Incest JANNAT TERI BAHON (TANGO) MEIN - Page 7 - SexBaba
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Incest JANNAT TERI BAHON (TANGO) MEIN

Part -34



सुबह, अनु दीदी और दिव्या के कॉलेज या काम के लिए जाने के बाद, पारी ने रसोई संभाली. उसने दोनों के लिए नाश्ता तैयार किया और अपने भाई माणिक को हॉल में बुलाया.

दोनों डाइनिंग टेबल पर शान्ति से नाश्ता कर रहे थे, लेकिन पिछली शाम की नज़दीकी और आगामी हिल स्टेशन की यात्रा की योजना अभी भी उनके दिमाग में थी.

पारी: (नाश्ता करते हुए, शरारती अंदाज़ में) भाई, देखो... आस्था को मनाना तोह हो गया. पर यह मत भूलना की यह सिर्फ एक शुरुआत है. तुम्हे वहाँ सीमाओं का ध्यान भी रखना है और रोमांस भी करना है.

माणिक: (कॉफ़ी पीते हुए) हाँ, हाँ. मुझे पता है. जेंटलमैन बन कर रहना है.

पारी: (मुस्कुराते हुए) सिर्फ जेंटलमैन नहीं! तुम्हे थोड़ा... सशक्त भी दिखना है. सीमा पार न करो, लेकिन अपनी मजबूती दिखाओ. तुम्हे पता है न... बॉर्डर पर लड़ने के लिए हथियार मजबूत होने चाहिए!

पारी ने जानबूझकर "हथियार" शब्द पर ज़ोर दिया.

माणिक, जो पहले से hi पारी के खुले मज़ाक से उत्तेजित था, उसने जोश और अनजाने में उत्तेजना के मिश्रण में जवाब दिया.

माणिक: (थोड़ा सीना फुलाते हुए) कहो तोह! हथियारों का ट्रायल दिखा दूँ? तुम्हे?

यह सुन कर पारी ने अपना हाथ रोका और प्यार से माणिक के कंधे पर मारते हुए हंस पड़ी.

पारी: (आँखों में हंसी) यार! अपनी hi बहिन पर हथियार तरय करोगे? शर्म नहीं आती? ट्रायल दिखाना है तोह आस्था को दिखाना!

माणिक को अपनी बात पर थोड़ी शर्म आयी, लेकिन साथ hi मज़ा भी आया. अब दोनों बेजहीझाँक दोस्तों की तरह अंतरंग मज़ाक कर रहे थे.

माणिक: (आवाज़ धीमी करके, नज़दीक झुकते हुए) मैं बस... तुम्हे बताना चाहता था की तुम्हारे गुरु की तैयारी पूरी है.

Baaton-baaton में, माणिक की आँखें, जो अब वर्जित चीज़ों पर आसानी से चली जाती थी, पारी के खुले गले के पास तिकी. उसने अचानक, बिना soche-samjhe, एक ऐसी बात कह दी जो सीमा पार कर गयी.

माणिक: (फुसफुसाते हुए, अचानक एक असहज तुलना करते हुए) वैसे, मुझे एक बात समझ नहीं आती... तुम्हारे बूब्स आस्था से भी बड़े और ज़्यादा... (वह शब्द नहीं ढूंढ पाया) ...खूबसूरत लगते हैं.

जैसे hi माणिक ने यह बात कही, उसने तुरंत महसूस किया की उसकी पंत में अंदर उसका 'हथियार' तन गया है. पारी के शरीर की वर्जित तुलना और उसकी नज़दीकी ने उसे तुरंत उत्तेजित कर दिया था.

पारी यह सुन कर शर्मा गयी. उसका चेहरा लाल हो गया. यह मज़ाक अब मज़ाक नहीं रहा था. उसके भाई ने उसके अंगों की तुलना किसी और लड़की से की थी, और उसने साफ़ देखा की उसके भाई का 'हथियार' यह देख कर खड़ा हो गया है.

पारी ने बिना कुछ कहे, तुरंत अपनी कुर्सी पीछे की तरफ धकेली.

पारी: (धीमी, काम्पटी आवाज़ में) बस... बस, भाई.

उसने तुरंत अपने और माणिक के ख़तम हुए बर्तन उठाये और तेज़ी से किचन में भाग गयी, जैसे की उसे उस माहौल से भागना हो.

किचन में पहुँच कर, पारी ने बर्तन सिंक में रखे. वह बर्तन साफ़ करने लगी, लेकिन उसकी आँखें दूर दीवार पर थी. उसके गाल अभी भी गरम थे. वह माणिक की baatein—uske शरीर की तुलना, 'हथियार' का ट्रायल, और उसका उत्तेजित hona—soch कर मुस्कुराने लगी.

वह जानती थी की यह सब गलत था, पर उसके भाई की यह कच्ची, बेकाबू उत्तेजना उसे अंदर hi अंदर एक अजीब सी गुदगुदी और रोमांच दे रही थी. वह मन hi मन सोच रही थी, "यह भाई भी न... अब इसे कौन सुधारेगा!"

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पारी के किचन में भाग जाने के कुछ hi पल बाद, माणिक को अपनी गलती का एहसास हुआ. वह समझ गया था की इस बार उसने मज़ाक की सीमा लांघ दी थी. वह तुरंत उसके पीछे किचन में चला गया.

पारी सिंक के सामने कड़ी थी, zor-zor से झूठे बर्तन धो रही थी, जबकि वहाँ धोने के लिए सिर्फ do-teen hi कप प्लेट्स थे. वह जानबूझकर माणिक की तरफ नहीं देख रही थी.

माणिक ने धीरे से पीछे से दरवाज़ा बंद किया और उसके पास आया.

माणिक: (आवाज़ में शर्मिंदगी और पछतावा) पारी... सुनो.

पारी ने बर्तन धोना जारी रखा.

माणिक: (थोड़ा नज़दीक आकर) मेरी बात सुनो. बुरा तोह नहीं लगा? मैं बस... मज़ाक कर रहा था. मुझे पता है की मुझे वह सब नहीं कहना चाहिए था.

पारी ने नल बंद किया, एक गहरी सांस ली, और धीरे से माणिक की तरफ मुढ़ी. उसके चेहरे पर अभी भी पिछली शर्मिंदगी की लाली थी, लेकिन उसकी आँखों में कोई गुस्सा नहीं था, बल्कि एक अजीब सी शरारत और संकोच था.

पारी: (शर्माते हुए, धीमी आवाज़ में) बुरा तोह नहीं लगा, भाई... पर आप कुछ भी बोलते हो! तुम्हे पता है, मेरा दिल कितनी ज़ोर से धड़क रहा था जब तुमने... जब तुमने वह सब कहा?

माणिक की नज़रें फिर से झुक गयीं.

माणिक: मुझे पता है. मैंने ख़ुशी के जोश में कह दिया. मैं माफ़ी चाहता हूँ. मैं उस नज़दीकी को कण्ट्रोल नहीं कर पाया.

पारी: (अब थोड़ी दृढ़ता से) कण्ट्रोल करना पड़ेगा, भाई! आप मुझसे अपना हथियार तरय करने की बात करते हो, और... और मेरे बूब्स की तुलना अपनी गर्लफ्रेंड के बूब्स से करते हो! यह सब... यह सही नहीं है.

पारी ने एक गहरी सांस ली.

पारी: क्या यार! बहुत आगे बढ़ रहे हो तुम! हमारा रिश्ता अब एक दोस्ती जैसा हो गया है, जहां हम खुल कर बात करते हैं, पर कुछ चीज़ों की सीमा होती है. तुम्हे आस्था के साथ नज़दीक होना है, न की मेरे साथ.

माणिक ने पारी के हाथ पकडे, जो अभी भी गीले थे.

माणिक: तुम सही कह रही हो. मैं जानता हूँ की मैं भटक रहा हूँ. पर यह सब तब तक hi था जब तक आस्था ज़िन्दगी में नहीं आयी थी. अब मैं पूरी तरह से उस पर फोकस करूँगा. तुम मेरी सबसे अच्छी दोस्त हो, पारी, और मैं तुम्हे कभी असहज नहीं करूँगा.

पारी, माणिक की ईमानदारी से थोड़ी नरम पड़ी.

पारी: (थोड़ा मुस्कुराते हुए) ठीक है. मैं तुम पर भरोसा कर रही हूँ. अब जाओ और अगली मुलाक़ात की तैयारी करो. और हाँ, अगली बार जब तुम आस्था से मिलो, तोह तुम्हे अपनी 'सीमा' थोड़ी काम करनी पड़ेगी, ताकि मुझे तुम्हारी 'फिजिक्स' पर भरोसा हो जाए.



माणिक ने हँसते हुए सर हिलाया. उसने प्यार से पारी के गाल पर हाथ फेरा और किचन से निकल गया, अपनी बहिन की बातों को गाठ बाँध कर.
 
Part - 35



Manik aur Aastha, apni 'group study' ke bahane, shehar se door us khoobsurat hill station par pahunch chuke the. Unke saath koi teesra dost nahi tha — yeh ek bahana tha jise dono ne khushi-khushi sweekar kar liya tha. Unhone ek aaramdayak cottage mein do alag-alag kamre book kiye the, lekin unke beech ki doori ab kam hone lagi thi.

Raat kaafi gehri ho chuki thi. Bahar ka temperature tez se gir raha tha, aur cottage ki lakdi ki deewaron se guzarti thandi hawa Manik aur Aastha ke beech ki antarangta ko badha rahi thi.

Aastha, jo thandi ke maare thodi sikud rahi thi, Manik ke kamre mein ek garam coffee peene aayi thi. Woh ek dheeli sweatshirt aur lower mein thi, jo use aaramdayak, par behad mohak look de raha tha.

Manik ne bistar par blanket ke neeche baithe hue coffee ka mug pakda.

**Aastha:** (kaampte hue) Uff! Yahan bahut thand hai. Maine socha tha ki yahan itni thand nahi hogi.

**Manik:** (pyaar se) Tum mere blanket mein aa sakti ho. Jagah kaafi hai. Main tumhe garam rakh sakta hoon… vaigyanik tareeke se.

Aastha muskuraayi. Woh jaanti thi ki yeh 'limit' ko todne ka pehla nimantran tha, aur woh ise sweekar karne ke liye taiyaar thi. Woh dheere se Manik ke bagal mein blanket ke andar chali gayi.

Jaise hi unke sharir ek-doosre ko chhue, dono ke beech ek teevra aur ankaha aakarshan fail gaya. Coffee ka mug ek taraf rakha gaya.

Manik, jisne apni pichhli mulaqaat mein khud ko kadai se niyantrit kiya tha, ab Pari ki salah aur apni dabee hui chaahat ke kaaran poori tarah se bekaabu ho raha tha.

**Manik:** (aawaaz dheemi aur bhaari) Aastha… mujhe lagta hai ki yeh raat, yeh jagah… yeh humein seemaon ko bhoolne ke liye majboor kar rahi hai.

Aastha ne apni aankhen band kar li aur halke se Manik ki taraf jhuk gayi.

**Aastha:** (lagbhag fusfusate hue) Shayad… shayad humein in seemaon ko todne ki zaroorat hai, Manik.

Manik ne bina der kiye, apni baahen Aastha ki kamar ke charon or kas li aur use apne kareeb kheench liya. Usne apne honth Aastha ke honthon se jode. Yeh unka pehla joshila chumban tha — gehra, lambe samay tak chalne wala aur saari purani hichkichahat ko todne wala.

Manik ne ek haath Aastha ke chehre par rakha, aur doosra haath uski peeth se hote hue dheere-dheere uske vakshasthal (boobs) par chala gaya. Aastha ne koi virodh nahi kiya, balki ek gehri 'aah' ke saath khud ko us sparsh mein aur samarpit kar diya.

Manik ne us waqt Pari ki baat yaad nahi ki, na hi apni pichhli kisi glaani ko. Woh sirf us pal ki vaasna mein dooba hua tha.

Aastha ne Manik ki shirt ke button kholne shuru kar diye. Woh bhi utni hi utkattata se is raat ke liye taiyaar thi.

**Aastha:** (saans lete hue) Manik… yeh raat sirf stargazing ke liye nahi hai… mujhe tumse aur nazdeek hona hai.

Manik ne Aastha ko dheere se bistar par litaya. Thandi raat mein, unke sharir ki garmi aur unke beech ki uttejana ne kamre ko poori tarah se bhar diya tha. Kapde tez se utarne lage, aur unke nagn sharir jald hi blanket ke neeche ek-doosre se kas kar chipak gaye.

