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संगीत
"नवीन का मतलब होता है नया यानी की मॉडर्न. जानती हो कौशल्या जो भी नवीन हो उसके लिए R&D होती है जिसको रिसर्च एंड डेवलपमेंट कहा जाता है आम भाषा में लेकिन अगर तुम कहो तोह मैं इसका हिंदी अनुवाद भी कर सकता हु.", रामेश्वर जी ने आज गहरी नीली पतलून और धारीदार सफ़ेद नीली कमीज पहनी हुई थी. एकदम ठीक किसी अफसर की तरह और उनके साथ गाडी में कौशल्या जी बगल में और पीछे छोल साहब, कृष्णेश्वर, हंसमुख और देवकी थे. जाने कहा से उन्होंने ये बात शुरू की थी लेकिन उनकी अर्धांगिनी समझ रही थी.
"मुझे न बताओ आपका रिसर्च और जो भी हो जी. मालूम है ये सब मुझे और वो आदमी अपने गाँव का तोह नहीं है चाहे परमिंदर का बीटा कह कर मिलवाया हो विनोद ने. परमिंदर के बीटा होता तोह जरूर वैसे हे मिलता जैसे अमूमन सभी आपसे मिलते है. आप खुल कर कहो और ये देवर जी खुद हे बता देंगे बाकी तोह. क्यों कृष्ण, जानता है तू उस नवीन को?", अब कृष्णेश्वर की क्या मजाल जो वो अपनी बड़ी भाभी के सामने झूठ बोल दे. रामेश्वर जी बस मुस्कुरा रहे थे और आज उनके हाथ में वो गाडी थी जो खुद शंकर ने अपने पिता को वापिस लौटाई थी ख़ास तैयार करके, जिसको चला कर उनकी उम्र बीती थी, महिंद्रा 4क्ष4.
"भाभी जी ये नवीन कोई व्यापारी दोस्त होगा विनोद का लेकिन अपने गाँव वाले परमिंदर के बेटे का नाम तोह गुरजीत है. दिखाई तोह दिया था मुझे एक बार लेकिन फिर वो लोग जाने कहा चले गए."
"जहाँ गए है घर से हे गए है नन्हे. और अब जहा जायेंगे मेरी नज़र में हे रहेंगे. बूढा होने का सबसे बड़ा फायदा यही तोह है भाई की सब लोग आपको वो समझ लेते है जिसका अभिप्राय एक गाली से दिया जाए तोह सार्थक लगेगा. लेकिन मैं उतना भी बेसहारा नहीं. बिनोदिये को अपने पास हे रखना देवकी नहीं तोह फिर तुम मुझे तना डौगी.", रामेश्वर जी इस जीप को लिए कम्युनिटी सेण्टर के बहार आ पहुंचे थे जहा के हाल मल्होत्रा जी वाली शादी से प्रतिकूल थे. हर तरफ सुरक्षा का ऐसा इंतजाम था जिस से परिंदा भी पर न मार पाए. उमेद सिंह ने हे ये सब इंतजाम किया था और उसके अलावा यहाँ भजन मां ने भी अपने अंगरक्षकों के साथ साथ सरकारी कर्मचारी लगा रखे थे. कपूर साहब को हिदायत थी की पुलिस न लगाईं जाए जिस से उन पर कोई बात आये. मुख्या प्रवेशद्वार पर स्वयं शंकर जी के साथ साथ हुसैन साहब, वालिए जी और दलीप सिंह मौजूद थे. और भी कई थे लेकिन परिवार से वही थे जो देख रहे थे की हर व्यक्ति उनसे मिलने के बाद हे भीतर जाए.
"यही उम्मीद थी मुझे मेरे बेटे से. शंकर, तू आजा इन्हे साथ लेके. ये बाकी लोग काम देख लेंगे.", कौशल्या जी ने जीप से उतारते हे शंकर को अपने साथ ले लिया. उनकी जीप एक सुरक्षाकर्मी खुद हे अंदर ले चला क्योंकि वो रामेश्वर जी की जीप जो थी.
"हाँ तेरी माँ का दूध आधे घंटे में हे सूख गया जो तू नजर नहीं आया. मल्होत्रा जी, सुना है यहाँ गाने बजेंगे? हमको तोह थोड़ी शान्ति हे दिलवा दो भाई.", रामेश्वर जी अपने साथ भाई और साले को लिए मल्होत्रा जी से मिलते हुए इस स्थान की दूसरी मंज़िल की तरफ हे बढ़ चले. वो चाहते थे की बचे आज अपनी मर्जी से दिलचाहे शौक पूरे करे.
"ऊपर तोह महफ़िल रंग वाली होगी भाई साहब. वैसे ये अपने सांगवान जी और शास्त्री जी भी आ गए. चलिए फिर तोह महफ़िल में रंग हो या न हो, अब तोह रंगीन हे होगी.", मल्होत्रा जी ने जैसे हे इनका ध्यान इस तरफ करवाया रामेश्वर जी हैरान हे रह गए सांगवान परिवार के साथ साथ शास्त्री जी के भी पूरे परिवार को देख कर. विशेष अपनी बीवी के साथ आया था उस पुराणी मेरसेदेज़ में जिसको खुद शास्त्री जी चला के लाये थे और हिमानी उस सुपारी रंग के गाउन में सचमुच divya-aabha सी लग रही थी. विशेष ने आते हे अपने पिता के कहे अनुसार पंडित जी के चरण स्पर्श किये.
"तोह हमारे भाई के सुपुत्र श्रीमान विशेष जी भी पधार गए आखिर. बीटा डॉलर कमाने से फुर्सत मिल हे गयी तुम्हे?", रामेश्वर जी के साथ साथ आगे जाते हुए कौशल्या जी और शंकर भी लौट आये. धर्मवीर जी से मिलने के बाद बाकी लोग अंदर चले गए लेकिन शंकर बड़े गौर से विशेष को देख रहा था.
"अंकल जी पहले पता होता तोह इतना लेट नहीं होता. ये अपने समो शंकर शर्मा जी तोह हमारे शुभचिंतक हे है. U.S. वाला काम मेरे पास हे था लेकिन तब भी पता नहीं चला के आप और ये एक हे परिवार है. कैसे हो डॉक्टर साहब?", शंकर खुद भी विशेष से गले लग कर मिला था और यहाँ बाकी सभी थोड़ा ताज्जुब में थे.
"विशेष ने हे वह का सारा काम करवाया था और ये अपने नाम के साथ शास्त्री नहीं लगता तोह मुझे क्या पता था के ये गुरूजी का बीटा है. वैसे भी दोनों एकसाथ कभी दिखे हे नहीं आज से पहले और हमारी तोह मुलाकात भी अबतक काम की जगह पर हुई है. पापा मीट विशेष थे हिडन दूर, और भाई ये मेरे पापा.", अब परिचय शंकर ने करवाया था और रामेश्वर जी के बाद खुद उमेद, छोल साहब और उमेद भी विशेष से गले लग कर मिले.
"ऐसी कोई बात नहीं है ताऊ जी. ताऊ जी बोल सकता हु न?"
"अब तोह तुम मुझे कुछ भी बोल लो बीटा. पता नहीं था अपने शास्त्री जी की औलाद डॉलर के साथ साथ नाम भी िज्जात्त स्वरुप बड़ा कर रही है. ख़ुशी हुई तुमसे मिल कर विशेष और तुम हो भी ख़ास क्योंकि शंकर बहोत काम हे तारीफ करता है और शास्त्री जी नजरअंदाज उसको हे करते है जो ख़ास हो. ताकि वो बेहतर हो सके. मिलते है, चलो भाई शास्त्री जी बाकी सभी प्रतीक्षा देख रहे है.", रामेश्वर जी ने अब अपनी पल्टन के साथ ऊपर का रुख किया तोह उनके बचो के बीच अभी भी अस्वमानिया स्थिति थी.
"अबे ये गुरु जी का लोंदा निकला? यार तुमने तोह एक भी दिक्कत न आने दी वह मेरी बीवी के समय.", नरिंदर ने तोह विशेष की गर्दन को हे बाहों में ले लिया था.
"आह.. भाई थोड़ा आराम से मैं नाजुक हु. ये डॉक्टर का डर हे इतना है की क्या कहूं. वैसे ये सब काम हे तोह मेरे जिम्मे है और मुझे ऑर्डर्स भी थे की सब अर्रंगे करके दू डॉ शंकर के केस में, डायरेक्ट कम ऑफिस से. और वो भी आये है इधर मैंने सुना है.", नरिंदर के साथ चलते हुए विशेष ने जैसे हे ये कहा उमेद उसको साथ लिए अपनी चची कौशल्या जी की तरफ आ गया.
"ये मेरी माँ है और ये चची जी, शंकर की माँ जी. और maa-chachi जी ये शास्त्री जी के सुपुत्र है विशेष. हाँ भाई विशेष ये भजन मां भी तोह बैठे है इधर.", कौशल्या जी ने बड़े स्नेह से विशेष के सर पे हाथ फिराया था जो थोड़ा असहज सा दिखा कम को वह बैठे देख.
"बचो की ram-ram का तोह जवाब दे दिया कर भजन. बीटा अभी अभी तुम्हारी बीवी से मिली हु और मेरी बच्चियां उन्हें लेके जाने कहा निकल गयी. तुम लोग अपना समय जैसे चाहो वैसे बिताओ. भगवन तुम्हे तरक्की और खुशिया दे.", कौशल्या जी की नजरे अपनी बहुओं को ढून्ढ रही थी जो शायद अभी तक पहुंची न थी. विशेष भी यहाँ से विदा ले कर ऊपर की और चल दिया था जहा उसको एक हलकी फुलकी महफ़िल मिलने वाली थी, सुकून पहुंचने वाली.
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धीरे धीरे पंडित जी के यहाँ से सभी सदस्य संगीत कार्यक्रम के लिए निकल चुके थे. उमेद ने कुछ ड्राइवर ख़ास तौर से इस कार्य पर हे लगाए थे और ऐसा करना ठीक भी था जब घर के सभी पुरुषो का वह पहले हे रहना जरुरी हो. राजकुमार जी स्वयं अभी घर आये थे अपनी धर्मपत्नी और जो रह गया हो उनको लेने. घर की सुरक्षा के लिए बहार हे मुनीर को तैनात किया गया था और वैसे तोह असगर को भी हिदायत थी की वो जितनी देर हो सके प्लाट में हे रहे.
"ललिता, देखो तुम्हारे beta-beti के विवाह सम्बन्धी प्रोग्राम है और सबसे आखिर में पहुंचने वाले भी हम लोग होंगे. भाई थोड़ा तोह ध्यान रखा करो इन छोटी छोटी चीजों का. वह सभी राह देख रहे होंगे.", राजकुमार जी आज चेहरा सफाचट करने के साथ हे बाल भी करीने से कटवा रखे थे. चमकदार चमड़े के जूते, कड़ी िस्ती की हुई हलकी नीली कमीज और भूरी पतलून में उनका वैसा हे व्यक्तित्व झलक रहा था जैसा अक्सर उनके पिता का रहता था. अपनी बीवी को अलमारी से पैसे निकलते देख उनका सबसे पहले जहा ध्यान गया वो बहार को उभरा हुआ मटके सा पिछवाड़ा था. उजले पीले रंग की कसीदाकारी वाली साड़ी में ललिता जी का पृष्टभाग इतना कैसा हुआ था की उठान देखने मात्रा से साधारण व्यक्ति का दिल बैठ जाए. ललिता जी भी अपने पति की निगाहें वह महसूस करती हुई सीढ़ी कड़ी हुई.
"अभी वह सिर्फ मेहमान और घर के मर्द हे पहुंचे है जी. ड्राइवर आपके सामने हे तोह ले कर निकला है शालिनी और बाकी लोगो को. Tara-Alka भी अभी अभी अपने बहनो को लेके गयी है और 4 लोग बाकी है.", होंठो की लाली ठीक करने के बाद ललिता जी ने वो सुनहरी हैंडबैग अपने कंधे पर लटकाया और अपने पति के साथ कमरे से बहार आ गयी.
"कृष्णा, चल जल्दी कर और रेखा को भी बुला ले. तेरे जेठ जी हे लेके चल रहे है हमे.", उनके कहने के साथ हे कृष्णा जी भी अपने कमरे से बहार चली आयी. गहरी हरी साड़ी में खुले बाल और बिना किसी अतिरिक्त saaj-sajja के वो उतनी हे हसीं थी जितनी नरिंदर जी से ब्याह होने के समय. बगल वाले कमरे से माधुरी को साथ लिए रेखा जी और रेणुका आयी तोह राजकुमार जी दुविधा में पड़ गए.
"कार में तोह ज्यादा से ज्यादा 4 लोग हे आ पाएंगे ललिता."
"हाँ तोह आपसे किसने कहा के हजार लेके जाने है. अर्जुन रोमिला और विवान को छोड़ कर वापिस आ रहा है अभी तोह वही माधुरी को लेके आएगा उधर. पिछली सीट पर ये अकेली जो बैठ के आएगी जैसा माँ जी ने कहा है. वो लड़का भी नीरा बैल है जो सुबह से बिना कपडे बदले हे लोगो को धोये जा रहा है. चलो भी अब यहाँ से, फिर कहोगे देर हो रही है. और माधुरी बीटा, अपना पर्स साथ ले लियो. तुझे नचाये बिना तोह तेरी सहेलियां मानेंगी नहीं लेकिन ये कंगन, हार और चूड़ियां थोड़ा ध्यान से रखने है. अर्जुन को बोल दियो के उसके कपडे ऋतू ने कोमल के कमरे में हे रख दिए थे. बदल कर जल्दी आने की कोशिश करना.", ललिता जी ने अपने साथ कृष्णा, रेखा और रेणुका को लिया तोह राजकुमार जी खिसियाते से आगे आगे चल दिए. अपनी माँ की हिदायत सुन्न कर माधुरी भी तुरंत कमरे में चली गयी, आभूषण पहन ने और बैग ढूंढ़ने.
"वैसे कोई एक रुक जाता तोह ठीक होता दीदी. माधुरी तैयार तोह हो गयी है लेकिन kade-choodiyan पहन ने में कही दिक्कत न आये.", रेखा ने अपनी जेठानी से धीमी आवाज में विचार जताये जिस पर वो परिचित अदा से मुस्कुरा दी.
