Romance भंवर (पूर्ण) - Page 2 - SexBaba
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Romance भंवर (पूर्ण)

Update:-5

लावणी कि इस बात पर सांची को थोड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि उसकी बातों से ऐसा लग नहीं रहा था कि आज जो बुक स्टोर में हुआ वह पहली बार हो रहा था…..

थोड़ी देर तक साची उसे शांत करती रही, फिर जब उसकी स्तिथि थोड़ी सी समन्या हुई तब साची ने उस से साफ शब्दों में पूछा "कि आखिर उसके और आरव के बीच चल क्या रहा है"

लावणी फिर गहरी सांस लेती हुई कहने लगी…. लगभग 15-20 दिन पहले की बात है, जब ये लोग सामने रहने आए थे। उसके अगले ही दिन जब मैं शाम को टहलने पार्क में गई तभी इस से मुलाकात हुई थी। मैं पार्क के बेंच पर बैठी थी और ये भी मेरे बिल्कुल करीब अा कर बैठ गया। मैं एक दम से चौंक गई, क्योंकि बेंच बिल्कुल खाली थी फिर भी ये मेरे करीब आ कर बैठ गया। इसी बीच जब तक मैं इस से कहती कि पूरी बेंच खाली है थोड़ा उधर खिसक कर बैठो की तब तक…

साची:- तब तक क्या लावणी..

लावणी:- दीदी मेरी बात समाप्त होने से पहले ही इसने मेरे गाल को चूम लिया।

लावणी की ये बात सुन कर साची बिल्कुल हैरान सी हो गई.. फिर से आगे बताने को कही….

लावणी अपनी बात आगे बढ़ाती हुई कहने लगी :- फिर दीदी ये जहां भी मुझ से मिलता मुझे अकेला देख कर उल्टी-सीधी बातें करता..

साची उसे बीच में ही रोकती हुई… "उल्टी-सीधी मतलब किस तरह की, पूरी बात बताओ"

लावणी:- वैसी ही दीदी जिस तरह कि आज किया था। यहीं की तुम से पहली नजर का प्यार है, तुम्हारे ऐसे वैसे सपने आते हैं। तुम्हरे शरीर पर कहां-कहां तिल हैं.. और भी गंदी- गंदी बातें। और जो 3 रात पहले घटना हुई थी ना पापा और इसके बीच। उस रात भी ये मुझे ही धक्का मारने कि कोशिश कर रहा था। अब दी सोचो ना कितना ढीठ है, मैं पापा के साथ थी तब भी ये मुझे धक्के मारने की कोशिश कर रहा था।

साची:- ढीठ तो है ही साथ ही पहुंच वाला भी है तभी तो ये जेल में ना हो कर बाहर घूम रहा है। इस से हमे संभल कर डील करना पड़ेगा। वैसे इसका भाई कैसा हैं।

लावणी:- उसे मैंने कभी इसके साथ नहीं देखा। पहले दिन ही जो इसे अपार्टमेंट के गेट पर देखी थी, उसके बाद आज देख रही हूं, वो भी जब आप ने इसे बालकनी में दिखाया।

साची:- एक भाई उचक्का है तो दूसरा ताका-झांकी वाला है। दोनों ही मुझे आवारा लगते हैं। खैर चल तू तैयार हो जा कॉलेज नहीं चलना क्या?

कॉलेज चलने कि बात पर लावणी थोड़े असमंजस में पड़ जाती है। तभी साची एक बार फिर कहती है "अब उठ भी जा, बैठे-बैठे क्या सोच रही है"।…… "दीदी, वो भी कॉलेज अा रहा है। मुझे बहुत डर लग रहा है, मैं नहीं जाऊंगी कॉलेज"।

साची:- "जानती है लावणी जब मैं सीतापुर में थी ना तब रोज कॉलेज जाते समय, एक कुत्ता, मेरे स्कूटी के पीछे भौंकते हुए दौड़ता। जैसे ही वो भौंकता ना, मेरे दिल की धड़कनें तेज हो जाती और स्कूटी का एक्सेलेरेटर अपने आप ही बहुत तेज हो जाती। उस कुत्ते का डर मेरे दिल में इतना हो गया था कि मुझे उस रास्ते से गुजरने में भी डर लगने लगा"।

"फिर मैंने वो रास्ता ही बदल दीया। लेकिन दूसरा रास्ता मेन रोड से होते हुए, बड़ा घूम कर मेरे कॉलेज पहुंचता, ऊपर से उस रास्ते में जाम लगा रहता सो अलग। तो कभी-कभी मुझे ना चाहते हुए भी उस रास्ते से हो कर जाना पड़ता था। लेकिन आलम ये था कि उस रास्ते पर जाने के नाम से ही, मेरे चेहरे की हवाइयां उड़ने लगती थी। लगभग 4 महीने तक ऐसा ही चलता रहा"।

"फिर एक दिन मैंने ठान लिया… जो होगा सो देख लेंगे, ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, वो कुत्ता मुझे कटेगा ही ना… मैं 14 इंजेक्शन लगवा लूंगी, पर आज तो इसे सबक सिखाए बिना नहीं छोडूंगी"।

"मैंने दृढ़ निश्चय किया। घर से निकलते वक़्त साथ में डंडा भी रखी लेकिन मैं जैसे-जैसे उस गली के ओर बढ़ रही थी, मेरी धड़कने वैसे-वैसे तेज हो रही थी। मैं खुद को हौसला तो देती रही थी कि "जो होगा सो देखा जाएगा".. लेकिन डर था कि जाने का नाम ही नहीं ले। तू विश्वास नहीं करेगी, वो कुत्ता जब मुझ पर भौंक रहा था ना तब वो सब कुछ भूल गई जो सोच कर घर से निकली थी। एक्सेलेरेटर खुद ही इतना तेज हो गया की, जब मैंने अपने डर पर काबू पाया तो पता चला कि मैं उस गली से बहुत दूर निकल आईं हूं"।

"और अगले 2-3 दिन तक ऐसे ही सब कुछ वैसा दोहराता रहा। घर से सोच कर निकलती आज तो मैं इस कुत्ते को सबक सिखा कर रहूंगी और गली तक पहुंचते पहुंचते सारी हिम्मत हवा हो जाती। लेकिन इस प्रक्रिया में जो एक बदलाव मुझ में आया, वो ये था कि मेरी धड़कने अब थोड़ी काबू में रहती थी और स्कूटी नियंत्रण में। और फिर 1-2 दिन बाद वो वक़्त भी आया जब मैं हिम्मत जुटा कर स्कूटी को ठीक उसी वक़्त रोकी जब वो कुत्ता भौंकना शुरू किया। पैर तो मेरे भौंक सुनते ही कांपने लगे थे किंतु हाथ में डंडा लिए मैं अपने स्कूटी से नीचे उतरी। और हुआ क्या, वो कुत्ता जो भौंकते हुए तेज़ी से स्कूटी के ओर दौड़ा चला अा रहा था, जैसे ही मैंने उसे मारने के लिए डंडा उठाया वैसे ही वो दुम दबा कर भाग गया"।

"बस इतनी सी है डर कि कहानी। अब तुम्हे फैसला करना है कि तुम क्या करोगी? क्योंकि आज तुम डर से कॉलेज नहीं जाओगी तो क्या कभी आगे कॉलेज जाओगी ही नहीं? तुम चाहो तो अपना कॉलेज भी बदलवा सकती हो, तो क्या वो उस कॉलेज में नहीं पहुंचेगा? तुम चाहो तो घर बैठ कर पढ़ाई कर लो कोई कॉलेज जाओ ही मत, फिर भी क्या तुम इस घर से कभी बाहर नहीं जाओगी, क्या केवल एक कॉलेज ही बचा है जहां वो तुम्हे परेशान कर सकता है? मैंने अपनी बात पूरी कर दी आगे तुम्हारी मर्जी, मैं जा रही हूं तैयार होने।

लावणी, साची की बात सुन कर हंसती हुई कहती है…. "ये तुम्हारे साथ सच में हुआ था या किसी इंस्पिरेशनल स्टोरी को चेंप दी"..

साची:- इंस्पिरेशनल स्टोरी में इतनी डिटेल नहीं होता है पागल। वहां तो लिख देते हैं डर का सामना करो डर भाग जाएगा लेकिन हकीकत में ऐसा कुछ नहीं होता है। आप का डर आप पर हमेशा हावी ही रहता है चाहे कितना भी सामना करने का सोच लो। कितना भी सामना करने जाओ फिर भी डर लगता ही है वो तो वक़्त और हमारी आदतो के कारण सामना करते-करते डर बाहर निकल जाता है। अब छोड़ ये सब और चल जा कर तुम भी तैयार हो जाओ।

साची की बातों से लावणी में थोड़ा बदलाव तो आया। वो किसी तरह हिम्मत जुटा कर कॉलेज जाने के लिए तैयार हो गई। दोनों जब बाहर निकाल रही थी तब भी अपस्यु बालकनी में ही खड़ा था। लावणी को तो डर ही इतना लग रहा था कि उसे कुछ सूझ ना रहा था लेकिन साची दबी नजरों से उसे देख लेती है।

वो लावणी का ध्यान भटकाने के लिए कहती भी है कि "आज नहीं बोलेगी कुछ, उस बालकनी वाले लड़के के बारे में"… लेकिन लावणी ने तो जैसे उसकी बात को अनसुना ही कर दिया।

थोड़ी ही देर में दोनों दौलत राम कॉलेज के गेट के बाहर खड़े थे। कॉलेज के गेट पर खड़ी हो कर साची, लावणी से कहती है…… "देखो हम अा गए अपनी मस्ती की पाठशाला में। अब पढ़ाई लिखाई के साथ-साथ मस्ती भी होगी"

साची की बात सुन कर लावणी एक फीकी मुस्कान दी, जिसमें डर और मुस्कान का मिलजुला संगम था। उसके इस फीकी हसी पर साची, लावणी के कंधे को हिलाती हुई कहने लगी… "चिल मार, इतना डरेगी तो जिएगी कैसे? मैं हूं ना, उस आरव के बच्चे ने यदि आज तुझे छेड़ा तो फिर समझो उसकी शामत आई। और हां प्लीज मैं तेरे पाऊं पड़ती हूं, यहां तू मुझे दीदी मत कहना"।

लावणी, साची की बात पर हां में हां मिलाते हुए अंदर चल देती है। दोनों वहां से अपने-अपने कक्षा के लिए प्रस्थान कर लेती है। लावणी को आरव का डर सता रहा था जो पूरा दिन उस पर हावी रहा, किंतु आरव का कहीं कोई अता-पता नहीं था…

ऐसे ही अगला 2-3 दिन बीता, जब आरव कॉलेज में कहीं नजर नहीं आया और ना ही कॉलोनी में कहीं दिखा। हां अपस्यु भले ही हर वक़्त बालकनी में दिख जाया करता था। असर तो सिर्फ पहले दिन का ही होता है, उसके बात तो सिर्फ रही-सही कहानी रह जाती है। वैसा ही कुछ लावणी के साथ हो रहा था। अब आरव का ख्याल भी उसके मन से निकल चुका था और दोनों बहने नियमित रूप से कॉलेज जाया करती थी…

लगभग महीना बीतने को आया था.. और इतने दिनों में आरव कभी नजर नहीं आया… फिर एक रात करीब डेढ़ बजे दोनों बहाने चुपके से अपने घर के बाहर आईं और रास्ता पकड़ कर नुक्कड़ तक जाने लगी.. दोनों अभी कुछ कदम ही चली होंगी की उधर से आरव अपनी फटफटी लिए सामने से आ रहा था।

आरव अपनी फटफटी दोनों बहनों के सामने रोका और उनसे पूछने लगा… "देर रात दोनों कहां सड़कों पर भटक रही हो, ये दिल्ली है तुम्हारा गांव नहीं" … दोनों बहनों ने कोई जवाब नहीं दिया और अपना रास्ता बदल कर आगे बढ़ गई। आरव भी अपने रास्ते आगे बढ़ गया और अपार्टमेंट के गेट पर अपस्यु का इंतजार करने लगा।

जब दोनों बहने थोड़ी और आगे बढ़ी तब सामने से उन्हें अपस्यु आता हुआ नजर आया। वो दोनो अपनी ही लय में चलती रही लेकिन अपस्यु के टेढ़े-मेढे लड़खड़ाते कदम धीरे-धीरे स्थिर मुद्रा में अा गए। दोनों बहने बिना कोई ध्यान भटकाए उसके पास से निकल गई और अपस्यु वहीं खड़ा रह गया….
 
Update:-6

जब दोनों बहने थोड़ी और आगे बढ़ी सामने से उन्हें अपस्यु आता हुआ नजर आया। वो दोनो अपनी ही लय में चलती रही लेकिन अपस्यु के टेढ़े-मेढे लड़खड़ाते कदम धीरे-धीरे स्थिर मुद्रा में अा गए। दोनों बहने बिना कोई ध्यान भटकाए उसके पास से निकल गई और अपस्यु वहीं खड़ा रह गया….

