- Joined
- Dec 5, 2013
- Messages
- 137,858
अपडेट 25
अब तक
"ठीक है सर, इस बार ये कांटेस्ट हम hi जीतेंगे और हमारे hi कॉलेज को मिलेगा." कमल ने पुरे आत्मविस्वास से अपने शब्द कहे. जिस पर प्रिंसिपल सर मुस्कुराते हुए बोले, "बहुत अच्छा, मुझे तुम से यही उम्मीद थी. और हाँ इस बार जो कांटेस्ट के लिए प्राइज रखा गया है वह बहुत hi बड़ा है. अगर ये कांटेस्ट तुमने जीत लिया तो इनाम के रूप 2 लाख मिलेंगे दोनों प्रतियोगी को."
"थैंक यू सर," कमल प्रिंसिपल सर का धन्यवाद किया. उसके बाद प्रिंसिपल से जानने के लिए इजाज़त मांगी. उसके बाद कमल के साथ नकुल और कनिका एडमिशन के लिए निकल गए प्रिंसिपल के ऑफिस से. मर. चंद्र के पास कमल हम दोनों ले कर आया, फिर हमने अपना अड्मिशन करवाया. फिर कमल के साथ इस कॉलेज के बारे में और जानकारी ली. उसके बाद हम घर के लिए निकल गए.
अब आगे
नकुल के जाने के बाद ज्योति ठाकुर अपना सेलफोन निकाली और फिर एक नंबर डायल कर दी. कुछ समय पश्चात् hi फ़ोन उठा लिया गया दूसरी तरफ से. उधर से कुछ कहा गया जिस पर पहले तोह ज्योति ठाकुर ने मुस्कुरा कर जवाब दी. देख कर ऐसा लग रहा था की सामने वाले ने जरूर उसका हाल चाल hi पूछा हो. ज्योति ठाकुर अपने चेहरे पर मुस्कराहट बरकरा रखते हुए बोली, "माँ आप कैसे hi है? घर पर सब कैसे है." ज्योति के चेहरे पर वह गुस्सा नहीं था जो पहले आया हुआ था नकुल की वजह से.
"मैं तोह ठीक हु और घर पर भी सब कुछ ठीक है. पर आज मेरी लाडो को मेरी याद कैसे आ गयी इतने दिनों के बाद." ज्योति की माँ ने अपनी बेटी से पहले तोह अपना हाल बताया उसके बाद घर पर सब khushal-mangal के बारे में और अपनी बेटी से शिकायत भी कर दी इतने दिनों के बाद बात करने के लिए. वही ज्योति अपनी माँ की शिकायत सुन कर हंस दी. उसकी माँ भी अपनी बेटी की हंसी साफ़ साफ़ सुनी सकती थी और अपनी बेटी के चेहरे पर हंसी देख कर उसकी चेहरे पर भी एक मुस्कान आ गयी थी. "अच्छा ये बात अपनी माँ की याद कैसे आ गयी इतने दिनों के बाद."
"माँ आप भी मेरी तरह एक बच्ची बन गयी है, जो हर पल शिकायत करती रहती है कुछ न मिल पाने पर." ज्योति अपनी माँ को इस तरह शिकायत करते हुए सुन कर एक कटाक्ष करती है. जिसको सुन कर उसकी माँ भी हंस दी जैसे कह रही हो की तुम भी तोह कुछ ऐसा hi करती थी छोटे से लेकर अभी तक और मैं कर कर दिया तोह इसमें बुरा मानाने वाली कौनसी बात थी. अपनी माँ की हंसी सुन कर ज्योति समय गयी थी की उसकी माँ उसका मज़ा बना रही थी. ज्योति ठाकुर अपनी माँ के चेहरे पर आयी मुस्कान को वह भी अच्छी तरह से महसूस कर सकती थी की उसकी माँ कितना खुश थी उसे इस तरह से बात करके, ज्योति फिरसे कहना सुरु बोली, "अच्छा ठीक है ठीक है मैं समझा गयी आप क्या कहना चाहती है. माँ क्या नकुल घर पर hi है."
"क्या बात है आज मेरी बेटी को उस कमीने नकुल की याद कैसे आ गयी और उसके बारे में पूछ बह रही है." ज्योति की माँ जिसका नाम रजनी ठाकुर था उसने अपनी बेटी से पूछी, रजनी को समझ नहीं पा रही थी की उसकी बेटी ज्योति ने नकुल के बारे में इतने दिनों के बाद इस तरह से क्यों सवाल की थी. जबकि उसकी बेटी कभी भी नकुल से प्यार नहीं करती थी और ना hi उससे बात करना चाहती थी, फिर आज कैसे उसकी बेटी ने उस कमीने के बारे में पूछ रही थी. वही अपनी माँ को कुछ न बोलते हुए देख कर ज्योति कुछ परेशां सी हो गयी थी. उसको लगाने लगा था की जरूर नकुल के साथ उसके घर वालो ने कुछ बुरा किया है और इसी वजह से उसकी माँ सोच में पद गयी थी. अपने मैं में उठ रहे शंका को दूर करने के लिए और अपनी माँ को सोच से बाहर लाने के लिए ज्योति ने फिर से बोलना सुरु किया, "माँ नकुल के साथ कुछ हुआ है क्या जो आप इस तरह से सोच में पद गयी है."
