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मर्द का बच्चा. अपडेट 40.
अभी छितिज पर सूर्य की लाली फ़ैल hi रही थी. सूर्य देव अभी उदय नहीं हुए थे. चारो और अँधेरे का परत अब हट गया था और उजाला अपना पंख फैलाना सुरु क्र दिया था.
त्रम्ब्केश्वर नाशिक…..
गोदावरी नदी किनारे एक इक्कंत स्थान, जहा परिंदे और नदी क अविरल धरा क अलावा और वह कोई नहीं था.
सो सॉरी….
वह कोई और भी था…
ओह्ह्हू आज ये हो क्या रहा है.
वह कोई और भी था… नहीं बल्कि थी…
एक कमशीन, अल्हड़, जवानी से लबरेज काळा वस्त्र पहले लड़की.
गोदावरी नदी मई एक नव क उप्पेर अकेली योग मुद्रा मई काफी देर से एक hi ाशन मई स्थिर थी.
वो नटराज मुद्रा मई पूर्व की और अपना चेहरा क्र क बाये पेअर पर कड़ी हो क्र दाहिने पेअर को पीछे सर की सिद्ध मई मोर क्र दोनों हाथ को सर क उप्पेर से पीछे ले जा क्र दाहिने पेअर क उंगलियों को पकडे हुए थी.
सूर्य की बहुत हलकी किरणे उसके सलोने मुखड़े पर पर रहा था.
बड़ा hi मनमोहक दृश्य था ये.
सूर्य की तीक्षण किरणे जब उसके पुरे बदन मई सामने लगा तब जा कर कही वो अपने इस नटराज मुद्रा से बहार आई.
वह से नव खेती हुई वो लड़की गोदावरी नदी किनारे पहुंची और फिर नव को एक किनारे लगा क्र उस मई से उतर गई.
एक बार नदी को प्रणाम क्र वापस चल पड़ी.
थोड़ी देर बाद वो त्रम्ब्केश्वर क योग विद्या पीठ आश्रम मई पहुंची.
वह जा क्र वो एक कमरे मई चली गई. जो सायद उसका hi था.
वह फ्रेश होने क बाद वो बहार निकल क्र आई.
तभी उस आश्रम क आचार्य दिखे जो वह क बचो को शिक्षा दे रहे थे.
इसारे से उन्होंने उस लड़की को अपने पास बुलाये.
आचार्य- कहा गई थी तुम पुत्री.
लड़की- बाबा मई तो गोदावरी नदी किनारे योग क्र रही थी.
आचार्य- बीटा गायत्री. काम से काम किसी को बता क्र तो जाया करो.
वो लड़की जिसका नाम गायत्री था.
गायत्री- क्षमा करे बाबा. आगे से बता क्र जाउंगी.
फिर आचार्य बच्चो को पढ़ने लगे और गायत्री वह आश्रम क पशु पक्षियों को उनका खाने क लिए दाना और चारा देने लगी.
वह आश्रम मई एक और कुछ मोर कोयल कबूतर इधर उधर घूम क्र गायत्री द्वारा छींटे गए डेन को चोग रहे थे तो एक और बंधी हुई गाय घास खा रही थी.
गायत्री उन्हें खता देख क्र बहुत खुश हो रही थी.
लल्लू बीएड पर लेता सदी ब्याह क कनु से काम रह गए है उसके बारे मई सोच रहा था.
अभी वो कल पुरे दिन यहाँ नहीं था और अभी दोपहर क बाद आया है.
उसे पता भी नहीं था की क्या काम शेष है और क्या हो गया है.
उसे काका से पूछना पड़ेगा की क्या सब काम सेष रह गया है ताकि जल्दी से उन कामो को निपटाया जा सके.
इधर माँ और ऋतू काकी का ब्यबहार भी कुछ ठीक नहीं लग रहा.
लगता है अभी भी नाराज है.
समझ नहीं आ रहा था की क्या करे. कैसे मनाये उन्हें. क्या कहे माँ को.
लगता है माँ ऋतू काकी क बारे मई जान गई है. अब कैसे उन्हें समझौ.
