Incest कैसे कैसे परिवार - Page 3 - SexBaba
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Incest कैसे कैसे परिवार

अध्याय ११: दूसरा घर - सुनीति और आशीष राणा २


जीवन का गाँव

दो दिन बाद:

जीवन को आए हुए दो दिन हो चुके थे. अपने मित्र और सम्बन्धी बलवंत के घर पर उनके चार मित्रगण जमा थे. वो जब भी आते थे तो नगर से मंहगी शराब की दो पेटियाँ साथ लाते थे. उनके मित्र भी इस समय की बहुत उत्सुकता से प्रतीक्षा करते थे. शराब के लिए नहीं, बल्कि उनके साथ के लिए. सब मित्र अहाते में बैठे बातें कर रहे थे. बलवंत की पत्नी गीता उन्हें खाने का सामान परोस रही थी. अंदर अन्य मित्रों की पत्नियाँ भोजन बनाने में जुटी थीं. बचपन के साथी थे और उन सबकी पत्नियां भी एक दूसरे की अंतरंग सहेलियाँ थीं. जीवन की पत्नी की मृत्यु का शोक सबको समान रूप से ही लगा था.

“भाई साहब, आपका समय कैसे काट पाता है हम सब के बिना. सच कहें तो आपकी बहुत याद आती है.” गीता ने जीवन की प्लेट में मुर्गे के पकवान परोसते हुए पूछा.

“सच भाभी, मन नहीं लगता. तभी तो चला आता हूँ. अब सोचता हूँ कि छह महीने में नहीं हर तीन महीने में आ जाया करूँ। और आप दोनों भी आया करो तो मन लगा रहेगा.”

“मैनें तो इन्हे कई बार कहा कि चलते हैं, सुनीति की हमें भी बहुत याद आती है.”

कुछ देर बाद सभी मित्र अपने घर चले गए. बलवंत और जीवन वहीँ बैठे रहे. फिर गीता भी आ गई.

बलवंत: “तुम लोगी?”

गीता के हाँ कहने पर बलवंत ने उसके लिए भी एक पेग बनाया और उसमे थोड़ा कोका कोला मिला दिया कि अगर कोई देखे तो पता न लगे कि गीता क्या पी रही है.

गीता: “आप सुनीति को क्यों नहीं लेकर आते?”

जीवन: “उसने काम बहुत फैला लिया है. अब आना कठिन है. उसने ये कहा है कि मैं आप दोनों को साथ ले कर लौटूँ। मैं भी यही चाहता हूँ.”

बलवंत: “खेती कौन संभालेगा?”

जीवन: “मेरा जो मैनेजर मेरे खेत देखता है, वहीँ देखेगा. उसे हम इसके लिए दोगुने पैसे देंगे. और मैं नहीं समझता की वो मना करेगा. फिर एक महीने बाद जैसा समझो वैसा ही करना.”

बलवंत: “इस बारे में विचार किया जा सकता है. क्यों गीता.?”

गीता: “आप जो निर्णय लें, मुझे स्वीकार है.”

बलवंत: “इस बार तुम सलोनी को भी लेकर आये हो?”

जीवन: “हाँ, तुम तो जानते हो कि मेरा एक दिन भी चुदाई के बिना रहना कितना मुश्किल है. अब पिछली बार भाभी की तबियत ठीक नहीं थी, तो सोचा कि इस बार अपने प्रबंध के साथ आऊं.”

गीता: “पूछ तो लेते एक बार, अब मैं पूरी ठीक हूँ.”

जीवन: “ठीक है, तो बलवंत का स्वाद बदल जायेगा.”

गीता: “इनकी इतनी चिंता न करें भाई साहब. इनके स्वाद बदलने वाली तीन तो अभी ही अपने घरों को गई है.”

बलवंत हँसते हुए: “बोल तो ऐसे रही है जैसे मुझे ही सब मजे मिलते है. तू भी उन तीनों के पतियों के साथ मजा लेती है.”

जीवन ठहाका लगते हुए: “एक दूसरे की पोल न खोलो, चलो अंदर चलें यहाँ किसी ने सुन लिया तो बेकार बदनामी होगी.”

गीता ने सलोनी को बुलाया और दोनों शेष वस्तुएं अंदर ले गयीं. बलवंत और जीवन बैठक में सोफे हुए थे. गीता जाकर साथ बैठ गई. जीवन ने सलोनी को भी बुलाकर साथ बैठा लिया. बलवंत और गीता सुनीति के घर में सलोनी का स्थान जानते थे और उन्हें इसमें कोई भी आपत्ति नहीं थी. कल तो सलोनी अपने घर अपने माता पिता से मिलने रुकी थी. उनको उसने ५० हजार रूपये दिए जो कि सुनीति ने उसे दिए थे. वो मना करते रहे, पर सलोनी कहाँ मानने वाली थी.

बातों में फिर एक बार सेक्स पर चर्चा होने लगी.

जीवन: “भाभी, वैसे गांव के जीवन का आनंद अलग है. शहर में भीड़ भाड़ और दौड़ भाग के बीच समय यूँ ही व्यर्थ में बीत जाता है. आशीष ने बहुत परिश्रम किया है. आज जब सब कुछ अच्छे से संभल गया है, तो उसने अपना समय घर और परिवार में अधिक बिताने का निश्चय किया है. अब तीनों बच्चे ही लगभग सँभालते हैं. ये बात अलग है कि उसकी अनुमति बिना लिए वो कोई बड़ा निर्णय नहीं लेते.”

गीता: “हाँ भाई साहब. हम लोग तो यहीं खुश हैं. हम पांचों का जो समूह था उसमे से भाभी के जाने के बाद अब वो रस नहीं रह गया.”

जीवन: “हाँ, रसीली तो बहुत थी वो. न जाने क्यों इतनी जल्दी चली गई. और भाभी, रस तो तुममें भी बहुत है.”

गीता: “अरे कहाँ, अब इन बूढी हड्डियों में वो बात नहीं रह गई.”

जीवन: “अरे भाभी, जब हम अभी बूढ़े नहीं हुए तो तुम कैसे हो गयीं?” ये कहकर जीवन उठा और गीता के बगल में जाकर बैठ गया.

उसके मम्मे दबाते हुए कहा, “बलवंत तो कहता है कि तेरी जैसी कोई हो ही नहीं सकती. और वो तीन दुष्ट भी यही सोचते है.”

गीता उससे लिपट गई, “क्यों चले गए यहाँ से, हम सब इतने खुश थे.”

जीवन: “सरला के जाने के बाद कुछ अच्छा ही नहीं लगता था. हर दृश्य में वही दिखती थी. आशीष और सुनीति इसीलिए ही मुझे अपने साथ ले गए क्योंकि मुझे वो कमी खाये जा रही थी.”

बलवंत के संकेत पर सलोनी उठकर उसकी गोद में जा बैठी. और अपनी बाहें बलवंत के गले में डाल दीं। बलवंत ने उसके होंठ चूमते हुए उसके शरीर पर अपने हाथों से सहलाते हुए उसके ब्लाउज के बटन खोल दिए. कुछ ही क्षणों में सलोनी ऊपर ने नंगी हो चुकी थी. फिर वो उठी और बिना हिचक के अपनी साड़ी और पेटीकोट उतारकर नंगी हो गई. फिर दोबारा बलवंत की गोद में जा बैठी.

जीवन गीता के मम्मे दबाते हुए बोला: “उधर देखो भाभी, सलोनी अपनी जवानी दिखा रही है तुम्हारे पतिदेव को. आपका क्या मन है?”

गीता: “अब उसके जैसा तो मेरा शरीर रहा नहीं. फिर भी आपके लिए मैं भी कपडे निकाल ही देती हूँ.”

गीता खड़ी होकर अपने कपडे निकालने लगी तो साथ में जीवन ने भी खड़े होकर अपने कपडे उतार दिए. उसका कसरती शरीर चमक रहा था. और उसके पांवों के बीच में उसका आधा तना लंड झूल रहा था.

गीता: “मुझे कभी कभी इसकी कमी बहुत सताती है.”

जीवन: “क्यों बहलाती हो भाभी, बलवंत के सामने तो ये उन्नीस ही होगा.”

गीता: “बात वो नहीं है, बस कभी कभी उस समय याद आती है जब सरला और मैं मिलकर आप दोनों से चुदवाती थी.”

जीवन की ऑंखें नम हो गयीं. गीता ने ये देखा तो उसके सीने से लग गई.

गीता: “ मुझे क्षमा कर दीजिये, भाईसाहब.”

जीवन: “नहीं भाभी, आप सही कह रही हो. उसकी बात कुछ और ही थी.” फिर उसने गीता की ठुड्डी पकड़कर सिर उठाकर उसके होंठ चूम लिए. “जैसे आपकी बात अपनी ही है.”

उधर बलवंत भी अपने कपडे उतार कर सलोनी को जमीन पर लिटा कर उसकी चूत की पूरी श्रध्दा से चूस रहा था. सलोनी कसमसा रही थी और अपनी गांड उठा उठाकर बलवंत को प्रोत्साहित कर रही थी. बलवंत ने उसके पांव इतने फैलाये हुए थे की चूत पूरी तरह से खुलकर उसके सामने थी. और वो उसके रोम रोम को कभी चाटता, कभी सहलाता और कभी हल्के से काट रहा था. सलोनी अपना वश खो चुकी थी. पर उसे पता था कि आज की रात उसकी और गीता दीदी की धुआंधार कुटाई होनी है. दोनों की चूत और गांड इतनी बार मारी जाएगी कि सुबह चलना भी कठिन होगा. इन दोनों की चुदाई कई बार इतनी दुर्दांत हो जाती थी कि मन कांप उठता था. पर उसमे जो आनंद आता था उसका वर्णन भी असंभव था.

सलोनी ये सब सोचते हुए अपनी चूत में चल रही उंगली और जीभ से आनंदातिरेक सिसकारियां ले रही थी. फिर बलवंत ने उसके पांव उठाकर ऊपर तक मोड़ दिए. इस आसन में सलोनी की चूत और गांड दोनों ही ऊपर आ गए. बलवंत ने अपनी जीभ को गांड के छेद से चूत के भगनासे तक घूमना आरम्भ किया. सलोनी की तो अब जैसे जान ही निकल गई. बलवंत उसकी गांड के छेद पर जीभ से खेलता, फिर अपनी जीभ के ऊपर ले जाता और फिर भगनासे को जीभ से चाटकर अपने होठों से दबा देता. और फिर यही क्रम दोहराता. सलोनी की चूत और गांड दोनों में कुनमुनाहट होने लगी. चूत ने अपना रस बहाना शुरू किया तो बलवंत ने उस रस के सहारे अपने क्रम को और गतिशील कर दिया.

सलोनी हल्की चीख के साथ सिसकती हुई बोल पड़ी: “भाई साहब, मेरा पानी छूटने वाला है.”

पर बलवंत ने अपने आक्रमण में कमी करने के स्थान पर और भी तेजी कर दी. और सलोनी का बांध टूट गया. उसने लम्बी पिचकारियों के साथ अपन ढेर सारा पानी बलवंत के मुंह और चेहरे पर उड़ेल दिया. पर बलवंत रुका नहीं. और जब सलोनी पूरी झड़ नहीं गई, तब तक उसने अपना खेल बंद नहीं किया. जब सलोनी निढाल हो गई, तब बलवंत ने अपना चेहरा उठाया जो इस समय पूरी तरह से भीगा हुआ था.

“जीवन, इसकी चूत तो बहुत मीठी है, यार. हर बार चाशनी जैसी मधुर लगती है.”

“मेरे घर की हर चूत मीठी है, तेरी बेटी की चूत मिला कर.” जीवन अपने लंड को गीता के मुंह में अंदर बाहर करते हुए हंस कर बोला.

“ये सब हमारी पत्नियों की कृपा है, जिन्होंने ऐसी संतानें जो दी हैं.” बलवंत भी हंसकर बोला।

गीता पूरी आत्मीयता से जीवन के लंड को चूस रही थी. अब वो पहले वाला समय तो था नहीं कि जब चाहते तब अपने किसी भी मित्र के घर चले जाते और चूत, लंड या गांड चूस लेते। जीवन का लंड तो अब साल में कोई १५-१६ दिन ही उसके हिस्से में आ पता था. और इसका वो पूरा लाभ उठाना चाहती थी. जीवन भी अपनी भाभी रूपी समधन से लंड चुसवाने के लिए लालायित रहता था. तभी वो चाहता था कि ये दोनों साथ चलें और आनंद लें. जीवन ने गीता का सिर पीछे से पकड़कर उसके मुंह को लंड से चोदने की प्रक्रिया प्रारम्भ की. गीता को उसकी ये सब लीलाएं पता थीं और वो बलवंत के लंड को भी गले तक निगल लेती थी. और अब भी जीवन का लंड उसके गले को छू कर अंदर बाहर हो रहा था.

“भाभी, अब मुझे आपको चोदना है.”

गीता: “क्यों भाईसाहब, मेरा रस नहीं पीना?”

जीवन: “नहीं भाभी, अभी रुका नहीं जा रहा, बहुत दिन हो गए इस चूत का भोग किये हुए. और अभी तो मैं कई दिन हूँ यहाँ.’

गीता वहीं जमीन पर लेट गई और अपने पांव फैला दिए.

जीवन: “नहीं भाभी, यहाँ नहीं, बिस्तर पर ही चलो. अब घुटने थक जाते हैं.”

ये सुनकर गीता उठी और वैसे ही नंगी अपनी गांड मटकाते हुए शयनकक्ष की ओर चल पड़ी. जीवन उसके पीछे हो गया. फिर उसने पीछे मुड़कर बलवंत को देखा.

जीवन: “तुम भी अंदर ही आ जाओ”

बलवंत ने सिर हिलाया और सलोनी को लेकर शयनकक्ष की ओर चल दिया. चलते समय उनके हाथ सलोनी की गांड पर था और उसने चुहल करने के लिए एक उंगली उसकी गांड में पेल दी. सलोनी चलते हुए ठिठक गयी.

सलोनी: “भाईसाहब, आपकी ऊँगली गलत छेद पर है.”

बलवंत: “नहीं, छेद भी सही है और लक्ष्य भेदने के लिए बाण भी उत्सुक है. पर अभी समय है वहाँ अतिक्रमण में. पहले तुम्हारी चूत का भोग लगाना चाहूंगा.”

सलोनी: “फिर ठीक है. चूत की खुजली बहुत अधिक बढ़ गई है, पर अब अपने गांड में भी आग लगा दी.”

बलवंत: “कहे तो मैं और जीवन तेरी चूत और गांड की आग एक साथ बुझा दें?”

अब सलोनी इस खेल के लिए नयी तो थी नहीं. उसे पता था कि उसके दोनों छेदों की पिलाई होनी ही है. जैसे की गीता दीदी की होगी. उसका शरीर उत्तेजना से सिहर उठा.

गीता: “ अभी नहीं भाईसाहब, उसका जब समय आएगा तब देखेंगे.”

वो जानती थी कि जीवन को इस तरह की चुदाई कितनी पसंद है. कभी कभी वो अपने बेटे आशीष के साथ उसे इसी प्रकार से चोदते थे. उसके दो दिनों तक घर का कार्य सुनीति संभालती थी. इसीलिए नहीं कि सलोनी कर नहीं सकती थी, बल्कि इसीलिए कि सलोनी उसे उन दोनों की दुर्दांत चुदाई से बचा लेती थी. अब उनके बेटे असीम और कुमार तो और दो पग आगे निकल गए थे.

और अब वो भी इसकी अभ्यस्त हो चुकी थी और उसे इसमें भी आनंद आता था. कमरे में पहुंचे तो देखा कि गीता पहले से ही बिस्तर पर टाँगें फैलाये पड़ी थी और जीवन अपने लंड को उसकी चूत के मुहाने पर रखकर खड़े थे.

जीवन: “आ जा बलवंत. तेरे ही लिए रुका हूँ. साथ में जुगलबंदी करेंगे. देखें इनमे से कौन पहले हार मानती है. और जीतने वाली को हम दोनों कुछ विशेष देंगे.”

ये सुनते ही गीता और सलोनी दोनों के शरीर में सिहरन सी दौड़ गई. आज हारने में ही भलाई लग रही थी. पर जीवन की बात अभी समाप्त नहीं हुई थी.

“और हारने वाली को सजा.”

अब गीता और सलोनी को काटो तो खून नहीं. इधर गिरीं तो कुंआ, उधर गिरीं तो खाई. बलवंत ने सहमी हुई सलोनी को बिस्तर पर लिटा दिया, गीता के साथ और अपने लंड को सलोनी की चूत पर लगाया और जीवन को संकेत दिया. एक साथ दो मोटे लम्बे कड़क लंड दो चूतों के अंदर एक ही झटके में समा गए. अब गीता की तो चूत कई सावन देख चुकी थी पर सलोनी की आंखे तिरछा गयीं. ये खेल बलवंत और जीवन का पुराना शौक था और जब वो जुगलबंदी करते थे तो उनका एक एक धक्का और गति एक समान होती थी. गीता तो इस खेल में कई बार खिलौना बन चुकी थी पर सलोनी के लिए ये अधिक पुराना नहीं था. पर इससे कुछ अंतर नहीं पड़ना था. चूत तो उसकी अलग से ही चुदनी थी.

जीवन और बलवंत जुगलबंदी में गीता और सलोनी की चूतों में अपने लंड पेल रहे थे. लकड़ी का पलंग भी चूं चूं की ध्वनि से चरमरा रहा था. उनके चोदने की तीव्रता इतनी अधिक थी कि अगर पलंग मजबूत लकड़ी का न होता तो संभवतः अब तक टूट गया होता. उनके नीचे अपनी चूत का भोसड़ा बनवाती हुई गीता और सलोनी इस भीषण चुदाई में पीड़ा और आनंद दोनों अनुभव कर रही थीं. गीता को तो ऐसी ही चुदाई बहुत भाती थी, अगर चोदने वाला उसका पति न हो तो. अपने पति बलवंत से उसे प्यार से चुदना अधिक रुचिकर लगता था. पर दूसरों से उसे ऐसी ही चुदाई की कामना रहती थी. विशेषकर जीवन से, जिसके लंड और पाशविक चुदाई की तो वो प्रशंसक थी. उधर बलवंत भी गीता के अलावा दूसरी औरतों को इसी निर्ममता से चोदता था.

सलोनी की चूत तो इस समय अगर नदी के समान बह रही थी तो गीता की समुद्र की तरह. दोनों इस समय चरमोत्कर्ष की ऊंचाई पर थीं और उनकी आँखों में चाँद तारे जगमगा रहे थे. शारीरिक संवेदना अब पूर्ण रूप से उनकी योनि पर केंद्रित थी.

