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- Dec 5, 2013
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Update:-21
इधर कैंटीन से निकालकर आरव सीधा हिस्ट्री की क्लास के लिए चल दिया। लेकिन क्या ही किया किया जा सकता है, हिस्ट्री के क्लास तक पहुंचने के लिए उसकी जानकारी भी तो होनी चाहिए।
उसने एक छात्र को रोक कर "इतिहास के कक्षा कहां लगती है" उसकी जानकारी पूछने लगा… वो लड़का हाथ दिखता उसे "पागल" कहता हुआ चला गया। इसी तरह 3-4 और छात्र-छात्राओं से भी जानकारी निकालने की कोशिश किया लेकिन किसी ने भी उसके सवालों में तनिक भी रुचि नहीं दिखाई।
अंत में वो सीधा ऑफीस पहुंचा, वहां एक चपरासी को 20 रुपए दिए और तब कहीं जाकर उसे इतिहास के कक्षा के बारे में पता चला। कक्षा के पता चलने के बाद वहां रुकने की कोई वजह नहीं थी इसलिए वो भागने के लिए तैयार ही बैठा था, तभी वो चपरासी उसे टोकते हुए…. "अरे सुन मजनू, कहां भाग रहा है। फर्स्ट ईयर के हिस्ट्री का लैक्चर तो कब का खत्म हो चुका होगा"…
आरव:- ओह ! सब बेकार हो गया।
चपरासी:- 200 रुपए दे मैं पूरी डिटेल बता सकता हूं, कि कौन किसी वक़्त किस क्लास में होगी।
आरव:- तू तो भाई निकला, 500 रुपया लेले.. पर काम जल्दी कर दे…
उस चपरासी ने 500 रुपए लेेकर अपने पीछे आने के लिए बोला। आरव उसके साथ स्टाफ रूम में पहुंचा जहां एक कोने में कंप्यूटर लगा था। चपरासी ने कॉलेज पोर्टल पर किसी स्टाफ के नाम से लॉगिन करने के बाद उसे कहने लगा…. "अभी स्टूडेंट के फोटो के साथ नाम है… उसपर क्लिक कर पूरी क्लास कि डिटेल पता चल जाएगी। फिर मेरे पास आना.. कौन सी क्लास कहां लगती है मैं बता दूंगा। लेकिन उसके पैसे अलग लगेंगे।"
आरव, प्रोफ़ाइल ढूंढ़ते ढूंढ़ते कहने लगा…. भाई पक्का बिजनेसमैन हो… ये मिल गई अपनी जानेमन… ओ तेरी.. ये कहां से प्लॉट हो गई इधर।
चपरासी… मिल गई तो जल्दी डिटेल निकाल ना। यहां ज्यादा देर नहीं रुक सकते।
आरव लावणी ढूंढ़ रहा था… और इंग्लिश के लेटर K के बाद L आता है जहां लावणी के नाम के ठीक ऊपर कुंजल लिखा था वो भी तस्वीर के साथ। अब काहे वो लावणी की डिटेल लेने लगा। कुंजल की पूरी डिटेल वो लिखा और भागते हुए खुद अपनी आखों से देख कर सुनिश्चित करने चला गया कि, वाकई ये कुंजल ही है।
भागते वो कुंजल के क्लास के पास पहुंचा और कुछ दूरी पर छिप कर, वो क्लास की गेट पर नजर जमा लिया। तकरीबन 10 मिनट बाद क्लास ख़त्म हुई और छात्र-छात्राएं बाहर आने लगी। आरव बड़े गौर से सबको देखते जा रहा था। लावणी भी अपनी क्लास समाप्त कर निकल रही थी, कि उसकी नजर आरव पर पड़ गई।
बड़े आराम से वो आरव के पास पहुंची। ऐसा भी नहीं था कि वो दबे पाऊं या छिप कर अा रही हो, लेकिन आरव तो बिल्कुल "बको ध्यानं" (बगुले की तरह ध्यान लगाना) किए था कुंजल के लिए। लावणी उसके दाएं ओर खड़ी होकर उसके कंधे पर हाथ अपना हाथ रखी और वो भी सामने देखने लगी।
कुछ देर तक देखने के बाद…. हूं !!! शॉर्ट, स्कर्ट, स्लीवलेस, टाईट टी शर्ट, टाईट जीन्स, काफी सुकून मिल रहा होगा ना इन्हे देख कर। अब तक तो आखों से ही पूरा माप लेे लिया होगा। काफी सेक्सी लड़कियां है ना....