उधर वो ऋतू काकी है की वो अलग मुँह फुलाए बैठी है.
अब इतनी बड़ी गांड बना क्र मटकती हुई घूमेगी तो फिर इस मई मेरा क्या कसूर है.
अब मुझ से नहीं रहा गया तो मई क्या करू.
क्यू इन सब क बारे मई सोचता हु मई.
मुझे अपने जान क बारे मई सोचना चाहिए.
जब से आया हु ठीक ढंग से बात भी नहीं हुई है.
वैसे आज वो कितनी खूबसूरत लग रही थी ग्रीन सूट मई.
माँ कशम कहर ध रही थी.
मेरा बस चले तो अभी मई उन्हें भाग क्र कही दूर देश के जाऊ. जहा मई और मेरी जान हो और हम अक्षर प्यार भरी बाटे करता rahu.
लल्लू यु hi उटपटांग बाटे सोचता हुआ सो गया.
" लल्लू बीटा कितना सोता है. रात को क्या करेगा. अब उठ जा नहीं तो रात मई नींद नहीं आएगी.
आवाज सुन क्र लल्लू की आँख खुल गई.
देखा तो छोटी बुआ झुक क्र उसे उठा रही थी
झुकने क कारन छोटी बुआ की सूट क गले से बुआ की गोरी बड़ी बड़ी दो पहर काली ब्रा मई कैसे हुए आधा से बहार निकल झक रहा था.
लल्लू का तो मन किया की अभी इन दूध से भरे टंकी को निचोड़ निचोड़ क्र पि जय.
छोटी बुआ जब लल्लू को यु अपनी और घूरती देखि तो समझ hi नहीं पाई की ये ऐसे क्यू घर रहा है बड़ी बड़ी आँखे क्र के.
फिर जब वो लल्लू क आँखों का पीछा की यह जानने क लिए तब उन्हें एहसास हुआ की ये लल्लू उल्लू की तरह क्यू तक रहा है.
वो झट से सीधी हो क्र अपने सूट को सही करती लल्लू को एक बार गौर से देख कमरे से बहार निकल गई.
लल्लू सर पिट लिया अपना.
ये क्या क्र दिया. क्या सोचेंगी मेरे बारे मई.
लल्लू सर्मिन्दा सर्मिन्दा सा उठा और फ्रेश हो क्र आँगन मई आ गया.
आज आँगन मई जमघट लगा था.
वैसे भी उसके घर मई hi काफी मेम्बर है लेकिन दोनों बुआ उनके दो बच्चे और अब दो ममी.
बहुत अच्छा लग रहा था.
सब बहुत खुश थे.
लल्लू खटिये पर बैठा सब क चेहरे को निहार रहा था.
जब वो नजर घूमता सोनम की और देखा तो वो भी लल्लू को hi देख रही थी.
सोनम आँखों क इसारे से लल्लू से पूछो की क्या हुआ क्या देख रहा है वो.
लल्लू भी इसारे मई hi बता दिया की कोई बात नहीं है बस यु hi वो सब को तर रहा था की इन सब क चेहरे पर खुशिया कैसे चमक रही है.
लल्लू- दीदियो कोई चाय पिलायेगा क्या.
बड़ी ममी- बाबू क्या तू डेली ऐसे hi सोया रहता है इतनी देर.
ऋतू- तो और क्या. करने को कुछ होता नहीं है. तो सोया hi रहेगा.
बड़ी ममी- ललिता ये मई क्या सुन रही हु.
लल्लू मुसकुडने लगा. फिर उठ क्र ममी क पास गया और उनको पकड़ क्र बैठ गया. उनके पास
लल्लू- आप को क्या लगता है.
छोटी ममी- दीदी, बाबू थक गया होगा. जब हम कार मई बैठे बैठे थक गए थे तो ये तो इतनी देर ड्राइव क्र क आया है.
सभी काकी एक साथ- क्या…. लल्लू ड्राइव क्र क आया है…
इसने कैसे कार चला लिया.
बड़ी ममी- क्या मतलब…. कैसे कार चला लिया. जैसे चलाया जाता है वैसे hi तो चलाएगा न.
