Incest कैसे कैसे परिवार - Page 10 - SexBaba
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Incest कैसे कैसे परिवार

अध्याय ३९: मिश्रण

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दृश्य ३: सुमति और प्रकाश

एक प्रसिद्ध रेस्त्रां के एक कोने में एक मंत्रणा चल रही थी. किसी को बाहर से देखने पर प्रतीत होता कि कोई किट्टी पार्टी हो, पर ऐसा था नहीं. स्त्री जब अपने षड्यंत्र को निभाने के लिए सक्रिय होती है तो कोई विराम नहीं लगती. ये मंत्रणा तीन परिवारों के मध्य चल रही थी. दिया और सिया, सुप्रिया और सुलेखा, नीलम और शोनाली इस चर्चा में लिप्त थे. और चर्चा का विषय तो समझा ही जा सकता है: सुमति और प्रकाश को मिलाना, बिना उन्हें अवगत कराये हुए कि वो मिल रहे हैं.

जब योजना बन गई तो सबके चेहरों पर एक संतुष्टि का भाव था. योजना आज से कार्यान्वित की जानी थी. पुरुष वर्ग को भी इसके बारे में समझना शेष था अन्यथा वे कोई न कोई व्यवधान डाल सकते थे.

घर पहुंचने के पश्चात अन्य पात्रों को बताया गया. पार्थ को उसकी भूमिका समझा दी गई. शीला को सुप्रिया ने बताया तो वो अत्यधिक प्रसन्न हुई. वो स्वयं भी सुमति से अथाह प्रेम करती थी और अगर उसका घर बस जायेगा तो शीला को अपार हर्ष होगा. शाम तक सभी इस योजना में निसंकोच सम्मिलित हो चुके थे.

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अगले दिन शाम:

मुखर्जी परिवार एक पाँच सितारा होटल के रेस्त्रां में भोजन के लिए एकत्रित हुआ था. सुमति और शोनाली सुंदर बंगाली साड़ियों में अप्सरा लग रही थीं. और उनके साथ केवल जॉय ही था.

“अरे जॉय, वो तो अपने छह नंबर बंगले वाले पटेल हैं न?” सुमति ने पूछा तो जॉय ने मुड़कर देखा. एक बड़ी टेबल पर आकाश, आकार, दिया और नीलम बैठे थे. उनके साथ एक स्त्री जो दिया की जुड़वाँ बहन थी दो पुरुषों के साथ बैठी हुई थी. जॉय के बोलने के पहले ही शोनाली बोल पड़ी.

“हाँ, लगता है दिया की बहन आई हुई है उससे मिलने. उसके साथ उसके पति चंद्रेश हैं, पर उस अन्य पुरुष को मैं नहीं जानती.”

तभी उन्होंने देखा कि नीलम उनकी ही ओर आ रही है. नीलम आई तो शोनाली और सुमति औपचारिकता से खड़ी हो गयीं. तीनों ने स्त्री सुलभ आलिंगन इस चतुराई से किया कि लिपस्टिक पर सिलवट भी न पड़ी. नीलम ने जॉय की ओर देखा.

“भाईसाहब, आप भी हमारे साथ आइये न?”

“अरे आपके परिवार के बीच में आकर बाधा नहीं डालना चाहेंगे.”

“क्या बात कर रहे हैं भाई साहब, हम सब घर की बातें घर में ही करते हैं. हमें तो अच्छा लगेगा कि कोई अन्य बातें भी सकेंगी. प्लीज़ आइये।”

अब जॉय से अस्वीकार नहीं किया गया. उसने वेटर को बुलाया और बताया कि वो दूसरी टेबल पर जा रहे हैं. वो सुमति के साथ पटेल परिवार की ओर बढ़ा और पटेल बंधु खड़े हो गए. पीछे से नीलम और शोनाली ने एक दूसरे को देखा और मुस्कुरा दीं. योजना का पहला चरण सुचारु रूप से सम्पन्न हो गया था.

टेबल पर बैठ कर बातचीत आरम्भ हुई और शीघ्र हु महिलाएँ साड़ियों और शृंगार इत्यादि की बातें करने लगीं तो पुरुष खेल, राजनीति और व्यवसाय की. वेटर के आने पर पेय का मंगाये गए. पुरुष ने बियर या व्हिस्की मंगाई तो महिलाओं ने यहाँ मात्र रस इत्यादि से ही संतोष किया. प्रकाश और सुमति के सिवाय किसी को भी इस मिलन का आशय नहीं पता था. षड्यंत्र के अनुसार उन्हें आमने सामने बैठाया गया था. जैसे जैसे बातों का विस्तार बढ़ा तो सब इसमें सम्मिलित होने लगे. सुमति और प्रकाश को ये पता भी नहीं चला कि कब वे दोनों एक दूसरे से ही बात करने लगे.

भोजन समाप्त होने तक सुमति और प्रकाश एक दूसरे से सहज हो चुके थे. भोजन समाप्त होने पर सिया ने प्रकाश को देखा और आँख से संकेत किया और बताया कि वो नंबर ले ले. प्रकाश ने धीरे से सिर हिलाकर उसे स्वीकार किया. बिल चुकाने के बाद सब उठे और चले लगे. प्रकाश और सुमति कुछ पीछे रह गए.

“आपसे मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगा. अगर आपको आपत्ति न हो तो क्या हम फिर मिल सकते हैं. इतने सबके साथ नहीं.” प्रकाश ने पहल की.

सुमति मुस्कुराई, “अवश्य.”

“अगर आप अपना नंबर दे दें तो मैं आपसे पूछ लूँगा।”

सुमति ने अपना नंबर बताया जिसे प्रकाश ने तुरंत ही अपने फोन में डाल लिया. आगे चल रहे सर्वजनों को पता था कि पीछे क्या चल रहा है.

“सब कश्मीर से कन्या कुमारी की बात करते है, हम गुजरात से बंगाल मिलाने का प्रयास कर रहे हैं.”

इस बात पर सब खुलकर हँसे. होटल के बाहर अपनी गाड़ियों की प्रतीक्षा करते हुए सबने ये निश्चय किया कि इस प्रकार के मिलन करते रहना चाहिए. गाड़ियाँ आते ही सब अपने घरों की ओर चल दिए.

जॉय गाड़ी चला रहा था और शोनाली उसके साथ आगे बैठी थी. पीछे सुमति अपनी कल्पना में मग्न थी.

“बड़ी बढ़िया पार्टी हो गई, बिना किसी परिश्रम के.” जॉय ने कहा.

“हाँ बहुत आनंद आया.” शोनाली ने उत्तर दिया फिर सुमति से पूछा, “क्यों दी? कैसी रही?”

“हुँह, हाँ हाँ, बेसी भालो छिलो!” सुमति मानो तंद्रा से जगी हो.

शोनाली और जॉय ने एक दूसरे को देखा और मुस्कुरा दिए. लगता था कि प्रेमदेव ने सुमति के मन को अपने प्रेम बाण से भेद दिया था. घर पहुंच कर सब उनकी ओर ही देख रहे थे.

पार्थ, “अरे बहुत देर कर दी. क्या हुआ?”

जॉय, “पटेल परिवार मिल गया था. तो उनके ही साथ बैठ गए थे. अच्छा लगा उनसे मिलकर इतने दिनों बाद.”

शोनाली, “और दिया की बहन सिया आई है, अपने पति और देवर के साथ. उनके पति तो ठीक ठाक थे, पर देवर कुछ अधिक ही चतुर चालाक लग रहा था, क्यों दी, आपको क्या लगा?” शोनाली ने चुटकी ली.

“मुझे तो प्रकाश बहुत सज्जन लगा. बहुत शालीनता से बात की मुझसे. अब मुझे नींद आ रही है, तो मैं चली सोने. पार्थ, तुम कब आओगे.”

“अभी आता हूँ. आप चलो.”

सुमति के जाते ही सबने हाथ उठाकर सामूहिक ताली बजाई।

उधर प्रकाश की भी स्थिति समान ही थी. परन्तु घर में अधिक लोगों के होने से किसी ने उससे अधिक प्रश्न नहीं किये. पर ये सबने ताड़ लिया कि प्रकाश का ध्यान कहीं और था. नीलम ने ताड़ने के लिए सुझाव दिया.

“अब देर हो रही है तो सोने चलते हैं. भाईसाहब आप कहाँ सोयेंगे?” उसने प्रकाश से पूछा.

“उँह, हाँ आज कुछ अधिक नींद आ रही है, तो मैं अपने ही कमरे में सो जाता हूँ.” ये कहते हुए वो उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना ही अपने कमरे चला गया.

“लगता है पँछी घायल हो गया है.” सिया बोली तो सब ठहाका मर कर हंस पड़े.

“बच्चों, सेंधमारी की हुई है न?”

“पूरी”

नीलम ने शोनाली को फोन लगाया. और वहाँ से भी सकारात्मक उत्तर ही आया. एक प्रहरी को प्रकाश के कमरे में बाहर बैठा कर टीवी चलाया और फिर एक चैनल पर रुके जहाँ प्रकाश के कमरे का दृश्य दिख रहा था. चलचित्र उतना स्पष्ट नहीं था परन्तु इसका प्रयोजन देखना नहीं सुनना था. पंद्रह मिनट में ही स्पष्ट हो गया कि प्रेमाग्नि को ग्रसित कर लिया है. दोनों के अकेले मिलने की योजना भी पता चल गई. अब उन्हें इस प्रकार से निकट लाना था कि बंधन न टूटे. और इसके लिए महिलाओं की नई मंत्रणा कल करना निर्धारित हुआ.

अगले दिन सुबह जब शोनाली उठी तो देखा घर का मुख्य द्वार बंद हो रहा था, जैसे कोई अंदर आया हो या बाहर गया हो. उसने बाहर झाँका तो सुमति को तेज चाल से उद्यान में जाते देखा.

“हम्म, लगता है दोपहर की प्रतीक्षा भी दोनों को भारी पड़ रही है.” उसने नीलम को फोन लगाया. कोई उत्तर न मिलने पर कटा ही था कि नीलम ने फोन किया. शोनाली ने अपनी ओर की सूचना दी तो नीलम ने रुकने को कहा. फिर नीलम ने बताया की प्रकाश भी कमरे में नहीं है. नीलमा अपने घर की बालकनी में गई और बताया कि दोनों उद्यान में घूम रहे हैं. इसके बाद फोन काटकर दोनों अपने कार्यों में व्यस्त हो गयीं.

जब सुमति घर लौटी तो शोनाली रसोई में ही थी.

“अरे दी, कहाँ से आ रही हो?”

सुमति सकपका गई.

“थोड़ा घूमने गई थी, बहुत मोटी होती जा रही हूँ.”

“ये अच्छा किया दी. मुझे बोलती तो मैं भी चलती.”

“अरे मैंने सोचा तुम सो रही होगी. क्यों डिस्टर्ब करूँ। चलो नहा कर आती हूँ.”

“अब ठहरो, चाय पीकर जाओ.” शोनाली ने रोका.

एक कप सुमति को दिया और एक स्वयं लेकर वहीँ खड़े हुए चुस्की लेने लगे. चाय पीकर कप को बेसिन में रखा. सुमति मुड़ी ही थी कि शोनाली ने फिर रोका.

“अरे दी, ये क्या लगा है मुंह पर?”

सुमति ने अपने चेहरे पर हाथ चलाया, “कोथाय?”

शोनाली पास गई और उसके होंठों पर हाथ फेरे, फिर उन्हें चूम लिया. “यहाँ, एक मुस्कराहट है जो कल से लगी है.”

सुमति शर्मा गई.

“दी. इसमें शर्माने की बात नहीं है. आपको प्रकाश अच्छा लगा न? हमें भी अच्छा लगा. और पार्थ को भी. तो हमसे छुपाने का कोई अर्थ नहीं है. उन्मुक्त होकर मिलो और आनंद लो. अगर बात आगे बढ़े तो हम सबको प्रसन्नता होगी. अब जाओ, नहाकर आ जाओ.”

सुमति ने शोनाली को चूमा, “धन्यवाद, भाई क्या बोला?”

“वो भी हैप्पी है.”

सुमति अपने कमरे में चली गई पर इस बार उसकी चाल भिन्न थी.

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दृश्य ४: वर्षा और स्मिता:

चार गाड़ियाँ रुकीं और उनमे से लोग उतरे. कुछ ने अंगड़ाई लेकर अपने शरीर को सीधा किया तो किसी ने घुटने मोड़कर.

“नाइस प्लेस.” समीर ने कहा.

“यस, वेरी वेरी नाइस.” वर्षा जो उसके साथ खड़ी थी उसने सहमति जताई.

वर्षा और उसका परिवार आज स्मिता के परिवार के साथ उसी रिसोर्ट में आया था जहाँ पर समुदाय के मिलन समारोह होते हैं.

“हाँ, मेरी इसके स्वामी से अच्छी मित्रता है. कभी आवश्यकता पड़े तो बताइयेगा.” विक्रम ने उसके पास आकर कहा.

रिसोर्ट में उनके लिए विशेष प्रबंध किया गया था. स्मिता द्वारा बताये जाने के बाद उन्हें इस बात का दायित्व दिया था कि अगर सम्भव हो तो उन्हें भी समुदाय से जोड़ने का प्रयास किया जाये. उनकी जो जाँच इत्यादि है वो समय ले सकती है परन्तु उनका इस प्रकार की जीवनशैली के प्रति समर्पण को समझना आवश्यक था.

गाड़ियों में से एक एक करके अंजलि, राहुल, जयंत, सुलभा और पवन भी बाहर आकर रिसोर्ट की सुंदरता का आनंद उठा रहे थे. स्मिता, मोहन, महक, मेहुल और श्रेया भी यही देख रहे थे. मेहुल का यहाँ का पहला आगमन था, हालाँकि इस माह के अंत के मिलन में उसे औपचारिक रूप से प्रवेश मिलना था. अविरल और सुजाता विवेक और स्नेहा के साथ आ सकते थे, अपितु उनका अब तक आना निश्चित नहीं था.

रिसोर्ट से निकलकर दो लड़के और दो लड़कियां आये, जो रिसोर्ट की वेशभूषा में थे. उन्होंने आकर सबको प्रणाम किया. तभी एक इलेक्ट्रिक गाड़ी लेकर एक लड़का और आया और उनकी कार से सामान निकालकर रखने लगा. इसमें अन्य कर्मचारी हाथ बंटाने लगे. फिर एक कर्मचारी विक्रम के पास आया और उसे चार चाबियाँ दे दीं. कारों की चाबी लेकर उसने बताया कि वे उन्हें उचित स्थान पर खड़ी कर देंगे.

“आप चलकर जलपान कीजिये. आपका सामान पहुंचा दिया जायेगा और फिर आपको भी छोड़ दिया जायेगा.” उसने बताया.

“क्या हम कमरों में जाने के पहले रिसोर्ट घूम सकते हैं?” वर्षा ने पूछा.

“बिलकुल, अगर आप ऐसा चाहती हैं तो ऐसा भी किया जा सकता है. अन्य रिसोर्ट के अतिथि तो आपको इस समय नहीं मिलेंगे, पर तरण ताल इत्यादि में अवश्य कोई न कोई मिल जायेगा.”

“कोई बात नहीं, हम उन सबसे बाद में मिल लेंगे. एक बार थोड़ा घुमा दीजिये.”

“ओके, मैम, नो प्रॉबलम।”

इसके बाद सभी अल्पाहार के लिए रेस्त्रां में चले गए.

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रेस्त्रां में प्रवेश करते ही स्मिता को मानो के झटका लगा. एक ओर श्रीमती मधु बैठी हुई थीं. और उनके साथ तीन समुदाय के लड़के बैठे थे. इनमें से एक सिद्धार्थ था जिसकी प्रशंसा उन्होंने पिछले मिलन समारोह में की थी. एक डॉक्टर रति का बेटा रवि था और एक अन्य लड़का जिसका नाम स्मिता को ध्यान नहीं था. मधुजी ने उन्हें देखा और मुस्कुरा दीं। जब सब बैठ गए तब उन्होंने स्मिता को बाहर बुलाया. बाहर एक ओर खड़े हो गए.

“मधु जी, आप यहाँ कैसे?”

“अरे जब परख ने बताया कि आप नए संभावित सदस्यों के साथ आ रही हो तो मैंने भी सोचा कि ये अच्छा समय होगा उनके पूर्वावलोकन का. अगर उनका प्रदर्शन उचित रहा तो उनके सम्मिलित होने की एक अड़चन हट जाएगी.”

“अगर वो इसके लिए सहमत हुए, तब.” स्मिता ने कहा.

“हाँ. अगर नहीं भी हुए तो कुछ मनोरंजन ही हो जायेगा. वैसे तुम्हें रति और स्वाति दोनों के बेटों के साथ समय बिताना चाहिए. सिद्धार्थ तो उत्कृष्ट है ही पर रवि और स्पर्श भी बहुत निपुण हैं चुदाई में. तो मैंने सोचा कि जब मैं तुम सबकी काम क्रीड़ा देख रही होंगी, तब अपनी भी कुछ चुदाई करवा ही लूँ.”

“आप कब चूकती हैं, बस अवसर मिलना चाहिए.” स्मिता ने हँसते हुए कहा.

“और अवसर इस आयु में भी मुझे ढूंढते हैं.” मधुजी ने इठलाते हुए बोला।

“अब मुझे ध्यान रखना होगा कि हम सबकी चुदाई का लाइव शो होगा.”

“बाद में भी देख सकती हो. परख ने इसका भी प्रबंध कर लिया है.” मधुजी ने आँख मारते हुए कहा और अंदर चली गईं।

ये समस्या खड़ी कर सकता था. इस विषय में विक्रम से बात करनी होगी. जब वो अंदर पहुँची तो जलपान लगा हुआ था.

“कौन हैं वो?” वर्षा ने पूछा.

“मेरे मित्र की माँ हैं. उनके ही बेटे का रिसोर्ट है ये.” विक्रम ने उत्तर दिया.

“ओह, बहुत वैल मैनटैनेड हैं.” वर्षा ने कहा तो स्मिता ने मन ही मन सोचा कि और उच्च कोटि की चुदक्क्ड़ भी हैं.

जलपान समाप्ति के बाद विक्रम ने उस वेटर को बुलाया जिसने उसे चाबियाँ दी थीं. वो उन्हें लेकर उनके आवास की ओर ले गया.

“परख सर ने आपके लिए अतिविशिष्ट लॉउन्ज सुरक्षित किया है. ये मात्र उनके अतिविशेष अतिथियों को ही आवंटित किया जाता है.” ये बताते हुए वो उसके साथ चल रहे थे.

“आपको आपका आवास दिखाकर मैं रिसोर्ट दिखाने के लिए ले चलूँगा. परन्तु आपको कोई चित्र या वीडियो लेने की अनुमति नहीं है. ये सामान्य आज्ञा है, अगर आप परख सर से अनुमति ले लेंगे तो कुछ चुने स्थानों पर आप खींच पाएँगे।”

“कोई बात नहीं, उसके लिए हमारे पास पर्याप्त समय है.” विक्रम ने उत्तर दिया.

जब वो उनके लॉउन्ज में पहुंचे तो प्रवेश कक्ष के बाद एक छोटा हॉल था.

“ये अन्य लोगों के आने पर मेल मिलाप के उद्देश्य से है. कृपया अपनी चाबी दीजिये। इसके आगे केवल चाबी के द्वारा ही प्रवेश किया जा सकता है. इसीलिए आपको चार चाबियाँ दी गई हैं.” ये कहकर उसने द्वार खोला और अंदर चला गया.

अंदर जाते ही सबकी ऑंखें खुली रह गयीं. ये हॉल समुदाय के मिलन वाले हॉल से लगभग चौथाई होगा. चारों ओर सोफे लगे हुए थे. बीच में एक गोलाकार वृत्त बना हुआ था. उस लड़के ने एक ओर जाकर एक रिमोट उठाया और विक्रम को थमा दिया और फुसफुसाकर बोला, "मेरे जाने के बाद देखिएगा इसका जादू, पर उस समय इस गोले के अंदर मत रहिएगा. उनका सामान एक ओर रखा हुआ था, हॉल के तीन ओर दो दो द्वार थे जो कमरों में जाते थे. महिलाओं ने जाकर कमरों का निरीक्षण किया और बाहर आने पर उनके चेहरे के भावों से संतुष्टि झलक रही थी. इसके बाद रिसोर्ट घूमने के लिए निकले और फिर एक घंटे बाद अपने आवास पर लौटे. सभी कमरों में जाने लगे तो विक्रम ने रोका.

“ये रिमोट दिया है किसी का. देखें तो क्या है?”

रिमोट में ऑन ऑफ़ के बटन थे और कुछ और भी बटन बने हुए थे. ऑन का बटन दबाने पर उस वृत्त के बीच एवं पूरी परिधि में प्रकाश हो गया. इसके बाद एक चेतावनी की घंटी बजी और उस वृत्त के पाट अंदर की ओर सिमट गए. फिर उसके बीच में से एक गोलाकार बिस्तर बाहर आया और रुक गया. बिस्तर इस प्रकार निकला था कि उसके नीचे कोई रिक्त स्थान नहीं था.

“वाओ!” सबके मुंह से निकला।

“लगता है आपके मित्र को हमारे यहाँ आने का प्रयोजन पता है.” समीर ने कौतुहल से कहा.

“हाँ. उनके साथ भी हमारे इस प्रकार के संबंध हैं और उनके पूछने पर मुझे बताना पड़ा. पर आप गोपनीयता की चिंता न करें.”

“ठीक है. तो थोड़ा विश्राम करने के बाद मिलते हैं.” ये कहकर समीर ने अपना बैग उठाया और एक कमरे में चला गया. पर्याप्त कमरे थे तो कोई समस्या नहीं थी, जहाँ जाना हो जा सकता था. कमरे भी पूर्ण रूप से सुसज्जित थे.

स्मिता ने एकांत पाते ही अपनी चिंता विक्रम को बताई. अगर मधुजी ये सारे वृत्तांत को रिकॉर्ड करने वाली थीं तो इसमें नायक और शिर्के परिवार को आपत्ति हो सकती थी. विक्रम ने बताया कि हम किसी भी परिस्थिति ने उन दोनों परिवारों को ये नहीं बता सकते हैं. और मधुजी को ये अनुरोध किया जा सकता है कि वे इसे अत्यंत सुरक्षित स्थान पर रखें और किसी के साथ साझा न करें. और अगर वो रिकॉर्डिंग न करने पर मान जाएँ तो सोने पर सुहागा होगा, केवल देखकर ही संतुष्ट हो जाएँ.

इस बात पर दोनों हंस पड़े क्योंकि मधुजी और संतुष्टि ये दोनों शब्द परस्पर विरोधी थे.

उधर वर्षा, समीर, सुलभा और पवन भी बातों में तल्लीन थे.

पवन, “मुझे पूर्ण विश्वास है कि ये परिवार दूसरे परिवारों के साथ भी इस खेल में सम्मिलित है. और सम्भवतः इस रिसोर्ट के स्वामी भी. हम सबने देखा कि रिसोर्ट स्वामी की माँ यहाँ उपस्थित है और उनके साथ तीन उनके नाती पोतों की आयु के नवयुवक भी हैं. सम्भव है कि ये एक बड़ा गुट हो हमारे ही प्रकार से पारिवारिक सम्भोग का आनंद लेता है और अन्य समान शैली वालों को भी जोड़ता है.”

समीर भी सोच रहा था, “हाँ, बाहर जो गोल बिस्तर है वो इसी की ओर संकेत करता है. तो पवन और आप दोनों. मानो हमें यहाँ लाकर हमारा परीक्षण किया जा रहा है और बाद में हमें भी उस गुट या सम्प्रदाय में जुड़ने का अवसर दिया जाये. तब हम क्या करेंगे?”

दूर रिसोर्ट के किसी अन्य कमरे में मधुजी इस वार्तालाप को बहुत ध्यान से सुन रही थीं. उन्हें अचरज था कि इस दोनों परिवारों ने इतना शीघ्र इस पहेली को सुलझा लिया था. अब अगर इनकी जाँच की रिपोर्ट ठीक आ जाये तो भला होगा.

“अभी कहना या सोचना सम्भव नहीं है. अगर ऐसा है तो वो भी बहुत सोच विचार के बाद ही हमें इसमें जोड़ेंगे. परन्तु अगर ऐसा है तो मुझे देखा जाये तो कोई आपत्ति नहीं है.” समीर ने अपने विचार रखे.

“मुझे भी.” सुलभा के ये कहने पर पवन ने उसकी ओर आश्चर्य से देखा.

“ऐसे मत देखिये. क्या बुराई है? हमारे जैसे ही होंगे न?”

पवन और वर्षा ने एक दूसरे को फिर समीर और सुलभा की ओर देखा.

“हम्म्म, ठीक है. अगर ऐसा होगा तो हमें भी स्वीकार है.”

मधुजी और उनके तीनों युवक प्रेमियों के चेहरे पर हर्ष की लहर दौड़ गई.

और मधुजी ने अपनी प्रसन्नता को दर्शाने के लिए नीचे झुकते हुए अपनी दायीं ओर बैठे लड़के, जिसका नाम विलास था, का लंड मुंह में लेकर चूसना आरम्भ कर दिया. उनकी बायीं ओर बैठे रवि ने उनकी चूत में अपनी ऊँगली को चलाने की गति बढ़ा दी और सिद्धार्थ बैठा हुआ ये सब देखता रहा.

