुल कड़क हो चूका था…
पापा ने फिर जितनी साड़ी नीचे खिसकी थी उतनी जगह पर बाम मलना शुरू कर दिया.. या कहो हाथों से hi भाभी के चिकने बदन को भोगने लगे..
भाभी थोड़ी देर तो ऐसे hi लेते हुए मालिश करवाती रही पर थोड़ी देर बाद बोली- चाचाजी थोड़ा सा और नीचे दर्द हो रहा है..
पापा थोड़ा सा हैरान हुए पर जब बात समझ आई तो खुश होते हुए बोले- पर बहु यहाँ तो साड़ी बंधी है इससे नीचे बाम लगाने के लिए तो तुझे साड़ी हटानी होगी.
प भाभी- ुहँन ाचा चाचाजी ये कहकर भाभी थोड़ा सा सोचने लगी और फिर बोली- चाचाजी आप थोड़ी देर के लिए बाहर चले जायेंगे?
पापा ने कुछ सोचा और फिर बोले
पापा- हाँ हाँ क्यों नहीं
और पापा कमरे से बहार चले गए और बहार जाकर खड़े होकर सोचने लगे की कहीं इसे बुरा तो नहीं लग गया, या की मैं कुछ ज़्यादा बोल गया, इतना मज़ा आ रहा था क्या चिकना बदन है बहु का ये हाथ से नहीं जाना चाहिए ..
पापा ये सब hi सोच रहे थे की अंदर से भाभी की आवाज़ आई- चाचाजी आ जाओ अंदर.
पापा तुरंत अंदर गए और जैसे hi उनकी नज़र अंदर के नज़ारे पर पड़ी पापा की आँखें फटी की फटी रह गयी, उनके पेअर वहीं के वहीं जैम गए, सामने भाभी बिना साड़ी के सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में कड़ी थी और उनका बदन इतना मादक और कामुक लग रहा था की पापा का मन कर रहा था अभी जाकर भोग लें… पापा का लुंड अकड़ कर झटके खाने लगा… पर उनका ध्यान तो सिर्फ भाभी पर था, गहरी गोल कामुक नाभि चिकना सपाट पेट और उसके ऊपर ब्लाउज में कैद बड़ी बड़ी छुछियां जो आधी ब्लाउज के बहार झाँक रही थी.

पापा को ऐसे अपने बदन को घूरते हुए देख भाभी के चेहरे पर एक अलग सी मुस्कान थी और फिर वो बोली- चाचाजी अब हो जाएगी न मालिश आराम से?
पापा- उह्ह्ह? हैं?? हाँ हाँ हाँ बहु अब आराम से हो जाएगी टी.. टी टट्टू लेट जा न..
पापा ने एक बार फिर से भाभी के पूरे बदन को आँखों में उतारते हुए कहा तभी पापा को एक बात थोड़ा अलग लगी.. और सोचने लगे की बहु ने साड़ी तो उतरी है पर ब्लाउज के ये दो ऊपर के हुक भी तो खुले हुए हैं.. ये पहले तो लगे हुए थे जहाँ तक मुझे याद है.. कमर की मालिश के लिए ब्लाउज के हुक क्यों खोलना… फिर पापा ने खुद hi मन में कहा की क्या सोच रहे हैं हम भी इतनी गदराई जवान औरत हमारे सामने है और खोला hi है बंद नहीं किआ तो मज़े लो इस हुस्न पारी बहु के साथ..
