Romance भंवर (पूर्ण) - Page 6 - SexBaba
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Romance भंवर (पूर्ण)

Update:-39 (B)

अपस्यु की कोई गलती नहीं थी। किसी लड़की ने अाकर उसे टोका, उसने अपस्यु को छलावा दिया और दे भी क्यों ना उसकी बात ही जुदा है। मेरी तरह कोई भी लड़की उसे पहली नजर में देख कर मर मिटे। किंतु मै जलन के मारे अपस्यु को ही उल्टा सीधा सुना दी।

जानती हो कमाल कि बात, इतना सुनने के बाद भी वो मुस्कुराता रहा और चंद शब्द के अलावा उसने बहुत ज्यादा कोशिश भी नहीं की सफाई देने की। वो मुकुरता रहा और मेरी बचपना को वो मेरा प्यार समझकर भूल गया। और एक मैं थी, मुंह फुलाकर बैठी थी इस उम्मीद में कि वो मुझसे माफी मांगे।

क्या करूं लड़की हूं ना दिल के किसी कोने में ऐसी भावना छिपी ही रहती है। ईर्ष्या जो किसी भी अनचाहे मामले में हो जाए और जान-बूझ कर रूठ जाना ताकि कोई हमे भी मानने आए, और बात यहीं से बिगड़ती चली गई। अपस्यु का पूरा फोकस शायद तुम पर था, इसलिए उसने मेहसूस तो किया मेरी भावनाओ को, लेकिन टाल सिर्फ इस वजह से दिया क्योंकि अभी उसे अपने परिवार की चिंता थी।

इसी क्रम में मेरी जलन और अंधी भावना, ये भी ना देख पाई कि अपस्यु किस के पीछे है। वो अपनी बहन को मानने आया था और मै कुछ और ही समझ बैठी। एक बार फिर उसे गलत समझी और अकेले ही फैसला कर लिया की वो मुझे धोका दे रहा है।

अब ये भी तो प्यार की ही भावना थी। उसे खोने के डर ने मुझे इस कदर पागल किया कि मैंने जिसे प्यार किया उसे है गलत समझ बैठी। लेकिन उसे गलत समझते - समझते कब मेरी सोच ही गलत हो गई मुझे खुद भी पता ना चला।

वो पूरी रात मै नफरत में जली, नफरत ने इतना अंधा किया कि मेरे एक दोस्त ने मेरे बताए कुछ तथ्यों के आधार पर अपस्यु को धोखेबाज साबित कर दिया। हालांकि वो भी गलत नहीं था क्योंकि उसे सारी बातें तो मैंने ही बताई थी और उसने अपनी जिम्मेदारी समझी और मुझे सच से अवगत करवाया। लेकिन मैं ही बेवकूफ थी जो केवल एकतरफा बात सोची, उसे सच माना। शायद अपस्यु से पहले बात करती तब उस दोस्त की बातें मेरे दिमाग में घर नहीं करती और ना ही मैं अपस्यु को ऐसा लड़का समझने कि भूल करती जो मेरा केवल इस्तमाल करना चाह रहा था।

लेकिन क्या ही कर सकते हैं, जब अपनी ही बुद्धि पर ताला लगा हो। अगले दिन उसी जली-बुझी भावना के साथ मै अपस्यु से मिली। मेरे दिल और दिमाग में उसकी धोखेबाज वाली छवि ऐसी छाई, की मेरे अंदर का प्यार कहीं मर सा गया और नफरत ही नफरत में, जो जी में आया कहती चली गई। ऐसा भी नहीं था कि उसे मैंने अकेले में सुनाया था। तुम और आरव भी तो थे वहां। उसके साथ-साथ कैंटीन में ना जाने कितने लोगों ने सुना होगा।

वो तब भी मुस्कुराता ही रहा। उसे अंदाजा था शायद मेरी पिरा और जलन का। वो तो यही मान कर चल रहा था कि सरप्राइज वाले दिन मुझे ना समय दे कर पूरा समय तुम्हारे पास लग गया तो कुछ गलतफहमियां मुझे हुई है। जबकि अभी तो बातें हम दोनों के दिल में ही थी, ना कोई इजहार हुआ था और ना ही कोई इनकार, फिर भी वो मुस्कुराता रहा। भरी महफ़िल की बेइज्जती झेलता रहा।

कमाल की बात पता है क्या है। जब उसने परिवार को पा लिया ना तब बीती सारी बातों को, मेरी सारी गलतियों को नज़रंदाज़ करते, मुझे मनाने भी पहुंचा अपस्यु। मेरे पास बैठा, मुझ से बातें करने की कोशिश भी किया। और मैंने क्या किया उसकी कोशिश पर पहला तमाचा मैंने अपने हाथों से मेरा।

इतनी अंधी हो गई की उसको थप्पड मारा। मैंने अपने अपस्यु पर हाथ उठाया। तुम्हे पता है उसका लेवेल हम लोगों जैसा नहीं है, बिल्कुल भी नहीं। वो तो अपने आप में प्रतिष्ठावान है, जिसकी ना तो किसी के साथ तुलना की जा सकती है और ना ही समानता। उसको थप्पड मारना मतलब उसकी आत्मा पर हाथ उठाना है क्योंकि उसका कैरेक्टर ही इतना ऊंचा है। मैंने उसके गाल पर नहीं बल्कि उसके आत्मसम्मान पर थप्पड मारा था।

और जानती हो कुंजल उसने क्या किया, अपने चारो ओर देखा कि कहीं किसी ने देखा तो नहीं और अपमान का ये घूंट पीकर मुस्कुराता रहा। और मैं पागल, मुझे अब भी एहसास नहीं हुआ की मैं ये क्या कर चुकी थी। काश यहां पर भी रुक जाति तो भी वो इतने समझदार है कि मेरे लिए प्यार भी रहता और मुझे एहसास भी करवा जाते की मैंने क्या गलती किया था।

पर मैं रुकने को तैयार कहां थी। भरी महफिल में उनके चेहरे पर काफी फेकी मैंने। ये मेरा गुस्सा नहीं था, ये मेरा अपस्यु को गलत समझकर उठाया गया कदम भी नहीं था। ये मेरा अहंकार था, बस मैं सही हूं और वो धोखेबाज, और धोखेबाज के साथ कुछ भी किया जा सकता है। बस इसी अहंकार ने मुझे बाजारू बनने पर मजबूर कर दिया।

हां सही सुना कुंजल, बाजारू हरकतें। रील लाइफ में चलने वाले नजारे जिसका सभ्य समाज में दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं वो हरकत मै अपस्यु के साथ कर बैठी। मैंने पूरे कैंटीन के सामने उसके मुंह पर कॉफी से भरा कप उड़ेल दिया। इतनी घटिया हरकत।

और मज़े कि बात जानती हो क्या है, ये मेरा वहीं अपस्यु है जो मुझे दिन रात अपने बालकनी से खड़ा देखा करता था। मैं बेवकूफ, अपनी होशियारी दिखाने के लिए एक दिन जानबुझ कर अपस्यु के साथ बाइक में बैठी थी, पता है क्यों। क्योंकि मुझे लगा ये मुझ पर फिदा है तो मैं इसे अपने झासे में फसा कर अपना काम निकलवा लूंगी।

मै बेवकूफ उसे किस कैटिगरी का आंक रही थी और ये भी एक सबूत है मेरे निचले स्तर के सोच का। मैं कितना घटिया सोच रखती थी। और उस दिन भी हुआ क्या था। मैं उसे रिझाने के लिए बातो का जाल बुन रही थी और उसने सीधा पूछ लिया काम क्या है। वो जान रहा था कि मैं बस नखरे कर रही हूं कि, कोई काम नहीं, लेकिन फिर भी जोड़ डालकर पूछता रहा।

मेरे पापा और मेरे चाचा दोनों बहुत बड़े सरकारी अधिकारी हैं। लेकिन मेरे चचा ने जब होम मिनिस्टर के बेटे का नाम सुना तो उनकी कपकपी निकल गई। उन्हें अपने बच्चों के साथ क्या बुरा सुलूक हुआ, वो जानने की कोशिश भी नहीं किए। बस ये चिंता थी कि होम मिनिस्टर से उलझे, तो वो क्या-क्या कर सकता है और इसी डर कि वजह से उन्होंने यहां तक कह दिया कि कॉलेज बदल लो।

वो अपस्यु ही था जिसे मै झांसा देकर होम मिनिस्टर से उलझाने कि कोशिश कर रही थी। ताकि प्यार में पागल एक अंधा मेरे जाल में फसकर बस उससे उलझ जाए और उसका सारा फोकस फिर अपस्यु पर हो और मैं निकल जाऊं। बात एक लड़की के स्वाभिमान की थी इसलिए अपस्यु को इसमें कोई बुराई नहीं लगी जबकि उसे पता था वो किस से भिड़ने को सोच रहा है।

एक ही दिन में सरा मामला सुलझा भी दिया और मुझ से कभी इस बारे में सवाल तक नहीं किया, "की मैं खुद की जान बचाने के लिए किसी को कैसे फसा सकती हूं।" इतना स्वार्थी कोई कैसे हो सकता है। लेकिन उसका जवाब है ना .. वो मैं हूं। जिसने मेरे आत्मसम्मान की रक्षा की उसके है आत्मसम्मान हनन मैंने कर दिया।

थोड़ी अक्ल तब ठिकाने अाई, जब उसने मुझसे कहा…. "कभी कभी हम गलत जगह दिल लगा लेते है।" वो चाहता तो वो मेरे इस बाजारू हरकत पर अच्छे से जवाब दे देता लेकिन उसने इस गम को भी पी लिया।

जानती हो कुंजल जब अपस्यु ने कहा ना "कभी कभी हम गलत जगह दिल लगा लेते हैं।" तब मै इसका मतलब नहीं समझ पाई। मै अब भी अपने ही अहंकार में थी। लेकिन कोई अपने कर्मा से कब तक भाग पाया है, अपस्यु नहीं तमाचा मरेगा तो वो ऊपरवाला तो तमाचा मरेगा ही। और विश्वास मानो कुंजल, वो जब तमाचा मारता है ना तो गाल पर नहीं बल्कि सीधा रूह पर पड़ती है।

पहला तमाचा वहीं के वहीं पड़ा, जब अपस्यु पर मैंने कॉफी फेकी और वो चुपचाप जा रहा था। वहां वो एक लड़की से मिला। काफी खूबसूरत और कुछ खुले गले के कपड़े भी पहन कर अाई थी। अपस्यु की ना तो नजरें बेईमान और ना ही उसकी नज़रों में खोंट। उसकी आंख से आंख मिला कर अपस्यु काम की बात करता रहा। दूसरा तमाचा भी उसी वक़्त पड़ा जब पता चला कि मशहूर वकील सिन्हा अपस्यु को उसके 1 केस का मेहनताना 40 लाख रुपया देते है।

ना तो सिन्हा के पास कोई केस की कमी है और अपस्यु जैसे फोकस इंसान के लिए काम आने कभी कम नहीं वाले। वो एक महंगी कार क्या अपने दम पर 10 मंहगी कर खरीद सकता था।

अब तो जैसे मेरी रूह सिहर रही थी। वहीं पीछे मुड़ कर मैंने कैंटीन को देखा जहां पर सभी स्टूडेंट हमारी वीडियो बना रहे थे… पहली बार पूरा एहसास हुआ, ये मैंने क्या कर दिया। मेरी रूह सिहर गईं। माफी मांगने की कोशिश में लग गई पर किस मुंह से माफी मांगती। हिम्मत ही टूट गई थी।

पछतावा हो रहा था पर पश्चाताप करना अभी बाकी था। इसलिए मैंने सोच लिया था, आज जब कॉलेज जाऊंगी और अपस्यु से बातें करूंगी तो खुद में संयम रखकर, बिना किसी भाव के ये जानने की कोशिश करूंगी, कि अपस्यु मुझसे कितना नाराज हैं? उससे एक बार बात करने के लिए भले ही उसके पीछे मुझे लगना क्यों ना पड़े, लेकिन बात करना ही है।

मै क्लास में थी और अपस्यु को डरती हुई पूछने लगी "हम कहीं बात कर सकते है क्या?" मुझे लगा नाराज है तो घुरेगा थोड़ा चिल्लाएगा और माना कर देगा बात करने से। लेकिन मै फिर गलत थी। बिना किसी भी किंतु-परन्तु के वो राजी हो गया।

अपस्यु और मै बात करने के लिए कॉलेज के बाहर वाले कैंटीन में गए। मेरी विडम्बना देखो कुंजल जिस कॉलेज के कैंटीन में मैंने अपस्यु को इतना अपमानित किया, मुझे डर था कहीं अपस्यु का गुस्सा फूटा तो मुझे वहां कैसा मेहसूस होगा। वाह री इंसानी फितरत और कमाल की सोच। मुझे माफी मांगनी थी, अपनी भूल का पश्चाताप करना था और दिल में ये ख्याल भी साथ चल रहा था कि कहीं अपस्यु वहां बेईज्जत ना कर दे।

मेरी एकतरफा सोच मुझे एक बार फिर झटका देने वाली थी। उस कैंटीन के मुलाकात के बाद तो जैसे लगा की मेरी दुनिया ही उजड़ गई है। अपस्यु के दिल में मेरे लिए ना तो नफरत थी और ना ही प्यार। कोई भावना ही नहीं बची उसके पास मेरे लिए जो वो मुझे नफरत में या प्यार में याद कर सके। मैं बस उसकी एक क्लासमेट बन कर रह गई। बात करती हूं तो बात कर लेता है और मज़ाक करती हूं तो हंस लेता है। उसके बाद वो अपने रास्ते चल देता है।

उस दिन में बाद जब भी कॉलेज में वो मुझे दिखा, हमेशा हंसते हुए ही दिखा। मैं उसके दिल, दिमाग और जिंदगी से गायब हो चुकी थी। यूं तो वो हंस के ही बात करता है मुझसे, और ना ही कभी भी मुझे घुमा-फिरा कर कभी तना मारा । बस उसके बात करने का ढंग ही बदल गया। पहले जब बात करता तो लगता मैं क्लोज हूं उसके अब सिर्फ अनजान बनकर रह गई हूं।

पिछले 13-14 दिनों में मैं जिस दौड़ से गुजरी हूं शायद वहीं मेरी सजा है। अपने प्यार को अपने नजरों के सामने देखना और उसकी नज़रों में एक मामूली लड़की बनकर रह जाना, जैस कॉलेज की अन्य लड़कियां जिससे वो वैसे ही बात करता है जैसा कि मुझसे।

अभी जो तुम मेरा खिला रूप देख रही थी और अपस्यु के साथ जोड़-जबरदस्ती करना, वो मात्र एक छलावा था। 3-4 दिन पहले भी मैंने ऐसा किया था। अपने रूप से उसे मोहने की कोशिश की थी, हां कुछ पल के लिए अपस्यु भी फिसला था, लेकिन वो प्यार नहीं बल्कि उकसाती भावना की एक वासना थी जिसके मद में वो थोड़ा बहका और मै तो गई ही थी उसी इरादे से।

आज भी मै उसे उकसा ही रही थी। मामला ये नहीं की शारीरिक सुख भोग कर मै आंतरिक प्यार की उम्मीद रख रही हूं। या तो वो मेरे छलावे को समझ कर मुझे बाजारू ही समझ ले और एक थप्पड मार कर निकाल जाए। नहीं तो मुझसे कुछ सूख ही भोग ले, मेरे द्वारा किए गए उसके आत्मसम्मान के ठेस पहुंचने की एक छोटी सी कीमत… फिर मै आराम से कहीं दूर जा सकती हूं । फिर ना तो कोई सिकवा रहेगा और ना ही कोई मलाल।
 
Update:-40 (A)

आज भी मै उसे उकसा ही रही थी। मामला ये नहीं की शारीरिक सुख भोग कर मै आंतरिक प्यार की उम्मीद रख रही हूं। या तो वो मेरे छलावे को समझ कर मुझे बाजारू ही समझ ले और एक थप्पड मार कर निकाल जाए। नहीं तो मुझसे कुछ सूख ही भोग ले, मेरे द्वारा किए गए उसके आत्मसम्मान के ठेस पहुंचने की एक छोटी सी कीमत… फिर मै आराम से कहीं दूर जा सकती हूं । फिर ना तो कोई सिकवा रहेगा और ना ही कोई मलाल।

कुंजल बड़े ही ध्यान से साची को सुन रही थी। वो उसके बात कि गहराई और उसके अंदर छिपी पिरा से जुड़ती चली जा रही थी। साची अपनी पूरी कहानी, अपनी सम्पूर्ण मनोदशा बयां करके खामोश किसी पुतले कि तरह बैठी हुई थी। कुंजल गहरी श्वास लेती उसके कंधे पर अपना हाथ रखकर किसी दोस्त की तरह उसे सहारा दी…..

"हंसते चेहरे के पीछे कितना गम होता है ये तो अक्सर सुना ही था। लेकिन 2 इंसान जो साथ रहते अच्छे लगते हैं उनके बीच इतना कुछ अंदर ही अंदर चल रहा होगा ये तो सोच के काफी परे है।"

साची:- कोई बात नहीं। इसमें गलती अपस्यु की तो है ही नहीं। कसूरवार तो मै हूं उसने तो अपना रास्ता चुन लिया अब मुझे यहां से अपना रास्ता तय करना है।

कुंजल:- बस रे बाबा बस। आज से तुम्हारे साथ मै भी चल रही हूं। अब जरा चिल हो जाओ और हम चलते हैं शॉपिंग पर।

साची:- मना करूंगी तो मानोगी नहीं, इसलिए चलते हैं। बस एक मिनट।

साची वाशरूम गई वहां से मुंह धो कर बाहर आयी। चेहरे पर पहले जैसी चमक और मुस्कुराहट वापस अा चुकी थी और इसी दिखावे के साथ वह वापस अपने घर लौट आई। कुछ ही देर में दोनों तैयार होकर शॉपिंग के लिए निकल गए।

अपस्यु सबको विदा करने के बाद अाकर मां के गोद में सुकून से लेटा था और नंदनी उसके बालों में हाथ फेर रही थी…. "सोनू इनकी दोनों बच्चियां कितनी प्यारी है ना।"..

अपस्यु:- साची और लावणी ना मां। दोनों समझदार और व्यवाहरिक भी है।

नंदनी:- ओह हो, कॉफी मुंह पर फेक दी तेरे, फिर भी व्यावाहरिक। अच्छा है बेटा तेरे अभी से लक्षण मुझे दिख रहे है।

अपस्यु:- हाहाहाहा… मां ये दाएं बाएं से क्यों घूम कर अा रही हो, दिल में क्या है वो सीधा पूछो ना।

नंदनी:- तुम्हारा सिर दर्द कभी नहीं करता क्या अपस्यु?

अपस्यु:- पहले करता था, जब से आप अाई है और आप का हाथ मेरे सिर पर लगा है अंदर के सारे दर्द अब सुकून और नींद में बदल गए हैं।

नंदनी:- मज़ाक मतकर। ये जो तू हर छोटी-छोटी चीज ऑब्जर्व करते रहता है ना, इसे घर और रिश्तों के मामलों में थोड़ा कम कर दें। अपनी जिम्मेदारियां घटा और अपने उम्र में रहकर जीना सीख।

अपस्यु:- हम्म ! ठीक है मां अब से ऐसा ही करूंगा।

नंदनी:- मैं भी तेरी मां हूं बेटा, मैं भी सब समझ रही हूं, तू ये बिल्कुल भी नहीं करेगा बस मेरा दिल बहला रहा है।

अपस्यु, उठ कर बैठते हुए…. "आप को कौन सी चिंता खाए जा रही है मां, आप खुलकर बोलो।"

नंदनी:- मैं बस इतना समझाना चाह रही हूं कि, हर कोई ना तो तेरी तरह सोचता है और ना ही तेरी तरह इतना परिपक्व (मैच्योर) होता है। खासकर तुमलोग की उम्र में तो बिल्कुल भी नहीं। बाकी तू बहुत समझदार है इस से ज्यादा मै नहीं कहूंगी।

अपस्यु:- ओके माय डियर मम्मा… अभी से ही मै इस बात का खास ख्याल रखूंगा। और कुछ..