काजल- नहीं. नहीं. हमारा मतलब था की इसने कब सिख लिया कार चलना. इसे तो बुलेट चलना भी नहीं आता.
दोनों ममी- क्या…..
फिर दोनों ममी लल्लू को देखने लगी.
लल्लू- लल्लू नाम है मेरा.
बड़ी ममी- कौन कहता है तुम्हे लल्लू. अगर आज क बाद किसी क मुँह से ये लल्लू बल्लू सुन्नन लिया तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.
सब अचानक चुप्प..
लल्लू- संत ममी संत… वो सब प्यार से बोलते है. ऐसा कुछ नहीं है.
बड़ी ममी- नहीं मुझे ये पसंद नहीं कोई तुम्हे लल्लू कहे. अरे इतना अच्छा नाम है ललित. सब ये कहने क बदले लल्लू उल्लू ऐसे भी कोई अपने बेटे को भाई को कहता है क्या.
लल्लू छोटी ममी को इसरा किया.
तब छोटी ममी आगे बढ़ क्र बड़ी ममी को संत किये.
बड़ी ममी उठ क्र कमरे मई चली गई.
पीछे छोटी ममी भी चली गई.
लल्लू उठ क्र मम्मी क कमरे की और उन्हें मानाने चला गया.
बड़ी बुआ- वैसे भाबी, बात तो सही है. अब इतने मेहमान होंगे घर मई वह उसे सब लल्लू लल्लू क्र क पुकरबगें क्या ये अच्छा लगेगा आप लोगो को.
रागिनी- नहीं.
छोटी बुआ- फिर आप लोग ये सब बाते पहले क्यू नहीं सोचे.
रागिनी- अब तो आदत हो गया है लल्लू बोलने का.
छोटी बुआ- वैसे आप सब उसे लल्लू क्यू कहते है.
काजल- क्या बताये दीदी. ये जब पढाई क्र रहा था सायद तब 8 मई था स्कूल मई सीधी से लुढ़कता हुआ निचे आ गया जिस कारन इसके सर मई चोट लग गया था. चोट तो सही हो गया लेकिन कभी कभी ये उस चोट क कारन पागल जैसा हो जाता है. इसकी हरकते बच्चो वाली हो जाती है.
इसी लिए सब इसे लल्लू कहने लगे. ककी इसे सही गलत सच झूठ कुछ भी पता नहीं होता है.
बड़ी बुआ- अभी देख क्र तो ये घर मई सब से समझदार लग रहा है. बिलकुल पिताजी की तरह.
छोटी बुआ- सही कहा दीदी. जब से हम लोग आये है तब से तो सच मई ये घर का सब से समझदार लगता है. और सुनील भैया से बाटे करता देख क्र तो यही लग रहा था जैसे आप लोग hi लल्लू हो या वो जान बुझ क्र आप सब को लल्लू बना रहा है.
सोनम- वैसे आप ने सही कहा बुआ. भाई कही से भी वैसा नहीं लगता है. वैसे भी हम तो उसे हमेसा भाई hi कह क्र बुलाये है.
बड़ी बुआ- तुम लोगो की माये hi सब की है. यही उसे लल्लू लल्लू करती रहती होंगी.
छोटी बुआ- वैसे बड़ी भाबी जी आप की भाबी क्यू इतना गुस्सा हो गई.
ऋतू- वो दरअशल बात ये है की वो लल्लू को…..
सोनम- maa….abhi अभी इतना बोलै है सब ने फिर भी आप बाज नहीं आ रही.
सोनम गुस्से मई ऋतू को बोली.
ऋतू समाज नहीं पाई.
ऋतू- क्या हुआ. मैंने क्या क्र दिया अब.
कोमल- काकी. आप अब भी भाई को लल्लू कह रही है.
ऋतू- ओह्ह. ये आदत हो गया है. बातो बातो मई मुँह से निकल जाता है. धीरे धीरे hi ये छूटेगा.
है तो मई क्या कह रही थी.
छोटी बुआ- आप अपनी भाबी और ललित क बारे मई बता रही थी.