"ब्याह होने वाला है कल उसका रेखा. जो अभी तक वो ये सब न सीखी तोह कल रात अपने आप उसका घरवाले सीखा देगा. वैसे भी माँ जी ने कहा था के माधुरी को तभी वह लेके आना है जब सब मेहमान और रिश्तेदार लोग उधर पहुंच जाए. पता तोह लगे की उनकी पौती ऐसी वैसी नहीं है. हाहाहा..", उनके इस मजेदार अंदाज और कहने के ढंग से खुद राजकुमार जी भी हंस दिए थे बाकी सभी के साथ.
"रेणुका तू आगे तेरे भैया के पास बैठ. मेरे से न साड़ी पहन के आगे बैठा जाता.", ललिता जी ने पिछली सीट पर कृष्णा और रेखा को अंदर करने के बाद रेणुका से कहा. वो खुद पिछली सीट पर खिड़की किनारे हे बैठ गयी. ये वाली गाडी कही ज्यादा हे खुली थी सीट के हिसाब से. राजकुमार जी ने एक बार सरसरी नजर घर के दरवाजे पद डाली जहा कुर्सी लगाए मुनीर मुस्तैदी से बैठा था और दरवाजा बंद. घर पूरी तरह लम्बी लटकन रोशनियों से नहाया हुआ साफ़ बता रहा था के यहाँ विवाह उत्सव जारी है. कार बेआवाज आगे बढ़ चली अपने गंतव्य की तरफ.
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माधुरी उस आदमकद आईने के सामने बैठी हुई अपने रूप लावण्या को देखती हुई मंद मंद मुस्कुराये जा रही थी. ब्यूटी पार्लर वाली लड़कियों ने उसके जिस्म को कही ज्यादा हे निखार दिया था. पूरे जिस्म पे कही किसी बाल का रोया तक न था और कोहनी तक रची गहरी मेहंदी इस आभा को बढ़ा हे रही थी. कंधे से कोहनी तक जालीदार हरा कपडा, सीने की बड़े बड़े उठान को समेटने की कोशिश करता वो सब्ज रंग का कमीज जिस पर चांदी की कारीगरी थी और कमर से तखने तक का वैसा हे लेहंगा पहने माधुरी पलभर में हे हर नजर को गुलाम बना सकती थी. आईने में देखते हुए अभी वो अपनी नाक के छिद्र में बारीक बाली पहन हे रही थी की कमर पे बाहों का घेरा महसूस होते हे चेहरे की चमक सो गुना हो गयी. माधुरी के कंधे पर ठुड्डी टिकाये अर्जुन भी दोनों के अक्स आईने में देख रहा था.
"बहोत हे ज्यादा खूबसूरत लग रही हो दीदी आप. सचमुच अब लग रहा है की आपके जाने के बाद दिल को समझाना बहोत मुश्किल होने वाल है. लाओ ये मैं अपने हाथो से आपको पहना दू.", अर्जुन ने बीएड के किनारे बैठे हुए हे अपने आगे बैठी माधुरी दीदी के गाल को चूम कर वो बाली उनके हाथ से ले ली. माधुरी ने भी चेहरा घुमा कर खुद को अर्जुन के सामने हे कर लिया. जाने ये कैसे वक़्त था या अलग हे असर की माधुरी के चेहरे पर ऊर्जा का अलग हे प्रभाव नजर आने लगा था अर्जुन के सम्मुख खुद को करते हुए. लरजते हाथो से अर्जुन ने बाली का वो बारीक सा कुण्डल जैसे हे दीदी के nakh-chhidra से छुहाया वैसे हे एक हलकी सी सिसकारी माधुरी के होंठो से निकलती हुई अर्जुन के दिल में उतर गयी. ये वो अनंत प्रेम था जिसको चाह कर भी मंज़िल नसीब न थी.
माधुरी के जीवन में आने वाला वो पहला मर्द जिसने उसको stree-sukh का संज्ञान करवाने के साथ साथ ऐसे प्यार से अभिभूत किया था जो माधुरी अर्जुन के आने से पहले तक बस कल्पना हे कर सकती थी. एकांत पालो में ये एक विलक्षण जोड़ी थी जो भरपूर संवाद के kaam-krida से आगे उस pur-sukoon तक बहते चले जाते थे जिसके आगे कोई और दुनिया हे न थी.
अर्जुन के लिए भी उसके prem-jiwan की नीव रखने वाली माधुरी पहली युवती थी. बेशक संदीप की बहिन ज्योति ने अर्जुन को kaam-krida से अवगत करवाया था लेकिन वह सिर्फ kaam-vaasna हे उस रिश्ते की मध्यस्थ थी, वो भी ज्योति की एकतरफा वासना. अर्जुन को हृदय से लगा कर अंतरंग पालो का सुख, prem-milan में दोनों हे दिलो का महत्व और पूर्ण समर्पण सीखने वाली माधुरी हे थी. और आज शायद इस घर में ये इन दोनों की आखिरी अंतरंग मुलाकात थी. अर्जुन पूरी एकाग्रता से वो दमकते नाग वाली छोटी सी बलि माधुरी को पहना रहा था. काम पूरा होते हे माधुरी का मुलायम चेहरा अपने दोनों हाथो में लिए अर्जुन बस ek-tak ऐसे देख रहा था जैसे वो इस मंजर को दिल में क़ैद रखना चाहता हो.
"शहहह.. ज्यादा टाइम नहीं है अर्जुन और फिर इसके बाद शायद हे ऐसा टाइम मिले.", माधुरी ने अभी अभी लगाईं लाली से सजे अपने उभरे हुए आधार अर्जुन के होंठो से जोड़ दिए. खुमार इतना हावी था माधुरी पर की इस चुम्बन को पल भर न लगा उतेजना के चरम पे जाने में. दोनों की जिव्हा अठखेलिया करती रही और बड़े ध्यान से अर्जुन ने माधुरी की पीठ पर बंधे धागे खोल कर वो कमीज ढीली कर दी. बैठी अवस्था में हे इस गहरे चुम्बन के साथ अब अर्जुन के दोनों हाथ कमीज के अंदर रेंगते हुए माधुरी के समतल निर्वस्त्र पेट और फिर उसके आगे उन मुलायम बड़े बड़े कसावयुक्त वक्षो पर आ रुके. कुछ पल उनकी गर्मी और चिकनाई को महसूस करता अर्जुन थोड़ा आवेग से माधुरी के होंठो को लगभग खाने हे लगा था. मॉटे उभारो पर अर्जुन के सख्त हाथो का स्पर्श माधुरी को भी जोश दिलाने लगा.
"उठ.. रुक भाई. कपडे खराब नहीं करने और इस सबके लिए जायदा टाइम नहीं है."
"आज उतनी जल्दी भी नहीं करने वाला दीदी. पहले आप ये अपना कमीज निकालो."
"नहीं बाबू. देख इसको निकलने के बाद मेरे बाल फिर से बनाने पड़ेंगे और सिलवट पड़ी तोह जवाब देते नहीं बनेगा. हाँ ये लेहंगा मैं हटा देती हु.", इतने में हे माधुरी ने अपने लहंगे की डोर खोल कर जिस्म का निचला भाग निर्वस्त्र कर दिया. दमकती लाजवाब जाँघे और उनसे ऊपर वो उभरा हुआ योनिप्रदेश देख अर्जुन ने फर्श पर घुटने टिका कर वो महकता कटाव अपने होंठो से छो लिया. माधुरी के गद्देदार कूल्हों को दोनों हाथ से दबोचे वो इस उभरी हुई योनि की मोटी फांको में तब तक मुँह धंसाए भोग करता रहा जबतक माधुरी की टाँगे जवाब न दे गयी.
"िष्ठ.. बस कर भाई.. आह्ह्ह्ह.. अब जल्दी कर.. उम्म्म..", अर्जुन भी जान चूका था की यहाँ उसकी दौड़ समय के साथ है जो हर गुजरते पल के साथ काम होता जायेगा. जमीन से उठ कर उसने एक और बार माधुरी दीदी के होंठो को अपने मुँह में भरा और अपनी जीन्स घुटनो से निचे सरकने के साथ हे वो बुरी तरह अकड़ा हुआ लिंग माधुरी दीदी के yoni-dwar पर टिका दिया. स्वतः हे माधुरी ने एक पाँव बिस्टेर पर टिका कर अपनी योनि का मुख उस दहकते लिंगमुण्ड के लिए उजागर कर दिया जिसको अपने अंदर महसूस करने की चाहत उस से अधिक शायद हे किसी को हो. इतने दिनों से prem-krida से दूर रहा अर्जुन इस मूक इशारे के साथ हे कमर धकेलता हुआ बिना रुके 3 ढको में हे माधुरी की कॉमर्स से महकती हुई योनि के अत्यधिक कसाव को दरकिनार करता हुआ गर्भ तक की दुरी लांग गया. माधुरी का जिस्म पहले वार पर तड़पा, दूसरे से जैसे वो दर्द में डूबी लेकिन अंतिम आघात से वो बस अर्जुन के जिस्म से जा लिपटी. आँखों में पानी की छोटी छोटी बूंदे निकल चुकी थी और अर्जुन भी जानता था की ऐसा होगा.
"आप वही महसूस करना चाहती थी न दीदी जो पहली बार हम दोनों ने एकसाथ किया था? देखो मुझे भी बिलकुल वैसा हे लग रहा है.. आह्हः", अर्जुन ने पुरकशिश से एक और गहरा चुम्बन जड़ने के बाद कमर को हरकत दी तोह माधुरी भी सिसकते हुए वो गहरे लेकिन धीमे धक्के बराबर झेलने लगी.
"आह्ह्ह्ह.. भाई.. उफ़.. सचमुच ऐसा हे लग रहा है जैसे पहली बार तेरा ये ले रही हु.. उम्म्म मा.. ऐसे ये कमीज ख़राब हो जायेगा..", माधुरी तुरंत अलग होती हुई दिवार का सहारा ले कर ठीक उस मुद्रा में हो गयी जिसको देख कर अर्जुन खुद को रोक न पता था. वही जुनूनी जानवर सा मिलान और अपनी संगिनी की लगाम हाथो में लेने वाली मुद्रा. इस अवस्था में माधुरी इसलिए भी आयी थी की वो अर्जुन को वो चीज थमा सकती थी जो वो सबसे अधिक चाहता था, उसके बड़े सुडोल और उन्नत वक्ष.
"आराम से डालना भाई, मैं इस मिलान का हर पल महसूस करना चाहती हु... आठ.", अर्जुन उन विशाल नितम्बो के बीच अपने मूसल अंग को सही दिशा दिखने के साथ हे इस बार बड़े प्यार से उस पनियाई गली को फैलता हुआ माधुरी दीदी को उस सुख का अनुभव करवाने लगा था जिसकी चाह ने इस ख़ास पल को सार्थक करने को उन्हें मजबूर किया था. जड़ तक उस गहराई को माप कर अर्जुन ने अपने दोनों हाथो आगे बढ़ा कर अकड़े हुए निप्पल के साथ भरे भरे मांस के गोले से वक्ष थाम लिए.
"उम्म्म.. आह्हः.. दीदी.. आपका सचमुच जवाब नहीं.", पीछे से जुड़ कर माधुरी की योनि में गहरे प्रहार करता हुआ अर्जुन ढीली कमीज के भीतर दोनों खरबूजों को दबाता हुआ हर बार अपने वृषण (अंडकोष) उन भारी कूल्हों की जड़ में टकराता. ताबड़तोड़ लेकिन साढ़े हुए धक्को ने जल्द हे माधुरी को दूसरे सखलन का एहसास करवा दिया लेकिन वो वैसे हे तिकी रही, हिम्मत बरकरार रखते हुए. गीली सुरंग में वो दैत्याकार सा लिंग बुरी तरह फिसलता हुआ माधुरी और अर्जुन को स्वर्गिक उड़ान पे लिए जा रहा था. Thapp-thapp की आवाज किवाड़ से बहार न जा कर बस इन्हे हे कामाग्नि के नशे में बाँध रही थी.
"उफ़... अर्जुनंन.. जल्दी कर.. आह्हः.. और अंदर हे करना अर्जुनंनं..", शायद ये अर्जुन का भी आजतक का सबसे तीव्र मिलान था और इतने दिन से सहेज कर रखा वीर्य अनंतकाल सामान जाने कितनी हे देर तक माधुरी के गर्भद्वार पर दस्तक देता योनि को भरने लगा.
"दीदी.. हहहहहह.", किसी अश्व की तरह हुंकार भरता हुआ वो माधुरी दीदी के जिस्म से जोंक की मानिंद जुड़ कर उनमे समाने की नाकाम सी कोशिश कर रहा था. Paani-bhare बड़े गुब्बारों से माधुरी के कूल्हों को फैलता हुआ अर्जुन लगभग होश भुला चूका था. आखिरी लम्हो में उसकी पकड़ माधुरी पर इतनी अधिक हो चुकी थी की चुचो पर बढ़ते दबाव से माधुरी लगभग चीख हे पड़ी. कासी हुई योनि के भीतर सूपड़ा फूलने पर एक और चरम प्राप्त करती हुई वो दिवार से हाथ टिकाये हे घुटनो के भर बैठ गयी. पक्क की आवाज करता वो भीषण लिंग दोनों के तरल में लिप्त बहार निकला बता रहा था के ये सम्भोग कुछ ज्यादा हे जोरदार रहा. अर्जुन की सांसें भी अनियंत्रित हो चुकी थी जिन्हे सँभालने के लिए वो बिस्टेर पर पसर गया.
"उफ़.. जान हे निकाल दी तुमने तोह भाई.. आह लेकिन अब उठ और जल्दी से कपडे पहन.. मैं भी तैयार होती हु.", माधुरी ने जैसे तैसे एक नजर अपनी योनि पर डाली जो जमीन पर सफ़ेद तरल टपकाती पहले से दुगनी फूल चुकी थी. होंठ फड़क रहे थे ऐसी भीषण चुदाई के बाद और उन्हें रुमाल से साफ़ करके माधुरी ने फुर्ती से लेहंगा पहना और आईने के सामने खड़े हो कर कमीज के पीठ की तरफ वाली डोर भी कसने लगी. अर्जुन जैसे तैसे उठने के बाद एक बार और अपनी बड़ी बहिन को सीने से लगते हुए चूम कर बगल वाले कमरे में चल दिया. माधुरी की तोह चाहत थी की अर्जुन उसको एक पूरी रात जी भर कर निचोड़ ले इस घर से विदा लेने से पहले लेकिन ये 15-20 मिनट का मिलान भी इस माहौल में कही से काम न था. फिर भी दोनों को त्यार होने में 15 मिनट और लग हे गए. अब माधुरी के हाथो में कलाई तक चूड़ियां और कड़े थे वही गले में एक हर और lehnge-kameej के अनुकूल हे एक जालीदार दुपट्टा सर पे लिए वो कार की पिछली सीट पर बैठी थी.