नंदनी:- अभी के लिए तो कुछ नहीं क्योंकि मेरी बोलती तुमने बंद कर दी है, लेकिन बेटा मेरी नजर अब तुम पर ही है।

दिन में करीब 2 बज रहे थे। मां चिल्ड्रंस केयर जा चुकी थी, साची और कुंजल शॉपिंग के लिए निकल चुकी थी, भाई आरव लावणी के साथ लगे थे और अपस्यु दोनों भाई के लिए नया सूट तैयार कर रहा था। कुछ ही देर में आरव भी वहां पहुंच गया… "क्या कर रहा है खड़ूस"..

अपस्यु:- मीटिंग शाम 7 बजे.. सिन्हा जी के ऑफिस में।

आरव:- मुद्दा..

अपस्यु:- फ़िरदौस का केस लगता है, इशारों में बोल गए सिन्हा जी, तैयारी पूरी होनी चाहिए।

आरव:- डेंजर लेवल..

अपस्यु:- पता नहीं…

आरव:- मुश्किल घड़ी। बिना फोकस्ड टारगेट के ही हाईलाइट भी हो गए और खतरे का भी अंदाजा नहीं। क्या सोच रहे हो?

अपस्यु:- निजी दुश्मनी ही होगा अभी तो, लेकिन एक बात खटक रही है।

आरव :- क्या?

अपस्यु:- चल चलते हैं वहीं बात पता करने, जरा कुछ लोगों से मिल लिया जाए।

आरव:- फंकी पहनकर निकलते हैं, बिल्कुल कूल डूड की तरह….

अपस्यु:- देखा सच कहा था ना, साला ये जुड़वा होने के अपने ही खामियाजे हैं। फिर चुराई ना मेरी सोच।

आरव:- ईहाहाहा .. अपनी सोच फिर पहले बताने का था ना…

दोनों भाई मस्त अपनी सपोर्ट कार में सवार सीधा पहुंचे एक सरकारी हॉस्पिटल। … "अबे घोंचू ये वही हॉस्पिटल है जहां से तुझे भगाया था। साला वो डॉक्टर देखेगा ना तो हम दोनों को 4 जूते मारेगा।"

"अबे तुझे ये चिंता है जरा ये तो सोच वो मुझे खड़ा देखेगा तो कहीं हार्ट अटैक ना अा जाए।"

"हां ये भी है, लेकिन हम यहां क्यों आए है अपस्यु।"

" किसी सरकारी आदमी को मैंने गोली मारी थी, अब उसे छुट्टी और सरकार से मुआवजा चाहिए तो यहीं आया होगा ना"…

आरव:- ओए पागल क्या हुआ… किस सोच में डूब गया तू।

अपस्यु:- तू अकेला रो रहा था यहां, मेरे कानो में वो चीख अब भी गूंज रही है।

आरव:- छोड़ ना यार, क्या तू मुझे रोतलू साबित करने में लगा है। वैसे सुन लावणी को ये बात बताना नहीं।

अपस्यु:- ठीक है नहीं बताता.. चल जरा चल कर पता लगाते हैं, वो है कहां।

दोनों साथ साथ चल रहे थे, हॉस्पिटल की कहानी याद आते ही आरव भी उसी विषय को आगे बढ़ाता हुआ कहने कहा…. "यार उस वक़्त ना मै पूरी तरह से टूट गया था। तूने तो डरा हिं दिया था मुझे।"

अपस्यु:- पता नहीं मै इतना लापरवाह उस दिन कैसे हो गया। सॉरी मेरे भाई।

आरव:- मुझे पता है तुझे क्या हुआ था… रुक रुक ये वही वार्ड बॉय है इस से पता करते है। … "क्या हाल है हीरो" …

वार्ड बॉय:- अरे सर आप, क्या हुआ फिर यहां कोई एडमिट है।

आरव:- वो छोड़ मुझे एक मरीज की जानकारी चाहिए।

वार्ड बॉय:- मेरे दिमाग की फीडिंग के लिए चार्ज लगेगा फ्री सर्विस के लिए काउंटर पर जाइए।

अपस्यु, 500 का नोट निकलते हुए…. "हाथ में गोली लगा"…

वार्ड बॉय, अपस्यु को बीच में ही रोकते…. "थानेदार है। दूसरी मंजिल सी ब्लॉक रूम नंबर 4, सामने के सीढ़ी से बाएं…

दोनों भाई फिर साथ साथ ऊपर चलते… "अराव, तू कुछ कह रहा था।"

आरव:- मै तो बस कह रहा था तू जब मंत्री जी के घर से निकला तो साची के ख्यालों में डूबा था।

अपस्यु:- हम्मम !!

आरव:- वैसे जानता है तेरी हालत देख कर मै तो टूट ही गया था। मेरा दिमाग काम करना बंद कर चुका था। एक साची ही थी जिसके कंधे पर सर रख कर मै रोया। उस वक़्त मेरे लिए तो वहीं मां थी।

अपस्यु:- हम्मम !!

आरव:- एक बात जानता है..

अपस्यु:- क्या ?

आरव:- तू मेरा बाप और वो मेरी मां, तुम दोनों की जोड़ी ऊपरवाले ने ही बनाकर भेजी है।

अपस्यु:- हम्मम !!

आरव, अपस्यु के ओर मुड़ते हुए… "तुझे हुआ क्या है। ना तो साची का नाम सुनकर तेरी मुस्कान अाई और ना ही कोई प्रतिक्रिया। तुम दोनों का फिर झगड़ा हुआ क्या सुबह।

अपस्यु, वार्ड के अंदर घुसते ही… "कैसे हैं सर जी, पहचाने की नहीं। वैसे अंगूर खाते आप बहुत अच्छे दिख रहे है।"

थानेदार वहां मौजूद अपने बेटे को बाहर इंतजार करने के लिए कहा और उसके जाते ही वो मिन्नतें करता कहने लगा…. "मुझसे उम्र में बहुत छोटे होगे फिर भी कहो तो पाऊं परता हूं, प्लीज उस दिन की बात किसी को बताना मत।"

आरव:- मंगलवार की तो हेडलाइन थे आप सर, द सपरकॉप संजय शर्मा।

थानेदार का ध्यान आरव पर गया…. "ये तुम्हारा भाई है।"

अपस्यु:- देखा आरव इसे कहते है पुलिसवालों कि पारखी नजर। घबराए नहीं सर उस दिन क्या हुआ मुझे नहीं पता बस कुछ सवाल है, उसके जवाब ढूंढते आप के पास आया हूं।

थानेदार:- पूछो

अपस्यु:- उस दिन 5 लड़कों की और भी पिटाई हुई थी। जिनकी अजीब ही हालत हो गई थी।

थानेदार:- जानता हूं, उनमें से 2 लड़के जैश और रिकी भी था। उसकी ही बात तो नहीं कर रहे।

अपस्यु:- बिल्कुल उसी के विषय में बात कर रहा था।

थानेदार:- महेश राठी और पंकज राठी का बेटे जैश और रिकी। बड़े बाप कि बिगड़ी हुई औलादें। न्यूज़ बाहर नहीं अाई लेकिन मारने वाला भी कोई उनके है लेवल का था… एक मिनट वो जो 2 लोग और लिस्ट में है वो क्या यही दोनों थे?

अपस्यु:- बहुत खूब, बहुत ही इंटेलिजेंस ऑफिसर हो आप। वैसे छोटी मुंह बड़ी बात लेकिन इन पैसे वालों के औलादों को बिगाड़ने में पुलिसवालों का भी बहुत बड़ा हाथ होता है।

थानेदार:- क्यों ताने मार रहे हो तुम। जो सोहरत एक ईमानदारी के काम में है ना उसका मुकाबला ये घुस के पैसे कभी नहीं कर सकता, ये बात मुझे समझ में आ गई है। वैसे हम भी क्या करे, सपने तो लेकर हम सिंघम जैसे ही आते है लेकिन बहाली के वक़्त लिया गया घुस आधा सपना वहीं हमारे पिछवाड़े में घुसेड़ देता है और बचा खुचा हमारे साहब लोग। फिर तो ऐसे बेशर्म बन जाते हैं कि मुर्दे का भी मांस नोच खाएं। पर जहां अंधेरा है वहां उजाला भी है.. यदि हम जैसे करप्ट लोग है तो बहुत से ईमानदार भी है, तभी तो सिस्टम बलैंस है।

आरव:- चिल्लर नहीं है वरना इस ज्ञान के लिए अभी लुटा देता। हमारे भी काम का कुछ बताओगे।

थानेदार:- जिन्हे तुमने मारा वो दोनों कजिन है। दोनों के बाप सगे भाई है और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरर्स है। यहीं एनसीआर में उनकी कई फैक्ट्री है और बाहर भी काम फैला है। पॉलिटिकल कनेक्शन अच्छे हैं और हर पार्टी को फंडिंग भी अच्छा करता है।

आरव:- और कुछ…

थानेदार:- और क्या, इन बड़े लोगों की उपरी डीटेल सबको पता होती है, अंदर की डिटेल शायद ही कोई बताए। उसके लिए जुगाड ढूंढना पड़ता है…

अपस्यु और आरव दोनों एक साथ … "हूं हूं.. और वो जुगाड क्या है सर"

3 घंटे की मेहनत के बाद दोनों भाइयों को मीटिंग का मैटर और खतरे का अंदाजा दोनों पता चल चुका था। जैसा कि दोनों ने पहले तय किया था, दोनों ठीक वैसे ही फंकी पहनकर पहुंचे। बिल्कुल स्टाइलिश और कूल।

शाम के 7 बजे दोनों भाई सिन्हा जी के ऑफिस के बाहर पहुंच चुके थे। एक बॉडी बिल्डर गनमैन उनके पास पहुंचा…. "इसकी बॉडी तो पक्का सलमान जैसी है"…. "इसका एटिट्यूड भी तो बॉडीगार्ड जैसा ही है।"… दोनों तंज कसते हुए हसने लगे। उस बॉडीगार्ड ने दोनों को एक बार घुरा और चेक करके अंदर भेज दिया।

दोनों स्टाफ एरिया से होते हुए कॉन्फ्रेंस हॉल पहुंचे। जैसे ही अंदर घुसे, धीमी रौशनी में सामने सिन्हा जी बैठे हुए थे। अपस्यु और अराव को देखकर वो लड़खड़ाते हुए खड़े हुए…. "आओ, मेरे पास तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था मै।"…

"आप ने आज फिर पूरा ड्रिंक किया है सर।" … अपस्यु उनके करीब जाते हुए पूछा।

"जब उसकी याद आती है तो कभी कभी खुद को संभालना मुश्किल हो जाता है।"…. सिन्हा जी दोनों भाई को गौर से देखते हुए बोले।

आरव:- मतलब हमे मीटिंग का झांसा दिया आपने।

सिन्हा:- मीटिंग की उनकी मां की चू… सी सी सी.. सॉरी… मीटिंग क्या होता है। मजाल है मेरे बच्चों पर कोई उंगली उठा ले।

अपस्यु:- मतलब आप मैटर पहले ही सल्टा चुके है। और आज दिन भर हम दोनों भाई बिना मतलब उसकी छान बीन में लगे रहे।

सिन्हा:- कभी कभी सरप्राइज भी जरूरी होता है। जब उन राठी ब्रदर्स को पता चला, मैंने तुम्हारा बेल करवाया है तो पहुंचे थे मेरे पास। साले बहुत उछल रहे थे दोनों भाई। दोनों को मैंने सीधा कह दिया, "वो दोनो मेरे बेटे है, मेरे बेटे। उसे हाथ लगाना मतलब मुझे हाथ लगाना"… सिन्हा जी बोलते बोलते लड़खड़ा गए.. अपस्यु ने संभाला…

"जनता है आज मेरा बेटा होता ना तो वो तेरे (अपस्यु) … ना तू नहीं.. इसके जैसा बिल्कुल होता।"… सिन्हा अपनी भावनाओं में बहते हुए कहने लगा…

अपस्यु:- सर क्यों पुराने जख्म कुरेद रहे है। चलो घर चलो… आरव ऐमी को कॉल लगाकर यहां बुलाओ…

"हाहाहा… याद है जब तू मुझे पहली बार मिला था… "मुकुराइए अंकल यहां आकर मायूस क्यों होते है।"… सिन्हा जी ने अपस्यु को बड़े ध्यान से देखते हुए बोला…

अपस्यु:- हां मुझे अच्छे से याद है। कुछ नहीं भुला हूं मै।

"मैं भी कुछ नहीं भूल पा रहा रे। इस देश का टॉप वकील अपने बेटे और पत्नी को इंसाफ नहीं दिला सका.. कुछ नहीं भुला मै। नहीं भुला की कैसे उस आश्रम को आग लगा दिया गया… 120 बच्चे जिंदा जला दिए गए… मेरी पत्नी जलकर मर गई… तुम्हारी मां जलकर मर गई… नन्हा सा था तो मेरा बेटा.. कितनी प्यारी मुस्कान थी… तोतली बोली उसके कानों में अब भी गूंजती है मेरे … सुन.. तू सुन ना।"… सिन्हा जी भावनाओ में बहते चले गए…
 
Updated:-40 (B)

"मैं भी कुछ नहीं भूल पा रहा रे। इस देश का टॉप वकील अपने बेटे और पत्नी को इंसाफ नहीं दिला सका.. कुछ नहीं भुला मै। नहीं भुला की कैसे उस आश्रम को आग लगा दिया गया… 120 बच्चे जिंदा जला दिए गए… मेरी पत्नी जलकर मर गई… तुम्हारी मां जलकर मर गई… नन्हा सा था तो मेरा बेटा.. कितनी प्यारी मुस्कान थी… तोतली बोली उसके कानों में अब भी गूंजती है मेरे … सुन.. तू सुन ना।"… सिन्हा जी भावनाओ में बहते चले गए…

अपस्यु:- आप यहां आराम से बैठ जाओ सर। एक पेग मुझे भी दो। यार खुद तो इमोशनल होते ही हो मुझे भी इमोशनल कर देते हो। आज मै भी कुछ नए और कुछ पुराने गम में पीना चाहता हूं।

सिन्हा:- तू मेरा सच्चा साथी है.. लेे पी…

अपस्यु, एक पेग पूरा पीते हुए… "कुछ ना हुआ मुझे और पिलाओ"… जबतक आरव लौट कर आया तब तक अपस्यु भी गले तक पी चुका था.. दोनों बहुत ही मशरूफ थे बात करने में।

सिन्हा:- अच्छा सुन सहायता करने का वक़्त अा गया है… मैंने जो मदद के बदले मदद कि बात की थी ना..

अपस्यु:- हां कहिए ना सर…

सिन्हा:- तेरे चिल्ड्रंस केयर गया था कुछ दिन पहले। मुझे ना वहां से एक को गोद लेना है… सुन सुन सुन .. प्लीज तू मुझे मना मत करना .. लेे तेरे पाऊं परता हूं…

अपस्यु:- बस, बस .. आप टल्ली हो गए हो, कल बात करते हैं।

सिन्हा:- ना, मै नहीं टल्ली हुआ हूं… तू कल से मिलेगा नहीं.. प्लीज देख हां कर दे।

अपस्यु:- मुझे सोचने दो इस बारे में..

सिन्हा:- बेवड़ा कहीं का, पूरी बॉटल गटक गया फिर भी सोचेगा मेरी बात पर।

"यूं समझिए अपना एक हिस्सा देने का वादा कर रहा हूं अभी… प्लीज मेरा भरोसा मत तोड़ना। .. कल अाकर वैभव को के जाइएगा।"…

सिन्हा:- आए शातिर … मतलब तुझे सब पता है हां..

अपस्यु:- वो बिना बाप के बच्चे नहीं है सर … जिम्मेदारी उठाई है तो ख्याल रखना पड़ता है वरना अनाथालय के नाम पर कई फोटो खिंचवाने वाले और बच्चे गोद लेकर पब्लिसिटी बटोरने वाले मिल जाते है।

सिन्हा जी खुशी से अपस्यु के गाल चूम रहे थे, इतने में कॉन्फ्रेंस हॉल में ऐमी भी पहुंच गई… "आज फिर दोनों टल्ली है।"

आरव:- छोड़ दो दोनों को.. कुछ देर आपस में गम बाटेंगे। कभी-कभी तो दोनों की भावनाएं जागती है।

ऐमी:- हां तो मैंने कब माना किया है। अब ये दोनों पूरा सहर घूमेंगे… एक मैटर फसाएगा तो दूसरा सलटाएगा।

आरव:- हाहाहा… पार्टी ड्रेस कहीं निकल रही थी क्या…

ऐमी:- हां यार दोस्तों के साथ पब जा रही थी।

आरव:- दोस्त या बॉयफ्रेंड..

ऐमी:- आरव एक बात बता, 15 मिनट तू गाली नहीं खाता तो तेरे पीछे कीड़े काटने लगते है क्या?

आरव:- बदतमीज लड़की..

ऐमी:- बेहूदा लड़का..

आरव:- मेरे दिमाग में एक आइडिया आया है।

ऐमी:- बोलिए सर..

आरव:- ऐसे रिएक्ट क्यों कर रही हो, सुन तो लो पहले…

ऐमी:- सुनना क्या है तू फिर बकवास करेगा…

आरव:- मै क्या बोल रहा था तू पब जा ही रही है.. इन्हे भी साथ लेती चली जा..

ऐमी, प्रतिक्रिया में चिल्लाती हुई कहने लगी…. "नो वे"

"ऐ दोनों चिल्ला क्यों रहे हो। पूरा मैटर बताओ।"…. सिन्हा जी दोनों को अपने पास बुलाते, जवाब तलब करने लगे….

ऐमी धीरे-धीरे आगे भी बढ़ रही थी और आरव से विनती भी करते जा रही थी…. "प्लीज नो.. मत बताना आरव"..

ऐमी:- कुछ नहीं डैड, मै तो बस एेवे ही…

अपस्यु:- बापू.. लगता है कहीं जा रही थी। तैयार होकर अाई है…

(आरव, ऐमी के कानों के पास धीरे से बोला… लेे बज गई तेरी बैंड)

सिन्हा जी:- मेरा राजा बेटा कहीं पार्टी करने जा रही है.. चल हम भी चलते है। थोड़ी देर खुली हवा में हमदोनों भी घूमेंगे…

अपस्यु:- बापू इसके शक्ल पर लिखा है ये हम दोनों को नहीं के जाने वाली।

सिन्हा जी और अपस्यु दोनों साथ में जोड़-जोड़ से हसने लगे और अपस्यु बोला… "ठीक है यूं गो.. हम दोनों यहां है… क्यों बापू"…. "हां रे अपस्यु सही कहा"… फिर से दोनों हसने लगे…

ऐमी गुस्से में दोनों को देखती हुई…. "आरव तूने मुझे कॉल लगा कर यहां क्यों बुलाया।"

आरव, अपस्यु के ओर इशारा करते हुए… "इसने मुझे कहा था कॉल लगने"..