"ना ना ऐसी कोई बात नहीं है, बीटा मैं तोह ये सोच रही थी मेरी इतनी समझदार बेटी आज उस नालायक और कमीने नकुल के बारे में इस तरह से क्यों पूछ रही है. जहाँ तक मुझे मालूम है की मेरी बेटी उसको देखना तक पसंद नहीं करती, फिर आज ऐसा क्या हो गया मेरी बेटी के साथ की वह आज नकुल के बारे में अपनी माँ से पूछ रही है." रजनी अपनी बेटी की द्वारा नकुल के पूछे जाने पर उसके tan-badan में आग सी लग गयी थी और इस वजह से वह अपने मैं में उठ रहे आग के सैलाब को न रोक सकीय और उसकी के भसीभूत हो कर वह बोलती चली गयी. वही अपनी माँ की बात सुन कर ज्योति के चेहरे के भाव बदल गए थे उसको अभी तक विश्वास नहीं कर पा रही थी की उसकी माँ आज भी नकुल से इतना नफ़रत करती होगी जितना वह भी नहीं करती थी. ज्योति को आज भी नकुल की वह मासूम सी आँखे नज़र आने लगी थी जबकि को उसने बचपन में देखि थी. सच तोह ये था की ज्योति नकुल से नफ़रत नहीं करती थी, बल्कि वह उसे बहुत ज्यादा प्यार करती थी, परन्तु जब भी ज्योति नकुल से बाते करती थी उसकी बहने और उसके घर में मौजूद सभी बड़े नकुल को बहुत बुरी तरफ से मरते थे, इस बात को समझने में ज्योति को पुरे 5 वर्ष हो गए, भला वह समझती भी कैसे आखिर वह भी तोह बहुत छोटी थी यही कोई 3 वर्ष की, उसे तोह यही लगता था की सायद नकुल ने hi कोई गलती की होगी इस लिए उसको मार पद रही है. उसको भी मार न पड़े जाए इसलिए ज्योति नकुल को बचने के लिए नहीं जाती थी. "बीटा क्या खो गयी. वैसे तू नकुल के बारे में पूछ क्यों रही है इतने दिनों के बाद."
"माँ बात ऐसी है की आज मैंने नकुल को देख है वह भी मेरे hi कॉलेज में वह भी एक लड़की के साथ. उसने तोह मुझे पहचाने से भी इंकार कर दिया." ज्योति अपनी सोच से बाहर निकलते hi अपनी माँ रजनी से उसने अभी जो थोड़े देर पहले उसके और नकुल के बिच घटित हुई घटना थी उसको बात दी. जिसको सुन कर रजनी ठाकुर के भी प्राण सुख गए. उसे तोह समझ hi नहीं आ रहा था की नकुल जिन्दा कैसा बच गया, जबकि उसको को तोह जान से मार के खाई में फेक दिया गया था. पर एक बात तोह अच्छी तरह समझ आ चूका था की अगर वह नकुल हुआ तोह वह कभी भी यहाँ पर नहीं आएगा और रही बात अगर वह नकुल नहीं हुआ यानि की नकुल की तरह देखि ने वाला कोई दूसरा व्यक्ति हुआ तोह वह उनकी मदत कर सकता था नकुल की दौलत को उनके नाम करवाने में, जहाँ एक तरफ रजनी को ये डर सत्ता रहा था की वह नकुल हुआ तोह वह उनकी बात अब कड्डपी नहीं मानेगा, और अगर वह उनका नकुल नहीं हुआ तोह उसके मदद से नकुल की साडी सम्पति अपने करवा सकती थी.
"बीटा तुम्हें कैसे पता वह लड़का नकुल hi है. तुम्हे लगत है की नकुल इस तरह बिना बताये तुम्हारे पास आ भी सकता है या हमारे पास से चला जाये." रजनी ठाकुर ने एक प्रश्नतम शब्दों का प्रयोग कर अपनी बेटी को उझलने में दाल चुकी थी, पर ज्योति का मैं ये मानाने को तैयार hi नहीं हो रहा था की वह उसका अपना प्यार भाई नकुल नहीं है. "अच्छा अगर तुझ ऐसा लगता है की वह तेरा भाई नकुल hi है तोह तू खुद hi उससे पूछ क्यों नहीं लेती."
"उसने तोह साफ़ माना कर दिया की मुझको पहचाने से की मैं उसकी बहन हु. और यहाँ तक उसके साथ आयी हुई लड़की ने तोह मेरी इंसल्ट भी कर दी." ज्योति ठाकुर कुछ सोचते हुए अपनी बात रजनी ठाकुर से बोली. अपनी बेटी की बात सुन कर रजनी को इतना तोह समझ आ गया था की वह जरूर वह नकुल न की तरह दिखने वाला कोई दूसरा लड़का है. " पता है मान जब मैं ने उससे बात करने चाही तोह उसने ऐसा व्यहवार किया जैसे वह मुझे जनता hi न हो. यहाँ तक उसने मुझे अपनी बहन माने से भी इंकार कर दिया."
"सायद तुम्हे कोई गलतफमी हुई है. हो सकता है वह तुम्हारा भाई hi न हो, बल्कि कोई दूसरा लड़का हो जो तुम्हारे भाई की तरह दीखता हो." रजनी ने ज्योति की मैं की बात भाप चुकी थी इसलिए उसने नकुल अपनी बेटी का भाई कह कर संभोधनं किया था ताकि ज्योति को लगे की उसकी माँ अब इतना नफ़रत नहीं करती जितना वह पहले किया करती थी. "एक काम कर तू न उस लड़के के बारे में पता कर, जब तुझे ये मालूम पद गए की तोह वह तुम्हारा hi भाई है तोह, फिर उसकी अच्छी तरह से खबर लेना ताकि उसे समझ आ जाये की अपनी बहने से किस तरह से बात करनी चाहिए."
"सायद तुम ठीक कहती हो माँ. मैं पहले उसके बारे में पता करती हु उसके बाद उसकी अच्छी तरह खबर लेती हु. अच्छा अब मैं रखती हु मेरा क्लास का टाइम हो गया है. Bye माँ! अपना ध्यान रखना" ज्योति मुस्कुराते हुए अपनी माँ से ये बात कही. वही रजनी भी अपनी बेटी के बात सुन कर मैं hi मैं खुश होने लगी थी जैसे उसने बहुत बड़ी जीत हांसिल कर ली हो.
"ok बीटा तुम अपना ध्यान रखना." रजनी ने अपनी बेटी से बोली. फ़ोन रखने के बाद ज्योति अपने hi मन में सोचते हुए कहती है "नहीं ये मेरा भाई hi है. माना मैंने इसके साथ कुछ गलत किया है, पर मेरी मजबूरी थी." फिर ज्योति अपने बिचारो को झटकने के बाद अपने फ्रेंड के साथ क्लास की और चली दी.