एक दूसरे कमरे में लगभग इसी विषय में अंजलि, राहुल की बातें श्रेया और मोहन से हो रही थीं. उनकी बातों से ये अवश्य विदित हो गया था कि सुलभा और वर्षा पर मोहन और स्मिता पर राहुल आसक्त थे. वहीँ अंजलि को विक्रम और श्रेया को समीर और पवन बहुत भाये थे. एक विषय पर सबकी एक ही राय थी. वे पहले एकांत में कमरों में सम्भोग करने के इच्छुक थे न कि उस गोलाकार पलंग पर जहाँ पर सब मिलकर चुदाई कर सकते थे. अंततः किस प्रकार से आगे की क्रीड़ा चलेगी इस पर निर्णय लेने के लिए स्मिता, सुलभा और वर्षा पर ही सबको विश्वास था.

एक घंटे के विश्राम के बाद वे सब मुख्य हॉल में लौटे तो विक्रम ने सहायक को बुलाया और उसे जलपान लाने का निवेदन किया. कुछ ही समय में वो अल्पाहार इत्यादि लेकर आ गया. उसने फिर विक्रम को दो मेनू दिए. एक भोजन से संबंधित था और दूसरा मदिरा से. उसने बताया कि जो भी मदिरा उनकी रूचि की है वो उन्हें कुछ ही देर में सौंप दी जाएगी. उसके साथ उचित मात्रा में अल्पाहार, सोडा इत्यादि भी दिए जाएँगे। रात्रि का भोजन आठ बजे होगा और इसके अतिरिक्त अगर कुछ चाहिए है तो उसी समय बताना होगा. उसने एक छोटी रसोई की ओर संकेत करके बताया कि वहाँ माइक्रोवेव और फ्रिज इत्यादि है.

इसके बाद वो चला गया और सबका ध्यान दोनों मेनू पर केंद्रित हो गया. अंततः दो उच्च कोटि की व्हिस्की और उत्कृष्ट बियर का चयन किया गया. अल्पाहार में अधिक नहीं मंगाया गया और भोजन के लिए भी सबने सीमित व्यंजन ही चुने. विक्रम ने अपना निर्णय फोन पर सहायक को बता दिया. अब चर्चा आरम्भ हुई आज के कार्यक्रम की.

सबको ये विचार सही लगा कि आज की रात सभी कमरों में ही बिताएं और कल इस सामूहिक क्रीड़ाघर को उपयोग किया जाये. जैसा कि पूर्व निर्धारित था महिलाओं ने आज रात्रि के लिए जोड़ों का चयन कर लिया. सबके मन प्रसन्न थे.

रात अभी शेष थी.

क्रमशः

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अध्याय ४०: मिश्रण

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दृश्य ५: सुजाता:

“ये निश्चित है न कि तुम्हें कोई आपत्ति नहीं है?” अविरल ने सुजाता के सिर पर हाथ घुमाते हुए पूछा.

सुजाता जो इस समय सूजी डार्लिंग की भूमिका में थी उसने अपना सिर उठाया और अविरल ले पैरों के अंगूठे को अपने मुंह से निकालते हु स्वीकृति में सिर हिलाया.

“ये समझती हो न कि एक बार ये तीर कमान से निकला तो लौटेगा नहीं.” अविरल जानता था कि सूजी डार्लिंग अब किसी भी मूल्य पर उसकी बात अब नहीं टालेगी, परन्तु पूछना उसका कर्तव्य था.

“जी, जानती हूँ. पर आपके लिए मुझे ये स्वीकार है.”

अविरल समझ गया कि सुजाता जानती है कि उसकी ये इच्छा है.

“पर तुम्हारी अपनी क्या इच्छा है? वो भी तो बताओ.” अविरल ने हठ किया.

सुजाता ने एक गहरी श्वास ली.

“मुझे ये भूमिका में आनंद आ रहा है. न जाने क्यों, मुझे इस प्रकार के तिरस्कार इत्यादि से अधिकाधिक उत्तेजना होती है. इस भूमिका में जिस प्रकार से मुझे असीम संतुष्टि मिलती है, उतनी मुझे पहले कभी अनुभव नहीं हुई. तो मेरा उत्तर है, कि मुझे ये बहुत रुचिकर लग रहा है. मेहुल ने मानो मेरी कोई दबी ग्रंथि को मुक्त कर दिया. और आपने उसमें और वृद्धि कर दी. इसीलिए आगे से आपको मुझसे पूछने की आवश्यकता नहीं है. अगर आपको ठीक लगे तो बस मुझे आज्ञा दीजिये.”

“ओके. परन्तु कुछ लीलाएँ मात्र मेरे और मेहुल के लिए ही संरक्षित रहेंगी. वैसे तो अपने लिए ही उन्हें सुरक्षित रखता, पर मेहुल के योगदान के कारण उसे निषेध करना उचित नहीं है.”

“जी, जैसा आप ठीक समझें.”

इतना कहकर अविरल खड़ा हुआ और सूजी डार्लिंग उसके पीछे घुटनों पर चल पड़ी. वो जानती थी कि अब उससे क्या अपेक्षित है और उसे पूरा करने के लिए वो भी उत्साहित थी. एक माह पहले की सुजाता से आज की सूजी डार्लिंग की की तुलना नहीं थी. जहाँ पर सुजाता एक अकड़ू और स्वार्थी स्त्री थी, तो सूजी डार्लिंग के प्रारूप में वो अत्यंत डब्बू, आज्ञाकारी और निस्वार्थ महिला बन जाती थी.

बाथरूम में जाकर सूजी डार्लिंग एक स्थान पर घुटनों के बल बैठ गई. सामने अविरल खड़ा था और उसका तमतमाया हुआ लौड़ा भयावह लग रहा था. पर सूजी डार्लिंग उसे सम्मोहित दृष्टि से देख रही थी.

“ये उनमें से पहला कर्म है जो केवल मुझे और मेहुल को ही प्राप्त है. हम दोनों के सिवाय कभी भी किसी और के साथ ये क्रीड़ा वर्जित है. अगर हम भी कभी नशे इत्यादि में बोल दें तो तुम्हें मना करना होगा.”

“जी, स्वामी.” ये कहते हुए सूजी डार्लिंग ने मुंह खोल दिया और अविरल ने लंड को साधते हुए उसके मुंह में मूत्र विसर्जन करना आरम्भ किया. कुछ मुंह में डालकर फिर उसके चेहरे और वक्ष पर भी डाला. सिर एवं बालों को बचाते हुए इस कार्य को समाप्त किया.

“मेहुल का मूत्र पीने से मना कर सकती हो, चाहो तो. पर मेरा कभी नहीं.”

“जी स्वामी.”

“गुड गर्ल सूजी डार्लिंग, अब स्नान करो और जिस विषय पर हमने बात की है उसके लिए उचित वेश भूषा धारण करो. मैं कमरे से बाहर जा रहा हूँ. आधे घण्टे में आऊँ तो तुम्हें उचित अवस्था में पाऊँ। अन्यथा.....”

ये चेतावनी सुनकर सूजी डार्लिंग के शरीर में कँपकँपी हो उठी. पर वो जानती थी कि वो इस समय सीमा में कार्य सम्पन्न कर लेगी.

अविरल बाहर बैठक में जाकर सोफे पर बिठा. विवेक और स्नेहा बैठे थे.

“डैड, हम जा रहें हैं रिसोर्ट पर.?”

“अभी नहीं.”

दोनों के मुंह उतर गए.

“अभी नहीं का अर्थ कभी नहीं नहीं होता. चलेंगे. पर पहले तुम दोनों से एक विषय पर बात करनी है.”

अविरल अपने पुत्र और पुत्री को घर के नए नियम और चरित्र के बारे में समझाने लगा. दोनों हतप्रभ से उसकी बात सुन रहे थे. जब अविरल ने अपनी बात समाप्त की तो दोनों सन्न थे.

“आपका अर्थ है कि मॉम आपकी स्लेव यानि दासी के रूप में रहना चाहती हैं?’

“हाँ. और जैसा मैंने कहा उस द्वार के पीछे अर्थात हमारे कमरे में वो आज से सबके लिए सूजी डार्लिंग रहेगी, और कमरे के बाहर वो सुजाता गौड़ा हो जाएगी. उस कमरे के बाहर वो मात्र मेरे लिए ही सूजी डार्लिंग रहेगी. और एक व्यक्ति भी है जिसे ये अधिकार है, पर अभी उसका नाम उजागर करना उचित नहीं है. समय आने पर वो भी पता चल ही जायेगा.” अविरल ने उन्हें सुजाता के रूपांतरण के पीछे के रहस्य को नहीं बताया था. उसे विश्वास था कि समय के साथ इसे बताना उचित होगा. उसने समय देखा तो आधा घण्टा हो चुका था. उसने विवेक और स्नेहा की ओर देखा.

“मेरे विचार से अब तुम दोनों का सूजी डार्लिंग से मिलने का समय हो गया है. मेरे पीछे आओ. और ध्यान रहे उस द्वार के पीछे तुम्हारी माँ नहीं बल्कि सूजी डार्लिंग है और उससे उसी प्रकार से व्यवहार करना होगा. स्नेहा तुम्हारे लिए ये सरल है, तुम मेहुल से जो व्यवहार करती थीं वो भी इसके सामने क्षीण होना चाहिए.”

स्नेहा ने सिर झुकाया और फिर हिलाकर स्वीकारा.

“आओ.”

आगे बढ़ते हुए अविरल ने कमरे को खोला और अंदर प्रवेश किया. अंदर मद्धम प्रकाश था. विवेक उसके पीछे आये. उनके सामने घुटनों के बल एक महिला बैठी हुई थी. उसके गले में कुत्ते का पट्टा बंधा था जिसमें एक चेन लगी थी. उसे देखकर ये प्रतीत हो रहा था मानो उसकी पूँछ भी हो. उसका सिर झुका हुआ था.

“सूजी डार्लिंग, देखो तुम्हें मिलने कौन आया है?” अविरल ने बोला।

सूजी डार्लिंग ने सिर उठाकर देखा और स्नेहा और विवेक को देखकर उसकी आँखों में चमक आ गई. परन्तु उसने अपने मुंह से कुछ न बोला। अविरल सोफे पर जाकर बैठा और स्नेहा और विवेक को भी बैठने को कहा. वो दोनों तो अपनी माँ के इस नए स्वरूप से चकित थे और अपने पिता की बात मानते हुए सोफे पर जा बैठे.

“सूजी डार्लिंग, हम सबके पाँव बहुत गंदे हो गए हैं. क्यों नहीं तुम उधर से आरम्भ करते हुए उन्हें साफ कर दो.” अविरल ने निर्देश दिया.

सूजी डार्लिंग घुटनों के बल चलकर विवेक के पास गई और उसकी चप्पल उतार दी. फिर उनके पैरों को अपने मुंह में लेकर चाटकर साफ करने लगी. विवेक को तो समझ ही नहीं आया कि ये क्या हो रहा है. अविरल मुस्कुरा रहा था कि विवेक के मुँह से निकला, “मॉम!”

ये सुनते ही सूजी डार्लिंग ने अपने मुंह से उसके पैर को निकाल दिया. विवेक को अपनी भूल का आभास हो गया. उसने तुरंत सुधार करते हुए कहा, “सूजी डार्लिंग, मैंने तुम्हें ऐसा करने के लिए नहीं कहा. चलो, मेरे पैर साफ करो. और फिर लौटकर आना तो मेरे लंड पर भी कुछ गंदगी लगी है, उसे भी तुम्हें ह निकालना है.”

सूजी डार्लिंग की आँखों की चमक लौट आई और वो अपने कार्य में लग गई. विवेक के बाद स्नेहा और उसके उपरांत अविरल के पैरों को उसने उचित रूप ने मलयुक्त कर दिया और विवेक के निर्देशानुसार उसकी लंड को साफ करने चली गई. अविरल ने उसके इस कृत्य से संतुष्टि जताई.

“सूजी डार्लिंग, यू आर बीइंग ए गुड गर्ल.”

सूजी डार्लिंग उसकी बात सुनकर विवेक के लंड को चाटने में जुट गई.

**********************

दृश्य ६: मिशेल:

मिशेल अपने तलघर के तरणताल में बैठी अंदर देख रही थी जहाँ ईव की भयंकर चुदाई चल रही थी. पार्थ और नितिन ने ईव को दोनों ओर से सैंडविच बनाया हुआ था. पार्थ नीचे लेटे हुए ईव की चूत चोद रहा था तो नितिन उसकी गांड मार रहा था. मिशेल स्वयं इस समय अकेली बैठी हुई बियर के घूँट ले रही थी. इन दोनों युवकों से वो कुछ देर ही पहले इसी प्रकार से चुदी थी, बस लंड और छेद भिन्न थे. पार्थ के लंड ने उसकी गांड में बहुत तहलका मचाया था.

एक मुस्कान के साथ वो उस समय को स्मरण करने लगी जब वो नए वर्ष के समारोह में मंत्रीजी के रिसोर्ट में गई थी. और उनके कौटुम्बिक व्यभिचार का रहस्य पार्थ पर खुल गया था.

मिशेल का परिवार इवान के निमंत्रण पर मंत्रीजी के रिसोर्ट पर गया था.

तीस दिसंबर को रिसोर्ट पहुँचा था. नए वर्ष का समारोह कल था, परन्तु उसमे मुख्य आकर्षण क्या था, इस पर रोमांच था. शाम को सब रेस्त्रां में ही एकत्रित हुए थे. यही रिसोर्ट का मिलन बिंदु था. रेस्त्रां के ही साथ में एक विशाल हॉल (बैंक्वेट) था और वहाँ भी बैठने का प्रबंध था. देखकर लगता था कि उस स्थान का उपयोग मंत्रणा इत्यादि के लिए किया जाता था. मिशेल का परिवार वहाँ उचित समय पर पहुंच गया था. रेस्त्रां में कुल ५० लोग थे. २४ पुरुष और अन्य स्त्रियां. पुरुषों में ८ लड़के थे और १० लड़कियां थीं.

मंत्रीजी के साथ कई स्त्रियों ने आकर उन्हें लुभाने का प्रयास किया परन्तु उनकी आज की रात तो केके के साथ निर्धारित थी. मंत्रीजी के लंड के आकार को देखकर उन स्त्रियों का दुखी होना उचित ही लगता था. नगर के प्रसिद्ध व्यवसाई पारस जी मंत्रीजी की ही टेबल पर बैठे थे. उनकी पत्नी सुधा उनके साथ थी. उनके पुत्र, बहू, पुत्री और दामाद अन्य स्थान पर बैठे हुए थे जहाँ उनकी आयु के चार अन्य लोग भी थे.

मिशेल और उनका परिवार इस पूरे वातावरण को अचरज से देख रहा था. इवान उनके पास आकर उन्हें अन्य अतिथियों से मिलवाने ले जाता था और कुछ अतिथि स्वयं भी उनके पास आते थे. उनका अफ़्रीकी रंग रूप भी एक आकर्षण था. पुरुषों के लौड़े देखकर महिलाएं उनसे संसर्ग के लिए उद्यत थीं तो पुरुष इन स्त्रियों को भोगने को आतुर.

सब कुछ शांति के वातावरण में चल रहा था और सब अपने प्रिय पेय पीते हुए एक दूसरे से बातें कर रहे थे. कहीं कहीं बीच में कुछ चुंबनों का आदान प्रदान हो जाता था. परन्तु अधिकांश मेजों पर नग्नता के पश्चात भी कोई फूहड़ता इत्यादि का प्रदर्शन नहीं हो रहा था.

इस वातावरण में अशांति का प्रवेश हुआ. और ये कोई अल्पायु का बालक या बालिका नहीं थी. ये एक आदेश आयु की स्त्री थी जिन्हें लेकर क्लब के ही दो सहायक आये थे. वो आकर सबसे पहले सुधा के पास गयीं और उन्हें अपनी चूत से बहता हुआ रस दिखाया. फिर एक ऊँगली निकालकर सुधा के होंठों पर मल दिया. सुधा ने निःसंकोच उसे चाट लिया.

“कैसा है?” महिला ने पूछा.

“मस्त है माँ जी. जहाँ से निकला है उसका भी अमृत मिला हुआ है.” सुधा ने चाटुकारिता से उत्तर दिया.

उस महिला ने मुस्कुराते हुए पारस जी से कहा, “मैं कहती हूँ न, मैंने बहू लाखों में एक ढूँढी है तेरे लिए.”

अब डिसूज़ा परिवार को समझ आया कि ये स्त्री पारसजी की माँ हैं.

“अब तुम कहती हो तो मान लेता हूँ.” पारसजी ने हँसते हुए उत्तर दिया.

“वैसे गांड में भी है माल अगर चखना है तो.” उस महिला ने सुधा से पूछा.

“नहीं माँ जी, अभी नहीं.”

“आंटीजी प्रणाम!” मंत्रीजी की ध्वनि ने उनका ध्यान खींचा.

“अरे ये देखो कौन बैठा है, बॉबी तुझे तो मैंने देखा ही नहीं और शिखा! हाय कितनी सुंदर लग रही है.”

मंत्रीजी बोले, “अरे अपनी बहू से ध्यान हटे तो कोई दिखे. कैसी हो आंटीजी?” वो खड़े हो गए.

वो महिला मंत्रीजी के सीने से लग गई.

“अच्छी हूँ. बस तू क्यों नहीं याद करता अब? बूढ़ी हो गयी इसीलिए न?”

“नहीं नहीं. आप तो जानती हो. कितनी व्यस्तता रहती है. आप मेरे लिए कभी बूढ़ी नहीं हो सकतीं. आप तो मेरा पहला प्रेम हो.”

“चल दुष्ट, मक्खन लगा रहा है. अच्छा सुन अब मिल ही गया है तो.” उन्होंने मंत्रीजी के मोटे भारी लौड़े को हाथ में लेकर बोला, “अब आज की रात मैं तेरे ही साथ रहूंगी.”

मंत्रीजी दुविधा में पड़ गए. कहाँ आज उनका शयन और चुदाई केके के साथ थी और कहाँ आंटीजी ने अपना अधिकार जता दिया. उन्होंने शिखा की ओर देखा तो वो समझ गयी. उसने बात संभाली.

“आंटीजी, ठीक है. पर एक ही स्थिति में आज रात ऐसा हो सकता है.”

“कैसी?”

“आप कल शाम के कार्यक्रम के पहले हमारे बंगले से बाहर नहीं आ सकतीं. आप हमारे साथ ही आ पाएंगी.”

“और मैं पूरे दिन करुँगी क्या मेमसाब?”

“जो मन हो. चुदाई या विश्राम.”

“बॉबी से?”

“इसका मैं विश्वास नहीं दिला सकती, पर आपको लौडों की कमी नहीं होगी.” ये कहते हुए शिखा ने अपने पति मंत्रीजी को देखा. मंत्रीजी अपनी पत्नी के खेल को समझ गए.

“मैं तो रहूँगा ही आंटीजी.”

“फिर ठीक है. कब चलना है?”

“जब सब जाने लगेंगे तब.”

आंटीजी समझ गयीं कि इससे अधिक इस विषय में बात करने से कुछ न मिलेगा. वो शांति से सुधा के पास जा बैठीं और अपने लिए पेग मंगा लिया.

अपने स्तनों पर किसी के हाथों के स्पर्श के आभास से मिशेल की तंद्रा टूटी. देखा तो डेविड था जो उसे जगा रहा था.

“व्हाट हप्पेनेड मॉम, स्लेप्ट? (क्या हुआ माँ, सो गयी थीं?)”

“ओह नो. मैं न्यू ईयर वाले रिसोर्ट के बारे में सोच रही थी. वी हैड सो मच फन.”

“याह, इट वास ग्रेट. मामी इस गेटिंग फक्ड वेल नाउ.” डेविड ने कहा तो मिशेल ने अंदर झाँका जहाँ ईव की चुदाई में कोई कमी नहीं आई थी.”

“जाओ तुम भी चले जाओ. उसका मुंह अभी खाली है.”

“यू आर राइट. ओके. आता हूँ.” ये कहते हुए डेविड ने कपड़े उतार फेंके, “पर मॉम, आप अधिक देर तक अकेले नहीं रहने वाली. मार्क और डैड भी आ चुके हैं पर अभी ऊपर हैं. मामा भी आने ही वाले होने इसीलिए रुके हैं.”

“ओह! गुड. आई वांट टू गेट फक्ड अगेन!” ये कहते हुए मिशेल ने बियर का एक घूँट लिया और डेविड को जाते हुए देखने लगी. और कुछ ही पलों में ईव के सामने जा खड़ा हुआ. ईव ने अपने सामने एक और लौड़ा देखा और बिना आपत्ति के मुंह में ले लिया.

क्रमशः

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अध्याय ४१ : मिश्रण ४

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दृश्य ७: सुरेखा:

सुरेखा सोफे पर बैठी गर्व से अपने पुत्र सजल को अपनी माँ की सेवा करते हुए देख रही थी. आज अचानक शीला ही उनके घर पर आ गई थी. वो ये अनुरोध लेकर आई थी कि शीघ्रतिशीघ्र सुरेखा सपरिवार उनके संभ्रांत नगर के बंगले में चले आएँ. इससे उनके क्रूस पर जाने के पहले सभी मिलकर रह लेंगे। उनके जाने में अब अधिक समय शेष न था. सुरेखा उनका गुप्त मंतव्य भी समझ रही थी. उसके माता पिता को सम्भवतः ये डर था कि कहीं सजल ही संजना का कौमार्य भंग न कर बैठे. अब जब संजना को यौन सुख मिल गया था वो अधिक समय तक कली बनकर नहीं रहना चाहती थी.

सुरेखा ने अपनी माँ को समझाया, “मॉम , कौमार्य की भेंट तो संजना अपने नाना को ही देगी, परन्तु गांड मारने का पहला अवसर सजल को ही मिलेगा.”

शीला अपनी बेटी की भावना को समझती थी परन्तु इसके बाद जो सुरेखा ने कहा उसे सुनकर सभी चौंक गए.

“हालाँकि अब इस प्रकार की जीवन शैली अपनाने के बाद इसका सबसे उचित प्रत्याशी उसके पिता नागेश ही हैं. परन्तु अब न जाने वो हमारे जीवन में लौटना भी चाहेंगे या नहीं.”

सबको पता था कि नागेश किस जाल में फंसकर उन सबसे दूर हुआ था. उसका सुरेखा से सम्भोग न करना वस्तुतः उसको किसी भो रोग से बचाना था. और इसका पूरा मूल्य केवल उसने ही चुकाया था. अन्य सभी सुख से जीवन व्यतीत कर रहे थे, बस यही अकेला था.

“मुझे पता है डैड कहाँ रहते हैं.” संजना बोली. “मेरी उनसे बात होती रहती है.”

ये सबके लिए सुखद आश्चर्य था।

“वो भी हम सबको बहुत मिस करते हैं. मॉम, क्या डैड हमारे साथ आकर रह सकते हैं?”

ये बहुत बड़ा प्रश्न था और इसके लिए पूरे परिवार की स्वीकृति आवश्यक थी. आज रात ही इसका उत्तर ढूँढना होगा. परन्तु अगर शीला आई थी तो कुछ लेकर ही वाली थी, और इसके लिए सजल भी उद्द्यत था. और इसका प्रमाण देने में वो कोई भी कमी नहीं कर रहा था. शीला की चुदाई के लिए उपयुक्त परिश्रम करने में उसे कोई संकोच न था. नानी नाती एक दूसरे को सुख देने में व्यस्त हुए तो संजना अपनी माँ के सामने बैठी और फिर उसके निचले वस्त्र को हटाकर उसकी चूत चाटने लगी. सुरेखा इस आनंद को भोगते हुए अपनी माँ को अपने बेटे से चुदते देख रही थी. संजना के कोमल बालों में उसकी उँगलियाँ प्रेम से घूम रही थीं.

इन सबके साथ उसे अपने पूर्व पति का भी स्मरण हो रहा था. उसे अपने पिता पर भी कुछ आक्रोश था जिन्होंने समस्या की जड़ देखे बिना ही उसका तलाक करवा दिया था. आज संजना के कथन ने उसके चेतन को झकझोर दिया था. बच्चों के लिए वो अपने पति से पुनर्मिलन के लिए सहमत थी. और सम्भवतः अपने लिए भी.

संजना को अपने पिता से अथाह प्रेम था और नागेश भी संजना पर न्यौछावर था. इसीलिए अगर वो दोनों सम्पर्क में थे तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए था. उसे अपने ऊपर भी ग्लानि हुई और संजना के अनुरोध को पूरा करने का निश्चय किया. अपने माता पिता के क्रूस पर जाने के बाद वो नागेश से बात करके उससे पूछेगी कि क्या वो घर लौटना चाहता है?

सजल और शीला की चुदाई समापन पर थी. अपने विचारों में डूबी होने के कारण संजना के अथक परिश्रम का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा था. संजना ने हार कर उसकी ओर देखा तो सुरेखा की दूर देखती आँखों को देखकर वो जान गई कि उसकी माँ भी उसके पिता के ही विषय में विचारमग्न है. उसे इससे संतुष्टि मिली कि उसकी प्रार्थना स्वीकार होने की संभावना है.