आरव कुछ देर तक वहीं अपार्टमेंट के गेट पर अपस्यु का इंतजार करता रहा, लेकिन जब वो वापस नहीं लौटा तो आरव खुद आगे बढ़ कर देखने चला गया। आरव ने जब अपस्यु को देखा तो ऐसा लगा रहा था मानो कोई जोगी अपने ध्यान में लीन है। बिल्कुल स्थिर मुद्रा, चेहरे पर मुस्कान और नजरें ना जाने कहां पर टिकी थी, ना तो वो आसमान देख रहा था और ना ही धरती।

आरव उसे हिलाते हुए कहता है… "उठो रेे, कहां खोया है"…

अपस्यु अपने यथावत स्थिति में बिना किसी बदलाव के अपने मुख से साची स्तुति पढ़ने लगता है…. "नीले समंदर से भी गहरी उसके कटिले नैन, जैसे मृगनैनी हो कोई… वो उसका चहकता खिला सा चेहरा, देख कर दिल खिल जाए… तराशा हुआ बदन बिल्कुल हीरे जैसा.. जिसकी चमक आखों में बस जाए"

तभी आरव उसे ठीक पीछे घुमा देता है…. "इतना खो कर काहे इमैजिनेशन कर रहा है, लेे वो सामने से अा रही है उसे देख कर बोल"

अपस्यु की नजर फिर से वही नजारा लेे रही थी जो अब से थोड़ी देर पहले लिया था। उसके मुख से निकल रहे साची पुराण अनायास ही गायब हो गए और वो फिर से उसे देखने में लीन हो गया।

इस बार भी साची बिना कोई प्रतिक्रिया दिए चुपचाप अपने लय में चलती जा रही थी। जब वो दोनो बहने उन दोनों भाइयों से थोड़े दूरी पर थी, तभी आरव साची को सुनाते हुए कहने लगा… "ओ मैडम.. मेरा भाई पागलों कि तरह तुम्हारे लिए नजरें बिछाए है, कुछ नहीं तो कम से कम एक मुस्कान ही देती चली जाओ"…

अब स्तिथि ये थी कि साची और लावणी लगभग 4 कदम की दूरी पर… अपस्यु वहीं सुकून भरी मुस्कान अपने चेहरे पर लिए साची को देख रहा था और तभी आरव ने ये कमेंट पास कर दिया। अपस्यु बिना अपना नजर साची पर से हटाए, और अपने भावों में बिना किसी बदलाव के, अपना हाथ उठाया और एक तमाचा खींच कर जड़ दिया।

वो तमाचा इतना जोरदार था कि उसकी आवाज़ दोनों बहनों के कानों तक भी पहुंची। अब चूंकि लावणी भी वहां पर थी इसलिए आरव को ये अच्छा नहीं लगा। और इस पर वो अपनी प्रतिक्रिया देते हुए झुंझलाकर कुछ कहा…

अपस्यु बस चंद सेकेंड के लिए अपनी नजर साची से हटा कर आरव पर डाला। इस वक़्त के जो भाव थे वो बिल्कुल ही उलट थे.. आंखें इतनी बड़ी कि देख कर है लगे की इसमें हैवान बस्ता हो… जैसे किसी भूखे भेड़िए की आखें हो। उसने अपने होंठ पर उंगली लगा कर "सुसससससस" की आवाज़ निकाली और शांत रहने का इशारा किया। इसके तुरंत बाद वो पुनः अपने पिछले अवस्था में वापस लौटते हुए फिर से उसी संतोषजनक मुस्कान के साथ साची को देखने लगा…

आरव को थप्पड पड़ना और फिर उसे शांत करवाना, ये देख कर दोनों बहनों के मुख से अचानक ही हंसी फुट गई और दोनों हंसती हुई वहां से बड़ी तेजी में वापस अपने घर को चली गई… इधर एक बार फिर आरव ने झुंझलाते हुए कुछ कहा और इस बार भी उसी तेवर के साथ अपस्यु उसे शांत करते हुए अपने हाथ से घर के ओर जाने का इशारा किया।

इधर दोनों भाई घर पहुंच जाते हैं और उधर दोनों बहने… अपस्यु वापस लौट कर हॉल में बने एक केबिन में घुस जाता है और अपना कंप्यूटर स्टार्ट करने लगता है… इधर आरव अपना कपड़ा बदलते हुए अपस्यु से कहता है… "तू मुझे ऐसे मत मारा कर वरना अच्छा नहीं होगा"

अपस्यु, आरव की बातों को सुन भी रहा था और बड़ी तेजी के साथ कीबोर्ड पर खट्टर-पिट्टर भी कर रहा था…. "तू ये बता 15 दिनों से कहां गायब था"…

आरव चिल्लाते हुए… "मैंने क्या कहा वो तू सुन भी रहा है"

अपस्यु, खट्टर-पिट्टार करते हुए इंटर कि दबाता है और अपने रोलिंग चेयर को घुमा कर पीछे घूम जाता है…. "तुझ से कुछ पूछ रहा हूं, कहां था 15 दिन"

आरव:- कामिना सला, पूछ तो ऐसे रहा है जैसे तुझे कुछ पता ही ना हो। ये कंप्यूटर पर तू मेरे बारे में ही कुछ खिट्टिर-पिट्टीर कर रहा था ना…

अपस्यु:- मेरे साथ हो तो एक बात हमेशा याद रखना… अपना गटर जैसा मुंह बंद रखा कर और जो पूछा उसका सीधा सीधा जवाब दे…

अपस्यु के लगातार रूखेपन से आरव के दिल में टीस सी लगती है और ना चाहते हुए भी उसके आखों में आंशु अा जाते हैं। आरव को रोता देख अपस्यु उसके पास पहुंचकर उसके आशु पोछने लगता है। पहले तिरस्कार फिर प्यार, आरव को बहुत तेज गुस्सा अा गया और वो गुस्से में फुफकारते हुए अपस्यु को धक्का देता है और नजर इधर-उधर दौड़ा कर कुछ ढूंढ़ने लगता है…

पास में ही एक देशी डंडा पड़ा होता है, आरव उसे उठा कर अपस्यु की पिटाई करने लगता है। आरव रोते रहता है और पूरे दम से अपस्यु को पीटते रहता है। पीटते-पीटते उसका गुस्सा भी शांत हो जाता है और इधर अपस्यु बस उसके गुस्से को देख मुस्कुराता रहता है और मार खाता रहता है। "हो गया तेरा" इतना कहते हुए वो उठा और अपने फोरआर्म को देखने लगा। फोरआर्म बहुत ही मजबूत जगह होती है लेकिन आरव डंडा इतना तेज चला रहा था कि हाथों पर उसके निशान साफ देखे जा सकते थे।

आरव जो पहले अपने भाई के बातों के कारण रो रहा था, अब वो अपने द्वारा कि गई हरकत और भाई के हाथ पर डंडे के लाल निशान देखकर व्याकुलता से रो रहा था। अपस्यु उसे शांत करते हुए कहने लगा…. "इसलिए मैं हमेशा कहता हूं गुस्से पर काबू रखा कर, क्योंकि ये गुस्सा अक्सर बाद में अफसोस के सिवा कुछ नहीं देता है"।

आरव "सॉरी-सॉरी" करता हुआ अपने भाई की मरहम पट्टी कर रहा था और साथ में सिकायते भी, की वो अक्सर उसके साथ बुरा व्यव्हार करता है जिसकी वजह से वो और भी ज्यादा चिड़चिड़ा होता जा रहा है।

इस पर अपस्यु उसे जवाब देते हुए कहता है… "मैं तेरे साथ ये सब करना उस दिन छोड़ दूंगा जिस दिन मुझे पता चल जाएगा कि तूने सीख लिया है कहां गुस्सा करना चाहिए और कहां अपनी भावनाओ को काबू में रखना चाहिए। साथ ही साथ कितना गुस्सा दिखना चाहिए और कितना गुस्सा अंदर छिपा रहना चाहिए"

आरव, अपस्यु की बात सुन कर नतमस्तक हो जाता है और कहता है… "ये तेरे 12 साल के उस गुरुकुल का नतीजा है जो तू इतनी बड़ी-बड़ी बातें कर रहा है। वरना है तो तू मेरा भाई ही, तू भी बिल्कुल मेरे जैसा ही होता, यदि तू उस गुरुकुल में ना गया होता"

अपस्यु:- जी सत्य वचन, चल अब सच-सच बता 15 दिनों से कहां था?

आरव:- साला हैकर, रात दिन तो तू मुझ पर ही नजर रखे रहता है, तुझे नहीं पता कि मैं कहां था?

अपस्यु:- अब तू होम सेक्रेटरी के ऑफिस के एक आईएएस (IAS) से पंगे लेगा तो ऐसे ही ना छिपता फिरेगा। किसी ने तुझ पर हाथ तो नहीं उठाया।

आरव:- वो माचो के बच्चे रशियन मेड गन लिए घूम रहे थे और तुझे क्या लगता है वो मुझे हाथ और लात से मारेंगे… मै उसके हाथ लगता तो तू अब तक मुझ से बात भी ना कर रहा होता। वैसे एक बात बता तू तो अपनी आयटम को सरा दिन निहारता रहता था फिर तुझे इतनी बात कहां से पता चली।

अपस्यु:- ये सब बातें कल पूछना फिलहाल मुझे नींद लग रही है और मैं जा रहा हूं सोने।

आरव:- अपस्यु सुन तो, भाई दर्द भी हो रहा है क्या?

अपस्यु:- तेरी कसम कोई दर्द नहीं है मानसिक रूप से। हां बाकी जो इस हाथ कि क्षति हुई है उसे दवा ठीक कर देगी। चल अब मैं जा रहा हूं सोने तू भी सो जा।

आरव:- अच्छा सुन, कल कॉलेज चलेगा क्या?

अपस्यु:- कॉलेज जा कर क्या ही करूंगा मै? नह, कोई इकछा नहीं।

आरव:- नहीं बस सोचा की बता दू, तेरी और मेरी वाली दोनों दौलतराम में ही पढ़ती है।

अपस्यु जिसपर नींद सवार हो रहा था, उसकी भोहें चौड़ी हो गई…. "क्या बोल रहा है तू, तुझे कैसे पता वो दोनो उसी कॉलेज में है"।

आरव:- जिसकी तू अभी गुणगान कर रहा था ना होम सेक्रेटरी का आईएएस (IAS) उसने भी मेरे साथ ही फॉर्म जमा किया था। मै हम दोनों का और वो उन दोनों बहनों का फॉर्म भड़ा था।

अपस्यु:- क्या बात कर रहा है? लेकिन इन दोनों बहनों को देख कर लगता तो नहीं कि इनका एडमिशन स्पोर्ट्स कोटा में हुआ होगा।

आरव:- तू समझा या फिर समझाऊं कैसे हुआ दोनों बहनों का एडमिशन।

अपस्यु:- हां समझ गया। जिसके घर में मच्छर मारने के लिए भी नौकर हो और वो खुद जाए फॉर्म भरने मतलब तो साफ ही है… अपना स्पोर्ट्स कोटा और उनका पैरवी कोटा।

और फिर दोनों भाई ठहाके लगा कर हसने लगे। उसके बाद दोनों चले गए सोने। इधर साची और लावणी चोरी से घर के अंदर घुसे और सीधे लावणी के कमरे में पैक हो गए…

लावणी:- दीदी मुझे ये सब ठीक नहीं लगता।

साची:- बुरा तो मुझे भी लग रहा है लेकिन क्या कर सकते है। वो दोनो मंत्री के बेटे है और छोटे पापा तो उन्हीं के आफिस में काम भी करते है। जब वो कुछ नहीं कर सकते फिर हमें तो ये सब करना ही होगा।

लावणी:- दीदी कब तक ऐसे डर के जिएंगे… वो डर निकालने वाली कुत्ते कि थेओरी पर काम क्यों नहीं करती?

साची:- ठीक है कल से वो भी कर के देख लेंगे। वैसे आज ये दोनों भाई एकदम से अचानक बाहर कैसे घूम रहे थे।

लावणी:- मेरी हालत तो ऐसी है कि मुझे तो ये दोनों भाई याद भी नहीं रहे।

साची:- मुझे भी…

लावणी:- वैसे दी जैसे आप के साथ कुत्ते वाली घटना हुई थी ना वैसे ही डर भागने का मुझे भी एक उपाय मिला है…

साची:- क्या ?

लावणी:- यदि आप किसी चीज से डरती हैं और उस से भी ज्यादा डरावना कुछ और मिल जाता है तो पहले जिस चीज से आप डरती थी उसका डर अपने आप ही खत्म हो जाता है। जैसे कि आज हुआ.. आरव को देख कर डर नाम की कोई चीज ही नहीं रही।

साची:- तो तू क्या चाहती है अब हम इस से भी कुछ ज्यादा डराने वाला को ढूंढना चाहिए।

लावणी:- बिल्कुल नहीं, वो तो बस मेरे साथ बीती डर भागने कि विधि मुझे पता चली तो आप के साथ साझा कर दी। वैसे दीदी एक बात बोलूं आप मुझे डांटेंगी तो नहीं?

साची:- अब बता ना, इतना बाउंड्री क्यों बना रही है?

लावणी:- पक्का ना, कसम खाओ मेरी…

साची:- अब तू बताएगी या मैं सोने जाऊं…

लावणी:- दीदी तुम उस अपस्यु को वहां उन से क्यों नहीं भिड़ा देती… ये लोग आपस में उलझे रहेंगे… और हमसे पीछा छूट जाएगा…

साची, लावणी की बात सुन कर कुछ सोचती है और फिर उसे सोने के लिए कह कर वहां से चली जाती है।
 
Update:-7

साची, लावणी की बात सुन कर कुछ सोचती है और फिर उसे सोने के लिए कह कर वहां से चली जाती है।

सुबह का वक़्त कोई रगड़-रगड़ के नहाता है तो कोई चिंता के सागर में डूब कर कॉलेज के लिए तैयार हो जाता है। और फिर सवार होकर निकलती है वाहने.. कोई स्कूटी से तो कोई फटफटी से चल देता है

एक ही वक़्त पर दोनों गाड़ी निकलती है बिल्कुल रेल की पटरी से समानांतर। वैसे ये कोई इत्तेफ़ाक नहीं था बल्कि दोनों लड़के ना जाने कब से अपनी फटफटी को धो कर, चमका कर, अपने अपार्टमेंट के गेट पर खड़े उनके बाहर आने का इंतजार रहे थे।

दोनों गाड़ी जैसे ही गली के नुक्कड़ के आगे बढ़ती है… स्कूटी में अचानक ब्रेक लगता है और वो रुक जाती है… स्कूटी रुकते ही आरव चिल्लाता है… "अरे भाई-भाई स्कूटी रुक गई"… और फिर तभी फटफटी भी रुक जाती है।

साची स्कूटी से उतर कर पैदल ही उन दोनों के पास पहुंचती है… "हे भगवान बस मेरा काम बन जाए। किसी तरह वो शिसे में उतर जाए बस" यही ख्याल लिए साची अपस्यु के ओर अपने कदम बढ़ा रही थी।

साची को अपनी ओर आते देख एक बार फिर अपस्यु खो जाता है। अभी वो पूरे ख्यालों में डूबा भी नहीं था कि नीले-गुलाबी मिश्रित चूड़ियों से भरे हाथ ऊपर उठते हैं जिसकी हथेली अपस्यु के चेहरे के आगे दाएं से बाएं और बाएं से दाएं हो रही थी…

उन कोमल हथेली के ठीक वो मृगनयनी का चमकता चेहरा था जिसके रूप पर अपस्यु मोह गया था। वो खिला सा चेहरा, दिल को रौशन कर देनी वाली हसी उपर से काले, घने और थोड़े से घुंघराले बाल, जो सदैव गाल के शुरवात से ऐसे टकराते मानो उन्हें चूम रहे हो, और ये दृश्य अपस्यु के लिए इतना मनमोहक था कि वो इनमें खो सा जाता था।

हथेलियों के बीच से गुजरने से वो चेहरा बार-बार हथेली के पीछे छिप जाता इसलिए अपस्यु ने तेजी के साथ उस हथेली को अपने हाथों में थाम कर किनारे कर दिया और सुकून से उसका चेहरा देखने लगा।

साची (अरे ये देवदास फिर से मुझे घूर रहा):- तस्वीर भेज दूंगी… बड़ा सा पोस्टर बना कर दिन रात मेरा चेहरा देखते रहना। अभी हाथ छोड़ो और नींद से जाग जाओ…

अपस्यु उसका हाथ छोड़ते हुए:- 700******11

साची (मैं तो गंवार समझी ये तो तेज निकला, सीधा नंबर दे रहा। कोई नहीं मैं भी ना समझने का नाटक करती हूं):- क्या?