.
.
जब रजनी को पता चला की नकुल ज़िंदा है तोह वह रेशमा ठाकुर के पास चल दी अपनी बेटी के द्वारा कही बात को बताने के लिए. वही रेशमा ठाकुर अपने hi कमरे में अपने hi देवर मेहन्दर ठाकुर का मजबूत लुंड अपनी छूट में लेने के लिए तैयार कर रही थी वह वही उसका देवर भी अपनी बड़ी भाभी के छूट को चायत और चूस अपने लुंड के लिए तैयार कर रहा था. जब रजनी ठाकुल अपने सौतन के कमरे में पहुंची तोह उसने पाया की महेन्दर अपना मोटा तगड़ लुंड रेशमा ठाकुर के बूर के मुँह में रखा हुआ था, रजनी को इतना तोह समझ आ गया था की महेंद्र अपना लुंड रेशमा ठाकुर की बूर के अंदर डालने वाला था धक्का मर के.
"रेशमा दीदी." रजनी ठाकुर ने बिना परवाह किये हुए की सौतन रेशमा इस समय की स्थिति में थी उसने आवाज़ लगा दी. जिसको सुन महेंद्र जीयो का तीयो अर्थात जिस अस्वस्थ में था उसी अवस्थ में रुक गया. तोह वही अपने अंदर लुंड न पा रेशमा ठाकुर भड़क चुकी थी. रेशमा ठाकुर जिस मनो आष्टीती में थी उसका भड़कना लाजमी भी था. रेशमा ठाकुर गुस्से में बरी हुई कही, "बोल रंडी तेरी बूर में इतनी आग क्यों लगी हुई है की तोह यहाँ पर अपनी मरवाने चली आयी."
"बोलेगी भी रंडी या अपनी बेतीचुवाने के लिए कड़ी रहेगी." रेशमा ठाकुर गुस्से में चूर अपनी सौतन रजनी ठाकुर से बोली. रेशमा ठाकुर घर की सबसे बड़ी बहु थी. उसके पति ने दो और शादी की थी एक ये रजनी ठाकुर थी दूसरी थी नकुल की माँ. "भड़वे देख क्या रहा है. चल जल्दी से लुंड मेरी बूर में दाल कर इसकी आग को शांत करनी, वर्ण आगे से घर में रहनी वाली किसी भी औरत को छोड़ न सकेगा." फिर क्या था महेंद्र ने एक जोर का धक्का लगा कर अपना पूरा लुंड रेशमा ठाकुर की बूर में उतर दिया. पर पूरा लुंड जाने के बावजूद भी रेशमा ठाकुर के चेहरे पर एक सिकन तक न दिखी. सच तोह ये था की रेशमा ठाकुर को इससे भी बड़े लुंड लेने की आद्दत थी फिर महेंद्र के लुंड से उसको क्या फर्क पड़ने वाला था. वही महेंद्र अपना लुंड छूट में डालने के बाद धक्के लग्न सुरु कर दिया वह भी तेज़ तेज़.
"दीदी नकुल जिन्दा है." रजनी का इतना hi कहना था की महेंद्र के धक्के पर विराम चिन्ह लग गया, तोह वही रेशमा के अंदर उफान रह साडी उत्तेजन धराशाही हो गयी. उसको तोह लकाव hi मार गया था ये सुन कर की नकुल जिन्दा बच गया था. क्योकि उसके सरे सोचे हुए प्लान पर पानी फिर गया था.
"क्या बक्ति है कामिनी, तू होस में तोह है न और हाँ तेरे सामने hi सामने तोह उस कुत्ते को मारा कर खाई में फेक दिए थे. भूल गयी क्या." रेशमा ठाकुर महेंद्र को एक तरफ हटा दी थी अपनी ऊपर से और बिस्तर पर उठ कर बाथ गयी थी. रेशम ठाकुर के पेअर अब भी फैले हुए थे जिसमे से उसकी बूर का पानी रईस रहा था.
"नहीं दीदी मुझे अच्छी तरह से याद है, की कैसे हमे उसे कमीने हरमि के पिल्लै को जान से मारा था. फिर खायी में फेक दिया था. मैं भी ये बात जब सुनी तोह मेरे कानो पर विश्वास नहीं हो रहा था की आखिर वह कुत्ते का पिल्ला बच कैसे सकता है." रजनी ठाकुर अपने शब्द इस तरह से कहे थे की रेशमा ठाकुर को भी एक पल के लिए उसे डर सा लगन लगा था, और ठीक वैसे hi हाल महेंद्र का भी था जो चुप चाप रेशमा ठाकुर के सामने खड़ा था अपन लुंड लड़काये हुए. देख कर ऐसा लग रहा था की उसके लुंड में जान hi नहीं बची हो. रेशमा ठाकुर खुद को एक पल में hi संभल चुकी थी और जैसे hi रजनी ठाकुर के बोलना बंद किया, तोह रेशमा ठाकुर गरजते हुए बोली, "तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरे सामने इस तरह से बोलने की और साला कुत्ता चुप चाप खाद सुना रहा थाई."
"चल ोये कुत्ते अब ज्यादा वफादारी मत दिखा मेरे सामने. तेरे रहते हुए ये दो टेक की रंडी मेरे सामने ुचि आवाज में बोल गयी और तुह वह पर खड़ा खड़ा अपना लुंड पड़के हुआ था." महेंद्र जैसे hi रेशमा ठाकुर की आवाज़ सुन कर रजनी ठाकुर की और उसको मरने के लिए बढ़ा hi था की रेशमा ने उसको वही पर रोक दिया था. उसके बाद उसने ये बात अपनी सौतन रजनी ठाकुर से कही थी और अपने पालतू कुत्ते महेंद्र से जो छूट एक लिए कुछ भी करने के लिए तैयार बैठा हुआ था. "चल इधर आ और अपना लुंड मेरी छूट में दाल कर मुझे अच्छी तरह से छोड़ तृप्त कर. अगर आज मेरी प्यास नहीं बुच्ये पायी तोह तेरी खैर नहीं या मेरे से पहले तूने अपन वीर्य छोड़ा तोह देख मैं तेरी गांड का क्या हाल करती हु. तेरी गांड हरिया से ऐसा मरवा ूँगी की एक हाफत से पहले सही से चल भी न सकेगा समझा आयी मेरी बात.
