Incest Pyaar - 100 Baar - Page 28 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अब कोई खींच तान नहीं भाई लोगो. जो लोग सेंस ऑफ़ ह्यूमर, मेरी ऐटिटूड वाली बात या सीज़ बोल रहे है पहले उन्हें सिर्फ ये समझना चाहिए की हमारी जिम्मेवारी भी होती है कुछ. इस थ्रेड पर कोई मेरे सामने दूसरे राइटर या उसकी कहानी की उपेक्षा करेगा तोह ये मेरा कर्त्तव्य है ऐसे व्यक्ति को तुरंत रिपोर्ट करना और बाकी सभी को भी ऐसे tark-vitark में शामिल होने से रोकना.

कोई ाचा लेखक है तोह मैं सफ के नियम भुला कर खुद हे तारीफ करता हबकि वो कहानी भी पढ़िए. ऐसे हे आप सभी लोग भी मेरी कहानी के थ्रेड पर प्रशंशा करते है तोह मैं आपके साथ उस कहानी पर चर्चा करता हु.

लेकिन नकरात्मक बातें न करनी है न केहनी है.

सेंस ऑफ़ ह्यूमर यहाँ दिखाओ भाई इस कहानी की कमी, लेखक की बुराई सामने करो. यहाँ भी पढ़ना है और उधर फिर अलग व्यक्तित्व दिखाना तोह गलत हे होगा. लेकिन ये भी स्वीकार है मुझे. लेकिन अगर आप दोस्त मानते हो तोह रोकना भी आपका कर्त्तव्य है.

जिसको मेरी बात पसंद आये वो पढ़े. जिसको गलत लगे तोह भाई मैं कुछ नहीं कर सकता. 18+ का मतलब ये बिलकुल नहीं की मैं आहात नहीं होता.

कहानी जारी रहेगी और मैं लिखता रहूँगा. जिसने कुछ बोलना हो वो यहाँ लिखे और माहौल को बिगड़ने की कोशिश मैट कीजिये.

धन्यवाद ?
 
अपडेट 146

अल्फा - (2)


जिसका सुक्ष्म कानन भी सर्वोपरि हो उसका वर्णन खुद ब्रह्मा न कर सके और बनाने वाले विश्वकर्मा भी. Til(sesame सीड) सामान अनु भी उत्तम है तभी वो तिलोत्तमा है. जाने कितने हे असुर उस ख़ूबसूरती पर मोहित हो जान गँवा बैठे और साक्षात देवराज इंद्रा समेत कितने हे देवगण हांसिल करने को बेक़रार. तिलोत्तमा को पाना किसी चह्वाण के वश का न था, वो सिर्फ तिलोत्तमा स्वयं निर्णय ले या फिर कोई ऐसा जिसके लिए वो एक kaam-bhog से बढ़कर हृदय से लगा कर रखने वाली प्रेयसी हो.

वैसाख का ये समय उतना भी उष्मित न था और इस एकांत कमरे में प्रज्वलित हलकी सुनहरी रौशनी जैसे यहाँ उपस्थित इस तिलोत्तमा से फूट रही हो. जहां शान्ति से लबरेज ये माहौल अर्जुन की दिल की धड़कन भी बता देता. यहाँ उसकी मौजदगी आज ख़ास थी जिसमे वो एक निरनय लिए आया था. रेखा का दिल भी समझ चूका था अर्जुन का उद्देश्य और पहली बार उसको अपने बेटे के समीप होने पर घबराहट थी. अर्जुन द्वारा वो 2 कदम का फैसला पूरा करते हे रेखा के महकते बदन पर असंख्य ौंस की बूंदे उभर आयी. घबराहट का असर था या अर्जुन की चाहत, परन्तु स्पष्ट था की रेखा आज अर्जुन को रोकने नहीं वाली था.

वो घने कमर तक आते बालो का अर्जुन के हाथो खुलना हे रेखा की आँखें बंद करवाने के लिए बहोत था. फर्श पर अर्जुन की तरफ पीठ किये कड़ी रेखा की धड़कन आज अनियंत्रित थी. जल्द हे उस मुलायम कंधे पर अर्जुन के तपते होंठो की छुहान ने इस ख़ामोशी को भांग करके का काम किया.

"आठ.. तुम जानते हो न इसका परनिअम क्या हो सकता है.? एकाधिकार चाहते हो मुझ पर?", रेखा की सांसें आज पहली बार अर्जुन के सिर्फ स्पर्श से हे उखड रही थी. संसर्ग पहले भी हुआ था लेकिन आज अर्जुन उन्हें पाने की ठान चूका था. उसके दोनों मजबूत हाथ कमर को सहलाते हुए नाभि पर आ रुके. पूरा जिस्म अपने आगोश में लिए अर्जुन उन महकते गीले केशो की सुगंध सीने में भरने लगा.

"एकाधिकार नहीं स्वयं को सौंप रहा हु आपके पास. आपकी शोषित आत्मा अगर मेरे ऐसा करने से पूर्ण होती है तोह परिणाम की चिंता नहीं. मैं अब आपका हु माँ.", अर्जुन के ऐसा कहने पर रेखा ने हर विचार को परे कर दिए. बीटा अगर माँ को पोषित करना चाहता है तोह साथ देना स्वीकार है. केश एक तरफ करता अर्जुन भी माँ की सहमति पा चूका था. मखमली त्वचा पर रेंगते होंठ गर्दन से गुजरते उन रक्तिम मुलायम गालो पर आ ठीके. अर्जुन हर divya-ras की ौंस सी बूँद ग्रहण करता उस पुष्पित गाल को होंठो में भरने लगा.

यहाँ जैसे संसार रुक चूक था. मजबूत हाथ गहरी नाभि सहलाता उस तरल सामान सम्मोहक जिस्म के उठान तक आ पंहुचा. ये सम्मान से खड़ा ठोस गुम्बद सा उरोज सब्सके ख़ास अंग था रेखा को उत्तेजित करने का. पंजे के घेरे से कही बड़ा और पुष्ट सतांन मजबूत से दबाते हुए अर्जुन ने मोहर लगा दी थी रेखा के स्वामित्व पर.

"आह्ह्ह्ह.. ", इस मादक सिसकी की वजह चूचक से छलकता दूध था जहा अंगूठे और तर्जनी का मर्दन इस gulabi-kathai चूचक को आकर देने लगे. जाहिर था की आज अर्जुन अपनी माँ को बंधनमुक्त प्रेम सफर पर ले जाने वाला था. निरंतर एक मॉटे उभर को मसलता वो दूसरे हाथ से चेहरा अपनी तरफ करता उन मधभरे होंठो को रास भी निचोड़ने लगा. अर्जुन का इस तरह अधिकार युक्त प्रेम प्रदर्शन जैसे रेखा के जिस्म पर ये पहला पुरुष स्पर्श सा था. फर्श पर टपकता दूध और जिव्हा रास में लिपटे होंठो ने दोनों को इस कदर उत्तेजित कर दिए की बचा हुआ वस्त्र एक झटके में चर्र की आवाज करता रेखा के बदन से जमीन पर जा गिरा.

"आज कोई बंधन नहीं माँ और कोई हद्द नहीं. ये आपके जीवन का वही प्रथम क्षण है जिस से आज तक आप वंचित रही.", रेखा का अलौकिक दिव्या स्वरुप वस्त्रहीन हो कर अर्जुन के सम्मुख था. बेजोड़ दुग्ध कलश अपनी क्षमता से अधिक भरी हुए इस श्रेष्ट युवक के चौड़े सीने में दबे थे. बलखाती मेरु (रीढ़) के जोड़ से नीचे व्याप्त वो काल्पनिक से Kaam-gaagar नितम्ब मसलता अर्जुन आज रेखा के हर कानन को अपने वजूद से भरना चाहता था. इतनी जोर से उन मटके से कूल्हों का मर्दन पहले न हुआ था. मुलायम रबर से दोनों कूल्हे मसलता हुआ वो रेखा के ang-ang को पुलकित करने लगा. स्वतः रेखा ने हे अपने होंठो को अर्जुन से मिला दिया. मुखरास बेहटा हुआ होंठो तक आ चला तोह कुछ पल दोनों अलग होते एक दूसरे को देखने लगे.

"तुम मुझे इस स्वरुप में स्वीकार हो अर्जुन बस ये रिश्ता..", अर्जुन ने उन मृगनयनो से पहले हे जान लिया था की वो क्या कहने वाली है.

"ये रिश्ता आपके अनुसार और आपके दायरे में रहेगा. अब मैं वक़्त जाया नहीं करना चाहता, प्यार करना चाहता हु.", अगले हे पल घुटनो पर बैठते हुए अर्जुन ने जड़ से हे शुरुवात कर दी. वो चमकदार बूंदो से घिरी कमलिनी सी योनि का सम्पूर्ण अकार अर्जुन के होंठो में भर गया. इतनी मादक गंध किसी की न थी जितनी रेखा के यौवन से आज बरस रही थी. चुम्बन जल्द हे उन केसरी फांको से कस्तूरी पीने में बदल गया. एक हाथ निरंतर पुष्ट उरोज को मसलता और दूसरा भारी गोलाकार कूल्हों को. कॉमर्स बहती योनि का विस्फोट जैसे दोनों को निहाल कर गया.

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"आह्ह्ह्हह्ह.... उम्.... अर्जुनंनं..", रेखा ने स्खलन के बावजूद अर्जुन को न रोका. उसका सर अपनी योनि पर दबती जैसे वो खुद आज इस सफर के हर पल को जीना चाहती थी, पागलपन की हद्द से परे. उत्तेजना काम होने की जगह बढ़ने लगी तोह अपना दूसरा सतांन वो खुद हे दबाने लगी. टपकता दूध अर्जुन के चेहरे पर गिरने लगा. यहाँ समय से परे हो रहा था सबकुछ. उन्नत जांघो को चूम कर अर्जुन खड़ा हुआ तोह रेखा ने मुक्त प्रेम पर अपनी पहल करि. तराशा हुआ जिस्म अलग हे मादकता से निचे हुआ और अर्जुन की कमर से वस्त्र सरकता जमीन तक ले गया.

"आप..", अर्जुन कुछ कहता उस से पहले हे रेखा ने वो लहराता हुआ ashwa-ling मजबूती से पकड़ते हुए ना में सर हिला दिया.

"प्यार एकतरफा नहीं होता जब दोनों सहमत हो. खुद को सौंप चुके हो न? तोह सवाल नहीं.", आज अपनी माँ के हाथो में खुद का लिंग देख अर्जुन भी चकित था. इतनी उत्तेजना और सुख जैसे पहली बार था. अपनी क्षमता से कही ज्यादा विशाल अकार लिए वो अंग रेखा के हाथो में कही ज्यादा मचल रहा था. लाल दहकता सूपड़ा उजागर होते हे रेखा ने अपने होंठ चिपका दिए. इस हलके चुम्बन ने अर्जुन को एहसास करवा दिया था माँ के समर्पण का. जल्द हे वो जीरो के बल्ब सा मोटा सपड़ा उन लाल होंठो से गुजरता गरम मुख में आ रुका.

"आअह्ह्ह.. माँ... उम्म्म.. आराम से.", मजे की इन्तहा से अर्जुन की आँखें बंद हो चुकी थी लेकिन रेखा के लिए तोह जैसे आज पहली prem-pariksha थी. होंठ बुरी तरह फैले उस कलाई से मॉटे लिंग पर जल्द हे हिलने लगे. नरम जीभ की रगड़ सुपडे को और आनंदित करने लगी, अकार मुँह के अंदर फूलने लगा. जल्द हे आधी लम्बाई मुँह में समाये रेखा ने mukh-maithun की रफ़्तार बढ़ा दी. हलक में लगने के बावजूद वो अर्जुन को उत्तेजना के शिकार पर ले जाती रही.

"बस्स्स...", अर्जुन ने माँ का सर पकड़ते हुए खुद को पीछे खींच लिया. मुखरास में बुरी तरह भीगा सूपड़ा माध्यम रौशनी में कोहिनूर सा चमक रहा था. अर्जुन ने माँ की दोनों गोलाकार नरम बाहें पकड़ते हुए सम्मुख खड़ा कर लिया. चूचक भी दूध बहते दोनों उभारो को भिगो चुके थे और अब अर्जुन अंतिम कदम लेने चला था. माँ के भीगे होंठो को बुरी तरह चूमता वो उन्हें बाहों में भरे इस बिस्टेर पर चला आया. रेखा ने भी खुद को अर्जुन के निचे कालीन सा बिछाते हुए दोनों गुदाज जाएंगे फैला ली.

"आप तैयार है न?", चुम्बन रोक कर अर्जुन ने इतना हे कहा था और रेखा ने उसके दोनों पंजे अपने दुग्ध कलशो पर जमा दिए.

"आज से ज्यादा तैयार तोह कभी न थी. आज वो सुख दो अर्जुन की सवेरा मुझे मेरी ये पहली रात बताये.", रेखा के इतना कहते हे दोनों के होंठ पुनः चिपक गए. दोनों मॉटे उभारो को मसलते हुए अर्जुन ने जांघो के बीच अपने kaam-dand का दबाव बनाया तोह रेखा ने हे लिंग थाम कर अपनी कमलिनी के मुहाने भिड़ा दिया. आज लिंग की मोटाई भी रेखा के जिस्म की तरह चरम पर थी. वो 2 गुलाब की भीगी पत्तिया भी जैसे सिहर उठी थी इस दहकते हुए सुपडे के चुम्बन से. क्षण के सौवे हिस्से में हे अर्जुन ने एक करारा वार कर दिया. तरल से भीगी yoni-surang भी दर्द से भर उठी इस मोटाई और धक्के पर.

"Aahhhh..ummm..", रेखा ये लिंग पहले भी ले चुकी थी पर आज जैसे prem-dard का भरपूर एहसास हुआ था. आधा लिंग बुरी तरह से उस सहेज कर राखी कासी हुई योनि को चीरता अंदर जा चूका था. अर्जुन ने तुरंत हे दूसरे वार में समूचा लिंग प्रवेश करवाते हुए गर्भ तक का रास्ता माप लिया.

"मममम.. आअह्ह्ह.", ये घुटी घुटी सी आवाज रेखा के पूरा होने का सन्देश था. योनि का अंदरूनी मांसल नरम हिस्सा बुरी तरह फैलाये वो भीमकाय लिंग गहराई तक फंस चूका था. होंठ अलग करता अर्जुन भी अब दोनों चुचो को मसलता एक निप्पल चुसकने लगा. साँसे नियंत्रित होते हे रेखा ने कमर को हिलाते हुए एक सिकसरी भरी.

"आप सरोवोत्तम हो... हहहहह..", अर्जुन इतना कहते हे आधे लिंग को बहार खींच कर फिर से अंदर करता हुए रेखा की गर्दन का मांस होंठो में भरने लगा. रेखा के लालिमा चढ़े लम्बे नाखून भी इन जोरदार धक्को से अर्जुन की मजबूत पीठ पर धंसने लगे. हर दुमदार धक्का योनि पटल को जैसे उधेड़ने लगा था. भारी वृषण (अंडकोष) नितम्भो की दरार पर टकराते और योनि रास चूमते. कुछ हे पल में कमरे में बस रेखा की लम्बी आहें और कॉमर्स की महक भर चुकी थी. रबर सी फैली हुई योनि की अंदरूनी गुलाबी रंगत लाल होती हुई लिंग के बहार आते हुए साथ खींची आती.

"आअह्ह्ह.. ऐसे हे .. उम्म्म.. माहहह.. कोई उठ जायेगा.. अर्जुन..", रेखा आवाज रोकना भी नहीं चाहती थी और मजबूरी भी थी. इस सबसे बेखबर अर्जुन तोह जैसे अपनी चाहत के सान्निध्य में जोरदार संसर्ग करता रहा. अब धक्को से बिस्टेर चरमराने के साथ रेखा के स्टैनो की भी भरपूर रगड़े होने लगी. 'Thapp-Thapp' की आवाज कॉमर्स ने बदल कर 'Fachh-Fachh' बना दी. हर बार सूपड़ा गर्भ पर लगता और इतने कॉमर्स से guda-dwaar के साथ बिस्टेर भी भीगने लगा.

"पलट जाओ आप. आह्हः..", अर्जुन की आवाज के बावजूद रेखा को हलकी परेशानी महसूस हुई. योरस से सरोबार लिंग बहार निकलते हे जैसे योनि ने गहरी सांस लेते हुए भरपूर रास बहार उड़ेल दिया. रेखा ने हिम्मत करते हुए करवट ली हे थी और अर्जुन ने मजबूती से वो पतली कमर थाम कर पिछले हिस्से को ऊँचा उठा दिया. वो गोलाकार गोर बेदाग़ नितम्भ चूमते हुए अर्जुन ने दांत गड़ाए तोह रेखा कराह उठी. अर्जुन आज सचमुच उस पर अधिकार जाता रहा था.

"एक मिनट.. अभी मैट डालना.. आठ..", रेखा ने चौपाया मुद्रा में हे ओढ़ने वाली चादर को खिंच कर मुँह में दबा लिया. अर्जुन ने भी इशारा मिलते हे दोनों बड़े कूल्हों के बीच उस गुलाबी रास बहती योनि पर लिंग टिकते हुए एक भरपूर धक्के से पूरी गहराई पार कर दी. उभर कर बहार निकल आयी योनि जैसे हल्का चिर्र हे गई थी. यहाँ 2 बेजोड़ nar-maada का जोरदार मिलान अब तूफानी रफ़्तार चल पड़ा. अर्जुन समागम करने के साथ साथ दोनों चुचो को दबाता माँ की पीठ चूमने लगा. रेखा जैसी अनुपमा को आज अपने स्त्रीत्व का पूर्ण एहसास हुआ था. अर्जुन शरीर के साथ अब आत्मा पर भी नाम लिख चूका.

"ाःह.. धीरे.. काट मैट अर्जुन. .. आठ.. ऐसा प्यार.. आह्हः.", अपनी हे बात गलत साबित हुई रेखा को अर्जुन द्वारा पीठ पर काटकने से. वो उस हिस्से को हल्का काटने के बाद चूमने लगा तोह रेखा जाने कौनसी बार चरमसुख प्राप्त करने लगी थी. बिस्टेर पर दूध की धारे इधर उधर बरसती और उमस भेदने लगी. कनक रुपी वो गुलाबी योनि पौने घंटे के संसर्ग और उस विशाल लिंग से बड़े 'ो' में बदल चुकी थी. Ashwa-shakti सा अर्जुन जैसे जिस्म की हर ऊर्जा इस पल में लगता अविलम्ब धक्के लगता रहा. बिस्टेर के सिरहाने रखा सजावट का सामान बिखर चूका था और लकड़ी के पायो की छू छू का भी अर्जुन पर कोई असर न हुआ.

"आह्हः.. माआ..", अब कही रेखा के इस जोरदार सखलन पर अर्जुन भी घोड़े की तरह हिनहिनाता बुरी तरह रेखा से लिपट गया. जड़ तक लिंग फंसाये वो रह रह कर हिलता हुआ अपने वीर्य की आखिरी बूँद तक गरबड़वार पर उड़ेलने लगा. रेखा उस गरम बौछार से पास्ट हो चली थी. अर्जुन के अलग होते हे रक्तिम सूजी हुई योनि ने सारा वीर्य चादर पर उड़ेल दिया. योनिमुख लिंग बहार निकलने के बाद भी सिक्के से ज्यादा चौड़ा खुलकर सफ़ेद धार बहार निकल रहा था.

अर्जुन ने बराबर लेट कर रेखा को अपने सीने से लगा लिया. न बिस्टेर के भीगे होने की परवाह थी और न बिखरे हुए दोनों के कॉमर्स की. अपने निर्वस्त्र मजबूत जिस्म पर अपनी माँ का फूलो सा नाजुक जिस्म लिटाते हुए अर्जुन उन्हें बड़े प्यार से चूम रहा था. हाथ पीठ और कूल्हों को सहलाते हुए साड़ी थकान मिटने लगे.

"आप सिर्फ प्यार करने के लिए बानी हो और मुझे दुःख है की इतने सालो तक आप सिर्फ और सिर्फ उपेक्षित रही. अबसे आपका पूरा ध्यान मैं रखूँगा और अपनी हर परेशानी आप मुझसे कहेंगी. वादा करता हु की गुजरा वक़्त पूछ कर आपको कभी दुखी नहीं करूँगा.", अर्जुन ने सर को सहलाते हुए कहा. रेखा को आज अर्जुन के ऊपर लेटना इतना भ रहा था की वो कुछ कहना हे नहीं चाहती थी. अर्जुन की धड़कन जैसे उसकी खुदकी हे थी. ये मजबूत जिस्म इस वक़्त उस इंसान का था जिसके सपने विवाह से पहले देखे थे. सिर्फ प्यार और परवाह करने वाला एक खूबसूरत दिल. आँखें मूंदने लगी तोह अर्जुन ने फिर से योनि को सेहला दिया.

"आउच.. अभी और नहीं अर्जुन.. आज ये दर्द कर रही है और मुझे आराम करना hai.",Rekha हमेशा पहल बिस्टेर और बाद में खुद को साफ़ करती थी. लेकिन इतनी तगड़ी चुदाई और उसके बाद अर्जुन के ऊपर आराम करना आज बाकी सब भुला रहा था.

"पता है आप अभी और नहीं कर पाओगी और मैं भी आपके साथ आराम से सोना हे चाहता हु. लेकिन आप नाहा लो माँ और मैं बिस्टेर ठीक कर देता हु. सुबह जवाब नहीं दे पाएंगी अगर दीदी या चची में से कोई अंदर चला आया तोह.", अर्जुन ने दोनों के सामाजिक रिश्ते की याद दिलाई तोह रेखा ने उसके चौड़े सीने पर कोहनी रखते हुए एक गीला चुम्बन दिया और उठने लगी. अर्जुन ने भी एक सतांन को हलके से दबाया तोह वो सिसक पड़ी.

"आह्हः.. इनकी हालत खराब कर दी है तुमने. दूध पिया काम और गिराया ज्यादा है आज.. ये भी दुःख रहे है और वो भी. साफ़ चादर अलमारी से निकल लो तुम, मैं नाहा कर आती हु.", रेखा बिस्टेर से उतरी तोह चाल में लड़खड़ाहट देख अर्जुन मुस्कुरा दिया. दोनों मांसल जाँघे थोड़ी फैलानी पड़ रही थी.

"अभी से ये हाल है तोह सुबह तक हालत ख़राब होने वाली है आपकी.", अर्जुन ने खराब चादर समेत कर स्टोर में रख दी और नयी चादर बिछाने लगा. रेखा ने वो फर्श पे गिरा हुआ गाउन उठाया तोह उसकी हालत अर्जुन को दिखने लगी.

"इसलिए दिलवाया था न तुमने ये गाउन? और मेरी हालत छोडो, खुद भी पजामा पहन लो पहले."

"मंडे को दिलवा दूंगा ढेर सारे जब आप मेरे साथ मार्किट चलोगी. फ़िलहाल दूसरा पहन लो कोई भी.", रेखा ने अलमारी से एक ढीला गाउन निकल कर पहना और टोलिया उठा कर बाथरूम की तरफ चली गयी. अर्जुन सिर्फ पजामा पहन कर बिस्टेर के बीच लेट गया. रात का 1 बज चूका था और शरीर अभी भी जैसे थका नहीं था. थोड़े हे समय बाद उसकी माँ हलके गीले बदन पर गाउन पहने कमरे में दाखिल हुई और दरवाजा लगते हे अर्जुन की बाहों में समां गयी.

"थैंक यू. उमाहहह.", हमेशा अर्जुन को अपनी ब्याह पर सुलाने वाली रेखा आज उसकी बाहों में थी. सोने से पहले दोनों हे हलके चुम्बन करते एक दूसरे को सहलाते रहे और जल्द हे रेखा सुकून से अर्जुन के आगोश में सो चुकी थी. तिलोत्तमा को उसका दिव्या नर प्राप्त हो चूका था इतनी तपस्या के बाद.

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4 बजे घर का मुख्या द्वार खुलने की आवाज पर रामेश्वर जी के साथ साथ नरिंदर जी भी जाग गए. बगल में अपने बड़े भाई को चैन से सोया देख वो मुस्कुरा कर उठते हुए बहार आँगन में चले आये जहा मौसम खुशनुमा था और हल्का अन्धकार भी. जिस्म जैसे प्रफुलित सा हो उठा इतनी प्यार सुबह देख. रामेश्वर जी भी पानी लौटा लिया आँगन में आये तोह नरिंदर को हाथ पांव खोलते देख अपने बेटे पर प्यार आ गया.

"लगता है नींद ाची पूरी हुई है तुम्हारी. वैसे शंकर भी इस समय तक उठ हे जाता है, शायद ज्यादा हे थक्क गया हो कल.", कुर्सी पर बैठ कर वो पानी पीने लगे तोह नरिंदर जी फर्श पर बैठते हुए उनके पंजे को हलके हलके दबाने लगे, जैसा अक्सर वो करते थे साथ होने पर.

"हाँ ाची नींद आयी थी पापा और बनवारी मां वाली चारपाई है भी बढ़िया. वैसे शंकर भी 11 बजे सो गया था मेरे साथ हे. ये अर्जुन हर रोज इतनी जल्दी उठता है क्या?"

"कभी कभी तोह कम्बख्त इस से पहले भी निकल जाता है और दिल न हो तोह 5 बजे घर से निकलता हु जबरदस्ती. आज जल्दी गया है तोह नहर की और गया होगा. उसके बाद अपने गुरुदेव के पास.", इधर कौशल्या जी भी नहाने जाने से पहले नरिंदर के सर पर हाथ फेरते हुए गिलास और पानी की बोतल पकड़ा गयी. गिलास भरते हुए नरिंदर जी ने जैसे और जानकारी लेनी चाही.

"वो नहर पे जाता है तोह आप उसको मन नहीं करते? वैसे हैरानी तोह मुझे भी हुई थी यहाँ आचार्य हंस को देख कर लेकिन उनकी बातों से लगता है के अर्जुन भी बहोत कुछ सीख चूका है अध्यात्म के बारे में. बिना सिक्योरिटी के पहली बार देखा और वो भी माँ के हाथ की चाय पीते हुए."

"हाहाहा.. मेरी तोह पहचान भी बहोत छोटी सी रही थी शास्त्री जी से, पासपोर्ट वाला एक काम था बस बहोत पहले. फिर अर्जुन को वो अपने आप हे मिल गए और अब वैरागी को जैसे नया राग मिल गया अर्जुन के रूप में. बहोत कुछ सिखाते रहते है उसको जो शायद मैं खुद भी नहीं सीखा पता. बेटे ये निस्वार्थ मोह है न, इस से बढ़कर कुछ नहीं. खैर तुम लोग जब नहर में जाते थे तोह स्कूल की दिवार फांद कर और वो भी kam-umar में सिर्फ मस्ती मारने. अर्जुन घडी लेके जाता है और वह भी कोई लक्ष्य बनाये हुए है. 30 मिनट तक वो सिर्फ और सिर्फ अभ्यास करेगा और ऐसा करके वो खुद को हे निखार रहा है."

"और कितना निखरेगा पापा? पहले हे आपने उसको सांड बना दिया है. इन्दर से 3 इंच ऊपर हो गया और शरीर देख कर ग्यारहवीं का कही से नहीं लगता. वैसे आज मैं भी क्लब जा रहा हु स्विमिंग के लिए इन्दर के साथ. देखते है स्टैमिना कितना बाकी है इसमें.", शंकर जी भी इधर आते हे फर्श पर तक लगा कर पसर गए. चाय मिले बिना तोह उन्होंने बाथरूम भी नहीं जाना था.

"ये ले देख ले इस डॉक्टर को. 50 का होने वाला है और स्टैमिना की बात ऐसे कर रहा है जैसे मुकाबला अर्जुन से हो.", रामेश्वर जी ने हँसते हुए हे ऐसा कहा था और उनके साथ इन्दर भी हंसने लगा.

"वो कल का बचा है पापा जो शरीर से बड़ा हो गया बस. अकेले भागो और अकेले जीतो वाली ज़िन्दगी है आपके लाडले की."

"रहने दे भाई बस कर. पापा सही कह रहे है की मुकाबला बनता हे नहीं है. वो हम दोनों से आगे है और ये गर्व करने वाली बात है. तू कॉलेज में नेशनल तक बॉक्सिंग खेला था न, 8 कक्षा से प्रैक्टिस करते हुए? उसने बिना मैच अभ्यास स्टेट चैंपियन हरा दिया डेढ़ महीने की कोचिंग से. अर्जुन का ज्ञान और क्षमता तू बेहतर जानते हुए भी जाने क्यों मानता नहीं है. अब छोड़ ये सब और चाय बना के ले आ.", नरिंदर के ऐसा कहने पर शंकर नखरे से अपने भाई को देखने लगा.

"अब थोड़ी न साहब चाय बनाएंगे. वो तोह स्कूल कॉलेज में जब लालच होता था तब मक्खन लगता था ये चाय बना कर. अब बाप की पेंशन से 100 गुना ज्यादा कमाने वाला डॉक्टर रसोई में क्यों जाने लगा.", अब झेंपते हुए शंकर उठने हे लगा तोह कोमल बिटिया को ट्रे लिए आता देख बैठ गया. सिर्फ 2 कप थे क्योंकि पंडित जी नहाने के बाद पूजा करके हे चाय पीते थे.

"सही कहते हो आप पापा. ये शंकर की बारी में पता नहीं भोलेनाथ ने माँ को क्या दे दिया जो इसको काम हे नहीं करना पड़ता. बैठे बिठाये हे साहब को माँ खिलाती रही और अब काम के लिए भी दर्जनों हाथ घर में हॉस्पिटल में तैयार रहते है. वैसे कोमल भी बड़ी जल्दी उठ जाती है.", चाय का कप शंकर को देते हुए नरिंदर ने अपने भाई से ये कहा था.

"वैसे तोह साढ़े 4 बजे तक बहु उठ जाती है और कोमल भी. आज मेहमान आने वाले है कुछ तोह जल्दी उठ गयी होगी. अब तोह बाकी बचे भी 5 बजे तक उठ जाते है जो 7-8 बजे तक उठते थे पहले. चलो अर्जुन ने सबकी आदत तोह बदली.", इतना बोल कर रामेश्वर जी टोलिया और कपडे लिए बाथरूम की तरफ चल दिए.

"सही है भाई. आरती तोह वह पर कॉलेज जाने से घंटा पहले उठती थी और पिंकी साढ़े 6 बजे तक. यहाँ दोनों हे 5 बजे बिस्टेर छोड़ देती है.", दोनों भाई कुछ देर तक ऐसे हे बातें करते रहे जबतक उनके पिता नाहा धो कर न आ गए.

"जल्दी उठ कर यही बैठना था तुम दोनों ने तोह सो हे जाते. क्लब जाना है तोह दोनों फ्रेश हो कर निकलो फिर दिन में काम भी है.", बाप की झिड़की सुनते हे शंकर जी बहार वाले बाथरूम में और नरिंदर जी अंदर वाले की और निकल लिए.

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"भेड़िये (वुल्फ) को ज्यादातर लोग ाचे से नहीं समझते बीटा लेकिन वो एक कही बेहतर सामाजिक जीव है जो सख्त नियमो से jiwan-yapan करते है. वह झुण्ड 7-8 से लेकर 100 तक का भी हो सकता है लेकिन अनदेखी किसी की भी नहीं होती चाहे वो बूढा हो या बचा. सबसे दिलेर और ताक़तवर को इस बड़े परिवार का मुखिया बनाया जाता है जिसको सहज भाषा में श्रेष्ठ या अल्फा कहते है.", अर्जुन आज नहर जाने की जगह सीध आचार्य जी के पास हे चला आया था. ऐतवार का दिन था और आज उन्हें यूनिवर्सिटी से पौधे भी लाने थे. समय बहोत बाकी था और दोनों हे गुरु शिष्य सुनसान पार्क में गीली डूब पर नंगे पाँव चलते चर्चा में लगे थे.

"आप बहोत जानते है भेडियो के बारे में दादा जी. मुलाकात भी की है कभी उनसे?"

"येल्लोस्टोने में भी मुलाकात की है जहा सबसे बड़ी प्रजाति पायी जाती है और साइबेरिया में भी, जहा सबसे ताक़तवर भेड़िये अपने से कही बड़े शिकारी बाघ (टाइगर) के साथ संतुलन बनाये रहते है. लेकिन हम बात यहाँ कुछ और कर रहे है."

"हाँ और मुझे भी लग रहा है के ये जरुरी है ाचे से समझना. आप बताये जरा इस अल्फा के बारे में.", अर्जुन भी उत्सुक था क्योंकि ये जीव उसने सिर्फ टेलीविज़न पर देखा था कुछ किताबो में. लेकिन जीव विज्ञान अभी भी ज्यादा नहीं टटोला था.

"बाद कर रहे थे उनके सामाजिक जीवन की बेटे. अल्फा सिर्फ ताक़तवर हे नहीं होता, वो हमेशा हे सबके लिए रास्ता बनता है, शिकार पर भी पहला आक्रमण वही करता है और जितने भी बूढ़े सदस्य होते है उनको पूरा maan-samman दिया जाता है. वो हमेशा ऐसी rann-niti का उपयोग करते है शिकार के वक़्त जिस से कोई सदस्य घायल न हो. तुम कुछ वैसी हे स्थिति में हो क्योंकि एक भरा पूरा परिवार है तुम्हारा लेकिन अल्फा तभी बन्न सकते हो जब तुम्हे घरेलु, सामाजिक और rann-niti का पूरा ज्ञान हो जाये."

"मैं अल्फा क्यों बनूँगा दादा जी. पापा और चाचा मेरे से पहले है तोह सही."

"हाहाहा.. कभी कभी न तुम बड़ी हे बचकानी बातें भी कर देते हो. पंडित जी के हिसाब से तुम्ही एकमात्र व्यक्ति हो जिसको हर तरह की जानकारी है और आने वाले वक़्त में परिवार को बनाये रख सकते हो. शंकर एक मजबूत व्यक्ति है इन्दर की तरह लेकिन घरेलु और सामाजिक जीवन में तालमेल नहीं है जैसा पंडित जी का है. राजकुमार एक बेहद हे सरल इंसान है जो सीढ़ी लकीर पर चलने में विश्वास रखता है. वापिस भेडियो पर आते है हम."

"ठीक है जरा मिलाये हमारे तार तोह मैं भी समझू.", अर्जुन ने हँसते हुए कहा तोह आचार्य जी ने कंधे पर हाथ रख दिया.

"भेड़िये के शावक परिवार में हे बड़े होते है और दूसरी बड़ी मादाये भी उनका वैसा हे ख्याल रखती है जैसा taai-chaachi या बुआ. ये माहौल बनाने वाला भी अल्फा हे होता है जिस वजह से झुण्ड का छोटा और बड़ा होना पता चलता है. फिर बात आती है शिकार की तोह सबसे पहले शावक वाली मादाये, बूढ़े और फिर ताक़तवर जवान भोजन करते है. बहार से होने वाले हमले जैसा की भालू या बाघ करते हे रहते है भोजन की कमी होने पर, उसमे भी सामने खड़ा होने वाला अल्फा हे होता है और उसके पीछे उसके सामान हे ताक़तवर सदस्य. सही rann-niti और बुजुर्गो से जवान तक के साथ से भेड़िये 10 में से 5 बार Bhaalu-Baagh का शिकार भी कर लेते है, जो 5 बार विफल भी हुए तोह गलत अल्फा की वजह से. वो थका कर मारते है और मुझे नहीं लगता की तुम अभी भी नहीं समझे होंगे.", आचार्य जी के इतने सही तरीके से बताने पर नासमझ भी समझ जाता था ये तोह फिर भी अर्जुन था.

"हम्म्म.. मतलब हर चीज में सही सदस्य से ज्ञान लेना, गृहस्थी समझना, सबको ek-saar परिवार में बनाये रखना और हमेशा खुद सामने रहना वो भी एक नियोजित नीति के साथ. वैसे कभी भेड़िये आपस में भी लड़ते है क्या?"

"बिलकुल सही समझे. All-rounder वो भी बेस्ट इन एव्री ट्रेड. नॉट लिखे जैक ऑफ़ आल ट्रेड्स एंड मास्टर इन नोने. आपस में तोह कभी कभार झुण्ड की मादा लड़ सकती है लेकिन दूसरे झुण्ड के साथ झगड़ा हो सकता है या फिर कोई अकेला बहार से आये और दावेदारी थोक दे अल्फा के लिए. वह फिर निर्णय 2-2 हाथ करके होता है और अगर अल्फा हार जाये तोह वो अकेला चला जाता है सबकुछ छोड़ कर. बहोत काम हे ऐसा होता है."