आरव बिना ध्यान दिए हुए…. हैं तो काफी सेक्सी लेकिन मज़ा कहां अा रहा है देखने में। जल्दी से दिख जाति तो सस्पेंस खत्म हो जाता।
लावणी:- जल्दी से सबकुछ थोड़े ना यहां दिखेगा। अब यहां न्यूड होकर तो नहीं घूम सकती ना, जितना दिख रहा है उतने में ही काम चला लो।
आरव:- अरे नहीं, ऐसा नहीं है.. मैं तो वो कुंजल…… वो ओ ओ !!! लावणी तुम !!
लावणी:- जी हां मै.. आखों में एक्सरे लगवा लो, सब कुछ जल्दी में दिख जाएगा।
आरव:- आंह ! पागल कहीं की मैं जल्दी में क्या दिखने की बात कह रहा हूं और तुम क्या सोच ली।
लावणी:- तुम मुझे बातों में घुमाओ मत। वैसे भी मुझे क्या लेना देना तुम कुछ भी करो। बस साची दी ने कहा था तुम मुझे घर तक छोड़ दोगे, इसलिए यहां अाई मै।
आरव:- ठीक है कैंटीन में जाकर बस 10 मिनट इंतजार करो, मैं आया।
लावणी मुंह बना कर भनभनाते वहां से चली गई और आरव फिर से कुंजल को ढूंढ़ने लगा। चारों ओर उसने अपनी नजर दौड़ाई। तभी उसे 4 लड़कियों का एक समूह दिखा, जहां उसे कुंजल भी दिख गई। कुंजल को देखते ही…. "ये पागल इधर क्या कर रही है। अपस्यु से बात करनी पड़ेगी"…
आरव वहां से दबे पाऊं भाग कर कैंटीन में आया जहां लावणी उसका इंतजार कर रही थी। वहां से फिर दोनों फटफटी में सवार होकर निकल गए। रास्ते में दोनों बिल्कुल खामोश थे और आरव इतनी देर तक खामोश हो रह जाए… कैसे संभव था…
फटफटी पर बैठा, वो भी हैल्मेट लगा कर, बात कर पाना काफी मुश्किल होता था, इसलिए उसने लावणी को कॉल लगाया.. जब लावणी ने अपने फोन को देखी तब वो एक बार फोन तो एक बार आरव को ही देख रही थी। चिल्लाती हुई वो उसके कानों में बोली…. "यहीं तो हूं, फिर कॉल क्यों लगा रहे"
आरव:- कॉल उठाओ बस…
लावणी कॉल रिसीव कर, इयरपीस अपने कानो में लगाती…. "मेरी शांति तुमसे देखी नहीं जाती, बको क्या बकना है"..
आरव, हंसते हुए… "इतना भड़क क्यों रही हो, तुम्हे छोड़ कर किसी और को देख रहा था, इसी बात का गुस्सा हो क्या?"
लावणी, गुस्से से बढ़ी श्वांस को काबू करती…. "मैं क्यों तुमसे गुस्सा होने लगी, मैं तो साची पर गुस्सा हूं की खुद चली गई मुझे फसा दी। आज उसको भी बताती हूं मै।"
आरव फिर से हंसते हुए…. ओह ऐसा है क्या?
लावणी:- मैं कोई कॉमेडी कर रही हूं, जो हर बात पर मुंह फाड़ कर हंस रहे हो। आगे देखो वरना कहीं अपने भाई की तरह तुम भी खटिया ना पकड़ लेना।
आरव:- अच्छा सॉरी बाबा। मैं अब बिल्कुल भी नहीं हंसने वाला, अब तो खुश हो ना।
लावणी:- नहीं । तुम मेरे कुंडली से गायब हो जाओ, तब मैं खुश हो जाऊंगी।
आरव:- अच्छा जी तो ऐसी बात है। वैसे हमारे बीच एक डील हुआ था, उसका क्या?