गीता: “अब और नहीं, बस अब झड़ जाओ. मेरी चूत अब और नहीं झेल पायेगी. मुझ पर दया करो.”

गीता की विनती भरे स्वर सुनकर सलोनी ने भी विनती दोहराई. बलवंत और जीवन ने एक दूसरे को देखा और सिर हिलाकर अपने धक्के और तेज कर दिए. बस कुछ ही पल निकले होंगे कि उन दोनों ने अपने गाढ़े सफ़ेद रस से दोनों चूतों को भर दिया. फिर दोनों मित्र परिवारजन हटकर अपने साथी की बगल में लेट कर लम्बी साँसों के साथ विश्राम करने लगे.

“आज कुछ अधिक ही जोश में थे भाई साहब.” गीता ने पूछा.

जीवन: “नहीं भाभी, बस आपके साथ इतने समय बाद जो किया, तो मन की इच्छा पूरी करनी थी. मैं फिर कहता हूँ, आप लोग मेरे साथ चलो.”

बलवंत: “जीवन, अभी चलना कठिन होगा. मैं सब काम एक बार संभाल दूँ फिर अगले महीने हम दोनों आ जायेंगे. अभी चलने से हमेशा मन में कुछ न कुछ कुरेदता रहेगा. अगले महीने आएंगे तो आराम से २ महीने तक रह पाएंगे. तुम मेरी बात समझ तो रहे हो न?”

जीवन ने कुछ देर सोचा फिर बोला, “तुम्हारी बात ठीक है. अगले महीने आओ फिर.”

गीता: “ये ठीक है, मैं भी सुनीति और बच्चों से कितने दिनों बाद मिलूंगी.”

जीवन हंस पड़ा, “जिन्हें तुम बच्चा कह रही हो वो तुम्हारी चूत और गांड की धज्जियाँ उड़ा देने वाले हैं.”

गीता: “क्या कह रहे हैं भाईसाहब!”

जीवन: “सच कह रहा हूँ. आओ भाभी, अब मैं तुम्हारी गांड का भी भोग लगा लूँ।”

बलवंत: “बिल्कुल, मेरा तो लंड सलोनी की गांड के बारे में सोचते ही फिर खड़ा हो गया है. क्यों सलोनी क्या कहती हो.”

सलोनी: “जब कमरे में आते हुए आपने मेरी गांड में उंगली की थी तब से ये खुजला रही है आपके लंड से खुजली मिटाने के लिए.”

ये कहते हुए चारों अगले चरण के लिए अग्रसर हो गए.

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सुनीति के घर

अगले दिन सुबह:


सुनीति और अग्रिमा रसोई में खाना बना रहे थे. सुनीति को तो इसमें कोई कठिनाई नहीं थी पर अग्रिमा के हाथ पांव फूले हुए थे. उधर लगातार उसके मित्रों के फोन आये जा रहे थे. शर्म और घमंड में ये बता नहीं पा रही थी कि वो घर में अपनी माँ का काम में हाथ बंटा रही है. कुछ ही देर में शंकर भी आ जाता है, सब्जी और अन्य वस्तुओं के साथ. उसे अग्रिमा को रसोई में काम करते देख बहुत अचरज हुआ.

शंकर: “अरे अग्रिमा बिटिया, तुम! चलो अब रहने दो मैं आ गया हूँ.”

अग्रिमा: “थैंक यू , मौसाजी.”

सुनीति: “ ए मैडम, मौसा के आने से तुम जा सकती हो, ये किसने कहा?”

अग्रिमा: “मम्मी, मम्मी, मम्मी, प्लीज प्लीज. मेरे सब फ्रेंड्स मेरा वेट कर रहे हैं. मुझे जाने दो न प्लीज.” अग्रिमा के ये शब्द सुनकर सुनीति हंसने लगी. उसका मन भी लाड़ से भर गया.

सुनीति: “ठीक है जा. और मौसा के लिए कुछ उपहार लाना.”

अग्रिमा: “ओके, मॉम. जो उपहार मौसाजी को पसंद है, वो आप इन्हे अभी दे देना मेरी ओर से.”

सुनीति: “चल, शैतान. अब जा, मुझे काम करना है.”

अग्रिमा: “हाँ जी. इस काम के बाद भी तो काम करना है.” उसने अपने बाएं हाथ के अंगूठे और ऊँगली से गोला बनाकर उसमे दाएं हाथ की ऊँगली चलते हुए चुदाई का संकेत दिया और भाग गयी.

सुनीति भी हँसते हुए अपने रसोई के काम में लग गयी और शंकर सामान लगाने लगा. और फिर सुनीति का हाथ बँटाने लगा.

सुनीति: “बात हुई सलोनी से? ठीक से है.”

शंकर: “हाँ दीदी, सुबह हुई थी. सब अच्छा है. अपने घर भी गई थी. आपने जो पैसे दिए थे अपने घर वालों को दे दिए.”

सुनीति: “और कुछ?”

शंकर: “आपके बाबूजी और माँ जी के यहाँ आने की बात हो रही है. अगले महीने आएंगे कह रही थी. दादाजी ने मना लिया उन्हें।”

सुनीति: “सच. और ये बात मुझे अब बता रहे हो. ओह माँ. ये तो बड़ी ख़ुशी का समाचार है.”

ये कहते हुए सुनीति ने शंकर को बाँहों में भरकर चूम लिया. थोड़े ही समय में नाश्ता और खाना दोनों बन गए. शंकर से नाश्ता टेबल पर लगा दिया और घर के सदस्यों की प्रतीक्षा करने लगे. आधे घंटे में आशीष, असीम और कुमार आ गए और सब बैठकर नाश्ता करने लगे. आशीष ने देखा की सुनीति बहुत खिली हुई है.

आशीष: “क्या बात है, बहुत खुश लग रही हो.”

सुनीति: “बाबूजी ने पापा मम्मी को यहाँ आने के लिए मना लिया है. अगले महीने आएंगे.”

आशीष: “ये तो सच में बहुत ख़ुशी की बात है.”

कुमार: “मम्मी, नानी क्या अभी भी उतनी ही सुन्दर हैं?

सुनीति: “हाँ. और तेरे जैसे चार को संभाल सकती हैं इस आयु में भी.”

असीम: “ठीक है माँ. वैसे मैंने इसीलिए नहीं पूछा था, पर अब अपने कहा है तो हम दोनों संभाल लेंगे उन्हें.” कहते हुए दोनों भाइयों ने अपने एक एक हाथ जोड़कर ताली बजाई (हाई ५ किया).

आशीष सुनीति से: “ये साले नहीं सुधरेंगे। जहाँ चूत की बात हो, उछलने लगते हैं.”

असीम: “अरे पापा, आप के मन में लड्डू फूट रहे हैं. है न.”

बस यूँ ही चुहल में नाश्ता समाप्त करने के बाद सब अपने काम के लिए निकल पड़े. अब शंकर और सुनीति घर में अकेले ही थे. सामान समेटकर, किचन की सफाई करने के बाद शंकर ने चाय बनाई और लेकर बैठक में गया जहाँ सुनीति फोन पर अपनी माँ गीता से बात कर रही थी.

सुनीति: “.. अगर अभी आने को बोल रहे थे तो आ ही जाते.”

गीता: “...”

सुनीति: “बात तो पापा की भी सही है, चलो अब जितना शीघ्र हो सके आ जाओ. बहुत याद आती है, सच में.”

गीता: “...”

सुनीति: “अरे रे रे रे. पापा और बाबूजी जब भी मिलते हैं हमेशा ऐसा ही करते हैं. चलो ऐसा करो तुम मालिश करवा लो नाऊन को बुलाकर. सलोनी की भी करा देना. और विश्राम करो. बाद में फिर बात करेंगे.”

शंकर: “क्या हुआ दीदी, सब कुशल मंगल है न?”

सुनीति चाय की चुस्की लेते हुए : “हाँ सब ठीक है. पापा और बाबूजी जब साथ होते हैं तो कई बार बहुत बेदर्दी से चोदते है. मम्मी वही कह रही थीं. दोनों ने रात भर मम्मी और सलोनी के सारे बदन को तोड़ डाला. मम्मी की आयु ऐसी पहलवानी करने की तो है नहीं, पर सलोनी ठीक है, मम्मी ने बताया.”

शंकर अपनी चाय पीते हुए: “सलोनी तो और खिल गई होगी. जब असीम और कुमार के पास से आती है तब उसकी चाल भी बदली होती है और चेहरे की चमक भी. और ये दोनों भी बहुत बेरहमी से चोदते है, आप तो जानती ही हो.”

सुनीति, “हाँ, ये उन दोनों से इक्कीस ही निकले हैं.”

सुनीति की चाय समाप्त हो चुकी थी, उसने प्याला एक ओर रखा.

सुनीति: “हाँ जानती हूँ. कल तो मैंने दोनों मुश्टण्डों के लंड अपनी चूत में एक साथ लिए थे. सोचकर फिर पनियाने लगी है.” सुनीति ने अपने नाईट गाउन को घुटनों के ऊपर उठाकर अपनी चूत पर हाथ फिराते हुए कल की चुदाई को याद किया.

“मैं कुछ सहायता करूँ, दीदी” शंकर ने अपना प्याला एक और रखकर पूछा. उसे समझ आ चुका था कि ये वृत्तांत किस ओर अग्रसर है.

“इसमें पूछने जैसी कोई बात ही नहीं है.”

शंकर ने सुनीति के पांवों के बीच में बैठकर जांघों को अलग करते हुए चूत का अवलोकन किया.

“हम्म्म, लगता है कल तगड़ी चुदाई हुई है, दीदी. बहुत सूजी हुई लग रही है ये तो.”

“सूजेगी नहीं क्या. दो दो लंड एक साथ पेले थे इसमें.”

शंकर ने चूत की फांकों पर अपनी जीभ फिराई। और फिर धीरे धीरे चाटने शुरू किया. सुनीति ने सोफे पर अपना सिर पीछे करते हुए अपने पांव और फैलाये और अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया. शंकर ने अपना कार्यक्रम चालू रखते हुए अब सुनीति की गांड से चूत तक चाटना शुरू किया. सुनीति के शरीर में एक झुरझुरी से उठी. और उसने अपने आसन को बदल कर अपनी गांड उठाकर शंकर की पहुंच को सरल कर दिया. शंकर ने भी अपनी चाटने की प्रक्रिया को थोड़ा और तेज किया और अब वो अपनी जीभ से गांड और चूत की फांकों को कुरेद रहा था. पहले वो गांड के भूरे सितारे पर अपनी जीभ से चाटता और फिर चूत और गांड के बीच की लकीर को चाटते हुए चूत पर पहुँचता जहाँ वो पंखुडियों को चाटकर, जीभ से चूत के अंदर थोड़ी सी चटाई करता और भग्नासे के दाने को होंठों से दबाकर मसलता. और यही क्रिया वो दोहराता रहा.

अब सुनीति भी पूरी गर्मी में आ चुकी थी. उसकी चूत के पट खुल चुके थे और अब उसे कुछ बड़ी और कठोर वस्तु की अभिलाषा थी जो उसकी चूत को ठीक से भर सके.

“शंकर, अब तू मुझे चोद दे, बहुत बेचैनी हो रही है.”

ये सुनकर शंकर ने अपने कपडे उतारे, उसका लंड इस घर के अन्य लोगों की तरह विशालकाय तो नहीं था पर छोटा भी नहीं था. उसने अपने लंड को सुनीति की चूत पर रखा और एक ही बार में पूरा अंदर धकेल दिया.

*****************

जीवन का गाँव

पिछली रात:


जीवन: “सलोनी, जाकर जरा रसोई से तेल लेकर आओ.”

सलोनी काँपते पाँवों से रसोई में गई और दो कटोरियों में सरसों का तेल ले आई. उसने एक एक कटोरी बिस्तर के दोनों ओर रख दी. बलवंत उसे बड़ी ललचाई हुई आँखों से देख रहा था. जब तेल रखकर वो मुड़ी तो बलवंत ने उसे खींच कर अपनी गोदी में बिठा लिया. उसके मम्मों को दबाते हुए उसके चेहरे और होठों को चूमने लगा. इस प्रक्रिया से सलोनी का शरीर भी उसका साथ देने लगा और वो स्वयं ही बलवंत से लिपट गई.

जीवन: “बलवंत, इसकी गांड बहुत प्यार और कोमलता से मारना। इसको गांड मरवाने में आनंद बहुत आता है, पर गली थोड़ी तंग है, तो रोने लगती है. तेरी मोटर ज्यादा तेज मत चलाना नहीं तो दोनों को मजा नहीं आएगा. एक बार खुल जाये फिर जैसे चाहो वैसे चला सकते हो अपनी गाड़ी.”

बलवंत: “इतनी मुलायम गांड को मैं कैसे दर्द दे सकता हूँ. सलोनी, चलो घोड़ी बन जाओ, पहले तेरी इस गांड को प्यार तो कर लूँ .”

सलोनी ने घोड़ी का आसान ग्रहण किया और बलवंत ने उसके पीछे आकर उसकी गांड को चाटते हुए उसकी चूत में एक उँगली डाल दी और उसे चोदने लगा. सलोनी की रोमांच से आह निकल गई. उधर जीवन ने भी गीता से उसी आसान में आने को कहा और गीता की गांड को चाट कर ढीला और गीला करने लगा. जब बलवंत को लगा कि सलोनी की गांड अपेक्षित रूप से गीली हो चुकी है तो उसने तेल उठाया और अपने एक हाथ से गांड को फैला दिया. इससे गांड का भूरा छेद थोड़ा खुल गया. फिर बलवंत ने कटोरी से तेल की एक पतली धार के द्वारा सलोनी की गांड में तेल भरने का काम शुरू किया.

ठन्डे तेल के प्रवेश से सलोनी की गांड कुलबुलाने लगी और उसे शरीर में सिहरन सी दौड़ गई. पर बलवंत इस खेल का अनुभवी खिलाडी था. उसने कटोरी एक ओर रखी फिर दोनों हाथों से सलोनी के नितम्ब जोड़े और गांड को सील करते हुए दोनों नितम्बों को एक दूसरे से विपरीत दिशा में हिलने लगा. इससे तेल गांड की गहराईओं में चला गया. फिर उसने अपनी एक ऊँगली गांड में डालकर उसे अंदर अच्छे से चलाते हुए तेल को गांड की अंदरूनी त्वचा पर अच्छे से मला. तीन चार बार उसने तेल डालते हुए ये क्रिया दोहराई.

इसके बाद रुकते हुए उसने अपनी पारखी आँखों से अवलोकन किया और पाया कि अब सलोनी की गांड चुदने की स्थिति के अनुरूप है. अब उसने तेल से अपने लंड की अच्छी मालिश की और इतना तेल लगा लिया जैसे नहा दिया हो. अब उसने अपने लंड को सलोनी की गांड पर रखा.

बिस्तर में दूसरी ओर भी गीता की गांड के साथ लगभग यही कर्म हुआ था. पर गीता की गांड पर इतना समय नहीं लगना था तेल से चिपड़ने में इसीलिए जीवन ने अपनी जीभ और उँगलियों से अधिक समय श्रम किया. और जब तक सलोनी की गांड पर बलवंत ने लंड रखा, जीवन ने भी उसी समय गीता की गांड पर अपने लंड को बैठाया. पर इस बार जुगलबंदी नहीं थी. और इसीलिए बलवंत बड़े संतोषी गति से सलोनी की गांड में अपना लंड उतारने लगा. अभी उसके सुपाड़े ने अंदर प्रवेश पाया ही था कि जीवन ने तीन चार धक्कों में ही अपना लंड गीता की वृद्ध गुदा में पेल दिया.

बलवंत: “सलोनी, ठीक तो है न तू?” जब लंड पूरा गांड में अच्छे से बैठ गया तब उसने पूछा.

सलोनी: “बिल्कुल, भाई साहब. और सुनिए, मैं पहली बार गांड में नहीं ले रही हूँ, आप अपने ढंग से मारिये. मुझे गांड मरवाने में आनंद तो बहुत आता है, पर निर्ममता से नहीं.”

बलवंत ये सुनकर प्रसन्न हो गया. उसने अपने अपने लंड को आगे पीछे करते हुए मिनट भर में ही सलोनी की गांड को अपने पूरे लंड से पैक कर दिया. अब सलोनी को ऐसा लग रहा था कि ये चला तो गया पर अब चलेगा कैसे? पर इसके लिए उसे अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी. तेल से सनी गांड में लंड आसानी के साथ चलने लगा. उसकी तंग गली में इस घर्षण से एक विलक्षण सी अनुभूति होने लगी. जब लंड बाहर होता तो जिस स्थान को छोड़ता वहां सलोनी को खुजली सी लगती, जिसे तत्क्षण बलवंत का लौड़ा लौटकर उसे मिटा देता.

पर जीवन पर ऐसा कोई अंकुश नहीं था, और गीता भी गांड मरवाने में महारथ प्राप्त किये हुए थी. उसने जीवन पर्यन्त बलवंत और उनके मित्र मंडल के लंड अपनी गांड से निकाले थे. और उसे जीवन का ये पाशविक चुदाई का ढंग बहुत रास आता था. सिर्फ जीवन ही उसके गांड के पेंच ढीले करता था, अन्य सभी उसे एक गुड़िया या बुढ़िया के रूप में ही चोदते थे. पर जीवन में कोई दया भावना नहीं थी. यही कारण था कि वो उसके आने की राह देखती थी. और इस समय जीवन उससे इस लम्बे अंतराल का एक एक पल ऋण समेत प्राप्त कर रहा था. उसके लंड के लम्बे और भयावह धक्के जो किसी और स्त्री की आत्मा कँपा देते, गीता प्रतिकूल प्रभाव कर रहे थे. गीता तो इस समय कामान्धता के स्वर्ग में विचरण कर रही थी.

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सुनीति के घर

शंकर जानता था कि इस समय की चुदाई में सुनीति को त्वरित वाली चुदाई की कामना होती है. और वही वो उसे प्रदान कर रहा था. सुनीति ने केवल अपना गाउन ऊपर किया हुआ था और शंकर ने भी केवल अपनी पैंट ही निकाली थी. और शीघ्र ही सुनीति और शंकर दोनों ही झड़ गए. सुनीति उठकर बाथरूम में नहाने चली गई और शंकर अपने आउट हाउस में. दोनों का ये सामान्य नित्यकर्म सा था. सुनीति को दिन में न कितनी बार चुदाई की भूख लगती थी. ये तो घर में इतने पुरुष थे जो उसकी इस आग को बुझा पाते थे अन्यथा न जाने क्या न कर बैठती.

