Incest कैसे कैसे परिवार - Page 15 - SexBaba
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Incest कैसे कैसे परिवार

अध्याय ६८: जीवन के गाँव में शालिनी ५

अध्याय ६७ से आगे

अब तक:

जीवन ने शालिनी को मित्र मंडली के गहरे संबंधों के विषय में बताया. शालिनी समझ गई कि उसका विवाह चाहे ही जीवन से हो, पर वो पत्नी सम्पूर्ण मित्र मंडली की होगी। आज रात से गैंगबैंग की शृंखला का भी आरम्भ होना था. गैंगबैंग प्राप्तकर्ता भाग्यशाली स्त्री कौन होगी, उसका नाम एक गुप्त पर्ची में निकालकर एक ओर रख दिया गया. शालिनी के साथ जस्सी और कँवल के संसर्ग भी आज ही के लिए निर्धारित हुआ. वहीँ शालिनी को उसके भावी पोतों के द्वारा दुहरी चुदाई का आनंद भी आज ही करने का निर्णय लिया था. गीता को उसके पोते अब चोदने के लिए आतुर थे, तो गीता भी उत्सुक थी.

“अब तीन बजने को हैं, तो आगे क्या करना है?” जीवन ने पूछा.

गीता बोली, “मुझे तो अपने नातियों से चुदना है. और मुझे अपनी चूत में भी दो लंड का अनुभव करना है.”

“मेरा ये सोचना है कि कँवल भाईसाहब को भी शालिनी की चुदाई का अवसर आज ही मिलना चाहिए. वो गैंगबैंग में बाद में जुड़ सकते हैं, वैसे भी वो लम्बे समय तक चलना है. और, यही अवसर शालिनी को अपने होने वाले पोतों के साथ मिलना चाहिए.”

अब आगे:

शालिनी को असीम और कुमार से एक साथ चुदवाने में कुछ असहजता थी. हालाँकि उसने जीवन के कहने पर सहमति दे दी थी. परन्तु क्या वो इसे कल तक के लिए टाल पायेगी, ये सोचकर उसका चेहरा गंभीर हो गया.

“अगर इच्छा न हो, तो मना कर देना. कोई बुरा नहीं मानेगा. दुहरी चुदाई में अगर मन न हो तो आनंद नहीं आता बल्कि कष्ट ही होता है.” जीवन ने मानो उसके मन के भाव पढ़ लिए.

“आज नहीं करें तो चलेगा?”

“बिलकुल. अभी कुछ नहीं कहो, मैं बाद में संभाल लूँगा. अब जाओ, जस्सी के साथ आनंद लो.”

शालिनी उठी तो जस्सी उसके पास आ गया और उसे बाँहों में भर लिया. असीम और कुमार अपना पेग समाप्त करके गीता के पास आये और उसे उठाया.

“नानी, आपको चोदने की बहुत दिनों से इच्छा थी. अब आपको जी भर कर चोदने वाले हैं.” असीम ने उसकी गर्दन को चूमते हुए कहा.

“जिस दिन सुनीति ने कहा था कि तुम दोनों भी आ रहे हो, उस दिन से मैं इस पल की प्रतीक्षा में थी. इन सब ने मिलकर मुझे तुम दोनों से दूर कर दिया. पर अब मुझे जम कर चोदना। फिर तो अपने घर में चाहो तो मुझे कुछ दिन अपने ही कमरे में रखना.”

“नाना का क्या होगा? वो क्या करेंगे?”

“अरे उनके लिए सुनीति है, गुड़िया है, सलोनी है और भाग्या भी तो है. उन्हें मेरा कहाँ ध्यान रहने वाला है.”

सब इस वार्तालाप को सुनकर आनंदित हो रहे थे.

“नानी, भाग्या तो अभी बच्चे को जन्म देने वाली है. और वो वैसे भी पापा के सिवाय किसी को हाथ नहीं रखने देती.”

“ठीक है, फिर भी तीन तो हैं न उनके लिए, और फिर शालिनी भी तो पड़ोस में रहती है, उसे भी तो परिवार से मिलाया जायेगा, तब क्या तेरे नाना उसे छोड़ेंगे?”

“बात तो सही है नानी. फिर अदिति आंटी और उनकी पोती भी तो है. और मेरी होने वाली पत्नी महक भी है. नाना की तो लॉटरी लगने वाली है.

“हाँ, भई. सारी लॉटरी मेरी ही लगेगी, जैसे इसे सब छोड़ देंगे. अरे गाँव की टनाटन गोरी है, मोहल्ले में आग लगा देगी.” बलवंत हँसते हुए बोला और सब ठहाका मार कर हंस पड़े.

“अब चलो, इनसे बात करना ही व्यर्थ है, हर बात घुमाकर मेरे ही ऊपर ले आते है.” गीता ने अपने नातियों के हाथ पकड़े और उस सोफे की ओर चल दी जो इस गतिविधि का केंद्र बन गया था. निर्मला और बबिता ने यहीं अपनी चूत में दो दो लौड़े लिए थे और वहाँ जाने का अर्थ यही था कि गीता भी अब इस आनंद से वंचित नहीं रहना चाहती थी. उसकी चूत से बहता हुआ पानी इसका साक्षी था.

शालिनी जस्सी से लिपटी हुई थी. बलवंत और सुशील से चुदने के बाद उसे भी इस जीवनशैली में आनंद आने लगा था. अपने परिवार से सम्भोग के बाद अब इस प्रकार से अन्य पुरुषों से उन्मुक्त चुदाई का अलग ही सुख था. सबसे बड़ी बात ये थी कि उसका भावी पति इसमें पूर्ण रूप से संलग्न था और उसे प्रोत्साहन भी दे रहा था. कल बलवंत से गाँड मरवाने के बाद उसे जीवन से गाँड मरवाने में जो आनंद मिला था वो अवर्णनीय था. आज सुशील उसके तीनो छेदों का आनंद ले चुका था और अब जस्सी भी ये सुख प्राप्त करने वाला था. जस्सी का फनफनाता लंड इस को दर्शा रहा था. इस समय केवल गीता और उसकी ही चुदाई होनी थी. अन्य सभी विश्राम करने वाले थे.

जीवन ने निर्मला से कुछ कहा तो निर्मला ने आश्चर्य से उसे देखा। जीवन ने विश्वास दिया कि वो सच बोल रहा है. निर्मला ने अपने पति सुशील को बाहर चलने के लिए कहा. वहाँ जाकर निर्मला ने सुशील को जीवन द्वारा बताई हुई बात कही तो सुशील ने उसे कपड़े पहनने के लिए कहा. दोनों अंदर कमरे में गए और कपड़े लेकर बाहर आये. सुशील ने जीवन को संकेत किया कि वो उसकी इच्छा के अनुसार कार्य करने जा रहा है. बलवंत ने उसे अँगूठा उठाकर अपनी सहमति का प्रदर्शन किया तो सुशील समझ गया कि ये बलवंत या गीता में से किसी की योजना थी. सुशील और निर्मला को जाते गीता ने भी देखा पर उसके हाथों में लौड़े थे और चेहरे पर एक रहस्य्मयी मुस्कान जिसका अर्थ कुछ भी हो सकता था.

शालिनी अब जस्सी के साथ मिल-जुल गई थी और उसे बैठा कर उसके लंड को चूस रही थी. बीच बीच में वो जीवन को देखती, उनकी आँखें मिलतीं और मूक स्वीकृति मिल जाती. लंड को चूसकर जब वो तृप्त हो गई तो उसने जस्सी को देखा जिसने बिना देरी किये उसे उठाया और पलंग पर लिटा दिया. अपने लंड को शालिनी की चूत पर रखा और बिना किसी चेतावनी के अंदर धकेल दिया. इतने दिनों से जिस चूत को चोदने का वो स्वप्न देख रहा था, आज उसे पाकर उसका लंड अंदर फड़फड़ा गया, जिसे शालिनी ने भी अनुभव किया. उसने अपने पैरों को फैलाकर जस्सी को और भीतर आने का निमंत्रण दे दिया.

“नानी, अब बहुत चूस लिया. नहीं तो मुँह में ही झड़ जायेंगे.” कुमार ने गीता से बोला जो एक एक करके दोनों के लंड इतनी तन्मयता से चूस रही थी कि उनके जैसे युवा भी झड़ने के निकट पहुंच गए थे.

“उसमें वैसे तो कोई बुराई नहीं है, पर अच्छा यही होगा कि इन्हें इनके सही स्थान पर ही पानी छोड़ने दिया जाये.” गीता ने सहमति जताई.

किसी आगंतुक के आक्रमण के आशा से उसकी चूत और गाँड अब लुपलुप कर रहे थे. अगर शीघ्र ही उन्हें मथने के लिए उनमें किसी दण्ड का प्रवेश न हुआ तो वो आक्रोशित हो सकते थे. गीता ऐसा कुछ नहीं होने देने वाली थी. उसके पास दोनों के लिए दो दण्ड थे और दोनों का प्रयोग करना उसे भलीभांति आता था. इस बार कुमार ने अपने बड़े भाई असीम को गाँड मारने का निवेदन किया, जिसे असीम ने सहर्ष ही स्वीकार कर लिया.

“भाई, क्या नानी को इस बार ट्रिपल ट्रीटमेंट दे दें?” कुमार ने सोफे पर बैठते हुए पूछा.

“क्यों नहीं. हमारी नानी हैं, हमें मना थोड़े ही करेंगी. है न नानी?”

“क्या देने को बोल रहा है ये?” गीता ने पूछा।

“नानी, वो आप दोनों पर छोड़ दो. आप बस आनंद लो. ये बताओ कि आपको हम पर विश्वास है या नहीं?”

“ये क्या पूछ रहा है. जो देना है सो दो और जो लेना वो लो. तुम्हारे लिए कोई बंधन इस सीमा नहीं है.” गीता ने पूर्ण विश्वास से कहा.

दूर से जीवन ने सुनकर उसके दोनों पोतों का षड्यंत्र भाँप लिया परन्तु कुछ न कहने का निर्णय लिया. गीता अपने नातियों से चुदने के लिए इतनी अधिक उत्सुक थी कि उसने उन्हें खुला निमंत्रण दे दिया था. वो असीम सुख का अनुभव पाने वाली थी.

सोफे पर कुमार ने अपने पीछे एक मोटा तकिया लगाया जिससे कि वो सामने आ गया. अब गीता के पैर हत्थों से बाधित नहीं होने वाले थे. गीता ने बिना संकोच के कुमार के दोनों ओर अपने पैर किये और उसके लंड को हाथ में लेकर अपनी चूत पर लगाया उस पर बैठती चली गई. अपने छोटे नाती के लंड को पूरा चूत में उतारने के बाद उसने एक गहरी श्वास भरी. इस सुख के लिए वो कितने दिनों से उत्सुक थी. उसकी चूत ने उसकी भावना का अनुशरण किया और लुपलुपना कुछ पलों के लिए बंद कर दिया. परन्तु फिर उसकी नसों में रक्त का संचार हुआ और फिर एक नई उमंग से चूत कुलबुलाने लगी.

“आह नानी. कितना अच्छा लगता है आपके साथ.” कुमार ने उसके झूलते मम्मों को हाथ में लेकर मसला और फिर उन्हें मुँह में लेकर चूसने लगा.

“हाँ, बिटवा. मैं भी तरस गई तुम दोनों के लिए. न जाने कितनी रातें बिताई हैं मैंने तुम्हारी कल्पना में.” गीता की आँखों में आँसू आ गए.

“अब तो हमारे साथ ही रहोगी, जब मन हो हमें बुला लेना. सब छोड़ कर आ जायेंगे.” असीम ने लंड उसकी गाँड पर रखते हुए कहा, “जैसे चाहोगी, वैसे चोदा करेंगे.”

असीम ने गीता की कमर पर हाथ रखकर उसे आगे झुकाया और अपना लौड़ा गीता की गाँड में डालने का उपक्रम आरम्भ कर दिया. उसे पता था कि उसकी महा चुड़क्कड़ नानी एक बार में भी लौड़ा झेलने की क्षमता रखती है, परन्तु वो इस खाई के हर रोम को अपने लंड से छूना चाहता था.

“ओह! मेरी माँ! इतना सुख है तुम दोनों के साथ.” गीता ने कहा और कुमार को चूमने लगी.

असीम ने धीमी गति से आगे बढ़ते हुए अपने लंड को पूर्णतः अपनी नानी की गाँड में डालकर एक गहरी श्वास भरी. इतने दिनों की इच्छा इस संसर्ग से पूर्ण हुई थी. तीनों कुछ क्षणों इस अनुभव को आत्मसात करना चाहते थे. कोई न हिला, बस उनके गुप्तांग अपनी धड़कन एक दूसरे को सुना रहे थे. चूत और गाँड के मध्य की उस पतली झिल्ली पर अत्यधिक दबाव था और दोनों भाइयों को एक दूसरे के लौंड़ों का स्पंदन हो रहा था. साथ ही उनकी नानी की चूत और गाँड खुलने और बंद होने का असफल प्रयास कर रही थीं.

गीता स्वर्ग के द्वार पर थी, और उसे अंदर प्रवेश करने के लिए धक्के उसके नातियों ने ही देने थे. उन दोनों के बीच वो हिलने डुलने की स्थिति में नहीं थी. असीम ने पहले उसकी गाँड मारना आरम्भ किया और फिर कुछ ही क्षणों में कुमार ने उसकी चूत में चप्पू चलाने का बीड़ा उठाया. स्वर्ग का द्वार धीमे से खुलने लगा, गीता को बहुरंगी प्रकाश की किरणे दिखने लगीं. असीम और कुमार ने अपनी गति बढ़ाई और कुछ ही देर में दोनों ने उसे वो धक्का लगाया जिसके कारण वो स्वर्ग का विचरण करने लगी.

उसका मन मस्तिष्क बहुआयामी प्रतिबिम्बों से आल्हादित हो गया. वो उस दृश्य को देख के आनंद से किलकारियाँ ले रही थी. जिसे वो किलकारियाँ समझ रही थी वो उसकी आनंद भरी चीखें थीं जिन्हें कमरे में उपस्थित सभी लोग सुनकर उसके सुखद अनुभव का परोक्ष रूप में आनंद ले रहे थे.

जस्सी का लंड अब शालिनी की चूत में समा चुका था और चुदाई की भीषण आँधी चल रही थी. जस्सी गाँव का परिश्रम करने वाला किसान था. उसका शरीर उसकी शक्ति का परिचायक नहीं था. जहाँ जीवन लम्बा और हट्टा कट्टा था, वहीँ जस्सी का शरीर अनुमान में पतला था. परन्तु न उसका लौड़ा जीवन से उन्नीस था न ही उसके चोदने की क्षमता. उसकी चुदाई का ढंग अवश्य भिन्न था, शक्तिशाली चुदाई के बाद भी उसकी चुदाई में एक ठहराव था. जीवन जिस प्रकार से चुदाई करता था वो निर्ममता का बोध कराती थी. जस्सी की चुदाई में एक प्रेम का भाव था. स्त्रियों को उनकी मनोदशा के अनुसार दोनों प्रकार की चुदाई की आवश्यकता होती थी. सम्भवतः यही कारण था कि ये चारों परिवारों में इतने अंतरंग संबंध थे. अपने मन के अनुसार स्त्रियाँ अपनी चुदाई का साथी चुन सकती थीं.

********

कमरे में अब चुदाई से गीता की चीत्कारों और शालिनी की सिसकारियों के रूप में एक सरगम का मादक संगीत बज रहा था.

उधर निर्मला और सुशील जीवन के खेतों में बने एक घर में प्रवेश कर के सामने चल रहे दृश्य को देख रहे थे. सुशील के हाथ में १२ शराब की बोतलों का क्रेट था. उनके सामने एक महिला बैठी हुई थी जिसने घाघरा और चोली पहनी हुई थी. इस समय घाघरा उसकी कमर के ऊपर बँधा हुआ था. उसके सामने एक अत्यंत मरियल पुरुष उसकी चूत चाटे जा रहा था. वो महिला कुछ कुछ देर में अपनी कमर उठाकर अपनी गाँड भी उसके सामने कर देती थी जिसे चाटने में वो पुरुष कोई संकोच नहीं करता था. उस महिला ने सुशील की ओर देखा और अपनी जीभ होंठों पर घुमाई.

महिला: “देखो, बाबूजी ने तुम्हारे लिए कितनी मंहगी शराब की बोतलें भेजी हैं.”

उस पुरुष ने अपना मुँह हटाया और सुशील की ओर मुड़कर देखा.

“नमस्ते बाबूजी. आप इस बार बहुत बोतलें लाये हो. लगता है इस बार इसे कई दिनों के लिए ले जा रहे हो. बस मुझे कुछ समय दीजिये फिर इसे साथ ले जाइएगा.”

“हाँ, भूरा. इस बार एक सप्ताह के लगभग के लिए बाबूजी ने बुलाया है. एक नए अतिथि को लाये हैं और उससे भी मिलाना चाहते हैं बसंती को. हम गाड़ी में बैठे हैं, इसे भेज देना अपना पेट भरने के बाद.”

“जी बाबूजी.” भूरा ने उत्तर दिया.

बसंती ने भूरा को प्रेम से देखा, “कितना प्रेम करता है तू मुझसे. स्वयं चोद नहीं पाता है फिर भी मेरी आग बुझाने के लिए इन सबके पास भेज देता है. अब चाट ले अच्छे से तुझे पानी पिलाकर जाती हूँ. सुबह आकर भोजन बना दूँगी। अपना ध्यान रखना और दारू पीकर गिर मत जाना कहीं. घर पर ही रहना. ठीक है न.”

“ठीक है.” ये कहकर भूरा ने बसंती को एक बार झड़कर उसका पानी पी लिया.

बसंती ने अपना लंहगा नीचे किया और एक चुन्नी सीने पर डालकर बाहर जाकर गाड़ी में बैठ गई. भूरा ने लपक कर एक बोतल निकाली और काँपते हाथों से एक पेग बनाया और गटागट पी गया. उसके हाथों ने काँपना बंद कर दिया और उसके चेहरे पर एक शांति का भाव छा गया.

बसंती: “इस बार बाबूजी ने बहुत दिनों बाद मुझे बुलाया है. क्या बात है?”

निर्मला: “इस बार वो अपनी भावी पत्नी शालिनी को लेकर आए हैं. मुझे लगता है कि वो उसे अपना विद्रूप रूप भी दिखाना चाहते हैं. हममें से तो कोई उनकी उनकी इस क्रीड़ा में उनका साथ नहीं देता है. इसीलिए तुझे बुलाया है जिससे कि बाद में शालिनी को कोई धक्का न लगे. अगर वो आगे जाने से मना कर दे तो वो ये सब छोड़ देंगे. मेरा यही अनुमान है.”

बसंती: “ठीक है. अगर उन्होंने बंद भी किया तो आप सब तो मुझे वंचित नहीं रखेंगे न?”

सुशील: “अरे तेरा इतना ध्यान रखते हैं, आगे भी रखेंगे. पर मुझे लग रहा है कि बलवंत तुझे साथ ले जाने के लिए कहेगा. भूरा तो यहीं रहेगा. उसका हम ध्यान रख लेंगे. बलवंत के घर में रहकर उसकी देखभाल कर लेगा. सलोनी और भाग्या को भी सहारा हो जायेगा. वैसे भी तेरी नातिन अब किसी भी दिन बच्चे को जन्म देने वाली है.”

बसंती: “भूरा मन का बहुत अच्छा है. बस दारू ने उसका सर्वनाश कर दिया.”

सुशील: “जीवन सम्भवतः कोई प्रबंध कर रहा है. बता रहा था कि उनके नगर में कोई क्लिनिक है जिसमें शराब छुड़ाई जाती है. उसमें जब भी कोई स्थान मिलेगा वो स्वयं तुझे बता देगा. इसीलिए भी तुझे साथ ले जाना चाहता है. अगर तू वहाँ रहेगी तो जाने से मना नहीं कर सकेगा. यहाँ रहेगी तो कोई न कोई बहाना निकलता रहेगा.”

बसंती: “बाबूजी सबका कित्ता ध्यान रखते हैं न?”

निर्मला पीछे मुड़कर बोली: “हाँ और आज तेरा ध्यान रखने वाले हैं. तुझे अपने प्यार से नहलाने वाले जो हैं.”

बसंती का चेहरा लाल हो गया, “क्या दीदी, आप सब भी तो नहलाओगे मुझे प्यार से.”

सुशील: “अब तू इतनी प्यारी है तो कैसे न करें?”

बसंती को हर दिन भूरा के घर ले जाने का विश्वास दिलाकर सब यूँ ही बतियाते रहे. कुछ ही देर में वो बलवंत के पहुंच गए.

********

उधर बलवंत के घर पर चुदाई समारोह की उपकथा अपने अगले चरण में प्रवेश कर चुकी थी. शालिनी की चूत का भोग लगाने के बाद अब जस्सी उसकी गाँड मारने में व्यस्त था. शालिनी भी अब गाँड मरवाने में अभ्यस्त हो गई थी और इसमें उसे आनंद आने लगा था. पहले भी गाँड मरवाई थी परन्तु इतने कम अंतराल में नहीं. और अब तो लगता था कि हर चुदाई में उसकी गाँड मारा जाना एक स्वाभाविक विस्तार होगा.

गीता की चूत और गाँड मारने के बाद दोनों भाइयों ने उसे भी चूत में दो लंड का सुख देने का निर्णय ले लिया था. और इसके लिए गीता को पलट दिया गया था और उसकी चूत में नीचे से अभी भी कुमार का ही लंड था, पर सामने असीम अपने लंड को लेकर खड़ा हुआ था. गाँड से निकले लौड़े को गीता से चटवाने की इच्छा को दबाते हुए उसने अपनी नानी की चूत पर लंड लगाया. कुमार ने लंड पहले ही बाहर निकाला हुआ था. दोनों लंड आपस में सटे हुए थे और एक साथ अंदर की और अग्रसर होने लगे.

गीता असीम की आँखों में झाँक रही थी. वो अपने नाती के आनंद की अनुभूति करना चाहती थी. असीम की आँखों में अथाह प्रेम दिख रहा था. असीम भी गीता के चेहरे के भाव पढ़ रहा था. दोनों लौंड़ों के प्रवेश के साथ साथ गीता के भाव कौतुहल की ओर थे. गीता ने इस प्रकार का अनुभव जीवन में पहले कभी नहीं किया था. इतने वर्षों में सामूहिक चुदाई करते हुए भी कभी चूत में एक साथ दो लौड़े नहीं लिए थे. और आज उसके नाती उसे इसका ज्ञान दे रहे थे.

दोनों लौंड़ों ने अंततः गीता की चूत की गहराई को नाप ही लिया. इस समय गीता को अपनी चूत इतनी भरी हुई लग रही थी जितनी अपनी युवावस्था में लगती थी.

असीम: “क्या नानी, कैसा लग रहा है?”

गीता: “सच में बेटा अद्भुत अनुभव है. इसीलिए मेरी बहनें इतनी भाग्यशाली हैं. मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि मैं ये सुख उनके सामने ही पा रही हूँ.”

उधर शालिनी की गाँड में जस्सी अपने लंड से लगातार धक्के लगा रहा था. गाँड मारने के समय उसका प्रेम का रूप छुप गया था और वो भी बलवंत और जीवन के ही समान पूरी शक्ति के साथ उसकी गाँड में उत्पात मचाये हुए था. शालिनी की आनंदकारी सीत्कारें उसका साथ दे रही थीं.

तभी कमरे में निर्मला और सुशील ने प्रवेश किया. उनके पीछे बसंती खड़ी हुई थी. उसे कमरे से चुदाई का संगीत और सुगंध दोनों आ रही थीं और उसकी चूत कुलबुलाने लगी थी. परन्तु उसे पता था कि उसे किस प्रयोजन से बुलाया गया है. पहले वो इस प्रकार के आयोजनों में नियमित बुलाई जाती थी, परन्तु कई महीनों से उसे इसका अवसर नहीं मिला था. वो सप्ताह में अवश्य दो या तीन बार इन मित्रों में से किसी न किसी के घर जाकर अपने शरीर का व्यायाम कर लेती थी, पर आज उसे अपने मन और तन दोनों को तृप्त करने का अवसर मिलेगा.

निर्मला ने बसंती का हाथ पकड़ा और उसे जीवन के सामने ला खड़ा किया.

“लो भाईसाहब, ले आई आपकी बसंती को.”

जीवन उसे देखकर मुस्कुराया, “बड़े दिन बाद आई है. हमें भूल गई क्या?”

“नहीं बाबूजी, आपको कैसे भूलूँगी। अब तो आप फिर से दादा बनने वाले हो. तो मेरे संबंधी भी बन जाओगे.” बसंती का संकेत भाग्या की होने वाली संतान की ओर था जो जीवन के बेटे आशीष के बीज से जन्मने वाला था.

“हाँ, ये तो लगभग निश्चित ही है.” जीवन ने ऊपर से नीचे तक उसे निहारा और होंठों पर जीभ घुमाई, “इतने सारे कपड़े क्यों डाली है अपने जोबन पर?”

“हाय दैया क्या कह रहे हैं बाबूजी? सबके सामने नंगी हो जाऊँ?” फिर हंसकर बोली, “सच में अब कल सुबह तक इन निगोड़ों का कोई काम भी तो नहीं है.”

बसंती ने कपड़े निकालने में कोई समय नहीं गँवाया और जीवन के सामने बैठ गई. जीवन के मोटे लौड़े को देखकर उसने अपनी जीभ से होंठ गीले किये.

“पहले जिसने बुलाया है उसकी सेवा कर.” जीवन ने बलवंत की ओर संकेत किया.

बसंती तुरंत बलवंत के सामने गई और इससे पहले कि वो कुछ कहता उसके लंड को मुँह में लेकर चूसने लगी.

“बहुत प्यासी लग रही है ये!” बलवंत ने हंसकर कहा.