सजल ने अपना कार्य सम्पन्न कर लिया था और अपने लंड से रस शीला के मुंह में उढ़ेल रहा था. शीला ने रस पीने के पश्चात सजल के लंड को चाटकर साफ किया. शीला ने उठकर अपने कपड़े पहने और सामान्य रूप से बैठी.

“तो?”

“अभी साथ चलते हैं. बाकि वस्त्र इत्यादि बाद में ले जायेंगे.” सुरेखा ने कहा तो सबके चेहरे खिल उठे.

“अच्छा है. सुप्रिया भी आज से वहीँ रहने वाली है.” शीला ने कहा, “ले आओ जो लेकर चलना है.”

सुरेखा, संजना और सजल अपने बैग बांधने चले गए. शीला ने समर्थ को फोन किया और संजना और नागेश वाली बात बताई. समर्थ भी सन्न रह गया. उसे भी अपनी भूल का आभास हुआ कि उसने इतना त्वरित कार्यवाई की कि नागेश के पक्ष को समझने का भी प्रयास नहीं किया. उसने कहा कि हम आज ही इसका उपाय खोजेंगे.

आधे घंटे में अपने बैग लेकर तीनों आ गए और समर्थ के घर के लिए निकल गए. वहाँ पर संस्र्थ ने आज उनका स्वागत भिन्न रूप से किया. उसे अपने किये पर प्रायश्चित था. पर आगे क्या करना था? कई बिंदुओं पर विचार हुआ पर सुप्रिया की प्रतीक्षा में निर्णय नहीं लिया गया. सुप्रिया एक घंटे बाद आई और देखकर समझ गई कि स्थिति तनावपूर्ण है. समर्थ और सुरेखा ने उसे पूरी बात समझाई।

सुरेखा बोली, “मैं किस मुंह से जाऊँ उनके पास? मैं तो क्षमा के भी योग्य नहीं हूँ.”

सुप्रिया: “ऐसा नहीं है. पर क्यों न मैं और पापा जाएँ. साथ में संजना को भी ले जाएँगे अन्यथा नागेश हमें दौड़ा सकता है.”

संजना का चेहरा खिल गया.

सुप्रिया ने आगे बोला, “परन्तु संजना को अंतिम अस्त्र के ही रूप में उपयोग किया जायेगा. हाँ, बात पूरी होने पर संजना अवश्य उनसे मिल सकती है.”

“मैं भी जाऊँगा।” सजल ने कहा. सब उसकी ओर देखने लगे.

“आप क्या सोचते हो, केवल संजना ही पापा को प्यार करती है? मैं भी उतना ही करता हूँ. और मैं भी जाऊँगा उनसे क्षमा माँगने।”

“ठीक है. तो शनिवार को चलेंगे.” समर्थ ने कहा तो सुरेखा की आँखों से आँसू बह निकले.

शनिवार:

शनिवार को सिंह परिवार में एक कौतुहल का वातावरण था. किसी को नहीं पता था कि नागेश कैसे प्रतिक्रिया करेगा. समर्थ ने नागेश के घर का पता लगा लिया था. वो अभी उसी घर में था जहाँ सुरेखा उससे अंतिम बार मिलने गई थी. सुबह दस बजे घर से निकलकर वे उस अपार्टमेंट में पहुँचे जहाँ उसका निवास था. संजना और सजल कार में ही बैठे रहे. समर्थ और सुप्रिया साहस करके अंदर गए और नागेश के फ्लैट की घंटी बजाई। समर्थ पीछे हो गया. कुछ समय में द्वार खुला.

“अरे सुप्रिया दी! आप? यहाँ?” नागेश ने ये कहा ही था कि समर्थ भी आगे आ गया.

“बाबूजी? आप भी?” अचानक उसके चेहरे पर भय दिखा, “क्या हुआ? संजू ठीक है न? सजल? सुरेखा, क्या हुआ उनको?” वो घबरा गया.

“सब ठीक हैं. पर क्या हम अंदर आ सकते हैं. वहीँ बात करते हैं.”

ये सुनकर कि सब ठीक हैं नागेश के चेहरे से तनाव दूर हो गया और वो एक ओर हो गया और संस्र्थ और सुप्रिया अंदर चले गए. घर साधारण रूप से सजा था, एक एकल पुरुष के घर समान. परन्तु साफ सुथरा था. नागेश ने उन्हें बैठाया और पानी लेकर टेबल पर रखा. अब तक सब असहज थे.

अंत में सुप्रिया ने ही चुप्पी तोड़ी. “हम क्षमा मांगने आये हैं.”

“किसलिए?” नागेश ने पूछा तो समर्थ और सुप्रिया एक दूसरे को देखने लगे.

समर्थ, “तुम्हारे और सुरेखा के तलाक के लिए. इसमें मेरी भूल थी. बिना ये जाने समझे कि तुम किस दबाव में वो सब कर रहे थे हमनें सुरेखा को तुमसे तलाक लेने का सुझाव दिया था.”

नागेश कुछ देर सोचता रहा. उसकी आँखें नम हो गयीं.

“मैं आपको दोषी नहीं मानता, न सुरेखा को. समय और परिस्थितियाँ अवश्य दोषी हैं. पर अब इस विषय में दुखी होने का कोई अर्थ नहीं है. अब हमारी राह पृथक हो चुकी हैं.”

“वो फिर जुड़ सकती हैं.” सुप्रिया ने तपाक से बोला तो नागेश चौंक गया.

“हाँ, नागेश. हम चाहते हैं कि तुम घर लौट चलो. बच्चे भी यही चाहते हैं और सुरेखा भी. हम सबको क्षमा करो और लौट चलो. पुनर्विवाह करके सुख से रहो.” सुप्रिया तो मानो अवसर देख रही थी, उसने दो वाक्यों में ही अपनी बात कह दी.

“मुझे सुरेखा और बच्चों से ये सुनना है. परन्तु मुझे अभी समय लगेगा. सोमवार को मैं दो महीने के लिए बाहर जा रहा हूँ. एक नई फैक्टरी को आरम्भ करना है. अगर सब ठीक रहा तो लौटने के बाद इस पर विचार करूँगा।”

“बच्चे तो कार में ही हैं, अभी बुलाती हूँ. और पापा आप निखिल या नितिन को कहो वो सुरेखा को ले आयें अभी.”

“वो नहीं हैं. हम चलते हैं. नागेश भी बच्चों के साथ समय बिता सकेगा.”

सुप्रिया के फोन के कारण संजना और सजल आ गए. वो नागेश के सीने से लग गए. संजना का रोना तो स्वाभाविक था पर सजल को रोता देख समर्थ का मन चीत्कार उठा. न जाने क्यों, वो आगे बढ़ा और नागेश के पैरों को पकड़कर बैठ गया.

“मुझे क्षमा कर दो, बेटा।”

नागेश भी भावुक था, उसने समर्थ को उठाया और उन्हें भी गले से लगा लिया.

“सब ठीक है बाबूजी. आप जाइये और मेरी सुरेखा को ले आइये. और इन दोनों को मेरे साथ छोड़ने के लिए धन्यवाद.”

कुछ और भावनात्मक पलों के बाद सुप्रिया और समर्थ चले गए. सुप्रिया की आँखों में आँसू थे. उसे अचानक ही अपने अकेले होने का आभास हुआ और एक पति की कमी का अनुभव हुआ. सुरेखा को समर्थ ने नागेश के पास छोड़ा तो कुछ देर और अश्रु-मिश्रित मिलन हुआ. फिर शनैः शनैः एक सामान्यता आ गई और मानो वो परिवार अपने पूर्व की स्थिति में आ गया.

दृश्य ८: अन्य स्थानों पर:

जहाँ एक ओर मेहुल और पार्थ रूचि मैडम के घर व्यस्त हैं. वहीँ मेहुल के लिए व्यस्तता और बढ़ गई है. इसके तीन कारण थे. एक इस माह के समुदाय मिलन में उसका उद्घाटन होना था. दूसरा दिंची क्लब में भी विशेष मासिक पार्टी रखी गई थी. और तीसरा उसे अपने और नायक परिवार के साथ प्राइवेट पार्टी के लिए रिसोर्ट जाना था. और इस कारण उसका अपने घर में महक और स्नेहा की चुदाई का कार्यक्रम पिछले दो ही दिनों में सम्पन्न करना पड़ा था.

पार्थ भी दिंची क्लब की पार्टी के कारण अब व्यस्त होने वाला था. वहीं उसकी माँ और प्रकाश का मिलन भी एक बड़ी चुनौती और कार्य था.

शीला और समर्थ अपने क्रूज़ पर जाने के लिए उत्सुक थे और सुरेखा के कारण एक नया मोड़ आ गया था.

पटेल परिवार भी प्रकाश के विवाह की योजना में लगा हुआ था और आशा कर रहा था कि इसमें सफलता मिलेगी. वर्तमान के संकेत बहुत प्रोत्साहन बढ़ाने वाले थे, परन्तु इन्हें अंतिम परिणीति तक पहुंचाना भी आवश्यक था. डिसूजा परिवार का अब तक सिंह परिवार से पूर्ण मिलन नहीं हुआ था. इसमें कुछ और समय लगने की आशंका थी. बजाज और राणा परिवार का मिलन अब निश्चित था. पर एक ही समस्या थी. बजाज परिवार के समुदाय में सम्मिलित हुए बिना शालिनी और जीवन एक नहीं हो सकते थे.

इसके अतिरिक्त केके के जीवन में एक नया मोड़ आने वाला था. सचिन ने भी एक नयी सदस्या के लिए पार्थ से बात की थी जिसके साथ उसने दो रात पहले ही ये सुझाव दिया था. और उसे कुछ नए और विस्फोटक तथ्य भी पता चले थे.

क्रमशः

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अध्याय ४२: मिश्रण

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दृश्य २: जीवन के गाँव में शालिनी:

कुछ ही देर में द्वार पर किसी ने खटखटाया और बिना प्रतीक्षा किये हुए खोलकर खड़ा हो गया.

“क्या मैं अंदर आ सकता हूँ?”

शालिनी खिलखिलाई, “अवश्य, जितना चाहें और जहाँ चाहें.”

ये सुनकर जीवन के चेहरे पर मुस्कान आ गई. उसने द्वार बंद किया तो उसके दूसरी ओर से कुछ स्त्रियों की दबी हंसी की ध्वनि और दब गई.

*********

पसीने से लथपथ दोनों गहरी साँसे ले रहे थे. जीवन के कमरे में आने के कुछ ही पलों में दोनों के होंठ मिले थे और चुदाई का संग्राम आरम्भ हो गया था. कामाग्नि की ज्वाला इतनी प्रचंड थी कि न लौड़ा ही चूसा गया और न चूत ही चाटी गई. बस सीधा आक्रमण हुआ. ये द्वन्द लगभग पंद्रह मिनट चला और शालिनी जीवन की इस आयु में भी क्षमता से प्रभावित हुए बिना न रह सकी। अब दोनों हाँफते हुए सीधे लेटे पंखे को ताक रहे थे. दोनों शांत थे, मानो स्वरों की आवश्यकता ही समाप्त हो चुकी हो.

“मैंने ऐसा कभी अनुभव नहीं किया.” शालिनी ने धीरे से कहा.

“हाँ, मेरी पत्नी के जाने के बाद तो कभी नहीं.” जीवन ने उत्तर दिया.

“मेरा यही कहना था, पर उनकी स्मृति को धूमिल नहीं करना चाहती.”

“वो सम्भव नहीं. पर आज वो दोनों नहीं हैं और हम अब भी यहीं हैं. क्या पता दोनों हमें ऊपर से देख रहे हों.” जीवन ने कहा, “और हमारे लिए प्रसन्न हों.”

“क्या जाने.” शालिनी बोली फिर शांत हो गई.

कुछ देर की शांति के बाद शालिनी ने ही उसे तोड़ा, “आपके मित्र क्या कर रहे होंगे?”

जीवन ने गहरी श्वास लेते हुए कहा, “आप सम्भवतः अनुमान लगा चुकी हैं. तो पूछना क्यों?”

शालिनी ने उसके लंड को हाथ में लेकर कहा, “आपके पोते भी हैं, इसीलिए मुझे कुछ उत्कंठा है.”

जीवन उसका तात्पर्य समझ गया.

“आप जानना चाहती हो न कि क्या चल रहा है? अगर विस्मित और क्रोधित न हों तो चलिए आपको उनसे मिलवा देता हूँ. वैसे उन्हें विश्वास है कि आप उनसे मिलने आओगी।”

“ओह!” शालिनी के मुंह से निकला, “तो चलिए.”

“एक बात पूछनी है, अगर आपको बुरा न लगे तो.” शालिनी ने कहा.

जीवन ने उसकी आँखों में झाँका और समझ गया कि प्रश्न क्या है. एक गहरी श्वास लेते हुए उसने पूछा, “मेरे पोते, मेरे मित्रों और उनकी पत्नियों के संबंध में?”

शालिनी ने स्वीकृति में सिर हिलाया.

जीवन, “मैं और मेरे मित्र हम सब साथ खेले और बड़े हुए. और हमारी पत्नियाँ भी इसी गाओं की हैं, वो हमसे दो तीन वर्ष छोटी थीं. हम चारों के सेक्स केपहले अनुभव भी लगभग एक ही साथ हुए थे. फिर कुछ समय बीता और विवाह हुए. हम मित्रों ने एक वचन लिया था कि सब मिलकर ही रहेंगे जीवन पर्यन्त. मिल कर रहने का जो अर्थ बना वो आरम्भ के अर्थ से भिन्न था, परन्तु हम सब मदिरा के नशे में एक दूसरे की पत्नियों के साथ चुदाई करने लगे. फिर ये एक सामान्य बात ही बन गई.”

“बलवंत का घर सबसे बड़ा था तो यही हमारे सामूहिक सम्भोग का केंद्र बन गया. आज भी है.”

शालिनी सुन रही थी एक ऐसा कथानक जो उसके लिए अप्रतिम था.

“बच्चे हुए, वो सब भी साथ ही खेले. पर अब तक गाँव में स्कूल पहले से अच्छा हो चला था. हमारे खेतों से कुछ अच्छी आय हुई तो हमने उन्हें नगर के स्कूल भेजना आरम्भ किया. इसमें हमारे यहाँ के विधायक ने भी बहुत योगदान किया. एक बस उन्हें स्कूल के लिए दे दी. पुरानी थी, पर हमारे लिए बी एम डब्लू से कम न थी. बच्चे पढ़ने में अच्छे थे तो समय आने पर उन्हें कॉलेज में भी प्रवेश मिल गया. छात्रवृत्ति के कारण व्यय कम ही रहा. कहीं कम पड़ता तो चारों किसी प्रकार से आयोजन कर लेते. आशीष इंजीनयरिंग के बाद नौकरी में लगा और अन्य सबके बेटे और बेटियां भी नगर में ही कार्यरत हो गए.”

“पर उसके पहले एक घटना घटी. एक रात वो सब बिना पूर्व समाचार के घर आ गए. हम सब बलवंत के घर में ही थे. तो सब ढूँढ़ते हुए वहीँ पहुंचे. हम नहीं जानते थे कि हमारे बच्चे भी हमारे ही समान उन्मुक्त सेक्स जीवन बिता रहे थे. हालाँकि सुनीति अधिकतर आशीष के ही साथ रहती थी, परन्तु अन्य के साथ भी दोनों संसर्ग करते थे. उस रात एक नया अध्याय आरम्भ हुआ. और उस रात्रि की घटनाओं का अंत उन सबके नगर लौटने तक चला. हम सबका एक नया जीवन आरम्भ हो गया था. विधि का विधान भी देखो. हम सबको एक ही संतान का सुख मिला. और दो लड़के हुए तो दो लड़कियाँ। आशीष और सुनीति का विवाह हुआ और उधर उदय और सुरभि का. हम मित्रों से संबंधी बन गए.”

“और अब आपके प्रश्न का उत्तर. आज पोते पोती या नाती नातिन भी हमारे साथ चुदाई करते हैं. असीम और कुमार इसी प्रयोजन से आये हैं. वैसे गीता को निराशा होगी, पर वो अपनी अन्य तीनों नानियों को चोदने हेतु ही आये हैं.”

शालिनी ने कहा, “एक बात कहूँ?”

जीवन ने सिर हिलाया. उसे विश्वास था कि जिस संबंध को वो आगे बढ़ाना चाहता था उसका विच्छेद हो चुका है.

“मैं इतनी तो स्वतंत्र नहीं रही, पर अजीत के साथ मैं चुदाई करती रही हूँ. उसके विवाह के बाद रुक गई थी. पर यहाँ आने के बाद अभी कुछ ही दिनों से फिर आरम्भ कर दी है. और इस बार गौतम और अदिति से भी चुदवा चुकी हूँ. तो मैं भी कोई पवित्रा नहीं हूँ. अब चलिए आपके मित्रों को अधिक प्रतीक्षा करना ठीक नहीं है.”

जीवन के चेहरे से तनाव दूर होने का संकेत मिला. वो तपाक से उठा और अपनी लुंगी पहन ली. फिर उसने शालिनी को देखा जो अपना गाउन पहन रही थी.

“इसकी आवश्यकता नहीं है, बस चादर बांध लीजिये वहाँ तक पहुंचने के लिए.”

शालिनी ने वैसा ही किया और दोनों सामूहिक चुदाई के ओलिंपिक में भाग लेने के लिए चल दिए.

दोनों चलते हुए उस हॉल के बाहर पहुंचे जहाँ अन्य सब जमा थे. शालिनी के ह्रदय की गति बढ़ती जा रही थी. उत्सुकता और उत्तेजना से उसका शरीर और मन दोनों काँप रहे थे. हॉल पहुंचने को ही थे परन्तु उसके कुछ ही पहले जीवन ने शालिनी के कंधे पर हाथ रखा और उसे रोका. और उसके सामने आ खड़े हुए. शालिनी का कम्पन और बढ़ गया.

“आपकी बातों से लगता है कि आपका अनुभव सीमित है. इस कारण सम्भव है कि जो आप देखें आपके लिए कुत्सित और घ्रणित हो. पर हमारे लिए ये एक सामान्य गतिविधि है. अगर विचलित हो जाएँ तो बताना, हम कमरे में लौट चलेंगे. अकेले मत जाइएगा. पर मैं चाहूँगा कि आप इस सब आसनों और सम्मिश्रणों से भी अवगत हो जाएँ. संभोगऔर जीवन का अपार आनंद इनमें ही निहित है.”

अब शालिनी की उत्तेजना कई गुना बढ़ गई. उसे विश्वास हो चला था कि अंदर चल रही गतिविधि अत्यंत भिन्न होने वाली है. जीवन ने द्वार खोला और शालिनी ने अंदर झाँका और उसकी शंका का निवारण हो गया.

अंदर का दृश्य उसकी कल्पना से परे था. असीम और कुमार के बीच में बबिता पिस रही थी. असीम नीचे से उसकी चूत में लंड पेल रहा था तो कुमार के लम्बे मोटे लंड का आवागमन उसकी गांड में होता हुआ दिखाई दे रहा था. उधर बबिता और पूनम के पति गीता पर इसी प्रकार से चढ़े हुए थे. जस्सी गीता के नीचे था तो कँवल उसकी गांड मार रहा था. पूनम और निर्मला की चुदाई सुशील और बलवंत कर रहे थे. उनके समूह को शालिनी इतना दूर से साफ नहीं देख पा रही थी. चुदाई की गूँज कमरे से अब बाहर निकल पड़ी और थप थप ने उसमें एक और ताल जोड़ दी. 123

“आह!”,

“ओह!”

“मर गई, रे !”

“उह नानी!”

इस प्रकार की विभिन्न ध्वनियोँ ने शालिनी का मन झकझोर दिया. सच में उसने जो अब तक चुदाई की थी वो इसके सामने क्षीण थी. उसकी चूत ने पानी छोड़ा ही था कि शीतल पवन ने उसके शरीर पर प्रहार किया. उसे सामने चल रही चुदाई की गति में कुछ शिथिलता का आभास हुआ. उसने देखा कि अब सब आँखें उसे ही देख रही हैं. चुदाई इस प्रकार के आसन में हो रही थी कि लगभग सभी का मुंह उनकी ओर था. उसे ये भी आभास हुआ कि उसके शरीर पर पवन का झोंका इसीलिए अनुभव हुआ था क्योंकि पवन ने बहुत चतुराई से उसके चादर को निकाल दिया था और वो अब उन सबके सामने नितांत नँगी ही खड़ी थी.

पल भर की शर्म और संकोच के बाद उसने पवन को देखा जिनकी लुँगी न जाने कहाँ खो गई थी और लंड पूर्ण रूप से तना हुआ था.

“आज शालिनी जी भी हमारे इस खेल में सम्मिलित होना चाहती हैं, तो क्या आप सब उनका स्वागत नहीं करोगे?”

शालिनी का मन भर आया. और उसकी आँखों के आंसुओं ने उसकी दृष्टि बाधित कर दी. जब आँखों से आँसू हटे तो उसके सामने जीवन के मित्र और परिवार खड़े उसे देख रहे थे. डबडबाई आँखों से उसने उन्हें देखा तो उनके चेहरे पर चिंता की चिन्ह थे. ऑंखें पोंछते हुए उसने मुस्कुराने का प्रयास किया. सहसा चार कोमल बाँहों ने उसे समेट लिया.

“बस बस, दीदी, अब रोना का कोई कारण नहीं है. आओ और हम सबके साथ आनंद उठाओ. जीवन जितना भी है, उसे अपने ढंग से जियो.” निर्मला ने उसे समझाया.

शालिनी ने रुंधे स्वर में उत्तर दिया, “मैं रो थोड़े ही रही हूँ. मैं तो समझ रही थी कि मैं ही पापिन हूँ जो अपने बेटे और उसके परिवार के साथ चुदाई करती हूँ. पर आप सबको देखकर मुझे अब स्वयं से घृणा नहीं रही है. मई भी आपके ही समान जीवन का जीवन के साथ आनंद उठाना चाहती हूँ.”

जीवन ने अपने नाम का ये द्विअर्थी प्रयोग सुना तो अट्ठास लगाने लगा.

फिर बोला, “अब ये आपका दायित्व है कि इन्हें हर आनंद से परिचित कराएं. बस एक अनुरोध है.”

निर्मला ने छेड़ते हुए कहा, “अब बोल भी दीजिये भाईसाहब कि इनकी गांड सबसे पहले आप ही मारेंगे!” फिर शालिनी को देखते हुए बोली, “हम सबकी गांड का उद्घाटन हमारे पतियों ने नहीं किया था. तो अगर आप इस संबंध को आगे बढ़ाना चाहती हो तो इन्हें गांड मारने से वंचित करना होगा और हमारे पतियों में से किसी एक को चुनना होगा. बोलो दीदी?”

शालिनी सोच में पड़ गई. फिर बलवंत की ओर देखते हुए बोली, “इन्हें अवसर देना चाहूँगी।”

जीवन के मुंह से निकला, “क्या यार!”

“पर आप दूसरे होंगे, ये वचन है.”

अन्य सभी पुरुषों ने एक दुखद आह भरी, तो कमरे में हंसी गूँज उठी. असीम और कुमार भी आगे आये और बोले, “आंटीजी, हमें मत भूलना.”

“अरे नहीं मेरे पड़ोस के नटखट बच्चों, तुम्हें तो मैं भरपूर अवसर दूँगी।”

वातावरण अब बहुत सामान्य और हल्का हो गया था, पूर्व चल रही चुदाई को बीच में छोड़ने का दुःख किसी को भी न था. निर्मला और गीता कुछ बात कर रही थीं और उन्होंने शीघ्र ही अपना निर्णय सुना दिया. उन्होंने विचार किया कि इस समय किसी अन्य जोड़ी से छेड़ना ठीक नहीं होगा. केवल बलवंत शालिनी के साथ हो जाये और जीवन निर्मला के साथ तो सब सही रहेगा. किसी को इसमें कोई आपत्ति भी नहीं थी. और बलवंत शालिनी की ओर बढ़ा तो उसने जीवन की ओर देखा. जीवन मुस्कुराया और निर्मला को अपनी बाँहों में लेकर चूमने लगा.

उसका संकेत यही था कि मैं भी उन्मुक्त हूँ, तो उस पर भी कोई बंधन न था. और बलवंत ने उसे अपनी बाँहों में समेटा और चूमने लगा. बलवंत का शरीर जीवन से अधिक सुगठित था. प्रतिदिन का खेतों का व्यायाम उसे शक्तिशाली बना चुका था. शालिनी ने चोरी से देखा तो अन्य दोनों मित्र भी इसी श्रेणी में थे. जीवन के नगर निवास ने उसे कुछ सीमा तक उन सब से कम कर दिया था. उसने स्वयं को मन ही मन झिड़का और बलवंत के बलशाली सीने में समा गई.

शालिनी अन्य सभी की उपस्थिति से मानो अनिभिज्ञ थी. अपने जीवन में पहली बार इस प्रकार के वातावरण में आई थी और कुछ ही पलों में मानो उसमें मिल गई थी. उसे इस बात का अनुमान नहीं था कि उसके आने के समय से जिस प्रकार की बातें इत्यादि हो रही थीं वो उसे इसके लिए इच्छुक बना रहे थे. जीवन उसके प्रति आकृष्ट था परन्तु वो अपनी जीवनशैली को परिवर्तित भी नहीं करना चाहता था. और इसके लिए शालिनी की स्वीकृति और जुड़ाव नितांत आवश्यक था.