"समझ गया भाभी आज नहीं होगा. पता नहीं भाभी जब तक नकुल जिन्दा था, पता नहीं मेरे लुंड में कहा से टक्कट आ जाती थी, फिर ऐसा छोड़ता था की आप भी गश हो जाती थी. पर जबसे मारा है साला मेरा लुंड भी जैसे मर hi गया है." महेंद्र ऐस रो रहा था अपनी भाभी रेशमा ठाकुर के आगे जैसे एक बचा अपनी माँ के आगे एक खिलाना टूट जाने के बाद रोटा है. रजनी और रेशमा ठाकुर अपने देवर की बात सुन कर जोर से हांसे लगी थी, रजनी ठाकुर हस्ते हुए बोली, "देख रही हो दीदी, मुझे तोह ऐसा लग रहा है की जब भी एक हमारे ऊपर चढ़ता था तोह पक्का ये नकुल की गांड के बारे में सोचते हुए हमारी बूर मरता होगा. ये तोह पक्का गे हो गया दीदी."
"तू खड़ा खाद रंडी रोना hi लगाए रहेगा, अगर तेरा बस की बात नहीं है तोह अपना ये सापोला ले कर यहाँ से चला जा और उस हरिया को मेरे पास भेज दे ताकि मैं प्यासी न रह जाऊं तेरी बेवजह से." रेशमा की बात सुनते hi महेंद्र एक फिर से अपना लुंड अपनी भाभी की छूट पर घिस कर खड़ा करने लगा गया ताकि वह अपना लुंड छूट के अंदर दाल सके. थोड़े hi पर्यटन के बाद उसका लुंड खड़ा हो गया था और अपनी भाभी की बूर में अपना लुंड दाल कर उसकी चुदाई करने लगा था. कुछ पालो के अंदर रेशमा ठाकुर को फिरसे मज़ा आने लगा था "अछि तरह से धक्के मार ताकि मुझ कुछ माज़ा आये.
"हाँ ऐसे छोड़ता रह मुझे ताकि मैं अपनी सांकल की तरफ बढ़ सकू. हाँ रे कामिनी बोल क्या कह रही थी." रेशमा ठाकुर चुदाई का आनंद लेते हुए अपनी सौतन रजनी ठाकुर से बोली, उसके चेहरे पर उत्तेजना साफ़ दिखी जा सकती थी वही महेंद्र के हर धक्के के साथ उसकी बूर से रईस रहे पानी की गति पहले से तेज़ हो गयी थी. वही रेशमा ठाकुर की बात सुन कर रजनी ने फिर से बोलै सुरु ki,"yahi दीदी नकुल जिन्दा है"
"तुझे कैसे पता की नकुल जिन्दा है. क्या तेरे पास उसकी आत्मा ने आ कर बोलै था या फिर कोई फरिश्ते ने आ कर बताया था तुझे की नकुल ज़िंदा है." रेशमा आहे भरते हुए अपनी बात बोल रही थी उसकी बात करने के तरीको देख कर कोई भी बता सकता था की उसको कितना मज़ा आ रहा था छुड़वाने में. रेशमा की चुदाई करते हुए महेंद्र की साँसे फूलने लगी थी, उसके अंदर की उत्तेजन उस उचाई पर पहुंच गयी थी, जहाँ से वह किसी भी वक़्त निचे आ सख्त था. पर किसी तरह खुद को संभाले हुए रेशमा को उसके आखिर पड़वा की तरफ लेजाने में लगा हुआ था. जिसमे वह कामयाब भी होने लगा था. "आहे अम्म्म आआ ऐसे hi करते राहू मेरा बस होने वाला है."
"दीदी ज्योति का फ़ोन आया था मेरे पास, फिर उसी ने बताया की नकुल ने उसीके कॉलेज में अड्मिशन लिया है." रजनी ठाकुर अपनी बेटी ज्योति के द्वारा कही गयी साडी बाते बता दी. जिसको सुन कर उसका दिम्माग hi एक पल के लिए सुन पद गया था तोह वैसे hi हाल महेंद्र का भी था उसकी उत्तेजन भी सम्पत हो गयी थी, पर उसके लिंग में अकड़न अभी भी बरकरा थी इसलिए वह धक्के लगाए जा रहा था.
"क्या बक्क रही ह कुटिया. दिमाग तो ठिकाने पर है न." रेशमा ठाकुर को समझ hi नहीं आ रहा था की अपनी वह क्या बोले गयी थी. पर जल्दी hi खुद को संभल लिया था और अपने दिमाग को शांत करने के लिए महेंद्र के धक्को को महसूस करने लगी ताकि वह पूरी तरह से शांत हो सके. उसका ऐसा करना पूरी तरह से सही भी निकल. क्योकि चुदाई की क्रिया के करना उसका ब्रेन पूरी तरह से संतुलित हो चूका था और इसलिए वह रजनी से बोली, " तू अभी यह से जा में तुझे मैं बाद में बुलाती हु."
फिर क्या तह वह वाहन से चली गयी, वही रेशमा ठाकुर चुदाई का आनंद लेने लगी थकी वह कुछ सोच सके. रेशमा ठाकुर जोर जोर से धक्के लगाने के लिए इशारा की, फिर क्या था महेंद्र की कुत्ते की तरह उसकी बात मान कर धक्के लगने लगा. 20 मिनट्स के बाद पहले रेशमा ठाकुर छीलते हुए संकलित होने लगी, उसके बाद महेंद्र भी अपना पानी अपनी भाभी की बूर में उड़ेलने laga.Mahendra ने आज अपनी इज्जत बच ली थी वर्ण उसको रेशमा अपनी पास भटकने भी नहीं देती. ऐसे hi पड़े हुए अपनी साँसे दुरुस्त करने लगे.