अपस्यु:- मेरा मोबाइल नंबर..

साची:- ऑफ ओ.. अच्छा सुनो मुझे तुम से कुछ काम है।

अपस्यु:- हुकुम कीजिए।

साची:- क्या मैं तुम्हारे साथ कॉलेज अा सकती हूं?

अपस्यु आरव की ओर देखते हुए… उतर

आरव:- फिर मैं कैसे जाऊंगा…

अपस्यु:- पैदल अा जाना.. उस से भी ना हो तो आज घर पर ही रह।

साची:- अरे नहीं वो लावणी के साथ चला जाएगा।

बस इतना सुनना था कि आरव सीधा लावणी के स्कूटी पर। दोनों गाडियां, सवारी की अदला-बदली करने के बाद पुनः अपने गंतव्य की ओर चल दी। लेकिन अब दोनों गाडियां एक दूसरे के समनंतर नहीं बल्कि अलग-अलग रास्ते से जा रही थी।

अपस्यु और साची…

आज तो जैसे सूखे रेगिस्तान में बिना किसी उम्मीद के बावजूद बारिश हो गई हो और उस बारिश का पूर्ण आनंद अपस्यु उठा रहा था… उसकी सासें इतनी गहरी थी मानो वो साची की खुशबू को महशुस कर उसे अपने साशों में बसा रहा हो.. अद्भुत क्षण थे… दोनों बिल्कुल खामोश आगे बढ़ रहे थे। लेकिन इस खामोशी से साची बहुत चिढ़ रही थी…

वो अपने मन के ख्यालों में ही बड़बड़ाने लगी… "वैसे तो मुझे देखने के लिए पागलों कि तरह अपने बालकनी में ही खड़ा रहता है। लेकिन अब जब मैं इसके साथ हूं तो कुछ बात ही ना कर रहा। एक इसका भाई है, ना जाने अब तक लावणी के साथ कितनी बक-बक कर चुका होगा। और एक ये हैं देवदास जिसकी आखें तो हमेशा मुझ पर ही टिकी रहती है पर जुबान नहीं खुलता। आज मुसीबत में ना होती तो इसके साथ ना बैठना पड़ता। कुछ तो बोल दो … ऐसे चुप रहोगे तो मैं तुम्हे बातों में कैसे उलझाऊंगी"।

साची इन्हीं उधेड़बुन में आगे बढ़ रही थी लेकिन अपस्यु था कि कुछ बोलने का नाम ही नहीं ले रहा था। और शायद वो कुछ बोलने के स्तिथि में भी नहीं था क्योंकि आधा ध्यान वो फटफटी चलाने में और आधा ध्यान में वो बस साची को अपने साथ मेहशुस करने में लगाए था। जब साची को लगा कि ये अब कुछ नहीं बोलने वाला तब अंत में उसी ने चुप्पी तोड़ दी।

साची:- तुम्हारा नाम क्या है?

अपस्यु:- नाम और ज्ञान की बात होगी तो भेद खुल जाएगा। काम की बात करते है, हम दोनों का भला हो जाएगा।

साची:- मैं समझी नहीं।

अपस्यु:- इतने भी नासमझ नहीं लेकिन पूछ ही लिया है तो बता दू अपनी बातों का मतलब। आप का मेरे साथ बैठना एक फरेब है, कोई जाल बून सा गया है जिसमें मुझे फसना है।

साची (मैं इसके बारे में जो भी सोचती हू वो सब उल्टा ही क्यों होता है, लगता है मैंने ही इसे कम आकां है। अब सीधा काम की बात करूंगी तो बेज्जति हो जाएगी, लगता है थोड़ा नखरा ही दिखना होगा) :- बाइक रोको मुझे उतारना है।

अपस्यु:- बाइक नहीं कहिए ये हमारी फटफटी है।

साची:- जो भी है रोको मुझे नहीं जाना तुम्हारे साथ..

अपस्यु:- मेरे साथ या मेरे बिना, समस्या का समाधान तब तक नहीं होगा जब तक आप मुझ से बात नहीं करोगी।

साची (प्लीज अब बाइक मत रोक देना वरना मेरा पोपट हो जाएगा):- तुम्हारे साथ बैठ क्या गई ना जाने तुम मेरे बारे में क्या क्या राय बनाने लगे? अभी रोको बाइक मुझे नहीं जाना तुम्हारे साथ….

अपस्यु:- गुस्से में भी आप की आवाज़ शुरिली है, काश पीछे मुड़ कर चेहरा देख सकता। वैसे अभी तो बताया बाइक नहीं फटफटी कहिए।

साची:- जो भी है अभी रोकोओओओओओओओ…

अपस्यु:- ऐसी भी क्या बेरुखी… अब बता भी दीजिए, क्यों संकोच कर रही हो..

साची (बहुत नखरे हो गए साची बेटा ऐसे ही नखरा चलता रहा तो कॉलेज अा जाएगा। अब बंद जिद कर ही रहा है तो तू क्यों संकोच कर रही):- अच्छा बता दूं..... यदि बता दिया तो क्या करोगे…

अपस्यु:- अगर मैंने बता ही दिया कि मैं क्या करूंगा तो फिर मुझे करने में और आप को देखने में मजा नहीं आएगा.. मैं क्या करूंगा वो गोपनीय रखते है केवल इस ख्याल से कि मैं जो भी करूंगा उसे हम दोनों एन्जॉय करेंगे और आखिर में आप सुनिश्चित कर लेना की काम आप के हिसाब से हुआ या नहीं।

साची:- ठीक है तो सुनो, कॉलेज का एक सीनियर है नाम है शशांक वर्मा सेंट्रल होम मिनिस्टर का बेटा, उसने हमारा जीना हराम कर दिया है। अब क्या मै बताऊं बहुत बदतमीजी करता है। किसी के सामने कहीं भी हाथ लगा देता है। उसकी शिकायत मैंने अपने छोटे पापा से भी की थी लेकिन वो भी कुछ नहीं कर पाए।

अपस्यु:- क्या…..? मतलब उसकी बेटी और भतीजी को कोई लड़का यहां-वहां हाथ लगाता है और वो कुछ कर नहीं पाए…

साची:- नहीं हमने शुरू ही किया था कि छोटे पापा ने सीधा कह दिया "कॉलेज बदल लो".. पूरी बात बताने भी कहां दिए।

अपस्यु:- ओह तो ये माजरा है, ठीक है चलो कॉलेज.. वैसे मेरा मेहनताना क्या होगा?

साची:- मतलब..

अपस्यु:- अपना फंडा क्लियर है मैडम… मैं काम करूंगा तो अपना मेहनताना लूंगा…

साची:- और क्या है तुम्हारा मेहनताना?

अपस्यु:- बस एक घंटे आप मेरे सामने रहो और मैं आप को देखता रहूं।

साची:- एक बात बताओ मुझे…

अपस्यु बीच में ही टोकते हुए… जो आप जानना चाह रही है आप को पता नहीं चलेगा। मैं क्या देखता हूं और क्या सोचता हूं वो मेरी भावनाएं है आप को बता भी दू तो आप के लिए महज चंद शब्द, वो भी एक पागल के द्वारा बोला गया शब्द होगा… इसलिए उसे आप को अभी बताने का कोई फायदा नहीं… और जिस वक़्त बताने का फायदा होगा शायद उस वक़्त बताने कि जरूरत नहीं होगी।

साची बड़े प्यार से हंसती हुई कहने लगी…. "बहुत खूब.. वैसे मैं तुम से काफी प्रभावित हुई और हां मुझे लगता है कि मुझे अपने सोच के लिए तुम से माफी मांगनी चाहिए। वैसे सच कहूं तो मुझे अभी बहुत बुरा लग रहा है लेकिन मै अभी इस बात को नहीं करना चाहूंगी क्योंकि पता नहीं क्यों अब मुझे यकीन हो गया है कि तुम जरूर अपना मेहनताना वसूल कर लोगे। तो ये बात उसी एक घंटे में मै कर लूंगी… मुझे मंजूर है लेकिन मेहनताना तभी मिलेगा जब मुझे लगेगा की तुम्हारा काम सराहनीय है।

अपस्यु:- मंजूर….
 
Update:-8

एक रास्ते जहां अपस्यु की फटफटी, साची को लिए, कॉलेज के ओर बढ़ रही थी, वहीं आरव भी लावणी के पीछे सवार हो कॉलेज के ओर निकाल परा था। एक तो लावणी पर दिल आया था ऊपर से उम्र का तकाजा, नादानी और छेड़खानी तो होनी ही थी।

स्कूटी के रफ्तार पकड़ते ही, आरव अपनी बाहें फैला कर उसके बदन के मध्य हिस्से को अपनी बाहों के जकड़ में लिया। लावणी को जैसे ही ये मेहसूस हुआ उसकी आंखें आश्चर्य से बड़ी हो गई और अगली हरकत ने तो उसे अनियंत्रित ही कर दिया।

बाहों में जकड़ने के बाद आरव अपने चेहरे को लावणी के बाएं कंधे पर रख कर, साइड से हेलमेट को ही चूमते उसे "I Love You" कहने लगा… लावणी को कुछ समझ में ही नहीं अा रहा था कि वो क्या करे और अचानक ही उसने ब्रेक लगा दी।

ब्रेक लगते ही पीछे से एक बाइक ने उसे धराम से ठोका। कुछ गाडियां अनियंत्रित होती, उसके स्कूटी के दाएं बाएं से 2-4 बातें सुनाते हुए निकली। वो जिसकी बाइक पीछे ठुकी थी वो बेचारा तो सड़क पर गिर गया। हाथ-पाऊं उसके छिल गए थे और जब गुस्से में वो हेलमेट निकाल कर लावणी के ओर बढ़ा तो लावणी पाऊं डर से थर-थर कांपने लगे।

वो लड़का उनके पास गुस्से में पहुंचा तो जरूर, परन्तु किसी लड़की को चालक देख, उसके तेवर ही बदल गए। आरव और उस लड़के के बीच कुछ देर बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा और अंत में लावणी उसे सॉरी कह कर कुछ मुआवजा दी और वो चला गया।

लावणी, रोती हुई गुस्से में कहने लगी… "ये सब तुम्हारी वजह से हुआ है, मुझे नहीं जाना तुम्हारे साथ कहीं"

लड़की सड़क पर रो रही थी, वो भी दिल्ली में, सीन तो क्रिएट होना ही था। आरव वहां के माहौल को भांपते हुए तुरंत चालक की जगह बैठ कर हेलमेट लगाया और लावणी को पीछे बैठने के लिए बोलने लगा, लेकिन लावणी बस आंसू बहाए जा रही थी बैठने का नाम ही नहीं के रही थी…

किसी तरह मिन्नतें कर, वादा कर की अब वो छेड़छाड़ नहीं करेगा, तब कहीं जा कर लावणी बैठी। दोनों बैठ कर कॉलेज के ओर बढ़ने लगे.. सम्पूर्ण शांति स्थापित हो चुकी थी दोनों के बीच और बिना किसी बताचित के गाड़ी आगे बढ़ रही थी।

अभी कुछ दूर ही स्कूटी आगे बढ़ी होगी की आरव के मोबाइल पर अपस्यु का संदेश पहुंचा। अपस्यु का इसलिए क्योंकि उसकी कॉल और मैसेज ट्यून दोनों अगल सेट की हुईं थीं। आरव एक काफी शॉप के बाहर गाड़ी खड़ी करके चोरी से अपस्यु का संदेश पढ़ने लगा।

इधर लावणी थोड़ा झुक-झुक कर उसके संदेश पढ़ने की कोशिश करती हुई कहती है… "कॉलेज चलो ना, स्कूटी यहां पर रोक कर किसका मैसेज पढ़ रहे"…

आरव:- कुछ नहीं, चलो एक कप कॉफी पीते हैं।

लावणी:- मैं नहीं पीती कॉफी-वॉफी.. चुपचाप सीधा कॉलेज चलो।

लावणी की बात सुनकर आरव उसे आंख दिखाते हुए… "चल चुपचाप, कोई डेट पर कॉफी पिलाने नहीं लाया बस मन कर गया"…

आरव की कड़क आवाज़ सुनते ही लावणी तेजी से जा कर टेबल पर बैठ गई उसके पीछे-पीछे आरव भी जा कर बैठ गया… "आरव कॉफी की एक चुस्की लेते हुए… "ये बता तू और तेरी वो बहन दोनों दिमाग से पैदल ही हो या फिर कुछ ज्यादा ही समझदारी भगवान ने तुमलोगों को दी है"

लावणी गुस्से में अपनी जगह से थोड़ा उठ कर आरव को उंगली दिखाती कहने लगी…. ये क्या बकवास है, मेरी बहन के बारे में कुछ मत बोलना।

आरव:- सॉरी सॉरी.. तू गुस्सा कहे कर रही, बैठ जा आराम से.. वैसे मेरा सवाल सही था पर तुझे गुस्सा अा गया इसलिए थोड़ा बदल कर पूछता हूं.. ये बताओ तुम दोनों बहने किस योजना के कारण आज हमारे साथ कॉलेज जा रही…

लावणी:- ना-ना कोई योजना वोजना नहीं है, आप गलत सोच रहे हैं। वो तो हम पड़ोस में रहते ना, तो साची दी ने सोचा कि साथ जाएंगे तो जान-पहचान बढ़ेगी…

आरव:- वाह क्या नेक ख्याल है.. सारे जवाब रटा दिया क्या तेरी बहन ने.. तू जो बोले, उस हम मान ले इतने बड़े वाले है क्या हम दोनों। हमारे माथे पर क्या 'चूउउ'.. खैर जाने दे

लावणी… ये कैसी बातें कर रहे हो?