लावणी:- जाकर उस तस्वीर को इंटरनेट पर डाल दो। उससे भी मन ना भड़े तो मेरे घर की दीवाल पर, कॉलेज में हर जगह उसके पोस्टर लगा दो। लेकिन मैं ब्लैकमेल नहीं होने वाली।
आरव उस वक़्त सिर नहीं खुजा सकता था वरना वो सबसे पहले अपना सिर ही खुजता। लावणी का ये नया और बदला रूप, आरव को बिल्कुल चुप होकर अपने अंदर खुद से बात करने पर मजबुर कर दिया…. " ये वही लावणी है.. पापा की डरपोक पड़ी या कहीं 180ml चढ़ा कर तो ना अाई है। ऐसा लग रहा है कल रात ही इसमें नया अपडेट आया हो और ये नया वर्जन काफी खरनाक है।"
"रोको, रोको, रोको"… आरव अपने आप से बात करने में लगा था, तभी लावणी जोर से चिंखती हुई कहने लगी।
"क्या हुआ, पगला क्यों रही हो"… आरव ने भी चिढ़ जर जवाब दिया।
लावणी:- मोड़ अा रहा है… गाड़ी रोक, मैं पैदल चली जाऊंगी।
आरव, फटफटी को गली के अंदर लेते हुए बोलने लगा…. "क्यों डर रही हो। इतनी तेज धूप में कौन तुम्हारे घर से से बाहर आकर दरवाजे पर……
आरव कुछ दूर पीछे ही था कि उसे अपार्टमेंट के सामने का नजारा दिखा…. सुलेखा ठीक साची के सामने थी और वो स्कूटी का ब्रेक लगा दी।… उनको देख कर आरव कहने लगा… "बच गई लावणी आज तू, तेरी मां का ध्यान साची पर है"…..………….लावणी.. लावणी.. और नजर जब पीछे गई तो कुछ लड़के लावणी के पास खड़े थे…
दरअसल जैसे ही गाड़ी गली के अंदर पहुंची लावणी ने देख लिया कि सुलेखा सड़क पार करके अपार्टमेंट की ओर जा रही है, और ये नजारा देख वो बाइक से कूद गई। आरव तो बातों में लगा था कि "क्यों डर रही हो".. और उसे पता भी नहीं चला कि कब लावणी कूद गई। जब पीछे मुड़ कर देखा तब पता चला कि वो कूद चुकी है….
सामने का नजारा देख साची तो हक्की-बक्कि रह गई। साची के चेहरे के उड़ते रंग को देख आरव समझ गया कि "ये घबराहट में जरूर फसेगी"… इसलिए वो फटफटी को उनके पास लेे आया और कल्च दबा कर जोर से एक्सेलेरेटर लेते हुए…. "ये क्या आप लोग रास्ता रोक खड़े है, थोड़ा किनारे होंगी क्या"..
सुलेखा जो टुकुर-टुकुर साची को घुरे जा रही थी, वो आरव की ओर देखती हुई… "जा ना इतना तो जगह खाली है"..
आरव:- आंटी लगता है आप को धूप लग गया है, और साथ में आपकी बेटी को भी, वहां देखो सड़क पर ही गिर-पड़ रही है।
सुलेखा जब लावणी के बारे में सुनी तब उसने भी अपनी नजर दूर दौड़ाई और बड़ी तेजी से लावणी को देखने गई… साची भी तुरंत लावणी के पास जाना चाहती थी, लेकिन उसे रोकते हुए….. "इतना घबराने से फसोगी। कूल रहो और फूल बनाओ। जाओ अब जाकर उसे भी देखो।"..