Woh raat sirf ek trip nahi thi, balki unki vaasna ki pehli, bekaabu aur poori tarah se tript abhi-vyakti thi, jisne unke rishte ko ek naya aayam de diya.

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Thand se bachne ke liye odhi gayi blanket ke neeche, ab keval do nange sharir the jo ek-doosre ki garmi aur chaahat mein lipte the. Hill station ki shanti us kamre ke bheetar umad rahe vaasna ke toofan ke vipreet thi.

Manik aur Aastha, apne pehle milan ki is raat mein, kisi bhi seema ko langhne ke liye taiyaar the. Manik ne Aastha ko apne oopar kas kar kheench liya aur unke honth ek baar phir ek gehre, lambe chumban mein bandh gaye.

Ve thodi der baad alag hue, unki saansen tez thi. Aastha ne Manik ki aankhon mein dekha aur bina kuch kahe, ek gehri uttejana ke saath, use '69' ki sthiti ke liye ishara kiya.

Manik turant samajh gaya. Unhone karwat badli aur ek-doosre ke nazdeek aaye. Ab ve aise sthaan par the jahan har ek apni saathi ki antarangta ko poorn roop se anubhav kar sakta tha.

Manik ne Aastha ki yoni ki taraf jhuk kar, dheere-dheere use apne honthon se sparsh kiya. Aastha ne ek lambi aur tript kar dene wali 'aah' bhari. Manik ne bina kisi sankoch ke, Aastha ki ichchhaon ko samajhte hue, use choosna shuru kar diya. Uska sparsh kalaatmak aur kaamuk tha, jo Aastha ke sharir mein ek teevra aur nayi uttejana paida kar raha tha.

Usi samay, Aastha bhi poori tarah se Manik ki uttejana mein doob gayi. Usne Manik ke tan chuke Lund ko apne haathon mein thaama aur phir dheere se apne muh mein liya. Woh bhi bade utsah aur samarpan ke saath use choosne lagi. Unke muh aur jeebh ek-doosre ke sharir ke sabse sanvedansheel angon par kaam kar rahe the, jisse dono ko ek adwitiya aur bekaabu sukh mil raha tha.

Kuch der tak chala yeh guptang ka khel dono ko charam uttejana ke kagaar par le aaya. Unki saansen bekaabu thi, aur unke sharir ka har hissa is sukh ko mehsoos kar raha tha.

Iske baad, Manik ne Aastha ko dheere se bistar par seedha litaya. Woh uske oopar jhuka aur sabse pehle uske vakshasthal (boobs) ko choomna aur choosna shuru kar diya. Uske honth aur jeebh, uske angon ke charon or ghoom rahe the, aur Aastha phir se ek gehri 'uff' ke saath Manik ko apni baahon mein kas rahi thi.

Manik, apni poori vaasna aur josh ke saath, antatah Aastha ki dono taangon ko uthaya aur dheere se, lekin dridhta se, uski yoni mein pravesh kiya.

**Aastha:** (zor se saans lete hue) Haan, Manik! Aur… aur zor se!

Manik ne Aastha ki aawaaz mein chhupi chaahat ko samjha. Usne ab tez se aur bekaabu dhang se dhakke lagaane shuru kar diye. Woh kisi bhi cheez ke baare mein nahi soch raha tha — sirf Aastha ka sharir, uski uttejana, aur apni saalon ki dabee hui chaahat.

**Manik:** (gehri aawaaz mein) Tumhe kaisa lag raha hai… batao!

**Aastha:** (aanand se chillate hue) Kamaal… kamaal lag raha hai, Manik! Roko mat! Mujhe aur chahiye!

Aastha poori tarah se Manik ka saath de rahi thi. Woh apni kamar oopar utha rahi thi, Manik ki gati ko badha rahi thi, aur uske baalon ko kheench kar use aur nazdeek la rahi thi. Unke sharir ke milne ki aawazein, unki sisakiyaan aur fusfusaahtein, thandi raat ki shanti ko tod rahi thi.

Yeh sahvaas zordaar, lamba aur poori tarah se triptidायक tha. Dono apne-apne charam par pahunche, unke sharir ka har hissa bekaabu ho gaya. Manik ek gehri dahaad ke saath Aastha par gir pada, aur dono us garam blanket ke neeche ek-doosre se chipke rahe, unke sharir ek-doosre ke paseene se bheege hue the, par unke dil ab poori tarah se jude hue the. Yeh raat unki adhoori chaahaton ki sabse badi jeet thi.



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*Part -36



दनादन चुदाई के बाद, दोनों बिस्तर पर ek-doosre से चिपके हुए कुछ देर तक सांस लेते रहे. उनके शरीर अभी भी गरम थे, पसीने और उनकी अंतरंगता के निशाँ अभी भी चमक रहे थे. आस्था ने धीरे से अपना हाथ माणिक के सीने पर रखा और उसकी धड़कन महसूस की – वह तेज़्ज़ थी, जैसे अभी भी उसमें बाकी एनर्जी बची हुई हो.

माणिक ने उसकी तरफ देखा, आँखों में वही शरारत और प्यार मिला हुआ था.

माणिक: (धीमी आवाज़ में) अभी भी थकी नहीं तू?

आस्था: (मुस्कुरा के) थकना तोह दूर की बात… मुझे लगता है हम दोनों को अब सफाई की ज़रुरत है… वर्ण यह पसीना और यह गीलापन… सुबह तक हम दोनों चिपक जायेंगे.

माणिक हंस पड़ा और उसका हाथ पकड़ के उठा लिया.

दोनों बाथरूम की तरफ चल पड़े, बिलकुल नंगे hi. बाथरूम का दरवाज़ा बंद करते hi माणिक ने शावर ों कर दिया. गरम पानी की तेज़्ज़ बूँदें ऊपर से बरसने लगी – जैसे कोई गरम बारिश शुरू हो गयी हो. पूरा बाथरूम भाप से भर गया, लाइट्स की रौशनी में वह भाप चमक रही थी और बहार की सर्दी बिलकुल भूल गयी.

वे दोनों उस गरम पानी के नीचे आ गए. पानी उनके कन्धों, पीठ, सीने पर बह रहा था – हर बूँद उनके थके हुए मसल्स को मस्सगे कर रही थी. आस्था ने आँखें बंद कर ली और सांस ली,

आस्था: यह… कितना ाचा लग रहा है…

माणिक ने उसको पीछे से गले लगाया, अपने हाथ उसके पेट पर रखे और धीरे से नीचे की तरफ ले जाने लगा. आस्था ने हलकी सी सिसकारी ली.

माणिक ने उसको वाल की तरफ मोर दिया, दोनों का चेहरा सामने. पानी उनके चेहरों पर बह रहा था, उनके होंठ भीगे हुए थे. माणिक ने उसके होंठों को अपने होंठों से दबाया – यह किश पहले से ज़्यादा गहरा था, जैसे साड़ी भूख अभी भी बाकी हो.

उनके शरीर ek-doosre पर फिसल रहे थे – पानी की वजह से हर स्पर्श और ज़्यादा सेंसिटिव लग रहा था. माणिक ने अपनी बाहों से आस्था को उठा लिया, उसकी टांगों को अपनी कमर के चारों ओरे लपेट लिया. अब आस्था हवा में थी, सिर्फ माणिक की बाहों और वाल के सहारे. पानी उन दोनों के बीच से बह रहा था, उनकी अंतरंगता को और गीला कर रहा था.

आस्था ने माणिक के कान में फुसफुसाया,

आस्था: माणिक… मुझे पता है… तुझे अभी भी और चाहिए… बिलकुल जैसे मुझे चाहिए.

माणिक ने जवाब नहीं दिया – बस अपने होंठ नीचे ले गया. उसने आस्था के गीले, खड़े निप्पल्स को मुँह में लिया, धीरे से चूसा, जुबां से घुमाया. पानी की बूँदें उसके बूब्स पर गिर रही थी, और हर बार जब माणिक चूसता, आस्था की चीख बाथरूम की दीवारों से टकरा के गूंजती.

फिर दोनों नीचे बैठ गए – शावर के नीचे hi. गरम पानी उनके ऊपर से बरस रहा था जैसे कोई ट्रॉपिकल झरना. माणिक ने आस्था की टांगों को फैलाया और अपना मुँह उसकी छूट पर रख दिया. उसकी जुबां धीरे धीरे, फिर तेज़्ज़ होकर चाटने लगी – क्लीट को टारगेट करते हुए. आस्था ने अपने हाथ उसके बालों में दाल दिए और मोअन करने लगी,

आस्था: हाँ… वही… ओह गॉड… माणिक…

आस्था ने भी इंतज़ार नहीं किया – उसने माणिक के लुंड को हाथ में लिया, गरम पानी के नीचे उसको सहलाया और फिर मुँह में ले लिया. वह deep-throat कर रही थी, पानी उसके मुँह से बह रहा था, लेकिन वह रुक नहीं रही थी. दोनों ek-doosre को सिमुलतानूसली प्लीज कर रहे थे – बाथरूम में सिर्फ पानी की आवाज़, उनकी सिसकारियां और चूसने की आवाज़ें थी.

कुछ देर बाद माणिक उठा, आस्था को वाल से सताया और उसके पेअर अपनी कमर पर उठा लिए. एक hi ज़ोर दार झटके में उसका पूरा लुंड अंदर चला गया.

आस्था: (तेज़ चीख के साथ) आआह्ह्ह! हाँ माणिक! पूरा अंदर… ज़ोर से!

माणिक ने अब फुल स्पीड पकड़ ली – हर धक्का इतना गहरा की आस्था की पीठ वाल से रगड़ रही थी. पानी उनके ऊपर झरना बन कर गिर रहा था, उनके शरीर स्लिप हो रहे थे लेकिन कनेक्शन कभी नहीं टूटा. आस्था अपनी कमर को माणिक के रदम के साथ हिला रही थी, दोनों की सांसें एक साथ चल रही थी.

आस्था: ज़ोर से… और ज़ोर से… मैं… झाड़ रही हूँ!

माणिक ने अपने हाथों से उसकी गांड को कास के पकड़ा और लास्ट कुछ ज़ोर दार धक्के मारे. दोनों एक साथ झाड़ गए – माणिक का गरम पानी आस्था के अंदर चला गया, और आस्था की छूट ने उसको स्क्वीज़ किया. दोनों हाँफते हुए ek-doosre से चिपके रहे, पानी उन पर बरसता रहा.

कुछ पल बाद जब सांस नार्मल हुई, माणिक ने आस्था को धीरे से नीचे उतारा. दोनों ek-doosre को गले लगाए खड़े रहे, गरम पानी के नीचे, जैसे दुनिया रुक गयी हो.

सुबह देर से जागे. सूरज की हलकी किरणें आ रही थी. दोनों अभी भी नंगे थे, ब्लैंकेट के नीचे चिपके हुए.

माणिक: गुड मॉर्निंग, मेरी स्टारगेज़र… कल रात… यह तोह ज़िन्दगी भर याद रहेगी.

आस्था: गुड मॉर्निंग, मेरे साइंटिस्ट… मुझे लगता है हमारी ग्रुप स्टडी अभी ख़तम नहीं हुई… और हाँ, अब भूख लगी है… बहुत ज़्यादा.

रूम सर्विस ने नाश्ता भेज दिया – फ्रेश फ्रूट्स, क्रोइस्संट्स, कॉफ़ी. दोनों बाथरोब पेहेन कर मेज़ पर बैठे.

आस्था ने क्रोइस्सन्त माणिक को दिया,

आस्था: पहले खा… एनर्जी चाहिए हमें.

माणिक ने एक टुकड़ा लिया और आस्था के होंठों के पास ले गया, खिला दिया. फिर आस्था ने कॉफ़ी का घूंट मुँह में रखा और माणिक को किश के ज़रिये पीला दिया – गरम कॉफ़ी उनके मुँह में घुल गयी, दोनों के होंठ चिपके हुए थे.

फिर आस्था ने क्रोइस्सन्त पर जैम लगाया, टुकड़ा तोडा और अपने बाथरोब के अंदर, अपने बूब्स के बीच खिसका दिया.

आस्था: (शरारती मुस्कान के साथ) अब ढूंढ… सिर्फ मुँह से खाना है… no हैंड्स, मेरे साइंटिस्ट.

माणिक मुस्कुराया, मेज़ के नीचे गया, घुटनो पर बैठ गया और धीरे से बाथरोब खोला. जैम लगा क्रोइस्सन्त उसके बूब्स के बीच था – उसने पहले उसकी स्किन को छाता, फिर जैम को जुबां से छत्ते हुए क्रोइस्सन्त को मुँह में लिया. आस्था ने आँखें बंद कर ली और मोअन करने लगी.