आरव:- दिमाग सटका हुआ है लावणी। यार हमारे नाम से दूर भागने वाली तुम लोग इतना मेहरबान अचानक से हो जाओगी तो क्या हमे पता भी नहीं चलेगा कि तुम हम से कोई काम निकलवा रही। इससे कहीं ज्यादा बेहतर होता कि तुम सीधे अा कर प्रॉब्लम बता देते। ये धोके से फसा कर काम निकलवाना… मेरी तो जुबान गंदी है पर तुम्हारी तो सोच ही गंदी है।

लावणी को शायद अपने किए का पछतावा हुआ… "I am sorry, Aarav"

आरव:- कोई नहीं, शायद गुस्से में मैं भी कुछ ज्यादा बोल गया.. चलो अब समस्या बताओ… और किस बिना पर तुम्हे लगा कि हम इस समस्या का समाधान कर सकते हैं।

लावणी फिर पूरी कहानी बताने लगी… "कॉलेज के शुरवात दिनों से लेकर रैगिंग तक। फिर रैगिंग के बाद भी होम मिनिस्टर के बेटे शशांक वर्मा का दोनों बहनों को बुरी तरह परेशान किया जाना। अलग-अलग तरह की मांगे, जैसे कल सिगरेट पिलाना है, ये पिलाना वो पिलाना। साथ में ये भी बताई की कल रात दोनों बहने बाज़ार से सिगरेट लेना भूल गई थी तो उन्ही के लिए सिगरेट खरीदने गई थी"…

आरव बड़े ध्यान से उसकी बातें सुन रहा था… "ओह तो ये समस्या है चल अब ये बता कि तुम्हे ऐसा क्या दिखा हम में कि इस समस्या के समाधान के लिए हमे बकड़ा बना रही"

लावणी:- वो आप आवारा टाइप हो ना..

इतना सुनते ही आरव अपनी जगह से उठकर अपना चेहरा लावणी के चेहरे के बिल्कुल करीब लेे जाकर, अपनी बड़ी-बड़ी आंखें दिखाते… "क्या बोली"

लावणी थोड़े पीछे हटती हुई डर से अपनी आंखें बंद करते … "सॉरी सॉरी वो फ्लो में निकाल गया"

तबतक आरव पीछे जा चुका था और उसे देख कर हंसते हुए… "बस भी करो यार इतना डरना… हर बात पर डर जाती हो.. मैं तो मज़ाक में आगे आया था" …

लावणी थोड़ी सी निश्चिंत होती हुई…. क्या करूं, मेरा स्वभाव ही ऐसा है या शायद शुरू से पापा ने इतना डरा कर रखा है कि अब तो किसी भी बात पर, किसी से भी डर जाती हूं। ये तो अब मेरे जीवन का हिस्सा है… वैसे अब मैं डर भागने के लिए थोड़ा वर्कआउट कर रही हूं समय लगेगा पर नतीजा जरूर निकलेगा..

आरव… डर भागने का वर्कआउट, कोई क्लास ज्वाइन किया है या किसी बाबा का ताबीज खरीदा है।

लावणी "नहीं नहीं" कहती हुई.. डर भागने वाला वो पूरा नुस्खा.. जो साची ने लावणी को बताया था वो शब्दों में बिना किसी बदलाव के पूरा चिपकाती हुई कहती है… "सामना करने जाती हूं डर जाती हूं.. फिर भी हिम्मत नहीं हारी। फिर से सामना करने की सोचूंगी, फिर सामना करने जाऊंगी और फिर भी ना हुआ तो अगली कोशिश…

इस पर आरव जोड़-जोड़ से हंसते हुए… "ऐसे ही कोशिश करते करते पूरी उम्र निकाल जाएगी… चलो".. आरव अपना हाथ आगे बढ़ते हुए कहने लगा..

लावणी:- लेकिन चलना कहां है?

आरव उसकी आखों में देख कर उसे भरोसा दिखाते हुए… "तुम्हारा डर भागने लावणी.. चलो"

लावणी को भी शायद कुछ यकीन सा हुआ और वो आरव की आंखों में देखती हुई उसका हाथ थाम लेती है और चल देती है आरव के साथ। इस बार स्कूटी सीधा एक वाइन शॉप के आगे रुकी।

लावणी:- यहां क्या दिखाने वाले हो..

आरव:- डर निकालने का देसी नुस्खा.. जाओ एक बॉटल वोदका खरीद कर लाओ।

एक तो दारू ऊपर से लावणी को खरीदने के लिए भेजना.. पहले तो ना-नुकर करने लगी। फिर जब आरव ने तना मारा.. "उस लड़के के डर ये सब खरीद सकती हो, पर मेरे कहने पर नहीं। वो तुम्हारा सोशन करे तो उस डर से खरीदो पर मदद करने वाला बोले तो मना कर दो".. फिर क्या था आखिरकार लावणी मन बना कर वोदका खरीदने चली गई..

इधर लावणी ने जैसे ही अपना कदम वाइन शॉप के ओर बढ़ाना शुरू की उधर आरव ने भी अपना संदेश मोबाइल में छापना शुरू किया… "इधर का काम लगभग हो गया है.. हम आधे से एक घंटे में कॉलेज में होंगे… तुम अपना गेम प्लान कर सकते हो"… और टाइप कर के कबूतर उड़ा दिया अपस्यु के नंबर पर।
 
Update:-9

इधर लावणी ने जैसे ही अपना कदम वाइन शॉप के ओर बढ़ाना शुरू की उधर आरव ने भी अपना संदेश मोबाइल में छापना शुरू किया… "इधर का काम लगभग हो गया है.. हम आधे से एक घंटे में कॉलेज में होंगे… तुम अपना गेम प्लान कर सकते हो"… और टाइप कर के कबूतर उड़ा दिया अपस्यु के नंबर पर।

लावणी जब वोदका की बोतल लेकर पहुंची तब आरव मोबाइल को अपने जेब में रख रहा था.. लावणी को देखकर… "लेे अाई, इसे बैग में डाल कर चलो बैठो"..

लावणी भी बिना कोई सवाल किए जैसा आरव ने कहा ठीक वैसा ही किया और जाकर पीछे बैठ गई। स्कूटी अब सीधा एक पान दुकान पर रुकी जहां से आरव ने बाकी जरूरी सामान जैसे की ग्लास, कुछ पैकेट चखने के, ठंडा, सोडा, और सिगरेट। ये सब सामान अपने बैग में डाल कर वहां से निकल गया।

पीने के लिए उसने एक जगह चुनी और स्कूटी पर ही ग्लास, सोडा, चखना और ठंडा बिछा कर महफ़िल शुरू करने की तैयारी कर लिया.. अब बचा था अहम चीज जिसे आरव ने लावणी को निकालने के लिए बोला.. वोदका

लावणी को कुछ समझ ना आने की स्थिति में वो बॉटल निकलती हुई पूछने लगी… "तुम ये सब क्या कर रहे हो, कहीं यहीं पर दारू पीने का तो इरादा ना है"

आरव हंसते हुए… "नहीं रे, मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं। हम यहां पीने नहीं बल्कि तुम्हारे दिल से डर निकालने आए हैं"

लावणी:- और वो कैस होगा?

आरव उसे बॉटल दिखाते हुए…. देखो, इसे कहते हैं दवा। इसके बारे में जितना जनों उतना ही कम लगता है और इसका प्रयोग तुम किसी भी मौके पर कर सकती हो। दुनिया की इकलौती ऐसी चीज है जो हर मौके पर सही फिट बैठ कर सीधा परिणाम देती है वो भी अपने मन मुताबिक। बस अलग-अलग मौकों पर अलग-अलग डोज की जानकारी होनी चाहिए।

लावणी:- तुम्हारी ये बकवास मेरे समझ से बाहर है.. जो भी करना है जल्दी करो कॉलेज के लिए देर हो रही है।

आरव:- देखा इस दवा का असर, कुछ देर पहले "आप-आप" कर रही थी दवा देख कर .. "तुम-तुम" करने लगी.. थोड़ी देर ठहर जाओ अभी तो "तू" आना बाकी है… खैर बातों में वक़्त ना जाया करते हुए शुरू करते हैं डर भागने कि प्रक्रिया… इसके लिए सब से पहले बॉटल खोला.. अब चूंकि मामला डर का है और तुम्हारा पहला मौका तो डोज बनता है 180ml वो भी तीन हिस्सो में। ये लो तुम्हारा डर भागने का पहला डोज 60ml।

लावणी अपने आखें बड़ी किए… "पागल हो गए हो क्या… किसी को पता चला ना तो मेरा कॉलेज छुड़वा कर घर में बिठा देंगे"।

आरव:- ठीक है तुम मत पियो, लेकिन मै तुम्हे कुछ बताता हूं, अगर उसके बाद लगे तो तुम ग्लास उठा कर पी लेना वरना कोई बात नहीं। वोदका ही सही पर है तो दारू, मैं बर्बाद थोड़े ना जाने दूंगा।

लावणी:- ऐसा होगा ही नहीं की तुम मुझे दारू पीने के लिए कनविंस कर लो..

आरव… देखते है.. तो सुनो .. वो लड़का शशांक तुम्हारे बदन पर हाथ लगाया.. तुम ने सह लिया। अब मैं तुम्हारे सामने सरिर के उस भाग नाम तो नहीं ले सकता…. लेकिन धिक्कार है….. मुझे यहां तुम्हारे सामने नाम लेने में शर्म अा रही है और शायद उसने तो सब के सामने पकड़ लिया होगा। और यदि ना भी पकड़ा हो, तो भी तुम्हारा ये डर एक दिन उसे हिम्मत दे ही देगा… फिर कपड़े फटेंगे.. फिर वीडियो बनेगा। ये डर का सिलसिला है.. शशांक से बच भी गए तो कोई दूसरा मिलेगा, नहीं तो कोई तीसरा.. तुम डरती रहोगी वो तुम्हे नोचते रहेंगे..

लावणी:- "बस"…. एक ही झटके में 60ml गटक गई। "तुम्हे पक्का यकीन है, इस से डर दूर हो जाएगा"….

आरव:- पक्के से भी पक्का.. तुम अब बस ध्यान लगाओ कि उस शशांक के साथ क्या करना है?

शशांक के बाड़े में सोचते-सोचते, लावणी 180ml के बदले 240ml गटक गई। 240ml गटकने के बाद थोड़े से नशे में वो पूछने लगी… "यार मुझे तो कुछ हुआ ही नहीं। तू तो कहता था डर भाग जाएगा पर ये तो असर ही नहीं करती"..

आरव हंसते हुए… "करेगी लावणी जरूर करेगी, चलो अब कॉलेज चलते है"

लावणी, पूरे जोश में... ए रुक, मेरी स्कूटी है मैं चलाऊंगी, आज उस शशांक को मैं इसी स्कूटी से ठोक दूंगी"

आरव:- अरे नहीं लावणी तुम यदि ड्राइव करोगी तो…

लावणी:- चुप, मैं ही चलाऊंगी, तुम्हे क्या लगता है इस वोदका से कुछ नशा भी होता है क्या, बेकार दारू"

आरव, स्कूटी लावणी को थामते हुए… "ठीक है लो ड्राइव करो"

लावणी स्कूटी चलाने लगी, जैसे जैसे उसे हवा लगती अंदर से कुछ अच्छा मेहसूस होता और साथ ही साथ नशा भी थोड़ा-थोड़ा कर के बढ़ने लगा, इसी क्रम में आरव ने फिर से बात छेड़ दी शशांक की..

शशांक का नाम सुनकर, लावणी चिढ़ती हुई बोली… "नाम मत लो उसका"

आरव:- नह, तुम्हारा डर कभी नहीं जा सकता।

लावणी:- ओए पागल, मैं किसी से नहीं डरती।

आरव:- जाने भी दो, अगर किसी से नहीं डरती तो ऐसे थोड़े ना बोलती.. "नाम मत लो उसका"

लावणी:- अच्छा.. फिर कैसे बोलती मैं..

आरव:- कहती नाम ना लो उस साले का..

लावणी:- रुको मुझे ट्राय करने दो… "नाम ना लो उस साले का".. हां यार फील तो हुआ कि बातों में वजन बढ़ा है… रूको मैं शशांक को कैसे डांटती हूं वो सुनो और एडिट कर के उसमे दमदार शब्द डालो.. आज इसकी फाड़ देनी है।

आरव:- साबश.. ऐसे ही चिर फाड़ करना.. मैं तुम्हे इस से भी ज्यादा दमदार बातें सिखाता हूं …

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आरव का जब संदेश आया तबतक अपस्यु कॉलेज पहुंचने ही वाला था। कॉलेज के पास एक कैंटीन को देख कर उसने अपनी फटफटी वहीं रोकी और दोनों अंदर चले गए।

साची:- तुम कुछ प्लान कर रहे हो क्या?

अपस्यु:- नहीं बस कुछ वक्त बीतने का इंतजार, बताओ क्या लोगी।

साची:- अभी मूड नहीं है दिमाग बस वहीं अटका है।

अपस्यु:- डोंट वरी, कुछ दिनों बाद ये नहीं अटकने वाला.. वैसे तुम्हारा विषय क्या है?

साची:- हिंदी साहित्य..

अपस्यु:- तुम साहित्य कि छात्रा नहीं लगती।

साची:- क्या मतलब है तुम्हारा..

अपस्यु:- इस पर लंबी चर्चा हो जाएगी। माफ करना अभी ये विषय उठाने के लिए, इसपर फिर कभी बात करेंगे। अभी पूरा ध्यान समस्या के समाधान पर लगाते है।

साची:- वहीं तो मैं शुरवात में पूछी, कोई प्लान कर रहे हो क्या?

अपस्यु:- इस वक़्त कहां मिलेगा वो?

साची:- वो तो अभी कैंटीन में बैठा होगा और मुझे वहां जाकर सिगरेट जलानी है और उसके मुंह से लगा कर रखना है।

अपस्यु ने पहले अपनी घड़ी देखी, फिर संदेश आने का समय देखा.. लगभग 20 मिनट हो चुके थे संदेश आए… "ठीक है जैसा उसने कहा तुम जा कर वैसा ही करो"

साची:- मगर…

अपस्यु:- भरोसा रखो, सब कुछ तय हो चुका है। बस जैसा मैं कैह रहा हूं, तुम ठीक वैसे ही करो।

साची हामी भड़ती, फिर से फटफटी पर बैठ गई और दोनों कॉलेज पहुंचे। अपस्यु कॉलेज के मुख्य द्वार पर खड़ा हो कर आरव के आने का इंतजार करने लगा, इधर साची डरते-डरते कैंटीन के अंदर पहुंची..

