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भाग 43: ईर्ष्या की आग और फॅमिली का पूरा ड्रामा
दिव्या गुस्से से किचन में घुस आयी थी. चेहरा लाल, आँखें तमतमा रही थी. गैस जलाकर पानी चढ़ाया, केतली राखी और चाय की पट्टी डालते हुए खुद से बड़बड़ाने लगी. मन अभी भी उसी सन पर अटका हुआ था – माणिक और पारी को उस ावक्वार्ड हालत में देखना, और फिर वह झूठा बहाना “बुखार आ गया”! उसे यकीन नहीं हो रहा था की यह दोनों मिलकर उसका मज़ाक उदा रहे हैं. हाथ काँप रहे थे, चमच से चाय हिलाते हुए भी दिमाग कहीं और था.
तभी पारी धीरे से किचन में दाखिल हुई. अब वह पूरी तरह नार्मल बनने की कोशिश कर रही थी – मुस्कान लगायी, बाल ठीक किये, जैसे कुछ हुआ hi नहीं. लेकिन आँखों में वह दर छुपा था, जो दिव्या से छुप नहीं प् रहा था.
पारी: (प्यार से, दी के पास आकर) दीदी? तुम इतनी नाराज़ क्यों हो गयी हो यार?
दिव्या ने बिना मुड़े जवाब दिया, चाय छंटे हुए.
दिव्या: मैं नाराज़ नहीं हूँ पारी. बस… बोहोत परेशान हूँ. दिल में कुछ अजीब सा लग रहा है.
पारी ने माहौल हल्का करने की कोशिश की. मुस्कुरायी और दिव्या के कंधे पर हाथ रख दिया.
पारी: अरे अच्छा! तो ठीक है न. तुम हमारे लिए भी चाय बना दो न प्लीज? माणिक भाई भी बहार इंतज़ार कर रहा है. दोनों के लिए ek-ek कप. प्लीज दीदी…
दिव्या ने बिना कुछ बोले दो और कप निकले. चाय डाली, थोड़ी चीनी मिलायी और गैस बंद कर दी. गुस्सा अब थोड़ा काम हो चूका था, लेकिन आँखों में चिंता साफ़ दिख रही थी – गहरी वाली, जो दिल को कुरेद रही थी. वह पारी की तरफ मुड़ी, उसका हाथ पकड़ा और सीधे आँखों में देखकर बोली.
दिव्या: (गंभीर होकर) देख पारी… तू अभी छोटी है यार. मैं जानती हूँ की तू और माणिक भाई अब बोहोत अचे दोस्त बन गए हो. Ek-doosre से सब कुछ खुलकर बात करते हो, हँसते हो, मज़ाक करते हो. मैं इस दोस्ती का पूरा सम्मान करती हूँ, सच में. लेकिन…
पारी को लगा अब दांत शुरू होगी, लेकिन दिव्या की बात कहीं और मुद गयी.
दिव्या: …लेकिन एक बात हमेशा याद रखना. तुम दोनों bhai-behen हो. इस रिश्ते की कुछ लिमिट्स होती हैं यार. तू कॉलेज जा रही है, माणिक भी बड़ा हो रहा है. तुम लोगों की हरकतें देखकर मुझे दर लगता है… कहीं गलत रस्ते पर मत चल पड़ना. समझ रही है न?
इशारा इतना साफ़ था की पारी के दिल में बिजली सी कौंध गयी. तुरंत साड़ी वह क्लोज मोमेंट्स याद आ गए – वह रातें जब माणिक के साथ बोहोत पास बैठी थी, हाथ पकडे थे, वह बातें जो bhai-behen के बीच नहीं होनी चाहिए. चेहरा लाल हो गया, आँखें नीचे झुक गयी. उसे एहसास हुआ – दी कितनी भोली हैं, और वह और माणिक कितनी खतरनाक आग से खेल रहे हैं.
पारी: (गंभीर होकर सर हिलाते हुए) नहीं दीदी… तुम टेंशन मत लो. हम… हम बस bhai-behen हैं यार. तेरी बात समझ गए. पक्का.
दिव्या ने रहत की सांस ली. पारी के लिए चाय का कप थमाया.
दिव्या: बस यही चाहती हूँ. तुम दोनों हमेशा हँसते रहो, लेकिन पढाई पर ध्यान दो. और हाँ… माणिक को भी बोल देना की वह भी समझे.
पारी ने कप लिया, मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन अंदर अब नयी टेंशन जाग चुकी थी. अब उन्हें और ज़्यादा सावधान रहना पड़ेगा. दी की नज़र अब उन पर तिकी हुई थी.