इतनी देर में भाभी लेट चुकी थी पीठ के बल और पापा भी बगल में आकर बैठ गए और फिर भाभी की कमर को मसलने लगे पापा की नज़रें रह रह कर भाभी की नंगी गोरी पीठ से लेकर नीचे पेटीकोट में उभरे हुए चूतड़ों पर दौड़ रही थी, साथ hi उनके हाथ मालिश के बहाने भाभी की पीठ पर घूम रहे थे, चची के मुँह से हलकी हलकी ुहम्म्म्म जैसी सिसकियाँ निकल रही थी…
पापा का लुंड पाजामे में बेहद कड़क हो चूका था और झटके पर झटके देकर बहार आने को फड़फड़ा रहा था …
पापा थोड़ी हिम्मत करते हुए अपने हाथों को पीठ के साथ साथ थोड़ी बगल में भाभी की कमर तक ले जाने लग्र धीरे धीरे पापा की उंगलिया भाभी की कमर तक जा रही थी जिसपर भाभी की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न मिलने पर पापा खुश थे, और आगे बढ़ रहे थे
भाभी का पेटीकोट उनकी पीठ के बिलकुल निचले हिस्से पर था जिससे की पापा पीठ पर अचे से मालिश कर सकें अगर पेटीकोट को थोड़ा सा और नीचे सरका दिया जाता तो भाभी के चूतड़ों की मांग नज़र आ सकती थी.. पापा के मन में भी भाभी के चूतड़ों को देखने की एक जिज्ञासा जागने lagin…aur वो मालिश करते हुए पेटीकोट को धीरे धीरे उँगलियों से नीचे खिसकने की कोशिश करने लगे पर क्यूंकि पेटीकोट भाभी के पेट से दबा हुआ था इसलिए कामयाब नहीं हो रहे थे… फिर भी पापा ने हिम्मत नहीं हरी और कोशिश करते रहे..
भाभी का पेटीकोट बिलकुल उनके चूतड़ों की सीमा तक पहुंच चूका था और पापा को यकीन था की अगर एक इंच भी और खिसकने में कामयब हुए तो भाभी के दोनों सुन्दर पर्वतों के बीच की वो घाटी की झलक ज़रूर पा लेंगे और इसके लिए उन्होंने इरादा भी पक्का कर लिए, भाभी बस आँखें मूंदे पापा के हाथों को अपने बदन पर चलता हुआ महसूस करके मज़े ले रही थी…
पापा ने इस बार सोच लिए की वो थोड़ा ज़ोर लगा कर पेटीकोट को नीचे खिसका hi देंगे और पहले वो हाथ ऊपर की तरफ ले गए और फिर नीचे की तरफ जैसे hi पेटीकोट को खिसकने के लिए लाये तभी…
खत खत खत… दरवाज़े पर आवाज़ हुई जिसे सुनकर पापा और भाभी चौंक गए और भाभी तो तुरंत उठ कर बैठ गयी वहीं पापा भी चौंक गए,
प भाभी- चाचाजी आप देखो मैं कपडे पहन कर आती हूँ..
पापा ये न तो ये चाहते थे की वो बहार जाएज और न hi ये की भाभी कपडे पहनें पर क्या कर सकते हैं.. पापा ने हामी भरी और भरी मन से कमरे से बहार निकल गए पर उससे पहले भाभी ने उनके पाजामे में बने तम्बू को ाचा से देख लिए… पापा की भाबी के चूतड़ों को देखने की ीचा पूरी नहीं हो पाई .
पापा ने गुस्से में जाकर दरवाज़ा खोला तो देखा रज्जो चची थी ,
रज्जो चची- भाई साहब तुम्हारी भैंस खुल गयी है खेत भर में दौड़ रही है, यही बताने आये थे.
पापा- अरे खुल गयी अभी जाकर बांधता हूँ निकम्मी को..
रज्जो चची- ठीक भाई जल्दी जाओ वैसे तो हम hi पकड़ लेते पर वो मुई मरखनी भी तो बहुत है इसलिए हम नहीं गए.
पापा- ाचा किआ रज्जो बेकार में मार वार देती.
रज्जो Chachi-acha भाई साब हम चलते हैं.
Papa-theek है.
ये कहकर रज्जो चची चली गयी और पापा भाग कर कमरे में आये तो देखा भाभी साड़ी पहन चुकी थी,
प भाभी- कौन था चाचाजी?