कुमार और असीम ने फिर से बबिता को पकड़ लिया था और बबिता उनसे बचने का स्वांग कर रही थी. कुमार ने उसकी कमर में हाथ डाला और अपने ऊपर पलट लिया. उसके ऊपर लेटी बबिता ने अपने होंठ उसके होंठ पर रखे और चूसने लगी. कुमार ने अपने लंड को पकड़ा और बबिता की चूत पर लगाते हुए एक झटके में अंदर डाल दिया. अब उसने असीम का स्थान ले लिया था तो असीम ने बबिता की गांड पर हाथ फिराया.

“नानी, जो भी कहो. आपकी गांड है बहुत मस्त. बिलकुल गोलगप्पा.” असीम ने कहा तो दूसरी ओर से निर्मला बोल पड़ी, “गोलगप्पा समझ कर खा मत लेना, नहीं तो हम सब क्या करेंगे?”

“अरे नहीं नानी. मैं तो इसमें पानी भरने वाला हूँ. फिर आपमें से जो चाहे पी सकेगा.”

“बदमाश! देख गीता. तेरा नाती मुझे अपना पानी बबिता की गांड से पीने के लिए कह रहा है.”

“अरे तो पी लेना. वो भी तो तेरे लिए ये सब करती है.”

शालिनी ने ये सब सुना तो उसकी गांड फट गई. पर बलवंत उसके कानों में बोला, “ये सब ऐसे ही बातें करती हैं. आप ध्यान मत देना. आप मेरा लंड चूसोगी न?”

शालिनी ने स्वीकृति दी तो बलवंत ने शालिनी को एक कुर्सी पर बैठाया और उसके सामने लंड झूलने लगा. शालिनी ने निसंकोच उसे चाटना आरम्भ कर दिया. पूनम और निर्मला उन दोनों के पास आईं और निर्मला ने नीचे बैठकर शालिनी की चूत का निरीक्षण किया।

“हम्म, भाईसाहब का पानी अभी भी अंदर है.” ये कहते हुए उसने चूत पर मुंह लगाया और चूसने का सफल प्रयास किया. जब वो हटी तो पूनम ने अपना भाग्य को परखा और जो शेष रज था उसे सोख लिया.

“ओके, दीदी. आप अब भैयाजी से आराम से चुदवाओ, हम चलीं.” ये कहते हुए वो हट गयीं.

शालिनी को कुर्सी पर बैठाने का एक और उद्देश्य था. इस स्थान से वो अन्य सबको भी देख सकती थी. और शालिनी को इसका लाभ भी मिला.

उसने असीम को अपने लंड को बबिता की गांड पर लगाकर हल्के धक्के के साथ अंदर डालते हुए देखा. कुमार का लंड पहले ही बबिता की चूत में था. शालिनी को बबिता की क्षमता देखकर आश्चर्य हुआ. कितनी सरलता से उसने दूसरे लंड को भी ले लिया था. असीम निर्बाध अपने लंड को उसकी गांड में डालता रहा और पूरा अंदर डालने के पश्चात ही उसने विश्राम लिया. शालिनी ने अब लंड चाटना बंद किया और चूसने के पहले अन्य जोड़ों पर दृष्टि दौड़ाई.

गीता के दृश्य में भी परिवर्तन था.अब कँवल नीचे लेटकर चूत में लंड डाले हुए था तो इस बार गांड का आनंद जस्सी के भाग में आया था. और वो दोनों एक सधी ताल में गीता की मस्त चुदाई कर रहे थे.

पूनम दिन में कुमार और असीम के मोटे लौंड़ों का आनंद ले चुकी थी. और निर्मला की भी इच्छा पूरी हो गई थी और उसे जीवन से चुदवाने का सुअवसर मिला था. सुशील पूनम की चुदाई आरम्भ करने को था तो जीवन निर्मला की. बस उन दोनों के लौंड़ों को चूस कर उचित स्थिति में लाने के लिए पूनम और निर्मला परिश्रम कर रही थीं. दोनों लौड़े अब कठोरतम स्थिति में आ चुके थे और किले भेदने के लिए उत्सुक थे. चारों ओर फिर से आनंद की सीत्कारें और आह, ऊह इत्यादि का स्वर सुनाई दे रहा था.

और कुछ ही समय में सुशील और जीवन पूनम और निर्मला की चुदाई में जुत गए. बलवंत के लंड को चूसते हुएभी शालिनी का सारा ध्यान जीवन पर ही था. और उसकी चुदाई की गति और कठोरता को जब उसने देखा तब उसे आभास हुआ कि जीवन ने उसकी चुदाई में कितना संयम रखा था. निर्मला नीचे थी और जीवन के पुट्ठे जिस तीव्रता से ऊपर नीचे हो रहे थे उससे ये विदित था कि उसकी क्षमता बहुत है. और निर्मला की उसके लंड को झेलने की भी. दोनों जिस गति के साथ एक दूसरे में समाने का प्रयास कर रहे थे वो अपर्याय था.

सुशील और पूनम की चुदाई में एक ठहराव था. सम्भवतः क्योंकि वे अधिक नियमितता से चुदाई करते थे. जीवन कभी कभी ही आते थे तो उनसे मिलन में एक स्फूर्ति रहती थी. शालिनी ने चारों जोड़ियों की चुदाई की भिन्नता को अनुभव किया और बलवंत का लंड अपने मुंह से निकाला और उसकी ओर देखा.

“अब रुकने का अर्थ नहीं है. चलिए हम भी उनके साथ मिल जाते हैं.” बलवंत ने उसके भाव समझ कर बोला।

शालिनी ने स्वीकृति दी और खड़ी हो गई. दोनों उस समूह की ओर बड़े.

सबके बीच पहुंचकर शालिनी ने बलवंत की ओर देखा, “भाईसाहब, एक बात कहूँ ?”

बलवंत ने सिर हिलाया. शालिनी ने जीवन और निर्मला की ओर संकेत करते हुए कहा, “मुझे भी इसी प्रकार चुदवाने की इच्छा है. परन्तु, आरम्भ धीमे ही कीजियेगा.”

बलवंत ने आश्वासन दिया कि वो ऐसा ही करेगा. ये कहते हुए उसने शालिनी को धीरे से नीचे लिटाया. शालिनी ने फिर एक बार जीवन की ओर देखा जो उससे अनिभिज्ञ निर्मला की चुदाई में जी तोड़ परिश्रम कर रहा था. अचानक ही जीवन ने उनकी ओर देखा और दोनों आँखें मिलीं. जीवन ने एक मूक स्वीकृति दी और शालिनी ने मुस्कुराकर उसका उत्तर दिया. बलवंत ने जब देखा कि दोनों प्रेमियों की आंख-मिचौली समाप्त हो रही है तो उसने शालिनी की चूत पर अपना लंड रगड़ा.

शालिनी का ध्यान जीवन से हटकर बलवंत की ओर आ गया और उसने बलवंत के लंड को अपनी चूत में उतरते हुए अनुभव किया. एक ही दिन में दो विभिन्न पुरुषों से चुदने का ये उसका दुर्लभ अनुभव था. और इसके आनंद में वो पूर्णतः डूबना चाहती थी. और सम्भव था कि आज उसे एक से अधिक पुरुषों से चुदने का भी अवसर मिल जाये. बलवंत उसे देख रहा था और उसके चेहरे के भावों को पढ़ने का प्रयास कर रहा था.

शालिनी बोली, “सोचिये, लोग हम सबको बूढ़ा समझते हैं. और हम सब जो कर रहे हैं वो कइयों ने तो स्वप्न में भी कल्पना नहीं की होगी.”

बलवंत मुस्कुराया और अपने लंड को पूरा जड़ तक गाढ़ने के बाद रुका, “अभी तो अपने कुछ भी नहीं देखा है. आज तो अपने आरम्भ किया है. एक सप्ताह रुकिए, फिर देखिये क्या क्या अनुभव करने मिलेगा. पास इस पगले को ठहरने के लिए मना लेना. चार दिन बाद भी चले गए तो क्या हानि होगी?”

शालिनी ने उत्तर दिया, “मैं प्रयास करुँगी पर अभी आप ये सब बातें न करें बल्कि अपने कार्य पर ध्यान दें.”

जीवन उनकी बातें सुन चुका था और उसकी योजना सफल हो रही थी. वो शालिनी को ये आभास कराना चाहता था कि वो उसकी बातें एक अच्छे होने वाले पति के समान मानेगा. उनके मिलन की राह में ये एक और पग होगा.

असीम और कुमार अपने वास्तविक रूप में आ चुके थे. अब जिस पाशविक गति और शक्ति से वो बबिता की चूत और गांड मार रहे थे वो मन को विचलित करने के लिए पर्याप्त था. परन्तु बबिता तो उल्टा उन्हें और गालियाँ दे देकर उकसा रही थी. उसकी चीखों को बंद करने के लिए कुमार ने उसके मुंह में साड़ी का एक गुच्छा बनाकर डाल दिया और उसके मम्मों को अपने हाथों से भींचने लगा.

कँवल और जस्सी ने भी गीता को चोदने में कोई कमी नहीं रखी थी और उसके दोनों छेदों को भली प्रकार से रौंद रहे थे. गीता जिसकी इच्छा तो अपने पोतों से चुदने की थी, इन दोनों की चुदाई से भी आनंद से दूभर हो कर उन्हें उत्साहित कर रही थी. जीवन जिस शक्ति से निर्मला को चोद रहे थे उसके लिए ही निर्मला व्याकुल रहती थी. पूनम को चोदते हुए सुशील ने उसके कान में कुछ बोला और उसकी सहमति पाकर उसे घोड़ी बनने के लिए छोड़ा.इस आसन में आते ही फिर से कुछ पल चुदाई की और फिर लंड निकालकर पूनम की गांड में डाला तो पूनम की आनंद से सिसकारी निकल गई.

“क्यों बे? गांड मारे बिना तुझे चैन नहीं है?” जीवन ने कहा.

“तो तुझे किसने रोका है? निर्मला तो कितने दिनों से कह रही है कि जीवन से गांड मरवानी है. आज न जाने क्यों नहीं बोली.”

“क्यों भाभी, सच कह रहा है क्या ये लँगूर?”

“हाँ बिलकुल, वैसे चूत में भी उतना ही आनंद आ रहा है. अब जब जान ही गए हो तो मार ही दो गांड भी.” निर्मला ने बोला तो जीवन ने उसे भी घोड़ी बनने की आज्ञा दी.

सुशील अपनी पत्नी को घोड़ी बनते हुए देख रहा था पर उसका ध्यान जस्सी की पत्नी पूनम की गांड पर अधिक था जिसमें उसका लंड पूर्ण वेग के साथ आवागमन कर रहा था. और पूनम का पति जस्सी और बबिता का पति कँवल बलवंत की पत्नी गीता की घनघोर दुहरी चुदाई कर रहे थे. और अंत में कँवल की पत्नी बबिता की भीषण चुदाई करने के लिए गीता और बलवंत के नाती और जीवन के पोते जुटे हुए थे. हर ओर चुदाई का मनभावन संगीत सुनाई दे रहा था. जीवन भी अब निर्मला की गांड मारने में पूरा परिश्रम कर रहा था. बलवंत की चुदाई तीव्र हो चली थी. उसने कुछ धीमे होते हुए शालिनी से पूछा.

“सारी सहेलियाँ गांड मरवा रही हैं, आप कहो तो आपका भी उद्घाटन कर दूँ.”

“नहीं, इन सबके झड़ने के बाद आप सबके सामने मारना गांड, नहीं तो किसी को क्या पता चलेगा.” शालिनी ने उत्तर दिया तो बलवंत समझ गया कि शालिनी उसकी समधन बने बिना नहीं मानेगी. कुछ देर भिन्न भिन्न आसनों में चुदाई करने के बाद सब झड़ने लगे और फिर शिथिल पड़ गए. सुशील ने पूनम की गांड में रस छोड़ा और फिर उससे हटकर लेट गया. दोनों हाँफ रहे थे.

“लगता है निर्मला की चुदाई देखकर आपका जोश दोगुना हो गया.” पूनम ने कहा तो सुशील ने हामी भरी.

“हाँ, जब जीवन उसे चोदता है तो मुझे अधिक रोष आ जाता है. पर उसका लाभ होता ही है.”

“सच कहते हो.” ये कहते हुए वो उठकर बाथरूम की ओर चली गई.

निर्मला की गांड में रस छोड़ने के बाद भी जीवन उसकी गांड में कई पलों तक अपने लंड को गाड़े रहा. अंततः निर्मला को उसे बोलना पड़ा और तब जीवन ने अपना लंड बाहर निकाला.

“क्या हुआ? कहीं खो गए थे क्या.” निर्मला ने उठते हुए पूछा.

“हाँ कुछ ऐसा ही समझो.” ये कहकर जीवन बलवंत और शालिनी की समाप्त होती चुदाई को देखने लगा. निर्मला चली गई और जीवन बैठा देखता ही रहा. जब बलवंत ने शालिनी की चूत को अपने रस से भर दिया तब जाकर जीवन ने उन पर से आँखें हटाई. उसका मन उनके संतुष्ट भाव देखकर स्वयं भी प्रफुल्लित हो गया.

गीता की चुदाई भी समाप्त हो चुकी थी और जस्सी और कँवल उस पर से हट गए थे. तीनों पास लेटे गहरी श्वासों को संयत कर रहे थे. तभी बलवंत ने पुकारा.

“अरे भागवान, इधर आओ. तुम्हारे लिए कुछ भोग है यहाँ।”

गीता साहस कर के उठी तो जस्सी ने उसे सहारा दिया. गीता बलवंत के पास गई. “अब क्यों पुकार लिया। कुछ देर तो लेटने देते. दो दो चढ़े थे मेरे ऊपर.”

बलवंत मुस्कुराया, “अरे मैंने सोचा कि समधन और मेरे रस का स्वाद तुम्हें ही पहले मिलना चाहिए.”

गीता का चेहरा खिल उठा. “क्या सच?”

“लगता तो है.”

गीता ने आव देखा न ताव झपट कर शालिनी की चूत में मुंह लगाया और चाटने में जुट गई और पलक झपकते ही पूरी मलाई चट कर गई. इस पूरे समय शालिनी केवल कसमसा ही रही थी.

गीता ने अपना मुंह उसकी चूत से निकाला और बोली, “अब आपको भी हम दोनों अपना रस पिलायेंगे, दीदी.”

फिर कुछ सोचकर चुप हो गई कि शालिनी ऐसा करेगी या नहीं.

“मैं आभारी रहूँगी।” शालिनी के मुंह से ये सुनकर उसे शांति मिली.

“वाह नानी. आनंद आ गया आज तो.” असीम का ये कथन सुनकर ओर ध्यान गया. असीम अपने लंड को बबिता की गांड से निकाल रहा था और फिर वो खड़ा हो गया. हाथ देकर उसने बबिता को कुमार के लंड से उठाया और बबिता एक ओर जाकर लुढ़क गई.

“अरे बुढ़िया चल फिर तो पायेगी न?” कँवल ने अपनी पत्नी पर उपहास किया.

“आप चिंता न करो. दस मिनट बाद मैं दो तीन और को निपटा सकती हूँ.” बबिता ने हाँफते हुए कहा.

“तब ठीक है. नहीं तो मैं तो निराश होने लगा था.” जीवन ने कहा तो सब हंस पड़े.

“दुष्ट!” बबिता ने हंसकर कहा.

जीवन ने कुमार और असीम को पीने की व्यवस्था करने की आज्ञा दी और कुछ ही देर में सब मदिरा के घूँट ले रहे थे.

“आज कुछ नया आनंद आया है.” गीता ने कहा।

“हाँ इन तीनो के आने से सच में आनंद कई गुना बढ़ गया.” जस्सी ने कहा.

“दादाजी” असीम ने कहा तो सब उसकी ओर देखने लगे.

“चारों परिवारों के मिलन की कोई व्यवस्था कीजिये न?”

जीवन ने कहा, “देखता हूँ. सुबह अपने वैद्यराज गिरिधारी से बात करूँगा। उनके बेटे के रिसोर्ट पर अगर कोई आयोजन हो सके तो.”

सबके मन में हर्ष की लहर दौड़ गई. शालिनी को पता तो नहीं चला कि किसकी बात हो रही है, पर उसने कुछ न कहने में ही भलाई समझी.

“भाई मुझे तो लगता है की शालिनीजी हमारी समधन बनने के लिए उत्सुक और सहमत हैं?” बलवंत ने दूसरा पेग समाप्त करते हुए कहा.

“क्योंकि, अब मैं चाहूँगी कि आप सब देखें और होने वाले समधीजी मेरी गांड मारकर मुझे अपने गुट में सम्मिलित करें.” शालिनी ने कहा तो सब ने आनंद से चिल्लाया और फिर तालियाँ बजाईं.

और इन सबके बीच में शालिनी गांड मटकाती हुई कमरे के बीच में जाकर खड़ी हो गई और बलवंत को ऊँगली के संकेत से बुलाया. दर्शकों ने अपने लिए एक और पेग बनाया.

रात अभी शेष जो थी.

क्रमशः

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अध्याय 4३: मिश्रण 6

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दृश्य १: रूचि आहूजा का घर:

शिखा: “जी आंटीजी. आज पहला अनुभव रहेगा इनके साथ.”

राशि: “अच्छे लड़के है. मस्त चुदाई करते हैं. जैसे बोलोगी वैसे चोदेंगे, जितना चाहोगी उतना. मेरी तो आत्मा तृप्त कर देते हैं. “

शिखा: “देखते हैं. मुझे भी यही आशा है.”

राशि: “तो चलो फिर बुला लो.”

शिखा: “पर पार्थ आया तो?”

राशि: “वो भी पंक्ति में लग जायेगा. मैंने उसे कहा है कि वो भी रहे.”

शिखा: “ओह!, तब ठीक है, बुला लो उन्हें अंदर.”

रूचि गई और सबको अंदर बुला लाई।

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जब रूचि बुलाने आई तो मेहुल कुछ दूर बैठा हुआ था. अन्य सभी रोमियो बियर पी रहे थे. मेहुल ने उनकी ओर देखा और लंड संभालते हुए वो भी अंदर की ओर चल दिया. वो रूचि आहूजा को पहचानता था. वो नगर की सबसे प्रतिष्ठित महिला व्यवसाई थी. उनका दिंची क्लब से जुड़ाव क्लब की सफल यात्रा का परिचायक था. और अभी जो महिला आई थी वो मंत्री की पत्नी थी और इसका अर्थ ये था कि पहुँच बहुत शक्तिशाली लोगों से थी. उसे ये भी समझ थी कि क्लब में अधिकांश उसे उसकी महिला सदस्याओं की इच्छा के अनुसार ही चुदाई करना होगी, न कि अपनी इच्छा से. जैसे शिखा को देखकर उसके मन में जो भाव उठे थे वो शिखा की सहमति या प्रस्ताव के बिना सम्भव न थे. इसकी हानि उसे क्लब के कार्य और मंत्रीजी के कोप के रूप में मिल सकती थी.

इसके विपरीत इन धनाढ्य और शक्तिशाली महिलाओं की सहायता से वो आगे बहुत कुछ पा सकता था. पार्थ इसका उदाहरण था और वो भी उसका उपयोग करना चाहता था. अंदर गया तो देखा कि राशि मैम शिखा को कुछ बता रही थीं.

राशि, “पहले इन तीनों विदेशियों से चुदवा ले. इनके लौड़े लम्बे भी हैं और मोटे भी. पर चुदाई में अधिक अनुभव नहीं है. इन्हें लगता है कि इनके लौड़े बड़ा होना ही पर्याप्त है. तो इनसे चुद कर तेरी मोटर चल पड़ेगी. फिर अपने देसी लौंडों से चुदवाने में आत्मा प्रसन्न हो जाएगी.”

जहाँ नीग्रो रोमियो को बात समझ नहीं आई, वहाँ देसी रोमियो अपनी प्रशंसा सुनकर आनंदित हो गए और मैडम को उनका समय आने पर पुरुस्कृत करने का मन बना लिए. राशि ने रूचि की ओर देखा.

“मैं तो इसकी चुदाई देखूँगी। पर तू भी आ ही जा.”

“नहीं माँ, अभी पार्थ आ जायेगा तो उससे मुझे बात करनी है.”

“ठीक है, जैसा तू चाहे.” राशि ने रूचि की आँखों में देखते हुए बोला तो रूचि ने ऑंखें घुमा लीं. राशि ने देखा था कि कई दिनों से रूचि किसी भी और से चुदवाने में आनाकानी करती है. पर पार्थ के साथ सदा उत्सुक रहती है. उसे इस बात की चिंता थी. पार्थ और रूचि की आयु का अंतर उनके किसी भी और सूत्र में बँधने की राह में रोड़ा था. बेटी पार्थ की ओर खिंची जा रही थी. और जहाँ रूचि केवल पार्थ से चुदवाती थी, वहीँ पार्थ पर ऐसा कोई बंधन नहीं था, न ही रूचि उसे रोकती ही थी. राशि को इस जटिल प्रश्न का उत्तर ढूँढना था.

पर अभी उसके पास अधिक महत्व का कार्य था. और वो था विदेशी रोमियो (विरो) ओडुम्बे, डिगबो, गातिमु से शिखा का उचित परिचय. उसने तीनों को निकट बुलाया और वो तीनों आज्ञाकारी बालकों के समान सामने आकर खड़े हो गए. उनके तनते हुए लौडों ने एक बार तो शिखा को भयभीत किया, पर उसे ध्यान आया कि वो ऐसे लौडों से चुदने की ही इच्छा लेकर यहाँ आई थी. और अगर वो पीछे हटी तो अपने पति बॉबी को क्या मुंह दिखाएगी?

राशि ने उसे फुसफुसाकर समझाया, “मैं इसीलिए तेरे साथ रहूँगी, इनको सीमा नहीं लाँघने दूँगी। तेरे सामर्थ्य के अनुसार ही चुदाई करवाऊँगी। हाँ, पर अपने देसी रोमियो (देरो) से जब चुदवाओगी तब उन्हें स्वयं ही संभालना होगा.”

शिखा ने हल्के से थैंक यू कहा. राशि उसे बिस्तर पर लिटाने के बाद ओडुम्बे, डिगबो, गातिमु को समझाने लगी कि राशि इस पूरे प्रकरण की निदेशक है और उन तीनों को उसकी बात माननी ही होगी. फिर उसने उन्हें शिखा की ओर धकेल दिया. एक विरो नीचे जा लेटा और राशि ने शिखा को उसके मुंह पर चूत रखने का निर्देशन दिया. मुंह पर चूत रखते ही एक सर्पाकार जीभ ने उसकी चूत में लिया. शिखा के मुंह से एक सिसकारी निकली और वो आगे झुक गई. राशि का संकेत पाते ही दूसरे विरो ने शिखा की गांड पर हाथ घुमाया और फिर उसे फैलाते हुए उसे चाटने लगा. अब तीसरे विरो को शिखा के सामने आने के लिया कहा गया. उसके सामने आने पर शिखा ने उसके लंड को मुंह में लिया और चाटने लगी.

अन्य रोमियो स्वाभाविक रूप में बैठे रहे मानो कोई घटना ही घटित न हो रही हो. हालाँकि उनके लौड़े उनकी इस विरक्ति से सहमत नहीं थे.

********************

इस सब में आधा घंटा व्यतीत हो चुका था और रूचि पार्थ की प्रतीक्षा में अधीर थी. पार्थ दस मिनट बाद आया और उसने रूचि को खड़ा पाया. ऐसा नहीं था कि पार्थ रूचि की भावनाओं से अवगत नहीं था. परन्तु उसने व्यवसाय और आनंद को पृथक रखने का दृढ़ निश्चय किया हुआ था. वो ये भी जानता था कि रूचि को उसके अन्य स्त्रियों को चोदने में कोई आपत्ति नहीं है. इसीलिए जब उसने रूचि को देखा तो उसे सीने से लगा लिया.

“अपने मेरे लिए जो किया है उसका मैं आभार कभी नहीं भूलूँगा। मैं आपकी भावनाओं को समझता हूँ पर हम एक दूसरे के प्रेमी तो बन सकते हैं पर इससे अधिक कुछ नहीं कर पाएंगे. आप भी मेरे ही समान स्वतंत्र हैं. अब चलिए आपके कमरे में चलते हैं. शिखा मैडम क्या कर रही हैं?”

“वो विरों के साथ हैं. माँ ने समझाये अनुसार ही किया है, जब तक हमारा कार्य सम्पन्न होगा तब तक शिखा को विरो ही संभालेंगे. उसके बाद तुम्हें उन्हें चोदने का अवसर मिलेगा.” ये बातें करते हुए दोनों रूचि के शयनकक्ष में प्रवेश किये और उसे बंद कर दिया. रूचि और पार्थ एक दूसरे से लिपट कर चुंबनों में खो गए. मानो कई वर्षों बाद दो प्रेमी मिले हों. वस्त्र स्वाभाविक रूप में ही कहीं गिर गए और जब दोनों के चुंबनों का समापन हुआ तो वे पलंग पर जा गिरे और फिर चूमा चाटी में लिप्त हो गए.