"मुनीर भैया, चलता हु. आपको कुछ चाहिए हो तोह असगर अंकल से बोल देना. वो भी बगल वाले प्लाट में हे चारपाई लगाए है.", अर्जुन ने कार की तरफ बढ़ने से पहले दरवाजा लगते हुए मुनीर को सूचित किया जो बदले में अदब से मुस्कुरा दिया. इसके बाद गाडी में हल्का संगीत चालू करके अर्जुन भी आगे बढ़ गया. इतने व्यस्त समय और भीड़भाड़ के बीच भी इन दोनों ने ऐसा समय निकाल हे लिया था जिसकी चाह इन दोनों को हे थी, माधुरी को कुछ अधिक.
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पार्टी में आया हर मेहमान खुदको माहौल में ढाल चूका था और शायद हे कोई ऐसा हो जो इस चकचौंध एक साथ साथ बेहतरीन मेजबानी से अभिभूत न हुआ हो. उम्मीद से कुछ हे मेहमान ज्यादा होंगे लेकिन प्रबंध शायद उनसे ज्यादा का था. गोलाकार पारिवारिक सजी मेज की गिनती दर्जनों में थी और संजीव की शराब पार्टी से कही अधिक बड़ा nirty-patal (डांस स्टेज) जगमग था जहा फ़िलहाल बचे उछाल कूद मचाते खुश हो रहे थे. पंडित जी के परिवार के सभी गृहस्थ लोग अपने अपने जोड़ीदारों के साथ आये हुए मेहमानो की आवभगत और बातचीत में व्यस्त थे.
"दादी, माधुरी दीदी भी आ गयी है.", प्रियंका ने जैसे हे कौशल्या जी को ये सन्देश दिया वो अपनी मंडली से उठ कर प्रियंका के साथ बहार की तरफ चली आयी. अर्जुन कार का द्वार खोले खड़ा था और माधुरी के लहंगे दुपट्टे को संभालती अलका रेणुका उसको इस तरफ हे लिए आ रही थी. अपनी माँ के बगल में खड़े हुए राजकुमार जी को भी ख़ुशी थी की आज उनकी बेटी इतनी बड़ी हो गयी है की विवाह करके वो कल अपने नए घर चली जायेगी. ललिता जी भी ये सब देखती हुई मुस्कुरा रही थी.
"देख ले माधुरी बिटिया, ये सब तामझाम मैंने संजीव के लिए न किया. सिर्फ और सिर्फ तेरे लिए और तेरी ख़ुशी जिसमे सभी शामिल हो इसलिए ऐसा हुआ है. मेरी बची सचमुच किसी पारी से काम न है.", कौशल्या जी ने अपनी बहु ललिता से काजल ले कर खुद हे माधुरी के कान के पीच लगाया और यहाँ से वो खुद हाथ पकड़ कर माधुरी को अंदर लिए आयी. सभी को लग रहा था के माधुरी की चाल में आयी हलकी लड़खड़ाहट लहंगे को थाम कर चलने की वजह से है. अर्जुन ये दृश्य देखता वही खड़ा खड़ा मुस्कुरा रहा था जिसको वजह ाचे से पता था.
"क्यों मिया अर्जुन ऐसे अकेले अकेले किसको याद करके मुस्कुरा रहे हो? कही कोई मेहमान हमारे छोटे उस्ताद को तोह नहीं भा गयी?", ये थे जनाब लकी अरोरा जी और उनके साथ हे उनकी बहिन डिम्पी भी आयी थी. Mata-pita शायद पहले हे अंदर जा चुके थे. डिम्पी को उनकी बगल में खड़े हँसते देख अर्जुन सकपका गया.
"ओह ऐसी बात नहीं है भैया. बस ये देख कर मुस्कुरा रहा था के घरवाले अपनी बेटी के जाने पर कितना खुश होते होंगे न जो इतने फंक्शन रखते है. वैसे डिम्पी की बारी में तोह मुझे लगता है आप ऐसी दिवाली हफ्ता भर मनाओगे. हाहाहा..", अर्जुन के व्यंग पर लकी भी खिलखिला पड़ा लेकिन डिम्पी दोनों को हे गुस्से से घूरने लगी.
"ओह सॉरी सॉरी डिम्पी. लकी भैया हफ्ता नहीं पूरे 10 दिन ख़ुशी मनाएंगे..", अर्जुन ने गंभीर होने के बाद फिर से मजाक किया तोह पाँव पटकती हुई डिम्पी वह से अंदर की तरफ चल दी. लेकिन थोड़ा आगे जा कर वो मुड़ी और बोली.
"मेरा नंबर जब आएगा तब आएगा लेकिन तुम्हारे कान मैं आज हे खिंचवा के जाउंगी और तुम भी जानते हो किस से. फिर कभी मजाक नहीं करोगे मुझसे और भैया आप तोह घर हे वापिस चलेंगे. आपको भी देखते है वह पर. बहोत हंसी आ रही है न आपको.", और अब वो अंदर जाते हे Afsana-Akanksha के साथ इधर उधर घूमती फिर रही प्रीती से मिली.
"गलती कर दी तेरी बात पर हंसने की अर्जुन. अब तोह भगवन हे बचाये मुझे मेरी शैतान बहिन से."
"आपको तोह भगवन बचा भी लेंगे भैया लेकिन मेरी तोह खबर खुद भगवन हे लेंगे अब. चलो छोडो ये सब और ये बताओ के ये संजीव भैया कहा है? आप लोगो का आज भी अलग प्रोग्राम है क्या?", अर्जुन ने कार के आईने में एक बार चेहरा देखने के बाद रुमाल से माथा साफ़ किया और कपडे दुरुस्त करता वो लकी के साथ हे दूसरे हॉल की और चल दिया.
"अरे ऐसा नहीं है भाई लेकिन तामझाम थोड़ा सा अलग अलग किया है. जिधर बाकी सभी जा रहे है वह फॅमिली वाले है और उनके हिसाब का हे माहौल. हम लोग भी उधर जा सकते है लेकिन संजीव ने साफ़ कहा है के जिसने ड्रिंक करनी है वो पिछले हॉल में एन्जॉय करे और फिर वही से निकल ले. ऊपर सिर्फ बड़े लोगो की व्यवस्था है. मैं तोह आज भी हमेशा वाले अपने 2 जाम लूंगा और संजीव शायद एक हे ले. चल आजा तुझे बाकी सभी से मिलवाता हु.", अर्जुन को अभी भी कुछ और जरुरी काम थे लेकिन फिलहाल बहोत समय था और अभी संजीव भैया के दोस्तों से बेहतर जगह उसको कोई लगी हे नहीं.
"हाँ मुझे भी ाचा लगेगा आपके दोस्तों से मिल कर.", अर्जुन इस तरफ से दाखिल हुआ तोह लम्बे हॉल में अभी खाने के काउंटर तैयार हे हो रहे थे और इस से आगे जाने पर वो इस तुलनात्मक छोटे हॉल में दाखिल हुए जिसका दरवाजा लकी के खटखटाने से खुला था. इधर तोह जैसे वो किसी अलग हे सभ्य पार्टी में आ पहुंचे थे जहा जाम के बहार भी सफ़ेद कागज लिपटे थे और तक़रीबन 2 दर्जन दोस्त में घिरा संजीव सबसे शुभकामनाये लेने के साथ हे उनके गिलास खुद बना रहा था.
"रूपक, एंड्रू, संजय तुम लोग तोह मिल हे चुके हो मेरे छोटे भाई से. दोस्तों ये है मेरी जान और मेरा सबकुछ, मेरा भाई अर्जुन.", संजीव भैया के ऐसे संक्षिप्त लेकिन सिर्फ और सिर्फ प्यार भरे शब्दों से अपना परिचय सुन्न कर अर्जुन सबसे पहले उनके हे गले लगा और फिर बारी बारी से उन्होंने अर्जुन का परिचय सभी से करवाया.
"तोह भाई अर्जुन तुम तोह इधर खड़े सभी लोगो से लम्बे तगड़े हो. आखिर तुम्हारे हे बड़े भाई और हमारे दोस्त की शादी होने की ख़ुशी में जो ये पार्टी है इसका पहला जाम तुम्हे नहीं लेना चाहिए?", आशीष ने गिलास उठा कर हवा में ऊँचा करके सभी से जैसे शामिल होने की दरख्वास्त की और ऐसा हुआ भी. लेकिन अर्जुन ने बिना कुछ जवाब दिए वही रखे एक खली गिलास को पानी से भर कर वैसा हे किया.
"ये तोह सरासर नाइंसाफी है दोस्त. संजीव बोलो अपने भाई को यार की वो भी जाम तोह बनाये, काम से काम बियर का हे सही.", एंड्रू की बात पर संजीव ने अपने भाई की पीठ पर हलकी सी ढोल जमा दी.
"हाहाहा.. ये नहीं पीयेगा एंड्रू और जिस दिन ये पीयेगा तोह यहाँ खड़े हर व्यक्ति को फिर से उस पार्टी में शामिल करूँगा. अर्जुन अभी सिर्फ 18 का है और इस से मेरा वादा है की जिस दिन इसका कॉलेज शुरू होगा, उस से पहले दिन मैं खुद अपने भाई के लिए जाम बनाऊंगा. फ़िलहाल तोह मेरे भाई की प्यूरिटी के लिए चियर्स.", और अब आगे कोई सवाल किये बिना khann-khann की ढेरो आवाजे हुई और उसके बाद सभी ने छोटा छोटा घूँट लेते हुए संजीव के आने वाले दिनों की शुभकामनाये प्रकट की.
"वैसे एक बात तोह मैं भी कहना चाहता हु अगर इजाजत हो तोह.?", ये जनाब थे कपिल मल्होत्रा, मल्होत्रा जी के बेटे और संजीव के ाचे दोस्त बेशक उम्र में लगभग 8-9 साल बड़े.
"कपिल भैया आपको तोह पूछना नहीं चाहिए. बोल भी दीजिये यार जो दिल में है.", संजीव ने उन्हें प्रोत्साहित किया था और कपिल भैया ने अर्जुन को अपने साथ लगते हुए कहा.
"ज़िन्दगी के लिए सभी का अपना अपना नजरिया है और वैसी हे सबकी प्राथमिकताएं. आप लोगो में से कई सिर्फ अपनी ड्यूटी को हे सबकुछ मानते है तोह कुछ मेरे जैसे जो धागा बनाते हे रह गए. पैसा, शोहरत और शायद कुछ ऐसे काम जिन्हे हम बताने में हिचक महसूस करते हो लेकिन मैंने व्यस्त जीवन में भी लगभग हर रोज 2 नाम अपने घर में जरूर सुने है. संजीव और अर्जुन. इन दोनों का नजरिया भी एक दूसरे से बिलकुल अलग है लेकिन ये दोनों फिर भी अलग नहीं. संजीव ने अभी कहा प्यूरिटी जिसका मतलब हुआ पवित्रता और यही तोह इनका सम्बन्ध है. ज़िन्दगी का एकमात्र नजरिया जो इन दोनों ने समझा है और बरक़रार भी ऐसे रखते है की सामने वाला मुरीद हो जाए. मैं उस दिन का इन्तजार करूँगा जब ये पवित्रता एक कदम आगे बढ़ेगी और उस वक़्त हमारे अर्जुन के हाथ में सामान जाम होगा. ये जाम इन दोनों के लिए.", कपिल भैया ने जोशीले अंदाज में कहा तोह एक साथ फिर कई स्वर गूंजे. पवित्रता के नाम.
इसके बाद तोह सरकारी क्या और व्यवसायी क्या और क्या हे बेरोजगार. सभी अपने अपने किस्सों के साथ सिमित जाम लेने लगे. संजीव ने अभी तक अपना पहला गिलास हे थाम रखा था और कोई आधे घंटे बाद अर्जुन ने जाने की आज्ञा मांगी तोह स्वीकार हुई.
"मिल कर ाचा लगा दोस्त. कल इत्मीनान से बातचीत होगी.", ये रूपक था जिसको अर्जुन ने बहोत प्रभावित किया था और उसकी बात पर अर्जुन ने भी हाथ मिला कर बस इतना हे कहा, "जी जरूर भैया. शुभरात्रि."
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जिधर जिधर ऋतू और आइशा जा रही थी वही वही उस शक्श की नजरे बस उन्ही दोनों का पीछा करती रही. सांगवान जी की धर्मपत्नी यशोदा जी के साथ ये युवक इस गोलाकार टेबल के गिर्द कुर्सी पर बैठा बस ऋतू को हे देख रहा था. यहाँ उसके करीब रुचिता, एनी और मधु के साथ अशोक जी भी बैठे हुए थे.
"क्या हुआ मंजीत, इतने गौर से क्या देख रहा है?", रुचिता ने एक बार इस युवक को और फिर उसकी नजरो का पीछा करने के बाद ये सवाल देगा तोह युवक थोड़ा सकपका गया.
"कुछ नहीं भाभी बस यहाँ की रौनक हे देख रहा था. आपको तोह पता है मुझे महफ़िल से ज्यादा परिवार के बीच रहना पसंद है. इसलिए देख रहा हु की यहाँ कितना पारिवारिक माहौल है. थोड़ा सा मॉडर्न है लेकिन सलीके से.", ये रुचिता का सबसे छोटा देवर था जो सांगवान जी के घर मिलने आया था और अब उनके अनुरोध पर इधर भी आ गया. अशोक जी तोह औपचारिक मुलाकात के लिए आये थे जो अब मधु को कुछ समय के लिए यहाँ से ले कर कुछ बात करने एक तरफ चल दिए.