यह सिर्फ नाश्ता नहीं था – यह उनकी नयी सुबह की शुरुआत थी… और रात की यादें अभी भी उनके शरीर में ज़िंदा थी.
 
Part - 37



माणिक, आस्था की इस कामुक चैलेंज को सुनते hi एकदम गरम हो उठा. वह तुरंत कुर्सी से उठा और आस्था के सामने घुटनो के बल बैठ गया. आस्था अभी भी अपना बाथरोब पहने कुर्सी पर बैठी थी, उसके चेहरे पर एक जीत वाली, बहुत hi सेडक्टिव मुस्कान थी.

**माणिक** (आँखों में गहरी चाहत के साथ):

“मेरे साइंटिस्ट होने का फायदा यह है की मैं जानता हूँ ‘टारगेट’ कहाँ है. मैं यह ‘इनाम’ ढूंढ लूंगा… और हाँ, सिर्फ मुँह का इस्तेमाल करूँगा.”

माणिक ने धीरे से आस्था के बाथरोब की डोरी खोल दी. आस्था ने बिना किसी झिझक के अपना बाथरोब थोड़ा सा खोला, जिससे उसके बूब्स का उप्पेर हिस्सा माणिक के सामने आ गया – क्रीमी, सॉफ्ट और हलके से लाल.

सबसे पहले माणिक ने अपने होंठों से आस्था के सीने को प्यार से चूमा. उसने ध्यान से हर इंच चेक किया – कहीं जैम या क्रोइस्सन्त का टुकड़ा तो नहीं पड़ा. फिर उसकी जीभ आस्था के उभर पर घूमने लगी – dheere-dheere, गीली और गरम. आस्था एक गहरी, एक्ससिटेड सांस ले रही थी, उसके निप्पल्स आलरेडी हार्ड हो चुके थे.

**आस्था** (माणिक के बालों को सहलाते हुए, हलकी आवाज़ में):

“क्या मिल गया? मेरा क्रोइस्सन्त?”

**माणिक** (उसकी स्किन पर फुस्कराते हुए):

“अभी नहीं… पर यह तलाश बहुत मीठी है.”

माणिक dheere-dheere नीचे की तरफ बढ़ा – पेट पर, नैवेल के aas-paas, फिर जाँघों की तरफ. हर किश, हर चाट में वह आस्था के बॉडी को एक नया करंट दे रहा था. आस्था के हाथ उसके सर पर और ज़ोर से जकड गए.

जब माणिक की सांस आस्था के बिलकुल इंटिमेट एरिया के पास पहुंची, तो आस्था का पूरा बदन काँप उठा.

**आस्था** (तेज़ सांस लेते हुए):

“मुझे लगता है… तुम अपने टारगेट के बहुत करीब हो, माणिक.”

माणिक ने बाथरोब को पूरा ऊपर धकेल दिया. और वहां था – स्ट्रॉबेरी जैम से सजा हुआ एक छोटा क्रोइस्सन्त का टुकड़ा, बिलकुल आस्था की छूट के बहार वाले हिस्से पर रखा हुआ. लाल जैम और उसकी गीली, पिंक स्किन का कंट्रास्ट देखकर माणिक का मुँह पानी भर आया.

उसने बिना एक सेकंड वास्ते किये, अपनी जीभ से उस टुकड़े को चाटना शुरू कर दिया. जैम की मिठास और आस्था की गरम, नमकीन टास्ते का मिक्स आस्था को पागल कर रहा था. वह सिर्फ क्रोइस्सन्त नहीं खा रहा था – वह आस्था की क्लीट को भी साथ में चुम, चाट और हलके से सूचक कर रहा था.

**आस्था** (कमर मोड़ते हुए, दबी हुई चीख के साथ):

“उफ्फ्फ्फ़! माणिक! तुम… अब हद्द पार कर रहे हो!”

माणिक मुस्कुराया और पूरा टुकड़ा मुँह में दाल कर खा लिया. फिर उसने आँखें उठा कर आस्था को देखा – उसके होंठ चमक रहे थे, जैम और आस्था के रास से.

**माणिक** (तृप्ति से):

“मुझे मेरा इनाम मिल गया. और यह सबसे मीठा ब्रेकफास्ट था जो मैंने कभी किया.”

आस्था अब पूरी तरह से आउट ऑफ़ कण्ट्रोल हो चुकी थी. उसने तुरंत माणिक को ऊपर खिंच लिया और उसके होंठों पर एक वाइल्ड, गहरा किश कर दिया – अपना टास्ते, जैम और क्रोइस्सन्त सब मिक्स हो गया.

**आस्था** (तेज़ आवाज़ में):

“अब मेरा इंतज़ार ख़तम! अब तुम्हारा इनाम… मैं हूँ!”

उसने माणिक को पीछे धक्का दिया और दोनों ज़मीन पर बिछे थिक कारपेट पर गिर पड़े. बाथरोब idhar-udhar गिर गए. अब दोनों बिलकुल नंगे थे – सिर्फ ek-doosre की गर्मी और पसीना.

आस्था ने बिना टाइम वास्ते किये माणिक को अपने ऊपर खींच लिया. उसने माणिक के लुंड को पकड़ा, थोड़ा एडजस्ट किया और खुद hi उसको अपने अंदर ले लिया – एक hi झटके में पूरा अंदर तक.

दोनों एक साथ ज़ोर से मोअन कर उठे.

यहाँ कोई स्लो रोमांस नहीं था – सिर्फ वाइल्ड, अर्जेंट, एनिमल जैसा सेक्स. कारपेट की रौग़नेस्स उनकी स्किन को रगड़ रही थी, पर वह दर्द भी मज़ा दे रहा था.

माणिक ने तुरंत स्पीड पकड़ ली – zor-zor से, गहरे धक्के. आस्था की आँखें बंद, मुँह खुला, आवाज़ें निकल रही थी.

**माणिक** (आस्था के कान में फुस्कराते हुए):

“तुम… मेरी सबसे अच्छी चैलेंज हो…”

**आस्था** (कमर उठाते हुए, ज़ोर से):

“और तुम… मेरे सबसे अच्छे विनर हो! माणिक, और तेज़! इस मीठे इनाम को पूरा कर दो!”

आस्था ने अपने नेल्स से माणिक की पीठ पर लाल लाइन्स बना दी. उनका रदम एक जंगली ताल बन गया – thap-thap की आवाज़, पसीने की बू, साँसों की गर्मी – सब मिक्स हो गया.

कुछ hi मिनट में दोनों के बदन कांपने लगे.

**आस्था** (आखरी चीख के साथ):

“आआह्ह्ह! माणिक!!”

उसने ज़ोर से क्लैंप किया, ओर्गास्म ने उसको हिला दिया. साथ hi माणिक भी रुक नहीं पाया – एक फाइनल गहरा धक्का मारा और अपनी साड़ी एनर्जी आस्था के अंदर छोड़ दी, garam-garam स्पोर्ट्स के साथ.

दोनों कारपेट पर hi गिर पड़े – पसीने से भीगा, सांस फूली हुई, पर चेहरे पर पूरी सटिस्फैक्शन.

वह वही पड़े रहे – नंगे, चिपचिपा, ek-doosre में घुले हुए. ब्रेकफास्ट टेबल अभी भी पास थी, क्रोइस्सन्त के टुकड़े idhar-udhar बिखरे हुए थे. पर अब उनके होंठों पर न सिर्फ जैम की मिठास थी – बल्कि ek-doosre की वाइल्ड, बेकाबू लस्ट थी.

यह सुबह उनके रिश्ते की साड़ी सीमाएं तोड़ चुकी थी – और एक नयी, और भी गहरी इंटिमेसी शुरू कर चुकी थी.

**********************************

उस तरफ बैडरूम में माणिक और आस्था ek-doosre में खो चुके थे – zor-zor के धक्के, चीखें, पसीना, और वह thap-thap की आवाज़ जो कॉरिडोर तक आ रही थी.

इधर, पारी अपने कमरे में अकेली लेती हुई थी. लाइट्स बंद, सिर्फ कॉरिडोर से आती हलकी सी रौशनी उसके बीएड पर पद रही थी. उसने ब्लैंकेट खिंच ली थी, पर नींद नहीं आ रही थी. कानो में वह आवाज़ें घूम रही थी – आस्था की दबी हुई सिसकियाँ, माणिक का गहरा सांस लेना, बीएड के स्प्रिंग का chhoti-chhoti चीख… सब कुछ सुनाई दे रहा था.

पारी ने पहले पिलो से कान दबा लिए. पर फिर भी आवाज़ अंदर तक घुस रही थी. उसके दिमाग में ख्याल आने लगे – भाई क्या कर रहा होगा? आस्था को कैसे पकड़ा होगा? कैसे उसके ऊपर चढ़ कर… अंदर तक…?

एक पल के लिए उसने आँखें बंद कर ली. इमेजिन करने लगी – माणिक का नंगा बदन, पसीने से चमकता हुआ, आस्था की कमर पकडे हुए, zor-zor से धक्के मारते हुए. आस्था के बूब्स उछाल रहे होंगे, उसकी चीखें निकल रही होंगी… “माणिक… और तेज़…!”

पारी का सांस तेज़ हो गया. उसके हाथ अपने आप ब्लैंकेट के अंदर सरक गए. पहले तो सिर्फ पेट पर रखे, फिर धीरे से नीचे… जाँघों के बीच.

जब उँगलियाँ उसकी पंतय के ऊपर पहुंची, तब उसे एहसास हुआ की वह आलरेडी गीली हो चुकी है. बहुत ज़्यादा.

**पारी** (दिल hi दिल में, शर्म से):

“अरे… यह क्या कर रही हूँ मैं? यह तो मेरा भाई है…”

पर हाथ रुक नहीं रहा था. उसकी उँगलियाँ पंतय के ऊपर hi हलके से रगड़ने लगी – बिलकुल वही जगह जहाँ से करंट सा दौड़ रहा था. सोच रही थी – अगर माणिक उसको ऐसे पकड़ता… अगर वह उसके ऊपर होता… अगर वह अंदर तक…

एक छोटी सी सिसकारी निकल गयी उसके मुँह से. उसने जल्दी से मुँह पिलो से दबा लिया.

शर्म से उसका चेहरा लाल हो गया. दिल zor-zor से धड़क रहा था. उसने सोचा – “बस… अब रुक जा… यह गलत है…”

पर आवाज़ें अभी भी सुनाई दे रही थी – आस्था की आखरी चीख, माणिक का गहरा मोअन… और फिर थोड़ी देर के लिए सन्नाटा.

पारी ने उँगलियाँ थोड़ी और अंदर सरकायी – पंतय के अंदर, सीधे उसकी गीली छूट पर. एक हल्का सा टच… और उसका पूरा बदन काँप उठा.

**पारी** (बिलकुल धीमी आवाज़ में, खुद से):

“भाई… तू इतना वाइल्ड कैसे हो गया…?”

उसने आँखें बंद कर ली और इमेजिन करना शुरू कर दिया – माणिक उसके कमरे में आता है… उसको बीएड पर धकेल देता है… उसकी टांगें फैलता है… और फिर…

उसके हाथ की हरकत तेज़ हो गयी. Chhoti-chhoti सांसें. शर्म और एक्ससिटेमेंट दोनों एक साथ बढ़ रहे थे.

पर तभी – कॉरिडोर से फूटस्टेप्स आये. कोई दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ हुई. उसे पता था ये उसकी अनु दीदी है.

पारी एकदम से हाथ निकाल कर ब्लैंकेट में छुप गयी. दिल zor-zor धड़क रहा था. चेहरा गरम, सांस फूली हुई.

वह सोच रही थी – “क्या मैं पागल हो गयी हूँ? यह तो गलत है… बिलकुल गलत…”

पर अंदर से एक छोटी सी आवाज़ आ रही थी – “पर इतना मज़ा… कभी पहले नहीं आया…”



वह पलट कर लेट गयी, पिलो को जकड लिया. नींद तो दूर की बात थी – अब सिर्फ वह ख्याल उसके दिमाग में घूम रहे थे… और उसकी बॉडी अभी भी गरम थी, बेचैन थी.
 