ऋतू- है. मेरी भाभी Lallu...lalit को अपने बेटे की तरह मानती है. जब लाल्ल्लित को चोट लग गया था तो मेरे भैया को भी पता चला तो वो देखने आये थे.
फिर वो लाल्ल्लित को अपने साथ ले क्र चले गए थे. ललित वह कई साल रहा है.
छोटी बुआ- अच्छा तो ये बात है. इसी लिए वो ललित को इतना चाहती है.
सब यु hi बाटे क्र रहे थे यहाँ.
उप्पेर लल्लू बड़ी ममी क कमरे मई गया तो बड़ी ममी रो रही थी और छोटी ममी उन्हें चुप करा रही थी.
लल्लू कमरे मई जा क्र बड़ी ममी क सामने बैठ गया अपना कान पकड़ क्र.
लल्लू- प्लस ममी आप चुप हो जाइये. ये सब मेरी hi गलती है. प्लस आप मत रोइये. नहीं तो मई भी रोने लगूंगा.
बड़ी ममी अपने आँखों से बहते आँखों को हाथो से साफ क्र लल्लू को उठा क्र गले से लगा लिया.
बड़ी ममी- फिर मुझे ऐसे रुलाया तो मई तुझ से कभी बात नहीं करुँगी
लल्लू ममी क गले लगे हुए गर्दन हिला दिया.
फिर तीनो वही बैठे बाटे करने लगे.
थोड़ी देर मई सोनम इन सब को निचे चलने को बुलाने आयी.
बड़ी ममी- बीटा एक काम क्र. हम जो शॉपिंग किये है न उस मई से चार पैकेट निचे करवा दे.
छोटी ममी वो चार पैकेट लल्लू को दिखा दी जो निचे लाना था.
लल्लू एक एक क्र चारो पैकेट ले जा क्र निचे जहा सब आँगन मई बैठे थे वह रख दिया.
तब तक चाय बन गई थी.
सब चाय पिने लगे.
छोटी ममी एक एक पैकेट खोल क्र उस मई से सब को उनका कपडा बाँट दिए.
ऋतू- भाभी ये क्या है. इतना सब क्यू किया आप. आप लोग यहाँ आये हमारे लिए यही बहुत है.
बड़ी ममी- आती कैसे नहीं. हमारा बीटा जो गया था बुलाने.
और ये सब छोटा सा उपहार मेरे बेटे की तरफ से.
सोनम- ममी हम सब को तो दे दिए लेकिन आप का लाडला बीटा hi रह गया. उसे कुछ मिला hi नहीं.
लल्लू- मुझे भी मिला है दी.
सोनम और कोमल - क्या मिला दिखाओ.
लल्लू- दालान क बहार खड़ा है न लाल रंग का.
लल्लू मुसकुडता हुआ बोलै.
रोमा- बहार लाल रंग का तो कार है जो भैया को उपहार मई उनके ससुर ने दिया है.
लल्लू- मेरी प्यारी बहन वह रेड कलर का एक नहीं दो कार है.
मीनू- भाई, जिस से ममी आई है.
लल्लू- है, वो मेरा hi है. जो मई वही मां क पास छोड़ दिया था पिछली बार.
गौरी- वाओ भाई. वो तो ऑडी है. बहुत सुन्दर है.
लल्लू गौरी को पकड़ क्र अपने पास बैठता हुआ.
लल्लू- वो मेरे साथ साथ मेरी सभी बहनो का भी है.
रानी- थैंक ु भाई.
लल्लू- भाई को थैंक ु नहीं कहते. ये बड़े बुजुर्गो ने कहा है.
सभी हुस्ने लगे.
फिर लल्लू सब को वह छोड़ दालान पर आ गया पूछने की कोई काम तो नहीं बचा है.
फिर लल्लू वही सब क साथ बैठा रहा जब तक खाना न तैयार हो गया रात का.
सुनील काका हलवाई को बुला लिए थे तो अब से हलवाई hi खाना बना रहा था.
घर की सभी महिलाये अब फ्री थी.