************************************
रात का डिनर था. डाइनिंग टेबल पर पूरा फॅमिली बैठा हुआ था – आनंद पापा, अनु दीदी, दिव्या, पारी और माणिक. आज माहौल थोड़ा पार्टी जैसा था, क्यूंकि माणिक ने का अन्तर की एग्जाम नहीं सिर्फ पास की थी, बल्कि अच्छी रैंक भी लायी थी. टेबल पर सबकी फेवरेट चीज़ें लगी थी – बटर चिकन गरमागरम, नान, दाल मखनी, सलाद, और डिजर्ट में गुलाब जामुन.
आनंद ने ख़ुशी से माणिक की पीठ थपथपाई.
आनंद: शाबाश मेरे शेर! तूने मेरा सर गर्व से ऊंचा कर दिया यार. जैसा मैंने वादा किया था, मैं तुझे तेरी मनपसंद बुलेट मोटरसाइकिल दिलवा दूंगा!
माणिक का चेहरा ख़ुशी से चमक उठा. बुलेट – दो लाख के करीब की बाइक. उसके सपनों वाली. सबने तालियां बजायी.
माणिक: थैंक यू पापा! मैं आपको कभी निराश नहीं करूँगा.
आनंद ने फिर दिव्या की तरफ देखा, मुस्कुराते हुए.
आनंद: और हाँ दिव्या बेटी… मुझे पता है इस सेमेस्टर में तेरे नंबर्स उतने अच्छे नहीं आये जितने आने चाहिए थे. लेकिन मैं जानता हूँ तू म्हणत करती है. तुझे भी कॉलेज aane-jaane में आसानी हो, इसलिए मैं तुझे भी एक स्कूटी दिलवाने का वादा करता हूँ.
दिव्या जो पहले से hi रोहन की वजह से खीझि हुई थी, अब यह सुन कर उसका खून खौल उठा. भाई को दो लाख की बुलेट, और उसे सिर्फ अस्सी हज़ार की स्कूटी? यह साफ़ भेदभाव लग रहा था.
दिव्या: (गुस्से में) यह क्या बात हुई पापा? आप हमेशा भेदभाव करते हो! माणिक को दो लाख की बुलेट और मुझे सिर्फ अस्सी हज़ार की स्कूटी? क्या मैं आपकी बेटी नहीं हूँ?
आनंद ने आराम से समझाया.
आनंद: अरे मेरी बेटी! ऐसा मत सोच. माणिक को कॉलेज दूर जाना पड़ता है, और यह उसकी म्हणत का इनाम है. तू मब्ब्स कर रही है, तुझे स्पीड से ज़्यादा सुविधा चाहिए. मेरे लिए तुम सब बच्चे बराबर हो यार.
पर दिव्या सुनने को तैयार नहीं थी. अंदर साड़ी फ़्रस्ट्रेशन निकलने लगी.
दिव्या: (झल्ला कर) नहीं! आप झूठ बोल रहे हो! आप हमेशा माणिक को hi सपोर्ट करते हो! मैं यह नाटक नहीं देख सकती!
उसने कुर्सी पीछे धकेली और उठने लगी.
तभी अनु दीदी ने सख्त आवाज़ में रोका.
अनु: दिव्या! बैठ जा! मैंने कहा बैठ और अपना खाना ख़तम कर. पापा ने जो कहा वह बिलकुल सही है. माणिक ने टॉप किया है, स्कूटी तेरे लिए काफी है. बिना खाये कहीं नहीं जाएगी!
अनु दी की आवाज़ में इतनी पावर थी की दिव्या को झुकना पड़ा. वह जबरदस्ती कुर्सी पर बैठ गयी, लेकिन गुस्सा अभी भी ठंडा नहीं हुआ था.
उसने जलती हुई नज़रों से माणिक को देखा. आँखों में नफरत और जलन साफ़ दिख रही थी. यह सिर्फ बुलेट की वजह से नहीं थी – अंदर साड़ी पुराणी शिकायतें निकल रही थी. माणिक को हमेशा ज़्यादा प्यार, ज़्यादा ध्यान, ज़्यादा सब कुछ. और अब यह बाइक भी.
माणिक ने उसकी नज़र पकड़ी. वह जानता था दी कितनी जल रही है. उसने jaan-bujh कर मुस्कुराते हुए, धीरे से कहा.
माणिक: थैंक यू दी!
यह “थैंक यू” बिलकुल छेड़ने वाला था. दिव्या ने मुँह कास कर बंद कर लिया. प्लेट में खाने पर ध्यान देने की कोशिश की, लेकिन अंदर आग लगी हुई थी.