******************

अब तक मुख्य शयनागार में शिखा पूर्ण रूप से चुदाई के लिए तत्पर थी. उसकी चूत के पानी को पीते हुए लेते हुआ रोमियो तक चुका था. सामने खड़े रोमियो के लंड में झटके लग रहे थे. राशि समझ गई कि लोहा अब पिघले की सीमा तक पहुंच चुका है. उसने जाकर टेबल से एक वस्तु निकाली जिसे देखकर अन्य रोमियो के चेहरों पर मुस्कान आ गई. वहीँ चाटने वाली रोमियो मुंह मुरझा गया. राशि एक गांड बंद करने वाला प्लग लेकर आई और उसे गांड चाटने वाले रोमियो को थमाया और उस रोमियो ने बिना आपत्ति के उसे शिखा की गांड में डाल दिया. शिखा कसमसाई पर कुछ बोली नहीं.

अगर राशि को गांड चाटने वाले रोमियो से कोई सहानुभूति थी भी तो उसने दर्शाया नहीं. उसके होंठों अपनी ऊँगली फिराई और शांत रहने का किया. फिर उसने शिखा से उठने कहा और उसे सीधा लेटा दिया. तीनों विरों को देखकर उसने चूत चाटने वाले रोमियो को आमंत्रित किया.

शिखा के पास बोली, “सुन अब इन अफ़्रीकी लौडों से चुदवा पर तेरी गांड मैं पहले पार्थ और देसी लौंड़ों से ही मरवाऊँगी। तो अधिक उतावली मत होना. एक बार इनसे अपनी चूत खुलवा ले. और तेरे बॉबी के लिए सब रिकॉर्ड कर रही हूँ.”

इसके बाद उसने तीनों अफ़्रीकी रोमियो को निर्देशित किया कि उनसे क्या अपेक्षा और उनकी क्या सीमा है. इसके बाद वो वहाँ से हट गई और देसी रोमियो के बीच जाकर बैठ गई. अफ़्रीकी रोमियो ने एक दूसरे को देखा और फिर निर्धारित रोमियो ने अपना काला लम्बा मोटा लौड़ा शिखा की चूत पर रखा और अंदर धकेलने लगा.

*********************

अपनी घनघोर चुदाई से तृप्त रूचि पार्थ के चौड़े सीने में सिमटी हुई थी. पार्थ ने उसे चोद चोद कर थका दिया था. परन्तु पार्थ को देखकर लगता ही नहीं था कि उसने कोई विशेष परिश्रम भी किया हो.

“मुझसे गुस्सा तो नहीं हो न? जो मैंने शिखा और बॉबी जीजाजी के साथ मिलकर किया?” रूचि की स्वर में कम्पन था. उसे लगा था कि पार्थ ने आज कुछ अधिक क्रूर चुदाई की है. हालाँकि उसकी गांड मारने का अवसर नहीं आया था अब तक.

“हूँ भी और नहीं भी.” पार्थ ने उत्तर दिया. “पर ये भी सच है कि अगर पहले बतातीं तो सम्भवतः मैं इस क्लब को अधिक समय तक नहीं चला पाता। आपके निवेश से सहायता भी मिली है और नयी सदस्याएँ भी.”

राशि की तीन सहेलियों को अब तक क्लब में प्रवेश मिल चुका था. उनमें से एक तो महा चुदक्क्ड़ थी और प्रवेश के दो ही दिन बाद तीन तीन रोमियो से चुदाई की बुकिंग करवा ली थी. और जो विवरण आया था उससे अगर दो तीन और भी होते तो उसे कम ही पड़ते.

“और अब मंत्रीजी के मिलने से जो एक डर था वो भी समाप्त हो गया है.” पार्थ ने कहा तो रूचि ने उसके मुंह पर हाथ रखा.

“आगे से कभी भी उन्हें इस नाम से नहीं बुलाना. बॉबी भैया कहना, जो एक सामान्य नाम हो सकता है, या जीजाजी.”

“ठीक है, जैसा कहो. अब शिखा दीदी की क्या सेवा करनी है?” पार्थ ने हंसकर कहा.

फिर बोला, “जैसा मैं कह रहा था, आपके हस्तक्षेप के बिना मैं अधिक दिन तक इसे नहीं संभाल सकता था, इसीलिए भी मैं क्रोधित नहीं हूँ. और सच ये भी है कि मैं भी आपसे प्रेम करता हूँ. परन्तु हमारे संबंध किसी और रूप में नहीं चल सकते.”

“मैं जानती हूँ और मुझे भी ये स्वीकार है.” रूचि ने कहा फिर पूछा, “तुम्हारी माँ की क्या कहानी चल रही है? अगर आपत्ति न हो तो पूछूँ?”

“नहीं, हम एक दूसरे से अब कुछ भी नहीं छुपाएंगे, सच्चे प्रेमियों की भांति.” फिर पार्थ ने सुमति और प्रकाश के बनते प्रेम प्रसंग की बात की.

“हम्म्म, अगर चाहो तो मैं इसमें कुछ मधु मिला सकती हूँ.”

ये कहकर रूचि ने अपनी योजना बताई जिसे सुनकर पार्थ प्रसन्न हो गया. उसने रूचि को चूमा और उसे चोदने के आसन में आ गया. पार्थ ने उसकी चूत में लंड दो चार बार अंदर बाहर किया और फिर निकाला.

उसे चूमा और बोला, “और मैं भी अब तुम्हारा ही हूँ, रूचि डार्लिंग.”

“नहीं, अभी मुझे छोड़ो, शिखा की गांड तुम्हारे लिए तेल लगाकर प्रतीक्षा कर रही है, पहले उसका उद्धार करो. मैं तो अब तुम्हारी ही हूँ.”

“उसके पहले मैं कुछ कहना कहता हूँ. अगर आपको उचित न लगे तो नकार देना.”

“क्या?”

“क्या हम आंटीजी को क्लब में भेज सकते हैं? उन्हें एक उत्कृष्ट कमरा दे दिया जायेगा. यहाँ भी उन्हें अकेले ही रहना पड़ता है. वहाँ रहेंगी तो क्लब के काम काज में भी व्यस्त रहेंगी. और हमें अपने रोमियो इस प्रकार से यहाँ नहीं भेजने होंगे। क्लब की अन्य सदस्याओं को भी लाभ मिलेगा.”

रूचि सोच में पड़ गई. पार्थ का तर्क सही था. राशि की चुदाई के लिए रोमियो यहाँ आते थे जिसके कारण उन्हें क्लब से अनुपस्थित होना पड़ता था. अगर उसकी माँ क्लब में ही रहेंगी तो व्यस्त भी रहेंगी और चुदाई भी भरपूर हुआ करेगी. साथ ही अन्य महिलाओं की सेवा करने के लिए रोमियो उपलब्ध हो सकेंगे.

“मुझे तो सुझाव अच्छा लगा है. पर उनसे पूछना होगा. फिर शुचि का क्या होगा?”

“उन्हें वहीं आना होगा, या नूतन और मंजुला में से एक के घर का उपयोग करना होगा. परन्तु उनके घर विशेष प्रयोजन के लिए ही उपयोग किये जाते हैं. मैं चाहता हूँ कि हम नियम किसी के भी लिए न तोड़ें. अगर कोई विशष परिस्थिति न आये, तब तक तो कदाचित ही नहीं.”

“ठीक है.”

“कम डार्लिंग.” पार्थ बोला।

अपने लिए तुम और डार्लिंग का सम्बोधन सुनकर रूचि की आँखों में आँसू आ गए. उसे पार्थ को अपने ऊपर से उठाया और उसका हाथ पकड़कर अपनी माँ के शयनकक्ष में ले चली.

**********************

शिखा आनंद की पराकाष्ठा को मानो कई बार छूकर लौटी पर पार कदाचित न कर पाई थी. दो अफ़्रीकी लौड़े उसकी चुदाई कर चुके थे. परन्तु उन्हें उसकी चूत में झड़ने नहीं दिया गया था. उसके लिए दोनों बार राशि सामने आई थी और उन्हें अपने मुंह से ही स्खलित किया था. दोनों बार उसने उस रस को शिखा से बाँटा था. और इस समय उसकी चुदाई में रत तीसरा अफ़्रीकी रोमियो भी अब अपने अंत के निकट था. शिखा की चुदाई को आधे घण्टे से अधिक हो चुका था और उसी शक्ति क्षीण होने लगी थी. राशि ने एक ही आसन में चुदने के लिए विवश किया था और अब वो इस बंधन से मुक्त होना चाहती थी.

और जब ओडुम्बो ने हुँकार भरी तो राशि ने उसे खींचकर हटाया और उसके लंड को मुंह में ले लिया. ओडुम्बो का लंड उसके मुंह में उछलते हुए अपना गाढ़ा रस छोड़ने लगा. शिखा पलंग पर पसरी हुई थी और उसकी चूत पूरी खुली हुई थी जिसकी लालिमा उसके साथ हुई कामक्रीड़ा की साक्षी थी. लंड के पानी को मुंह में लेकर राशि शिखा की ओर मुड़ी और मुँह से मुंह जोड़ा. शिखा ने अपना मुंह खोला और दोनों ने अफ़्रीकी वीर्य का रसपान किया. फिर राशि हटी और उसकी चूत में अपनी जीभ घूमने लगी. खुली हुई चूत उसके इस प्रेम से बंद होने लगी.

और इसी दृश्य को देखते हुए रूचि ने पार्थ के साथ प्रवेश किया.

खड़े हुए रोमियो ने जब अपने बॉस और लेडी बॉस को आते देखा तो तालियाँ बजाने लगे. पार्थ और रूचि को तब आभास हुआ कि वो दोनों नंगे ही आ गए थे. पर वहाँ तो सब नंगे ही थे. फिर उन्हें समझ आया कि ऐसा क्यों था. रूचि पार्थ की बाँह पकड़े हुए थी जैसे कोई पत्नी या गर्लफ्रेंड पकड़ती है. न ही पार्थ ने इसे छुड़ाने का अभिनय किया न ही रूचि ने छोड़ा. ये देख सभी देसी रोमियो उनके निकट आये और अपने हाथ बढ़ाये. उनसे हाथ मिलाकर पार्थ ओर एक और हाथ बढ़ा, जो राशि का था. उसकी आँखों में आँसू थे पर हर्ष की चमक भी थी. बिना कुछ कहे सुने ही सब समझ लिया गया.

अब तक एक रोमियो ने सबके लिए पेग बना दिए थे और पार्थ और रूचि को उस ओर ले गए. शिखा और उसके रोमियो भी अब सजीव होकर इस उत्सव में जुड़ गए. रोमियो राशि देखकर यही सोच रहे थे कि इस आयु की महिला में कामवासना कितनी प्रबल है. वो हर प्रकार की काम क्रीड़ा के लिए आतुर रहती है. आज उसकी चुदाई का एक चरण पूर्ण हो चुका था और अभी उसकी लालसा और वासना में कोई कमी नहीं आई थी. लेकिन अभी अगला संस्करण पार्थ का दायित्व था. शिखा की गांड में डाला प्लग अब बाहर निकलने को उद्द्यत था. उसे केवल अपनी स्वामिनी शिखा की शक्ति के लौटने की प्रतीक्षा थी. और इसमें मदिरा अपना सहयोग दे रही थी.

शिखा ने भी रूचि को गले लगाकर बधाई दी. रूचि शर्मा गई परन्तु उसने शिखा की बधाई को स्वीकारा और उसके कान में फुसफुसाकर बोली, “मेरे बॉयफ्रेंड को दे रही हूँ, उसका ध्यान रखना. वैसे उसे गाँड मारने का बहुत अनुभव है. तुझे बहुत सुख देगा.”

“जानती हूँ. तभी तो आंटीजी ने किसी और को गांड में ऊँगली नहीं करने दी.” शिखा बोली.

सब अपने पेग पी रहे थे और सामान्य वार्तालाप में मग्न थे. सचिन पार्थ से एक कोने में बात कर रहा था.

सचिन, “भाई, मैंने कल दो नई महिलाओं को सदस्या बनने के लिए मनाया है. दोनों भाभी और नन्द हैं. और उनके परिवार में भी चुदाई की परम्परा है. परिवार का आयात निर्यात का बड़ा व्यवसाय है और इसके लिए पुरुष कई दिनों तक दुबई और अन्य खाड़ी देशों में रहते हैं. बेटों को अपने कार्य से जोड़ने के बाद बेटे भी जाने लगे हैं और ये दोनों प्यासी रह जाती हैं. वैसे तो वो बोल रही कि अपनी अम्मी को भी क्लब में सदस्या बनवा देगी. पर मैंने सोचा पहले आपसे पुष्टि लूँ.”

“अम्मी? क्या वे मुस्लिम हैं?”

“जी भाई. और बहुत प्रतिष्ठित परिवार है.” सचिन ने बताया.

“किसकी बात कर रहे हो?” पार्थ ने उसे पैनी दृष्टि से देखा, “मैं किसी लफड़े में नहीं पड़ना चाहता.”

“नहीं भाई. कुछ नहीं होगा. वो दोनों अपने पतियों से लिखित अनुबंध देंगी. उनके पति भी इतने महीनों जो तो उन्होंने भी वहां अपने लिए स्थाई रखेलें रखी हैं.”

“तुमने बताया नहीं. कौन?”

“सलीम खान, एस एन एस ट्रेडिंग के मालिक. वो उनकी बेटी और बहू हैं. और उनकी बेटी उनकी अम्मी अमीना को भी जोड़ना चाहती हैं.”

पार्थ के मुंह से अनायास ही सीटी की ध्वनि निकल गई.

“अगर मैं गलत नहीं हूँ तो उनकी बेटी….”

“सबीना है और बहू निगार.”

“सबीना अब तक साली के बेटों से चुदवा कर ठंडी हो जाती थी. पर अब वो तीनों अपनी माँ की सेवा के लिए चले गए. और उसकी बेटी को भी साथ ले गए. तब से बेचारी बड़ी दुखी है. वैसे ये अवश्य है कि उनके न तो लौड़े ही बड़े थे न चुदाई ही ढंग से आती थी. अब इसे हमारे लौंड़ों का स्वाद मिल गया है तो उन्हें भूल गई है.”

“मुझे रूचि और बुआ से बात करनी होगी. वैसे क्लब के बारे में क्या बताया?”

“कुछ नहीं. बस ये कहा कि अगर नियमित लम्बे और मोटे लौंड़ों से चुदना हो तो मेरे मित्रों की मंडली में आ जाओ. पर ये फ्री सर्विस नहीं है. जितने मोटे लम्बे लौड़े हैं उतना ही दाम भी लगेगा.”

इस बात पर दोनों हंस पड़े. “ये हमारे क्लब की टैग लाइन हो सकती है.”

तभी रूचि पार्थ को लेने आ गई. कुछ सोचकर पार्थ ने रूचि से कहा कि सचिन कोई बात करना चाहता है तो तुम भी सुन लो. फिर बताना क्या विचार है.

“ओके. मैं कर लूँगी. अब चलो शिखा अत्यधिक आतुर है.”

क्रमशः

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अध्याय ४

दृश्य १: रूचि आहूजा का घर:

शिखा आतुर क्या थी, उसकी गांड फट रही थी. तीनों अफ़्रीकी लौंड़ों आकार से उसे ये तो समझ आ ही गया था कि पार्थ का हथियार बीस ही होगा. गांड मरवाने में उसे दक्षता प्राप्त थी, पर अपनी गांड सबको प्यारी होती है. पार्थ को अपनी ओर आते देख लुपलुपाने लगी. पर अपने बॉबी के लिए उसे ये बलिदान देना ही होगा. राशि ने उसकी असहजता को समझा।

राशि, “चिंता न कर, बहुत अनुभवी है ये. हर नई सदस्या की गांड मारकर ही उसे क्लब में लेता है. कइयों की तो गांड की सील भी खोली है. वो सब इससे गाँड मरवाने के लिए आज भी आतुर हैं.”

राशि की बात सुनकर शिखा को शांति मिली.

“शिखा जी, दिंची क्लब की सदस्यता की जो परीक्षा है उसमें आज आपके लिए विशेष परिवर्तन किया गया था. अन्यथा, आपका संसर्ग मुझसे एकांत में होना चाहिए था. परन्तु मैडम (राशि की ओर संकेत करते हुए) की इच्छा ये थी. और इनकी बात टालने का साहस मुझमें नहीं था. परन्तु, इसका जो दूसरा चरण है, जहाँ आपकी गांड मारी जानी है, वो आप चाहें दूसरे कमरे में जाकर पूर्ण कर सकते हैं. या यहाँ सबकी उपस्थिति में.”

शिखा सोच में पड़ गई. उसने राशि को देखा जो एक संकेत कर रही थी. उसे समझ आ गया कि उसके बॉबी के लिए वीडियो बनाई जा रही है.

“यहीं उचित है. जब सबके सामने चुद ही चुकी हूँ, तो गांड मरवाने में कैसा संकोच?”

ये सुनकर पार्थ और राशि की मुस्कुराहट बिखर गई.

पार्थ ने राशि से पूछा, “आंटी, क्या इनकी गाँड समुचित खुली है?”

राशि ने शिखा को आगे झुकाया और उसकी गाँड में लगे प्लग को दिखाया.

“हम्म्म, क्यों नहीं आप ये प्लग निकाल कर इनकी गाँड को कुछ गीला कर देतीं, तब तक मैडम मेरे लंड को गीला कर लेंगी.”

राशि इन शिखा का हाथ लिया और उसे पलंग पर घोड़ी के आसन में कर दिया. फिर धीमे से उसकी गाँड से प्लग निकाला. पार्थ ने अपने लंड को शिखा के सामने किया तो शिखा ने उसे मुँह में लेकर चाटा।

“मेरा स्वाद भी ले ले.” रूचि ने पास आकर शिखा को जताया कि पार्थ के लंड पर उसका रस भी जमा है. पर शिखा दूसरे संसार में जा चुकी थी. मोटे लंड को मुँह में लेकर चूसने का आनंद ही भिन्न होता है. और उसकी रिक्त हुई गाँड में उसकी शैली की माँ की जीभ घूम रही थी, जिसका आनंद भी उसे मिल रहा था.

दूसरी ओर सचिन बैठा व्हिस्की पीते हुए कल रात की घटना के विषय में चिंतन कर रहा था.

************

सबीना की गाँड़ मारने के बाद सचिन उसकी गाँड़ में ऊँगली डाल डाल कर उसमे से अपना रस लेकर सबीना को खिला रहा था. उसे स्वयं ये अचरज था कि इतने विशिष्ट परिवार की बेटी और बहू इस प्रकार से उसके वश में थी कि न केवल अपनी गाँड़ से निकला वीर्य चाटती थी बल्कि उसका मूत्र भी प्रेम पूर्वक पीती थी.

“सबीना डार्लिंग, कैसी रही आज की चुदाई?” सचिन ने उसके कानों में पूछा.

“मस्त रही. पर आज अकेले क्यों आये?” सबीना ने पूछा.

सचिन जान कर आज अकेला आया था. उसे सबीना की कामपिपासा, सम्पत्ति और एकाकीपन का अनुमान हो चुका था. वो उसे दिंची क्लब की सदस्या बनाने के विषय में सोच रहा था.

“क्यों क्या हुआ? तुम्हारे भतीजों की याद आ गई क्या?”

“अरे उन मुओं को छोड़ो.” फिर वो सचिन के सीने से जा लगी. “सच कहूँ तो कुछ और ही बात है.”

सचिन ने उसकी ओर देखा.

“रुको, मैं तुम्हें अपने बेटे से मिलवाती हूँ.”

“आपको बेटा भी है, मैं तो समझा था कि सना ही आपकी इकलौती संतान है.”

“नहीं, वो सना से बाद है और अपने अब्बू, मामू और नानू के साथ दुबई गया हुआ है. उससे बात कराती हूँ. अभी वहां शाम ही हुई है.”

ये कहकर उसने अपना आईफोन निकाला और फेसटाइम पर नूर नाम लिखा.

“पर मैं यहाँ, कोई समस्या न हो जाये.”

“कुछ नहीं होगा, पर तुम चुप रहना बस.”

काल लगने पर एक स्मार्ट लड़का दिखाई दिया.

“हाई मॉम, क्या हाल है, ब्यूटीफुल?”

“मत बात कर मुझसे, जब तक मैं न लगाऊँ कभी मुझे नहीं फोन करता.”

“अरे मॉम, दिन भर तो नानू, मामू और अब्बू गाँड में ऊँगली किये रहते हैं, एक मिनट भी बैठने नहीं देते. बस यही समय थोड़ा विश्राम कर पाता हूँ.”

“गाँड में ऊँगली, क्या वो तेरी भी गाँड मारने लगे?” सबीना की चीख निकल गई.

“अरे नहीं अम्मीजान.” तभी उसके चेहरे पर कुछ विचित्र से भाव आये और एक हंसी का स्वर सुनाई दिया.

“तेरे साथ कोई है क्या?” सबीना ने पूछा.

“हाँ, देखो.” कैमरा नीचे गया तो एक महिला उसका लंड चाट रही थी. सचिन ने देखा कि ये खिलाडी क्लब के लिए उपयुक्त है. पर उसकी ऑंखें उस वृद्धा पर रुक गयीं.

“अम्मी! आप कब दुबई गयीं?”

अमीना बेगम ने अपने नाती के लंड चाटते हुए बताया, “आज ही सुबह पहुँचे हैं. मन लग नहीं रहा था.”

“मुझे क्यों नहीं बुलाया?”

“तुझे तो चोदने के लिए बड़े जवान लौंडे आ रहे हैं, क्या करती बुला कर. कभी हमारे बारे में भी सोचती तो यहाँ न आना पड़ता.”

“और कौन गया?”

“निगार भी आई है, समीर के साथ.”

“वो कहाँ है?”

“मॉम, मामी को तो नानू मामू और अब्बू अपने साथ चोदने के लिए ले गए हैं. और समीर भाई मेरे साथ हैं. हम दोनों मिलकर अब नानी को चोदने वाले हैं. अब मॉम बाद में बात करते हैं. नानी इतने दिन मिली हैं, इन्हें अच्छे से चोदने दो आज.”

ये कहकर काल बंद हो गया. और सबीना उदास हो गई. सचिन को लगा कि लोहा अभी गर्म है और चोट की जा सकती है.

“सबीना डार्लिंग. मेरे पास आपके अकेलेपन का एक हल है.”

“बताओ.”

“मेरी एक मित्र मंडली है, इन सबसे भिन्न. हम सभी आपके जैसी दुखी महिलाओं के अकेलेपन को दूर करते हैं. और सबके लौड़े मेरे जितने या मुझसे बड़े हैं. और हम सब चुदाई में पारंगत हैं. आप चाहो तो मैं आपके लिए बात कर सकता हूँ अगर वो आपको सम्मिलित करने के लिए मान जाएँ.”

“ओह! ये ठीक रहेगा. कर लो बात. मेरे शौहर, बेटा, भाई और अब्बू तो अब दो महीने बाद ही आएंगे.”

“परन्तु कुछ नियम हैं.” सचिन ने मछली को काँटे में फँसते देखा तो बोला, “इस विषय में आप किसी को भी कभी भी नहीं बता सकतीं, क्योंकि इनमें आपके जैसे ही प्रतिष्ठित परिवारों की महिलाएं हैं. और ये सेवा फ्री नहीं है.”

“मैं पूरा विश्वास दिलाती हूँ कि मैं किसी से भी नहीं कहूँगी. तुम मेरा ये स्वभाव अकेलेपन के कारण देखते हो. तुमने देखा होगा, जब से तुम सब मुझे चोदने लगे हो मैं शांत हो गई हूँ.”

फिर सबीना कुछ सोचने लगी. “क्या निगार भी जुड़ सकती है?”

“पर.”

“मुझे उसपर विश्वास है और हम दोनों की स्थिति भी एक जैसी ही है. मुझे तो लगता है कि कहीं अम्मी भी न मचलकर हठ करने लगें. अर्शी और सना को भी जोड़ लेंगे.”

“नहीं, ये सेवा पैंतीस वर्ष से अधिक मात्र विवाहित या विधवा महिलाओं के लिए ही है. ऊपर की कोई सीमा नहीं है. एक दो तो सत्तर वर्ष के निकट की महिलाएं हैं.”

“ठीक है, तो हम तीनों ही सही.”

“मुझे पूछना होगा. पर आपने ये तो पूछा है नहीं कि इस सेवा की कीमत कितनी है?”

“जो भी हो, मुझे स्वीकार है. सप्ताह में तीन चार बार जम कर चुदाई हो जाये और क्या चाहिए. पर कितनी है?”

“प्रवेश शुल्क ५ लाख, और अगर आप में तीन चार बार सेवा लेंगी तो हर महीने के लगभग दो से तीन लाख.” सचिन ने बढ़ा कर बताया।

अगर सचिन ने सोचा था कि सबीना मोलभाव करेगी तो उसे आश्चर्य हुआ.

“ठीक है. मैं बोनस भी दे दूंगी. अब अम्मी और निगार लौटें तो तुम्हें उन्हें भी चोदना होगा. फिर उन्हें भी मिला लेंगे.’

अचानक सामने से कुछ ध्वनि सुनकर सचिन का ध्यान वर्तमान में लौटा.