सहमी सी वो धीमे-धीमे आगे बढ़ रही थी और उसे आते देख शशांक और उसके दोस्त जोड़-जोड़ से हसने लगे… "कितनी देर लगा दी जानेमन आते-आते, कब से सिगरेट की तलब लगी थी"

साची बिना कोई प्रतिक्रिया दिए सिगरेट जला कर, शशांक के मुंह के आगे लाकर रख देती है और अपना चेहरा दूसरी ओर घुमा लेती है। शशांक सिगरेट की एक कस खींचते हुए, साची के कमर में हाथ डालकर उसे चेयर के हैंडरेस्ट पर बिठा देता है… "अरे तू भी एक कस खींच ले, मुझे बिल्कुल भी बुरा नहीं लगेगा"..

ऐसा लग रहा था पर्दे पर चल रहा कोई सीन असल जिंदगी में उतर आया हो जहां मनमानी करने की पूरी आज़ादी है पर डर से कोई कुछ बोलता नहीं। घोर प्रताड़ना चल रही थी और इच्छा के विरूद्ध जबरन ऐसे काम को अंजाम दिया जा रहा था जो किसी के भी दिल और दिमाग पर एक गहरी छाप छोड़ जाए।

अपस्यु को पहले तो ये मामला, मात्र कुछ रैगिंग कर रहे लडको का लगा। लेकिन जब साची के साथ हो रहे दुर्व्यवहार को देखा और पिछले एक महीने की बात जब ध्यान में अाई तो बस इतना ही ख्याल आया कि, ये लड़के तो कब का सीमा लांघ चुके हैं।

अभी इनकी हरकतें जारी ही थी कि अब अाई लावणी।…. "साले कुत्ते के बच्चे चल दूर हट मेरी दी से"

पूरा कैंटीन जो मौन बैठा तमाशा देख रहा था .. सब का ध्यान लावणी के ओर केंद्रित हुआ। साची, लावणी का ये रूप देख कर बिल्कुल हैरान हो गई .. और उधर ये असुर प्रवृति के लड़के ने जब लावणी को अपने खिलाफ बोलते पाया… फिर असुर तो असुर ही होते है।
 
Update:-10 (A)

पूरा कैंटीन जो मौन बैठा तमाशा देख रहा था .. सब का ध्यान लावणी के ओर केंद्रित हुआ। साची, लावणी का ये रूप देख कर बिल्कुल हैरान हो गई .. और उधर ये असुर प्रवृति के लड़के ने जब लावणी को अपने खिलाफ बोलते पाया… फिर असुर तो असुर ही होते है।

लावणी का इस तरह से बोलना उन्हें रास ना आया। शशांक लावणी को कुछ अपशब्द कहते हुए गुस्से में अपनी जगह से उठा। उठने के क्रम में साची, जो चेयर के हैंडरेस्ट पर बैठी थी, वो खुद को संभाल ना पाने की स्थिति में नीचे गिर जाति है।

साची को नीचे गिरते देख लावणी अपना आपा खो देती है और सैंडल निकाल कर शशांक के ओर दौड़ लगा देती है… लेकिन शशांक उसका गला पकड़ कर पूरे हाथों कि दूरी बनाए.. "देखो कूतिया को आज भौंक और काट दोनों रही है। लगता है आज ज्यादा ही गर्मी चढ़ी है इसे"।

लावणी:- छोड़, साले छोड़… और उसने क्या सिखाया था… ए आरव किधर है रेय, वर्ड कौन सा था … हां.. साले, हरामि, कुत्ते के पिल्ले, छोड़ मुझे, तुझे अभी बताती हूं। बहुत सह लिया तेरा .. बहुत डर-डर के जी लिया .. आज फैसला होगा..

इतने में चटाक से एक जोरदार तमाचा लावणी के गाल पर। इतना जोड़ का, की थप्पड लावणी को पड़े और दर्द साची तक गया। साची को ना जाने क्या हुआ, वो गुस्से से उठी और शशांक को इतना तेज धक्का दी की वो लड़खड़ा कर नीचे गिर गया। जब तक शशांक के दोस्त साची को संभालते, लावणी शशांक के ऊपर बैठ कर जल्दी-जल्दी पूरे दम से जो चार पांच सैंडल घुमा कर उसके थोपरे पर चिपकाई, उसकी गवाही तो उसका चेहरा ही दे रहा था।

सैंडल का सोल आरा-तिरछा लगने की वजह से उसके चेहरे पर सैंडल के सोल की लंबी-लंबी लाइनिंग छप गई। दिमाग बिल्कुल सन्न रह गया और जबतक उसके दोस्त लावणी को हटाते तबतक तो उसने शशांक का दिमाग ठंडा कर दिया था। ऊपर से उसे हटाने के क्रम में वो "वैय-वैय" करती उसने शशांक के ऊपर ही उल्टियां कर दी। लगभग उसके सिना और चेहरा इस उल्टी के चपेट में अा गया।

इतना सब तमाशा होता रहा लेकिन वहां मौजूद सभी छात्र-छत्राएं तमाशबीन की तरह तमाशा देखते रहे, कई लोग तो वीडियो बनाने का असफल प्रयास भी करते रहे लेकिन कोई बीच-बचाव को नहीं गया।

खैर मामला तूल पकड़ता देख, स्टाफ रूम से एडमिनिस्ट्रेशन टीम निकले, इधर सिक्योरिटी गार्ड जो शशांक की सुरक्षा के लिए तैनात थे, उन्होंने साची और लावणी को पकड़ कर अलग कर वहीं बिठा लिया।

अपस्यु बस इनकी भड़ास पूरी होने तक का इंतजार कर रहा था… जैसे ही उसने लावणी का पूरा एक्शन देखा, उसके तुरंत बाद ही दोनों बहनों को वहां से निकालने की प्रक्रिया शुरू हो गई।

आरव को पहले ही निर्देश मिल चुके थे उसे क्या करना है, इधर अपस्यु सीधा कैंटीन में घुसा और शशांक के सिक्योरिटी गार्ड से भीड़ गया.. बहासा-बहसी होने लगी। वक़्त मज़ा लेने का था तो भीड़ क्यों ना लगे ऊपर से शशांक के सताए कुछ लोग भी पहुंचे जिनमें थोड़ी बहुत हिम्मत अा गई थी।

इधर बहस छिड़ी, भीड़ लगी और उधर आरव ने मौका देख कर दोनों बहनों को वहां से निकाल लिया। हालांकि लावणी को अभी और लड़ना था और वो जाने के लिए तैयार ही नहीं हो रही थी, लेकिन किसी तरह उसे वहां से निकाल लिया गया। वो तीनो कैंटीन के गेट के नीचे आए ही थे कि उतने में ही पूरा एडमिनिस्ट्रेशन स्टाफ पहुंच गया। लावणी को बड़बड़ाते हुए पा कर उन्हें गेट पर ही सब ने रोका.. "क्या हुआ है इसे, और तुम दोनों (आरव और साची) इसे कहां लेे जा रहे हो"।

आरव:- सर पता नहीं कैंटीन में कुछ खा ली, उल्टियां अा रही है। डॉक्टर से दिखाने लेे जा रहे हैं।

तभी स्टाफ में से किसी ने कहा "उधर चलो, मामला फसा तो समझो नौकरी गई".. सभी स्टाफ कैंटीन निकल लिए और इधर आरव दोनों को स्कूटी पर बिठा कर किसी फ्लैट में लेे आया। अभी तीनों वहां पहुंचे ही थे कि पीछे से अपस्यु भी पहुंचा… "कैसी है वो"..

आरव:- पता नहीं, बेसुध है।

तभी साची गुस्से में तमतमाई दोनों भाई के पास पहुंची :- क्या नाटक हैं.. मदद करने के बदले उल्टा हमे ही फसा दिए। और इसके साथ क्या किया तुम्हारे भाई ने?

अपस्यु:- शांत हो जाओ.. तुम जैसा सोच रही हो वैसा कुछ भी नहीं है।

साची:- नहीं होना मुझे शांत …

अपस्यु:- एकदम चुप, और जा कर कोना पकड़ लो।.. फिर आरव से बात करते हुए… "कितना पी थी"..

आरव:- बहुत कैपेसिटी है भाई, गटागट 4 पेग मार ली, ना रोकता ती शायद पूरी बॉटल पी जाती।

साची:- मुझे लगा ही था तुम लोगों ने इसे कुछ नशा करवाया है। हे भगवान..

इसे पहले की आगे और कुछ मेलो ड्रामा होता साची का, अपस्यु उस दोबारा चुप करवाते हुए… "देखो तुम क्या चाहती हो कि तुम और तुम्हारी बहन कल अखबार की सुर्खियों में हो"…. साची ने ना में अपना सिर हिलाया… "हां तो जाओ फ्रिज से नींबू निकालो उसे लावणी के मुंह में निचोड़ते रहो। और प्लीज वहीं रहो, और मुझे करने दो जो मैं कर रहा हूं।

साची:- भड़कते क्यों हो, जा रही हूं.. ये बात आराम से भी कर सकतें थे…

अपस्यु:- 4 बजे तक मैं ना आऊं तो इन लोगों को घर भेज देना और तू भी वहीं चले जाना। और हां साची के साथ जाकर उसके लिए कपड़े लेे अा..

आरव:- कपड़े क्यों ?

अपस्यु:- अरे कपड़े गंदे हो गए हैं उसके। चेंज करवा कर, इसके पहने कपड़े धुलवा देना और जाने से पहले फिर चेंज करवा देना.. समझा।

आरव:- ओह अब समझ में आया.. तू कहां जा रहा है।

अपस्यु:- माहौल का जायजा लेकर जरा ये काम भी निपटा आऊं।

अपस्यु सारी बातें समझा कर वहां से निकल गया इधर बच गए ये तीनों जिसमें से एक तो होश में ही ना थी। लेकिन साची उसके होंठ खोल कर उसके मुंह में नींबू निचोड़ रही थी।

आरव:- चलो, इसके लिए कपड़े लेने है।

साची:- कपड़े क्यों?

आरव:- ये ऐसे उल्टी किए हुए कपड़ों में जाएगी तो घर पर क्या जवाब दोगी।

साची:- बेवकूफ, केवल दारू पीने से ही उल्टी होती है क्या… कैंटीन में खाया और हो गया ये सब.. बस

आरव:- ओह, इस बारे में मेरा भाई सोचा ही नहीं। ठीक है फिर..

लगभग 10 मिनट तक दोनों खामोश रहे फिर साची इस चुप्पी को तोड़ती हुई… "तुम्हारा भाई कहां गया"

आरव:- अपस्यु नाम है उसका..

आरव की बात सुन कर साची हंसती हुई… स्टाइलिस्ट नाम के चक्कर में कैसे-कैसे नाम रख देते हैं।

आरव थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए… कभी हिंदी नहीं पढ़ी क्या.. अपस्यु का अर्थ होता है कुशल, सक्रिय.. और ये नाम उसके ऊपर पूरा सार्थक होता है। वैसे तुम्हे खुद के नाम का अर्थ पता भी है या फिर जिंदगी भर डिक्शनरी से इंगलिश के शब्द के ही अर्थ ढूंढ़ती रही हो और हिंदी शब्द के अर्थ के लिए डिक्शनरी खोलने में शर्म आती है।

आरव की बातों में ऐसा ताना था कि बेचारी साची शांत ही हो गई। दोनों के बीच फिर से 10 मिनट की खामोशी और फिर… "वैसे तुम दोनों में बड़ा कौन है, अपस्यु ही होगा"

आरव:- बड़ा नहीं बहुत बड़ा है। कहने को ही हम सिर्फ जुड़वा है लेकिन वो भाई नहीं मेरा बाप है बाप।

साची:- ऐसा क्यों बोल रहे हो?

आरव:- कुछ दिन साथ रहो पता चल जाएगा। तुम्हे एक बात पता है..

साची:- क्या..

आरव:- वो हैंडपंप है ..

साची:- मतलब?

आरव:- हैंडपंप देखा है, ऊपर की लंबाई कितनी छोटी होती है और नीचे कि गहराई कितना ज्यादा। ठीक वो ऐसा ही है। हमारी उम्र अभी 20 की है लेकिन वो अपने उम्र से 20 साल ज्यादा का तजुर्बेकार है।

साची:- हीहीहीही… वैसे बातें तो तुम भी बहुत समझदारी वाली कर लेते हो।

आरव:- हाहाहाहा.. नहीं जी वो तो उस गधे ने दिन रात सुना-सुना कर रटा दिया है। वो ऊपर के नाम के अर्थ वाला डाइलोग उसने किसी दिन मुझे चिपकाया था आज मैंने तुम पर चिपका दिया।

इसी के साथ दोनों ठहाके मार कर हसने लगे…
 
Upadate:-10(B)

अपस्यु बाहर आते ही सबसे पहले कैफेटेरिया गया वहां एक कप कॉफी पीते-पीते अपना लैपटॉप खोला और उसपर वो कैंटीन वाली वीडियो देखने लगा। उस वीडियो में कुछ कटाई-छटाई के बाद उसने लैपटॉप बंद किया और कॉल मिलाने लगा…

कॉल पिक होते ही:- सिन्हा सर मैं अपस्यु बोल रहा हूं, कहीं व्यस्त तो नहीं थे?

सिन्हा:- हां एक केस में उलझा हूं।

अपस्यु:- मुझे बस एक छोटी सी सहायता चाहिए।

सिन्हा:- जल्दी बोलो।

अपस्यु:- केंद्रीय गृह मंत्री जी से एक मीटिंग फिक्स करवा दीजिए।

सिन्हा:- होम मिनिस्टर जी से तुम्हे क्या काम?

अपस्यु:- आप से होगा कि नहीं वो बताइए?

सिन्हा:- कितना अर्जेंट है..

अपस्यु:- बस यूं समझिए कि 5 मिनट का काम है अगर अभी बोलिएगा तो अभी उनके पास पहुंच जाऊंगा।

सिन्हा:- 10 मिनट दो मुझे। मैं वापस से फोन करता हूं।

तकरीबन 15 मिनट बाद .. "हां सर कहिए"

सिन्हा:- अभी असेम्बली में है, 1 घंटे बाद चले जाना और अपनी आईडी दिखा देना, काम हो जाएगा।

अपस्यु:- आईडी… मज़ाक कर रहे हैं क्या सर, जिनके पास आईडी ना होगा वो क्या मिलेगा नहीं?