"देख पारिवारिक माहौल में अगर कुछ ज्यादा हे पसंद आ जाए तोह ऐसी वैसी हरकत न कर दियो. बाकी तू समझदार है.", रुचिता ने बातों बातों में अपनी तरफ से आगाह करने की कोशिश भर की थी लेकिन ये युवक अब फिर से वही देख रहा था लेकिन अब उसकी नजर जिस युवती पर रुकी थी वो Ritu-Aaisha के दरमियान कड़ी उनसे भी कुछ लम्बी और क़यामत हे थी. अलका, जो ठीक ऋतू जैसे हे लेहंगा चोली में बरबस हे हर युवक का ध्यान अपनी और आकर्षित कर रही थी. ऋतू बेशक चेहरे के मामले में हमेशा मासूमियत की वजह से भरी पड़ती थी अलका पर लेकिन जो कटाव अलका के सुडोल तराशे हुए जिस्म पर थे उनका मुक़ाबला भी बस ऋतू हे कर सकती थी, 19 रह कर. ऋतू से कुछ बात करने के बाद अलका उस तरफ से हे बहार की और चल दी.
"मैं बाथरूम हो के आया भाभी. जूस कुछ ज्यादा हे पी लिया है लगता.", मंजीत ने रुचिता को बताने के बाद इस तरफ से हे बहार का रुख किया जैसे वो जानता हो की उसकी मंजिल किधर मिलेगी. ांनी के करीब हे रोमिला अपने साथ अलीशा को लिए चली आयी थी लेकिन ये युवक उन्हें न देख बस निकल चला.
'साला ऐसा स्वर्ग तोह दिल्ली में भी न देखने को मिला. जितनी देखि सभी रंडी थी लेकिन ये जो भी है बस हर कीमत पे यही चाहिए.', खुद से बड़बड़ाता हुआ ये व्यक्ति आगे की तरफ बढ़ा तोह अलका को उस लम्बे तगड़े युवक जो अर्जुन हे था, उसके सीने पर हाथ रख कर मुस्कुराते हुए बात करके देख अपनी हे जगह ठहर गया. कुछ हे पल में वह कोमल भी प्रकट हुई और प्रीती भी. कोमल के सामने अलका सहज रही और बाकी तीनो बस कोमल की बात सुनते रहे जो कुछ गंभीर दिख रही थी. लेकिन अर्जुन के संवाद के बाद जैसे वो खुश हो कर वापिस अंदर चली गयी. प्रीती भी बातों के साथ साथ हाथ के इशारो से अर्जुन को गंभीरता से समझती दिखी और फिर उसकी पीठ सेहला कर जैसे अर्जुन ने सांत्वना दी तोह प्रीती भी अपनी किसी सहेली की आवाज पर अंदर चली गयी. अब संगीत बजने लगा था और उस बड़े मंच पर लड़कियों का एक दूसरे के साथ ताल मिला कर नाचना भी. मधु, सरोज, पालक मल्होत्रा के साथ साथ प्रीती आकांक्षा और ज़ुबैदा इन नाचने वाली बालाओ में शामिल थी लेकिन इनसे अलग एकांत में अभी भी अर्जुन अलका का हाथ थामे उस से बातों में लगा रहा.
"चल यार अलका, तू इसके साथ हे लगी रहेगी तोह ये कब काम करेगा. विवान अंकल भी आ गए है और वो रोमिला अलीशा आंटी के साथ स्टेज के पास हे बैठे देख रहे है. अर्जुन तुझे सब याद है न?", ऋतू लगभग अलका को खिंच कर ले जाती हुई हंस भी रही थी. अर्जुन ने भी सर हिला दिया और 5 मिनट का इशारा करके वो इस तरफ हे आने लगा. वो दोनों अंदर जा चुकी थी लेकिन अब मंजीत से जैसे सबर न हुआ और वो भी अर्जुन की हे और चल दिया.
"क्यों पहलवान क्या चल रहा था वह?", मंजीत के सवाल पर अर्जुन ने पहले तोह इस आइटम को ऊपर से निचे तक ध्यान से देखा. गर्मी में भी उसने कमीज का ऊपर वाला बटन टांक रखा था और कमीज की आस्तीन भी पूरी लम्बाई वाली. पाँव में महंगे जूते जैसे उसके साथ न करते हो.
"देख लिया हो तोह मुँह भी खोल ले. ये जो तू कुछ भी कर रहा था वो कटाई गलत बात है और मैंने न यु सब पसनद नहीं.", मंजीत दांतो को भींच कर जैसे अपनी बात कह रहा था वो गंभीर की जगह वो अजूबा हे लग रहा था. अर्जुन को हंसी आ गयी ये देख कर.
"देखो भाई एक तोह तुम जो कोई भी हो मुझे उस से मतलब नहीं और दूसरी बात घर के मामलो में तुम्हे बोलना नहीं चाहिए. वैसे मैं अगर तुम्हारे हे अंदाज में तुम्हे समझने लागु तोह शायद तुम उन पैरो पर वापिस न जा सको जिनमे ये चमकदार जूते पहने हुए हो.", अर्जुन ने आखिरी लफ्ज़ बिलकुल भी नरमी में नहीं कहे थे. औसत कदकाठी का मंजीत अभी भी हैरानी से अर्जुन को हे देख रहा था जो चलता हुआ वही दाखिल हो गया था जहा से मंजीत आया था. उसके भी कदम ठीक पीछे हो लिए और जाते हे वो रुचिता से मुखातिब हुआ. अर्जुन इस बीच अपनी ताई जी से मस्ती करता हुआ उनका हाथ पकडे स्टेज की और जा रहा था.
"भाभी, ये पठानी कुर्ते पयजामे वाला लड़का कौन है?", रुचिता ने जब अर्जुन को देखा तोह वो मुस्कुरा दी और ये मंजीत ने भी देखा की उसकी भाभी इतनी खुश क्यों हुई.
"शंकर भैया का बीटा अर्जुन है वो और जहा तुम आये हो उस परिवार का लाडला. कहो तोह मुलाकात करवौ? मेरी बहोत जमती है इसके साथ और मेरी क्या सभी की ाची खासी निभती है फिर चाहे वो एनी भाभी हो या पापा जी.", रुचिता के खुलासे से एक पल के लिए तोह ये युवक खामोश हे हो गया.
"ाचा. पता नहीं था मुझे लेकिन कुछ ज्यादा हे अभिमानी न है ये लड़का?"
"तुमसे तोह 100 गुना काम होगा मंजीत बीटा. वो सबके साथ हमेशा अपनेपन और पूरी इज्जत देते हुए मिलता है. और यही वजह है के उसके लिए सिर्फ ाची बातें हे सुन्न ने को मिलेंगी. खाना खा लो तुम फिर हम लोग चलेंगे. रूचि के पापा और भाई का तोह आज रात घर आने का कोई इरादा नहीं दीखता मुझे.", ये यशोदा जी थी और उनकी बात का मंजीत से जवाब देते न बना. अर्जुन का परिचय हो जाने के बाद वो कुछ हद्द तक उस से उलझने का विचार त्याग कर अब बस स्टेज की तरफ देख रहा था जिधर नरिंदर जी ने संगीत रुकवाते हुए गले में ढोल पहन लिया था. सभी लोग खड़े हो कर उस तरफ हे चल दिए थे, क्या बड़े क्या छोटे.
"जिसको जिसको ढोल पे नाचना नहीं आता वो भी इधर आ जाओ.. आज कदम अपने आप हे न झूमे तोह फिर .. तोह फिर मेरा नाम एक बार और बदल देना..", और इतना कहने के साथ हे नरिंदर जी ने उन 2 डंडियों से जो ढोल की थाप दी उनका संगीत हर तरफ हे गूँज उठा. पंजाबी धुन में ढोल की थाप देते हुए वो खुद भी जोर शोर से कदम हिला रहे थे. उनके गिर्द हे घेरा बना कर गुरदीप, जसलीन, ज़ुबैदा के साथ साथ प्रीती, मरीना और दर्जन भर लड़कियां भी हल्ला मचती हुई कमर में दुपट्टा बांध ठुमकने लगी.
"अरे रास्ता तोह दो जरा...", यहाँ दलीप जी चले आये थे अपने साथ सरोज और अन्नू को लिए. वही आइशा को इतना खुश हो कर गुलाबी शरारे में थिरकता देख उमेद जी ने पूरे मंच पर नोटों की बारिश सी कर दी. विन्नी बहार से कड़ी रूचि के साथ ये दृश्य देख रही थी और उन्हें अपने साथ लिए कौशल्या जी भी ऊपर मंच पर चली आयी.
"माँ, आज तोह कंजूसी मैट दिखा.", शंकर जी की आवाज सुन्न कर कौशल्या जी ने 10-10 की गद्दी वापिस रख कर 100-100 के नोट अपने बचो पर वार के संगीत वाले को सौंप दिए. नरिंदर जी तोह अब और भी jor-shor से लगभग पागल सामान सर हिलाते हुए ढोल पीटने लगे थे. क्या लड़कियां और क्या भाभियाँ.. उनके साथ साथ अशोक जी और मधु, Saroj-Daleep, वालिए जी हुसैन साहब तक मंच पर अपनी बेगम को लिए हाथ उठा कर थिरकने लगे थे.
"ओह पापा.. और जोर से..", ज़ुबैदा ने सीटी बजाते हुए जैसे अपने पिता का जोश बढ़ाया और वो अब अफसाना को भी साथ लिए अपने माता पिता के साथ थिरकने लगी थी. ज़ुबैदा सचमुच इस शैली भी बेजोड़ और निर्भीक थी. उसके जोश और नृत्य को देख लगभग सभी लोग परे होते गए और बाकी बचे जो वो भी ज़ुबैदा की ताल से ताल मिलती ेद्दियों और नरिंदर जी के बेमिसाल ढोली अवतार में खोये रहे. यही पल था जब खुद हिमांशु कैमरा छोड़ सीटियां बजने लगा और मधु जी अपने बेटे के इस तरह सबमे शामिल होने पर मुस्कुराती हुई ज़ुबैदा का हौंसला बढ़ने लगी. इस बार नोटों की बारिश हर तरफ से हुई थी और ऐसी हुई की वह बस कागज हे कागज़ उड़ते दिखे. न वो ऑर्केस्ट्रा वाला पैसे उठाने स्टेज पर आया और न कोई और. आखिर में डंडे की चोट से ढोल हे दम टॉड गया.
"धत्त तेरे की. वाह ज़ूबी बीटा मान गए तुझे. पिछली लोहड़ी पर भी ढोल जवाब दे गया था और आज भी.", नरिंदर जी के बालो तक से पसीना पानी की तरह मंच पर टपक रहा था और पूरी कमीज जैसे पानी से निकली हो. ज़ुबैदा खुश हो कर अपना चेहरा और गाला दुपट्टे से पौंछती आदाब करके हंसती हुई अपनी माँ की तरफ चल दी. हर तरफ से जोरदार तालियां का शोर हुआ और मंच साफ़ होते हे एक बार फिर वही जुगलबंदी से सभी का नाचना शुरू हो चूका था. ये माहौल अब जैसे अलका, प्रीती, रोमिला और अर्जुन के लिए अनुकूल था उस काम को अंजाम देने के लिए जिसका इन्हे इंतजार था.
'शुरू करो. पापा वही दरवाजे के पास है लेकिन अलीशा आंटी उनसे रह रह कर नजरे मिला रही है.', अलका ने अर्जुन के कान में सरगोशी की तोह अर्जुन ने पाया की रोमिला ने भी कुर्सी पर बैठे हुए हे सहमति में गर्दन हिलाई. अर्जुन इस व्यस्त माहौल में साढ़े कदमो से चलता हुआ अलीशा के करीब आ रुका. उसका रुकना ऐसा था की हाथ जैसे अनजाने में अलीशा के मांसल कूल्हों पर छुआ हो, पूरी तरह जायजा लेते हुए. इस कोने में naam-matra हे लोग थे क्योंकि इधर से बहार जाने का दूसरा दरवाजा करीब था.
"सॉरी आंटी जी.", अर्जुन में अलीशा का ध्यान अपनी तरफ दिलाते हुए थोड़ा सा झुक कर क्षम्य चाहि और अलीशा के जिस्म की वह खूबसूरत महक भुला कर वो लक्ष्य पर हे केंद्रित रहा. सफ़ेद उभारो को समेटे वो कला लिबास उनकी आधी गहराई बखूबी दर्शा रहा था. और रोमिला ने इस हट्टे काटते लड़के को अपने जिस्म के करीब सत्ता देख ऐसी मुस्कान दी जैसे वो तोह इन्तजार में हो की अर्जुन ऐसी गलती ाचे से करे.
"मुझे तोह लगा था के तुम्हे मैं कभी दिखाई हे नहीं दी. शुक्र है सॉरी के साथ हे सही बात तोह की तुमने.", अलीशा की आँखें उसके जिस्म के सामान बहोत कुछ कहती थी, मादकता के साथ.
"दूर रहना भी चाहिए मुझे. पता नहीं फिर आप मेरे बारे में क्या सोचने लगे अगर ऐसी गलतियां जानबूझ कर होने लगी तोह.", अर्जुन अपनी आवाज और जिस्म को स्थिर किये वैसे हे कर रहा था जैसा वास्तविक हो. अलीशा के सुर्ख होंठो पर गहरी मुस्कान आ गयी.
"मौका तोह मैं खुद हे देना चाहती हु की तुम गलती करो और उस से मुझे पता भी चले की तुम गलती ाची कर सकते हो या फिर?"
"इतना जानता हु की आपसे खूबसूरत गलती कोई हो नहीं सकती. सॉरी आप बड़ी है तोह मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए. लेकिन जब पहली बार उस सुबह आपको पलभर के लिए देखा था तबसे बस हर गुलाब में जैसे आपको खोजता हु. जानता हु ये ठीक नहीं है इसलिए सॉरी.", अर्जुन सामने देख कर बात कर रहा था जिस से किसी को शक न हो की वो क्या बोल रहा है और किसके साथ. अलीशा के खूबसूरत चेहरे पर एकाएक हैरानी उभर आयी. रोमिला ने उसको बताया भी था अर्जुन के पुरुषार्थ के बारे में और वो अब हर हाल में उसके करीब जाना भी चाहती थी. अर्जुन को ऐसे अपने करीब से बहार जाते देख वो एक पल रुकने के बाद ठीक उसके पीछे हे हो ली.