पापा- रज्जो थी दीनू की घरवाली, कह रही थी भैंस खुल गयी है..
प भाभी- अरे दिया..
पापा- एक काम करना बहु हम जा रहे हैं पकड़ने तू जाये तो टाला लगा कर चाबी दरवाज़े के ऊपर सच्चे में रख जाना.
प भाभी- ठीक चाचाजी अआप जाओ जल्दी.
पापा जल्दी से घर से निकल गए
(अस कर्मा)
वहीं दूसरी तरफ कालक गाओं में हम सब लोगो ने खूब देर तक बातें की और बात करते करते शाम हो गयी.. इसके बाद साल ऐसे hi अलग होकर घूमने लगे इधर उधर… मैं चित्रावती को ढूंढने लगा न जाने क्यों उससे बात करने को मन हो रहा था.. पर वो कहीं नहीं दिखी तो फिर जहाँ पहले पिल्लों के साथ देख रही थी वहां जाकर देखा तो वहां भी नहीं दिखी पर वो छोटे छोटे पिल्लै ज़रूर दिखे जिन्हे देखकर मुझे उनपर प्यार आने लगा और मैं उन्हें खिलने लगा. बहुत ाचा लग रहा था उनके साथ खेलने में की तभी अचानक से पिल्लै मुझे छोड़ कर एक तरफ भागने लगे…
मैंने मुद कर देखा तो पाया चित्रावती वहीं कड़ी थी

सरे पिल्लै उसकी तरफ दौड़ कर गए थे. उसने एक पिल्लै को गॉड में उठाया और मेरी तरफ आई..
चित्रावती- आकाश में जितने टारे हैं, ये सब उनसे भी ज़्यादा प्यारे है.
में- हाँ प्यारे तो बहुत हैं..
मैंने ये बोलै तो वो मुझे घूर के देखने लगी…
में- क्या हुआ, ओह्ह्ह हाँ ाचा समझा..
क्या फ़र्क़ पड़ता है कितने टारे आकाश में है,
मुझे तो बस इनसे प्यार है जो हमारे पास में हैं.
ये सुनकर उसके चेहरे पर एक बहुत hi सूंदर सी मुस्कान आ गयी..
चित्रावती- वैसे हिम्मत तो बहुत तुमने दिखलाई,
पर अफ्शोष आखिर में मात hi खाई.
में- तारीफ है ये या मज़ाक उदा रही हो,
मेरी हार पर तुम बहुत मुस्कुरा रही हो.
चित्रावती- नहीं हमारा मतलब वो नहीं था तुमने गलत हमें जाना है,
और वैसे भी तुम्हारी हार का मज़ाक उड़ाकर हमें क्या मिल जाना है.
में- हाँ बात तो ये भी सही है,
जो तुमने अभी कही है.
चित्रावती- बहुत hi बहादुरी दिखाई तुमने सच तुम्हे हम बताते हैं.
बहुत से लोग तो कालजंग को देख डरके बिना लाडे भाग जाते हैं.
में- फिर भी इस बहादुरी के बाद भी रोना है,
न जाने आगे के मुक़ाबले में और क्या होना है.
चित्रावती- ज़रूरी नहीं की जो बड़ा हो बल में..
वो hi बड़ा हो अकाल में.
चित्रावती की ये बात मेरे दिमाग में लगी यार बात तो सही है, वो मुझसे एक जगह यानि ताकत में ज़्यादा है पर हर चीज़ में तो नहीं आ सकता मैं चित्रावती की बात समझ कर मुस्कुराया फिर उसकी और देखकर बोलै- सिर्फ ये पिल्लै नहीं कोई और भी है जो तारों से भी प्यारा है,
किस्मत है हमारी जो उसने ये पल बुमरे है साथ गुजरा है.
चित्रावती ये सुनकर मेरी तरफ सवालिया नज़रों से देखने लगी पर जब मैंने कुछ नहीं बोलै तो बोली- बताओ वो है कौन,
जल्दी बोलो क्यों हो मौन?