************

भला हो प्लग का जिसने शिखा गाँड को भलीभाँति खोल दिया था. राशि की लप्लपाती जीभ को उसमे विचरण में कोई समस्या खड़ी नहीं हुई. जब राशि को लगा कि अब गाँड की राह इसे अधिक सुगम नहीं हो सकती तब हट गई. शिखा पार्थ के लंड को अब तक चूस कर पर्याप्त रूप से चिकना कर चुकी थी. तो अब रुकने का औचित्य ही नहीं था. पार्थ सामने से हटा और शिखा के पीछे जा खड़ा हुआ. अपने हाथों से उसकी गाँड सहलाते हुए नितम्बों की गोलाई और सुडौलता को देख रहा था. पार्थ अब तक न जाने कितनो ही परिपक्व स्त्रियों की गाँड मार चुका था. पर उसे आज तक हर गाँड की सुंदरता और आकार मानो कंठस्थ थे. राशि ने सहायता हेतु, थोड़ा तेल शिखा की गाँड में डाला और कुछ पार्थ के लंड पर मल दिया. फिर लंड को गांड के छेद पर रखा और हट गई.

पार्थ ने अपने चारों ओर देखा, सब उसकी ही ओर देख रहे थे. अपने घुटनों पर बल डालते हुए लंड को गाँड में प्रविष्ट कर दिया. सुपाड़ा अंदर जाते ही शिखा ने हल्की सी सिसकारी ली. राशि उसके आगे जा खड़ी हुई और उसके मम्मों से खेलने लगी. पार्थ बिना रुके अपने लंड को अंदर डाले जा रहा था और शिखा को उसके शक्तिशाली लौड़े की प्रगति का पूरा आभास था. किस प्रकार से उसकी गांड भरती हुई अनुभव हो रही थी. एक स्थान पर आकर पार्थ रुक गया. अभी लगभग आधा ही लंड अंदर गया था. वो इसी स्थिति में लंड को आगे पीछे करने लगा. शिखा की हल्की सिसकारियाँ निकल रही थीं. राशि द्वारा उसके मम्मों को निचोड़े जाने के कारण भी वो अत्यधिक उत्तेजित हो रही थी. इसका प्रभाव उसकी चूत से बहते हुए रस के रूप में दिख रहा था.

“अब मत रुको, पूरा डाल दो.” राशि ने पार्थ से कहा.

पर पार्थ जानता था कि अगर अभी तीव्रता दिखाई तो आगे समस्या हो सकती है. उसने राशि की ओर देखा तो राशि भी समझ गई और उसकी ओर आई. पार्थ ने अपना लंड बाहर निकाला और राशि ने उसे मुंह में लेकर चाटा और फिर से शिखा की अधखुली गाँड पर रख दिया. शिखा की गाँड अब बंद होने लगी थी. पार्थ ने फिर से उसकी गाँड में लंड डाला और इस बार कुछ और आगे तक ले गया. शिखा कुनमुनाने लगी. पार्थ ने इतनी ही गहराई तक उसकी गाँड मारने का निश्चय किया और लंड धीमी गति से अंदर बाहर करने लगा. शिखा को आनंद आने लगा और राशि फिर उसके मम्मों पर ध्यान देने लगी. कमरे में उपस्थित अन्य सभी पार्थ के संयम और प्रताप को देखकर प्रभावित थे. किस प्रकार से चुदाई का आरम्भ किया जा सकता है ये उनके लिए एक पाठ था.

पार्थ इसी प्रकार से लंड को शिखा की गाँड में अंदर बाहर करता जा रहा था, परन्तु हर बार कुछ और अंदर तक भी डाल रहा था जिसका आभास शिखा को नहीं हो रहा था. कोई दस मिनट के बाद पार्थ ने एक गहरी श्वास भरी और नीचे देखा. उसका लौड़ा शिखा की गाँड में पूर्ण रूप से स्थापित हो चुका था. दर्शक दीर्घा की ओर से तालियों की ध्वनि सुनकर शिखा को आभास हुआ कि उसकी गाँड में पार्थ का विशाल लौड़ा पूरा अंदर है. उसने अपनी गाँड हिलाकर उसका स्वागत किया. रूचि आगे आई और उसने पार्थ को चूमा और कहा कि अब वो स्वतंत्र है शिखा की गाँड पर विजय प्राप्त करने के लिए. पार्थ ने अब धीमी गति से ही अपने लंड को शिखा की मखमली गाँड में अंदर बाहर करना आरम्भ किया.

शनैः शनैः उसने अपनी गति बढ़ाई और कुछ ही मिनटों में उसके लंड के पूरे प्रताप से शिखा दोहरी होकर चीखने लगी.

“अब मेरे यहाँ रुकने का कोई अर्थ नहीं है.” राशि ने कहा और उस ओर चल पड़ी जहाँ रोमियो बैठे हुए ये कुकृत्य देख रहे थे. सचिन ने जब राशि को अपनी ओर आते देखा तो उसे अमीना बेगम का चेहरा और शरीर का स्मरण हो आया. उसे राशि में अमीना दिख रही थी.

“सो बॉयज? अब मेरी बारी है. फिर तुम्हें शिखा की भी चुदाई करनी है.” राशि मेहुल के सामने बैठते हुए बोली. फिर वो गौरव की ओर देखते हुए बोली, “आजा बेटा चढ़ जा मेरे ऊपर. इतनी देर से चुदाई देखकर मेरी आग भड़क गई है.”

गौरव उठा तो साथ में फिलिप भी उठ खड़ा हुआ.

“एक से आपका क्या होगा आंटीजी, आप मेहुल के लंड को चूसो, हम आपकी सेवा करते हैं.”

“हाय कितने सयाने बच्चे हैं. तो फिर यहाँ नहीं हो पायेगा. बिस्तर पर ही चलो.” चारों पलंग चल पड़े जिन्हें देखते हुए सचिन, ओडुम्बे, डिगबो और गातिमु देखते रहे. वो उधर देख रहे थे और सचिन अमीना के विषय में ही सोच रहा था.

************

सचिन अमीना के बारे में सोचने वाला अकेला नहीं था. सबीना भी उनके ही विषय में सोच रही थी. उसे पता था कि उसकी माँ रात भर चुदी होगी और अभी थककर सो रही होगी. पर उससे अधिक प्रतीक्षा नहीं हो पा रही थी. उसने अपने आई-पैड से उन्हें फेसटाइम पर कॉल लगा दी. आश्चर्य से अमीना ने तुरंत ही कॉल ले ली. उनके मुस्कुराते चेहरे को देखकर सबीना को संतोष हुआ कि उसने उन्हें जगाया नहीं.

“सही समय पर कॉल किया. हम सब तेरे ही विषय में बात कर रहे थे.” ये कहते उन्होंने अपना आई-पैड घुमाया और सबको दिखाया. सबीना ने अपने परिवार के सभी लोगों को नंगे बैठे देखा तो उसकी चूत खुजलाने लगी. निगार की आँखें बंद थीं और उसके होंठ कांप रहे थे.

“क्या समीर यहीं भाभी का मूत्र पी रहा है?” सबीना ने अचरज से पूछा. उसे समीर के व्यसन का पता था कि वो अपनी अम्मी की चूत से दिन में कई बार मूत्र नहीं पीता उसे शांति नहीं मिलती थी. दुबई में वो कैसे रह पाता होगा ये भी एक चिंतन का विषय था. निगार ने आँखें खोलीं और आई-पैड की ओर देखा.

“कैसी को सबीना. देखो न तुम्हारा लाडला भांजा सुबह से चार बार मेरा मूत पी चुका है पर इसका पेट नहीं भरा.”

“अरे भाभी, पेट भर भी गया होगा. पर मन नहीं भरा होगा अपने शहजादे का.”

इतने में समीर भी फ्रेम में आ गया. उसका पूरा चेहरा भीगा हुआ था. अपने होंठों पर जीभ घुमाते हुए बोला, “यस मामी. अम्मी का हर पानी मुझे अमृत लगता है. अब जब तक हैं तब तक तो अच्छे से पियूँगा.”

“ठीक है. जब आएगा तो अपनी मामी का भी पी लेना.”

“ओह यस मामीजान। इस चूजे को पिलाया कि नहीं?” नूर की ओर देखते हुए पूछा.

“इसे कहाँ प्यार है मुझसे जितना तू करता है.” सबीना ने हँसते हुए कहा.

“अम्मी, ऐसा नहीं है. अपने कभी कहा नहीं. अब देखना जब आयूंगा तब.”

“मेरा राजा.” सबीना का मन मातृत्व से गदगद हो गया.

अमीना बी ने आई-पैड अपनी ओर किया.

“क्या बात करने के लिए फोन लगाई है?”

“अम्मी, वो जो मुझे चोदने वाले लौंडे हैं न, उनमें से एक ने बताया कि उनकी एक मंडली है. और सबके लौड़े लम्बे मोटे हैं. वो कई शादीशुदा और बड़ी उम्र की औरतों को चोदते हैं. अब नासिर तो मुझे कम ही मिलने आते हैं. तो मैं सोच रही थी कि क्यों न मैं भी…”

“मुझे कोई आपत्ति नहीं है, बेगम. पर जब मैं वहां रहूँ तब ये नहीं चलेगा.”

“हाँ. मैं भी आप जब यहाँ रहोगे तो कौन सी फ्री रहूँगी। आप सब मुझे चोदोगे ही, तो उनके पास जाने का कोई अर्थ ही नहीं बनेगा.”

अचानक सबीना के भाई नदीम ने टोका, “वो सब ठीक है, हमारा भी यहाँ रहना नितांत आवश्यक है. पर कोई लफड़ा नहीं चाहिए अपुन को.”

“कोई लफड़ा नहीं होगा. मैं उस लौंडे की अम्मी को जानती हूँ.”

तभी निगार बोल पड़ी, “मुझे भी मिलवा दो न? ये तो यहाँ हैं, मेरी चुदाई के लिए कोई नहीं है. अब तो बच्चे भी इनके साथ आने लगे हैं.”

नदीम: “ठीक है. पर जैसा नासिर ने कहा, जब हम वहां रहेंगे तब सब बंद रहेगा.”

निगार प्रसन्न हो गई, “ठीक है.”

“तो बेगम, आप अकेली क्यों तरसोगी? आप भी जुड़ जाओ.” ये सबीना के अब्बू सलीम ने अमीना बी को बोला तो उन्होंने चुपचाप सहमति दे दी.

“ठीक है, मैं उनसे बात करुँगी। आप कब लौट रहे हो?”

“दस दिन बाद. नूर और समीर भी आएँगे दो सप्ताह के लिए.”

“वाह !” सबीना ने ताली बजाई, “अम्मी, अब्बू. एक बात और है.”

“बोलो.” सलीम ने अपने लौड़े को सहलाते हुए बोला।

“उनकी फ़ीस है, फ्री में नहीं है.”

“ओह! लगता है यहाँ की बीमारी इंडिया में भी पहुंच गई है. कितनी है?”

“पहले पाँच लाख और फिर हर महीने दो तीन लाख, कितने लड़के और कितनी बार पर निर्भर है.”

“ओह! ये तो बहुत अधिक है. पर ठीक है. थोड़ा मोल भाव करो, आखिर तीनों मिलकर जा रही हो.”

“ठीक है, अब्बू. मैं कम करवा लूँगी। आप सबको ये स्वीकार है न?”

सबने हामी भरी. सलीम ने निगार को अपना लंड दिखाया तो वो उनके आगे झुककर चाटने लगी. सबीना समझ गई कि अब बात समाप्त हो चुकी है. पर उसका उद्देश्य पूरा हो गया था. उसने कॉल काटी और सचिन को कॉल किया.

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जहाँ एक ओर पार्थ की गति तीव्रता पकड़ रही थी और अंतिम चरण पर थी, वहीँ उसके साथ में फिलिप नीचे लेट चुका था और राशि उसके ऊपर चढ़कर अपनी चूत में उसके लंड को ले रही थी. पार्थ ने राशि को आगे झुकते हुए देखा और उसकी गाँड पर मुग्ध हो गया. आज तक पार्थ ने राशि को नहीं चोदा था, न ही शुचि को. अब उसे लगा कि इस त्रुटि को ठीक करने का समय आ गया था. अगर राशि क्लब में रहने लगेगी तो उसका भोग लगाने में पार्थ को अधिक समय नहीं लगेगा.

राशि ने आगे झुकते हुए अपनी गाँड को फैलाया और उसके पीछे खड़े गौरव ने बिना किसी देरी के अपना लौड़ा उसकी गाँड में पेल दिया. राशि की चूत और गांड में मोटे लम्बे लौड़े स्थापित हो गए थे. मेहुल ने राशि के मुंह में अपना लंड डाला क्योंकि राशि के दोनों हाथ पलंग पर ठीके थे. और फिर उसने गौरव को चुदाई आरम्भ करने का संकेत दिया.

शिखा अपनी सहेली की माँ का ये रूप देखकर विस्मित थी. पर उसके साथ भी आज ये होना ही था. इसी सुख की खोज में तो वो आज यहां आई थी. पार्थ ने एक हुंकार भरी और शिखा को अपनी गांड में पार्थ के लंड का मोटा होते होना अनुभव हुआ. और पल भर की देरी में उसे अपनी गाँड में पार्थ के रस की ठंडक का अनुभव हुआ. पार्थ ने कुछ देर तक अपने लंड को यूँ ही भीतर बाहर किया और फिर निकाल कर एक ओर हट गया.

और इसी बीच सचिन का फोन बज उठा. एक ओर टेबल पर रखे फोन को देखा तो सबीना का कॉल था. उसने पार्थ को साथ आने का संकेत किया और कमरे से दोनों बाहर निकल आये. अब तक सबीना ने फोन काट दिया था तो सचिन ने उसे फोन किया.

“हेलो डार्लिंग! कैसी हो?”

“तुम्हारी ही याद में खोई हुई हूँ. पर मैंने फोन इसीलिए किया है कि मेरी घर पर बात हो गई है. अब्बू और भाई ने अम्मी और भाभी को भी इजाजत दे दी है. तो हम तीनों ही जुड़ेंगी. पर एक समस्या है.”

पार्थ भी सुन रहा था और उसे तीन नए सदस्याओं के जुड़ने से आनंद आ गया. सचिन के पूछने पर सबीना ने बताया.

“पहली बात तो ये है कि जब हमारे आदमी यहाँ होंगे, तब हम आपसे मिलने नहीं आएंगी. और दूसरी कि अब्बू ने कहा कि आप फीस अधिक माँग रहे हो. तो आपको कम करनी होगी.”

पार्थ ने हथेली दिखाकर सचिन को बताया कि इसे थोड़ा लटकाओ, फिर १० मिनट बाद कॉल करना.

सचिन: “पहली बात के लिए तो आपको कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं है. आप जब आना चाहे आयें और जब न चाहें न आएं. दूसरी के लिए मुझे हमारे लीडर से पूछना होगा. और अगर वो माने तो आपका इंटरव्यू भी वही लेंगे. मैं दस मिनट में फोन करता हूँ.”

इसके बाद सचिन और पार्थ ने बात की और केवल पहली फ़ीस कम करने पर सहमति हुई. क्योंकि अभी उन्हें इन तीनों की चुदाई की क्षमता का पता नहीं था. परन्तु कुछ सोचकर पार्थ ने कहा कि दो लाख से बिल ऊपर जाने पर दो बार की फ़ीस छोड़ देंगे. सचिन को भी ये सुझाव उत्तम लगा और उसने सबीना को फोन करके बता दिया. फिर उसे बताया कि उसका इंटरव्यू दो दिन बाद है जिसके लिए वो उसे लेने आएगा. सबीना ने बताया की उसकी अम्मी और भाभी दस दिन बाद आएंगे. तो सचिन ने उनके इंटरव्यू की भी तिथि बता दी. उसके बाद दोनों अंदर चले गए जहाँ राशि की घनघोर चुदाई अपने चरम पर थी.

***********

शिखा अभी भी राशि की चुदाई देखकर अचरज में थी. जिस शक्ति और तीव्रता के साथ उसकी चुदाई की जा रही थी उसे देखकर उसकी आत्मा कांपने लगी थी. पर राशि की चीखों से तो मानो आनंद की अनुभति हो रही थी. उसकी स्वयं की भी इस प्रकार से कई बार चुदाई हुई थी, पर जो बल और लौड़े रोमियो प्रयोग में ला रहे थे वो उसके अनुभव के सामने क्षीण थे. पार्थ और सचिन भीतर आये तो रूचि उनकी ओर गई. पार्थ ने उसे अमीना, निगार और सबीना के बारे में बताया. रूचि भी नगर के प्रतिष्ठित परिवार के बारे में जानकर सन्न रह गई. परन्तु उसने इसे क्लब के आगे बढ़ने के लिए सहर्ष स्वीकार किया.

गौरव, फिलिप और मेहुल ने राशि को भिन्न भिन्न आसनों में चोदा था और अब झड़ रहे थे. एक एक करके वो रणभूमि से हटते गए और राशि संतुष्टि के साथ पलंग पर ही ढेर हो गई. उसके मुँह, चूत और गाँड से रस भी जा रहा था. पर वो अचेत सी पड़ी हुई थी. उसके चेहरे की मुस्कान और संतुष्टि के भाव ही उसके सुख का प्रमाण थे. चुदाई के इस संग्राम में अब एक विश्राम का समय था. सो व्हिस्की के पेग बने और सब पीने में व्यस्त हो गए.

रूचि अपनी माँ की एक ओर ले गई और उन्हें क्लब में रहने के विषय में पूछा. राशि सहर्ष ही मान गई. रूचि के मन से एक बोझ उतर गया. उसने पार्थ को संकेत दिया कि सब ठीक है.

शिखा आज रात्रि यहीं रुकने वाली थी. रोमियो में से तीन अपने घरों को जाने वाले थे. पार्थ ने रूचि के ही साथ रुकने का निर्णय लिया। अब शिखा और राशि की रात भर चुदाई होने वाली थी.

रात अभी शेष थी.

क्रमशः

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अध्याय ४५: मिश्रण 7

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दृश्य ३: सुमति और प्रकाश

जब सुमति पार्क से घर लौटी तो शोनाली रसोई में ही थी.

“दी. इसमें शर्माने की बात नहीं है. आपको प्रकाश अच्छा लगा न? हमें भी अच्छा लगा. और पार्थ को भी. अगर बात आगे बढ़े तो हम सबको प्रसन्नता होगी.”

सुमति ने शोनाली को चूमा, “धन्यवाद, भाई क्या बोला?”

“वो भी हैप्पी है.”

सुमति अपने कमरे में चली गई पर इस बार उसकी चाल में एक लचक थी.

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सुमति के भीतर जाते ही शोनाली ने दिया को फोन लगाया. उस घर में भी बहुत उत्सुकता थी तो ये तय हुआ कि महिला समिति की तुरंत मंत्रणा की जाये. ११ बजे का समय निर्धारित हुआ और फोन कट गया.

११ बजे जब प्रकाश और सुमति सुंदर जीवन के स्वप्न देख रहे थे महिला मंडली एक होटल में मंत्रणा में व्यस्त थी. वहीँ रूचि ने भी शतरंज पर अपनी चाल चल दी थी और अचानक ही चंद्रु को इस नगर में अपना व्यापार करने के लिए धन उपलब्ध हो गया. जब उसने ये प्रकाश को बताया तो उसकी मुस्कराहट ने चंद्रू का मन मोह लिया.

महिला मंडली का निर्णय शीघ्र ही हो गया था. उसके बाद अन्य विषयों पर बात हुई. फिर आगे की योजना को परिपूर्ण करने के लिए सब घर चले गए.

*************

अगले दिन जब सुमति पार्क से लौटी तो शोनाली ने फिर चाय पिलाई.

शोनाली: “दी, आपको आज सिया ने नौ बजे घर पर बुलाया है.”

सुमति न जाने क्यों ये सुनकर शर्मा गई. फिर अपने कमरे में चली गई. अधिक समय नहीं था तो तुरंत ही नहाकर कपड़े पहने और कई वर्षों बाद हल्का मेकअप भी किया. फिर समय देखा तो नौ बजने को कुछ ही मिनट शेष थे. ये देखकर वो घर से निकल गई और पटेल परिवार के घर जाकर घण्टी बजाई। दिया से खोला और उसे आश्चर्य से देखने लगी.

“वो वो शोनाली बोली कि आपने मुझे बुलाया है.”

दिया ने झट से द्वार बंद किया और तब सुमति ने देखा कि उसके वस्त्र बहुत अस्त व्यस्त थे.

“मैंने रात नौ बजे के लिए कहा था. पर कोई बात नहीं. आइये.”

अभी सुमति बैठने ही वाली थी कि भीतर से कुछ गिरकर टूटने की ध्वनि आई. दिया अंदर की ओर लपकी तो सुमति भी बिना सोचे हुए उसके पीछे दौड़ी. कमरा खोलकर दिया अंदर गई और उसके पीछे सुमति. और सुमति वहीं ठहर गई. आगे का दृश्य देखकर वो ठगी सी रह गई. सामने पलंग पर हितेश लेटा हुआ था और उसकी माँ सिया उसके ऊपर चढ़ी हुई थी. पीछे से प्रकाश उसके बालों को पकड़कर उसकी गाँड मार रहा था. सुमति का ध्यान केवल प्रकाश पर ही था जिसके लंड के सिया की गाँड में आवागमन को वो देख रही थी.

पलंग के एक ओर एक ग्लास टूटा पड़ा था. प्रकाश को तो जैसे इस बात का भान भी नहीं था कि कुछ टूटा भी था. दिया उसे उठाने के लिए आगे बड़ी तो हितेश ने सुमति की ओर संकेत किया, “मौसी, आंटी!”

दिया झटके से मुड़ी और उसने सुमति को देखा. फिर हितेश के देखकर आँख मारी फिर सुमति की ओर आकर बोली, “चलो चलो हम बाहर बैठते हैं.”

पर सुमति टस से मस न हुई. वो प्रकाश को सिया की गाँड मारते हुए एकटक देखे जा रही थी. दिया को तो लगा कि कहीं उसका मानसिक संतुलन तो नहीं बिगड़ गया. पर सुमति एक तंद्रा में थी. और धीमे से बोली.

“कितनी अच्छी चुदाई करते हैं न ये.”

“हाँ, पर अभी चलें?”

“नहीं. मुझे देखना है. आप जाओ.”

पर दिया नहीं गई और सुमति के साथ खड़ी देखने लगी. कामक्रीड़ा समापन पर थी और कुछ ही देर में प्रकाश ने एक तीव्र चिंघाड़ के साथ सिया की गाँड में अपना पानी छोड़ दिया. शोनाली ने दिया को सुमति के व्यसन के बारे में बताया था और इसी कारण से इस घटना को रचा गया था. अब ये देखना था कि क्या सुमति सिया की गाँड से प्रकाश का वीर्य पीयेगी या नहीं.

प्रकाश ने अपना लंड बाहर निकाला और बोला “भाभी आज तो सच में बहुत आनंद आया.”

ये बोल ही रहा था कि उसे अपने लंड पर किसी के होठों का स्पर्श हुआ. और उसका लंड निगल लिया गया.

“क्या दिया, ये कब से करने लगीं तुम. मैं तो तुम सबको मना मना के हार गया. अब भाभी की गाँड भी चाट लो तो जीवन सफल हो जाये.”

“हो जायेगा.”

ये सुनकर प्रकाश ने देखा तो दिया उसके सामने ही थी. सिया अभी तक हितेश पर चढ़ी हुई थी और हितेश उसे अभी भी चोदे जा रहा था, पर ये खेल भी कुछ ही पलों का था. प्रकाश ने नीचे देखा कि कनिका तो नहीं. पर उसकी आँखें सुमति से जा मिलीं. वो एक झटके से दूर हो गया. उसे लगा कि उसका बनता हुआ घर उजड़ने वाला है. पर सुमति की आँखों में ऐसा कुछ नहीं था. वो मुस्कुराई और सिया की ओर मुड़ी. उसकी कमर पर हाथ रखा तो दिया ने हितेश को ठहरने के लिए संकेत किया.

सुमति ने सिया की गाँड से बहते हुए रस को अपनी जीभ से चाटा और मुंह खोलकर प्रकाश को दिखाया. फिर अपने मुँह गाँड पर लगाया और उसमें से सोखने लगी. अनुभव की धनी होने के कारण कुछ ही पलों में सिया की गाँड का रस सुमति के मुँह में था. उसने फिर प्रकाश को देखा और उसे पी गई. अपने होठों पर जीभ दौड़ाई और मुस्कुरा दी. प्रकाश भी मुस्कुरा दिया और उसकी ओर आया और उसे अपनी बाँहों में भर लिया.

हितेश ने चुदाई पुनः आरम्भ कर दी थी और वो कुछ ही पलों में झड़ने वाला था. दिया की आँखों में आँसू थे.

प्रकाश: “मुझे तो लगा था कि मैंने तुम्हें खो दिया.”

सुमति: “नहीं. अब ऐसा कभी नहीं होगा. आपकी हर इच्छा पूरी करुँगी।”

प्रकाश: “और मैं तुम्हारी.”

हितेश के झड़ने की चीख से उनका ध्यान उधर गया. सिया भी झड़कर उसके लंड से उतर रही थी. सुमति ने प्रकाश को देखा तो उसने सिर हिलाकर स्वीकृति दी. सुमति जाकर सिया की चूत से हितेश का वीर्य पीने लगी और उसे पूरा सोखकर ही हटी.