सिन्हा:- ओह भूल गया था। माफ़ करना.. ठीक है तुम गेट पर पहुंचकर मुझे कॉल करना काम हो जाएगा। और हां इस बार कीमत लगेगी..

अपस्यु:- बस अनैतिक कोई काम नहीं बताइएगा सर मैं सहायता नहीं कर पाऊंगा।

सिन्हा:- कोई अनैतिक काम नहीं है। सब नीति के तहत ही है..

अपस्यु:- ठीक है आज रात मिलता हूं आप से।

सिन्हा:- नहीं आज रात मत आना। मैं खुद तुम से संपर्क कर लूंगा।

अपस्यु:- ठीक है सर मैं चलता हूं…

"सिन्हा" वहीं वकील थे जिन्होंने आरव को छुड़ाया था। उनसे बात करने के बाद अपस्यु सीधा निकला मंत्री जी के घर। तय समय पर दोनों की मुलाकात भी हो गई..

मंत्री जी:- सिन्हा साहब बता रहे थे तुम्हे कुछ काम था। बताओ

अपस्यु:- सर आप इस देश के बहुत बड़े नेता है आप से मिल पाना मेरे लिए बहुत बड़ी बात है।

मंत्री जी:- अरे ऐसी कोई बात नहीं। हम तो बस सेवा का काम करते हैं।

अपस्यु:- वैसे सर ये कैसा लगेगा सुनने में कि केंद्रीय गृह मंत्री का बेटा एक दिलफेंक आवारा.. जो अपने बाप के पोस्ट का नाजायज फायदा उठा रहा।

मंत्री जी गुस्से से लाल आखें दिखाते हुए… "तू मुझे ब्लैकमेल कर रहा है। जनता भी है मैं कौन हूं"

अपस्यु:- आप के बारे में जानना कितनी बड़ी बात है मंत्री जी, क्या आप मेरे बारे में जानते हैं। होम मिनिस्ट्री.. हां.. मतलब पुलिस से लेे कर सीक्रेट सर्विस सभी एजेंसी को मेरे पीछे लगा सकते हैं.. लेकिन फिर भी मैं बिना डरे आप के सामने खड़ा हूं..

मंत्री जी:- मूर्ख बालक, एक पल के लिए कोई किसी के सामने भी खड़ा हो सकता है। तुझे क्या लगता है तू मेरे घर अा कर मुझे सुना कर चला जाएगा और मैं कुछ नहीं कर सकता।

अपस्यु:- मैंने ऐसा कब कहा मंत्री जी। और हां आप बहुत कुछ कर सकते हैं। लेकिन मैं फिर भी नहीं डरने वाला।

मंत्री जी कुछ देर तक उसकी बात पर सोचने के बाद थोड़ा मुस्कुराते हुए.. "माफ़ करना, क्या करूं राजनीति में रह कर मेरा रोम-रोम उसी भाषा को बोलने लगा है। ठीक है मैंने मान लिया तुम नहीं डरने वाले अब अपने आने का कारण बताओ।

अपस्यु:- मंत्री जी ये देखिए आज सुबह की ये वीडियो है। वैसे आपको मुझे धन्यवाद कहना चाहिए क्योंकि वीडियो जैमर नहीं लगता तो ऐसी वीडियो देश भर में घूम रही होती।

वो वीडियो जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी, मंत्री जी का पारा वैसे-वैसे सातवे आसमान पर.. उन्होंने फौरन अपने पीए से बोलकर शशांक को अभी के अभी सामने खड़ा करने के लिए बोले… कुछ 5 मिनट बाद मुंह पर तौलिया लपेटे वो मंत्री जी के पास पहुंचा…

मंत्री जी:- मुंह पर से कपड़ा हटाओ शशांक..

शशांक:- पापा वो..

मंत्री जी:- कपड़ा हटाओ…

शशांक ने जैसे ही कपड़ा हटाया, उसके मुंह पर बनी रेखाएं और सुजन के निशान अपनी कहानी बयां करने लगे। इतने में अपस्यु मंत्री जी कहने लगा.. "सर आप की आज्ञा हो तो क्या मैं एक बार शशांक से मिल लूं"

मंत्री जी ने इशारे में हां किया और अपस्यु पहुंच गया शशांक के पास.. उसकी आखों में देखा और खींच कर एक तमचा जड़ दिया…. मंत्री जी के घर में किसी ने हाथ उठा दिया.. सभी गार्ड दौड़े अपस्यु के ओर, इधर पहले थप्पड की झनझनाहट दिमाग से गई नहीं थी कि अपस्यु ने दूसरा थप्पड भी लगा दिया। ये थप्पड उस से भी ज्यादा शानदार था और शायद अंदर का जबड़ा तक हिल गया था जिसकी गवाही उसके मुंह से निकलता खून दे रहा था।

इतने वक़्त में तो सभी गार्ड सहित लोगों ने उसे पकड़ लिया.. माहोल कुछ ऐसा था कि जैसे किसी आतंकवादी को पकड़ कर बिठाते है ठीक वैसे ही अपस्यु को बंदूक की नोक पर उसे घुटनों के बल बिठा दिया गया…

मंत्री जी:- छोड़ो इसे, तुम यहां आओ..

अपस्यु उनके पास पहुंच कर जैसे ही उनको धन्यवाद कहा, ठीक उसी वक़्त अपस्यु के गाल पर भी 2 तमाचे परे। लेकिन इन तमचों में वो दम ना था…

मंत्री जी:- तुम बहुत काम के लड़के हो, क्या नाम बताया था अपना।

अपस्यु:- जी अपस्यु, सर

मंत्री जी:- देखो अपस्यु हर मां बाप के लिए उसका बच्चा उसकी जान होती है। ऐसे में इनका थोड़ा बिगाड़ना तो लाजमी है।

अपस्यु:- आप राज धर्म से जुड़े हैं सर और आप कोई गली के नेता नहीं है, ऊपर से अब जनता पहले वाली जानता नहीं रही, ये भी तो समझिए…

मंत्री जी:- हां जानता हूं मै। वैसे अब नेता भी पहले की तरह नहीं रहे .. वरना अभी जो तुमने एक्शन किया है उसका अंजाम जानते हो ना।

अपस्यु:- एक बात कहूं सर बुरा तो नहीं मानोगे..

मंत्री जी:- क्या?

अपस्यु:- आप के बारे में सोच कर ही केवल 2 थप्पड मारा। कोई दूसरा होता तो इस से ज्यादा पीटता। रही बात पहले जैसे नेता अब नहीं रहे तो यदि इसके केस में मुझे सिन्हा सर ने पहले मना कर दिया होता की "मत जाओ मंत्री जी से मिलने, कोई फायदा नहीं" तो मैं इस से बाहर ही निपट लेता और आप पूरी इंटेलिजेंस लगा कर पाता करवाते रहते की किसने किया…

मंत्री जी:- कमाल है मैं एक बच्चे कि इतनी देर से सुन रहा। वैसे सिन्हा ने जितना तुम्हारे बारे में बताया, तुम उससे भी बढ़ कर निकले। कभी मेरी भी सहायता करोगे।

अपस्यु:- स्वागत है सर, आपकी सहायता करना मेरा स्वाभाग्य होगा। वैसे मेरी एक सलाह है.. अपने बेटे को क्यों नहीं कहीं विदेश भेज देते हैं पढ़ने के लिए। यहां तो एमएलए का लड़का विदेश में पढ़ता है और आप तो सेंट्रल मिनिस्टर हैं।

मंत्री जी:- क्या कहूं इसकी मां की जिद के वजह से ये यहां रह गया। तुम बेफिक्र रहो अब ये उस कॉलेज में नहीं जाएगा। मेरे जाने का वक़्त हो गया है बाकी चर्चा फिर कभी करेंगे.. और हां अपना नंबर मेरे पीए को देते जाना।

अपस्यु:- आप के समय देने के लिए धन्यवाद सर। वैसे मैं एक बात बताता चलूं, मुझे आप के बेटे से कोई समस्या नहीं बस गुस्सा उसका आचरण देख कर अा जाता है।

अपस्यु मंत्री जी से मिल कर लौट आया। सारी कहानी सामान्य हो चुकी थी। अपस्यु की फटफटी अपने रफ्तार से सड़क पर दौड़ रही थी, की तभी अचानक पीछे से एक कार ने उसे जोरदार टक्कर मारी और ठीक उसी वक़्त जब अपस्यु हवा में था सामने से रफ्तार में अा रही बस ने उसे ठोका….
 
Update:-11

अपस्यु मंत्री जी से मिल कर लौट आया। सारी कहानी सामान्य हो चुकी थी। अपस्यु की फटफटी अपने रफ्तार से सड़क पर दौड़ रही थी, की तभी अचानक पीछे से एक कार ने उसे जोरदार टक्कर मारी और ठीक उसी वक़्त जब अपस्यु हवा में था सामने से रफ्तार में अा रही बस ने उसे ठोका….

ना जाने कितनी देर तक खून से लथपथ शरीर सड़क पर पड़ी रही। लोग भीड़ लगा कर देखते तो रहे किंतु किसी ने भी उठा कर हॉस्पिटल नहीं पहुंचाया। रक्त बहता रहा सासें धीमी होती रही…

आरव, अपस्यु के कहे अनुसार 4 बजे के बाद वो जगह खाली कर दी। लावणी को भी पूरा होश अा चुका था और वो अपने चेतना में थी। दोनों बहने अपनी स्कूटी से अपने घर निकाल गई और आरव अपने फ्लैट।

रात बीत रही थी पर अपस्यु का कोई पता नहीं था। आरव की चिंता थोड़ी जायज भी थी क्योंकि जो लड़का कभी रात भर बाहर रहा नहीं आज पूरी रात गायब था। लेकिन आरव को ये भी ज्ञात था कि अगर वो बाहर है तो किसी ना किसी काम में जरूर होगा। फिर भी चिंता तो हो ही जाती है।

2 दिन बीतने को आए थे, अपस्यु का कोई पता नहीं। अगले दिन जब दोनों बहने कॉलेज पहुंची तब उनकी समस्या का भी समाधान हो चुका था लेकिन कॉलेज में ना उनको आरव दिखा और ना ही अपस्यु।

साची की नजरें भी अब अपस्यु के बालकनी पर टिकी रहती की कहीं एक बार अपस्यु दिख जाए तो उसे धन्यवाद कहा जा सके लेकिन वो हो तो ना बालकनी में दिखे।

2 दिन बीतने के पश्चात, जब अपस्यु घर नहीं लौटा, तब आरव बहुत ही चिंतित हो गया। फिर उसने अपस्यु का कंप्यूटर खोला, उसमे जीपीएस ट्रैकिंग वेबसाइट खोलकर अपस्यु के लोकेशन को देखने लगा। चिंता और दिल की धड़कने तब और भी ज्यादा बढ़ गई जब उसका लोकेशन किसी हॉस्पिटल का अा रहा था, और पिछले 2 दिनों से वो वहीं एक ही लोकेशन पर था।

आरव हड़बड़ी में अपने फ्लैट से निकला, नुक्कड़ तक पहुंच कर वो टैक्सी के लिए हाथ दिखाने ही वाला था कि उसके पास साची की स्कूटी रुकी। स्कूटी रोक साची ने पहला सवाल वही किया… "आरव तुम लोग कहां गायब हो गए उस दिन के बाद से"।

आरव:- सही वक़्त पर अाई हो, लावणी तुम घर चली जाओ हम जरा हॉस्पिटल हो कर आते हैं।

साची:- हॉस्पिटल.. क्या हो गया? सब ठीक तो है ना।

आरव:- तुम चलो रास्ते में तुम्हे सब बताता हूं।

लावणी स्कूटी से उतर गई और आरव उसपर सवार हो कर चल दिया हॉस्पिटल। रास्ते में उसने साची से सारी बातें साझा कर दी। साची भी थोड़े सकते में अा गई और उसने भी स्कूटी की रफ्तार थोड़ी बढ़ा दी।

कुछ समय पश्चात दोनों एक सरकारी हॉस्पिटल में थे। थोड़ी देर पूछताछ के बाद दोनों को अपस्यु के बारे में पता चला। वो बेसुध हो कर जेनरल वार्ड में परा हुआ था और सिर से लेे कर पाऊं तक पूरी पट्टियां लगी हुई थी।

उस क्षण आरव के ह्रदय में उठ रही पिरा को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। पास ही एक कंधा था और उसी कंधे पर सिर रख कर आरव अपने भाई को देखता रहा और आशुओं के धार बहाता रहा।

साची, ने उसे कई बार कहा भी, "आरव तुरंत अपने मम्मी पापा को खबर करो".. लेकिन आरव के आखों से बस आशुं निकलते रहे। सिसकती जुबान से आखिर में बस इतना निकला… "मेरे लिए मेरा भाई है और उसके लिए मैं। किसे पुकारू, किसे बुलाऊं"..

बहुत ही मार्मिक स्थिति थी। यूं तो सांची जाना नहीं चाहती थी लेकिन शाम हो रही थी और घर से भी बार-बार फोन अा रहा था, इसलिए ना चाहते हुए भी साची को वहां से जाना परा।

तकरीबन रात के 8.३० बजे वो खाना लेेकर पुनः वापस आयी। आरव वहीं अपस्यु के खटिए के नीचे उसका एक पाया पकड़ कर ना जाने कहां खोया था। साची उसे चेतना में वापस लाती हुई… "खाना खा लो"

साची को देखते ही एक बार फिर उसके आंसू निकाल आए। मानो जैसे किसी अपने को देख कर भावनाए जाग जाती हो। साची उसे किसी तरह चुप करा कर, अपस्यु का चेहरा दिखा कर हौसला देती… "अगर तुम हिम्मत हार गए फिर उसकी देखभाल कौन करेगा"… इन्हीं सब तरह की बातें सुनाकर उसे चुप करवाई और खाने के लिए भेज दी।

भाई की ऐसी हालत देख कर निवाला गले से कहां उतरे। फिर भी कुछ निवाला खाकर उसने टिफिन साची को दिया और साची उस टिफिन को लेेकर वहां से चली गई।

अगली सुबह जब डॉक्टर राउंड में आए तब आरव को देख कर गुस्से से कहने लगे… "इसकी इतनी हालत खराब है और तुम लोग कहां सो रहे थे 4 दिनों से"..

आरव:- सर मेरे भाई को क्या हुआ है वो ठीक तो हो जाएगा ना?

