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- Dec 5, 2013
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गीता अब बड़ी हो गयी

गीता रुक गयी, फिर बोली ऐसा नहीं है की मजूर आसानी से गाँव में मिल जाते हैं
अब छुटकी को मौका मिल गया, वो चढ़ गयी, बोली यही बात तो मैं भी कह रही थी की फिर क्यों
लेकिन गीता ने उसे बात पूरी करने का मौका नहीं दिया, बोली अब रहोगी न तीन चार महीने तो पता चला जाएगा, ... अरे जब काम होता तो एकसाथ, सबकी कटाई दँवाई,... और जब नहीं होता तो कुछ नहीं, गर्मी भर देखना,...
पर अब छुटकी हार नहीं मानने वाली थी
बोली दी, लेकिन अब मजूरी का भी तो, गाँव में नहीं रहे लेकिन रेडियो सुनते हैं अखबार पढ़ते हैं , ...कोई स्किम है
गीता जैसे जल बुझ गयी, तू पढ़ी हो हम देखते हैं , १०० दिन मतलब २६५ दिन नहीं मिलेगा। उही में परधान जिसको चाहेगा लगाएगा, मेट की चिरौरी करो, रूपया में चार आना तो हाजिरी लगाएगा, वर्ना काम कोई करे हाजिरी किसी की,... कई तो खाली हाजिरी लगाए अंगूठा निशानी सब कराय के गायब,... अगर जुगाड़ है वरना २०-३० दिन मिल जाए तो बहुत,... और जो बाहर जाते है उनका तो हर महीने मनी आर्डर आएगा आजकल तो मोबाइल से ही,... केतना तो पैसा जोड़ के थोड़ बहुत खेत भी, मनई सोचता है हमारा जो हुआ बच्चो का भी,... अच्छा स्कूल मिल जाये,...
फिर पलट के उसने छुटकी पे ही वार किया,..
अपने दीदी क ससुराल देखो, ... उनके जेठ गए न बाहर, फिर अब जेठानी भी चली गयी,... और अपनी छुटकी ननद को भी ले गयी की वहां अच्छा स्कूल है,... और अब तोहरे घर में केतना आदमी केतना औरत, ... और तुमको ही न अब हम जल्दी जाने देंगे न गाँव के लौंडे,... तो तू, हमार नयकी भौजी, उनकी सास,... और मरद में तोहार जीजू,... अब ये जिन कहना की उ अकेले तीन तीन के लिए काफी हैं,...
हँसते हुए गीता के मुंह से निकला, लेकिन छुटकी के मुंह से हाँ निकलते निकलते रह गया,... उसके सामने ही जीजू ने बारी बारी से उसकी दोनों सहेलियों को क्या रगड़ रगड़ के, फिर मंझली के भी अगवाड़े पिछवाड़े,... बस वो मुस्करा दी।
गीता अब शांत हो गयी थी, फिर उसने अब तक की बातचीत समेटते हुए कहना शुरू किया
सब बातें समझायी गीता ने। वो बोली,
" सबसे पहले गाँव में हम लोगों का अपना ट्यूबवेल लगा,....कैसे बाऊ जी के बंबई के पैसे से, भैया की फटफटिया, , बमबई के पैसे से, हर महीने पांच तारीख को डाकिया खड़ा रहता था बाउ जी का मनीआर्डर,... "
फिर गीता ने खेती की परेशानी बतायी।
पहले तो बारिस का ठिकाना नहीं, और केतनो ट्यूबवेल हो गया लेकिन रोपनी है तो बिना पानी के ,
फिर बारिश नहीं तो गेंहू के लिए जमींन,... और एक दो बार तो फसल हो गयी कट के थोड़ बहुत खलिहान में, ... और बेटाइम क बारिस, ओला पड़ गया,...
तो बस सब मेहनत डाँड़,बीज, खाद क पैसा भी, और बाजार में कउनो चीज बिना पैसा के नहीं, हमरे और भैया के फ़ीस के लिए पैसा, किताब कपडा के लिए पैसा , और सबसे बढ़कर बीज, खाद कउनो चीज नहीं बिना पैसे के ,...
छुटकी ने ज्ञान की बात कर दी और डाँट पड़ गयी, लेकिन दी बैंक से पैसा,... पहले तो गीता ने डांटा और फिर प्यार से बोली,
" माँ नहीं है न नहीं तो दस गारी देतीं तोहरी महतारी के , वैसे भी उनका समधिन का रिस्ता लगता,... बैंक के नाम से मुंह नोच लेती थी, कहती थी हमार पैसा लेते है तो ओनकर कउनो जमीन जायदाद नहीं और हमको जरूरत पड़ी तो कुल गिरवी रखा लेंगे, हमार पैसा लेंगे तोदो टका सूद देंगे और हमें पैसा देंगे तो १२ से पंद्रह टका और लेंगे और टेबल टेबल जाके बिनती करा, परसाद चढ़ावा बाबू लोगन के,...