ऐमी:- अब सर को तो मै कुछ कह भी नहीं सकती … वरना अभी कहने लगेंगे.. तुम्हे अपने पापा को घर ले जाने के लिए कॉल लगवाया था… क्यों सर यहीं बात है ना…

अपस्यु:- बापू ये बौत समझदार हो गई है, मै कह रहा हूं ये आप की तरह ही वकील बनेगी…

सिन्हा जी:- ना रे … मेरा बेटा मैजिशियन बनेगी …

ऐमी:- हद है.. डैड मैजिशियन नहीं म्यूजिशियन।

सिन्हा जी:- जाओ घूमो तुम लोग .. हम कहीं नहीं जा रहे .. यहीं है।

फिर से दोनों के जोड़-जोड़ से हंसने की आवाज़। … "भाई प्लीज़ मुझे इस सिचुएशन से निकाल दे, प्लीज।"… ऐमी आरव से विनती करती…

आरव:- कोई फायदा नहीं। या तो प्लान कैंसल करके घर चली जाओ या फिर जहां जा रही थी वहां चली जाओ। अब थोड़े ना कुछ हो सकता है।

ऐमी:- मैं ही बेवकूफ थी जो तुम्हारे बातों में अा गई। मुझे समझ जाना चाहिए था कि अपस्यु भी बैठक लगा ही चुका होगा। मेरी शाम खराब कर दी तुमने आरव।

आरव:- वाह, मतलब पिए ये दोनों बिल मेरे नाम पर फाड़ रही हो…

ऐमी:- हुंह ! तुमने ही भरोसा दिलाया था ना आज अपस्यु नहीं पायेगा.. आओ और अपने पापा को यहां से अभी लेे जाना। इससे ती अच्छा होता ड्राइवर और गार्ड के साथ ही चले आते।

आरव:- अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।

एमी:- हां ये भी सही है। चल चलते है।

आरव:- मैं नहीं जाता तेरे साथ। तेरी पार्टी है तू जान।

ऐमी, आरव का हाथ पकड़ कर खींचती हुई बाहर लेे जाते हुए… "मुझे फसा कर मज़े करेगा.. नोट पॉसिबल।"

आरव:- ना ना हाथ छोड़ मेरा, एक तो तेरा खरनाक ग्रुप ऊपर से दो खूंखार लोग और पीछे से पहुंचेंगे … मेरी चटनी हो जाएगी इनके बीच।

ऐमी:- तू ऐसे नहीं सुनेगा… गार्ड इस छछूंदर को उठा कर मेरे गाड़ी में डालो…

ऐमी पहले से अपनी कर स्टार्ट कर चुकी थी… 4 गार्ड ने मिलकर उसे कार में जाकर छोड़ आए और ऐमी वहां से सीधा पब निकल गई।

लगभग 15 मिनट बाद… "सुन छोटे चल जरा हमलोग भी घूम कर आए… हम भी थोड़ा पार्टी करेंगे। वो लोग क्या सोचते है मेरी उम्र हो गई है।"

अपस्यु:- क्या बात कर रहे हो, अभी तो आप पूरे जवान हो। चलो बापू हम भी पार्टी करे। उन्हें भी अपना जलवा दिखा ही देते हैं। वैसे भी यहां की दारू मुझे चढ़ी ना है.. चलो उधर ही चलकर मूड बनाएंगे।

दोनों लड़खड़ाते खड़े हुए… "सुन छोटे कीटी सु गए है दोनों।"… "बापू इतने बड़े वकील हो, फिर भी गलती। हमे देख कर जगह बदल दी होगी ऐमी ने, याद नहीं लास्ट टाइम क्या हुआ था"…

सिन्हा जी:- हां सही कहा, रुक जीपीएस चेक करने दे… सही कहा कार रेडिशन के पास खड़ी है। चल हम भी चलतें हैं।"..

अपस्यु और सिन्हा जी दोनों बाहर निकले उसके पीछे-पीछे सभी गार्ड और ड्राइवर भी बाहर आए।… "तुम लोग घर चले जाओ.. मैं छोटे के साथ जा रहा हूं।"… तभी उनमें से एक गार्ड… "लेकिन सर" बोला। सिन्हा जी उसे माना करते हुए अपस्यु के साथ निकल गए।

कुछ ही देर में पब के पास थे और जैसे ही पब के गेट पर पहुंचे वहां का बाउंसर दोनों को दरवाजे पर ही रोक लिया… "आप लोग अंदर नहीं जा सकते"

सिन्हा जी:- बैनचो मुझे मना कर रहा है।

अपस्यु:- बापू शांत बेचारा रूल फॉलो कर रहा है।

सिन्हा जी:- इनके रूल की मां का भो… शुस शूस शु्स.. नो अब्यूज..

तभी वो बाउंसर आगे आया और सिन्हा जी के कॉलर पकड़ने के लिए हाथ आगे ही बढ़ाया था कि अपस्यु उसके हाथ को पकड़कर… "आराम से खड़े हो जाओ पीछे। बापू के कॉलर को हाथ लगाना मतलब हमारी इज्जत पर हाथ डालना… 10000 की ड्यूटी के लिए लंबा फस जाओगे। जाओ अपने मैनेजर को बुला लाओ।"…

"अबे छोड़ इनके मैनेजर को .. बैनचो मालिक को ही इधर बुलाते है। चल बैठ छोटे यहीं पर"… दोनों वहीं सड़क के पर नीचे बैठ गए और नीचे बैठ कर सिन्हा जी ने पब के मालिक को फोन लगा दिया…

2 मिनट में ही वहां पर पब के मालिक की कार लग चुकी थी। सिन्हा जी के बुलाने पर वो खुद अा गए और वो बाउंसर पास खड़ा सिर झुकाए और हाथ जोड़े खड़ा था।

सिन्हा जी उस बाउंसर को एक थप्पड खींच कर मारते हुए …. "मैं तुझ से बड़ा हूं और बड़ों की इज्जत करना सीख। छोटे इसकी ड्यूटी मुझे पसंद आयी, लड़का मन लगा कर यहां काम कर रहा है… टिप देकर अंदर अा"…

अपस्यु उसे 10000 का टिप देते हुए… "तुमसे बहुत बड़े हैं यार थप्पड का फील मत करना… बापू को तुम पसंद आए। ये लो रखो"… अपस्यु उसे 10000 देकर अंदर चला आया।

अंदर आते ही वो सीधा पहुंचा सिन्हा जी के पास बार काउंटर पर… "और बापू ऑर्डर कर दिया"…. "हां छोटे तेरे लिए वो तेरी पसंदीदा कॉकटेल ऑर्डर कर दिया हूं। सुन छोटे वो साला लड़का कौन है जो ऐमी के साथ नाच रहा है।"…… दोस्त होगा बापू छोड़ो ना।"….… "ना ऐसे नहीं तू जा उसे एक थप्पड मार कर अा।"……. "आप को चढ़ गई है बापू, वो अपने दोस्तों के साथ आया है यार … बेचारे को बेइज्जती फील होगी"…. "तूने उसे थप्पड नहीं मारा मुझे फील हुआ और ये बैनचो गाना कौन सा बज रहा है। जा ये गाना बदलवा कर अा।"

इधर आरव जो ऐमी की फ्रेंड के साथ नाच रहा था… "जे छोड़ा मुझे छोड़ कर यहां नाच रहा है, इसे तो मै अभी बताता हूं।" अपस्यु, आरव की कुछ फोटो चुपके से खींचने लगा, और साथ ही साथ लावणी के मोबाइल पर भी ट्रांसफर करता जा रहा था"…. तभी उसे कुछ ऐसा दिखा जो नहीं दिखना चाहिए था। उसने एक बार सिन्हा जी के ओर देखा… वो सामने बार काउंटर पर ऑर्डर से रहे थे….

"सुनो बापू, तुम्हे थप्पड देखना था ना।"…. "हां छोटे अभी देखनी है मुझे।"…… अभी दिखता हूं।"…... "ये हुई ना बात, अच्छा छोटे एक्शन से पहले जरा वो गाना बाजवा देना।….. "कौन सा गाना बापू"… "अरे वही जो कुछ दिन पहले तक ट्रेंड कर रहा था… तमंचे पे डिस्को"

अपस्यु ने एक बौंसर को पकड़ कर कुछ पैसे दिए और म्यूजिक बदलने के लिए बोल दिया। ऐमी के पास आकर उसका हाथ पकड़ा और उसे किनारे करते हुए, उसके जो सामने लड़का खड़ा था उसके सामने अपस्यु खड़ा हो गया। अपस्यु के हाव भाव देख कर वो समझ चुकी थी अब क्या होने वाला है…

ऐमी:- अपस्यु नहीं प्लीज, इग्नोर करो… वो नशे में है।

अपस्यु उसे आंख दिखाते…. "तुम नशे में तो नहीं थी ना ऐमी। कितनी बार तुम्हे एक ही बात समझता रहूंगा मै।

ऐमी:- अपस्यु प्लीज जाने भी दो।

अपस्यु:- जस्ट कीप क्वाइट ।

वो लड़का अब भी सर को घुमा-घुमा कर मदहोशी में नाच रहा था। अपस्यु अपनी बात कहकर वहीं सामने खड़ा रहा और उस लड़के को देख रहा था… वो लड़का , एक हाथ अपस्यु के कमर में डाला और दूसरा हाथ सीने के बाएं भाग में । अपस्यु फिर एक बार ऐमी को घुरा … जबतक वो लड़का बोलने लगा… "कुछ फील ना हो रहा बेबी।"

अपस्यु का गुस्से में खींच कर मारा गया एक तमाचा और उसके सिर को पकड़कर अपने घुटने पर दे मारा… उसके नाक से खून निकलने लगा। ये नजारा देखकर सिन्हा जी ग्लास टोस्ट करते हुए चिल्लाकर शाबाश कहे….

फिर तो जो ड्रामा वहां का शुरू हुआ, अपस्यु के सामने उसके 3-4 दोस्त आए और सभी को वो मारता चला गया। ग्लास कांच और अन्य सामान टूट रहे थे और सिन्हा जी ग्लास बढ़ा-बढ़ा कर एन्जॉय कर रहे थे। आरव किसी तरह अपस्यु को के जाकर बार काउंटर पर बिठाया। इधर बाउंसर ने जगह को जल्दी से साफ किया और उन मार खाए लड़कों को वहां से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

अपस्यु फिर से बार काउंटर पर बैठ कर अपनी पसंदीदा कॉकटेल के पेग पर पेग चढ़ाए जा रहा था। 10 पेग वो चढ़ा चुका था और एक पेग सामने रखी थी….

सुबह-सुबह का वक़्त…. अपस्यु सिर पर अपना हाथ रखे उठ कर बैठा। "ओह बहुत ज्यादा हो गई रात को।"…. "इसे पी लीजिए थोड़ा आराम मिलेगा"… अपस्यु थैंक्स बोलकर ग्लास हाथ में ले लिया। केवल और केवल नींबू निचोड़ा हुआ जूस था वो। एक सिप में ही दिमाग फ्रेश हो गया। डकार आने शुरू हो गए। साथ ने आंख भी थोड़ी खुली… हैरानी से चारो ओर वो देखने लगा और कुछ ही दूर बिस्तर के आगे केवल टॉवेल में साची खड़ी थी और नीचे बिस्तर पर उसके कपड़े फैले पड़े थे…..
 
Update:-41 (A)

सुबह-सुबह का वक़्त…. अपस्यु सिर पर अपना हाथ रखे उठकर बैठा। "ओह बहुत ज्यादा हो गई रात को।"…. "इसे पी लीजिए थोड़ा आराम मिलेगा"… अपस्यु थैंक्स बोलकर ग्लास हाथ में ले लिया। केवल और केवल नींबू निचोड़ा हुआ जूस था वो। एक सिप में ही दिमाग फ्रेश हो गया। डकार आने शुरू हो गए। साथ में आंख भी थोड़ी खुली… हैरानी से चारो ओर वो देखने लगा और कुछ ही दूर बिस्तर के आगे केवल टॉवेल में साची खड़ी थी और नीचे बिस्तर पर उसके कपड़े फैले पड़े थे…..

अपस्यु, झटके के साथ बिस्तर पर लेटते हुए पूछने लगा…. "रात में कितने बजे आया मै इधर।"

साची बिस्तर से अपने कपड़े उठाकर पहनती हुई… "मुझे क्या पता, मैं तो गहरी नींद में थी, सुबह जब उठी तो पास में तुम सो रहे थे।

अपस्यु:- मुझे पता है तुम झूठ कह रही हो। अब बता भी दो…

साची की प्यारी हंसी वहां गूंजती हुई…. "एक किस दोगे तो बताती हूं।"

अपस्यु:- मैं लेटा हूं अाकर ले लो।

साची:- सर अपस्यु कब से इतना सबमेसिव हो गए।

अपस्यु बिस्तर से उठा और साची का हाथ मड़ोर कर उसे उल्टा घुमाते हुए, उसके कानों में कहने लगा….. "आज और कल की साची में बहुत फर्क दिख रहा है। यह एक अच्छी बात है। लेकिन सवाल अब भी वही है कल रात मै कितने बजे आया?"

साची हंसती हुई…. शर्म नहीं आती मुझे ऐसी हालत में जकड़ रखे हो।

अपस्यु:- मैं हालत पर नहीं हालातों पर ध्यान देता हूं। और जितनी शरारत तुम्हारी आखों में नजर आ रही है, वो सब मेरे भाई की करतूत है। अब बताओ रात को मैं कितने बजे यहां आया और हमदोनों के बीच क्या बात हुई।

साची:- हाथ छोड़ो ना, दुखता है।

अपस्यु, हाथ छोड़ते:- अब बताओ कल हमारे बीच क्या बात हुई।

साची खुलकर और खिल-खिलाकर हंसती, अपने हाथ हिलती हुई कहने लगी…. "जाओ नहीं बताती क्या कर लोगे"…

अपस्यु, कुछ सोच ही रहा था कि तभी साची उसके सामने आती हुई कहने लगी… "खुला बदन इतना ही पसंद अा रहा है तो क्या पूरा ही खोलकर दिखा दूं?"

अपस्यु:- बावली कहीं की, नहाने के बाद इतना समय लगता है क्या कोई कपड़े पहनने में। कॉलेज के लिए तैयार हो ना जल्दी वरना अनुपमा मिश्रा आती ही होगी। तब से खुद ब्रा-पैंटी में मंडरा रही हो और मुझे बेशर्म कह रही।

साची:- अच्छा दिल जल रहा है क्या इन कपड़ो में देखकर।

अपस्यु:- साची थोड़ा सा मज़ाक अच्छा लगता है। लेकिन लगातार एक ही बात पर मज़ाक करती रहोगी तो बातें इरिटेटिंग हो जाएगी।

साची:- अच्छा ठीक है मैं तैयार होती हूं।

अपस्यु, नींबू जूस पीते हुए पूछने लगा…. "रात की सभी बात को तुम सस्पेंस ही रखने वाली हो ना।"

साची:- हां बिल्कुल… कितने स्वीट हो तुम जानेमन।

अपस्यु:- हम्मम !!! अच्छा बस एक रिक्वेस्ट पूरी करोगी।

साची:- हाए । ऐसे रिक्वेस्ट पर तो जान ले लो। …

अपस्यु:- कल रात की बात मैंने कहां से शुरवात की थी वो बस बता दो।

साची:- मुझे याद नहीं।

अपस्यु:- कुछ ही समय पूर्व तो कह रही थी "ऐसे रिक्वेस्ट पर तो जान ले लो।" ….. अभी मुकड़ रही अपनी बातों से।

साची:- जान चाहिए तो ले लो कुछ ना कहूंगी। लेकिन यह नहीं बता सकती, कुछ और पूछो।

अपस्यु:- ठीक है कोई एक बात ही साझा कर दो।

साची:- ज़िन्दगी में थोड़ा टफ भी बनाना पड़ता है।

अपस्यु:- बहुत खूब, अब बताओ यहां से मै जाऊं कैसे।

"अब तक सो रही है क्या… कॉलेज नहीं जाना।"….. "तैयार हो रही हूं मम्मी, अभी अाई बाहर"… दरवाजे पर खड़ी होकर अनुपमा चिल्लाई जिसका जवाब साची ने दिया।

साची, अपस्यु के ओर देखती…. "सुबह का वक़्त और सब के सामने से निकालना… सोचिए अपस्यु जी सोचिए।

अपस्यु, आरव को कॉल लगाते हुए…. "मुझे यहां से अभी बाहर निकाल"

आरव:- तू वहीं अच्छा है… लावणी से मेरा झगड़ा करवाया ना .. अब तू वहीं फसा रह कमिने।

अपस्यु, आरव का कॉल डिस्कनेक्ट करने के बाद बहुत ही सोच में पर गया। कुछ देर सोचने के बाद वो उठकर खिड़की के पास गया और खिड़की को ध्यान से देखने लगा।… "नहीं यहां से निकालना संभव नहीं है जाना… सॉरी साची माफ़ करना"

साची आइने के सामने बैठकर अपनी बाल बना रही थी। उसे बातों मै उलझाकर अपस्यु ने सामने पड़े पीन को चुपचाप उठा लिया और अचानक से पूरा पीन साची के कंधे में घुसा दिया। साची की तेज चीख निकल गई।

उसकी आवाज़ काम करने वाली बाई ने सुनी और फिर सुनते-सुनते पूरे घर ने सुन लिया। अपस्यु वहीं दरवाजे के किनारे खड़ा हो गया। दौड़े-दौड़े सभी घरवाले "क्या हुआ, क्या हुआ" करते साची के कमरे पहुंच गए। सबने दरवाजा खोला और सीधा अंदर।

साची के आखों से आशु बह रहे थे और वो पिरा में अपने हाथ पीछे करके पीन निकालने की कोशिश कर रही थी। सब "क्या हुआ, क्या हुआ' कर रहे थे और सबसे पीछे अपस्यु खड़ा होकर वो भी "क्या हुआ, क्या हुआ" करने लगा।

साची:- पीठ में पीन चुभ गया।

अपस्यु चिंता जाहिर करते हुए, सबको किनारे करते आगे आया और झटके से पीन को बाहर निकलते हुए कहने लगा…. "अरे फौरन इलाज ना हुए तो टेटनस के साथ साथ सेप्टिक भी हो जाएगा। लावणी तुम इसके कॉपी-किताब लेकर कॉलेज चली आना। मैं इसे डॉक्टर से दिखा कर वहीं कॉलेज लेे आऊंगा।

अपस्यु साची का हाथ पकड़कर, उसके पूरे परिवार के बीच से उसे लेकर गया। … और सब देखते रह गए…. "ये कब आया"… लावणी के मुख से अनायास ही निकला, जिसे अनुपमा ने सुन लिया।

अनुपमा अपने मन में विचार करती…. "कब आया, हुलिया तो अजीब ही था। बाल बिखरे, ऐसा की रात में ठीक से सोया भी ना हो…. (धक धक, धक धक)… नहीं मै ही पागल हूं, ऐसा नहीं होगा, वो अपने घर से ही आया होगा। लेकिन ये तो सुबह 4 बजे उठ जाता है फिर इसका ये हुलिया.. कहीं ये रात में चोरी से यहां… नहीं-नहीं मैं भी ये क्या सोच रही हूं। लेकिन तब भी दोनों, जवान लड़की और जवान लड़का है।"

"बड़ी मां क्या हुआ, कहां खोई है।"… लावणी अनुपमा को हिलाती हुई पूछने लगी।

अनुपमा:- कुछ नहीं। तू साची के बुक्स लेे जा।

लावणी, साची का सरा सामान उठाने लगी, तभी बिस्तर पर अपस्यु का वॉलेट उसे परा मिल गया। वो चौंककर एक बार पीछे देखी फिर बड़ी सफाई से उसे किताब के बीच छिपाकर लेे जाने लगी…

"ऐ भूटकि सुन"… लावणी हड़बड़ा कर पीछे मुड़ी… "हां बड़ी मां"

अनुपमा उसके चेहरे के भाव को पढ़ती हुई… "क्या हुआ इतना घबराई क्यों है।"

लावणी:- वो बड़ी मां मै सोच रही थी, यदि दी को सैप्टिक हो गया तो बहुत परेशानी होगी ना।

(इसे कुछ तो पता है, मुझसे कुछ तो छिपा रही है ये)……. "तू इतना घबराई क्यों है, थोड़ी देर पहले तो नहीं घबराई थी".. अनुपमा थोड़े कड़े लहजे में जवाब तलब करती हुई।

लावणी:- बड़ी मां चिंता जब शुरू होगी तभी तो घबराहट आएगी।

अनुपमा:- हम्मम ! अच्छा साची को कॉल लगाकर पूछ किस हॉस्पिटल में गई है?