“हाँ, कुछ देर रुको फिर इसकी सारी प्यास बुझाएँगे।” जीवन ने उत्तर दिया और शालिनी की ओर देखने लगा. ये शालिनी की अंतिम परीक्षा होगी. उसने मन में कामना की कि शालिनी इसमें उत्तीर्ण हो सके.

बलवंत के लंड चूसने के बीच में ही बलवंत ने उसे रोक दिया.

“अभी नहीं. जाकर गीता को देख क्या कर रही है.”

अनमने भाव से बसंती उठी और दोनों चुदाई के दृश्यों को देखा. एक नई स्त्री की गाँड मारने में जस्सी व्यस्त था तो दूसरी ओर गीता की चुदाई में उसके नाती लगे हुए थे. वो गीता के पास गई तो हतप्रभ रह गई. गीता की चूत में दो दो लंड अबाध गति से अंदर बाहर आ जा रहे थे. उसे पास आया देख कुमार और असीम मुस्कुराये.

“क्या छोटी नानी? आप भी आ गयीं?”

“हाँ मुन्ना, तेरे दादा ने बुलवा भेजा तो कइसन मना करती. ये तुम दोनों क्या अपनी नानी की दुर्गति कर रहे हो? चूत में दोनों लंड डालकर चोद रहे हो, कहीं कुछ हो न जाये.” बसंती की आँखें गीता की सूजी हुई चूत पर गड़ी हुई थीं.

“अरे कछु न होइ छोटी नानी. बाकि तीनों नानिओं को भी अइसन है चोदे रहे हम. दुइनौ बहुत मजा लिए रहीं. और अब तुम्हें भी चोदने वाले हैं. पहिले तनिक दादा से निपट लेयो.” असीम ने गाँव की भाषा में उत्तर देने का प्रयत्न किया.

“हाय दैया, ये क्या बोल रहा है?” बसंती सच में सहम गई.

“तू चुप कर और मुझे चुदवाने दे. नहीं तो तेरी गाँड में बाँस कर दूँगी।” गीता ने अपनी चुदाई में व्यवधान से क्रुद्ध होकर कहा.

“अरे दीदी, गुस्सा न करो. मैं चली.” बसंती वहाँ से लौटकर जीवन के पास गई तो जीवन ने उसे अपनी गोद में बैठने के लिए कहा.

“क्या हुआ?” जीवन ने उसकी गर्दन को चूमते हुए उसकी चूत में ऊँगली डाली.

“दोनों दीदी की चूत को एक साथ चोद रहे हैं.” बसंती ने कुनमुनाते हुए उत्तर दिया.

“अभी तो एक साथ गाँड भी मारेंगे, तब क्या करेगी?”

“क्या बाबूजी, ऐसे मत बनाओ. ऐसा भी होता है क्या?”

“अरे मेरी सुनीति की गाँड कई बार मारी है दोनों ने मिलकर. तेरी भी इच्छा हो रही होगी न?”

बसंती कुछ न बोली तो जीवन ने कहा.

“सुन, मेरे साथ चल इस बार. मैंने भूरा की शराब छोड़ने के लिए प्रबन्ध किया है. पर अगर तू यहाँ रही तो वो नहीं आएगा. वैसे भी भाग्या अब बच्चा जनने ही वाली है. तो उसकी भी देखभाल करनी होगी.”

“बाबूजी, इन्हें छोड़कर कैसे चलूँ. दारू पीने के बाद मैं तो इन्हें खाना खिला भी देती हूँ. कौन देखेगा इन्हें?”

“क्यों? क्या पूनम, बबिता और निर्मला ध्यान नहीं रखेंगी? मेरे विचार से तो वो तुझे आँख दिखाकर तेरे प्रेम का अनुचित लाभ उठाता है. उन्हें कुछ न बोल पायेगा. वैसे भी इस घर में ही रहेगा. तू चिंता न कर.” जीवन ने उसे समझाया.

“ठीक है बाबूजी. पर ये आप ही बोलना उसे. आपसे बहुत डरता है, मुझसे न मानेगा.”

“ठीक है, वहां तू मेरे साथ ही रहेगी, मेरे कमरे में.”

“बाबूजी, मेरा जीवन ही कृतार्थ हो जायेगा.”

“रुक, तुझे अपनी होने वाली पत्नी से मिलवाता हूँ. जस्सी उसकी गाँड मारकर निपट ले. तेरा भी परिचय हो जायेगा उसकी गाँड से.”

बसंती ने जस्सी की ओर देखा जो अब अंत के निकट था. उसने जीवन की ओर देखा और उसकी आज्ञा लेकर जस्सी और शालिनी के पास जा खड़ी हुई.

जस्सी ने उसे देखा तो समझ गया कि बसंती के मन में क्या है. उसके विषय में सोचते ही उसके लंड ने पानी छोड़ दिया और शालिनी को अपनी गाँड में उसे वीर्यपात का सुखद अनुभव हुआ. जस्सी ने कुछ समय तक लंड शालिनी की गाँड में ही रखा जब तक उसकी अंतिम बूँद स्खलित नहीं हुई. उसने बसंती को देखा.

“आ अपने इच्छा पूरी कर ले. नई नई गाँड है, माल पुराना है.” जस्सी ने अपने ढीले पड़ते लंड को पक्क की ध्वनि से बाहर निकाला। शालिनी को उसकी गाँड के खुले छिद्र में ठंडी पवन का आभास हुआ. परन्तु इससे पहले कि वो इसका पूर्ण आनंद ले पाती उसे अपनी गाँड पर किसी की जीभ का अनुभव हुआ. उसे ध्यान आया कि जस्सी कुछ समय पहले किसी से बात कर रहा था. सम्भवतः कोई नई स्त्री थी. उसने इस विषय में बाद में चिंतन करने का निर्णय लिया क्योंकि उस जीभ को अपनी गाँड में प्रवेश करते पाया.

बसंती मानो सदियों की भूखी हो, वो अपनी जीभ को घुमा घुमाकर शालिनी की गाँड से जस्सी के रस की हर बूँद सोख रही थी. शालिनी को गुदगुदी होने लगी तो वो गाँड हिलाकर हंसने लगी. जीवन शालिनी के इस अनुभव से आनंदित हो रहा था. बसंती ने भी अपनी भूख मिटाकर ही अपनी जिव्हा को विश्राम दिया. उसके बाद ही उसने उस गाँड की स्वामिन स्त्री की ओर देखा. परन्तु अभी उसका चेहरा दूसरी ओर था और उसके पलटने के पहले ही जस्सी ने उसे अपना लंड भी चाटने के लिए प्रस्तुत कर दिया. बसंती ने पूरे प्रेम से उस मलिन लंड को चाटकर चमका दिया.

अब तक शालिनी उठ गई थी. उसने एक सांवली गठे शरीर की स्त्री को जस्सी के लंड को चाटते देखा. न जाने क्यों उसके मन में ये देखकर वितृष्णा नहीं हुई. इस समूह में मानो उसे ये देखकर कोई अचम्भा नहीं हुआ. जस्सी ने बसंती के गाल पर प्रेम से हाथ फेरा और हट गया. अब तक जीवन उनके पास आ चुका था. शालिनी और बसंती ने एक दूसरे को देखा, तो जीवन ने उनका परिचय करवाया.

“आप बहुत सुंदर हो दीदी. मेरे बाबूजी बहुत भाग्य वाले हैं जो उन्हें आप मिल गयीं. और सच कहूँ तो यही आप पर भी सार्थक होता है. मुझे बहुत प्रसन्नता है, दीदी.” ये कहकर बसंती ने अपनी आँख से काजल निकाला और शालिनी के माथे के एक ओर लगा दिया।

शालिनी उसके इस क्रिया और कथन से शालिनी भावुक हो गई और बसंती को गले से लगा ली.

“बाबूजी, आपकी चयन उत्तम है. मेरी शुभकामनायें आप दोनों के लिए.” बसंती ने जीवन से कहा.

“तू भी सदा मेरी चहेती रहेगी. अब जा गीता का भी ध्यान कर ले. उसके नाती भी उसकी चुदाई समाप्त करने वाले हैं.”

बसंती ने गीता की चीख सुनी तो समझ गई की चुदाई लीला समाप्त हो गई है. वो वहाँ जाकर खड़ी हुई तो असीम ने अपना लंड निकाला. बसंती ने लालच से देखा तो असीम ने उसे चाटने के लिए आमंत्रित किया. असीम का लंड चाटा ही था कि असीम ने उसे गीता की चूत की ओर संकेत किया. कुमार के लंड पर चढ़ी हुई गीता की चूत पर बसंती ने मुँह जमाया और चाटना और सोखना आरम्भ कर दिया. कुमार ने धीरे से लंड बाहर निकाला तो बसंती का कार्य और सरल हो गया. गीता की चूत से पूरा रस पीकर वो हटी. उसकी आँखों के सामने अब कुमार का लंड था जिसे उसने चाटकर अपना कार्य समाप्त किया.

गीता वहीँ लेट गई. वो अत्यधिक संतुष्ट थी. उसकी महीनों की प्यास मिटी थी. प्रतिदिन चुदाई होने के बाद भी अपने नातियों से चुदवाने में जो परम सुख था उसकी तुलना नहीं थी. और वो भी चूत में एक साथ, उसके मन में फिर से सुख और आनंद की लहर दौड़ गई.

कुछ ही देर में सब कुछ सामान्य हो गया. शालिनी जाकर जीवन के पास बैठ गई और गीता बलवंत के पास. जीवन को अचरज हुआ कि बोलने के बाद भी उसके पोतों ने गीता की तीसरा अनुभव नहीं कराया. आज के आगे के कार्यक्रम के विषय में बात होने लगी तो बसंती जीवन के सामने बैठकर उसका लंड चूसने लगी. उसने अपना अधिपत्य जमाना चाहा. जीवन ने उसके बालों में प्रेम से हाथ फेरा.

“शालिनी को दिखाना है कि तेरा क्या आकर्षण है जो तुझे हम सबकी ओर खींचता है.”

“जी बाबूजी, दीदी को भी जानना ही चाहिए.”

असीम और कुमार ने सबको पेग बनाकर दिया. बसंती ने मना कर दिया. शराब ने उसके घर का सर्वनाश जो किया था.

गीता और शालिनी को छोड़कर वो कौन थी जिसे आज गैंगबैंग का सुख प्राप्त होना था. क्या असीम और कुमार गीता को उसका तीसरा अनुभव आज कराएँगे? शालिनी बसंती और उनके बीच की क्रीड़ा से अपना मन तो नहीं बदलेगी? यही प्रश्न सबके मन में थे, जिनका उत्तर आज मिलना था.

अभी शाम ही हुई थी, और आगे बहुत रात शेष थी.

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क्रमशः

1524600
 
अध्याय ६९: जीवन के गाँव में शालिनी ६

अध्याय ६८ से आगे


अब तक:

आज रात से गैंगबैंग की शृंखला का भी आरम्भ होना था. गैंगबैंग प्राप्तकर्ता भाग्यशाली स्त्री कौन होगी, उसका नाम एक गुप्त पर्ची में निकालकर एक ओर रख दिया गया.

शालिनी जस्सी के साथ चुदाई का आनंद उठा चुकी थी. अब कँवल ही शेष था जिससे उसकी चुदाई होनी थी. ये उस मित्र मंडली की बात थी. उसके बाद असीम और कुमार भी थे जो सम्भवतः उसकी एक साथ चुदाई करने वाले थे. अब तक के घटे प्रकरण के अनुसार तो वो साथ ही चुदाई करते थे. गीता की दुहरी चुदाई का आनंद दोनों भाइयों ले लिया था और उसे चूत में दो लौंड़ों का सुख भी प्रदान कर दिया था. उधर जीवन की इच्छा के अनुसार बसंती जो सलोनी की माँ थी, और भाग्या की नानी, उसे बुलाया गया था. उसे ऐसे आयोजनों में किन्हीं विशेष प्रयोजन के ही लिए बुलाया जाता था.

एक लम्बे विश्राम के बाद अगले चरण का शुभारम्भ होने वाला था. इसमें गीता, शालिनी और बसंती का योगदान रहने वाला था. अन्य तीनों स्त्रियां ये सोचकर उत्सुक थीं कि आज रात्रि में किसका गैंगबैंग होना है.

अब आगे:

शालिनी जीवन के साथ बैठी हुई बसंती को जीवन के लंड को पूरे प्रेम से चूसते देख रही थी. उसे कोई ईर्ष्या नहीं थी कि जीवन के घर को नौकरानी की माँ उसके भावी पति के लंड को चूस रही थी.

“ये गैंगबैंग में क्या सब मिलकर एक ही स्त्री को चोदोगे?” शालिनी ने विस्मय से पूछा.

“हाँ, इसका यही अर्थ है. चिंता न करो, तुम्हें भी लौटने से पहले इसका आनंद दिलवाऊँगा। और लौटने के बाद तुम्हारा विशेष गैंगबैंग भी करेंगे.” जीवन ने बताया.

“विशेष गैंगबैंग?” शालिनी ने कौतुहल से पूछा.

“विशेष ही तो होगा. तुम्हारे दोनों बेटे, और तीनों पोते तुम्हारे पति के साथ जब तुम्हारी चुदाई करेंगे तो विशेष ही होगा न?”

“धत्त! बस यूँ ही.” शालिनी ने कहा, फिर बोली, “हाँ, सच में विशेष होगा. दो बेटे आपका और मेरा, तीन पोते आपके और मेरे. सच में मैंने तो ये कभी सोचा ही नहीं!”

“हाँ, और अगर बलवंत को मिला लोगी तो सोने पर सुहागा हो जाएगा. मैं जानता हूँ कि सुनीति इसके लिए तुरंत मान जाएगी. अदिति मानेगी?”

“पता नहीं. हो सकता है बाद में मान ले. अभी तो ऑपरेशन के बाद सामान्य चुदाई से ही संतुष्ट है.”

“ओह! ओके. तब तो उसे इसमें बिलकुल नहीं सम्मिलित होना चाहिए.” जीवन ने कहा और बसंती के सिर पर हाथ फेरा.

“अब तुम्हारे एक परीक्षण का समय है, शालिनी. ये अंतिम है. बसंती क्या तुम आगे जाओगी? मैं इन्हें लेकर आता हूँ.”

“जी बाबूजी.” बसंती की आँखों की चमक कई गुना बढ़ गई और उसने अपने होंठों पर जीभ फेरी और उठकर बाथरूम में चली गई.

“ये बाथरूम में क्या करने गई है?” शालिनी ने पूछा.

“चलो तुम्हें दिखता हूँ. सबकी अपनी अपनी रूचि होती है. बसंती की भी है, और मेरी भी. वैसे बसंती की इस रूचि को हम सभी पूरा करने में साथ देते हैं.”

शालिनी को न जाने पेट में कुछ हिलता हुआ लगा. उसे आभास होने लगा कि क्या हो सकता है. इन सबके साथ दो ही दिन में उसके आयाम इतने विस्तृत हो गए थे कि वो कुछ भी असम्भव नहीं मानती थी.

“तुम्हें भी इसमें अपना योगदान देना होगा, नहीं तो बेचारी दुखी हो जाएगी.” जीवन ने उसे बाथरूम की ओर ले जाते हुए बोला।

“ठीक है, जैसा आप चाहें.” शालिनी ने उत्तर दिया तो जीवन ने उसकी ओर देखकर प्रसन्नता दर्शाई.

“एक अंतिम विनती. जो भी देखो, उसे देखकर मुझसे घृणा मत करना. मैं तुम्हें अपने विषय मैं हर बात बता दे रहा हूँ, जिससे कि बाद में ये हमारे बीच में कलह का कारण न बनें. मैं सब त्याग दूँगा परन्तु तुम्हें दिखाना आवश्यक है. इसके बाद का निर्णय तुम्हारा होगा.” जीवन ने उसकी आँखों में झाँक कर बोला।

शालिनी ने स्वीकृति दी और दोनों बाथरूम में चले गए. अन्य सभी ये देखकर अपने स्थानों पर बैठे थे. कुछ समय के लिए उन्होंने अपने कार्य स्थगित कर दिया.

वे किसी विस्फोट होने के लिए आशंकित थे. सबकी साँसे रुकी हुई थीं. जीवन और शालिनी जब बाथरूम में गए तो बसंती कमोड पर बैठी हुई थी और अपनी चूत रगड़ रही थी.

“बाबूजी, बहुत देर कर दी.”

जीवन उसके सामने बैठा और उसकी उँगलियों को खेलता देखता रहा. आज भी बसंती की चूत को देखकर उसके मुँह में पानी भर जाता था. बसंती और जीवन के बीच एक ऐसा संबंध था जिसके विषय में उनकी मित्र मंडली और परिवार को ही पता था. सलोनी को भी इसका आभास नहीं था.

“हाँ, बहुत दिन हो गए तेरा पानी पिए हुए. मैंने कितनी बार तुझे कहा है, अगर तू भूरा को पिलाने लगे तो इसमें इतना नशा है कि उसकी दारू स्वतः ही छूट जाएगी. पर तू मानती ही नहीं है.”

“बाबूजी, मुझे डर है कि वो कहीं मुझे छोड़ न दे.”

“नहीं छोड़ेगा. मेरी गारण्टी है.” ये कहते हुए उसने बसंती की उँगलियाँ हटाईं और अपना मुँह उसकी चूत पर लगा कर चाटने और चूसने लगा.

शालिनी ने देखा कि बसंती भी जीवन के बालों में उसी प्रकार से प्रेम से हाथ फिर रही थी जिस प्रकार जीवन ने उसके बालों में घुमाया था. ये एक आत्मीयता का परिचायक था. परन्तु शालिनी को किसी भी प्रकार की ईर्ष्या का अनुभव नहीं हुआ. वो इस प्रेमालाप को देख कर उत्तेजित हो रही थी.

“चाट लो बाबूजी, अपनी बसंती की चूत को चाटो। फिर मैं आपको पानी पिलाती हूँ. बहुत प्यासे होंगे न आप इतने दिनों से?”

जीवन ने मात्र सिर हिलाकर उसकी बात का समर्थन किया. बस दो तीन मिनट ही बीते होंगे कि बसंती बोली.

“बाबूजी, आपकी बसंती पानी पिलाने वाली है.”

शालिनी को आश्चर्य हुआ जब जीवन ने अपना मुँह उसकी चूत से हटाकर उसके सामने अपना मुँह खोल दिया. बसंती की चूत से एक धार निकली जो जीवन के मुँह में गिरने लगी. जीवन गटागट पीने लगा. शालिनी को अचानक समझ आया कि ये पानी साधारण पानी नहीं था बल्कि बसंती का मूत्र था जिसे जीवन अमृत के समान पिए जा रहा था. शालिनी को समझ नहीं पड़ा कि ये क्या हो रहा है. इतने शक्तिशाली व्यक्तित्व का स्वामी जीवन अपनी नौकरानी की माँ के मूत्र का सेवन इतनी रूचि से कर रहा था. उसे लगा था कि उसे घिन आएगी. परन्तु ऐसा भी नहीं हो रहा था, बल्कि उसकी चूत में एक लहर सी दौड़ी, जिसे वो समझ न पा रही थी. उसने हाथ लगाकर देखा तो उसकी चूत बहे जा रही थी. सम्भवतः उसे इसमें रोमांच का अनुभव हो रहा था.

बसंती ने जब जीवन को अपना मूत्र पीला दिया तो जीवन फिर से उसकी चूत चाटने लगा. बसंती ने शालिनी को देखा और मुस्कुराई. शालिनी ने भी मुस्कुराकर उसे देखा. मानो एक स्वीकृति हो गई.

“बाबूजी, दीदी को अच्छा लगा है. अब आप उठिये. मेरी भी प्यास बुझा दो अब.”

जीवन खड़ा हुआ तो उसका लौड़ा इतना कठोर था जितना शालिनी ने अब तक न देखा था. बसंती नीचे बैठी और जीवन के लंड को चूसने लगी.

“बसंती, मैं भी तुझे पानी पिलाने वाला हूँ. जीवन के मूत्र के लिए बसंती ने मुँह खोल लिया और इस बार जीवन ने उसके मुँह में मूत्रत्याग करना आरम्भ किया. पर अचानक बसंती ने मुँह बंद किया और अपना चेहरा सामने कर दिया. उसके चेहरे पर गिरता मूत्र उसके वक्ष पर गिरने लगा. जीवन के त्याग की समाप्ति पर बसंती ने उसका लंड चाटा और शालिनी से बोली.

“दीदी, आप भी पिलाओ न मुझे.”

शालिनी के शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई. वो आगे गई तो जीवन हट गया. बसंती ने शालिनी की चूत में जीभ डाली और शालिनी का संयम टूट गया और वो झड़ने लगी. जीवन ने उसके काँपते शरीर को संभाला और सहारा मिलते ही शालिनी की चूत से मूत्र की धार निकली जिसे बसंती पीने का प्रयास करने लगी. उसे इस बात की चितना न थी कि कितना मुँह में जा रहा है और कितना बाहर. वो तो अपने बाबूजी की भावी पत्नी के प्रेम को अपने में समाने से ही संतुष्ट थी.

जीवन ने शालिनी को छोड़ दिया और शालिनी ने अपना कार्य पूर्ण किया ही था कि उसे कमरे में से तालियॉं बजती सुनाई दीं और फिर बाथरूम में अन्य लोगों के आने का आभास हुआ.

“तो जीवन, तेरी बहू तो मान गई. अब बसंती भी खुश और तू भी.”

“हाँ मित्रों, एक चिंता दूर हो गई.” शालिनी जीवन के पास आ गई तो जीवन ने उसके होंठ चूमे. शालिनी को बसंती के मूत्र का स्वाद मिल गया. पर वो जीवन से लिपटी रही. अब अन्य सब बसंती को घेरकर उस पर मूत्र वर्षा कर रहे थे. उसके बाल, मम्मे कोई भी स्थान अछूता न रहा. बसंती आनंद से पीते हुए स्नान कर रही थी.

गीता ने बसंती को सहारा देकर उठाया और स्नान करवाया। भले ही बसंती को कोई अंतर नहीं पड़ने वाला था परन्तु अन्य सभी उससे दूरी बना लेते जो शाम के कार्यक्रम में बाधा डालने के लिए पर्याप्त था. बसंती को स्नान करवाने के बाद गीता उसे कमरे में ले आई और जीवन के पास बैठा दिया. अब शाम का गैंगबैंग के पहले का अंतिम प्रकरण आरम्भ करने का समय हो चला था. असीम और कुमार अपने मोटे लम्बे लौड़े खड़े करके इसके लिए उत्सुक थे तो वहीँ कँवल भी शालिनी की चुदाई के लिए आतुर था. शालिनी और गीता दोनों की चूतें भीगी हुई थीं. जीवन बसंती के मम्मे दबा रहा था. तो पूनम, बबिता और निर्मला शांत होकर एक ओर बैठी ये सोच रही थीं कि उनमे से गैंगबैंग का केंद्र बनने वाली सौभाग्यशाली स्त्री कौन होगी. परन्तु इसमें कोई स्पर्धा नहीं थी. और यही इस मंडली की एकजुटता का सबसे बड़ा चुंबक था. वो ये भी जानती थीं कि गीता को अब जो अनुभव मिलने वाला है वो विलक्षण होगा, परन्तु उन्हें इसमें भी कोई ईर्ष्या न थी. अगर अपने ही नातियों से पहले गीता को ये अनुभव न मिले तो सम्भवतः अन्याय होगा.

कुमार और असीम ने बलवंत से आज्ञा माँगी जिसे देने में बलवंत ने संकोच नहीं किया. उसने गीता को चूमकर उसे अपने नातियों को सौंप दिया. गीता ने दोनों के हाथ पकड़े और इस कांड के कर्म स्थल उस सोफे की और चल पड़ी. जीवन ने बसंती के कान में कुछ कहा तो बसंती उनके पीछे चल पड़ी. शालिनी के लिए जीवन से पूछकर कँवल ने उसका हाथ लिया और पलंग को ओर ले गया. भले ही इस सुंदरी को भोगने में उसका क्रम अंतिम था, परन्तु वो इसका भरपूर आनंद लेना और देना चाहता था.

“दीदी, बाबूजी ने बताया आप क्या करने जा रही और कहा है कि मैं आपको उचित स्थिति में ले आऊँ. मैं घी लेकर आती हूँ तब तक आप इन दोनों हथियारों से खेलिए. मैं बस यूँ गई और यूँ आई.” बसंती ने गीता से कहा तो गीता ने जीवन की ओर देखते हुए धन्यवाद किया. जीवन ने अंगूठा उठाकर उसका मान रखा.

बसंती ने यही सम्बोधन शालिनी से भी किया. हालाँकि शालिनी को किसी प्रकार की चिकनाई की आवश्यकता नहीं थी परन्तु उसने मना नहीं किया. वो देखना चाहती थी कि बसंती किस प्रकार इस कार्य को करती है. बसंती लौटी तो उसने पहले शालिनी को ही घोड़ी बनने का आग्रह किया. उचित अवस्था में आने पर उसकी चूत में ऊँगली घुमाई और प्राकृतिक चिकनाहट को पिघले घी में डुबोने के बाद फिर से उँगलियों को चूत में डालकर घुमाया. तपते और पिघले घी के स्पर्श से उसकी चूत में नए स्पंदन हुए तो शालिनी की सिसकी निकल पड़ी. अपनी ऊँगली को घी से लेपकर बसंती ने शालिनी की चूत को अत्यधिक उत्तेजित कर दिया.

“दीदी, अभी जब भाईसाहब गाँड मारेंगे तब वहाँ भी लगाऊँगी।” ये कहते हुए उसने कँवल के लंड पर भी कुछ घी लगाया और गीता की गाँड को चिकनाईयुक्त करने हेतु उधर चली गई.

“अब तो कुछ और करने की आवश्यकता ही नहीं रही. बसंती ने सब काम स्वयं ही कर दिया.” कँवल ने हंसकर कहा और घोड़ी बनी शलिनी की चिकनी चूत में अपना लंड एक ही बार में अंदर तक गाढ़ दिया. शालिनी थोड़ी आगे की ओर झुक गई और गाँड उठाकर कँवल को आगे बढ़ने का संकेत दे दिया.