अब तक
"ठीक है सर, इस बार ये कांटेस्ट हम hi जीतेंगे और हमारे hi कॉलेज को मिलेगा." कमल ने पुरे आत्मविस्वास से अपने शब्द कहे. जिस पर प्रिंसिपल सर मुस्कुराते हुए बोले, "बहुत अच्छा, मुझे तुम से यही उम्मीद थी. और हाँ इस बार जो कांटेस्ट के लिए प्राइज रखा गया है वह बहुत hi बड़ा है. अगर ये कांटेस्ट तुमने जीत लिया तो इनाम के रूप 2 लाख मिलेंगे दोनों प्रतियोगी को."
"थैंक यू सर," कमल प्रिंसिपल सर का धन्यवाद किया. उसके बाद प्रिंसिपल से जानने के लिए इजाज़त मांगी. उसके बाद कमल के साथ नकुल और कनिका एडमिशन के लिए निकल गए प्रिंसिपल के ऑफिस से. मर. चंद्र के पास कमल हम दोनों ले कर आया, फिर हमने अपना अड्मिशन करवाया. फिर कमल के साथ इस कॉलेज के बारे में और जानकारी ली. उसके बाद हम घर के लिए निकल गए.
अब आगे
नकुल के जाने के बाद ज्योति ठाकुर अपना सेलफोन निकाली और फिर एक नंबर डायल कर दी. कुछ समय पश्चात् hi फ़ोन उठा लिया गया दूसरी तरफ से. उधर से कुछ कहा गया जिस पर पहले तोह ज्योति ठाकुर ने मुस्कुरा कर जवाब दी. देख कर ऐसा लग रहा था की सामने वाले ने जरूर उसका हाल चाल hi पूछा हो. ज्योति ठाकुर अपने चेहरे पर मुस्कराहट बरकरा रखते हुए बोली, "माँ आप कैसे hi है? घर पर सब कैसे है." ज्योति के चेहरे पर वह गुस्सा नहीं था जो पहले आया हुआ था नकुल की वजह से.
"मैं तोह ठीक हु और घर पर भी सब कुछ ठीक है. पर आज मेरी लाडो को मेरी याद कैसे आ गयी इतने दिनों के बाद." ज्योति की माँ ने अपनी बेटी से पहले तोह अपना हाल बताया उसके बाद घर पर सब khushal-mangal के बारे में और अपनी बेटी से शिकायत भी कर दी इतने दिनों के बाद बात करने के लिए. वही ज्योति अपनी माँ की शिकायत सुन कर हंस दी. उसकी माँ भी अपनी बेटी की हंसी साफ़ साफ़ सुनी सकती थी और अपनी बेटी के चेहरे पर हंसी देख कर उसकी चेहरे पर भी एक मुस्कान आ गयी थी. "अच्छा ये बात अपनी माँ की याद कैसे आ गयी इतने दिनों के बाद."
"माँ आप भी मेरी तरह एक बच्ची बन गयी है, जो हर पल शिकायत करती रहती है कुछ न मिल पाने पर." ज्योति अपनी माँ को इस तरह शिकायत करते हुए सुन कर एक कटाक्ष करती है. जिसको सुन कर उसकी माँ भी हंस दी जैसे कह रही हो की तुम भी तोह कुछ ऐसा hi करती थी छोटे से लेकर अभी तक और मैं कर कर दिया तोह इसमें बुरा मानाने वाली कौनसी बात थी. अपनी माँ की हंसी सुन कर ज्योति समय गयी थी की उसकी माँ उसका मज़ा बना रही थी. ज्योति ठाकुर अपनी माँ के चेहरे पर आयी मुस्कान को वह भी अच्छी तरह से महसूस कर सकती थी की उसकी माँ कितना खुश थी उसे इस तरह से बात करके, ज्योति फिरसे कहना सुरु बोली, "अच्छा ठीक है ठीक है मैं समझा गयी आप क्या कहना चाहती है. माँ क्या नकुल घर पर hi है."
"क्या बात है आज मेरी बेटी को उस कमीने नकुल की याद कैसे आ गयी और उसके बारे में पूछ बह रही है." ज्योति की माँ जिसका नाम रजनी ठाकुर था उसने अपनी बेटी से पूछी, रजनी को समझ नहीं पा रही थी की उसकी बेटी ज्योति ने नकुल के बारे में इतने दिनों के बाद इस तरह से क्यों सवाल की थी. जबकि उसकी बेटी कभी भी नकुल से प्यार नहीं करती थी और ना hi उससे बात करना चाहती थी, फिर आज कैसे उसकी बेटी ने उस कमीने के बारे में पूछ रही थी. वही अपनी माँ को कुछ न बोलते हुए देख कर ज्योति कुछ परेशां सी हो गयी थी. उसको लगाने लगा था की जरूर नकुल के साथ उसके घर वालो ने कुछ बुरा किया है और इसी वजह से उसकी माँ सोच में पद गयी थी. अपने मैं में उठ रहे शंका को दूर करने के लिए और अपनी माँ को सोच से बाहर लाने के लिए ज्योति ने फिर से बोलना सुरु किया, "माँ नकुल के साथ कुछ हुआ है क्या जो आप इस तरह से सोच में पद गयी है."