परसो सगुन का रस्म था.
अभी छितिज पर सूर्य की लाली फ़ैल hi रही थी. सूर्य देव अभी उदय नहीं हुए थे. चारो और अँधेरे का परत अब हट गया था और उजाला अपना पंख फैलाना सुरु क्र दिया था.
त्रम्ब्केश्वर नाशिक…..
गोदावरी नदी किनारे एक इक्कंत स्थान, जहा परिंदे और नदी क अविरल धरा क अलावा और वह कोई नहीं था.
सो सॉरी….
वह कोई और भी था…
ओह्ह्हू आज ये हो क्या रहा है.
वह कोई और भी था… नहीं बल्कि थी…
एक कमशीन, अल्हड़, जवानी से लबरेज काळा वस्त्र पहले लड़की.
गोदावरी नदी मई एक नव क उप्पेर अकेली योग मुद्रा मई काफी देर से एक hi ाशन मई स्थिर थी.
वो नटराज मुद्रा मई पूर्व की और अपना चेहरा क्र क बाये पेअर पर कड़ी हो क्र दाहिने पेअर को पीछे सर की सिद्ध मई मोर क्र दोनों हाथ को सर क उप्पेर से पीछे ले जा क्र दाहिने पेअर क उंगलियों को पकडे हुए थी.
सूर्य की बहुत हलकी किरणे उसके सलोने मुखड़े पर पर रहा था.
बड़ा hi मनमोहक दृश्य था ये.
सूर्य की तीक्षण किरणे जब उसके पुरे बदन मई सामने लगा तब जा कर कही वो अपने इस नटराज मुद्रा से बहार आई.
वह से नव खेती हुई वो लड़की गोदावरी नदी किनारे पहुंची और फिर नव को एक किनारे लगा क्र उस मई से उतर गई.
एक बार नदी को प्रणाम क्र वापस चल पड़ी.
थोड़ी देर बाद वो त्रम्ब्केश्वर क योग विद्या पीठ आश्रम मई पहुंची.
वह जा क्र वो एक कमरे मई चली गई. जो सायद उसका hi था.
वह फ्रेश होने क बाद वो बहार निकल क्र आई.
तभी उस आश्रम क आचार्य दिखे जो वह क बचो को शिक्षा दे रहे थे.
इसारे से उन्होंने उस लड़की को अपने पास बुलाये.
आचार्य- कहा गई थी तुम पुत्री.
लड़की- बाबा मई तो गोदावरी नदी किनारे योग क्र रही थी.
आचार्य- बीटा गायत्री. काम से काम किसी को बता क्र तो जाया करो.
वो लड़की जिसका नाम गायत्री था.
गायत्री- क्षमा करे बाबा. आगे से बता क्र जाउंगी.
फिर आचार्य बच्चो को पढ़ने लगे और गायत्री वह आश्रम क पशु पक्षियों को उनका खाने क लिए दाना और चारा देने लगी.
वह आश्रम मई एक और कुछ मोर कोयल कबूतर इधर उधर घूम क्र गायत्री द्वारा छींटे गए डेन को चोग रहे थे तो एक और बंधी हुई गाय घास खा रही थी.
गायत्री उन्हें खता देख क्र बहुत खुश हो रही थी.
लल्लू बीएड पर लेता सदी ब्याह क कनु से काम रह गए है उसके बारे मई सोच रहा था.
अभी वो कल पुरे दिन यहाँ नहीं था और अभी दोपहर क बाद आया है.
उसे पता भी नहीं था की क्या काम शेष है और क्या हो गया है.
उसे काका से पूछना पड़ेगा की क्या सब काम सेष रह गया है ताकि जल्दी से उन कामो को निपटाया जा सके.
इधर माँ और ऋतू काकी का ब्यबहार भी कुछ ठीक नहीं लग रहा.
लगता है अभी भी नाराज है.
समझ नहीं आ रहा था की क्या करे. कैसे मनाये उन्हें. क्या कहे माँ को.
लगता है माँ ऋतू काकी क बारे मई जान गई है. अब कैसे उन्हें समझौ.