गीता ने बसंती को गले लगाकर स्वागत किया.

“दीदी, आप बहुत साहसी हो! मैं तो गाँड में दो दो लौड़े एक साथ लेने की कल्पना भी नहीं कर सकती” बसंती बोली।

कुमार: “छोटी नानी, आप कल्पना मत करो. आप को भी इसका सुख न दिया तो हम दोनों आपके नाती नहीं!”

“हाय दिया! दीदी, देखो कैसे निर्लज्ज हो गए हैं ये दोनों! ऐसी बातें कर रहे हैं!” बसंती ने कृत्रिम क्रोध दिखाते हुए कहा.

“अब इतनी भोली न बन, सच तो ये है कि ये सुनकर तेरी गाँड में भी खुजली होने लगी है. कहे तो भाईसाहब से बोलूँ मिटाने के लिए, नहीं तो रहने देते हैं.” गीता ने उसे छेड़ते हुए कहा.

बसंती: “अब दीदी, आप बोल रही हो तो बाबूजी से बोल ही दो.”

गीता ने जीवन की ओर देखा जो ये सुन रहा था और उसे संकेत किया जिसका जीवन ने स्वीकृति में उत्तर दिया.

“चल, बोल दिया तेरे बाबूजी को. अब जो करने आई है वो कर. नहीं तो घी जम जायेगा.”

गीता सोफे पर झुक गई और कुमार ने उसकी गाँड को फैला दिया. बसंती ने घी की कटोरी असीम को सौंपी और गीता की गाँड को ऊपर से चाटने लगी.

“अरे दुष्टा, ये क्या कर रही है!” गीता बोली, पर उसे भी इसमें आनंद मिल रहा था.

“दीदी, ऐसी मक्खन जैसी गाँड की जो ये दोनों क्या स्थिति करने वाले हैं उसके पहले भी एक बार स्वाद ले लूँ. बड़े दिन हुए आपकी गाँड को चाटे हुए.” बसंती ने कहा और फिर अपनी जीभ अंदर डालकर गीता की गाँड की गहराई का अनुमान लगाने लगी.

अपने मन को संतुष्ट करने के बाद ही उसने अपना मुँह वहाँ से निकाला और चटखारे लेकर घी की कटोरी से गीली हो चुकी गाँड को भरने लगी. घी कुछ जमने लगा था परन्तु गाँड की ऊष्मा ने उसे फिर से पिघला दिया. अपनी दो उँगलियों से गीता की गाँड में घी को अच्छे से मिलाकर उसने अपनी नातियों को देखा पर असीम ने अपना सिर हिलाकर अपने लौंड़ों पर घी लगाने से मना कर दिया.

“दीदी, ये दोनों निर्दयी लौंड़ों पर घी नहीं लगवा रहे हैं. लगता है आपकी गाँड की नसें खोलने का मन बनाये हैं. अगर कहो तो इन्हें रोक लूँ.”

“हट मुई! जा अपने बाबूजी से अपनी गाँड मरवा। मुझे मेरे नातियों के लौड़े गाँड में लेने दे.” फिर खड़ी हो गई और असीम से बोली, “जैसे तुम दोनों एक साथ सुनीति की गाँड मारते हो वैसे ही मारना, मुझे भी तो पता चले मेरी बेटी कैसा सुख भोगती है.”

“बिलकुल नानी. आपको वैसा ही सुख देंगे.” कुमार ने सोफे पर अपना स्थान लेते हुए बोला।

बसंती गीता का साहस देखकर विस्मित हो गई. उसने कुमार को अपने लौड़े को हाथ में लेकर छत की ओर कर दिया. बसंती के मुँह में उसे देखकर पानी आ गया, पर अब समय निकल गया था. गीता ने अपने बालों को झटका दिया जिससे कि वो बसंती के चेहरे को छू गए और फिर गाँड लहराते हुए कुमार के लंड को देखा.

“है न एकदम टनाटन? अपनी गाँड में लेते ही जैसे स्वर्ग दिखाई दे जाता है. और आज तो दोनों एक साथ गाँड मारने वाले हैं. सोचकर ही मैं झड़ी जा रही हूँ.” गीता ने मचलते हुए कहा.

“हाँ दीदी, मस्त लौड़े हैं दोनों बछड़ों के. मुझे तो इनसे चुदे महीनों हो गए. पर अब आप अपना काम करो. मुझे अपनी गाँड में भी कुछ मोटा, लम्बा और कड़क चाहिए है.”

बसंती ने गीता को कुमार के लौड़े पर अपनी गाँड रखते हुए बैठने में सहायता की. गीता का चेहरा कुमार की ओर था. गाँड में अपने नाती का लंड लेते ही गीता की चूत ने भरभराते हुए पानी छोड़ दिया. कुमार का लौड़ा उस पानी से भीग गया. कुमार ने पीछे सरकते हुए गीता को अपने ऊपर लिटा लिया और उसके पैरों को मोड़ दिया. गीता की गाँड आगे उभर गई. उसमें उपस्थित लंड अब और तंग हो गया. गीता को कुछ शंका होने लगी कि क्या सच में पहले से ही तंग गाँड एक और लंड ले पायेगी?

असीम ने अपनी नानी की गाँड को देखा तो उसका लौड़ा लहराने लगा. बसंती अविश्वास से असीम को देखते हुए बोली, “क्या सच में अपना लौड़ा भी आप दीदी की गाँड में डाल रहे हो. वहाँ तो लगता नहीं कि जा पायेगा.”

असीम मुस्कुराया, “छोटी नानी. अब आप चमत्कार देखना. गाँड कैसे फैलती है.”

असीम ने कुमार के लंड के साथ अपना लंड लगाया और धीमे से अंदर धकेलना आरम्भ किया. प्राथमिक प्रतिरोध के पश्चात उसका सुपाड़ा पक्क की हल्की ध्वनि के साथ अंदर प्रविष्ट हो गया. बसंती की आँखें फ़ैल गयीं तो गीता की आँखें और मुँह खुले रह गए.

“अम्मा!” गीता ने धीमे से बोला। असीम रुक गया. इसके आगे की यात्रा कठिन थी. इतने भेदन से भी उसका लंड एक सँकरी गली की तीव्र ऊष्मा का अनुभव कर रहा था.

“नानी, आप ठीक हो न?” असीम ने गीता से प्रेम से पूछा.

“उन्ह उन्ह! बहुत मोटे हैं तुम्हारे लौड़े. न जाने जा भी पाएंगे?” गीता ने शंका बताई.

“चिंता न कर गीता, तेरी बेटी बड़ी सरलता से ले लेती है इनके दोनों लौड़े. तू तो उसकी माँ है, ऐसे कैसे नहीं ले पायेगी.” जीवन ने पास आकर उसका उत्साह बढ़ाया.

‘पता नहीं, मुझे तो लग रहा है मेरी गाँड न फट जाये.” गीता बोली.

पूनम, बबिता, निर्मला और शालिनी भी अब निकट आ गयीं और बसंती के पास खड़ी होकर इस अद्भुत लीला को देखने लगीं. उनकी भी गाँड का यही परिणाम जो होना था. सबमें एक भय और उत्सुक्तता थी. असीम और कुमार के सामान्य भावों को देखकर उन्हें विश्वास हो चला कि ये कामलीला अवश्य आनंददायक होने की संभावना है. उनके नाती किसी भी रूप में उन्हें ऐसी दिशा में नहीं ले जायेंगे जहाँ उन्हें कष्ट तो हो पर आनंद कदापि न प्राप्त हो. यही विश्वास उन्हें आगे के लिए उद्द्यत कर रहा था.

कुछ समय असीम और कुमार यूँ ही शिथिल रहे जब तक कि गीता कुछ सामान्य नहीं हो गई. जहां कुमार का लौड़ा गाँड में स्थापित था, वहीँ असीम के लंड को अभी आगे बढ़कर उस गुप्त द्वार की अंतिम सीमा को छूना था. उसके पश्चात ही आगे की कोई गतिविधि की जा सकती थी. जीवन ने असीम की पीठ पर हाथ रखा तो असीम ने उसके संकेत को समझकर धीरे से लंड पर दबाव बनाया. शनैः शनैः उसका लंड आगे की जटिल यात्रा पर निकल पड़ा. गीता की गाँड फैलने का प्रयास करते हुए उसे समाहित करने में जुट गई. गीता को विलक्षण अनुभव हो रहा था, जिसमें उसे अपनी गाँड के हर रोम और फैलने का आभास प्राप्त हो रहा था.

बसंती ने कुछ और घी उढ़ेला और असीम का लंड और आगे चलता गया. एक लम्बे अंतराल के बाद असीम का लौड़ा भी गीता की गाँड में अपने भाई के लंड के समकक्ष स्थापित हो गया. सबसे दुर्गम पहला पड़ाव पार हो चुका था. अब गीता की गाँड कुछ विश्राम की आवश्यकता थी. गीता को जीवन में इतना भरा हुआ कभी अनुभव नहीं हुआ विशेषकर गाँड में. उसे जो शंका थी कि गाँड दोनों लौड़े नहीं झेल पायेगी निरर्थक सिद्ध हुई थी. परन्तु आनंद जैसा कोई अनुभव अभी नहीं मिला था.

उसके लिए अगले चरण का आरम्भ आवश्यक था, जिसका समय उसके नाती ही तय कर सकते थे.

जीवन ने अपना गला खँखारा और कहा, “मैं समझता हूँ कि तुम सबको देखने की प्रबल इच्छा है. पर हमें अब यहाँ इन तीनों को अपने सुख के लिए अकेला छोड़ देना चाहिए. बसंती, तुम घी की कटोरी भरकर असीम को दे दो. इसे आगे उसे ही उसका उपयोग करने का निर्णय लेना है. हम सब अब चलकर अपने स्थान से ही इस क्रीड़ा को देखेंगे.”

फिर शालिनी की ओर देखकर बोला, “तुम्हें अगली बारी की प्रतीक्षा करनी होगी, कँवल अब और रुकने के लिए उत्सुक नहीं है.”

शालिनी ने कँवल को देखा जो अपने लंड को हाथ में पकड़े उसकी ही ओर देख रहा था.

“आप सही कह रहे हैं. बसंती, इनका ध्यान रखना.” ये कहते हुए वो कंवल की ओर चल दी और बसंती घीकी कटोरी भरने के लिए. शालिनी ने कँवल का हाथ उसके लंड से हटाया और उसे चूसने लगी. बसंती अपना कार्य करने के बाद जीवन के साथ जा बैठी और उसके लंड को सहलाने लगी.

बसंती: “आपको क्या लगता है बहूरानी को अपना खेल बुरा तो नहीं लगा?”

जीवन: “लगता तो नहीं है. नहीं तो वो इसमें भाग न लेती. पर आगे क्या करेगी इसके विषय में मुझे कोई ज्ञान नहीं है.”

बसंती: “हमें रोकेंगी तो नहीं?”

जीवन सोचते हुए: “नहीं, अन्यथा अब तक बोल देती. हम दोनों की प्यास भिन्न है, और मुझे लगता है इस वातावरण में वो भी चुदाई के नए अनुभवों और आयामों से परिचित हो रही है. अब तक मैंने उसके व्यवहार में कोई वितृष्णा नहीं देखी है, बल्कि वो हर क्रीड़ा में उत्साह से भाग ले रही है.”

बसंती: “तो क्या वो भी आपका मूत्र पीने के लिए सहमत होंगी?”

जीवन शालिनी को देख रहा था और जिस आतुरता से वो कँवल के लंड को चूस रही थी उसे देखकर बोला, “कह नहीं सकता. क्यों न आज के गैंगबैंग के बाद एक प्रयास किया जाये? वैसे भी तू मेरे ही कमरे में सोने वाली है.”

बसंती हँसते हुए: “जैसे आप मुझे कभी सोने भी देते हो.”

जीवन भी हँसा: “क्या करेगी सो कर? पर आज तक जायेंगे, तो सोना ही होगा. वैसे भी शालिनी को विश्राम चाहिए होगा. उसे इतनी चुदाई का अभ्यास नहीं है.”

बसंती: “ठीक है, बाबूजी. पर अब क्या आप मेरी गाँड मारकर उसकी खुजली मिटा सकते हो. मुई बहुत कुलबुला रही है.”

जीवन ने अपना लंड दिखाया, “पहले इसे ठीक से खड़ा कर फिर तेरी गाँड की खुजली मिटाता हूँ.”

बसंती झट से नीचे बैठकर उसका लंड चूसने लगी और जीवन ने देखा कि शालिनी अब पलंग पर लेट चुकी थी और कँवल उसे चोदने के लिए अपने लौड़ा उसकी चूत पर रगड़ रहा था. जीवन के चेहरे पर संतुष्टि का भाव आया कि उसने सही चयन किया है और उसका लौड़ा फड़फड़ाने लगा.

कँवल अब शालिनी को चोदने लगा था, पर उनकी ओर किसी का ध्यान न था. सबकी ऑंखें गीता पर टिकी हुई थीं जो अपने नातियों के बीच में पीस रही थी. असीम और कुमार के शरीर की ताल से समझा जा सकता था कि वो अब गीता की गाँड में अपने लौड़े चलने में व्यस्त थे. परन्तु इस बार उनकी गति और ताल अधिक सधी हुई थी. चूत की अपेक्षा गाँड मारना अधिक कठिन होता है. चूत को प्रकृति ने प्राकृतिक लचीलापन प्रदान किया है, पर गाँड को उसकी अपेक्षा कम आँका है. असीम और कुमार इसका भरपूर ज्ञान रखते थे और गीता की गाँड को बहुत संयम के साथ मार रहे थे.

गीता उनके इस धीमे आक्रमण से धीरे धीरे आनंदित हो रही थी. उसके मन की शंका का समाधान हो चुका था. न केवल उसने अपने नातियों के दोनों लंड अपनी गाँड में लेने में सफलता पाई थी, बल्कि अब उसे आनंद की अनुभूति भी होने लगी थी.

“नानी गाँड थोड़ी ढीली करो, नहीं तो यूँ ही धीमे धीमे चुदाई होगी.” कुमार ने उसके मम्मों को निचोड़ते हुए कहा.

गीता: “बिटवा, अब मेरे बस में कुछ न है. जो करना है सो तुम दोनों ही करो. मेरी तो गाँड तुम दोनों ने पूरी बंद कर दी है. मैं कुछ न कर पाऊँगी.”

असीम और कुमार ने एक दूसरे को देखा और मुस्कुरा दिए. उनकी नानी उसी स्थिति में थी जहाँ वो उसे चाहते थे. असीम ने अपने नाना बलवंत को देखा जिसने उन्हें स्वीकृति दे दी. अब नानी की गाँड के तार खोलने के लिए दोनों भाइयों ने अपनी गति में बढ़ोत्तरी की. गीता की हल्की चीखों ने उसकी सिसकियों का स्थान ले लिया. दोनों भाई का समन्वय अद्भुत था. वो इस प्रकार से गाँड मारकर कई प्रोढ़ और मध्यम आयु की स्त्रियों को अनुग्रहित कर चुके थे. उन्हें कब किस गति और शक्ति का उपयोग करना है, इसके वो इतने अनुभवी थे कि उन्हें गीता पर उस ज्ञान का प्रयोग करने में कोई संशय नहीं था.

बढ़ती गति से गीता की चीखों की ध्वनि भी बढ़ती गई. अब उसे अपनी गाँड में जो अनुभव हो रहा था वो अभूतपूर्व था. उसकी गाँड भी अब उसका साथ दे रही थी और उसकी चूत भरपूर रस बहा रही थी. असीम ने फिर गीता की गाँड में घी डाला और अब उनके धक्के और तीव्र हो चले. घी की सहायता से चिकनी हुई गाँड दोनों लौडों का प्रतिरोध करने में असमर्थ थी. फक्क फक्क की ध्वनि के साथ दोनों लंड उसकी गाँड में आवागमन कर रहे थे. उसके आनंद की सीमा अब पार हो चुकी थी और वो स्वर्गलोक का विचरण कर रही थी.

कँवल अपनी पूरी शक्ति लगाकर शालिनी की चुदाई कर रहा था. न जाने क्यों उसे लग रहा था कि उसकी जीवन के साथ स्पर्धा है. ये उनकी मंडली के लिए नया था. शालिनी भी उसकी इस शक्तिशाली चुदाई का भरपूर आनंद उठा रही थी जिसका उसके कंठ से निकलती सिसकारियां साक्षी थीं. जीवन जब भी उसकी ओर देखता उसे एक आनंद का अनुभव होता. बसंती लौड़े को चाटकर अब गाँड मरवाने के लिए उत्सुक थी, पर जीवन की आज्ञा के लिए ठहरी हुई थी. जीवन भी अब उसकी इस इच्छा को समझ रहा था.

“अंदर चल पहले.” जीवन ने भरे कंठ से कहा तो बसंती का मन आल्हादित हो गया. उसके बाबूजी उसकी हर भावना को बिना कुछ कहे ही पढ़ लेते थे.

वो उठी और गाँड मटकाते हुए स्नानगृह में चली गई. जीवन उसकी इठलाती गाँड के देखते हुए उसके पीछे गया.

“ऊपर बैठ.” जीवन ने कहा तो बसंती वाश-बेसिन के मचान पर बैठ गई और अपने पैर फैला लिए.

“आओ बाबूजी, पी लो मेरा अमृत.” उसने जीवन से मादक स्वर में कहा.

जीवन ने उसकी चूत पर मुँह रखा और बसंती ने अपनी धार उसके मुँह में छोड़ दी. निवृत्त होते ही जीवन ने उसकी चूत को चाटा और उसे नीचे उतार दिया. बसंती बैठ गई और इस बार जीवन के लंड ने उसके मुँह में अपना मूत्र दान किया. प्यासी बसंती ने हर बूँद को पी लिया. जीवन ने उसे उठाया और दोनों एक दूसरे को चूमने लगे.

“तेरे जैसी मुझे कोई मिल नहीं सकती है, बसंती. अगर भूरा न होता तो मैं तुझे सदा अपने साथ ही रखता.”

“अब चल तो रही हूँ बाबूजी. जब तक चाहोगे तब तक रहूँगी आपके साथ. जब दीदी आएँगी फिर देखेंगे.”

“अब चल तेरी गाँड बहुत व्याकुल है लौड़े के लिए.”

“आपके लौड़े के लिए, बाबूजी. लौड़े तो और भी हैं यहाँ.”

“बातें बहुत बनाने लगी है तू.” जीवन ने उसकी बाँह पकड़ी और अपने स्थान पर जा बैठा.

बसंती उसकी ओर अपनी गाँड करते हुए घोड़ी बन गई और पीछे सरक गई. जीवन का विशाल तमतमाया लंड उसकी गाँड से टकराया तो वो रुक गई. जीवन ने घी लगाने के लिए कहा तो बसंती ने मना कर दिया.

“नहीं बाबूजी, ऐसे ही मारो। बहुत जल रही है आपके मुसल के लिए.” बसंती ने उत्तेजना से कहा.

जीवन ने सामने देखा। शालिनी की चूत को छोड़कर अब कँवल उसे घोड़ी बनाकर उसकी गाँड मार रहा था. उधर गीता की गाँड की दुहरी चुदाई चरम पर थी और कमरे में गीता की धीमी पड़ चुकी चीखें अभी भी गूँज रही थीं. उसे विश्वास था कि उसके पोते उसके मित्रों की पत्नियों को भी ये नया सुख देकर अनुग्रहित करेंगे. उसने अपने हाथों से बसंती की गाँड को खोला और दो उँगलियाँ डाल कर कुछ समय तक चलाईं। बसंती अब गाँड मटका रही थी. उसे मूसल चाहिए था, नहीं.

अपनी उँगलियाँ हटाते हुए जीवन ने अपने लौड़े को बसंती की फूलती पिचकती गाँड पर रखा और एक धक्का लगाया. जीवन का भारी लंड बसंती की गाँड को चीरते हुए प्रवेश कर गया. बसंती ने स्वयं को इस आक्रमण के लिए संभाला हुआ था. उसने इस बात का ध्यान नहीं रखा कि जीवन जैसे आततायी ने उसका मन पढ़ लिया था. बसंती की ह्रदयविदारक चीख ने सबके मन पल भर के लिए दहला दिया. एक बार उसे ओर देखकर सब सामान्य हो गए. उन्हें जीवन से गाँड मरवाने का मूल्य भलीभांति पता था. अगर बसंती बिना घी तेल लगाए जीवन से गाँड मरवाना चाहती थी तो ये उसकी त्रुटि थी.

बसंती, जिसे अब तक अपनी गाँड में जलन और खुजली का अनुभव हो रहा था, अब दोनों में अपार वृद्धि हो गई. जलन का स्तर ऐसा था कि उसे आभास हुआ कि उसने एक राक्षस को चुनौती दे दी थी. बसंती की चिंता किया बिना जीवन ने एक पैशाचिक मुस्कुराहट के साथ अपना लंड बाहर खींचा तो बसंती को लगा कि उसकी गाँड बाहर निकली जा रही थी. लंड जब मुंहाने तक आया तो इस बार जीवन ने और भी अधिक शक्ति के साथ धक्का लगाया. इस बार की चीख पिछली से अधिक तीव्र थी पर इस बार किसी ने उनकी ओर देखा भी नहीं. उन सबका ध्यान गीता की चीत्कारों पर था जिसकी गाँड में दो लौड़े थे. एक लंड खाने वाली स्त्री की ओर कौन ही देखना चाहता था.

गीता की आँखें पलट गयी थीं और उसके मुँह से जो ध्वनि निकल रही थी वो प्राकृतिक तो कदापि नहीं थी. असीम और कुमार अपनी पूरी शक्ति के साथ एक सधी लय में उसकी गाँड में अपने लंड अंदर बाहर कर रहे थे. गीता स्वर्ग और धरती के बीच त्रिशंकु भांति झूल रही थी. उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि वो इस प्रकार का अनंत सुख पायेगी. गाँड में दो लौड़े उसे ऐसा अनुभव दे रहे थे जो अपर्याय था. लौड़े अंदर घुसते तो वो स्वर्गलोक की ओर जाती और बाहर निकलते ही पृथ्वीलोक को लौटती. परन्तु इन दोनों में इतना क्षणिक अंतर था कि उसे कोई ज्ञान नहीं था कि वो कहाँ है.

असीम और कुमार अपनी सफलता पर गर्व कर रहे थे. उन्होंने अपनी प्रिय नानी को वही सुख दिया था जिसकी वो अधिकारी थी.

शालिनी की गाँड में कँवल का लौड़ा सटासट अंदर बाहर हो रहा था.

जीवन में अब से पहले उसने मात्र तीन पुरुषों से सम्भोग किया था. पर इन तीन दिनों में उसे अब तक पाँच पुरुष भोग चुके थे. और इसकी सँख्या कल तक सात पहुँचना निश्चित था. यही सोचते हुए शालिनी कँवल से अपनी गाँड मरवा रही थी. अब तक वो चुदाई में इतनी खुल चुकी थी कि उसे कोई लज्जा या झिझक नहीं थी. वैसे भी कमरे में गृहस्वामिनी को उसके नाती सबके सामने चोद रहे थे और उसके भावी पति अपने घर की नौकरानी की माँ की गाँड मार रहे थे. और आज रात्रि इस चुदाई के संस्करण के बाद पूनम, बबिता और निर्मला में से किसी एक को सभी सात पुरुष जब तक सम्भव हो एक साथ मिलकर चोदने वाले थे.

कँवल के लंड को अपनी गाँड में फूलते हुए अनुभव करते ही शालिनी समझ गई कि कँवल अपना रज उसकी गाँड में छोड़ने वाला है. उसे इस चुदाई में कोई विशेष आनंद नहीं मिला था, हालाँकि कँवल ने अत्यधिक परिश्रम किया था. शालिनी का मन कहीं और ही था और उसने कँवल को अपनी इच्छा पूरी करने के उद्देश्य से चोदने दिया था. उसके मन में अपने पुत्र और पोते के साथ चुदाई करने की इच्छा बलवती हो रही थी. उसके मन में ये भी उधेड़बुन चल रही थी कि क्या उसे जीवन उस रिसोर्ट में आमंत्रित करेगा जहाँ कँवल और बबिता के पुत्र उदय और सुशील और निर्मला की पुत्री सुरभि के परिवार के साथ सामूहिक व्यभिचार का कार्यक्रम है.

फिर बसंती और जीवन के बीच का विशेष संबंध भी उसे विचलित और रोमांचित कर रहा था. जीवन और बसंती एक दूसरे के मूत्र को जिस सहजता से पी रहे थे वो अत्यंत कामुक था. बसंती ने तो सबके मूत्र का सेवन किया था, शालिनी ने भी उसे अपना मूत्र पिलाया था. क्या जीवन उससे भी यही अपेक्षा रखेगा? क्या वो ऐसा करने में सक्षम होगी. कँवल की हुंकार ने उसका ध्यान तोडा और उसे अपनी गाँड में कँवल के रस की वृष्टि होने का आभास हुआ. कुछ ही पलों में उसकी गाँड से कँवल का लंड निकल गया और ठंडी पवन के वेग से शालिनी की गाँड स्वतः बंद हो गई.

और इसी के साथ आज की उसकी चुदाई का अंत हुआ. कँवल ने अपना लंड पकड़कर बसंती के सामने जा खड़ा हुआ. बसंती जो अब भी जीवन के आक्रमण से संतुलित नहीं हुई थी, उसके लंड को देखकर मुस्कुराई और अपना मुँह खोल लिया. कँवल ने उससे अपना लंड को साफ करवाया और जीवन के ही पास पड़े सोफे पर बैठ गया. बसंती की गाँड में परम वेग से चलते हुए जीवन के लंड को देखा. वो जीवन की शक्ति से परिचित था और उसका सम्मान भी करता था. एक पल के लिए उसके मन में ईर्ष्या के भाव आये फिर उसने उन दोनों की चुदाई को देखने लगा.