"ना ना ऐसी कोई बात नहीं है, बीटा मैं तोह ये सोच रही थी मेरी इतनी समझदार बेटी आज उस नालायक और कमीने नकुल के बारे में इस तरह से क्यों पूछ रही है. जहाँ तक मुझे मालूम है की मेरी बेटी उसको देखना तक पसंद नहीं करती, फिर आज ऐसा क्या हो गया मेरी बेटी के साथ की वह आज नकुल के बारे में अपनी माँ से पूछ रही है." रजनी अपनी बेटी की द्वारा नकुल के पूछे जाने पर उसके tan-badan में आग सी लग गयी थी और इस वजह से वह अपने मैं में उठ रहे आग के सैलाब को न रोक सकीय और उसकी के भसीभूत हो कर वह बोलती चली गयी. वही अपनी माँ की बात सुन कर ज्योति के चेहरे के भाव बदल गए थे उसको अभी तक विश्वास नहीं कर पा रही थी की उसकी माँ आज भी नकुल से इतना नफ़रत करती होगी जितना वह भी नहीं करती थी. ज्योति को आज भी नकुल की वह मासूम सी आँखे नज़र आने लगी थी जबकि को उसने बचपन में देखि थी. सच तोह ये था की ज्योति नकुल से नफ़रत नहीं करती थी, बल्कि वह उसे बहुत ज्यादा प्यार करती थी, परन्तु जब भी ज्योति नकुल से बाते करती थी उसकी बहने और उसके घर में मौजूद सभी बड़े नकुल को बहुत बुरी तरफ से मरते थे, इस बात को समझने में ज्योति को पुरे 5 वर्ष हो गए, भला वह समझती भी कैसे आखिर वह भी तोह बहुत छोटी थी यही कोई 3 वर्ष की, उसे तोह यही लगता था की सायद नकुल ने hi कोई गलती की होगी इस लिए उसको मार पद रही है. उसको भी मार न पड़े जाए इसलिए ज्योति नकुल को बचने के लिए नहीं जाती थी. "बीटा क्या खो गयी. वैसे तू नकुल के बारे में पूछ क्यों रही है इतने दिनों के बाद."
"माँ बात ऐसी है की आज मैंने नकुल को देख है वह भी मेरे hi कॉलेज में वह भी एक लड़की के साथ. उसने तोह मुझे पहचाने से भी इंकार कर दिया." ज्योति अपनी सोच से बाहर निकलते hi अपनी माँ रजनी से उसने अभी जो थोड़े देर पहले उसके और नकुल के बिच घटित हुई घटना थी उसको बात दी. जिसको सुन कर रजनी ठाकुर के भी प्राण सुख गए. उसे तोह समझ hi नहीं आ रहा था की नकुल जिन्दा कैसा बच गया, जबकि उसको को तोह जान से मार के खाई में फेक दिया गया था. पर एक बात तोह अच्छी तरह समझ आ चूका था की अगर वह नकुल हुआ तोह वह कभी भी यहाँ पर नहीं आएगा और रही बात अगर वह नकुल नहीं हुआ यानि की नकुल की तरह देखि ने वाला कोई दूसरा व्यक्ति हुआ तोह वह उनकी मदत कर सकता था नकुल की दौलत को उनके नाम करवाने में, जहाँ एक तरफ रजनी को ये डर सत्ता रहा था की वह नकुल हुआ तोह वह उनकी बात अब कड्डपी नहीं मानेगा, और अगर वह उनका नकुल नहीं हुआ तोह उसके मदद से नकुल की साडी सम्पति अपने करवा सकती थी.
"बीटा तुम्हें कैसे पता वह लड़का नकुल hi है. तुम्हे लगत है की नकुल इस तरह बिना बताये तुम्हारे पास आ भी सकता है या हमारे पास से चला जाये." रजनी ठाकुर ने एक प्रश्नतम शब्दों का प्रयोग कर अपनी बेटी को उझलने में दाल चुकी थी, पर ज्योति का मैं ये मानाने को तैयार hi नहीं हो रहा था की वह उसका अपना प्यार भाई नकुल नहीं है. "अच्छा अगर तुझ ऐसा लगता है की वह तेरा भाई नकुल hi है तोह तू खुद hi उससे पूछ क्यों नहीं लेती."
"उसने तोह साफ़ माना कर दिया की मुझको पहचाने से की मैं उसकी बहन हु. और यहाँ तक उसके साथ आयी हुई लड़की ने तोह मेरी इंसल्ट भी कर दी." ज्योति ठाकुर कुछ सोचते हुए अपनी बात रजनी ठाकुर से बोली. अपनी बेटी की बात सुन कर रजनी को इतना तोह समझ आ गया था की वह जरूर वह नकुल न की तरह दिखने वाला कोई दूसरा लड़का है. " पता है मान जब मैं ने उससे बात करने चाही तोह उसने ऐसा व्यहवार किया जैसे वह मुझे जनता hi न हो. यहाँ तक उसने मुझे अपनी बहन माने से भी इंकार कर दिया."
"सायद तुम्हे कोई गलतफमी हुई है. हो सकता है वह तुम्हारा भाई hi न हो, बल्कि कोई दूसरा लड़का हो जो तुम्हारे भाई की तरह दीखता हो." रजनी ने ज्योति की मैं की बात भाप चुकी थी इसलिए उसने नकुल अपनी बेटी का भाई कह कर संभोधनं किया था ताकि ज्योति को लगे की उसकी माँ अब इतना नफ़रत नहीं करती जितना वह पहले किया करती थी. "एक काम कर तू न उस लड़के के बारे में पता कर, जब तुझे ये मालूम पद गए की तोह वह तुम्हारा hi भाई है तोह, फिर उसकी अच्छी तरह से खबर लेना ताकि उसे समझ आ जाये की अपनी बहने से किस तरह से बात करनी चाहिए."
"सायद तुम ठीक कहती हो माँ. मैं पहले उसके बारे में पता करती हु उसके बाद उसकी अच्छी तरह खबर लेती हु. अच्छा अब मैं रखती हु मेरा क्लास का टाइम हो गया है. Bye माँ! अपना ध्यान रखना" ज्योति मुस्कुराते हुए अपनी माँ से ये बात कही. वही रजनी भी अपनी बेटी के बात सुन कर मैं hi मैं खुश होने लगी थी जैसे उसने बहुत बड़ी जीत हांसिल कर ली हो.
"ok बीटा तुम अपना ध्यान रखना." रजनी ने अपनी बेटी से बोली. फ़ोन रखने के बाद ज्योति अपने hi मन में सोचते हुए कहती है "नहीं ये मेरा भाई hi है. माना मैंने इसके साथ कुछ गलत किया है, पर मेरी मजबूरी थी." फिर ज्योति अपने बिचारो को झटकने के बाद अपने फ्रेंड के साथ क्लास की और चली दी.