आनंद ने माहौल सँभालने की कोशिश की.
आनंद: बस बच्चो… खाना खा लो. आज ख़ुशी का दिन है. माणिक ने म्हणत की है, उसका रिवॉर्ड मिला. दिव्या, तू भी अगली बार अच्छे नंबर्स लाएगी, फिर तेरी भी बड़ी बाइक दिलवा देंगे.
दिव्या ने सिर्फ “हम्म” कहा. Jaldi-jaldi खाना खा लिया और उठ गयी.
दिव्या: मैं रूम में जा रही हूँ. गुड नाईट.
वह चली गयी. टेबल पर सन्नाटा छ गया.
अनु ने माणिक को देखा.
अनु: तू भी थोड़ा संभल कर. दिव्या को छेड़ना अच्छा नहीं लगता.
माणिक ने सर हिलाया, लेकिन अंदर थोड़ा गिलटी फील कर रहा था. पर वह भी जानता था – दी की जलन अब रुकने वाली नहीं.
पारी ने चुपचाप सब देखा. मन में सोचा – यह फॅमिली कितनी कॉम्प्लिकेटेड है यार. दी को इतना गुस्सा, माणिक भाई को इतनी ख़ुशी… और मैं बीच में फँसी हुई. अब हमे और ज़्यादा छुपाना पड़ेगा.
खाना ख़तम हुआ. सब अपने कमरे में चले गए.
दिव्या रूम में लेट गयी. आँखें बंद की, लेकिन नींद कहाँ आ रही थी. सोचा – पापा हमेशा माणिक को ज़्यादा पसंद करते हैं. मुझे कुछ नहीं मिलता. और वह माणिक और पारी… उनका रिश्ता भी सही नहीं लग रहा. मैं सब देख रही हूँ. अब मुझे कुछ करना पड़ेगा. यह सब बंद होना चाहिए.
तकिये को ज़ोर से पकड़ा. ईर्ष्या की आग अब पूरी तरह भड़क चुकी थी. और यह आग शायद जल्दी बुझने वाली नहीं थी.
रात गहरी हो गयी. घर में सन्नाटा था, लेकिन andar-andar तूफ़ान चल रहा था – जलन का, प्यार का, और गलत रिश्तों का.
दिव्या गुस्से से किचन में घुस आयी थी. चेहरा लाल, आँखें तमतमा रही थी. गैस जलाकर पानी चढ़ाया, केतली राखी और चाय की पट्टी डालते हुए खुद से बड़बड़ाने लगी. मन अभी भी उसी सन पर अटका हुआ था – माणिक और पारी को उस ावक्वार्ड हालत में देखना, और फिर वह झूठा बहाना “बुखार आ गया”! उसे यकीन नहीं हो रहा था की यह दोनों मिलकर उसका मज़ाक उदा रहे हैं. हाथ काँप रहे थे, चमच से चाय हिलाते हुए भी दिमाग कहीं और था.
तभी पारी धीरे से किचन में दाखिल हुई. अब वह पूरी तरह नार्मल बनने की कोशिश कर रही थी – मुस्कान लगायी, बाल ठीक किये, जैसे कुछ हुआ hi नहीं. लेकिन आँखों में वह दर छुपा था, जो दिव्या से छुप नहीं प् रहा था.
पारी: (प्यार से, दी के पास आकर) दीदी? तुम इतनी नाराज़ क्यों हो गयी हो यार?
दिव्या ने बिना मुड़े जवाब दिया, चाय छंटे हुए.
दिव्या: मैं नाराज़ नहीं हूँ पारी. बस… बोहोत परेशान हूँ. दिल में कुछ अजीब सा लग रहा है.
पारी ने माहौल हल्का करने की कोशिश की. मुस्कुरायी और दिव्या के कंधे पर हाथ रख दिया.
पारी: अरे अच्छा! तो ठीक है न. तुम हमारे लिए भी चाय बना दो न प्लीज? माणिक भाई भी बहार इंतज़ार कर रहा है. दोनों के लिए ek-ek कप. प्लीज दीदी…
दिव्या ने बिना कुछ बोले दो और कप निकले. चाय डाली, थोड़ी चीनी मिलायी और गैस बंद कर दी. गुस्सा अब थोड़ा काम हो चूका था, लेकिन आँखों में चिंता साफ़ दिख रही थी – गहरी वाली, जो दिल को कुरेद रही थी. वह पारी की तरफ मुड़ी, उसका हाथ पकड़ा और सीधे आँखों में देखकर बोली.