शालिनी अपने ही स्थान पर लेट गई और पिछले दिनों की घटनाओं के विषय में सोचने लगी. साथ ही भविष्य में उसकी नई जीवनशैली के विषय में भी उसका ध्यान जा रहा था. इन दिनों में उसने जिस प्रकार से बड़े प्राकृतिक ढँग से चुदाई का आनंद लिया था, अब इसके बिना रहना सम्भव नहीं था. उसने चारों ग्रामीण स्त्रियों के रास के रूप देखे तो सहज ही स्वयं को उन्नीस पाया था. क्या वो भी एक साथ चूत और गाँड मरवाने का साहस कर सकेगी? क्या एक साथ चूत या गाँड में दो लौड़े ले पायेगी? क्या उसका भी गैंगबैंग होगा? क्या उसे भी मूत्रक्रीड़ा में आनंद आएगा? ऐसे ही प्रश्नों से उसका मन चिंतित था. उसने आँख खोलकर जीवन को देखा जो बिना किसी चिंता के बसंती की गाँड को निर्ममता से मारे जा रहा था. उसने अपना भविष्य जीवन के निर्णय पर छोड़ दिया, और इन सारे प्रश्नों के उत्तर भी उसे मिल गए. जीवन का साथ मिलने पर वो सब करने का सामर्थ्य रखती है.

गीता की चुदाई अब समापन की ओर थी. दोनों भाई अब गति कभी कम तो कभी अधिक करते हुए गीता को आनंद की लहरों पर उछालें दिलवा रहे थे. गीता इस अनुभव से अत्यधिक आनंद पा रही थी. उसे अपने नातियों पर गर्व था कि वो उसे नए नए ढंग से चोद रहे थे. अगर बलवंत, जीवन और आशीष भी इस प्रकार की चुदाई कर पाएंगे तो उसे हर रात ऐसा ही सुख मिलने को संभावना थी.

लगभग यही भाव बसंती के मन में भी थे. अगर उसे हर दिन जीवन के लौड़े से चुदने का सौभाग्य मिले तो वो कभी गाँव लौटेगी ही नहीं. किसी प्रकार से भूरा को वहीँ बुला लेगी. जीवन अब इतनी अधिक गति से बसंती की गाँड मार रहा था कि उसके झड़ने का समय निकट आ गया था. बसंती के मूत्र पीने से उसमें अपार शांति आ जाती थी. पर आयु का अपना नियम होता है. और जीवन के लौड़े ने इसे सिद्ध करते हुए बसंती की गाँड सींच दी.

बसंती की गाँड की जलन अब मिट चुकी थी. उसने जीवन के लंड को बाहर निकलते हुए अनुभव किया. फिर उसकी गाँड को फैलते हुए और उँगलियों को अंदर घूमने का आभास हुआ तो वो मुस्कुरा उठी. उसके बाबूजी उसका कितना ध्यान रखते हैं, ये सोचकर उसने अपनी गर्दन घुमाई और अपना मुँह खोल दिया. जीवन ने उसकी गाँड से इकट्ठा किया रज उसके मुँह डाला तो बसंती ने उसे अपनी जीभ पर घुमाया और फिर चट कर गई. अब वो संतुष्ट थी. जीवन उसे प्रेम से देख रहा था.

“जा उधर शालिनी और गीता की गाँड से भी माल खा ले.”

“पहले आप का लौड़ा तो साफ कर दूँ, बाबूजी!” ये कहकर वो पलटी और जीवन के लंड को चाटने के बाद कुछ पल चूसकर उठ खड़ी हुई, “मेरी गाँड में से निकला आपका पानी सच में बहुत पौष्टिक ,बाबूजी.”

जीवन हंसने लगा और बसंती शालिनी के पास जाकर खड़ी हो गई.

“बहूरानी, बाबूजी ने कहा है आपकी गाँड साफ करने के लिए, तो थोड़ा फ़ैल जाओ.” बसंती ने उत्तर की प्रतीक्षा नहीं की और शालिनी के पैरों को ऊपर किया. शालिनी की गाँड से अब भी कुछ वीर्य बाहर निकल रहा था. बसंती ने उसे चाटकर उसकी गाँड में ऊँगली डाली और अंदर से कुछ और रस एकत्रित करके चाट लिया.

“कभी इसका भी स्वाद लेना बहूरानी. बहुत निराला स्वाद और सुगंध होती है. अब चलूँ, गीता दीदी को भी संभालना है.” ये कहकर वो गीता की ओर बढ़ गई. अन्य सभी स्त्रियां उसके इस स्वभाव से परिचित इसीलिए किसी ने कुछ न कहा.

बसंती ने गीता के सामने जाकर देखा तो गीता की आँखें पलटी हुई थीं और मुँह खुला था. बसंती को नटखटता सूझी. उसने अपनी उँगलियाँ जिनमें शालिनी की गाँड से निकाला हुआ कँवल का कुछ रज लगा हुआ था, गीता के मुँह में डाल दीं.

“लो चखो दीदी, कैसी मधुर मलाई है.”

गीता इस समय ब्रम्हांड के किस ग्रह पर थी उसे ज्ञात न था, उसने बसंती की ऊँगली को मुँह में लेकर चूस लिया. ऊँगली निकालकर बसंती ने धीमे से गीता के कान में बताया कि उसने क्या चाटा है. गीता की आँखें सीधी हो गईं.

“तुझे इसका मजा न चखाया तो मैं भी गीता नहीं.”

ये गीतकह तो गई पर उसकी चूत ने अंतिम बार रस की फुहार छोड़ी. और मानो असीम और कुमार भी उसकी ही प्रतीक्षा में रहे हों. एक एक करके दोनों ने अपना पानी गीता की गाँड में छोड़ दिया.

“दीदी, मजा तो मैं अब चखने ही जा रही हूँ. भरी होगी आपकी गाँड इन मोटे लौंड़ों के पानी से.” बसंती ने इठलाते हुए बोला।

“आ जाओ, छोटी नानी. आपका शेक नानी की गाँड में आपकी राह देख रहा है.”

“बड़े नटखट हो गए हो इतने दिनों में बिटवा. अपनी छोटी नानी को छेड़ रहे हो!”

“अरे छोटी नानी, अभी तो छेड़ा ही है. कल आपको चोद कर भी दिखा देंगे.”

“हाय हाय दीदी. सुन रही हो क्या बोल रहें हैं आपके नाती.”

गीता तो अब उत्तर देने की स्थिति में थी नहीं वो तो किसी प्रकार अब लेटना चाहती थी. बूढी हड्डियों ने चुदाई के समय तो सहन कर लिया, पर अब उसे विश्राम चाहिए था. कुमार और असीम ने ये समझा और पहले असीम ने अपना लंड बाहर निकाला. बसंती ने तुरंत गीता की गाँड पर मुँह लगाया और सड़प सड़प कर बाहर रिसते हुए रस को चाट गई.

“कुमार बेटा, अभी रुकियो.” कहते हुए उसने असीम के लंड पर धावा बोला और उसे चाटने के बाद कुमार से लंड निकालने के लिए कहा.

लंड निकलते ही रस भरभर करते बाहर बह निकला. अगर बसंती इसकी अपेक्षा न कर रही होती तो अवश्य चकित रह जाती. पर उसने जिस तीव्रता ने अपना मुँह गीता की गाँड पर लगाया उसे देखकर असीम अचम्भित हो गया. अपनी पूर्ण संतुष्टि के बाद ही उसने अपना मुँह हटाया और जीभ से जो कुछ शेष था उसे भी सोख लिया। फिर कुमार के नीचे पड़े लौड़े को चाटा और उठ गई. जीवन उसके पीछे आ खड़ा हुआ था.

“मन भर आया तेरा?”

“जी बाबूजी. अब शांति मिली.” ये कहते हुए वो जीवन के सीने से लिपट कर सुबकने लगी.

“चल, मन भारी मत कर. सब ठीक कर दूँगा। मुझ पर विश्वास कर.”

इसके बाद सबने निर्णय लिया कि कुछ समय अपने कमरों में विश्राम किया जाये ताकि रात के गैंगबैंग के लिए शक्ति का संचार हो सके.

“पर गीता, ये तो बता, कि कौन है वो भाग्यशाली जो आज की हीरोइन बनेगी?”

गीता ने जाकर वो पर्ची लाई और बसंती को थमा दी. “तू ही बता.”

बसंती ने पर्ची खोली और उत्सुक समूह को बताया.

“आज की हीरोइन का नाम है.....”

रात्रि अभी शेष थी.

____________________________________________________________________

क्रमशः

1554500
 
भाई,

सर्वप्रथम तो आपके इन विचारों के लिए कोटिशः धन्यवाद.

जहाँ तक अब इसमें रसहीनता का प्रश्न है, इसका मुख्य कारण पाठकों की उदासीनता है. आप अगर पूरी टिप्पणियाँ पड़ेंगे तो सम्भवतः आपकी ये टिप्पणी सबसे उचित दस में से एक होगी.

अधिकतर रसहीन, सामान्य या जेनेरिक होती हैं. क्रमशः इनका प्रभाव कथानक पर भी पड़ता है. क्योंकि, लेखक को कोई प्रतिक्रिया ही नहीं मिलती है, कि क्या पाठकों की रूचि है. इस कारण ही अपडेट की निरंतरता पर भी स्वाभाविक रूप से पड़ता ही है. जब कोई प्रतिक्रिया ही नहीं है तो क्योंकर लिखना. जब मन करे सो लिखो, कौन प्रतीक्षा में ही है. कुछ पाठक समय समय पर अगले अपडेट की प्रतीक्षा के लिए लिखते हैं, पर उसमें न कोई अधीरता होती है न कोई भाव. मानो एक दिनचर्या हो.

आशा है मेरे हतोत्साहित होने का कारण आप समझ सकते हैं.

आपके इस विस्तृत सुझाव के लिए धन्यवाद. परन्तु अब मैंने अपना निर्णय ले लिया है.

जो भी है, वो समय के साथ जो गिनती के पाठक हैं वो समझ जायेंगे.

आपका फिर से धन्यवाद
 
अध्याय ७०: जीवन के गाँव में शालिनी ७

अध्याय ६९ से आगे

अब तक:

आज रात से गैंगबैंग की शृंखला का भी आरम्भ होना था. गैंगबैंग प्राप्तकर्ता भाग्यशाली स्त्री कौन होगी, उसका नाम एक गुप्त पर्ची में निकालकर एक ओर रख दिया गया.

जीवन और बसंती ने शालिनी को मूत्रक्रीड़ा से परिचित करवाया. शालिनी की विरूचि ने देखकर जीवन और उनकी मित्र मंडली को संतोष हुआ. गीता को अपनी मंडली में सर्वप्रथम गाँड में दो लौड़े लेना का सुख और यश प्राप्त हुआ. पाँचों मित्र अब शालिनी की चुदाई कर चुके थे. असीम और कुमार उसे बाद में चोदने वाले थे. बंसती की गाँड मारकर जीवन ने उसकी जलन शांत की. विश्राम के पहले आज रात्रि की गैंगबैंग की महिला का नाम जानने की इच्छा सबके मन में थी.

गीता जाकर वो पर्ची लाई और बसंती को थमा दी. “तू ही बता.”

बसंती ने पर्ची खोली और उत्सुक समूह को बताया.

“आज की रानी का नाम है.....”

अब आगे:

बसंती सबके चेहरों को देख रही थी. उन चेहरों की उत्सुक्ता उसे एक शक्ति का आभास दिला रही थी मानो उसके हाथों में कोई लॉटरी हो. आज रात्रि की तीन प्रत्याशी स्त्रियों के चेहरे पर सबसे अधिक व्यग्रता थी. उसने उन तीनों को फिर से देखा.

“और आज की रानी का नाम है… बबिता!”

और इस घोषणा के साथ बबिता को पूनम और निर्मला ने बाँहों में भर लिया और उसे चूमने लगीं. ये दृश्य उस दृश्य के समकक्ष था जिसमें विश्वसुंदरी इत्यादि का चयन होता है और उसे हारने वाली लड़कियाँ बधाई देती हैं. उनके हटते ही गीता, शालिनी ने उसे चूमा और फिर बसंती ने भी यही किया. बबिता के पति ने आकर अपनी पत्नी को बाँहों में लिया और उसे चूमकर बधाई दी. फिर घोषणा की.

“मित्रों, अब बबिता को विश्राम की आवश्यकता है. तो मैं उसे कमरे में ले जा रहा हूँ. आप सब भी जाकर विश्राम कीजिये और अपना इन्जन में ईंधन भरिये.”

गीता बोली: “और एक बात मैं बता देती हूँ. मेरी छोटी बहन बसंती इसका निर्देशन करेगी. हमें इसका पेट भी भरा रखना होगा. कार्यक्रम आरम्भ होने के बाद हर प्रकार के रस पर केवल बसंती का ही अधिकार होगा. मेरी प्यारी बहन बहुत प्यासी रहती है, तो हम सब इसे ही अपना रस इत्यादि पिलायेंगे। ये वैसे भी हमारी परम्परा है. जब भी हम ऐसा कोई कार्यक्रम करते हैं और वो उपस्थित होती है, तब उसे ही इसका अधिकार मिलता है. इसकी आज्ञा मानना बबिता और सब पुरुषों का कर्तव्य होगा. अगर किसी को कोई समस्या है तो अभी बता दे.”

अब इसमें क्या समस्या हो सकती थी. सबने स्वीकृति दी और अपने जोड़ों में कमरों में चले गए. असीम और कुमार अपने कमरे में चले गए और बसंती को जीवन अपने और शालिनी के साथ ले गया.

बबिता का मन धकधक कर रहा था.

बबिता: “अब मैं थोड़ी देर सो लेती हूँ. उसे बाद तो आप सब मुझे गुड़िया के समान मरोड़ोगे.”

कँवल: “अगर तेरा मन नहीं है तो किसी और को आज के लिए कह देते हैं.”

बबिता: “नहीं, नहीं! ऐसा मत करना. मैं तो इसके लिए बड़ी लालायित हूँ. बहुत आनंद आता है आप सबके बीच में पिसने में.”

कँवल: “चल थोड़ा विश्राम कर ले, मैं तेरी हल्की मालिश कर देता हूँ. तुझे इसका लाभ मिलेगा.”

ये कहते हुए कँवल ने बबिता को लिटाया और उसके हाथ, पैर और कमर इत्यादि को दबाने लगा. बबिता उसके प्रयासों से कुछ ही पलों में सो गई. कंवल ने उसे बाँहों में लिया और उसके साथ लेट गया और वो भी सो गया.

***********

शालिनी के साथ जीवन अपने कमरे में गया तो बसंती भी साथ थी. बसंती ने शालिनी के चेहरे को अपने हाथों में लिया.

बसंती: “बाबूजी ने हीरा चुना है, बहूरानी। आप सच में अद्वितीय हो.”

शालिनी: “तू मुझे बहूरानी क्यों कहती है, सबको तो दीदी बुलाती है. मुझे भी दीदी ही बुलाया कर, मुझे अच्छा लगेगा.”

बसंती: “ठीक है, दीदी.” फिर कुछ सोचकर, “आपको मेरे रूचि से घृणा तो नहीं है न दीदी?”

शालिनी: “नहीं. मैं समझ सकती हूँ. इनके साथ इतने ही दिनों में मैंने ये सीख लिया है कि रतिसुख के कई आयाम और कोण होते हैं. हमें अपने मन को नए परीक्षण और नई अनुभूतियों का स्वागत करना आना चाहिए. जितनी सरलता से सब एक दूसरे के साथ सहवास करते हैं, न कोई ईर्ष्या, न कोई क्रोध, ये सीखने और भोगने का आनंद लेना चाहिए.”

बसंती ने अब डरते हुए पूछा, “तो क्या आप बाबूजी आपके साथ वो सब खेल खेलना चाहें तो आप उनका साथ दोगी?”

शालिनी सोच में पड़ गई. फिर उसने बसंती को देखकर कहा, “क्या तुम मुझे सिखाओगी?”

बसंती की आँखें खुली रह गईं. उसने जीवन की ओर देखा जो इन बातों से अनिभज्ञ अपने लिए पेग बना रहा था.

“आइये मेरे साथ.” बसंती बोली और वो दोनों उस कमरे के बाथरूम में चली गईं.

जीवन ने अनुमान लगाया कि बसंती की प्यास फिर भड़क गई होगी. उसे ये सोचकर सांत्वना मिली कि उसने शालिनी को चुना और शालिनी ने भी प्रतिरोध नहीं किया. बाथरूम में जाकर बसंती ने शालिनी को देखा.

“क्या करें दीदी?”

“पहले मैं तुम्हें पिलाती हूँ, फिर मैं प्रयास करुँगी. ठीक है न?”

बसंती ने शालिनी को कमोड पर बैठाया और उसके सामने आकर बैठ गई और उसकी चूत पर मुँह लगा दिया. शालिनी ने स्वयं को संतुलित किया. वो एक नया शिखर पार करने जा रही थी. और वो भी उनके घर की नौकरानी की माँ के साथ. उसे न जाने क्यों इस विचार से कोई क्षोभ नहीं हुआ. उसने देखा था कि सभी मित्र बसंती का सम्मान करते हैं और उसे किसी भी रूप में कम नहीं आँकते। उसने शरीर को ढीला छोड़ा और अपने मूत्र पात्र बसंती के मुँह में करना आरम्भ किया. उसने बसंती की जीभ और होठों के संचालन पर भी ध्यान दिया कि किस प्रकार से वो इस जल का सेवन कर रही थी. उसे कुछ नया सीखने को मिल गया.

जब शालिनी ने अपना कार्य समाप्त किया तो उसने बसंती को उसकी चूत को अंदर और बाहर चाटकर शेष जल को चाटते हुए पाया. सम्भवतः ये भी इस अनुभव की एक शिक्षा थी. बसंती उठ गई और उसने शालिनी को देखते हुए अपने होंठों को चाटा।

“दीदी, आप सच में बहुत मीठी हो.”

शालिनी अब सोच में पड़ गई. क्या वो आगे बढ़े? फिर उसने निर्णय लेते हुए बसंती का हाथ पकड़ा और खड़ी हो गई.

“मैं भी तो देखूँ ये (जीवन) तेरे पानी के लिए इतने अधीर क्यों रहते हैं. अब बैठ.”

बसंती का रोम रोम सिहर उठा. आज जीवन के अतिरिक्त कोई और उसका मूत्र पान करने वाला था. आज उसके बाबूजी का एकमेव अधिकार समाप्त होने जा रहा था. चाहे ये एकमात्र अवसर क्यों न हो, पर इसका वो अनुभव करना चाहती थी. कमोड पर बैठकर उसने अपने पैरों को फैलाया और शालिनी ने उसके सामने स्थान लेकर उसका अनुशरण करते हुए बसंती की चूत पर अपना मुँह लगा लिया.

“दीदी, जीभ नीचे रखना, नहीं तो बाहर अधिक गिरेगा.”

शालिनी ने यही किया और बसंती ने उसके सिर पर हाथ लगाया.

“गट गट करके पीती रहना, दीदी. मैं रुक रुक कर पिलाऊँगी।”

शालिनी ने सिर हिलाया और जीवन के नए स्वाद और अनुभव की प्रतीक्षा करने लगी.

बसंती ने हल्के दबाव के साथ शालिनी के मुँह में मूत्र त्यागना आरम्भ किया. उसने एक सीमित मात्रा में ही दबाव डाला. इसका परिणाम ये हुआ कि जो मात्रा उसने छोड़ी उसे पीने में शालिनी को कोई दुविधा नहीं हुई. बसंती के लिए एक कठिन नियंत्रण का कार्य था, परन्तु वो जीवन की भावी पत्नी के लिए इस कष्ट को भी झेलने के लिए तत्पर थी. शालिनी बसंती के कहे अनुसार गट गट करते हुए पीती रही. कुछ घूँटों के उपरांत ही उसे मूत्र की गंध का आभास हुआ. परन्तु वो रुकी नहीं.

एक नया ही स्वाद था. गंध अवश्य चिर परिचित थी, पर स्वाद में अनूठापन था. बसंती ने पर्याप्त समय लेते हुए शालिनी को अपना पूरा जल भेंट कर दिया. फिर उसके सिर पर हाथ घुमाया.

“मैं निपट गई दीदी.”

शालिनी ने बसंती का अनुशरण करते हुए उसकी चूत को चारों ओर से चाटा और अंदर जीभ डालकर भी कुरेदा. फिर उसने अपना मुँह हटा लिया और बसंती की ओर देखने लगी. बसंती के मुँह पर एक मुस्कान थी.

“कैसा लगा दीदी?”

“हम्म्म, ऐसा कुछ विशेष नहीं. हाँ, गंध ने अवश्य कुछ क्षणों के लिए विचलित किया था.” फिर रुककर बोली, “पर स्वाद अनूठा था. लुक मीठा, कुछ कसैला, कुछ न समझ आने वाला.”

“हाँ दीदी, यही बात है. आप दिन के भिन्न भिन्न समय पियोगी तो और भी विविधता पाओगी. चुदने से पहले और चुदने के बाद में भी बहुत अंतर होता है. और यही चोदने के पहले और चोदने के बाद भी होता है.”

“अच्छा! तब तो मुझे एक बार सब का स्वाद लेना चाहिए.” शालिनी ने नटखट स्वर में कहा तो बसंती खिलखिला उठी.

“दीदी, मुझे लगता है कि आप बाबूजी को बहुत प्रसन्न रखेंगी. वैसे बाबूजी, इसे मदिरा में मिलाकर भी पीते हैं. मैं तो पीती नहीं, सो जानती भी नहीं. पर कहते हैं कि मेरे मूत्र से बने पेग में नशा कई गुना अधिक होता है.”

“अच्छा जी. ऐसे हैं तेरे बाबूजी. उनका स्वाद कैसा है?”

“अरे दीदी, पूछ क्या रही ही, हाथ कंगन को आरसी क्या? अभी बुलाकर देख लो और ले लो स्वाद!”

“हम्म्म, ठीक है. बुला अपने बाबूजी को.”

शालिनी बोली तो बसंती लपककर कमरे में गई और कुछ ही पलों में जीवन को ले आई. जीवन ने शालिनी को नीचे बैठे देखा तो अचम्भित हो गया.

बसंती ने उसका लंड अपने हाथ में लिया और बोली, “दीदी हमारे खेल में मिलने की इच्छा रखती है. अब बाबूजी, आपके ऊपर है आप क्या चाहते हो?”

जीवन ने शालिनी को देखा, “क्या सच?” ऐसा कहते हुए बसंती ने अपने हाथ में उसके लंड को मचलते हुए अनुभव किया. शालिनी ने मात्र सिर हिलाकर स्वीकृति दी.

बंसती ने जीवन का लंड पकड़कर उसे शालिनी की मुँह की ओर इंगित किया.

“बाबूजी, अब अपनी दुल्हन को अपना पानी पिलाकर अपना बना लो.”

शालिनी ने मुँह खोला और जीवन के लंड से मूत्र की धार उसके मुँह में समाने लगी. बसंती के सिखाये अनुसार शालिनी बिना रुके गट गट करते हुए पीने लगी. पंरतु जीवन का स्त्राव अधिक था और उसके मुँह से बाहर गिरने लगा. शालिनी इसकी चिंता किया बिना अपना कार्य करती रही. जब जीवन का बहाव समाप्त हुआ तो उसने स्वाद और गंध का आभास किया. बसंती ने जीवन का लंड छोड़ा और शालिनी के शरीर से बहते हुए मूत्र को चाटने लगी. फिर उसने अपने होंठ शालिनी से जोड़े और दोनों एक दूसरे को चूमने लगीं.

जीवन उन दोनों को देखकर आश्वस्त हो गया कि अब कोई दुविधा नहीं है. उसके मन से एक बड़ा बोझ उतर गया. बसंती ने जीवन को देखा।

“बाबूजी, दीदी की टंकी अभी खाली है. मैं तो कहूँगी कि इसमें पैट्रोल डालकर आप भी स्वाद ले लो. बड़ा मीठा पानी है आपकी दुल्हनिया का. मैं तो अब जब तक साथ रहूँगी दिन में एक बार तो अवश्य पियूँगी.”

शालिनी लजा गई.

“तेरा भी बड़ा मीठा था, बसंती. अच्छा लगा था मुझे.”

ये सुनकर जीवन अचरज में पड़ गया. उसने सोचा था कि बसंती ने शालिनी को पहला पानी उसका पिलाया था, पर शालिनी पहले ही बसंती को चख चुकी थी. बसंती समझ गई.

“बाबूजी. पिलाया चाहे पहले मैंने हो, पर नहलाना पहले आप ही.”

जीवन मुस्कुराया, “ठीक है. पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है अगर तूने पहल की तो. पर अब कुछ समय विश्राम कर लेते हैं. फिर बहुत व्यस्त हो जायेंगे.”

हल्के स्नान के बाद बसंती और शालिनी जाकर पलंग पर जीवन के साथ लेट गए और कुछ ही पलों में सो गए और लगभग एक घंटे बाद ही उठे. सबसे पहले बसंती की ही नींद टूटी. वो बैठकर जीवन और शालिनी को सोते हुए देख रही थी. उसे दोनों की जोड़ी बहुत प्यारी लग रही थी. और अगर कोई शंका थी तो वो भी कुछ समय पहले दूर हो चुकी थी. शालिनी की आँख खुली तो उसने बसंती को उसे निहारते हुए देखा और मूक प्रश्न किया.

“आप सच में बहुत सुंदर हो दीदी. बाबूजी बहुत भाग्यशाली हैं.” फिर कुछ सोचकर, “आप भी कम नहीं हो जो आपको उनके जैसा पुरुष मिला है. आप दोनों इस संतुलन को बिगड़ने मत देना.”