अपने कमरे में नहा धोकर वो थोड़ी देर के लिए टीवी देखने लगा की तभी भाग्या का फोन आ गया. उसने बताया कि सूरज तीन दिन के लिए किसी काम से बाहर जा रहा है तो उसने अपनी सास से घर आने की अनुमति ले ली है. उसने ये भी कहा कि वो शाम के पहले आ जाएगी और किसी से बताये नहीं क्योंकि वो अपने ही कमरे में रहना चाहेगी. बात समाप्त होने के बाद शंकर टीवी देखते हुए कुछ देर के लिए सो गया और फिर उठकर मुख्य घर में शेष कार्य संपन्न करने के लिए आ गया.

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जीवन का गाँव

रात अभी बाकी है


“मार मेरी गांड, फाड़ दे इसे. तेरे जैसा लौड़ा पाकर ये आज धन्य हो गई. जोर से कर हरामी. बुढ़ा गया क्या तू? अपने नातियों से मरवानी है ये गांड, उसके लिए तो खोल दे.” गीता भावावेश में चिल्ला रही थी.

ये तो अच्छा हुआ कि वो शयनकक्ष में थे नहीं तो मोहल्ले वाले खिड़की से झांक रहे होते. सलोनी के मुंह से इस स्थिति में भी हंसी निकल गई. उसकी गांड में बलवंत लम्बे धक्के लगा रहा था, पर जहाँ उनकी लम्बाई पूरी थी उनमें वो तीव्रता नहीं थी. एक लय से वो गांड में अपने लंड को चला रहा था. हालाँकि सलोनी इससे तेज गति भी झेल सकती थी और वस्तुतः उसमें आनंदित भी होती, परन्तु उसने अधिक वीरता न दिखाने में ही अपनी भलाई समझी.

सलोनी की हंसी सुनकर धक्कों से उखड़ी साँस के बीच गीता चिढ़ कर बोली,”तू . . क्यों . . हंस .. रही .. है… माँ .. की…. लौड़ी?”

सलोनी: “माँ जी, आप जो बाबूजी को कह रही हो न नातियों से गांड मरवाने की बात, सच कहूँ तो आप वैसा न ही करना अगर अपनी भलाई चाहती हो. उनके नीचे आकर अगर आपने उन्हें अगर ऐसे ललकारा तो समझ लेना कि आपको बाथरूम जाने लायक भी नहीं छोड़ेंगे. सच कहूँ तो बाबूजी उनके आगे आपको दया की मूर्ति लगेंगे.”

ये सुनकर गीता की गांड फट गई, पर उसे इसका रोमांच भी आया. उसकी गांड, चूत और पूरे शरीर में उस समय के बारे में सोचकर एक सिहरन दौड़ गई. अब ऐसा नहीं था कि बलवंत और जीवन उसकी गांड दबा के नहीं मारते थे. पर ये भी सच था की उनकी उम्र के कारण वो झड़ने के बाद ठहर जाते थे. पर जवान लौंडे रुकने वाले नहीं थे, और न ही जल्दी झड़ने वाले थे. यही सोचकर गीता ने निश्चय किया कि समय आने पर वो उस आग में घी अवश्य डालेगी. और इस सोच के कारण उसकी चूत ने ढेर सारा छोड़ दिया. गांड भी अब उत्तेजना से लप्लपाने लगी.

जीवन ने भी ये स्पंदन अनुभव किया. उसे भी अब लग रहा था कि वो शीघ्र ही झड़ेगा. और इसीलिए वो लंड को गांड के पूरा बाहर लेकर छेद को खुलते बंद देखकर फिर लौड़ा पेलने लगा. पर अभी गति पर अंकुश लगा लिया था. कभी छोटे तो कभी लम्बे धक्कों के साथ ही उसका ज्वालामुखी फूट गया और उसने गीता की गांड मलाई से भर दी. लंड बाहर निकाल कर गीता की चौड़ाये हुए गांड के छेद को संतुष्ट भाव से देखते हुए वो उठकर एक ओर बैठ गया.

बलवंत भी अब कुछ ही देर और रुक पाया और फिर उसने भी अपनी मलाई से सलोनी की गांड को भर दिया. सलोनी को इस चुदाई से बहुत सुख मिला था. उसे गांड मरवाना बहुत सुखद लगता था, और बलवंत ने जिस विधि से उसकी गांड ली थी, उसमें प्यार और व्यभिचार का अनोखा संगम था. बड़ा लंड होने के बाद भी जिस सरलता से बलवंत ने उसकी गहराइयाँ नापी थीं वो सचमुच इस कला की चरम सीमा थी.

जीवन और बलवंत उठकर बाथरूम चले गए और लौड़े धोकर नंगे ही बाहर बैठक में चले गए. गीता और सलोनी ने भी अपनी सूजी हुई गांड उठायीं और बाथरूम की और बढ़ी. जहाँ सलोनी साधारण गति से चल रही थी, गीता की चाल में एक लचक थी जिसका कारण संभवतः गांड की हालत थी. सलोनी ने उन्हें दया भरी आँखों से देखा और उनको सहारा देते हुए अंदर ले गई और सफाई करवाई.

“ये हरामी थोड़ा भी जोश दिलाओ तो जानवर ही बन जाता है.” गीता बोली.

सलोनी: “तो क्यों करतीं है ऐसा.”

गीता: “उसके बिना मजा भी नहीं आता. ये समझ कि गांड के कीड़े साफ कर दिए. और जो दर्द की टीस है, वही तो इस खेल का असली सुख है.”

सलोनी ने भी सफाई की और दोनों नंगी ही बाहर बैठक में चली गयीं.

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सुनीति के घर

४ बजे दोपहर को भाग्या आ गयी और सीधे अपने घर में चली गई. इस समय शंकर घर में अकेला ही था. भाग्या जाकर उसके गले लग गई.

शंकर: “ क्या हुआ बेटी, सब कुशल मंगल तो है?”

भाग्या: “सब ठीक है. आप दोनों की बहुत याद आयी तो चली आयी.”

परन्तु शंकर समझ गया कि भाग्या कुछ छुपा रही है.

शंकर: “सच कह बिटिया, अभी तुझे गए हुए चार दिन भी नहीं हुए हैं.”

भाग्या: “जब ये चले जाते हैं तो सास बहुत तंग करती है. मुझे डर है कि मौसी जी कहीं उनकी माँ न चोद दें.”

शंकर: “सूरज को बताया?”

भाग्या: “सीधे तो नहीं. वो मानेंगे नहीं कि ऐसा कुछ है.”

शंकर: “जा, तू आराम कर, मैं कुछ सोचकर बताता हूँ. लेकिन सम्भवतः तेरी मौसी को बताना ही होगा. अब चिंता मत कर और विषम कर.”

भाग्या इधर उधर देखते हुए : “माँ कहाँ है? इस समय तो घर पर ही रहती है.”

शंकर: “बाबूजी के साथ उनके गांव गई है. अगले सप्ताह लौटेगी.”

भाग्या: “ तब तो बेचारी की हालत ख़राब कर देंगे। आपने जाने क्यों दिया?”

शंकर : “पहली बात, कि मना करना ठीक नहीं था. और दूसरी कि सलोनी भी जाना चाहती थी. तेरे नाना नानी से मिले हुए भी बहुत दिन हो गए हैं.”

भाग्या: “बात तो ठीक है. पर यहाँ आप अकेले पड़ गए.”

शंकर: “अब तू जो आ गयी है. सब ठीक रहेगा. थोड़ा विश्राम कर ले फिर चाय बनता हूँ. मेरा काम पर जाने का समय हो जायेगा तब तक.”

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जीवन का गाँव

रात अभी भी बाकी है


बैठक में बैठे हुए सब बातें कर रहे थे.

जीवन: “वैसे तुम्हारे अगले महीने आने की योजना सही है. मैं कल सुबह अपने मैनेजर को बुला लूंगा और उसे काम समझा देना. उसकी मासिक आय को मैं संभाल लूंगा. मुझे नहीं लगता कि वो मना करेगा.”

गीता: “मेरी सुनीति से बात हुई, वो भी बहुत आनंदित हुई ये जानकर कि हम लोग आ रहे हैं.” फिर कुछ सोचते हुए, “भाईसाहब, आपको अगर कोई परेशानी न हो तो मैं कुछ कहूँ?”

जीवन: “क्यों नहीं भाभी, इसमें पूछने जैसी कोई बात ही नहीं.”

गीता: “मैं सोच रही थी कि सलोनी के माता पिता को भी ले चलें. वो भी कुछ दिन रह लेंगे अपने बच्चों के साथ. सप्ताह या १० दिन में फिर लौट आएंगे.”

सलोनी की ऑंखें नम हो गयीं, पर वो कुछ बोली नहीं.

जीवन: “बिल्कुल ले कर आना. मैं बड़ी गाड़ी भेज दूंगा। पर ये ध्यान रहे कि हमारे संबंधों के बारे में उन्हें कोई भी शक न हो. और जब तक वो रहें तब तक इन तीनों को अपने खेलों से दूर ही रहना होगा. ठीक है न सलोनी.”

सलोनी: “बाबूजी, आप सचमुच देवता हैं. मैं कल ही माँ से बात करूँगी। “

गीता: “वो तुम मुझपर छोड़ दो, मुझे विश्वास है कि वो मेरी बात नहीं टालेंगे.”

कुछ देर और यूँ ही बातें करने के बाद सलोनी ने सोने जाने की अनुमति मांगी और जाकर अपने कमरे में लेट कर सो गई.

“तो भाभी, अब हम दोनों के बीच में तुम अकेली ही बची हो.”

“तो क्या हुआ, मैं अभी भी तुम दोनों को धूल चटा सकती हूँ. चलो मैदान में.”

और इसी के साथ सब लौट कर शयन कक्ष में आ गए और अपने कपडे उतारकर नंगे हो गए.

गीता बिस्तर पर बैठकर सामने खड़े दोनों विशालकाय लौंड़ों को चूसने लगी. एक बार एक और दूसरी बार दूसरा. पहले को मुंह से निकालकर वो उसे अपने हाथों से रगड़ देती और दूसरे को चूसती. इस प्रकार उसने लगभग ५-७ मिनट दोनों को अच्छे से चूस और चाटकर तान दिया. अब दोनों ही लंड उसके शरीर के दो छेदों में प्रविष्ट होने के लिए उत्सुक थे.

जीवन: “तुझे क्या चाहिए, बलवंत ?”

बलवंत अनकहे प्रश्न को समझ गया.

बलवंत: “तुमने तो इस बुढ़िया की गांड मार ही ली है एक बार, अब मुझे मारने दे.”

जीवन: “बिल्कुल ठीक.”

उसने गीता को खड़ा किया और उसका एक गहरा चुम्बन लिया.

जीवन: “भाभी, अब तुम्हारा सर्वप्रिय खेल खेलें?”

गीता: “अरे भाई साहब, जब से आप आये हो मैं इसी समय की राह देख रही थी. अब लेट जाओ, मैं अपनी चूत में आपके लौड़े को डाल लूँ, फिर सुनीति के बाबूजी मेरी गांड में अपना लंड डाल देंगे.”

जीवन बिस्तर पर लेट गया जहाँ उसका लंड छत को ताक रहा था. गीता ने उसके ऊपर दोनों पांव फैलाकर बैठते हुए उसका लंड अपनी चूत में ले लिया. और पूरा अंदर जाने के बाद आगे की ओर झुक गई. जीवन ने उसकी पीठ पर अपने हाथों से शिकंजा बनाया और उसे अपनी ओर खींच लिया. गीता के स्तन जीवन के मजबूत सीने से जाकर जुड़ गए. बलवंत ने कटोरी में बचा तेल अपने लंड पर मला और थोड़ा तेल गीता की गांड पर डालकर उसे भी चिकना कर दिया.

बलवंत: “इस बुढ़िया के आज सारे पेंच ढीले करने हैं, जीवन. बहुत फुदकती है ये लंड के लिए.”

ये कहते हुए बलवंत ने अपना सुपाड़ा अंदर डाला और सुपाड़ा फिट होते ही एक तगड़ा धक्का मारा. धक्का इतना तीव्र था कि उसका पूरा लौड़ा एक ही बार में गीता की गांड में पूरा जड़ तक घुस गया. इतनी खेली खिलाई गीता की भी चीत्कार निकल गई. बलवंत अधिकतर गीता की बहुत प्यार से गांड मारता था, पर आज उसने ऐसी पाशविकता दिखाई कि गीता की आँखों के आगे तारे नाचने लगे. उसकी चीख से बगल के कमरे में सो रही सलोनी की आंख खुल गई. परन्तु उसे समझ आ गया कि क्या चल रहा है और वो अपने भाग्य को धन्यवाद करते हुए मुस्कुराकर दोबारा सो गई.

अब जब दोनों लंड गीता की चूत और गांड में पूरे धंसे हुए थे तो गीता को एक अलग ही अनुभव हो रहा था. यही वो अनुभव था जिसके लिए उसका शरीर और आत्मा इतने समय से व्याकुल थी. दोनों छेदों के बीच की पतली झिल्ली इस समय दो ओर से दबी हुई थी और उस समय की प्रतीक्षा कर रही थी जब उसकी दोनों ओर से घिसाई होगी.

बलवंत: “जीवन कैसे चलना है?”

जीवन: “उल्टा सीधा.”

उल्टा अर्थात जब एक लंड अंदर जायेगा तब दूसरा बाहर आएगा. सीधा अर्थात दोनों एक साथ अंदर बाहर होंगे. और इन दोनों के जोड़ का अर्थ ये कि कुछ बार उल्टा चलेगा और फिर सीधा. उनके वर्षों के अनुभव में ये मिश्रण चुदने वाली महिला को अत्यधिक सुख देता था, क्योंकि उसका शरीर लगातार एक उधेड़बुन में रहता था कि आक्रमण किस प्रकार का होगा. जीवन और बलवंत ५ धक्कों से इस विविधता का आरम्भ करते थे और हर परिवर्तन में उसे दो धक्कों से बढ़ा देते थे. अर्थात ५ उल्टे , ७ सीधे, ९ उलटे ११ सीधे. इसको पांच बार दोहरा कर फिर ५-७-९-११ शुरू हो जाता था.

गीता इस मेल में कई बार चुद चुकी थी और अथाह आनंद अनुभव कर चुकी थी. और इन दोनों के सिवाय कोई और नहीं था जो इस लय को इतनी सटीकता से निभा सकता. आज वो फिर उसी सुख के लिए तत्पर थी.

और इसी के साथ जीवन और बलवंत ने अपना समागम प्रारम्भ किया. जीवन का लंड चूत में घुसता तो बलवंत का लंड गांड से बाहर निकलता. निश्चित गणना के पश्चात्, दोनों के लंड एक साथ अंदर जाते और बाहर निकलते. यही क्रम एक बढ़ते हुए क्रम में चलता फिर अचानक निचले क्रम को पकड़ लेता. गीता इस समय कामोत्कर्ष की चरम सीमा पार कर चुकी थी. उसकी चूत से बहती हुई धार उसकी जांघों और बिस्तर को भिगा रही थी. पर न उसका मन अभी भरा था न ही उसका शरीर ही हार मान रहा था.

दूसरी ओर जीवन और बलवंत भी अपने लौंड़ों को गीता की चूत और गांड के बीच की पतली झिल्ली का अनुभव कर रहे थे. और ये कहना गलत नहीं होगा कि ये घर्षण उनके आनंद में चार चाँद लगा रहा था. गीता का मस्तिष्क इस विविधता का गणित समझने में सक्षम नहीं था. वो तो केवल उस केंद्र से उठती हुई आनंद की अनंत संवेदनाओं से ही अपने आप को प्रफुल्लित कर रहा था.

जीवन ने तभी बलवंत से कहा: “भाई, अब बस सीधे.” और इसी के साथ दोनों लौड़े अपने अपने गंतव्य में एक साथ अंदर और बाहर होने लगे. इसका अर्थ ये भी था कि जीवन का अब रस निकलने वाला ही था. जब इस क्रम के १० -१५ धक्के हो चुके तो जीवन ने कहा.

“भाभी, कहाँ छोड़ना है?”

“हम्प्फ हम्प्फ मेरे हम्प्फ मुंह में हम्प्फ हम्प्फ हम्प्फ।”

ये सुनकर दोनों ने अपनी गति सामन्य की और फिर धीमी करते हुए पहले बलवंत ने अपने लौड़े को गीता की गांड से निकाला और हट गया. गीता ने भी रूककर अपने आपको बहुत संभाल कर जीवन के लंड से अलग किया और बिस्तर के किनारे बैठ गयी. जीवन भी उठा और उठकर गीता के सामने फिर खड़ा हो गया. अब दोबारा से गीता ने दोनों के लंड चाटते हुए चूसना शुरू कर दिया. पर अब दोनों अपने लक्ष्य पर पहुँच चुके थे. पहले जीवन ने अपने गाढ़े सफ़ेद रस से गीता का मुंह भर दिया. गीता ने एक बूँद भी बेकार नहीं जाने दी. और जब तक उसने उसका सेवन पूरा करके बलवंत के लंड को मुंह में डाला तो बलवंत ने भी उसके मुंह को मलाई से भर दिया.

अंततः, सब अपने अपने लक्ष्य को पाकर संतुष्ट थे. कुछ मिनट यूँ ही सुख की अनिभूति करने के बाद गीता बोल उठी.

गीता: “यहाँ सोना संभव नहीं, पूरा बिस्तर गीला है, चलिए दूसरे शयनकक्ष में सोते हैं.”

तीनों यूँ ही नंगे दूसरे कमरे में सोने के लिए चले गए.

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क्रमशः

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Thank you Satabdi.

1) I have actually never (may be once in a while seen TMKOC) so I can not fulfil that request. In fact any story based on TV shows is not my cup of tea, as I do not watch any.

2) Indian Celebs: This has actually crossed my mind a couple of days back. What I am planning is to introduce one couple in this story and then create another story based on the Celebs lives in their bedrooms. I have read some that were based such, but most are not my types. So yes, this is a possibility. But not very soon.
 