लावणी, साची से संपर्क करने के बाद…. "बड़ी मां वो लालजी हॉस्पिटल गए हैं।"

अनुपमा:- तू अपना फोन मुझे दे जरा…

लावणी ने जैसे ही अनुपमा को फोन दी, वो झट से अपने पास रखती हुई कहने लगी…. "5 मिनट रुक मै भी तुम्हारे साथ कॉलेज चल रही हूं।"

"इसपर तो आज पूरा काल मंडरा रहा है। भगवान थोड़ी नजर उधर भी डाल देना".. लावणी अपने मन में सोचती हुई चुपचाप वहां से निकल गई।

इधर साची का हाथ पकड़कर जब अपस्यु उसे लेे जा रहा था, वह उसकी हिम्मत और सूझ-बुझ की दीवानी हुई जा रही थी। अपार्टमेंट की पार्किंग में पहुंचकर अपस्यु ने साची को कार में कुछ समय इंतजार करने के लिए कहा और भागकर घर में पहुंचा।

नंदनी, अपस्यु को देखते ही गुस्से मै पूछने लगी… "रात भर कहां थे।"

अपस्यु:- मां लौटकर बताता हूं। अभी मै आप से ही मिलने आया था। अाकर पूरी बात बताता हूं।

अपस्यु, नंदनी से लिपटकर अपनी बात कहकर भागने लगा… नंदनी उसे पीछे से कुछ खा कर निकालने के लिए कहती रही लेकिन वो बाहर खाने का बोलकर निकल गया।

अपस्यु, साची को लेकर सिन्हा जी के बंगलो पहुंचा। सिन्हा जी दरवाजे पर ही कार में मिल गए। वो भी सुबह-सुबह किसी केस के सिलसिले में ऑफिस निकल रहे थे। कुछ औपचारिक बात होने के बाद सिन्हा जी ऑफिस निकल गए और अपस्यु साची को लेकर बंगलो के अंदर घुस गया।

"हम यहां क्यों आए हैं अपस्यु, मुझे लगा हम कहीं घूमने निकलेंगे। या फिर कोई रोमांटिक सफर होगा।" … साची मुस्कुराती हुई अपनी बात कही और अपस्यु को आंख भी मार दी।

अपस्यु:- साची वादा करो अभी, की आज तुम पूरा दिन मेरे साथ रहोगी, जबतक मै तुमसे ये ना कह दूं .. ये है पूरी कहानी।

साची, अपस्यु के गले में हाथ डालते बिल्कुल उस से चिपकती हुई कहने लगी… "मै तो पूरी उम्र तुम्हारे साथ रहूंगी और एक पूरी कहानी सुनने के बाद फिर से कोई नई कहानी बनाएंगे और ये सिलसिला पूरी उम्र चलता रहेगा।"

अपस्यु:- अच्छी बात है। लेकिन आज के लिए जो वादा मांग रहा हूं, उसके लिए तो हां कह कर स्वीकृति दे दो।

साची:- मतलब इतना कहने के बाद भी केवल आज के पीछे पड़े हो, ठीक है बाबा वादा किया। और कुछ ..

अपस्यु:- हां ! बस इतना ही की आगे जो भी होगा, उसपर ओवर रिएक्ट मत करना मैं सारी बातें समझा दूंगा।

साची, अपस्यु की इस आखरी बात पर कुछ देर तक सोचती रही, फिर उस बंगलो को ध्यान से देखने लगी… उसका खिला चेहरा थोड़े चिंता में डूबा नजर आने लगा। और साची अपनी इसी चिंता को जाहिर करती हुई कहने लगी….

"जबसे मुझसे गलतियां हुई है मैंने ये एक काम तो सबसे पहले छोड़ दिया है, वो है ओवर रिएक्ट करना। लेकिन बात क्या है अपस्यु, तुम मुझे यहां क्यों लाए हो? कहीं इनका बंगलो खाली हैं ये सोच कर तो नहीं लाए। सुनो शायद कुछ गलतफहमियां हुई है जिन्हे अभी बात करके दूर करनी होगी।"

"कल रात तुम मेरे पास जब आए, तब नशे कि हालत में मुझ से वो सब कह गए जो तुम्हारे दिल में मेरे लिए था। यहीं एक वजह है कि कल और आज की साची में तुम्हे बहुत फर्क नजर आया होगा। रही बात तुम्हारे पास आना और मेरा खुला व्यवहार करना तो आज के पहले कि कहानी कुछ और ही थी जिसका शायद तुम्हे कोई ज्ञान नहीं, और आज तो मै तुम्हे केवल चिढ़ा रही थी क्योंकि तुम पर मुझे पूरा यकीन जो है।"

"अगर तुम सुबह की बात सोचकर इस खाली बंगलो में लाए हो तो मै क्या कहूं इसपर। बस इतना ही कहना चाहूंगी, मेरे अंदर के संस्कार मुझे कभी इस बात की इजाज़त नहीं देगी। फिर भी तुम यदि इसी में खुश हो तो फिर मै गलत साबित हो जाऊंगी… आगे तुम्हारी मर्जी.. मै साथ हूं।"

"सो नाइस ऑफ यूं… बस अपनी बात याद रखना कोई ओवर रिएक्शन नहीं।".. अपस्यु अपनी बात कहकर इधर-उधर देखने लगा और साची अपस्यु को देखकर समझने कि कोशिश कर रही थी कि ये चाहता क्या है?
 
Update:-41 (B)

अपस्यु ने घर के नौकर से पता किया ऐमी कहां है? पता चला वो अभी तक सो रही थी। अपस्यु साची को लेकर सीधा उसके कमरे की ओर बढ़ा। साची को कुछ भी समझ में नहीं अा रहा था, अपस्यु करना क्या चाह रहा है। वो कुछ पूछना शुरू करती तो अपस्यु उसे इतना ही कहता बस देखती जाओ।

दोनों साथ-साथ उसके कमरे में पहुंचे, साची को सामने एक लड़की चादर ताने सोई हुई दिखी। ऐमी गहरी नींद में लेटि थी। अपस्यु कमरे में लगे चेयर पर साची को बैठने का इशारा किया। साची उसके इशारे पर बैठ तो गई लेकिन उसके दिमाग में अब काफी हलचल सी मच रही थी, फिर से एक भावना जो उसके अंदर कौंध रही थी लेकिन अपने सभी भावनाओ पर वो काबू रखती बस अपस्यु को ही देख रही थी।

अपस्यु, ऐमी के बिस्तर पर चढ़ गया। उसके कमर के दोनों ओर पाऊं रखकर बैठते हुए, उसके गर्दन पकड़कर जोड़-जोड़ से हिलाने लगा…. "आओओ … इतनी सुबह-सुबह क्यों पहुंचे। प्लीज अभी लैक्चर नहीं"..

अपस्यु उसके होंठ से होंठ लगा कर ऐमी को चूमते हुए… "उसपर बाद में बात करेंगे। उठ जाओ तुम्हारे कमरे में कोई गेस्ट है।"… इतना कहकर अपस्यु उसके ऊपर से हटा और अलमीरा से अपने कपड़े निकालकर सीधा बाथरूम में घुस गया।

ऐमी अंगड़ाई लेती उठकर बैठी, जब उसके शरीर के ऊपर से चादर हटा और अंगड़ाई लेकर वो उठ रही थी… साची उसे पहली बार करीब से पूरा देख रही थी। जब वो उठकर बिस्तर से बाहर आयी तब तो उसकी आंखें और भी फैल गई क्योंकि इस तरह की लुभावनी लिंगरी में वो किसी लड़की को पहली बार देख रही थी।

साची के ठीक सामने आएन था, जिसमे वो अपने पूरे बदन पर गौर कर रही थी और खुद को ऐमी से तुलना करके देख रही थी। … "क्या हुआ तुम मुझे इस तरह से घूर क्यों रही हो। कहीं तुम लेस्बियन तो नहीं।"... साची ना में अपना सिर हिलाती उसपर से अपनी नजरें हटा ली।

अजीब ही उलझन में साची थी। दिल तो खैर टूटा ही था, साथ ही साथ इतने सारे सवाल एक साथ उसके मन में अा रहे थे जिन्हें वर्णित करना संभव नहीं। क्या उस मनोदशा की भी कल्पना की जा सकती थी, जब अपने ही प्यार को किसी दूसरी लड़की के साथ चूमते पकड़ो। लेकिन यहां तो चूमते पकड़ा भी नहीं था उल्टा खुद अपस्यु उसे ये सब दिखा रहा था।

"ज्यादा मत सोचो वो खुद ही सारी बातें क्लियर कर देगा"… ऐमी अपने ऊपर कपड़े डालती हुई कहने लगी।

साची:- तुम..

ऐमी:- मैं ऐमी हूं, और तुम साची हो ना।

साची:- तुम मुझे जानती हो?

ऐमी:- हां बिल्कुल.. चाय लोगी या कॉफी..

साची:- एक सुकून की नींद, जो ना जाने कितनी रातों से मैं सोई नहीं और ना जाने कितनी रातो तक आए नहीं।

ऐमी:- विरह के सोक अवस्था। कीप इट अप डार्लिंग।

ऐमी के ऐसे रिप्लाई पर साची उसे ऐसी घुरी मानो वो उसका मुंह अभी नोच ले। उसकी ऐसी प्रतिक्रिया देख कर ऐमी को हंसी अा गई। वह हंसती हुई कहने लगी…. "सॉरी यार, हम बेफिक्रे लोग है, जो मुंह में आया बक देते है। तुम्हारी भावना को ठेस पहुंचाना मेरा बिल्कुल भी मकसद नहीं था।"

इतने में अपस्यु भी तैयार होकर बाहर अा गया… "चले साची"..

अपस्यु, के ऐसे पूछने पर मानो उसके बदन में आग सी लग गई हो… वो अचानक ही फट पड़ी… लेकिन शायद अपनी अभिव्यक्ति के लिए उसे ज्यादा शब्द नहीं मिल रहे थे इसलिए वो धोखेबाज, स्काउंद्रल, और चंद शब्द बोल कर चिल्लाए जा रही थी। उसे भी थोड़े ना समझ में आ रहा था कि वो क्या भावना व्यक्त करे।

फिर शुरू हुई समझाने कि कोशिश, लेकिन क्या ऐसी स्तिथि में किसी भी लड़की को समझाया या चुप करवाया जा सकता था, कभी नहीं। अपस्यु को इस स्तिथि का अंदाज़ा था इसलिए अपस्यु और ऐमी ने मिलकर उसके मुंह पर टेप लगा दिया और हाथ-पाऊं बांध कर उसे गाड़ी में बिठा दिया।

कार जैसे ही उस बंगलो से आगे बढ़ी, अपस्यु अपना हाथ पीछे बढ़ाकर उसके हाथ कि रस्सियां खोल दिया। हाथ की रस्सी खुलते ही, साची ने सबसे पहले खुद को कैद से आजाद करवाया। फिर कुछ देर तक तक अंदर ही चिल्लाती रही फिर चिल्ला-चिल्ला कर खुद ही चुप हो गई।

उसके चुप होने के 2 मिनट बाद अपस्यु उससे कहने लगा… "मैंने कल तुम्हारी और कुंजल की लगभग बातें सुनी थी। तुम्हे बहुत सी बातें बतानी है लेकिन जबतक तुम कुछ सुनने के लिए तैयार नहीं होगी तबतक मैं कुछ भी कर लूं तुम्हे समझा नहीं सकता।

साची, फिर से चिंख़ती हुई कहने लगी….. "इसमें समझना क्या है, तुम दोनों का अफेयर है और मेरे साथ तुम एक्स्ट्रा अफेयर कर रहे थे। सच ही कहा क्रेज़ी ने तुम धोखेबाज हो।

अपस्यु:- ठीक है तुम अपनी राय बनाए रखो। मै किसी तरह का उसमे छेड़-छाड़ नहीं करूंगा। बस एक ही बात कहता हूं.. मै धोखेबाज होता तो तुमने मुझे सामने से कई मौके दिए थे। इसके अलावा मै खुद तुम्हे ऐमी से मिलवाने लेे गया। आगे तुम्हारी सोच। आज का एक दिन तुमसे क्यों मांगा जरा इस बात पर भी गौर करना। तुम चाहो तो मुझे धोखेबाज समझ सकती हो या नहीं तो मै कैंटीन में मिल जाऊंगा। उतारो हम पहुंच चुके हैं।

साची कार से नीचे उतरकर कुछ कदम आगे चली और कुछ सोचकर वापस अपस्यु के पास पहुंची…. "एक बात बताओ, तुम किससे प्यार करते हो।

अपस्यु:- तुमसे

साची को एक बार फिर गुस्सा अा गई…. "और जो सुबह-सुबह तुम दोनों मुंह से मुंह चिपकाकर कर रहे थे वो भी बिना ब्रश किए यक्क .. वो क्या था फिर"..

अपस्यु:- हमारा कैज़ुअल रिलेशन…

"क्या……. कौन सा रिलेशन"… अपस्यु अपनी बात कहकर आगे निकल चुका था और साची उसे पीछे से पूछने लगी।

अपस्यु चलते चलते…. "अपनी क्लास खत्म करके कैंटीन अा जाना आज का पूरा दिन केवल तुम्हारे लिए रखा है। बाकी आना ना आना तुम्हारी मर्जी"

अपस्यु वहां से चला गया और साची, सिर्फ 5 मिनट पहले जिसके दिमाग में बॉम्ब फुट रहे थे, वो केवल इतना ही सोचने में लगी रही…. "जीवन में तरह-तरह के रिलेशन के बारे में सुनी, ये कैज़ुअल रिलेशन क्या होता है।"

दूसरी ओर अनुपमा भी कॉलेज जाने के लिए तैयार हो चुकी थी। लावणी पहले से अपनी स्कूटी को तैयार करके खड़ी थी। अनुपमा को देखती ही कहने लगी…. "बड़ी मां अब मै समझी आप 5 मिनट बोल कर आधा घंटे बाद क्यों अाई। खूबसूरत दिख रही है।"…

अनुपमा उसे एक थप्पड लगाती हुई कहने लगी… "हम कार से चलेंगे".. लावणी अपने गाल पर हाथ रखकर उसके पीछे चल दी।…

दोनों कार में बैठ चुके थे। लावणी अब भी अपने गाल पर हाथ रखे, सोचने लगी…. "मिर्गी उन दोनों को अाई है और बड़ी मां गुस्सा मुझ पर निकाल रही"..

"कुछ पूछ रही हूं बोलती क्यों नहीं"… अनुपमा लावणी को डांटती हुई पूछने लगी।

लावणी:- क्या पूछ रही थी बड़ी मां।

अनुपमा:- ना जाने कहां खोई रहती है ये लड़की। सपना गार्डन (वहीं गार्डन जहां से साची, अपस्यु से मिलने लालजी हॉस्पिटल आयी थी) और अपने घर के रास्ते में लालजी हॉस्पिटल पड़ता है क्या?

लावणी:- नहीं बड़ी मां, दोनों अलग डायरेक्शन में है।

"ओह मतलब उस रात भी ये तबीयत खराब का बहाना करके उसी से मिलने गई थी। इसके तो पड़ मै आज कतरूंगी।"… अनुपमा मन में ख्याल लाती।

लावणी:- बड़ी मां फोन दो ना।

अनुपमा ने लावणी को उसका फोन दे दी। लावणी ने जैसे ही अपना फोन चालू की स्क्रीन पर व्हाट्स ऐप मसेंजर खुला हुआ। ऐप को जब उसने मिनिमाइज किया तब पता चला, अनुपमा ने उसका पूरा फोन खंगाल लिया था। मन ही मन वो अपस्यु को धन्यवाद कर रही थी। कल रात यदि उसने वो फोटो नहीं भेजी होती, तो ना ही वो आरव से झगड़ा करती और ना ही वो उसके सभी मैसेज और फोटो डिलीट करके उसे ब्लॉक करती।

पहली जांच पड़ताल लालजी हॉस्पिटल। यहां वो दोनों आए थे। दूसरी जांच पड़ताल कॉलेज में। क्लास में बैठकर साची पढ़ रही थी। यहां भी सब कुछ क्लियर। इसी बीच जब अनुपमा लौट रही थी तब उसकी नजर अपस्यु पर पड़ी… अनुपमा ने अपना रास्ता बदल लिया और वो अपस्यु से बात करने उसके पास पहुंची…

अपस्यु जहां खड़ा था वहां के चारो ओर का माहौल देखकर लावणी का दिल डीजे के बूफर जैसे धड़कने लगा, लेकिन अब वो कर भी क्या सकती थी, बस अपस्यु ही सामने खड़ा दिख रहा था और वहीं उसका इकलौता सहारा था।

अपस्यु ने जब अनुपमा के साथ-साथ लावणी को भी आते देखा, तो लावणी के चेहरे का उड़ा रंग देखकर उसे हंसी आने लगी। खैर वो अपने हंसी पर काबू किया और अनुपमा को नमस्ते करते हुए कहने लगा, सुबह साची को डॉक्टर से दिखाना जरूरी लगा इसलिए आप लोगों से बिना पूछे उसे साथ ले आया। सॉरी आंटी।

अनुपमा:- कोई बात नहीं है बेटा, तुम उसके साथी हो और ये तो बड़ी खुशी की बात है कि तुम्हे भी उसकी चिंता है। थैंक यू सो मच…

(झूठी, पूरे रास्ते इंक्वायरी करती अाई है ये, अब सामने है तो थैंक यूं बोल रही).. लावणी

अपस्यु:- अरे इसमें थैंक्स जैसा क्या है, हम पड़ोसी है। एक ही कॉलेज में है। और आप की तो मेरी मां से अच्छी दोस्ती भी हैं। अब इन सबके बदले मैंने कुछ कर दिया तो इसमें थैंक्स जैसा क्या है।

(हां फेकू, बिस्तर पर वाला वॉलेट हाथ लग जाता ना तब ये सफाई देते। चार चप्पल लगाती बड़ी मां) लावणी..

अनुपमा:- बेटा तुम क्लास में नहीं हो। तुम और साची तो एक ही विषय पढ़ते हो ना।

अपस्यु:- अरे आंटी वो सुबह साची से एक नोट्स लेकर बस एक झलक देखना था, तो सोचा वो लेेकर देख लूं फिर आराम से तैयार होकर जाऊंगा कॉलेज, और इतने में ही ये सरा कांड हो गया… इसलिए साची को यहां छोड़ कर फिर तैयार होने गया था।

अनुपमा:- घर से तैयार होकर इतनी जल्दी अा भी गए।

अपस्यु:- अच्छा मज़ाक कर लेती है आंटी। नहीं मै घर नहीं गया था यहीं अपने दोस्त के पास जाकर उसके कपड़े उधार मांग लिए और वहीं तैयार हो गया।

(ओ पागल बस कर, तू भी जा इन्हे भी जाने दे। क्यों पकड़े है इन्हे। एक बार जाने दो बड़ी मां को फिर उस आरव को बताती हूं मै)

अनुपमा:- कितने सरल हो तुम अपस्यु। चलो बाय बेटा।

(शुक्र है.. बला टली).. लावणी

अपस्यु:- अरे कहां आंटी… आप पहली बार कॉलेज अाई है, एक चाय तो पीती जाइए।

(ओ बावरा, जाने दे ना बड़ी मां को… पागल कहीं का।)

अनुपमा:- नहीं बेटा जाने दो। चाय तुम्हारे घर पर कभी पिएंगे। चलो अब मै चलती हूं।

(हे ऊपरवाले तेरा लाख लाख शुक्रिया, बच गई आज तू लावणी)..