Part -38

मानिक सुबह जल्दी उठा, आस्था को विदा किया और कॉटेज से निकलकर वापस शहर की ओर चल पड़ा। रास्ते में, उसने तुरंत अपना फ़ोन उठाया और परि को मैसेज किया।

मानिक (मैसेज): "सबसे ज़रूरी मीटिंग है आज। तुरंत घर आओ। आज स्कूल मत जाना! तुम्हें पता है न, सारी 'ग्रुप स्टडी' की रिपोर्ट तुम्हें ही देनी है। घर पर मेरा इंतज़ार करना।"

परि, जो अभी नाश्ता कर रही थी, मैसेज पढ़कर ही उत्सुकता से भर उठी। उसे पता था कि मानिक ज़रूर कोई धमाकेदार बात लेकर आ रहा है। उसने तुरंत अनु दीदी और दिव्या से झूठ बोला कि उसे पेट दर्द है, और वह स्कूल नहीं जा पाएगी। दोनों के जाने के बाद, परि घर पर अकेली रह गई, बेचैनी से अपने भाई का इंतज़ार कर रही थी।

दोपहर होते-होते मानिक घर पहुँचा। वह थका हुआ था, पर उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक, संतुष्टि और जीत का भाव था।

परि, जो अब तक अपने उत्साह को रोक रही थी, मानिक के कमरे में दौड़कर गई। मानिक सीधा अपने बेड पर बैठा, और परि तुरंत उसके पास कसकर सटकर बैठ गई। मानिक ने सहजता से अपना हाथ परि के कंधे पर रखा और उसे अपनी तरफ़ खींच लिया।

परि: (उत्साह से, फुसफुसाते हुए) बताओ! बताओ! सब कुछ ठीक रहा? 'हथियारों का इस्तेमाल' हुआ या नहीं?

मानिक मुस्कुराया। उसने गहरी साँस ली, और आँखें बंद करके रात के सारे दृश्य याद करने लगा। उसका हाथ, जो परि के कंधे पर था, अब धीरे से उसकी नंगी बाँह पर फिसलने लगा।

मानिक: (आवाज़ धीमी, पर भारी) परि... जो कुछ भी हुआ... वह अविश्वसनीय था। तुमने मुझे जो आज़ादी दी, वह कमाल कर गई। आस्था... वह पूरी तरह से समर्पित थी।

मानिक अब यह भूल चुका था कि परि उसकी बहन है। वह अपनी सबसे अच्छी दोस्त और साथी से बात कर रहा था, जिसने उसे यह रास्ता दिखाया था। वह अपनी यादों में इतना खो गया था कि वह हर बात को खुलकर बताने लगा।

मानिक: सबसे पहले, हमारी 'सीमा' टूटी, और फिर रात को... हमने '69' किया। तुम सोच भी नहीं सकती कि जब आस्था... जब वह मेरे लंड को चूस रही थी, तो उस ठंडी रात में कैसी आग लगी थी। और जब मैं... जब मैं उसकी चूत को चाट रहा था... वह इतनी मीठी, इतनी गर्म था कि मैं पागल हो गया था!

परि का शरीर, जो मानिक से सटा हुआ था, अब तेज़ी से काँपने लगा। मानिक के हाथ का स्पर्श, और उसके मुँह से निकली हर उत्तेजक बात, सीधे परि के शरीर में उत्तेजना पैदा कर रही थी। उसकी साँसें तेज़ हो गईं और वह बिस्तर पर थोड़ा आगे की ओर खिसक गई, अनजाने में मानिक के और करीब आ गई।

मानिक: (आँखों में वासना और याद का मिश्रण) और सुबह तो... हमने एक नया खेल किया! वह क्रोइसैन वाला! आस्था ने जैम लगाकर क्रोइसैन का टुकड़ा... अपने निजी अंग पर रखा! और मैंने... मैंने उसे अपनी जीभ से चाटकर खाया! जब मैं उसकी चूत के बाहरी हिस्सों को चूम रहा था... उस पर क्रोइसैन की मिठास और उस जगह की गर्माहट... मैं तुम्हें बता नहीं सकता...

मानिक ने उत्साह में अपनी आँखें खोलीं और देखा कि परि का मुँह खुला हुआ था, और उसकी आँखें पूरी तरह से वासना और रोमांच से भरी हुई थीं। उसकी साँसों की गति मानिक से भी ज़्यादा तेज़ थी।

मानिक: (अब सीधे परि की आँखों में देखते हुए, उसकी उत्तेजित साँसों को महसूस करते हुए) और फिर हमने शावर में... खड़े-खड़े ही सेक्स किया। आस्था को बहुत मज़ा आया। मैंने उसे जोर से, दना-दन किया! मुझे लगता है कि मैंने अपने और तुम्हारे, दोनों के लिए... बदला ले लिया!

मानिक अपनी बात पूरी करते हुए, जोश में परि की बाँह पर कसकर दबाव डालता है। परि की आँखों में अब भाई-बहन का संकोच नहीं था, बल्कि एक गहरा यौन आकर्षण था, जो मानिक की इस खुली, बेबाक कहानी ने पैदा किया था। वह अंदर ही अंदर, मानिक के साथ आस्था की जगह खुद को कल्पना कर रही थी।

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मानिक की बेबाक कहानी ख़त्म होने के बाद, दोनों भाई-बहन कुछ देर तक उसी उत्तेजित अवस्था में रहे। मानिक का हाथ परि की बाँह पर था, और वे एक-दूसरे से कसकर जफ़ी) पाए हुए थे। कमरे में गहन चुप्पी थी, जिसे सिर्फ़ उनकी तेज़ साँसों की आवाज़ें तोड़ रही थीं।

परि, अपने भाई की बातों से पूरी तरह उत्सुकता और उत्तेजना के चरम पर थी। वह मानिक से अलग नहीं होना चाहती थी। मानिक के शरीर की गर्माहट, जो आस्था के शरीर की यादों से भरी थी, परि को एक अजीब सी राहत और रोमांच दे रही थी।

धीरे-धीरे, परि ने उस चुप्पी को तोड़ा।

परि: (बहुत धीमी, लगभग फुसफुसाती हुई आवाज़ में) भाई... मुझे यकीन नहीं हो रहा। तुम... तुमने सच में वह सब किया?

मानिक: (आँखें बंद किए हुए, संतुष्टि से) हाँ, परि। सब कुछ।

परि: (अब और उत्सुकता से) मुझे फिर से बताओ न... जब तुमने... जब तुमने आस्था के प्राइवेट पार्ट पर जैम लगा क्रोइसैन खाया, तो कैसा महसूस हुआ? उसकी त्वचा... वह गर्म थी?

परि ने मानिक के सीने पर और ज़ोर दिया, उसे अपनी ओर खींचते हुए, ताकि वह हर शब्द को ध्यान से सुन सके।

मानिक, जो अब अपनी बहन को अपना अंतरंग राज़दार मान चुका था, को यह जानकर मज़ा आया कि उसकी कहानी परि को कितना उत्तेजित कर रही है। उसने अपनी यादों को और vivid बनाने के लिए, आँखें बंद करके, उन यौन स्मृतियों को बार-बार दोहराया।

मानिक: (धीमी, कामुक आवाज़ में) हाँ... बहुत गर्म थी। क्रोइसैन और जैम की मिठास... और उसकी त्वचा की गंध... सब कुछ मिलकर इतना ज़बरदस्त था कि... मुझे लगा कि मैं अब खुद को रोक नहीं पाऊंगा। आस्था ने भी... (वह हँसा) ...बहुत आहें भरीं।

परि: (उसकी हर बात को ध्यान से सुनती हुई) और शावर में... जब तुमने उसे खड़े-खड़े... जोर से किया... तब वह कैसी आवाज़ें निकाल रही थी? और पानी... पानी की बूँदें...

परि जानबूझकर उन उत्तेजक क्षणों को दोहराने के लिए कह रही थी, क्योंकि हर बार मानिक जब उन क्षणों का वर्णन करता था, तो मानिक का शरीर तनावग्रस्त हो जाता था, और वह खुद भी गहराई से उत्तेजित हो जाती थी।

मानिक भी अब उस क्षण का मज़ा ले रहा था, जहाँ उसकी सबसे करीबी रिश्तेदार, उसकी बहन, उसकी कामुक उपलब्धियों की गवाह बन रही थी।

मानिक: (अब सीधे परि की आँखों में देखते हुए, अपने हाथ से परि की बाँह को सहलाते हुए) वह सिर्फ़ 'आह' नहीं... वह 'चीख़' रही थी। उसे लगा जैसे मैं उसे दीवार में धँसा दूँगा। उस गर्म पानी के नीचे... वह हमारे प्यार का सबसे तूफ़ानी पल था।

परि ने एक गहरी, तृप्ति भरी साँस ली। उनके बीच का आलिंगन और भी कस गया। इस समय, उनके बीच भाई-बहन का रिश्ता नहीं, बल्कि दो युवा थे जो एक-दूसरे की यौन ऊर्जा और रोमांच को साझा कर रहे थे।

परि को अपनी उत्तेजना महसूस हो रही थी, लेकिन वह इस बात से संतुष्ट थी कि उसके भाई को अब सकारात्मक और स्वस्थ रास्ता मिल गया है, भले ही उसकी ख़ुशी उसे खुद ही उत्तेजित कर रही थी।



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Part-39

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माणिक और पारी एक दुसरे को तिघ्टलय हुग किये बीएड पे बैठे थे. पिछले कुछ मिनट्स की गहरी और बेबाक बातचीत ने उन दोनों को ऐसी इमोशनल और फिजिकल स्टेट में ला दिया था, जिसकी उन्होंने कभी सोची भी नहीं थी.

पारी अभी भी माणिक की बाहों में थी, और वह अभी भी अपने भाई के कंधे से सर नहीं हटा पा रही थी. माणिक का हाथ अभी भी उसकी कमर के पास टिका हुआ था, और दोनों की सांसें अभी भी थोड़ी तेज़ थी.

सडनली दोनों को एक दुसरे की क्लोसनेस्स और उस उनकंफर्टबले एक्ससिटेमेंट का एहसास हुआ, जो उन्होंने शेयर किया था.

माणिक: (बोहोत धीमी, ऑलमोस्ट व्हिस्पर में) पारी… तुम… तुम अभी भी इतनी…

पारी: (बीच में टोकते हुए, घबराहट और शर्म का मिक्स) हाँ… मुझे पता है. मुझे पता है, भाई. मैं… मैं समझ नहीं पा रही की हम इतने एक्ससिटेड कैसे हो गए? यह तो सिर्फ एक स्टोरी थी न.

दोनों की आँखों में अब एक कॉमन सवाल था: bhai-behen होने के बावजूद, यह ‘फोर्बिडन’ क्लोसनेस्स उन्हें इतना ज़्यादा एक्साइट क्यों कर रही थी?

माणिक को अपनी गर्लफ्रेंड आस्था के साथ बिताये मोमेंट्स याद आ रहे थे, और उन्हें याद करने का एक्ससिटेमेंट उससे थोड़ा डिस्ट्रक्ट कर रहा था. लेकिन पारी की रिएक्शन, उसका बार बार सेक्सुअल डिटेल्स पूछना, और उसका बॉडी कांपना — यह सब प्रोवे कर रहा था की उनके बीच एक ुणस्पोकेन, अननोन अट्रैक्शन अभी भी था, जो आस्था के आने के बाद भी कम्प्लीटली ख़तम नहीं हुआ.

माणिक: (थोड़ा हकलाते हुए) मुझे नहीं पता. शायद… क्युकी तुम मेरी सबसे अच्छी दोस्त हो, और मैं तुमसे इतना ओपनली बात कर रहा था… शायद इसलिए.

पारी: (खुद को जस्टिफाई करते हुए) हाँ, शायद. या शायद… (वह बात पूरी नहीं कर पायी).

दोनों शॉकेड थे और इस क्लोसनेस्स के कोंसेकुएंसेस से डर भी रहे थे, फिर भी वह एक दुसरे से अलग नहीं हुए. माणिक के हाथ का टच और पारी का अपने भाई के सीने से चिपके रहना — यह उन्हें एक वीयर्ड सेफ्टी और साथ hi बेकाबू थ्रिल दे रहा था. उनका बॉडी इस ुणस्पोकेन, फोर्बिडन अट्रैक्शन में पीस ढूंढ रहा था.

दोनों जानते थे की उन्हें इस हुग को तोडना पड़ेगा, इस इंटिमेट मोमेंट को ख़तम करना पड़ेगा, ताकि उनके रिश्ते की बाउंड्री बानी रहे. लेकिन इस थ्रिलिंग जर्नी के लास्ट स्टेज पे उनकी विलपॉवर कमज़ोर पद रही थी. वह बस वही फ्रीज हो गए थे, जहां उनकी हसी, उनकी ख़ुशी और उनकी एक्ससिटेमेंट का राज़ दफन था.