अध्याय १२: मिश्रण - दिंची क्लब और दो परिवार २

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शोनाली का घर:

दिन: शुक्रवार, सांयकाल ७ बजे


शुक्रवार शाम ७ बजे के करीब घर की घंटी बजी. शोनाली ने दरवाजा खोला और अपने अतिथियों का स्वागत किया. सुप्रिया इस समय एक पंजाबी सूट में थी. समर्थ एक महंगे कुर्ते पाजामे में, और उनकी पत्नी शीला साड़ी पहने हुए थीं. सब इस समय बहुत आकर्षक और संभ्रांत दिख रहे थे. शोनाली ने सुप्रिया के गले लगकर उसका स्वागत किया और उसके गाल पर एक चुम्बन किया. फिर उसने वही शीला के साथ किया और फिर उसके पांव छूकर आशीर्वाद लिया. उसने समर्थ के भी पांव छुए और उन्हें बैठक में आमंत्रित किया. समर्थ अपने हाथ में एक बैग लिए थे जो उन्होंने शोनाली को थमा दिया.

शोनाली के साथ वो बैठक में पहुंचे जहाँ जॉय ने सबका स्वागत किया. सुमति ने भी शोनाली की तरह ही सुप्रिया के गाल चूमे और शीला और समर्थ के पांव छूकर आशीर्वाद लिया. जॉय ने सबको आदर पूर्वक बैठाया और पूछ कि वो क्या लेना चाहेंगे. शोनाली ने देखा तो समर्थ एक महंगी विदेशी वाइन लाये थे. तब तक समर्थ ने स्कॉच का आग्रह किया तो जॉय ने भी वही चुना. शोनाली ने वाइन को ठंडा होने के लिए लगा दिया हालाँकि समर्थ ठंडा करके ही लाये थे. सुमति ने अल्पाहार को टेबल पर सजा दिया.

फिर सब लोग अपने काम के विषय में बात करने लगे. सुमति सुप्रिया के पास बैठी थी. समर्थ और शीला साथ तथा जॉय और शोनाली साथ बैठे थे. कुछ बातें व्यवसाय से सम्बंधित थीं और कुछ राजनीति से. सब एक दूसरे से अच्छे से घुल मिल गए. समय उचित देखकर शोनाली और सुमति जाकर सबकी ड्रिंक्स एक ट्रॉली पर ले आये. चर्चा का प्रवाह चलता रहा, अब बातें अपने परिवार के लोगों के बारे में थी कि कौन क्या करता है, किसकी क्या रुचियाँ हैं, इत्यादि. सुप्रिया और शीला ने निखिल और नितिन की बढ़ाई के पुल बांधे तो शोनाली और सुमति ने सागरिका और पार्थ के. वातावरण बहुत मित्रतापूर्वक और घरेलू था.

तभी सुप्रिया ने अपने बैग में से वो लिफाफा निकला जो शोनाली ने उसे कल दिया था. उसने लिफाफे को शीला के हाथ में दिया.

सुप्रिया: "मम्मी, ये है इनकी बेटी सागरिका. बिल्कुल माँ पर गयी है."

शीला ने फोटो निकले और समर्थ और शीला ने सारे फोटो देखे.

शीला, "बहुत ही सुन्दर और प्यारी बच्ची है. सच में शोनाली तुम्हारा ही जवानी का रूप लगता है."

शोनाली शर्मा गई.

सुप्रिया: "कुछ और फोटो भी हैं, जो शोनाली ने मुझे दिखाए तो थे परन्तु दिए नहीं थे. उन्हें भी देख लें, अगर सम्बन्ध बनना है तो उनको देखना भी नितांत आवश्यक है."

कहकर सुप्रिया ने शोनाली से आग्रह भरी आँखों से देखा. शोनाली ने जॉय से मूक सहमति ली और अंदर जाकर लॉकर से वो उन चित्रों का लिफाफा भी ले आयी और सुप्रिया को सौंप दिया. सुप्रिया ने चित्र लिफाफे से निकाले और शीला के हाथों में दे दिए.

अब चटर्जी परिवार साँस रोककर बैठा था. जॉय ने बेचैनी से अपनी ड्रिंक के एक साथ दो तीन घूँट लिए. शीला और समर्थ ने सारे चित्र देखे और फिर एक बार दोबारा देखे.

शीला: "न केवल आपकी बेटी सुन्दर है, पर ऐसा लगता है कि बहुत मीठी और स्वादिष्ट भी है. आपने तो उसका रस भरपूर चखा होगा."

समर्थ: "अरे भागवान, ये कोई पूछने की बात है."

शीला: "मुझे तो आपकी दोनों ही बेटियां पसंद हैं, पर हम अभी शायद केवल सागरिका की ही बात कर रहे हैं."

शोनाली: "जी, माँ जी. पारुल अभी छोटी है, तो उसकी शादी लगभग दो साल बाद ही करेंगे."

शीला: "सही सोचा है. तब तक उसका घर में ही आनंद लो."

शोनाली कुछ नहीं बोली.

शीला: "मुझे इस संबंध में कोई कठिनाई नहीं लगती. पर हम लोग एक दूसरे के परिवारों को निकट से जान लेते तो श्रेष्ठ होता."

जॉय: "जी, इसी विचार से पार्थ ने कल अपने क्लब में हम सबके लिए आयोजन किया है, जिससे कि हम सब एक दूसरे को अंतरंग रूप से जान पाएंगे. न सिर्फ इससे निखिल और सागरिका एक दूसरे को मिल लेंगे, बल्कि हम लोग भी समय बिता लेंगे. हमने दो दिन का आयोजन किया है. पूरा आयोजन गुप्त होगा और किसी को भी भनक नहीं लगेगी. आगे जैसा आप उचित समझें."

समर्थ, "पर..."

सुप्रिया, "पापा, मैंने निखिल और नितिन दोनों को आने के लिए मना लिया है. सुरेखा से इस समय मैं नहीं कुछ कहना चाहती."

शीला ने समर्थ की ओर देखकर सिर हिलकर अपनी सहमति दे दी.

समर्थ, "तो ठीक है. कब निकलेंगे?"

जॉय, "११ बजे. निखिल को स्थान पता है. आप लोग १२ से १ के बीच आ जाएँ. हम पहले जाकर शेष प्रबंध देख लेंगे."

समर्थ: "ठीक है."

शोनाली: "आइये, खाना भी तैयार है, आप लोग मुंह हाथ धोकर डाइनिंग टेबल पर बैठें, मैं और सुमति दीदी परोसते हैं."

शीला: "अरे शोनाली बिटिया, अब तो हम संबंधी बनने वाले हैं. चलो मैं भी तुम्हारे साथ आती हूँ."

सुप्रिया: "और मैं भी."

ये कहकर चारों महिलाएं रसोई में चली गयीं . शीला और सुप्रिया ने रसोई का छुपी आँखों से अवलोकन किया और पाया कि हर चीज़ साफ और यथोचित स्थान पर थी. उन्हें ये देखकर संतुष्टि हुई. खाना लेकर सबने टेबल पर लगाया और फिर बातें करते हुए आनंदपूर्वक भोजन किया.

दिंची क्लब ११ बजे :

अगले दिन पार्थ और शोनाली १० बजे सुबह ही निकल गए ताकि वो सारे आयोजन की व्यवस्था कर सकें. जॉय, सुमति और सागरिका लगभग एक घंटे बाद निकले. पारुल अभी यूरोप के दो सप्ताह के टूर पर थी और अगले रविवार आने वाली थी. पता करने पर समर्थ ने बताया कि वे भी कुछ देर ही में निकल पड़ेंगे. पार्थ और शोनाली क्लब में सिमरन से मिले और उससे सारा कार्यक्रम समझाया और खाने का मेनू इत्यादि भी निश्चित कर लिया. ये सब कल रात में निर्णीत हो चुका था इसीलिए कोई समस्या नहीं थी.

इसके बाद शोनाली और पार्थ ने छह रोमियो के साथ खेल कक्ष का निरीक्षण किया. ये एक बड़ा हॉल था जिसमे उनकी पखवाड़े की पार्टी होती थीं. पार्टी क्या असल में वो सामूहिक सम्भोग का नंगा नाच होता था. हर स्त्री अपने पसंद के सेक्स में लिप्त रहती थी और क्लब के रोमियों का ये दायित्व था कि कोई महिला असंतुष्ट वापिस नहीं जाए. कमरे के बीच में २० डबल बेड के गद्दे बहुत व्यवस्थित रूप से गोलाकार क्रम में रखे थे. कमरे के कोनों में सोफों की एक लम्बी रेखा थी जो कि गोलाकार क्रम में ही थी. कमरे में चार स्थानों पर बार थे जिसमे महंगी शराब, वाइन और बियर का इंतज़ाम था. हर बार के साथ में खाने की एक लम्बी मेज थी जिस पर व्यंजन और अल्पाहार परोसे जाते थे. उनके बगल में एक एक अलमारी थी कपडे इत्यादि रखने के लिए.

सिमरन के साथ पार्थ और शोनाली ने हर वस्तु को देखा और कुछ परिवर्तन करने का निर्देश दिया. रोमियो तुरंत उनकी आज्ञा के पालन में जुट गए. जब पूरा प्रबंध सही लगा तब पार्थ ने रोमियो और सिमरन को बताया कि चूँकि ये उसकी व्यक्तिगत पार्टी है वे विशेष ध्यान रखें. उन्हें इसके लिए अलग पारिश्रमिक मिलेगा. इसके बाद दोपहर के भोजन के लिए बने कमरे में जाकर निरीक्षण किया और संतुष्टि दिखाई.

पार्थ: "सिमरन जी, ये हमारे घर की पार्टी है जिसमे कुछ विशेष अथिति आ रहे है. अगर आपने उत्तम सेवा की तो में एक सप्ताहांत आपको सभी रोमियो के साथ उपहार में दूंगा. पर आज मुझे पूर्ण सफलता चाहिए."

सिमरन: "पार्थ, आप जानते हो कि मैं किसी भी प्रकार से कमी नहीं करती. पर आपका उपहार मैं अवश्य ले कर रहूंगी. अगर पार्टी में भी आपको मेरी किसी प्रकार की सहायता लगे, मुझे बेझिझक होकर बताईयेगा."

सिमरन लगभग ५५ वर्ष की एक कामांध महिला थी. पहले वो एक कॉलेज टीचर थी पर जब ये विदित हुआ कि वो पढाई के साथ छात्रों को चुदाई का भी ज्ञान देती है तो उसे शांतिपूर्वक और गोपनीय ढंग से निकल दिया था. उसने बाद में ये केटरिंग का व्यवसाय आरम्भ किया था, जो बहुत अच्छा चल रहा था. अधिकतर पार्टियों में वो कम से कम ४-५ रोमियो का पानी छुड़ाती थी. ये सोचकर इस समय भी उसकी चूत पनिया गई कि दो दिन तक वो इतने सारे जवान लड़कों पर राज करेगी.

उधर समर्थ, शीला, सुप्रिया नितिन और निखिल के साथ क्लब के लिए निकल पड़े थे. १२ बजे के आसपास जॉय, सागरिका और सुमति आ गए और उनके पीछे लगभग आधे घंटे बाद समर्थ अपने परिवार सहित पहुँच गए. सब लोग पहले भोजन के लिए डाइनिंग रूम में गए. वहां समर्थ और जॉय ने एक बियर ली और अन्य सभी ने सॉफ्ट ड्रिंक. उसके बाद सिमरन ने खाना लगवा दिया. किसी से ये न छुप पाया कि समर्थ और सिमरन के बीच नैन मटक्का हो रहा था. पर किसी ने इस को अधिक महत्त्व नहीं दिया. खाने के बाद पार्थ ने सबको क्लब का दर्शन कराया. क्लब की भव्यता और व्यवस्था देखकर सब लोग बहुत प्रभावित हुए. समर्थ ने पार्थ की पीठ थोक कर उसे बधाई और आशीर्वाद दिया कि वो अपने इस उपक्रम में सफलता पाए.

"और शीला, चाहो तो तुम भी शोनाली के साथ आ जाया करो कभी कभी. तुम्हें भी सदस्यता ले लेनी चाहिए. मुझे नहीं लगता कि इन दोनों में से कोई तुम्हें मना करेगा."

"नानाजी, अगर आप गंभीर हैं तो मैं अभी इन्हे सदस्य बना लेता हूँ." पार्थ ने कहा.

"अरे भाई, नेकी और पूछ पूछ."

पार्थ ने फोन पर सोनम को सदस्यता का फार्म लाने के लिए कहा. उसके बाद उसने उस पर नानी का नाम शीला सिंह लिखा, उनके हस्ताक्षर लिए और अपने हस्ताक्षर करके बताया कि अन्य औपचारिकताएं हम बाद में पूरी कर लेंगे पर आप आज से हमारी मान्य सदस्य है. शोनाली ने शीला को बढ़कर बधाई दी और बताया कि वो इस क्लब की एकमात्र सदस्य हैं जो बिना साक्षात्कार और जाँच प्रक्रिया के प्रविष्ट की गई है.

इसके बाद सब खेल कक्ष में प्रवेश कर गए और रोमियो बाहर खड़े हो गए. बुलाये जाने पर ही उन्हें अंदर जाने का आदेश था . कक्ष के द्वार रिमोट से बंद कर दिए गए. अब कमरे में केवल दोनों परिवार ही थे.

खेल कक्ष राउंड १:

कमरा बंद होने के बाद सब लोग बार की ओर बढ़े और अपने लिए अपनी रूचि की ड्रिंक बनाई. सब अपनी ड्रिंक पीते हुए बातें कर रहे थे. निखिल सागरिका से उसके भविष्य के बारे में पूछ रहा था. दोनों अपनी रूचि और अरुचि के विषय में बात कर रहे थे.

तभी समर्थ की आवाज आयी जिसने सबको उनकी ओर आकर्षित किया, "बातें तो और भी समय होती रहेंगीं. मेरे विचार से हम यहां बातें करने नहीं बल्कि ये जानने के लिए आये हैं कि हमारे परिवार एक दूसरे के कितना अनुरूप हैं. और अगर मैं गलत नहीं हूँ तो इसका अर्थ ये है कि हम एक दूसरे को चुदाई में संतुष्ट कर सकते हैं या नहीं."

सबने हाँ में हाँ मिलाई।

"तो फिर क्या करना है?"

"पापा, मैंने सोच रखा है. आप कहें तो बताऊँ?" सुप्रिया ने समर्थ के पास जाकर कहा.

"तुमने सब सोच रखा होगा, ये तो मैं जानता हूँ. अब हम सबको भी बताओ." समर्थ ने उसे अपनी बाँहों में लेकर उसके होंठों को चूमकर उत्तर दिया.

"पापा, आप हम सबसे बड़े है, तो अपनी होने वाली बहू पर सबसे पहले आपका ही अधिकार बनता है. इसीलिए सागरिका आपके साथ रहेगी." सुप्रिया ने बताया, "सागरिका, जाओ तुम नानाजी की पास जाओ."

सागरिका शर्माती हुई समर्थ के साथ खड़ी हो गई.

"अब मम्मीजी सबसे बड़ी है, तो इनको मैं पार्थ का साथ देती हूँ. पार्थ नानी जी के पास जाओ."

पार्थ जैसे ही शीला के पास पहुंचा शीला ने उसे अपनी बाँहों में भींच लिया.

"शोनाली और निखिल एक दूसरे का स्वाद ले चुके हैं, इसीलिए मैं निखिल को सुमति के साथ करती हूँ."

निखिल सुमति के पास गया. सुमति की तो आंखे ही चौंधिया गयीं.

"शोनाली को मैं अपने दूसरे बेटे नितिन का साथ देती हूँ, उसे पता होना चाहिए की मैं इतनी खुश और संतुष्ट कैसे रहती हूँ."

नितिन ने शोनाली हो अपनी बाँहों में ले लिया और उसके होंठ चूम लिए.

"और मैं अपने समधी जॉय के साथ रहूँगी. मुझे आशा है की वो अपना संबंध पक्का करने मैं मेरी सहायता करेंगे."

जॉय सुप्रिया के पास आया और उसके हाथों को लेकर उन्हें चूम लिया.

पार्थ ने तभी घोषणा की, "जैसे ही हमने कमरा रिमोट से बंद किया है, सारे कैमरे चालू हो चुके हैं और हम सबका ये खेल रिकॉर्ड हो रहा है. अगर इसमें किसी को आपत्ति हो तो बताये, मैं उसे रोक दूंगा."

किसी ने आपत्ति नहीं जताई.

समर्थ ने अपनी दबंग आवाज में कहा, "अब इन कपड़ों की क्या आवश्यकता है?" ये कहकर उसने अपने कपडे उतार दिए और नंगा हो गया.

उसका अनुशरण करते हुए अन्य लोग भी अपने कपडे उतार कर खड़े हो गए. शोनाली ने एक ओर लगी कपड़ों की अलमारी की और इशारा किया और सबने एक एक करके अपने कपडे उसमें लटका दिए. समर्थ ने सागरिका का हाथ अपने हाथ में लिया और उसे सोफे पर बैठा दिया.

समर्थ: "देखें तो कैसा रस है हमारी होने वाली बहुरानी का. बेटी तुम्हारी चूत तो देखने से ही बहुत मीठी और रसीली लग रही है.. मैं स्वाद चख लूँ तुम्हारा?"

सागरिका: "नानाजी, आपकी ही चूत है, जैसा मन हो वैसा कीजिये."

खेल कक्ष:

समर्थ ने नीचे बैठकर सागरिका के दोनों पांव अपने कन्धों पर रखे और अपना मुंह सागरिका की जांघों के बीच डाल दिया. सभी लोग ठहर कर ये दृश्य देख रहे थे. तभी शीला ने पार्थ के लौड़े को पकड़ा और उसे लेकर सोफे पर बैठ गई. अब शीला सागरिका के साथ बैठी थी, पार्थ ने अर्थ समझ कर शीला के आगे घुंटने तक दिया और अपना मुंह समर्थ जैसे ही शीला की जांघों में छुपा लिया. अन्य सभी यही विधि अपनाने के लिए अग्रसर हुए और कुछ ही क्षणों में जॉय सुप्रिया की, नितिन शोनाली की और निखिल सुमति के बीच में मुंह छुपा लिए. सभी स्त्रियां एक लाइन में बैठी थीं और सभी पुरुष उनकी चूतों में सिर घुसाए हुए थे.

शृंखला कुछ इस प्रकार से थी:

सागरिका - समर्थ, शीला - पार्थ, सुमति - निखिल, सुप्रिया - जॉय और शोनाली - नितिन.