"इंसानो के कबीले भी तोह ऐसे हे होते थे न दादा जी पुराने समय में.? बस वह मुखिया ज्यादा हे शान दिखता था.", अर्जुन का मंतव्य समझ कर आचार्य जी थोड़ा खुल कर हंसने लगे जिस पर अर्जुन झेंप गया. वो गलती से हे ऐसा बोल गया था.

"कोई बात नहीं तुम जानकारी वाली बात हे कर रहे हो. ऐसा भेड़ियों से सीखा गया था और राजा की तरह अल्फा भी रौब से हे रहता है बेटे. उसके भी कई संगिनी होती है और बड़े परिवार में उसका एक अलग प्रमुख परिवार भी. अल्फा के समकक्ष हे एक मादा भी होती है जो अधिकतर जनम से साथ हो या पिछले अल्फा की बेवा. अल्फा अपने परिवार की मादाये साथ हे रखता है और नर बड़े होने पर या तोह जोड़ा बना ले या झुण्ड से जा सकते है परेशानी होने पर. हम बहोत बाद में विकसित हुए है अर्जुन लेकिन जानवरो से सीखने के बाद हम गलत इंसान की तुलना जानवर से करके ज्यादा बड़ी गलती करते है. वो तोह शिक्षक और हमारे होने की वजह है भला उनका अपमान क्यों?", अर्जुन के पल्ले सबकुछ पड़ गया था और वो आचार्य जी से भी कही ज्यादा समझ प् रहा था खुद के चरित्र को. अनजाने हे सही वो कुछ इस डगर पर हे तोह चल रहा था. लेकिन साबित करने के लिए बहोत वक़्त था और इसके लिए बेहतर होना जरुरी था.

"तुम ये वक़्त अपनों के साथ व्यतीत करो बेटे और जीवन का विस्तार करने के लिए कुछ समय तुम्हे बहार भी जाना पड़ेगा. बस हमेशा ये याद रखना की प्यार जीवन की आत्मा है और सही फैंसले ज्यादा मजबूत प्यार भरे परिवार का सच. आज इस प्यार ने हे तोह मुझे भी तुम्हारा बुजुर्ग सदस्य बना दिया है.", आचार्य जी ने जब खुद को भी अर्जुन के परिवार का सदस्य बताया तोह उसने अपनेपन से उनका हाथ थाम लिया.

"इंसान विकसित हो चुके है दादा जी और अब तोह छोटे परिवार में हे 2 दावेदार बन्न जाते है श्रेष्ट की होड़ में. बहार से खतरा बरक़रार हो और ऊपर से खुद हे घर के 2 हिस्से करके अपने आप को लाचार कर लो. मैं हमेशा मेरे दादा जी को श्रेष्ठ मानता हु जिन्होंने ऐसा कुछ कभी महसूस हे नहीं होने दिया एक भी व्यक्ति को. पिछले कुछ महीनो में ढेरो परिवार देखे जहा उन्हें हे सबकुछ चाहिए और या तोह अपनों को मार गए, या खुद मारे गए. परिवार की एहमियत समझते तोह अपनों से हार जाते लेकिन सबकुछ बरकरार रहता. वो प्यार, ताक़त, सम्मान और वजूद. मैंने यही सीखा है और मुझे आज समझ आया की संजीव भैया ने भी क्यों सबकुछ मेरे हवाले कर दिया.", अर्जुन अब अपनी बात बताने लगा था और आचार्य जी बड़े ध्यान से सब सुन्न रहे थे.

"पहले दादा जी ने ऐसा किया था फिर दादी जी ने भी. बच गए चाचा और ताऊजी तोह उन्होंने भी सबकुछ मेरे हवाले कर दिया. कहने को तोह लगता है की मैं सबका मालिक बन्न गया लेकिन उन्होंने मुझमे वो देखा होगा जो इस संपत्ति और पूर्वजो की धरोहर को संभाल सकता है. कभी ध्यान हे नहीं गया की अनजाने हे मैं कब जिम्मेवार बन्न गया."

"ये है विश्वास, प्रेम और हीरे को तराशना. तुम्हारे साथ ठीक वैसा हे तोह परिवार है और सभी लोग तुमको निस्वार्थ मजबूत इंसान के रूप में देखना चाहते है लेकिन वो सभी साथ है तुम्हारे. इसलिए तोह आज ये भेड़िया वर्णन किया. तुम अपने हुनर को और निखारो मेरे बचे, कड़े फैंसले भी लिए जाएंगे तुम्हारी बेहतरी के लिए जिस से आने वाले समय में तुम्हारे पिता और दादा जी को मान हो की उनके विश्वास और प्यार को सम्मान देने वाला सचमुच एक अल्फा है. हाँ वो राजा वाली बात व्यक्तिगत है जिसका निर्णय व्यक्तिगत है बस क्षमता पर फरक नहीं पड़ना चाहिए.", अर्जुन आज दूसरी बार शरमाया था उनकी बात पर और ऐसे हे हलकी फुलकी बातें करते दोनों वापिस घर की तरफ चल दिए. यूनिवर्सिटी जाने के लिए कार जो चाहिए थी.

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"क्या बात है रेखा आज बहोत अलग लग रही है तू? तबियत ठीक है न तेरी?", नाश्ता बनाते हुए ललिता जी ने अपनी देवरानी को असहज रूप से चलते देख कर पूछ हे लिया. अब रेखा जी क्या जवाब देती उन्हें की रात को अर्जुन ने बिस्टेर के साथ उनका भी पुर्जा पुर्जा हिला दिया. जांघो के बीच आयी हलकी सूजन की वजह से तोह कच्ची पहन न भी दूभर था और खुला रखने पर भी चलने पर होती रगड़ अलग सी मस्ती भर रही थी.

"हाँ माँ और आज तोह आप उठी भी 5 बजे. तबियत ठीक नहीं है तोह आप आराम कर लीजिये, मैं और ताई जी कर लेंगे सब काम.", कोमल अंदर चली आयी थी जो बहार सबको नाश्ता परोस रही थी. अर्जुन अभी तक नहीं आया था और उसने अपने दादा जी को फ़ोन पर बता दिया था की आचार्य जी के यहाँ वो पौधे लगवा रहा है.

"ऐसा कुछ भी नहीं है. तबियत बिलकुल ठीक है बस जांघ की नस चढ़ गयी थी थोड़ी तोह ीोडेक्स लगा ली."

"ीोडेक्स का असर है ये? हाहाहा.. वह तेल मालिश करनी थी पगली, ये ीोडेक्स अलग हे कमाल कर देती है जरा सी इधर उधर हुई तोह.", ललिता जी के कहने का तात्पर्य समझते हुए रेखा जी का चेहरा जो पहले से हे दमक रहा था वो गुलाबी हो गया. कोमल बिना कुछ बोले शर्माती हुई पराठे लिए बहार निकल चली.

"कुछ भी कह देती हो आप दीदी. देखो कोमल भी समझ गयी.", रेखा जी खुद चूल्हे के सामने बैठते हुए भी शर्मा रही थी लेकिन हंसती हुई ललिता जी ने अपनी देवरानी की गर्दन पर बना वो हल्का सा निशाँ देख हे लिया. वो रेखा को ाचे से जानती थी इसलिए आगे कुछ नहीं बोली. उन्हें यही लगा की रात शंकर ने चढ़ाई की होगी और utt-pataang मुद्रा बनवाते हुए टांग मदद गयी होगी.

"वैसे कही शंकर ने गुलाबो की बहिन पर तोह वार नहीं कर दिया कल रात.?", रुकी वो फिर भी नहीं चुहल करने से और इस बीच कृष्णा जी भी अंदर चली आयी. बेशक काम की मनाही थी लेकिन बैठ सकती हे थी. रेखा जी तोह पहले हे झेंप रही थी ऊपर से कृष्णा जैसी बड़ी बहिन के आने पर सर झुका लिया.

"अब ये तोह पता नहीं की गुलाबो पर हुम्ला हुआ या भूरी पर लेकिन कुछ गिरने की आवाज तोह जरूर आयी थी.", अब कृष्णा जी ने अलग हे जीकर छेड़ दिया था.

"ऐसा कुछ भी नहीं हुआ दीदी. रात मेरे पास अर्जुन सोया था और नहाने के बाद नींद नहीं आ रही थी इसलिए किताब पढ़ने लगी. 12 के बाद बस थोड़ा पाँव फँसल गया तोह बीएड के सिरहाने राखी अलार्म घडी गिर गयी थी. नस भी तभी खींची तोह ाचे से सो न सकीय. ये तोह अब बैठक में सोते है इसलिए बचे मेरे पास सोने आ जाते है.", रेखा जी ने आधा सच और आधा झूठ कहा था. वो किसी नयी प्रेमिका की तरह अपने मिलान को छिपा रही थी और दोनों ने सच मान लिया.

"बुला लेना चाहिए था न रेखा अगर इतनी दिक्कत हुई थी तोह. इस अर्जुन की खबर तोह मैं लेती हु, जो माँ का ख़याल तक नहीं रख सकता.", कृष्णा जी के ऐसा कहने पर रेखा जी ने अपनी जेठानी की तरफ देखा और जवाब दिया.

"इतनी रात को आपको बुलाने आती तोह वो जाग सकता था और उसको बताती तोह ठीक नहीं लगता. वो जिद्दी है और नस गलत जगह खींची थी. अब आराम है दीदी. आप परेशां मैट हो. ये दीदी भी मजे लेने से पीछे नहीं hat-ti.", रेखा को अपनी तरफ बात घूमते देख ललिता जी ढिठाई से हंसने लगी.

"रेखा तेरी जगह मैं होती तोह उठा देती पेटीकोट अर्जुन के सामने. नस उतरने में माहिर है मेरा लल्ला और वो दर्द दूर कर चूका है मेरा पहले भी. तू याद रखियो कृष्णा, कभी कही khinch-taan हो जाये तोह पसर जाइयो उसके सामने. बड़े प्यार से ठीक करेगा और फिर कभी ीोडेक्स या डॉक्टर वैध की जरुरत न पड़ने वाली.", ललिता जी की दिवार्थी बात वो भी अपने बेटे के लिए सुन्न कर रेखा तोह बस पानी हो गयी लेकिन कृष्णा को तोह इसमें भी मजा आ रहा था. वो पढ़ी लिखी होने के साथ हे स्वच्छंत मजाक समझती थी देवरानी जेठानी का.

"और किस से कहूँगी दीदी. अर्जुन ने तोह पहले हे मुझे आज ज़िन्दगी जीना सीखा दिया है. फिर पेटीकोट उठाना हो या ब्लाउज, नस चढ़ी तोह मैं उसको हे बुलाऊंगी. इन्हे तोह मैंने पहले हे कह दिया के वो मेरी देखभाल कर सकता है और करता रहेगा. हाँ ये रेखा ऐसी हे है जो हर बात पर गर्दन झुका लेती है. अर्जुन को आने दो मैं खुद हे कहूँगी की अपनी माँ की नस उतार जरा.", कृष्णा के साथ ललिता जी भी जोरो से हंसने लगी थी लेकिन कौशल्या जी के आगमन पर दोनों हे खामोश हो गयी. रेखा आज पहली बार nav-vadhu सी शर्मा रही थी जैसे सुहागरात के बाद आज वो फांसी हो.

"धर्मवीर भाई साहब आने वाले है थोड़ी देर में और उनकी बहु के साथ रूचि बिटिया भी होंगी. भाई साहब के लिए रेखा तू जरा मूंग की दाल रख दे और कृष्णा तू चल के नाश्ता ले उसके बाद दवा भी लेनी है. अर्जुन भी आ गया है और बहार नाहा रहा है. रेखा कपडे देके काम कर लेना.", आज तोह अर्जुन को कपडे देने वाली बात भी अलग हे उमंग जगा रही थी रेखा में. कही हाथ पकड़ कर अंदर हे न खींच ले. फिर अपनी सोच पर हे हंसती वो ख़ामोशी से कड़ी हो गयी.

"अभी दे आती हु माँ जी. दीदी आप उसका नाश्ता लगाओ फिर मैं दाल रख दूंगी.", रेखा की चाल देखते हुए कौशल्या जी ने ललिता की तरफ इशारा किया. रेखा जैसे तैसे सावधानी बारात कर बहार निकल चली.

"नस खिंच गयी थी रेखा की माँ जी कल रात. देर तक किताब पढ़ रही थी और फिर पाँव फँसल गया. आवाज तोह कृष्णा ने भी सुनी थी."

"अब ये भी गिरने लगी है. ध्यान से रहने को बोल जरा इसको और अर्जुन को कह देना दवा करवा लाएगा. शंकर इन्दर तोह दौड़ गए घर से ऋचा का आना सुनते हे.", कौशल्या जी जिसको ध्यान रखने का बोल रही थी वो हे जिम्मेवार था. इन सबको कहा पता था की अगर इस बार वो रेखा के करीब आया तोह वो बिस्टेर से उतने भी नहीं वाली.
 
Raja chouhan यही है भाई. मेरा लाडला है लेकिन मंदबुद्धि. इसको भेजता हु मैं मधुलता के पास . समझता हे नहीं यार.
 
ट्यूसडे थर्सडे एंड सैटरडे स्टोरी फ्लो में रहेगी. संडे सिर्फ चुदाई
 
अपडेट पोस्ट करते हुए 11 बज सकते है दोस्तों. डिनर से फारिग होने के बाद सोना चाहे तोह नींद ले लीजियेगा. घर पर रिश्तेदार आये हुए है जो भोजन के बाद हे वापिस जायेंगे. ऐसे में लैपटॉप तक जाना जोखिम भरा काम है.

कुछ रीडिंग के बाद अपडेट पोस्ट कर दूंगा. निशाचर मित्र प्रतीक्षा कर सकते है. अपडेट जरूर दूंगा.
 
अपडेट 147

अल्फा - (3)


आज बड़ी बैठक का नजारा बहोत अलग था और table-sofa हटा कर वह दरी और गद्दे बिछे थे. धर्मवीर सांगवान जी ने भी अपनी पसंद का नाश्ता बड़े चाव से किया था. उनके साथ धर्मपत्नी यशोदा जी, बहु ांनी, पौती मरीना और बिटिया रुचिता उर्फ़ रूचि भी आये थे. कौशल्या जी ने ाचे से खात्री की थी बहु और बेटी की. वही मरीना को तोह अलका और प्रीती के रूप में ख़ास सहेलिया मिल गयी थी. अभी वो बाकी सबसे नहीं मिली थी लेकिन इतना bhara-poora परिवार देख बहोत खुश थी.

बैठक में 10 बजते हे जय नारायण जय महादेव के साथ अपने चरण इन तेजस्वी से साधू ने रखे, जिनकी सही उम्र का कुछ अंदाजा न था. 6 फ़ीट लम्बे, गहरा रंग और श्वेत धोती और वैसे हे निर्मल वस्त्र का कुरता सीने पर, गले में tulsi-rudraksh धारण किये और ललाट पर चन्दन का ऊँगली जितना लम्बा तिलक. कौशल्या जी हाथ जोड़ कर उन्हें अंदर ले आयी और साफ़ दीवान पर विराजने का अनुरोध किया.

"बिटिया, हम बेटी के घर ऊपर नहीं बैठ सकते. देख कर अत्यधिक ख़ुशी हुई की उद्यान से शुरू होता ये संसार इतना prem-maye हैं की स्वर्ग भी ऐसा न हो. रामेश्वर, बैठ जाओ बीटा.", वो जिस प्रकार से उन्हें मान दे रहे थे प्रतिउत्तर में साधू भी दोनों pati-patni को आशीर्वाद देते हुए दीवान के निचे हे राखी गद्दी पर विराजमान हो गए, जो उनके चरणों के लिए वह राखी गयी थी. यशोदा जी ने भी हाथ जोड़ कर उनके पाँव छूने की चेष्टा की तोह उन्होंने मुस्कुराते हुए खुद हे यशोदा जी के पाँव पर दोनों हाथ रख दिए.

"बिटिया मान होती है जो हमेशा पिता के सर पे रहता. यशोदा ऐसी भूल मैट करना और धर्मवीर तुम्हे अलग से निमंत्रण देना पड़ेगा?", झेंपते हुए वो दोनों भी हाथ जोड़ कर बैठ गए. इधर से घर के अंदर वाला द्वार बंद हे था बस आँगन वाले दरवाजे के दोनों कपाट पूरे खुले थे.

"20 वर्ष बाद दर्शन हुए है महाराज आपके और एक पल मिलने वाले के नाम आज तक याद है?", ये धर्मवीर जी ने कहा था, अभी भी हाथ जोड़े वो रामेश्वर जी की बगल में बैठे बस इन साधू को हे निहार रहे थे.

"परिचय तोह एक हे पल का होता है धर्मवीर, उसके बाद सम्बन्ध बन्न जाते है. ये कौशल्या 8 बरस की थी जब इसने हमारे घाव पल मलहम लगाया था और अगली मुलाकात इसके विवाह की चर्चा वाले दिन हे हुई थी, मोतीलाल और कांशीराम का परिचय हमने हे करवाया था. जीवन यही तोह है बीटा, परिचय हो जाये तोह विस्तार करो. ख़ुशी हुई तुम दोनों भी इनकी तरह संपन्न हो और प्रभु नारायण हमेशा सभी को ऐसे हे परिवार से बांधे रखे.", साधू महाराज ने एक नजर द्वार की तरफ देखा तोह वह 5-6 लोग देख उन्होंने आने का इशारा दिया.

शंकर, नरिंदर, राजकुमार, छोल साहब के साथ संजीव भी अंदर चला आया. यहाँ महाराज को ये लोग ज्यादा नहीं जानते थे बस शंकर इन्दर उनसे 3 बार मिल चुके थे.

"तोह अब भी सर दुखता है तुम्हारा शंकर?", शंकर तोह इतना सुनते हे उनके पाँव पर हाथ रख के नतमस्तक हे हो गया. बड़े स्नेह से वो उसका सर सहलाते रहे और फिर इन्दर और संजीव ने भी वैसा हे किया.

"अब तोह कभी साल या 2 साल में हे कभी दर्द करता है. आपने जीवन दिया है तोह इतना दर्द कुछ भी नहीं.", शंकर की बात सुन्न कर कौशल्या जी की आँखें नम्म हो गयी.

"तुम्हारे mata-pita और उस भगवन ने वो पीड़ा हरी है पुत्र, हम बस अपनी बिटिया से मिलने आये थे उस दिन. और अज्ञातवास से कब वापिस आये इंदरजीत?", ये कहते हुए महाराज ने कुर्ते की बगल वाली जेब से एक रतन निकल कर नरिंदर की हथेली पर रख दिया. गुलाबी रतन किसी सफ़ेद चने जितना बड़ा था और हीरे सी चमक.

"अब maa-papa के पास हे रहूँगा बाबा. लेकिन आप ये मुझे क्यों दे रहे है?"

"तुम अशांत हो इंदरजीत और कोशिश करना mata-pita के पास हे रहो. ये सतीश के भी बाल उड़द गए?", छोल साहब का जीकर हुआ तोह वो झेंप गए और नरिंदर चुपचाप एक तरफ पीछे बैठ गया अपने भाई के साथ.

"आपकी कृपा ज्यादा नहीं हुई न महाराज. प्रणाम.", छोल साहब जिंदादिल व्यक्ति थी लेकिन इस वक़्त चेहरे पर दुःख झलकने लगा था जैसे इन महाराज के सामने हर व्यक्ति की असलियत अपने आप हे बहार उजागर हो जाती थी.

"तुमने बहोत कुछ झेला है सतीश लेकिन हमारे लिए तुम सही मायने में रामेश्वर के लक्समन हो. अब दुखो के बादल हट चुके है. तपस्या का फल जल्द मिलने वाला है. कौशल्या बिटिया चाय नहीं पिलवाओगी?", महाराज ने छोल साहब को आशीर्वाद देने के बाद कौशल्या जी से चाय का आग्रह किया तोह वो क्षमा मांगती हुई तुरंत उठ कर बहार वाली तरफ से हे घर के पिछले आँगन में चल दी.

"इतने वर्षो बाद आपको याद आयी बाबा?", पहली बार रामेश्वर जी ने कुछ कहा था और वो महाराज बस मुस्कुरा दिए.

"बीटा, संसार में अब इतने परिचित है की सबसे मिलने में वक़्त लग हे जाता है. वैसे ये सरकारी नौकर क्या लगते है तुम्हारे?", इशारा संजीव की तरफ था उनका और वो थोड़ा हैरानी से कभी महाराज तोह कभी अपने दादा को देखने लगा.

"राजकुमार की ज्येष्ठ संतान है बाबा, संजीव शर्मा. इस महीने हे 21 तारिख को इसका विवाह है, बाबा.", अब अपने दादा द्वारा परिचय देने पर संजीव उनके सम्मुख हाथ जोड़ कर बैठ गया था. वो बड़े ध्यान से संजीव के चेहरे को देखते रहे और एकाएक उसका हाथ थाम लिया. संजीव भी उनके तेजस्वी चेहरे को बस देखता हे रहा और नजरे अपने आप हे निचे हो गयी.

"इतना समर्पित कैसे हो सकता है कोई? राजकुमार तुम्हे अपने पिता की छाया से बहार आने में कितने बरस लगे है लेकिन ये देखो जो एक जवान रामेश्वर हमारे पास बैठा है. ये मान है इस परिवार का तोह उचित स्नेह देना भी जरुरी है.", राजकुमार जी के तोह चेहरे पर नमी आ गयी थी. सच हे था की संजीव को वो कभी उतना प्यार नहीं दे सके थे जबकि वो घर की पहली संतान था. बीटा कब अफसर बन्न गया और जिम्मेदारिअ उठाने लगा था उन्होंने इसका एहसास भी नहीं किया था.

"अब कोई गलती नहीं होगी महाराज."

"जीवन चलने का हे नाम है राजकुमार. व्यथित मैं से भी कही कोई सफल हुआ है. अतीत से बहार आओ पुत्र और सबके साथ शामिल राहु.", आज संजीव की आँखों में भी पानी आ गया था और महाराज उसका सर सहलाने लगे जिस से वो आंसू कही ज्यादा हे tapp-tapp करते हुए निचे गिरने लगे थे. वो मजबूत इंसान बेआवाज बस रोटा हे रहा लेकिन अपने दादा का हाथ कंधे पर महसूस होते हे रुमाल से चेहरा साफ़ करता हुआ बहार निकल गया.

"हल्का होना भी जरुरी है व्यक्ति को. रामेश्वर, कितने पौता पोतियों का सूखा मिला है तुम्हे?"

"राजकुमार से संजीव के साथ साथ 2 पुत्रिया है बाबा. शंकर की 3 पुत्रियां और एक पुत्र है. नरिंदर के 2 पुत्रिया लेकिन शंकर का बीटा भी उसका साँझा है. मधु की बिटिया के जनम पर आपने हे नाम दिया था तारा, उसके बाद एक बीटा है. भगवान् नारायण ने इस परिवार को हरा भरा रखा है बाबा और मुझे पूरा सुकून मिलता है अपने bacho-pariwar के साथ.", रामेश्वर जी ने पूरी जानकारी देते हुए भी हाथ जोड़े रखे थे.

"ये जरा सांझे पुत्र से मिलवाओ तोह हमे. और धर्मवीर बीटा तुम्हारे दोनों बचे सुखी है?", महाराज ने अर्जुन से मिलने की इत्छा जताने के साथ हे बड़े सांगवान जी को भी पूछ लिया.

"जी बाबा. परम से एक पौती के रूप में जीवन का बेशकीमती नगीना मिला है मुझे, मरीना. आयी है यहाँ और रुचिता भी 2 बचो की माँ बानी है. एक लड़का और एक लड़की. बचे तोह नहीं लेकिन बिटिया भी साथ आयी है यहाँ."

"सतीश."

"महाराज, पौती प्रीती हे मेरे साथ रहती है. बिटिया का vivah-vicched हो गया तोह उसकी संतान दूसरे हे घर रख ली गयी. वो गर्भवती है अभी.", छोल साहब अब दुखी नहीं थे.

"मिलवाओ अपनी पौती से. हम मिलना चाहेंगे उस देवी से जो अपने दादा का सहारा बानी हो.", अभी उन्होंने प्रीती से मिलने की इत्छा जताई थी और कौशल्या जी के साथ वही ट्रे में एक बड़ा गिलास चाय का लिए अंदर चली आयी. सफ़ेद सलवार कमीज और सर पर दुपट्टा लिए प्रीती की सादगी और सुंदरता लाजवाब थी. कौशल्या जी ने चाय का गिलास और वो बड़ी कटोरी महाराज के सामने खुदसे हे राखी.

"बाबा, ये प्रीती है. सतीश भाई साहब की पौती और मेरे घर की होनेवाली दूसरी बहु. शंकर के बेटे के साथ इसका रिश्ता तये किया था बहोत पहले हे.", कौशल्या जी ने प्रीती का भी परिचय करवाया जो साधारण तरह से नमस्ते करते हुए शर्मा रही थी.

"श्रेष्ठ निर्णय. ये बहोत ाचा किया तुमने रामेश्वर जो इतनी प्यारी बिटिया को पौटे के लिए पसंद किया. बिटिया, तुम खुश हो न?", यहाँ प्रीती के चेहरे पर सिर्फ ख़ुशी और शर्म हे थी और उसने हाँ में सर हिला दिया.

"बचे साथ हे बड़े हुए है बाबा और पसंद भी करते है एक दूसरे को. सतीश के साथ साथ सभी को यही ठीक लगा तोह हमने भी ये फैंसला किया की रिश्ता कर दिया जाये. पढ़ाई पूरी होने के बाद विवाह हो जायेगा.", अब प्रीती वह और न रुक सकीय. उसको शर्मा के बहार जाता देख महाराज भी मुस्कुरा दिए. अर्जुन ऐसे हे ghoomta-firta हुआ इधर चला आया था और साथ आने वाले संजीव ने भी उसको नहीं बताया था के अंदर कौन है. सामने विराजमान साधू महाराज को देख वो थोड़ा हैरान हो गया.

"अरे. आपको तोह मैंने थोड़े दिन पहले वह क्सक्सक्सक्स शहर में देखा था, कबूतरों को दाना खिला रहे थे.", अर्जुन ने पंजाब का जीकर किया था और वो बिना किसी के चेहरे के भाव देखे उनके सामने चलता आया और चरण स्पर्श करते हुए फिर से चेहरे को देखने लगा. महाराज ने उसका हाथ थाम कर सामने बैठा लिया. अब अर्जुन ने अपनी दादी के चेहरे पर नाराजगी देखि और कुछ वैसा हे पीछे बैठे पिता के.

"हाहाहा.. कैसे हो कृष्णा? हमने भी देखा था तुम्हे लेकिन बात नहीं हुई क्योंकि.."

"क्योंकि भोजन करवाते समय बातें नहीं करते. वैसे मेरा नाम अर्जुन है, अर्जुन शंकर शर्मा.", अर्जुन ने बात हे बीच में काट दी तोह महाराज ने हँसते हुए एक हाथ पकडे रखा और गिलास से कटोरी में आधी चाय दाल कर अर्जुन के दूसरे हाथ में पकड़ा दी.

"बड़े दिलचस्प व्यक्ति हो पूर्ति. बिलकुल सही कहा तुमने और हम भी इसलिए नहीं तुम्हारे करीब गए. वैसे हो तोह तुम कृष्ण हे बीटा जो हमसे ज्यादा भली भांति तुम खुद जानते हो. अर्जुन नाम को सार्थक करने में समय लगेगा तुम्हे लेकिन रामेश्वर की छाया में कर हे डोज.", एकके ये पंक्ति उन्होंने गंभीरता से कही थी और कभी चाय के हाथ तक न लगाने वाले अर्जुन ने प्याली से चाय का घूँट भर लिया.

"दोनों अलग थे क्या?", अर्जुन के इस सवाल को सुन्न कर महाराज ने भी चाय का घूँट भरते हुए कुछ पल कोई जवाब न दिया. गिलास एक तरफ रखने के बाद कौशल्या जी से सफ़ेद कपडा लेते हुए हाथ पांच कर वो बोले.

"एक हे तोह थे वो. बस कभी कभी 2 स्वरुप जरुरी होते है जिस से बेहतर काम किये जा सके. आएगा तुम्हारा भी समय जब तुम्हे खुद को हे बताना होगा के तुम्हारा सच क्या है और जीवन का उद्देश्य क्या. इतने निश्चिंत रहो. तुम्हारे होने वाली धर्मपत्नियाँ भी नियति से अलग अलग गुण रखती है, तुम्हारी असली शिक्षक वही होंगी. जाओ तुमसे हम फिर मिलेंगे.", खुद हे महाराज ने अर्जुन को जाने के लिए कहा जैसे वो जानते हो की अर्जुन किसी और फेर में है. लेकिन एक से अधिक पत्नी वाली बात सुन्न कर वह बैठे सभी के चेहरों पर हैरत थी. कुछ जानते भी थे की इशारा कहा है लेकिन बोल नहीं सकते थे और जो अनजान थे उन्हें अर्जुन के चरित्र पर पूर्ण विश्वास था.

"क्षमा चाहता हु बाबा लेकिन मेरा पौता आपसे परिचित था? क्या उसको भान भी था वो किनके सामने बैठा sawal-jawaab कर रहा है?", रामेश्वर जी ने ये अलग हे बात कही थी जबकि सबको लगा था वो जरुरी जानकारी लेंगे.

"वो यहाँ किसी के बुलाने पर तोह नहीं आया था न रामेश्वर. हमसे नजरे मिलते हे चला आया और एक मित्र के रूप में हमको ये कृष्ण स्वीकार है. वनवास तोह अर्जुन के रूप में मिलेगा इस बचे को, तुम्हारे हाथ. हम चलते है और प्रभु नारायण घर के सम्पूर्ण कार्य निर्वघ्न करे. कौशल्या, मिल आना अपने प्रभु से और गरीबो को भोजन करवाना परिवार के हरेक सदस्य के हाथो और ये नहीं जाए तोह कोई जबरदस्ती मैट करना.", महाराज अपने स्थान से खड़े हो गए और उन्हें जैसे ये भी पता था की अर्जुन मंदिर नहीं जाने वाला.

"मंगलवार को हे ये शुभ काम कर देंगे बाबा. वैसे वो बहु.."

"एक हे स्वरुप से कितने भी विवाह कर लो, क्या फरक पड़ता है. बस उसके साथ रहना बिटिया. करम किसी और के, सजा मासूम को.", वो अपनी बात कहते हुए थोड़े चिंतित नजर आये और उनके कदम आँगन तक बढ़ने के बाद प्रीती के पास Alka-Ritu और मरीना को देख रुक गए. बाकी सभी उनके पीछे हे आये थे.

"सदा खुश रहो.", चारो लड़कियों को आशीर्वाद देते हुए उनकी नजर रुस्सिना मरीना से आगे अलका पर गयी और फिर प्रीती पर. ऋतू को देखते हे मुस्कुरा उठे और कुछ पल बस उसके सर पर हाथ रखने के बाद वो बहार कड़ी अम्बस्सडोर कार की पिछली सीट पर विराजमान हो गए. जाने से पहले सिर्फ कौशल्या जी को आशीर्वाद दिया, चाय के पैसो के साथ.

"ये बाबा कौन थे पापा?", ऋतू के सवाल पर मरीना भी अपने चाचा को हे देखने लगी.

"माँ को बेटी मानते है और सिद्धपुरुष है बेटी. मैं कभी या साधु या बाबा लोग में नहीं मानता था लेकिन ये जो भी कहते है वो हमेशा सच हे हुआ है. मेरे लिए तोह भगवान् हे है. वैसे तुम्हे बड़े ध्यान से देख रहे थे और ये अर्जुन कहा चला गया?"

"उसको देखने हे आये थे लेकिन वो कार ले कर जाने कहा निकल गया. वो क्या इतने बुजुर्ग थे जो दादी को बेटी बोलते है?", ऋतू के इस सवाल पर पीछे से अंदर आती हुई कौशल्या जी ने कहा.

"वो तेरे पड़ दादा जी से भी कुछ साल बड़े हे होंगे. और ये तुम दोनों के लिए दिया है उन्होंने, ध्यान से अपने पास रखना.", कौशल्या जी के ऐसा कहने पर सभी लड़कियों के मुँह खुल गए उनकी उम्र का अंदाजा लगते हुए. लेकिन ऋतू और प्रीती ने जब अपने हाथ में कौशल्या जी द्वारा दिए सोने के छले देखे तोह और हैरत हुई. वो ऊँगली में पहने जानी वाली अंगूठी से थे लेकिन सिर्फ ऋतू और प्रीती को दिया जाना हैरानी की बात थी.

"सिर्फ हम दोनों को हे दिए? ये ले अलका मेरे वाला तू रख ले.", ऋतू ने दादी के सामने हे वो छल्ला अलका को देना चाहा तोह अलका ने अपने हाथो वो ऋतू की ऊँगली में पहना दिया.

"तेरा है और तू दादी की बात मा लिया कर चुपचाप. तुम भी पहन हे लो प्रीती.", अलका के ऐसे करने से कौशल्या जी ने स्नेहवश उसका गाल सेहला दिया. अब सभी लड़कियां वापिस अपनी जगह चली गयी थी और bujurg-mandali बैठक में कीर्तन की वजह से छोल साहब के घर.

"शंकर क्या सोच रहा है तू? कुछ दुविधा है क्या मैं में?", अपने बेटे को गहरी सोच में देख कौशल्या जी ने इस एकांत में सवाल किया तोह शंकर तुरंत हे बोल उठा.

"आप खामोश क्यों रही माँ? मानता हु उन्होंने मेरा इलाज करके ये ज़िन्दगी दी है मुझे लेकिन सवाल तोह कर हे सकती थी की अर्जुन का जो भविष्य वो बता रहे है उसका परिणाम कितना बुरा होगा. आपने मेरे सामने हे ऋतू को वो दे दिया जो सिर्फ सास का हक़ होता है?"

"उन्होंने कुछ और भी कहा था शंकर. किसी और के करम की सजा अर्जुन भुगतेगा और बुरे करम पिछली पीढ़ी से अगली पर असर करते है. मुझे नहीं पता के तूने ऐसा क्या किया होगा लेकिन इतना जरूर समझ गयी हु की अर्जुन का वनवास जाना और वो विवाह तेरी हे वजह से होगा. लेकिन अगर नियति ऐसा चाहती है तोह तेरा विज्ञान और मेरा धरम करम भी उसको बदल नहीं सकता.", कौशल्या जी आँखें आज दूसरी बार भीग गयी थी और वो बहार वाले बाथरूम की तरफ चली गयी खुद को सहज करने.

'मधु के साथ वो करना ये दिन दिखा सकता है, कभी नहीं सोचा था. और अर्जुन इस घर से गया तोह... नहीं.. ये नहीं होने दूंगा माँ. मैं प्राण करता हु की आप लोगो को ऐसे दिन नहीं देखने दूंगा चाहे अपनी बेटी का हाथ मुझे खुद हे बेटे को देना पड़े.' शंकर को भी कर्मो पर विश्वास हो गया था और अब परेशानी होने लगी थी सिर्फ भविष्य का सोच कर. लेकिन नियति को रोकना तोह उसके वश में भी कहा था. अभी तोह जाने अर्जुन के भविष्य में और कितना कुछ लिखा था. इंसान को स्वर्ग और नरक धरती पर रह कर हे देखना पड़ता है, यही मातृभूमि कर्मभूमि बनती है और यही सब भुगतान होता है.

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"मैं तोह कल रात हे आ गयी थी लेकिन संजीव ने बताया था की रात में तुम मिलने नहीं आ सकते. आज भी 6 घंटे से बस तुम्हारा हे इन्तजार कर रही थी और तुम अब आ रहे हो.", पोल्का प्रिंट का कैसा हुआ हरा टॉप और सलेटी जीन्स पहने निक्की चलती फिरती आग हे लग रही थी. आज जैसे वो ख़ास अर्जुन के संवर कर आयी और अब शहर से दूर चले आने पर सीधा उसकी गॉड में हे आ बैठी थी. उसकी ये बेकरारी और शिकायत देख अर्जुन ने बड़ी हे मासूमियत से जवाब दिया.

"आप आ जाती हमारे यहाँ. और वैसे भी हम तोह दोस्त है न Nick's रेस्टोरेंट."

"बड़े गंदे हो तुम और ये संजीव की खबर मैं लुंगी बाद में लेकिन उस से पहले ये जान लो की हम ख़ास फ्रेंड्स है. तुम मुझे पसंद हो और मुझे कोई भी लड़का इस नजर से पसंद नहीं, बस.", निक्की का गुस्सा असलियत में उत्तेजना थी जो वो इतना समाया अर्जुन की प्रतीक्षा करती रही और मिलने के बाद भी शहर से यहाँ तक आते हुए अर्जुन ने आधा घंटा उस से बस फिजूल बातें करके गँवा दिया था.