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क्रमश
संगीत
"नवीन का मतलब होता है नया यानी की मॉडर्न. जानती हो कौशल्या जो भी नवीन हो उसके लिए R&D होती है जिसको रिसर्च एंड डेवलपमेंट कहा जाता है आम भाषा में लेकिन अगर तुम कहो तोह मैं इसका हिंदी अनुवाद भी कर सकता हु.", रामेश्वर जी ने आज गहरी नीली पतलून और धारीदार सफ़ेद नीली कमीज पहनी हुई थी. एकदम ठीक किसी अफसर की तरह और उनके साथ गाडी में कौशल्या जी बगल में और पीछे छोल साहब, कृष्णेश्वर, हंसमुख और देवकी थे. जाने कहा से उन्होंने ये बात शुरू की थी लेकिन उनकी अर्धांगिनी समझ रही थी.
"मुझे न बताओ आपका रिसर्च और जो भी हो जी. मालूम है ये सब मुझे और वो आदमी अपने गाँव का तोह नहीं है चाहे परमिंदर का बीटा कह कर मिलवाया हो विनोद ने. परमिंदर के बीटा होता तोह जरूर वैसे हे मिलता जैसे अमूमन सभी आपसे मिलते है. आप खुल कर कहो और ये देवर जी खुद हे बता देंगे बाकी तोह. क्यों कृष्ण, जानता है तू उस नवीन को?", अब कृष्णेश्वर की क्या मजाल जो वो अपनी बड़ी भाभी के सामने झूठ बोल दे. रामेश्वर जी बस मुस्कुरा रहे थे और आज उनके हाथ में वो गाडी थी जो खुद शंकर ने अपने पिता को वापिस लौटाई थी ख़ास तैयार करके, जिसको चला कर उनकी उम्र बीती थी, महिंद्रा 4क्ष4.
"भाभी जी ये नवीन कोई व्यापारी दोस्त होगा विनोद का लेकिन अपने गाँव वाले परमिंदर के बेटे का नाम तोह गुरजीत है. दिखाई तोह दिया था मुझे एक बार लेकिन फिर वो लोग जाने कहा चले गए."
"जहाँ गए है घर से हे गए है नन्हे. और अब जहा जायेंगे मेरी नज़र में हे रहेंगे. बूढा होने का सबसे बड़ा फायदा यही तोह है भाई की सब लोग आपको वो समझ लेते है जिसका अभिप्राय एक गाली से दिया जाए तोह सार्थक लगेगा. लेकिन मैं उतना भी बेसहारा नहीं. बिनोदिये को अपने पास हे रखना देवकी नहीं तोह फिर तुम मुझे तना डौगी.", रामेश्वर जी इस जीप को लिए कम्युनिटी सेण्टर के बहार आ पहुंचे थे जहा के हाल मल्होत्रा जी वाली शादी से प्रतिकूल थे. हर तरफ सुरक्षा का ऐसा इंतजाम था जिस से परिंदा भी पर न मार पाए. उमेद सिंह ने हे ये सब इंतजाम किया था और उसके अलावा यहाँ भजन मां ने भी अपने अंगरक्षकों के साथ साथ सरकारी कर्मचारी लगा रखे थे. कपूर साहब को हिदायत थी की पुलिस न लगाईं जाए जिस से उन पर कोई बात आये. मुख्या प्रवेशद्वार पर स्वयं शंकर जी के साथ साथ हुसैन साहब, वालिए जी और दलीप सिंह मौजूद थे. और भी कई थे लेकिन परिवार से वही थे जो देख रहे थे की हर व्यक्ति उनसे मिलने के बाद हे भीतर जाए.
"यही उम्मीद थी मुझे मेरे बेटे से. शंकर, तू आजा इन्हे साथ लेके. ये बाकी लोग काम देख लेंगे.", कौशल्या जी ने जीप से उतारते हे शंकर को अपने साथ ले लिया. उनकी जीप एक सुरक्षाकर्मी खुद हे अंदर ले चला क्योंकि वो रामेश्वर जी की जीप जो थी.
"हाँ तेरी माँ का दूध आधे घंटे में हे सूख गया जो तू नजर नहीं आया. मल्होत्रा जी, सुना है यहाँ गाने बजेंगे? हमको तोह थोड़ी शान्ति हे दिलवा दो भाई.", रामेश्वर जी अपने साथ भाई और साले को लिए मल्होत्रा जी से मिलते हुए इस स्थान की दूसरी मंज़िल की तरफ हे बढ़ चले. वो चाहते थे की बचे आज अपनी मर्जी से दिलचाहे शौक पूरे करे.
"ऊपर तोह महफ़िल रंग वाली होगी भाई साहब. वैसे ये अपने सांगवान जी और शास्त्री जी भी आ गए. चलिए फिर तोह महफ़िल में रंग हो या न हो, अब तोह रंगीन हे होगी.", मल्होत्रा जी ने जैसे हे इनका ध्यान इस तरफ करवाया रामेश्वर जी हैरान हे रह गए सांगवान परिवार के साथ साथ शास्त्री जी के भी पूरे परिवार को देख कर. विशेष अपनी बीवी के साथ आया था उस पुराणी मेरसेदेज़ में जिसको खुद शास्त्री जी चला के लाये थे और हिमानी उस सुपारी रंग के गाउन में सचमुच divya-aabha सी लग रही थी. विशेष ने आते हे अपने पिता के कहे अनुसार पंडित जी के चरण स्पर्श किये.
"तोह हमारे भाई के सुपुत्र श्रीमान विशेष जी भी पधार गए आखिर. बीटा डॉलर कमाने से फुर्सत मिल हे गयी तुम्हे?", रामेश्वर जी के साथ साथ आगे जाते हुए कौशल्या जी और शंकर भी लौट आये. धर्मवीर जी से मिलने के बाद बाकी लोग अंदर चले गए लेकिन शंकर बड़े गौर से विशेष को देख रहा था.
"अंकल जी पहले पता होता तोह इतना लेट नहीं होता. ये अपने समो शंकर शर्मा जी तोह हमारे शुभचिंतक हे है. U.S. वाला काम मेरे पास हे था लेकिन तब भी पता नहीं चला के आप और ये एक हे परिवार है. कैसे हो डॉक्टर साहब?", शंकर खुद भी विशेष से गले लग कर मिला था और यहाँ बाकी सभी थोड़ा ताज्जुब में थे.
"विशेष ने हे वह का सारा काम करवाया था और ये अपने नाम के साथ शास्त्री नहीं लगता तोह मुझे क्या पता था के ये गुरूजी का बीटा है. वैसे भी दोनों एकसाथ कभी दिखे हे नहीं आज से पहले और हमारी तोह मुलाकात भी अबतक काम की जगह पर हुई है. पापा मीट विशेष थे हिडन दूर, और भाई ये मेरे पापा.", अब परिचय शंकर ने करवाया था और रामेश्वर जी के बाद खुद उमेद, छोल साहब और उमेद भी विशेष से गले लग कर मिले.
"ऐसी कोई बात नहीं है ताऊ जी. ताऊ जी बोल सकता हु न?"
"अब तोह तुम मुझे कुछ भी बोल लो बीटा. पता नहीं था अपने शास्त्री जी की औलाद डॉलर के साथ साथ नाम भी िज्जात्त स्वरुप बड़ा कर रही है. ख़ुशी हुई तुमसे मिल कर विशेष और तुम हो भी ख़ास क्योंकि शंकर बहोत काम हे तारीफ करता है और शास्त्री जी नजरअंदाज उसको हे करते है जो ख़ास हो. ताकि वो बेहतर हो सके. मिलते है, चलो भाई शास्त्री जी बाकी सभी प्रतीक्षा देख रहे है.", रामेश्वर जी ने अब अपनी पल्टन के साथ ऊपर का रुख किया तोह उनके बचो के बीच अभी भी अस्वमानिया स्थिति थी.
"अबे ये गुरु जी का लोंदा निकला? यार तुमने तोह एक भी दिक्कत न आने दी वह मेरी बीवी के समय.", नरिंदर ने तोह विशेष की गर्दन को हे बाहों में ले लिया था.
"आह.. भाई थोड़ा आराम से मैं नाजुक हु. ये डॉक्टर का डर हे इतना है की क्या कहूं. वैसे ये सब काम हे तोह मेरे जिम्मे है और मुझे ऑर्डर्स भी थे की सब अर्रंगे करके दू डॉ शंकर के केस में, डायरेक्ट कम ऑफिस से. और वो भी आये है इधर मैंने सुना है.", नरिंदर के साथ चलते हुए विशेष ने जैसे हे ये कहा उमेद उसको साथ लिए अपनी चची कौशल्या जी की तरफ आ गया.
"ये मेरी माँ है और ये चची जी, शंकर की माँ जी. और maa-chachi जी ये शास्त्री जी के सुपुत्र है विशेष. हाँ भाई विशेष ये भजन मां भी तोह बैठे है इधर.", कौशल्या जी ने बड़े स्नेह से विशेष के सर पे हाथ फिराया था जो थोड़ा असहज सा दिखा कम को वह बैठे देख.
"बचो की ram-ram का तोह जवाब दे दिया कर भजन. बीटा अभी अभी तुम्हारी बीवी से मिली हु और मेरी बच्चियां उन्हें लेके जाने कहा निकल गयी. तुम लोग अपना समय जैसे चाहो वैसे बिताओ. भगवन तुम्हे तरक्की और खुशिया दे.", कौशल्या जी की नजरे अपनी बहुओं को ढून्ढ रही थी जो शायद अभी तक पहुंची न थी. विशेष भी यहाँ से विदा ले कर ऊपर की और चल दिया था जहा उसको एक हलकी फुलकी महफ़िल मिलने वाली थी, सुकून पहुंचने वाली.
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धीरे धीरे पंडित जी के यहाँ से सभी सदस्य संगीत कार्यक्रम के लिए निकल चुके थे. उमेद ने कुछ ड्राइवर ख़ास तौर से इस कार्य पर हे लगाए थे और ऐसा करना ठीक भी था जब घर के सभी पुरुषो का वह पहले हे रहना जरुरी हो. राजकुमार जी स्वयं अभी घर आये थे अपनी धर्मपत्नी और जो रह गया हो उनको लेने. घर की सुरक्षा के लिए बहार हे मुनीर को तैनात किया गया था और वैसे तोह असगर को भी हिदायत थी की वो जितनी देर हो सके प्लाट में हे रहे.
"ललिता, देखो तुम्हारे beta-beti के विवाह सम्बन्धी प्रोग्राम है और सबसे आखिर में पहुंचने वाले भी हम लोग होंगे. भाई थोड़ा तोह ध्यान रखा करो इन छोटी छोटी चीजों का. वह सभी राह देख रहे होंगे.", राजकुमार जी आज चेहरा सफाचट करने के साथ हे बाल भी करीने से कटवा रखे थे. चमकदार चमड़े के जूते, कड़ी िस्ती की हुई हलकी नीली कमीज और भूरी पतलून में उनका वैसा हे व्यक्तित्व झलक रहा था जैसा अक्सर उनके पिता का रहता था. अपनी बीवी को अलमारी से पैसे निकलते देख उनका सबसे पहले जहा ध्यान गया वो बहार को उभरा हुआ मटके सा पिछवाड़ा था. उजले पीले रंग की कसीदाकारी वाली साड़ी में ललिता जी का पृष्टभाग इतना कैसा हुआ था की उठान देखने मात्रा से साधारण व्यक्ति का दिल बैठ जाए. ललिता जी भी अपने पति की निगाहें वह महसूस करती हुई सीढ़ी कड़ी हुई.
"अभी वह सिर्फ मेहमान और घर के मर्द हे पहुंचे है जी. ड्राइवर आपके सामने हे तोह ले कर निकला है शालिनी और बाकी लोगो को. Tara-Alka भी अभी अभी अपने बहनो को लेके गयी है और 4 लोग बाकी है.", होंठो की लाली ठीक करने के बाद ललिता जी ने वो सुनहरी हैंडबैग अपने कंधे पर लटकाया और अपने पति के साथ कमरे से बहार आ गयी.
"कृष्णा, चल जल्दी कर और रेखा को भी बुला ले. तेरे जेठ जी हे लेके चल रहे है हमे.", उनके कहने के साथ हे कृष्णा जी भी अपने कमरे से बहार चली आयी. गहरी हरी साड़ी में खुले बाल और बिना किसी अतिरिक्त saaj-sajja के वो उतनी हे हसीं थी जितनी नरिंदर जी से ब्याह होने के समय. बगल वाले कमरे से माधुरी को साथ लिए रेखा जी और रेणुका आयी तोह राजकुमार जी दुविधा में पड़ गए.
"कार में तोह ज्यादा से ज्यादा 4 लोग हे आ पाएंगे ललिता."
"हाँ तोह आपसे किसने कहा के हजार लेके जाने है. अर्जुन रोमिला और विवान को छोड़ कर वापिस आ रहा है अभी तोह वही माधुरी को लेके आएगा उधर. पिछली सीट पर ये अकेली जो बैठ के आएगी जैसा माँ जी ने कहा है. वो लड़का भी नीरा बैल है जो सुबह से बिना कपडे बदले हे लोगो को धोये जा रहा है. चलो भी अब यहाँ से, फिर कहोगे देर हो रही है. और माधुरी बीटा, अपना पर्स साथ ले लियो. तुझे नचाये बिना तोह तेरी सहेलियां मानेंगी नहीं लेकिन ये कंगन, हार और चूड़ियां थोड़ा ध्यान से रखने है. अर्जुन को बोल दियो के उसके कपडे ऋतू ने कोमल के कमरे में हे रख दिए थे. बदल कर जल्दी आने की कोशिश करना.", ललिता जी ने अपने साथ कृष्णा, रेखा और रेणुका को लिया तोह राजकुमार जी खिसियाते से आगे आगे चल दिए. अपनी माँ की हिदायत सुन्न कर माधुरी भी तुरंत कमरे में चली गयी, आभूषण पहन ने और बैग ढूंढ़ने.
"वैसे कोई एक रुक जाता तोह ठीक होता दीदी. माधुरी तैयार तोह हो गयी है लेकिन kade-choodiyan पहन ने में कही दिक्कत न आये.", रेखा ने अपनी जेठानी से धीमी आवाज में विचार जताये जिस पर वो परिचित अदा से मुस्कुरा दी.