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आनंद और अनीता के उस हफ्ते भर के स्टे के बाद, आनंद और सविता का milna-julna फिर से शुरू हो गया था. अब जब भी दोनों अकेला होते, आनंद jaan-bujhkar हमेशा सिर्फ अनीता की hi बातें करता. वह डिटेल में बताता — अनीता कितनी हॉर्नी है, उसे सेक्स में कितना मज़ा आया, और वह हर तरह के लिए रेडी थी.

सविता, जो पहले से hi आनंद की स्टोरीज सुनके गरम हो जाती थी, अब उससे अवॉयड करने की कोशिश करती. वह टॉपिक चेंज करने की तरय करती या बस चुप हो जाती. लेकिन आनंद अपनी बात पूरी करके hi मानता — हर बार अनीता की तारीफ और अपनी सेक्सुअल विंस का बयान करता.

एक हफ्ते तक यही चलता रहा. आनंद की बातें सुनके सविता का चेहरा लाल हो जाता, और उसके चेहरे पे एक्ससिटेमेंट (अरौसल) और जेएलओसी का मिक्स साफ़ दीखता. उसके होंठ कास जाते, आँखों में गुस्सा भी क्लियर दीखता — की आनंद jaan-bujhkar उससे तड़पा रहा है.

एक दिन, जब आनंद फिर से अनीता के ‘ज़ोर दार कोऑपरेशन’ की स्टोरी सुना रहा था, सविता का सब्र टूट गया.

सविता: (सच्ची आवाज़ में, गुस्से और थकावट के साथ) बस! बहुत हो गया, आनंद!

आनंद एकदम चुप हो गया.

सविता: (उठकर कड़ी होते हुए) जब हम दोनों अकेला होते हैं, तो सिर्फ हम दोनों की बात करो न, सर! मुझे आपकी और अनीता की कहानियां नहीं सुन्नी!

आनंद ने सविता की आँखों में देखा. उसकी फ़्रस्ट्रेशन और गुस्सा उसके लिए जैसे जीत था. आनंद मन hi मन मुस्कुरा दिया. उसे पता था की यह औरतें एक दुसरे से कितनी जलती हैं, ेस्पेशलय जब बात सेक्स की एनर्जी की आती है. सविता की यह रिएक्शन एक्साक्ट्ली वही थी जो वह चाहता था.

लेकिन आनंद ने उसे शांत करने की बजाये, jaan-bujhkar और भड़काने का प्लान बनाया.

आनंद: (रिलैक्स्ड लेकिन तैसिंग टोन में) देखो सविता… मैं उसकी बात क्यों न करून? इतनी उम्र के बाद भी उसकी सेक्सुअल एनर्जी नेक्स्ट लेवल है. तुम्हे पता है न मैंने बताया था… उसकी छूट अभी भी एकदम टाइट है. उसने खुद को बोहोत मेन्टेन किया है.

जैसे hi सविता ने यह सुना, अंदर की साड़ी जेएलओसी और डिजायर एक साथ भड़क उठी. उसका गुस्सा अब इंटेंस सेक्सुअल चैलेंज में बदल गया. वह जल्दी से आनंद के पास आयी.

सविता: (ऑलमोस्ट कांपते हुए, सांसें तेज़) अनीता की तिघटनेस से hi कपड़े करोगे हमेशा?

इससे पहले की आनंद कुछ और बोल पाटा, सविता ने अपने लिप्स उसके लिप्स पे रख दिए. यह किश नहीं था, बल्कि एक पावरफुल, चल्लेंजिंग कांटेक्ट था.

सविता ने थोड़ा पीछे हटी, लेकिन आँखें सीधा आनंद की आँखों में.

सविता: (बोहोत सेडक्टिव और कॉंफिडेंट वौइस् में, चैलेंज देते हुए) आपने मेरी छूट देखि है कभी?

सविता ने सवाल पूरा नहीं किया, एक सेकंड रुक गयी और फिर फुल कॉन्फिडेंस से बोली:

सविता: उससे भी ज़्यादा टाइट है! और मैं आपको अभी दिखा सकती हूँ की रियल तिघटनेस और रियल आग क्या होती है!

सविता ने आनंद के चेहरे से हाथ हटाया और उसकी पंत की ज़िप पे अपनी उंगलियां रख दी — कम्प्लीटली रेडी की अब वह आनंद को अनीता को भूलने पे मजबूर कर देगी.


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**Part -40**



सविता का गुस्सा और जलन अब पीक पे पहुँच चुके थे. आनंद की बातें सुनके उसने और वेट नहीं किया. गुस्से और कामुकता के फुल मिक्स में उसने जल्दी से अपने और आनंद के कपडे उतार दिए. कुछ hi सेकण्ड्स में दोनों प्राइवेट ऑफिस अपार्टमेंट के सोफे के सामने बिलकुल नंगे खड़े थे.

आनंद थोड़ा शॉकेड था की सविता ने जगह की परवाह किये बिना ऑफिस में hi यह सब शुरू कर दिया. लेकिन उसकी तिघटनेस की चैलेंज और उसकी out-of-control एक्ससिटेमेंट ने आनंद के दिमाग उदा दिए थे.

सविता ने बिना किसी हेसिताशन के आनंद का हाथ पकड़ा और ज़ोर से अपनी छूट पे रख दिया. उसकी छूट पूरी तरह गीली और गरम थी.

सविता: (आँखों में फुल चैलेंज) देखो आनंद! टच करके देखो! कितनी टाइट है मेरी छूट! अब भी तुम्हे अनीता की तिघटनेस का लेक्चर देना है?

आनंद ने सविता के हाथ के नीचे उसकी छूट को सहलाना शुरू किया. टच इतना हॉट था की उससे फील हुआ की वाल्स सच में बोहोत कासी हुई हैं.

आनंद: (एक्ससिटेड टोन में) हाथ फेरने से तो सच में टाइट लग रही है सविता! यह तो maan'na पड़ेगा.

आनंद ने मुस्कुराते हुए एक ऊँगली अंदर दाल दी. ऊँगली जाते hi सविता ने हलकी सी आह भरी.

आनंद: (तैसिंग स्माइल के साथ) पर सविता… इसकी रियल तिघटनेस तो चुदाई करके hi पता चलेगी न? और तुम तो वह करने नहीं डौगी, है न?

आनंद को पता था अब वह जेएलओसी से फुल भरी पड़ी है और एक्ससिटेमेंट भी उसपे छ गया है. उसकी पहली बातें, उसका ोपेन्नेस्स और तिघटनेस चैलेंज — सब कुछ अब फाइनल रिजल्ट मांग रहा था.

सविता ने आँखें बंद की. उसने एक सेकंड भी वास्ते नहीं किया.

सविता: (गहरी सांस लेके, तुरंत) अभी छोड़ो मुझे! मुझे पता है मैं उससे ज़्यादा टाइट हूँ! मुझे प्रोवे करना है!

आनंद को और क्या चाहिए था? यह तो उसके लिए जैकपोट था.

आनंद ने सविता को धीरे से नेअर्बी ऑफिस काउच पे लिटाया. सविता की टाँगे उठायी और बिना टाइम वास्ते किये अपना हार्ड लुंड उसकी कासी हुई छूट में दाल दिया.

वह मिशनरी स्टाइल में उससे छोड़ा जा रहा था. सविता ने काउच के एज को ज़ोर से पकड़ लिया. इस बार आनंद ने फुल पावर, फुल पैशन और फुल स्पीड उसे किया.

ऑफिस काउच पे आनंद और सविता अपने पैशन के एक्सट्रीम पे थे. आनंद ने सविता की चैलेंज एक्सेप्ट कर ली थी और वह प्रोवे करना चाहता था की उसकी सेक्सुअल पावर किसी से काम नहीं.

आनंद जानता था सविता सिर्फ फिजिकल सटिस्फैक्शन नहीं चाहती, बल्कि वह अनीता से अपनी सुपरिवृत्य प्रोवे करना चाहती है. इसलिए उसने स्पीड और अग्रेशन को नेक्स्ट लेवल पे ले गया. सविता पूरी तरह आनंद के नीचे सरेंडर थी, उसकी आँखों में अब जलन की जगह सिर्फ इंटेंस लस्ट थी.

आनंद ने सविता की दोनों टाँगे अपने कन्धों पे तिघ्टलय उठा ली, जिससे एंट्री पॉइंट कम्प्लीटली ओपन हो गया. उसने zor-zor के पावरफुल और फ़ास्ट थ्रुस्तस मारे उसकी टाइट छूट में.

आनंद: (हैवी ब्रीथिंग के साथ) बताओ सविता! फील कर रही हो? यह अनीता से ज़्यादा टाइट है न?

सविता ने जवाब देने की बजाये एक गहरी चीख भरी, उसके मुँह से सिर्फ आनंद की तारीफ में मोअन्स निकल रहे थे.

चुदाई की स्पीड मेन्टेन रखते हुए आनंद ने दोनों हाथ सविता के बूब्स पे रखे. उसने दोनों हाथों से उन गोल उभारों को मर्सिलेस्स्ली मसला. इतना ज़ोर से दबा रहा था की सविता पैन और प्लेअसुरे के मिक्स से zor-zor से कराह रही थी.

सविता: (darde-maza के मिक्स में) उफ्फ्फ्फ़! आनंद… हाँ! ज़ोर से!

सविता को कम्प्लीटली out-of-control करने के लिए आनंद ने अपना मुँह उसके मुँह पे लगा दिया. यह प्यार वाला किश नहीं था — आनंद ने उसके लिप्स को ब्रुटली चूसना शुरू कर दिया. अपनी जीभ को zor-zor से अंदर घुमा रहा था, हर कार्नर टच कर रहा था. यह वाइल्ड किश और चुदाई एक साथ चल रही थी, जिससे सविता का दिमाग पूरा नम्ब हो गया था.

आनंद ने स्पीड और तेज़ कर दी. सविता बूब्स पे ज़ोर दार टच और छूट में इंटेंस थ्रुस्तस दोनों एक साथ फील कर रही थी.

सविता: (आँखें बंद करके चीखते हुए) आनंद! मैं… मैं अब और नहीं सेह सकती! हाँ! मुझे चाहिए!

आनंद ने स्पीड और बढ़ा दी, थ्रुस्तस इतने फ़ास्ट थे की सोफे हिल रहा था. कुछ hi मोमेंट्स में दोनों एक साथ क्लाइमेक्स पे पहुँच गए. आनंद ने साड़ी पावर और छुम सविता की गहराई में दाल दिया, और सविता ने उससे तिघ्टलय पकड़ रखा, लिप्स चूसते हुए.

दोनों हाँफते हुए एक दुसरे पे पड़े रहे. सविता ने आंसुओं भरी आँखों से आनंद को देखा. आज उसने सिर्फ अनीता को नहीं, बल्कि खुद को भी प्रोवे कर दिया था की वह एक्सट्रीम सेक्सुअल प्लेअसुरे दे भी सकती है और ले भी सकती है.

सविता को आज फील हो रहा था की आनंद का मरदाना पैन उसके हस्बैंड विनोद से कहीं ज़्यादा पावरफुल है. आनंद की स्पीड, उसका जोश, और उसकी बेबाक लस्ट — यह सब उससे वह अल्टीमेट प्लेअसुरे दे रहा था जो विनोद से कभी नहीं मिला.

काउच पे उनकी वाइल्ड सेशन फुल zor-shor से चल रही थी और दोनों इस अनएक्सपेक्टेड और पैशनेट राउंड का फुल मज़ा ले रहे थे.

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दिव्या अपने मब्ब्स क्लास में एक ब्रिलियंट स्टूडेंट थी. वह दिल hi दिल में अपने बातचमते रोहन को बोहोत लिखे करती थी. रोहन भी स्टडीज में टोपर था और उसका कलम, फोकस्ड नेचर दिव्या को बोहोत पसंद था. दिव्या की फीलिंग्स सिर्फ दिल तक लिमिटेड थी — उसने कभी भी लिमिट्स क्रॉस नहीं किये और हमेशा डेन्ट और कंट्रोल्ड रहती थी.

उसे बिलकुल भी आईडिया नहीं था की घर पे उसके पापा (आनंद) और भाई (माणिक) क्या क्या कर रहे हैं (मतलब सेक्सुअल रिलेशन्स बना रहे हैं या बना चुके हैं). उसे यह भी नहीं पता था की उसकी बड़ी बेहेन पारी कितना एडवांस हो चुकी है और माणिक के साथ कितनी ओपनली इंटिमेट बातें करती है. दिव्या अपनी सिंपल, इनोसेंट दुनिया में बिजी थी जहां अभी सिर्फ एनाटोमी और रोहन की स्माइल मटर करती थी.