फिर गीता ने एक साल का किस्सा बताया , हंसती भी रही, साथ साथ
माँ भी न एक साल आलू का दाम खूब बढ़ गया, बस आधे खेत में आलू बोवाय दी , और बाकी लोग भी, फसल भी खूब अच्छी हुयी , लेकिन आलू जब खेत में से खोदा गया तो दाम एक रूपया डेढ़ रुपया किलो,...
"तो कोल्ड स्टोरेज " छुटकी ने फिर सलाह देने की गलती की,...
और एक जोर का हाथ पड़ा पीठ पे,...
" कोल्ड स्टोरेज,.. अरे वो ससुरे चौगुना दाम बढ़ा दिए , फिर ओहु में जगह नहीं, बाद में पता चला की तीन चौथाई जगह कुल बनिया लोग फसल क अंदाज कइके पहले से एडवांस रख लिए और केतना कोल्ड स्टोरेज तो उन्ही सब का,... बस आलू मंडी में पहुंचाने के लिए ट्रक, ट्रैक्टर छकड़ा सब ने दाम दूना तिगुना,... बस और वही बनिया सीधे खेत से उठा रहे थे तो वही एक रूपया दो रूपया,... भैया किसी तरह से ले गया मंडी तो वहां भी गोल बंदी कर के वही दाम और जानती हो शहर में चार पांच महीने बाद वही एक रूपये वाला आलू कितने में बिका,.. "
छुटकी तो हरदम पास की दूकान से ही खरीद के लाती थी , फिर भी उसने पूछा कितने में ,...
एकदम जल के गीता बोली,... २० रूपया में , हमें मिला एक रूपया और तुमको पड़ा २० रूपया।
" फिर खेती में साल भर का काम तो है नहीं , रोपनी, बोआई कटाई जब ज्यादा आदमी लगते हैं , बाकी तो अब मशीन आ गयी है , हरवाह नहीं रहे,... तो आदमी सब का करें कभी पंजाब कभी बंबई और जिसका जुगाड़ लग गया वो खाड़ी में,.. " गीता कुछ रुक के बोली। फिर समझाया,... कउनो गाँव में चल जाओ, आदमी कम है औरतें ज्यादा,..और वही कउनो बड़े सहर में तो उलटा,.... "
छुटकी सुन रही थी और एक बार फिर दोनों चुप थीं।
गीता अब सचमुच बड़ी हो गयी थी।
कुछ देर तक दोनों चुप बैठी रहीं, फिर गीता ने मुस्कराते हुए छुटकी की ओर देखा, फिर उसके बगल में आकर बैठ गयी और उसे चिपका लिया और उसके कान में बोली,....
" तू छोटी है लेकिन बात सही कहती है। "

गीता रुक गयी, फिर बोली ऐसा नहीं है की मजूर आसानी से गाँव में मिल जाते हैं
अब छुटकी को मौका मिल गया, वो चढ़ गयी, बोली यही बात तो मैं भी कह रही थी की फिर क्यों
लेकिन गीता ने उसे बात पूरी करने का मौका नहीं दिया, बोली अब रहोगी न तीन चार महीने तो पता चला जाएगा, ... अरे जब काम होता तो एकसाथ, सबकी कटाई दँवाई,... और जब नहीं होता तो कुछ नहीं, गर्मी भर देखना,...
पर अब छुटकी हार नहीं मानने वाली थी
बोली दी, लेकिन अब मजूरी का भी तो, गाँव में नहीं रहे लेकिन रेडियो सुनते हैं अखबार पढ़ते हैं , ...कोई स्किम है
गीता जैसे जल बुझ गयी, तू पढ़ी हो हम देखते हैं , १०० दिन मतलब २६५ दिन नहीं मिलेगा। उही में परधान जिसको चाहेगा लगाएगा, मेट की चिरौरी करो, रूपया में चार आना तो हाजिरी लगाएगा, वर्ना काम कोई करे हाजिरी किसी की,... कई तो खाली हाजिरी लगाए अंगूठा निशानी सब कराय के गायब,... अगर जुगाड़ है वरना २०-३० दिन मिल जाए तो बहुत,... और जो बाहर जाते है उनका तो हर महीने मनी आर्डर आएगा आजकल तो मोबाइल से ही,... केतना तो पैसा जोड़ के थोड़ बहुत खेत भी, मनई सोचता है हमारा जो हुआ बच्चो का भी,... अच्छा स्कूल मिल जाये,...
फिर पलट के उसने छुटकी पे ही वार किया,..
अपने दीदी क ससुराल देखो, ... उनके जेठ गए न बाहर, फिर अब जेठानी भी चली गयी,... और अपनी छुटकी ननद को भी ले गयी की वहां अच्छा स्कूल है,... और अब तोहरे घर में केतना आदमी केतना औरत, ... और तुमको ही न अब हम जल्दी जाने देंगे न गाँव के लौंडे,... तो तू, हमार नयकी भौजी, उनकी सास,... और मरद में तोहार जीजू,... अब ये जिन कहना की उ अकेले तीन तीन के लिए काफी हैं,...