"और जो दूसरी सच्चाई है वो? निक्की इसका असर भैया और भाभी पर भी पड़ ..", अर्जुन बात पूरी करता उस से पहले हे निक्की ने वो मीठी लाली लगे होंठो में उसका होंठ भर लिए. चेहरा पकडे वो इस कदर उत्तेजित थी की कपड़ो के साथ हे उसकी कमर अर्जुन के ख़ास भाग पर आगे होने लगी. ये एकतरफा चुम्बन जल्द हे दोतरफा होता हुआ कही ज्यादा कामुक हो चला.

"उम्म्म्म.. जो भी असर होगा वो सिर्फ मुझपे होगा अर्जुन और वो भी सिर्फ पॉजिटिव. तुम जब चाहोगे तभी मिलूंगी और जैसे कहोगे वैसे लेकिन कभी ये ख़याल दिल में मत लाना की निक्की अपनी राधिका पर कोई आंच आने देगी. बस हमारी ख़ास दोस्ती को बरकरार रखना.", निक्की के गोर बादामी चेहरे पर इतनी चाहत देख अर्जुन ने एक बार और होंठो को चूम कर जैसे सहमति जाता दी.

"ऐसा है तोह मुझे भी ऐतराज नहीं लेकिन आप कभी राधिका भाभी से ये जीकर नहीं करेंगी की हमारा ये ख़ास रिश्ता किस हद्द तक है. आपकी बहिन होने के साथ वो मेरी एकलौती भाभी भी है. इतना पर्दा रखना बस.", अर्जुन ने ढके हुए शब्दों में हे अपनी ख्वाहिश जाहिर करि तोह निक्की ने उचकते हुए अर्जुन का चेहरा अपने बहार को उभरे हुए सीने पर दबा दिया. अब कार में फैली वो महंगी सुगंध का स्त्रोत अर्जुन के चेहरे पर था.

"आह्हः.. ये चाहत बस मेरे तक हे रहेगी अर्जुन. हमारी गहराई को मैं कभी राधिका तक नहीं जाने दूंगी. बस इतने दिन से तुम्हारे लिए तड़प रही हु, ये तड़प मिटा दो प्लीज...", शरीर में रह रह कर उठते स्पनन्दनं और अर्जुन को अपने सीने से लगाना निक्की के शरीर को झुलसने लगा था. कमर पर उन मजबूत हाथो की पकड़ महसूस होते हे निक्की की आँखें खुमार से बंद हो गयी. 26 की उस पतली कमर से टॉप को ऊपर उठता अर्जुन भी जिस्म की कोमलता पर निशब्द था. निक्की ने खुद को तराश कर हे ये काया पायी थी जिसपर निगाह हजारो मंडराई लेकिन उसने खुद को सिर्फ अर्जुन के सुपुर्द किया.

"यहाँ मैं ज्यादा कुछ नहीं कर पाउँगा निक्की.", टॉप के अंदर दोनों ठोस उभार एक रेशमी ब्रा में क़ैद अब अर्जुन की हथेलियों पर ठीके थे. छोटी सी नाभि से जीन्स की चैन तक एक ख़ास लहर ने निक्की का वो छिपा खजाना भिगो दिया था. स्टैनो पर सिर्फ आवरण से स्पर्श करना हे इतना भयंकर सखलन देगा ये कल्पना नहीं की थी निक्की ने.

"उफ़.. इस से ज्यादा भी प्यार करोगे?", अब निक्की झेंप रही थी और अर्जुन मुस्कुरा रहा था. वापिस निक्की को गॉड में बिठाते हुए अर्जुन ने उस तगड़े मूसल का एहसास करवाया तोह वो कही ज्यादा हे शर्म से उस से लिपट गयी.

"अभी तोह ाचे से देखा हे नहीं है तुम्हे. और तुम भी मुझे देखना तोह चाहती हे होगी?", अर्जुन ने टॉप के भीतर हे ब्रा का हक्क खोल दिया था. चिकनी पीठ सहलाते हुए अर्जुन के हाथ कपडे के भीतर से हे उन 34 के गोल उभारो तक आये तोह निक्की के शरीर में कंपकंपी चढ़ने लगी. रेशम से मुलायम और पूरी गोलाई लिए निक्की के दोनों हे चुचो को ब्रा की भी जरुरत न थी. निप्पल नुकीले जाने कितनी हे देर से थे और उंगलियों के स्पर्श से ज्यादा कड़े हो गए. पहली बार यहाँ किसी पुरुष का स्पर्श हुआ था.

"माँ... आह्ह्ह्हह.. मर्डर जाउंगी प्लीज स्टॉप.. आठ.. क्या कर रहे हो तुम...? आह्हः.. शित्त्त...", दोनों निप्पल हलके हलके मसलते हुए अर्जुन तोह निक्की की आग और बढ़ने लगा था. निक्की के गोर चेहरे के साथ बाकी जिस्म पर भी पसीना उभर आया. चुचो की चिकनाहट अर्जुन को भी उत्तेजित करने लगी. दोनों पंजो में उभारो को पकड़ते हुए अर्जुन ने गर्दन पर होंठ जमा दिए.

वो वातानुकूलित कार भी असहाये थी इनके जिस्म की गर्मी काम करने में. महकते नाजुक छरहरे जिस्म को साथ लगाए अर्जुन बड़ी शिद्दत से निक्की की पतली गर्दन चूमता हुआ दोनों हाथो से stann-mardan भी करने लगा. जल्द हे दोनों के होंठ एक बार फिर आपस में जुड़े और इस बार एक दूसरे के जीभ चूसते हुए वो बेकाबू हो चुके थे.

"टॉप निकालो मेरा आठ.. जल्दी करो..", निक्की ने बाहें ऊपर उठाई और एक पल में वो सफ़ेद बिंदियो वाला हरा टॉप बगल वाली सीट पर नजर आया. आधे कप वाली ये महंगी विदेशी ब्रा बस लटक हे रही थी. तीखे गुलाबी निप्पल और उनके गिर्द वो सिक्के जितना हल्का भूरा घेरा. फक्क गोर चुचो पर कही कही गुलाबी रंगत आ चुकी थी मसलने से. निक्की ने खुद हे ब्रा एक तरफ फेंकते हुए फिर से होंठो से होंठ जोड़ दिए. अर्जुन खुल कर चुचो की मालिश करने लगा था और निक्की उसके होंठ kaat-ti हुई जीवन के इस पहले अनुभव का मजा लेने लगी. 5 मिनट बाद दोनों अलग हुए तोह होंठो पर एक दूसरे की लार लिपटी थी, उखड़ती हुई साँसों के साथ.

"तुम बहोत सुन्दर हो निक्की. बिज़नेस में आने के बावजूद कोई बॉयफ्रेंड नहीं बनाया?", अर्जुन ने सवाल के बाद जैसे हे एक निप्पल को मुँह में लिया निक्की ने कंधे पर नाखून गदा दिए.

"आअह्ह्ह.. जालिम कही के.. इनमे दूध नहीं आता जो पीने लगे हो.. उफ़.. बॉयफ्रेंड नाम से हे नफरत है.. आउच.. आराम से बेबी... माय निप्पल्स अरे एक्सट्रेमेली sensitive...aaahhh.. I'm किंग अगेन.. आह्हः.. ", निक्की के दोनों चूचक 2 हे मिनट चूसने पर उसकी बुरी हालत हो चुकी थी. अर्जुन इस कंपकंपी को ाचे से पहचानता था. निक्की जैसे मीलो दौड़ कर आयी हो और अब अर्जुन से लिपटी खुद को संभल रही थी.

"अब हमको चलना होगा निक्की. लाइब्रेरी का बोल कर निकला हु घर से और आधा घंटा वापिस जाने में लगेगा.", अर्जुन चाहता तोह वो कुछ भी कर सकता था और उसकी बात सुन्न कर निक्की की भी वैसी हे प्रतिक्रिया थी. वो निर्वस्त्र सीने हे बगल वाली सीट पर बैठ गयी अर्जुन द्वारा हटाने से.

"तुम सेक्स नहीं करोगे? सॉरी मेरी वजह से तुम्हे नहीं रुकना चाहिए. मेरा 2 बार हो गया है लेकिन तुम्हे भी रिलीज़ करने की जरुरत होगी.", अर्जुन ने बस ब्रा को सीधा करके उसके हाथो में थमा दिया.

"मेरे से ज्यादा जरुरत तुम्हे थी हल्का होने की. और ये कोई जरुरी तोह नहीं की बदले में मैं सेक्स करू. तुम्हे आराम है और मैं भी संतुष्ट हु. पहली बार कार में नहीं करूँगा और पहली अकेली मुलाकात में तोह बिलकुल भी नहीं. तुम बहोत ाची हो और मैं चाहता हु के हमारे ये ख़ास पल याद रखने लायक हो तुम्हारे लिए. सिर्फ सेक्स करना हे मेरे दिल में होता तोह मैं कल रात हे आ जाता जब भैया ने मुझे मैसेज दिया था.", अर्जुन निक्की के साथ सबकुछ धीरे धीरे और आराम से करने की सोच चूका था.

"उम्म्म.. थैंक यू. मैं सोच कर हे आयी थी की तुम एक बार कहोगे तोह मैं सारे कपडे खोल दूंगी. लेकिन मुझे भी ख्वाहिश थी की हम वक़्त गुजरे, मैं तुम्हे अपने दिल की वो सभी बातें बताऊ जो हमेशा मेरी चाहत रही है लेकिन दिल में बंद. लव यू.. उमाठ.. अब नेक्स्ट संडे मिलेंगे और फिर सीधा शादी में.", टॉप पहनते हुए भी वो 2-3 बार अर्जुन को चूम चुकी थी. हालत दुरुस्त होने के बाद दोनों ने एक गहरा चुम्बन किया और कार वापिस शहर की तरफ घुमा दी.

"वैसे तुम्हारा वो कुछ ज्यादा हे बड़ा नहीं है?", निक्की झेंप रही थी अपनी हे बात पर और अर्जुन मुस्कुराते हुए कार चलता रहा.

"क्या बड़ा नहीं है?"

"पेनिस."

"अब जो भी है यही मेरे पास लेकिन अगर ये छोटा लगता है तोह अब कुछ हो नहीं सकता. टाइम आने पर क्या पता थोड़ा बढ़ जाए.", अर्जुन यहाँ निक्की के मजे ले रहा था और वो उसकी जांग पर चपत लगाती हंसने लगी.

"इडियट. बहोत ज्यादा हे बड़ा है, हिप्स पे फील किया था और हाथ रख के भी देखा था. अंदर कैसे जाता होगा?", अपने हे सवाल को समझते हे वो बहार देखने लगी. शर्म आ रही थी की वो खुद अपनी चुदाई के लिए मरी जा रही है.

"तुम्हे कैसे पता की ये बड़ा है नार्मल नहीं?"

"मजे मत लो मेरे. गाँव की नहीं हु और सेक्स के साथ हे बॉडी पार्ट्स का ाचे से पता है. पेनिस 5-6 इंच तक हे होते है या कुछ उस से भी छोटे. तुम्हारा पूरे हिप्स पर फील हो रहा था. गंदे कही के कैसी बातें करवा रहे हो."

"ाचा, बातें मैं करवा रहा हु. खुद हे इस पर बैठी थी और ये टॉपिक भी शुरू किया. लेकिन मुझे नहीं पता ये अलग क्यों है. तुम मन करोगी तोह हम ऊपर ऊपर से हे करते रहेंगे, कभी अंदर नहीं करूँगा.", अर्जुन सड़क के साथ साथ निक्की को भी निहार रहा था जो आखिरी बात सुन्न कर थोड़ा भड़क हे गयी.

"क्यों नहीं करोगे? पोर्न मैंने भी देखि है और होते हैं कुछ इतने बड़े और वो पोर्नस्टार्स लेती भी. मैं भी ले लुंगी.", निक्की बेध्यानी में हे वो सब बोल गयी थी जो सहज समय में वो कभी बोल न पाती. गलती पर गलती हो रही थी और अर्जुन बस हंस रहा था.

"युक.. तुम करवा रहे हो न ये सब? छी.. गंदे कही के. देखना मैं तुम्हारा क्या हाल करती हु वक़्त आने पर."

"वो तोह तुम हे बताओगी किसकी हालत बुरी होती है. वैसे इरादा बनाये बैठी हो पूरा. चलो ाची बात है की डर नहीं लग रहा तुम्हे. वैसे नेक्स्ट संडे आने से पहले बात कर लेना, कही ऐसा न हो के मैं हे बिजी राहु.", अर्जुन ने ज्यादा तंग न करते हुए अगली बार मिलने से पहले हिदायत देते हुए कहा.

"ऑब्वियस्ली यार. मैं भी बिजी रहूंगी और आना इसलिए है की यहाँ मौसी को लेकर जाना है अपने साथ. देख लेना अगर टाइम मिले तोह.", निक्की अब शीशे में देखते हुए खुद को ठीक करने लगी थी. होंठो पर हलकी सूजन थी और अंदर चुचो पर जलन, जिसका वो अर्जुन को बता तोह नहीं सकती थी लेकिन बार बार ब्रा को ठीक करने के बहाने वो सेहला जरूर लेती.

"पाउडर लगा लेना थोड़ा, घर जाने के बाद. सॉरी कण्ट्रोल नहीं हुआ था तोह थोड़ा ज्यादा हे जोश दिखा दिया.", अर्जुन की इस बात से वो शर्माने के साथ खुश भी हुई. वो हर बात पर ध्यान दे रहा था.

"कर लुंगी और सॉरी की जरुरत नहीं है. मुझे भी आज हे पता लगा के यहाँ से भी अलग कनेक्शन होता है.", निक्की की कार यूनिवर्सिटी के पास हे कड़ी करवाई थी, सावधानी से. उतरने से पहले दोनों ने एक छोटा सा चुम्बन किया और विदा लेते अपने अपने रस्ते हो लिए. आज अर्जुन घर में आये मेहमानो से मिल भी नहीं पाया था और अब सवाल जरूर होने वाले थे उस से. संजीव भैया के रेहम से हे बचा जा सकता था और आज वो भी घर पे हे थे.

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"देखो ताई जी, पहले बोल दो इस शंकर को जे aadha-adhura नाम लिया या रंगत पे toka-takai की तोह अदा (उल्टा) लिटा के मारूंगी. इन सारो को मैं काली दिखती हु जो मजाक उड़ाते है.", 38-39 साल की ये महिला अपने आप में हे कुदरत का अनमोल तोहफा थी. सांवला रंग और पतली काया, बड़ी बड़ी काली आँखे किसी हिरणी सी और उतने हे गहरे लम्बे रेशमी बाल. उम्र देखने से तोह कही भी 25 से ज्यादा नहीं लगती थी लेकिन ये 2 जवान होते बचो की माँ थी और नाम था रुचिता उर्फ़ रूचि. कुदरत का सबसे करामाती तोहफा था इस पतले मजबूत शरीर पर वो पहाड़ से उन्नत वक्ष जिनकी वजह से हमेशा ढीले कपडे पहन कर रखने पड़ते थे.

"तेरी तरफ तोह मेरा चाचा नजर न उठा सकता रुचिता, मेरी क्या मजाल. और ज़िन्दगी में मैंने कभी कहा के तू काली है? वो तोह परमा बुलाया करता था और गुस्सा सब पे निकलती थी तू. यशोदा चची, इस से मैं 8 साल बड़ा हु लेकिन तू तड़ाक आज तलाक न बंद हुई इसकी. ये देखो इसके नाखून के निशाँ जरा.", शंकर तोह दूर से हे सफाई दिए जा रहा था और कौशल्या जी ने रूचि को अपने साथ लगा लिया.

"छोटी है और बहिन भी. जो दिल करे वो कहा कर तू और आँख दिखाए तोह धार दियो बिना पूछे. और शंकर तुझे कह के भेजा था न ice-cream का डब्बा लाना है, जानबूझ के भुला न तू?", कौशल्या जी फटकार भी लाड में हे लगा रही थी और इस कमरे में बीएड पर उनके साथ ांनी भी बैठी मुस्कुरा रही थी ये सब देख कर.

"ओह माँ, मुझे पता होता की आइसक्रीम इसने मंगवाई है तोह बाकी सब भूल जाता लेकिन आइसक्रीम जरूर लता. वो इन्दर को सामान बताया था आपने और ये शरारत उसने हे की है जो खुद धर्मपाल के घर भाग गया. मैं अभी लेके आता हु रूचि, तू गुस्सा न हो.", शंकर को अपने छोटे भाई की कारस्तानी समझ आ गयी थी लेकिन यहाँ फिर से एक गलती हो गयी जो रुचिता का छोटा नाम ले दिया.

"ये न सुधरता ताई. शंकर एक तोह मेरा नाम है रुचिता, रूचि सिर्फ घर के बड़े कह सके है और अब मेरा न है दिल कोई आइसक्रीम खाने का. ताई इसने बोलो के ज्ञान से rabri-jalebi ले आये और फिर कुछ उठा ल्याया तोह मैं न आती आपके घर कभी.", ये अलग फरमाइश कर दी थी अब रूचि ने. शंकर ताज्जुब से उसके साथ साथ अपनी माँ को भी देख रहा था.

"माँ, इतनी दोपहर में अब बड़ी मार्किट जाऊ इसके लिए एक प्लेट राबड़ी जलेबी लेने? और वह न मिली तोह फिर?"

"देख लो आप. आपके सामने हे कह रहा है के न मिली तोह. मतबल साफ़ है ताई के नियत हे नहीं है जाने की. ठीक है माँ, मैं जॉन हु घर आड़े (यहाँ) तोह बहिन की कदर हे कोणी. पृथ्वीराज चौहान ने तोह युद्ध कर दिया था मुघलो के साथ, यु डॉक्टर दूकान तक न जाना चाहता.", इस बार यशोदा जी ने डपट का बिठाया अपनी नकचढ़ी को.

"होश न खोया कर हर वक़्त. टिक के बैठी रह और जा शंकर तू बीटा काम कर तेरा. दोफहर के खाने में पहले हे इसकी पसंद का सूजी हलवा, खीर बनाई है. इस जलोकड़ी को अभी जलेबी भी चाहिए. तेरे चाचा भी बोल गए थे की तुझे सतीश भाई साहब के घर भेज दू आने पे. तू काम देख इस ऋचा की kachar-pachar से तंग आके तोह विशेष भी 8 महीने घर से दूर रहता है और बाकी 4 में से 2 महीने मेरे पल्ले बांध जाता है.", अब शंकर बहार निकलते हुए अलग हे मुस्कुराये जा रहा था और रूचि गुस्सा करती बिस्टेर के कोने में जा बैठी.

"गुस्सा न कर रूचि बीटा मैं मंगवा देती हु तुझे जो भी चाहिए. यशोदा न कहा कर इतना इसको, एक बेटी दी है भगवान् ने और उसको हे daant-dapat करती रहती है."

"हाँ ताई, माँ न कहती कुछ अपने लाडले को. वो तोह आज यहाँ भी न आया क्योंकि मैं जो साथ चली आयी. भांजा भांजी को घूमने ले गया लेकिन इधर न आया. वो raat-raat भर आवारागर्दी करता फायर है, लेकिन वो तोह चाँद है मेरी माँ का. मैं हे ग्रहण हु इनके लिए तोह. खसम भी ऐसा दिलवाया जो सारा टाइम बस आप विदेश और मेरे पल्ले बांध गया एक जोड़ी बचो के साथ 100 काम.", रूचि तोह रोने को हे हो गयी.

"जा तू mooh-hath धो ले, अर्जुन आ गया होगा तोह वो ले आएगा.", कौशल्या जी ने इतना कहा तोह गुस्सा पल में गायब. बिस्टेर पर कड़ी होने पर हे पता लगा था के वो साढ़े 5 फ़ीट से कुछ लम्बी है. इतने ढीले वस्त्रो में भी सीना ाचे से नुमाया हुआ बिस्टेर से उतारते वक़्त.

"ब्याह होये भी 19 साल हो गए इस छोरी के और आज तक ये मेरी समझ से बहार है बहनजी. पता नहीं इसको इस जनम में समझ आएगी भी या नहीं.", यशोदा जी यहाँ अपनी बेटी को कोस रही थी और उधर रूचि मैडम के हाथे अर्जुन चढ़ चूका था. आँगन वाला बाथरूम बंद देख वो बहार चली आयी थी और कार की चाबी घूमता अर्जुन टकरा गया इस tufaan-express से.

"ओह बावलीबूच, कंपनी बाग़ में हांड (घूम) रहा से के? यु ओढ़ (एंटी) बड़ी लुगाई न दिखती
 
अपडेट 148

चाहत - 1


अर्जुन की छल्ला घूमती ऊँगली अब मुट्ठी में बंद हो चुकी थी अपने सीने पर इतनी नरम टक्कर के एहसास से. रुचिता का सीना बहोत हलके से हे टकराया था लेकिन वो बहोत था उस naari-saundarya का एहसास करवाने के लिए जिसको रुचिता ने ाचे से छुपाया हुआ था. वो काली बड़ी बड़ी आँखें और चेहरे का ख़ास कटाव.

"आप कहा से आयी है?", अर्जुन बस उन mrig-nayano में खोया शायद सुन्न पाने में असमर्थ हो गया था जो भी भड़कती हुई रूचि बोल रही थी. ऊपर से ऐसे सवाल ने तोह जाटनी का पारा हे 100 के पार पंहुचा दिया.

"ओह नैनसुख, किवाड़ जितना लाम्बा हो गया आरर सॉरी की जगह इंटरव्यू करेगा? तारकोल के ड्राम से लकड़ी हु लेकिन इतनी काली भी कोणी के दिन में दिखू न.", रूचि के ऐसी तेज आवाज भी जैसे अर्जुन को मधुर संगीत से ज्यादा कुछ न लगी. वो उसका बड़ी बड़ी आँखें नाचना और होंठो का हिलना देख अर्जुन एक बार फिर से उसके चेहरे को निहारने लगा.

"जहाँ से भी आयी हो लेकिन आप बहोत सुन्दर हो. उम्.. सॉरी.. ध्यान नहीं रहा और आप भी कार के बिलकुल बराबर से गुजर रही थी.", अपनी बात से हे अर्जुन की तन्द्रा भांग हुई. ऐसे हे किसी को अपने घर में वो जाने क्या कह गया था. नजर झुकता हुआ वो जाने लगा तोह रूचि ने उसकी कलाई थाम ली. चेहरे पर अब बिलकुल हे विपरीत भाव थे.

"तू के बोल्या जरा फिर से कहिये?"

"जी सॉरी. मुझे हे देख के चलना चाहिए था.", अर्जुन नजरे मिलाने से कटरा रहा था और रूचि उसके चेहरे को देखने की कोशिश में लगी थी.

"सॉरी से पहले जो तू मेरा मजाक उड़ावे था वो के था फिर?", इस बात पर अर्जुन ने गंभीर नजर से रूचि की तरफ देखते हुए कहा.

"ऐसे मजाक नहीं करता लेकिन आप बिलकुल अलग है. जैसे कहानियों में होता है मृगया या mrig-nayani. सॉरी मैं आपको जानता भी नहीं हु लेकिन मेरा नाम अर्जुन है.", अर्जुन के इतने स्पष्ट जवाब की उम्मीद न थी रूचि को और वो भी अब ध्यान से अर्जुन को देखने लगी थी. लम्बा तगड़ा और किसी कहानी का जीवंत किरदार सा divya-purush.

"मेरा नाम रुचिता है और तेरी बुआ लागु हु मैं. तू रूचि कह लिए लेकिन ऐसा भद्दा मजाक न करिये आइंदा.", ये नाम अर्जुन ने अपनी दादी से सुना था और अर्जुन का नाम भी थोड़ी देर पहले कौशल्या जी ने रूचि को बताया था.

"आप मेरी बुआ है? इतनी काम उम्र में बुआ बन्न गयी? वैसे मजाक नहीं करता मैं बुआ जी, इतनी सुन्दर आँखें सबकी नहीं होती. सांवले तोह श्री कृष्ण जी भी थे.", अर्जुन को जानकार ाचा लगा था के ये कोई बहार की महिला न थी और वही रूचि बाथरूम जाना भूल अभी तक अर्जुन की कलाई पकडे कड़ी थी. बेशक ये पकड़ नाजुक और ढीली थी.

"आदमी का कला होना महारे देश में चल जे है, लुगाई तोह दूध बरगी चाहवे है सारे. बता कोई विख्यात छोरी जो काली हो और सबने पसंद भी. मैंने बेरा है के दिल्लगी बहोत करे है आजकल के बालक.", रूचि को अपनी तारीफ पहली बार सुन्न ने को मिली थी. वैसे तोह उनके पिता हमेशा हे अपनी बिटिया को सबसे खूबसूरत लड़की मानते थे लेकिन वो एक बाप का प्यार हे लगता था रूचि को.

"स्मिता पाटिल. वैसे तोह मैं कितनी हे ऐसी पौराणिक देवियों के नाम जानता हु लेकिन आपने पुछा तोह उदहारण हमारी हे दुनिया से दिया. मुझे उनसे खूबसूरत कलाकार तोह कोई लगी हे नहीं. वैसे आप उनसे भी कही ज्यादा हे सुन्दर हो बुआ और गुस्सा तोह और भी जंचता है.", अर्जुन के इस जवाब से रूचि निरुत्तर हो चुकी थी. वो जान चुकी थी की ये लड़का कुछ भी झूठ या मजाक में नहीं कह रहा. लेकिन पहली बार खुद की तारीफ सुन्न न ाचे के साथ साथ थोड़ा स्वयं के नजरियो को ठेस पहुंचने वाला भी लगा. कलाई छोड़ कर वो बाथरूम की तरफ जाने लगी थी.

"रूचि बुआ.", अर्जुन के ऐसे आवाज देते हे वो ृक्क गयी लेकिन पलट के न देखा.

"जिसमे हर रंग समां कर उस जैसा हो जाये तोह भला कोई भी रंग बेहतर हो सकता है क्या? खुद को पसंद कीजिये, मेरी तारीफ का हर शब्द सच्चा हे था.", अर्जुन भी इस पहली मुलाकात को ज्यादा न खींचते हुए अंदर की तरफ चल दिया. ऋचा बाथरूम जाने से पहले अर्जुन को जाते देख हल्का सा मुस्कुराई लेकिन आँखों में हलकी नमी थी.

'हाँ तोह मैंने बेरा है के मैं सुथरी हु. लेकिन तेरी सॉरी इतनी जल्दी ख़तम न करती मैं.', इस पल में तोह फूलन देवी सी रेहनी वाली रूचि भी एक मासूम युवती हे लग रही थी. अर्जुन की बात भी सही थी की रूचि अपनी उम्र से 10 बरस काम हे लगती थी, यही गहरा रंग उसको जवान रखे था.

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"तुम कितने बिजी हो आजकल, 11 दिन बाद मैं चली जाउंगी और तुम्हे जैसी मेरी परवाह हे नहीं है कोई.", ये माधुरी दीदी थी जो इस वक़्त सलवार कमीज पहने अर्जुन के कमरे में कड़ी थी. बाकी सभी व्यस्त थे और इस तरफ बस यही दोनों थे. अर्जुन कपडे बदलने के लिए यहाँ आया था और उसके पीछे दीदी चली आयी.

"परवाह क्यों नहीं है दीदी? आपकी शादी है और उसमे कोई कमी न रहे इसलिए तोह सभी व्यस्त है.", अर्जुन जीन्स उतारने के बाद अलमारी से अपना ट्रैक पजामा निकल रहा था लेकिन उसके जवाब के बदले में जो हरकत माधुरी दीदी ने करि उसको देखते हे जड़ हो गया.

"बाकी सबको शादी की तैयारी करने दे लेकिन तू मुझ पर ध्यान दे. अगले एक हफ्ते हर रात मुझे तेरे करीब रहना है और ज्यादा बहाने बनाये तोह मैं खुद तेरे कमरे में आ जाउंगी. तुमने वादा किया था न?", माधुरी दीदी अंडरवियर के ऊपर से हे अर्जुन का वो तगड़ा उभार पकडे थे, बेशक सुप्त अवस्था में था लेकिन इस स्पर्श से हे जैसे वो जागने लगा था.

"ओह्ह्ह.. दीदी मरवाओगी क्या?"

"तभी तोह तेरे पास आयी हु. लेकिन मुझे लगता नहीं की तू मेरी हसरत पूरी करना चाहता है. प्यार ख़तम हो गया न अब अपनी इस प्यारी बड़ी बहिन से?", घुटनो के बल बैठती हुई माधुरी दीदी की नजरे अर्जुन के चेहरे पर हे थी और अगले हे पल उसका अंडरवियर निचे करती माधुरी ने वो 5 इंच का नींद से बहार आता लिंग मुट्ठी में पकड़ते हुए चेहरा करीब कर लिया.

"उफ़.. कोई आ जायेगा दीदी. मेरा यही मतलब था मरवाने से.. आह्हः.. घर में इतने सारे लोग है और ऐसे में आपके पास हर वक़्त कोई न कोई रहता हे है... रुक जाओ.. आह्हः..", लाइन ख़तम करने से पहले हे अर्जुन की आँखें बंद हो चुकी थी. मजे की शिद्दत में वो ये भी भूल गया की ये दिन का वक़्त है. माधुरी दीदी के होंठो में क़ैद उसका हल्का भूरा लुंड जल्द हे अपनी औकात में आता हुआ दीदी के मुँह को भरने लगा. अर्जुन उनके सर पे हाथ रखे हुए दूसरे हाथ को अलमारी पर टिकाये खड़ा रहा. और माधुरी दीदी ने उस 9 इंच के मूसल की जड़ पकड़ते हुए 5-6 बार आधा लुंड होंठो से अंदर बहार करते हुए छोड़ दिया.

"ाः.. रुक क्यों गयी?"

"यही बताने के लिए की मेरी हालत कैसी है इतने दिनों से. रात को 1 बजे मैं तेरे कमरे में आने वाली हु.", अर्जुन ने उनकी बात सुन्न कर तुरंत अंडरवियर ऊपर किया और ड्राइंग हॉल की तरफ तेजी से लपका. वो दोनों दरवाजे बंद करता वापिस माधुरी दीदी के करीब आ गया.

"रात का तोह पता नहीं दीदी लेकिन अभी जरूर वक़्त है.", अर्जुन की ऐसी हिम्मत देख माधुरी दीदी भी चकित थी. पता तोह उन्हें भी था के घर में अभी सब लोग मेहमानो के साथ व्यस्त है और इधर कोई नहीं आने वाला. फिर भी एक डर तोह मैं में था हे.

"देख रात को..", वो आगे बोलती उस से पहले हे अर्जुन ने उनके मॉटे चुत्तड़ो को पकड़ते हुए अपने साथ लगा लिया. होंठ आपस में जुड़ते हे माधुरी भी इस विद्युत प्रवाह में खो गयी. उनका वो भरपूर गदराया नरम बदन बस अर्जुन के हे स्पर्श के लिए तरसता था और अब उन्हें भी जैसे कोई परवाह न रही. सलवार का नाडा कब ढीला हुआ और कब खुद माधुरी ने अपने हाथ उठाते हुए कमीज उतरवाया, उसको भी पता न चला. काली पंतय और ब्रा में क़ैद उनका जरुरत से ज्यादा भारी यौवन अब बिस्टेर पर था.

"बस ज्यादा शोर मैट करना दीदी.", अर्जुन भी उनके हिलते हुए 38 के खरबूजे देख उत्तेजित हो चूका था. छूट के सामने से वो कला रंग अलग हे चमकता हुआ कॉमर्स की उपस्थिति बताने लगा. पंतय के ऊपर से एक बार उस गांड को साँसों में भरते हुए अर्जुन दीदी के असाधारण बदन पर किसी चादर की तरह चा गया.

मॉटे चुचो को ब्रा पलट कर बहार निकलते हुए मसलता वो बस diwan-war सा उनके होंठ मुँह में लिए चूसने लगा. माधुरी दीदी की भी सुडोल भारी जाँघे फ़ैल कर अर्जुन को खुद में सामने को आतुर थी.

"आठ.. जल्दी कर मेरे भाई.. आठ.. चूसना चाटना कल कर लियो.. पहले जो ये पानी बहा रही है इसका मुँह बंद kar..aa..", अर्जुन दीदी का अर्थ समझते हुए ऊपर उठा तोह वो एक पल बस उन gore-bhoore चमकदार पहाड़ से चुचो को देखने लगा. दिन की रौशनी में उनकी गोलाई और ऐसा अकार देख कर लुंड ने भी लार टपका दी. पंतय उतरने में मशक्कत हुई सो अलग. 40 की पिछवाड़े की गहरी दरार में फँसी वो काली पंतय बहार निकलते हे फूली हुई गीली छूट ने अपना नन्हा सा मुँह भी खोल दिया.

"दीदी, सच में ये तोह तप रही है.", अर्जुन ने लकीर के बीच एक ऊँगली फिरते हुए कहा और माधुरी की सिसकी निकल गयी.

"बाद में देख लियो इसको, कोई बुलाने आये उस से पहले मुँह खोल दे इसका. आह्ह्ह्ह...", इधर अर्जुन ने बात न सुनते हुए गाछ से एक ऊँगली अंदर ठेलते हुए चिकनाई देखने का उपक्रम किया तोह लाल सुरंग सचमुच नदी बानी हुई थी, गरम नदी. 2-3 बार ऊँगली पेलने के बाद उसने दीदी के दोनों पाँव बिस्टेर पर टिकते हुए घुटने मदद दिए. लुंड को मुठी से दबाये वो दोनों उत्तेजिट अंगो को चुम्बन करवाता हुआ माधुरी दीदी के ऊपर फिर से चा गया.

"आह्ह्ह्ह.. ममममममम..", हलकी दबी दबी चीख माधुरी दीदी के गले में रह गयी जब वो तगड़ा लुंड एक झटके में हे आधा छूट में उतर गया. अर्जुन के सीने के निचे वो दोनों मॉटे चुके दबे थे और होंठ होंठो के बीच. छूट ने भी इस लुंड के पिछले सभी अकार चखे थे लेकिन आज कुछ ज्यादा हे मोटा और तगड़ा हो चूका अर्जुन का सूपड़ा ठीक दूसरी चुदाई सा दर्द दे रहा था. फांके फ़ैल कर बुरी तरह लुंड को जकड़े थी. शरीर शांत होते हे अर्जुन ने करारा धक्का लगते हुए समूचा लुंड दीदी की छूट में उतार दिया. गर्भ की दिवार पर ठोकर लगते हे माधुरी की चीख अर्जुन भी पूरी तरह न रोक सका.

"माँ... फट गयी कमीने.. आठ.. चुदाई कर रहा है या बदला ले रहा है कोई.. ? उन्न्नन्नं.. आह्ह्ह्ह..", अर्जुन को गलती समझ आते हे उसने दीदी के माथे को चूमते हुए जिस्म बाहों में भर लिया लुंड जिस तरह से फंसा हुआ था, वो बताने के लिए काफी था की अर्जुन ने दीदी की काफी अनदेखी की है.

"सॉरी. अब आराम से करूँगा दीदी. वो आपने कहा था न जल्दी कर.", अर्जुन के ऐसा कहते हे वो दर्द में भी मुस्कुरा दी. खुद हे हलके से कमर झटकती माधुरी दीदी ने इशारा दिया की जो होना था वो हो चूका.

"आठ.. तू पूरा घोडा है रे. इतना लम्बा उफ्फ्फ.. ऐसा लगता है जैसे पेट में आ गया हो.. आठ.. अर्जुन थोड़ा प्यार से कर भाई.", अर्जुन का घोडा इस गीली कासी हुई सुरंग में अभी धीमी हे रफ़्तार से दौड़ने लगा था और माधुरी दीदी का जिस्म अकड़ने लगा. उनकी गुदाज जाँघे ऊपर उठता वो और गहरे धक्के लगता अपनी दीदी को तृप्त करने में जुट गया.

"आप हे झेल सकती हो इसको.. आठ.. सचमुच इतनी टाइट होगी मुझे भी नहीं लगता था.. अब गीली हो तोह मजा आ रहा है दीदी.. आह्हः.", अर्जुन ने दोनों चुचो को आपस में सताते हुए मूंगफली के दाने जितने दोनों निप्पल एक साथ हे होंठो में खींच लिए. ये दोहरा मजा दोनों के लिए स्वर्ग सा था. शहद टपकती वो उभरी हुई छूट सटासट वो मोटा डंडा अपने अंदर ले रही थी, भरपूर रगड़ के साथ. बहार निकली छूट की फांके फूल कर इस अवस्था में ज्यादा निखार आयी थी.