जैसे ही अनुपमा जाने लगी, अपस्यु लावणी को देखकर कहने लगा…. "अरे लावणी तुम यहीं थी। कबसे तुम्हे ही ढूंढ़ रहा था। ये देखो किसी ने यहां क्या लिखा है"…

लावणी तो पहले ही देख चुकी थी अब बारी थी अनुपमा की, जो ऊपर नजर उठा कर बड़े-बड़े बैनर में लिखा पढ़ रही थी…. "लावणी आई एम् सॉरी…. किसिंग इमोजी… आई लवयू बेबी ….. किसिंग इमोजी…. प्लीज मुझसे लाइब्रेरी के पास मिलो, तुम्हारे सारे गीले शिकवे दूर कर दूंगा।"

(बैनचो चुटिया कहीं का… फसा दिया साले ने)…. लावणी
 
Update:-42

लावणी तो पहले ही देख चुकी थी अब बारी थी अनुपमा की, जो ऊपर नजर उठा कर बड़े-बड़े बैनर में लिखा पढ़ रही थी…. "लावणी आई एम् सॉरी…. किसिंग इमोजी… आई लवयू बेबी ….. किसिंग इमोजी…. प्लीज मुझसे लाइब्रेरी के पास मिलो, तुम्हारे सारे गीले शिकवे दूर कर दूंगा।"

(बैनचो चुटिया कहीं का… फसा दिया साले ने)…. लावणी

अनुपमा उस बड़े-बड़े बैनर को पढ़ने के बाद गुस्से में आखें लाल पीली करती हुई लावणी के ओर देखने लगी…. "ये सब क्या है"… अनुपमा की तेज आवाज और लावणी सहम गई। उसके पाऊं कापने लगे और आखों से गंगा-जमुना बहने लगा।

अनुपमा:- इसकी तो मैं बाद में खबर लेती हूं, अपस्यु चल पहले प्रिंसिपल ऑफिस।

अपस्यु:- बिल्कुल आंटी चलो चलते हैं।

दोनों प्रिंसिपल ऑफिस के दरवाजे पर पहुंचे जहां दरवाजे पर खड़ा चपरासी उन्हें रोकते हुए कहने लगा…. "सर अभी मीटिंग में व्यस्त है, आप बाहर इंतजार कीजिए।"

अनुपमा मिश्रा, अब कहां रुकने वाली थी, धड़ाम से दरवाजा खोली और फाटक से अंदर। प्रिंसिपल अपने चेयर पर बैठकर सामने कुछ लोगों से बात कर रहा था। अनुपमा और अपस्यु को इस तरह बिना इजाज़त अंदर घुसते हुए देखकर, प्रिंसिपल ने चपरासी से कड़े लहजे में जवाब तलब किया।

चपरासी तो धीमे बोलना शुरू ही किया था लेकिन बीच में ही अनुपमा ने चिल्लाना शुरू कर दिया…. "आप ये कॉलेज चला रहे है या लवर्स पार्क। ऊपर से शिकायत करने आओ तो बाहर इंतजार करने के लिए बोला जाता है। क्यों करे इंतजार, आखिर आप की कोई जवाबदेही बनती है कि नहीं।"

प्रिंसिपल अपने सामने बैठे लोगों को बाद ने आने के लिए कहकर अनुपमा को शांत होकर पूरा मामला समझाने के लिए कहता है। अनुपमा पूरे गुस्से में अपनी बात कहकर प्रिंसिपल को घूरने लगती है।

प्रिंसिपल:- मैम आप का गुस्सा जायज है मै सारे मामलों की छान-बीन करके पूरा एक्शन लूंगा। आप निश्चिंत रहिए।

अनुपमा:- आप मेरे साथ चलकर अभी एक्शन लीजिए, तभी मेरा गुस्सा ठंडा होगा।

इधर अनुपमा जैसे ही प्रिंसिपल के ऑफिस के लिए अपस्यु के साथ निकली, लावणी दौड़ कर लाइब्रेरी के पास पहुंची। वहीं कोने में आरव उसका इंतजार कर रहा था।.. लावणी को देखते ही वो खुशी से नाचते हुए गाने लगा…. "आईये आप का इंतजार था।".. अराव लावणी को आते देख मुस्कुराते हुए गा रहा था और लावणी उसके पास पहुंचकर उसे एक थप्पड चिपका दी।

आरव:- बेबी मेरा दूसरा गाल बुरा मान जाएगा… एक बार प्यार से इनपर भी हाथ फेर दो ना।

लावणी उसकी ये अरमान भी पूरी करती हुई कहने लगी… "तुम दोनों भाई पागल हो, उसने रात वाली तुम्हारी हरकत मुझे बताई और तुम्हारी सुबह वाली हरकत बड़ी मां को दिखा दिया।"

आरव:- क्या मतलब तुम्हारा…

लावणी उसके बाल को अपने दोनो हाथों से जोड़-जोड़ से नोचती हुई कहने लगी… "तुमने जो बड़े-बड़े बैनर लगाकर ढिंढोरा पिटा है ना उसे तुम्हारे भाई ने मेरी बड़ी मां को दिखा दिया।"

आरव उसके पास आने लगा, लेकिन तभी लावणी उसे हाथ दिखाती हुई कहने लगी…. "आज से हमारा ब्रेकअप… तुम तो दूर ही रहना मुझसे… और तुम्हारे भाई की वजह से यदि मुझे कुछ सुनना परा ना तो तुम देख लेना, क्या करती हूं मै।"

लावणी पूरा आक्रोशित होकर वहां से निकली। …. "कमिना माहौल बना कर मज़े लूट रहा है, तूने अच्छा ना किया अपस्यु।"…. ख्यालों में ही गाली देते हुए उसने तुरंत कुंजल को कॉल लगा दिया। 1 मिनट में उसने कल रात से सुबह तक का सरा मामला समझाकर, 5 मिनट में ही उसे किसी तरह मामला सैटल करने के लिए बोल दिया।

थोड़े ही देर में अनुपमा सबको लेकर लाइब्रेरी के पास पहुंच गई…. "ये क्या है"… सामने एक टेबल पर केक रखा था और 4-5 लड़के लड़कियों ने जैसे ही सामने से लावणी को आते हुए देखा, सब एक स्वर में गाने लगे…. "सॉरी सॉरी सॉरी पकड़े दोनों कान क्या"

प्रिंसिपल:- वहां बैनर किसने लगवाया…

विन्नी आगे आकर कहने लगी…. "हम सब ने सर"

प्रिंसिपल:- और ऐसे बैनर लगाने का क्या मतलब है, तुमलोग समझाओगे मुझे।

कुंजल:- सर हमने अपने जूनियर को थोड़ा परेशान किया था ना इसके लिए उसे सरप्राइज देने और उसके चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए ये प्लान किया था।

प्रिंसिपल:- मतलब तुम सब ने मिलकर रैगिंग की इस कैंपस में।

विन्नी:- सर थोड़ी सी छेड़-छाड़ कब से रैगिंग हो गई। क्या आपको अनुभव नहीं है कि रैगिंग क्या होती है। आप अपने जमाने से पहले तुलना कीजिए फिर कहिए।

क्रिश:- वैसे भी क्या उसने शिकायत कि है? पूछ लीजिए उससे की हमने रैगिंग की थी या थोड़ा सा मस्ती मज़ाक। उससे ज्यादा परेशान तो हमलोग आप को कर देते हैं कभी-कभी।

प्रिंसिपल:- बस-बस मुझे मत समझाओ, इनके गार्जियन आए हैं इन्हे समझाओ ये बात।

कुछ देर की बातचीत और कुंजल ने सरा मामला संभाल लिया। ये मैटर तो सलट गया लेकिन आरव और लावणी के बीच की कहानी फसा कर अपस्यु अपनी कहानी सुलझाने के इरादे से कैंटीन में बैठा साची का इंतजार कर रहा था।

"ये सब क्या था भाई, तुमने जान-बुझ कार आरव को फसाया"… कुंजल पास बैठते पूछने लगी।

अपस्यु:- अरे ऐसे झगड़ों को एन्जॉय करो। जरा मै भी तो देख लुं इनके रिश्ते की गहराई को। लवर्स है या केवल अब तक गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड पर ही अटके है।

कुंजल:- जानते हो एक बात भाई..

अपस्यु:- क्या ?

कुंजल:- आप ना खुद को इतना ऊंचा उठा लिए हो की बाकी सभी आपको अपने नीचे नजर आने लगे है। केवल आप ही सही हो। आप जैसा सोचते हो सब वैसा ही करे।

अपस्यु:- अरे .. किस बात से खफा है रे बच्चा… इतना गुस्सा।

कुंजल:- गुस्सा ना रहूं तो क्या करूं। खुद दूसरों के साथ क्या कर रहे हो इस बात की जानकारी भी है क्या? क्या आप को समझ में आता है कि आप के वजह से कोई सुसाइड भी कर सकती है?

अपस्यु:- कुछ सवालों के जवाब वक़्त देता है, इसलिए मै क्या कर रहा हूं वो खुद तुम्हे पता चल जाएगा।

कुंजल:- हुंह । इसे घमंड कहते है। "जो भी मै कर रहा… तू अभी बच्ची है… अभी नहीं समझ में आएगा"…. हर कहानी तो खुद के ही बात पर खत्म कर देते हो।

अपस्यु:- ओ.. ओ .. !! कुंजल इतना गुस्सा क्यों?

कुंजल गुस्से में उठकर चली गई। अपस्यु उसकी बातों को सोच कर बस मुस्कुराए जा रहा था। …. "जरूर मुझ पर ही हंस रहे होगे।"… साची सामने बैठकर पूछने लगी।

अपस्यु:- अरे मुकेश 2 कप कॉफी लाना तो।

अपस्यु, का ऐसा कहना था कि साची उसे हैरानी से देखने लगी। अपस्यु वहीं अपने मुस्कुराते अंदाज में साची से कहने लगा…. "मै आज तुम से अपना कुछ अनुभव साझा करने वाला हूं। यदि तुम अपनी यथावत स्तिथि (करेंट सिचुएशन) से बाहर निकलना चाहती हो तो मुझ पर भरोसा रखना और यदि कुछ कहूं तो मान लेना।"

साची:- अपस्यु अब तो तुमसे डर लगने लगा है। तुम्हारे अंदर मुझे कोई साइको दिख रहा है। जब से तुम मेरी ज़िन्दगी में आए हो ज़िन्दगी बदतर होते चली जा रही हैं क्यों कर रहे हो ऐसा।

अपस्यु:- अरे … धीरज रखो थोड़ा। अच्छा चलो मुझे मारो…

साची:- तुम पागल हो चुके हो अपस्यु। मै जा रही हूं।

अपस्यु:- सोच लो यदि अभी तुम यहां से गई तो मुझे ये सबको बताते देर नहीं लगेगी की मैं कल रात तुम्हारे साथ था।

साची वापस उसके पास पहुंचती, अपने हाथ के हाव-भाव और नजरों से नफरत बरसाती हुई कहने लगी…. "दिया मैने, तुमको आज का दिन लेकिन एक बार तुम्हारी कहानी खत्म होगी फिर तुम मुझे कभी परेशान नहीं करोगे।"

अपस्यु:- अच्छा फैसला, चलो अब खींच कर एक तमाचा मारो।

"बड़े ही शौक से"… और इतना कहकर साची ने पूरी ताकत झोंक दी उस थप्पड में। थप्पड मारने के बाद वो अपनी कलाई पकड़कर बैठ गई। कुछ बूंद आशु उसके आखों में थे, वो अपनी पलकें उठा कर पूछने लगी… "क्यों कर रहे हो ऐसा।"

अपस्यु, अब भी मुस्कुरा रहा था… "मैंने तुम्हारी भावनाओ को क्यों नहीं समझा, इस बात के लिए ये थप्पड था। …. चलो अब चलते हैं।

अपस्यु, साची का हाथ थामे उसे अपने साथ ले जा रहा था। संभवतः ये वो लम्हा तो बिल्कुल भी नहीं था जिसके ख्वाब कभी साची ने संजोए थे। अब तो बस चंद सवाल, मन के भीतर दबा कहीं प्यार और अपस्यु के लिए ढेर सारा नफरत ही अपस्यु के साथ चल रही थी।

कुछ ही पल में दोनों दिल्ली उत्तराखंड के हाईवे पर थे। कार लगभग 160 के गति से चल रही थी। इतने स्पीड को अनुभव करते ही साची का दिल जोड़ से धड़कने लगा… वो गति कम करने की अनुरोध करने लगी, इसे सुनकर अपस्यु ने गति बढ़ा कर 170 तक लेे गया। साची को अब और भी डर लगने लगा…

वो फिर से एक बार गति में परिवर्तन के लिए कहने लगीं। इस बार फिर से अपस्यु ने गति को बढ़ाकर 180 तक लेे गया। ऐसे ही साची अपने डर के कारण बार-बार मिन्नतें करती रही और कार की गति बढ़ते-बढ़ते 230 के पार चली गई। साची डर के मारे चीखती हुई, कार रोकने के लिए कहने लगी।

अपस्यु ने झटके वाला ब्रेक लिया। हंडब्रेक का इस्तमाल करते हुए कार को 180 डिग्री पर रोल किया। तकरीबन 10 फिट आगे जाकर कार पूरी तरह रुक चुकी थी। दरवाजा खुला और साची बाहर जाकर उल्टियां करने लगी। अपस्यु वहीं सड़क से कार को नीचे उतार कर उसके आने का इंतजार करने लगा…

15 मिनट तो साची को सामान्य होने में लग गए। एक बार जब वो सामान्य हुई तब उसने अपस्यु का चेहरा देखी, और मायूसी से पूछने लगी…. "आखिर मेरी गलती क्या है अपस्यु?"

अपस्यु:- यूं समझ लो, ये मैंने तुम्हे आखरी बार कष्ट दिया था, अब प्लीज थोड़ा आराम करो।

अपस्यु ने साची को जूस दिया पीने और कुछ देर कार में बिठाए रखा। अपस्यु को जब लगा अब सब ठीक है तब वो साची को लेकर सड़क के नीचे पेड़ों के बीच गया और वहीं नीचे बैठ गया। साची भी उसके साथ नीचे बैठ गई।

अपस्यु:- हो सके तो मुझे माफ़ कर दो केवल आज के लिए नहीं बल्कि हर वो दर्द के लिए, जो तुमने कुंजल के साथ साझा की थी।

साची:- अपस्यु अब मुझ में हिम्मत नहीं बची है किसी भी बात को समझने की। बस तुम कहते रहो मैं सुन रही हूं।

अपस्यु अब अपने पूरे लय में आते हुए कहने लगा…. "साची मै बहुत ही सरल शब्दों में अपनी बात रखता हूं। मैं पिछले 2-3 महीनों से ही लोगों के बीच रहने लगा हूं, इसलिए मुझे बहुत से इंसानी स्वभाव का ज्ञान ही नहीं था।

साची, हैरानी से उसे देखती:- मतलब..

अपस्यु:- मतलब यही की कल जितनी भी बातें तुमने कुंजल से कही, वैसी मेरी कोई फीलिंग थी ही नहीं। मै तो बस तुमसे इसलिए अनजान बन रहा था क्योंकि कैंटीन में अाकर जब तुमने मुझ से बिना किसी भाव के अपनी बात रखी, तो मुझे लगा अब तुम्हारे दिल में मेरे लिए कोई फीलिंग ही नहीं रही इसलिए मैंने भी उचित समझ कर बात को वहीं खत्म करने का फैसला किया। इसलिए शायद तुम्हारी दोस्ती भी कबूल नहीं थी क्योंकि हम जितने पास होंगे भावनाएं उतनी ही करीब खींचेंगी एक दूसरे को।

साची:- ये सरल भाषा है या पजल। तुम मुझे कंफ्यूज कर रहे हो।

अपस्यु:- हम दोनों ही एक दूसरे से आकर्षित और एक दूसरे को लेकर बहुत ही दुविधा में है। यहीं कन्फ्यूजन दूर करने तो यहां बैठकर बातें करने आए है।

"मै और ऐमी पिछले 12 सालों से साथ है। जैसा कि मैंने तुम्हे बताया मै 2-3 महीनों से ही लोगों के बीच रह रहा हूं इसलिए कुछ इंसानी स्वभाव को कभी मैंने जाना ही नहीं… जैसे कि जब दो लोग प्रेम में होते है तो उसके समतुल्य कोई तीसरा नहीं होना चाहिए। और हम दोनों के बीच ऐमी है।

"तुम्हारी भावनाएं सिर्फ इस बात को लेकर आहत हो जाती है कि कोई लड़की मुझे क्यों छलावा दे, या मै किसी दूसरी लड़की के पीछे क्यों जा रहा हूं। जबकि इस रिश्ते में तो एक लड़की बहुत पहले से मेरे साथ है, और बस यही वजह है कि मैं तुम्हारे साथ वो रिश्ता नहीं निभा सकता।"

साची:- तुम्हारे कहने का मतलब है कि तुम मुझसे भी प्यार करते हो और ऐमी से भी।

"हम दोनों एक दूसरे से प्यार नहीं करते, बस हम दोनों कैज़ुअल रिलेशन में है।"….
 
Update:-43 (A)

साची:- तुम्हारे कहने का मतलब है कि तुम मुझसे भी प्यार करते हो और ऐमी से भी।

अपस्यु:- हम दोनों एक दूसरे से प्यार नहीं करते, बस हम दोनों कैज़ुअल रिलेशन में है।"….

साची:- अपस्यु, हम दोनों आज अपने सभी कन्फ्यूजन दूर करने बैठे है ना तो मेरे ज़िन्दगी का सबसे बड़ा कन्फ्यूजन अभी यहीं है… आखिर क्या है ये कैज़ुअल रिलेशनशिप। पहले इसे ही तुम क्लियर कर दो।

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12 जून 2011….

सुबह सुबह का वक़्त था… "खट खट खट"… अपस्यु ने जैसे ही दरवाजा खोला, सामने ऐमी खड़ी थी…. "ओह माय गॉड, ऐमी… वाउ"… अपस्यु के चेहरे पर खुशी और आश्चर्य के भाव साफ देखे जा सकते थे। ऐमी अपना सामान वहीं दरवाजे पर पटक दी और उछलकर अपस्यु के गले लगती…. "बहुत मिस की तुम्हे"… अपस्यु भी उसे अपने बाहों में समेटते हुए कहने लगा… "तुमने तो मुझे सरप्राइज ही कर दिया। नाचने को दिल कर रहा है।"

अपनी खुशियां जाहिर करते दोनों थोड़े देर तक गले लगे रहे। फिर ऐमी अलग होकर बाथरूम में चली गई फ्रेश होने, इधर जबतक अपस्यु नाश्ता बना चुका था। दोनों खाने कि टेबल पर साथ बैठे… "उम टेस्टी, क्या बनाया है सर खाने में, काफी लजीज है।"

अपस्यु::- दिख नहीं रहा है, फ्राइड आलू है।

ऐमी:- हां वो दिख रहा है लेकिन पहले तो कभी इतना टेस्टी नहीं लगा।

अपस्यु:- वो इसलिए क्योंकि पहले चीज के साथ फ्राई नहीं करता था। वैसे अचानक से मियामी (Miami, US) में क्या करने पहुंच गई, 18 जून को तो न्यूयॉर्क में तुम्हारे ग्रुप का शो है ना?

ऐमी:- उसकी बात मत करो, न्यूयॉर्क एयरपोर्ट पर ही डायरेक्टर के साथ झगड़ा हो गया और मै फ्लाइट पकड़कर इधर अा गई।

अपस्यु:- सबाश, वैसे झगड़ा हुआ किस बात पर था।

ऐमी:- इतनी डिटेल कौन पूछता है, ठीक से खाने भी नहीं दे रहे। मुझे बस यहां आना था सो मै अा गई।

अपस्यु:- अच्छा किया, वैसे भी मैं अब अकेला वापस नहीं जाऊंगा।

ऐमी खाना बीच में ही छोड़कर उठ गई और खुशी का इजहार करती वहीं उछलने लगी…. "सच में, वाउ, वाउ, वाउ। लेकिन ये तो गलत है अपस्यु, हमे बताया तक नहीं।

अपस्यु:- सोचा वहीं अाकर सरप्राइज दे दूं। भाई कैसा है?

ऐमी:- उस छछूंदर का नाम मत लो, मुझे बहुत तंग करता है।

अपस्यु:- हम्मम!

ऐमी:- बस, बस, बस .. इतनी गहरी सांसें लेकर अपनी फीलिंग दबाने की जरूरत नहीं है। काफी मस्त है और आज कल तो वो जिम्नास्टिक भी कर रहा है, वो भी युद्ध स्तर पर, तो काफी लचीला और फुर्तीला होते जा रहा है।

अपस्यु:- मै समझा नहीं?