हँसते हुए गीता के मुंह से निकला, लेकिन छुटकी के मुंह से हाँ निकलते निकलते रह गया,... उसके सामने ही जीजू ने बारी बारी से उसकी दोनों सहेलियों को क्या रगड़ रगड़ के, फिर मंझली के भी अगवाड़े पिछवाड़े,... बस वो मुस्करा दी।
गीता अब शांत हो गयी थी, फिर उसने अब तक की बातचीत समेटते हुए कहना शुरू किया
सब बातें समझायी गीता ने। वो बोली,
" सबसे पहले गाँव में हम लोगों का अपना ट्यूबवेल लगा,....कैसे बाऊ जी के बंबई के पैसे से, भैया की फटफटिया, , बमबई के पैसे से, हर महीने पांच तारीख को डाकिया खड़ा रहता था बाउ जी का मनीआर्डर,... "
फिर गीता ने खेती की परेशानी बतायी।
पहले तो बारिस का ठिकाना नहीं, और केतनो ट्यूबवेल हो गया लेकिन रोपनी है तो बिना पानी के ,
फिर बारिश नहीं तो गेंहू के लिए जमींन,... और एक दो बार तो फसल हो गयी कट के थोड़ बहुत खलिहान में, ... और बेटाइम क बारिस, ओला पड़ गया,...
तो बस सब मेहनत डाँड़,बीज, खाद क पैसा भी, और बाजार में कउनो चीज बिना पैसा के नहीं, हमरे और भैया के फ़ीस के लिए पैसा, किताब कपडा के लिए पैसा , और सबसे बढ़कर बीज, खाद कउनो चीज नहीं बिना पैसे के ,...
छुटकी ने ज्ञान की बात कर दी और डाँट पड़ गयी, लेकिन दी बैंक से पैसा,... पहले तो गीता ने डांटा और फिर प्यार से बोली,
" माँ नहीं है न नहीं तो दस गारी देतीं तोहरी महतारी के , वैसे भी उनका समधिन का रिस्ता लगता,... बैंक के नाम से मुंह नोच लेती थी, कहती थी हमार पैसा लेते है तो ओनकर कउनो जमीन जायदाद नहीं और हमको जरूरत पड़ी तो कुल गिरवी रखा लेंगे, हमार पैसा लेंगे तोदो टका सूद देंगे और हमें पैसा देंगे तो १२ से पंद्रह टका और लेंगे और टेबल टेबल जाके बिनती करा, परसाद चढ़ावा बाबू लोगन के,...
फिर गीता ने एक साल का किस्सा बताया , हंसती भी रही, साथ साथ
माँ भी न एक साल आलू का दाम खूब बढ़ गया, बस आधे खेत में आलू बोवाय दी , और बाकी लोग भी, फसल भी खूब अच्छी हुयी , लेकिन आलू जब खेत में से खोदा गया तो दाम एक रूपया डेढ़ रुपया किलो,...
"तो कोल्ड स्टोरेज " छुटकी ने फिर सलाह देने की गलती की,...
और एक जोर का हाथ पड़ा पीठ पे,...
" कोल्ड स्टोरेज,.. अरे वो ससुरे चौगुना दाम बढ़ा दिए , फिर ओहु में जगह नहीं, बाद में पता चला की तीन चौथाई जगह कुल बनिया लोग फसल क अंदाज कइके पहले से एडवांस रख लिए और केतना कोल्ड स्टोरेज तो उन्ही सब का,... बस आलू मंडी में पहुंचाने के लिए ट्रक, ट्रैक्टर छकड़ा सब ने दाम दूना तिगुना,... बस और वही बनिया सीधे खेत से उठा रहे थे तो वही एक रूपया दो रूपया,... भैया किसी तरह से ले गया मंडी तो वहां भी गोल बंदी कर के वही दाम और जानती हो शहर में चार पांच महीने बाद वही एक रूपये वाला आलू कितने में बिका,.. "
छुटकी तो हरदम पास की दूकान से ही खरीद के लाती थी , फिर भी उसने पूछा कितने में ,...
एकदम जल के गीता बोली,... २० रूपया में , हमें मिला एक रूपया और तुमको पड़ा २० रूपया।
" फिर खेती में साल भर का काम तो है नहीं , रोपनी, बोआई कटाई जब ज्यादा आदमी लगते हैं , बाकी तो अब मशीन आ गयी है , हरवाह नहीं रहे,... तो आदमी सब का करें कभी पंजाब कभी बंबई और जिसका जुगाड़ लग गया वो खाड़ी में,.. " गीता कुछ रुक के बोली। फिर समझाया,... कउनो गाँव में चल जाओ, आदमी कम है औरतें ज्यादा,..और वही कउनो बड़े सहर में तो उलटा,.... "
छुटकी सुन रही थी और एक बार फिर दोनों चुप थीं।
गीता अब सचमुच बड़ी हो गयी थी।
कुछ देर तक दोनों चुप बैठी रहीं, फिर गीता ने मुस्कराते हुए छुटकी की ओर देखा, फिर उसके बगल में आकर बैठ गयी और उसे चिपका लिया और उसके कान में बोली,....
" तू छोटी है लेकिन बात सही कहती है। "






