दिव्या: (गंभीर होकर) देख पारी… तू अभी छोटी है यार. मैं जानती हूँ की तू और माणिक भाई अब बोहोत अचे दोस्त बन गए हो. Ek-doosre से सब कुछ खुलकर बात करते हो, हँसते हो, मज़ाक करते हो. मैं इस दोस्ती का पूरा सम्मान करती हूँ, सच में. लेकिन…
पारी को लगा अब दांत शुरू होगी, लेकिन दिव्या की बात कहीं और मुद गयी.
दिव्या: …लेकिन एक बात हमेशा याद रखना. तुम दोनों bhai-behen हो. इस रिश्ते की कुछ लिमिट्स होती हैं यार. तू कॉलेज जा रही है, माणिक भी बड़ा हो रहा है. तुम लोगों की हरकतें देखकर मुझे दर लगता है… कहीं गलत रस्ते पर मत चल पड़ना. समझ रही है न?
इशारा इतना साफ़ था की पारी के दिल में बिजली सी कौंध गयी. तुरंत साड़ी वह क्लोज मोमेंट्स याद आ गए – वह रातें जब माणिक के साथ बोहोत पास बैठी थी, हाथ पकडे थे, वह बातें जो bhai-behen के बीच नहीं होनी चाहिए. चेहरा लाल हो गया, आँखें नीचे झुक गयी. उसे एहसास हुआ – दी कितनी भोली हैं, और वह और माणिक कितनी खतरनाक आग से खेल रहे हैं.
पारी: (गंभीर होकर सर हिलाते हुए) नहीं दीदी… तुम टेंशन मत लो. हम… हम बस bhai-behen हैं यार. तेरी बात समझ गए. पक्का.
दिव्या ने रहत की सांस ली. पारी के लिए चाय का कप थमाया.
दिव्या: बस यही चाहती हूँ. तुम दोनों हमेशा हँसते रहो, लेकिन पढाई पर ध्यान दो. और हाँ… माणिक को भी बोल देना की वह भी समझे.
पारी ने कप लिया, मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन अंदर अब नयी टेंशन जाग चुकी थी. अब उन्हें और ज़्यादा सावधान रहना पड़ेगा. दी की नज़र अब उन पर तिकी हुई थी.
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रात का डिनर था. डाइनिंग टेबल पर पूरा फॅमिली बैठा हुआ था – आनंद पापा, अनु दीदी, दिव्या, पारी और माणिक. आज माहौल थोड़ा पार्टी जैसा था, क्यूंकि माणिक ने का अन्तर की एग्जाम नहीं सिर्फ पास की थी, बल्कि अच्छी रैंक भी लायी थी. टेबल पर सबकी फेवरेट चीज़ें लगी थी – बटर चिकन गरमागरम, नान, दाल मखनी, सलाद, और डिजर्ट में गुलाब जामुन.
आनंद ने ख़ुशी से माणिक की पीठ थपथपाई.
आनंद: शाबाश मेरे शेर! तूने मेरा सर गर्व से ऊंचा कर दिया यार. जैसा मैंने वादा किया था, मैं तुझे तेरी मनपसंद बुलेट मोटरसाइकिल दिलवा दूंगा!
माणिक का चेहरा ख़ुशी से चमक उठा. बुलेट – दो लाख के करीब की बाइक. उसके सपनों वाली. सबने तालियां बजायी.
माणिक: थैंक यू पापा! मैं आपको कभी निराश नहीं करूँगा.
आनंद ने फिर दिव्या की तरफ देखा, मुस्कुराते हुए.
आनंद: और हाँ दिव्या बेटी… मुझे पता है इस सेमेस्टर में तेरे नंबर्स उतने अच्छे नहीं आये जितने आने चाहिए थे. लेकिन मैं जानता हूँ तू म्हणत करती है. तुझे भी कॉलेज aane-jaane में आसानी हो, इसलिए मैं तुझे भी एक स्कूटी दिलवाने का वादा करता हूँ.
दिव्या जो पहले से hi रोहन की वजह से खीझि हुई थी, अब यह सुन कर उसका खून खौल उठा. भाई को दो लाख की बुलेट, और उसे सिर्फ अस्सी हज़ार की स्कूटी? यह साफ़ भेदभाव लग रहा था.
दिव्या: (गुस्से में) यह क्या बात हुई पापा? आप हमेशा भेदभाव करते हो! माणिक को दो लाख की बुलेट और मुझे सिर्फ अस्सी हज़ार की स्कूटी? क्या मैं आपकी बेटी नहीं हूँ?