डॉक्टर उस पर चिल्लाते हुए…. "पहले तुम ठीक से खड़े राहो"

आरव:- सर मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा है। प्लीज़ आप बताइए ना।

डॉक्टर:- देखो बेटा, तुम्हारे ऐसे पैनिक होने से तो तुम्हारा भाई ठीक नहीं होगा। अब हिम्मत रखो और इसकी सेवा करो।

आरव:- जी सर मै खूब सेवा करूंगा। इसे एक काम नहीं करने दूंगा। लेकिन मेरा भाई कुछ बोल क्यों नहीं रहा… अपस्यु… अपस्यु.. कुछ तो बोल भाई। मार लेे मुझे, डांट ही सही पर कुछ तो बोल।

आरव जेनरल वार्ड में डॉक्टर के सामने खड़े हो कर चिल्ला रहा था। तुरंत ही हस्पताल प्रशासन वहां पहुंच गई। लेकिन डॉक्टर के कहने पर किसी ने कुछ नहीं किया और सब वापस चले गए। डॉक्टर ने एक वार्ड बॉय को बुला कर आरव को उसके केबिन में लेे जाने के लिए बोले और फिर राउंड पर निकाल गए।

तकरीबन 1 घंटे बाद डॉक्टर साहब अपने केबिन में पहुंचे और आरव को बताने लगे… "देखो तुम्हारे भाई का सीरियस ऐक्सिडेंट हुआ था। कई जगह चोटें अाई हैं और कई हड्डियां टूट चुकी है। तुम्हारे ऐसे भावुक होने से या चिल्लाने से वो ठीक तो होगा नहीं। मेरी सलाह है की तुम धर्या बनाए रखो। समय के साथ वो धीरे-धीरे ठीक हो जाएगा। समझे"

आरव:- माफी चाहूंगा सर बताया ना इस वक़्त मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा है।

डॉक्टर:- होता है, तुम्हारी जगह मै भी होता तो शायद मेरा भी यही हाल होता। लेकिन बेटा ये बताओ तुम्हारे अभिभावक कहां है?

आरव:- सर अब उसका इकलौता रिश्तेदार मैं ही हूं।

डॉक्टर:- ओह माफ़ करना मुझे। ठीक है तुम जाओ, मैं तुमसे अा कर मिलता रहूंगा। लेकिन कोई शोर मत करना वरना तुम्हे हस्पताल से निकाल दिया जाएगा। फिर तुम अपने भाई की सेवा नहीं कर पाओगे।

डॉक्टर से बात करके आरव को थोड़ी तसल्ली मिली और वो शांत मन से वहां से निकल कर सीधा अपने भाई के पास पहुंचा। जब वो अपस्यु के पहुंचा तब उसकी आंखें खुली हुई थी और नजरें इधर से उधर हो रही थीं।

अपस्यु को देख कर तो मानो आरव के चेहरे पर खुशी छा गई हो, वो अपस्यु के सर के पास बैठ कर उसके माथे को सहलाते हुए… "जल्दी उठ जा भाई, तेरे बिना पागल हो रहा हूं मैं"।

अपस्यु, ने इशारों से नजदीक आने के लिए कहा, फिर किसी तरह अपनी आवाज़ निकलते.. "कान इधर ला".. आरव अपना काम अपस्यु के मुंह के पास लेे गया.. "आज रात मुझे अपने फ्लैट पर पहुंचना है, मैं नहीं जानता तू क्या करेगा, कैसे करेगा, लेकिन तुझे ये करना है"…

आरव आश्चर्य से उसे देखते हुए… "आज ही तो तू होश में आया है ऊपर से ऐसी बातें कर रहा"।

अपस्यु:- मुझे तू बुलबाएगा ही। अरे होश तो उसी दिन आया था, बस शरीर में जान नहीं था। तब तू नहीं था ना इसलिए शायद। अब जैसा कह रहा हूं वैसा कर और हां किसी वार्ड बॉय को कुछ पैसे दे कर मेरी पूरी रिपोर्ट लेे लेना।

अपस्यु की बात आरव के समझ से परे थी। लेकिन अब भाई ने कहा था तो करना ही था। सब से पहले उसने 2 वार्ड बॉय को पकड़ा और दोनों को ₹10000 रुपया पहले पकड़ाया। रुपया देख कर ही वो खुश हो गए। फिर आरव ने उसे पूरी बात समझाई। उन दोनों को क्या मतलब था कि कोई कहां जा रहा। उन्होंने कितने आदमी और लगेंगे और एम्बुलेंस से लेकर फ्लैट के अंदर तक के पहुंचने का सारा गणित लगा कर ₹20000 और मांग लिए। आरव उन लोगों को ₹30000 थामते हुए बोलने लगा… "तुम्हारी पूरी पेमेंट हो गई। साथ में एक्स्ट्रा भी दिया, आज रात काम हो जाना चाहिए"

इधर वो वार्ड बॉय के साथ अपनी मुलाकात खत्म करके अा ही रहा था कि हस्पताल के बाहर साची मिल गई। साची ने सबसे पहले तो आरव को ऊपर से नीचे तक देखी और उसे देखकर यही कही… "लगता है अपस्यु को होश अा गया है"। आरव ने खुशी का इजहार करते हां में जवाब दिया फिर साची उसके हाथ में परी रिपोर्ट के बारे में पूछने लगी।

आरव ने प्रतिउत्तर में बताया कि उसके हाथ में अपस्यु की रिपोर्ट है। यूं तो मेडिकल रिपोर्ट पढ़ लेना कोई आम बात नहीं होती, गूगल भी करो तो भी ठीक से पता नहीं चल पाता कि क्या लिखा है। हां लेकिन आजकल सीधे-सीधे लाइन में 2-4 बातें लिख दी जाती है जिसे पढ़ कर कोई भी समझ सकता है। और साची उसी को देख रही थी। जब अपस्यु के शरीर के क्षति के बारे में उसने रिपोर्ट में पढ़ी तो उसके होश ही उड़ गए। कई हड्डियां टूटी, कई पसलियां टूटी.. और बाकी अंदर की तो रिपोर्ट समझ में ही नहीं अाई।

साची:- इसका तो बहुत बड़ा एक्सिडेंट हुआ है। काफी दर्द और तकलीफ में होगा।

आरव:- हां इसलिए तो उसे आज यहां से शिफ्ट करवा रहें हैं। यहां उतनी फैसिलिटी नहीं है ना।

साची:- हां ये सही किया, वैसे कहां लेे कर जा रहे हो।

आरव:- वेदांता में लेकर जा रहे है। वहां तो अनलोगों ने बस इतना ही कहा कि मरीज को छोड़ जाना बाकी किसी कि जरूरत नहीं।

साची:- हां अच्छा हॉस्पिटल है। अच्छा निर्णय लिया। अब बस अपस्यु जल्दी से ठीक हो जाए।

साची वहां से चली गई और आरव बकिं सारी तैयारियां करने लगा। शाम के 7 बजे वार्ड बॉय ने अपना काम कर दिया। उन्होंने अपस्यु को चुपके से निकालकर एम्बुलेंस में लोड करवा दिया। थोड़ी ही देर में अपस्यु अपने फ्लैट में था। आरव उसके लिए पहले से सब व्यवस्था कर रखा था। एक फोल्डिंग आरामदायक बेड जो हॉस्पिटल में लगा होता है और उसके साथ सारे जरूरी उपकरण, जैसे ऑक्सीजन सिलेंडर, हार्ट रेट चेक करने की डिजीटल मशीन। ऐसा लग रहा था जैसे हॉस्पिटल का छोटा सा सेटअप लगा रखा हो।

अपस्यु को जब उस पर लिटाया जा रहा था, तब सारा सेटअप देख कर अपस्यु मुस्कुरा दिया। उसने आरव को अपने पास बुलाया और उसे "थैंक यू" कह दिया। आरव ने हंस कर उसके थैंक यू का टेढ़ा जवाब दिया और वहां से जाने लगा। लेकिन अपस्यु ने उसे रोककर कुछ बातें समझाई और अपस्यु के कहे अनुसार वो करते हुए पूछने लगा… "तेरा ऐक्सिडेंट कैसे हुआ और ये समझ से परे है कि तू यहां अाकर, साबित क्या करना चाहता है"

"आरव, हम तो यहां आराम से काम करने आए थे लेकिन कुछ लोग जरा जल्दी में है जिन्हे हमारा आराम से काम करना अच्छा नहीं लग रहा। और ये ऐक्सिडेंट उनकी जल्दबाजी का नतीजा है। गलती मेरी है जो मैं थोड़ा लापरवाह हो गया। लेकिन कोई नहीं, उन्होंने अधूरी कोशिश की और मैं उन्हें दोबारा कोशिश करने का मौका नहीं दूंगा"
 
Update:-12(A)

शाम 5 बजे … साची का घर…

साची अपने ही ख्यालों में खोई अपनी खिड़की से अपस्यु के बालकनी में देख रही थी। लावणी कुछ पुस्तक अपने हाथ में लिए साची के कमरे का दरवाजा खोलती है और उसके पास जा कर बैठ जाती हैं। लावणी बिना कुछ बोले केवल साची को ही देख रही थी। कुछ समय पश्चात उसने जोर से आवाज किया जिससे साची का ध्यान भंग हो गया और लावणी के ओर देखकर उसने फीकी मुस्कान दी।

लावणी:- ठीक हो जाएगा वो, क्यों इतनी चिंता कर रही हो दी।

साची:- हम्म्..

लावणी:- क्या हुआ किन ख्यालों में डूबी हो, कहीं कुछ चल तो नहीं रहा ना आपके दिल में अपस्यु के लिए..

दोनों की बातचीत अभी शुरू भी नहीं हुई थी कि पीछे से देवरानी और जेठानी की अद्भुत जोड़ी कमरे में प्रवेश की। यानी कि साची की मां अनुपमा और लावणी की मां सुलेखा। दोनों अंदर आते ही पूछने लगी… "क्या बातें हो रही है दोनों बहनों में"

लावणी:- राखी अा रहा है लेकिन हमारे भाई नहीं अा रहे। बस यही बात हो रही थी।

इसपर सुलेखा तुरंत ही अपनी प्रतिक्रिया देती हुई.. "वो विदेश में पढ़ता है, एक तेरे राखी के लिए घर आएगा क्या? उसे वहां पढ़ने दे और खबरदार जो उसे कॉल भी किया तो।

अनुपमा:- इसमें इतना चिल्लाने की क्या जरूरत है सुलेखा, वो तो बस अपनी इच्छा बता रही थी।

सुलेखा:- कहां चिल्ला रही हूं दीदी मैं तो केवल कह रही हूं। अब क्या कुछ कह भी नहीं सकती।

अनुपमा:- हां बिल्कुल कह सकती हो, वैसे दोनों बच्चों को देखने का मन तो मुझे भी कर रहा था। सोच रही हूं एक बार पूरा परिवार चलते मिलने।

सुलेखा:- नहीं-नहीं दीदी, अभी उनको परेशान नहीं कर सकते। जानती नहीं कितना पढ़ना परता है। हमारे जाने से उनकी पढ़ाई पर असर पड़ेगा।

फिर क्या था, एक बार जब सुलेखा शुरू हुई फिर मजाल है किसी की कोई कुछ बोल दे। कोई एक प्वाइंट कहता सुलेखा उसपर 4 बातें समझाती। जबतक उसे कोई काम याद ना आया तब तक वो किसी को बोलने ही नहीं दी, और उसके जाते ही…

अनुपमा:- ये क्या चल रहा है आज कल?

साची:- मैं समझी नहीं मां।

अनुपमा:- वहीं तुम दोनों का, कुछ दिन पहले निकली तो तुम दोनों कॉलेज साथ लेकिन रास्ते में दोनों.. मुझे नहीं लगता कि इस से ज्यादा कुछ कहने कि जरूरत है।

लावणी:- आप ने हमे देख लिया बड़ी मां। सुनिए ना बड़ी मां, पापा को कुछ नहीं कहिएगा, प्लीज…

साची उसे बीच में ही रोकती, अनुपमा से सारी कहानी बताना शुरू कर दी। हालांकि उतना ही बताया जितना बताने लायक था, लेकिन शशांक की हर एक हरकतें पूरी विस्तार से बता दी। अनुपमा पूरी बात सुनने के बाद…

"कभी कभी हम जल्दबाजी में सही को भी गलत समझ लेते है। जैसा तुमने बताया उस हिसाब से तो दोनों भाई, नहि एक भाई तो दिल और जुबान दोनों से अच्छा है। दूसरा जुबान से थोड़ा टेढ़ा है पर दिल का वो भी भला है। वैसे मैं एक बात बता दू, तुम्हारे पापा और चाचा भी किसी से कम ना है। किसी मामले को कैसे हवा देकर झगड़े तक पहुंचना है ये उनको अच्छे से आता है। 10-12 साल पहले तेरे मामा और तेरे पापा के बीच, छोटी सी बात को लेकर बहस हुई थी, और आज तक बातचीत बंद है। कोई नहीं जब वो ठीक हो जाए तो उन दोनों भाई को मेरी ओर से भी धन्यवाद कह देना लेकिन खबरदार जो कभी बाइक कर पीछे बैठी तो"

साची:- मां रह-रह कर बस यही ख्याल आता है कि उनके साथ तो कोई भी नहीं। दोनों भाई कैसे उबरेंगे इस परिस्थिति से?

अनुपमा:- इतने दिनों से तो वो खुद से ही, हालात से लड़ते आए हैं ना। आगे भी लड़ते रहेंगे .. तू चिंता मत कर। जब कई लोग होते हैं तो एक दूसरे का सहारा होता है और जब कोई नहीं होता तो खुद का ही सहारा होता है, इसलिए उन्हें उनके हाल पर छोड़ दे।

कुछ समय तक बातें चलती रही फिर सब वहां से चले गए। लेकिन साची को रह-रह कर अपस्यु का ख्याल आता रहा। लगभग शाम के 8.30 बज रहे होंगे जब साची को अपार्टमेंट के गेट पर एक एम्बुलेंस खड़ी दिखाई दी और आरव नीचे उतर कर गार्ड से कुछ बात कर रहा था, बाद में एम्बुलेंस अंदर चली गई। साची को पक्का यकीन हो गया कि अपस्यु को वेदांता नहीं बल्कि यहां फ्लैट पर लेकर चला आया आरव।

इधर रात के वक्त… उस मेडिकल वाले बेड पर लेटने के बाद..