"आइइइइइइइ माँ... मजा आ रहा है अर्जुन.. भाई.. ऐसे हे जोर से करता रह.. पता नहीं आगे तेरे जीजा ये सुख दे भी सकेंगे.. आह्ह्ह्ह.. तुझे सोचते हे गीली हो जाती है मेरी.. आईई.. काट मैट प्लीज.. ऐसे हे आठ.. ऐसे हे प्यार कर इन्हे..", ब्रा तोह बस नाम की हे शरीर पर लिपटी थी और अर्जुन मजबूती से दीदी के जिस्म को अर्ध्चन्द्रमा सा बनाये छूट की तगड़ी कुटाई में लगा रहा. हर धक्के के साथ उसके अंडकोष गांड की दरार पर टकराते. विशाल चिकने नितम्भ भी कमर के ऊपर उठने से पूरे नुमाया था. 15 मिनट वो ऐसे हे धुआंदार चुदाई करने के बाद अलग हुआ.

"रुक क्यों गया रे.. आठ?", लुंड बहार निकलते हे माधुरी दीदी ने अपनी मुँह खुली छूट पर चारों उंगलिया रगड़नी शुरू कर दी. वो जैसे अपने दूसरे सखलन के करीब थी और अर्जुन ने एकाएक वो मजा बंद कर दिया.

"पलट जाओ न दीदी.", इस बार पर दीदी के हाथ एक मुस्कराहट के साथ रुक गए. शरीर पर पसीना उभर आया और मेहनत का असर हिलते चुचो के साथ हर तरफ पता चल रहा था. तुरंत हे वो अपने भाई की पसंदीदा मुद्रा में घुटनो के बल घोड़ी बन गयी. दोनों बड़े बड़े उन्नत कूल्हों को देख अर्जुन ने हलके से एक चपत लगते हुए उनकी लचक का जायजा लिया.

"आठ.. क्या करता है रे? बैक (गांड) में मैट करना अभी.", अर्जुन उनकी बात पर हँसते हुए ठीक कूल्हों के पीछे जा चिपका. एक भरपूर वॉर में पूरा लुंड छूट में घुसेड़ कर वो अब जमीन पर खड़ा सरपट छोड़ने लगा था. बड़े बड़े लटकते खरबूजे हर धक्के पर हिलते बहुत हे मादक तस्वीर दिखा रहे थे. सिसकियाँ ज्यादा हे गूंजने लगी तोह दीदी ने चेहरा बिस्टेर में दबा लिया. अर्जुन बेफिक्र सा ताबड़तोड़ उनकी छूट का कचुम्बर निकल रहा था, इस सिखर दोपहरी में और माधुरी दीदी भी पूरे जोश से छुड़वा रही थी. पीठ पर झुकते हुए दोनों लटकते चुचो को मसलता वो अब जोरदार गहरी टक्कर मारने लगा.

"उफ़.. फाड़ेगा क्या आज हे..? माँ.. आराम से कर.. अब जलन होने लगी है.", छूट ने ज्यादा हे पानी बहा दिया था और साखळीत होती माधुरी इन धक्को से कांप रही थी. चुचो पर अर्जुन का केहर अलग हे मिलाजुला असर कर रहा था. जल्द हे वो आँखें बंद करते हुए गुर्राता हुआ उनकी मखमली छूट को बुरी तरह भँभोङने लगा..

"बस्स्स... आह्ह्ह्ह.", एक के बाद एक जाने कितनी हे गरम धार दीदी की उभरी हुई छूट की गहराई में उड़ेलता हुआ अर्जुन उनकी गांड से चिपक कर खड़ा रहा. शरीर इतनी मेहनत से पसीने में तरबतर हो चूका था लेकिन आखिरी 2 मिनट की चुदाई ने तोह जैसी निचे डाभी माधुरी को आज अपना आखिरी दिन दिखा दिया हो. वीर्य की गर्माहट से हे चेतना वापिस लौटी थी लेकिन उठने की हिम्मत बिलकुल न थी.

"मार दिया भाई तूने तोह. आखिरी बार नहीं छुड़वा रही थी तुझे.. आठ.. गलती मेरी हे है जो दिन में चली आयी और तेरा पकड़ के मुँह में ले लिया.. माँ.. एक तरफ तोह हो जा रे..", अर्जुन का लुंड बहार आते हे छूट ने वैक्यूम का भान करते हुए 'पुक्क' की आवाज दी. दोनों हे अगले 10 मिनट तक बिस्टेर पर लेते सांसें दुरुस्त करने लगे रहे.

"ध्यान नहीं रहा दीदी.. आप जब घोड़ी बनती हो तोह बस रुका नहीं जाता...", अर्जुन ने हौले से वो अपनी तरफ लुढ़का मोटा सतांन दबाते हुए माधुरी को एक हल्का सा चुम्बन दिया तोह बिखरे बाल ठीक करती वो भी मुस्कुराती हुई उठ कड़ी हुई.

"उफ़.. अब तोह बगल वाले कमरे में आराम हे करना पड़ेगा मुझे. चाल का फरक दिख गया तोह आज मोच का बहना भी काम नहीं आने वाला. वैसे सच कहु तोह तेरी चुदाई अब पहले से कही ज्यादा हे दुमदार हो चुकी है. बहोत मजा आया और अगर रात को ये डंडा मैं बिना jaanch-parakh के लेती तोह मुसीबत हो जाती. उफ़.. देख कैसे खोल कर रख दी है मेरी.", कच्ची पहन ने से पहले दीदी ने अपनी फैली हुई जांघो के बीच देखा तोह सफ़ेद वीर्य की धार उस लाल सुराख से बहार आ रही थी. ये छूट पहले सिर्फ एक सूक्ष्म सा सुराख था जहा अब भी 8 आने जितना सुराख़ दिख रहा था.

"मुझे भी आपके साथ करने में मजा आता है दीदी. सचमुच आपकी पूरी बॉडी प्यार करने लायक है और फ़लुफ़्फ़ी भी. इतनी नरम होने के बावजूद पूरा साथ देती हो न तोह मजा दुगना हो जाता है. वैसे काम तोह आधा हे हुआ है.", अर्जुन ने भी अंडरवियर पहनते हुए दीदी के एक उभरे हुए निप्पल को जोर से चूस लिया.

"सीईई.. पागल.. सेंसिटिव है अभी.. और आधा हे रहने दे भाई. पूरे के चक्कर में चलने के काबिल न रहूंगी. वह एक हे बार ढंग से हुआ था लेकिन ये और भी मोटा हो चूका था फ़िलहाल कोई रिस्क नहीं लेना. चल तू इधर से हे निचे चला जा. मैं कुछ देर आराम कर लू.", अर्जुन को टीशर्ट पजामा पहना के उन्होंने जबर्दस्ती विदा किया और ये दरवाजा भी बंद करती हुई वो अपनी कच्ची से हे छूट साफ़ करके नंगी बिस्टेर पर लेट गयी. ऐसी चुदाई के बाद कपडे भी शर्तिया जलन हे देने वाले थे.

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दोपहर के भोजन पर आज 3 अलग अलग जगह कार्यक्रम चल रहा था. सभी बड़े और पुरुष सदस्य बैठक में जमीन पर बिछे गड्डो पर बैठ कर भोजन कर रहे थे वही ज्यादातर लड़कियां अपना खाना ऊपर वाली मंजिल के अपने हिस्से में बैठ कर ग्रहण कर रही थी. इन सभी का खाना होने के बाद जब अर्जुन तैयार हो कर पिछले आँगन में आया तोह डाइनिंग टेबल पर अपनी माँ के साथ ताई जी को खाना लगते पाया.

"ाचा हुआ तू आ गया लल्ला. वो अलका तुझे बुलाना भूल गयी और ये माधुरी तोह जाने कहा रहती है. इधर हे बैठ जा, हम लोग हे बचे है.", यहाँ 8 लोगो के टेबल पर ांनी, कृष्णा चची, रेणुका बुआ और विन्नी सामने की तरफ बैठी थी और इस तरफ रोमिला की बगल वाली कुर्सी खाली थी. रोमिला के दूसरी तरफ वाली दोनों कुर्सियों पर अपनी माँ और ताई के बैठने की सोचता अर्जुन भी अंदर की तरफ वाली इस कुर्सी पर बैठ गया.

वो ांनी चची से मिल चूका था कुछ देर पहले और अभी भी वो ठीक उसके सामने बैठी बड़े स्नेह से अर्जुन को देख रही थी. कृष्णा चची तोह रेणुका बुआ से किसी बात पर चर्चा में लगी हुई थी और विन्नी भी उनकी बात सुनती बीच बीच में कनखियों से अर्जुन को देख लेती.

"आज तोह तुम सवेरे से दिखाई हे नहीं दिए. एक बार कार ले जाते हुए दिखे थे और फिर घर में आने के बाद फिर से गायब.", रोमिला बात कहती हुई तोह बहार से संयतत लग रही थी लेकिन थोड़ी झिझक थी आज जैसे अब उसके और अर्जुन के बीच बहोत कुछ बदल चूका हो.

"नहीं तोह आंटी जी. वो सवेरे जरुरी काम था यूनिवर्सिटी और आने में समय लग गया. अभी बस ऊपर थोड़ा काम करने के बाद मैं फ्री हुआ. लंच के लिए लेट हो गया था लेकिन शुक्र है के आप लोग अभी साथ हो.", अर्जुन को स्वाभविक हे बात करते देख रोमिला मुस्कुराने लगी. अर्जुन ने भी सबकी थाली खली देखते हुए अपनी प्लेट में खाना लगाने के बाद वो ांनी चची से बदल ली. वो कुछ कहती उस से पहले हे अर्जुन ने मुस्कुरा कर उन्हें मन किया और अपनी चची माँ की तरफ ये दूसरी प्लेट सरका दी. अगले 5 मिनट में हे उसकी माँ और ताई जी के आने तक वो बाकी सबका खाना परोस चूका था.

"मैं कर देती ारु, अब दीदी और मेरी प्लेट हम लगा लेंगे बीटा. तुम खाना शुरू करो.", रेखा जी ने बड़े स्नेह से अपने बेटे को रोकते हुए वापिस कुर्सी पर बैठाया और फिर रोमिला की दूसरी तरफ बैठ गयी. ऐसे वो खाना बहोत काम हे खाती थी लेकिन आज सभी मेहमान महिलाये थी तोह बैठना जरुरी भी था.

"आपकी फॅमिली से बहोत पहले मिली थी रेखा, उस वक़्त अर्जुन को नहीं देखा था.", ांनी के ऐसा कहने पर उधर रेखा जी जवाब देने लगी और यहाँ रोमिला ने अर्जुन के गाल को चूमते हुए धन्यवाद् किया और भोजन जारी हुआ. विन्नी ये देख मुस्कुरा रही थी और अर्जुन थोड़ा झेंपते हुए खाने लगा.

"ये बोर्डिंग में था ांनी उस वक़्त. शायद वह पहला हे साल था इसका. पिछले साल हे वापिस आया है और अन्तर की पढाई तक तोह रहेगा.", ांनी के साथ हे रोमिला और विन्नी को भी ये सुन्न कर थोड़ा बुरा लगा था की अर्जुन को इतनी काम उम्र में हे बोर्डिंग भेज दिया गया था.

"रूस में बोर्डिंग स्कूल्ज का कल्चर नहीं है और अगर थोड़े बहोत बोर्डिंग है तोह वो जरुरत की वजह से. यहाँ इतना ाचा माहौल है लेकिन फिर भी एकलौते बेटे को घर से दूर स्कूलिंग करवाना गलत बात है. मुझे नहीं पता रीज़न क्या होगा इसके पीछे लेकिन बोर्डिंग के लिए ात लीस्ट टीनएज होनी चाहिए.", ांनी बड़ी नजाकत से थोड़ा थोड़ा करते हुए खा रही थी और साथ हे अपनी बात भी कह रही थी. रोमिला ने भी उसकी बात का समर्थन किया तोह रेखा जी हलके से मुस्कुरायी.

"एकलौता है न और इतनी साड़ी बहने, ताई, चची और खुद इसके दादा दादी. यहाँ अर्जुन को पढ़ने से ज्यादा शरारत करने की आजादी रहती थी. लेकिन बोर्डिंग भेजने का रिजल्ट खराब तोह नहीं आया न ांनी? क्यों रोमिला तुम्हे क्या लगता है?", अब इस बात का जवाब वो दोनों भी क्या देती. रोमिला को तोह अर्जुन पसंद भी था और ांनी को ये हँसता मुस्कुराता लड़का ख़ास दिखा था.

"चची आप न जस्टिफाई कर रही हो चाचा की मिस्टेक को. अर्जुन कही भी रहता वो ऐसा हे होता. हाँ बचपन भी सभी सहरारत करते है, ये थोड़ी ज्यादा करता था लेकिन हर कोई अर्जुन नहीं होता. मैं बोर्डिंग रही हु और पता है की लाइफ कितनी खराब लगती है. सबके लिए बस गुस्सा हे रहता है और यु लगता है जैसे घरवालों को जरुरत हे नहीं थी मेरी. कितने साल यु सबसे दूर और वो भी एक chaar-diwari में.", विन्नी का कहना उसके अपने अनुभव से था जो गलत भी नहीं था. बहसों को बचपन तोह maa-baap और भाई बहनो के संग हे गुजरना चाहिए.

"विन्नी दीदी, अब प्रेजेंट की बात करे तोह ज्यादा ठीक नहीं है.? आप न बोर्डिंग जा कर स्मार्ट हो गयी हो, कॉन्फिडेंस भी देखो जरा. हरेक चीज का सकरात्मक और नकरात्मक प्रभाव तोह होता हे है. घर से दूर रहकर शिक्षा पर पूरा ध्यान रहता है, प्यार करने वाला साथ न हो तोह आप और ज्यादा कोशिश करते हो खुद को मजबूत बनाने की. वो मिलने के लिए छुट्टियों का इन्तजार कितना सुख देता है? और बीत गया सो बीत गया. अब आप भी यही है और मैं भी.", अर्जुन अपनी माँ को और सफाई देने नहीं देना चाहता था.

"सही कह रहे हो तुम अर्जुन. हर बात के 2 पहलु होते है और हमेशा सही वाला हे देखना चाहिए. वैसे मुझे पता लगा के रोमिला विख्यात आर्टिस्ट है और विन्नी की पेंटिंग भी बनाई है आपने?", ांनी ने यहाँ रोमिला से चर्चा शुरू की और टेबल के निचे से रोमिला ने जाने क्या सोच कर अपना बाय हाथ अर्जुन की मांसल जांघ पर टिका दिया.

"लंच के बाद चलते है मेरे यहाँ अनीता (ांनी). बहोत कुछ दिखती हु तुम्हे, चाहे ज्यादा ख़ास चित्रकारी नहीं है लेकिन तुम्हे पसंद आएगी. रेणुका तोह यहाँ रूचि और कृष्णा के साथ रहने वाली है शाम तक. हम चलते है वह और मेरा दिल है तुम्हारा स्केच करने का.", ांनी तोह इतना सुनते हे थोड़ा शर्माने सी लगी थी. और अर्जुन की खाने की रफ़्तार अपनी जांघ पर घिसाई करते रोमिला के हाथो ने धीमी कर दी. रोमिला टेबल से जुड़ कर बैठी थी और बिना ब्याह के ढीले कमीज से वो गोलाइयाँ कुछ ज्यादा हे अर्जुन को नजर कराती हुई जैसे अलग हे खेल खेल रही थी.

"थैंक यू रोमिला. फिलहाल तोह बस देखने का हे इरादा है और मैं उतनी भी सही सब्जेक्ट नहीं हु आर्ट के लिए. वैसे मरीना को उसे कर सकती हो.", ांनी के सुझाव पर कृष्णा जी हंसने लगी.

"वो आपको इसलिए कह रही है क्योंकि रोमिला के हिसाब से आप कही ज्यादा खूबसूरत है. मरीना दुबली पतली है और हमारी रोमिला मैडम का मान न है की औरत का शरीर bhara-bhara होना चाहिए. वैसे गलत भी नहीं है रोमिला का कहना.", हंसी मजाक के बात इन सबकी बातें ऐसे हे चलती रही और यहाँ अर्जुन की हालत बुरी हो चुकी थी. थोड़ी देर पहले की हुई माधुरी दीदी की चुदाई भूल कर लुंड महाशय तोह अपने विकराल रूप में आ चुके थे और अर्जुन का चेहरा गर्मी से लाल होने लगा था.

'बस कीजिये. दिक्कतत हो रही है.', अर्जुन ने जैसे हे रोमिला के कान के पास ये कहा रोमिला ने चेहरे पर कोई भाव न लाते हुए अर्जुन का मूसल कस के मुट्ठी में पकड़ने के बाद हाथ हटा लिया. अब वो अपनी उसी हाथ से 2-3 बार अपनी योनि को सेहला कर वापिस बातों में लग गयी. अर्जुन दिमाग को शांत करता हुआ कुछ पल वैसे हे बैठा रहा.

"माँ, बोई (बुआ) कहा है?", मरीना जैसे हे यहाँ प्रकट हुई अर्जुन उसके लम्बे छरहरे शरीर के बाद मासूम से चेहरे को देखने लगा. ांनी ने भी ये गौर किया लेकिन फिर अर्जुन को नजर हटते देख वो अपनी बेटी को जवाब देने लगी.

"ये साथ वाले रूम में है. आपकी दादी भी उधर हे है."

"Ok. वो मैं कहने लगी थी.. ी फॉरगॉट. ऋतू से पूछ कर आती हु.", मरीना अपना हे सर झटकती हुई वापिस ऊपर दौड़ गयी. अर्जुन ने इस बार कोई कोशिश न की थी इस साइबेरियन शेरनी को देखने की.

"माँ, मैं आपके कमरे में थोड़ी देर आराम कर रहा हु. 4 बजे तक उठा देना प्लीज.", अर्जुन अभी खड़ा हे हुआ था और Kaushalya-Yashoda जी के साथ रूचि इधर चली आयी.

"ओह बैलबुद्धि, ये तेरी रुचिता बुआ है. तेरे धर्मवीर दादा जी की लाड़ली और रूचि बीटा ये अर्जुन है, शंकर का बीटा और मेरा कपूत.", अर्जुन अब थोड़ा मुस्कुराता हुआ उनकी तरफ बढ़ा और यशोदा जी के पाँव छूने के बाद जब रूचि का आशीर्वाद लेने लगा तोह वो पीछे हट गयी.

"ताई यु के करवाओ हो आप? इतनी भी बूढी न हुई मैं जो पाँव पांडवों."

"बुआ जी, पाँव तोह भतीजा छूटा हे है लेकिन आशीर्वाद नहीं देना तोह आपकी मर्जी.", अर्जुन के चेहरे की शैतानी देख कौशल्या जी ने उसका कान पकड़ लिया.

"तू न सुधारियो कभी. तेरी बुआ को इनके घर ले जा, कुछ जरुरी सामान लेके वापिस आना है. सीधा जाना है और सीधा वापिस यहाँ. कोई atar-patar की तोह मैं तोह कान हे मरोड़ रही हु, रूचि तेरी गर्दन पकड़ लेगी.", अभी वो अर्जुन को समझा हे रही थी और इस बार मरीना के साथ Ritu-Alka भी चली आयी.

"बोई यही पूछने आये थे के आप जब घर चलेंगी तोह हम भी चलते है.", मरीना का हिंदी ज्ञान अभी उतना भी साफ़ न था लेकिन वो बोलती हुई प्यारी बहोत लगती थी.

"ए मेरी लाडो, चाल फेर चला. यु ड्राइवर दिया है तेरी दादी ने, बोल इसने के गाडी निकल.", यशोदा जी कुछ बोलने को हुई थी लेकिन कौशल्या जी ने हँसते हुए उन्हें रोक दिया.

"ड्राइवर, चाल गाड़ी रिकॉल.", मरीना निकाल को रिकॉल बोली थी और उसको पता भी नहीं था के अर्जुन आखिर हैं कौन.

"बूत हे doesn't लुक लिखे ा ड्राइवर.", तुरंत हे मरीना को अपनी गलती का एहसास हुआ और वो ऋतू की तरफ देखने लगी. रूचि तोह हंसती हुई सर पे दुपट्टा करती गलियारे की तरफ चल दी और उनके पीछे हे अलका भी.

"हे इस अर्जुन. वे तालकेद अबाउट माय यंगर बरोथेर, थिस इस हिम.", ऋतू के समझते हे मरीना ने मासूमियत से अर्जुन की तरफ देखा जो खुद भी गंभीर चेहरा बनाने के बाद मुस्कुरा दिया.

"It's ऑलराइट.", अर्जुन आगे कुछ सुन्न ने से पहले हे बहार निकल चला. और उसके पीछे ये दोनों.

"सॉरी ऋतू. बोई ने मजाक किया और मैंने वही बोल दिया. तुम्हारा भाई बुरा नहीं मन."

"नहीं. वो भी जानता है की मजाक कर रहे थे.", दोनों बहार आयी तोह अर्जुन ड्राइवर सीट पर बैठ कर कार स्टार्ट कर रहा था. अलका और रूचि बुआ पिछली सीट पर बैठ चुकी थी.

"अगर किसी को प्रॉब्लम न हो तोह मैं फ्रंट सीट पर बैठ सकती हु?", मरीना पहली बार हे इनके यहाँ आयी थी और ऋतू को भी वो ाची लगी थी. अर्जुन ऋतू की gair-maujdgi में जो चाहे करता लेकिन यहाँ बस सब निर्णय ऋतू के हे थे.

"हाँ क्यों नहीं. ारु ध्यान से चलना.", अर्जुन वैसे भी इतने लोगो के साथ कार को निर्धारित गति में हे चलता था लेकिन ऋतू के ऐसा बताने पर वो और सावधानी से कार को लिए घर से चल पड़ा.

"कौनसे सेक्टर में जाना है?", शीशे से रूचि को देखते हुए अर्जुन ने पुछा था और वो भी आवाज के साथ शीशे में उसकी नजरो से नजरे मिलती मुस्कुरा दी.

"क्सक्स सेक्टर में है हमारा घर. इस स्ट्रीट से राइट टर्न..", मरीना अपना रेडियो चलती उस से पहले हे अलका हंसने लगी.

"मरीना ये इस सेहर में हे रहता है. ारु, वापसी में अपने मोडल टाउन की मार्किट से सिलाई के कपडे भी लेते जाने है.", अलका की बात सुन्न कर अर्जुन ने हाँ में गर्दन हिला दी. वो रह रह कर कनखियों से कभी मरीना को देखता तोह कबि आईने से रूचि, ऋतू और अलका को. ऋतू बगल में हे बैठी थी रूचि बुआ के और अर्जुन को ऐसा करता देख उसने सर पे हलकी सी चपत लगा दी.

"सड़क सामने है."

"लेफ्ट साइड और इस अंदर वाले मिरर से बाकी ट्रैफिक भी देखना पड़ता है दीदी. कोई उस तरफ से टकरा गया या मैंने ब्रेक लगाई तोह पीछे वाली गाडी टक्कर लगा देगी तब क्या होगा?", अब ऋतू अपने भाई की चालाकी से निरुत्तर थी और वो ढीठ की तरह हंस के ऋतू को देख रहा था.

"चल फिर भी सड़क पे ज्यादा ध्यान दे. वैसे रूचि बुआ, आप थोड़े दिन हमारे हे इधर आ जाओ.", ये ऋतू ने तोह औपचारिकता में कहा था.

"न यार, मेरा बीटा घाना शरारती है और यहाँ वो अपने मां गइल (साथ) हे खुश है तोह मेरा पापा के घर रहना हे ठीक. आज तोह ख़ुशी उनके साथ गयी हुई है तोह मैं आ गयी लेकिन कल से वो भी घर में होगी तोह मेरा भी मन्नू और ख़ुशी के साथ घर रहना ठीक. वैसे घडी दो घडी तोह आ जाया करुँगी, ड्राइवर भेज दिया करियो.", यहाँ भी अर्जुन को हे लपेटा था रूचि ने और ऋतू हंस रही थी. जिसको ड्राइवर बोल कर मजे लिए जा रहे थे अगर उसकी असली दृवारी रूचि देख चुकी होती तोह वो मजाक न करती.

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"इतनी हिम्मत लायी कहा से आप दीदी?", 4 बज चुके थे शाम के और माधुरी दीदी की बगल में अब प्रियंका बैठी थी इस बंद कमरे में. माधुरी के जिस्म पर एक ढीला सा गाउन था और अभी तक जिस्म में भरपूर खुमारी थी उस तगड़े संसर्ग की.

"तू यही रहने वाली है अभी कुछ साल पिंकी. मेरे तोह यहाँ दिन भी 10-11 बाकी रह गए. ऊपर से जब एक बार शरीर को सुख मिल जाए तोह ये और की चाहत रखने लगता है. गयी तोह थी मैं रात का प्रोग्राम बनाने लेकिन उसके अजगर को जगा दिया गलती से. क्या तबियत से निचोड़ा है न आज, बता भी नहीं सकती.", माधुरी के चेहरे पर अलग हे चमक थी और कपडे के ऊपर से अभी तक चूचक सूज कर अपनी स्थिति बता रहे थे.

"पता चल हे रहा है, बताने की जरुरत नहीं है दीदी. लेकिन आप तोह पहले भी कर चुकी हो कई बार, फिर भी ऐसी हालत? और रात का क्या बना?"

"पहली बार लिया था तब आँखों में पानी और छूट में खून निकल आया था. लेकिन अब तोह उसका वो भी पूरा मूसल हो चूका है और ऊपर से तेरा अभी तक एक हे बार हुआ है न, वो भी उसने बड़े प्यार से किया होगा. मेरी तोह अब तक की सबसे जोरदार वाली करि है लेकिन सच कहती हु दिन में तारे देखने का मजा भी अलग हे है. फोड़े की तरह सुजा कर रख दी है, दवा न लेती तोह कपडे भी न पहन सकती."

"मतलब फुल जोरदार म्हणत करि आपके साथ. वैसे सही कह रही हो आप, मेरे साथ किया तोह बहोत प्यार से था लेकिन जो दर्द हुआ था न पहले 10 मिनट.. बाप रे.. और आप तोह बक्सीडे भी करवा चुकी हो."

"जाने से पहले तोह बक्सीडे 2-3 बार ढीली करवा हे लुंगी. और देखती रह पिंकी, अब तोह माँ भी यही बनाएगा मुझे. गौरव को मैं हैंडल कर लुंगी और जब ये वह मुझे लेने के लिए आएगा तोह एक रात अपने ससुराल में ना अर्जुन के साथ सेक्स किया तोह मेरा भी नाम माधुरी नहीं.", अपनी बड़ी बहिन के ऐसे प्लान सुन्न कर प्रियंका की आँखें चौड़ी हो गयी.

"आप जानती है न आप क्या कह रही है? गौरव जीजू को वैसे भी पता चल हे जाना अगर उनका अर्जुन जैसा न हुआ तोह. ऊपर से इतना रिस्क लेने की सोच रही है आप.", प्रियंका को हैरान देख माधुरी कुटिलता से हंसने लगी.

"अब तुझे एक और बात बता देती हु मेरी बहिन लेकिन इसको अपने तक हे रखना.", माधुरी के ऐसे अधूरी बात कहने पर प्रियंका ने जल्दी से हाँ में गर्दन हिलाई.

"बताओ ऐसी क्या बात है जो आप इतना कुछ सोच कर बैठी हो. आपने तोह कहा था के गौरव जीजू बड़े हे ाचे व्यक्ति है."

"हाँ बाबा, वो दिल का बड़ा हे साफ़ व्यक्ति है. जब गाँव गए थे तोह हमको 5 मिनट के लिए बात करने के लिए अलग भेजा था विनोद चाचा के कमरे में. गौरव ने पहली बात यही कही थी की 'तुम बहोत सुन्दर हो माधुरी लेकिन मैं चाहता हु के तुम रिश्ते के लिए मन कर दो.', और मैं तोह चाहती भी यही थी की रिश्ता हो हे नहीं. लेकिन अब गौरव के बड़े भाई अभिषेक जो है वो हैं लोकल राजनेता और वह पर उनका बहोत ाचा सम्बन्ध है अपने परिवार से.", माधुरी सबकुछ बताती हुई थोड़ी गंभीर भी हो गयी थी.

"तोह इस सबमे रिश्ते के लिए हाँ कैसे हुई?"

"गौरव से मैंने मन करने की वजह पूछी तोह उसने कहा की वो शादी सिर्फ अपने बड़े भैया के दबाव में कर रहा है. अगर मैं उसके साथ रिश्ता सवीकार करती हु तोह वो मुझे हर वो सुख देगा जिसकी चाहत हर औरत हो रहती है लेकिन अंतरंग सुख की ज्यादा उम्मीद न राखु. अब अपनी कमी तोह कोई भी व्यक्ति खुल कर बताता नहीं है."

"तोह फिर हाँ क्यों कही आपने? ये तोह पन्गा हो जायेगा दीदी और आपकी लाइफ भी खराब."

"ओह पिंकी डार्लिंग वो नपुंसक नहीं है. बचा दे सकता है मुझे जैसा उसने खुद कहा भी था की वो मेरा ध्यान रखेगा लेकिन ज्यादा इंटरेस्ट नहीं हैं इन सबमे. वो तोह यहाँ तक कह गया की अगर पहले भी मेरा कोई बॉयफ्रेंड रहा हो तोह मुझे प्रॉब्लम नहीं है. गौरव को बस अपना काम पसंद है बाकी वो घर में सिर्फ shanivar-eitvar रहा करेगा. अब मेरी उम्र भी 23 हो चुकी है और जब सामने वाले को अपनी आजादी चाहिए तोह मैं भी खुश. घर भी ठीक है और मुझे दिक्कत भी नहीं आएगी.", अब कही प्रियंका के पल्ले बात घुसी की उसके होने वाला जीजा जी थोड़ा से अलग स्वभाव के है जिनकी अपनी एक अलग हे ज़िन्दगी है. वो नियोजित समय हे देंगे और बाकी पूरा maan-sammaan.

"मतलब सुहागरात को पन्गा हुआ तोह?"

"जरुरी तोह नहीं हरेक के पहले बार में खून निकले? और बिस्टेर में सिसकने के साथ छूट को कसना मुझे आता है ाची तरह से. ऊँगली से भी तोह झाड़ जाते है न, उस से तोह सही होगा. और जब कभी मौका मिलेगा तोह अर्जुन तोह है हे. कुछ भी हो मेरा पहल और आखिरी प्यार वही है बस.", माधुरी की बात सुन्न कर इस विषय पर तोह प्रियंका कुछ न बोली लेकिन समय देखते हुए उठ कड़ी हुई.

"उठ कर कपडे पहन लो दीदी. कीर्तन 5 बजे शुरू हो जायेगा और आपका वह होना जरुरी है.", प्रियंका की बात पर माधुरी उठने लगी तोह एक मजे की सिसकारी निकल गयी.

"आठ.. नहाना हे ठीक रहेगा यार. इतने दिनों बाद सेक्स करना भी हालत ख़राब कर हे देता है. वैसे तू भी करवा हे ले थोड़ी सर्विस.", धीरे धीरे बाथरूम की तरफ कदम बढाती माधुरी दीदी के हिलते कूल्हों को देख प्रियंका के चेहरे पर अलग हे मुस्कराहट आ गयी.

"जब उसका दिल करेगा तोह कर लेगा दीदी. वैसे आपकी शेप तोह ाची बना दी है उसने.", प्रियंका की बात सुन्न कर माधुरी भी हंसती हुई बाथरूम में दाखिल हो गयी. प्रियंका ने भी सोच हे रखा था के वो हाथ का सहारा तोह नहीं लेगी लेकिन अपनी आग भी काबू में रखेगी जिस से जब भी अर्जुन का सान्निध्य प्राप्त हो तोह पूरा सुख मिले.

'पहले जनाब मिले तोह सही, हम तोह तीनो तरफ से स्वागत करने को तैयार है अब. ये तारा को हे पकड़ती हु सही टाइम देख कर. करेगी कुछ न कुछ तोह दोनों के लिए.', चाहत हर इंसान जाहिर नहीं कर सकता और हर किसी की चाहत भी अलग हे होती है. प्रियंका और माधुरी की चाहत बेशक एक जैसी थी लेकिन जाहिर कर पाना प्रियंका के लिए कही ज्यादा हे मुश्किल था, ठीक कोमल की तरह.

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"गंडक (कुत्ते) बाद में खिला लियो सरपंच जी, थोड़ी हाँ (समय) महारे (हमारे) सत्ती (साथ) भी बाटल्या लो.", रुचिता अपने कमरे से कपडे बदल कर बहार आयी तोह मिली के साथ खेलने में व्यस्त अर्जुन इस आवाज की दिशा में देखने लगा तोह भोचक्का हे रह गया. उस छरहरे शरीर पर इतने उन्नत्त वक्षो की जोड़ी की कल्पना तोह सपने में भी नहीं की थी. तुरंत ध्यान हटाता वो चेहरे को देखने लगा. रूचि मुस्कुरा रही थी और उसके सांवले खूबसूरत बदन पर आसमानी नीला सलवार कमीज बेहद आकर्षक लग रहा था.

"हांजी बुआ. वो सभी लोग चले गए थे तोह मैं मिली के साथ खेलने लगा.", अर्जुन इस वक़्त नजरे चुरा रहा था और वो जानता था के यहाँ उसकी 2 बहनो के साथ हे मरीना भी उपस्थित है, बेशक वो लोग मरीना के कमरे में थी. रूचि को तोह अर्जुन का ये झेंपना भी अपनी तारीफ हे लग रहा था.

"ये सारे मेरे पापा की हे औलाद जैसे है अर्जुन. वैसे तू इतना lamba-chauda हो है, सेटिंग वेटिंग तोह जरूर होगी.", रूचि ने आख़िरकार अर्जुन की तारीफ कर हे दी थी.

"जी सेटिंग तोह पता नहीं लेकिन मेरी शादी पक्की हो चुकी है प्रीती के साथ. कॉलेज के बाद हो भी जाएगी.", अर्जुन सोफे पर बैठा तोह बहादुर ठंडा शरबत ले आया, जिसकी जरुरत भी थी इस वक़्त.

"घनी (बहोत) सुथरी लड़की है प्रीती, मैं मिली थी उस से बस थोड़ी शर्मीली है लेकिन तेरी टक्कर की छोरी है. लेकिन तन्ने देख के तोह न लगता के तू एक हे कबूतरी से बंधा है?", आँखें तरेर कर जैसे हे रूचि ने ये सवाल किया अर्जुन असहज सा होने लगा था. वो तोह बिलकुल हे बिंदास बोले जा रही थी, अर्जुन की हालत पर मंद मंद हंसती हुई.

"आपको क्या लगता है आप हे बता दो बुआ.", अर्जुन को बस यही समझ आया तोह उसने बोल दिया.

"मैं तोह पहली बार मिल रही हु लेकिन सच कहु तोह ऐसा लड़का gaam-kasbe में दूर दूर तक जाना जाता है. तेरी कबूतरिया भी उम्मीद से ज्यादा हे होंगी."

"बुआ, फिर तोह ऐसा हे आपके साथ भी होता होगा.", अर्जुन ने सामने से हे बात करना ठीक समझा. नहीं तोह रूचि रुकने को मान हे कहा रही थी. लेकिन इस सवाल पर वो बड़े ध्यान से अर्जुन को देखने लगी.

"मेरे को तोह मेरे पति ने भी ब्याह के अगले दिन देख्या था."

"तोह फूफा जी की तोह निकल पड़ी होगी?", अर्जुन ने वैसे हे मजाक में ये बोल तोह दिया लेकिन रूचि का जवाब भी वैसा हे आया.

"हाँ निकल पड़ी तेरे फूफा की तोह. बिज़नेस चमक गया था ब्याह के बाद हे और कहते सुण्या था उन्हें अपने दोस्त को की नजर का टिका मिल गया रुचिता के रूप में. 2 बालक हो गए जुड़वाँ और उसके पाछे तोह वो साड़ी हाँ (वक़्त) बस कड़े मलाईसीए, कड़े थाईलैंड या फेर किसी यूरोप के देश में बैठ्या रेहवे है. ेब भी ताइवान है और 2 महीने बाद आएगा फेर कही और निकल लेगा. तन्ने के लागे है लुगाई गुस्सा क्यों करे है?"

"जब अनदेखी हो लेकिन आपसे तोह सभी प्यार करते है."

"सच केहवे है ताई तू बैलबुद्धि है. अनदेखी वाली बात सही और प्यार वाली बात गलत. बचपन से देखती आ रही हु के बहार कोई दोस्त न होया करता मेरा, थोड़ा बहोत bhai-behano में खेल लिए लेकिन वो भी kallo-kaali कह के चिडया करते. पापा मम्मी ने बहोत प्यार दिया और मेरा भाई भी ेब मेरी िज्जात्त करे है. लेकिन समाज में दौलत होना सबकुछ नहीं अर्जुन, दुनिया इसके साथ आदमी की रंगत भी देखती है. मैं अपने आप से बहोत प्यार करती हु लेकिन लोगो की नजरे heen-bhavna पैदा कर हे देती है. 39 की होने वाली हु और जब से होश संभाला है तबसे पापा के बाद एक तू हैं जिसने न्यू कह्या के मैं खूबसूरत हु."

"आपको भी ये रंगत वाली बात पर विश्वास है?"