में- क्या तुम इतनी भोली हो जितनी बनती हो?
मेरे और इन पिल्लों के अलावा यहाँ कौन है नहीं समझती हो?
चित्रावती- तो तुम्हारे हिसाब से मैं भोली और प्यारी हूँ.
ज़रा बच के रहो मेहमान मैं यहाँ की राजकुमारी हूँ.
चित्रावती ने हँसते हुए बोलै.
में- तो राजकुमारी जी आप ऐसे hi क्यों बतलाती हैं?
एक प्रश्न है की आप हर बात की तुक क्यों मिलती हैं?
चित्रावती- बचपन में हमारी गुरु ने हमें बतलाया था,
एक राजकुमारी की भाषा कैसी होनी चाहिए सिखलाया था.
में- पर ये ज़रूरी तो नहीं, वैसे भी तो बोलिये कभी.
चित्रावती- हमें ऐसे बात करना लगता आसान है,
तुकबंदी में बात करना hi अब हमारी पहचान है.
में- माफ़ कीजिये पर आप शायद इस बात से अनजान हैं.
बोली या जगह से नहीं बस आपसे आपकी पहचान है.
चित्रावती- हम समझे नहीं खुल के बताओ,
अपनी बात का मतलब समझाओ.
में- मतलब यही की ऐसे बात करने से hi सिर्फ आपकी पहचान नहीं है..
चित्रावती- पूरी बात बताओ
पर तुक तो मिलाओ.
में- नहीं राजकुमारी माफ़ कीजिये पर मैं तुक नहीं मिलाऊँगा पर मैं आपको ये समझाना छह रहा हूँ की इस जगह से या आपके तुक मिलाने से या आपके राज कुमारी होने से आपकी पहचान नहीं है.
चित्रावती काफी गंभीर होकर मुझे देखने लगी मैं सोचने लगा की कहीं कुछ ज़्यादा तो नहीं बोल गया..
चित्रावती- सही से बोलो, अपना मुँह खोलो.
उसने मेरी आँखों में देखते हुए बिलकुल गंभीरता से कहा एक पल को तो मैं थोड़ा डरा फिर बोलै- मैं बस इतना कह रहा हूँ राजकुमारी.
चित्रावती- बात सुनो हमारी, मत बोलो हमें राजकुमारी.
अब बोलते जाओ, हमें नाम से बुलाओ.
में- हाँ राज कुमा. नहीं चित्रावती बात ये है की मेरे अनुसार आपकी पहचान वो है जो ये राजकुमारी और तुकबंदी को हटाकर है.. आप चित्रावती हो… सिर्फ चित्रावती… आपकी पहचान आप हो न की ये राजकुमारी का पद या गुरुमा की सिखलाई हुई तुकबंदी.
चित्रावती मेरी तरफ देखते hi जा रही थी उसकी आँखें लग रहा था मेरे जिस्म को भेद कर निकल जाएँगी…
में- ाचा एक बात बताओ की क्या तुक बंदी से आप सब कुछ कह पति हो?
चित्रावती- हाँ सब कह जाती हूँ, सब कुछ बतलाती हूँ..
में- सच में वो सब जो तुम्हारे दिल में होता है, सब कुछ मन की हर एक बात, तुम्हे किस्से दर लगता है किस बात से ख़ुशी मिलती है कैसा लगता है सब कुछ.
इस बार चित्रावती की आँखें मुझसे हटकर. इधर उधर घूमने लगी..
चित्रावती- अगर हम बता भी पाएं तो उससे क्या होगा.
ये पहली बार था जब मेरे सामने चित्रावती ने कुछ बिना तुकबंदी के बोलै था..
में- उससे क्या होगा मतलब?