आज लंच ब्रेक में दिव्या लाइब्रेरी में रोहन के पास बैठी थी. रोहन टेबल पे बुक्स फैला के किसी टफ टॉपिक में फुल्ली िम्मेरसेद था. दिव्या चुपके से उससे देखती रही. उसके दिल में एक छोटी सी विश थी की उससे थोड़ी देर के लिए पढाई से दूर ले जाए.

दिव्या: (बोहोत धीमी और शाय वौइस् में) रोहन? सुनो…

रोहन ने बिना सर उठाये, बुक से hi जवाब दिया.

रोहन: हाँ दिव्या. बोलो.

दिव्या: (हिम्मत जुटाके) लंच ब्रेक हो गया है. क्या तुम कैंटीन चलोगे? मैंने सोचा आज हम साथ में कुछ खा लेंगे.

रोहन ने पेंसिल रोकी, एक गहरी सांस ली और फिर पॉलिटेली बोलै.

रोहन: (बुक पे फोकस रखते हुए) थैंक्स दिव्या. पर मुझे अभी यह कार्डियोलॉजी chapter कम्पलीट करना है. यह बोहोत इम्पोर्टेन्ट है और मैं इससे बीच में नहीं छोड़ सकता. लगता है आज नहीं जा पाउँगा. तुम चली जाओ.

दिव्या के चेहरे पे थोड़ी सी डिसअप्पोइन्त्मेन्त आयी, पर उसने तुरंत छुपा ली. वह रोहन की डेडिकेशन की रेस्पेक्ट करती थी.

दिव्या: (मुस्कुराने की कोशिश करते हुए) Okay रोहन. No प्रॉब्लम. मैं थोड़ी देर में आती हूँ.

दिव्या उठी, उसके दिल में रोहन के लिए प्यार और हलकी सी उदासी का मिक्स था. वह कैंटीन की तरफ चल पड़ी, यह सोचके भी नहीं की उसका भाई इस वक़्त कहीं और कितनी ‘डीप स्टडी’ कर रहा होगा.



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**Part -40**



सविता का गुस्सा और जलन अब पीक पे पहुँच चुके थे. आनंद की बातें सुनके उसने और वेट नहीं किया. गुस्से और कामुकता के फुल मिक्स में उसने जल्दी से अपने और आनंद के कपडे उतार दिए. कुछ hi सेकण्ड्स में दोनों प्राइवेट ऑफिस अपार्टमेंट के सोफे के सामने बिलकुल नंगे खड़े थे.

आनंद थोड़ा शॉकेड था की सविता ने जगह की परवाह किये बिना ऑफिस में hi यह सब शुरू कर दिया. लेकिन उसकी तिघटनेस की चैलेंज और उसकी out-of-control एक्ससिटेमेंट ने आनंद के दिमाग उदा दिए थे.

सविता ने बिना किसी हेसिताशन के आनंद का हाथ पकड़ा और ज़ोर से अपनी छूट पे रख दिया. उसकी छूट पूरी तरह गीली और गरम थी.

सविता: (आँखों में फुल चैलेंज) देखो आनंद! टच करके देखो! कितनी टाइट है मेरी छूट! अब भी तुम्हे अनीता की तिघटनेस का लेक्चर देना है?

आनंद ने सविता के हाथ के नीचे उसकी छूट को सहलाना शुरू किया. टच इतना हॉट था की उससे फील हुआ की वाल्स सच में बोहोत कासी हुई हैं.

आनंद: (एक्ससिटेड टोन में) हाथ फेरने से तो सच में टाइट लग रही है सविता! यह तो maan'na पड़ेगा.

आनंद ने मुस्कुराते हुए एक ऊँगली अंदर दाल दी. ऊँगली जाते hi सविता ने हलकी सी आह भरी.

आनंद: (तैसिंग स्माइल के साथ) पर सविता… इसकी रियल तिघटनेस तो चुदाई करके hi पता चलेगी न? और तुम तो वह करने नहीं डौगी, है न?

आनंद को पता था अब वह जेएलओसी से फुल भरी पड़ी है और एक्ससिटेमेंट भी उसपे छ गया है. उसकी पहली बातें, उसका ोपेन्नेस्स और तिघटनेस चैलेंज — सब कुछ अब फाइनल रिजल्ट मांग रहा था.

सविता ने आँखें बंद की. उसने एक सेकंड भी वास्ते नहीं किया.

सविता: (गहरी सांस लेके, तुरंत) अभी छोड़ो मुझे! मुझे पता है मैं उससे ज़्यादा टाइट हूँ! मुझे प्रोवे करना है!

आनंद को और क्या चाहिए था? यह तो उसके लिए जैकपोट था.

आनंद ने सविता को धीरे से नेअर्बी ऑफिस काउच पे लिटाया. सविता की टाँगे उठायी और बिना टाइम वास्ते किये अपना हार्ड लुंड उसकी कासी हुई छूट में दाल दिया.

वह मिशनरी स्टाइल में उससे छोड़ा जा रहा था. सविता ने काउच के एज को ज़ोर से पकड़ लिया. इस बार आनंद ने फुल पावर, फुल पैशन और फुल स्पीड उसे किया.

ऑफिस काउच पे आनंद और सविता अपने पैशन के एक्सट्रीम पे थे. आनंद ने सविता की चैलेंज एक्सेप्ट कर ली थी और वह प्रोवे करना चाहता था की उसकी सेक्सुअल पावर किसी से काम नहीं.

आनंद जानता था सविता सिर्फ फिजिकल सटिस्फैक्शन नहीं चाहती, बल्कि वह अनीता से अपनी सुपरिवृत्य प्रोवे करना चाहती है. इसलिए उसने स्पीड और अग्रेशन को नेक्स्ट लेवल पे ले गया. सविता पूरी तरह आनंद के नीचे सरेंडर थी, उसकी आँखों में अब जलन की जगह सिर्फ इंटेंस लस्ट थी.

आनंद ने सविता की दोनों टाँगे अपने कन्धों पे तिघ्टलय उठा ली, जिससे एंट्री पॉइंट कम्प्लीटली ओपन हो गया. उसने zor-zor के पावरफुल और फ़ास्ट थ्रुस्तस मारे उसकी टाइट छूट में.

आनंद: (हैवी ब्रीथिंग के साथ) बताओ सविता! फील कर रही हो? यह अनीता से ज़्यादा टाइट है न?

सविता ने जवाब देने की बजाये एक गहरी चीख भरी, उसके मुँह से सिर्फ आनंद की तारीफ में मोअन्स निकल रहे थे.

चुदाई की स्पीड मेन्टेन रखते हुए आनंद ने दोनों हाथ सविता के बूब्स पे रखे. उसने दोनों हाथों से उन गोल उभारों को मर्सिलेस्स्ली मसला. इतना ज़ोर से दबा रहा था की सविता पैन और प्लेअसुरे के मिक्स से zor-zor से कराह रही थी.

सविता: (darde-maza के मिक्स में) उफ्फ्फ्फ़! आनंद… हाँ! ज़ोर से!

सविता को कम्प्लीटली out-of-control करने के लिए आनंद ने अपना मुँह उसके मुँह पे लगा दिया. यह प्यार वाला किश नहीं था — आनंद ने उसके लिप्स को ब्रुटली चूसना शुरू कर दिया. अपनी जीभ को zor-zor से अंदर घुमा रहा था, हर कार्नर टच कर रहा था. यह वाइल्ड किश और चुदाई एक साथ चल रही थी, जिससे सविता का दिमाग पूरा नम्ब हो गया था.

आनंद ने स्पीड और तेज़ कर दी. सविता बूब्स पे ज़ोर दार टच और छूट में इंटेंस थ्रुस्तस दोनों एक साथ फील कर रही थी.

सविता: (आँखें बंद करके चीखते हुए) आनंद! मैं… मैं अब और नहीं सेह सकती! हाँ! मुझे चाहिए!

आनंद ने स्पीड और बढ़ा दी, थ्रुस्तस इतने फ़ास्ट थे की सोफे हिल रहा था. कुछ hi मोमेंट्स में दोनों एक साथ क्लाइमेक्स पे पहुँच गए. आनंद ने साड़ी पावर और छुम सविता की गहराई में दाल दिया, और सविता ने उससे तिघ्टलय पकड़ रखा, लिप्स चूसते हुए.

दोनों हाँफते हुए एक दुसरे पे पड़े रहे. सविता ने आंसुओं भरी आँखों से आनंद को देखा. आज उसने सिर्फ अनीता को नहीं, बल्कि खुद को भी प्रोवे कर दिया था की वह एक्सट्रीम सेक्सुअल प्लेअसुरे दे भी सकती है और ले भी सकती है.

सविता को आज फील हो रहा था की आनंद का मरदाना पैन उसके हस्बैंड विनोद से कहीं ज़्यादा पावरफुल है. आनंद की स्पीड, उसका जोश, और उसकी बेबाक लस्ट — यह सब उससे वह अल्टीमेट प्लेअसुरे दे रहा था जो विनोद से कभी नहीं मिला.

काउच पे उनकी वाइल्ड सेशन फुल zor-shor से चल रही थी और दोनों इस अनएक्सपेक्टेड और पैशनेट राउंड का फुल मज़ा ले रहे थे.

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दिव्या अपने मब्ब्स क्लास में एक ब्रिलियंट स्टूडेंट थी. वह दिल hi दिल में अपने बातचमते रोहन को बोहोत लिखे करती थी. रोहन भी स्टडीज में टोपर था और उसका कलम, फोकस्ड नेचर दिव्या को बोहोत पसंद था. दिव्या की फीलिंग्स सिर्फ दिल तक लिमिटेड थी — उसने कभी भी लिमिट्स क्रॉस नहीं किये और हमेशा डेन्ट और कंट्रोल्ड रहती थी.

उसे बिलकुल भी आईडिया नहीं था की घर पे उसके पापा (आनंद) और भाई (माणिक) क्या क्या कर रहे हैं (मतलब सेक्सुअल रिलेशन्स बना रहे हैं या बना चुके हैं). उसे यह भी नहीं पता था की उसकी बड़ी बेहेन पारी कितना एडवांस हो चुकी है और माणिक के साथ कितनी ओपनली इंटिमेट बातें करती है. दिव्या अपनी सिंपल, इनोसेंट दुनिया में बिजी थी जहां अभी सिर्फ एनाटोमी और रोहन की स्माइल मटर करती थी.

आज लंच ब्रेक में दिव्या लाइब्रेरी में रोहन के पास बैठी थी. रोहन टेबल पे बुक्स फैला के किसी टफ टॉपिक में फुल्ली िम्मेरसेद था. दिव्या चुपके से उससे देखती रही. उसके दिल में एक छोटी सी विश थी की उससे थोड़ी देर के लिए पढाई से दूर ले जाए.

दिव्या: (बोहोत धीमी और शाय वौइस् में) रोहन? सुनो…

रोहन ने बिना सर उठाये, बुक से hi जवाब दिया.

रोहन: हाँ दिव्या. बोलो.

दिव्या: (हिम्मत जुटाके) लंच ब्रेक हो गया है. क्या तुम कैंटीन चलोगे? मैंने सोचा आज हम साथ में कुछ खा लेंगे.

रोहन ने पेंसिल रोकी, एक गहरी सांस ली और फिर पॉलिटेली बोलै.

रोहन: (बुक पे फोकस रखते हुए) थैंक्स दिव्या. पर मुझे अभी यह कार्डियोलॉजी chapter कम्पलीट करना है. यह बोहोत इम्पोर्टेन्ट है और मैं इससे बीच में नहीं छोड़ सकता. लगता है आज नहीं जा पाउँगा. तुम चली जाओ.

दिव्या के चेहरे पे थोड़ी सी डिसअप्पोइन्त्मेन्त आयी, पर उसने तुरंत छुपा ली. वह रोहन की डेडिकेशन की रेस्पेक्ट करती थी.

दिव्या: (मुस्कुराने की कोशिश करते हुए) Okay रोहन. No प्रॉब्लम. मैं थोड़ी देर में आती हूँ.

दिव्या उठी, उसके दिल में रोहन के लिए प्यार और हलकी सी उदासी का मिक्स था. वह कैंटीन की तरफ चल पड़ी, यह सोचके भी नहीं की उसका भाई इस वक़्त कहीं और कितनी ‘डीप स्टडी’ कर रहा होगा.