ऐमी:- बुद्धू, मतलब वो मेरी फ्रेंड्स के बीच काफी मशहूर है, 3-4 गर्लफ्रेंड तो होगी ही लेकिन कुत्ता कुछ बताता नहीं है।

अपस्यु:- हाहाहा … और तुम्हारे कितने ब्वॉयफ्रैंड है।

ऐमी:- बस एक है, उसी से तो मिलने… मिलने नहीं मिलता आज कल…

अपस्यु:- पकड़ी गई हां। चलो अब पूरी कहानी बताओ…

ऐमी:- छिपाने जैसी कोई बात नहीं थी लेकिन तुम सवालों के पहाड़ खड़ा कर देते इसलिए मैं नहीं बताना चाह रही थी। फिलहाल मै एक चैन कि नींद लूंगी फिर आराम से शाम को सभी बातें बताऊंगी।

दिन के 1 बज रहे होंगे। अपस्यु अपना काम निपटाकर वापस पहुंचा था। जाकर देखा तो ऐमी अब भी सो रही थी। कुछ सोचते हुए उसने ऐमी का लैपटॉप निकला और उसे ऑन किया। सामने स्क्रीन पर पासवर्ड मांग रहा था और अपस्यु को पता था इसका पासवर्ड क्या होना चाहिए। 2 कोशिश और लैपटॉप खुल चुका था।

अब बस एक ही शंका थी वो भी ब्राउज़र खुलते ही दूर हो गई। एफबी पहले से लॉगिन था और अपस्यु फिर कुछ देर की छानबीन के बाद वहां भी पहुंचा, जिससे मिलने ऐमी पहुंची थी। 10 मिनट तक संदेशों का आदान प्रदान हुए, उसके पश्चात अपस्यु चैट को डिलीट करके, सबकुछ पहले जैसा वापस रख दिया।

शाम के तकरीबन 5 बजे ऐमी एक अच्छी नींद के बाद जाग रही थीं। फ्रेश होकर वो हॉल में पहुंची, जहां अपस्यु खुले बदन, नीचे लोअर पहन कर रस्सियां कूद रहा था। ऐमी को पहले के मुकाबले अपस्यु का बदन काफी आकर्षक लग रहा था। मेसोमोर्फ शरीर (mesomorph) जिसे किसी एथलीट के ढांचे में तैयार किया गया था। शरीर का आकार और उसका ढांचा अपस्यु को मनमोहक बना रहा था।

ऐमी उसके रूप आकर्षण में खींची हुई उसके साथ-साथ रस्सियां कूदने लगी। ऐमी उसके बदन को छूते हुए कहने लगी…. "काफी मेहनत कर रहे हो सर, सेक्सी बॉडी हां। देखकर मेरे होश उड़ रहे है।"

अपस्यु चुप-चाप अपनी रस्सियां कूदता रहा। ऐमी कुछ देर तक उसके साथ कूदती रही फिर उसकी सासें उखड़ने लगी और वो अाकर बैठ गई। कुछ देर बाद वो भी ऐमी के पास आकर बैठते हुए अपनी श्वास सामान्य करने लगा।

"इंप्रेसिव मिस्टर अपस्यु, 600 जंप की गिनती तो मैंने कर ली है।" ….. "कुल 3000 जंप 1000-1000 के 3 सेट सुबह शाम और रात।"…

"दोनों भाई एक जैसे ही हो, वैसे तुम्हारी यहां तो अनगिनत गर्लफ्रेंड होगी।"

अपस्यु:- और वो क्यों होगी भला…

ऐमी:- जब मै इतना अट्रैक्ट हो सकती हूं तो यहां की लड़कियां तो नोच डालती होंगी तुम्हे…

ऐमी अपनी बात कहकर जोड़-जोड़ से हंसने लगी। अपस्यु उसे हंसते हुए देखकर मुस्कुराने लगा। गम में लगातार रोती लड़की को यूं खुलकर हंसते देखने का अपना ही सुकून था।

दोनों 6 बजे के करीब शॉपिंग के लिए निकल रहे थे। ऐमी हल्के पीले रंग की शॉर्ट और उसपर टी शर्ट डाले हुई थी जो कंधे से पूरा खुला हुआ था। अपस्यु उसे देखते ही कहने लगा… "ये पहन कर अपने बॉयफ्रेंड पर बिजलियां गिराने जा रही है क्या?"

"खड़ूस मुझे देख कर ऐसा कह रहा है मतलब आज मै वाकई कमाल कि दिख रही हुं क्या?" .. और फिर से वही खिली सी मुस्कान को उसके चेहरे पर फ़ैल गई थी।

रात के तकरीबन 10 बजे ऐमी तैयार होकर हॉल में अाई। नीचे काले रंग की मिनी स्कर्ट, ऊपर व्हाइट कॉलर की टी-शर्ट और उसके ऊपर ब्लैक कलर की जैकेट। इन सब के अलावा जब वो इस परिधान के साथ आंखों पर हल्के पीले रंग की स्टाइलिश चस्मा लगा कर हॉल में अाई, अपस्यु खड़ा होकर उसे देखने लगा।

"क्यों होश उड़ गए ना।"… ऐमी अपने भृकुटी (eyebrow) चमकती हुई पूछने लगी।

अपस्यु उसके पास पहुंचकर उसके माथे को चूमते हुए उसे गले लगाते कहने लगा….. "मै बहुत खुश हूं, और हां तुम्हे ऐसे देखकर वाकई में मेरे होश उड़ गए। काफी प्यारी और खूबसूरत लग रही हो।"

ऐमी, अपने दोनो हाथ फैलाकर, अपने सिर को झुकाकर उसके तारीफों का अभिवादन की और अपने बॉयफ्रेंड से मिलने के लिए निकली। 10 बजे के करीब वो निकली और लगभग 10.30 बजे तक गुस्से में लाल-पीली होती हुई वो वापस अा रही थी। उसके पीछे-पीछे कोई लड़का भी चला अा रहा था। अपस्यु हॉल में ही बैठा हुआ था, ऐमी की हालत देख कर वो जोड़-जोड़ से हंसने लगा। वो आते ही सीधे अपने कमरे में घुस गई और उसके पीछे-पीछे वो लड़का भी अंदर जाने लगा…

"ओए खजूर, किधर जा रहा है।"… अपस्यु ने उसे रोकते हुए कहा..

लड़का:- Chill bro, she is my girlfriend.

अपस्यु, उसे ऊपर से नीचे तक देखा… "तू इंडियन है ना।

लड़का:- Yes bro

अपस्यु:- तू यहां जरा मेरे पास अा..

"Yo Bro" वो लड़का अपस्यु के पास आते हुए बोलने लगा। अपस्यु ने उसके बाल को पकड़ कर, उसके सर को गोल गोल घुमाते कहने लगा…. "साले निकम्मे, मै इधर बैठा हूं और तू उसके पीछे-पीछे उसके कमरे में जा रहा हैं। इतनी हिम्मत अाई कहां से अा गई बे।"

लड़का:- sorry bro, she misunderstood…

अपस्यु:- साले अंग्रेज, हिंदी ने बोल लेे.. वरना अभी सुताई कर दूंगा।

लड़का:- सॉरी ब्रो। वो थोड़ी सी मिसअंडरस्टैंडिंग हो गई है। वहीं समझाने जा रहा था।

अपस्यु उसे धीमे हाथ का एक थप्पड मारते हुए…. "वो पूरी गीली होकर अाई है। अंदर कपड़े बदल रही होगी और तू साला उसके पीछे पीछे जा रहा है। चल यहां मुझे अपनी सफाई दे, मै उसे समझा दूंगा।

लड़का:- वो पागल हो गई है ब्रो।

फिर से एक थप्पड… "अबे तू मेरे सामने उसे पागल बोल रहा है, इतनी हिम्मत।"

लड़का:- you both are fucking freak. You asshole, motherfucker… go fuck yourself…

इतने में ऐमी अपने कपड़े बदल कर हॉल में पहुंच चुकी थी और इस प्रकार से जब वो गाली देती सुनी, नजर इधर-उधर दौड़ा कर देखने लगी। पास में ही फर्श साफ करने वाला डंडा रखा हुआ था। फिर क्या था वो लड़का गालियां दे ही रहा था कि ऐमी ने डंडा बरसाना शुरू कर दी। इतनी तेज उसके पीठ पर डंडे पड़े की वो छटपटा कर वहां से भागना ही सही समझा।

ऐमी गुस्से में डंडा वहीं फेककर, वो अपना लैपटॉप निकली और दूसरी कोई आईडी ओपन करके अपना लास्ट लॉगिन टाइम देखने लगी। जैसे ही उसने अपना लास्ट लॉगिन टाइम देखी, वहीं डंडा लेकर अपस्यु के पीछे दौड़ गई।

10 मिनट के भाग दौड़ के बाद अपस्यु हॉल में अाकर सोफे पर बैठ गया और ऐमी उसे मारने लगी। वो ऐमी को देख कर जोड़-जोड़ से हंस रहा था और ऐमी मारते-मारते थककर वहीं बैठ गई..… "कितनी दूर से आई थी मै अपने इंटरनेशनल ब्वॉयफ्रैंड से मिलने। सब बर्बाद कार दिया तुमने अपस्यु।"

अपस्यु उसकी बात सुनकर फिर से जोड़-जोड़ से हसने लगा। उसे हंसते देखकर ऐमी की भी हंसी निकल आईं। ऐमी हंसती हुई, उसके सीने से अपने सर को टीकाकर अपनी आखें मूंद ली और अपस्यु उसके बालों में हाथ डाल कर उसके सर को हल्का हल्का दबाने लगा…. "क्या मैसेज किया था उस खजूर को"

अपस्यु:- ज्यादा नहीं बस इतना ही लिखा था…. I love pull side party, specially someone lift me and through in.

ऐमी, थोड़ी सिकुरकर अपस्यु के और उपर आती हुई… "तभी उस गधे ने मुझे सीधा पुल में फेक दिया। सब लोग हंस रहे थे।"

अपस्यु:- तुझे वहां कोई देसी लड़का नहीं मिला जो इन विदेशियों को पकड़ने चली आईं। और पसंद भी आया तो मियामी का ही लड़का, इतने बड़े देश में कहीं और ढूंढ लेती अपना इंटरनेशनल बॉयफ्रेंड।

ऐमी:- ना मियामी में ही ढूंढना था, तुम्हे देखे साल भर से ऊपर जो हो चुका था।

अपस्यु वहीं सोफे पर बैठे उसके सर पर धीरे-धीरे हाथ फेरता रहा और ऐमी सुकून से सो गई। सुबह जब उसकी आंख खुली तब अपस्यु कहीं बाहर निकल रहा था। ऐमी उसे पीछे से टोकती हुई पूछने लगी….. "मुझे छोड़ कर कहां चल दिए सर।"

अपस्यु:- यहां से वापस निकलने की तैयारी ऐमी… बस एक दो जगह बताना रह गया है कि आज से मै नहीं आऊंगा।

ऐमी:- कितना वक़्त लगेगा।

अपस्यु:- मुश्किल से 1 घंटा लगना है ऐमी, जबतक तुम नहा धोकर आराम से नस्ता का लुफ्त उठाव तबतक मै काम ख़त्म करके आया।

सुबह के 10 बज रहे थे, ऐमी किचेन में बर्तनों को साफ करके रख रही थी। अपस्यु उसे पीछे के गले लगाते हुए, उसके गालों पर किस्स करते हुए कहने लगा..… "इस काम को तुम्हे करने की जरूरत नहीं"

ऐमी घूमकर सीधी हो गई और किचेन सलब पर अपने हाथ टीका कर अपस्यु को ध्यान से देखने लगी… "क्या हुआ, ऐसे क्या देख रही हो"… अपस्यु ने पूछा।

ऐमी:- इतने साल हो गए तुम्हे देखते हुए, परिस्थिति कोई भी हो तुम्हारे चेहरे की मुस्कान कभी गई नहीं। ना कहो कुछ चंद दिनों को छोड़कर।

अपस्यु:- हाहाहा.. तुम भी ना ऐमी, मेरे चेहरे की बनावट ही ऐसी है।

ऐमी:- किस्स मी..

अपस्यु:- क्या ?

ऐमी:- आई सैड किस्स मी..

अपस्यु थोड़ा आगे बढ़कर उसके गालों को चूम कर अलग हो गया… ऐमी ने फिर से दोबारा कहा… "किस्स मी, और इस बार बिल्कुल वैसा होना चाहिए जैसा हमने अपनी पहली मूवी में देखा था।"

अपस्यु:- मज़ाक कर रही हो क्या?

ऐमी आगे बढ़ी और एरिया ऊंची करती हुई, उसने अपस्यु के होंठ से होंठ लगाकर चूमती हुई अलग हुई। अपस्यु का हाथ पकड़ कर उसने अपने सीने से लगाया… "मेहसूस करो इन बढ़ी धड़कनों को"… फिर उसका हाथ, उसी के सीने पर रखती… "तुम्हारा दिल भी ठीक वैसे ही धड़क रहा है कि नहीं देखो।"

अपस्यु:- तुम समझना क्या चाह रही हो ऐमी?

ऐमी:- यहीं की कुछ इंसानी स्वभाव भी होता है… इसलिए कभी-कभी एन्जॉय भी करना चाहिए। हर वक़्त ये मुस्कान वाला फेस मास्क तुम्हारे अंदर डिप्रेशन पैदा कर देगा।
 
Update:-43 (B)

ऐमी आगे बढ़ी और एरिया ऊंची करती हुई, उसने अपस्यु के होंठ से होंठ लगाकर चूमती हुई अलग हुई। अपस्यु का हाथ पकड़ कर उसने अपने सीने से लगाया… "मेहसूस करो इन बढ़ी धड़कनों को"… फिर उसका हाथ, उसी के सीने पर रखती… "तुम्हारा दिल भी ठीक वैसे ही धड़क रहा है कि नहीं देखो।"

अपस्यु:- तुम समझना क्या चाह रही हो ऐमी?

ऐमी:- यहीं की कुछ इंसानी स्वभाव भी होता है… इसलिए कभी-कभी एन्जॉय भी करना चाहिए। हर वक़्त ये मुस्कान वाला फेस मास्क तुम्हारे अंदर डिप्रेशन पैदा कर देगा।

अपस्यु:- और तुम्हे किसने कह दिया कि मै एन्जॉय नहीं करता। बस मुझे ये गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड सब फालतू की बातें लगती है।

ऐमी:- और सेक्स

अपस्यु:- इस पर तो कभी ख्याल भी नहीं गया।

ऐमी:- अच्छा, सच-सच बताना मियामी में तुम्हारा किसी लड़की के साथ फिजिकल रिलेशन रहा है क्या?

अपस्यु:- बिल्कुल भी नहीं। जब मुझे किसी लड़की में इंट्रेस्ट ही नहीं, तो रीलनशन तो बहुत दूर की बात है।

ऐमी:- पक्का यहीं कारण होगा, मुझे यकीन है।

अपस्यु:- खुद से क्या बोल रही हो, मुझे भी बताओ।

ऐमी:- सर अपस्यु क्या आप बताएंगे की मियामी बीच आप कितनी बार गए हैं, जिसका व्यू आप के खिड़की से भी मिल रहा है। यहां के पब में कितनी बार गए हैं, डिस्को कितनी बार गए और कितनी पार्टियां की है?

अपस्यु:- एक यही काम बचा है क्या करने को।

ऐमी:- ओह हो तो ऐसी बातें है। कोई नहीं, इंसानी स्वभाव के नए रूप से आप को आज जरा दर्शन करवाया जाए चलिए, चलते है।

अपस्यु:- कहां जा रहे है हम।

ऐमी:- तैयार हो जाओ हम बीच जा रहे हैं। और सुनो अंदर अंडरवियर मत डालना।

अपस्यु:- हट ये कैसी शर्त है।

ऐमी:- मुझ पर यकीन है ना…

अपस्यु:- हां..

ऐमी:- ठीक है फिर वैसा ही करो जैसा मैंने कहा।

बीच पर जाने के हिसाब से दोनों ने हल्के-फुल्के कपड़े अपने ऊपर डाले और निकल लिए। अपस्यु, ऐमी की बात मानते हुए नीचे अंडरवीयर नहीं पहना था। दोनों पहुंचे बीच पर। वहां के बार से दोनों ने एक-एक बियर ली और बीच पर घूमने लगे। यूं तो अपस्यु का ध्यान बहुत ही केंद्रित हुआ करता है और कोई भी चीज उसे भ्रमा नहीं सकती थी।

लेकिन साथ चल रही ऐमी की कमेंट्री पर जब अपस्यु मियामी बीच का नजारा देखता तो उसके अंदर भी भावनाएं जागृत हो जाती। अभी 5 मिनट भी नहीं हुए थे आए की अपस्यु किसी तरह झुक कर और अपने जेब में हाथ डालकर वहां से तेजी के साथ भागा। उसे भागते देख ऐमी को जोड़-जोड़ से हंसी आने लगी और वो अपस्यु को चिढाती हुई कहने लगी…. "अरे कहां भाग लिए… थरक अरमान जाग ही गए ना।"…

सुबह के इस वाक्ए के बाद फिर दोनों के बीच इस विषय में कोई चर्चा नहीं हुई। दोनों किसी गहरे दोस्त की तरह पूरा दिन बात करते और घूमते-फिरते निकाल दिए। वैसे भी, जब भी दोनों साथ होते तब उनके पास विषयों कि कमी नहीं थी बात करने के लिए।

रात के 10 बज रहे होंगे, ऐमी और अपस्यु एक साथ बिस्तर पर लेटे हुए थे। दोनों चीत परे छत को देखते हुए काफी समय से बात किए जा रहे थे। उसी बीच अपस्यु धीमे से कहा…. "सुबह की वो किस्स"….