चित्रावती- मतलब यही की अगर हम कहेंगे भी तो सुनेगा कौन? कौन जानना चाहता है हमारे मन की बात, बड़ी माँ गाओं को अचे से कैसे चलना है इसमें लगी रहती हैं. वो बड़ी माँ बनने में इतनी खो गयी हैं की भूल गयी हैं की वो मेरी माँ भी हैं सिर्फ बड़ी माँ नहीं… दूसरा न हमारा कोई साथी है, बस है तो ये बेजुबान जानवर और ये पेड़ पौधे, अगर हम बोलेन भी तो किस्से बोलेन मन की बात.
मैं उसके इस तरह बोलने से हिल गया.. थोड़ी देर की चुप्पी के बाद बोलै
में- राजकुमारी का तो पता नहीं. पर चित्रावती का तो एक दोस्त है जो उसकी साडी बात सुन्ना चाहेगा..
चित्रावती- सच्ची कौन?
में- एक बहुत hi लम्बा चौड़ा दिखने में बहुत hi सुन्दर बांका नौजवान.
चित्रावती- ऐसा कौन है
में- तुम्हारे सामने खड़ा है..
मेरी बात सुनकर चित्रावती के चेहरे पर मुस्कान आए गयी..
चित्रावती – तो तुम हमारे दोस्त बनोगे सच्ची?
में- हाँ बिलकुल बनूँगा पक्का वाला पर चित्रावती का राजकुमारी का नहीं उससे मुझे दर लगता है..
चित्रावती- मुझसे नहीं लगता.
में- बिलकुल नहीं,
चित्रावती- क्यों?
में- तुम इतनी खूबसूरत हो अछि हो तुमसे क्यों दर लगेगा..
चित्रावती हंसी और बोली- नहीं बुद्धू, हमारा मतलब है क्यों बनना चाहते हो तुम हमारे दोस्त?
में- मैं बस तुम्हे जानना चाहता हूँ..
चित्रावती- तुम तो मुझे जानते हो फिर?
में- नहीं तुम्हे जानना चाहता हूँ, चित्रावती को, तुम्हारे मन की हर बात को, तुम्हारी सबसे अछि यादों से लेकर सबसे बुरी तक, तुम्हारी कर्मियों से लेकर तुम्हारी ताकत तक, तुम्हारे मन में चल रही उथल पुथल, तुम्हारे सपने तुम्हारी प्यारी सी मुस्कान के पीछे का राज. मैं तुम्हे जानना चाहता हूँ.
चित्रावती बस मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी और कुछ सोच रही थी, न जाने उसके मन में क्या चल रहा था पर लग बहुत प्यारी रही थी

उसने ऐसे देखते हुए hi एक कदम लेकर मेरे और करीब आ गयी और बोली- सच्ची?
में- हाँ सच्ची हमेशा के लिए.
चित्रावती- हमेशा के लिए?
और ये कहकर उसने मेरा हाथ पकड़ लिए.. मुझे भी उसका मेरा हाथ पकड़ना बहुत ाचा लगा..
में- हाँ हमेशा के लिए.
मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा कुछ देर तक हम यूँ hi आँखों में देखते हुए खड़े रहे तभी एक पिल्लै के भौंकने की वजह से हमारा ध्यान टूटा.
उसने हंस कर उस पिल्लै को अपनी गॉड में उठा लिए और मैंने एक को और पहिए मैं उससे बोलै- तो अब शुरू हो जाओ
चित्रावती- मतलब
में- मतलब तुम्हारे बारे में जानना है मुझे सब कुछ बचपन से लेकर जो भी याद है सब बताओ.
चित्रावती- सचमें अभी?
में- हाँ अभी…
इसके बाद वो अपने बारे में बताती गयी और मैं सुनता गया जितना उसके बारे में जाना उतना hi उसके लिए लगाव और इज़्ज़त बढ़ती गयी.. हूँ करीब 2-3 घंटे तक बात करते रहे जब तक की हमें खाने पर न बुलाया गया…
इसके बाद क्या हुआ सब अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्






