हर पुरुष अपनी साथिन को अधिकतम मौखिक सुख देने का प्रयास कर रहा था. चूतें चाटी और चूसी जा रही थी. उँगलियाँ चूतों में कहीं धीमी तो कहीं द्रुत गति से विचरण कर रही थी. कहीं जीभ चूत के पपोटों के साथ गाँड के भूरे सितारे को भी गीला कर थी. कहीं भगनासे को इस प्रकार निचोड़ा जा रहा थे कि उसकी मालकिन थरथरा उठती थी. किसी ने चाटने के साथ एक ऊँगली चूत और एक गाँड में डाल रखी थी.

कहने का तात्पर्य ये है कि हर पुरुष अपनी क्षमता का परिचय अपने नए साथी को कराना चाहता था. और ये कहना उचित होगा की ऐसा ध्यान पाने से महिलाएं आनंद की लहरों पर डोल रही थीं. पूरा हॉल अब स्त्रियों की सीत्कार और सिसकारियों से गुंजायमान था. हर स्त्री कुछ न कुछ बोल रही थी पर इस वातावरण में किसके मुंह से क्या निकल रहा था ये किसी को समझ नहीं आ रहा था.

हर पुरुष का चेहरा इस समय कामरस से भीगा हुआ था और स्त्रियों ने अपना पानी छोड़ने में कोई कंजूसी नहीं की थी. जब स्त्रियाँ शांत पड़ीं तो पुरुष अपना चेहरा उठाकर उनकी ओर देखने लगे. सबकी आँखों में संतुष्टि के भाव देखकर सभी पुरुषगण गर्व से फूल गए. फिर समर्थ उठे और उन्होंने शीला के पास जाकर उसका एक गहरा चुंबन लिया.

"ले भागवान, चख ले अपनी होने वाली बहू की चाशनी, बहुत मीठी है अपनी बहू."

"सच में बहुत मीठी है, पर मैं तो बाद में स्रोत से ही पियूँगी, तभी प्यास बुझेगी।" ये कहकर शीला ने अपने साथ बैठी सागरिका को अपने पास खींचा और उसके मुंह में मुंह डालकर उसे चूम लिया. "सच बेटी, बहुत दिन से किसी जवान लड़की का रस नहीं पिया, ये बुढ़िया तरस गई थी."

"नानी, आप कहाँ से बूढ़ी हो गयीं. और आप जब चाहे मुझे बुला लेना में आकर आपका भी रस पियूँगी और अपना भी पिलाऊंगी."

"बहुत अच्छे संस्कार दिए है शोनाली ने तुम्हें."

उधर समर्थ के कृत्य को संकेत मानकर पार्थ ने उठकर सुमति को चूमा, निखिल ने सुप्रिया को, जॉय ने शोनाली को और नितिन उठकर सागरिका के पास गया और उसका मन भर कर चुम्बन किया.

"देवर भाभी अभी से एक दूसरे से घुल मिल रहे हैं. इससे अधिक प्रसन्नता की क्या बात हो सकती है." शीला ने समीक्षा की.

"सच है माँ, ऐसा ही रहा तो घर स्वर्ग बन जायेगा."

"मैं जानती हूँ सुप्रिया दीदी, जिस घर में सागरिका जाएगी उसे स्वर्ग बना देगी." सुमति ने अपनी टिप्पणी की.

किसी को भी इस बात से कोई आपत्ति नहीं थी.

कुछ समय के लिए सबने एक विराम लिया और कुछ लोग बाथरूम गए, कुछ ने अपने लिए एक ड्रिंक बनाई. कुछ उस बड़े कक्ष में यूँ ही चहलकदमी कर रहे थे. फिर एक एक करके सारे पुरुष इस बार सोफे पर बैठे, शृंखला वही थी, बस इस बार पुरुष सोफे पर थे. उनकी साथी स्त्रियों ने उनके पांवों के बीच अपना स्थान ग्रहण किया. स्पष्ट था की इस बार मौखिक सम्भोग का आनंद पुरुष उठाएंगे. और इसी के साथ इस सामूहिक सहवास का दूसरा चरण प्रारम्भ हुआ.

स्त्रियों ने अपने साथियों के लौंड़ों को प्यार से चूसना और चाटना शुरू कर दिया. इनमें से कुछ तो इस कला की पारखी थीं और अपने साथी को वो स्खलन के द्वार पर लाकर रोक देतीं और कुछ समय बाद दोबारा वहीँ लेकर आ जातीं। उनके साथी एक आनंद और पीड़ा की दो धाराओं में सवार थे. इसकी अग्रणी थी शीला जिसका लौड़े चूसने का उतना ही अनुभव था जितनी सागरिका और पार्थ की मिलकर आयु. और दूसरी भला उसकी शिष्य पुत्री के सिवा और कौन हो सकता था. सागरिका की जो कमी अनुभव की थी वो उसे अपने उत्साह और ऊर्जा से पूरी कर रही थी. अब समर्थ का लौड़े को चूसने वाली वो कोई पहली तो थी नहीं, पर ये अवश्य स्पष्ट था कि वो उसे हर रूप में सुख और संतुष्टि देने का प्रयास कर रही थी. और समर्थ के चेहरे के भाव उसकी सफलता को दर्शा रहे थे.

पार्थ को अब ये समझ आ गया था की उसके लौड़े पर अब पूरा वश शीला का है. अब जब वो चाहेगी तभी उसका पानी छूटेगा.

पार्थ ने अपने साथ बैठे निखिल से पूछा, "तुम कैसे इनके इस आक्रमण से अपने आपको सँभालते हो?"

निखिल: "सँभालने की आवश्यकता ही क्या है? हम सेक्स को स्पर्धा नहीं समझते. कभी जल्दी झड़ने में कोई शर्म नहीं मानते. इसे हम आनंद का एक साधन मानते हैं. हममें से कोई एक दूसरे से जीतने का प्रयास नहीं करता."

निखिल की ये बात सुनकर चटर्जी परिवार को थोड़ी सांत्वना मिली. जॉय को तो जैसे दूसरा जीवन मिल गया. उन्हें अब किसी प्रकार का प्रदर्शन नहीं करना था. सिंह परिवार की तरह इन दो दिनों केवल आनंद की उबलब्धि के लिए व्यतीत करने थे. संबंध हो या नहीं ये दिन उन्हें सदैव स्मरण रहने चाहिए थे. इस स्वीकारोक्ति ने उनके सभी सदस्यों को तनावमुक्त कर दिया. और इसका प्रभाव उनके उत्साह पर पड़ा जो चौगुना हो गया.

अपने लौंड़ों को अपने साथी के मुंह से चुसवाते हुए अब लगभग दस मिनट तो निकल ही चुके थे. और पुरुषगण अपना बीज गिराने के लिए तैयार थे. उनके लौंड़ों की नसों और सुपाड़े को फूलता हुआ महसूस करने पर ये पता चल गया कि वे सब झड़ने की कगार पर है. महिलाओं ने अपने आप को आते हुए सुनामी के लिए तैयार ही किया था कि एक एक करके सारे लौंड़ों अपना पानी छोड़ने लगे. इस स्वादिष्ट प्रोटीन युक्त प्रसाद की भेंट अपने मुंह में स्वीकारते हुए स्त्रियों ने एक बूँद भी बाहर न गिरने दी. पीने के बाद उन्होंने अपने हिस्से के लौड़े को एक बार और प्यार से चाटकर साफ किया और फिर अपने पांवों पर खड़ी हो गयीं.

शीला ने सागरिका से पूछा, "कैसा लगा मेरे पति का स्वाद बहू ?"

सागरिका: "बहुत अच्छा नानी जी. अब मुझे आपकी सुंदरता का रहस्य पता चल गया है."

शीला ने सागरिका को अपने गले से लगा लिया.

शीला: "और भी हैं इसके राज, एक बार तू बहू बनकर आ तो जा, देख तेरी सास को इसकी जवानी ही इसका साथ नहीं छोड़ती."

इसी तरह एक दूसरे से सब बातें कर रहे थे. समर्थ जॉय को एक ओर ले गया.,

समर्थ: "जॉय, तुम इतने सहमे से क्यों हो."

जॉय: "जी, लड़की का बाप हूँ, कुछ गलती न हो जाये."

समर्थ: "इस सोच को अपने मन से निकाल दो, अपने घर की लक्ष्मी हमें दे रहे हो और हम से ही डरते हो. संबंधों में मिठास रहनी चाहिए, औपचारिकता और डर नहीं. हमारे साथ वैसे ही रहो जैसे रहते हो. तुम हमसे छोटे नहीं हो. क्या मैं गलत कह रहा हूँ?"

जॉय: "बिल्कुल नहीं. अपने मेरे मन को जीत लिया, नानाजी." ये कहकर जॉय नानाजी के गले से लग गया.

फिर दोनों लौट कर रणक्षेत्र में आ गए, जहाँ अगले चरण की तैयारी चल रही थीं. शीला ने समर्थ को जॉय साथ वापिस आते देखा तो आँखों से पूछा कि सब ठीक है? समर्थ ने हल्के गर्दन के इशारे से बताया कि अब ठीक है. शीला ने चैन की साँस ली.

समर्थ: "तो मेरी प्यारी बहूरानी अब क्या चाहती है?"

सागरिका: "जो मेरे प्यारे नानाजी चाहते हैं. मेरी चूत में आपका लंड."

शीला: "देखा मेरी बहूरानी को, घर में आने के पहले ही सबका मन जीत रही है? क्यों जॉय, क्या कहते हो."

जॉय: "माँ जी, आप बिल्कुल सही कह रही हैं, इसका स्वभाव ही बहुत मिलनसार है. और अगर सामने कोई लंड तानकर खड़ा हो तो फिर ये संकोच नहीं करती. जितनी जल्दी हो सके उसे अपनी मुंह, चूत या गाँड में ले लेती है."

समर्थ ने जॉय को थम्स अप करके शाबाशी दी और सागरिका को बाँहों में लेकर उसके होंठों से अपने होंठ मिला दिए. दोनों ऐसे एक दूसरे को चूम रहे थे जैसे पृथ्वी का अंत निकट हो. समर्थ के हाथ सागरिका के वक्षस्थलों पर रेंग रहे थे. फिर उसने अपने हाथ पीछे किये और सागरिका के दोनों नितंबों को भरकर निचोड़ दिया. सागरिका की एक हल्की सी कराह निकल गयी और उसने चुम्बन को और भी गहरा करने का प्रयास किया. पर समय अब चुम्बन का नहीं, चुदाई का था. तो समर्थ ने उसका हाथ लिया और जमीन पर लगे मोटे गद्दों में से एक पर उसे ले जाकर बैठा दिया. फिर उसके साथ खुद बैठ चुम्बनों का आदान प्रदान पुनः आरम्भ हो गया.

फिर समर्थ ने सागरिका को लिटा दिया और अपना मोटा लम्बा लंड उसकी कमसिन गुलाबी चूत के मुंहाने रखा.

समर्थ: "बहू, डाल दूँ?"

सागरिका: "अब सोचिये मत, बना लीजिये आज मुझे अपनी. चोद दीजिये ये चूत।"

समर्थ ने अपने लंड को सागरिका की चूत में उतारना शुरू किया और कुछ ३-४ मिनट में पूरा लंड उसकी चूत में बैठ गया.

शीला ने जॉय को जाकर एक गहरा चुम्बन दिया, "कितने सुन्दर लग रहे हैं न दोनों?"

जॉय, जो अब खुल चुका था, ने शीला की गाँड दबाते हुए उसके चुम्बन का उत्तर दिया, "सचमुच, मुझे विश्वास है कि चुदवाती हुई आप भी बहुत ही सुंदर लगती होगी."

शीला: "ये देखने मैं अब तुम्हे ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करनी होगी, आओ पार्थ, तुम्हारे मामा को मेरी चुदवाती हुई मुद्रा देखनी है."

ये कहकर शीला पार्थ को लेकर एक गद्दे पर जाकर बैठ गई.

सुमति ने निखिल, शोनाली ने नितिन को अपने अपने गद्दों पर बैठा दिया. सुप्रिया और जॉय दोनों देख रहे थे.

सुप्रिया: "कितना मनोरम दृश्य है."

जॉय: "अगर पारुल भी होती तो और सुन्दर होता."

सुप्रिया: "हाँ, पर देखा जाये तो फिर लौंड़ों की कमी पड़ जाती."

जॉय हंस दिया. "वो तो वैसे भी पड़ने ही वाली है. अगले सप्ताह वो वापिस जो आ रही है."

सुप्रिया: "जॉय, प्लीज उसे आने के बाद मुझसे मिलने भेजना."

जॉय: "अवश्य. पर अब हम अपने विषय में भी कुछ सोचें?" ये कहकर जॉय ने सुप्रिया को बाँहों लिया और चुम्बनों की बौछार कर दी.

उसका हाथ लेकर वो भी एक गद्दे पर बैठ गया. और फिर उसने चारों ओर देखा. समर्थ अपने लंड को तीव्रता से सागरिका की चूत में पेल रहा था. वहीँ शीला के फैले हुए पांवों के बीच पार्थ का लंड चूत की गहराइयाँ नाप रहा था. सुमति ने निखिल को लिटा दिया था और वो उसके लंड पर सवार थी और आगे झुककर तेजी से अपनी गाँड उछालकर चुदवा रही थी. नितिन ने शोनाली को घोड़ी बनाया हुआ था और वो पीछे से उसकी चूत में अपना लंड पेल रहा था. चारों महिलाएं सिसकारियों और घुटी हुई चीखों से अपने आनंद का प्रदर्शन कर रहे थे. जॉय ने ये सब देखकर सुप्रिया को खड़े स्थिति में ही आगे झुका दिया और उसकी कमर को मजबूती से पकड़कर पीछे से उसकी चूत में एक ही झटके में लंड पेल दिया. अब पांचों जोड़े संभोगरत थे और आनंद में झूल रहे थे.

समर्थ: "जॉय, तेरी बेटी की चूत तो बहुत कसी है. बहुत मजा आ रहा है इसे चोदने में."

जॉय: "बाबू जी, आपकी बेटी की चूत भी कोई कम नहीं. क्या सट के जा रहा है मेरा लंड इसकी चूत में."

सागरिका: "नानाजी, थोड़ा और जोर से चोदिये न, आपका लंड बहुत मजा दे रहा है, थोड़ा और लम्बे धक्के मारिये. मेरी चूत फटेगी नहीं, सच में."

समर्थ ने ये सुनकर अपने धक्कों की गति और तेज कर दी. इस उम्र में भी उसकी शक्ति देखने वाली थी. उसके लम्बे और गहरे धक्के सागरिका की चूत को भरपूर सुख दे रहे थे. उसका पानी अब तक दो बार छूट चूका था. वहीँ शीला अपने आप को पूरी तरह से पार्थ को समर्पित कर चुकी थी. पार्थ अब उसकी बूढी चूत को प्रबल शक्ति से चोद रहा था. चूँकि शीला को इस प्रकार की चुदाई पसंद थी और वो इसकी प्रतिदिन की दिनचर्या थी, वो इस नए लंड का भरपूर आनंद ले रही थी.

शीला: "बहुत अच्छा पार्थ, तू तो बहुत बढ़िया चुदाई करता है बेटा। मेरे नातियों के साथ मिलकर एक दिन तुम मेरे तीनों छेद सील करना."

पार्थ: "नानी, आप जब कहोगी मैं आ जाऊँगा. आपके बस बुलाने की देर होगी, मैं सब काम छोड़कर आपकी सेवा में उपस्थित हो जाऊँगा."

शीला की पनियाई हुई चूत अब पार्थ को वो घर्षण नहीं दे पा रही थी. तो उसने अपना लंड बाहर निकाला और गद्दे पर बिछे हुए बिस्तर के कपडे से उसकी चूत को पोंछ कर सुखा दिया और फिर वापिस अपना पूरा लंड एक ही झटके में डाल कर बेरहमी से चोदने लगा.

शीला: "वाह रे मेरे शेर, अब फटेगी मेरी चूत सही से. चोद मुझे हरामी. दम लगाकर चोद। "

पार्थ भी कहाँ पीछे हटने वाला था. उसने ऐसी चुदाई शुरू की जिसे देखकर दुर्बल ह्रदय के व्यक्ति को आघात ही पड़ जाता. पर शीला को इसमें असीम सुख मिल रहा था.

सुमति निखिल के लंड पर पूरे जोर शोर से उछल रही थी. निखिल का लंड उसके पुत्र पार्थ के लंड के ही जितना बड़ा और चौड़ा था और उसे इससे बहुत संतुष्टि मिल रही थी. पार्थ उसको अब इतना समय नहीं देता था. घर में तीन और चुदने को तैयार चूतें जो थीं. उसे अब उसको किसी ने किसी के साथ बाँटना ही पड़ता था, अकेले माँ बेटे की चुदाई को बहुत समय हो गया था. पर आज निखिल से चुदने में उसे वही समय का ध्यान आ रहा था. और अभी नितिन भी तो था. अब भविष्य में उसे इन तीनों में से किसी न किसी के साथ अकेली रात मिल ही जाएगी. यही सोचकर उसकी चूत लगातार पानी छोड़ रही थी. वो आगे झुककर अपने मम्मे निखिल के मुंह में दबाकर उसके लंड पर जबरदस्त उठक बैठक कर रही थी. निखिल ने उसकी गाँड में एक ऊँगली डाली हुई थी जिससे वो उसके छेद को हल्के हल्के कुरेद रहा था.

सुमति फुसफुसा कर: "निखिल, मेरी गाँड जरूर मारना, उस दिन शोनाली की गाँड से तेरा रस पिया था, बहुत स्वादिष्ट था. पर मुझे अपनी गाँड से निकाल कर पीना है."

निखिल को याद आया की शोनाली ने अपनी गाँड को एक प्लग से बंद किया था क्लब में, जिससे उसका वीर्य बाहर न बहे. अब उसे समझ आ गया कि वो अवश्य सुमति के लिए सहेजी होगी. इतना प्यार और एक दूसरे का ध्यान रखने वाले परिवार की लड़की से शादी करने में कोई समस्या नहीं होने चाहिए.

निखिल: "बुआ, चिंता न करो. अब से मैं तुम्हें गाँड का इतना रस पिलवाऊंगा कि तुम्हारी सारी प्यास मिटा दूंगा. और नितिन और नाना से भी कहूंगा. आपके लिए अब कभी कमी नहीं होगी."

सुमति ये सुनकर भावुक हो गई. उसकी गति अब कभी तेज तो कभी धीमी पड़ने लगी. ये समझकर कि शायद वो थक गई हो निखिल ने उसे पकड़कर एक करवट ली और सुमति अब नीचे थी और निखिल उसके ऊपर. अब तक निखिल सुमति के परिश्रम से ठहरा हुआ था पर अब उसने चूत में अपने लंडों को ऐसे पेलना शुरू किया कि सुमति का रोम रोम कांप गया.