.
.
जब रजनी को पता चला की नकुल ज़िंदा है तोह वह रेशमा ठाकुर के पास चल दी अपनी बेटी के द्वारा कही बात को बताने के लिए. वही रेशमा ठाकुर अपने hi कमरे में अपने hi देवर मेहन्दर ठाकुर का मजबूत लुंड अपनी छूट में लेने के लिए तैयार कर रही थी वह वही उसका देवर भी अपनी बड़ी भाभी के छूट को चायत और चूस अपने लुंड के लिए तैयार कर रहा था. जब रजनी ठाकुल अपने सौतन के कमरे में पहुंची तोह उसने पाया की महेन्दर अपना मोटा तगड़ लुंड रेशमा ठाकुर के बूर के मुँह में रखा हुआ था, रजनी को इतना तोह समझ आ गया था की महेंद्र अपना लुंड रेशमा ठाकुर की बूर के अंदर डालने वाला था धक्का मर के.
"रेशमा दीदी." रजनी ठाकुर ने बिना परवाह किये हुए की सौतन रेशमा इस समय की स्थिति में थी उसने आवाज़ लगा दी. जिसको सुन महेंद्र जीयो का तीयो अर्थात जिस अस्वस्थ में था उसी अवस्थ में रुक गया. तोह वही अपने अंदर लुंड न पा रेशमा ठाकुर भड़क चुकी थी. रेशमा ठाकुर जिस मनो आष्टीती में थी उसका भड़कना लाजमी भी था. रेशमा ठाकुर गुस्से में बरी हुई कही, "बोल रंडी तेरी बूर में इतनी आग क्यों लगी हुई है की तोह यहाँ पर अपनी मरवाने चली आयी."
"बोलेगी भी रंडी या अपनी बेतीचुवाने के लिए कड़ी रहेगी." रेशमा ठाकुर गुस्से में चूर अपनी सौतन रजनी ठाकुर से बोली. रेशमा ठाकुर घर की सबसे बड़ी बहु थी. उसके पति ने दो और शादी की थी एक ये रजनी ठाकुर थी दूसरी थी नकुल की माँ. "भड़वे देख क्या रहा है. चल जल्दी से लुंड मेरी बूर में दाल कर इसकी आग को शांत करनी, वर्ण आगे से घर में रहनी वाली किसी भी औरत को छोड़ न सकेगा." फिर क्या था महेंद्र ने एक जोर का धक्का लगा कर अपना पूरा लुंड रेशमा ठाकुर की बूर में उतर दिया. पर पूरा लुंड जाने के बावजूद भी रेशमा ठाकुर के चेहरे पर एक सिकन तक न दिखी. सच तोह ये था की रेशमा ठाकुर को इससे भी बड़े लुंड लेने की आद्दत थी फिर महेंद्र के लुंड से उसको क्या फर्क पड़ने वाला था. वही महेंद्र अपना लुंड छूट में डालने के बाद धक्के लग्न सुरु कर दिया वह भी तेज़ तेज़.
"दीदी नकुल जिन्दा है." रजनी का इतना hi कहना था की महेंद्र के धक्के पर विराम चिन्ह लग गया, तोह वही रेशमा के अंदर उफान रह साडी उत्तेजन धराशाही हो गयी. उसको तोह लकाव hi मार गया था ये सुन कर की नकुल जिन्दा बच गया था. क्योकि उसके सरे सोचे हुए प्लान पर पानी फिर गया था.
"क्या बक्ति है कामिनी, तू होस में तोह है न और हाँ तेरे सामने hi सामने तोह उस कुत्ते को मारा कर खाई में फेक दिए थे. भूल गयी क्या." रेशमा ठाकुर महेंद्र को एक तरफ हटा दी थी अपनी ऊपर से और बिस्तर पर उठ कर बाथ गयी थी. रेशम ठाकुर के पेअर अब भी फैले हुए थे जिसमे से उसकी बूर का पानी रईस रहा था.
"नहीं दीदी मुझे अच्छी तरह से याद है, की कैसे हमे उसे कमीने हरमि के पिल्लै को जान से मारा था. फिर खायी में फेक दिया था. मैं भी ये बात जब सुनी तोह मेरे कानो पर विश्वास नहीं हो रहा था की आखिर वह कुत्ते का पिल्ला बच कैसे सकता है." रजनी ठाकुर अपने शब्द इस तरह से कहे थे की रेशमा ठाकुर को भी एक पल के लिए उसे डर सा लगन लगा था, और ठीक वैसे hi हाल महेंद्र का भी था जो चुप चाप रेशमा ठाकुर के सामने खड़ा था अपन लुंड लड़काये हुए. देख कर ऐसा लग रहा था की उसके लुंड में जान hi नहीं बची हो. रेशमा ठाकुर खुद को एक पल में hi संभल चुकी थी और जैसे hi रजनी ठाकुर के बोलना बंद किया, तोह रेशमा ठाकुर गरजते हुए बोली, "तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरे सामने इस तरह से बोलने की और साला कुत्ता चुप चाप खाद सुना रहा थाई."
"चल ोये कुत्ते अब ज्यादा वफादारी मत दिखा मेरे सामने. तेरे रहते हुए ये दो टेक की रंडी मेरे सामने ुचि आवाज में बोल गयी और तुह वह पर खड़ा खड़ा अपना लुंड पड़के हुआ था." महेंद्र जैसे hi रेशमा ठाकुर की आवाज़ सुन कर रजनी ठाकुर की और उसको मरने के लिए बढ़ा hi था की रेशमा ने उसको वही पर रोक दिया था. उसके बाद उसने ये बात अपनी सौतन रजनी ठाकुर से कही थी और अपने पालतू कुत्ते महेंद्र से जो छूट एक लिए कुछ भी करने के लिए तैयार बैठा हुआ था. "चल इधर आ और अपना लुंड मेरी छूट में दाल कर मुझे अच्छी तरह से छोड़ तृप्त कर. अगर आज मेरी प्यास नहीं बुच्ये पायी तोह तेरी खैर नहीं या मेरे से पहले तूने अपन वीर्य छोड़ा तोह देख मैं तेरी गांड का क्या हाल करती हु. तेरी गांड हरिया से ऐसा मरवा ूँगी की एक हाफत से पहले सही से चल भी न सकेगा समझा आयी मेरी बात.