"आरव, हम तो यहां आराम से काम करने आए थे लेकिन कुछ लोग जरा जल्दी में है जिन्हे हमारा आराम से काम करना अच्छा नहीं लग रहा। और ये ऐक्सिडेंट उनकी जल्दबाजी का नतीजा है। गलती मेरी है जो मैं थोड़ा लापरवाह हो गया। लेकिन कोई नहीं, उन्होंने अधूरी कोशिश की और मैं उन्हें दोबारा कोशिश करने का मौका नहीं दूंगा"…..

आरव:- चल रे टूटे, अभी तो 1 साल के लिए तू बुक हो गया। वैसे कहीं रॉड भी लगा है या कच्चा-पक्का पलस्टर से काम चल रहा है।

अपस्यु:- तू हंसा मत। मुझे नहीं पता अंदर क्या-क्या लगा है। जा कर काम कर जो मैंने अभी तुझे बताया।

आरव:- दोनो जार से स्लाइन आईवी सेट पाइप कनेक्ट कर दिए।आगे भी बताएगा,।

अपस्यु मेडिकली कुछ कर रहा था अपने शरीर में। कोई 2 बड़ी जार थी जिसमे आईवी सेट पाइप कनेक्ट कर पहले तो उसने अपने हाथ की नसों में इंत्रवेनस लगवाया, फिर आरव को अपने कंप्यूटर पर एक बॉडी स्कैन प्रोग्राम रन करने के लिए कहा। अपस्यु क्या करना चाह रहा था वो आरव को समझ में नहीं अा रहा था लेकिन जैसे-जैसे वो बोलता गया, वैसे-वैसे आरव करता गया।

अपस्यु अपने बेहोश होने से पहले आरव को समझा चुका था कि आगे वो बेहोश होने वाला है और बेहोशी के दौरान उसका शरीर बहुत कुछ प्रतिक्रिया देगा इसलिए घबराना नहीं अपितु यदि उस रन प्रोग्राम में नीचे हार्ट लाइनिंग जीग-जग के बदले पैरेलल हो जाए, तो आइसबॉक्स में रखा इंचेक्शन उसके सीने में इंज्जेक्ट कर देना।

इसपर आरव चिढ़कर पूछता भी है कि वो इंजेक्शन कैसे लगा सकता है। इसपर अपस्यु ने बस इतना ही कहा, चाकू की तरह पकड़ना और सीधा सीने में घोप कर लगा देने वो भी बाएं ओर कहीं भी। सभी प्रक्रिया शुरू हो गई और जैसे-जैसे नसों में द्रव्य उतरता गया अपस्यु की आखें बंद होती चली गई। अचेत अवस्था में कुछ धुंधली सी ओझल तस्वीर बनने लगी..

दो भाईयों के खिलखिलाती हसी, जिसे गोद में लेकर माता-पिता प्यार कर रहे थे। बड़े से हवाई जहाज से उतारना…. दूर किसी ठंडे इलाके में एक आश्रम तक का सफर… चंद बातें …

"गुरु जी ये है हमारे दोनों जुड़वा बेटे"…. "एक को मेरे पास रहने दो" … माता-पिता के छोड़ कर जाना। वो अपनी मां के हाथ को जकड़ कर पकड़ना और फिर धीरे-धीरे मां के हाथ से उसका हाथ छूटना, और रोते हुए उन्हें अपने आखों से तबतक जाते हुए देखना जब वो नजरों से ओझल ना हो गए। कड़कती ठंड का एहसास और उस ठंडी में भी शरीर पर केवल जरूरत के कपड़े…

बड़ा सा गुरुकुल जिसकी पुश की छत, जो कड़कती ठंड में मजबुर कर दे। गुरु जी की वो मधुर आवाज़… "अपस्यु… अपस्यु"… और वो मासूम सा चेहरा बनाए… "गुरु जी क्या मैं अपने माता पिता से नहीं मिल सकता"…
 
Update:-12(B)

"सहपाठियों के साथ वो आचरण की शिक्षा और वेदों का पाठ"… फिर एक मासूम सा सवाल "गुरु जी क्या हम उन्हीं विषयों को पढ़ सकते है जिन्हे आपने निर्धारित किए है"…. "नहीं अपस्यु, तुम अपने विवेक और मनन से किसी भी विषय को पढ़ने के लिए स्वतंत्र हो केवल उन विषयों की रुचि तुम्हे होनी चाहिए"…

आरव अपने भाई का हाथ थामे उसके शरीर में हो रहे हलचल को देख रहा था.. एक नजर कंप्यूटर पर, तो दूसरी नजर अपस्यु पर थी। हार्ट रेट काफी बढ़ी हुई थी और शरीर में लगातार प्रतिक्रिया चल रही थी। आधे घंटे तक यही सब चलता रहा फिर अपस्यु के कहे अनुसार आरव ने आईवी सेट नसो से निकाल दिया। शरीर में झटका जैसे लगा हो और फिर धीरे-धीरे श्वास समन्य होती चली गई। कुछ देर आरव उसी के पास ठहर मुआयना करता रहा और जब उसे सब कुछ सामान्य लगा तब कहीं जा कर वो सो गया।

रात के 2 बज रहे होंगे "नहीं" की एक चिंख गूंजी और अपस्यु उठ कर बैठ गया। शरीर में काफी दर्द और अकड़न भी मेहसूस हो रहा था। आरव को वो तेज-तेज आवाज लगा कर उठाने लगा, लेकिन शायद वो गहरी नींद में सो गया था इसलिए जाग ना पाया।

चेहरे पर पानी गिरने के कारण आरव हड़बड़ा कर नींद से जगा और उठ कर बैठ गया। कुछ समय बाद जब आखों के सामने तस्वीरें साफ हुई और सामने अपस्यु को देखा तो "ओ तेरी" करता हड़बड़ा कर वो बिस्तर से नीचे गिर गया।

आरव:- अबे ये क्या बवासीर है.. तू उठ कर खड़ा कैसे हो गया। तू मर-मुरा कर भूत तो ना बन गया।

अपस्यु:- नींद में है क्या बे या मेरे सोने के बाद पी लिया था जो ये उल्टी सीधी बातें कर रहा है। और ये बवासीर क्या है। पट्टी ना बंधी होती तो अभी कुटाई कर देता।

आरव:- कोई तंत्र विद्या सीख लिया क्या वहां गुरु जी के पास। साला इतना जल्दी तो फिल्मों में भी किसी टूटे को खड़ा नहीं कर देते जितनी जल्दी तू खड़ा हो गया।

अपस्यु, कर्रहते हुए जाकर पुनः उसी बिस्तर पर टेक लगा कर बैठ गया.. इसे विज्ञान कहते हैं मेरे भाई। कोई तंत्र विद्या या जादू नहीं है।

आरव:- अच्छा सुन आसान सी भाषा में मुझे समझा कि ये सब संभव कैसे हुआ। हां लेकिन कोई ज्ञान मत पेल देना।

अपस्यु:- तू और तेरी भाषा.. सुन जब मैं पढ़ाई के छठे वर्ष में था मेरी रुचि मानव शरीर और उसकी संरचना में अत्यधिक थी।

आरव:- इतिहास छोड़ सीधा बता ना ये कैसे संभव हुआ..

अपस्यु:- देख हमरा शरीर कोशिकाओं से बना है। कई कोशिकाएं मिल कर कर ऊतक बनाते है यानी कि टिश्यू और कई टिश्यू मिल कर…

आरव:- समझ गया ऐसे ही एक के बाद एक चेन चलेगा और बॉडी बन जाएगी।

अपस्यु:- उतावला बस होता रह। पूरी बात मत सुनना। सुन शारीरिक संरचना में कोसिका की अहम भूमिका है और तूने जो मुझे इंजेक्ट किया वो सेल बॉडी सब्सटेंस यानी कि कोशिका जिस चीज से बनेगी उसका द्रव्य था। अब मेरी बॉडी स्कैन होती गई और ये कोशिकाएं जा कर क्षति हुई कोशिकाओं पर जुड़ने लगी जिसके परिणामस्वरूप बहुत सी कोशिकाएं ठीक हो गई।

आरव:- कच्चा पक्का ज्ञान मिला, पर कुछ-कुछ समझ में आ गया। मतलब ठीक हो गया ना।

अपस्यु:- नहीं पूरे तरीके से नहीं ठीक हो पाया हूं किंतु ठीक हूं। हड्डियां जुड़ने में वक़्त लगेगा।

आरव:- हड्डियां नहीं जुड़ी तो खड़ा कैसे हुआ तू।

अपस्यु:- अबे ये प्लास्टर का सहारा था ना, किसी तरह से खड़ा हो गया। हां लेकिन जितना भी कैल्शियम डिपोजिट हुए होगा वो फ्री हो गए होंगे तो ये एक समस्या हो सकती है कि जुड़ने में थोड़ा और वक़्त लग जाए।

आरव:- तू तो जीनियस निकला। वैसे इतनी बात बता ही दिया है तो उस इंजेक्शन कि भी कहानी बता ही दे, जो आईसबॉक्स में रखी है।

अपस्यु:- वो.. वो तो एल्केलायड है। एक तरह का एड्रेनेलिन इंजेक्शन। इमरजेंसी की स्तिथि में इसे लगा दो काम कर गई तो मारता हुआ भी वापस अा जाएगा, वरना मारा हुआ तो वैसे भी हैं।

आरव:- यार मैं तेरी तरह क्यों नहीं। तू तो हर चीज का मास्टर है।

अपस्यु:- ऐसा नहीं है मेरे भाई। तू ऐसा क्यों सोचता है। तू अपने अंदर की प्रतिभा को नहीं देख पा रहा है इसलिए, वरना तू भी किसी से कम नहीं।

आरव:- चल जाने दे इसे, कभी फुर्सत में तू मेरी प्रतिभाओं के बारे में बताना। अभी करना क्या है? क्योंकि देख जब तेरे ऊपर हमला हो गया इसका मतलब है कि हमारे बारे में सब को खबर लग गई होगी। तो क्या अब यहीं रह कर सब को एक साथ देखना है या फिर चले यहां से।

अपस्यु:- देख, एक साथ सबका सामना तो हम कर नहीं सकते, ये बात सत्य है। इनकी इतनी बड़ी हस्ती है कि कहां-कहां से ये कितने लोगों को खड़ा कर देंगे वो हमे भी नहीं पता। इसलिए ये ख्याल दिल से निकाल दे की हम एक साथ सबका सामना कर सकते हैं। और यहां से जा भी नहीं सकते क्योंकि दिल्ली छोड़ने का मतलब है कि फिर हमे सबकुछ भूलना होगा।

आरव:- तो हम करेंगे क्या?

अपस्यु:- कुछ धमाल करते हैं। तू तैयार है क्या?

आरव:- क्या बात कर रहा है.. क्या सच में ..

अपस्यु:- हां सही सुना, तैयार है क्या.. लेकिन याद रहे करना 2-4 दिन के अंदर में ही है, और वहां मैं नहीं रहूंगा।

आरव:- तू नहीं बस तेरा बैकअप चाहिए। बोल प्लान क्या है?

अपस्यु:- "सुन, जहां तक मुझे लगता है मेरे ऐक्सिडेंट के पीछे भूषण अग्रवाल और जमील का हाथ है क्योंकि जिसने भी मेरा ऐक्सिडेंट करवाया है उसका मकसद मारना नहीं था। वो तो बस मुझे ये दिखा रहा था कि वो मुझे मार भी सकता है। वरना वहां पर उनके पास पूरा मौका था"।

" ऐसी सूरत में त्रिवेणी शंकर तो ये करवा ही नहीं सकता क्योंकि वो तो जनता ही नहीं की उसके साथ कांड किसने किया। वो तो अभी पाता ही लगा रहा होगा और यदि उसे पता चल गया होता की ये सब मैंने करवाया है तो वो जान से मारने का प्रयास करता ना कि अधमरा छोड़ कर ये दिखाने का, की वो मार भी सकते हैं। अब केवल और केवल बचता है भूषण और जमील, और जबतक उनके पैसे अटके है वो हर संभव कोशिश करेगा अपने पैसे निकलवाने कि। उन्हीं दोनों को मेरे बारे में पता चला होगा।

आरव:- तो पहला टारगेट कौन फिक्स हुआ, जमील या भूषण।

अपस्यु:- पहला टारगेट होगा त्रिवेणी, मैं नहीं चाहता कि हमारा राज खुले और इन्हे पता चले कि हमारा टारगेट हर वो कामीना है जो उसके साथ धंधा करता है। चूंकि हमारी मनसा अभी किसी को पाता नहीं है तो अपने-अपने धंधे में मस्त है कौन मारा किसे परवाह। ऐसे धंधों में तो ये आम बात है। भेद खुल गया तो ये सब ग्रुप बना लेंगे, फिर सब मिलकर हमे टारगेट करेंगे और साथ में उसे भी खबर लग जाएगी। इसलिए पहला काम उनको खत्म करना, जो हमे तलाश रहे हैं।

आरव:- लेकिन अभी हमारे बारे में तो उस भूषण और जमाल को पता है, तो टारगेट त्रिवेणी क्यों।

अपस्यु:- प्लान ये है कि मैं सरा पैसा त्रिवेणी के अकाउंट में ट्रांसफर करूंगा। तू जमाल और भूषण से मिल कर ये कहेगा की हमे बस हायर किया गया था सरा पैसा त्रिवेणी के पास है।

आरव:- नहीं इस प्लान में बहुत कमी है, तू समझा नहीं। दोनों एक ही धंधे में है और एक दूसरे को जानते नहीं। अगर तू पैसा ट्रांसफर भी करेगा तो ये सीधा जा कर गोलीबारी नहीं करने वाले। एक ही टेबल पर बैठ कर बातचीत कर लेंगे। उस से भी ना होगा तो इनका बाप बीच में कूद आएगा। क्योंकि उसके 2 लोग एक दूसरे से लड़ रहे है तो वो मध्यस्ता में आएगा ही। एक बार वो चला आया तो फिर उन दोनों के बीच लड़ाई ना होने देगा। प्लान बहुत कमजोर है और हम एक्सपोज भी हो जाएंगे।

अपस्यु:- तो तू करना क्या चाहता है?

आरव:- मुझे तू बैकअप देता जा। टारगेट मुझे मिल गया है, एलिमिनेटर कैसे करना है वो मैं समझ लूंगा।

अपस्यु:- ठीक है लेकिन याद रहे किसी भी सूरत में कोई कड़ी मत छोड़ना। क्योंकि उसके 3 डीलर मारे जाएंगे तो वो कारण का पता जरूर लगाएगा।

आरव:- तू बस देखता जा, ये मैं कैसे करता हूं।
 
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