"विश्वास लोग भगवन पे कर लेते है जो दीखता नहीं और जो दीखता है उसमे kami-khot निकलने से हटेंगे भी नहीं. जानती हु रंग बस इंसान की एक बाहरी परत है लेकिन हर इंसान दुआ क्या करता है बचे गोर हो, लम्बे तगड़े हो, अमीर हो.. कोई कहता है के दिल का साफ़ औलाद हो जाये, चाहे कला हे हो? ऊपर से लड़की काली तोह समझ लो बेडा हे गरक."

"मैं तोह परवाह नहीं करता और सच कहु तोह गहरा रंग हे सच है. गोर आवरण पर तोह नैन नक्श के साथ साथ इंसान के भाव भी पता नहीं चलते. अगर आप खुद हे इस वजह से बेचैन रहेंगी की सामने वाला आपको देख कर सिर्फ रंगत के बारे में सोच रहा है तोह खुद को हे दुःख देंगी. मैंने भी तोह पहली हे बार देखा था न?", अर्जुन अपनी बात कहते कहते चुप हो गया. रूचि प्रभावित थी इस नवयुवक के नजरिये से और इतनी बारीकी से उसके मानसिक विश्लेषण करने पर.

"तोह क्या देखा?"

"यही की आप लाखो में एक है. और अब तोह कही ज्यादा हे बेहतर लग रही है."

"हाहाहा.. चल तू कह रहा है तोह मान लेती हु. वैसे मैं कोशिश करुँगी की इस सबके बारे में ज्यादा न सोचु लेकिन फ़िलहाल ये गुस्से वाली आदत."

"वो रहने दीजिये. जो चीज जंचती है उसको तोह बरकरार हे रखना चाहिए.", ऊपर सीढ़ियों से 2 बैग लेकर आती Ritu-Marina को देख अर्जुन ने बात ख़तम करते हुए शरबत पर ध्यान देना बेहतर समझा. अलका भी कुछ कदम पीछे एक पैकेट लिए आ रही थी.

"बोई चले?"

"हाँ राजकुमारी जी, थारी हे हे बात देखा थे हम तोह. चाल तेरी माँ का जी घट्ट न रहा हो.", रूचि पल में हे वापिस अपने अंदाज में आ चुकी थी और 5 बजने पर वो लोग वापिस कार में थे. रूचि की चाहत थी अर्जुन से अभी ढेरो बात करने की, कितने हे समय बाद वो सहज हुई थी लेकिन अभी माहौल नहीं था.
 
अपडेट 149

चाहत - 2 (ा)

"उधर कहाँ चले? अब ये मत कहना की तुम्हे भी कीर्तन में बैठना पसंद है?", विन्नी जैसे हे अर्जुन के समीप कड़ी हुई, वो घर के अंदर जाने लगा. विन्नी इतने वक़्त में एक बार भी अर्जुन से ढंग से मिल भी न पायी थी और अब उसके पास सही मौका था. घर की सभी महिलाये और युवतियां बैठक में चल रहे कीर्तन में शामिल थी, aas-pados की महिलाओं के साथ.

"मेरी प्यारी विन्नी दीदी, मैं तोह खुद इस शोर से बचने के लिए आप लोगो के कमरे में जा रहा हु. चलो अगर साथ चलना है तोह.", अर्जुन का ऐसा जवाब सुन्न कर जो ख़ुशी विन्नी के चेहरे पर इस वक़्त थी, जैसे अर्जुन ने उसके दिल की बात हे कर दी.

"हाँ, मुझे भी ये सब पसंद नहीं लेकिन जब सभी इधर है तोह मैं अकेली भी क्या करती? अब तुम मिल गए हो....", अर्जुन से वो इतना कहते कहते हे खामोश हो गयी. यहाँ गेट पर ये नीली एस्टीम कार आ रुकी थी और इन दोनों की नजर हे उस से बहार आते आदमी और औरत पर अटक गयी. सुघड़ शरीर की वो महिला बेहद गोरी थी, औसत कद के साथ. व्यक्ति महंगी जीन्स और कालर वाली टीशर्ट के साथ धुप का चस्मा लगाए था, जो बहार निकलते हे उसने अपनी सामने वाली जेब में रख लिया.

"ऐ लड़के, जरा कार से सामान निकल कर कमरे में रखो.", अर्जुन को वो व्यक्ति जैसे आदेश दे रहा था ये सुन्न कर विन्नी का पारा अपनी हद्द से ज्यादा चढ़ गया. वो कुछ बोलने को हे हुई थी लेकिन अर्जुन के जवाब ने उसको वही रोक दिया.

"जी चाचा जी, नमस्ते. ये भी कहने वाली बात है भला? नमस्ते चची जी.", अर्जुन द्वारा उन्हें चाचा चची कहना जहा विन्नी को शांत कर गया वही वो व्यक्ति थोड़ा झेंप गया अपने हे कहे शब्द पर. महिला ने सपाट चेहरे से नजरे झुककये हुए हे अर्जुन को प्रतिउत्तर में नमस्ते बोलै. 2 बैग पिछली सीट से निकलते हुए अर्जुन उन्हें लिए मेहमान कमरे में दाखिल हो गया. विन्नी भी रसोईघर चली गयी थी पानी लाने.

"तुम हो शंकर भाई के लड़के?", ये व्यक्ति जैसे अलग हे मिटटी का बना था और कही से भी रामेश्वर जी के इस संसार वाले किसी सदस्य जैसा न था. जूते खोलने के बाद उन्ही हाथो से विन्नी द्वारा लाया पानी का गिलास पकड़ते हुए उसने एक सरसरी नजर विन्नी पर मारी और मुँह में हे पानी घूमने लगे.

"जी चाचा जी, अर्जुन नाम है मेरा. आप थोड़ा आराम कीजिये मैं चाय लेके आता हु आपके और चची जी के लिए. भाई (नन्हा बचा) तोह शीशी का दूध नहीं पीटा न?", अर्जुन द्वारा उस नवजात को भाई कहने पर ये आदमी थोड़ी शेखी से बोलै.

"कॉफ़ी बना देना अगर आती हो तोह. लगता है सभी bhajan-kirtan में व्यस्त है और तुम भी बहनो में रह कर घर ग्रहस्थी सीख रहे हो. तुम्हारा भाई अपनी माँ का हे दूध पीटा है तोह उसका आहार उसके पास है.", विन्नी तोह पानी देते हे इधर से चली गयी थी और अब अर्जुन भी दोनों गिलास लिए निकल गया.

"जी, मैं ताई जी की तरफ चली जाऊ? निकेतन सो रहा है.", पहली बार ये महिला कुछ बोली थी और वो भी जैसे दबी हुई आवाज में.

"हाँ चली जाओ.", इतना कह कर ये व्यक्ति 2 तकिये सिरहाने लगता हुआ पसर गया. बचा चैन से सो रहा था और महिला यहाँ से बहार आँगन में निकलती हुई पहले बाथरूम गयी और फिर बैठक में, जहा सभी bhajan-kirtan में व्यस्त थे. कुछ हे समय बाद घर में प्रवेश करते शंकर और इन्दर भी सीधा इस मेहमान कमरे में दाखिल हो गए.

"क्या हाल है तेरे बिन्दिये?", नरिंदर जी ने तोह आते के साथ हे पंजा इस व्यक्ति की जांघ पर छाप दिया था. इस मस्ती भरी मुलाकात में इन जनाब के चेहरे पर बेबसी के साथ झूठी ख़ुशी भी आ गयी.

"आठ.. इन्दर भाई.. मैं तोह बढ़िया हे hu..aap सुनाओ. कैसे हो शंकर भैया?", उसकी हालत देख कर शंकर जी ने अपना प्यार नहीं जताया नरिंदर की तरह. बस हँसते हुए उसको एक तरफ सरकते हुए बगल में बैठ गए.

"विनोद, तू तोह आज दोपहर तक आ रहा था? वैसे पर्सनालिटी तोह गज़ब हो गयी है तेरी और कार भी टॉप मॉडल.", ये व्यक्ति कृष्णेश्वर के सुपुत्र विनोद शर्मा थे और इन दोनों के छोटे चचेरे भाई. अभी तक वो अपनी जांघ मसल रहा था लेकिन तारीफ सुन्न कर थोड़ा खुश हो गया.

"वो जरुरी काम पड़ गया था भैया होटल का, इसलिए देरी हो गयी आने में. अब रात रुक के हे जाना पड़ेगा. वैसे भी इन्दर भाई के साथ बियर पीने को मिलेगी तोह बढ़िया हे हुआ.", बियर वाली बात सुन्न कर नरिंदर भी करीब होते हुए विनोद की जांघ सहलाने लगा.

"बड़ा बिजनेसमैन और हमारे जैसे बेरोजगारों के साथ बियर की ख्वाहिश? चलो इतना तोह जुगाड़ हे लेंगे तेरे लिए, मेरी जानेमन. वैसे आज तोह राजू भाई भी मूड में है, पिछले घर हे चलते है. तू मिल ले घरवालों से और नाहा धो लियो. उमेद बियर और मुर्गा ले कर उधर हे आएगा सीधा.", अभी वो और बातें करते लेकिन अर्जुन को ट्रे में 4 कप कॉफ़ी लाते देख बातें रोक दी.

"वाह, मेरा बीटा तोह ये सब काम भी करने लगा. आज तेरे हाथ की कॉफ़ी भी पी कर देखते है.", नरिंदर जी ने अर्जुन से ट्रे ले कर बिस्टेर पर राखी तोह एक कप काली कॉफ़ी का भी था.

"थैंक यू यार, मुझे बड़ी तालाब थी इस ब्लैक कॉफ़ी की. विनोद, ये अर्जुन है. हमारा बीटा और अर्जुन तेरे चाचा जी तोह चले जायेंगे चची को छोड़ कर. अपने छोटे भाई का पूरा ख़याल रखना, बचो की बहोत सी जरुरत होती है.", शंकर जी आज ठीक पुराने अवतार में थे जहा वो हमेशा अर्जुन के साथ आत्मीयता से पेश आते थे. अर्जुन ने भी ख़ुशी से हामी भर दी.

"जी पापा. और दोनों बाथरूम में तोलिये रख दिए है. अंदर वाले में आपके कपडे भी, माँ ने बताया था के आप नाहा कर डॉक्टर दादा जी के घर जाने वाले है.", अर्जुन ने बात करते हुए उस मासूम से गोल मटोल बचे पर निगाह की जो हलके हलके होंठो को हिला रहा था नींद में.

"हाँ सही याद करवाया यार. इन्दर तू भी नाहा ले फिर विनोद को भी साथ ले कर सांगवान चाचा के फार्महाउस चलते है.", अर्जुन तोह चला गया था और शंकर जी ने अब बाकी दोनों से कहा.

"अब वह क्यों? जब पार्टी अपने पिछले घर में है तोह फार्महाउस नहीं जाना."

"अबे सुन्न तोह लिया कर भाई. वह सामान रखा है कुछ जो लेके आना है. उस फार्महाउस पे कल से काम चलने लगेगा क्योंकि शादी वाले मेहमान भी वह रुकेंगे. चल तू कॉफ़ी ख़तम कर और विनोद, पापा भी आ गए बहार. कॉफ़ी ख़तम करके मिल लेना उनसे, बगीचे में हे बैठे है.", शंकर जी यहाँ 5-10 मिनट और बैठे ऐसे हे बातें करते हुए. उधर अर्जुन को साथ लिए अब विन्नी घर के सबसे ख़ास कमरे में थी. ये वही कमरा था जहा अब कोमल दीदी रहने लगी थी, Ritu-Alka के कमरे के साथ जुड़ा हुआ वो ख़ास कक्ष.

"विन्नी दीदी, ये आपको क्या हुआ?", अर्जुन स्थिरर खड़ा था और उसके सीने से विन्नी कस कर लिपटी बस खामोश थी. विन्नी के बाहुपाश में क़ैद अर्जुन भी कुछ कुछ उनकी हालत समझ रहा था लेकिन ये वक़्त प्यार के लिए मुनासिब भी नहीं था.

"आप कुछ तोह बोलिये दीदी. घर में सभी है इस वक़्त और मेरा इस कमरे में आपके साथ होना गलत कहलायेगा अगर किसी ने देख लिया तोह."

"तुम्हारे पास टाइम हे कब होता है? और मुझे किसी के देखने या आने की कोई परवाह नहीं लेकिन अब और दुरी बर्दाश्त नहीं होती.", विन्नी के खूबसूरत चेहरे पर आया दर्द उसकी चाहत के साथ दर्द भी दिखा रहा था. एक पल के लिए अर्जुन ने भी सबकुछ भूलते हुए, उनका चेहरा दोनों हाथो में थाम लिया. खुद हे विन्नी ने होंठ आगे बढ़ाते हुए अर्जुन के होंठो से मिला दिए. कशिश से भरा ये चुम्बन सिर्फ स्पर्श की चाहत था.

"सॉरी. रात को मैं मेरे हे कमरे में सोने वाला हु, आप बराबर वाले कमरे में सोने आ जाना.", अर्जुन ने इस बार खुद हे विन्नी दीदी को बाहों में लिए कहा था. विन्नी के दिल को अब कही सुकून आया और वो कुछ पल ऐसे हे उस मजबूत सीने से लगी इस एहसास में डूबी रही. वो कोई शारीरिक मिलान के लिए लालायित न थी, बस अर्जुन के साथ कुछ एकांत पालो की चाहत थी.

"ठीक है, मुझे भी ाची नींद की जरुरत है. तारा के सोने के बाद मैं तुम्हारे पास चली आउंगी.", अर्जुन ने भी इस बात पर सहमति देदी. अब दोनों हे संनयात्त थे हलकी मस्ती करते हुए अर्जुन ने विन्नी दीदी के उभरे हुए ठोस कूल्हों पर हाथ जमा दिए.

"पता नहीं नींद आएगी या उड़ेगी. वैसे हे सोना पड़ेगा जैसा पिछली बार..."

"छियई.. गंदे कही के. तुम्हे रात को ठीक करती हु मैं और ये हाथ ज्यादा हे नहीं घूम रहे?", मजा विन्नी को भी आ रहा था अर्जुन की हरकतों से लेकिन शर्म से गाल गुलाबी भी हो रहे थे. अर्जुन ने थोड़ी और आगे बढ़ते हुए वो नरम फूला हुआ हिस्सा पंजो में दबोच लिया.

"अभी तोह आप सीने से लगी है नहीं तोह ये हाथ तोह इस से भी ज्यादा सॉफ्ट जगह जाना चाहते थे. वैसे रात को तोह खुद आप उन्हें मेरे हाथो में पकड़ने वाली हो.", अर्जुन का इशारा विन्नी के मॉटे चुचो से था जो अपने आप में हे ख़ास थे. छरहरे लम्बे शरीर पर विन्नी के वो मॉटे सतांन बहार से उतना नहीं पता चलते थे जितना निर्वस्त्र अवस्था में.

"कर लेना जो करना हो तुम्हे, मैं तोह खुद चाहती हु की तुम ऐसे हे मेरे साथ रहो. वैसे वो तुम्हारा चाचा बद्तमीज होने के साथ साथ ठरकी भी है. जैसे उसने तुम्हे बुलाया था, मेरा दिल कर रहा था की गोली मार दू. कमीना अपनी बीवी के सामने भी मुझे ताड़ रहा था. हैं कौन वो जाहिल?", अब बातों का रुख बदला तोह अर्जुन बीएड के किनारे बैठ गया, विन्नी को अपनी जांघ पर बैठते हुए. चेहरे पर हंसी थी और एक हाथ विन्नी के मखमली गाल पर.

"ओह मेरी प्यारी दीदी, इतना गुस्सा मैट किया करो और वो छोटे दादा जी के बेटे है विनोद शर्मा. एकलौते है और लाडले भी, तोह हुकुम चलने की आदत पड़ चुकी है. मैं खुद उनसे पहली बार मिला था आज, जबसे बड़ा हुआ हु. लेकिन जानकारी थी की वो कौन है. वैसे बुरा मुझे भी लगा था जब वो आपको देख रहे थे और उनकी बीवी, अनामिका चची शर्मिंदा होती नजरे झुका रही थी. लेकिन जाने दो न क्यों मूड खराब करती हो आप अपना.", अर्जुन का एक हाथ उनकी पीठ से होता हुआ कमर को पकडे था जिस से विन्नी बिलकुल चिपकी हुई थी एक तरफ से. वो मोटा उभार ढीले टॉप की वजह से उतना बड़ा नहीं दिख रहा था लेकिन अर्जुन के होंठो से बस एक इंच दूर था. अर्जुन की सांसें वह लगने से विन्नी ने अपना उभर उसके चेहरे से सत्ता दिया.

"उसकी तोह हालत खराब करके रहूंगी, तुम देखते रहो बस. तुम्हारा चाचा है तोह मैं भी भतीजी लगी न लेकिन फिर भी घर रहा था, अब जलवे दिखती हु और उसके बाद हालत देखना अपने चाचा की. आह्ह्ह्ह.. ", विन्नी जैसे मैं हे मैं कुछ ठान चुकी थी और जैसे हे अर्जुन ने कपडे के ऊपर से उस उभर को चूमा शरीर कांप गया. विन्नी ने खुद हे अर्जुन का चेहरा अपने दोनों कबूतरों के बीच दबाते हुए एक और मादक सिसकी दी..

"बस करो यार विन्नी दीदी. कीर्तन ख़तम होने वाला होगा, तोह आप निचे जाओ. मुझे घंटा भर सोने दीजिये, फिर रात को प्यार कर लेना जितना दिल करे.", अर्जुन ने कूल्हों पर हलकी चपत लगते हुए उन्हें उठने का इशारा किया तोह वो हंसती हुई उठ कड़ी हुई.

"रात को बस तैयार रहना. कर लो आराम, मैं जरा देखु वो ठरकी चाचा क्या गुल खिला रहा है.", विन्नी आँख मारने के बाद कमरे से निकल गयी और अर्जुन भी हँसता हुआ तकिये को सीने से लगता बिस्टेर पर लेट गया. ये बिस्टेर उसकी प्यारी कोमल दीदी का था और उनकी महक हमेशा सुकून देती थी अर्जुन को. 2 मिनट में हे आँखें बोझिल होते होते बंद हो चुकी थी. नींद की सख्त जरुरत भी थी उस शरीर को.

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6 बजे कीर्तन ख़तम हुआ तोह aas-pados की महिलाये धीरे धीरे करके बहार निकलने लगी. अन्नू के माता जी भी आज यहाँ आये हुए थे जो रेखा और ललिता जी से बात करती हुई बहार दरवाजे तक आ गयी थी. कृष्णा जी को मल्होत्रा आंटी और उनकी बेटी अपने साथ हे घर ले गयी. सरोज भाभी भी माधुरी प्रियंका के साथ बातें करती हुई उन्हें लिए अपने घर के आँगन में चली आयी. मेहमान कमरे के दरवाजे पर खड़ा विनोद सभी को देख रहा था.

"कोमल बिटिया, ताई जी कहा है?", विनोद ने आँगन में अब सिर्फ 5-6 युवतियों को खड़े पाया तोह कमरे से बहार इधर हे चला आया. यहाँ कोमल दीदी आकांक्षा और रुपाली से कुछ बात कर रही थी. वही उनके पास हे प्रीती भी आकांक्षा के कंधे पर हाथ रखे मुस्कुराती हुई उनकी बातों को सुन्न रही थी लेकिन विनोद चाचा की आवाज पर कोमल दीदी पलटी तोह आकांक्षा यहाँ से निकल चली रुपाली को अपने साथ लिए. प्रीती ने हाथ हिला कर 'bye' का इशारा किया तोह वैसा हे जवाब मिला.

"चाचा जी, दादी जी तोह अभी अभी पापा के साथ कश्यप अंकल के गयी है. वो आंटी को बप की प्रॉब्लम है थोड़ी इसलिए.", इस दौरान विनोद बड़े ध्यान से प्रीती को भी देख चूका था जो उन्हें नमस्ते कर रही थी.

"ाचा ाचा. मैं तोह बस ऐसे हे पूछ रहा था क्योंकि मिला नहीं हु अभी तक उनसे. वैसे ये बिटिया तोह वह गाँव भी आयी थी ऋतू के साथ?", विनोद को प्रीती पहचान में आ गयी थी बेशक वह वो ज्यादा मिल नहीं सका था इन सबसे लेकिन इस लड़की का आकर्षण एक घंटे में हे उसके सर चढ़ गया था वह.

"जी, प्रीती छोल दादा जी की पौती है और अर्जुन का रिश्ता इसके हे साथ हे हुआ है.", कोमल ने एक लाइन में हे सही परिचय दे दिया था प्रीती का और ऋतू द्वारा बुलेट स्टार्ट करने पर प्रीती उसके पीछे जा बैठी. विनोद हैरत से वो लाल बड़ी मोटरसाइकिल और उसपे सवार ऋतू को देखने लगा.

"दीदी, 10-15 मिनट तक आ रहे है अपनी हे मार्किट से. टेलर से कपडे लाने जरुरी है, 7 बजे दूकान बंद हो जाएगी और कल सोमवार है.", ऋतू ने तोह विनोद चाचा पर कोई ध्यान हे न दिया था, जैसे वो वह मौजूद हे न हो. कोमल द्वारा हाँ करते हे वो dug-dug करती रानी बड़ी शान से गलियारे से होती बहार वाले गेट से निकल गयी. अन्नू की माता जी भी मुँह पर हाथ रखे हंसने लगी थी ऋतू को बुलेट चलते देख.

"बीटा इस लड़की को तोह शंकर भाई ने कुछ ज्यादा हे सर चढ़ा रखा है. ऐसा तोह घर में लड़के भी नहीं करते और हमारे खानदान की बहु बेतिया संस्कारो से रहती है.", विनोद चाचा को तोह जैसे ऋतू का व्यवहार चोटिल कर गया था लेकिन उस से ज्यादा ठेस लगी थी प्रीती और अर्जुन के रिश्ते की बात जानकार.

"ऋतू को पापा ने नहीं चाचा जी, दादी जी ने खुद कहा था मोटरसाइकिल सीखने के लिए. संजीव भैया ज्यादातर बहार होते है और अर्जुन का रूटीन भी व्यस्त रहता है. दादी जी के लिए अब ऋतू बेटे जैसी है और इसमें दादा जी की भी सहमति है. आप chai-coffee लेंगे कुछ?", कोमल भी अब ज्यादा बात नहीं करना चाहती थी अपने इस चाचा से. बात सुन्न कर बुरा तोह लगा था लेकिन कोमल हमेशा हे शांत रहती थी.

"न chai-coffee की जरुरत नहीं है कोमल, तुम्हारे छोटे भाई ने बना दी थी मेरे लिए. खैर जब tauji-taaiji की सहमति है इतनी आजादी के पीछे तोह मेरा कहना हे कहा बनता है.", उनका जवाब सुन्न कर कोमल अपनी माँ और ताई जी साथ हे अंदर चली गयी. अलका और ऋचा अभी भी बैठक में गप्पे हाँक रही थी मरीना, रूचि बुआ और अनामिका के साथ, जो अब अपने बेटे को गॉड में लिए दूध भी पीला रही थी. विनोद टहलता हुआ अर्जुन की कार तक चला आया.

"ाची कार है न विनोद बीटा? ये दोनों हे अर्जुन की है लेकिन नीली उसने अपने बड़े भाई को शादी के उपहार में दे दी. ये वाली उसके लिए ख़ास है, जो तेरे ताऊजी ने गिफ्ट की है थोड़े समय पहले.", विनोद देख रहा था की कार को टाला नहीं लगा था, बेशक चाबी नहीं लगी थी. ये काली कार बिलकुल चकाचक थी और कौशल्या जी की बात सुन्न कर पहले तोह उसने चरण स्पर्श किये फिर नरमी से अपनी दिल की भड़ास निकलने लगा.

"क्या ताई जी, 18 का हुआ है वो लड़का और 2-2 कार, वो भी महंगी वाली. वो तोह आटोमेटिक मॉडल है, जो ज्यादा महंगा है. आपको नहीं लगता की एक लड़के जरुरत से ज्यादा हे दिया जा रहा है?", कौशल्या जी अपने भतीजे की बात सुन्न कर मुस्कुरा दी. उन्हें विनोद की तबियत के बारे में ाचे से पता था

"सबकुछ उसका हे है तोह काम क्या और ज्यादा क्या बीटा? दिया उसको लेकिन उसने तोह वो भी सबमे बाँट दिया. पिछले घर को खुद हे अपनी चाची (कृष्णा) के नाम कर दिया उसने और तू कहता है के हम उसको दे रहे है. तेरे बेटे का भी हिस्सा चाहता है वो दिल्ली वाले प्रोजेक्ट में.", विनोद अब और ज्यादा आहात हुआ था ये सुन्न कर की अर्जुन सबकुछ ऐसे बाँट रहा है. उसको तोह पहले हे इस बात से नाराजगी थी की उसके बाप ने अपने हिस्से की आधी जमीन भी अर्जुन के नाम लिख दी थी जिसको वो बेचने के सपने देखता रहता था.

"एक जेब से निकाल कर अपनी हे दूसरी जेब में डालना कबसे दान हो गया ताई जी. चलो छोडो ये सब तोह आप बड़े लोगो ने देखना है. वैसे ताऊ जी से कह के मेरा क्सक्सक्सक्स शहर वाला काम हे करवा दो आप. मेरी तोह मान नहीं रहे लेकिन आप कहेंगी तोह वो जमीन पास करवा देंगे. बड़े जीजा का भी पैसा लगा हुआ है उधर.", ये अपनी नयी जुगत भिड़ने लगा था विनोद, जिसको आये अभी घंटे से कुछ समय हे ऊपर हुआ था.

"शादी के बाद हो जायेगा तेरा काम लेकिन पहले बता देती हु जो भी बात हो पूरी बताएगा. प्रीतपाल (जीजा) पे तोह रत्ती भर यकीन न है मुझे, लेकिन तेरा बिज़नेस है इसलिए मैं उनको राजी कर लुंगी. प्रीतपाल से वो पहले हे नाराज है और तू एक और धंदा उस करमजले के साथ करने लगा है. सोच समझ के करियो जो भी करना है.", कौशल्या जी की खरी खरी सुन्न के भी विनोद को ाचा हे लग रहा था. एक यही थी जो उसमे और अपने बचो में फरक नहीं करती थी.

"तभी तोह आप मेरी माँ से भी बढ़कर हो ताई जी. निश्चिंत रहो, मैं बस वह भी होटल हे बनाने वाला हु पूरे कायदे के साथ. वैसे शंकर भाई नहीं आये वापिस. आपके साथ हे गए थे."

"आ रहा है शंकर भी अभी इन्दर के साथ. संजीव से कुछ बात कर रहे है दोनों हे बहार.", अभी कौशल्या जी ने इतना कहा था और तीनो व्यक्ति गेट से अंदर चले आये. संजीव ने भी विनोद चाचा से पाँव छू कर मुलाकात की.

"तेरी वाली कार की चाबी देदे संजीव, चलने में मजा आता है उसको.", शंकर जी ने इलो की चाबी मांगी तोह संजीव ने तुरंत उन्हें थमा दी.

"कही जाना हो तोह एस्टीम ले जइयो, हमको थोड़ी देर भी हो सकती है.", नरिंदर जी के ऐसा कहने पर कौशल्या जी ने अपने दोनों बेटो की तरफ घूर कर देखा और इस बीच विनोद की नजर फिर से घर में घुसती उस लाल बुलेट पर गयी जिसको देख उसकी ताई के चेहरे से गुस्सा गायब हो गया था.

"अब यही बाकी था बस. कही गिर गयी तोह एक टांग पर चलोगी बाकी उम्र.", शंकर जी हंस कर कह रहे थे ऋतू को और उनको बड़ी ख़ुशी हुई थी अपनी बेटी के इस स्वरुप को देख कर. ऋतू ने जिस कुशलता से दोहरा स्टैंड लगाया था वो देख नरिंदर जी ने जवाब दिया.

"मेरी बेटी है ये शंकर, डबल स्टैंड तेरे से भी बढ़िया लगा दिया फर्श पे और तू कह रहा है ये मोटरसाइकिल गिराएगी. वैसे तुम न पूरी सरदारनी लगती हो बीटा ये चलते हुए, जंचती है.", प्रीती कपड़ो का बैग लिए सर पे दुपट्टा किये मुस्कुरा रही थी और ऋतू ने चाबी अपनी दादी को पकड़ते हुए कहा.

"चाचा जी, सीखने वाले ने कहा था के कुछ भी बड़ा नहीं होता अगर दिल के साथ साथ सही तकनीक और ध्यान से काम किया जाये. ये बुलेट अब मुझे कार से भी ज्यादा ाची लगती है चलनी, जैसे दादा जी को लगती थी.", अपनी दादी के गले में बाहें दाल वो पंडित जी का जीकर करती जैसे उनके भी मजे ले रही थी.

"चल पागल कही, की कुछ भी बोलती रहती है.", कौशल्या जी को भी सबसे अधिक स्नेह ऋतू से हे था और हर नए दिन के साथ वो कोशिश करती थी इस लड़की को ज्यादा से ज्यादा खुश रखने की.

"वैसे ये सब आदमियों के शौक होते है, मेरी बात का बुरा ना maan-na ताई जी. मैं बिटिया के खिलाफ नहीं हु लेकिन समाज में थोड़ा गलत प्रभाव भी पड़ता है इतनी आजादी का.", बस यही कमी थी विनोद की और कहा भी उनके सामने जो ऋतू के लिए एक लफ्ज़ नहीं सुन्न सकते थे. दोनों भाई तोह खामोश हे रहे क्योंकि माँ मौजूद थी और ये चचेरा भाई था.

"तेरे ताऊजी को जब चोट लगी थी तोह शंकर मेरी गॉड में हुआ करता था विनोद. मेरे पिता जी ने बेशक मेरा ब्याह जल्दी करवाया था लेकिन कार सिखाते वक़्त लड़का लड़की का फरक नहीं किया था. उस टाइम वही शिक्षा काम आयी थी अपने पति को हॉस्पिटल ले जाने के लिए. और मेरी बेटी 10 आदमियों पे भारी है hunar-dimag के मामले में तोह मैं इसको बांड के न रखती चाहे बाकी किसी को मैं बिना सर ढके घर से न निकलने दू. जो लायक है, हक़ उसका.", इतना कह कर वो ऋतू और प्रीती को साथ लिए भीतर गलियारे में चली गयी. अपनी माँ के आखिरी लफ्ज़ सुन्न कर तोह शंकर जी का भी मुँह खुला रह गया था.

"तू उड़ता तीर ले लिया कर हमेशा. लड़कियां हमेशा लड़को से बेहतर है विनोद और तू बहार निकल थोड़ा अपनी दोहरी मानसिकता से. अब चल नहीं तोह कही थानेदार के हाथे चढ़ गया तोह मुर्गा बना देंगे.", नरिंदर की यही खासियत थी की वो माहौल को खराब नहीं होने देते थे. शंकर ने भी ज्यादा कुछ कहे बिना कार की तरफ कदम बढ़ा लिए.

"ताई जी के आगे किसी की चलती भी कहा है भाई. मैंने तोह बस इसलिए कहा था के वो मोटरसाइकिल है. स्कूटरी या कार से मुझे परेशानी नहीं. वैसे ये वाली कार ले चलो शंकर भाई.", विनोद ने काली लांसर की तरफ इशारा करते हुए अपनी इत्छा जताई तोह शंकर ने ना में गर्दन हिला दी.

"हाथ भी लगाना मन है इसको विनोद. वो सिर्फ अर्जुन की है और वो अपनी बहिन के सिवा इसकी चाबी किसी को नहीं देता. कार तोह कार हे है यार, फिर मैं उड़ता तीर क्यों लू तेरी तरह?", अब विनोद को तोह बस अर्जुन और उसकी बहिन हे अपने सबसे बड़े दुश्मन नजर आ रहे थे. कर कुछ सकता नहीं था क्योंकि शंकर का भली भांति पता था उसको. चुपचाप कार की पिछली सीट पकड़ ली और तीनो निकल लिए काम पर, जिसके बाद उनकी अपनी महफ़िल भी सजने वाली थी.

"विन्नी दीदी, सचमुच खतरनाक हो आप. हालत देखनी थी विनोद चाचा की एक बार. हाहाहा", ऋतू अंदर विन्नी के गले लगती हुई हंस रही थी और प्रीती के साथ साथ वह आरती, तारा और कोमल भी मौजूद थी इस समाया.

"तभी तोह तुझे मोटरसाइकिल ले जाने का कहा था मैंने. घटिया सोच वाला आदमी कभी भी औरत को अपने से आगे देख हे नहीं सकता. और तुझे टोकना मतलब दादी जी के साथ साथ शंकर चाचा को भी टोकना. मैं उसकी हालत देख रही थी जाली वाले दरवाजे से. हाहाहा.. ठरकी गंवार कही का.", विन्नी ने खुद सामने न आ कर ये जाल बिछाया था विनोद चाचा के लिए.

"विन्नी दीदी, आपने शायद एक बात पर ध्यान नहीं दिया.", सभी अलका के चेहरे की तरफ देखने लगी.

"ऐसा क्या देख लिया तुमने जिसपर ध्यान नहीं गया?", विन्नी ने तुरंत सवाल किया क्योंकि अलका गंभीर थी इस समय.

"विनोद चाचा गाँव में भी प्रीती को घूर रहे थे दीदी और आज भी जब प्रीती वह कोमल दीदी के पास कड़ी थी तोह उनकी नजरे प्रीती पर हे थी. अलका ने ये ाचे से पहचान लिया.", ऋतू की बात वही थी जो अलका कहने वाली थी.

"हाँ. और वो आकांक्षा को भी देख रहे थे. थोड़ा ध्यान रखना होगा इस बात का क्योंकि गाँव में तोह पता लग हे गया था के ये हरामी इंसान है लेकिन खुद फंसने की जगह निर्दोष को हे गलत साबित कर देते है.", अलका के इस बड़े खुलासे से आरती भी हैरत में पड़ गयी.

"विनोद चाचा की कुंडली है ारु के पास और वो यहाँ बैठे सभी से ज्यादा समझदार है. तुम लोगो की ये शरारते जरूर कुछ ऐसा वैसा करवा देंगी लेकिन ारु पहले से कुछ सोच कर बैठा है.", कोमल दीदी के इस खुलासे पर बाकी सब उनको देखने लगे. वो ज्यादा नहीं बोलती थी और जो कहती थी उसका सबूत हमेशा उनके पास होता था.

"मतलब की बात कुछ और भी है?", विन्नी के इस सवाल पर कोमल ने कंधे उचका दिए.

"नहीं पता के बात क्या है लेकिन वो संजीव भैया से दबी आवाज में बहोत सी बातें कर रहा था और उन दोनों के पास अलग अलग फाइल्स थी. विनोद शर्मा का जीकर था सबसे पहले पेज पर. ारु क्या कर रहा है ये पता लगाना तोह मुमकिन नहीं पर वो पहली बार मिलते हुए भी विनोद चाचा को पहचान गया था. तुम लोग वैसे हे रहो जैसी रहती हो, उसका काम बिगड़ सकता है किसी की गलती की वजह से.", कोमल दीदी की बात से तारा इत्तेफ़ाक़ रखती थी.

"हाँ, ऋचा भी अर्जुन से कुछ अलग हे बातें कर रही थी. सुनाई तोह नहीं दिया लेकिन दोनों बड़ी सावधानी से बात कर रहे थे. वैसे भी ये मां तोह अब शादी से 2 दिन पहले हे आने वाला है, भाड़ में जाए.", तारा की बात पर सभी हंसने लगी तोह ऋतू ने प्रीती को लपेट लिया सबके सामने.

"तू भी बहोत से गुल खिला रही है प्रीती. अब जरा बता भी दे क्या चल रहा है तेरा अर्जुन के साथ? डिटेल न सही लेकिन इतना तोह बता सकती है के कुछ ख़ास हैं न.", प्रीती शर्म से सिकुड़ने लगी थी इस बात पर. अर्जुन ने इतनी सावधानी बरती थी लेकिन ऋतू कैसे जान गयी ये प्रीती को समझ नहीं आ रहा था.

"वो.. वो.."

"क्या वो वो लगा रखा है यार.. तेरा बॉयफ्रेंड है और बिंदास बोल जो बोलना है.", तारा ने हौंसला दिया तोह प्रीती ने एक लाइन में हे सबकुछ कह दिया.

"ट्यूसडे को सभी लोग जा रहे है तोह अर्जुन के साथ मेरी डेट है उस दिन.", और वो तुरंत उठ कर भाग गयी इस कमरे से, सबको हैरान छोड़ कर.

"ओह तेरी. ये बिल्ली तोह बड़ी शातिर निकली यार. और ट्यूसडे को सब लोग कहा जा रहे है?", तारा ने अब ऋतू की तरफ देखते हुए पुछा.