आनंद ने आराम से समझाया.
आनंद: अरे मेरी बेटी! ऐसा मत सोच. माणिक को कॉलेज दूर जाना पड़ता है, और यह उसकी म्हणत का इनाम है. तू मब्ब्स कर रही है, तुझे स्पीड से ज़्यादा सुविधा चाहिए. मेरे लिए तुम सब बच्चे बराबर हो यार.
पर दिव्या सुनने को तैयार नहीं थी. अंदर साड़ी फ़्रस्ट्रेशन निकलने लगी.
दिव्या: (झल्ला कर) नहीं! आप झूठ बोल रहे हो! आप हमेशा माणिक को hi सपोर्ट करते हो! मैं यह नाटक नहीं देख सकती!
उसने कुर्सी पीछे धकेली और उठने लगी.
तभी अनु दीदी ने सख्त आवाज़ में रोका.
अनु: दिव्या! बैठ जा! मैंने कहा बैठ और अपना खाना ख़तम कर. पापा ने जो कहा वह बिलकुल सही है. माणिक ने टॉप किया है, स्कूटी तेरे लिए काफी है. बिना खाये कहीं नहीं जाएगी!
अनु दी की आवाज़ में इतनी पावर थी की दिव्या को झुकना पड़ा. वह जबरदस्ती कुर्सी पर बैठ गयी, लेकिन गुस्सा अभी भी ठंडा नहीं हुआ था.
उसने जलती हुई नज़रों से माणिक को देखा. आँखों में नफरत और जलन साफ़ दिख रही थी. यह सिर्फ बुलेट की वजह से नहीं थी – अंदर साड़ी पुराणी शिकायतें निकल रही थी. माणिक को हमेशा ज़्यादा प्यार, ज़्यादा ध्यान, ज़्यादा सब कुछ. और अब यह बाइक भी.
माणिक ने उसकी नज़र पकड़ी. वह जानता था दी कितनी जल रही है. उसने jaan-bujh कर मुस्कुराते हुए, धीरे से कहा.
माणिक: थैंक यू दी!
यह “थैंक यू” बिलकुल छेड़ने वाला था. दिव्या ने मुँह कास कर बंद कर लिया. प्लेट में खाने पर ध्यान देने की कोशिश की, लेकिन अंदर आग लगी हुई थी.
आनंद ने माहौल सँभालने की कोशिश की.
आनंद: बस बच्चो… खाना खा लो. आज ख़ुशी का दिन है. माणिक ने म्हणत की है, उसका रिवॉर्ड मिला. दिव्या, तू भी अगली बार अच्छे नंबर्स लाएगी, फिर तेरी भी बड़ी बाइक दिलवा देंगे.
दिव्या ने सिर्फ “हम्म” कहा. Jaldi-jaldi खाना खा लिया और उठ गयी.
दिव्या: मैं रूम में जा रही हूँ. गुड नाईट.
वह चली गयी. टेबल पर सन्नाटा छ गया.
अनु ने माणिक को देखा.
अनु: तू भी थोड़ा संभल कर. दिव्या को छेड़ना अच्छा नहीं लगता.
माणिक ने सर हिलाया, लेकिन अंदर थोड़ा गिलटी फील कर रहा था. पर वह भी जानता था – दी की जलन अब रुकने वाली नहीं.
पारी ने चुपचाप सब देखा. मन में सोचा – यह फॅमिली कितनी कॉम्प्लिकेटेड है यार. दी को इतना गुस्सा, माणिक भाई को इतनी ख़ुशी… और मैं बीच में फँसी हुई. अब हमे और ज़्यादा छुपाना पड़ेगा.
खाना ख़तम हुआ. सब अपने कमरे में चले गए.
दिव्या रूम में लेट गयी. आँखें बंद की, लेकिन नींद कहाँ आ रही थी. सोचा – पापा हमेशा माणिक को ज़्यादा पसंद करते हैं. मुझे कुछ नहीं मिलता. और वह माणिक और पारी… उनका रिश्ता भी सही नहीं लग रहा. मैं सब देख रही हूँ. अब मुझे कुछ करना पड़ेगा. यह सब बंद होना चाहिए.
तकिये को ज़ोर से पकड़ा. ईर्ष्या की आग अब पूरी तरह भड़क चुकी थी. और यह आग शायद जल्दी बुझने वाली नहीं थी.
रात गहरी हो गयी. घर में सन्नाटा था, लेकिन andar-andar तूफ़ान चल रहा था – जलन का, प्यार का, और गलत रिश्तों का.