“वाओ आंटी, यू आर ग्रेट.”

“आंटी नहीं, चाची बोल. होने वाली चाची.”

भले ही सुमति के मुँह पर हितेश का रस लगा था पर वो ये सुनकर शर्मा गई. दिया ने उसे पीछे से बाँहों में ले लिया.

“अब आओ, इन्हें कुछ समय लगेगा. हम बैठक में बैठते हैं.”

दोनों बाहर गए और प्रकाश बाथरूम में गया तो हितेश ने अपनी माँ को उनका फोन दिया.

सिया ने एक संदेश लिखा और भेज दिया: “मिशन सफलता पूर्वक पूर्ण किया गया.”

और ये पढ़कर शोनाली नाचने लगी.

*********

कुछ ही देर में पहले प्रकाश और फिर सिया के साथ हितेश आ गए. दिया ने सुमति को फलों का रस पीने के लिए दिया था. सुमति खड़ी हो गई तो सिया ने आकर उसे गले से लगा लिया. फिर हितेश आगे बढ़ा और सुमति को बाँहों में लेकर उसकी गाँड दबा दी. सुमति उछल गई. प्रकाश मुस्कुरा दिया.

“तो सुमति, अब तो तुम्हें पता चल गया है कि हम परिवारिक सम्भोग में विश्वास रखते हैं. हमें प्रकाश के लिए तुम्हारे ही समान पत्नी की खोज थी जो इसमें बुराई न देखे और सम्मिलित हो जाये. लगता है कि वो खोज पूरी हो गई. प्रकाश और तुम एक दूसरे के प्रति आकर्षित हो. हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं है. शोनाली भी यही कह रही है. मेरा सुझाव है कि तुम दोनों दो तीन दिनों के लिए कहीं चले जाओ. देखो कि क्या साथ रहने में कोई अड़चन तो नहीं आती. उसके बाद जो भी निर्णय लेना है ले लेना.” सिया ने सुमति को समझाया.

“सच तो ये है कि हम सब भी इसी प्रकार रहते हैं. मैं पार्थ से कई वर्षों से चुदवा रही हूँ. यहां आकर भाई भी जुड़ गए. मुझे आपका सुझाव अच्छा लगा है. मैं भाई से पूछूँगी फिर बताती हूँ.”

“मैंने पूछ लिया दी.” ये सुनकर सबने उस ओर देखा तो शोनाली मुस्कुराती हुई अंदर आ रही थी. “आपके भाई से पूछने का काम मैंने कर लिया है. अब प्रकाश को निर्णय लेना है कि जाना कब है और कहाँ है.”

“आप सब इतने आतुर क्यों हो?” सुमति ने पूछा.

“क्योंकि हम सबको दिख रहा है कि तुम दोनों एक दूसरे को चाहते हो. बिन बोले भी तुम्हारे हाव-भाव साक्षी हैं. और हम नहीं चाहते थे कि तुम दोनों अक्कड़ बककड़ के चक्कर में एक दूसरे को खो दो. तो हम सबने ये सब खेल रचा था. आप दोनों के लिए.”

सुमति ने शोनाली को गले से लगा लिया और रोने लगी.

“आई ऍम सो लकी, जो आप मेरी भाभी हो. आई लव यू.”

प्रकाश अपने फोन पर कुछ ढूँढ रहा था. फिर उसने सुमति के कंधे पर हाथ रखा. सुमति ने उसे देखा तो प्रकाश ने अपना फोन दिखाया. सुमति ने सहमति में सिर हिलाया.

“कल जाएँगे शाम को. ऊटी.”

“और दी, आपको दिया ने रात नौ बजे बुलाया था और आप सुबह ही आ गयीं. पर अच्छा ही हुआ, ये भेद खुल गया और आगे की समस्या सुलझ गई. अब रात तो आपको आना ही है और चाहो तो यहीं रुक जाना अपनी ससुराल में.” शोनाली ने छेड़ते हुए कहा.

“धत, बदमाश.”

“नहीं, ये सही कह रही हैं. आप आज यहीं रुकना.”

“नहीं, मैं ऐसा नहीं करुँगी. मैं नौ बजे आ जाऊँगी पर लौट भी जाऊँगी।”

अब सुमति को मनाने का कोई औचित्य नहीं था.

“आओ दी, अब अपने घर चलते हैं.” ये कहकर शोनाली सुमति को लेकर अपने घर चल पड़ी.

**********

अपने घर पहुंच कर उन्होंने देखा कि सभी सदस्य बैठे उनकी ही राह देख रहे थे. और अंदर आते ही शोनाली ने उन्हें शुभ समाचार दिया तो पार्थ ने उठकर अपनी माँ को अपने सीने से लगा लिया. सुमति उसके आलिंगन में रोने लगी.

“अब मत रो. सब अच्छा होगा.” पार्थ ने कहा तो दूसरी ओर से जॉय ने उसे पकड़ा और उसकी बात का विमोचन किया.

सुमति ने कुछ समय बाद अपना रोना बंद किया। फिर सागरिका और पारुल ने उसे पकड़ा और फिर से रोना गाना आरम्भ हो गया. कुछ समय बाद सब शांत हो गए और अपने नित्य कर्म में लग गए. पार्थ ने शोनाली को सबीना, अमीना और निगार के विषय में सूचित किया. साथ ही उसे राशि को क्लब में ही रहने के लिए भी मनाया. क्योंकि रूचि का इस उपक्रम में एक बड़ा योगदान था तो सबसे उच्चतम कमरे को उसे आवंटित करना ही उचित था. शोनाली ने क्लब में फोन करके उस कमरे को लम्बे आवास के अनुरूप बनाने के निर्देश दे दिए.

फिर शोनाली ने पार्थ से कहा कि वो और जॉय आज सुमति को न चोदे क्योंकि उसे कल प्रकाश के साथ जाना है तो उसे विश्राम करना चाहिए. पार्थ हँसते हुए बोला कि ये बात प्रकाश को भी समझा दो. शोनाली ने कहा कि वो अभी ये काम कर देगी.

“मामी, अब क्लब कुछ ठीक चलने लगा है. मैं सोच रहा हूँ कि हम दोनों अन्य लोगों को इंटरव्यू लेने के लिए सोच सकते हैं. ये तीनों नयी महिलाओं के बाद हम पुराने रोमिओस को इसका अवसर दे सकते हैं. अब माँ के विवाह की भी बात होगी, सागरिका का तो तय हो ही चुका है. हमें अपने परिवार को अब अधिक समय देने के विषय में विचार करना चाहिए.”

“तुम्हारा रूचि के साथ क्या चल रहा है?”

पार्थ आश्चर्य से उसे देखने लगा.

“ऐसे मत देखो. मैंने तुम दोनों को साथ देखा है. क्या चक्कर है?”

“हम दोनों एक दूसरे से प्यार करते हैं. पर इससे अधिक कुछ नहीं कर पाएंगे.”

“क्यों नहीं? क्या आयु के अंतर के कारण? प्रियंका चोपड़ा अपने पति से १५ वर्ष बड़ी है. तो समस्या क्यों है?”

“नहीं, ये कारण नहीं है. सम्भव है कि अधिक मेल मिलाप के बाद इस विषय में सोचा जाये. परन्तु अभी रूचि और मैं इसे सीमित ही रखना चाहेंगे.”

“क्या इसीलिए तुम इंटरव्यू का कार्य छोड़ना चाहते हो?”

“नहीं ऐसा तो मैंने नहीं सोचा है. पर हाँ, मैं उनके साथ अधिक समय अवश्य बिताना चाहूँगा।”

“और राशि के क्लब में जाने से ये सरलता से सम्भव हो जायेगा.”

“हाँ, पर उसका एकमात्र उद्देश्य ये नहीं है.”

शोनाली ने पार्थ का हाथ पकड़ा.

“मैं समझ सकती हूँ. और मैं इस बात से भी अत्यंत प्रसन्न हूँ कि रूचि ने प्रकाश के व्यवसाय के लिए इतनी शीघ्र फंडिंग करवा दी. वो एक अच्छी महिला है. तो क्या आज तुम उसके घर जाओगे?”

“नहीं. एक बार उनकी माँ क्लब चली जाये तब.”

अचानक शोनाली ने पार्थ को देखा, “राशि को चोदा अब तक या नहीं?”

“नहीं.”

“तो क्लब की उसकी पहली रात उसके साथ ही रहना. वो भी इससे संतुष्ट होगी.”

“ओके.”

इसके बाद दोनों लौटे. सब अपने काम पर जा रहे थे तो पार्थ भी कुछ देर में निकल गया.

*************

रात में सुमति और शोनाली पटेल के बंगले पर गए. उनके स्वागत में आज मुख्य रूप से गुजराती भोजन बना था. इसके बाद दिया ने बहुत सारा खाना उन्हें डब्बे में भी दिया. प्रकाश और सुमति में अधिक वार्तालाप तो नहीं हुआ बस आँखों से ही बात हुई. दोनों अपने घर लौट आईं और सुमति अपने कमरे में सोने चली गई. शोनाली से बात होने के कारण प्रकाश को अपने कमरे में ही जाने के लिए कहा गया. वो इसका कारण जान कर हँसते हुए चला गया.

“देवरजी अब कुछ शांत हो गए हैं. पहले ऐसा बोलने पर लड़ जाते.” सिया बोली.

चंद्रू : “हाँ अच्छा है. अगर इसका क्रोध शांत हो जाये तो इसकी बुद्धि अच्छी है और सफलता अवश्य मिलेगी.”

“अभी ये चार पाँच दिन नहीं है, तो यहाँ जो काम आरम्भ करना है उसका क्या होगा?”

“उसके लिए मैं हितेश को ले लूँगा। वैसे भी ये यहीं रह रहा है तो अपना बिज़नस भी कुछ सीखेगा. प्रकाश के आने पर उसके हस्ताक्षर इत्यादि ले लेंगे. वो और हर्षित सहभागी हो जायेंगे.”

“ये अच्छा है. चलो अब देर हो रही है. दर्शन कहाँ गया हुआ है?”

“अरे वो रात में आएगा. उसके किसी मित्र का विवाह है तो वहीं गया हुआ है दो दिन से.” दिया ने बताया.

सबको आश्चर्य हुआ कि दो दिन से घर का बेटा बाहर है और प्रकाश और सुमति में इतना खो गए थे कि उन्होंने ध्यान भी नहीं दिया. हितेश अपने माता पिता के साथ ही उनके कमरे में जा घुसा तो सबको समझ आ गया कि आज सिया की भरपूर चुदाई होगी. अन्य सभी अपने कमरों में जाकर सो गए. रात भर सिया के कमरे से चीखें सुनाई देती रहीं. पर बंगले के बाहर नहीं जा पायीं.

*************

अगले दिन शाम चार बजे सुमति और प्रकाश निकल पड़े. उन्हें सबने भावुक मन से भेजा और सफलता की कामना की.

चंद्रेश हँसते हुए बोला “अरे चार ही दिन के लिए जा रहा है. अभी आ जायेंगे.”

उसे ये नहीं पता था कि ये दोनों चार दिन नहीं दो सप्ताह बाद लौटने वाले थे. प्रकाश आने की टिकट आगे बढ़ाता रहा और सुमति उसके साथ घूमती रही. हर शाम दोनों भोजन के बाद एक दूसरे में खो जाते. हर प्रकार के यौन सुख का आनंद दोनों ने लिया। परन्तु किसी अन्य व्यक्ति को अपने आनंद में सम्मिलित नहीं किया. उसके लिए उनका परिवार ही श्रेष्ठ था.

सुमति ने प्रकाश से कुछ भी नहीं छुपाया. उसके व्यसन के बार में सुनने के बाद प्रकाश बहुत उत्तेजित हो गया था और सुमति की गाँड मारकर उसे अपने रस को खिलाया था. इसके बाद तो ये उनके लिए एक सामान्य कर्म हो गया.

चंद्रेश ने नए व्यापार की सारी औपचारिकताएं पूरी कर ली थीं, केवल प्रकाश के आने की प्रतीक्षा थी. और वो हर तीसरे चौथे दिन आना टाल देता था. अंततः दो सप्ताह बाद प्रकाश ने बताया कि वो देर रात्रि में पहुंच रहे हैं.

***********

अगर इस पूरे प्रकरण से कोई अछूता था तो वो पार्थ था. उसे अपने कुछ आवश्यक कार्य सम्पन्न करने का समय मिल गया. राशि क्लब में रहने के लिए चली गई. और जैसा शोनाली ने कहा था, क्लब की उसकी पहली रात पार्थ से चुदाई करवाते हुए निकली. पार्थ ने भी उसे पूरे बल और सामर्थ्य से चोदा था. और शोनाली के कथनानुसार राशि पूर्ण रूप से संतुष्ट हो गई थी. उसने अगले दिन प्रातः में पार्थ से एक बार और चुदवा कर अपनी बेटी को भी सुखी रखने का वचन ले लिया था.

राशि के क्लब में रहने के अधिकाधिक लाभ मिले. इस माह की पार्टी की कमान राशि ने संभाल ली. राशि, रूचि, शोनाली और पार्थ ने पार्टी संचालन हेतु एक मंत्रणा की. इसमें राशि के सुझाव पर सचिन और निखिल को भी बुलाया गया. सबका ये अनुमान था कि रोमियो की सँख्या कम पड़ सकती है. परन्तु इसका कोई उपाय नहीं सूझ रहा था. अचानक ही सचिन ने कहा कि क्यों न हम ऐसे अब आयोजनों के लिए अस्थाई रोमियो का प्रबंध करें. नितिन इस श्रेणी में आ सकता है. इस पर विचार किया गया तो लगा कि ये सम्भव है कि सदस्याओं और रोमियो से भी इस विषय में पूछा जा सकता था. कुल मिलाकर अगर चार से पाँच ऐसे लड़के मिल सकेंगे तो पार्टी का आनंद ही अलग स्तर का होगा.

इस बार पार्टी की थीम थी “परिवार”. क्लब में ऐसे दस सदस्याओं और रोमियो के जोड़े थे जो एक ही परिवार से थे. कुछ रोमियो को सदस्याओं ने जोड़ा था तो कुछ सदस्याओं को रोमियो ने. माँ, मामी, चाची, बुआ इस प्रकार के विभिन्न संबंध थे. इनका एक विशेष शो होना था. और उसके बाद दो दिनों तक व्यभिचार की अनूठी कथा लिखी जानी थी.

इस संदर्भ में सचिन के मन में एक नाम था, नूर का, जिसका लौड़ा उसने देखा था. और सबीना के कहे अनुसार उसके कज़न भाई नदीम भी इसी प्रकार से सुसज्जित था. पार्टी की थीम में भी ये पूर्ण रूप से सटीक बैठते थे. और दोनों उपलब्ध भी रहने वाले थे. इस प्रकार से तीन का तो प्रबंध हो ही चुका था. पर अभी उसने इस विषय में कुछ कहा नहीं. जब पार्थ ने शोनाली से उनके साक्षात्कार के बारे में पूछा क्योंकि ये क्लब की प्रतिष्ठा का प्रश्न था. वो कुछ कहती इससे पहले ही राशि बोल पड़ी.

“अब अस्थाई हैं तो शोनाली को क्यों घसीट रहे हो. मैं हूँ न.” उसकी आँखों की चमक उसके मन के उद्भव व्यक्त कर रही थी. सबने सहर्ष इसे स्वीकार किया.

इसके बाद क्लब की सदस्याओं को एक संदेश भेजा गया. “इनमे से किसी को कॉल करो.” इसके बाद शोनाली और राशि के नाम दिए गए. कुछ ही समय में उनके फोन बजने लगे.

दूसरा समान संदेश रोमियो को भेजा गया और उन्हें पार्थ, सचिन और निखिल को कॉल करने का आदेश दिया. इसके बाद दोनों गुट नए अस्थाई रोमियो की खोज में लग गए.

पार्थ अब हर दूसरी या तीसरी रात रूचि के ही साथ बिताता था. सागरिका भी वहीं सुप्रिया के घर अधिक रुकने लगी थी. नितिन और उसकी अच्छी पटती थी और निखिल को कोई जलन नहीं होती थी. इस कारण जॉय, शोनाली और पारुल को अधिक समय साथ रहने का अवसर मिल रहा था जिसका वो भरपूर लाभ भी उठा रहे थे.

इस बीच पार्थ ने सबीना का यथोचित साक्षात्कार करने के बाद उसे क्लब में प्रवेश दे दिया गया था. अब उसी माँ और भाभी आ चुके थे और उनके साक्षात्कार कल से निर्धारित थे. पार्थ का मन एक बार डोला कि अगर उसकी माँ आ रही है तो उसकी चुदाई का आनंद पहले ले. पर एक अच्छे व्यापारी के समान रूचि ने समझाया कि सुमति कहीं भागी नहीं जा रही है, और रात तो वो उसे चोद ही सकता है.

***********

रात्रि ग्यारह बजे के लगभग एक टैक्सी सुमति और प्रकाश को छोड़कर चली गई. दोनों का अपने अपने घरों में भरपूर स्वागत हुआ. प्रकाश और सुमति दोनों के चेहरे दमक रहे थे. शोनाली और पारुल ने तो सुमति के ऊपर चुंबनों की बौछार ही कर दी. पार्थ खड़ा अपने माँ के इस नए रूप को देख रहा था. कई वर्षों बाद उसे अपनी माँ के चेहरे पर एक चमक और शांति दिख रही थी. उसे अपने इस निर्णय पर प्रसन्नता हुई कि उसने अपनी माँ के भविष्य के लिए कुछ अच्छा किया. रूचि ने प्रकाश की सहायता करके ये सुनिश्चित कर दिया था कि उसकी माँ अब इस कॉलोनी में नहीं भी हुआ तो इसी नगर में रहेगी. लगभग इसी आशय के भाव जॉय के मन में भी उमड़ रहे थे.

शोनाली और पारुल से मिलकर जब सुमति ने अपने भाई और बेटे को देखा तो दौड़ कर उनके पास आई. उसका चेहरा इतनी ही देर में आँसुओं से भीग गया. दोनों ने उसे अपनी बाँहों में लिया और फिर से चुंबनों का क्रम आरम्भ हो गया. जब ये भावुक मिलन ठहरा तो सुमति ने धीमे से कहा.

“मैंने आप दोनों का अभाव बहुत अनुभव किया इतने दिनों. मैंने शोनाली और पारुल से पूछ लिया है. आप आज रात मेरे साथ रहो. प्रकाश को भी मैंने पहले ही बता दिया था और उसे कोई आपत्ति नहीं है.”

सुमति के इस कथन से कि प्रकाश को आपत्ति नहीं है ये सिद्ध हो गया कि अब दोनों का भविष्य एक है. पार्थ भी मन ही मन झूम उठा. अब उसे अपनी माँ की चुदाई के लिए कल रात्रि की प्रतीक्षा नहीं करनी होगी. जॉय और पार्थ एक दूसरे को देखकर मुस्कुराये तो शोनाली ने पास आकर सुमति का हाथ पकड़ा.

“चलो दी, आप पहले नहा लो नहीं तो ये दोनों आपको कुछ नहीं करने देंगे.” फिर जॉय की ओर देखकर बोली, “आप पार्थ और दी के कमरे में चलो. मैं इन्हें लाती हूँ.”

**********

वहीं पटेल गृहस्थी में दिया, सिया, नीलम और कनिका ने प्रकाश को घेरा हुआ था. प्रकाश की बातों से उसके भविष्य में सुमति से विवाह करने का निर्णय सिद्ध हो चुका था. घर के पुरुष भी उतने ही प्रसन्न थे परन्तु उन्हें ये प्रकट करने का अवसर नहीं मिल रहा था. जब प्रकाश को महिलाओं ने मुक्त किया तो उसके चेहरे पर लिपस्टिक के इतने चिन्ह थे कि पूरा मुंह रंगबिरंगा हो गया था. अब उसे छेड़ने का अवसर पुरुषों को मिला. और प्रकाश जो पहले बहुत शीघ्र चिढ़ कर क्रोधित हो जाता था उनके इस खेल में मुस्कुराकर साथ दे रहा था.

दर्शन और हर्षित तो उसे सबसे अधिक छेड़ रहे थे, “चाचा, क्या हुआ चाची साथ नहीं आई? चाची को अपने बताया कि आप ऐसा करते हो वैसा करते हो?” इत्यादि। पर प्रकाश हंसकर उनका उत्तर देता रहा. उसके इस परिवर्तित व्यक्तित्व से सबको शांति मिली. और उन्होंने आज की रात इसका उत्सव मनाने का निर्णय लिया. बहुत दिनों से घर में सामूहिक चुदाई का अभाव था.

*************

दोनों परिवारों में इतनी रात होने के बाद भी ऐसा वातावरण था मानो सब अभी उठे हों. शोनाली जब सुमति को लाई तो पारुल भी साथ ही आ गई. पारुल और शोनाली ने सुमति को पार्थ के हाथ सौंपा और पारुल के साथ एक ओर सोफे पर जा बैठी. सागरिका ने सुबह तड़के आने का विश्वास दिलाया था.

उधर पटेलों ने अपनी बैठक में ही कामक्रीड़ा करने का निर्णय लिया. उसके लिए स्थान को उपयुक्त बना दिया गया. दर्शन, हितेश और कनिका ने जितनी स्फूर्ति दिखाई वो प्रशंसनीय थी. कुछ ही समय में क्रीड़ांगन सज गया.

आज इस कॉलोनी के पाँचवें और छठे घर के एकीकरण का उत्सव था.

खेल अभी आरम्भ होने के थे.

रात अभी शेष थी.

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विशेष सूचना:

राशि का क्लब में रहने का विवरण एक विशेष अध्याय में दिया जायेगा. इस अध्याय में ही आप ओडुम्बे, डिगबो और गातिमु के क्लब में परीक्षण और सबीना, अमीना और निगार के क्लब प्रवेश के साक्षात्कार के भी विषय में जान पाएँगे।

ये सम्भवतः ५0 वाँ अध्याय रहेगा.

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क्रमशः

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अध्याय ४६

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दृश्य ४: वर्षा और स्मिता:

वर्षा, समीर, सुलभा और पवन भी बातों में तल्लीन थे.

“मुझे पूर्ण विश्वास है कि ये परिवार दूसरे परिवारों के साथ भी इस खेल में सम्मिलित है. बाहर जो गोल बिस्तर है वो इसी की ओर संकेत करता है. हमें भी उस गुट या सम्प्रदाय में जुड़ने का अवसर दिया जाये. तब हम क्या करेंगे?”

“हम्म्म, ठीक है. अगर ऐसा होगा तो हमें भी स्वीकार है.”

दूर रिसोर्ट के अन्य कमरे में मधुजी इस वार्तालाप को बहुत ध्यान से सुन रही थीं. उनके और तीनों युवक प्रेमियों के चेहरे पर हर्ष की लहर दौड़ गई.

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शाम को रेस्त्रां में जाने पर उन्हें अन्य कुछ परिवार भी दिखे. वर्षा, समीर, सुलभा और पवन ने अब उन्हें भिन्न दृष्टि से देखा और उनकी शंका का समाधान हो गया. जिस प्रकार से परिवारों के सदस्य एक दूसरे से व्यवहार कर रहे थे, उन्हें विश्वास होगया कि वे भी पारिवारिक व्यभिचार के अनुयायी हैं. परन्तु न उन्हें ही उन परिवारों से मिलने की इच्छा थी, न ही वो परिवार भी इसके इच्छुक लग रहे थे. ये सबके लिए उचित था. कुछ देर में मधुजी ने प्रवेश किया और उनके पीछे उनके तीन युवा प्रेमी भी आये. चारों को इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ रहा था कि उन सबके बीच में आयु का इतना अंतर था. मधुजी जाकर सब परिवारों से मिलीं, विशेषकर एक परिवार जिसमें उनकी ही आयु की एक महिला थी. उनके साथ उन्होंने कुछ अधिक ही समय बिताया. अंत में स्मिता, सुलभा और वर्षा के पास आईं.

स्मिता से मिलने के बाद उन्होंने वर्षा और सुलभा को देखा और सौंदर्य की प्रशंसा की. उनकी पारखी दृष्टि ने जयंत, राहुल और मेहुल को देखकर उन्हें अपने बिस्तर की शोभा बढ़ाने के लिए उपयुक्य पाया. मोहन ने तो उनके साथ कई बार चुदाई की थी. उन्हें मेहुल के विषय में पता था. पर मेहुल अभी समुदाय से जुड़ा नहीं था, हालाँकि इस माह के मिलन में उसके भी जुड़ने का आवेदन आया हुआ था. जब मधु जी वर्षा और सुलभा से बात कर रही थीं तो स्मिता ने मेहुल के कान में धीमे से कहा.