ऐमी, अपस्यु के ओर करवट लेती उसके चेहरे को देखती हुई पूछने लगी… "सुबह की वो किस्स क्या अपस्यु"

"कोई शब्द नहीं मिल रहे की क्या कहूं, मै अपना अनुभव साझा नहीं कर सकता लेकिन अलग ही वो फीलिंग थी"… अपस्यु भी करवट लेते हुए ऐमी के ओर चेहरा घुमा कर कहने लगा। दोनों की नजरों से नजरें टकरा रही थी, होंठ करीब आते चले गए और आखें बंद होती चली गई।

दोनों एक दूसरे को चूमते हुए तेज-तेज सासें लेे रहे थे। हाथ एक-दूसरे के बदन पर रेंग रही थी और दोनों उस चुम्बन में डूबते चले जा रहे थे। बेहताशा चूमते हुए दोनों की सासें उखाड़ने लगी थी, दोनों अलग हुए तेज-तेज श्वास अपने अंदर भरते, उखड़ी श्वासों को सामान्य करने में लग गए। दोनों की नजरें फिर एक दूसरे से मिली और ऐमी की खिल- खिलाती हंसी, तेज चलती शवसों के साथ आने लगी और एक बार फिर वो अपस्यु के होंठ से होंठ लगाकर चूमने लगी।

दोनों चूमते हुए बैठ गए और चूमते हुए एक दूसरे को स्मूच करने लगे। दोनों अपने इस लंबे चले चुम्बन को एक बार फिर तोड़ते हुए अलग हुए, और बड़ी ही तेजी के साथ एक दूसरे की टी शर्ट को निकाल कर फेंक दिए। ऐमी, अपस्यु की आखों में देखती हुई, उसके हाथ को अपने स्तनों के ऊपर रख कर मस्ती में अपने होंठ को दातों तले दबा ली।

स्तन को हाथ में लेने का ये पहला अनुभव था और काफी रोमांचित करने वाला अनुभव था। अपने दोनो हाथों का दबाव स्तनों पर धीरे-धीरे बढ़ाते हुए अपस्यु एक बार फिर, ऐमी के होंठ से होंठ लगाकर चूमते हुए उसे लिटा दिया।

लेटने के साथ ही अपस्यु ने ऐमी के शॉर्ट का बटन खोला। फिर अपने हाथों से उसका चेन को नीचे करते हुए शोर्ट्स को पैन्टी के साथ खिसकते हुए घुटनों के नीचे तक लाते हुए उसे निकाल दिया और खड़े होकर अपने पैंट उतार कर वापस ऐमी के ऊपर अा गया।

दोनों की श्वास तेज-तेज चल रही थी। होंठ से होंठ जुड़े हुए थे। अपस्यु अपना एक हाथ से उसके स्तन को पूरा पकड़े उसे मसल रहा था और दूसरा हाथ की उंगलियां ऐमी के हाथों की उंगलियों में फसा कर सर के ऊपर रखा था। इस स्तिथि में, लिंग का योनि के ऊपर पड़ने वाला स्पर्श, वासना की अलग उन्माद पैदा कर रही थी।

ऐमी अपने हाथ नीचे ले जाकर लिंग को अपने हाथों में ली। ये उसके लिए भी पहला अनुभव था और वो उत्तेजित होती हुई लिंग को योनि के ऊपर लाकर बड़ी तेजी से उसे ऊपर-ऊपर रगड़ने लगी। दोनों की श्वास काफी तेज और उत्तेजना चरम पर थी। लिंग को अपने योनि के प्रवेश पटल के थोड़ा अंदर डालती उसने चुम्बन को तोड़ते हुए अपस्यु के कंधे पर एक लव बाइट दी और उसके कानों में उखड़ी श्वास के साथ कहने लगी…. "जरा धीमे"

इतना कहकर ऐमी ने अपस्यु के कान के नीचे हिस्से को अपने मुंह में लेकर उसे गीला करती हुई चूमने लगी। इधर अपस्यु इंच दर इंच, धीरे-धीरे लिंग को योनि के अंदर डालते जा रहा था। हल्के दर्द के तैरते उत्तेजना में ऐमी के होटों के "आह्ह" निकल गई। धीरे-धीरे माहौल और भी ज्यादा उत्तेजित होता चला गया। चढ़ती श्वास के साथ धीमी निकलती सिसकारियां चारो ओर मादक माहौल बना रही थी। दोनों पसीने से तर हो चुके थे और एक आखरी झटके के साथ दोनों ने पहली बार अपने संभोग के चरम का भी आनंद लिया।

बदन बिल्कुल हल्का पड़ चुका था। आस-पास लेटकर दोनों श्वास को सामान्य करते, एक दूसरे की आंखों में देखकर हंसने लगे। … "ये अनुभव बिल्कुल रोमांचित करने वाला था। बहुत मज़ा आया।".. अपस्यु ऐमी की आखों में आखें डाल कर बोलने लगा। ऐमी भी प्रतिक्रिया ने मुस्कुराती हुई कहने लगी…. "मुझे भी बहुत मज़ा आया। ऐसा लग रहा है पूरी हो गई मै आज।"

अपस्यु उसे अपने आलिंगन में भरकर, प्यार से उसके होंठ को चूमा और अपने आखें मूंद ली। ऐमी भी उसके बाहों मै अपना सर डाले सो गई। आधी रात के करीब ऐमी की आखें खुल गई। वो अपस्यु को एक नजर देखी और अपने कपड़े समेटकर वहां से अपने कमरे में चली गई।

अगली सुबह फिर से सामान्य थी। ना तो उसमे बीती रात कि कोई चर्चा और ना ही कोई भावनात्मक सोच। फिर से वहीं घंटो बैठ कर बातें, घूमना-फिरना और दोनों की खिल- खिलाती हंसी।

17 जून रात के 8.30 बजे, ऐमी किचेन में खड़ी सलाद काट रही थी। अपस्यु पीछे से उससे चिपकता हुआ उसके कानों के नीचे किस्स किया। अपने दोनो हाथ उसके स्ट्रिप के अंदर डालकर, उसके स्तन को अपने हाथों से मसलते हुए अपने हाथ धीरे धीरे चला रहा था…. "आह.. सीईईईईईईईईईईईई … मेरे स्तनों से खेलना बंद करोगे।" .... अपस्यु अपने हाथ बाहर निकालकर एक कदम पीछे हट गया। ऐमी घूम कर अपस्यु के सामने हुई और शरारती मुस्कान दिखाती, उंगली के इशारे से अपने पास बुलाई।

अपस्यु अपने कदम बढ़ाता हुआ उसके पास पहुंचा और होंठ से होंठ लगाकर चूमने लगे। श्वास उखड़ी और हाथ पूरे बदन पर फिर रहे थे।वासना अपने पुरजोर पर थी और इसी क्रम मै ऐमी नीचे बैठकर, अपस्यु के लोअर को नीचे खिसका कर उसके लिंग को अपने हाथों में पकड़ ली। पहले तो उसने लिंग को अपने मुट्ठी में पकड़कर उसे आगे-पीछे, मस्ती में हिलाने लगी, फिर अपने मुंह में लेकर उत्तेजना से चूसने लगी।

अपस्यु की सासें पूर्ण रूप से चढ़ी हुई थी और उत्तेजना ऐसी हावी थी कि वो किचेन स्लैब को पकड़ कर अपनी आखें मूंद चुका था। कुछ ही पल बाद उसने ऐमी को बालों से पकड़ कर खड़ा किया और उसके होंठ से होंठ लगाकर उसके जीभ को चूसने लगा।

जल्द ही उसने ऐमी को कमर से पकड़ कर उठाया और किचेन स्लैब पर बिठाते हुए, उसके लोअर को खींच कर नीचे कर दिया और दोनों पाऊं को फैला कर योनि के बीच अपना सिर डाल दिया। वो योनि के किनारे से जीभ का पूरा स्पर्श देते हुए अपने जीभ को पूरा अन्दर तक डाल दिया।

जैसे ही अपस्यु जीभ से योनि के साथ खेलना शुरू किया, ऐमी के पूरे बदन में सुरसुरी दौड़ गई। वो अपस्यु के बालों को भींचती हुई, लंबी-लंबी सिसकारियां भड़ने लगी। कुछ ही देर में उसका बदन झटके खाने लगा। वो अपस्यु के बाल को खींचती उसके चेहरे को अपने चेहरे के करीब लेकर अाई। उसके होंठ को अपने दातों तले दबा कर काटती हुई उसे आखों से आगे बढ़ने का इशारा करने लगीं।

वो जिस्मों में उत्तेजना और जोश के उन झटकों का एहसास। हर झटके के साथ दोनों अलग ही रोमांच पर होते और पूरा बदन हिल जाता। दोनों अपने कामुक अवस्था का पूर्ण रोमांच उठाकर एक दूसरे से अलग हुए।

अगली सुबह दोनों में पहली बार इस विषय को लेकर बात हो रही थी। वो भी तब जब अपस्यु को लगा की "हम अपनी वासना में कुछ गलत तो नहीं कर रहे" इसलिए वो इस बदली परिस्थिति को रिश्ते का नाम देना चाहता था।

वहीं ऐमी अपने विचारों में स्पष्ट और उसकी सोच साफ थी।…. "कुछ शारीरिक जरूरतें और मन के अंदर छिपी वासना भी होती है जो जिस्म के भड़काव को स्थिर करती है। लोग इसे अफेयर का नाम देकर करते हैं। फिर ये अफेयर एक ही वक़्त में एक के साथ हो या अनेक के साथ, या फिर बदलते समय के साथ उनके पार्टनर बदल जाए। रिश्ते का नाम देकर भावना में तो किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं होता, रहेगी शारीरिक भूख ही और उसे मिटाना लक्ष्य। तो क्यों जरूरी है इस इसे कोई नाम देना। जिस वक़्त हमे अपना कभी जीवन साथी मिल जाए तो कम से कम हमे ब्रेकअप तो नहीं करना होगा।

अपस्यु, मुस्कुराते हुए उसके होटों को चूमते…. "थैंक्स, मैं थोड़ा बेचैन सा था कि कहीं छनिक सुख के लिए मै तुम्हे खो ना दू।"

ऐमी:- ऐसा भी होगा क्या इस जीवन में।

अपस्यु:- वो तो पता नहीं, लेकिन अब से ये तय रहा।

ऐमी:- क्या?

अपस्यु:- या तो कोई हमे ऐसा प्यार करने वाला मिल जाए जो हमारे रिश्ते को समझ सके और परख सके नहीं तो जब किसी अंजान से शादी करनी है तो हम आपस में बुरे है क्या?

इस बार ऐमी अपस्यु के होंठ चूमती…. वाउ, ये मुझे पसंद आया। लेकिन तुम्हे कोई भी प्यार करने वाली मिले, लेकिन मै तुम से लिपटना और तुम्हे चूमना नहीं छोड़ सकती, क्योंकि तुमसे खुशी के इजहार करते वक़्त मुझे भी पता ना मै तुम्हे कब चूम लूं।

अपस्यु:- ये तो मुझे भी पता है। सो आज से हम कैजुअल रीलेशन में रहेंगे।

ऐमी:- कैजुअल रिलेशन !!! ये कैजुअल रिलेशन क्या होता है ?
 
Update:-43 (C)

इस बार ऐमी अपस्यु के होंठ चूमती…. वाउ, ये मुझे पसंद आया। लेकिन तुम्हे कोई भी प्यार करने वाली मिले, लेकिन मै तुम से लिपटना और तुम्हे चूमना नहीं छोड़ सकती, क्योंकि तुमसे खुशी के इजहार करते वक़्त मुझे भी पता ना मै तुम्हे कब चूम लूं।

अपस्यु:- ये तो मुझे भी पता है। सो आज से हम कैजुअल रीलेशन में रहेंगे।

ऐमी:- कैजुअल रिलेशन !!! ये कैजुअल रिलेशन क्या होता है ?

अपस्यु:- ऐसा रिलेशन जिसमे सच्चा चाहनेवाला या चाहनेवाली मिलने पर ब्रेकअप ना हो बस हम अपने दायरे कायम कर ले।

एक रिश्ता जो दोनों में उत्तेजना के कारण कायम हुए, और दूसरा रिश्ता जो लंबे वक़्त से इनका चला अा रहा था। दोनों रिश्तों के बीच की कड़ी को इन लोगों ने कैजुअल रिलेशन का नाम दिया। क्योंकि दिलों के बीच प्रेमी-प्रेमिका की भावनाएं थी नहीं, और गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड बनना नहीं चाहते थे क्योंकि ब्रेकअप इन्हे चाहिए था नहीं।

खैर वक़्त अपने रफ्तार से ही चल रहा था। ऐमी और अपस्यु बिल्कुल पहले कि तरह ही अपना रिश्ता आगे बढ़ा रहे थे, एक गहरे दोस्त की भांति जो हर पल साथ निभाता चला जा रहा था। दोनों के बीच हुए फिजिकल रिलेशन के कारण इनके इस रिश्ते में रत्ती भर का भी बदलाव नहीं आया और ना ही ये कभी किसी रात के हुए सेक्स को सुबह चर्चा करते।

20 जून 2011…. अपस्यु और ऐमी दोनों साथ में भारत वापसी कर रहे थे। फ्लाइट टेक ऑफ किए लगभग 3 घंटे हो गए थे। ऐमी किसी गहरे ख्यालों में डूबी हुई थी…. "क्या हुआ अवनी को, आज इस प्रकार इतनी खामोश क्यों है।"

ऐमी फीकी मुस्कान अपने चेहरे पर लाती हुई कहने लगी…. "क्यों चिढ़ा रहे हो अपस्यु।"

अपस्यु:- अगर तुम्हे नहीं चिढ़ना है तो जरा बताओ कौन सी चिंता खाए जा रही है।

ऐमी, अपस्यु के ओर देखती गहरी श्वास ली और कहने लगी…. "किसी प्रकार की चिंता नहीं है, बस कुछ बातें दिमाग़ में अा रही थी, उसी बारे में सोच रही थी।

अपस्यु:- कौन सी बातें ऐमी।….

ऐमी…..

"जानते हो सर एक वक़्त था जब तुमने भी मौतें देखी और मैंने भी मौते देखी। देखा जाए तो मेरे सर पर मेरे डैड का हाथ था लेकिन तुम्हारे सर पर, उस विषय पर ना ही बात की जाए तो अच्छा है……. उस वक़्त हम सबकी दुनिया उजड़ी थी। मेरे पापा शराब में डूब गए थे, मै और आरव पूर्णतः सदमे में थे। कई रातों तक हम दोनों को तुमने अपने गोद में सुलाया था। कई बार जब रातों को मेरी नींद खुलती, तब तुम्हे वैसे ही बैठे-बैठे सोते हुए भी देखा है मैंने।

तुम्हारा तो कोई रिश्तेदार भी नहीं थे, या थे भी तो कभी सामने नहीं आए किंतु मेरे तो थे। कोई 2 दिन के लिए रुकते, तो पूछा करते थे ये लड़का कौन है जो हर वक्त अवनी के पास रहता है। उन्हें वो छोटी सी लड़की नहीं दिखती थी, जो सदमे में थी। बस सबको वो अंजान लड़का ही दिखता था। कोई दस दिन तक रुकता तो तुमसे नौकर की तरह काम करवाता। लेकिन किसी को भी यह नहीं दिखता की एक लड़का जो लगभग मेरी उम्र का था, वो हम दोनों बाप बेटी और अपने भाई का सहारा था। लोग आते रहे, तुम्हे ताने मारते रहे। तुम सबकी बातों को सुनकर भी अनसुना करते रहे, चेहरे पर वही चिर-परिचित मुस्कान।

खुद इतने दर्द में होते हुए भी हमे संभला, उस दर्द और सदमे से टूटे लोगों को उबड़ा। सर झुक जाता है सर.. आप के आगे ये सर झुक जाता है। अवनी को संभालने तो कोई रिश्तेदार नहीं आया लेकिन अवनी के साथ ये कौन लड़का है कह कह कर इस नाम से ही नफरत करवा दी उन लोगो ने।

अपस्यु:- बस रे बाबा बस। यूं समझ लो कि ज़िन्दगी एक साजिश है और आने वाला वक़्त उसका सस्पेंस। बीती बातें किसी कहानी की तरह होती है जिसमें दर्द, प्यार और ढेर सारे ड्रामा होते है। उन बीती कहानी को कभी कभी पढ़ लिया करो ताकि उनकी यादें धुंधली ना हो और ध्यान पूरा आने वाले वक़्त पर लगाओ। क्योंकि यदि हम अतीत में खोए रहे तो पता ना ज़िन्दगी कौन सी साजिश रच कर किस तरह का नया सस्पेंस हमारे सामने खोल दे। ये तो हो गई तुम्हारे उन ख्यालों का जवाब जिसमे तुम जबरदस्ती डूब रही थी लेकिन अब ये बात बताओ कि मुख्य मुद्दा क्या है, जो इतना सोचने पर तुम मजबुर हो गई।

ऐमी अपने चेहरे पर मुस्कान लाती…. चिंता सिर्फ इतनी है सर, एक लड़का उस लड़की से भी सच्चा प्यार कर लेता है जिसके 3-4 ब्वॉयफ्रैंड पहले से रहे हो। एक लड़के को इस बात से भी बहुत कम आपत्ति होती है कि उसकी लवर का कोई सच्चा दोस्त एक लड़का है। वो लड़का अपने प्रियसी को पूरे दिल से समझता है और उसके समझाए रिश्ते को वो पूरी ईमानदारी से निभाता है। लेकिन एक लड़की के साथ इसका उलट होता है। वो हर बात समझकर भी समझना नहीं चाहती। उसे पहले से यदि पता हो की उसके लवर का किसी लड़की के साथ ब्रेकअप हुआ है और वो किसी अन्य लड़की को देख भी ले, तो भी घूम फिर कर मुद्दा वही बनता है.. "तुम्हारी दूसरी लड़कियों के साथ चक्कर है।"… कितनी भी चाहने वाली लड़की क्यों ना मिले उसे अपने रिश्ते में कोई दूसरी ऐसी लड़की नहीं चाहिए जो उसके लवर टच भी करे। ऐसा नहीं को वो सच्चा प्रेम नहीं करती बस हम लड़कियों की भावना ही कुछ ऐसी होती है कि इन छोटी छोटी बातों से हर्ट कर जाती है।

"बस यही बातें खाए जा रही है, यदि तुम्हे कोई प्यार करने वाली मिल गई तो दायरे में फस कर कहीं मेरी कहानी सिसक कर ना रह जाए।"

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साल 2000 … नए मिलेनियम की शुरवात हो रही थी। बहुत ज्यादा तो याद नहीं उस वक़्त का, लेकिन हां लोग काफी हर्षित थे और चारो ओर न्यू ईयर से पहले की तैयारियां जोरों पर थी। मेरी प्यारी मां चाहती थी कि इस बार की मिलेनियम, हम सब एक साथ भारत में मनाएं।

मां की बात को मानकर हमारा पूरा परिवार यहां भारत आया हुआ था। पूरा एक महीना सब लोग रुके थे। मेरे माता पिता गुरु निशी के बहुत बड़े अनुयाई थे वो लोग अक्सर उनसे मिलने भारत आया करते थे। ये लम्हा मै कभी नहीं भूल सकता जब मेरे माता-पिता आश्रम पहुंचे थे और गुरुजी ने उनसे एक बेटा मांग लिया था।

मेरी मां राजी नहीं हुई, लेकिन पापा के समझाने पर वो मुझे यहीं छोड़ कर चले गए। साल 2000 के गर्मियों की बात होगी जब पहली बार ऐमी नैनीताल अपने पापा के साथ गुरुजी के आश्रम अाई थी। मै उस वक़्त तन्हा अकेला सा रहता था और तभी पहली बार मैंने ऐमी को देखा था। बहुत ही जिद्दी और हर बात पर नखरे करने वाली थी, जैसा मै अपने माता पिता के पास करता था।

लेकिन ये हमारी पहली मुलाकात नहीं थी। वो 2002 की गर्मियों की छुट्टी चल रही थी जब ऐमी यहां आश्रम अाई हुई थी। मै गुरु से छिपकर पहाड़ों पर चढ़कर, उजला और नीले रंग का बेहद लुभावना फूल तोड़ रहा था। ऐमी ने मुझे उस पहाड़ पर चढ़े देख लिया और वो इतनी तेज चिल्लाई की मै ऊपर से नीचे गिर गया।

इस झाड़ में फंसा, उस पत्थर से टकराया और आंख जब खुली तब दिए की रौशनी में पहली बार उसे मैंने अपने पास बैठे देखा। मेरी जब आंख खुली और मैंने कर्रहा, तब अवनी, हां उस वक़्त तक तो अवनी ही थी। तो जब मै कर्ररहा रहा था, तब अवनी को पहली बार सुना था…. "सुनो तुम जल्दी से वो फूल मुझे दे दो।"… हाहाहा.. तभी मैंने कहा था उस निशान कि अपनी एक फनी कहानी है।

यहां से हमारी बातें शुरू हुई। हालांकि बातें वही करती थी मै बस उसे सुनता रहता और "हां हूं" में जवाब दिया करता था। कभी-कभी तो ऐसा होता था कि वो मुझ से सवाल पूछती और मै उसपर भी "हां हूं" करता रहता। वो क्या हैं ना ऐमी 4 बातें बोला करती थी जिसमे से मुझे एक दो शब्द भी समझ में आ जाए तो बहुत बड़ी बात थी।

हर साल वो अपने छुट्टियों में आती और हम दोनों लगभग साथ ही रहा करते थे। ऐमी के साथ रहने का मुझे एक फायदा होता था, मुझे दिल्ली की भाषा सीखने के लिए मिल जाती। कमाल की बात तो ये थी कि उसी ने मुझे गाली देना भी सिखाया।

जैसा तुमने कहा था ना आज से हम दोस्त, या हम दोनों को प्यार है। शायद ही ऐसे शब्द हमने इस्तमाल किए होंगे कभी। इतने छोटे से मिल रहे थे और इतने लंबे समय से मिल रहे थे कि कभी इन बातों का ध्यान भी नहीं रहा।

2004 या 05 की बात है, ऐमी लैपटॉप का कीड़ा थी। तब मैंने मां से बोलकर एक लैपटॉप पैरिश से मंगवाया था। हुआ ये कि, जब मै उसे रैप किया हुआ लैपटॉप दे रहा था तब उसने भी मुझे लैपटॉप ही गिफ्ट किया था। हंसी तो तब अा गई जब दोनों एक ही मॉडल के लैपटॉप गिफ्ट कर रहे थे।

उन्हीं छुट्टियों में हम दोनों ने लैपटॉप पर साथ मे फिल्म देखा था। फिल्म के अंदर किसिंग सीन को देखकर हमने भी तय किया कि ये करके देखते है। हम दोनों ने एक दूसरे को किस्स किया। वो यक करती हुई मुझ से अलग हुई थी और कहने लगी… "कितना गन्दा था ये, कैसे करते हैं ये लोग फिल्म में।"