"समझ गया भाभी आज नहीं होगा. पता नहीं भाभी जब तक नकुल जिन्दा था, पता नहीं मेरे लुंड में कहा से टक्कट आ जाती थी, फिर ऐसा छोड़ता था की आप भी गश हो जाती थी. पर जबसे मारा है साला मेरा लुंड भी जैसे मर hi गया है." महेंद्र ऐस रो रहा था अपनी भाभी रेशमा ठाकुर के आगे जैसे एक बचा अपनी माँ के आगे एक खिलाना टूट जाने के बाद रोटा है. रजनी और रेशमा ठाकुर अपने देवर की बात सुन कर जोर से हांसे लगी थी, रजनी ठाकुर हस्ते हुए बोली, "देख रही हो दीदी, मुझे तोह ऐसा लग रहा है की जब भी एक हमारे ऊपर चढ़ता था तोह पक्का ये नकुल की गांड के बारे में सोचते हुए हमारी बूर मरता होगा. ये तोह पक्का गे हो गया दीदी."
"तू खड़ा खाद रंडी रोना hi लगाए रहेगा, अगर तेरा बस की बात नहीं है तोह अपना ये सापोला ले कर यहाँ से चला जा और उस हरिया को मेरे पास भेज दे ताकि मैं प्यासी न रह जाऊं तेरी बेवजह से." रेशमा की बात सुनते hi महेंद्र एक फिर से अपना लुंड अपनी भाभी की छूट पर घिस कर खड़ा करने लगा गया ताकि वह अपना लुंड छूट के अंदर दाल सके. थोड़े hi पर्यटन के बाद उसका लुंड खड़ा हो गया था और अपनी भाभी की बूर में अपना लुंड दाल कर उसकी चुदाई करने लगा था. कुछ पालो के अंदर रेशमा ठाकुर को फिरसे मज़ा आने लगा था "अछि तरह से धक्के मार ताकि मुझ कुछ माज़ा आये.
"हाँ ऐसे छोड़ता रह मुझे ताकि मैं अपनी सांकल की तरफ बढ़ सकू. हाँ रे कामिनी बोल क्या कह रही थी." रेशमा ठाकुर चुदाई का आनंद लेते हुए अपनी सौतन रजनी ठाकुर से बोली, उसके चेहरे पर उत्तेजना साफ़ दिखी जा सकती थी वही महेंद्र के हर धक्के के साथ उसकी बूर से रईस रहे पानी की गति पहले से तेज़ हो गयी थी. वही रेशमा ठाकुर की बात सुन कर रजनी ने फिर से बोलै सुरु ki,"yahi दीदी नकुल जिन्दा है"
"तुझे कैसे पता की नकुल जिन्दा है. क्या तेरे पास उसकी आत्मा ने आ कर बोलै था या फिर कोई फरिश्ते ने आ कर बताया था तुझे की नकुल ज़िंदा है." रेशमा आहे भरते हुए अपनी बात बोल रही थी उसकी बात करने के तरीको देख कर कोई भी बता सकता था की उसको कितना मज़ा आ रहा था छुड़वाने में. रेशमा की चुदाई करते हुए महेंद्र की साँसे फूलने लगी थी, उसके अंदर की उत्तेजन उस उचाई पर पहुंच गयी थी, जहाँ से वह किसी भी वक़्त निचे आ सख्त था. पर किसी तरह खुद को संभाले हुए रेशमा को उसके आखिर पड़वा की तरफ लेजाने में लगा हुआ था. जिसमे वह कामयाब भी होने लगा था. "आहे अम्म्म आआ ऐसे hi करते राहू मेरा बस होने वाला है."
"दीदी ज्योति का फ़ोन आया था मेरे पास, फिर उसी ने बताया की नकुल ने उसीके कॉलेज में अड्मिशन लिया है." रजनी ठाकुर अपनी बेटी ज्योति के द्वारा कही गयी साडी बाते बता दी. जिसको सुन कर उसका दिम्माग hi एक पल के लिए सुन पद गया था तोह वैसे hi हाल महेंद्र का भी था उसकी उत्तेजन भी सम्पत हो गयी थी, पर उसके लिंग में अकड़न अभी भी बरकरा थी इसलिए वह धक्के लगाए जा रहा था.
"क्या बक्क रही ह कुटिया. दिमाग तो ठिकाने पर है न." रेशमा ठाकुर को समझ hi नहीं आ रहा था की अपनी वह क्या बोले गयी थी. पर जल्दी hi खुद को संभल लिया था और अपने दिमाग को शांत करने के लिए महेंद्र के धक्को को महसूस करने लगी ताकि वह पूरी तरह से शांत हो सके. उसका ऐसा करना पूरी तरह से सही भी निकल. क्योकि चुदाई की क्रिया के करना उसका ब्रेन पूरी तरह से संतुलित हो चूका था और इसलिए वह रजनी से बोली, " तू अभी यह से जा में तुझे मैं बाद में बुलाती हु."
फिर क्या तह वह वाहन से चली गयी, वही रेशमा ठाकुर चुदाई का आनंद लेने लगी थकी वह कुछ सोच सके. रेशमा ठाकुर जोर जोर से धक्के लगाने के लिए इशारा की, फिर क्या था महेंद्र की कुत्ते की तरह उसकी बात मान कर धक्के लगने लगा. 20 मिनट्स के बाद पहले रेशमा ठाकुर छीलते हुए संकलित होने लगी, उसके बाद महेंद्र भी अपना पानी अपनी भाभी की बूर में उड़ेलने laga.Mahendra ने आज अपनी इज्जत बच ली थी वर्ण उसको रेशमा अपनी पास भटकने भी नहीं देती. ऐसे hi पड़े हुए अपनी साँसे दुरुस्त करने लगे.