शोनाली और जॉय भी अपने अपने साथी की पूरे जोश से चुदाई कर रहे थे. सुप्रिया की चूत इतने बार चुदने के बाद भी व्यायाम के कारण काफी कसी थी. और उसे चोदने में जॉय को बहुत आनंद आ रहा था. उसके साथ ही शोनाली नितिन को तेज चुदाई के लिए उकसा रही थी और नितिन अपनी पूरी शक्ति उसकी चूत फाड़ने में झोंक रहा था.

लगभग पंद्रह से बीस मिनट की इस चुदाई के पश्चात एक एक करके सभी पुरुषों ने घोषणा की कि वो झड़ने वाले हैं. शीला ने सबको चेताया कि चूत में कोई नहीं झड़ेगा बल्कि सब चेहरे पर अपना कामरस छोड़ेंगे. उसने महिलाओं को भी चेताया कि वो अपना मुंह बंद रखें और अपने चेहरे पर ही पूरा वीर्य इकठ्ठा करें. सबसे पहले समर्थ की ही धार छूटी जिसने सागरिका के सुन्दर चेहरे पर गाढ़े श्वेत जल का लेप कर दिया. उसके बाद जॉय ने सुप्रिया, निखिल ने सुमति, नितिन ने शोनाली और अंत में पार्थ ने शीला के चेहरे को अपने पानी से पोत दिया. शीला ने उसे अपने चेहरे और स्तनों पर अच्छे से मला और वही अन्य महिलाओं ने भी किया.

उसके बाद शीला उठी और सागरिका के पास जाकर उसका चेहरा और स्तन चाटकर साफ कर दिया और सागरिका से अपना चेहरा और स्तन चटवा लिए. फिर उसने बाकी तीनों महिलाओं के चेहरे और स्तन चाटकर साफ किये और अंत में लेट कर ऑंखें बंद करते हुए आनंद की अनुभूति करते हुए विश्राम करने लगी. अन्य सभी लोग उठे और बार या बाथरूम की और अग्रसर हुए. कुछ ही देर में सब लोग वहीँ नंगे खड़े होकर अपनी अपनी ड्रिंक का सेवन करने लगे.

पार्थ: "नानी जी बहुत शांति से लेटी हैं. कोई परेशानी तो नहीं?"

समर्थ: "अरे नहीं, उसे लौडों का टॉनिक बहुत रुचिकर लगता है. शराब से ज्यादा उसे इस टॉनिक से नशा होता है."

पार्थ: "सच में नानाजी, सबके अपने अपने स्वाद और पसंद होती है. मम्मी को गाँड मरवाकर उससे वीर्य पीना बहुत अच्छा लगता है. न केवल इतना, बल्कि अगर गांड में वो माल कुछ समय तक ठहरा रहा हो तो उन्हें उसका स्वाद कई गुना अधिक स्वादिष्ट लगता है. हमारे यहाँ गाँड मारने के बाद उसका पूरा प्रसाद मम्मी को ही पिलाया जाता है."

सुमति ये सुनकर शर्माकर लाल हो गई.

समर्थ:" सुमति, लगता है अगले चरण में तुम्हे भरपूर भोजन मिलने वाला है. क्योंकि अगला राउंड गाँड खोलने का है."

सुमति की आँखों में एक चमक आ गयी जिसे देखकर कोई भी ये समझ सकता था कि वो इस समाचार से कितनी आनंदित हुई थी. समर्थ ने शीला को पास बुलाया और उसके कान में कुछ कहा. शीला ने मुस्कुरा कर सिर हिलाया और सुमति की ओर देखकर मुस्कुराई. सुमति झेंप गई तो शीला उसे अपने साथ अलग ले गई.

शीला: "समर्थ ने मुझे क्या बोले जानती हो?"

सुमति: "नहीं माँ जी."

शीला हँसते हुए बोली," उन्होंने कहा कि इस बार गाँड का पानी अकेले न पियूँ बल्कि इस बार पूरा तुम्हें पीने दूँ, अगली बार मैं बाँट कर पियूँ."

सुमति आश्चर्य से उसकी ओर देखने लगी.

शीला: "तुम क्या सोचती हो, तुम्हें ही सारी विकृत रुचियाँ हैं. मेरे पास आना कभी मेरी विभिन्नता देखोगी तो चौंक जाओगी."

सुमति: "माँ जी, इससे अधिक विकृत क्या हो सकता है?"

शीला ने सुमति को पास खींचा और उसके कान में कुछ कहा. सुमति की ऑंखें चौड़ी हो गयीं.

शीला: "इन सबका मजा लेना हो तो कभी आओ हमारी हवेली पर."

सुमति: "ज जज जज्जि माँ जी. आउंगी."

शीला: "चलो अब लंडों को तैयार करें, मेरी तो गाँड कल रात से खुजला रही है. समर्थ ने मुझे कल छुआ भी नहीं, अपनी ताकत बचाने के लिए."

उधर एक ओर शोनाली और पार्थ में भी कुछ गुप्त बातचीत चल रही थी. शोनाली उसकी बात से सहमत नहीं लग रही थी.

पार्थ: "मामी, मैं एक बार नानाजी से पूछ लूंगा अलग से. अगर उन्होंने सहमति दे दी, तब तो आपको कोई आपत्ति नहीं होगी न?"

शोनाली बेमन से मान गई.

पार्थ: "नानी बुला रही हैं, न जाने माँ के साथ क्या खिचड़ी पका रही थीं."

शोनाली: "बाद में पता चल जायेगा."

इसी के साथ सब अपनी ड्रिंक्स समाप्त कर चुके होते हैं और अगले चरण में प्रवेश के लिए कमर कस लेते हैं.

शीला: "अब गाँड मारने की बारी है. पर इसमें एक ही शर्त है. सारे मर्द पानी गाँड में ही छोड़ेंगे."

सबने अपनी स्वीकृति दी.

शीला ने आगे कहा, "और गाँड से निकला पूरा सूप सब मेरी सुमति को ही पिलायेंगे. तो ख़बरदार अगर किसी ने एक बूँद भी बाहर निकाला.”

ये सुनकर शोनाली सतर्क हो गई. वो तुरंत दरवाजे के पास गई और बाहर खड़े एक रोमियो से कुछ कहा. कोई ५-७ मिनट में सहायक ने उसके हाथ में कुछ थमा दिया.

शोनाली, "ये प्लग है जिससे गाँड से पानी बाहर नहीं निकलता. मैंने सबके लिए एक एक लिया है. और ये वेसलीन की ट्यूब, इतने बड़े लंडों हमारी गाँड में बिना वेसलीन के नहीं लेने वाले हम." ये कहते हुए उसने पांचों प्लग और वेसलीन की ट्यूब बाँट दिए.

समर्थ: "मैं चाहूंगा कि आप महिलाएं अपने साथी का लंडों चूस कर खड़ा करें. और इस बीच सुमति और शीला उनकी गाँड तैयार करें. बाद में सुमति शीला की गाँड तैयार करेगी."

जॉय: "पर सुमति दीदी का क्या होगा, और वैसे भी ये दोनों तीन गाँड कैसे संभालेंगी?"

इससे पहले कि समर्थ उत्तर देता शोनाली बोल उठी. "मेरे पास इसका भी उपाय है. बस ५ मिनट दो मुझे."

ये कहकर उसने टेबल से मोबाइल उठाया और एक संदेश भेजा. कुछ ५-७ मिनट में कमरे का एक दरवाजा खुला और सिमरन ने नग्नावस्था में प्रवेश किया. शोनाली ने सिमरन को उसकी भूमिका समझाई। सिमरन ने बेझिझक इस स्वीकार कर लिया. अब इस चरण की तैयारी हो चुकी थी. समर्थ गद्दे पर बैठ गए और सागरिका अपने घुटनों पर उनकी जांघों के बीच आ गई. उसने अपनी गाँड ऊपर उठाकर समर्थ का लंड अपने मुंह में ले लिया. शीला ने अपनी होने वाली बहू के पीछे स्थान लिया और उसकी जांघों से ऊपर चाटना आरम्भ किया.

जॉय ने अपना स्थान ग्रहण किया, फिर सुप्रिया ने सागरिका की तरह उसका लंड अपने मुंह में लिया और सुमति उसकी गाँड की ओर अग्रसर हुई. नितिन और शोनाली ने भी अपनी स्थिति तय की और इस बार शोनाली की गाँड के पीछे सिमरन थी. पार्थ और निखिल ने अपने लिए एक ड्रिंक बनाई और दोनों एक ओर खड़े होकर सामने चलने वाले सेक्स शो को देखने लगे. पार्थ को अपने क्लब के लिए एक नया आइडिया भी मिल गया. वो हर पार्टी में ऐसे शो अपने सदस्याओं और रोमियो से करवा सकता था. उसने मन ही मन नानाजी का धन्यवाद किया और निखिल के साथ खेल देखने लगा.

सागरिका इस समय समर्थ के लंड की पूरी श्रद्धा से चुसाई कर रही थी. ऐसा कोई अंश नहीं था जिसे उसे अछूता छोड़ा हो. उसे चाटने और चूसने में जैसे एक लालच का पुट था. जैसे कि वो कहीं खो न जाये. उसके पीछे शीला नानी उसकी चूत से लेकर गाँड तक चाटे जा रही थी. शीला अत्यंत अनुभवी और पारखी स्त्री थी. उसने अपने जीवन का लम्बा समय किसी न किसी लंड के छोर पर ही बिताया था. और कुछ ऐसी ही उनके मुंह की भी महिमा थी. वो लंडों, चूत हो या गाँड सबको इतने प्रेम से चाटती और चूसती थीं कि कोई बिरला ही उनसे स्पर्धा कर सकता था.

उनका मुख्य ध्यान सागरिका की गाँड पर ही था. उसकी गाँड के भूरे सितारे नुमा प्रवेश द्वार को वो अपनी उँगलियों से सहलाती और फिर चाट लेती. कुछ देर में उसने सागरिका की गाँड को दो हाथों से खोला और अपनी लम्बी जीभ को अंदर डालकर उससे ही जैसे उसे चोदने लगी. खुले छेद को थूक से भरकर उसने पहले दो फिर तीन उँगलियाँ अंदर डाल कर गाँड को थोड़ा चौड़ा कर दिया. फिर अपने हाथ से वेसलीन की ट्यूब लेकर लगभग एक चौथाई ट्यूब को गाँड के अंदर खाली कर दिया और दो उँगलियों से उसे अच्छी तरह से रगड़ रगड़ कर चिकना कर दिया. इस पूरे उपक्रम में गाँड का छेद अब काफी खुल गया था और समर्थ के लंड के प्रवेश के लिए अब उचित था.

दूसरी ओर सुमति जहाँ एक अनुभवी स्त्री थी पर उसका सर्वाधिक प्रेम गाँड से था. गाँड से सम्बंधित हर क्रिया की वो विशेषज्ञ थी. उसकी इस कला का एक नमूना सुप्रिया देख ही चुकी थी, और अब वो उस अनुभव के लिए दोबारा तैयार थी. बस इस बार उसके मुंह में जॉय का तमतमाया हुआ लंड भी था. सुमति उसकी गाँड खोलकर अपनी जीभ से ऐसे चाट रही थी जैसे किसी स्वादिष्ट व्यंजन खाने के बाद लोग थाली चाटते है. हर मिली मीटर को उसने चाट कर चमका दिया. और जब लगा की अब कुछ शेष नहीं है, तो वेसलीन की ट्यूब से गाँड को अच्छे से तर किया और उँगलियों से अंदर फैला कर अपने भाई के लिए उपस्थित कर दिया.

शोनाली नितिन के भारी लंड को दिल लगाकर चूस रही थी. साथ ही वो उसे अपने मुंह ने पूरी तरह लेकर अच्छे से गीला भी कर रही थी. उसके पीछे सिमरन को गाँड चाटने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, इसीलिए उसने सीधे से वेसलीन लगाकर शोनाली की गाँड को अच्छा चिकना कर दिया और तीन उँगलियों से छेद को चौड़ा भी कर दिया. ये गाँड अब चुदाई के लिए सबसे पहले तैयार हुई थी.

शीला ने सागरिका के नितम्ब पर एक हल्की चपत दी तो उसने समर्थ के लंड को अपने मुंह से निकाल दिया. समर्थ शीला के आगे खड़े हो गए और शीला ने वेसलीन से उनके लंड की अच्छी मालिश कर दी.

वहीँ जॉय और नितिन के साथ भी यही हुआ. अब तीन मोटे लंड तीन मखमली गाँड के लिए तैयार थे. शीला ने पार्थ को बुलाया और लिटा दिया. अब वो उसके लंड को चूम और चाट कर तैयार करने लगी. सुमति ने अपना स्थान शीला के पीछे लिया और अपना जादू दिखाना प्रारम्भ किया. शीला इस स्तर के गुदा प्रेम से अभी तक वंचित थी. कुछ ही क्षणों में उसकी गाँड इतनी उत्तेजित हो गई की रुकना असंभव सा लगने लगा. सुमति से उसकी मनस्थिति को समझा और गाँड में वेसलीन लगाकर तीन उँगलियों के प्रयोग से खोल दिया. फिर पार्थ उठकर पास आ गया और उसके लंड पर उसने बहुत प्रेम से वेसलीन लगाई.

सुमति: "बेटा, अच्छे से मारना नानी की गाँड, मेरे सम्मान का प्रश्न है. नहीं तो सब सोचेंगे कि मैंने तुझे कुछ सिखाया नहीं."

पार्थ: "अरे माँ, तुम चिंता न करो. नानी की मैं पूरे मन से सेवा करूँगा और उनकी गाँड का घी मथ दूंगा."

सुमति ने अब निखिल को अपने पास बुला लिया और उसके लंड पर जुट गई और सिमरन ने उसकी गाँड को तैयार करने का काम शुरू किया. कुछ ही देर में ये जोड़ा भी तैयार था. सिमरन ने सबसे विदा मांगी और बताया कि आधे घंटे में शाम का नाश्ता परोसा जायेगा.

समर्थ ने अपना लंड सागरिका की मुलायम गाँड पर रखा और बड़े ही प्रेम से अंदर धकेल दिया. प्लप्प की आवाज़ के साथ सुपाड़ा गाँड की झिल्ली को छेदते हुए अंदर चला गया. सागरिका थोड़ी कसमसाई पर आगे के लिए सँभलने लगी. उसकी गाँड पहली बार तो मारी नहीं जा रही थी, और पार्थ के लंड को भी वो ले चुकी थी. पर गाँड मरवाना कुछ अधिक जटिल होता है. समर्थ पर इस कला के पारखी थे. न जाने कितनी ही गाँड उनकी इस कला से परिचित थीं. वो अविरल बिना रुके अपने लंड को बहुत हल्के से गाँड में उतार रहे थे. सागरिका साँस रोके इस प्रहार के समापन की राह देख रही थी, जब लंड गांड में पूर्ण रूप से समा चुका होगा. उसे अपनी गाँड धीरे धीरे भरती हुई अनुभव हो रही थी. अचानक ये प्रगति रुक गई. उसने समर्थ को आगे झुककर उसकी गर्दन पर चुम्बन लिया.

फिर फुसफुसाते हुए समर्थ ने कहा, "बहू तुमने तो मेरा पूरा लंड बड़ी सरलता से ले लिया."

ये कहकर एक झटका मारा तो रहा सहा लंड भी जड़ तक जाकर बैठ गया. इसके साथ ही समर्थ ने सागरिका की चूत पर एक हाथ रखकर उसे मसलने के साथ गाँड में अपने लंड की गतिविधि आरम्भ कर दी. धीरे धीरे उन्होंने अपनी गति बढ़ाई और उसी गति से सागरिका की चूत की रगड़ाई भी. सागरिका तो जैसे पागल ही हो गई, वो लगातार झड़ रही थी. न जाने कितना पानी था उसके शरीर में जो चूत के रास्ते बहा जा रहा था. समर्थ ने अपने पूरे जोश से सागरिका की गाँड कोई १० मिनट तक मारी और फिर एक ओर रखे प्लग को उठाया और अपना पानी सागरिका की गाँड में छोड़ दिया. लंड सिकुड़ जाने के बाद धीरे से बाहर निकालते हुए प्लग जो गाँड ने डाल कर उसे सील बंद कर दिया. सुमति के लिए पहला पकवान सीलबंद हो गया था.

पार्थ ने शीला की गाँड में अपना लंड टिकाया और एक बार जैसे ही प्रवेश हुआ उसने लंड बाहर खींचकर एक लम्बे झटके में पूरा एक ही बार में पेल दिया. अब शीला की गाँड इतनी बार पिल चुकी थी कि उसे उसमें भी मजा ही आया. वो आनंद की अधिकता से चीख पड़ी.

शीला: “वाह रे मेरे शेर. फाड़ दे ये गाँड, मिटा दे इसकी खुजली. कल से लपलपा रही है लंड के लिए. तेरे नाना ने तो कल छुआ भी नहीं मुझे. आज के लिए बचा रहा था. अच्छे से चोद, चिंता न कर फटेगी नहीं. बहुत राही इस रास्ते से गुजर चुके हैं. जरा जोर से और कस के मार. हाँ यूँ अब आया मजा. बहुत अच्छा लंड है रे तेरा. सुमति, तेरी किस्मत कितनी अच्छी है जो ऐसे लंड वाले लड़के को पैदा किया.”

यूँ ही बोलते हुए शीला की चूत भी पानी छोड़ रही थी. पार्थ ने अपनी दो उँगलियों में भग्नासे को पकड़ कर मसल दिया. शीला चीखकर झड़ गयी. पार्थ उसकी गाँड पूरी बेरहमी से मार रहा था, और शीला को यही प्रिय भी था. अगर गाँड मरवाने में आंसू न निकलें तो मारने वाले के सम्मान पर बात आ जाती है. पर पार्थ उसे उसकी इच्छा से अधिक गहराई और पाश्विक ढंग से चोद रहा था. १० मिनट की इस भयंकर चुदाई के बाद पार्थ ने बताया कि वो झड़ने वाला है. अपना पानी छोड़कर, उसने अपने लंड को निकला और प्लग से शीला की लगभग फटी गाँड को सील कर दिया. सुमति के लिए दूसरा पकवान भी पैक हो गया था.