उधर वो ऋतू काकी है की वो अलग मुँह फुलाए बैठी है.
अब इतनी बड़ी गांड बना क्र मटकती हुई घूमेगी तो फिर इस मई मेरा क्या कसूर है.
अब मुझ से नहीं रहा गया तो मई क्या करू.
क्यू इन सब क बारे मई सोचता हु मई.
मुझे अपने जान क बारे मई सोचना चाहिए.
जब से आया हु ठीक ढंग से बात भी नहीं हुई है.
वैसे आज वो कितनी खूबसूरत लग रही थी ग्रीन सूट मई.
माँ कशम कहर ध रही थी.
मेरा बस चले तो अभी मई उन्हें भाग क्र कही दूर देश के जाऊ. जहा मई और मेरी जान हो और हम अक्षर प्यार भरी बाटे करता rahu.
लल्लू यु hi उटपटांग बाटे सोचता हुआ सो गया.
" लल्लू बीटा कितना सोता है. रात को क्या करेगा. अब उठ जा नहीं तो रात मई नींद नहीं आएगी.
आवाज सुन क्र लल्लू की आँख खुल गई.
देखा तो छोटी बुआ झुक क्र उसे उठा रही थी
झुकने क कारन छोटी बुआ की सूट क गले से बुआ की गोरी बड़ी बड़ी दो पहर काली ब्रा मई कैसे हुए आधा से बहार निकल झक रहा था.
लल्लू का तो मन किया की अभी इन दूध से भरे टंकी को निचोड़ निचोड़ क्र पि जय.
छोटी बुआ जब लल्लू को यु अपनी और घूरती देखि तो समझ hi नहीं पाई की ये ऐसे क्यू घर रहा है बड़ी बड़ी आँखे क्र के.
फिर जब वो लल्लू क आँखों का पीछा की यह जानने क लिए तब उन्हें एहसास हुआ की ये लल्लू उल्लू की तरह क्यू तक रहा है.
वो झट से सीधी हो क्र अपने सूट को सही करती लल्लू को एक बार गौर से देख कमरे से बहार निकल गई.
लल्लू सर पिट लिया अपना.
ये क्या क्र दिया. क्या सोचेंगी मेरे बारे मई.
लल्लू सर्मिन्दा सर्मिन्दा सा उठा और फ्रेश हो क्र आँगन मई आ गया.
आज आँगन मई जमघट लगा था.
वैसे भी उसके घर मई hi काफी मेम्बर है लेकिन दोनों बुआ उनके दो बच्चे और अब दो ममी.
बहुत अच्छा लग रहा था.
सब बहुत खुश थे.
लल्लू खटिये पर बैठा सब क चेहरे को निहार रहा था.
जब वो नजर घूमता सोनम की और देखा तो वो भी लल्लू को hi देख रही थी.
सोनम आँखों क इसारे से लल्लू से पूछो की क्या हुआ क्या देख रहा है वो.
लल्लू भी इसारे मई hi बता दिया की कोई बात नहीं है बस यु hi वो सब को तर रहा था की इन सब क चेहरे पर खुशिया कैसे चमक रही है.
लल्लू- दीदियो कोई चाय पिलायेगा क्या.
बड़ी ममी- बाबू क्या तू डेली ऐसे hi सोया रहता है इतनी देर.
ऋतू- तो और क्या. करने को कुछ होता नहीं है. तो सोया hi रहेगा.
बड़ी ममी- ललिता ये मई क्या सुन रही हु.
लल्लू मुसकुडने लगा. फिर उठ क्र ममी क पास गया और उनको पकड़ क्र बैठ गया. उनके पास
लल्लू- आप को क्या लगता है.
छोटी ममी- दीदी, बाबू थक गया होगा. जब हम कार मई बैठे बैठे थक गए थे तो ये तो इतनी देर ड्राइव क्र क आया है.
सभी काकी एक साथ- क्या…. लल्लू ड्राइव क्र क आया है…
इसने कैसे कार चला लिया.
बड़ी ममी- क्या मतलब…. कैसे कार चला लिया. जैसे चलाया जाता है वैसे hi तो चलाएगा न.