शालिनी उठी तो जीवन ने भी आँख खोली, “तुम सच कह रही हो बसंती, हमें एक दूसरे को पाने में एक लम्बा समय लगा, पर अब एक दूसरे को खोना नहीं चाहेंगे. और सच कहूं तो मैं तुझे भी नहीं खोना चाहता. मेरे मन में तेरा बहुत बड़ा स्थान है. अगर भूरा न होता तो मैं तुझे अपना लेता.”

“बाबूजी, मैं तो सदा आपकी रहूँगी, भूरा बस अपनी लत छोड़ दे तो मैं उसे अपने साथ लेकर आपके ही पास चली आऊँगी। अपने वचन दिया है उसके व्यसन छुड़ाने का,उसका पालन करना, बस यही चाहती हूँ.”

“चिंता न कर, घर लौटकर मैं उस क्लिनिक में बात करूँगा, भूरा के लिए. उसके उपचार में समय लगेगा, छह माह लग सकते हैं. उस पूरे समय वो वहीँ रहेगा. पर जब लौटेगा तब तेरी दूसरी सुहागरात मनाने का उत्सव मनाएँगे।”

बसंती की आँखों से आँसू बह निकले. फिर उसने स्वयं को संयत किया.

“बाबूजी, अब हमें चलना चाहिए. पर उसके पहले आप दीदी का भी स्वाद ले लो.”

जीवन ने शालिनी को देखा और उसे चलने का संकेत किया. बाथरूम में जाकर शालिनी कमोड पर बैठी और जीवन को अपना मूत्र पान करवाया. उसके बाद जीवन और शालिनी बाहर आये और बसंती के चल पड़े.

जीवन: “बसंती, तूने सच कहा था. बहुत मीठा है शालिनी का पानी. अब तो उसके बिना जीना कठिन होगा.”

“बाबूजी, आपने सच कहा. पर अब बबिता दीदी की ओर ध्यान दो.”

सामने बबिता कँवल के साथ खड़ी थी. उसने एक साड़ी पहनी थी, जो बस उसके शरीर से लिपटी हुई थी. अन्यथा कोई और वस्त्र नहीं था. जीवन को देखकर वो लजा गई. बसंती और शालिनी जाकर उससे मिलीं और तब तक अन्य सब भी कमरे में आ गए.

“पहले दो पेग और भोजन हो जाये, फिर कुछ और.” ये कहते हुए कंवल ने असीम को संकेत किया.

बबिता को छोड़कर अन्य स्त्रियाँ रसोई में चली गयीं और अल्पाहार और भोजन का प्रबंध करने लगीं. आधे ही घंटे में सब कुछ निपट गया. अल्पाहार लेकर आयीं और असीम ने पेग बनाये. बबिता पुरुषों को उनके पेग देने लगी. हर पेग से एक घूँट लेकर वो ग्लास थमा रही थी. ग्लास लेकर कोई उसके मम्मे दबाता तो कोई गाँड। पेग बाँटने के बाद उसने भी अपना पेग लिया और अन्य सखियों के साथ बैठकर पीने लगी.

कुछ ही देर में भोजन लगा दिया गया और सबने अपने मन के अनुसार खाया. खाना कम खाने पर अधिक ध्यान रखा गया जिससे कि अनावश्यक सुस्ती या अन्य समस्याएं न आएं. मदिरा की बोतलें सजा दी गयीं, भोजन को ढक दिया गया जिससे कि विश्राम के समय अगर मन करे तो और खाया जा सके. अल्पाहार अधिक मात्रा में रखा गया था. भोजन के उपरांत सभी प्रबंध पूरे करने में लगभग और आधे घण्टे का समय लगा. इस पूरे समय वातावरण पूर्ण रूप से सहज और सामान्य था. कोई विश्वास ही नहीं कर सकता था कि कुछ ही देर में यहाँ वासना का ऐसा वीभत्स खेल होना है जिसे देखकर निर्बल मन के व्यक्ति की आत्मा काँप जाएगी.

बसंती अपने निर्देशक की भूमिका के लिए उचित स्थान पर बैठ कर सभी गतिविधियों को संचालित कर रही थी. किसी के मन में उसके प्रति कोई द्वेष न था और सब उसके निर्देशों का पालन कर रहे थे. पलंग के निकट ही धुली हुई चादरें और कई सारे तौलिये रख दिए गए थे. गीता ने बसंती को उसके द्वारा कई बार उपयोग किया हुआ कांच का एक बड़ा प्याला दिया जिसे बसंती ने अपने निकट रख लिया. और एक बाल्टी नीचे रख दी गई.

बसंती को बैठने के लिए एक प्लास्टिक की कुर्सी दी गई थी और उसके नीचे भी प्लास्टिक की चादर फैला दी गई थी. एक और प्लास्टिक की कुर्सी उसके पास रख दी गई. कई सारे पुराने कपड़ों से नीचे बिछी प्लास्टिक के चारों ओर एक मेढ़ बना दी गई जिससे कि कोई भी पानी बाहर न बहे. फिर उसके बाहर द्वार पर लगने वाली कपड़े की चटाइयाँ लगा दी गयीं. उसके साथ ही कई सारे पोंछने के कपड़े भी उसे दे दिए गए थे.

शालिनी ये सब देखकर स्तब्ध थी. इसका यही अर्थ था कि ये एक नियमित प्रक्रिया थी जिसका इतनी कुशलता से प्रबंध किया गया था. अब रंगमंच नए खेल के लिए व्यवस्थित हो चुका था. किसी भी समय पहले गैंगबैंग का शुभारम्भ हो सकता था. कँवल ने उसके पास आकर उसे कुछ समझाया और चला गया. बसंती ने बबिता को देखा जिसकी आँखों में उल्लास और कामोन्माद की चमक थी. बसंती ने सबको अपने स्थानों पर बैठने का आदेश दिया, जिसका तुरंत पालन हुआ.

फिर उसने बबिता को खड़े होकर अपनी साड़ी निकालने का आदेश दिया. एक नौकरानी की माँ इतने बलशाली पुरुषों और प्रभावी महिलाओं को जिस प्रकार से आदेश दे रही थी वो दर्शनीय था. सम्भवतः जीवन से उसकी निकटता के कारण उसे ये अधिकार मिला था.

“दीदी, आज आपका गैंगबैंग होने वाला है. इसकी आपको बधाई हो. मैं आशा करती हूँ कि आपको इस चुदाई में असीम आनंद की प्राप्ति हो. इसके साथ ही आपको ये भी चेता दूँ कि हर बार के समान आपका सुरक्षा शब्द सरला होगा.”

शालिनी चौंकी क्योंकि ये तो जीवन की दिवंगत पत्नी का नाम था. पर उसे तुरंत इसका आशय समझ आ गया. उसने जीवन को देखा जिसका सिर झुका हुआ था.

“मेरे पीछे लगी तख्ती पर आपके नाम और नंबर लिखे हैं. ये वही नम्बर होते पर असीम और कुमार के आने से कुछ अंतर है.” उसने पीछे संकेत किया.

तख्ती पर लिखे हुए नाम और नंबर दिखने के लिए.

१ असीम

२ बलवंत

३ जस्सी

४ जीवन

५ कँवल

६ कुमार

७ सुशील

“तो मैं स्थिति के अनुरूप एक दो या तीन नंबर पुकारूँगी। मैं उन्हें बताऊंगी कि उन्हें बबिता दीदी को कैसे और कहाँ चोदना है. ये हमारी परम्परा है तो किसी को कोई शंका नहीं होने चाहिए.”

“और आप सबको, उसने सभी स्त्रियों को देखते हुए कहा, आपके हर स्खलन को इस मुझे ही अर्पण करना होगा. बबिता दीदी को कब क्या मिलेगा इसका निर्णय किसी भी समय मैं तत्काल कर सकती हूँ. पर आप जानते ही हो कि मैं कितनी लालची हूँ!” ये कहते हुए वो हंस पड़ी और अन्य सबने उसका साथ दिया.

“तो पहले सुशील भाईसाहब को अपनी पत्नी के मुँह के सहवास का सुख मिलेगा. इसके बाद बलवंत भाईसाहब को चूत और इसके बाद कुमार को गाँड मारने दी जाएगी. इससे आगे इन तीनों के कार्य समाप्ति पर बताऊँगी।”

“तो बबिता दीदी, अब आप आकर इस कुर्सी पर बैठिये.”

बबिता दूसरी कुर्सी पर बैठी और बसंती ने उसके आगे बैठकर अपना मुँह उसकी चूत पर रख दिया और बबिता ने आशानुसार अपना मूत्र का दान बसंती को दिया. बसंती ने उसे धन्यवाद किया और अपनी कुर्सी पर जा बैठी. सुशील आया और उसने बबिता के मुँह में लंड डाला और उसे चोदने लगा. बबिता भी उसका पूरा साथ दे रही थी. जब सुशील झड़ने को आया तो उसने अपना लंड बाहर निकाला और बसंती के काँच के प्याले में वीर्यपात कर दिया. बबिता वहाँ से उठी और पलंग पर जा बैठी. बसंती ने सुशील के लंड को चूमा और लंड को नीचे बाल्टी की ओर किया जिसमें सुशील ने मूत्र विसर्जन कर दिया. गैंगबैंग का आधिकारिक रूप से आरम्भ हो चुका था.

बबिता का गैंगबैंग:

बलवंत अपने लंड को हिलाते हुए बबिता के सामने आ खड़ा हुआ. बबिता नेउसके लंड को मुँह में लेकर कुछ पल चूसा और फिर पलंग पर पैरों को फैलाकर लेट गई. बलवंत ने बबिता को प्रेम से देखा.

“बड़े दिन बाद हाथ आई हो. अब मन भर कर चोदुँगा।”

“किसने रोका है आपको? अब तो वैसे भी कई दिन बाद मिलोगे. कुछ ऐसे चोदो कि कई दिन तक भूलूँ नहीं.”

बलवंत ने अपना लंड चूत के मुहाने पर रखा और बोला, “तब तो इस बार प्यार से चोदता हूँ. जोश वाली चुदाई फिर कर लेंगे.”

ये कहते हुए बबिता और बलवंत की चुदाई का आरम्भ हो गया और ये चुदाई से अधिक प्रेमालाप था. दोनों किसी भी प्रकार की शीघ्रता नहीं दिखा रहे थे. बबिता की बात सुनकर गीता की आँखों में आये आँसू अब सूख गए थे. उसे भी इस बात का दुःख था कि वो अपने घनिष्टतम मित्रों को छोड़कर जाने वाली है. उसे विश्वास था कि जीवन और बलवंत इसका कोई समाधान निकाल लेंगे. उसने जीवन को देखा जो उसे ही देख रहा था. जीवन ने अपना सिर हिलाकर बताया कि वो उसकी भावना समझ गया है. गीता फिर अपने पति को अपनी सखी को चोदते हुए देखने लगी.

इस बीच जीवन उठा और बसंती के पास गया.

“इससे पहले कि कुछ आगे बढ़ें मुझे अपना टॉनिक पिला दे.”

बसंती ने अपने पैर चौड़े किये और जीवन उनके बीच में बैठ गया.

“लो पी लो, बाबूजी. इसके सेवन से आपका लौड़ा रात भर खड़ा रहने वाला है.” बसंती खिलखिलाकर बोली और जीवन के मुँह में मूत्र विसर्जित कर दिया.

अपनी औषधि के सेवन के बाद जीवन उठकर अपने स्थान पर चला गया और वो भी बबिता की चुदाई जो अब कुछ गति पकड़ रही थी और सम्भवतः समापन पर थी, देखने लगा.

जीवन का अनुमान सही था बलवंत ने कुछ धक्के लगाए और फिर अपना लंड बाहर निकाल लिया. बबिता के रस से मिश्रित उसके अपने रस से चमकता गीला लौड़ा लेकर वो निसंकोच बसंती के सामने जा खड़ा हुआ. बसंती ने उसका लंड चाटा और चूसने लगी. बलवंत तो झड़ने वाला ही था अधिक न रुक सका और बसंती के मुँह में झड़ गया. बसंती ने कुछ तो गटक लिया, पर फिर काँच के प्याले में थूक दिया. फिर उसने बलवंत की मुठ मारकर शेष रस को प्याले में गिरा दिया.

इसके बाद उसने बलवंत के लंड को अपने मुँह के आगे किया और मुँह खोल लिया. बलवंत के लिए ये समुचित संकेत था. उसने बसंती के मुँह में मूतना आरम्भ किया. कुछ पीने के बाद बसंती ने नीचे की ओर आँखें कीं तो बलवंत ने अपनी धार रोकी और बाल्टी में सुशील के योगदान में अपना अंश जोड़ दिया. बसंती ने उसे मुस्कुराकर देखा और एक ओर जाकर बैठे के लिए कहा. अब बलवंत को लगभग एक से डेढ़ घंटे का अंतराल मिला था. उसने अपने लिए एक पेग बनाया और चुस्कियाँ लेते हुए कुमार को देखने लगा जिसका लंड अब बबिता के मुँह में था.

बलवंत की चुदाई के बाद बबिता को पाँच मिनट का विश्राम दिया गया था. और जब तक बलवंत बसंती के मुँह में झड़ा तब तक कुमार बबिता के पास पहुँच कर उससे अपना लौड़ा चुसवा रहा था. उसके लंड को मुँह से निकालकर बबिता ने घोड़ी का आसन लिया और कुमार ने उसकी गाँड में घी डालकर उसे चिकना कर दिया. फिर उसने कुछ घी अपने लौड़े पर भी लगाया. उसे गाँव प्राकृतिक चिकनाई अच्छी लग रही थी, अन्यथा नगर में अधिकतर जैल का उपयोग करना का चलन हो चुका था.

“नानी, प्यार से मारूँ या जोर से?” कुमार लंड गाँड के छेद हुए पूछा.

“बिटवा, पूछ कर क्यों मूरख बना रहा है. तुझे जानती हूँ, तू गाँड अपने दादा के समान ही मारेगा. तो पूछ कर बुढ़िया को बहला मत और मार मेरी गाँड।” बबिता ने कहा तो कुमार ने एक धक्के के साथ आधा लौड़ा गाँड में पेल दिया. अगले दो धक्कों में पूरा लंड बबिता की गाँड में जड़ दिया. दोनों साँस लेने के लिए रुके फिर एक मंथर गति से कुमार बबिता की गाँड मारने लगा.

गीता ने शालिनी को देखा जिसकी आँखों में वासना के डोरे तैर रहे थे. वो उसके सामने जा बैठी और पैरों को खोलकर उसकी चूत चाटने लगी. उनकी देखा देखी पूनम ने निर्मला को लिटाया और दोनों एक दूसरे की चूत का आनंद लेने लगीं. कुछ ही पलों बाद शालिनी ने भी यही इच्छा जताई तो शालिनी और गीता भी एक दूसरे की चूत चाटकर सुख पाने में जुट गयीं.

बसंती अपनी चूत को उँगलियों से ही सहला रही थी. अपने शरीर की बढ़ती प्यास को शांत करने के लिए उसने बाल्टी में से एक कटोरी मूत्र लिया और काँच के प्याले में उड़ेलकर पी गई. फिर उसने अपने स्तनों पर भी कुछ मात्रा रगड़ ली. और अंत में चेहरे पर थोड़ा सा लेप कर लिया. उसकी आग शांत न होकर और भड़क गई. पर अब उसे चारों स्त्रियों या कुमार के झड़ने तक रुकना था. वो आशा से कुमार के सशक्त धक्कों से बबिता की गाँड की नली की सफाई होते हुए देखने लगी.

बबिता की गाँड मारते हुए कुमार कोई दया नहीं दिखा रहा था. बबिता भी आज पूरी रात इसी प्रकार की चुदाई की अपेक्षा कर रही थी. उनकी मंडली में गैंगबैंग अब बहुत विरले हो गए थे. और उसे आज की गैंगबैंग रानी बनने का जो अवसर मिला था वो अब कब दोहराया जायेगा इसका कोई अनुमान नहीं था. अपनी गाँड में कुमार के लौड़े के शक्तिशाली धक्के उसे असीम सुख प्रदान कर रहे थे. असीम और कुमार दोनों अपने दादा जीवन की शक्ति और निर्ममता को विरासत में पाए थे. उनके पिता आशीष अपेक्षाकृत कम निर्दयी थे,पर आशीष की कला अनूठी थी. गाँड में चलते मोटे लम्बे लौड़े के आभास से बबिता की चूत से पानी बहने लगा था.

लगभग गाँड की दस मिनट तक भीषण चुदाई करने के बाद कुमार ने कहा कि अब उसे छोटी नानी के पास जाना होगा. बबिता इसका अभिप्राय समझ कर फिर से झड़ गई. और कुमार ने अपना लंड उसकी गाँड से बाहर निकाल लिया. बबिता कुछ समय इसी स्थित में रही पर उसे भी बसंती के पास जाने की आवश्यकता का आभास हुआ. उसने देखा तो बसंती कुमार के लंड को बड़े प्रेम से चूस रही थी. उसे इस तथ्य से कोई संकोच नहीं था कि वो लंड अभी बबिता की गाँड की गहराइयों को खँगाल कर आया है.

कुमार चूँकि झड़ने के समय ही बसंती के पास गया था तो बसंती के लंड चूसने के कुछ ही पलों में उसने बसंती ने मुँह में अपना रस छोड़ दिया. बसंती ने पहले कुछ पिया और फिर मुँह में भर लिया और काँच के प्याले में थूक दिया. इसके बाद कुमार के मुरझाते लंड को नीचे बाल्टी की ओर किया.

“छोटी नानी, मुँह में ले लो न? अभी तो अपने चेहरे पर मसल रही थीं. ताजा माल है, क्यों ठण्डा करोगी?” कहा.

“बिटवा, बहुत चतुर हो गए हो. चलो मुतो मेरे मुँह में और चेहरा भी धो दो अपने अमृत से.” बसंती ने उसकी आँखों में झाँककर कहा.

कुमार मुस्कुराया और अपने लंड से धार छोड़कर पहले बसंती को पिलाया और फिर उसके चेहरे और वक्ष पर भी बौझार कर दी. उसके बाद शेष मात्रा बाल्टी में समर्पित कर दी. वो हटा तो बसंती ने बबिता को खड़ा पाया, जो अपने पैरों पर उछल रही थी.

“क्या दीदी, रुका नहीं जा रहा है क्या?” ये कहते हुए उसने बबिता को अपने सामने खड़ा किया.

“हो जाओ हल्की, दीदी. मुँह में जाये तो ठीक नहीं तो बाल्टी तो है ही.” बसंती ने अपना मुँह बबिता की चूत पर रखने से पहले कहा.

इतनी देर से ठहरी हुई बबिता की चूत से गर्म मूत्र ने बसंती के मुँह में त्याग किया और फिर बसंती ने मुँह हटाकर बाल्टी में गिरने दिया.

“दीदी, सारा पी जाऊँगी तो बाद में तरसूंगी. वैसे कैसी रही चुदाई.”

“मस्त रही, बसंती. अब आगे क्या करना है.”

“अभी बताती हूँ. आप जाकर कुछ विश्राम कर लो.”

बबिता जाकर सुशील के पास बैठ गई और उसके ग्लास से दो घूँट लिए. तभी कुमार उन दोनों के लिए नए ग्लास भर कर ले आया. पूनम और निर्मला एक दूसरे को संतुष्ट कर चुकी थीं और उन्होंने नियम तोड़ दिया था. दोनों बसंती के सामने जा खड़ी हुईं.

“बसंती, हम दोनों ने एक दूसरे का रस पी लिया है. क्या करें?” पूनम ने पूछा.

“दीदी, अब आप दोनों को मुझे भी संतुष्ट करना होगा, एक एक करके. वैसे शालिनी और गीता दीदी भी यही करने वाली हैं. अच्छा होता अगर आप मुँह में रख कर मुझे कुछ दे पातीं, पर कोई बात नहीं है. मैं आपसे अपनी चूत चटवाकर सुख पा लूँगी।” अब तक शालिनी और गीता भी आ चुकी थीं और उसकी बात सुन ली थी.

फिर बसंती बोली, “पर क्या आपके पास मेरे लिए कुछ भी और नहीं है?” ये कहकर उसने मुँह खोलकर उसकी और ऊँगली दिखाई।

पूनम: “क्यों नहीं है, बोल किसका पानी पहले पीना है?”

“जो मेरी चूत पहले चाटेगा.”

इसमें किसी को कोई समस्या न थी. तो पूनम ने ही पहले हाथ खड़ा कर दिया. उसने बसंती के सामने आसन जमाया और उसकी चूत को चाटने लगी. कुछ पलों में ही बसंती का प्रेमरस पूनम के मुँह में भर गया. उसके बाद बसंती ने पूनम को दूसरी कुर्सी पर बैठाया और उसकी चूत को चाटने लगी. कुछ ही परिश्रम किया होगा कि पूनम ने उसके मुँह में अपनी आहुति दे दी. बसंती ने फिर कुछ पिया कुछ बाल्टी में थूक दिया. पूनम खड़ी हुई और जाकर अपने पति के साथ बैठ गई जहाँ उसका पेग रखा हुआ था.

“अभी आप तीनों जाओ. मेरे पेट में अब बिलकुल स्थान नहीं है.” बसंती ने कहा तो गीता, निर्मला और शालिनी भी जाकर अपने पतियों के साथ बैठ गयीं.

उधर बसंती ने बबिता की अगली चुदाई की व्यवस्था के लिए चिंतन आरम्भ किया. उसने कुछ परिवर्तन करने का निर्णय भी लिया.

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क्रमशः

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अध्याय ७१: जीवन के गाँव में शालिनी ८

अध्याय ७० से आगे


अब आगे:

“आप सब मेरी बात सुनिए.” उसने पुकारा.

सब उसकी ओर देखने लगे.

“मेरा ये सोचना है कि अगली चुदाई में तीन के स्थान पर दो ही पुरुष रहेंगे. चूँकि मुँह चोदने वाला बबिता दीदी के मुँह में झड़ नहीं सकता तो इसका कोई अर्थ नहीं है. इसीलिए पहले असीम दीदी को चोदेगा, फिर जस्सी भाईसाहब उनकी गाँड मारेंगे। उसके बाद बाबूजी चोदें और कँवल भाईसाहब गाँड मारें. ये लगातार किया जा सकता है. अभी भी एक के बाद एक ही चोदेगा. क्या विचार है?”

“ठीक है. वैसे भी तेरे मुँह में झड़ने से अच्छा कुछ और छोड़ना है.” जीवन हँसते हुए बोला.

“बाबूजी, अधिक चतुर न बने, नहीं तो आज एक बूँद न छोड़ने दूँगी अपने मुँह में.” बसंती ने झूठा क्रोध दिखाया.

जीवन हँसते हुए बोला, “ठीक है मेरी रानी, तुझसे कैसे तर्क करूँगा, पक्का हार जाऊँगा।”

“अच्छा है इतनी सरलता से समझ गए.” ये कहकर उसने अपनी जीभ होंठों पर घुमाई. “तो अगला चरण आरम्भ हो, असीम बेटा चल अपनी नानी की चूत अब तक तरसने लगी होगी. उसके बाद मेरे ही पास आना.”

“जी छोटी नानी.” असीम ने सुशील की आज्ञा ली और फिर बबिता का हाथ लेकर पलंग की ओर चल दिया.

“मुझे प्यास लगी है, दीदी. आपमें से कौन आएगा? पहले मेरी चूत चाटनी होगी.”

निर्मला और शालिनी खड़ी हुईं पर शालिनी बैठ गई. निर्मला बसंती की चूत को चाटकर उसे झड़ाने में सफल हुई और फिर दूसरी कुर्सी पर बैठकर बसंती के मुँह में मूत्रदान किया. बसंती ने फिर कुछ बाल्टी में बचा लिया. निर्मला अपने स्थान पर आ बैठी। अब सबकी आँखें उस पलंग पर थीं जहाँ असीम ने अपने लौड़े को बबिता की चूत में धकेलना आरम्भ किया था. कुछ ही पलों में उसका पूरा लौड़ा बबिता की चूत में समा गया धुआँधार चुदाई आरम्भ हो गई. बबिता की चीखों से उसके आनंद का अनुमान मिल रहा था, वहीँ असीम की गुर्राहट उसकी शक्ति का परीक्षण ले रही थी.

पुरुष अपने लंड सहला रहे थे तो स्त्रियों की उँगलियां उनकी चूत को शांति करने का प्रयास कर रही थीं. इस बीच बबिता और असीम ने तीन बार आसन बदले और पंद्रह मिनट की कठोर तपस्या के बाद बबिता को तीन बार झड़ने का सुख प्राप्त हुआ. जब असीम को आभास हुआ कि वो झड़ने वाला है तो उसने अपनी गति कम की और फिर धीमे से अपना लंड बाहर निकाल लिया और फिर उसे लहराते हुए बसंती के पास जा खड़ा हुआ.

“बड़ी मलाई लगाकर लाये हो बिटवा अपनी छोटी नानी के लिए?” बसंती ने ये कहकर उसके लंड को चाटना आरम्भ किया. लंड को चमकाने के बाद उसे चूसने में जुट गई और जब असीम झड़ने लगा तो उसके वीर्य को काँच के प्याले में जोड़ दिया.

“छोटी नानी?”

“का बिटुआ?”

“अभी और कुछ भी है आपके लिए. मुँह तो खोलो.” असीम ने मुस्कुरा कर कहा.

“बड़े नटखट हो गए हो. अपनी छोटी नानी के मुँह में सूसू करना चाहते हो? पर तुम्हें कैसे मना करूँ?” बसंती ने मुँह खोला और असीम ने उसके मुँह में मूत्र त्याग करते हुए अपना कर्तव्य पूर्ण किया. बाल्टी का स्तर और बढ़ गया. असीम के हटते ही बबिता दूसरी कुर्सी पर आ बैठी और बसंती ने पहले उसकी चूत को अंदर से साफ किया और फिर बबिता के मूत्र का दूसरा योगदान स्वीकारा. फिर उसकी गाँड को चाटकर कुछ चिकना किया।

“जाओ दीदी, अब जस्सी भाईसाहब आपकी गाँड फाड़ने को उतावले हैं.”