"ब्याह होने वाला है कल उसका रेखा. जो अभी तक वो ये सब न सीखी तोह कल रात अपने आप उसका घरवाले सीखा देगा. वैसे भी माँ जी ने कहा था के माधुरी को तभी वह लेके आना है जब सब मेहमान और रिश्तेदार लोग उधर पहुंच जाए. पता तोह लगे की उनकी पौती ऐसी वैसी नहीं है. हाहाहा..", उनके इस मजेदार अंदाज और कहने के ढंग से खुद राजकुमार जी भी हंस दिए थे बाकी सभी के साथ.
"रेणुका तू आगे तेरे भैया के पास बैठ. मेरे से न साड़ी पहन के आगे बैठा जाता.", ललिता जी ने पिछली सीट पर कृष्णा और रेखा को अंदर करने के बाद रेणुका से कहा. वो खुद पिछली सीट पर खिड़की किनारे हे बैठ गयी. ये वाली गाडी कही ज्यादा हे खुली थी सीट के हिसाब से. राजकुमार जी ने एक बार सरसरी नजर घर के दरवाजे पद डाली जहा कुर्सी लगाए मुनीर मुस्तैदी से बैठा था और दरवाजा बंद. घर पूरी तरह लम्बी लटकन रोशनियों से नहाया हुआ साफ़ बता रहा था के यहाँ विवाह उत्सव जारी है. कार बेआवाज आगे बढ़ चली अपने गंतव्य की तरफ.
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माधुरी उस आदमकद आईने के सामने बैठी हुई अपने रूप लावण्या को देखती हुई मंद मंद मुस्कुराये जा रही थी. ब्यूटी पार्लर वाली लड़कियों ने उसके जिस्म को कही ज्यादा हे निखार दिया था. पूरे जिस्म पे कही किसी बाल का रोया तक न था और कोहनी तक रची गहरी मेहंदी इस आभा को बढ़ा हे रही थी. कंधे से कोहनी तक जालीदार हरा कपडा, सीने की बड़े बड़े उठान को समेटने की कोशिश करता वो सब्ज रंग का कमीज जिस पर चांदी की कारीगरी थी और कमर से तखने तक का वैसा हे लेहंगा पहने माधुरी पलभर में हे हर नजर को गुलाम बना सकती थी. आईने में देखते हुए अभी वो अपनी नाक के छिद्र में बारीक बाली पहन हे रही थी की कमर पे बाहों का घेरा महसूस होते हे चेहरे की चमक सो गुना हो गयी. माधुरी के कंधे पर ठुड्डी टिकाये अर्जुन भी दोनों के अक्स आईने में देख रहा था.
"बहोत हे ज्यादा खूबसूरत लग रही हो दीदी आप. सचमुच अब लग रहा है की आपके जाने के बाद दिल को समझाना बहोत मुश्किल होने वाल है. लाओ ये मैं अपने हाथो से आपको पहना दू.", अर्जुन ने बीएड के किनारे बैठे हुए हे अपने आगे बैठी माधुरी दीदी के गाल को चूम कर वो बाली उनके हाथ से ले ली. माधुरी ने भी चेहरा घुमा कर खुद को अर्जुन के सामने हे कर लिया. जाने ये कैसे वक़्त था या अलग हे असर की माधुरी के चेहरे पर ऊर्जा का अलग हे प्रभाव नजर आने लगा था अर्जुन के सम्मुख खुद को करते हुए. लरजते हाथो से अर्जुन ने बाली का वो बारीक सा कुण्डल जैसे हे दीदी के nakh-chhidra से छुहाया वैसे हे एक हलकी सी सिसकारी माधुरी के होंठो से निकलती हुई अर्जुन के दिल में उतर गयी. ये वो अनंत प्रेम था जिसको चाह कर भी मंज़िल नसीब न थी.
माधुरी के जीवन में आने वाला वो पहला मर्द जिसने उसको stree-sukh का संज्ञान करवाने के साथ साथ ऐसे प्यार से अभिभूत किया था जो माधुरी अर्जुन के आने से पहले तक बस कल्पना हे कर सकती थी. एकांत पालो में ये एक विलक्षण जोड़ी थी जो भरपूर संवाद के kaam-krida से आगे उस pur-sukoon तक बहते चले जाते थे जिसके आगे कोई और दुनिया हे न थी.
अर्जुन के लिए भी उसके prem-jiwan की नीव रखने वाली माधुरी पहली युवती थी. बेशक संदीप की बहिन ज्योति ने अर्जुन को kaam-krida से अवगत करवाया था लेकिन वह सिर्फ kaam-vaasna हे उस रिश्ते की मध्यस्थ थी, वो भी ज्योति की एकतरफा वासना. अर्जुन को हृदय से लगा कर अंतरंग पालो का सुख, prem-milan में दोनों हे दिलो का महत्व और पूर्ण समर्पण सीखने वाली माधुरी हे थी. और आज शायद इस घर में ये इन दोनों की आखिरी अंतरंग मुलाकात थी. अर्जुन पूरी एकाग्रता से वो दमकते नाग वाली छोटी सी बलि माधुरी को पहना रहा था. काम पूरा होते हे माधुरी का मुलायम चेहरा अपने दोनों हाथो में लिए अर्जुन बस ek-tak ऐसे देख रहा था जैसे वो इस मंजर को दिल में क़ैद रखना चाहता हो.
"शहहह.. ज्यादा टाइम नहीं है अर्जुन और फिर इसके बाद शायद हे ऐसा टाइम मिले.", माधुरी ने अभी अभी लगाईं लाली से सजे अपने उभरे हुए आधार अर्जुन के होंठो से जोड़ दिए. खुमार इतना हावी था माधुरी पर की इस चुम्बन को पल भर न लगा उतेजना के चरम पे जाने में. दोनों की जिव्हा अठखेलिया करती रही और बड़े ध्यान से अर्जुन ने माधुरी की पीठ पर बंधे धागे खोल कर वो कमीज ढीली कर दी. बैठी अवस्था में हे इस गहरे चुम्बन के साथ अब अर्जुन के दोनों हाथ कमीज के अंदर रेंगते हुए माधुरी के समतल निर्वस्त्र पेट और फिर उसके आगे उन मुलायम बड़े बड़े कसावयुक्त वक्षो पर आ रुके. कुछ पल उनकी गर्मी और चिकनाई को महसूस करता अर्जुन थोड़ा आवेग से माधुरी के होंठो को लगभग खाने हे लगा था. मॉटे उभारो पर अर्जुन के सख्त हाथो का स्पर्श माधुरी को भी जोश दिलाने लगा.
"उठ.. रुक भाई. कपडे खराब नहीं करने और इस सबके लिए जायदा टाइम नहीं है."
"आज उतनी जल्दी भी नहीं करने वाला दीदी. पहले आप ये अपना कमीज निकालो."
"नहीं बाबू. देख इसको निकलने के बाद मेरे बाल फिर से बनाने पड़ेंगे और सिलवट पड़ी तोह जवाब देते नहीं बनेगा. हाँ ये लेहंगा मैं हटा देती हु.", इतने में हे माधुरी ने अपने लहंगे की डोर खोल कर जिस्म का निचला भाग निर्वस्त्र कर दिया. दमकती लाजवाब जाँघे और उनसे ऊपर वो उभरा हुआ योनिप्रदेश देख अर्जुन ने फर्श पर घुटने टिका कर वो महकता कटाव अपने होंठो से छो लिया. माधुरी के गद्देदार कूल्हों को दोनों हाथ से दबोचे वो इस उभरी हुई योनि की मोटी फांको में तब तक मुँह धंसाए भोग करता रहा जबतक माधुरी की टाँगे जवाब न दे गयी.
"िष्ठ.. बस कर भाई.. आह्ह्ह्ह.. अब जल्दी कर.. उम्म्म..", अर्जुन भी जान चूका था की यहाँ उसकी दौड़ समय के साथ है जो हर गुजरते पल के साथ काम होता जायेगा. जमीन से उठ कर उसने एक और बार माधुरी दीदी के होंठो को अपने मुँह में भरा और अपनी जीन्स घुटनो से निचे सरकने के साथ हे वो बुरी तरह अकड़ा हुआ लिंग माधुरी दीदी के yoni-dwar पर टिका दिया. स्वतः हे माधुरी ने एक पाँव बिस्टेर पर टिका कर अपनी योनि का मुख उस दहकते लिंगमुण्ड के लिए उजागर कर दिया जिसको अपने अंदर महसूस करने की चाहत उस से अधिक शायद हे किसी को हो. इतने दिनों से prem-krida से दूर रहा अर्जुन इस मूक इशारे के साथ हे कमर धकेलता हुआ बिना रुके 3 ढको में हे माधुरी की कॉमर्स से महकती हुई योनि के अत्यधिक कसाव को दरकिनार करता हुआ गर्भ तक की दुरी लांग गया. माधुरी का जिस्म पहले वार पर तड़पा, दूसरे से जैसे वो दर्द में डूबी लेकिन अंतिम आघात से वो बस अर्जुन के जिस्म से जा लिपटी. आँखों में पानी की छोटी छोटी बूंदे निकल चुकी थी और अर्जुन भी जानता था की ऐसा होगा.
"आप वही महसूस करना चाहती थी न दीदी जो पहली बार हम दोनों ने एकसाथ किया था? देखो मुझे भी बिलकुल वैसा हे लग रहा है.. आह्हः", अर्जुन ने पुरकशिश से एक और गहरा चुम्बन जड़ने के बाद कमर को हरकत दी तोह माधुरी भी सिसकते हुए वो गहरे लेकिन धीमे धक्के बराबर झेलने लगी.
"आह्ह्ह्ह.. भाई.. उफ़.. सचमुच ऐसा हे लग रहा है जैसे पहली बार तेरा ये ले रही हु.. उम्म्म मा.. ऐसे ये कमीज ख़राब हो जायेगा..", माधुरी तुरंत अलग होती हुई दिवार का सहारा ले कर ठीक उस मुद्रा में हो गयी जिसको देख कर अर्जुन खुद को रोक न पता था. वही जुनूनी जानवर सा मिलान और अपनी संगिनी की लगाम हाथो में लेने वाली मुद्रा. इस अवस्था में माधुरी इसलिए भी आयी थी की वो अर्जुन को वो चीज थमा सकती थी जो वो सबसे अधिक चाहता था, उसके बड़े सुडोल और उन्नत वक्ष.
"आराम से डालना भाई, मैं इस मिलान का हर पल महसूस करना चाहती हु... आठ.", अर्जुन उन विशाल नितम्बो के बीच अपने मूसल अंग को सही दिशा दिखने के साथ हे इस बार बड़े प्यार से उस पनियाई गली को फैलता हुआ माधुरी दीदी को उस सुख का अनुभव करवाने लगा था जिसकी चाह ने इस ख़ास पल को सार्थक करने को उन्हें मजबूर किया था. जड़ तक उस गहराई को माप कर अर्जुन ने अपने दोनों हाथो आगे बढ़ा कर अकड़े हुए निप्पल के साथ भरे भरे मांस के गोले से वक्ष थाम लिए.
"उम्म्म.. आह्हः.. दीदी.. आपका सचमुच जवाब नहीं.", पीछे से जुड़ कर माधुरी की योनि में गहरे प्रहार करता हुआ अर्जुन ढीली कमीज के भीतर दोनों खरबूजों को दबाता हुआ हर बार अपने वृषण (अंडकोष) उन भारी कूल्हों की जड़ में टकराता. ताबड़तोड़ लेकिन साढ़े हुए धक्को ने जल्द हे माधुरी को दूसरे सखलन का एहसास करवा दिया लेकिन वो वैसे हे तिकी रही, हिम्मत बरकरार रखते हुए. गीली सुरंग में वो दैत्याकार सा लिंग बुरी तरह फिसलता हुआ माधुरी और अर्जुन को स्वर्गिक उड़ान पे लिए जा रहा था. Thapp-thapp की आवाज किवाड़ से बहार न जा कर बस इन्हे हे कामाग्नि के नशे में बाँध रही थी.
"उफ़... अर्जुनंन.. जल्दी कर.. आह्हः.. और अंदर हे करना अर्जुनंनं..", शायद ये अर्जुन का भी आजतक का सबसे तीव्र मिलान था और इतने दिन से सहेज कर रखा वीर्य अनंतकाल सामान जाने कितनी हे देर तक माधुरी के गर्भद्वार पर दस्तक देता योनि को भरने लगा.
"दीदी.. हहहहहह.", किसी अश्व की तरह हुंकार भरता हुआ वो माधुरी दीदी के जिस्म से जोंक की मानिंद जुड़ कर उनमे समाने की नाकाम सी कोशिश कर रहा था. Paani-bhare बड़े गुब्बारों से माधुरी के कूल्हों को फैलता हुआ अर्जुन लगभग होश भुला चूका था. आखिरी लम्हो में उसकी पकड़ माधुरी पर इतनी अधिक हो चुकी थी की चुचो पर बढ़ते दबाव से माधुरी लगभग चीख हे पड़ी. कासी हुई योनि के भीतर सूपड़ा फूलने पर एक और चरम प्राप्त करती हुई वो दिवार से हाथ टिकाये हे घुटनो के भर बैठ गयी. पक्क की आवाज करता वो भीषण लिंग दोनों के तरल में लिप्त बहार निकला बता रहा था के ये सम्भोग कुछ ज्यादा हे जोरदार रहा. अर्जुन की सांसें भी अनियंत्रित हो चुकी थी जिन्हे सँभालने के लिए वो बिस्टेर पर पसर गया.
"उफ़.. जान हे निकाल दी तुमने तोह भाई.. आह लेकिन अब उठ और जल्दी से कपडे पहन.. मैं भी तैयार होती हु.", माधुरी ने जैसे तैसे एक नजर अपनी योनि पर डाली जो जमीन पर सफ़ेद तरल टपकाती पहले से दुगनी फूल चुकी थी. होंठ फड़क रहे थे ऐसी भीषण चुदाई के बाद और उन्हें रुमाल से साफ़ करके माधुरी ने फुर्ती से लेहंगा पहना और आईने के सामने खड़े हो कर कमीज के पीठ की तरफ वाली डोर भी कसने लगी. अर्जुन जैसे तैसे उठने के बाद एक बार और अपनी बड़ी बहिन को सीने से लगते हुए चूम कर बगल वाले कमरे में चल दिया. माधुरी की तोह चाहत थी की अर्जुन उसको एक पूरी रात जी भर कर निचोड़ ले इस घर से विदा लेने से पहले लेकिन ये 15-20 मिनट का मिलान भी इस माहौल में कही से काम न था. फिर भी दोनों को त्यार होने में 15 मिनट और लग हे गए. अब माधुरी के हाथो में कलाई तक चूड़ियां और कड़े थे वही गले में एक हर और lehnge-kameej के अनुकूल हे एक जालीदार दुपट्टा सर पे लिए वो कार की पिछली सीट पर बैठी थी.