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Part -41



दिव्या लंच ब्रेक में अकेली कैंटीन से वापस आयी. उसका मूड थोड़ा ऑफ था. रोहन की फोकस और डेडिकेशन उसे पसंद थी, लेकिन kabhi-kabhi वह चाहती थी की वह उसके लिए भी थोड़ा टाइम निकाले.

शाम को जब दिव्या कॉलेज से घर पहुंची, तोह घर का सन बिलकुल नार्मल लग रहा था. अनु दी फ़ोन पे बात कर रही थी और पारी अपने रूम में थी. दिव्या को घर के अंदर चल रहे किसी भी सीक्रेट स्टॉर्म का बिलकुल भी पता नहीं था. उसे यह भी नहीं मालूम था की माणिक की कोई गर्लफ्रेंड बन चुकी है या पारी अब माणिक की सीक्रेट इंटिमेट पार्टनर बन गयी है.

दिव्या ने बैग साइड में रखा और सीधा पारी के रूम की तरफ चली गयी.

दिव्या: (दूर खोलते हुए, थोड़ी इर्रिटेशन और डिसअप्पोइन्त्मेन्त के साथ) क्या कर रही हो मिस? आज स्कूल क्यों नहीं गयी?

पारी जो बीएड पे लेती फ़ोन में स्क्रॉल कर रही थी, थोड़ी सी घबरा गयी. उसका मंद अभी भी माणिक की स्टोरीज और उस ुणस्पोकेन अल्हड में था.

पारी: (जल्दी से नार्मल बनने की कोशिश करते हुए) अरे दी! हाँ… बस थोड़ी तबियत ठीक नहीं थी. आज तोह बस रेस्ट किया. तू इतनी khizzi-khizzi क्यों लग रही है?

दिव्या: (शोल्डर शृंग करते हुए, ताश में) मैं खिज़्ज़ी क्यों लग रही हूँ? बताऊँ क्या! कॉलेज में सब पागल हैं. कोई काम नहीं करता, बस बुक्स!

दिव्या सोफे पे बैठ गयी और अपनी फ़्रस्ट्रेशन निकालने लगी. वह रोहन के बारे में ओपनली नहीं बोल रही थी क्यूंकि उसके फीलिंग्स उसके लिए बहुत पर्सनल थे. बस जनरल गुस्सा निकाल रही थी.

पारी: (जो खुद एक्ससिटेमेंट से भरी हुई थी, अब ज्ञान देने के मूड में) दी! रिलैक्स करो. तू भी तोह हर वक़्त पढ़ती रहती है. इतना गुस्सा आ रहा है तोह ब्रेक ले! लाइफ में सिर्फ पढाई नहीं होती, थोड़ी मस्ती भी ज़रूरी है.

दिव्या: (डिसागरी करते हुए) मस्ती? मुझे मस्ती का कोई मूड नहीं है! मुझे बस अपने काम से मतलब है. और वैसे भी, मुझे समझ नहीं आ रहा तू और माणिक भाई आज इतने शांत क्यों हो. कुछ चल रहा है क्या?

पारी: (झट से) कुछ नहीं चल रहा! तुझे हर चीज़ में 'चल रहा है' क्यों दीखता है? तू समझ क्यों नहीं लेती की लाइफ में थोड़ा थ्रिल भी ज़रूरी होता है?

पारी की आवाज़ में अचानक आयी वह वीयर्ड एनर्जी दिव्या को चुभ गयी. उसे नहीं पता था पारी को यह साड़ी एनर्जी कहाँ से मिल रही है, लेकिन उसकी बातों में उसे चिलदिश लगा.

दिव्या: (गुस्से से) मुझे कोई थ्रिल नहीं चाहिए! मुझे बस अपनी डिग्री चाहिए. तू और भाई मुझे ज्ञान मत दो!

दिव्या गुस्से में रूम से बहार निकल गयी, अपने आप में भड़भड़ाते हुए. वह अपनी सिंपल दुनिया और अपने मैं की डब्बी हुई देसिरेस के बीच फँसी हुई थी, और उसे बिलकुल आईडिया नहीं था की जिस 'थ्रिल' की बात उसकी बेहेन कर रही थी, वह उन्ही के घर की चार दीवारी में फुल स्पीड से चल रहा था.

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माणिक और आस्था हिल स्टेशन से वापस आये दो दिन हो गए थे. अब स्टडी ब्रेक ख़तम होने के बाद यह उनका पहला प्रॉपर मिलना था. दोनों एक दुसरे के बॉडी, देसिरेस और इंटिमेसी को अब पूरी तरह जान चुके थे. अब उनके बीच कोई शर्म या हेसिताशन नहीं बचा था. दोनों के मुँह को खून लग चूका था – मतलब अब फुल वाइल्ड मोड ों था.

घर पे प्राइवेसी मिलना मुश्किल था, इसलिए आस्था ने स्मार्ट मूव किया और अपने एक डिस्टेंट फ्रेंड के एम्प्टी अपार्टमेंट की कीस ले ली थी. आज दोनों वही मिलने वाले थे.

शाम को माणिक चुपके से पारी को बताये बिना उस अपार्टमेंट पहुँच गया. आस्था पहले से वहां वेट कर रही थी.

जैसे hi माणिक अंदर आया, आस्था ने दूर लॉक किया और तुरंत उसको अपनी बाहों में भर लिया. यह हुग सिर्फ मिलने की ख़ुशी का नहीं था – यह पुरे लस्ट और बेचैनी से भरा था.

आस्था: (उसके कान में व्हिस्पर करते हुए) ी मिस्ड यू सो मच, का साहिब. मुझे लगा मैं तुझे अपने बॉडी से दूर नहीं रख पाऊँगी.

माणिक: (उसे कास कर पकड़ते हुए) मैं भी, मेरी स्टारगेज़र. मेरा दिमाग तोह बस तेरी यादों में hi खोया हुआ था.

दोनों एक दुसरे को पकड़ कर सोफे की तरफ बढे. कपडे उतरने में अब कोई टाइम वास्ते नहीं. कुछ hi सेकण्ड्स में दोनों कम्प्लीटली नेकेड थे और एक दुसरे के ऊपर.

माणिक ने आस्था को सोफे पे लिटाया. कोई फोरप्ले नहीं – सीधा अपनी वाइल्ड डिजायर दिखाई. उसने आस्था के दोनों पेअर अपने शोल्डर्स पे रख दिए.

माणिक: (डीप वौइस् में) अब कोई रूल्स नहीं! मैं तुझे वैसा hi चाहता हूँ जैसा मैंने याद किया था – पूरी तरह मेरी!

माणिक ने अपना लुंड आस्था की छूट में ज़ोर से घुसा दिया. आस्था ने एक लम्बी सटिस्फीएड चीख मारी.

आस्था: (उसके नेल्स से उसकी पीठ खरोंचते हुए) यस! मुझे तेरी यह अग्रेशन बहुत पसंद है!

माणिक ने इस इंटेंस पोजीशन (सोफे पे लेती हुई, पेअर शोल्डर्स पे) में फुल ज़ोर के धक्के मरने शुरू कर दिए. इस एंगल में एंट्री बहुत डीप और पावरफुल था, आस्था पूरी तरह माणिक के कण्ट्रोल में थी.

एक हाथ से उसके बूब्स को बुरी तरह मसला, दुसरे हाथ से कमर पकड़ कर स्पीड मेन्टेन राखी. Non-stop तेज़ धक्के.

आस्था: (कम्प्लीटली आउट ऑफ़ कण्ट्रोल) माणिक… तू… तू तोह एक तूफ़ान है! मुझे यह पसंद है! मत रुकना!

माणिक ने स्पीड और बढ़ा दी. रूम की विंडोज बंद थी लेकिन उनके बॉडीज की गर्मी से पूरा अपार्टमेंट गरम हो गया था.

जब माणिक को लगा दोनों क्लाइमेक्स पे पहुँच रहे हैं, तोह सडनली आस्था को घुमाया और बहार निकल लिया.

माणिक: (हस्ते हुए, नॉटी टोन में) अभी नहीं! एक और स्टाइल बाकी है.

माणिक ने आस्था को अपने फेस पे बैठने का इशारा किया. आस्था समझ गयी और रिवर्स काउगर्ल स्टाइल में उसके ऊपर बैठ गयी.

माणिक ने नीचे से लुंड अंदर डाला और तेज़ उपवार्ड थ्रुस्तस शुरू. आस्था अब फुल राइड कर रही थी – बाल झटक रही थी, कमर घुमा रही थी.

इसके साथ माणिक का मुँह अब आस्था के पेट और बूब्स को किश और लीक कर रहा था. कम्पलीट सेंसुअल डोमिनेशन.

कुछ hi देर में दोनों एक साथ पीक पे पहुँच गए. आस्था ज़ोर की चीख के साथ माणिक पे गिर पड़ी, माणिक ने उसे तिघ्टलय पकड़ लिया. यह सीक्रेट मीटिंग सिटी के बीच में उनकी वील्डस्ट लस्ट का परफेक्ट डिस्प्ले था.

सोफे पे दो बार क्लाइमेक्स के बाद भी उनकी हंगर ख़तम नहीं हुई. माणिक ने आस्था को उठाया और वाल की तरफ ले गया.

माणिक: (हस्ते हुए, सांसें तेज़) अभी भी रेडी है मेरी स्टारगेज़र? या सोच लिया रात ख़तम?

आस्था: (उसकी नैक पे बाहें लपेट ते हुए) यह रात तब तक ख़तम नहीं होगी जब तक तू मेरी हर इच्छा पूरी नहीं करता, मेरे का. मुझे और चाहिए!

माणिक ने आस्था को वाल से सत्ता दिया. एक टांग उठायी और अपनी कमर पे लपेटवा दी. आस्था ने दोनों बाहें उसकी गर्दन के अराउंड टाइट कर ली – अब वह पूरी तरह माणिक पे डिपेंडेंट थी.

माणिक ने फुल पावर से अपना लुंड अंदर डाला.

आस्था: (ज़ोर की 'आह' के साथ) हाँ माणिक! ऐसे hi! मुझे यह बहुत पसंद है!

माणिक ने स्टैंडिंग पोजीशन में फुल ज़ोर के धक्के मरने शुरू कर दिए. वाल का सपोर्ट और आस्था का उसपे कम्प्लीटली देपेंद होना – यह सबको और इंटेंस बना रहा था.

एक हाथ से कमर पकडे रखा, दुसरे से बूब्स को बुरी तरह मसलने लगा. इतना ज़ोर से दबा रहा था की आस्था का फेस पैन + प्लेअसुरे से ट्विस्ट हो रहा था.

आस्था: (उसके शोल्डर पे दांत गड़ाते हुए) उफ्फ्फ! आज तू मुझे मार hi डालेगा!

माणिक ने इग्नोर किया और स्पीड बढ़ाते गया. हर धक्के पे वाल से हलकी सी आवाज़ आ रही थी. आस्था के बूब्स उसके हाथों में upar-neeche बाउंस कर रहे थे, दोनों के मुँह से मोअन्स निकल रहे थे.

माणिक: (डीप वाइल्ड वौइस्) बता कितना मज़ा आ रहा है आस्था!

आस्था: (कांपते हुए) बहुत! बहुत ज़्यादा! यह सबसे बेस्ट चुदाई है!

माणिक ने स्पीड और तेज़ की. दोनों लास्ट स्टेज पे थे. आस्था ने टांगें उसकी कमर पे और टाइट कर ली जैसे उसे पूरा अंदर समेत लेना चाहती हो.

आस्था: (तेज़ चीख के साथ) मैं… मैं झाड़ रही हूँ माणिक!

माणिक ने लास्ट, सबसे पावरफुल धक्के मारे. पूरे बॉडी में करंट सा दौड़ गया और उसने साडी एनर्जी आस्था के अंदर रिलीज़ कर दी. आस्था भी ज़ोर की चीख के साथ ओर्गास्म में डूब गयी.



दोनों वही वाल से टेक हुए, एक दुसरे को तिघ्टलय पकडे रहे. सांसें आउट ऑफ़ कण्ट्रोल, बॉडीज स्वेट से भीगे हुए. यह रात उनके लिए सेक्सुअल फ्रीडम और दीपेस्ट फिजिकल कनेक्शन का अल्टीमेट एक्सप्रेशन थी.
 
Part -42 (हिंगलिश वर्शन)



अनु दी एक बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर के लिंगेरी सेक्शन में थी. वह कुछ बरस और पैंतीस देख रही थी और कुछ दसिग्नस सेलेक्ट करके अपने शॉपिंग बास्केट में दाल रही थी. उनका फुल फोकस साइज और फिटिंग पे था.