“जैसे मैं जानती नहीं.” उसने पलंग की ओर देखा जहाँ जस्सी अपने लंड को मुठिया रहा था. वो इठलाते हुए उसके पास पहुँच गई और घोड़ी बन गई.

जस्सी न जाने कबसे अपने लौड़े को सहलाये जा रहा था और इतना आतुर था कि बबिता के घोड़ी बनते ही उसने सवारी गाँठी और गाँड मारने लगा. बबिता अभी अपने आसन में पूर्ण रूप से स्थापित भी नहीं हो पाई थी कि गाँड में लौड़े ने धुआँधार चुदाई आरम्भ कर दी.

“इतना क्यों बेचैन हो? मैं कहीं भागी जा रही हूँ क्या. थोड़ी साँस तो लेने देते.” बबिता ने उलाहना दी तो जस्सी को अपनी त्रुटि का आभास हुआ. उसने धक्के धीमे किया और नीचे बबिता ने अपना आसन ठीक किया जिससे उसे भी गाँड मरवाने का आनंद प्राप्त हो सके.

बबिता ने पीछे सिर घुमाकर जस्सी को अब अपनी गति से आगे बढ़ने के लिए कहा तो जस्सी फिर से उसी पुरानी गति से उसकी गाँड मारने लगा. बबिता को अपनी गाँड में चलते हथोड़े का आनंद अनुभव होने लगा तो उसकी चूत ने पानी छोड़ा. बबिता ने अपना एक हाथ पीछे करते हुए अपने भग्नाशे को छेड़ा तो ढेर सा रस पलंग पर बिखर गया. उसके काँपते शरीर को जस्सी ने थामा और धक्कों की तीव्रता बढ़ा दी. बबिता ने अपना हाथ आगे करते हुए दोनों कोहनियों का सहारा लिया और जस्सी के धक्कों का साथ देने लगी. दोनों वासना के ज्वर में जल रहे थे और शीघ्र पतन की ओर अग्रसर हो रहे थे.

शालिनी के मन में एक प्रश्न था जिसे उसने जीवन से पूछा, “सभी को बसंती के पास क्यों जाना पड़ रहा है? वो भी तो आ सकती है.”

जीवन: “क्योंकि वो इस पूरे कार्यक्रम की संचालिका है. और उसे अपना स्थान पता है. अगर वो अपने सिहांसन से हटी तो वो जिस प्रकार से मूत्र इत्यादि का सेवन कर रही है उसका स्थान हम सबके मन में नीचा हो जायेगा. और ये हम सबके लिए एक अत्यंत दुःखद अनुभव होगा और इस प्रकार के आयोजन सम्भवतः बंद हो जायेंगे. बसंती को हम अपने परिवार का अभिन्न अंग समझते हैं, और उसकी बेटी का परिवार भी इसी प्रकार से हमारे साथ रहता है. क्या मैंने तुम्हारे प्रश्न का उत्तर ठीक से दिया है.”

“पूर्णतः”

“मुझे अगले चरण के लिए जाना होगा.” जीवन ने कहा.

“क्या मैं बसंती का…”

“ये उससे पूछना, मुझे कोई आपत्ति नहीं है. पर अभी मुझे उसकी आवश्यकता है.”

जीवन उठकर बसंती की ओर चला गया.

“आओ बाबूजी. जस्सी भाईसाहब लगता है आने ही वाले हैं.”

“हाँ, इसीलिए तो आया हूँ तेरा अमृत पीने. फिर बबिता की चुदाई जो करनी है.”

“तो बैठो न.”

जीवन उसके सामने बैठा और उसकी चूत पर मुँह लगाकर चाटने लगा. बसंती ने हल्का दबाव बनाकर उसके मुँह में अपना अमृत रस छोड़ दिया. जीवन अपनी प्यास बुझाकर खड़ा हो गया और घेरे से बाहर चला गया और जस्सी के अंतिम धक्कों को देखने लगा. जस्सी के धक्के धीमे पड़ चुके थे और बबिता की सिसकारियाँ भी मद्धम हो चुकी थीं.

जस्सी ने अपना लंड बबिता की गाँड से निकाला और फिर हिलाते हुए बसंती के पास आ खड़ा हुआ.

जीवन पलंग की ओर जा रहा था और जस्सी और उसने एक दूसरे को पार किया हाथ ऊपर मिलाकर ताली बजाई (इसे हाई फाइव भी कहते हैं) बबिता गहरी साँसे भरते हुए अपनी गाँड को सहला रही थी. बसंती ने जस्सी के लंड को चाटते हुए उसे चमकाया और चूसने लगी. कुछ ही पलों में जस्सी ने अपना वीर्य उसके मुँह में छोड़ा जिसे बसंती ने प्याले में थूक दिया और आना मुँह खोलकर जस्सी को देखने लगी.

जस्सी ने प्रेम से उसके सिर पर हाथ घुमाया और उसके बालों को सहलाते हुए उसके मुँह में अपना मूत्र का दान दे दिया.

बाल्टी में कुछ और मूत्र एकत्रित हो गया. जस्सी जाकर अपने स्थान पर बैठ गया और जीवन ने बबिता को उठाकर बसंती के पास भेज दिया. बबिता दूसरी कुर्सी पर बैठ गई और बसंती ने उसकी गाँड को साफ किया और फिर बबिता के मूत्र का रस लिया.

“हर बार तुम्हारा स्वाद नया होता है दीदी. अब जाओ बाबूजी आपको चोदने के लिए खड़े हैं.”

बबिता मुस्कुराई और जाकर पलंग पर लेटी और अपने पैरों को चौड़ा करते हुए जीवन को आमंत्रित किया.

“टॉनिक पी कर आये हो तो जम कर चोदना।” बबिता ने गाँड हिलाकर कहा.

“अरे तुम्हें चोदने के लिए कोई टॉनिक नहीं चाहिए. बस थोड़ी प्यास लगी थी.” जीवन ने हँसते हुए बबिता की जाँघ पर चपत मारी।

“मुझसे न बनो भाईसाहब, न जाने आपमें कहाँ की शक्ति आ जाती है बसंती का टॉनिक पीने के बाद.”

जीवन ने अपना लौड़ा बबिता की चूत पर रगड़ा, “इसीलिए तो मैं उसे समझा रहा हूँ कि भूरा को पिलाने लगे तो उसका नशा फुर्र हो जायेगा और लौड़ा भी खड़ा होने लगेगा.”

“सबको लौड़ा खड़ा करने के लिए मूत नहीं पीना पड़ता.” ये बबिता ने जीवन को छेड़ने के लिए कहा था जिससे कि वो उसकी चुदाई में कोई छूट न करे.”

जीवन के चेहरे पर छाती कुटिल मुस्कराहट ने बबिता को बता दिया कि तीर ने लक्ष्य पा लिया है. अब उसकी चूत की जो विकराल चुदाई होगी जिसकी उसे आशा थी.

जीवन ने एक लम्बे धक्के में बबिता की चूत को चीरते हुए अपना लौड़ा अंदर तक गाढ़ दिया. बबिता की ह्रदयविदारक चीख ने कमरे को हिला दिया. सुशील ने अपना सिर पकड़ लिया. वो जानता था कि बबिता ने जीवन को क्यों छेड़ा, पर पति जो था, उसकी चीख से उसका भी मन दहल गया. वहीँ शालिनी की तो मानो साँस ही रुक गई.

गीता ने उसकी जाँघ पर हाथ रखा और बोली, “ये इन दोनों का खेल है. बबिता उन्हें छेड़ देती है और वो उसकी जमकर चुदाई करते हैं. हम तीनों भी कभी कभी ऐसा ही करती हैं. जीवन की पाशविक चुदाई का आनंद ही भिन्न है. बबिता आगे गैंगबैंग में ऐसा कुछ न कर पायेगी, सो उसने अभी उनको छेड़ दिया.”

शालिनी अचरज से जीवन के नितम्बों को चलते हुए देख रही थी. इतनी तीव्र गति थी कि आँखों को कुछ सुझाई न दे रहा था.

जीवन की असीमित शक्ति को देखकर वो हतप्रभ थी. इस प्रकार से कौन चुदाई कर सकता है? बबिता की चीत्कारें धीमी होने का नाम नहीं ले रही थीं, न ही जीवन के मुँह से निकलती हुई गुर्राहट. इस प्रकार की चुदाई न जाने कितनी ही देर तक चलती रही जीवन ने लेशमात्र भी अपनी गति और शक्ति में कमी न की तो शालिनी चीख पड़ी, “अब बस भी करो.”

जीवन उसकी चीख सुनकर कुछ ठिठका फिर उसी गति से कुछ देर तक और बबिता को चोदने के बाद धीमा पड़ गया. अंततः उसने अपना लंड बाहर निकाला तो वो लाल हो गया था. वहीँ बबिता की चूत भी सूजकर लाल हो गई थी.

शालिनी जाकर बबिता के पास बैठ गई और जीवन मुस्कुराते हुए बसंती के पास खड़ा हो गया जिसने अपने कर्तव्य का निर्वाहण किया और जीवन के वीर्य को प्याले और मूत्र को मुँह और बाल्टी में प्राप्त किया.

“आप ठीक हो न?” शालिनी ने बबिता की चूत पर हाथ रखकर चिंता जताई.

“काहे रोक दी रहीं उस मादरचोद को. रोम रोम हिला दिया कुत्ते ने! कुछ देर और चोदता तो तृप्त हो जाती.” बबिता धीमे से बुदबुदाई.

शालिनी को झटका लगा. उसे तो लगा था कि बबिता कष्ट में थी, पर यहाँ तो बात बबिता उसका स्वागत कर रही थी.

“अब आई हो तो बसंती के पास ले चलो. उसकी भी प्यास मिटा दूँ.” बबिता ने आँख खोलकर कहा.

शालिनी ने उसे उठाया और बसंती की ओर देखा जो इस समय जीवन के मूत्र से अपना मुँह धो रही थी. शालिनी को ईर्ष्या हुई पर उसने जीवन के हटने की प्रतीक्षा की और उसके हटते ही बबिता को ले जाकर दूसरी कुर्सी पर बिठा दिया.

“तुम जाओ.” बबिता ने कहा तो शालिनी शांति से जाकर जीवन के पास जा बैठी.

“क्यों इतना छेड़ती देती हो दीदी बाबूजी को? देखो कितनी निर्ममता से चोदे हैं आपको?” बंसती ने उसके सामने बैठकर उसकी फूली चूत को सहलाते हुए पूछा.

“छेड़े बिना वो ऐसे नहीं चोदता। तू न समझेगी, जब तक वो मेरी ऐसी हड्डियाँ हिलाने वाली चुदाई न करे मेरी आत्मा को तृप्ति नहीं मिलती. वो तो शालिनी ने बीच में टाँग अड़ा दी नहीं तो मैं शिखर से गिरने वाली ही थी.”

“न जाने दीदी, मुझे भी उनकी ऐसी ही चुदाई में आनंद आता है, पर लगता है बहूरानी डर गई.” बसंती अब बबिता की चूत को प्रेम से चाटने लगी. बबिता का शरीर काँपने लगा और वो झड़ गई. बसंती ने उसका पानी पी लिया और चूत को फिर से चाटने लगी.

“थोड़ा विश्राम कर लो, फिर जाना.” बसंती बोली और असीम को बबिता के लिए पेग बनाने का संकेत किया. बबिता की चूत चाटते हुए उसने अनुभव किया कि असीम बबिता को उसका पेग थमा गया था.

“दीदी, मूतने का मन करे तो रुकना मत, बस बोल देना. नहीं तो बाल्टी में न डाल पाऊँगी.”

“ले ही आ बाल्टी भी. तेरी प्यास भी मिटा दूँ.” बबिता बोली और फिर बसंती ने बाल्टी अपने सामने रख ली. बबिता ने उसके मुँह में धार छोड़ दी और बबिता ने अपने लिए बाल्टी में और मूत्र जोड़ लिया.

“अब थोड़ी देर रुको, फिर कँवल भाईसाहब के पास चली जाना. इसके बाद आपको बस एक बार ही विराम मिलेगा क्योंकि उसके बाद निरंतर चुदाई होगी.”

“ठीक है.” ये कहते हुए बबिता ने आँखें बंद कर लीं और कुछ देर के लिए हल्की नींद में चली गई. जीवन की चुदाई का उस पर ये प्रभाव पड़ता था.

जब कुछ देर में नींद खुली तो बसंती पास आई और पूछा कि क्या वो ठीक है? बबिता ने कहा अब वो ठीक है तो बसंती ने उसकी गाँड को चाटा और उसे पलंग पर भेज दिया. उसके साथ ही कँवल भी खड़ा हुआ और उसके पास जाकर खड़ा हो गया. बबिता घोड़ी बनी और अपनी गाँड को हिलाया. कँवल ने देर न की और अपना लंड उसकी गाँड में पेल दिया और धकाधक गाँड मारने लगा.

कहा जाये तो गैंगबैंग का आरम्भ हो चुका था क्योंकि अब ये मात्र शारीरिक संबंध में सीमित होने लगा था. सब अपना सुख प्राप्त करने वाले थे. इसमें सर्वपरि बबिता थी जिसे सबके संसर्ग का सुख मिलेगा। अब किसी भी प्रकार का संवाद नहीं होना था, होना थी तो मात्र चुदाई, भीषण, वीभत्स, कठोर। बबिता आज के गैंगबैंग की रानी थी, और कल कोई और होने वाली थी. और इन सबको वश में रखने वाली उनके घर की नौकरानी की माँ थी जो उन्हें नियंत्रण में रखने वाली थी. और उसे इसके लिए पर्याप्त रस मिलने वाला था.

अब फिर बसंती को अनुदान देना था जिसके लिए इस बार शालिनी खड़ी हुई और बसंती के सामने जा खड़ी हुई. उसने संकेत किया तो बसंती ने मना कर दिया.

“अभी नहीं दीदी. यहाँ सबके सामने मेरा मूत मत पियो. अभी अपनी इस लालसा को हम तीनों के ही बीच रखो. समय आने पर ये भी सबको बता देंगे. पर अभी नहीं.”

शालिनी को बात समझ आई और वो दूसरी कुर्सी पर बैठी जहाँ बसंती ने उसका जल ग्रहण किया और बाल्टी में भी जोड़ा.

इसके बाद शालिनी ने जाकर एक पेग बनाया और जाकर जीवन के पास बैठ गई.

“मना कर दिया?”

“जी.”

“मैं जानता था, इसीलिए कहा था कि उससे ही पूछो.”

“आप दोनों सही हो. मैं ही अधीर हो रही हूँ.”

“ये चस्का ही ऐसा है. जितना डूबो उतना ही अपनी ओर खींचता है. चिंता न करो, आज रात तुम्हारी इच्छा पूरी कर देंगे.”

“जी. पर कँवल भाईसाहब बिना भावना बबिता की गाँड मार रहे हैं.”

“हाँ, इसका अर्थ ये है कि गैंगबैंग का आरम्भ हो गया है. गैंगबैंग में भावना नहीं मात्र शारीरिक तृप्ति सर्वोपरि होती है. भावना से ध्यान बँटता है. इसमें मात्र रानी के सुख का ध्यान रखा जाता है. उसकी इच्छा के ही अनुसार बसंती भी निर्देशन करेगी. देखना, जब तुम इसकी रानी बनोगी तब अनुभव होगा.”

“मुझे तो डर लग रहा है.”

“जैसे वो पीने में संकोच नहीं हुआ, इसमें भी नहीं होगा. वैसे बसंती और मैं पूरा ध्यान रखेंगे.”

“जैसा आप कहो.” ये कहकर शालिनी ने अपना पेग एक ही घूँट में समाप्त कर दिया. जीवन ने कुमार से नया पेग बनाने के लिए कहा और वो दादा और भावी दादी के लिए नया पेग बना लाया.

कुछ देर में कँवल ने अपना कार्य समाप्त किया और जाकर बसंती की चौखट पर अपना योगदान दिया. उसके बाद बबिता ने जाकर बसंती को अपनी गाँड और चूत का उपहार दिया. इसके बाद बसंती ने गीता को पुकारा और उसके जल का सेवन किया और आधे घंटे के विश्राम की घोषणा की. सब उठ कर अपने लिए पेग बनाने लगे, वहीँ बंसती ने प्याले में एकत्रित वीर्य में बाल्टी से कुछ मूत्र डाला और उसे ही अपना पेग समझ कर पीने लगी. कुछ वो अपने चेहरे और स्तनों पर मल लेती पर अधिकतर उसके पेट में ही जा रहा था. शालिनी बीच बीच में बसंती की इन गतिविधियों को देखकर उत्तेजित हो रही थी, परन्तु उसे अभी बहुत कुछ सीखना और अनुभव करना था. गाँव में रहने वाले वरिष्ठ नागरिक उसकी सेक्स की परिभाषा से कितने भिन्न थे. ये सोचकर वो हतप्रभ थी.

जब विश्राम का समय समाप्त हुआ तो बसंती ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा।

“अब अकेले चोदने का कार्यक्रम समाप्त हुआ है. और इस बार बबिता दीदी को दो दो लौंड़ों से चुदने का आनंद दिया जायेगा. अन्य सभी नियम वही हैं, सबका पानी मुझे ही मिलेगा. एक जोड़े की चुदाई के बाद दस मिनट का विराम रहेगा. एक समस्या ये है कि आप सात पुरुष हैं, तो किसी एक को बबिता दीदी की इस चुदाई में छूटना होगा.”

सब पुरुषों के मुँह उतर गए. न जाने किसकी टिकट काट जाये.

“पर जैसा हम हर बार करते हैं, उसे हम सभी स्त्रियों में से किसी एक की चुदाई करने का अवसर दिया जायेगा. वो बबिता दीदी की चुदाई के पश्चात ही होगा. परन्तु उनके नाम अभी से बता दिए जायेंगे.”

सबके मन उत्सुक हो गए कि ऐसा कौन जोड़ा होगा.

“चूँकि शालिनी दीदी की चुदाई उनके पोतों से नहीं हुई है तो उन्हें इसका अवसर मिलेगा. और उनके साथ होगा….” ये कहकर वो कुमार और असीम को देखने लगी. उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी.

“टॉस करो!” असीम बोला।

एक सिक्का लाया गया और उसे शालिनी ने ही उछाला और असीम को विजयी घोषित किया.

“असीम बेटा, तुम तो जानते ही हो कि अंत कैसे करना है.” बसंती ने एक नटखट स्वर में पूछा.

“बिलकुल छोटी नानी. मैं कैसे भूल सकता हूँ.”

“तो ठीक है. अब बबिता दीदी की दुहरी चुदाई का कार्यक्रम किया जायेगा. इस बार कुमार को चूत और सुशील भाईसाहब को अपनी पत्नी की गाँड मारना है. अब जाइये और जाकर दीदी को रगड़ दीजिये.”

ये कहते हुए बसंती अपने स्थान पर बैठ गई. बबिता अपने पति सुशील और नाती कुमार के साथ पलंग पर चली गई. कुमार और सुशील बबिता में मम्मों को दबाते हुए अपने लौड़े उसके मुँह के सामने लहरा रहे थे. बबिता ने बसंती को देखा जिसने स्वीकृति दी तो बबिता ने दोनों लंड चाटे और थोड़ा चूसे. पर ये गैंगबैंग था, इसमें चूत और गाँड की खुदाई होनी थी. इसीलिए कुमार लेट गया और बबिता उसके ऊपर चढ़ गई और उसके लंड को चूत में ले लिया. चूत और गाँड दोनों चुद कर खुल चुकी थीं तो लंड के प्रवेश में कोई कठिनाई नहीं हुई.

बबिता चूत में पूरा लंड लेकर रुक गई और पीछे से उसके पति ने उसकी गाँड पर हाथ फेरा और अपना लंड उसकी गाँड पर रखा और एक धक्का मारा. बबिता की सिसकी निकली और सुशील ने दो और धक्कों में पूरा लौड़ा जड़ तक पेल दिया.

कुछ पल यूँ ही रुक कर पहले कुमार ने अपनी कमर हिलाई और बबिता की चूत में लंड पेलना आरम्भ किया. सुशील ने उसके कुछ ही पलों के बाद अपने लंड का संचालन आरम्भ कर दिया. पति और नाती बबिता की दुहरी चुदाई करने लगे और शीघ्र ही गति पकड़ ली.

दोनों एक दूसरे से अच्छा सामंजस्य और ताल मिलाकर बबिता की चूत और गाँड की ठुकाई कर रहे थे. बबिता को आज की पहली दुहरी चुदाई का आनंद मिल रहा था. सोने पर सुहागा ये था कि उसमें से एक उसका पति था तो दूसरा माना हुआ नाती. ये अलौकिक आनंद उसकी सिसकारियों में और भी मादकता भर रहा था. जहाँ अन्य सभी जोड़े इसे एक सामान्य चुदाई की दृष्टि से देख रहे थे, वहीँ शालिनी अभी भी इस प्रकार की चुदाई से अचंभित थी. कितनी सरलता से बबिता इस आयु के पड़ाव में भी इस प्रकार की चुदाई का सुख ले रही थी ये उसके लिए अचरज का विषय था.

वो स्वयं को इस स्थिति में देखने के लिए आतुर थी और जीवन ने उसे विश्वास दिलाया था कि उसे अपने घर लौटने से पहले वो हर आसन और मिश्रण का आनंद दिलवाएगा. और वो इस खेल में शीघ्र स्नातक से स्नातकोत्तर की श्रेणी में उत्तीर्ण होने के लिए लालायित थी. जीवन भी उसे इस ओर सुचारु रूप से खींच रहा था.

चुदाई की गति में अब एक ठहराव सा आ गया था, इसे देखकर नाना नाती ने अपनी ताल बदली और इस बार दोनों ने से एक का ही लौड़ा अंदर होता. अंदर जाते और बाहर निकलते लौंड़ों का घर्षण बबिता को आनंद की नई ऊंचाइयों की ओर ले चला. अब नाना नाती इसी प्रकार से ताल और गति के विभिन्न मिश्रणों से बबिता को चोदने लगे. शालिनी के जीवन के पुरुष साथियों की शक्ति पर भी बहुत गर्व था. वो भी आम पुरुषों की अपेक्षा अधिक देर तक चुदाई करने में सक्षम थे.

कई मिनटों की इस चुदाई के बाद सुशील ने झड़ने के निकट होने की बात कही तो गति को धीमा किया गया. और झड़ने से बचते हुए सुशील ने अपना लंड बाहर निकाल लिया. उसके लंड निकालते ही कुमार ने फिर से बबिता की चुदाई आरम्भ कर दी.

सुशील अपना सना लौड़ा लेकर बसंती के पास चला गया जहाँ उसका भरपूर स्वागत हुआ और वो अपने वीर्य और मूत्र का दान देकर अपने स्थान पर जा बैठा. अब उसके पास लगभग दो घण्टे थे तो उसने अपने लिए पेग बनाया और सामने अपने पत्नी की इस चुदाई के अंतिम चरण को देखने लगा. उसे अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी और कुमार ने भी अपनी चुदाई का कर्तव्य पूरा किया और जाकर अपनी छोटी नानी को भेंट चढ़ाई और एक पेग बनाकर अपने नाना के पास बैठ गया. बबिता लड़खड़ाती हुई बसंती के पास जा बैठी जहाँ बंसती ने उसके दोनों छेदों की आवभगत की और फिर बाल्टी में अपने लिए बबिता का जल एकत्रित कर लिया. उसने फिर से बबिता को उसके स्थान पर भेजा और अगले चोदुओं की घोषणा की.

इस बार बलवंत को गाँड और कँवल को चूत का दायित्व मिला. दोनों जाकर बबिता से अपने लौड़े चुसवाने लगे और बलवंत लेट गया. बबिता उसके ऊपर चढ़ी और अपनी गाँड पर उसका लंड लगाकर बैठ गई. पक्क की ध्वनि से लंड अंदर समा गया. बबिता अपने हाथों के बल पीछे झुकी और कँवल ने अपना लौड़ा उसकी चूत में पेलने में समय न गँवाया।

इस आसन में गाँड अधिक तंग हो जाती है और चूत की ऊपर से चुदाई होने के कारण अधिक आनंद आता है. नीचे लेटे हुए पुरुष को भी अधिक परिश्रम करना पड़ता पर उसे सुख पूरा प्राप्त होता है. फिर से धुरंधर गति से बबिता की चुदाई का आरम्भ हो गया. नीचे से बलवंत हाथ बढ़कर बबिता के मम्मों को निर्ममता से मसलने लगा. बबिता की अब हल्की घुटी चीखें निकल रही थीं. परन्तु इस बार शालिनी को कोई शंका नहीं थी कि इसमें भी बबिता को आनंद ही मिल रहा था. उसने स्वयं अपने मम्मों को दबाया और हल्की सी सिसकारी ली.

गीता जाकर बसंती के सामने की बैठ गई और बसंती की चूत चाटकर उसे झड़ा दिया फिर गीता दूसरी कुर्सी पर बैठी और उसकी चूत को चाटा और उसके दोनों स्त्राव का सेवन किया.

गीता: “इतना बाल्टी में जो लिए बैठी है उसका क्या करेगी?”

बसंती ने चुल्लू से उसमें से मूत्र निकाला और चेहरे पर डालकर उसे धो लिया. फिर बाल्टी में मुँह डालकर पीने लगी. ऐसा करने से उसके बाल भी गीले हो गए. उसका चेहरा जब ऊपर आया तो उसकी आँखें लाल थीं.

“बस दीदी, यही करुँगी। पर यूँ व्यर्थ न बहाऊँगी.”

“इसे साफ करने का काम तेरा ही है समझी न? नहीं तो कल पूरा कमरा महक जायेगा.”

“चिंता न करो दीदी. आपको आज तक कभी कहने की आवश्यकता पड़ी जो आज कह रही हो.”

“अरे आज शालिनी आई है. नई है, न जाने क्या क्या सोचे हमारे बारे में.”

“दीदी, जहाँ समझी हूँ, वो हमारे बारे में सब अच्छा ही सोच रही हैं.”