इतना कह कर आरव अंदर चला गया और साची भी लावणी के पास पहुंच गई। इधर अपार्टमेंट पहुंचते ही आरव जल्दी में अपने फ्लैट पहुंचा…. अपस्यु वहीं बिस्तर पर बैठा अपने हाथ और बदन को देख रहा था…
"अपस्यु, तू जानता भी है उस कॉलेज में कौन पढ़ रही है"… आरव अंदर आते ही हड़बड़ा कर अपनी बात कहा…
अपस्यु:- कौन पढ़ रही है…
आरव:- कुंजल भी वहां पढ़ रही है.. एक साल सीनियर क्लास में…
अपस्यु:- कौन कुंजल…
"कितने कुंजल को तू जानता है… हां मैं उसी कुंजल की बात कर रहा हूं, जिसके बारे में तू अभी सोच रहा होगा"… आरव ने चिढ़ते हुए अपस्यु को सुना दिया।…
इधर कैंटीन से निकालकर आरव सीधा हिस्ट्री की क्लास के लिए चल दिया। लेकिन क्या ही किया किया जा सकता है, हिस्ट्री के क्लास तक पहुंचने के लिए उसकी जानकारी भी तो होनी चाहिए।
उसने एक छात्र को रोक कर "इतिहास के कक्षा कहां लगती है" उसकी जानकारी पूछने लगा… वो लड़का हाथ दिखता उसे "पागल" कहता हुआ चला गया। इसी तरह 3-4 और छात्र-छात्राओं से भी जानकारी निकालने की कोशिश किया लेकिन किसी ने भी उसके सवालों में तनिक भी रुचि नहीं दिखाई।
अंत में वो सीधा ऑफीस पहुंचा, वहां एक चपरासी को 20 रुपए दिए और तब कहीं जाकर उसे इतिहास के कक्षा के बारे में पता चला। कक्षा के पता चलने के बाद वहां रुकने की कोई वजह नहीं थी इसलिए वो भागने के लिए तैयार ही बैठा था, तभी वो चपरासी उसे टोकते हुए…. "अरे सुन मजनू, कहां भाग रहा है। फर्स्ट ईयर के हिस्ट्री का लैक्चर तो कब का खत्म हो चुका होगा"…
आरव:- ओह ! सब बेकार हो गया।
चपरासी:- 200 रुपए दे मैं पूरी डिटेल बता सकता हूं, कि कौन किसी वक़्त किस क्लास में होगी।
आरव:- तू तो भाई निकला, 500 रुपया लेले.. पर काम जल्दी कर दे…
उस चपरासी ने 500 रुपए लेेकर अपने पीछे आने के लिए बोला। आरव उसके साथ स्टाफ रूम में पहुंचा जहां एक कोने में कंप्यूटर लगा था। चपरासी ने कॉलेज पोर्टल पर किसी स्टाफ के नाम से लॉगिन करने के बाद उसे कहने लगा…. "अभी स्टूडेंट के फोटो के साथ नाम है… उसपर क्लिक कर पूरी क्लास कि डिटेल पता चल जाएगी। फिर मेरे पास आना.. कौन सी क्लास कहां लगती है मैं बता दूंगा। लेकिन उसके पैसे अलग लगेंगे।"
आरव, प्रोफ़ाइल ढूंढ़ते ढूंढ़ते कहने लगा…. भाई पक्का बिजनेसमैन हो… ये मिल गई अपनी जानेमन… ओ तेरी.. ये कहां से प्लॉट हो गई इधर।
चपरासी… मिल गई तो जल्दी डिटेल निकाल ना। यहां ज्यादा देर नहीं रुक सकते।
आरव लावणी ढूंढ़ रहा था… और इंग्लिश के लेटर K के बाद L आता है जहां लावणी के नाम के ठीक ऊपर कुंजल लिखा था वो भी तस्वीर के साथ। अब काहे वो लावणी की डिटेल लेने लगा। कुंजल की पूरी डिटेल वो लिखा और भागते हुए खुद अपनी आखों से देख कर सुनिश्चित करने चला गया कि, वाकई ये कुंजल ही है।
भागते वो कुंजल के क्लास के पास पहुंचा और कुछ दूरी पर छिप कर, वो क्लास की गेट पर नजर जमा लिया। तकरीबन 10 मिनट बाद क्लास ख़त्म हुई और छात्र-छात्राएं बाहर आने लगी। आरव बड़े गौर से सबको देखते जा रहा था। लावणी भी अपनी क्लास समाप्त कर निकल रही थी, कि उसकी नजर आरव पर पड़ गई।
बड़े आराम से वो आरव के पास पहुंची। ऐसा भी नहीं था कि वो दबे पाऊं या छिप कर अा रही हो, लेकिन आरव तो बिल्कुल "बको ध्यानं" (बगुले की तरह ध्यान लगाना) किए था कुंजल के लिए। लावणी उसके दाएं ओर खड़ी होकर उसके कंधे पर हाथ अपना हाथ रखी और वो भी सामने देखने लगी।
कुछ देर तक देखने के बाद…. हूं !!! शॉर्ट, स्कर्ट, स्लीवलेस, टाईट टी शर्ट, टाईट जीन्स, काफी सुकून मिल रहा होगा ना इन्हे देख कर। अब तक तो आखों से ही पूरा माप लेे लिया होगा। काफी सेक्सी लड़कियां है ना....