बस ऐसे ही हमारा वक़्त कट रहा था। कुछ खट्टी मीठी यादें हमने साथ में संजोए थे उन बचपन के, फिर शायद बचपन ही खत्म हो गया था। एक हादसे में हम दोनों की मां और ऐमी का छोटा भाई मर गया। ये 2007 की बात थी।

2007 से 2009 तक मै और ऐमी एक साथ सिन्हा सर के यहां ही रहे। चूंकि मै शुरू से ही अपने मां से दूर रहा था, शायद यह एक वजह थी की इस हादसे का असर मुझ पर से जल्दी ख़त्म हो गया, लेकिन आरव और ऐमी को उबरने में काफी समय लग गया। खैर वो दौड़ भी खत्म हो गया। हसी मज़ाक हमारे बीच फिर से शुरू होने लगी थी।

2009 के मध्य से लेकर शायद जून 2011 तक मै मियामी में रहा। फिर वापस भारत आया और अपने अध्यन के लिए भारतवर्ष के अन्य हिस्सों में मै भटकता रहा। इतने वर्षों में संपर्क के नाम पर मैंने बहुत कम ही उससे बात की होगी लेकिन बीच बीच में हम मिलते रहते थे। मै कहीं भी रहूं ऐमी को पता रहता था। गले लगाना और एक दूसरे को चूमना ये हमारे खुशी के इजहार करने का तरीका सा बन गया।

इन्हीं सब बातों को मध्य नजर रखते हुए हमने अपने रिश्ते को कैजुअल रिलेशन का नाम दिया। जब एक दूसरे के पास नहीं होते तो याद नहीं करते और जब पास होते है तो दिन कब बातों में निकल जाती पता भी नहीं चलता। उम्मीद है तुम हमारे रिश्ते को समझ चुकी होगी और शायद ये भी समझ में अा चुका होगा कि कैजुअल रिलेशन क्या होता है।

तुम कुछ निष्कर्ष पर पहुंचो, उससे पहले मै तुम्हे एक बात बता दूं। मै लगभग २-३ महीने से दिल्ली में हूं लेकिन उसे पता होने के बावजूद, ना तो वो मुझसे मिलने की कोशिश की और ना ही उसने फोन किया। इतने दिनों में केवल 2 मिनट की मुलाकात कुछ दिन पहले हुई थी, वो भी तब जब सिन्हा सर को मै कुछ जरूरी केस पेपर देने गया था। उसके बाद कल रात मुलाकात हुई थी। वो भी मुलाकात नहीं होती लेकिन मै और सिन्हा सर पिए हुए थे, तब वो अाई थी। और फिर आज सुबह मुलाकात हुई, जब मुझे लगा कि तुमसे किसी भी तरह का रिश्ता आगे बढ़ाने से पहले, मै तुम्हे अपने और ऐमी के रिश्ते के बीच की सच्चाई बता दूं।
 
Update:-44

तुम कुछ निष्कर्ष पर पहुंचो, उससे पहले मै तुम्हे एक बात बता दूं। मै लगभग २-३ महीने से दिल्ली में हूं लेकिन उसे पता होने के बावजूद, ना तो वो मुझसे मिलने की कोशिश की और ना ही उसने फोन किया। इतने दिनों में केवल 2 मिनट की मुलाकात कुछ दिन पहले हुई थी, वो भी तब जब सिन्हा सर को मै कुछ जरूरी केस पेपर देने गया था। उसके बाद कल रात मुलाकात हुई थी। वो भी मुलाकात नहीं होती लेकिन मै और सिन्हा सर पिए हुए थे, तब वो अाई थी। और फिर आज सुबह मुलाकात हुई, जब मुझे लगा कि तुमसे किसी भी तरह का रिश्ता आगे बढ़ाने से पहले, मै तुम्हे अपने और ऐमी के रिश्ते के बीच की सच्चाई बता दू

साची बड़े ही ध्यान से उसकी बातें सुनती रही। जब अपस्यु ने अपनी बातें समाप्त की तब साची अपस्यु के ओर देखते हुई अपने दर्द भड़े चेहरे पर थोड़ी सी झूठी मुस्कान लाती हुई कहने लगी…

साची:- सच ही कहा था तुमने मै बेवकूफ हूं। मुझ पर छोटा सा एहसान करोगे।

अपस्यु:- क्या?

साची:- हम एक दूसरे से दूर ही भले है। क्या तुम ऐसा कर सकते हो?

अपस्यु, की नजरें जैसे कुछ कहना चाह रही थी किंतु जुबान से इतना ही निकला… "चलो वापस चलते है।"

यूं तो बताने के लिए बहुत अरमान अभी बाकी थे, लेकिन कभी-कभी शायद अल्फ़ाज़ साथ नहीं देते। खामोश ही चले दोनों और खामोशियों के साथ ही घुट गए दोनों के अरमान। साची खुल कर रोना तो चाहती थी लेकिन उसके पास कोई कंधा नहीं था। अपस्यु अपनी भावना को जताना तो चाहता था लेकिन जता नहीं पाया।

कॉलेज के गेट से साची अंदर जा रही थी और अपस्यु ठीक उसके विपरीत दिशा में। चिल्ड्रंस केयर के सामने उसकी कार खड़ी हुई और अपनी सोच में डूबा वो अंदर जा रहा था। चिल्ड्रंस केयर के कुछ लड़के-लड़कियां जो स्कूल नहीं जा सकते थे, वो अाकर अपस्यु से मिलते रहे और अपस्यु मुस्कुराते हुए उन सब से मिलकर आगे बढ़ता रहा।

नजरों के सामने जब उसे नंदनी दिखी, वो धीरे-धीरे उसके ओर बढ़ने लगा। नंदनी जो अभी काफी मसरूफ थी सिन्हा जी से बात करने में, अपस्यु को सामने से यूं आते देखी वो सारे काम छोड़ कर उसके पास तेजी से पहुंची।

कुछ पूछ रही थी शायद अपस्यु से, लेकिन अपस्यु के कानो तक वो बात नहीं पहुंच पाई। बस अपनी मां को देखकर, वो लिपट कर रोते चला गया। बस रोता ही रहा। अपने बच्चे के निकलते आशु ने नंदनी को भी रोने पर विवश कर दिया। नंदनी अपस्यु के रोने का कारण तो नहीं जानती थी लेकिन उसका दर्द एक मां को खींच रही थी।

ना जाने कितनी देर वो रोता रहा। आशु शायद आज बहते ही रहते लेकिन आखों के सामने जब उसे आरव और ऐमी का चेहरा नजर आया तब उसके आशु खुद-व-खुद रुक गए। वो अपने आशु पोंछता नंदनी से अलग हुआ। नंदनी भी अपने आशु साफ करती वहीं सोफे पर बैठ गई।

अपस्यु की जब चेतना जागी, तब वो देख पा रहा था कि उसके चारो ओर उनके चिल्ड्रंस केयर के सभी लड़के-लड़कियां, सिन्हा जी, आरव, ऐमी सब वहीं खड़े थे। अपस्यु अपने आशु पोंछते, अपने चेहरे पर मुस्कान लाया और सबको देखने लगा। वो सबके नजरों के सवाल को देख पा रहा था, किंतु इस वक़्त शायद वो कुछ जवाब देने की स्थिति में नहीं था।

ऐमी वहां के भीड़ को वापस भेजती हुई कहने लगी…. "डैड आप अपना झगड़ा जारी रखो। आंटी आप भी शुरू हो जाइए।"

नंदनी, अब भी अपस्यु को ही देख रही थी, मायूसी उसके चेहरे पर भी थी…. "आप लोग वैभव को लेे जाइए। आरव ऑफिस में रुक कर सभी पेपर वर्क देख ले। अपस्यु, चल बेटा घर चलते है।"

नंदनी उसके साथ घर निकल गई। वहां पहुंचकर नंदनी, अपस्यु को बिठाकर पूछने लगी…. "मेरा स्ट्रोंग बच्चा इतना क्यों रोया। कोई रिश्ता टूटा क्या?"

अपस्यु:- आप को पता चल गई ये बात।

नंदनी:- मां हूं ना बच्चे का दर्द मेहशूस हो जाता है। कल रात घर से गायब क्यों थे?

अपस्यु:- सिन्हा अंकल ने रोक लिया था अपने पास।

नंदनी:- बता तो देना था मुझे, कितनी फ़िक्र हो रही थी।

अपस्यु:- सॉरी मां। अब से नहीं होगा।

नंदनी:- अच्छा सुन वो खूबसरत और प्यारी सी लड़की कौन थी?

अपस्यु:- कौन मां?

"आंटी मेरे बारे में बात कर रही है शायद।"… ऐमी अंदर आती हुई कहने लगी। साथ में सिन्हा जी उसके साथ वैभव और आरव था।

नंदनी:- तुम लोग एक दूसरे को जानते हो।

ऐमी:- आप के सभी सवालों के जवाब मेरे डैड और आरव दे देगा क्योंकि अपस्यु को मै अपने साथ ले जा रही हूं।

अपस्यु:- ऐमी फिर कभी चलते है आज नहीं।

ऐमी:- क्या सर मुझे मना कर रहे हो।

ऐमी के जिद के आगे फिर अपस्यु की नहीं चली। आरव भी ऐमी का साथ देते उसे भेज दिया। अपस्यु जाते-जाते आरव को नजरों से कुछ समझाते हुए वहां से चला गया और आरव ने बीती वक़्त के उन चुनिंदा राज को सामने रख दिया जिसमे अपस्यु, आरव और सिन्हा परिवार था।

दूसरी ओर… राहें जब अलग हुई तब साची के कदम भी धीमे-धीमे कॉलेज के अंदर बढ़ रहे थे। अपस्यु की बाते जैसे उसके दिमाग में गूंज रही थी। वो इस कदर डूबी रही अपनी सोच में कि कुंजल की आवाज़ तक नहीं सुन पाई ..…

"क्या हो गया, इतनी गुमसुम और मायूस क्यों हो।"…. कुंजल साची को टोकती हुई कहने लगी….

साची…. मुझे एकांत चाहिए अभी कुंजल।

कुंजल उसके हाल-ए-दिल को समझती हुई, कॉलेज के दूसरे मंजिल पर बनी एक कबाड़ख़ाने में लेकर पहुंच गई। हालांकि वो जगह भी खाली तो नहीं थी लेकिन कुंजल को ज्यादा वक़्त नहीं लगा वहां के कुछ लैला-मजनू को भगाने में।

जैसे ही वो जगह खाली हुई, साची कुंजल को पकड़ कर रोने लगी। भावनाएं आशुओं के साथ बहते जा रहे थे, वो लगातार रोए जा रही थी। रोते-रोते सिसकियां सी लेने लगी वो। रोते हुए काफी वक़्त हो चला था, कुंजल उसे पानी बॉटल देती हुई उसके आशु पोछी…. "पानी पी लो।"

साची:- मेरे ही साथ ऐसा क्यों हुआ कुंजल, मैंने तो उसे इतना ऊंचा दर्जा दिया था। मै ही गलत हूं इस बात को सोच कर पगलाई सी, उस पर सबकुछ लुटाने का सोच लिया था। मेरा जमीर धिक्करता रहा, लेकिन मै अपनी गलती समझ कर आगे बढ़ती रही।

कुंजल:- शांत हो जाओ साची। तुम इस वक़्त शायद अपने आपे में नहीं हो।

साची:- क्यों वो तुम्हारा भाई है इसलिए तुम्हे बुरा लग रहा है क्या?

कुंजल:- मुझे उसके लिए नहीं तुम्हारे लिए बुरा लग रहा है। खुद को संभालो।

साची:- कैसे संभाल लूं कुंजल, तुम जानती भी हो मेरे अंदर क्या चल रहा है।

कुंजल:- मै अच्छे से जान रही हूं, तुम्हे पागलपन के दौरे आने शुरू हुए है और ना जाने कब तक आएंगे उसका समय निश्चित नहीं है।

साची:- हां शायद तुम सही कह रही हो। ये मेरा दर्द है और मै ही झेलूंगी, तुम्हरे साथ का शुक्रिया।

कुंजल:- मै जानती थी पागलपन की शुरवात में ऐसे ही जवाब आएंगे। जाओ कुछ दिन रोकर जब तुम्हारे आशु सुख जाएंगे तब मै बात करूंगी।

दिन बिरहा में बीतने के बाद साची घर लौट कर आयी और सीधे अपने कमरे में जाकर रोती रही। ना जाने वो कितना रोई थी, आखें सुज गई थी। आखों के आस पास की सिलवटें सारी कहानी कह रहे थे। लावणी किसी तरह उसके कमरे में पहुंची। बहुत कोशिशों के बाद जाकर वो चुप हुई।

किसी ने किसी को धोका नहीं दिया। दोनों ने ही अपनी भावनाएं कभी एक दूसरे से नहीं छिपाए लेकिन दिल दोनों का ही टूटा। शायद प्यार में जो विश्वास होता है, उसकी कमी सी खल गई। आज ऐमी के साथ भी अपस्यु खामोश ही रहा।

अगली सुबह बिल्कुल खामोश और मायूस थी। ना तो कोई उत्साह बचा था और ना ही कोई तमन्ना। बस एक कॉलेज जाने की ड्यूटी बची थी, साची वहीं निभा रही थी। आखें उसके रोने कि कहानी बयां कर रही थी और मायूस उतरा सा चेहरा टूटे दिल का किस्सा।

अपस्यु जब सुबह जागा तब उसके चेहरे पर उसकी वहीं चिर परिचित मुस्कान थी। अपने भाई-बहन के साथ उसने पूरा वर्कआउट भी किया किंतु अब उसने कॉलेज से मुंह मोड़ लिया था। साची जो आखरी बात उस से कह गई, उसी को निभाते हुए उसने कॉलेज से ही दूरियां बनाना सही समझा।

दिन बीत रहे थे और दोनों के बीच की दूरियां भी शायद। अपस्यु अपना ध्यान अपने पुरानी रुचि पर केंद्रित करने में लग गया, नई चीजों का अध्यन करना और उसे प्रयोग में लाना। अपने रुचि में खुद को इस कदर वो उलझा चुका था कि दिन ढल जाता, मजबूरी में सोना पड़ रहा था लेकिन अध्यन पूरा नहीं हो पा रहा था।

बीतते वक़्त के साथ साची भी खुद को संभालने कि कोशिश कर रही थी, लेकिन दर्द ज्यादा था और उसपर सोचने के लिए प्रयाप्त समय भी। शायद यही वजह थी कि आशु छलक ही आते थे, किंतु कुंजल और लावणी हर संभव उसे हंसाने और गम भूलने में मदद कर रही थी।

बीतते वक़्त के साए में आरव की लावणी भी कहीं गुम हो रही थी। आरव से गुस्सा तो था लेकिन उससे प्यार भी कम नहीं था। बस लावणी चाह कर भी उसे सुन नहीं पा रही थी। उसका दिल कर तो रहा था कि कुछ वक़्त रुक कर आरव का मानना भी सुन लिया जाए, और अपना गुस्सा बस उसकी एक प्यार भरी बात से खत्म किया जाए, लेकिन शायद इस वक़्त वो अपना सारा खाली समय अपनी बहन को दे रही थी।

लगभग 15 दिन बीतने को आए थे। रात का अंधेरा और 2 बजे का वक्त था। … आरव एक बार फिर चोरी से लावणी के कमरे में दाखिल हुआ। लाइट जला कर उसने फिर से सोती हुई लावणी के मासूम चेहरे को गौर से देखने लगा… "हाय मेरी धड़कने, काबू में रह भाई। माना कि वो तेरे होश उड़ा रही है लेकिन अंदर इतना मत उछल।"

अपने अंदर के पंख को उड़ान देते, आरव लावणी के सर के पास जाकर बैठ गया और उसका मुंह पर हाथ डालकर उसे जगाने लगा। लावणी की जब आखें खुली तो आरव को पास बैठे देख उसकी आखें चौड़ी हो गई…. "ऊं ऊं ऊं" … "ओह" .. और आरव ने अपना हाथ लावणी के मुंह पर से हटाया।

हाथ हटते ही लावणी उठकर बैठती हुई अपने आखें दिखाने लगी…. "प्लीज प्लीज प्लीज मेरी बात तो सुन लो"… उसकी आखें देखकर आरव मिन्नतें करते कहने लगा।

लावणी:- क्यों सुनूं तुम्हे…

आरव:- बेबी आई लव यू।

लावणी:- तुमसे तो कब का ब्रेकअप कर चुकी मै, जाकर किसी और कि नींद खराब करो।

आरव, साइड से ही उसके गले पड़ते…. एक मौका तो दो मुझे अपनी बात समझाने का।

(अंदर खिल-खिलाती हंसी, बाहर से खुद को शख्त दिखाती).. लावणी अराव की इस हरकत पर अपनी मुंडी घुमा कर उसे घूरती हुई कहने लगी… "1 फिट की दूरी से बात करो, चलो।"

आरव, कुछ दूरियां बनाते…. "बेबी सुनो ना"…

लावणी:- 4 बार तो कह चुके "सुनो ना, सुनो ना".. इस से आगे भी है कुछ बोलना है या फिर यही रट्टा मार कर आए हो।

आरव:- कहने को बहुत सी बातें है बेबी लेकिन पहले आई लव यू।

लावणी अपने बनावटी भाव दिखाती…. "ये भी दोबारा बोल रहे हो।"

आरव:- अब तुम ऐसे मुझ पर राशन-पानी लेकर चढ़ी रहोगी तो कहां से मै कुछ सोच पाऊंगा। ठीक से सोचने तो दो की कैसे समझाऊं तुम्हे।

लावणी:- ये बातें उस वक़्त समझ में नहीं आयी थी, जब कमर में हाथ डाले उस लड़की से चिपक कर डांस कर रहे थे।

आरव, वापस लावणी के पास जाकर उसके गले पड़ते हुए कहने लगा…. "अरे वो तो ऐमी ने फसाया था मुझे वरना मै तो कॉलेज में भी किसी को भाव नहीं देता।"

लावणी:- तुमने कह दिया मैंने सुन लिया, इस विषय पर बाद में सोचकर बताऊंगी। फिलहाल मै दी को लेकर चिंता में हूं।

आरव:- वो बेवकूफ है…

लावणी:- ओए कुछ भी बकवास की ना तो देख लेना…

आरव:- अगर तुम्हे मेरी बातें बकवास लगे ना तो तुम बेशक मेरे साथ जो चाहे वो कर लेना … लेकिन एक बार मेरी पूरी बात ध्यान से सुन लो और मेरे कहे अनुसार साची को समझाना… तुम दोनों बहन कि चिंताएं खत्म हो जाएगी।

आरव ने फिर अपनी बात कहनी शुरू की। वो कहता गया लावणी उसे ध्यान से सुनती गई। जैसे-जैसे बात आगे बढ़ रही थी, वैसे-वैसे उसे अंदर से खुशी मेहसूस होते जा रही थी। अपनी बात पूरी खत्म करके आरव लावणी से कहने लगा…. "सिर्फ तुम्हारी चिंता कि वजह से मैं अपनी बात अधूरी छोड़ कर जा रहा हूं। अब तो तुम्हारी ये चिंता जब खत्म होगी तभी मिलने आऊंगा। चलता हूं बेबी… और हां…

लावणी आरव की ओर देखती… क्या ?

फाटक से वो उसके होटों को चूम कर भागते हुए कहने लगा…. "आई लव यू।" आरव के जाते ही लावणी हंसती हुई कहने लगी…. "मेरा स्वीटो.. लव यू टू"… अंधरे में भागता हुआ आरव फिर से अपने घर वापस आया। अपस्यु हॉल में ही बैठा हुआ था।

"तूने सारी बातें समझा दी लावणी को"….. "समझा तो दिया है भाई लेकिन यार तेरा दिल नहीं दुखेगा।"…

"कोई एक तो खुश रहे मेरे भाई… मेरा क्या है, बिना अाशरा तब भी थे आगे भी जीते रहेंगे। एक ही दर्द से 2 लोग क्यों पिस्ते रहे।"
 
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