काजल- नहीं. नहीं. हमारा मतलब था की इसने कब सिख लिया कार चलना. इसे तो बुलेट चलना भी नहीं आता.
दोनों ममी- क्या…..
फिर दोनों ममी लल्लू को देखने लगी.
लल्लू- लल्लू नाम है मेरा.
बड़ी ममी- कौन कहता है तुम्हे लल्लू. अगर आज क बाद किसी क मुँह से ये लल्लू बल्लू सुन्नन लिया तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.
सब अचानक चुप्प..
लल्लू- संत ममी संत… वो सब प्यार से बोलते है. ऐसा कुछ नहीं है.
बड़ी ममी- नहीं मुझे ये पसंद नहीं कोई तुम्हे लल्लू कहे. अरे इतना अच्छा नाम है ललित. सब ये कहने क बदले लल्लू उल्लू ऐसे भी कोई अपने बेटे को भाई को कहता है क्या.
लल्लू छोटी ममी को इसरा किया.
तब छोटी ममी आगे बढ़ क्र बड़ी ममी को संत किये.
बड़ी ममी उठ क्र कमरे मई चली गई.
पीछे छोटी ममी भी चली गई.
लल्लू उठ क्र मम्मी क कमरे की और उन्हें मानाने चला गया.
बड़ी बुआ- वैसे भाबी, बात तो सही है. अब इतने मेहमान होंगे घर मई वह उसे सब लल्लू लल्लू क्र क पुकरबगें क्या ये अच्छा लगेगा आप लोगो को.
रागिनी- नहीं.
छोटी बुआ- फिर आप लोग ये सब बाते पहले क्यू नहीं सोचे.
रागिनी- अब तो आदत हो गया है लल्लू बोलने का.
छोटी बुआ- वैसे आप सब उसे लल्लू क्यू कहते है.
काजल- क्या बताये दीदी. ये जब पढाई क्र रहा था सायद तब 8 मई था स्कूल मई सीधी से लुढ़कता हुआ निचे आ गया जिस कारन इसके सर मई चोट लग गया था. चोट तो सही हो गया लेकिन कभी कभी ये उस चोट क कारन पागल जैसा हो जाता है. इसकी हरकते बच्चो वाली हो जाती है.
इसी लिए सब इसे लल्लू कहने लगे. ककी इसे सही गलत सच झूठ कुछ भी पता नहीं होता है.
बड़ी बुआ- अभी देख क्र तो ये घर मई सब से समझदार लग रहा है. बिलकुल पिताजी की तरह.
छोटी बुआ- सही कहा दीदी. जब से हम लोग आये है तब से तो सच मई ये घर का सब से समझदार लगता है. और सुनील भैया से बाटे करता देख क्र तो यही लग रहा था जैसे आप लोग hi लल्लू हो या वो जान बुझ क्र आप सब को लल्लू बना रहा है.
सोनम- वैसे आप ने सही कहा बुआ. भाई कही से भी वैसा नहीं लगता है. वैसे भी हम तो उसे हमेसा भाई hi कह क्र बुलाये है.
बड़ी बुआ- तुम लोगो की माये hi सब की है. यही उसे लल्लू लल्लू करती रहती होंगी.
छोटी बुआ- वैसे बड़ी भाबी जी आप की भाबी क्यू इतना गुस्सा हो गई.
ऋतू- वो दरअशल बात ये है की वो लल्लू को…..
सोनम- maa….abhi अभी इतना बोलै है सब ने फिर भी आप बाज नहीं आ रही.
सोनम गुस्से मई ऋतू को बोली.
ऋतू समाज नहीं पाई.
ऋतू- क्या हुआ. मैंने क्या क्र दिया अब.
कोमल- काकी. आप अब भी भाई को लल्लू कह रही है.
ऋतू- ओह्ह. ये आदत हो गया है. बातो बातो मई मुँह से निकल जाता है. धीरे धीरे hi ये छूटेगा.
है तो मई क्या कह रही थी.
छोटी बुआ- आप अपनी भाबी और ललित क बारे मई बता रही थी.