ये कहते हुए बाल्टी में से उसने चुल्लू भरा और अपने स्तनों में मल लिया. गीता सिर हिलाती अपने स्थान पर चली गई. अपने स्थान पर बैठकर वो बबिता की चुदाई का दृश्य देखने लगी. उसे बसंती की इस विकृति से घृणा नहीं थी, पर ये उसका घर था जिसमें दुर्गंध को वो सहन नहीं कर सकती थी. परन्तु बसंती हमेशा पूरी सफाई करके ही हटती थी इसीलिए अधिक तर्क का नहीं था.

बलवंत और कँवल के बीच पिसती हुई बबिता सुख के सागर में गोते लगा रही थी. इस आसन का आनंद ही भिन्न था. बलवंत के द्वारा उसके मम्मों का भींचा जाना उसे और सुख दे रहा था. उसे कठोर चुदाई में अधिक आनंद आता था और इन कुछ दिनों में उसकी ये इच्छा पूर्ण होने में कोई कमी नहीं थी. उसके नातियों द्वारा चूत और गाँड की विशेष चुदाई और कुछ पहले जीवन की निर्मम चुदाई इसका उदाहरण थे. अभी तो इस गैंगबैंग का आरम्भ ही हुआ था. अभी तो पूरी रात्रि शेष थी जिसमें उसे इतने लौड़े चोदने वाले थे जिनका वो ध्यान भी नहीं रख सकती थी.

बसंती इसी कारण इस गैंगबैंग को चरण-बद्ध रूप से संजोया था. अन्यथा सब शीघ्र ही संतुष्ट हो जाते और रात युवा ही रह जाती.

चूँकि कँवल अधिक परिश्रम कर रहा था इसीलिए पहले उसने ही झड़ने की घोषणा की और अपना लंड बबिता की चूत ने बाहर खींचा और लगभग दौड़ते हुए बसंती के सामने खड़ा हो गया. बसंती ने मुस्कुराकर उसका स्वागत किया और अपना कर्तव्य पूरा किया और कँवल से उसका कर्तव्य पूरा करवाया.

कुछ ही समय और निकला कि बलवंत ने भी बबिता से हटने के लिए कहा. बबिता अभी झड़ ही रह थी तो उसने मन मार कर बलवंत का लौड़ा अपनी गाँड से निकाला और हट गई. बलवंत ने उठकर बसंती के चौखट पर अपना योगदान दिया. इसके बाद बबिता आई और उसने भी बसंती को अपना मूत्र पिलाया. इसके बाद बसंती जो इतनी देर से पानी पिए जा रही थी तो उसने भी बाल्टी में अपना अंश जोड़ दिया. बसंती ने बबिता से कहा कि वो जाकर पलंग पर बिछी चादर हटाकर दूसरी बिछा दे फिर उसके ही पास आकर बैठ जाये। बबिता ने ये कार्य शीघ्र समाप्त कर लिया.

बसंती ने असीम और शालिनी को अपना कार्यक्रम आरम्भ करने का आदेश दिया. असीम अपनी भावी दादी को लेकर पलंग पर गया और उनके कान में कुछ कहा. शालिनी ने स्वीकृति दी तो असीम ने अपना लंड उसके मुँह के सामने कर दिया. असीम के मोटे लम्बे लौड़े को चूसने चाटने में शालिनी को बहुत आनंद मिल रहा था.

कुछ देर में असीम ने अपना लंड निकाल लिया क्योंकि वो इसका उपयोग शालिनी की चुदाई के लिए करना चाहता था. उसने शालिनी के पैरों को फैलाया और उसकी चूत चाटने लगा. शालिनी कुछ ही पलों में काँपने लगी तो असीम ने अपनी जीभ बाहर निकाल ली और खड़ा हो गया. उसने शालिनी को उचित स्थित में आने के लिए कहा.

असीम ने अपना लौड़ा शालिनी की चूत पर रखा तो शालिनी की अपने पोते गौतम के साथ की हुई पहली चुदाई का ध्यान आया. असीम ने धीमी गति से अपने लंड को शालिनी की चूत में उतार दिया और उसे चोदने लगा. कुछ देर की सामान्य चुदाई के बाद उसने गति बढ़ाई और शालिनी भी उसका साथ देने लगी. कुछ ही देर हुई थी कि पीछे से बसंती ने पुकारा.

“अब गाँड मारो!”

असीम ने आज्ञाकारी नाती के समान अपना लंड बाहर निकाला और उसी आसन में शालिनी की गाँड पर लंड रखा. शालिनी के पैरों को उसने ऊपर किया तो पूनम ने आकर शालिनी के पैर पकड़ लिए जिससे असीम को कोई असुविधा न हो. आखिर नानी जो थी, अपने नाती का ध्यान रखना उसका कर्तव्य था. असीम ने उसे मूक धन्यवाद किया और अपने लंड को शालिनी की गाँड में डालना आरम्भ किया.

ये आसन गाँड मारने में कुछ कठिन होता है क्योंकि गाँड बहुत तंग हो जाती है. पर धैर्य और संयम का परिचय देते हुए असीम ने अपने सुपाड़े को अदंर प्रविष्ट कर दिया. इसके बाद की राह अपेक्षाकृत सरल थी और असीम ने बिना अधिक अड़चन के शालिनी की गाँड में अपना लंड पूरा डाला और धीमी गति से गाँड मारने लगा. कुछ ही देर हुई थी कि बसंती ने आदेश दिया.

“क्या लौंडे के जैसे गाँड मार रखा है, थोड़ा जम के मार. दादी है तेरी, इतना तो उसका ध्यान रख.”

असीम ने शालिनी को देखा तो उसने स्वीकृति दे दी और असीम ने गति बढ़ा दी. कुछ ही देर में वो शालिनी की चीखों के बीच उसकी गाँड धुआंधार गति से मार रहा था.

“और जोर लगा, असीम. अच्छे से मार अपनी दादी।” इस बार पूनम ने उसका उत्साह बढ़ाया. असीम अपने रौद्र रूप में आ गया और शालिनी की गाँड तीव्रता से मारने लगा.

कई पलों के बाद उसने पूनम को देखा, “नानी, अब में झड़ने वाला हूँ. आप दादी की टाँगे सम्भालो, मैं छोटी नानी के पास जा रहा हूँ.”

उसने अपना लंड बाहर निकाला और पूनम शालिनी को संभाले रही. फिर धीरे से उसकी टाँगे यथावत कर दीं.

असीम ने जाकर छोटी नानी से अपना लौड़ा चुसवा कर उनके मुँह में अपना वीर्य छोड़ा जिसका एक अंश प्याले में चला गया. फिर उसने छोटी नानी के मुँह, चेहरे और स्तनों पर मूत्र त्याग किया, जिसका कुछ भाग बाल्टी में गिरा. बसंती ने पिया और अपने चेहरे और शरीर पर मल कर असीम के लंड को चूमा।

“बहुत सीख गए को लल्ला. सदा सुखी रहो.”

असीम ने छोटी नानी को धन्यवाद दिया और अपने लिए पेग बनाने चला गया.

अब शालिनी आई और बसंती ने उसकी गाँड चाटी और उसके मूत्र का सेवन किया.

“तुम्हारे लिए मैंने नियम तोड़ा है बहूरानी. अब जाओ.”

“बबिता दीदी, अब आपको विश्राम मिल गया है. जस्सी भाईसाहब अब आपको चूत और बाबूजी आपको गाँड मारना है.” बसंती ने कहा तो जस्सी और जीवन खड़े हो गए. “इस चरण के बाद घण्टे का अंतिम विराम होगा.”

जहाँ जस्सी और बबिता पलंग की ओर बढ़े तो जीवन बसंती के पास गया और उससे टॉनिक पिलाने की माँग की. बसंती ने प्रेम से अपने बाबूजी को टॉनिक पिलाया जिसे पीकर तृप्त जीवन अखाड़े में चला गया. बबिता ने दोनों के लंड कुछ पल चूसे और फिर जस्सी को लिटाकर उसके लंड पर चढ़ गई. उसके पीछे से जीवन ने अपना लौड़ा उसकी गाँड में पेल दिया और बबिता की दुहरी चुदाई फिर आरम्भ हो गई. जस्सी और जीवन अनुमान के अनुसार तीव्रता से चुदाई कर रहे थे. बबिता के छेद भी अब खुल चुके थे और उसे भी इस चुदाई में आनंद आ रहा था. तीनों के शरीर एक दूसरे को सुख देने के लिए लालायित थे.

इस चरण की चुदाई भी लगभग दस पंद्रह मिनट चली और फिर जीवन ने अपना लौड़ा बाहर निकाला और बसंती को सौंप दिया. बसंती ने प्रेमपूर्वक उसे चुदाई से पूर्व स्थिति में चाटकर लाया और फिर अपने बाबूजी के मूत्र को अपने चेहरे पर लगाया और लंड नीचे करते हुए शेष शरीर को भी नहला दिया.

उधर जस्सी ने बबिता को नीचे कर दिया था और पाशविक गति से चोदे जा रहा था. फिर उसने भी लंड बाहर निकला और बसंती की चौखट पर अपना उपहार दिया. जीवन और जस्सी अपने पेग लेकर बैठ गए. बबिता ने भी जाकर बसंती की चूत को चाटा और फिर अपना मूत्र पिलाया और बाल्टी में भी डाल दिया. वो वहीं बैठी रही क्योंकि अब आधे घण्टे बाद उसके गैंगबैंग का अंतिम चरण आरम्भ होना था और उसे विश्राम करना था.

आधे घण्टे के स्थान पर लगभग 45 मिनट लग गए. बबिता हल्की नींद में चली गई और उसे उठाना थी नहीं था. इस बीच अन्य सभी सामान्य वार्तालाप करते रहे. जीवन एक ओर खड़ा होकर अपने दोनों पोतों से कुछ बात कर रहा था और दोनों उसकी बात ध्यान से सुन रहे थे. सबके हाथ में अपनी रूचि का पेय था, जिसमें बसंती का अपना पेय भी था. कमरे में धीरे धीरे बसंती के स्थान की महक प्रबल होती जा रही थी. गीता ने कमरे को खोल दिया जिससे की कुछ गंध कम हो सके. पंखा चलने से कुछ ही देर में ये उद्देश्य पूरा हो गया पर अभी कमरा बंद नहीं किया गया.

“दीदी!” बसंती ने गीता को पुकारा.

गीता उसके पास गई तो बसंती ने पूछा: “दीदी, आपको इसमें असुविधा होती है तो मैं आगे से ऐसा नहीं करुँगी.”

गीता ने उसे देखा, “ऐसा कुछ नहीं है. तू कौन पराई है. और जब तेरे बाबूजी आते हैं और हमारा ये सब खेल चलता है, तभी तू भी खेलती है. चिंता न कर किसी को कोई समस्या नहीं है. अपने मन से ये विचार निकाल दे, समझे मेरी छोटी बहन.”

बसंती की आँखों में आँसू आ गए, उसका गला भर आया और वो उत्तर न दे सकी, बस सिर हिलाकर रह गई. गीता ने उसका सिर थपथपाया और चली गई. इतने में बबिता की आँख भी खुल गई. गीता ने उसे पानी पिलाया और फिर सुशील ने उसे एक पेग बना कर दिया. बबिता ने शांति से उसे समाप्त किया और बसंती की ओर देखा. बसंती उसका संकेत समझ गई और उसकी चूत पर मुँह लगा दिया. गर्म फुहार ने उसके मुँह को भर दिया और इसकी समाप्ति के पश्चात बंसती हट गई और उसने बबिता को बैठे रहने के लिए कहा. बसंती ने ताली बजाई और सब उसकी ओर देखने लगे.

“अब हमारा अंतिम चरण आरम्भ होगा. जैसे नम्बर लगे हैं उसी प्रकार से चुदाई आरम्भ की जाएगी. असीम चूत और बलवंत भाईसाहब गाँड मारेंगे। जैसा की नियम है दोनों छेदों में हर समय लंड रहना चाहिए. मैं असीम और कुमार के लिए बता रही हूँ. अगर नीचे लेटा पुरुष झड़ने वाला है तो उन्हें पलटी मारनी होगी बिना लंड बाहर निकाले हुए. और उसका लंड बाहर निकलते ही अगले नम्बर वाले को उसका स्थान लेना है. चूत हो या गाँड किसी भी समय खाली नहीं रहनी है.”

“अगर विराम चाहिए भी है तो बबिता दीदी को सरला दीदी का नाम लेना होगा. ऐसा करने पर उन्हें कुछ देर का विश्राम दिया जायेगा. हाँ अगर उन्हें पानी पीना हो या मेरी सेवा की आवश्यकता हो (हंसती है) तब भी उन्हें यही करना होगा. विराम के बाद चुदाई वहीँ से आरम्भ होगी जहाँ रुकी थी. ध्यान रहे, बिना लंड के छेद नहीं रहना चाहिए, और सारा पानी मुझे मिलना चाहिए.”

उसने बबिता को देखा, “दीदी अब जाओ और आनंद लो. जब मन करे मेरे पास आ जाना, मेरी और अपनी प्यास बुझाने.”

बबिता पलंग पर जा बैठी और सातों पुरुषों ने उसे घेर लिया.

बसंती ने अन्य स्त्रियों को सम्बोधित किया: “आप एक दूसरे को या मुझे संतुष्ट कर सकती हैं. मेरे पास आने पर आपको पता है कि क्या करना होगा.”

इसके बाद सबका ध्यान पलंग की ओर चला गया जहाँ पहले गैंगबैंग का अंतिम चरण प्रारम्भ हो रहा था.

असीम लेट चुका था और बबिता ने उसका लौड़ा अपनी चूत में ले लिया था. जैसे ही बबिता आगे झुकी तो बलवंत ने आगे जाकर उसकी गाँड में लंड पेल दिया. असीम अपने नाना (उसके माँ के पिता) के साथ अपनी मुंह-बोली माँ की चुदाई करने जा रहा था. नाना नाती ने अपनी ताल साधी और बबिता की सिसकारियों ने कमरे में मधुर संगीत घोल दिया. अन्य पाँचों पुरुष अपने लंड धीमे धीमे सहला रहे थे, जिसमें जस्सी सर्वाधिक उतावला था. उसके साथ खड़े सुशील ने उसके हाथ पकड़ा जिससे कि वो अत्यधिक उत्साह में शीघ्र न झड़ जाये. सुशील को अपनी पत्नी के सुख का पूरा ध्यान था. जस्सी ने अपना हाथ धीमा दिया.

बलवंत और असीम दोनों अपनी पूरी ताल के साथ बबिता को चोदे जा रहे थे और बबिता आनंद के सागर में गोते लगा रही थी. अपने समय के अनुसार बलवंत ने ही पहले हटने की घोषणा की और जस्सी ने अपने लंड को संभाला। बलवंत ठीक से हटा भी नहीं था कि जस्सी के लंड ने उसका स्थान ले लिया और सवारी में जुट गया. बबिता की गाँड में बस हल्की पवन का एक झोंका पल भर को ही समा पाया था कि जस्सी के ढकते लौड़े ने उसे फिर से भर दिया.

असीम और जस्सी ने मिलकर बबिता को पलटा और बिना अपने लौड़े निकाले हुए इस बार जस्सी नीचे से गाँड मारने लगा तो असीम ऊपर से चूत का आनंद लेने लगा. जस्सी ने बबिता के मम्मों को अपने हाथों में लिया और दबाने लगा जिससे कि बबिता को और भी अधिक आनंद का अनुभव हुआ. उसकी चूत ने असीम के लंड को जकड़ना आरम्भ कर दिया तो असीम भी अपने स्खलन के निकट पहुंचने लगा.

बलवंत अपने और बबिता की गाँड के रस से चिपचिपाये लौड़े के साथ बसंती के पास गया तो बसंती ने उसे बड़े ही प्रेम से पहले तो चाटा और फिर मुँह में लेकर शीघ्र ही झड़ने पर विवश कर दिया. इस बार उसने अधिकतर वीर्य को प्याले में ही डाल दिया. “बाबू, मुँह में थोड़ा ही छोड़ना. अब पेट भरा हुआ है. चेहरे पर छोड़ो या बाल्टी में डाल दो.” बसंती ने कहा और फिर मुँह खोलकर बलवंत के मूत्र की प्रतीक्षा करने लगी.

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क्रमशः

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कैसे कैसे परिवार: Chapter 71 is posted

पात्र परिचय

अध्याय ७१: जीवन के गाँव में शालिनी ८

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अध्याय ७२: जीवन के गाँव में शालिनी ९

अध्याय ७१ से आगे


अब तक:

बलवंत और असीम दोनों अपनी पूरी ताल के साथ बबिता को चोदे जा रहे थे और बबिता आनंद के सागर में गोते लगा रही थी. अपने समय के अनुसार बलवंत ने ही पहले हटने की घोषणा की और जस्सी ने अपने लंड को संभाला। बलवंत ठीक से हटा भी नहीं था कि जस्सी के लंड ने उसका स्थान ले लिया और सवारी में जुट गया. बबिता की गाँड में बस हल्की पवन का एक झोंका पल भर को ही समा पाया था कि जस्सी के ढकते लौड़े ने उसे फिर से भर दिया.

असीम और जस्सी ने मिलकर बबिता को पलटा और बिना अपने लौड़े निकाले हुए इस बार जस्सी नीचे से गाँड मारने लगा तो असीम ऊपर से चूत का आनंद लेने लगा. जस्सी ने बबिता के मम्मों को अपने हाथों में लिया और दबाने लगा जिससे कि बबिता को और भी अधिक आनंद का अनुभव हुआ. उसकी चूत ने असीम के लंड को जकड़ना आरम्भ कर दिया तो असीम भी अपने स्खलन के निकट पहुंचने लगा.

बलवंत अपने और बबिता की गाँड के रस से चिपचिपाये लौड़े के साथ बसंती के पास गया तो बसंती ने उसे बड़े ही प्रेम से पहले तो चाटा और फिर मुँह में लेकर शीघ्र ही झड़ने पर विवश कर दिया. इस बार उसने अधिकतर वीर्य को प्याले में ही डाल दिया. “बाबू, मुँह में थोड़ा ही छोड़ना. अब पेट भरा हुआ है. चेहरे पर छोड़ो या बाल्टी में डाल दो.” बसंती ने कहा और फिर मुँह खोलकर बलवंत के मूत्र की प्रतीक्षा करने लगी.

अब आगे:

बलवंत ने बसंती की आज्ञा का पालन किया और उसके चेहरे और वक्ष पर धार छोड़ने के पश्चात बाल्टी में शेष मूत्र त्याग दिया।

“बाबूजी, जो भी अंतिम चुदाई करे, उन्हें बता देना कि अंतिम रस दीदी की चूत और गाँड में ही छोड़ें. आप तो जानते ही हो कि मैं इस प्रकार के आयोजनों का समापन किस प्रकार से करती हूँ.” बसंती ने कहा.

“ठीक है, बसंती, जैसा तुम चाहो.” ये कहकर बलवंत ने अपने लिए एक पेग बनाया और बबिता की घनघोर चुदाई का दृश्य देखने लगा.

बबिता के गैंगबैंग का ये चरण आगे बढ़ने लगा. जैसा निर्धारित था उसकी चूत और गाँड बस पल भर के लिए ही लंड-विहीन होती थी. जैसे ही एक लंड निकलता दूसरा उसका स्थान तत्परता से ले लेता. शालिनी बबिता के सामर्थ्य से विस्मित थी. फिर उसे ध्यान आया कि इस कमरे में उपस्थित हर स्त्री इतना ही समर्थ थी. क्या वो भी इनके समान इस प्रकार की निरंतर चुदाई को झेल पायेगी.

बबिता ने अगले दो घंटों में तीन बार सरला का नाम लेकर कुछ विश्राम लिया. परन्तु इस अवधि में भी लौड़े चूत और गाँड से नहीं, बस कुछ पलों के लिए चुदाई को विराम दिया गया. एक बार अवश्य बबिता ने मूत्र निस्तारण के लिए लौड़े बाहर निकलने दिए था और बसंती को अपनी भेंट देकर कुछ पल बैठी और फिर से संग्राम छेत्र में लौट गई.

इस प्रकार की चुदाई के लगभग दो घण्टे बाद पुरुष शिथिल होने लगे तो बलवंत ने बसंती की आज्ञा उन्हें बता दी. अंतिम जोड़ी में अब जीवन और असीम बबिता की चूत और गाँड में धककमपेल कर रहे थे. बबिता की शक्ति अब लगभग समापन की ओर थी, फिर भी वो उन दोनों को प्रोत्साहित कर रही थी. जीवन ने अपना रस बसंती की चूत में भरा और रुक गया. असीम समझ गया कि वही इस द्वन्द का अंतिम योद्धा है. एक गर्वान्वित भाव से उसने भी अपने लंड के रस से बबिता की आहत गाँड सीँच दिया.

उधर बसंती ने एक तौलिये से अपने शरीर को पोंछा और असीम के पास आ खड़ी हुई. मूत्र की तीव्र गंध से असीम विचलित हो गया.

“लल्ला अब तुम हटो, मुझे मलाई खाना है. और तुमसे एक भेंट भी चाहिए.” बसंती की बात सुनकर असीम कुछ समझा नहीं, पर उसने अपना लौड़ा बबिता की गाँड से निकाल लिया. बसंती एक बार शालिनी की ओर देखा और अपनी जीभ से बबिता की गाँड चाटने लगी. बबिता को जब बसंती की जीभ का आभास हुआ तो उसने अपनी गाँड को खोलने सिकोड़ने करने का उपक्रम किया. असीम का वीर्य अब उसकी गाँड से बाहर निकलने लगा जिसे बसंती बड़े चाव से चाटती रही. अंत में उसने अपनी जीभ को अंदर धकेला और घुमाते हुए चाट लिया.

“दीदी, अब आप जाकर वहाँ बैठो और लल्ला को साथ ले जाओ. अब आप चाहो तो उसका लंड चूस सकती हो.” बसंती ने कहा.

असीम का हाथ पकड़कर बबिता के आसन के पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गई.

“बाबूजी, अब आप भी जाओ और दीदी से अपना लंड चमकवा लो.” बसंती ने कहते हुए जीवन को उठाया.

जीवन बबिता के समक्ष खड़ा हो गया और बबिता ने असीम के लंड मुँह से निकाला और जीवन के लंड को चूसने लगी.

“बाबूजी, अब आप चलो अपने स्थान पर.” बसंती ने जीवन को बोला तो जीवन चुपचाप अपने लिए पेग बनाकर शालिनी के पास बैठ गया.

“अब जो देखोगी तो सम्भवतः तुम विचलित हो जाओ. परन्तु ये बबिता के गैंगबैंग से साथ ही बसंती का भी दूसरे अर्थ का गैंगबैंग है. इस प्रकार के आयोजन का समापन एक विशेष प्रकार से होता है. असीम को अब पता चलेगा कि बसंती ने उससे क्या भेंट माँगी है.”

असीम के चेहरे पर आश्चर्य के भाव देखकर शालिनी समझ गई कि बसंती ने अपनी भेंट की इच्छा बता दी थी. बबिता के चेहरे के भाव बता रहे थे कि वो असीम के इस अचरज पर मुस्कुरा रही थी. बंसती की मांग सुनकर असीम ने बबिता को देखा.

“बिटवा, यही इन कार्यक्रमों का अंतिम चरण होता है. तूने मेरी गाँड में जो अपना रस छोड़ा है वो बसंती पूरा नहीं चाट पाई. तो उसे धोकर पिलाना तेरा ही दायित्व है.” ये कहते हुए बबिता ने अपने दोनों पैरों को ऊपर उठा लिया. सुशील ने जाकर उसके दोनों पैरों को पकड़ा जिससे कि बबिता की चूत गाँड ऊपर उभर आई.

असीम ने अपना लौड़ा बबिता की गाँड में डाला और तीन चार धक्के लगाए. और रुक गया. बबिता की आँखें धीरे से चौड़ी होने लगीं. बसंती असीम के पीछे बैठ गई. और उसने बसंती के नितम्बों पर अपने हाथ रख लिए.

“छोटी नानी, मैं हट रहा हूँ.” असीम ने कहा.

“मेरे हाथ के ऊपर ने निकलना.” बसंती ने बबिता के नितम्बों को थामे हुए बोला।

“जी, छोटी नानी.”

“अब देखना…” जीवन ने शालिनी के कान में बोला।

जैसे ही असीम हटा तो बबिता की गाँड से मूत्र की एक तीव्र धार छूटी। बसंती इसकी ही अपेक्षा कर रही थी. उसके खुले मुँह में वो धार आकर गिरने लगी. बसंती घूँट लेती तो मुँह बंद होते ही उसके चेहरे पर धार आ जाती. अंततः बबिता की गाँड पूर्ण रूप से धुलकर बसंती के मुँह, चेहरे और शरीर पर अपना स्थान बना चुकी थी. बसंती ने बड़े ही प्रेम से बबिता की गाँड को चाटा और हट गई.

“आज तो सचमुच आनंद आ गया. अब मेरा कार्य समाप्त हुआ. आप चलो, मैं यहाँ साफ सफाई हूँ.” बसंती ने बबिता से कहा.

“चाहे तो मैं तेरी सहायता कर देती हूँ, मेरी बहन.” बबिता ने उस स्थान को देखकर बसंती से कहा.

“नहीं, दीदी. मुझे इसमें अधिक समय नहीं लगेगा. पर असीम को इस बाल्टी को अंदर स्नानघर में रखने के लिए बोल दीजिये.”

बबिता ने असीम को आज्ञा दी. बसंती ने वीर्य और कुछ मात्रा में मूत्र से मिश्रित प्याला उठाया.

“पीना है, दीदी?”

“नहीं, तूने उसमे मूत्र न मिलाया होता तो अवश्य पी लेती.” बबिता ने उठते हुए कहा. बसंती ने मुस्कुराते हुए उसे अपने होंठों से लगाया और पी गई. अंत में जो शेष रहा उसे अपने चेहरे पर मल लिया.