"मुनीर भैया, चलता हु. आपको कुछ चाहिए हो तोह असगर अंकल से बोल देना. वो भी बगल वाले प्लाट में हे चारपाई लगाए है.", अर्जुन ने कार की तरफ बढ़ने से पहले दरवाजा लगते हुए मुनीर को सूचित किया जो बदले में अदब से मुस्कुरा दिया. इसके बाद गाडी में हल्का संगीत चालू करके अर्जुन भी आगे बढ़ गया. इतने व्यस्त समय और भीड़भाड़ के बीच भी इन दोनों ने ऐसा समय निकाल हे लिया था जिसकी चाह इन दोनों को हे थी, माधुरी को कुछ अधिक.
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पार्टी में आया हर मेहमान खुदको माहौल में ढाल चूका था और शायद हे कोई ऐसा हो जो इस चकचौंध एक साथ साथ बेहतरीन मेजबानी से अभिभूत न हुआ हो. उम्मीद से कुछ हे मेहमान ज्यादा होंगे लेकिन प्रबंध शायद उनसे ज्यादा का था. गोलाकार पारिवारिक सजी मेज की गिनती दर्जनों में थी और संजीव की शराब पार्टी से कही अधिक बड़ा nirty-patal (डांस स्टेज) जगमग था जहा फ़िलहाल बचे उछाल कूद मचाते खुश हो रहे थे. पंडित जी के परिवार के सभी गृहस्थ लोग अपने अपने जोड़ीदारों के साथ आये हुए मेहमानो की आवभगत और बातचीत में व्यस्त थे.
"दादी, माधुरी दीदी भी आ गयी है.", प्रियंका ने जैसे हे कौशल्या जी को ये सन्देश दिया वो अपनी मंडली से उठ कर प्रियंका के साथ बहार की तरफ चली आयी. अर्जुन कार का द्वार खोले खड़ा था और माधुरी के लहंगे दुपट्टे को संभालती अलका रेणुका उसको इस तरफ हे लिए आ रही थी. अपनी माँ के बगल में खड़े हुए राजकुमार जी को भी ख़ुशी थी की आज उनकी बेटी इतनी बड़ी हो गयी है की विवाह करके वो कल अपने नए घर चली जायेगी. ललिता जी भी ये सब देखती हुई मुस्कुरा रही थी.
"देख ले माधुरी बिटिया, ये सब तामझाम मैंने संजीव के लिए न किया. सिर्फ और सिर्फ तेरे लिए और तेरी ख़ुशी जिसमे सभी शामिल हो इसलिए ऐसा हुआ है. मेरी बची सचमुच किसी पारी से काम न है.", कौशल्या जी ने अपनी बहु ललिता से काजल ले कर खुद हे माधुरी के कान के पीच लगाया और यहाँ से वो खुद हाथ पकड़ कर माधुरी को अंदर लिए आयी. सभी को लग रहा था के माधुरी की चाल में आयी हलकी लड़खड़ाहट लहंगे को थाम कर चलने की वजह से है. अर्जुन ये दृश्य देखता वही खड़ा खड़ा मुस्कुरा रहा था जिसको वजह ाचे से पता था.
"क्यों मिया अर्जुन ऐसे अकेले अकेले किसको याद करके मुस्कुरा रहे हो? कही कोई मेहमान हमारे छोटे उस्ताद को तोह नहीं भा गयी?", ये थे जनाब लकी अरोरा जी और उनके साथ हे उनकी बहिन डिम्पी भी आयी थी. Mata-pita शायद पहले हे अंदर जा चुके थे. डिम्पी को उनकी बगल में खड़े हँसते देख अर्जुन सकपका गया.
"ओह ऐसी बात नहीं है भैया. बस ये देख कर मुस्कुरा रहा था के घरवाले अपनी बेटी के जाने पर कितना खुश होते होंगे न जो इतने फंक्शन रखते है. वैसे डिम्पी की बारी में तोह मुझे लगता है आप ऐसी दिवाली हफ्ता भर मनाओगे. हाहाहा..", अर्जुन के व्यंग पर लकी भी खिलखिला पड़ा लेकिन डिम्पी दोनों को हे गुस्से से घूरने लगी.
"ओह सॉरी सॉरी डिम्पी. लकी भैया हफ्ता नहीं पूरे 10 दिन ख़ुशी मनाएंगे..", अर्जुन ने गंभीर होने के बाद फिर से मजाक किया तोह पाँव पटकती हुई डिम्पी वह से अंदर की तरफ चल दी. लेकिन थोड़ा आगे जा कर वो मुड़ी और बोली.
"मेरा नंबर जब आएगा तब आएगा लेकिन तुम्हारे कान मैं आज हे खिंचवा के जाउंगी और तुम भी जानते हो किस से. फिर कभी मजाक नहीं करोगे मुझसे और भैया आप तोह घर हे वापिस चलेंगे. आपको भी देखते है वह पर. बहोत हंसी आ रही है न आपको.", और अब वो अंदर जाते हे Afsana-Akanksha के साथ इधर उधर घूमती फिर रही प्रीती से मिली.
"गलती कर दी तेरी बात पर हंसने की अर्जुन. अब तोह भगवन हे बचाये मुझे मेरी शैतान बहिन से."
"आपको तोह भगवन बचा भी लेंगे भैया लेकिन मेरी तोह खबर खुद भगवन हे लेंगे अब. चलो छोडो ये सब और ये बताओ के ये संजीव भैया कहा है? आप लोगो का आज भी अलग प्रोग्राम है क्या?", अर्जुन ने कार के आईने में एक बार चेहरा देखने के बाद रुमाल से माथा साफ़ किया और कपडे दुरुस्त करता वो लकी के साथ हे दूसरे हॉल की और चल दिया.
"अरे ऐसा नहीं है भाई लेकिन तामझाम थोड़ा सा अलग अलग किया है. जिधर बाकी सभी जा रहे है वह फॅमिली वाले है और उनके हिसाब का हे माहौल. हम लोग भी उधर जा सकते है लेकिन संजीव ने साफ़ कहा है के जिसने ड्रिंक करनी है वो पिछले हॉल में एन्जॉय करे और फिर वही से निकल ले. ऊपर सिर्फ बड़े लोगो की व्यवस्था है. मैं तोह आज भी हमेशा वाले अपने 2 जाम लूंगा और संजीव शायद एक हे ले. चल आजा तुझे बाकी सभी से मिलवाता हु.", अर्जुन को अभी भी कुछ और जरुरी काम थे लेकिन फिलहाल बहोत समय था और अभी संजीव भैया के दोस्तों से बेहतर जगह उसको कोई लगी हे नहीं.
"हाँ मुझे भी ाचा लगेगा आपके दोस्तों से मिल कर.", अर्जुन इस तरफ से दाखिल हुआ तोह लम्बे हॉल में अभी खाने के काउंटर तैयार हे हो रहे थे और इस से आगे जाने पर वो इस तुलनात्मक छोटे हॉल में दाखिल हुए जिसका दरवाजा लकी के खटखटाने से खुला था. इधर तोह जैसे वो किसी अलग हे सभ्य पार्टी में आ पहुंचे थे जहा जाम के बहार भी सफ़ेद कागज लिपटे थे और तक़रीबन 2 दर्जन दोस्त में घिरा संजीव सबसे शुभकामनाये लेने के साथ हे उनके गिलास खुद बना रहा था.
"रूपक, एंड्रू, संजय तुम लोग तोह मिल हे चुके हो मेरे छोटे भाई से. दोस्तों ये है मेरी जान और मेरा सबकुछ, मेरा भाई अर्जुन.", संजीव भैया के ऐसे संक्षिप्त लेकिन सिर्फ और सिर्फ प्यार भरे शब्दों से अपना परिचय सुन्न कर अर्जुन सबसे पहले उनके हे गले लगा और फिर बारी बारी से उन्होंने अर्जुन का परिचय सभी से करवाया.
"तोह भाई अर्जुन तुम तोह इधर खड़े सभी लोगो से लम्बे तगड़े हो. आखिर तुम्हारे हे बड़े भाई और हमारे दोस्त की शादी होने की ख़ुशी में जो ये पार्टी है इसका पहला जाम तुम्हे नहीं लेना चाहिए?", आशीष ने गिलास उठा कर हवा में ऊँचा करके सभी से जैसे शामिल होने की दरख्वास्त की और ऐसा हुआ भी. लेकिन अर्जुन ने बिना कुछ जवाब दिए वही रखे एक खली गिलास को पानी से भर कर वैसा हे किया.
"ये तोह सरासर नाइंसाफी है दोस्त. संजीव बोलो अपने भाई को यार की वो भी जाम तोह बनाये, काम से काम बियर का हे सही.", एंड्रू की बात पर संजीव ने अपने भाई की पीठ पर हलकी सी ढोल जमा दी.
"हाहाहा.. ये नहीं पीयेगा एंड्रू और जिस दिन ये पीयेगा तोह यहाँ खड़े हर व्यक्ति को फिर से उस पार्टी में शामिल करूँगा. अर्जुन अभी सिर्फ 18 का है और इस से मेरा वादा है की जिस दिन इसका कॉलेज शुरू होगा, उस से पहले दिन मैं खुद अपने भाई के लिए जाम बनाऊंगा. फ़िलहाल तोह मेरे भाई की प्यूरिटी के लिए चियर्स.", और अब आगे कोई सवाल किये बिना khann-khann की ढेरो आवाजे हुई और उसके बाद सभी ने छोटा छोटा घूँट लेते हुए संजीव के आने वाले दिनों की शुभकामनाये प्रकट की.
"वैसे एक बात तोह मैं भी कहना चाहता हु अगर इजाजत हो तोह.?", ये जनाब थे कपिल मल्होत्रा, मल्होत्रा जी के बेटे और संजीव के ाचे दोस्त बेशक उम्र में लगभग 8-9 साल बड़े.
"कपिल भैया आपको तोह पूछना नहीं चाहिए. बोल भी दीजिये यार जो दिल में है.", संजीव ने उन्हें प्रोत्साहित किया था और कपिल भैया ने अर्जुन को अपने साथ लगते हुए कहा.
"ज़िन्दगी के लिए सभी का अपना अपना नजरिया है और वैसी हे सबकी प्राथमिकताएं. आप लोगो में से कई सिर्फ अपनी ड्यूटी को हे सबकुछ मानते है तोह कुछ मेरे जैसे जो धागा बनाते हे रह गए. पैसा, शोहरत और शायद कुछ ऐसे काम जिन्हे हम बताने में हिचक महसूस करते हो लेकिन मैंने व्यस्त जीवन में भी लगभग हर रोज 2 नाम अपने घर में जरूर सुने है. संजीव और अर्जुन. इन दोनों का नजरिया भी एक दूसरे से बिलकुल अलग है लेकिन ये दोनों फिर भी अलग नहीं. संजीव ने अभी कहा प्यूरिटी जिसका मतलब हुआ पवित्रता और यही तोह इनका सम्बन्ध है. ज़िन्दगी का एकमात्र नजरिया जो इन दोनों ने समझा है और बरक़रार भी ऐसे रखते है की सामने वाला मुरीद हो जाए. मैं उस दिन का इन्तजार करूँगा जब ये पवित्रता एक कदम आगे बढ़ेगी और उस वक़्त हमारे अर्जुन के हाथ में सामान जाम होगा. ये जाम इन दोनों के लिए.", कपिल भैया ने जोशीले अंदाज में कहा तोह एक साथ फिर कई स्वर गूंजे. पवित्रता के नाम.
इसके बाद तोह सरकारी क्या और व्यवसायी क्या और क्या हे बेरोजगार. सभी अपने अपने किस्सों के साथ सिमित जाम लेने लगे. संजीव ने अभी तक अपना पहला गिलास हे थाम रखा था और कोई आधे घंटे बाद अर्जुन ने जाने की आज्ञा मांगी तोह स्वीकार हुई.
"मिल कर ाचा लगा दोस्त. कल इत्मीनान से बातचीत होगी.", ये रूपक था जिसको अर्जुन ने बहोत प्रभावित किया था और उसकी बात पर अर्जुन ने भी हाथ मिला कर बस इतना हे कहा, "जी जरूर भैया. शुभरात्रि."
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जिधर जिधर ऋतू और आइशा जा रही थी वही वही उस शक्श की नजरे बस उन्ही दोनों का पीछा करती रही. सांगवान जी की धर्मपत्नी यशोदा जी के साथ ये युवक इस गोलाकार टेबल के गिर्द कुर्सी पर बैठा बस ऋतू को हे देख रहा था. यहाँ उसके करीब रुचिता, एनी और मधु के साथ अशोक जी भी बैठे हुए थे.
"क्या हुआ मंजीत, इतने गौर से क्या देख रहा है?", रुचिता ने एक बार इस युवक को और फिर उसकी नजरो का पीछा करने के बाद ये सवाल देगा तोह युवक थोड़ा सकपका गया.
"कुछ नहीं भाभी बस यहाँ की रौनक हे देख रहा था. आपको तोह पता है मुझे महफ़िल से ज्यादा परिवार के बीच रहना पसंद है. इसलिए देख रहा हु की यहाँ कितना पारिवारिक माहौल है. थोड़ा सा मॉडर्न है लेकिन सलीके से.", ये रुचिता का सबसे छोटा देवर था जो सांगवान जी के घर मिलने आया था और अब उनके अनुरोध पर इधर भी आ गया. अशोक जी तोह औपचारिक मुलाकात के लिए आये थे जो अब मधु को कुछ समय के लिए यहाँ से ले कर कुछ बात करने एक तरफ चल दिए.