ऋतू- है. मेरी भाभी Lallu...lalit को अपने बेटे की तरह मानती है. जब लाल्ल्लित को चोट लग गया था तो मेरे भैया को भी पता चला तो वो देखने आये थे.
फिर वो लाल्ल्लित को अपने साथ ले क्र चले गए थे. ललित वह कई साल रहा है.
छोटी बुआ- अच्छा तो ये बात है. इसी लिए वो ललित को इतना चाहती है.
सब यु hi बाटे क्र रहे थे यहाँ.
उप्पेर लल्लू बड़ी ममी क कमरे मई गया तो बड़ी ममी रो रही थी और छोटी ममी उन्हें चुप करा रही थी.
लल्लू कमरे मई जा क्र बड़ी ममी क सामने बैठ गया अपना कान पकड़ क्र.
लल्लू- प्लस ममी आप चुप हो जाइये. ये सब मेरी hi गलती है. प्लस आप मत रोइये. नहीं तो मई भी रोने लगूंगा.
बड़ी ममी अपने आँखों से बहते आँखों को हाथो से साफ क्र लल्लू को उठा क्र गले से लगा लिया.
बड़ी ममी- फिर मुझे ऐसे रुलाया तो मई तुझ से कभी बात नहीं करुँगी
लल्लू ममी क गले लगे हुए गर्दन हिला दिया.
फिर तीनो वही बैठे बाटे करने लगे.
थोड़ी देर मई सोनम इन सब को निचे चलने को बुलाने आयी.
बड़ी ममी- बीटा एक काम क्र. हम जो शॉपिंग किये है न उस मई से चार पैकेट निचे करवा दे.
छोटी ममी वो चार पैकेट लल्लू को दिखा दी जो निचे लाना था.
लल्लू एक एक क्र चारो पैकेट ले जा क्र निचे जहा सब आँगन मई बैठे थे वह रख दिया.
तब तक चाय बन गई थी.
सब चाय पिने लगे.
छोटी ममी एक एक पैकेट खोल क्र उस मई से सब को उनका कपडा बाँट दिए.
ऋतू- भाभी ये क्या है. इतना सब क्यू किया आप. आप लोग यहाँ आये हमारे लिए यही बहुत है.
बड़ी ममी- आती कैसे नहीं. हमारा बीटा जो गया था बुलाने.
और ये सब छोटा सा उपहार मेरे बेटे की तरफ से.
सोनम- ममी हम सब को तो दे दिए लेकिन आप का लाडला बीटा hi रह गया. उसे कुछ मिला hi नहीं.
लल्लू- मुझे भी मिला है दी.
सोनम और कोमल - क्या मिला दिखाओ.
लल्लू- दालान क बहार खड़ा है न लाल रंग का.
लल्लू मुसकुडता हुआ बोलै.
रोमा- बहार लाल रंग का तो कार है जो भैया को उपहार मई उनके ससुर ने दिया है.
लल्लू- मेरी प्यारी बहन वह रेड कलर का एक नहीं दो कार है.
मीनू- भाई, जिस से ममी आई है.
लल्लू- है, वो मेरा hi है. जो मई वही मां क पास छोड़ दिया था पिछली बार.
गौरी- वाओ भाई. वो तो ऑडी है. बहुत सुन्दर है.
लल्लू गौरी को पकड़ क्र अपने पास बैठता हुआ.
लल्लू- वो मेरे साथ साथ मेरी सभी बहनो का भी है.
रानी- थैंक ु भाई.
लल्लू- भाई को थैंक ु नहीं कहते. ये बड़े बुजुर्गो ने कहा है.
सभी हुस्ने लगे.
फिर लल्लू सब को वह छोड़ दालान पर आ गया पूछने की कोई काम तो नहीं बचा है.
फिर लल्लू वही सब क साथ बैठा रहा जब तक खाना न तैयार हो गया रात का.
सुनील काका हलवाई को बुला लिए थे तो अब से हलवाई hi खाना बना रहा था.
घर की सभी महिलाये अब फ्री थी.
परसो सगुन का रस्म था.