"मंदिर और फिर उसके बाद गरीबो को भोजन भी करवाना है. दादी ने थोड़ी देर पहले हे बताया था मुझे की सभी जा रहे है परसो सवेरे 5 बजे सिवाए अर्जुन के. लेकिन ये दोनों तोह इतने ख़ास दिन कुछ और हे प्लान बनाये बैठे है. बिल्ली से ज्यादा तोह चूहा (अर्जुन) चालाक है यहाँ.", ऋतू को भी ये बात नहीं पता थी इन दोनों की.

"हाहाहा.. तू हैरान क्यों है डार्लिंग? प्रीती की पहली डेट है अर्जुन के साथ, ाची बात है न.", अलका मजे ले रही थी और उसको पता था की ऋतू को ये ाचा लगा है लेकिन भनक नहीं लगने पर हैरान थी.

"मैं भी रुक जाती हु फिर तोह.", आरती ने मासूमियत से कहा था.

"न डार्लिंग, उन दोनों को तुम्हारे एक्सपीरियंस की जरुरत नहीं पड़ने वाली. मुश्किल से तोह अर्जुन वक़्त निकाल रहा है इसके लिए, तू रुक गयी तोह उसकी रही सही हिम्मत भी जवाब दे जाएगी.", तारा ने आरती को अपने साथ लगते हुए मस्ती की.

"इसका मतलब था के कही प्रीती को जरुरत..."

"छी.. बहोत गन्दी हो यार तुम ऋतू. मैं चली निचे काम करवाने तुम लगाओ गप्पे. चलो कोमल दीदी.", आरती झेंपती हुई उठ कर चलने लगी तोह अलका ने उसके मॉटे कूल्हों पर थप्पड़ रसीद कर दिया. मांसल हिस्सा इधर उधर हिला तोह आरती की भी 'आह्हः' निकल गयी.

"सुधर जा यार.. आठ.. रात को बताती हु तुझे.", आरती पिछवाड़ा मसलती हुई कोमल के साथ निचे चल दी, जहा बहोत काम बाकी था. ऐसे हे ये सब भी अपने कपडे बदल कर या तोह पढाई में लग गयी या निचे काम करवाने चली आयी. अर्जुन अभी भी अंदर वाले कमरे में मजे से सोया पड़ा था, दिन दुनिया से बेखबर अपने मीठे सपनो में.

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क्रमश
 
अपडेट 149

चाहत - 2 (बी)


जारी

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"कमाल की आर्टिस्ट हो तुम रोमिला. ये स्केच तोह जैसे मुझसे अपने आप से हे बेहतर दिखा रहा है. लगता है मैं फिर से जवान हो गयी हु.", ांनी की hu-ba-hu तस्वीर बना दी थी रोमिला ने एक घंटे के भीतर, सिर्फ कोयले की पेंसिल और रुमाल जैसे कपडे की मदद से. वो आकर्षक भरा हुआ चेहरा इस shwet-shyaam चित्र में भी दमक रहा था. सुडोल सीना और कमीज की सिलवट तक बड़ी बारीकी से उकेरी थी रोमिला ने और ांनी की बात पर वो बस मुस्कुराती रही.

कमरा हमेशा की तरह सकरात्मक ऊर्जा से भरपूर था और रोमिला इस गहरे गले वाली ढीली सी पोषक में खिले गुलाब सी तारो तजा. जैसे चित्रकारी में भी उसने एक ऊर्जा का स्त्रोत ढून्ढ लिया था, जिसको करने के बाद वो थकने की जगह कही ज्यादा आकर्षक दिखती थी.

"ये तुम अपने पास रखना ांनी, दोस्त की तरफ से उपहार. मुझे बेहद ख़ुशी हुई है तुमसे मिल कर क्योंकि तुम्हारी जैसी रुस्सियन सुंदरता अब काम हे नजर आती है. पीलापन लिए लम्बी, पिंजर सी लड़कियों ने सुंदरता के मायने बदल दिए पर तुम जैसी किसी 19वि सदी की किताब से निकल कर सामने आ गयी हो. शुक्रिया उन तस्वीरों के लिए.", कांच के छोटे गिलासों में वो ख़ास चाय ांनी की तरफ बढाती हुई दिल से प्रशंशा कर रही थी. ांनी सचमुच हे सुंदरता का पर्याय थी चाहे रोमिला से कुछ काम लेकिन भरपूर दिलकश महिला.

"मैं भी कुछ समय रूस हे थी रोमिला और वह सबकुछ वैसा हे है जैसा तुम कह रही हो. बदलाव ाची बात है लेकिन फैशन की ये आंधी चिंताजनक है. घर के सभी काम लड़कियां लड़को की तरह हे करती थी और khaan-paan भी दुरुस्त था. अब डाइटिंग के नाम पर भूखे रहना, शरीर को अधिक पतला बनाये रखना हानिकारक है. जानती हो मरीना का जनम जिस दिन हुआ था उस दिन भी मैं काम हे कर रही थी. हाहाहा..", इस बात पर रोमिला भी हंसने लगी.

"यही तोह असली naari-sondarya है ांनी. मैं वतरतुब में बैठ कर अपनी आँखों से प्रीती को इस दुनिया में आता देख रही थी. वो पल सबसे ख़ास था, ऐसा जैसे मैं सिर्फ उस दिन हे पूरी हुई. लेकिन अब तोह लड़कियां चाहती है के पेट पर चीरा लगवा के ये काम बस डॉक्टर हे कर दे. फिर औरत और माँ होने का पूरा एहसास कैसे हुआ भला? वैसे मरीना बहोत खूबसूरत है और 2-3 साल में शरीर ाचा खासा भर जायेगा."

"हाँ, यहाँ उसके दादा दादी सबकुछ मान लेते है लेकिन डाइट पर कोई समझौता नहीं. वैसे प्रीती के लिए अर्जुन आदर्श चुनाव है तुम्हारा. प्रीती मजबूत लड़की है हसीं होने के साथ साथ और सवा 6 फ़ीट ऊँचा अर्जुन भी मजबूत होने के साथ बड़ा समझदार लड़का है. लगता है जैसे ग्रीस की पैदाइश तुम्हारी बेटी के लिए अर्जुन के रूप में यही हो गयी.. ", ांनी की मुस्कराहट अध्भुत थी और वो एकसार सफ़ेद दांत बताते थे की हर चीज पर वो बारीकी से ध्यान देती है. रोमिला तोह अर्जुन के नाम से हे गदगद हो गयी थी.

"तुम यकीन नहीं करोगी लेकिन सच ये है की उन दोनों का रिश्ता बचपन में हे हो गया था. मैं तोह बस थोड़े दिन पहले अपने होने वाले दामाद को देखने आयी थी और एक नजर में हे ऐसा लगा जैसे क्रीट में बिताये अपनी जवानी के सपनो वाला राजकुमार सामने आ खड़ा हुआ हो. बेटी से ईर्ष्या होना भी अलग हे एहसास देता है. हाहाहा..", ांनी भी थोड़ा मंद मंद हंसने लगी थी. थोड़ी हैरत थी की रिश्ता बचपन में होना और रोमिला का सिर्फ देखने आना.

"वैसे िष्य कुछ ज्यादा ाची भी है तुम्हारी. उसका लाल होता चेहरा और उसके बाद तुम्हारा आँखों को बंद करना बहोत कुछ कहता है. दामाद को परेशान तोह कर हे रही हो तुम, छुप छुप कर."

"हाहाहा.. वो ज्यादा हे सीधा है ांनी. थोड़ा समझदार बना रही हु बस लेकिन ी मस्ट तेल्ल यू तहत हे है एक्स्ट्राऑर्डिनरी टूल बिलो हिज बेल्ट. बुरा मैट maan-na लेकिन मुझे ये पता लगाना पड़ा अपनी बेटी के फ्यूचर को देखते हुए. प्रीती और वो इतने समय से साथ है लेकिन फिर भी उसने मेरी बेटी के साथ वो सब नहीं किया जो हमारे देश में आजकल दूसरी डेट पर हो जाता है. बस इसलिए जांच करनी पड़ी और यकीन से कहती हु के ऐसा औजार हजार में से किसी एक का हे होता होगा, ख़ास कर एशियाई रीजन में." रोमिला बेबाक है इसका एहसास तोह ांनी को ाचे से हे हो गया था. हलकी लाली लिए गालो पर वो बस रोमिला की बात सुनती रही. एक घूँट बिना दूध की उस सुनहरी चाय का पीते हुए ांनी ने पूछ हे लिया.

"एब्नार्मल जैसा कुछ? वैसे अगर बात ऐसी है तोह तुम्हे परेशानी भी हो सकती है."

"हाहाहा.. यार मैं तोह ख़ुशी ख़ुशी ले लू अगर वो मेरे लिए होता तोह.. मेरी बेटी का है और वो अपने आप संभल लेगी जब उनके बीच वो होगा तोह. हाँ कोई कमजोर लड़की हो तोह उसकी हालत बिगाड़ देगा. प्रीती मजबूत है और शादी तक सही जगह से वजन बढ़ हे जायेगा. माँ की किस्मत में एवरेज था लेकिन खुश हु की जिस से बेटी को प्यार है वो हर तरह से असाधारण हे है."

"सचमुच देखा है तुमने रोमिला? मतलब अर्जुन ऐसा लड़का नहीं लगता मुझे की वो ....", ांनी अटक रही थी अपनी बात कहते हुए.

"नहीं ांनी, अर्जुन बहोत हे प्यारा लड़का है जो सबका बराबर ध्यान रखता है. उसका दिल हे सब्सि बड़ा अंग है जिसमे सिर्फ परवाह और प्यार है, सबके लिए. तुम टेबल वाली जो बात कर रही हो तब मैं उसकी टांग सहलाते हुए छेड़ रही थी बस. और मेरी आँखें बंद होने की वजह थी गलती से रेखा का हाथ मेरे ब्रैस्ट पर लग्न. लेकिन मैंने अर्जुन का पेनिस देखा है जब वो मुझे फोटोग्राफी के लिए पास के गाँव लेके गया था.", रोमिला ने बड़ी सफाई से अपने जज्बात छुपा लिए थे.

"गाँव में सड़क किनारे हल्का होते वक़्त देखा क्या?", ांनी ने चुटकी लेते हुए पूछ लिया. अब उसको भी ऐसी बातों में मजा आ रहा था.

"अरे नहीं यार वो तोह वह नहर में स्विमिंग करने लगा था और मैं उसकी भी तस्वीरें लेने लगी. कैमरा में एक फोटो क़ैद हो हे गयी जब वो कपडे बदल रहा था. हिज semi-erect टूल वास् नेअर्ल्य थिस लॉन्ग.", अपने हाथ से पूरी हथेली दिखती रोमिला ने जो अकार बताया वही 6-7 इंच था. ांनी हैरत से कभी रोमिला का चेहरा तोह कभी वो लम्बाई देखने लगती.

"सीरियसली? इतना तोह मेरे उनका इरेक्शन में भी नहीं है. परम ाचे तगड़े है और पेनिस भी 6 इंच आराम से होगा. बूत तुम्हारा जो इशारा है इसका मतलब ये kam-umar लड़का 8-10 इंच का लिए घूम रहा है?", बात कहते कहते खुद हे अपने मुँह पर हाथ रख लिया था ांनी ने और रोमिला ने हँसते हुए हाँ में सर हिला दिया.

"मेरे हस्बैंड का कौनसा तुम्हारे वाले से बड़ा है. लेकिन एवरेज पेनिस भी अपना काम ाचे से कर लेता है अगर स्टैमिना हो तोह. यही कमी है बस हमारी लाइफ में. 10 मिनट से ज्यादा तोह सेकंड राउंड में नहीं टिकते लेकिन इन्ही मर्दो को बहार वाली मिल जाये तोह उसपे जोश में दुगना टाइम भी चढ़े रहेंगे. और अर्जुन जैसा अल्फा मेल हो तोह फिर एक लड़की उसको नहीं संभल सकती, 3-4 चाहिए ऐसे व्यक्ति को तृप्त करने के लिए."

"तुम्हे तोह इस बात पर खुश होना चाहिए, क्रीट से हो. बेटी के साथ माँ पर भी दामाद का हक़ होता है अगर बेटी से गुजरा न चले तोह. हाहाहा..", ांनी को भी विविधता का ाचा ज्ञान था.

"फिलहाल तोह मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है लेकिन तुम तोह उसकी चची लगती हो न, सामरा रीजन में तोह माँ को छोड़ कर चची या बुआ लड़के की विर्जिनिटी ले हे सकती है. या फिर लड़का अकेला हो तोह वो उसके साथ तब तक रह सकती है जबतक लड़का चाहे. गलत तोह नहीं कहा न?", रोमिला ने गुलाम पर बेगम मार दी थी इन रिवाजो के मामले में. ांनी तोह हँसते हुए दोहरी हो गयी.

"हाहाहा.. कुछ भी यार रोमिला. वो सब तब होता था जब परिवार बड़े थे और पापुलेशन बहोत काम. लोग दूर दूर अपने फार्म्स पर हे रहते थे इसलिए जवान लड़के को ऐसे खुश रखा जाता था परिवार के अंदर. अब हर तरफ तोह आजादी है और लड़कियों की भरमार. साइबेरिया की तरफ ऐसा हो सकता है और कुछ हद्द तक dur-daraaj के गाँव में भी. मैं परम के साथ हे ठीक हु और बेटी बड़ी होने के बाद इस सबमे उतना इंटरेस्ट बचा भी नहीं.", ांनी कुछ हद्द तक रोमिला जैसी हे थी जज्बात छुपाने में.

"मैं जानती हु इन मर्दो को ाचे से. और तुम कहती हो न की इंटरेस्ट नहीं है, निप्पल खड़े हो चुके है तुम्हारे जिसका मतलब है के तुम्हे ये सब ाचा तोह लग रहा है लेकिन जंजीरे बहोत बंधी है पाँव में. बातचीत तोह कर हे सकते है ांनी, इसमें कोई बुराई नहीं है. मैं मेरे हस्बैंड के साथ 93 के बाद से हमबिस्तर नहीं हुई हु. फाइव लॉन्ग इयर्स."

"8 साल मैंने परम से अलग गुजरे है रोमिला और वापिस आने के बाद मैंने अपने प्यार करने वाली पति को पाया पर अब वो प्यार बरकरार नहीं रहा जिसकी हमने कस्मे खाई थी. हे इस वैरी केयरिंग हस्बैंड एंड हे ट्रीट्स उस वेल. परम गिलटी फील करता है और बातें करने के सिवा कुछ भी नहीं करता. मैं सामने से कुछ करने की कोशिश करती तोह हटा देते और 2-3 दिन बाद मैंने भी बंद कर दिया. उनका कहना है के बिना ड्रिंक किये वो ये सब नहीं कर सकते. भला प्यार करने के लिए भी नशे की जरुरत पड़ती है? प्यार तोह खुद एक नशा है, सबसे ज्यादा तेज नशा.", ांनी की बात का हर एक लफ्ज़ सच था बस परमवीर के उसके साथ सम्भोग न करने की वजह उसको पूरी तरह नहीं पता थी.

"ये इंडिया, रूस या ग्रीस कुछ भी अलग नहीं है ांनी. समाज में वह बेशक खुलापन हो यहाँ से ज्यादा लेकिन अंतरंगता के मामलो में आदमी हे खुद को श्रेष्ठ समझता है, हर देश में. लड़की का कौमार्य भांग हो चूका हो तोह वो सिर्फ उसके लिए एक भोगने के जिस्म से ज्यादा कुछ नहीं है और यही कौमार्य एक मर्द हक़ से ले चूका हो तोह कुछ सालो बाद वो बहार किसी दूसरी को देखने लगता है. औरत वैसा करे तोह वो वैश्य, लेकिन आदमी के मामले में वो काबिल या श्रेष्ठ. या तोह जीवनभर एक जुड़े में रहो, नहीं तोह दोनों हे आजाद मानसिकता के साथ जियो. बीच वाला रास्ता सिर्फ एक मर्द का लालच हे है. चलो छोडो ये सब, रेखा की तरफ चलते है. 8 बज गए और फिर तुम्हे भी डिनर के बाद जाना हे है.", रोमिला ने बात अधूरी छोड़ कर ांनी को पशोपेश में दाल दिया था. लेकिन वो भी समय की स्थिति देख कड़ी हो गयी.

"वैसे तुमसे बात करके आज दिल हल्का महसूस हो रहा है रोमिला. मिलना होता रहेगा लेकिन आशा करुँगी की फ़ोन पर भी बात होती रहे.", ांनी को अपने एकाकीपन में ऐसे हे दोस्त की जरुरत थी और रोमिला भी समझती थी औरत का दर्द जो वो खुद झेल रही थी इतने सालो से.

"हाँ जरूर ांनी और मैं उसे जाने के बाद भी बात करती रहूंगी. कुछ शेयर करना होगा तोह ईमेल भी प्रयोग करेंगे.", दोनों हे ऐसी बातें करती कड़ी हुई तोह ांनी के सामने हे रोमिला ने अपना वो चुस्त सा गहरे गले का कमीज उतार कर एक तरफ रख दिया. अंदर वो बड़े बड़े सफ़ेद खरबूजे आजाद थे और उनके गुलाबी निप्पल अकड़े हुए. अलमारी से एक गुलाबी रंग की हे ब्रा में उन्हें क़ैद करने के बाद रोमिला ने ढीला सा जांघो तक का कमीज पहन लिया.

"तुम तोह बिलकुल भी ढीली नहीं हुई हो. बहोत खूबसूरत हो तुम रोमिला, जैसे संगेमरमर की कोई इतिहासिक मूरत.", रोमिला बाल ठीक करती मुस्कुराने लगी थी अपनी तारीफ पर.

"बहोत म्हणत करि है लेकिन कदरदान नसीब नहीं हुआ. मेरे वाले का प्यार का नशा 12-13 साल में हे उतर गया."

"बेवकूफ है आपके पति. ऐसी सहेज कर राखी गयी पुराणी शराब की कदर सड़क किनारे पीने वाले नहीं कर सकते. उन्हें तोह जो मिले बस गटकने का पता है. पुराणी खूबसूरत शराब का शौक़ीन तोह उन्हें अपने दिल के करीब रखता है. हर बूँद को महक लेते हुए पीना ऐसे शौक़ीन के हे बस का है, नहीं तोह बेवड़े और शौक़ीन में फरक कहा होता. रोमिला थे ग्रीक वाइन, 40 इयर्स ओल्ड बूत स्टिल फ्रेश लिखे फर्स्ट हार्वेस्ट.", ांनी के ऐसे बखान पर तोह रोमिला हँसते हुए उसके गले हे लग गयी.

"यार कमाल की हो तुम. मुझे वाइन बना दिया है तोह अपनी ये एंटीक वोडका भी सही कदरदान को हे सौंपना. इसको चखने के लिए पहले से शराबी होने वाला तोह सही से ज़ायका भी नहीं ले पायेगा. गरम कुछ ज्यादा हे होती है न वोडका, कही हैंगओवर हुआ तोह न इधर के रहे न उधर के. हाहाहा.", ांनी भी रोमिला के साथ हे हंसती हुई पंडित जी के घर की तरफ चली आयी. बहार हे सफारी से सभी लड़कियां उतर रही थी, जिनको तारा करीब की मार्किट तक लेकर गयी थी और ठीक उनके पीछे मोटरसाइकिल पर अर्जुन रूचि बुआ का लिए आ पंहुचा.

"ये हैं असली ज़िन्दगी ांनी. कितना hil-mil के रहते है और पता लगता है की इनके बीच सब एक जैसे हे है. तेरी ननद हे देख ले जो सवेरे आग उगल रही थी और अब चुम्बक की तरह अर्जुन से चिपकी बैठी है.", ांनी भी थोड़ा हैरान थी रुचिता को ऐसे सबके साथ घूमते देख.

"ओह भाभी, आप भी चलती तोह घाना मजा आता. Tara-Aarti के साथ आज मैंने दर्जन पुचके (गोलगप्पे) निबटा दिए और दही बड़े भी जोरदार थे.", रूचि तोह अलग हे अंदाज में थी इस वक़्त लेकिन अपनी ननद को खुश देख ांनी भी मुस्कुरा उठी.

"मीठा खाने वाली आज तीखा खा कर उछाल रही है. मन्नू (मरीना) ने भी मस्ती करि थी या वो बस गाडी में बैठी रही?", ांनी साथ चलते हुए बात कर रही थी.

"उसने तोह सबसे ज्यादा मौज काटी है भाभी. देख लो झोला भर के सामान ले आयी जिसकी वजह से अर्जुन को मार्किट बुलाना पड़ा. पैसे हे ख़तम करवा दिए इस मुसीबत ने तोह. मैं भी पर्स न लेके गयी थी.", अब प्रीती और ऋतू के साथ चलती हुई मरीना दोनों से अलग होती नजरे झुकाये अपनी माँ के करीब आ गयी.

"सॉरी माँ. मुझे पसंद आ गया था ये सब और ऋतू ने कहा के मुझे ले लेना चाहिए. बोई अभी अर्जुन को पैसे रेतुर्न कर देंगी, हैं न बोई?"

"इसकी जरुरत नहीं है चची जी. पैसे दादी जी ने दिए थे और उन्होंने हे ऋतू दीदी को कहके भेजा था की मरीना दीदी को शॉपिंग करवा देना लेकिन वो भी पर्स घर भूल गयी थी.", अर्जुन ने पीछे से आते हुए पूरी बात बताई तोह मरीना फुर्ती से अंदर भाग गयी. उसकी वो उदासी जैसे कभी चेहरे पर आयी हे नहीं थी.

"थैंक यू अर्जुन फॉर थिस काइंड जेस्चर. लेकिन तुम्हे परेशानी हुई इस सबकी वजह से."

"मुझे तोह ाचा हे लगा चची जी. आप लोग डिनर कीजिये, मैं बाद में मिलता हु.", अर्जुन एक बार फिर से बहार निकल गया लेकिन इस बार उसके साथ संजीव भैया थे स्कूटर पर. हमेशा की तरह मार्किट में nimbu-jeera वाला सोडा पीने के साथ बातचीत करने के लिए.

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पुराने घर की बड़ी छत्त पर आज जोरदार महफ़िल लगी थी, शांत माहौल में यहाँ 8 लोग बैठे थे जमीन पर 4 गद्दे बिछाए जो निचे वाले कमरों में रखे बीएड से उठा कर इधर लाये गए थे. राजकुमार, शंकर, नरिंदर, दलीप, राजेश, धर्मपाल (संदीप के पापा), विनोद और उमेद. हर गद्दे पर 2 लोग और बीच में 4 बोतल शराब, सोडा, पानी, बर्फ, मुर्गा, चखना के साथ साथ सिग्गट की डिब्बियां.

"यार ये हुआ इस घर का शुभारम्भ एक बार फिर से. शराब का छिड़काव हर बुरी बाला को दूर रखता है.", उमेद ने पहली बोतल खोलते हुए थोड़ी सी शराब छत्त के फर्श पर उड़ेलने के बाद 8 गिलासों में हे ये बोतल निबटा दी. राजकुमार और धर्मपाल भी उसकी हरकत पर हंस रहे थे.

"ये बात तोह चोखी कही उमेद भाई साहब आपने लेकिन घर में उन्नत्ति तभी आती है जब गृहलक्ष्मी का प्रवेश हो और जोड़ा अपनी पहली रात बिताये. बाकी शराब तोह आत्मा भी पवित्र कर देती है.", विनोद अपनी हे बात पर खींसे निपोरता हंसने लगा था और उसके साथ राजेश अलग हे तरह हंसने लगा.

"शंकर जीजा, बिनोदिया को गृहप्रवेश आप हे करा दो.", इस बार विनोद को छोड़ कर बाकी सबके ठहाके गूँज उठे थे और वो बेचारा बुरी तरह झेंप गया था.

"न न साले साहब, ये सिर्फ मैं हे बुला सकता हु इसको. और इस पर सिर्फ मेरा हक़ है, शंकर का जरा सा भी नहीं. ले मेरी जान, तू मुर्गा खा और मजे ले बस इस हंसी मजाक के.", नरिंदर ने खुदसे हे विनोद को एक भुना हुआ टुकड़ा खिलाया और राजेश हँसते हुए सभी गिलासों को baraf-pani से भरने लगा.

"सच कहु तोह इन्दर, आज पूरे 6 साल बाद हम लोग शराब पीने बैठे है. क्या दिन थे यार जब राजू भाई 2 पेग पीने के बाद 10 इलाइची खा कर घर में घुसते थे. और ये उमेद तोह बिना रोटी खाये हे सो जाता था. उस दिन के बाद से मैं आज हे शराब पी रहा हु.", ये धर्मपाल जी के शब्द थे और इस से पता चलता था की इन सबका याराना कितना मजबूत था.

"हाँ पल भाई, आपकी छत पर भी बहोत बार महफ़िल लगती थी. भाभी दोनों बचो के साथ शनिवार को ससुराल और हम सब आपकी पनाह में. हाहाहा. शंकर तोह रात 2 बजे दारु ख़तम होने पर ल1 हे चला गया था, याद है क्या काण्ड हुआ था उस दिन?", उमेद ने ऐसे हे वो दिन याद करवाया शंकर के साथ दलीप भी बगले झाँकने लगा.

"कमीने गज्जू तू सचमुच सबसे ज्यादा आग लगता था तब. बहनचोद ने माँ को फ़ोन कर दिया था और वह ल1 पर बाप सामने मिला. 12 साल पुराणी बात है. क्या दिन थे भाई?"

"शंकर क्या दिन थे? तू तोह चाचा को देख के छुप गया, मेरी गांड पर लेथ पड़े तेरे आखिरी पेग के चक्कर में. और नशे में मेरे मुँह से भी यही निकला था के चोरी नहीं करने आये थे बस एक हे बोतल चाहिए थी. सचमुच ये उमेद और शंकर मेरी गांड आगे कर देते थे जब भी पन्गा होता.", दलीप की बेचारगी के साथ हे गिलास खनक उठे.

"ये तीनो हैं तोह मेरे छोटे भाई लेकिन पक्के कमीने है धर्मपाल. मेरी शादी की पहली रात जोशीली दवा बता कर इन्होने दारु पीला दी थी, मेरी ज़िन्दगी की पहली शराब वो भी छोटे भाइयो ने पिलाई. कसम से सुहागरात तोह क्या माननी थी, उलटी करके बस सर पकड़ के रात बितायी. वैसे काम तोह तुम भी नहीं हो. मल्होत्रा जी के घर होली खिलने ले गए और भांग पीला कर मेरे हे घर छोड़ गए.", राजकुमार की ज़िन्दगी में भी किस्से तोह थे हे.

"वैसे सच कहु तोह बड़े जीजा जी, आप न कितने हे साल गुमनामी में रहे हो. आप लोगो के हे साथ तोह पहली बार मैंने शराब चखी थी. कितना मजेदार वक़्त था वो लेकिन आप पिछले 13-14 सालो में बहोत हे काम बोलचाल करते दिखे. लो ये तरी वाला मीट खा के देखो बड़े जीजा जी.", राजेश ने वो मीट का डोंगा उनकी तरफ बढ़ने के बाद सिग्गट और लाइटर शंकर जी की तरफ कर दिया.

"चल छोड़ ये सब बातें यार राजेश. वैसे विनोद तू तोह होटल में पूरी मौज मारता होगा. सुना है एक फार्महाउस भी रंगीन है तेरा.", नरिंदर की इस बात पर विनोद थोड़ा चौंक गया था. वो फार्महाउस दुनिया की नजरो में उसके जीजा का हे था लेकिन इनके सामने वो झूठ नहीं बोलना चाहता था.

"इन्दर भैया, वह मैं बड़े लोगो के साथ थोड़ा कारोबार भी करता हु तोह शराब के साथ गरम गोष्ट (लड़कियां) भी परोसना पड़ता है. मेरा कोई इंटरेस्ट नहीं है वैसा काम करने वालियों में. लेकिन फार्महाउस की वजह से हे होटल ाचा चलता है तोह करना पड़ता है. आप आओ कभी उधर, आपके शहर से तोह पास हे है.", विनोद के आमंत्रण को इन्दर ने तोह ठुकरा दिया लेकिन शंकर बोल उठा.

"इसका भी यही शहर है भाई. मैं आऊंगा तेरे फार्म पर दलीप और मेहुल के साथ. मीटिंग करने की अगर सुरक्षित जगह है तोह देख तेरे भी vaare-nyaare करवा दूंगा. वैसे गज्जू ये तरी वाला मीट तूने नहीं बनाया न?", इस बात पर विनोद खुश हो गया था क्यूंकि शंकर की मीटिंग मतलब बड़े बड़े लोग और पैसे. वही उमेद हंसने लगा.

"मैं तोह इन्दर के लिए ये मुर्गा सलाखों पर भून रहा था. शालिनी ने चूल्हे पर मीट चढ़ा दिया जब पता लगा के मैं तुम्हारा यहाँ आ रहा हु. ाचा नहीं बना क्या?"

"न उमेद जीजा जी, एक नंबर बना है. अब बस थोड़ा बचा के रखना मैं तोह इसके साथ हे चावल खाऊंगा. वैसे विनोद भाई, तुम्हारा एक चक्कर सुन्न ने में आया है.", उमेद से बात करते हुए राजेश ने विनोद को लपेटे में ले लिया. शंकर ने 2 सिग्गट सुलगते हुए एक अपने बड़े भाई को और दूसरी दलीप की तरफ बढ़ा दी. इन्दर ने भी एक अलग से जलाते हुए काश लेने के बाद वो उमेद के होंठो से लगते हुए उसको काश लगवाया और अपने भाई को दे दी.

"मेरा कौनसा चक्कर राजेश भाई? आप तोह कभी मेरी तरफ आये भी नहीं और मैं ज्यादातर तोह होटल के काम में हे व्यस्त रहता हु.", विनोद के चेहरे पर हल्का पसीना था जो उतना नहीं दिख रहा था इस काम रौशनी में.

"कॉलेज में पढ़ने वाली 2 गाँव की लड़कियों के साथ तुम्हारा कुछ तगड़ा हे चक्कर चल रहा है. मर्जी से है तोह ठीक नहीं तोह बंद कर देना भाई, सलाह दे रहा हु. रही बात के मैं उधर नहीं जाता तोह इसका जवाब दलीप भाई साहब दे देंगे.", विनोद की तोह अंदर से गांड हे फट चुकी थी इतनी सीढ़ी तरह से खुलासा सुन्न कर.

"बात ऐसी है विनोद, तुम्हे फंसाया भी जा सकता है और तुम पहचान भी नहीं पाओगे. नाड़े का इतना भी कच्चा होना ठीक नहीं है और राजेश एक छलावा है मैं तुम्हे बता देता हु. इसकी पहुंच दिल्ली से लेकर आसपास के 4 राज्यों में इतनी गहरी है के खुदाई करते थक्क जाओगे लेकिन गहराई पता नहीं लगेगी.", दलीप ने इस बार नयी बोतल उठाते हुए फिर से सभी 8 गिलास भर दिए थे. मॉटे मॉटे जाम बनाते हुए वो काश भी लगा रहा था.

"वालिए की कमी महसूस हो रही है यार शंकर.", धर्मपाल जी ने माहौल को सँभालते हुए जो नाम लिया उसको सुन्न कर राजकुमार जी भी शंकर और उमेद की तरफ देखने लगे.

"फ़ोन किया था भाई सरदार जी को लेकिन आप तोह जानते हे हो आजकल घर में भाभी के सिवा कोई हैं भी नहीं. अगले ऐतवार को महफ़िल लगाएंगे उनके साथ. वैसे सरदार जी ने दलीप को नए केस पर लगा दिया है.", अब चौंकने की बारी राजेश की थी जिसको ये बात दलीप ने बताई हे नहीं.

"कौनसा केस जीजा जी? और दलीप भाई आप तोह पहले हे मेरे साथ मंगलम वाली कहानी की गुत्थी सुलझा रहे हो तोह गुरु जी ने आपको कौनसा केस दे दिया.?", विनोद हे अकेला इनके बीच ऐसा था जैसे शेरो के बीच सियार.

"वो निवेदिता मर्डर केस देखने बोलै है उन्होंने. सरदारजी पिछले 3 महीने से जांच में लगे है लेकिन कुछ रुकावट आ रही है. वो ऑफिस में रहने वाले अफसर है और हम दरिंदे सड़को के. तुझे कल फाइल दूंगा मैं और राजू भाई अपने धर्मपाल जी से कह के मेरे उधर भी थोड़ी जमीन खेती में करवा दो. जंगल घोषित हुआ तोह 15 किल्ले हाथ से जायेंगे.", दलीप के ऐसा अप्रत्यक्ष रूप से कहने पर धर्मपाल जी ने कान खींच दिया उसका.

"तू न सुधारियो दलीप. फ़िलहाल तोह 2 दिन यूनिवर्सिटी हु, बुधवार चलेंगे पटवारी को ले कर. तहसील दफ्तर में हैं अपना आदमी, फाइल कर देगा पास और रजिस्ट्री में भी बस सिग्न करने आ जईओ.", कृषि विभाग प्रमुख होने के साथ साथ सदा जीवन जीने वाले धर्मपाल जी की पहुंच भी ाची खासी थी.

"मेरी भी जमीन का कुछ करवा दो भाई साहब, दिल्ली के पास है और 10 मंजिल के फ्लैट बनाने का जुगाड़ कर रहा हु उधर.", उमेद ने मस्ती में कही थी ये बात.

"ये सारे एक जैसे हे है. मैं हुडा और पव्ड का मुखिया होता तोह करता न कुछ. लेकिन मेरा पैसा लगाने का पूरा विचार है तेरे प्रोजेक्ट पर उमेद. तू, इन्दर और राजेश मिल कर देखने वाले हो तोह चौथा हिस्सा मेरा लगा लो. गाँव की जमीन हाईवे पर आ गयी है तोह आधी बेच दी. 40 किल्ले के 16 करोड़ मिले है और इतने हे साल बाद और लगा दूंगा.", यहाँ जैसे हे बात करोड़ में गयी तोह विनोद का माथा भी ठनका लेकिन वो गिलास में बर्फ डालते हुए आगे सुन्न ने लगा.

"पल भाई, पैसे की तोह बात हे नहीं है. लेकिन आप इसकी जगह दिल्ली वाले प्रोजेक्ट से जुड़ जाओ, उस तरफ वाले हरयाणा में आपकी ाची दखल है जो काम आएगी. बात कमाई से ज्यादा है वह अपनी ताक़त बढ़ने की और आपका साथ होने पर बहार किसी की तरफ देखना भी नहीं पड़ेगा. राजू भैया इधर वाला प्रोजेक्ट देखेंगे दलीप भी इनका साथ देगा. दिल्ली वाली तरफ राजेश सामने रहेंगे इन्दर के साथ और गज्जू के साथ आपकी पूरी दखल रहेगी. भल्ला हिस्सेदार है अपना वह.", शंकर ने जैसे हे पूरा मामला समझाया तोह धर्मपाल ने हाँ में सर हिला दिया.

"कोई होटल का भी विचार कर लो उस तरफ शंकर भाई.", विनोद ने अपने मैं की कह हे दी.

"अभी तोह मुश्किल रहने वाला है विनोद क्योंकि मैं 10 साल तक इनके साथ काम करने नहीं वाला और ये 3-4 लोग एक बड़ा होटल बनाने का पन्गा लेने नहीं वाले. उस तरफ गुडगाँव या दिल्ली में 5 सितारा होटल का मतलब है 150 करोड़ के आसपास. इतने पैसे यहाँ बैठे किसी के पास भी नहीं है एक नंबर में और जमीन हमारी तोह अर्जुन के पास है, उमेद की विनीता बिटिया और पूर्णिमा चची के. बेच नहीं सकते. हाँ राजू भाई अगर इधर वाला प्रोजेक्ट छोड़ कर तेरे साथ होटल का विचार करे तोह कुछ हो सकता है लेकिन फिर भी 50 करोड़ तुझे जुगाड़ने पड़ेंगे.", इतनी रकम सुन्न कर विनोद के हवा हे निकल गयी.

"जमीन बेच कर 25-30 की व्यवस्था हो जाती शंकर भाई लेकिन मेरी वाली से भी पापा ने बेदखल करके ताऊजी को सौंप दी. 10-12 से ऊपर उड़ान नहीं है मेरी. लेकिन सपना है के वह एक चमकदार होटल हो मेरा अपना."

"सपने देखने बंद करदे मेरी बिनोदि. पहली बात तोह तुझे मनाही है अपने शहर से कही जाने की और दूसरी बात ये है की 5 सितारा यहाँ किसी के भी बस का नहीं. अर्जुन हे अकेला है जिसके पास जमीन, पैसा और काबिलियत है लेकिन उसको अभी खुद को साबित करने में 10 साल लगेंगे. और उस मलंग का पता भी नहीं के वो करेगा क्या ज़िन्दगी में.", यहाँ 2-2 पेग ख़तम हो चुके थे और अब राजकुमार जी ने कह दिया था एक ये वाला उनका आखिरी होगा. साथ हे धर्मपाल जी ने भी यही कहा.