“इनके साथ वो लड़का देख रहे हो न घुंघराले बालों वाला?” मेहुल ने सिर हिलाया. “उसका नाम सिद्धार्थ है और लंड भी तुम्हारे ही आकार का ही है. अभी पिछले माह ही समुदाय में जुड़ा है, तो मैंने भी देखा है. मधुजी बड़ी प्रशंसक हैं उसकी. अब मेरे बेटे के नीचे आएंगी तब पता चलेगा.” स्मिता ने मानो कोई षड्यंत्र रचा हो. मेहुल मुस्कुरा दिया. उसे अपनी माँ के द्वारा इन विशेष अभियानों पर भेजा जाना बहुत आनंददायक लग रहा था. सुजाता को तो वो अपनी दासी बना ही चुका था और अब मधुजी के तन मन पर अपनी छाप छोड़नी थी. मधुजी ने अपनी बात समाप्त की और उन्हें कल दोपहर के भोजन के लिए आमंत्रित किया. स्मिता को लगा कि मधुजी कुछ अधिक तीव्रता दिखा रही हैं. परन्तु उसे ध्यान आया कि जब तक गुप्त रिपोर्ट नहीं मिलती मधुजी स्वयं ही कुछ करने की स्थिति में नहीं रहेंगी.

कुछ ही देर में जलपान और मद्यपान आरम्भ हो गया. स्थान और वातावरण को देखते हुए सभी ने सीमित मात्रा में ही मद्यपान किया. वैसे भी बोतलें उनके आवास पर भेजी जाने वाली थीं. जलपान भी अत्यधिक स्वादिस्ट था. इसके बाद उन्हें फिर एक बार रिसोर्ट घुमाया गया. दिन के प्रकाश की सुंदरता से भिन्न रात्रिकालीन सुंदरता थी. सबने इसकी प्रशंसा की और फिर वे रेस्त्रां ही लौट गए. शाम का भोजन आठ बजे तक समाप्त करने की परम्परा थी, जिससे कि सब अतिथि अपने परिवार के साथ आनंद ले सकें.

एक उन्मुक्त वातावरण था और इस बार जब सब रेस्त्रां पहुंचे तो अन्य परिवारों से भी औपचारिक भेंट हुई. नायक परिवार के बड़ों को ये समझने में देर नहीं लगी कि ये परिचय में दिए गए नाम मनघड़ंत थे. पर उन्होंने कुछ दर्शाया नहीं. अपने नाम उन सबने सही ही बताये. इसके बाद सब भोजन करने लगे. इस बार भी बफे की ही व्यवस्था की गई थी और सबको भोजन रुचिकर लगा. भोजन समाप्त होते होते लगभग आठ बज ही गए. मधुजी अपने गुट के साथ व्यस्त थीं. इस बार उनकी आयु की महिला ने उनसे आकर कुछ बात की. आठ बजे सारे परिवार उठकर अपने अपने आवास की ओर चले गए.

स्मिता अपने गुट की मुखिया थी. और अपने आवास पर पहुंचकर उसने वर्षा और सुलभा को बुलाया। ये अब रात्रि के आयोजन की मंत्रणा करने का समय था. विषम सँख्या के कारण कुछ समस्या तो होनी ही थी. तो स्मिता को मुखिया होने के कारण दो पुरुषों का साथ देने का निर्णय हुआ. स्मिता ने महक को बुलाकर उसे सबका निर्णय बताया। अंजलि भी साथ आ गई थी. स्मिता ने अंजलि और श्रेया को दोनों परिवारों को मिलाने का श्रेय दिया. फिर प्रथम चरण की घोषणा की गई.

महिलाओं को युवा लड़के और पुरुषों को लड़कियों का सान्निध्य प्राप्त होना था और इसे सहर्ष ही स्वीकार कर लिया गया.

चूँकि ये दोनों परिवारों का पहला मिलन था ये निर्णय भी लिया गया कि सभी जोड़े पहले कमरों में चले जाएँ जहाँ वो एक सीमा तक एक दूसरे से परिचित हो सकें. दस से पंद्रह मिनट बाद वे सब यहाँ लौटें और फिर आगे की कामक्रीड़ा बढ़ाई जाये. ये सुझाव भी सहर्ष स्वीकार हो गया. छहों जोड़े छह कमरों में लुप्त हो गए.

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ये देखकर मधुजी को कुछ निराशा लगी. उनकी इच्छा थी कि सब एक साथ चुदाई करें जिससे उन्हें देखने में समस्या न हो. पर उसके लिए उन्हें अभी परीक्षा करनी होगी. और इस समय का सदुपयोग करने के लिए उन्होंने जैसे ही अपने साथ लेटे हुए विलास के लंड को मुंह में लिया किसी ने घंटी बजे. विलास, सिद्धार्थ और रवि के चेहरे पर कुछ क्रोध के भाव आये.

मधुजी ने सिद्धार्थ को देखा और बोलीं, “जा खोल, एक और दुल्हन आई है, अपने साथ बाराती लाई है.”

सिद्धार्थ ने द्वार खोला तो वही वृद्ध महिला जिससे मधुजी रेस्त्रां में वार्तालाप कर रही थीं खड़ी हुई थीं. उनके पीछे दो रिसोर्ट के ही लड़के खड़े थे. कमरे में उपस्थित चारों को नग्नावस्था में देख कर किसी को अचरज नहीं हुआ. सिद्धार्थ उस महिला को देख ही रहा था कि उस महिला ने सिद्धार्थ के सीने पर हाथ रखा और अंदर धकेला. साथ ही वो स्वयं अंदर आ गई. उनके पीछे रिसोर्ट के दोनों लड़के भी अंदर आये और कमरा बंद कर दिया.

मधुजी: “आजा रजनी, जैसा मैंने कहा था वैसा ही है सब.” फिर अपने तीनों युवा प्रेमियों को देखकर बोलीं, “ये रजनी है. अपने ही समुदाय से है. तुममें सी कोई मिला है इनसे?”

रवि बोला, “मिलने वाले ढंग से तो नहीं पर इन्हें मैंने अपने मासिक मिलन में अवश्य देखा है. आज इनसे मिलने का भी सौभाग्य मिल गया.”

विलास और सिद्धार्थ को उनका ध्यान नहीं आया. मधुजी ने निर्णय लिया कि समुदाय के भीतर परिवारों के मिलन को और बढ़ावा देना होगा. रजनी अपने कपड़े उतारने में लग गई और उसके साथ आये रिसोर्ट के लड़के भी इसी उपक्रम में लग गए.

“मैंने तुझे इन तीनों से चुदने के लिए आमंत्रित किया है. पर मुख्य रूप से जैसा मैंने पिछले मिलन में कहा था इस सिद्धार्थ के लौड़े को तेरी गाँड में लेने के लिए. शाम से इस बेचारे को तरसा रही थी जिससे कि तेरी गाँड की माँ चोद दे.”

“हाँ, देखने में तो बहुत बड़ा है. पर मैं भी गाँड मरवाने की अनुभवी हूँ. सच में ऐसे लम्बे मोटे लौड़े से गाँड का माल मथने में बहुत आनंद आता है. सिद्धार्थ बेटा, तेरी दादी की आयु की हूँ, अपने पोतों को निराश करके तेरे पास आई हूँ. मुझे निराश मत करना. गाँड पर कोई दया मत करना.”

“बिलकुल, दादी माँ.” ये कहते हुए उन्हें सिद्धार्थ ने जकड़ लिया.

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1.

सबसे पहले बाहर आने वाले वर्षा और मोहन थे. कमरों में जाने के समय ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कुछ तनाव था. इस प्रकार से इन दोनों पड़ोसियों ने कभी भेंट जो नहीं की थी. दस मिनट के बाद एक एक करके कमरे कुल और जोड़े मुख्य कक्ष में आ गए. अंत में आने वाली स्मिता ही थी. एक अंतर जो अंदर जाने और बाहर आने में था वो ये कि अंदर वस्त्रों के साथ गए थे और बाहर नग्नावस्था में आये. छुपी आँखों से एक दूसरे के परिवारों का शारीरिक निरीक्षण किया गया और आश्वस्त हुए कि एक से बढ़कर एक सौंदर्य और पुरुषार्थ के प्रतिबिम्ब सामने थे.

वर्षा और मोहन को एक दूसरे से खुलने में अधिक समय नहीं लगा. वे एक दूसरे को कई वर्षों से जानते थे. मोहन अंजलि से दो या तीन वर्ष ही बड़ा था. वर्षा उसमें कभी कभी अपने भावी दामाद को देखती थी. मोहन के विवाह से उसकी इस इच्छा को चोट पहुंची थी. मोहन ने उसे अपनी बाँहों में लिया और चूमकर बोला।

“मैं जानता हूँ कि आप मुझे अंजलि के लिए चुनना चाहती थीं. परन्तु कोई चिंता नहीं है. अब हम एक दूसरे के साथ हर प्रकार का आनंद ले सकते हैं.”

“तुम्हें कैसे पता?”

“मैं आपकी आँखों में ये देखता था, जब भी हम किसी सभा या पार्टी में मिलते थे. सच तो ये है कि अंजलि मुझे भी अत्यंत प्रिय थी. पर विधि का विधान यही है. आज अंजलि और मैं अपने साथियों के साथ प्रसन्न हैं.”

मोहन ने अपनी बातों के मोहपाश में वर्षा को यूँ बाँधा हुआ था कि उसे पता भी नहीं चला कि कब उसके बाह्य वस्त्र उतर गए. इसके बाद मोहन ने अपने कंपड़ों को उतार फेंका और फिर से वर्षा के पास आकर उसकी ब्रा और पैंटी भी शरीर से मुक्त कर दी. उसे अपने बाहुपाश में लेकर उसके होंठ चूसने लगा. वर्षा ने भी उसका साथ दिया और उसके लंड को अपने हाथ में ले लिया. मोहन भी वर्षा के सुडोल स्तनों से खेलता रहा. एक दूसरे को कुछ और समय एक दूसरे को चूमते रहे फिर बाहर जाने का मन बना लिया. और बाहर निकल गए.

2.

मेहुल को जब पता लगा कि उसे सुलभा का साथ मिला है तो उसकी प्रसन्नता कई गुना बढ़ गई. उसे सुलभा में एक अकथनीय आकर्षण लग रहा था. हालाँकि सुलभा सौंदर्य के माप में उपस्थित अन्य महिलाओं से उन्नीस ही थी, परन्तु मेहुल उसके प्रति अत्यधिक आकर्षित था. सुलभा ने जब उसका हाथ अपने हाथ में लिया तो मेहुल के शरीर में मानो तीव्र विद्युत् प्रवाह दौड़ गया. कमरे में पहुंच कर मेहुल को पहली बार एक असहजता का अनुभव हुआ. स्वयं को पराक्रमी चोदू समझने वाले मेहुल का आत्मविश्वास न जाने कहाँ खो गया.

“घबराओ मत, मैं तुम्हें खाने की कोई योजना नहीं बना रही हूँ.” सुलभा ने मुस्कुराकर बोला तो मेहुल की सारी झिझक छू-मंतर हो गयी. वो हंस पड़ा.

“सच ये है कि मुझे स्वयं नहीं समझ आ रहा कि मैं आप पर इतना मुग्ध हो गया हूँ. आपके हाथ को छूकर ही मेरी गाँ….” मेहुल बोलते बोलते रुक गया.

सुलभा मुस्कुराने लगी. “मैं समझ गई. पर ये भी बता देती हूँ कि मुझे तुम्हारे भीतर मेरे बेटे राहुल जैसा आकर्षण अनुभव हो रहा है. और मेरा अनुमान है कि तुम चुदाई में उससे उन्नीस नहीं हो.”

ये बोलते हुए सुलभा अपने वस्त्र उतार कर एक ओर रख रही थी. मेहुल उसे एकटक देखे जा रहा था. जब सुलभा निर्वस्त्र होकर पलटी तो मेहुल का मुँह खुला रह गया. सुलभा का साँवला सुगठित शरीर में सच में एक अपूर्व आकर्षण था.

“देख लेना, अब अपने कपड़े उतार लो. अधिक समय नहीं है.” सुलभा ने कहा तो मेहुल को निर्वस्त्र होने में ३० सेकण्ड भी नहीं लगे.

“हम्म, मेरा अनुमान सही है. तुम भी राहुल के ही समान शक्तिशाली लौड़े के स्वामी हो. आशा है कि चोदने में भी निपुण होंगे.”

“जी, अब तक किसी ने कमी नहीं निकाली. हाँ, चाहने वाली स्त्रियों की कमी नहीं है.” मेहुल का आत्मविश्वास लौट आया.

उसने सुलभा को अपनी बाँहों में लिया और उसके होंठ चूसने लगा. सुलभा उसके चुंबन का साथ देने लगी. सुलभा ने मेहुल के लंड को हाथ में लेकर सहलाया और वहीँ दूसरे हाथ से मेहुल का हाथ अपने मम्मों पर रखा. इस स्थिति में चुंबन के पश्चात वो दोनों पूर्ण रूप से उत्तेजित हो गए और उनका कमरे में आने का प्रयोजन सिद्ध हो गया. एक दूसरे का हाथ पकड़े वो बाहर आये तो वर्षा और मोहन पहले ही वहाँ थे और दोनों एक दूसरे को चूम रहे थे. सुलभा ने उन्हें देखा और फिर मेहुल के चेहरे को हाथ में लेकर उसे चूमने लगी.

3.

श्रेया को देखकर पवन का लौड़ा बुरी स्थिति में था. हालाँकि महक भी उतनी ही आकर्षक थी, पर श्रेया का शरीर अधिक माँसल था, जो पवन को अत्यधिक प्रिय था.

“आओ.” उसने श्रेया की ओर हाथ बढ़ाया तो श्रेया ने उसे थामा और उसके साथ मुस्कुराकर चल दी. कमरे में पहुंचकर पवन को पहले तो समझ ही नहीं आया कि वो क्या करे. वो एक ग्रामीण वातावरण में पीएलए बड़ा था, श्रेया जैसी आधुनिक लड़की का सामना उसने कभी नहीं किया था. राहुल के विवाह के पहले उसे इस प्रकार के धनी जीवन का की अनुभव नहीं था. श्रेया ने उसे देखा तो उसे लगा कि वो कुछ झिझक रहे हैं.

“क्या हुआ अँकल? मैं भी तो आपकी बहू अंजलि के समान ही हूँ? क्या मैं आपको अच्छी नहीं लगी? मम्मी को महक के लिए कहूं क्या?”

“अरे नहीं नहीं बेटी. ऐसा कुछ नहीं. बात बस ये है कि मैं गाँव का रहने वाला, राहुल के अंजलि से विवाह के पूर्व अपने ही परिवार में मस्त था. राहुल और मैं सुलभा को सुखी रखते थे. विवाह के बाद सब अच्छा है, पर मैंने इनके सिवाय किसी और से संसर्ग नहीं किया। तो कुछ अटपटा सा लग रहा है.”

“कोई बात नहीं अँकल। जैसे अपने पहली बार अंजलि को अपनी बाँहों में लिया था वैसे ही अब मुझे भी ले लीजिये.”

ये कहते हुए वो पवन से किसी लता के समान लिपट गई. पवन को इससे अधिक प्रोत्साहन नहीं चाहिए था. कुछ ही पलों में दोनों नंगे होकर एक दूसरे को चूम रहे थे और उत्तेजित करने का प्रयास कर रहे थे. श्रेया पवन के लम्बे मोटे लौड़े से प्रभावित हुए बिना न रह सकी. दोनों कई मिनटों तक एक दूसरे के शरीर से खेले और फिर कमरे से बाहर आ गए. सुलभा और वर्षा की प्रेम लीला देखकर वो फिर से अपनी लीला में लिप्त हो गए.

4.

समीर ने बिना हिचक महक का हाथ लिया और कमरे में चला गया. वो उसके अपूर्व सौंदर्य पर आसक्त था. वो उसे अंजलि का ही दूसरा रूप दिख रही थी.

“तुम सच में मुझे अंजलि ही लग रही हो.”

“तो फिर मुझे अंजलि ही समझो. और जैसे उसे प्रेम करते हो मुझसे भी करो.”

समीर उसकी बात सुनकर भावुक हो गया और आगे बढ़कर उसे अपने सीने से लगा लिया.

“विक्रम सौभाग्यशाली है जो तुम्हारे जैसी बेटी मिली.” फिर कुछ सोचते हुए बोला, “तुम्हारा तो विवाह राणा के घर में हो रहा है न? फिर ये सब कैसे चलेगा?”

महक सकपका गई क्योंकि उसे इस प्रश्न की अपेक्षा ही नहीं थी. उसकी इस उधेड़बुन ने जैसे समीर को एक चेतना दी.

“ओह!” समीर के मुंह से निकला तो महक ने उसे देखा. समीर के चेहरे को देखकर वो समझ गई कि तीर कमान से निकल चुका है. उसने आँखें झुका लीं।

“हाउ इंटरेस्टिंग.” समीर ने कहा. “हाउ वेरी इंटरेस्टिंग.”

महक: “अंकल, हम समय क्यों व्यर्थ कर रहे हैं. इस विषय में आप पापा से चर्चा कर लेना.”

“तुम सही कहती हो. मेरा ही ध्यान बँट गया था. वैसे तुम्हारी सास है बहुत रसीली.”

“अंकल!” ये कहते हुए महक ने अपने कपड़े निकालने आरम्भ किये और शीघ्र ही नग्नावस्था प्राप्त कर ली. समीर उसके दमकते रूप में खो गया पर फिर सम्भलते हुए अपने कपड़े उतार फेंके और महक की ओर बढ़ा.

“वाओ अंकल, यू हैव ए बिग कॉक. आई लव इट.”

“तो चलो चलते हैं.” और दोनों मुख्य कक्ष में चले गए जहाँ का वातावरण देखकर उन्हें आभास हुआ कि उन्होंने तो एक दूसरे को चूमा ही नहीं. दोनों ने एक दूसरे को देखा और इस कमी को पूरा करने में व्यस्त हो गए.

5.

विक्रम अंजलि के साथ कमरे में गया तो उसने अंजलि को गले से लगा लिया.

“क्या हुआ अँकल?”

“मैं उस दिन का धन्यवाद करना चाहता हूँ जिस दिन तुम्हारे घर की चीखों ने हमारे मिलने की राह बनाई थी.”

“जी. माँ जी उस दिन बाप बेटे ने इतनी बुरा रौंदा था कि उनकी चीखें ही नहीं थमी होंगी. वही आपके घर तक सुनाई दे गयीं. पर जो भी होता है भले के ही लिए होता है.”

“हाँ, मेरा भी यही मानना है. तभी तो तुम्हारे जैसी सुंदरी आज मेरी बाँहों में है.”

“श्रेया और महक के सामने तो मैं कुछ भी नहीं हूँ.”

विक्रम का मन तो था कि वो उसे वहीँ पटक के चोद डाले परन्तु उसे अपने समुदाय के लिए कुछ जानकारी और एकत्रित करनी थी.

“तो क्या तुम सब केवल अपने ही परिवार तक इस चुदाई को सीमित रखते हो या पूर्ण उन्मुक्त हो किसी से भी सेक्स करने के लिए?”

अंजलि सोच में पड़ गई. क्या बताना उचित है? फिर बोली.

“ऐसा नहीं है कि हम बाहर किसी को भी चोद सकते हैं. परन्तु कुछ सीमा तक ये अनुमत है. परन्तु ऐसा कम होता है. वो भी राहुल और जयंत के साथ, क्योंकि वे ही सबसे अधिक यात्रा करते हैं. पवन पापाजी और सुलभा मम्मीजी तो मेरे विचार से परिवार के अतिरिक्त पहली बार किसी अन्य से सम्भोग करने वाले हैं आज.” उसने ये नहीं बताया कि कुसुम के परिवार के विषय में कुछ नहीं कहा, वैसे भी उन्हें नायक गृहस्ती में परिवार ही माना जाता था.

विक्रम: “ओह, ये भी ठीक है. हम सब तो नियमित रूप से बाहर का स्वाद लेते रहते हैं. हालाँकि ये बहुत सीमित मात्रा में है, परन्तु इससे हमें चुदाई के नए आयाम देखने और सीखने के लिए मिलते हैं. और ये हमारे अपने सुखी जीवन के लिए सहायक होता है.”

अंजलि: “मुझे भी इसमें कोई बुराई नहीं लगती. सच कहूँ तो हममें से किसी को भी नहीं. परन्तु अब तक इस प्रकार के अवसर कम ही मिलते हैं.”

विक्रम: “और अगर मिलें तो?”

अंजलि: “तो उनका भरपूर लाभ उठाया जायेगा. और मुझे विश्वास है इसमें आप हमारी सहायता करेंगे. अगर मैं सही हूँ तो आप स्विंगर्स हो. है न?”

विक्रम: “सही समझा. इसके विषय में हम कल बात करेंगे. आज तो मिलन की पहली ही रात है.”

एक दूसरे को नंगा करते हुए दोनों ने एक नया समीकरण बना लिया था. विक्रम ने ये जान लिया था कि नायक परिवार समुदाय से जुड़ने में सक्षम है. और अंजलि को नए प्रयोग करने का अवसर मिलने की उत्सुकता थी.

कुछ देर तक चुंबनों का आदान प्रदान करके वे मुख्य कक्ष में अन्य जोड़ों के साथ जा मिले.

6.

जीजा साले ने स्मिता के एक एक हाथ को थामा और अंतिम कमरे में चले गए. राहुल और जयंत प्रसन्न थे. वे कई बार एक साथ कई महिलाओं की चुदाई कर चुके थे. उनमें से स्मिता के समान सुंदर कम ही थीं. उन्हें इस बात का अनुमान ही नहीं था कि स्मिता किस स्तर की चुड़क्कड़ है. उन दोनों की माताओं को लोहा देने में सक्षम थी. राहुल को अपने लंड की शक्ति पर कुछ सीमा तक गर्व भी था, जिसे उससे चुदने वाली महिलाएं और प्रोत्साहित करती थीं.

“ओके राहुल और जयंत. पहले कपड़े निकालो और मुझे देखने दो आज रात मेरी तृप्ति होगी या नहीं.”

स्मिता के ये कहने पर राहुल को कुछ आक्रोश आया पर उसने संयम रखा. उसका लौड़ा इसका उत्तर देने के लिए पर्याप्त था, तो मुंह का उपयोग करने का कोई आशय ही नहीं था. जयंत के भी यही विचार थे और जीजा साले की ऐसी एकसमता थी कि वो स्मिता को एक पाठ पढ़ा सकते थे. परन्तु पहली बार ऐसा करने से स्थिति विपरीत हो सकती थी. जब दोनों ने नंगे होकर स्मिता की ओर मुंह किया तो स्मिता के चेहरे के भाव बदल गए.

“मुझे क्षमा करना. मैंने तुम दोनों से जो शब्द कहे. मैं उन्हें लौटाना चाहूँगी। तुम दोनों अवश्य ही मुझे आज रात पूर्ण संतुष्ट करने के लिए सक्षम हो.” स्मिता बोली तो राहुल और जयंत के क्रोध शांत हो गया.

स्मिता: “और राहुल, मेहुल का लंड तुम्हारे लंड के ही आकार का है. मैं जयंत को कम नहीं आँक रही हूँ. पर मेहुल और तुम्हारे लंड में बहुत समानता है.”

जयंत: “मैं समझता हूँ. राहुल से गाँड मरवाने में हम दोनों की मम्मियों को असीम सुख मिलता है.”

स्मिता: “इसी कारण हम यहाँ हैं. उस रात सुलभा की चुदाई ने ही हमें मिलाया है. गाँड कौन मार रहा था उस रात?”

राहुल: “मैं ही था. माँ की चुदाई किये हुए कई दिन हो गए थे तो उन्होंने ही कहा था गाँड मारने के लिए. मुझे क्या पता था कि इतना चिल्लायेंगी.”

ये सुनकर सब हंसने पड़े और राहुल और जयंत ने बढ़कर स्मिता को नंगा कर दिया. उसके एक एक स्तन को पकड़कर मसला तो स्मिता की सिसकी निकल गई. जयंत और राहुल के लंड खड़े थे जिन्हें सहला कर स्मिता ने खेल को मुख्य अखाड़े में ले जाने का सुझाव दिया.

स्मिता, राहुल और जयंत के बाहर आते ही सबने उनकी ओर देखा. सबके चेहरों पर एक मुस्कराहट थी. हॉल में तेरह वयस्क नंगे खड़े थे और चुदाई के लिए उत्सुक थे.

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मधुजी और रजनी भी उस गुट को अपने कमरे से देख रहे थे. राहुल और मेहुल के लौडों ने दोनों के मुंह और चूत में पानी भर दिया था. दोनों की आँखें मिलीं और एक मूक संदेश पारित हुआ. दोनों इस समय घुटनों पर थीं और एक दूसरे के सामने थीं. और जहाँ मधुजी की चूत और गाँड दोनों में रिसोर्ट के लड़कों के लौड़े हाथापाई कर रहे थे, वहीं रजनी की गाँड पर सिद्धार्थ ने लौड़ा रखा ही था. विलास और रवि प्रतीक्षारत थे. उनके भी लंड पूरे तने हुए बुलावे के लिए सजग थे.

रिसोर्ट के अन्य कमरों में भी सज्जन नर नारी इसी प्रकार के कौटुम्बिक व्यभिचार में लिप्त थे. कुछ ने रजनी और मधुजी के समान रिसोर्ट के लड़कों या बालाओं को बुलाया हुआ था. रिसोर्ट में कामवासना का ज्वर अपने चरम पर था.

कहीं चुदाई आरम्भ हो चुकी थी तो कहीं आरम्भ होने वाली थी.

रात्रि अभी शेष थी.

क्रमशः

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