उसी टाइम, उनके सामने वही लड़का आ गया – विक्रम.

विक्रम ने अनु को देखते hi तुरंत अपनी आवाज़ धीमी कर ली. वह थोड़ा हेसितांत और शर्मिंदा लग रहा था.

विक्रम: (झुक कर, धीमी आवाज़ में) एक्सक्यूज़ में, अनु जी. आप ठीक हैं?

अनु ने उसे तुरंत पहचान लिया. यह वही विक्रम था जिसके पापा की शादी (यानि उसकी बेहेन की शादी) का अरेंजमेंट वह कर रही थी, और जिसने काम के टाइम baar-baar टोक कर सन ख़राब किया था. अनु को याद था की उस दिन मल्लिका ने विक्रम को बुरी तरह डांटा था, और बाद में उसके पापा ने भी उसे बहुत सुनाया था.

अनु: (थोड़े रौदे टोन में) हाँ, मैं ठीक हूँ. विक्रम जी, आप यहाँ?

विक्रम: (झिझकते हुए, नज़रें नीचे करते हुए) हाँ… मैं यहीं पास में था. आपको देख कर लगा की आज आप से उस सब के लिए माफ़ी मांग लून.

अनु: (सरप्राइज से) माफ़ी? किस बात की?

विक्रम: (गहरी सांस लेते हुए) उस दिन शादी की प्रिपरेशन के टाइम, जो मैंने आपको टोकने वाला और बुरा बेहवे किया था, उसके लिए. मल्लिका दी और पिताजी ने मुझे बहुत डांटा था. मुझे एहसास हुआ की मैं over-react कर रहा था और आपको ूँकनेविंग्ली उनकंफर्टबले कर रहा था. सच में सॉरी हूँ.

अनु ने देखा की विक्रम सच में पास्ट मिस्टेक के लिए माफ़ी मांग रहा था, लेकिन उसकी नज़र baar-baar अनु के हाथ में रखे आइटम्स पे जा रही थी. अनु के हाथ में अभी भी 2-3 बरस और मैचिंग पैंतीस के पैकेट्स थे, जो वह बास्केट में डालने वाली थी.

विक्रम की नज़रें उन पैकेट्स पे अटकी हुई थी – उनके कलर्स, लास और साइज पे – और वह jaldi-jaldi उनको देखने की कोशिश कर रहा था.

अनु: (गुस्से को कण्ट्रोल करते हुए, आइटम्स को छुपाते हुए) देखिये विक्रम जी. माफ़ी मांगने के लिए थैंक्स. उम्मीद है आपने सच में सीख लिया होगा.

विक्रम: (माफ़ी मांगते हुए भी कण्ट्रोल नहीं कर प् रहा) हाँ हाँ, बिलकुल सीख लिया. मैं समझ गया हूँ की… (फिर से अनु के हाथ के आइटम्स की तरफ देखता है) …की हर किसी को अपनी फ्रीडम है… अपनी पसंद की चीज़ें खरीदने की… बिना किसी इंटरफेरेंस के.

अनु को क्लेअर्ल्य दिखाई दे रहा था की विक्रम की माफ़ी सिर्फ ड्रामा थी, और उसका ध्यान अभी भी उसी फोर्बिडन स्टफ पे था जिसकी वजह से पहले बार झगड़ा हुआ था. वह jaan-bujh कर अनु को उनकंफर्टबले कर रहा था.

अनु: (तेज़ आवाज़ में) अच्छा, थैंक्स. अब मुझे देर हो रही है.

अनु ने अपने आइटम्स बास्केट में डाले और बिना रुके तेज़ चलती हुई वहां से निकल गयी. विक्रम ने एक पल अनु को जाते देखा और फिर लिंगेरी सेक्शन को घूरते हुए वही खड़ा रह गया. अनु को गुस्सा आ रहा था की कुछ लोग कभी नहीं सुधरते.

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मॉल से घर लौटे hi अनु को बहुत गुस्सा आ रहा था. विक्रम की आँखों में छुपी लस्ट और माफ़ी के बहाने उसकी bra-panty को घूरने की कोशिश अनु को बहुत ज़्यादा खटका गयी थी. उसे लगा की यह डिस्कम्फर्ट बिना किसी से शेयर किये नहीं रह सकता.

उसने तुरंत फ़ोन उठाया और अपनी बोल्ड और बेबाक फ्रेंड मल्लिका को कॉल किया.

मल्लिका: (फ़ोन उठाते hi, हस्ते हुए) अरे अनु दी! कैसी हो? आज याद कैसे आयी? माणिक भाई ने छुट्टी दी या नहीं?

अनु: (आवाज़ में गुस्सा) मल्लिका! तू है मत! मुझे अभी एक बहुत गन्दा एक्सपीरियंस हुआ है.

मल्लिका: (सीरियस हो जाते हुए) क्या हुआ? कहाँ हो तुम? कोई प्रॉब्लम?

अनु: मैं अभी मॉल से आयी हूँ. तुझे याद है वह विक्रम? जिसके पापा की शादी मैंने ओर्गनइजे की थी, और जिसने उस दिन बहुत बकवास की थी?

मल्लिका: हाँ हाँ याद है! वह गन्दा, शरारती बच्चा. क्या हुआ? वह तुझे फिर मिला?

अनु: हाँ! और आज भी लिंगेरी सेक्शन में मिला! वह माफ़ी मांगने आया था की पहले उसने मुझे उनकंफर्टबले किया था.

मल्लिका: (हस्ते हुए) अच्छा! तोह वह सुधर गया? चलो यह तोह अच्छी बात है.

अनु: (आवाज़ ऊँची करते हुए) नहीं सुधरा! यही तोह मेरा गुस्सा है! वह माफ़ी तोह मांग रहा था, लेकिन उसकी नज़र मेरे हाथ में रखे ब्रा और पंतय पैकेट्स पे थी! माफ़ी के बहाने भी मुझे घूर रहा था! जैसे jaan-bujh कर वही खड़ा था ताकि मुझे फिर से उनकंफर्टबले करे!

मल्लिका कुछ देर चुप रही, फिर उसकी आवाज़ में एक अजीब सी समझदारी आ गयी.

मल्लिका: देख अनु. कुछ मर्द ऐसे hi होते हैं. ख़ास कर जो घर में दबाये जाते हैं. उन्हें लगता है की माफ़ी के बहाने या किसी भी एक्सक्यूज़ से वह फोर्बिडन चीज़ें देखने की फ्रीडम ले सकते हैं.

अनु: लेकिन यह गन्दा है! मैं उसे यह फ्रीडम क्यों दूँ?

मल्लिका: तू मत दे. पर यह समझ की वह तेरे बॉडी या तेरी पसंद को नहीं, बल्कि उस 'फ्रीडम' को घूर रहा था जो उसे नहीं मिली. तू सुन्दर है, और यह तेरा दोष नहीं की वह तेरी पर्सनल चीज़ें देखना चाहता है.

अनु: (थोड़ा कलम होते हुए) हाँ… तेरी बात सही है. मैं तुझे इसलिए बताया ताकि मेरा गुस्सा थोड़ा शांत हो.

मल्लिका: (थोड़ी शरारत से) अच्छा! तोह गुस्सा शांत कर. और हाँ, अगर वह नेक्स्ट टाइम फिर मिले, तोह एक काम करना. उसके सामने hi अपनी खरीदी हुई सबसे बोल्ड लिंगेरी का पैकेट खोल और पूछना, “विक्रम जी, यह साइज ठीक रहेगा या नहीं?”

अनु यह सुन कर ज़ोर से हसी.

अनु: तू पागल है मल्लिका! मैं ऐसा कुछ नहीं करने वाली!

मल्लिका: (कॉन्फिडेंस से) क्यों नहीं? जब वह तुझे अनवांटेड चीज़ें दिखने की कोशिश कर रहा है, तोह तू उसे अपनी टर्म्स पे क्यों न दिखा दे?

अनु ने अपनी फ्रेंड की एडवाइस को हसी में ताल दिया, लेकिन उसे पता था की मल्लिका की बात में कहीं न कहीं एक कड़वी सच्चाई थी.

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माणिक और पारी, जैसे हमेशा, माणिक के बीएड पे बैठे थे. माणिक पारी को एक टफ साइंटिफिक कांसेप्ट समझा रहा था, लेकिन यह सिर्फ बहाना था. हिल स्टेशन से वापस आने के बाद उनके बीच इंटिमेसी बहुत बढ़ गयी थी, और दोनों किसी भी एक्सक्यूज़ से एक दुसरे के क्लोज रहना चाहते थे.

माणिक समझते हुए अपना हाथ टेबल पे रखे हुए था, और पारी का हाथ ूँकनेविंग्ली माणिक के हाथ में था – उनकी उँगलियाँ एक दुसरे में फँसी हुई थी. दोनों इस क्लोसनेस्स में खोए हुए थे, उनके चेहरे एक दुसरे के बहुत क्लोज थे.

तभी रूम का दरवाज़ा तेज़ से खुला और दिव्या अंदर आयी. वह अभी भी रोहन से हुए आर्गुमेंट और अपने काम से खिज़्ज़ी हुई थी.

दिव्या ने एक सेकंड के लिए देखा और जो सन देखा, उससे वह शॉक हो गयी: माणिक और पारी बहुत क्लोज बैठे हैं, और पारी का हाथ माणिक के हाथ में था. दिव्या का सारा फ़्रस्ट्रेशन तुरंत गुस्से में बदल गया.

दिव्या: (ज़ोर से चिल्लाते हुए, आवाज़ में गुस्सा और डाउट) माणिक! यह क्या हो रहा है? तुम दोनों क्या कर रहे हो? तुम अपनी छोटी बेहेन का हाथ अपने हाथ में लेके क्यों बैठे हो? तुम लोगों को शर्म नहीं आती?

माणिक और पारी दोनों तुरंत सकते में आ गए. उन्होंने झट से हाथ अलग किये. दोनों के चेहरे सफ़ेद पद गए.

माणिक ने बिना एक सेकंड वास्ते किये, पारी को बचने और सिचुएशन सँभालने के लिए झूठा एक्सक्यूज़ बनाया.

माणिक: (चिंता दिखते हुए) दी! अरे तुम गलत समझ रही हो! पारी बोल रही थी की उसे लग रहा है बुखार आ रहा है. इसलिए मैं चेक कर रहा था की बुखार कितना है!

माणिक ने तुरंत अपना हाथ पारी के माथे पे रख दिया, ड्रामा को और रियल बनाने के लिए.

पारी को भी झट से भाई के झूठ में सपोर्ट करना पड़ा. उसे पता था अगर दिव्या को उनके बीच के मस्ती और इंटिमेसी का थोड़ा भी पता चल गया तोह घर में तूफ़ान आ जायेगा.

पारी: (थोड़ी घबराहट से, रोने का नाटक करते हुए) हाँ दी! मैंने hi भाई को चेक करने को बोलै था! मुझे लग रहा था शायद कल रात की ठण्ड से…

दिव्या ने दोनों की तरफ डाउट भरी नज़रों से देखा. उसे पता था माणिक और पारी झूठ बोल रहे हैं. उनकी घबराहट, चेहरे की व्हिटनेस और हाथ अलग करना – सब क्लियर था. लेकिन दिव्या के पास कोई सॉलिड प्रूफ नहीं था, और 'बुखार' वाला एक्सक्यूज़ इतना सुद्दीन था की वह तुरंत बड़ी लड़ाई शुरू नहीं कर सकीय.

दिव्या: (माथे पे शिकन के साथ, बिलीव नहीं करते हुए) झूठ बोल रहे हो तुम दोनों! मुझे सब पता है.

लेकिन फिर, शायद अपनी थकन और फ़्रस्ट्रेशन की वजह से, दिव्या ने आर्गुमेंट आगे नहीं बढ़ाया. उसने नाराज़गी से सर हिलाया.

दिव्या: (ठंडी आवाज़ में) ठीक है. जो करना है करो. मैं जा रही हूँ.



दिव्या पलट कर किचन में चाय बनाने चली गयी. उसका गुस्सा अभी भी शांत नहीं हुआ था, लेकिन उसे पता था की bhai-behen के इस अजीब, ुणस्पोकेन रिश्ते में घुस कर कोई फायदा नहीं होगा. माणिक और पारी ने एक दुसरे की तरफ देखा, रिलीफ और डर के मिक्सचर से भरी लम्बी सांस ली. दोनों जानते थे की वह baal-baal बचे थे.
 
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