"3 तिगाड़ा काम बिगाड़ा. 4-4 बनेंगे और ये चरों बोतल खाली होने के बाद हे उठना है जिसने भी जाना हो.", उमेद के इतना बोलने पर वो विवश हो हे गए. नए जाम बने और अँधेरा गहराने लगा था. रात के 10 बजने वाले थे और बड़े बड़े जाम आराम से पीये जा रहे थे.

"वैसे थोड़ी चुटिया हरकते करना बंद कर दे विनोद. पापा सिर्फ माँ की वजह से तुझे कुछ नहीं कहते. Bina-wajah अपनी राये देने से बचा कर और उनके घर में जब भी हो तोह सावधानी और पूरी मर्यादा के साथ. आज तोह तुमने ऋतू और अर्जुन को कुछ कह दिया क्योंकि ये पहली बार था लेकिन आइंदा ऐसी गलती मैट करना.", नरिंदर जो हमेशा हे समझदारी से बात करता था एकाएक थोड़ा धीमी लेकिन सख्त आवाज में बोलै. एक पल के लिए तोह शंकर भी झुरझुरी ले गया की उसका भाई इतना गंभीर क्यों हो गया.

"हाहाहा.. गांड फट गयी न तेरी. लेकिन सच कह रहा हु तुझे. गाँव में तोह चची की वजह से तुझे सब झेलते है लेकिन यहाँ शंकर और मेरी भी मजाल नहीं जो पापा के संसार के किसी भी सदस्य पर उनकी उपस्थिति में आवाज ऊँची कर दे. तू यहाँ पर अनामिका से भी बदतमीजी मैट करियो, फिर चची जबतक आएगी तेरी गांड बन्दर जैसी लाल कर चुके होंगे थंडर जी.", ये कही से भी कोरी बात नहीं थी और उमेद ने विनोद की पीठ थपकते हुए इस बात पर हामी भरी.

"अगर तुमने अर्जुन को कुछ कहा भी है तोह शायद इसलिए की तुम अपने भाई बहनो में सबसे छोटे और लाडले होने पर सीमा पार करते रहते हो. वो वक़्त तब तक था जब यहाँ बचे नहीं थे विनोद. उनके सर पर चाचा चची की छाया है, कोशिश करना इन्दर की बात समझने की. अर्जुन के हत्थे चढ़े तोह यहाँ बैठा कोई मदद नहीं करेगा.", उमेद ने पहली बार खुलकर अर्जुन से आगाह किया था.

"ध्यान रखूँगा लेकिन सबको पता है मैं छोटा हु उमेद भाई साहब और मेरी बात माँ ने कभी न ताली, न ताई जी ने. और ये अर्जुन तोह भतीजा है मेरा, रौब न मारु तोह चाचा किस बात का."

"तुम गांड मरवाने की तैयारी कर चुके हो तोह हम कुछ नहीं कहेंगे.", हमेशा खामोश रहने वाले राजकुमार ने ऐसे लफ्ज़ कहे तोह बाकी सभी को झटका लगा.

"सही कह रहा हु मैं विनोद. तुम छोटे भाई से ज्यादा मेरे लिए बेटे जैसे हो. 100 कमी होंगी तुम में लेकिन कभी किसी ने तुम पर हाथ नहीं उठाया. जिस घर की छत्त पर हम बैठे है उसमे भी अर्जुन का पसीना है और जहा सब रहते है वह तोह हर दिल के अंदर वो मेरा लायक बीटा राज करता है. ये इन्दर और शंकर उसके बाप है तोह उतना हे उमेद भी है. दलीप के साथ उसका रिश्ता अलग है लेकिन बहोत ख़ास भी और राजेश अर्जुन के लिए जान ले भी सकता है और दे भी सकता है. धर्मपाल उसका शिक्षक होने के साथ साथ दोस्त भी है. मैं जाहिर नहीं करता लेकिन अर्जुन को पता है के हम दोनों के बीच गहरा प्यार है. उसको गलत कहना मतलब सीधा पिता जी के मान को ठेस पहुंचना.", राजकुमार जी द्वारा इतना कुछ खोल कर रखने पर उनके भाइयों के साथ साथ बाकी सब भी आश्चर्य से उन्हें देख रहे थे.

"छोड़ो बड़े जीजा जी, ये भाई आज रात के लिए हे आया है और अब घर पे भी नहीं है. आगे ध्यान रखेगा विनोद और नहीं रखेगा तोह आपकी बात मैं हे सच कर दूंगा.", राजेश ने अंगड़ाई लेते हुए शरीर को कटकटाय तोह उमेद के चेहरे पर मुस्कान तैर गयी.

"न करता भाई मैं उसके साथ कुछ ऐसा वैसा लेकिन डराओ तोह मैट. ताऊजी का लाडला है ये पहले न पता था नहीं तोह दिन में उसको प्यार से बुलाता."

"हाहाहा.. मतलब तुम तेल लगा चुके हो अपने पिछवाड़े पर? हाहाहा.. विनोद दारु पे, फिर खाना खा के आराम से यही छत्त पर सो जईओ.", दलीप ने हँसते हुए ये उपहास किया था और शराब की हलकी सी चुस्की लेते हुए एक बार शंकर की तरफ अलग तरह से देखा. ये इशारा किसी और को समझ नहीं आया था लेकिन इन दोनों में कुछ बात हो चुकी थी.

"चिल मन. मजा लो और ाचे बेटे की तरह परिवार में रहो. अपने वह शहर में जा कर जो दिल करे वो करो. वैसे तुम्हारा 5 सितारा होटल का सपना मैं पंजाब में हे पूरा करवा दू तोह?", राजेश ने बात को एक बार फिर अलग हे रुख दे दिया था. असहज बैठा विनोद तुरंत सहज हो गया.

"पर मेरे पास ज्यादा से ज्यादा 20 तक का जुगाड़ होगा."

"चिंता मैट करो, बहोत है उतने. क्सक्सक्सक्स शहर के उस मैं चौक पर साड़ी जमीन अपने वाकिफ की है. वह तोह सरकारी झमेला भी नहीं दिल्ली जैसा और होटल बनते बनते तुम्हारी साख भी बढ़ा दूंगा. बदले में एक वचन चाहिए.", राजेश की बात सुन्न कर इन्दर ने जैसे उसको रोकना चाहा लेकिन शंकर ने मन कर दिया. बाकी सब भी बड़े गौर से देख रहे थे की राजेश क्या वचन मांगने वाला है और टूटने पर सजा क्या होगी.

"मुझे सब मंजूर है राजेश भाई अगर आप मेरा ये सपना पूरा कर दो. मुझे पता है की 5 सितारा होटल के साथ कितनी ताक़त मिलती है कारोबारी को और मैं वह उतना ताक़तवर नहीं हु. आपके हर वचन को निभाउंगा."

"जीवन में कभी भी परै स्त्री पर हाथ नहीं रखोगे और परिवार के हर सदस्य के साथ िज्जात्त से बात करोगे. 10 दिन सोचना इस बारे में और 11वे दिन शादी पर मैं तुमसे जवाब मांगना. तभी बताऊंगा की वचन टूटने की कीमत क्या होगी. मेरे सभी जीजा को अगर कोई आपत्ति है तोह बोल दीजिये.", राजेश ने बात कहने के साथ हे उठ कर थोड़ी चहलकदमी शुरू कर दी. बैठे बैठे उसकी टाँगे थोड़ी जकड गई थी. लेकिन इस वचन ने तोह सचमुच विनोद को परेशानी में दाल दिया था क्योंकि वो तोह खुद को बादशाह समझता था. इस वचन को निभाना मतलब सबकुछ बंद. शंकर और दलीप मंद मंद मुस्कुरा रहे थे.

"आराम से सोचना विनोद, राजेश जो कहता है वो करके दिखता है. रही बात पैसे और पहुंच की तोह इधर बैठे सभी लोगो में से सिर्फ शंकर और उमेद हे इसकी टक्कर के हो सकते है लेकिन कुछ कायदो में ये दोनों बंधे है.", नरिंदर के ऐसा कहने पर विनोद ने जाम उठाते हुए बस संक्षिप्त सा जवाब दिया.

"जी इन्दर भैया, सोच कर हे फैंसला लूंगा.", विनोद को ये सब एक सुनहरे सपने सा लग रहा था लेकिन वचन टूटने का परिणाम और नरिंदर की चेतावनी से दिल में कुछ हलचल जरूर थी. इनकी महफ़िल अभी कही लम्बी होने वाली थी और अभी तोह राजकुमार जी से छुपा कर निचे भी एक बोतल राखी थी जिसको इन्दर, शंकर और उमेद ने बाद के लिए रखा था.

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घर से विदा लेते हुए सांगवान जी को भी 11 बजने को आये थे आज. सभी लोगो ने बहोत काम किये थे दिन भर और इस वक़्त उनके साथ बहार आँगन में पंडित जी, कौशल्या जी के साथ अर्जुन हे आया था. सांगवान जी का पूरा परिवार आज के दिन की कई मीठी यादें ले जा रहा था. अर्जुन से धर्मवीर जी गले लग कर मिले थे.

"ऐसे हे अपनी समझदारी बरकरार रखना बीटा. तुम पर नाज है हमको. भाभी जी, सच कहु तोह हीरा तराशना बस आपको और भाई साहब को हे आता है.", उनके स्वर में सिर्फ अपनापन और ढेर सारा प्यार था.

"भाई साहब, आप भी तोह कमी नहीं रखते. बचे हमारे लिए तोह सभी एक से है बस ये थोड़ा ज्यादा हे सरल है इसलिए ज्यादा लोग देखभाल करते है.", कौशल्या जी ने एक थैला यशोदा जी को पकड़ाया और फिर धर्मवीर जी के सामने मान से हाथ जोड़ दिए.

"चलती हु बहिन जी और ये कभी गलत नहीं कहते. शिक्षा के साथ साथ इंसान का व्यक्तित्व और समर्पण सबसे बड़ी बात है. आज तोह रूचि का भी दिल लग गया था यहाँ.", यशोदा जी ने अर्जुन के सर पर हाथ फेरा और उधर मरीना ने सबको हे हैरत में दाल दिया. सारा दिन ये लड़की अर्जुन से कटी कटी सी रही थी लेकिन अभी अचानक उसने अर्जुन को गले लगाने के बाद जो कहा वो सुन्न कर सभी गदगद हो गए.

"थैंक यू सो मच. पता है तुम्हारे जैसा भाई मिलना सबसे बड़ी ख़ुशी है मेरे लिए. तुमने एक बार भी मेरी sahi-galat बात का बुरा नहीं मन और न कोई रिप्लाई दिया. ा डेन्ट बॉय विथ गोल्डन हार्ट, शंकर चाचा की तरह. मरीना विल रेमेम्बेर थिस डे फॉरएवर, ारु. यू अरे ा गेम ऑफ़ ा पर्सन एंड बेस्ट बरोथेर. गूडनिघत.", गाल को चूम कर वो अपने दादा की बगल में जा कड़ी हुई. अर्जुन बस नजरे झुकाये मुस्कुरा रहा था.

"अरे इतनी भी तारीफ न करो इसकी. नीरा बैल हे है यु जिस तरह ताई कहे है लेकिन सच कहु तोह पापा जैसी बात करे है, खरी और दिल ने सुकून दें वाली. तू गहरा आया कर महारे, तेरे bhai-behan भी मिल के देखे और उन्हाना पता चले के बालक कैसे होने चाहिए. ताऊ जी, यु मैंने हे गॉड दे दो तोह बात चोखी न हो जे?", रुचिता ने ठेठ लहजे में बात करते हुए आज के दिन में पहली बार अर्जुन को गले लगाया था और उसके बाद वो कौशल्या जी से भी गले लग कर मिली.

"ले जा तू इसको अगर तुझे ये बैल इतना पसंद है तोह. मैं खुश हु की मेरी बेटी आज खुश रही.", रामेश्वर जी ने ये कहा था और अर्जुन ने सभी बड़ो के चरण स्पर्श करते हुए खुद हे उन्हें घर के बहार तक विदा किया. जाते हुए ांनी ने बस 'थैंक यू' कहा था और रूचि की मुस्कान जाने क्या कह गयी थी.

"तू इस बात को सर पे मैट चढ़ा लियो और विनोद से तोह नहीं उलझा था न?", कौशल्या जी के ऐसा कहते हे अर्जुन गेट के टाला लगता हुआ उनको अपने साथ लिए दादा दादी के कमरे में आ गया.

"आप बैठो मैं पाँव की मालिश करता हु. विनोद चाचा जी का मुझे पता है दादी थोड़ा बहोत और मैं उन्हें उतनी हे इज्जत दूंगा जितनी सबको देता हो. थोड़े से रूखे है लेकिन कोई बात नहीं."

"कैसे कोई बात नहीं? तुझे कुछ कहा था विनोद ने?", रामेश्वर जी भी बिस्टेर पर आराम करते हुए एकाएक बोल उठे. उनकी नाराजगी देख अर्जुन शांत हे रहा.

"एक रात की तोह बात है जी और वो हैं भी नहीं यहाँ. आप गुस्सा न किया करो इतना, बरसो बाद तोह वो आया था यहाँ.", रामेश्वर जी भी अपनी बीवी की बात सुन्न कर थोड़ा नरम पड़ गए. अर्जुन अपनी दादी के पंजो पर तेल से मालिश करता बस खामोश हे रहा.

"कृष्णेश्वर की बात न होती तोह मैं कबका फैसल कर देता कौशल्या. Putra-moh में देवकी ने उसको बांध दिया और इस सबमे तुमने मुझे. ज़िंदगीभर इस बोझ को लिए जी रहा हु लेकिन अगर यहाँ कुछ भी unch-neech हुई तोह मैं वचन नहीं निभा सकूंगा. अर्जुन, तुम्हे अजीब लग रहा होगा की क्यों मैं तुम्हारे छोटे दादा जी के परिवार को कभी यहाँ नहीं बुलाता.?"

"हम इस बात पर अलग चर्चा कर सकते है दादा जी. फ़िलहाल शादी तक आप कुछ भी ऐसी बात न करे जिस से मेरी दादी को दुःख हो. मैं 3-4 साल का रहा होऊंगा जब ये वाले चाचा आये थे, तब तोह उम्र भी कुछ नहीं थी इनकी. इतने सालो बाद आज आये है तोह वजह जरूर होगी. फ़िलहाल इस पर बात नहीं करते.", रामेश्वर जी का दिमाग हिल गया था इस बात को सुन्न कर. मतलब अर्जुन कुछ जान चूका था और इसलिए वो इतना शांत था.

"ठीक हे तोह कह रहा है मेरा बीटा, बहु घर में है और वो बहार. नहीं टूटने देते वचन और आपका बोझ भी कभी न कभी तोह उतर हे जाएगा.", कौशल्या जी ने ये बात मजाक में कही थी और उन्हें बड़ा आराम मिल रहा था मालिश से.

"हाँ थानेदारनी जी, मुझे भी लग रहा है के जल्द हे बोझ उतर जाएगा. और वाडे के मुताबिक मैं तोह दखल देने भी नहीं वाला.", अब रामेश्वर जी के चेहरे पर अलग सी मुस्कराहट थी जैसे उन्हें भान हो गया था की कुछ ाचा जरूर होगा. इसके बाद वही ब्याह और काम की चर्चा के बीच अर्जुन आधा घंटा तक अपने दादा दादी के तलवो की मालिश करता रहा. दोनों को सुकून देने के बाद वो भी हाथ धो कर अपनी माँ के कमरे की तरफ चल दिया.

यहाँ पहले हे ऋतू माँ से चिपक कर सो चुकी थी. कृष्णा चची के साथ आज फिर से आरती थी लेकिन दूसरी तरफ रुपाली. अर्जुन मुस्कुराता हुआ ऊपर आया तोह haal-kamre में मद्दिम रौशनी के बीच बिस्टेर पर तारा सो रही थी और प्रियंका बाथरूम में थी जिसका अर्जुन को पता न चला. विन्नी दीदी को यहाँ न देख वो थोड़ा उदास हुआ और संजीव भैया के कमरे में निगाह करि. वह तोह कोई भी न दिखा. अपने बिस्टेर पर लेट कर वो बस विचारो की हे दुनिया में खोया था की इस नरम और थोड़े वजनी जिस्म को अपने ऊपर महसूस करते हे आँखें खुल गयी.

"दीदी आप?", अर्जुन के होश हे उड़द गए थे मध्यरात्रि के समय ये विशाल निर्वस्त्र चुके अपने चेहरे के पास देख. प्रियंका का दमकता यौवन उसके सामने पूर्ण निर्वस्त्र था और वो बड़ी अदा से उसकी कमर पर टाँगे फैलाये झुकी बैठी थी. माधुरी की टक्कर के वो बड़े पर्वत कही ज्यादा हे सख्त थे और इस खूबसूरत कामदेवी के साथ अभी तक अर्जुन ने सिर्फ एक बार purn-milan किया था.

"किसी और का इन्तजार था क्या?"

"नहीं लेकिन ये भी उम्मीद नहीं थी की आपका दीदार hoga.",Arjun के गले में खुश्की उभर आयी थी उन बेरी से laal-kathai चुचकों को देख कर, जो कुछ इंच की दुरी पर थे और प्रियंका के जिस्म से उठती ये तजा महक जैसे पूरे कमरे में फ़ैल चुकी थी. धीरे से अपने दोनों बड़े गुब्बारे अर्जुन के चेहरे पर रखती हुई वो बड़ी कामुकता से बोली.

"आज तुम्हारी हर ख्वाहिश पूरी करना चाहती है तुम्हारी पिंकी. जैसा तुम कहते रहते हो और पूरी रात तुम्हे इतना प्यार करना है की चाँद ढलते हुए सूरज का उगना तुम्हारी बाहों में देखु. कर सकते हो इतना प्यार?", अर्जुन तोह उन बड़े उरोजों की महक अपने नथुनों में भरने लगा था. क्या खुमार था उनकी महक में जैसे पहली बारिश पर आती मिटटी की सोंधी सोंधी सुगंध. उत्तेजना से उसका सोया हुआ लिंग भी अकड़ कर नाभि तक चिपक गया.

"मैं पीछे नहीं हटूंगा दीदी लेकिन ये आपके लिए ज्यादा हो सकता है. जवाब मुश्किल हो जायेगा देना.", अर्जुन ने वो बड़े बड़े फैले हुए कूल्हों को दबाए हुए दीदी की आँखों में देख कर कहा. वो भी एक ऐसे संसर्ग की चाहत रखता था जिसमे समय और संगिनी का पुरजोर समावेश हो. ऐसा अबतक सिर्फ कोमल दीदी कर सकीय थी और अलका को ऋतू का सहारा लेना पड़ा था.

"मेरी तोह चाहत ने आज मुझे बेशरम बना दिया अर्जुन लेकिन सच कहु तोह मैं जितना प्यार तुमसे करती हु, उतना कभी मैं किसी से कर सकुंगी ये अब मुमकिन नहीं होगा. बस आज मैं तेरी हु और मैं खुद चाहती हु की सूरज की पहली किरण तेरी बाहों में देखु.", इतना कहते हुए प्रियंका थोड़ा पीछे सरकती अपने होंठो का रास अर्जुन को पिलाने लगी. भारी वक्ष जैसे अर्जुन को जाता रहे थे की आज prem-dwand में सामने वाला हार कर भी जीतने वाला है.
 
अपडेट 150

चाहत - 3


पुराने घर की उस खुली छत पर अब ये अतिरिक्त आखिरी बोतल खुली थी और अब यहाँ सिर्फ 4 लोग थे. शंकर, इन्दर, उमेद और विनोद. दलीप के साथ राजेश वापिस जा चूका था और राजकुमार जी नीचे वाले एक कमरे में एक की ठंडक में सो चुके थे, धर्मपाल जी के घर जाने के बाद.

"शंकर भाई, वो किरण बहोत याद करती है आपको. मैं गया था एक दिन जब ज्यादा हे आग लगी थी लेकिन साली ने हाथ न रखने दिया.", विनोद अब कही ज्यादा हे नशे में था लगभग आधी बोतल हलक में जाने के बाद. चेहरे पर हल्का पसीना, डबडबाती हुई नशे में चूर आँखें और थिरकता हुआ शरीर. बाकी तीनो तोह जैसे अभी पीने लगे थे, जिन्हे naam-matra भी सुरूर न था.

"क्या बोल रही थी किरण, बिनोदिये? पिछली बार तोह तू हमारी चुदाई देख कर अपना हिला रहा था.", शंकर के चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी और बड़े भाई और साले के जाने से यहाँ माहौल ज्यादा हे खुलने लगा.

"हिक्क.. कह रही थी के गांड देखने देती हु बहोत है लेकिन शंकर के सिवा उस पर बस उसके पति का हक़ है. याद कर रही थी आपको, पति की छुट्टी कैंसिल हो गयी बेचारी की. कुछ भी कहो साली कॉलेज की लड़कियों से भी करारी है.", विनोद का वो हाथ जिसमे जाम था लगातार हिल रहा था. उसकी हालत पर चेहरे से तोह बाकी तीनो मुस्कुरा रहे थे लेकिन बात जैसे कुछ और हे थी.

"विनोद, तू साले ये कॉलेज वाली लड़कियां पटटा कैसे है बे? हमेशा तोह होटल पे गांड मरवाता रहता है, टाइम कैसे मिलता है? और वो भी कॉलेज की लड़कियां तेरे जैसे के साथ मान जाती है. स्मार्ट तोह है तू.", ये बात अब नरिंदर ने कही थी और अपने हाथ से उमेद ने एक काश लगवा दिया विनोद को, जिस से उसको महाराजा वाला एहसास होने लगा.

"क्या इन्दर भाई चुटिया समझा है जो मैं सड़क पर लड़कियों के पीछे .... लार टपकता फिरू.? ये जो गाँव की करारी जवानी होती है, ये तोह बानी हे अमीरो की चादर बदलने के लिए है. होटल अपने आप चलता है सेटिंग की वजह से, मैं तोह शाही ठाठ से फार्म पर रहता हु.", विनोद की ऐसी सोच देख कर एक पल तोह उमेद ने गहरी सांस भरी लेकिन वो भी जैसे बाकी सबकी तरह विवश था.

"शाही खानदान से तोह अलग हुए हे 18-19 बरस हो गए लेकिन लगता है तू बदलने को तैयार नहीं है.", नरिंदर के ऐसा कहने पर विनोद ने गिलास उमेद को पकड़ते हुए 2 तकिये काख के निचे लगते हुए ऐसी मुद्रा बनाई जैसे महाराजा विनोद जी मुजरा देख रहे हो और बाकी सब उनके naukar-chaakar. गिलास एक अदा से हाथ में वापिस पकड़ते हुए विनोद ने एक घूँट भरी तोह थोड़ी सी मदिरा होंठो से निचे चालक गयी.

"भैया हम शाही थे, शाही है और शाही रहेंगे. 20 गाँव है अपने कसबे के साथ जहा आज भी सबका सर हमारे सामने झुकता है. जमीने हमारी, लोगो को रहने भी हमने दिया वह, वह भी बिना कोई len-den किये. ऐसे में 2-3 कलियों को फूल बना भी दिया तोह किसी के बाप का क्या जाता है. साला सपने तोह बहोत थे लेकिन हमारी ख़ुशी सबसे देखि नहीं जाती.", विनोद की सोच हे बताती थी की उसकी परवरिश कैसे की गयी थी. शायद इस अनदेखी की वजह से हे रामेश्वर जी नाराज रहते थे.

"सपने टूटने पर तोह बुरा बहोत लगता है बिनोदिये, मैं समझता हु इस बात को. और तेरी बात भी सही है की 2-3 कलियों को फूल बना भी दिया तोह क्या गलत हो गया. लेकिन शाही परिवार से रिश्ता तोह पहले था, अब वो dhann-daulat बची हे कहा है?", शंकर ने एक और जाम सबके लिए बनाते हुए जैसी विनोद को ये अलग हे चिंगारी लगा दी.

"हाँ भाई विनोद, अब तोह raaj-pariwar से पैसा तोह मिलता नहीं. राजमाता खुद राजनीति करती है और उनका खर्चा University-Hospital आदि से चलता है. हम सबको भी रोजगार करना हे पड़ा, सही गलत तरीके से लेकिन तुम्हारी ज़िन्दगी उतनी ख़ास नहीं लगती पैसे के मामले में. शाही परिवार से और कार एस्टीम, खुद का होटल लेकिन हिसाब चाचा को देना पड़ता है तुम्हे.", नरिंदर ने भी सलाद का टुकड़ा विनोद को खिलते हुए इस बात को और हवा दी.

"भैया आप लोग हो चुटिया, बुरा मैट मान na..hikk... थैंक यू इन्दर भाई.. हाँ तोह बात है ये टुच्ची सी कार की या होटल की तोह ऐसी गाडी मैं रोज खरीद लू. राजपरिवार की ताक़त जरूर काम कर दी है सरकार ने लेकिन इतनी भी काम नहीं हुई जितना सभी सोचते है. 20 करोड़ तोह पिछले 2 साल में कमा लिए मैंने, जब सही औकात का ज्ञान हुआ. हाँ सारा पैसा कला है इसलिए इधर उधर चढ़ा देता हु...", विनोद की आँखें थोड़ी बोझिल थी लेकिन वो अपना गुणगान करता रहा.

"पूछो कैसे?"

"20 करोड़ 2 साल में तोह बहुत ज्यादा है बिनोदिये, कैसे कमाए बे तुमने इतने पैसे.?", उमेद ने आश्चर्यचकित होने का दिखावा करते हुए पुछा.

"हाहाहा.. बताया न उमेद भाई की पैसा कला है. किसी छोटे मॉटे किसान की जमीन पर कारोबारी दोस्तों की फैक्ट्री लगवा दी तोह कही फार्म पर लोगो की ख़ास मीटिंग अर्रंगे करवा दी. मुझे मतलब नहीं के वो किस धंदे से जुड़े है, बस पैसा मिलता है और मैं उनकी शाम पूरी रंगीन रखने की जिम्मेवारी लेता हु.", नशे के बावजूद विनोद बता नहीं रहा था के उसकी इतनी ज्यादा कमाई का राज क्या है लेकिन नरिंदर को जैसे कुछ एहसास था.

"वो राजेश कह रहा था के 2 लड़कियों के साथ तुम्हारा कुछ लफड़ा हुआ था?", अब उमेद ने बात को पलट कर नयी जानकारी लेनी चाहि.

"घंटा कुछ लफड़ा उमेद भाई. वो तोह बस कुछ शातिर कबूतरी थी दोनों जो फंसने का दिखावा कर रही थी साली. ले दे के उनका किस्सा शांत करवा दिया. शहर वाली होती हे साली ज्यादा चालाक है. कुछ करो तोह लफड़ा न करो तोह लफड़ा. मैं चला बड़े भाइयों सोने, आराम नहीं करूँगा तोह सवेरे कार नहीं चलेगी.", झूमता हुआ विनोद खड़ा हुआ तोह नरिंदर ने उसको गिरने से बचते हुए थाम लिए. सीढ़ियों से अपना साथ लगाए वो विनोद को नीचे ले चला.

"यार शंकर, बड़ा हे मादरचोद व्यक्ति है ये विनोद तोह. मतलब 20 गाँव में जो नाम चाचा जी ने बनाया था वो ये विंडो मिटटी में मिलाने पर तुला हुआ है. चाहे करता ये सबकुछ सावधानी से है लेकिन सोच राजेश जब इस तक पहुंच गया तोह इसका मतलब यही हुआ के अब ये हाथ से बहार जा रहा है.", उमेद की चिंता देख शंकर ने भी सर हिला दिया. कभी अपशब्द न कहने वाले उमेद की हालत शंकर समझ रहा था.

"ये पहले फिर भी कुछ हद्द तक हे काण्ड करता था लेकिन दोनों बड़ी बहनो के ब्याह के बाद जैसे इसको लाइसेंस मिल गया गज्जू. पहले हे पापा गाँव से दूर रहते थे जबसे चची इसको सर चढाने लगी. वो खेत वाला किस्सा तोह याद हे होगा तुझे जब विनोद जबरदस्ती कर रहा था और पापा वही से इसको नंगा करके घर तक बेल्ट से लाल करते लाये थे. बस उस दिन 2 हिस्से हो गए थे और चाचा पापा के पाँव में गिर गए अपनी बीवी के ड्रामे से डर कर. इसको कुछ कहो तोह चची तूफ़ान उठा देगी और चची को कुछ हुआ तोह चाचा randi-rona शुरू कर देगा. बहने भी अपनी माँ पर हे गयी है इसलिए माँ ने हे पापा को राजपरिवार से किनारा करवा दिया.", शंकर की विवशता से उमेद भली भांति परिचित था.

"गज्जू भाई, लेकिन इसका ये मतलब नहीं की इसको ऐसे हे उड़ने देंगे. आज ये इतने साल बाद आया और मेरे बीटा बेटी के लिए बोल गया. हम कुछ नहीं कर सकते लेकिन अर्जुन किसी वचन में नहीं बंधा.", नरिंदर ऊपर आते हे बीच वाले गद्दे पर चौकड़ी लगता बैठ गया.

"अर्जुन को बहार रखने के लिए हे तोह मैंने राजेश और दलीप को शामिल किया है इन्दर. विनोद को हवा देने वाला है इसका बड़ा जीजा और एक तरह से ये बस रुतबे में अँधा उनके sahi-galat काम में साथ दे रहा है. विनोद के aas-pas की गन्दगी साफ़ करनी पड़ेगी, इसको दिखा कर. अर्जुन इसको सुधर सकता है लेकिन वो गंदगी में उतरे ये मुझे मंजूर नहीं.", शंकर के ऐसे शब्द सुन्न कर उमेद हैरानी से देख रहा था.

"गज्जू, अपना शंकर दिखता नहीं लेकिन अर्जुन पे जान वार्ता है ये ठीक पापा और teri-meri तरह. वो लड़का भी अपने बाप को कही बेहतर समझता है इसलिए इसकी बात का बुरा नहीं मानता. देखा था न खाने की टेबल पर वो खुद शंकर से बात कर रहा था, नाराज होने की जगह. लेकिन फिर भी मैं तोह कहता हु शंकर की हम गन्दगी साफ़ करते है, विनोद का मामला अर्जुन को हे देखने दो. किरशन चाचा भी जो दीखते है वो हैं नहीं.", नरिंदर ने ये आखिरी तीन जाम बनाते हुए अपनी बात राखी तोह शंकर ने उमेद की तरफ देखते हुए हाँ कर दी.

"वही ठीक रहेगा लेकिन राजेश कह रहा था के विनोद नए होटल के लिए 3-4 दिन में मीटिंग रखने का बोलेगा. वह वो सब लोग हो सकते है जो अभी तक हमारे सामने नहीं आये है."

"मैं तैयार हु भोले और ये प्रोग्राम तू, मैं और राजेश देखते है. नरिंदर ने उस तरफ बहोत काम किया है, इसको यहाँ घर हे रहने दे इस बार.", उमेद की बात पर नरिंदर थोड़ा नाराज लगा.

"हाँ इन्दर, तू इस बार घर हे रह भाई. गज्जू है मेरे साथ तोह तू चिंता मैट कर लेकिन इस बार एक या 2 खूबसूरत लड़कियों की भी जरुरत पड़ेगी गज्जू.", शंकर के सुझाव पर उमेद ने तोह साफ़ मानक कर दिया.

"अपने आप जुगाड़ ये सब. मैं साल में 18 दिन देवीमाता के व्रत रखता हु और हर लड़की मेरे लिए अपनी बेटी है भोले. समझ तोह मैं गया हु के तू कैसे लोगो को गिलास में उतरने वाला है परन्तु जैसी लड़की तुझे चाहिए वो इंटेलीजेंट होने के साथ साथ आधुनिक भी होनी चाहिए."

"हो गया जुगाड़ और वो दोनों लड़कियां हैं भी दिलेर, हसीं होने के साथ. वाह मेरे गज्जू प्यारे तू हमेशा सही बात करता है. इन्दर, goli-pistol वाला मामला तोह बनेगा नहीं."

"तेरे हाथ ब्लेड ज्यादा ाचा लगता शंकर और जादूगर की कलाई में वो बड़े आराम से छुपाया भी जा सकता है. राजेश को भी बहोत पसंद है cheer-faad और अपना गज्जू भी समय आने पर खाली हाथ हे शरीर फाड़ सकता है. कोशिश करना भाई के ज्यादा तमाशा न हो. तू मय्याट्ट में भी बंद बाजा बजने से नहीं hatt-ta. गज्जू इसको संभल के रखना क्योंकि ये jija-sala कम्पटीशन करने लगे तोह ये भी नहीं देखेंगे कोई बेक़सूर है या कमजोर.", नरिंदर की बात पर उमेद हंसने लगा था और जाम ख़तम करते हे सिग्गट सुलगता वो शंकर के सर पर हाथ फेरने लगा.

"यही खूबी तोह इसको हम सबसे ज्यादा ख़ास बनती इन्दर. जहा शंकर के दिमाग ने करवट ली वही इसका अलग स्वरुप. कही आशिक़ तोह कही जल्लाद. साला बीमारी भी मिली तोह एक नंबर मिली इस भोले को.", उमेद के ऐसा कहने पर शंकर किसी लड़की सा शर्माने लगा था और नरिंदर भी मुस्कुराते हुए शंकर के गले में बाहें दाल उसके गाल चूमने लगा.

"इसलिए तोह ये आज भी कॉलेज में है गज्जू, अपना देसी मुर्गा. हाहाहा..", नरिंदर के ऐसा कहते हे शंकर ने भी अपने छोटे भाई को एक तरफ से साथ लगा लिए.

"गज्जू, तू इन्दर के जाने के बाद साथ न रहता तोह मैं...."

"शहहह.. हम दोनों में एक तोह हमेशा हे तेरे साथ रहेगा भोले और जब दोनों हो तोह तू बस आराम से अपनी डॉक्टर वाली ज़िन्दगी जिया कर. हम दोनों से कही ज्यादा जरुरत तेरी है सबको.", उमेद ने वो बात कहने हे नहीं दी शंकर को जो उसकी जुबान पर आने लगी थी.

"सच है ये शंकर और हो सके तोह तू काम हे ऐसे काण्ड किया कर जिसमे हम दोनों में से कोई एक भी तेरे साथ न हो. संजीव ने बताया था मुझे तेरे परम, मेहुल और भुप्पी के बारे में. वो बेहतरीन लोग है और हमारे लिए भाई जैसे हे लेकिन जब एक रात में 4 जगह हमले हुए थे तोह वो तीनो घायल हुए, असला होने के बावजूद. समझ रहा है न भाई तू?"

"हाँ बे समझ तोह मैं तभी गया था और उनसे तेज तोह अर्जुन हे निकला जो निहत्था हे 4-4 बंदूकधारी लोगो पर भरी पड़ा. वैसे वो तीनो उतने भी बुरे नहीं है और maar-kaat का तरीका भी एक से बढ़ कर एक है सबका. लेकिन ये बड़े झगड़ो में सिर्फ परम हे काबिल है और वो घायल भी भुप्पी को बचते हुए हुआ. अब तोह मैं उनको भी सिमित हे रखूँगा क्योंकि तुमने और गज्जू ने जो सब संभल लिया है. वो साला दलीप और राजेश भी कहते है के तुम दोनों का काम करने का अंदाज उन्हें पसंद है. चल एक एक काश लगा कर रोटी खाते है फिर कल डबल ड्यूटी भी है मेरी."

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इस ख़ामोशी से परिपूर्ण घर में बस एक यही अर्जुन का कमरा था जहा रात के डेढ़ बजे 2 लोग एक दूसरे को बाहों में भरे जाग रहे थे. आज प्रियंका के जिस्म का जर्रा ज़रा अर्जुन के नाम से महक रहा था. दोनों हे गीले बदन निर्वस्त्र एक दूसरे को प्यार से चूमते, सहलाते हुए बतिया रहे थे. जीवन में यही एक पहला संसर्ग था अर्जुन को जिसमे वो घंटे भर तक अपनी बड़ी बहिन के जिस्म को प्यार से महकता रहा था.

"ी लव यू.. उम्माह.. सचमुच तुम बहोत ख़ास हो अर्जुन. इतने आराम और परवाह से तुमने जो मेरी इत्छा पूरी की है, मेरे पास शब्द नहीं है.", प्रियंका अपनी जांघ आपस में सताने में असमर्थ जरूर थी छूट पर आयी हलकी सूजन की वजह से लेकिन एक पाँव अर्जुन पर रखे वो उस मीठी खारिश से अलग हे मजे में थे.