लगभग उसी समय जॉय ने भी अपना माल सुप्रिया की गाँड में उड़ेल दिया और उसे भी सुमति के भोज के लिए पैक कर दिया। शोनाली की गाँड नितिन ने भर कर पैक कर दी. अब सुमति के लिए एक ही व्यंजन चार स्वाद में भोगने हेतु उपलब्ध थे. प्रतीक्षा थी तो स्वयं सुमति की, जिसकी गाँड में अभी भी निखिल का लंड अपनी पूरी कलाबाजियां दिखा रहा था. पर कुछ ही देर में उसने भी सुमति की गाँड को सींच दिया और उसे भी प्लग लगाकर सील कर दिया.

अभी सारी महिलाएं अपने घोड़ी ही बनी हुई थीं, और सबकी गाँड अभी भी उठी हुई थी. शीला ने पहल करते हुए सुमति को घुटनों के बल बैठने को कहा. उसके बाद उसने एक एक करके सारे पुरुषों को आगे करते हुए शीला से उनके लंडों चटवा कर साफ करवाए. फिर उसने निखिल को इशारा करके एक पेग बनाने को कहा और उसे एक बाउल (बड़ी कटोरी) में लाने को कहा. निखिल समझ गया और लेने चला गया.

शीला: “सुमति, आज मैं तुम्हे ये रस पीने का एक और स्वरूप सिखाती हूँ.”

निखिल ने वो शराब (लगभग २ पेग के बराबर) से भरा कटोरा नीचे रखा. शीला ने उसके ऊपर निशाना साधा और अपनी गाँड से प्लग निकाल कर रुका हुआ वीर्य कटोरे में छोड़ दिया. एक एक करके चारों महिलाओं ने अपनी गाँड में थमा वीर्य उस कटोरे में डाल दिया. अंत में बारी आयी सुमति की तो उसने देखा कि सब उसकी ही ओर देख रहे हैं.

“अरे माँ, देखो नानी ने तुम्हारी पसंद के खाने को एक नए ढंग में बनवाया है.”

अंततः सुमति ने भी अपनी गाँड से कामरस उस कटोरे में भर दिया. जब ये सब चल रहा था तो नितिन और सागरिका सबके लिए नए ड्रिंक्स बना कर ले आये थे. अब ९ नंगे लोग अपने हाथों में ग्लास थामे खड़े थे. सुमति ने कांपते हाथों से अपना शराब, वीर्य और गाँड के रस का कॉकटेल उठाया.

“चियर्स!” सब ने जोर से चिल्लाकर सुमति को प्रेरित किया और अपने ग्लास एक बार में ही खाली कर दिए. सुमति ने भी अपना प्याला अपने मुंह से लगाकर गटागट पीना शुरू किया. पर अधिक होने के कारण पूरा नहीं पी पायी. बाकी जो बचा वो अपने चेहरे पर डाल कर उसे कॉकटेल से धो दिया.

“कीमती पेय का अपव्यय ये कहकर शीला उसके पास आयी और उसकी ठुड्डी से लेकर ऊपर तक चाटकर खुद पी लिया.

“क्यों सुमति, कैसा लगा स्वाद?”

“अच्छा था, पर तुम लोग उसमे इतना सारा दारू क्यों डाला? क्या मुझे नशे में करके मेरी गाँड मारना चाहते हो?”

ये सुनकर सब खिलखिला उठे. और फिर बाथरूम में जाकर नहाकर, अपने कपडे पहनने लगे. कुछ ही देर में वे सब संभ्रांत व्यक्तियों की तरह शाम के नाश्ते के लिए डाइनिंग रूम की और बढ़ गए. उनके पीछे, रोमियो ने कमरे को साफ किया और सभी उपयोग किये हुए बिस्तरों को हटाकर नए लगा दिए. २० मिनट में वो कमरा पहले जैसा ही हो गया था. नाश्ते के समय यूँ ही हल्की फुल्की बातें चलती रहीं. समर्थ और सिमरन में आँखों से कुछ बात हुई. समर्थ और सिमरन कुछ देर के लिए गायब हो गए. उन्होंने प्रयास तो किया कि किसी को समझ न आये पर इतने चतुर लोगों से वो बच न पाए. जब कुछ देर बाद सिमरन आयी तो उसकी चाल बदली हुई थी. शोनाली ने उसे देखकर आंख मारी तो सिमरन भी मुस्कुरा दी. समर्थ भी कुछ ही देर में आ गए. सब उनकी ओर देखकर मुस्कुराने लगे.

समर्थ: “बेचारी, सुबह से काम में लगी थी. देखा तो सोचा थोड़ी उसकी मालिश कर दूँ.”

शीला: “अंदर बाहर दोनों से मसला लगता है. कैसी थी?”

समर्थ: “जैसे पुरानी शराब.”

सब लोग हंसने लगे. यूँ ही शाम के ७ बज गए. पार्थ ने पूछा कि कौन क्या लेगा. सबने अपनी इच्छा की ड्रिंक बता दी. उसके साथ ही सिमरन ने खाने के लिए भी भेज दिया. इस समय दोनों परिवार बिल्कुल एक ही लग रहे थे.

समर्थ: “मुझे हर्ष है कि हम लोग एक दूसरे से इतने जल्दी स्वाभाविक हो गए.”

जॉय: “बाबूजी, इसके लिए आपका और माँ जी का बहुत श्रेय है. “

समर्थ: "हम बुजुर्गों का काम भी यही होता है."

शाम ८. ३० तक यही सब चलता रहा उसके बाद सबने खाना खाया और कुछ देर के लिए बाहर लॉन में बैठ गए.

सुप्रिया: “अब रात के लिए मैंने ये जोड़े तय किये हैं. सब अपने कमरे में ही रहेंगें। इससे उन्हें अलग से बात करने का समय भी मिलेगा.”

१, निखिल और सागरिका: इन्हें जीवन साथ बिताना है, इसीलिए अच्छा हो जो एक दूसरे से पूछना हो पूछ लें.

२. माँ जी और जॉय: अब जब ये समधन से अंतरंग हो चुके हैं तो उसकी माँ से भी मिल लें.

३. पापा और शोनाली: अब बेटी की माँ का भी नाप देख लें.

४. सुमति और नितिन: ये दो भाई हर मिठाई को बांटते है.

५. पार्थ और मैं: क्यूंकि मैं इसकी शक्ति और विवेक दोनों से अचंभित हूँ.

सब ने अपनी सहमति जताई और उठने लगे. तभी पार्थ ने समर्थ से कुछ बात करने के लिए एक ओर बुलाया. जब बात पूरी हो गई तो समर्थ के हाव भाव से लग रहा था कि वो सहमत है. बात समाप्त होने पर पार्थ ने शोनाली को थम्ब्स अप का इशारा किया. शोनाली और पार्थ ने समर्थ और सुप्रिया से कुछ समय माँगा और एक ओर चले गए. लगभग १५ मिनट में वे लोग वापिस आ गए. तब तक शेष सभी अपने कमरों में जा चुके थे. ये चारों भी अपने कमरों में चले गए.

अगले दिन सुबह:

अगले दिन सभी अपने कमरों से निकलकर सुबह के नाश्ते के लिए डाइनिंग रूम में पहुँच गए. इस बार समर्थ शीला, शोनाली और जॉय साथ बैठे थे. ये देखकर सबको सुखद आश्चर्य हुआ कि सागरिका ने निखिल के साथ बैठने का निश्चय किया. सुप्रिया, नितिन और सुमति, पार्थ के साथ बैठी थी. सिमरन ने बहुत अच्छा नाश्ता लगवाया था और सबने भरपूर खाया.

निखिल और सागरिका एक साथ बोले: “हमें कुछ कहना है.”

सबकी दृष्टि उनकी ओर केंद्रित हो गई.

निखिल ने पहल की: “हम दोनों की इस विवाह से सहमति है. कल रात हमने काफी देर बात की और ये अनुभव किया कि हमारी सोच लगभग हर विषय में मिलती है.”

सागरिका: “दूसरा हमने देखा कि हमारे परिवार कितनी सरलता से एक दूसरे के करीब आ गए. आज ऐसा लग ही नहीं रहा कि एक सप्ताह पहले हम लोग एक दूसरे को ठीक से जानते तक न थे, सिवाय इसके कि हम पडोसी थे.”

निखिल: “इसीलिए हमने ये सोचा है कि हम दोनों एक दूसरे और दोनों परिवारों के साथ बहुत खुश रहेंगे. और तो और हमारी जीवन पद्धति पर भी कोई आंच नहीं आएगी.”

ये सुनकर शीला ने उठकर सागरिका को गले लगा लिया और अपने गले का हार निकलकर उसे पहना दिया. उसका माथा चूमा और सागरिका ने उसके पांव छूकर आशीर्वाद लिया. फिर सागरिका ने समर्थ और सुप्रिया के पांव छुए. सुप्रिया ने भी उसे गले से लगाकर अपने हाथ का कंगन उसे पहनाया.

सुप्रिया: ”शोनाली और जॉय, आज से सागरिका हमारे घर की बेटी हुई. आप मंगनी और शादी की समय निश्चित करिये.”

ये सुनकर सुमति और शोनाली दोनों रोने लगीं. परन्तु उनके इन आँसुओं में ख़ुशी थी और किसी ने भी उन्हें चुप करने का प्रयास नहीं किया. पार्थ निखिल के पास जाकर उसके गले लग गया.

“अब हम केवल दोस्त नहीं है, जीजा जी.”

निखिल ने हंसकर अपने मित्र को उत्तर दिया, “अब संभल के रहना साले साहब.”

जॉय ने उठकर अपने कमरे से एक डिब्बा लाया और निखिल के हाथों में एक बहुमूल्य आयातित घड़ी पहना दी. फिर उसे गले से लगाकर उसके माथे को चूम लिया.

“बेटा मुझे आज इतनी प्रसन्नता मिली है, जिसका मैं वर्णन नहीं कर सकता.”

सिमरन ने भी सबको गले मिलकर बधाई दी और विश्वास दिलाया कि अगर उसकी कंपनी से केटरिंग कराई जाएगी तो वो अपनी पूरी श्रध्दा से उसे सफल करेगी. सब लोग एक हंसी ख़ुशी के वातावरण में न जाने कितनी देर बातें ही करते रहे. फिर पार्थ ने समर्थ से पूछा कि क्या जो कल बात की थी वो अभी भी वैध है. समर्थ ने हामी भरकर कहा कि अब तो १०० गुना अधिक वैध है. पार्थ ने शोनाली की ओर देखकर उसे सिर हिलाकर स्वीकृति दी.

दोपहर के खाने के पहले दो चक्र शराब के चले, इस मौके का सबने जी भर के आनंद लिया.

भोजन के पश्चात् सभी लोग खेल कक्ष में चले गए. सभी बिना कुछ कहे बिना अपने वस्त्रों से अलग हुए और उन्हें अलमारी में टांग दिया.

तभी शोनाली और पार्थ ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा.

पार्थ: “कल मैंने नानाजी से कुछ पूछा था जिसकी उन्होंने मुझे अनुमति दे दी थी. इसीलिए आज का विशेष आयोजन हमारे दोनों परिवारों की स्त्रियों के लिए है.”

शोनाली: “सुमति दीदी ने कल माँ जी से हुई बात मुझे बताई थी, जो मैंने पार्थ को बताई.”

शीला के होठों पर एक मुस्कराहट और आँखों में चमक आ गई.

“इसीलिए, आज मैंने अपने क्लब के १० रोमियो को अपनी सेवा के लिए नियुक्त किया है, इनमे से छह से आप कल मिल चुके हो, जो हमारे साथ उपस्थित थे. दोनों सहायिकाएं सोनम और नूतन भी उपस्थित रहेंगी. अब चूँकि हम सब व्यस्त होंगे तो पूरे कार्यकर्म का निर्देशन सिमरन जी करेंगी.”

ये कहकर उसने दो बार ताली बजाई। एक ओर का दरवाजा खुला जिसमें से सिमरन नंग धडंग अंदर आयी. उसके दोनों ओर उनकी दोनों सहायिकाएं सोनल और आतिशी भी नंगी खड़ी हो गयीं.

उसके बाद दरवाजे से १० नंगे लड़कों ने प्रवेश किया. और वो सब सिमरन के पीछे एक व्यूह में खड़े हो गए.

पार्थ: “आज हम सब अपने परिवार की महिलाओं को एक साथ तीन पुरुषों से सम्भोग का सुख देंगे. पर इसमें कुछ नियम हैं जो हर स्त्री के स्वभाव के अनुरूप होंगे:

१. गाँड का रस मम्मी को ही अर्पित होगा.

२. नानी माँ को अंत में वीर्य से नहलाया जायेगा.

३. चूत मारने के बाद के रस का सेवन केवल सागरिका के लिए होगा.

शोनाली: “मेरे विचार में ये नियम सही हैं और अगर किसी को कोई आपत्ति है तो बता सकता है.”

समर्थ: “मुझे ये देखकर प्रसन्नता होती है कि तुम हर कार्य एक नियम के अनुसार करते हो. मुझे किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं है.”

अन्य सबने भी अपनी स्वीकृति दी.

"इसमें से पहले सागरिका और नितिन, सुमति दीदी और पापा जी साथ होंगे क्यूंकि उन्हें अभी तक एक दूसरे का साथ नहीं मिला है. शेष सब एक म्यूजिकल चेयर से जीते जायेंगे.”

ये कहकर शोनाली ने पाँचों स्त्रियों को एक गोले में खड़ा कर दिया. अब पुरुष लोग एक गोले में आ गए. शोनाली के कहने पर सिमरन ने एक गाना बजा दिया और सब आदमी गोले में घूमने लगे. इसमें होना ये था कि गाना रुकने पर जो भी आदमी जिस स्त्री के सम्मुख होता वो उसका साथी बन जाता. इसमें सागरिका और सुमति को केवल दो लोगों को चुनना था. तीन बार में सबके साथी निश्चित हो गए.

शोनाली के हिस्से में निखिल +२ आये , सुप्रिया को पार्थ +जॉय +१ मिले और शीला को तीनों नए रोमियो. २ २ रोमियो सागरिका और सुमति को भी मिले. .

और एक सामूहिक चुदाई का नंगा खेल प्रारम्भ करने के लिए बीच में आ गए.

कुछ ही समय में कमरा नंगे शरीरों का एक अखाडा बन गया था. पांचों महिलाएं एक गोल चक्र में एक दूसरे को देखती हुई बैठ गयीं. जब एक बार महिलाओं ने अपने हिस्से के लंड को चूस चाट कर कड़ा कर लिया तो उन्हें जल्द से जल्द अपने काम पर लगने के लिए उत्साहित करने लगीं.

शीला इस समय तीन रोमियो के बीच में सैंडविच बनी हुई थी. एक लंड उसकी चूत में था, एक गाँड में और एक मुंह में. सबसे बड़ी बात की तीनो लंडों १० इंच से अधिक बड़े थे यानि उसके शरीर में ३० इंच से अधिक लम्बाई के लंड भरे हुए थे. और वो सब उसके द्वारा उत्साहित किये जाने के कारण एक गहराई और बेदर्दी से उसके छेदों को मथ रहे थे. एक लंड जब चूत में घुसता तो गाँड वाला बाहर निकलता और इसी लय ने उसके दोनों छेदों का मंथन कर रखा था. उसके मुंह का लंड पहले तो शीला की दया पर निर्भर था पर बाद में उसने भी शीला का सिर पकड़कर उसे अपनी गति से चोदना शुरू कर दिया था.

यही कुछ स्थिति शेष महिलाओं की भी थी. इस समय प्रेम और प्यार नहीं बल्कि शरीर का सहवास हो रहा था, सिर्फ शरीर की भूख मिटाई जा रही थी. सिमरन एक घडी से समय देख रही थी. उसने ३ मिनट पूरे होने पर “CHANGE” की आवाज़ दी. ये सुनकर सबने अपने लंड बाहर निकाल लिए. फिर गाँड मारने वाले आदमी ने अगली औरत के पास जाकर अपना लंड उसके मुंह में डाल दिया. जिसका लंड मुंह था वो नीचे लेट गया और चूत में लंड पेल दिया और जो चूत में था उसे गाँड में स्थान मिला.

(समझने के लिए: शीला की गाँड मारने वाले व्यक्ति ने अपने लंड को सुमति के मुंह में डाला. शीला की चूत मारने वाले ने गाँड में लंड डाला और सागरिका की गाँड मारने वाले ने अपना लंड शीला के मुंह में डाला.)

इसी प्रकार से हर 3 मिनट में सिमरन आवाज़ देती और हर आदमी अपने हिस्से का छेद बदल कर अगले गंतव्य पर चला जाता. इस पूरे क्रम को पूरा करने में ४५ मिनट निकल गए और अब आदमियों से रुका नहीं जा रहा था. महिलाएं भी अब थकान की ओर जा रही थीं. अंत में जो जहाँ से आरम्भ किया था वहीँ वापिस पहुँच चुका था. एक एक करके लंडो ने पानी छोड़ना शुरू कर दिया और कुछ ही मिनटों में हर छेद पानी से लथपथ हो गया था. सागरिका अपने सामने आयी चूत से रस पिने लगी और सुमति गाँड. सब की साफ होने के बाद सब लोग निढाल पड़ गए.

सिमरन, सोनम और नूतन ने गर्म पानी से गीले तौलिये लाये और सबके शरीर एक एक करके पोंछकर साफ किये. उसके बाद सबके लिए एक नया ड्रिंक बनाया और सबको दिया. अपना ड्रिंक पीते हुए सब यही सोच रहे थे कि क्या हम लोग विकृत तो नहीं हैं. दोपहर के लगभग तीन बज चुके थे और ५ बजे निकलना भी था तो यही तय किया कि अब अंतिम चरण का खेल शुरू किया जाये.

पर शीला ने अपनी मांग रख दी.

शीला: “देखो, ऐसा अवसर बार बार नहीं मिलता है. तो मैं अपनी एक इच्छा पूरी करना चाहती हूँ.”

समर्थ: “इतने वर्षों से इतना खेलने के बाद अभी भी कुछ है जो बचा है तुम्हारे मन में?”

शीला: “और क्या. मेरा मन एक साथ चार लंडों से चुदने का है. एक मुंह में, दो चूत और एक गाँड में.”

समर्थ: “इस उम्र में झेल पाओगी ये सब.”

शीला: “कोई नहीं, अगर झेल नहीं पायी तो कम से कम प्रयास करते हुए मरूंगी.”

समर्थ: “चुप कर. ऐसा क्यों बोलती है?”

शीला ने जॉय, पार्थ, निखिल और नितिन की ओर देखकर कहा, “करोगे इस बुढ़िया की इच्छा पूरी?”