आरव बिना ध्यान दिए हुए…. हैं तो काफी सेक्सी लेकिन मज़ा कहां अा रहा है देखने में। जल्दी से दिख जाति तो सस्पेंस खत्म हो जाता।
लावणी:- जल्दी से सबकुछ थोड़े ना यहां दिखेगा। अब यहां न्यूड होकर तो नहीं घूम सकती ना, जितना दिख रहा है उतने में ही काम चला लो।
आरव:- अरे नहीं, ऐसा नहीं है.. मैं तो वो कुंजल…… वो ओ ओ !!! लावणी तुम !!
लावणी:- जी हां मै.. आखों में एक्सरे लगवा लो, सब कुछ जल्दी में दिख जाएगा।
आरव:- आंह ! पागल कहीं की मैं जल्दी में क्या दिखने की बात कह रहा हूं और तुम क्या सोच ली।
लावणी:- तुम मुझे बातों में घुमाओ मत। वैसे भी मुझे क्या लेना देना तुम कुछ भी करो। बस साची दी ने कहा था तुम मुझे घर तक छोड़ दोगे, इसलिए यहां अाई मै।
आरव:- ठीक है कैंटीन में जाकर बस 10 मिनट इंतजार करो, मैं आया।
लावणी मुंह बना कर भनभनाते वहां से चली गई और आरव फिर से कुंजल को ढूंढ़ने लगा। चारों ओर उसने अपनी नजर दौड़ाई। तभी उसे 4 लड़कियों का एक समूह दिखा, जहां उसे कुंजल भी दिख गई। कुंजल को देखते ही…. "ये पागल इधर क्या कर रही है। अपस्यु से बात करनी पड़ेगी"…
आरव वहां से दबे पाऊं भाग कर कैंटीन में आया जहां लावणी उसका इंतजार कर रही थी। वहां से फिर दोनों फटफटी में सवार होकर निकल गए। रास्ते में दोनों बिल्कुल खामोश थे और आरव इतनी देर तक खामोश हो रह जाए… कैसे संभव था…
फटफटी पर बैठा, वो भी हैल्मेट लगा कर, बात कर पाना काफी मुश्किल होता था, इसलिए उसने लावणी को कॉल लगाया.. जब लावणी ने अपने फोन को देखी तब वो एक बार फोन तो एक बार आरव को ही देख रही थी। चिल्लाती हुई वो उसके कानों में बोली…. "यहीं तो हूं, फिर कॉल क्यों लगा रहे"
आरव:- कॉल उठाओ बस…
लावणी कॉल रिसीव कर, इयरपीस अपने कानो में लगाती…. "मेरी शांति तुमसे देखी नहीं जाती, बको क्या बकना है"..
आरव, हंसते हुए… "इतना भड़क क्यों रही हो, तुम्हे छोड़ कर किसी और को देख रहा था, इसी बात का गुस्सा हो क्या?"
लावणी, गुस्से से बढ़ी श्वांस को काबू करती…. "मैं क्यों तुमसे गुस्सा होने लगी, मैं तो साची पर गुस्सा हूं की खुद चली गई मुझे फसा दी। आज उसको भी बताती हूं मै।"
आरव फिर से हंसते हुए…. ओह ऐसा है क्या?
लावणी:- मैं कोई कॉमेडी कर रही हूं, जो हर बात पर मुंह फाड़ कर हंस रहे हो। आगे देखो वरना कहीं अपने भाई की तरह तुम भी खटिया ना पकड़ लेना।
आरव:- अच्छा सॉरी बाबा। मैं अब बिल्कुल भी नहीं हंसने वाला, अब तो खुश हो ना।
लावणी:- नहीं । तुम मेरे कुंडली से गायब हो जाओ, तब मैं खुश हो जाऊंगी।
आरव:- अच्छा जी तो ऐसी बात है। वैसे हमारे बीच एक डील हुआ था, उसका क्या?