"देख पारिवारिक माहौल में अगर कुछ ज्यादा हे पसंद आ जाए तोह ऐसी वैसी हरकत न कर दियो. बाकी तू समझदार है.", रुचिता ने बातों बातों में अपनी तरफ से आगाह करने की कोशिश भर की थी लेकिन ये युवक अब फिर से वही देख रहा था लेकिन अब उसकी नजर जिस युवती पर रुकी थी वो Ritu-Aaisha के दरमियान कड़ी उनसे भी कुछ लम्बी और क़यामत हे थी. अलका, जो ठीक ऋतू जैसे हे लेहंगा चोली में बरबस हे हर युवक का ध्यान अपनी और आकर्षित कर रही थी. ऋतू बेशक चेहरे के मामले में हमेशा मासूमियत की वजह से भरी पड़ती थी अलका पर लेकिन जो कटाव अलका के सुडोल तराशे हुए जिस्म पर थे उनका मुक़ाबला भी बस ऋतू हे कर सकती थी, 19 रह कर. ऋतू से कुछ बात करने के बाद अलका उस तरफ से हे बहार की और चल दी.
"मैं बाथरूम हो के आया भाभी. जूस कुछ ज्यादा हे पी लिया है लगता.", मंजीत ने रुचिता को बताने के बाद इस तरफ से हे बहार का रुख किया जैसे वो जानता हो की उसकी मंजिल किधर मिलेगी. ांनी के करीब हे रोमिला अपने साथ अलीशा को लिए चली आयी थी लेकिन ये युवक उन्हें न देख बस निकल चला.
'साला ऐसा स्वर्ग तोह दिल्ली में भी न देखने को मिला. जितनी देखि सभी रंडी थी लेकिन ये जो भी है बस हर कीमत पे यही चाहिए.', खुद से बड़बड़ाता हुआ ये व्यक्ति आगे की तरफ बढ़ा तोह अलका को उस लम्बे तगड़े युवक जो अर्जुन हे था, उसके सीने पर हाथ रख कर मुस्कुराते हुए बात करके देख अपनी हे जगह ठहर गया. कुछ हे पल में वह कोमल भी प्रकट हुई और प्रीती भी. कोमल के सामने अलका सहज रही और बाकी तीनो बस कोमल की बात सुनते रहे जो कुछ गंभीर दिख रही थी. लेकिन अर्जुन के संवाद के बाद जैसे वो खुश हो कर वापिस अंदर चली गयी. प्रीती भी बातों के साथ साथ हाथ के इशारो से अर्जुन को गंभीरता से समझती दिखी और फिर उसकी पीठ सेहला कर जैसे अर्जुन ने सांत्वना दी तोह प्रीती भी अपनी किसी सहेली की आवाज पर अंदर चली गयी. अब संगीत बजने लगा था और उस बड़े मंच पर लड़कियों का एक दूसरे के साथ ताल मिला कर नाचना भी. मधु, सरोज, पालक मल्होत्रा के साथ साथ प्रीती आकांक्षा और ज़ुबैदा इन नाचने वाली बालाओ में शामिल थी लेकिन इनसे अलग एकांत में अभी भी अर्जुन अलका का हाथ थामे उस से बातों में लगा रहा.
"चल यार अलका, तू इसके साथ हे लगी रहेगी तोह ये कब काम करेगा. विवान अंकल भी आ गए है और वो रोमिला अलीशा आंटी के साथ स्टेज के पास हे बैठे देख रहे है. अर्जुन तुझे सब याद है न?", ऋतू लगभग अलका को खिंच कर ले जाती हुई हंस भी रही थी. अर्जुन ने भी सर हिला दिया और 5 मिनट का इशारा करके वो इस तरफ हे आने लगा. वो दोनों अंदर जा चुकी थी लेकिन अब मंजीत से जैसे सबर न हुआ और वो भी अर्जुन की हे और चल दिया.
"क्यों पहलवान क्या चल रहा था वह?", मंजीत के सवाल पर अर्जुन ने पहले तोह इस आइटम को ऊपर से निचे तक ध्यान से देखा. गर्मी में भी उसने कमीज का ऊपर वाला बटन टांक रखा था और कमीज की आस्तीन भी पूरी लम्बाई वाली. पाँव में महंगे जूते जैसे उसके साथ न करते हो.
"देख लिया हो तोह मुँह भी खोल ले. ये जो तू कुछ भी कर रहा था वो कटाई गलत बात है और मैंने न यु सब पसनद नहीं.", मंजीत दांतो को भींच कर जैसे अपनी बात कह रहा था वो गंभीर की जगह वो अजूबा हे लग रहा था. अर्जुन को हंसी आ गयी ये देख कर.
"देखो भाई एक तोह तुम जो कोई भी हो मुझे उस से मतलब नहीं और दूसरी बात घर के मामलो में तुम्हे बोलना नहीं चाहिए. वैसे मैं अगर तुम्हारे हे अंदाज में तुम्हे समझने लागु तोह शायद तुम उन पैरो पर वापिस न जा सको जिनमे ये चमकदार जूते पहने हुए हो.", अर्जुन ने आखिरी लफ्ज़ बिलकुल भी नरमी में नहीं कहे थे. औसत कदकाठी का मंजीत अभी भी हैरानी से अर्जुन को हे देख रहा था जो चलता हुआ वही दाखिल हो गया था जहा से मंजीत आया था. उसके भी कदम ठीक पीछे हो लिए और जाते हे वो रुचिता से मुखातिब हुआ. अर्जुन इस बीच अपनी ताई जी से मस्ती करता हुआ उनका हाथ पकडे स्टेज की और जा रहा था.
"भाभी, ये पठानी कुर्ते पयजामे वाला लड़का कौन है?", रुचिता ने जब अर्जुन को देखा तोह वो मुस्कुरा दी और ये मंजीत ने भी देखा की उसकी भाभी इतनी खुश क्यों हुई.
"शंकर भैया का बीटा अर्जुन है वो और जहा तुम आये हो उस परिवार का लाडला. कहो तोह मुलाकात करवौ? मेरी बहोत जमती है इसके साथ और मेरी क्या सभी की ाची खासी निभती है फिर चाहे वो एनी भाभी हो या पापा जी.", रुचिता के खुलासे से एक पल के लिए तोह ये युवक खामोश हे हो गया.
"ाचा. पता नहीं था मुझे लेकिन कुछ ज्यादा हे अभिमानी न है ये लड़का?"
"तुमसे तोह 100 गुना काम होगा मंजीत बीटा. वो सबके साथ हमेशा अपनेपन और पूरी इज्जत देते हुए मिलता है. और यही वजह है के उसके लिए सिर्फ ाची बातें हे सुन्न ने को मिलेंगी. खाना खा लो तुम फिर हम लोग चलेंगे. रूचि के पापा और भाई का तोह आज रात घर आने का कोई इरादा नहीं दीखता मुझे.", ये यशोदा जी थी और उनकी बात का मंजीत से जवाब देते न बना. अर्जुन का परिचय हो जाने के बाद वो कुछ हद्द तक उस से उलझने का विचार त्याग कर अब बस स्टेज की तरफ देख रहा था जिधर नरिंदर जी ने संगीत रुकवाते हुए गले में ढोल पहन लिया था. सभी लोग खड़े हो कर उस तरफ हे चल दिए थे, क्या बड़े क्या छोटे.
"जिसको जिसको ढोल पे नाचना नहीं आता वो भी इधर आ जाओ.. आज कदम अपने आप हे न झूमे तोह फिर .. तोह फिर मेरा नाम एक बार और बदल देना..", और इतना कहने के साथ हे नरिंदर जी ने उन 2 डंडियों से जो ढोल की थाप दी उनका संगीत हर तरफ हे गूँज उठा. पंजाबी धुन में ढोल की थाप देते हुए वो खुद भी जोर शोर से कदम हिला रहे थे. उनके गिर्द हे घेरा बना कर गुरदीप, जसलीन, ज़ुबैदा के साथ साथ प्रीती, मरीना और दर्जन भर लड़कियां भी हल्ला मचती हुई कमर में दुपट्टा बांध ठुमकने लगी.
"अरे रास्ता तोह दो जरा...", यहाँ दलीप जी चले आये थे अपने साथ सरोज और अन्नू को लिए. वही आइशा को इतना खुश हो कर गुलाबी शरारे में थिरकता देख उमेद जी ने पूरे मंच पर नोटों की बारिश सी कर दी. विन्नी बहार से कड़ी रूचि के साथ ये दृश्य देख रही थी और उन्हें अपने साथ लिए कौशल्या जी भी ऊपर मंच पर चली आयी.
"माँ, आज तोह कंजूसी मैट दिखा.", शंकर जी की आवाज सुन्न कर कौशल्या जी ने 10-10 की गद्दी वापिस रख कर 100-100 के नोट अपने बचो पर वार के संगीत वाले को सौंप दिए. नरिंदर जी तोह अब और भी jor-shor से लगभग पागल सामान सर हिलाते हुए ढोल पीटने लगे थे. क्या लड़कियां और क्या भाभियाँ.. उनके साथ साथ अशोक जी और मधु, Saroj-Daleep, वालिए जी हुसैन साहब तक मंच पर अपनी बेगम को लिए हाथ उठा कर थिरकने लगे थे.
"ओह पापा.. और जोर से..", ज़ुबैदा ने सीटी बजाते हुए जैसे अपने पिता का जोश बढ़ाया और वो अब अफसाना को भी साथ लिए अपने माता पिता के साथ थिरकने लगी थी. ज़ुबैदा सचमुच इस शैली भी बेजोड़ और निर्भीक थी. उसके जोश और नृत्य को देख लगभग सभी लोग परे होते गए और बाकी बचे जो वो भी ज़ुबैदा की ताल से ताल मिलती ेद्दियों और नरिंदर जी के बेमिसाल ढोली अवतार में खोये रहे. यही पल था जब खुद हिमांशु कैमरा छोड़ सीटियां बजने लगा और मधु जी अपने बेटे के इस तरह सबमे शामिल होने पर मुस्कुराती हुई ज़ुबैदा का हौंसला बढ़ने लगी. इस बार नोटों की बारिश हर तरफ से हुई थी और ऐसी हुई की वह बस कागज हे कागज़ उड़ते दिखे. न वो ऑर्केस्ट्रा वाला पैसे उठाने स्टेज पर आया और न कोई और. आखिर में डंडे की चोट से ढोल हे दम टॉड गया.
"धत्त तेरे की. वाह ज़ूबी बीटा मान गए तुझे. पिछली लोहड़ी पर भी ढोल जवाब दे गया था और आज भी.", नरिंदर जी के बालो तक से पसीना पानी की तरह मंच पर टपक रहा था और पूरी कमीज जैसे पानी से निकली हो. ज़ुबैदा खुश हो कर अपना चेहरा और गाला दुपट्टे से पौंछती आदाब करके हंसती हुई अपनी माँ की तरफ चल दी. हर तरफ से जोरदार तालियां का शोर हुआ और मंच साफ़ होते हे एक बार फिर वही जुगलबंदी से सभी का नाचना शुरू हो चूका था. ये माहौल अब जैसे अलका, प्रीती, रोमिला और अर्जुन के लिए अनुकूल था उस काम को अंजाम देने के लिए जिसका इन्हे इंतजार था.
'शुरू करो. पापा वही दरवाजे के पास है लेकिन अलीशा आंटी उनसे रह रह कर नजरे मिला रही है.', अलका ने अर्जुन के कान में सरगोशी की तोह अर्जुन ने पाया की रोमिला ने भी कुर्सी पर बैठे हुए हे सहमति में गर्दन हिलाई. अर्जुन इस व्यस्त माहौल में साढ़े कदमो से चलता हुआ अलीशा के करीब आ रुका. उसका रुकना ऐसा था की हाथ जैसे अनजाने में अलीशा के मांसल कूल्हों पर छुआ हो, पूरी तरह जायजा लेते हुए. इस कोने में naam-matra हे लोग थे क्योंकि इधर से बहार जाने का दूसरा दरवाजा करीब था.
"सॉरी आंटी जी.", अर्जुन में अलीशा का ध्यान अपनी तरफ दिलाते हुए थोड़ा सा झुक कर क्षम्य चाहि और अलीशा के जिस्म की वह खूबसूरत महक भुला कर वो लक्ष्य पर हे केंद्रित रहा. सफ़ेद उभारो को समेटे वो कला लिबास उनकी आधी गहराई बखूबी दर्शा रहा था. और रोमिला ने इस हट्टे काटते लड़के को अपने जिस्म के करीब सत्ता देख ऐसी मुस्कान दी जैसे वो तोह इन्तजार में हो की अर्जुन ऐसी गलती ाचे से करे.
"मुझे तोह लगा था के तुम्हे मैं कभी दिखाई हे नहीं दी. शुक्र है सॉरी के साथ हे सही बात तोह की तुमने.", अलीशा की आँखें उसके जिस्म के सामान बहोत कुछ कहती थी, मादकता के साथ.
"दूर रहना भी चाहिए मुझे. पता नहीं फिर आप मेरे बारे में क्या सोचने लगे अगर ऐसी गलतियां जानबूझ कर होने लगी तोह.", अर्जुन अपनी आवाज और जिस्म को स्थिर किये वैसे हे कर रहा था जैसा वास्तविक हो. अलीशा के सुर्ख होंठो पर गहरी मुस्कान आ गयी.
"मौका तोह मैं खुद हे देना चाहती हु की तुम गलती करो और उस से मुझे पता भी चले की तुम गलती ाची कर सकते हो या फिर?"
"इतना जानता हु की आपसे खूबसूरत गलती कोई हो नहीं सकती. सॉरी आप बड़ी है तोह मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए. लेकिन जब पहली बार उस सुबह आपको पलभर के लिए देखा था तबसे बस हर गुलाब में जैसे आपको खोजता हु. जानता हु ये ठीक नहीं है इसलिए सॉरी.", अर्जुन सामने देख कर बात कर रहा था जिस से किसी को शक न हो की वो क्या बोल रहा है और किसके साथ. अलीशा के खूबसूरत चेहरे पर एकाएक हैरानी उभर आयी. रोमिला ने उसको बताया भी था अर्जुन के पुरुषार्थ के बारे में और वो अब हर हाल में उसके करीब जाना भी चाहती थी. अर्जुन को ऐसे अपने करीब से बहार जाते देख वो एक पल रुकने के बाद ठीक उसके पीछे हे हो ली.
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क्रमश