पति पत्नियों की जोड़ियाँ अब अपने कमरों में जाने लगीं. परन्तु जीवन और शालिनी नहीं गए. जीवन ने कुमार और असीम को कुछ निर्देश दिया और शालिनी को लेकर स्नानघर में चला गया. बसंती उस बाल्टी को लालच से देख रही थी.

“जाकर पहले बाहर की धुलाई कर ले, नहीं तो फिर समस्या होगी.” जीवन ने कहा.

“मैं इसके साथ जाती हूँ. आप नए पेग बनाओ.” शालिनी ने जीवन को कहा तो जीवन आज्ञाकारी भावी पति के समान उसकी आज्ञा पूरी करने चला गया.

“यही इन पुरुषों को ठीक रखने का उपाय है दीदी. पर आपको कुछ करने की आवश्यकता नहीं है. मैं हर बार अकेली ही कर लेती हूँ.”

“ पर अब मैं तेरा साथ दूँगी।” शालिनी के स्वर में स्पष्ट भाव था कि वो न नहीं सुनाने वाली.

“चलो फिर.” बसंती ने एक अन्य बाल्टी उठाई और एक ओर जाकर एक उपकरण निकाला। शालिनी को गाँव में वैक्यूम क्लीनर देखकर पल भर के लिए आश्चर्य हुआ. बसंती ने अनुभवी ढंग से कुछ ही पलों में उसे कार्य के उपयुक्त बनाया और जाकर सफाई में लग गई. एक बार सोखने के बाद पानी डालकर फिर से उसे साफ कर दिया. दस पंद्रह मिनट में ही उसने अपना कार्य सम्पन्न कर लिया.

वैक्यूम क्लीनर इत्यादि लेकर बसंती और शालिनी स्नानघर में चली गयीं. जीवन ने असीम और कुमार को भी अंदर जाने के लिए संकेत किया और स्वयं अपना पेग समाप्त करके उनके पीछे चल दिया.

बसंती बहुत उतावली हो रही थी. उसने तीनों पुरुषों को आते देखा तो उसका चेहरा खिल उठा.

“तुझे तो पता है बसंती, तेरी हर इच्छा मेरे लिए कितना अर्थ रखती है. आज मैं चाहूँगा कि शालिनी भी देखे कि मैं तेरे लिए क्या हूँ.” जीवन ने कहा.

“बाबूजी!” बसंती का स्वर काँप गया.

जीवन ने बसंती का हाथ पकड़ा और शालिनी के सामने बैठा दिया. वो स्वयं बसंती के एक ओर खड़ा हो गया. असीम ओर और कुमार पीछे खड़ा हो गया. शालिनी समझ गई कि क्या करना है.

“अपना मुँह खोलो और आँखें बंद कर लो, बसंती.” शालिनी ने कहा.

बसंती ने यही किया तो शालिनी ने जीवन को देखा और मुस्कुराई. “मैंने सही समझा न?”

जीवन, “बिलकुल.”

“फिर आइये नहलाइये अपनी सखी को.” ये कहकर शालिनी आगे बड़ी और उसने बसंती के मुँह पर धार छोड़ दी. इसके साथ ही जीवन, असीम और कुमार ने भी बसंती पर अपनी धार छोड़ दी. चारों ओर से बसंती पर इस वृष्टि ने उसके मन को आल्हादित कर दिया. वो हाथों को अपने शरीर पर रगड़ने लगी मानो उसे रोम रोम में समाहित करना चाहती हो.

जब सबने अपना कार्य समाप्त किया तो शालिनी ने बाल्टी उसके सामने रख दी. बसंती ने कुछ पिया कुछ सिर पर डाला और फिर उससे सामान्य स्नान करने लगी.

“आप सब जाओ. मैं कुछ देर में आती हूँ.”

जीवन ने शालिनी को लिया और कपड़े लेकर अपने कमरे की ओर चल दिया. असीम और कुमार ने भी अपने कपड़े उठाये और चल पड़े.

“तुम अब क्या सोचती हो बसंती के विषय में?”

“पता नहीं. कुछ समझ नहीं पड़ रहा. हाँ, मूत्र से स्नान करना, गाँड में से मूत्र पीना, कुछ अधिक ही विकृत है. परन्तु जैसा अपने समझाया है, जिसे जिसमे आनंद और सुख मिले हमें उसके लिए कोई धारणा नहीं बनाना चाहिए.”

“तुम्हें पता है कि वो तुम्हारी गाँड से भी वही सुख पाने की इच्छुक है?”

“सम्भव है. और मुझे सच कहूँ तो कोई आपत्ति भी नहीं है.”

“बढ़िया. बसंती ये सुनकर बहुत प्रसन्न होगी.”

कमरे में पहुंचकर दोनों ने एक साथ स्नान किया और फिर जीवन ने दोनों के लिए पेग बनाये.

“नींद तो नहीं आ रही है?”

“न जाने क्यों, अभी नहीं.”

“फिर कुछ और देर खेल सकते हैं.” जीवन ने उसे ग्लास थमाते हुए कहा.

शालिनी सोफे पर जीवन से सट कर बैठ गई और अपनी व्हिस्की पीते हुए जो आज देखा था उसके विषय में सोचने लगी. उसने कभी सोचा न था कि गाँव में इतना खुला चुदाई का वातावरण भी हो सकता है. और बसंती! उसकी तो बात ही भिन्न थी. वो जिस प्रेम से अपने विकृत चरित्र को दिखाने में सक्षम थी उसने कभी सोचा भी न था. और अब वो भी उनके साथ नगर में लौटने वाली है.

“बसंती वहाँ आपके ही कमरे में रहने वाली है क्या?” उसने जीवन से पूछा.

“हाँ, क्यों? क्या तुम्हें कोई आपत्ति है?”

“नहीं, नहीं! ऐसा कुछ नहीं. मैं सोच रही थी कि हर दो तीन दिन में मैं आ जाया करुँगी तो हम तीनों…”

जीवन हंसने लगा.

“बस मुझे बता कर आना. वो घर के काम में सलोनी का हाथ बँटाये बिना नहीं रुकेगी. अगर पहले बता दोगी तो पहले ही उसे बता दूँगा और वो तुम्हें मेरे पास ले आएगी.”

“ये ठीक रहेगा. आपके परिवार वाले?”

“दो से तो तुम मिल ही चुकी हो. मेरा बेटे, बहू और पोती से भी ठीक से मिल लेना. वैसे तुम जानती ही हो कि बलवंत और गीता की बेटी सुनीति ही मेरी बहू भी है. तो तुम आधे परिवार से तो मिलन कर ही चुकी हो. घर पहुँचने के एक घण्टे में ही सबको तुम्हारे विषय में ज्ञात हो जायेगा. फिर उनका भी मन तुम्हारे इस सुंदर शरीर को चखने और तुम्हारे साथ खेलने का हो जायेगा.”

“मुझे भी अपने बेटे, बहू, पोते और पोती को आपके विषय में बताना होगा. आपके जितना लम्बा इतिहास हमारा नहीं है पारिवारिक और सामूहिक चुदाई का. तो मैं क्या कहूँगी, पता नहीं.”

“सच बताना, चाहे थोड़े थोड़े अंश में सही.”

“हाँ, यही मैंने भी सोचा है.”

उनके पेग समाप्त हो गए थे तो जीवन ने एक और पेग बनाया और इतने में ही उसके निर्देश के अनुसार असीम और कुमार बसंती को लेकर कमरे में आ गए.

“बाबूजी, मैंने नहीं कहा. ये दोनों ही मुझे पकड़कर आये।” बसंती विनती भरे स्वर में कहा.

जीवन उसके पास गया और उसके चेहरे हो अपने हाथों में लेकर प्रेम से बोला, “मैंने ही कहा था इन्हें.”

“क्यों?”

“अरे तेरा ध्यान मैं नहीं रखूँगा तो कौन रखेगा? इसीलिए यहाँ बुला लिया. अब तेरे इन दोनों नातियों को तेरी सेवा में दे रहा हूँ. इनके पास तो कोई कमरा है नहीं. और तुझे नीचे क्यों सोना पड़े?” फिर उसने शालिनी को देखा, “जब भी हम ऐसा आयोजन करते हैं तो बसंती मेरे साथ इस कमरे में सोती है. मैं जानता था कि वो आज हिचकेगी, इसीलिए इनसे पकड़वा कर लाना पड़ा.”

शालिनी उठ खड़ी हुई, “क्यों? मेरे आने से तेरा स्थान थोड़े ही कम हो गया. मुझे दीदी भी कहती है और संकोच भी करती है?”

बसंती की आँखें भर आईं.

“अब तेरे बाबूजी ने तुझे दो दो हट्टे कट्टे युवा तेरी सेवा में दिए हैं तो उसका सुख ले. और अब से कभी भी कहीं और सोने का मन में विचार भी मत लाना. हाँ अगर तेरी कहीं चुदाई हो रही हो तो फिर मैं नहीं रोकूंगी!”

ये सुनकर सब हंस पड़े और बसंती शर्मा गई.

असीम ने पहल की और बसंती को पीछे से पकड़ा और उसके स्तन दबाते हुए उसकी गर्दन को चूमा, “छोटी नानी, अब तो दादी से भी अनुमति मिल गई है. इतनी देर से सबकी सेवा कर रही थीं, अब हमें अपना कर्तव्य भी पूरा करने दो!”

बसंती कसमसाई और धीमे से बोली, “हाँ बिटवा, चूत बहुत व्याकुल है. अब तुम दोनों ही मेरी तृप्ति करो. तेरे दादा तो देवता हैं जिन्होंने मेरी इच्छा जान ली.”

अब तक कुमार आगे आ चुका और उसने बसंती के होंठों पर अपने होंठ रखते हुए उसे कुछ और बोलने से रोक दिया. कुछ देर तक कुमार उसके होंठ चूसता रहा और असीम उसके मम्मे मसलता रहा.

कुमार ने चुंबन तोड़ा और बसंती को देखते हुए कहा, “आओ छोटी नानी, पलंग पर चलते हैं. मुझे चूत चाटने की इच्छा है.”

तीनों पलंग पर चले गए जहाँ पहले से ही जीवन शालिनी की चुदाई आरम्भ कर चुका था. जीवन और शालिनी ने उनके लिए पर्याप्त स्थान छोड़ दिया था. कुमार नीचे लेटा और बसंती उसके मुँह पर अपनी चूत लगाकर बैठ गई. कुमार ने चूत चाटनी आरंभ कर दी. अचानक बसंती को अपनी गाँड पर कुछ आभास हुआ और उसकी सिसकारी निकल गई. असीम उसकी गाँड को चाट रहा था और एक ऊँगली से उसे खोल भी रहा था.

“आह बिटवा, चाटो मेरी चूत और गाँड और फिर उनकी चुदाई भी करना.”

कुछ देर तक ही ये चला और फिर कुमार ने अपनी जीभ हटा ली.

“अब चुदाई हो जाये.”

बसंती हटी और उसने पलटते हुए कुमार के मूसल से खड़े लौड़े पर चूत को दो पल रगड़ा और उस पर बैठती गई. दिन भर की दबी वासना चरम पर आ चुकी थी. उसकी आँखें शालिनी से मिलीं और दोनों मुस्कुरा दीं.

असीम ने बसंती की कमर पर हाथ रखकर उसे झुकाया और उसकी गाँड पर रखते हुए बिना किसी दुविधा के दो तीन धक्कों में अंदर पेल दिया. बसंती स्वर्ग की यात्रा पर निकल पड़ी.

इसके बाद अगले दो घंटों तक दोनों भाइयों ने मिलकर अपनी छोटी नानी की भरपूर चुदाई की. कुछ देर रुकते और फिर से चोदने लगते. बसंती की चूत और गाँड को इतना चोदा कि दोनों फूल गयीं. अंततः उन्होंने उस पर दया करते हुए उन्हें विश्राम करने के लिए छोड़ा और बसंती एक मधुर मुस्कान के साथ सो गई और दोनों भाई अपने कमरे में चले गए. जीवन और शालिनी इस बीच में पहले ही चुके थे.

अगली सुबह शालिनी उठी तो बसंती को बेसुध सोता पाकर मुस्कुरा दी. उसने अपने पोतों द्वारा चुदाई का वृत्तांत देखा था और बसंती की चूत और गाँड पर जमी श्वेत पपड़ी उसकी थकान की साक्षी थी. वो स्नान करने चली गई जहाँ जीवन अपने स्नान से निवृत्त हो चुके थे. बिना कुछ कहे उसने ब्रश किया और स्नान करने लगी. जीवन ने कहा कि वो बैठक में मिलेगा. शालिनी स्नान के बाद एक फिर बसंती को देखते हुए बाहर चली गई.

जीवन ने उपस्थित मित्रों को बताया कि वो बसंती को उसके घर छोड़ने जायेगा और शाम को उसे फिर ले आएगा. फिर उसने अपने मित्रों के साथ अपनी योजना को साँझा किया, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया. चाय नाश्ता समाप्त होते होते बसंती भी आ गई. गीता ने उसे चाय पिलाई और घर लेकर जाने के नाश्ता इत्यादि दिया. इसके बाद जीवन और शालिनी बसंती को उसके घर छोड़ने निकल पड़े.

“बाबूजी, इन्हें अधिक तिरस्कृत मत करना. बस उन्हें दारू पीने की कीमत बता देना.” बसंती ने जीवन से विनती की.

“देख बसंती, मुझे जो भी उचित लगेगा मैं वही करूँगा. मुझे तेरी और उसकी एक समान चिंता है. तुझसे दूर रहने का दुःख और तुझसे मिलने की लालसा उसे ठीक कर सकती है. वहीँ मेरी मित्र मंडली उसे कड़े वश में रखेंगी और उसकी मदिरा पर सीमा लगा देंगी. यहाँ अकेला छोड़ा तो वो कभी नहीं छोड़ने वाला.” जीवन ने कठोर शब्दों में कहा.

बसंती ने गहरी श्वास भरी और उसके कंधे झुक गए. वो समझ गई कि अब भूरा को अपने किये की भरपाई करनी ही होगी.

इतनी देर में ही वो अपने खेतों पर पहुंच गए जहाँ पर बसंती और भूरा रहते थे. अंदर जाते ही सस्ती देसी दारू की गंध ने उन्हें व्यथित कर दिया.

भूरा उनकी रसोई में कुछ ढूँढ रहा था. बंसती को अकेला अंदर छोड़कर जीवन और शालिनी बाहर गाड़ी में बैठ गए. पंद्रह मिनट बाद बसंती आई और उन्हें अंदर ले गई. अब तक घर में से गंध कम हो चुकी थी और भूरा सिर झुकाये बैठा था.

जीवन जाकर एक कुर्सी पर बैठ गया.

“भूरा, तुम जानते हो कि तुम्हारा परिवार मेरे अपने परिवार के ही समान प्रिय है. जो तुम अपने साथ कर रहे हो उससे बसंती, सलोनी और भाग्या दुखी हैं. इसीलिए मैंने कुछ निर्णय लिया है.”

“जी.”

“मैं बसंती को अपने साथ ले जा रहा हूँ. वैसे भी भाग्या कुछ ही दिनों में अपने बच्चे को जन्म देने वाली है. तो सलोनी को कुछ सहारे की आवश्यकता होगी. साथ ही तुम यहाँ नहीं रहोगे. तुम बलवंत के घर में उनके घर की देखभाल करोगे. परन्तु वहां तुम केवल सोने और सफाई इत्यादि के लिए ही जाओगे. तुम दिन में मेरे मित्रों के घर रहोगे और उनके घर का काम काज संभालोगे. तुम्हारे भोजन इत्यादि का प्रबंध उनके ही घर पर रहेगा.”

“जी.”

“ये कहते हुए मुझे दुःख हो रहा है परन्तु तुम उनके घर में नौकर के समान ही रहोगे और उनकी पत्नियों की सुख सुविधा का ध्यान रखोगे. और उनकी हर आज्ञा और इच्छा को पूरा करोगे.”

“जी.” भूरा का सिर अब भी झुका था.

“भूरा, तुम्हें याद है, जब मैं और तुम सरला की मिलकर चुदाई करते थे?” शालिनी ये सुनकर अचंभित हो गई.

“जी, बाबूजी!”

“और ये भी याद होगा कि जब तेरा विवाह बसंती से हुआ तो सुहागरात के एक ही सप्ताह बाद तूने मुझे बसंती की कुँवारी गाँड की भेंट दी थी.”

“जी बाबूजी..”

“और किस प्रकार से हम दोनों मिलकर उन्हें चोदा करते थे.”

भूरा की आँखें चमक उठीं.

“मुझे मेरा वही भूरा चाहिए. दारू के नशे में थका हुआ भूरा नहीं जिसका लंड खड़ा भी नहीं होता.”

भूरा ने उसे आश्चर्य से देखा.

जीवन ने शालिनी की ओर संकेत किया, “जानते हो ये कौन हैं?”

“आपकी मित्र हैं.”

“हाँ, पर भविष्य में पत्नी बनने वाली हैं. और मैं चाहूँगा कि हम उसी पुराने समय जैसे इन दोनों को एक साथ चोदे.”

शालिनी की आँखें फ़ैल गईं पर उसने कुछ कहा नहीं. जीवन भूरा को दण्ड और पारिश्रमिक से समझा रहा था.”

इस बार भूरा ने शालिनी को लालच से देखा.

“पर उसके पहले तेरे लिए कुछ नियम हैं. तू जानता है न कि बसंती और मेरा एक विशेष प्रेम क्यों है.?

“जी.”

“क्या है वो?”

“आप एक दूसरे का मूत पीते हो.”

“हाँ, और अब तुम्हें भी यही करना होगा. नहीं, नहीं, तुम्हें उसे अपना मूत्र पिलाने की अनुमति नहीं है. तुम केवल उसका और इसके बाद पूनम, निर्मला और बबिता का, जब तुम उनके घर रहोगे. विश्वास करो, तुम्हारी ये लत छुड़ाने का इससे शीध्र उपाय मुझे तो नहीं सूझ रहा. साथ ही तुम्हें दारू उनके ही द्वारा दी जाएगी. और वो जितना चाहेंगी, उतना ही देंगी. और अगर तुमने आनाकानी की तो मुझसे बुरा कोई न होगा और तुम सदा के लिए अपनी पत्नी, बेटी और नातिन से संबंध तोड़ दोगे।”

“बाबूजी!”

“मेरी चेतावनी को भली भांति समझ लो भूरा. तुम मेरे छोटे भाई के समान हो, पर अब मैं तुम्हें अपने परिवार को नष्ट करते हुए नहीं देखूँगा। दो तीन माह बाद मैं तुम्हें वहां बुलाऊँगा और एक क्लिनिक में भर्ती कराऊँगा जहाँ तुम्हारी ये लत सदा के लिए छूट जाएगी. समझ रहे हो?”

“जी बाबूजी, मुझे आपकी बात स्वीकार है.”

“बहुत अच्छे! तो फिर बसंती उधर बैठो और अपने पति को अपने अमृत का सेवन कराओ.”

बसंती ठगी सी रह गई.

“बसंती!” जीवन ने कर्कश स्वर में बुलाया.

“जी!”

ये कहते हुए बसंती जीवन वाली कुर्सी पर बैठ गई और जीवन ने एक झटके में उसका लहँगा उठाकर उसकी चूत उजागर कर दी.

“भूरा!”

भूरा अपनी पत्नी के सामने बैठ गया.

“देख रहा है न कैसे लाल है. रात भर मेरे पोतों से इसे चोदा है. गाँड भी मारी है. पर अभी तेरे लिए बस इसे चाटने और मूत्र पीने की स्वतंत्रता है.”

भूरा बसंती की चूत चाटने लगा. बसंती ने जीवन को देखा तो जीवन से अपना सिर हिलाकर संकेत किया.

“सुनिए जी, मेरा मूत निकलने वाला है.”

पर भूरा रुका नहीं और बसंती ने उसके मुँह में अपनी धार छोड़ दी. भूरा ने बिना संकोच उसे पीने का प्रयास किया और अधिकांश पी भी लिया.

“तो भूरा? क्या बुरा लगा?”

“कुछ कुछ!”

“कुछ दिनों में इसका स्वाद भी अच्छा लगने लगेगा. और जब तुझे दारू भी इसके साथ मिलकर ही दी जाएगी तो नशा भी जम कर चढ़ेगा.”

“जी.”

“अब तक तो तूने अपनी पत्नी का मूत्र पिया है. मैं जानना चाहता हूँ कि मेरी भाभियों का पी सकेगा या नहीं.”

भूरा के चेहरे पर कौतुहल के भाव आये. ये तो उसने सोचा ही न था. अपने परिवार को साथ रखने के लिए उसने एक कदम तो ले लिया था.

“इसका निर्णय अभी हो जायेगा, शालिनी!” जीवन ने कहा तो शालिनी चौंक गई.

“बसंती के स्थान पर बैठो और भूरा को अपना अमृत पिलाओ.”

बसंती विनती भरे चेहरे के साथ उठी और जीवन के सामने हाथ जोड़ दिए. जीवन ने सिर हिलाकर उसकी विनती अस्वीकार कर दी.

शालिनी के मूत्र का सेवन करने के बाद जीवन ने भूरा से कहा, “अब से क्लिनिक में जाने तक यही तेरी नियति है. और उसके बाद तुम सब मेरे ही साथ रहोगे. इस गाँव में तेरे यही २ महीने शेष हैं.”

“मेरी बात को हल्के में मत लेना भूरा, तुमने मेरा प्रेम देखा है, पर आक्रोश नहीं. मुझे विवश मत करना. अब मैं जा रहा हूँ. शाम को बसंती को लेने के लिए शालिनी आएंगी.”

ये कहते हुए जीवन ने शालिनी का हाथ लिया और चला गया.

**************

पाँच दिन बाद:


सामूहिक चुदाई के सारे कार्यक्रम समाप्त हो चुके थे. बबिता के बाद पूनम, निर्मला, गीता के गैंगबैंग के बाद शालिनी ने भी इसका आनंद लिया था. हालाँकि उसका गैंगबैंग उतना कठोर नहीं था न ही उतना वीभत्स. कल अंतिम रात थी जिसमें बसंती का गैंगबैंग हुआ था और वो पहले वाले गैंगबैंग के समान ही था. अंत में बसंती के अनुरोध पर उसे मूत्र स्नान करवाया गया था चूँकि उसकी चुदाई के समय इस क्रीड़ा में किसी की रूचि नहीं थी.

बाद में उसे स्नान करवा कर असीम उसे उसके घर छोड़ आया था. पति पत्नी एक दूसरे से दूर होने का दुःख साझा कर रहे थे. सुबह कुमार उन्हें लेने आया और दोनों बलवंत के घर चले गए. बसंती के हाथ में एक छोटी थी थैली ही थी. उसमें ही दो तीन जोड़ी कपड़े रख लिए थे. भूरा ने भी यही किया था. दोनों ने अपनी कोठरी को एक बाद देखकर अश्रुपूर्ण विदाई दी. सम्भवतः वो अब कभी इसमें रहने नहीं आएंगे.

***********

दो घण्टे बाद दो गाड़ियाँ बलवंत के घर से निकल कर जीवन के घर ओर दौड़ पड़ीं.

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क्रमशः

1741800
 
कैसे कैसे परिवार: Chapter 72 is posted

पात्र परिचय

अध्याय ७२: जीवन के गाँव में शालिनी ९

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हेलो मित्रों,

मैं एक बार फिर से लिखना आरम्भ करना चाहता हूँ.

मेरी इच्छा है कि मैं पहले ससुराल की नई दिशा को आगे बढ़ाऊँ।

कैसे कैसे परिवार में मैं अटका हुआ हूँ. कई परिदृश्यों में से किसको चुनूँ समझ नहीं पा रहा हूँ. इसीलिए उस पर बाद मैं लौटूँगा।

मामी का ट्रेनिंग भी आगे बढ़ाने का विचार है.

और एक और कथा जो किसी राज परिवार से सम्बन्धित हो उसे भी लिखना चाहता हूँ.

तो आप अपने विचार बताएं. कैसे कैसे परिवार को अभी छोड़ दें.

कुछ समय में इस पर कार्य आरम्भ करूँगा.

संतोषजनक और पर्याप्त प्रतिक्रिया मिलने के पश्चात ही मैं आगे बढूँगा।
 
Writing the new Update

From Previous Update:

अब तक:

मामी और दादी स्नान करने के बाद बैठक में आ बैठे. उनके चेहरे पर मनोरम शांति और असीम तृप्ति के भाव थे. भावना ने उन्हें पहले शीतल पेय पिलाया और फिर सबको नाश्ते के लिए आमंत्रित किया. सबने नाश्ता लिया एयर यहाँ वहाँ बैठकर खाने लगे. उसके बाद सब एक साथ बैठ गए मंत्रणा के लिए.

मामी: “मैंने पल्लू से कहा है कि वो अपने ससुराल में नीतू के लिए बात चलाये. अनर्थक विषयों पर बहस करने का कोई औचित्य नहीं है.”

पल्लू: “जी मामी, मैंने अभी स्नान के बाद इनसे (अनुज) बात की है, और उन्होंने माधवी मामी और यश भैया से बात कर ली है. माधवी मामी ने फागुनी मामी को आमंत्रित किया है. सम्भव हो तो आज ही.”

चाची कुछ बोलें इससे पहले ही पल्लू ने बात आगे बताई, “वो चाची से इसके बाद मिलने आएंगी, परम्परा के अनुसार. इसीलिए अभी केवल मामी को ही बुलाया है.”

अब अन्य किसी को समझ आया हो या नहीं, पर पल्लू और मामी को इसका कारण पता था. सबने इसे सहर्ष स्वीकार किया और पल्लू से आग्रह किया कि वो मामी को लेकर अपने ससुराल जाये.

“नहीं, पापा. मुझे अभी आने के लिए मना किया है. मेरे विचार से हरीश भैया मामी को छोड़ आएं फिर कोई न कोई उन्हें लौटा लाएगा.”
 
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