लावणी:- जाकर उस तस्वीर को इंटरनेट पर डाल दो। उससे भी मन ना भड़े तो मेरे घर की दीवाल पर, कॉलेज में हर जगह उसके पोस्टर लगा दो। लेकिन मैं ब्लैकमेल नहीं होने वाली।
आरव उस वक़्त सिर नहीं खुजा सकता था वरना वो सबसे पहले अपना सिर ही खुजता। लावणी का ये नया और बदला रूप, आरव को बिल्कुल चुप होकर अपने अंदर खुद से बात करने पर मजबुर कर दिया…. " ये वही लावणी है.. पापा की डरपोक पड़ी या कहीं 180ml चढ़ा कर तो ना अाई है। ऐसा लग रहा है कल रात ही इसमें नया अपडेट आया हो और ये नया वर्जन काफी खरनाक है।"
"रोको, रोको, रोको"… आरव अपने आप से बात करने में लगा था, तभी लावणी जोर से चिंखती हुई कहने लगी।
"क्या हुआ, पगला क्यों रही हो"… आरव ने भी चिढ़ जर जवाब दिया।
लावणी:- मोड़ अा रहा है… गाड़ी रोक, मैं पैदल चली जाऊंगी।
आरव, फटफटी को गली के अंदर लेते हुए बोलने लगा…. "क्यों डर रही हो। इतनी तेज धूप में कौन तुम्हारे घर से से बाहर आकर दरवाजे पर……
आरव कुछ दूर पीछे ही था कि उसे अपार्टमेंट के सामने का नजारा दिखा…. सुलेखा ठीक साची के सामने थी और वो स्कूटी का ब्रेक लगा दी।… उनको देख कर आरव कहने लगा… "बच गई लावणी आज तू, तेरी मां का ध्यान साची पर है"…..………….लावणी.. लावणी.. और नजर जब पीछे गई तो कुछ लड़के लावणी के पास खड़े थे…
दरअसल जैसे ही गाड़ी गली के अंदर पहुंची लावणी ने देख लिया कि सुलेखा सड़क पार करके अपार्टमेंट की ओर जा रही है, और ये नजारा देख वो बाइक से कूद गई। आरव तो बातों में लगा था कि "क्यों डर रही हो".. और उसे पता भी नहीं चला कि कब लावणी कूद गई। जब पीछे मुड़ कर देखा तब पता चला कि वो कूद चुकी है….
सामने का नजारा देख साची तो हक्की-बक्कि रह गई। साची के चेहरे के उड़ते रंग को देख आरव समझ गया कि "ये घबराहट में जरूर फसेगी"… इसलिए वो फटफटी को उनके पास लेे आया और कल्च दबा कर जोर से एक्सेलेरेटर लेते हुए…. "ये क्या आप लोग रास्ता रोक खड़े है, थोड़ा किनारे होंगी क्या"..
सुलेखा जो टुकुर-टुकुर साची को घुरे जा रही थी, वो आरव की ओर देखती हुई… "जा ना इतना तो जगह खाली है"..
आरव:- आंटी लगता है आप को धूप लग गया है, और साथ में आपकी बेटी को भी, वहां देखो सड़क पर ही गिर-पड़ रही है।
सुलेखा जब लावणी के बारे में सुनी तब उसने भी अपनी नजर दूर दौड़ाई और बड़ी तेजी से लावणी को देखने गई… साची भी तुरंत लावणी के पास जाना चाहती थी, लेकिन उसे रोकते हुए….. "इतना घबराने से फसोगी। कूल रहो और फूल बनाओ। जाओ अब जाकर उसे भी देखो।"..
इतना कह कर आरव अंदर चला गया और साची भी लावणी के पास पहुंच गई। इधर अपार्टमेंट पहुंचते ही आरव जल्दी में अपने फ्लैट पहुंचा…. अपस्यु वहीं बिस्तर पर बैठा अपने हाथ और बदन को देख रहा था…
"अपस्यु, तू जानता भी है उस कॉलेज में कौन पढ़ रही है"… आरव अंदर आते ही हड़बड़ा कर अपनी बात कहा…
अपस्यु:- कौन पढ़ रही है…
आरव:- कुंजल भी वहां पढ़ रही है.. एक साल सीनियर क्लास में…
अपस्यु:- कौन कुंजल…
"कितने कुंजल को तू जानता है… हां मैं उसी कुंजल की बात कर रहा हूं, जिसके बारे में तू अभी सोच रहा होगा"… आरव ने चिढ़ते हुए अपस्यु को सुना दिया।…