"आपको दर्द देना मतलब अपना स्वार्थ होता न दीदी. आप इतनी प्यारी हो तोह मुझे ख़याल रखना हे पड़ेगा. वैसे अभी भी दर्द है न?", हलकी रौशनी में प्रियंका का वो दूधिया उन्नत शरीर कुछ समय पहले हुए मिलान का भरपूर वर्णन कर रहा था. गुलाबी नुकीली घुंडीया अभी तक सख्त थी कुछ लालिमा लिए गोर वक्षो पर. बड़े बड़े चिकने कूल्हों के बीच बहार की तरफ उभरी वो सिलवटों वाली मुलायम छूट की गुलाबी फांको में नमी बरक़रार थी. होंठो को चूस चूस कर और उभार दिया था अर्जुन ने.

"िष्ठ.. कही दर्द नहीं है अर्जुन.. बस दिल कह रहा है की अगर ये लम्हा एक सपना है तोह मैं कभी इस से बहार न निकलू. आज एहसास हुआ है अपने होने का और चाहे तुम्हे ये मेरा स्वार्थ लगे लेकिन जितने आँखें खुली है, मुझमे समाये रहो.. उम्म्म्म..", धीमी आवाज में अपने दिल की ख्वाशिः कहती प्रियंका ने खुदसे हे अर्जुन का ऊपर हाथ अपने कूल्हों से हटा कर मॉटे वक्ष पर रख दिया. सिसकती हुई वो अपनी छूट को अर्जुन के तन्नाए लुंड पर रगड़ने लगी. कॉमर्स से भरपूर छूट की फांको ने उस पहले से विकराल kaam-dand को कही ज्यादा हे निखार दिया था.

"उम्म्म्म.. कही ऐसा न हो दीदी की आप चल हे न सको.", अर्जुन दीदी के ऊपर होंठ को चूमने के साथ हे उनका वो खरबूजे सा दूध दबाने लगा. लुंड अकड़ कर छूट के आगे से फिसलता कूल्हों से 3-4 इंच तक बहार निकल रहा था. प्रियंका ने आँखें मूंदे हुए हे एक हाथ से वो कलाई से मोटा बांस पकड़ कर अपनी तजा चूड़ी छूट की फांको के मुहाने भिड़ा दिया. सुपडे की गर्मी और छूट का गीलापन उनके जिस्म की आग को और बढ़ा रहा था.

"उफ्फ्फ.. भाई.. ये रात का सफर तोह मंजिल लगे, सवेरा अभी बहोत दूर है. आअह्ह्ह्ह.. इस बार जैसे तुझे पसंद है वैसे.. उम्म्म्म", मांसल जांघो पर हाथ फिरते हुए अर्जुन ने गद्देदार चूतड़ को पंजे से दबोचते हुए कमर आगे सरका दी. प्रियंका मदहोशी के आलम से निकलती उस से पहले हे आधा लुंड उस फूली हुई छूट को भेदता हुआ कच्छ से अंदर उतर गया. एक तेज 'आठ' के साथ प्रियंका ने अपने सीने को अर्जुन की लोखंड सी छाती से चिपका दिया. तजा चूड़ी छूट में इस धक्के ने अलग हे आग लगा दी.

"आपको दर्द हो रहा है न दीदी? आपकी वागिना में हलकी सूजन है जो पता लग रही है इतनी टाइट होने की वजह से.", अर्जुन बिना hile-dule दीदी का सर सहलाने लगा. छूट की वो मीठी खारिश अब हलके दर्द में बदल चुकी थी.

"जे प्यार मेरा मेरे कॉल, तह कोई पीड़ नहीं होनी.. हंजुआ न पहचान, तेरी दीड भरी होनी..", प्रियंका ने आँखे खुमारी से खोलते हुए अर्जुन से नजर मिलते हुए अपनी चाहत जिस तरह बयान की एक पल तोह अर्जुन भी निरुत्तर हो गया. इतनी गहरा प्यार? और उसके जवाब से पहले हे प्रियंका दीदी ने कमर को अर्जुन की तरफ करते हुए पूरा लिंग अपनी नाजुक छूट के अंदर जड़ तक उतार लिया. बंद आँखों से 2 गरम पानी की बूंदे निकल कर अर्जुन के चेहरे को भी छू गयी. अर्जुन के होंठो पर दीदी ने जोरदार प्रहार किया था अपने दर्द को बर्दाश्त करते हुए.

दीदी के मुलायम बदन को बाहों में थाम कर वो भी आँखें मूंदे धीमी रफ़्तार से उनकी इत्छा पूरी करने जुट गया. 2-3 इंच लुंड अंदर बहार होता हुआ प्रियंका को हलके दर्द के साथ अलग हे मजा दे रहा था. लिपटे हुए हे वो अर्जुन को करवट के बल करती हुई पूरी उसके ऊपर आ गयी. 38 के बड़े कूल्हों के बीच वो चमकता हुआ सख्त मूसल जड़ तक प्रियंका के अंदर जाता और फिर से वो 3-4 इंच आगे हो जाती. चुदाई की कमान पूरी तरह से प्रियंका के हाथ थी. हर बार पूरा अंदर जाते हे गोर चुत्तड़ो के बीच वो छोटा सा गुलाबी छेड़ दिखने लगता, गहरी खाई के फैलने पर. अर्जुन के दोनों हाथ अब उन मुलायम कूल्हों को मसल रहे थे और प्रियंका अपनी लाये में वैसे हे aage-peeche होती अपने बड़े चुके अर्जुन की ठोस छाती पर घिसती रही. 10-12 मिनट की इस शांत चुदाई में अब प्रियंका जोरो से झड़ने लगी तोह होंठो से हलकी चीख निकल गई.

"आह्हः.. अर्जुन.. आअह्ह्ह्ह...", और शरीर बेजान सा हो कर अर्जुन पर गिर गया. अर्जुन भी समझता था ऐसे तगड़े चरमोत्कर्ष पर होने वाली हालत को. साँसों का शोर बता रहा था कितनी म्हणत की है प्रियंका ने. अर्जुन के अंडकोष बुरी तरह चुतरस में भीगे चमक रहे थे.

"आप आराम कर लीजिये.", अर्जुन ने फिर से करवट करते हुए प्रियंक को बगल में लिटाया लेकिन मुस्कुराती हुई वो ना में गर्दन हिलने लगी. चेहरा लाल हो चूका था और हल्का पसीना म्हणत की साफ़ गवाही था.

"ऐसा करना जरुरी था ारु."

"क्यों दीदी? आपने कुछ ज्यादा हे म्हणत नहीं कर ली?", अर्जुन उनका गाल सहलाते हुए उतने हे प्यार से पूछने लगा. धड़कन अभी भी थोड़ी तेजी से चल रही थी. मॉटे कैसे हुए चुचो का हिलना देख अर्जुन दुविधा में था.

"मैंने अपने हिस्से की म्हणत कर्ली लेकिन मैं जानती हु तुम्हे मुझमे क्या पसंद है और उसके लिए अब साड़ी म्हणत तुम्हे करनी है.", प्रियंका दीदी के गरम सांसें इतनी करीब से अर्जुन के चेहरे पर गिरती हुई जैसे उसको और उकसा रही थी. अर्जुन बस उनकी आँखों में खोया ये सुन्न हे रहा था और दीदी ने उसका हाथ पकड़ कर अपने कूल्हों पर रख दिया. पहले हुए वो बड़े नितम्भ सचमुच जानलेवा थे और अर्जुन की पसंद भी. लुंड ने दीदी की इस हरकत पर ठुमकते हुए ख़ुशी जाहिर कर दी.

"दीदी, चल नहीं पाओगी. कितनी भी कोशिश कर लू लेकिन आपका पहली बार है वह और वो तोह वागिना से भी टाइट होती है."

"कल मैं आराम पे हु अर्जुन. माँ को पता है मुझे बुखार है और अगर अब सच में हो भी जायेगा तोह ाची बात है न. उम्माह.. मुझे करवाना है बून्द में.", प्रियंका ने जैसे हे गांड को बून्द कहा अर्जुन ने मस्ती में एक तेज धक्का लगते हुए उन्हें कस के जकड लिए.

"आठ.. सचमुच पागल हैं न तू इसके लिए.? तेरा ये मोटा डंडा भी फुदकता हुआ खुश हो रहा है. आज अपनी चाहत पूरी कर लो, मैं भी तैयार हु भाई.", अर्जुन को अपने साथ चिपकाये प्रियंका दीदी अभी भी अपनी कमर हिला रही थी, जैसे उन्हें डर हो की अर्जुन की उत्त्जना काम न हो जाये. लेकिन अर्जुन को एकाएक खुद से अलग होता देख थोड़ी हैरान हो गयी.

"मत एवेरेस्ट पर चढ़ने के लिए अलग जूते पहन ने पड़ते है न दीदी. यही hu,kahi जा नहीं रहा.", अर्जुन की बात सुन्न कर वो बस उसके तराशे हुए lambe-chaude जिस्म को निहारने लगी. इतनी मेहनत से वो अलग चमक रहा था लेकिन सबसे ख़ास था वो 45 की कोण पर खड़ा मोटा तगड़ा मूसल. आधी चुदाई के बाद अनगिनत नस्से उभरी हुई उसको कही ज्यादा आकर्षक बनती थी. अर्जुन ने अपनी अलमारी में छिपा कर राखी वो जेली की तुबे और श्रीगोपाल तेल की शीशी निकल ली.

"आप यहाँ मालिश करो मैं उधर करता हु.", अर्जुन बगल में आते हे दीदी की भारी जांघ को अपने पत् पर रखते हुए निचे से थोड़ा करीब हो गया. प्रियंका दीदी बस उस सुनहरी तरल से भरी कांच की शीशी को देख रही थी और अर्जुन अपनी ऊँगली पर तुबे से जेली गिरा कर उनके मॉटे कूल्हों की गहरी फांके फैलता हुआ उस कोरे गुदाद्वार को तैयार करने लगा.

"इस्सस... ठंडी है ये क्रीम.. आह्हः..", सिलवट वाला वो कैसा हुआ छेड़ अर्जुन के स्पर्श से हे गंगना उठा. ठंडी जेली को बाहरी हिस्से पर मसलता अर्जुन अपने निचले हाथ से एक मोटा चुका दबाते हुए दीदी की कामाग्नि बरक़रार रखे थे. करवट लिए हे प्रियंका ने हथेली पर ढक्कन भर तेल उड़ेलते हुए दोनों हाथ से अर्जुन का घोडा थाम लिया. अब मजे से अर्जुन भी दीदी के साथ आहें भरने लगा था. हवा में इस ख़ास तेल की तेज सुगन्धित महक फैलने लगी और प्रियंका को भी इस्पात सामान मजबूत लुंड पर मालिश करना ाचा लगने लगे. सुपडे से जड़ तक की लम्बाई को वो भरपूर मसल रही थी.

"उफ़... आराम से भाई.. आह्हः.. मर्डर गयी..", दीदी ने उसका लुंड कस के दबोच लिया जब अर्जुन की चिकनी मोटी ऊँगली आधी गांड में उतर गयी. शरीर इस नए अनुभव से बुरी तरह अकड़ कर धनुषाकार हो गया. लेकिन जल्द हे अर्जुन की ऊँगली के आराम से अंदर बहार होने पर वो लुंड की मालिश में फिर से जुट गयी. ऐसे वक़्त में दोनों को हे एक दूसरे का स्पर्श अलग हे मजा दे रहा था. बड़े गुब्बारों से चिकने और गोल कूल्हों के बीच की दरार इतनी गहरी थी की उस चिकने होते छेड़ में अर्जुन की ऊँगली बस 2 पोरे जितनी समाती. एक इंच के लगभग हिस्सा बस इस गरम गहराई में बहार हे रहता.

"बहोत कासी हुई हो didi..Uff.. आप मालिश कर रही हो या ऐसे हे काम कर डौगी?", जहा अर्जुन गांड की गर्मी और कसावट से उत्तेजित हो रहा था वही दीदी जैसे उसका पानी हाथो से हे निकलने में लगी थी.

"थोड़ी देर में ढीली भी तू हे करेगा न.. और ये मुझे बड़ा प्यारा लग रहा है बस अंदर कैसे जाएगा पता नहीं."

"करवट दूसरी तरफ कीजिये, देखते है जाता भी है या नहीं.", अर्जुन गांड के चले को नरम और चिकना करके आश्वस्त लगा. प्रियंका ने जैसे हे करवट लेते हुए अपनी पीठ अर्जुन की तरफ की तोह दिल की धड़कन फिर से भड़ने लगी. एक ऊँगली ने हे जब पहली बार में चीख निकलवा दी हो तोह ये मूसल तोह कही भयंकर था. दीदी की निचली टांग सीढ़ी रखते हुए अर्जुन ने ऊपर वाली टांग को थोड़ा आगे कर दिया. ऐसे में दोनों बड़े तरबूज बहार को उभर आये और ये कोण guda-maithun के लिए बिलकुल उचित था.

प्रियंका ने तकिया खींच कर अपने मुँह में दबा लिया था जैसे उसको मालूम हो आगे क्या होने वाला है. गरम गुदाद्वार पर वो लाल टमाटर सा मोटा चमकदार सूपड़ा भिड़ते हे दोनों के शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गयी. सचमुच दरार एक इंच से अधिक गहरी और लचीली थी. सुपडे का दबाव अपनी गुदा पर महसूस करते हे प्रियंका ने उसको कस लिया.

"दीदी, रिलैक्स. ऐसे बहोत दर्द होगा.", एक हाथ से लुंड को guda-dwar पर दबाये अर्जुन ने दूसरे हाथ से उनका सर सहलाते हुए बड़ी धीमी आवाज में कहा. गहरी सांस लेते हुए प्रियंका ने खुद को जैसे तैसे आने वाले तूफ़ान के लिए तैयार किया और गांड को ढीला छोड़ दिया. अगले हे पल शरीर में तीव्र दर्द की लहर दौड़ गयी. जेली से चिकना किया गया वो अछूता छिद्र अपनी क्षमता से दुगना फ़ैल गया.

"गुणणणणण.. आअह्ह्ह..", मोटा सूपड़ा बुरी तरफ गांड को फाड़ता हुआ उस छल्ले को बंध कर अंदर घुसा तोह लाख जातां करने पर भी प्रियंका की घुटी घुटी चीख निकल गयी. शरीर जैसे हे बर्फ सा ठंडा होने लगा तोह अर्जुन ने उनके मॉटे चुके को पकड़ते हुए मसलना शुरू कर दिया.

"हो गया दीदी.. आठ सचमुच जरुरत से ज्यादा हे टाइट है आपकी. इतना चिकना करने पर भी आठ.. ऐसा लग रहा है जैसे मेरा कट जायेगा.", गांड का असहनीय दर्द प्रियंक इस बात से हे भूल गयी की अर्जुन को भी दर्द हो रहा है. कास के उसका हाथ अपने चुचो पर दबाते हुए दीदी ने गांड को बिलकुल ढीला छोड़ दिया. अर्जुन ने भी दीदी को मजबूती से पकड़ते हुए थोड़ा दबाव बढ़ाया तोह सररर से 5-6 इंच लुंड फिसलता हुआ उस गहरी गरम गुफा में उतर गया.

"आह्हः.. मर्डर गयी माँ.. ये तोह ऐसा लग रहा है जैसे मेरी फट गयी हो. अर्जुन.. थोड़ा रुक जा एक बार.", गांड की दोनों फांके एक दूसरी से 3 इंच दूर हो चुकी थी इतने मॉटे लुंड के अंदर जाने पर. अर्जुन ने भी दीदी पर झुकते हुए उनके होंठ मुँह में भर लिए. बारी बारी से दोनों कैसे हुए चुचो को मसलता वो उनसे बिना हिले डुले चिपका रहा. दोनों के शरीर पर पसीने के बुँदे दमकने लगी थी.

"बस अब और दर्द नहीं होगा दीदी. आप हे झेल सकती है ये क्योंकि आपके हिप्स इतने लचीले और बड़े है. बस अभी थोड़ी देर में आपको दर्द होना बंद हो जायेगा.", अर्जुन ने होंठ अलग करते हुए stann-mardan जारी रखा और थोड़ा सा लुंड बहार करते हुए वापिस अंदर कर दिया. अगले 5-6 मिनट तक वो ऐसे हे धीमी गति से थोड़ा थोड़ा अंदर बहार करते हुए दीदी को अभ्यस्त करने लगा रहा. इस दुआरण हे 8 इंच तक लुंड वो ले चुकी थी. इस से ज्यादा इस अवस्था में जाना मुमकिन भी नहीं था.

"उफ्फ्फ.. अब दर्द नहीं हो रहा भाई.. आठ लेकिन ऐसे हे धीरे धीरे करता रह.. उम्म्म्म..", अब दीदी भी अपनी गांड पूरी तरह से अर्जुन की जांघो पर चिपकाये सिसक रही थी. अर्जुन तोह बस गांड की गर्मी और लचकता से मदहोश हो कर लगभग आधा लुंड निकल कर अंदर पेलने लगा. वो गुलाबी छल्ला हर बार लुंड के साथ खिंचा आता और वैसे हे अंदर. प्रियंका को तोह अर्जुन का मजबूती से चुचो को दबाना भी अब सुकून देने लगा. जल्द हे खामोश कमरे में तेज धक्को से वो मॉटे चुत्तड़ो की thapp-thapp गूंजने लगी. साथ हे अर्जुन का हाथ अब उनकी गुलाबी छूट को मसलता हुआ दीदी को दोहरा मजा देने लगा.

"अह्ह्ह्ह.. मजे से मर्डर हे जाउंगी .. उम्म्म.. और ाचे से सेहला अर्जुनंनं.. उफ्फ्फ..", वो दर्द अब 10 मिनट की चुदाई में हे हवा हो गया था जो पहली बार सूपड़ा अंदर जाने पर हुआ था. अर्जुन ने भी गति ज्यादा तेज न करते हुए गहरे धक्को के साथ दीदी की छूट में 2 उंगलिया धकेल दी थी. ये करवट वाला आसान बेशक उतना मजेदार न था लेकिन अर्जुन दीदी की फ़िक्र करता उन्हें ऐसे हे पीछे लिपट कर पहले गुदामैथुन का अनुभव करवाता रहा.

"उफ़.. तुझे परेशानी हो रही है न...? उम्म्म.. मेरे ऊपर आजा अर्जुन... आह्हः.", लुंड निकलवाए बिना हे दीदी अर्जुन का हाथ जकड़े औंधी हो गयी. सवा 6 फ़ीट का लम्बा चौड़ा अर्जुन उनकी पीठ पर आते हे कुहनियो के भार हो गया. घुटने दोनों जांघो के बिच सही से रख कर अब वो खुल कर उस कैसे हुए छेड़ को ढीला करने लगा.

"उम्... आह्हः.. मर्डर गयी.. आठ.. और तेज अर्जुन.. आठ.. पूरा भर दे अपनी दीदी को.. माहहहहह...", इस तरह 9 इंच की पूरी लम्बाई उस छोटे से छेड़ को फैलाये अंदर होने लगी. अर्जुन के लुंड की नस्से भी फूलने लगी तोह धक्के अपनी चरम पर पहुंच गए. अब तोह बिस्टेर की चर्र चर्र भी इस thapp-thapp की आवाज से ज्यादा तेज गूँज रही थी लेकिन प्रियंका की जोरदार सिसकियाँ सब पर भारी रही.

"हुन्न्न... मैं आया दीदी.. आह्ह्ह्हह.", अर्जुन ने इस बार गांड के दोनों पात फैलते हुए रहा सहा लुंड भी अंदर तेल दिया. गरम वीर्य की फुहारे रह रह कर गांड के अंदर गिरने से प्रियंका भी साखळीत होती कांप गयी. इस आखिरी धक्के में दर्द के साथ हे अर्जुन की ताक़त का भी पूरा एहसास हुआ था उन्हें.

"तुम पूरे घोड़े हो आठ.. अभी हिलना नहीं कुछ देर.. आह्ह्ह्हह.. ", 5-6 मिनट दोनों ऐसे हे अवस्था में रहे लेकिन गांड के कसाव से लुंड ढीला न पड़ा. जैसे हे अर्जुन अलग हुआ प्रियंका की हलकी चीख निकल गयी. सूपड़ा बाकी के हिस्से से कही ज्यादा मोटा था और उसका बहार आना ठीक वैसा था जैसे जिस्म से बाण (एरो) बहार निकलना. गांड का छेड़ एक चुदाई में हे बिगड़ कर खुल चूका था जो कुछ वक़्त बाद दुरुस्त हो हे जाना था.

"हेड ज्यादा मोटा है न दीदी, इसलिए निकलते हुए दर्द हुआ. आपको कैसा लगा ये करके?", अर्जुन बगल में लेता औंधी पड़ी प्रियंका के कूल्हों को थपका रहा था. दर्द के बावजूद दीदी मुस्कुरा उठी उसके सवाल पर.

"तुम न भी कहते तोह मैंने ये एक्सपीरियंस लेना हे था तुम्हारे साथ. शुरू में तोह जान हे निकल गई थी लेकिन तुम बार बार तेल गिरते रहे तोह फिर ाचा लगने लगा. और जब ऊपर आये तोह बस दिल कर रहा था तुम न हे रुको.. मैं पीछे करवाने पर भी आगे से हो गयी.", अब दीदी शर्मा रही थी और गांड से वीर्य बहार निकलने का एहसास होते हे उठने लगी तोह दर्द से तड़प उठी.

"मैं ले चलता हु आपको. आराम करने से पहले एक पेनकिलर खिला दूंगा, नहीं तोह आप दिन में कही बैठ नहीं सकोगी.", अर्जुन नंगा हे खड़ा हो कर उन्हें बाहों में उठाये बाथरूम चल दिया. इन दोनों की रासलीला देखती तारा सावधानी से चादर में जा घुसी. 10 मिनट बाद दोनों वापिस आये तोह प्रियंका दीदी बुरी तरह से शर्मा रही थी जैसे अर्जुन ने कोई अलग हे मस्ती कर दी हो अंदर.

"3 बजने वाले है दीदी."

"बाहों में लिए बातें तोह कर हे सकते हो न थोड़ी देर.?"

"दिन शुरू होने तक करूँगा दीदी.", अर्जुन ने कमरे में रखे तोलिये से उनकी छूट और पिछले हिस्सा साफ़ करने के बाद बाथरूम से लाया गाउन पहनाया और दवा खिलने के बाद बाहों में भर के लेट गया. इन दोनों की जोरदार कामलीला देख कर तारा की छूट ने भी 2-3 बार पानी निकाल दिया था जिसकी खबर इन दोनों को हे नहीं थी.

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ठीक 5 बजे घर का मुख्या दरवाजा कौशल्या जी ने खोला तोह सामने उनके तीनो बेटो के साथ उमेद और विनोद भी खड़े थे. वो सभी उधर पुराने घर से नाहा धो कर आये थे लेकिन विनोद नहाने के बावजूद थोड़ा सुस्त दिखा.

"क्या बात माँ, अभी तक टाला लगा था गेट पर? आपका लाडला आज घूमने नहीं गया क्या?", नरिंदर सवाल कर रहा था और उमेद ने अपनी चची का आशीर्वाद लेते हे आँगन में बैठ पंडित जी की तरफ कदम बढ़ा लिए. मेहमान कमरे से संजीव भी आज इतनी सवेरे तैयार हो कर इधर आ गया.

"रात 12 बजे के आसपास तोह वो हमारे पास से गया था और उसके बाद पढाई करता रहा होगा. सोने भी देना चाहिए कभी कभी. जा विनोद, अनामिका से मिल ले तेरी बात देख रही है.", ताई की बात सुन्न कर विनोद बिना ज्यादा hil-hujjat के गलियारे से अंदर चला गया.

"माँ, मेरा भी नाश्ता लगा दो पापा के साथ.", शंकर को तोह नहाते हे भूख लग जाती थी. रामेश्वर जी उमेद के साथ बैठे अपने बेटे की बात पर हंसने लगे.

"तुम्हारी माँ ने पहले हे तैयारी कर राखी है. वैसे आज राजू भी चमक रहा भगवान, कितने हे सालो बाद देख रहा हु ये चारो एकसाथ. क्यों भाई छोटे रघुबीर, रात कुछ काण्ड तोह नहीं कर दिया?", रामेश्वर जी इतना तोह समझते थे की ये सभी है तोह मनमौजी अगर सही टाइम मिल जाये तोह.

"न पापा ऐसी तोह कोई बात नहीं. बस कल रात पुराणी बातें कर रहे थे और धर्मपाल भी साथ था. समय से सो गए थे तोह समय पर नाहा धो कर वापिस आ गए.", राजकुमार जी भी अपने पिता के पास जा बैठे संजीव का सहारा लेते हुए. संजीव के शांत चेहरे पर हलकी सी मुस्कान आ गयी थी. इधर रुपाली सबके लिए चाय लिए आयी और उसके पीछे हे ऋतू नाश्ता.

"वाह मेरी बेटी, ये काम बढ़िया किया तुमने. भूख भी लगी थी और चाय की तालाब भी. उन्ह्ह.. रेखा भाभी ने बनाये है ये aalu-pyaaj के paronthe.",Umed ने महक लेते हे होतससे से 4 पराठे एक साथ अपनी थाली में रख लिए जो शंकर, नरिंदर, राजकुमार और रामेश्वर जी ने ऐसे हे एक एक उठा लिए. ऋतू ने भी हँसत हुए चटाई पर 6 प्लेट लगा दी और रुपाली ने सबके लिए चाय मक्खन रख दिया.

"सचमुच लाजवाब पराठे है गज्जू.", इन्दर ने ढेर सारा मक्खन एक निवाले में लगते हुए प्रशंशा की तोह कौशल्या जी ने घूर कर देखा.

"जो लोग घर पे बिस्टेर तोड़ने वाले है अब वो भी इतनी जल्दी खाने लगे?"

"सभी बहार जा रहे है भगवान. इन्दर और राजू अभी निकलेंगे मंदिर के लिए जिस से कल का काम बिना परेशानी हो सके. भोजन बनाने के लिए वही कसबे के हलवाई लगवा देना तुम दोनों और पूजा की सामग्री ले कर पुजारी जी को सौंप देना. 12-1 बजे तक वापिस आ हे जाओगे. मैं जरा संजीव के साथ जरुरी काम से जा रहा हु लेकिन 10 बजे तक हम लौट आएंगे. उमेद, भाभी और बचो को ले आना जिस से वो रात यही आराम करके कल सवेरे साथ चल सके.", पंडित जी के लिए पूरे परिवार का यही मतलब था. वो और रघुबीर सिंह कभी भी अलग नहीं थे.

"नाश्ता करना हे भरी पड़ गया आज तोह. और ये गज्जू वाला काम आप मुझे क्यों नहीं दे देते? चची को मैं ले आता हु और ये चला जायेगा उधर रेगिस्तान में.", नरिंदर मजाक कर रहा था लेकिन कौशल्या जी ने कान खींच दिया.

"बड़ा आया चची को लाने वाला. तू और शंकर गए तोह न वो यहाँ आएगी और न तू. यहाँ आ जाने दे फिर चिपक जाइयो अपनी चची के पल्लू से. आराम से खाना ख़तम कर और कपडे बदल कर निकल. राजू, इसका ध्यान रखियो कही उधर कोई मजाक न करने लगे. मैं पैसे ला कर देती हु.", यहाँ ऋतू बार बार गरम पराठे ला कर रखती जा रही थी और वो हवा होते रहे. अब 6 में से 3 लोग तोह थे भी पेटू जिसमे शंकर सबसे ऊपर.

"ओह मेरे खाचरर, दिमाग में आता भर जायेगा इतना खायेगा तोह. आराम से खा ले बीटा.", अपनी पिता की बात सुन्न कर शंकर ने एक बार उन्हें देखा लेकिन बिना जवाब दिए वापिस जुट गया खाना ठूसने. चाय वैसे हे राखी थी उसकी लेकिन एक किलो लस्सी का लौटा जरूर निबटा दिया था. अभी पौने 6 होने वाले थे और अर्जुन बिना किसी की तरफ देखे हलकी दौड़ लगता सीधा बहार निकल गया.

"लेट सही लेकिन जाता जरूर है लड़का.", नरिंदर ने अपने भतीजे को घर से हे पसीने में निकलते देख कहा.

"वो तोह मेरे नहाने के वक़्त से हे कसरत कर रहा था चाचा जी. पिछली मंजिल वाले बड़े कमरे को गयम बना रखा है इसने और 200 कग के आसपास वजन रखे है. आपको लगा के ये लेट बहार जा रहा है? आचार्य जी के घर जा रहा है वह.", संजीव के इस खुलासे पर बाकी सबके साथ रामेश्वर जी भी हैरान थे. उन्हें तोह लगा था के आज उनका लाडला आराम करने के मूड में है.

"हम्म्म. इसका शरीर हे इसको रुकने नहीं देता इन्दर. तुम्हारी माँ से मैंने पुछा भी था की ये आराम कब करता है."

"ारु कल शाम को 3 घंटे सोया था दादा जी और फिर रात भी 12 से 5 घंटे सोया है तोह वो रिलैक्स हे है. वैसे तोह कई बार वो एक घंटे में भी नींद पूरी कर लेता है.", ऋतू ने सभी के मैं को शांत कर दिया था सिवाए अपने पिता के. इधर विनोद भी बहार आ गया था और अपने ताऊजी का आशीर्वाद लेने के बाद बाकी सबसे हाथ मिला कर निकल चला अपने रस्ते.

"आप माँ को मेरे लिए कहते रहते हो, चची ने जो ये अथवा अजूबा पैदा किया है उस पर तोह नहीं बोलते.", शंकर ने इतनी देर बाद अपने पिता के तंज का जवाब दिया तोह नोटों की गद्दी राजकुमार को पकड़ती कौशल्या जी ने शंकर के पीठ पर चमाट लगा दी.

"उसका सबको पता है और तू खुद की तुलना उसके साथ कर रहा है? आइंदा ऐसी बात नहीं करना कभी."

"सुन्न लिया भाई? माँ भी बिनोदिये के खिलाफ नहीं सुन्न सकती.", नरिंदर ने इतना कह कर अपनी शामत जरूर बुलवा ली थी.

"तू ृक्क, बड़े पर निकल आये तेरे जो तिल्ली लगता फिर रहा है इतनी देर से."

"आह्हः.. पापा देख लो माँ को.. बिलकुल नहीं सुन्न सकती अपनी लाडले भतीजे के खिलाफ.", नरिंदर अभी भी फिरकी ले रहा था और रामेश्वर जी हंस रहे थे इनकी नौटंकी देख कर.

"तेरी माँ ने तोह मेरा gaanv-nikala करवा दिया था अपने भतीजे के चक्कर में.", अब कही कौशल्या जी थोड़ा नाराज हुई लेकिन उमेद ने उनका हाथ पकड़ कर पास राखी कुर्सी पर बैठा लिया.

"चची, आपको सबसे ज्यादा दुःख है इस बात का और ये मुझे पापा ने भी बताया था. लेकिन इतना बड़ा जिगर सिर्फ आपमें हे हो सकता है जो घर की मुखिया हो कर एक पल में सब छोड़ कर नए सिरे से नयी जगह अपनी ये प्यार भरी दुनिया आबाद करि. किसी भी रजवाड़े में इतनी सुख समृधि नहीं होगी जो इस घर की देहलीज से ले कर एक एक ईंट में है. पापा इसलिए आपको सरस्वती और माँ को लक्ष्मी की उपाधि देते थे. शिक्षा सर्वोपरि है.", उमेद की ये बात सुन्न कर दोनों हे बुजुर्गो की आँखें ख़ुशी से नम्म हो गयी थी. कौशल्या जी ने बड़े स्नेह से उमेद का चेहरा थामते हुए माथे को चूम लिया.

"ये राम है न तोह वनवास भी इनके साथ मेरे लिए मेरी गृहस्थी हे है बीटा. रघुबीर जी भी इनके समकक्ष थे, लेकिन पूर्णिमा ने भी वही किया जो मैंने. परिवार 2 लोगो से शुरू होता है फिर इतिहास में पीछे 100 परछाई भी रहे तोह हम उनका लालच छोड़ अपने बचो का भविष्य बनाये. तू हमेशा से मेरा दूसरे नंबर का बीटा रहा है, राजू के बाद.", उमेद तोह जैसे निहाल हे हो गया था अपनी चाची के प्यार से.

"आप मेरी माँ हो न जैसे मेरी माँ इन्दर की है?", उमेद के ऐसा कहने पर बाकी सब भी हंसने लगे थे और कौशल्या जी थोड़ा शरमाते हुए बोली.

"माँ हे हु जो तूने और इस शंकर ने मेरा दूध पीया है. इस बात के बदले पूर्णिमा ने मुझसे इन्दर ले लिया था 6 महीने. तभी तोह तू इस शंकर का सागा है और इन्दर..", इतना कहते कहते फिर से कौशल्या जी की आँखें नम्म हो गयी लेकिन अब वो रो हे पड़ी थी क्योंकि इन्दर और अज्जू एक साथ थे. वो उठ कर भीतर चली गयी तोह उमेद भी उठने लगे.

"बैठा रह और उसको हल्का होने दे. कुछ दिन से उसको बहोत याद आ रही थी लेकिन आज हल्का होने दे तेरी चची को. चलो भाई सब अपने अपने काम सम्भालो.", रामेश्वर जी ने सबको उठाते हुए कहा तोह इन्दर शंकर राजकुमार तोह अंदर चले गए, उमेद के साथ संजीव बहार लेकिन खुद वो अपनी अर्धांगिनी की तरफ.

"कौशल्या.", रामेश्वर जी ने अपनी बीवी को एक तरफ खड़े रट देख बस इतना हे कहा था और वो अपने पति के सीने से जा लगी.

"मैं हर वचन से मुक्त करती हु जी आपको. आज आप किसी बंधन में नहीं बंधे.", रोटी हुई कौशल्या जी के इन शब्दों ने जाने क्या प्रहार किया था रामेश्वर जी के मैं मस्तिष्क पर लेकिन फिर भी वो उनकी पीठ सहलाते रहे.

"बहोत देर हो चुकी है औरआज ऐसा करने की वजह? सब ठीक हैं न कौशल्या तोह हमको भी समय के साथ हे चलना चाहिए."

"रघुबीर और रामेश्वर अलग तोह नहीं थे जी. आज मेरे बेटे के सामने मैं बेबस थी. मुझे फरक नहीं पड़ता की देर हुई है या परिणाम क्या होगा. मरने से पहले आप और मैं दिल पर कोई बोझ के साथ नहीं जाएंगे. आप मेरे लिए न सही लेकिन राजमाता और अपने भाई की आत्मा की शांति के लिए तोह ये कर हे सकते है. मेरी अब कोई चाहत नहीं और न इत्छा है किसी सुख की. मेरे रामेश्वर मुझे वैसे हे चाहिए जैसे मिले थे.", आज कितने बरसो बाद कौशल्या जी ने अपने पति के सीने से लगते हुए ऐसी प्यार भरी गुजारिश की थी.

"वचनमुक्त करने के बदले मैं वचन देता हु तुम्हे कौशल्या, रघुबीर और राजमाता प्रभा की आत्मा को शांति जरूर मिलेगी. आज तुमने सिर्फ वचन मुक्त हे नहीं किया है, बरसो के दर्द से आजाद कर दिया है. विवाह के बाद मैं तुम्हरी चाहत को हर हाल में पूरा करूँगा फिर चाहे पूरा राजपाट हे खिलाफ क्यों न खड़ा हो जाये. अब तुम्हारी आँखों में दर्द के आंसू नहीं आने चाहिए. रघुबीर का अक्स है रामेश्वर.", आज जैसे पंडित रामेश्वर शर्मा 20 बरस पीछे आ गए थे जीवन चक्र में और उनकी अर्धांग्नी के दिल को सुकून था.

"अज्जू के मामले को भी खोल हे दीजिये, मुझे नहीं परवाह की वो कौनसी ऐसी जेड है जिस से सर्वनाश हो सकता है लेकिन मेरा बीटा था वो."

"बस अब वही से तोह अतीत में जाना है कौशल्या. हम संजीव के साथ बहार जा रहे है काम से.", रामेश्वर जी के ऐसा कहने पर वो अलग होती हुई स्टोर में राखी अलमारी की तरफ चल दी. आज उनके पति की रिवॉल्वर, तुलसी की माला और रघुबीर सिंह के साथ खिंचवाया चित्र बटुए में रखती वो अपने उस अंदाज में थी जैसा विवाह के समय था.

"ध्यान रखियेगा."

"तुम्हारे जीवन भर के व्रत बहोत है हमारी सुरक्षा के लिए.", रामेश्वर जी जिस तरह से बहार निकले थे उनकी पोलिसिअ चाल देख कौशल्या जी के चेहरे पर भी ख़ुशी छ गयी थी. यही तोह वो इंसान था जिसके साथ विवाह होते हे प्यार हो गया था, बहादुरी और ईमान देख कर.
 
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