जॉय: “अवश्य करेंगे, पर आप अपने आप को बूढ़ा समझना छोड़िये.”

ये कहकर चारों ने उसे घेर लिया. घर के चारों पुरुषों ने उसे घेर कर लिटा दिया. सोनल और नूतन आगे आयीं और सभी पुरुषों के लंड चूसकर अच्छे से खड़ा करने में लग गयीं. समर्थ बड़ी भूखी आँखों से दोनों को देख रहे थे.

शोनाली उनके पास गई, और धीरे से बोली, “आप का जब दिल करे बाबूजी, तब आप सोनम और नूतन की मार लेना.”

समर्थ: “मुझे पता है कि तुम मुझे निराश नहीं करोगी.”

इस समय सामने जॉय ने अपना स्थान गद्दे पर बनाया और सबने मिलकर सँभालते हुए शीला को उसके लंड पर बैठाया. निशाना गाँड पर था और कुछ ही मेहनत से जॉय का पूरा लंड शीला की गाँड में बैठ गया. अब बारी पार्थ और नितिन की थी दो लंड शीला की चूत में डालने की. कुछ अचरज भरी कलाबाजियों के साथ ये भी संभव हो गया और अब शीला की चूत में दो लंड थे और एक उसकी गांड में था. निखिल ने आगे आकर अपना लंड शीला के मुंह में घुसा दिया.

और अब आरम्भ हुआ चुदाई का वीभत्स नाच. वैसे भी सबके लौड़े एक से बढ़कर एक थे और जिस लयबद्ध तरीके से वो चोद रहे थे उससे ये प्रतीत होता था कि ये उन्होंने पहले भी किया हुआ है. शीला के मुंह में अगर निखिल का लंड न होता तो शायद उसकी चीखें क्लब को हिला देतीं. कुछ ही समय में शीला के झड़ने का सिलसिला थमा तो सबने एक दूसरा आसन में आक्रमण चालू रखा. इसी तरह से अलट पलट कर चारों मिलकर शीला को एक गुड़िया की तरह चोद रहे थे.

तभी एक धक्के में गलती से नितिन का लंड चूत से बाहर तो आया पर चूत में जाने की स्थान पर नितिन ने उसे निखिल के लंड के साथ जो उसकी नानी की गाँड में पहले ही डला हुआ था उसके साथ मिला दिया. अब शीला की गाँड में दो लंड थे और चूत में एक.

(नीचे मैंने इस पराक्रम के कुछ चित्र भी लगाए हैं.)

इस प्रकार से शीला मंथन यही कोई बीस मिनट चला होगा. जिसके अंत तक शीला चुद चुद कर और झड़ झड़ कर निर्जीव सी हो गई थी. उधर सभी महिलाओं ने बाकी के लंड भी चूसकर झड़ने की कगार पर ला दिए थे. जब चुड़क्कड़ चार झड़ने के करीब पहुंचे तो वो हट जाते. जैसे ही आखिरी आदमी ने अपना लंड शीला के मुंह से निकाला, सब उसके इर्द गिर्द घेरा बनाकर खड़े हो गए और मुठ मारने लगे. एक एक करके हर पुरुष ने अपना गाढ़ा सफ़ेद वीर्य शीला के चेहरे और शरीर पर गिरा दिया. जब सब हटे तो शीला का चूत से ऊपर का पूरा शरीर कामरस से पुता हुआ था. पर शीला निढाल पड़ी थी. सागरिका और सुप्रिया ने छाती और पेट, शोनाली ने चेहरा और सुमति ने चूत और गांड को चाटकर अच्छे से साफ कर दिया. सब खड़े होकर शीला के भोगे हुए शरीर को देख रहे थे.

कुछ देर में शीला ने आंख खोली और सबको अपनी ओर देखता पाया.

शीला: ” आऊवोह, मैं जीवित हूँ? मैं तो समझी थी कि मैं मर चुकी हूँ और देवलोक में मुझे चोद रहे हैं.”

सुप्रिया: “अरे मम्मी तुम पूरी जीवित हो.”

समर्थ ने हाथ बढाकर शीला को खड़ा किया.

समर्थ: “तो कैसा रहा तुम्हारा ये अनुभव?”

शीला: “अद्भुत, अद्वितीय, अकल्पनीय. मैं तो समझी थी कि मैं स्वर्ग में हूँ. पर इन लड़कों ने मुझ बुढ़िया की हड्डियां हिला डालीं ” फिर रूककर, “मुझे उसका नाम बताओ जिसने मेरी गाँड में दूसरा लंड डाला था.”

सब सहम गए, फिर नितिन ने हाथ खड़ा किया. शीला आगे बढ़ी और उसे चूम लिया.

“तूने मुझे वो सुख दिया जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी.”

पार्थ ने तभी कहा, “अब हमारे निकलने का समय हो रहा है, तो सब लोग नहाकर तैयार हो जाओ.”

सब एक एक करके तैयार हो गए. पार्थ ने सिमरन को बुलाकर कहा, “आपका बोनस पक्का है. अगले महीने के दूसरे शनिवार को सारे रोमियो आपकी सेवा में होंगे.”

तैयार होकर सब बाहर आये और एक दूसरे की गले मिलकर फिर संबंध बनने की बधाई दी और अपनी गाड़ियों में सवार होकर अपने घर के लिए निकल गए.

क्रमशः

1150900
 
अध्याय १३: चौथा घर - मिशेल और रिचर्ड डिसूज़ा २

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विश्वविद्यालय:

जैसन और ईव का बेटा मार्क इस समय विश्वविद्यालय के प्रविष्टि अध्यक्ष के समक्ष खड़ा था. उसने भारत आने से पहले यहाँ से पढाई करने का आवेदन किया था. क्यूंकि उसके नंबर अच्छे थे और उसने विदेशी छात्र के रूप में आवेदन किया था, इसीलिए प्रवेश मिलना एक औपचारिकता ही थी. वैसे भी उनके देश से कई छात्र हर वर्ष भारत पढ़ने के लिए आते हैं. इस समय शैली भी मार्क के साथ ही थी. मार्क ने उसे साथ आने का निमंत्रण दिया था जो शैली ने स्वीकार किया था.

प्रविष्टि अध्यक्ष: “मार्क, तुम्हारा आवेदन स्वीकृत हो चूका है. तुम चाहो तो शुल्क आदि जमा कर सकते हो. विदेशी क्षात्र होने के कारण अगर चाहो तो हॉस्टल में कमरा की भी व्यवस्था है. हमारा अगला शैक्षिक वर्ष ३० दिन में ही प्रारम्भ हो रहा है. स्टूडेंट वीसा के लिए मुझे नहीं लगता कि तुम्हें किसी भी प्रकार की दुविधा होगी. शैली तुम कल चाहो तो मार्क को कैंपस की यात्रा करवा सकती हो. उसके लिए मैं एक अनुमति पत्र तुम्हें दे रहा हूँ हो जो ५ दिन के लिए वैध है.”

ये कहकर उन्होंने एक पत्र शैली को दे दिया. शैली ने उसे पढ़ा और अपने पर्स में रख लिया. इसके बाद दोनों ने अनुमति ली और आगे के कार्य के लिए कल आने का निश्चय किया.

“मार्क, कहो तो कैफ़े में बैठकर कॉफी पीते हैं फिर घर चलेंगे. वैसे भी तुम्हें तीन घंटे हो चुके हैं. जैसन अंकल मस्ट बी वरीड.”

”या, आई टोल्ड हिम फॉर २ हावर्स ओनली. पर अभी ३ घंटे से अधिक हो गया है.” फोन मानो इसी के लिए रुका था, और अब बज उठा.

“हल्लो डैड, ..... यूनिवर्सिटी… डन हियर. कॉफी पीकर घर आ रहे हैं. यस, शैली इस विद मी. विल बी होम सून.”

“ओके, कॉफी और फिर घर. लेट अस गो! ”

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मिशेल का घर:

जैसन: “सब आ रहे हैं. मार्क यूनिवर्सिटी में है, शैली के साथ. ईव और ऐलिस भी बस आते ही होंगे.:

तभी घर की घंटी बजी और मिशेल ने दरवाजा खोला.

“ईव! ऐलिस!! ओह माई गॉड. यू लुक सो ब्यूटीफुल.” मिशेल उन दोनों से गले मिलकर उनके गालों पर चुम्बन लेते हुए ख़ुशी से चीख पड़ी.

“ओह, बुआ, यू लुक सो फ्रेश एंड यंग. आप क्या खाते हो मुझे भी वो रेसिपी चाहिए. प्लीज बुआ.”

रिचर्ड अब तक पास आ चुका था, “ये फ्रेश जूस पीती है, और वो भी स्त्रोत से.” रिचर्ड ने उत्तर दिया, “हेलो ईव. वेलकम होम. बहुत देर कर दी आने में.” फिर ऐलिस की ओर मुड़कर, “हे बेबी डॉल, तुम तो बहुत सुन्दर हो गई हो. लोगों से बचाकर रखना होगा तुम्हें.”

“लोगों से तो मैं इसे बचा लूंगी, डियर. पर तुमसे इसे कौन बचा पायेगा?” मिशेल ने अठखेली की.

सब हंस पड़े.

“अंकल रिचर्ड, डोंट वरी, मैं आपसे बचने की कोई ट्राई नहीं करूंगी. यू नो व्हाट आई मीन.”

“लो अभी घर में आयी नहीं और मेरे हस्बैंड को स्टील करने लगी, यू नॉटी गर्ल. चलो सब अंदर चलो.”

सब लोग अंदर बैठक में आ गए. जैसन भी खड़ा हो कर उन्हें मिला. तभी डेविड स्विमिंग पुल से अंदर आया. और जैसी उसकी आदत थी, केवल स्विमिंग अंडरवियर पहने हुए और एक तौलिये से अपने बाल पोंछते हुए.

“डेविड, कम से कम टॉवल तो लपेट लेते. देखो ईव और ऐलिस भी पहुँच गए.” मिशेल ने डांटने के स्वर में कहा.

“अरे मॉम, इट इस OK. माय लवली मामी हैज़ कम. हेलो मामी। आई ऍम श्योर यू विल कम (cum) ए लॉट ऑन दिस विजिट. ” ये द्विअर्थी कथन कहते हुए ईव से चिपक गया. ईव भी उसके शक्तिशाली शरीर से चिपक गई. उसने अंडरवियर से उभरते हुए लंड को भी अनुभव किया.

ईव: “तुम तो बड़े हो गए डेविड. कितनी गर्लफ्रेंड हैं.”

डेविड: “आपके जैसी एक भी नहीं.”

ईव: “नॉटी नॉटी, अपनी मामी को कोई ऐसे बोलता है?”

डेविड अब तक ऐलिस का ध्यान कर रहा था, “हे कज़न, यू लुक रेविशिंग,ब्यूटीफुल.” डेविड उसके भी गले लगते हुए बोल पड़ा.

“तुम भी बहुत हैंडसम हो गए हो डेविड.”

“चलो, तुम बैठो, मैं चेंज करके आया.”

कुछ ही समय में मार्क और शैली भी पहुंच गए और उन्हें बताया कि प्रवेश हो गया है. कुछ देर सबने बैठ कर बातें करीं और तब तक खाना तैयार हो गया. बातें करते हुए सबने खाना खाया. रिचर्ड ने ये बता दिया कि मार्क को हॉस्टल में रहने की कोई आवश्यकता नहीं, वो यहीं रहेगा घर में. डेविड और मार्क कमरा शेयर कर सकते हैं या मार्क अलग कमरा भी ले सकता है. परन्तु अगर कोई अतिथि आता है, तो उन्हें कमरा शेयर करना होगा. मार्क ने कहा कि उसे कोई आपत्ति नहीं है. अभी के लिए मार्क डेविड के साथ और ऐलिस शैली के साथ रहेगी. जैसन और ईव को अलग कमरा दिया गया था.

खाने के बाद सब अपने कमरों में जाने लगे क्योंकि वार्ड परिवार थका हुआ था.

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ईव का कमरा:

कमरे में जाने के बाद कमरा लॉक करते ही जैसन ईव पर झपट पड़ा.

“क्या बेबी, तुम कहाँ चली गयी थीं?”

“बोरिस और उसके दोस्तों के रहने का प्रबंध देखने के लिए. जो कार्य तुम्हें करना चाहिए था.” ईव ने उसे उलाहना देकर कहा.

“वेल, मैं जाने ही वाला था कि रिचर्ड आ गया और फिर समय का पता ही नहीं चला. पर फिर भी इतनी देर क्यों लगी?”

“क्योंकि मैं उनके काले लौडों का स्वाद ले रही थी.” फिर थोड़ा ठहर कर, “ऐलिस के साथ.”

“मुझे अगर बता कर जाती तो अच्छा होता. पर ऐलिस को इसमें सम्मिलित मत करो.”

“वो नहीं हुई थी.” ईव ने कहा. “मैं भी जितना चाहती थी उतना नहीं हुई. देखते हैं अगर अवसर मिला तो एक दो चक्कर लगा लूंगी वहां का.”

“बी केयरफुल, यहाँ इतने घर नहीं कि तुम्हारी गतिविधि चुप सके. और मिशेल पर इसका सामाजिक रूप से प्रतिकूल असर हो सकता है.”

ईव अब चिढ़ने सी लगी थी. एक तो उसकी चुदाई नहीं हुई थी, और अब उसका पति उसे उपदेश दे रहा था.

जैसन ने उसका मूड भांप लिया और चुप हो गया. दोनों लेट गए पर किन्ही कारणों से नींद दोनों की आँखों से दूर थी. ईव की चुदने की इच्छा थी पर जैसन से इस प्रकार बात करने के बाद वो झुकना नहीं चाहती थी. जैसन ईव का मूड ठीक करना चाहता था. वो यहाँ कुछ ही दिनों के लिए थे और वो इस समय को भलीभांति बिताना चाहता था. यूँ ही रात के लगभग ११ बज गए. अचानक उसे कुछ ध्यान आया जिससे शायद ईव का मूड ठीक हो सके.

“बेबी, रिचर्ड ने बहुत सुन्दर क्रीड़ांगन बनाया है नीचे बेसमेंट में. बोलो, चलोगी देखने?”

ईव समझ गई कि जैसन उसे प्रसन्न करने का प्रयास कर रहा है. वैसे भी जो हुआ उसमे जैसन की कोई गलती नहीं थी. उसने हामी भरी और अपना नाइट गाउन पहन लिया. रिचर्ड ने भी अपना गाउन पहना और उसे लेकर बेसमेंट की और चल पड़ा.

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तलघर की सैर:

तलघर के प्रवेश ( सीढ़ियां नीचे थीं) पर पहुंचकर अपनी फोन की टॉर्च जलाई क्योंकि पता नहीं था कि लाइट का स्विच कहाँ है. जब वो नीचे की ओर पहुँचने लगे तो उन्हें पानी की आवाज़ आई. शायद कोई तैराकी कर रहा था. जैसन ने ईव को चुप रहने संकेत किया. एक दो सीढियाँ और उतरने पर उन्हें नीचे प्रकाश दिखाई दिया. जैसन का दिल धड़कने लगा. ईव ने जैसन का हाथ पकड़ लिया. जैसे ही वो आखिरी सीढ़ियों पर पहुंचे तो सामने का दृश्य देखकर हतप्रभ रह गए. डेविड स्विमिंग पूल के किनारे नंगा बैठा हुआ था, एक स्त्री अपना चेहरा उसकी जांघों के बीच में छुपाये हुए थी. डेविड की पीठ सीढ़ियों की ओर होने से उस स्त्री का चेहरा नहीं दिख रहा था.

पर कुछ ही समय में ये रहस्य भी सुलझ गया. पूल के एक ओर रिचर्ड बैठा हुआ एक गिलास से कुछ पी रहा था. सम्भवतः व्हिस्की. वो भी इस समय नंगा था और उसकी गोद में भी एक स्त्री का सिर छुपा था. पर चूँकि उसके बैठने का कोण ऐसा था तो उस स्त्री का आधा चेहरा देख पा रहे थे. वो कोई और नहीं शैली थी, जो अपने पिता के लंड को बड़े ही प्यार से चाट और चूस रही थी. इसका अर्थ यही था कि पूल के अंदर मिशेल थी और वही अपने बेटे डेविड का लंड चूस रही थी.

“हमें चलना चाहिए.” ईव ने जैसन से फुसफुसाकर कहा.

जैसे ही दोनों मुड़े तो फोन की टॉर्च का प्रकाश रिचर्ड की आँखों में पड़ा. उसने जान लिया कि ये अवश्य ही जैसन है. पर उसके साथ कौन था. ईव ही होगी. कुछ ही सेकंड में रिचर्ड ने निर्णय लिया.

“जैसन!” उसने पुकारा.

“यस” जैसन के मुंह से स्वाभाविक रूप से उत्तर निकल गया.

“कम बैक हियर.”

जैसन ने ईव ओर देखा तो उसने अपने कंधे उचका दिए. जैसन ने ईव का हाथ लिया सीढ़ियों से उतर कर क्रीड़ांगन में आ गया. अब तक अन्य तीन भी अपनी गतिविधियां रोक कर घटनाक्रम को देख रहे थे.

“कम जैसन एंड ईव. ज्वाइन अस.” ये कहकर रिचर्ड खड़ा हो गया. “डेविड, गेट देम ए ड्रिंक.”

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मार्क :

मार्क की बीच में ही प्यास के कारण नींद खुल गई. उसने उठकर देखा तो डेविड अपने बिस्तर पर नहीं था. ये सोचकर कि बाथरूम में होगा, मार्क ने पानी पिया पर उसे नींद नहीं आई. जब डेविड को न आये हुए कुछ अधिक समय हो गया और उसे भी बाथरूम जाने की आवश्यकता लगी तो उसने बाहर के बाथरूम में जाने का निर्णय किया. बाहर बाथरूम से निकल कर उसने सोचा कि अब उठ ही गया हूँ तो अगर बियर हो तो पी लेता हूँ. ये सोचकर वो बार के फ्रीज़ में ढूंढने लगा. एक बियर का कैन खोलकर पी ही रहा था की उसे अपने माँ बाप नीचे आते हुए दिखे. उसे उनकी गतिविधि कुछ असामान्य लगी. थोड़ी आड़ में हो गया. पर उन्होंने उसकी ओर देखा भी नहीं, बल्कि घर के दूर कोने में गए और लुप्त हो गए.

मार्क ने अपनी बियर समाप्त की और इस रहस्य से पर्दा हटाने का निश्चय किया. वो धीमे पांवों से उस ओर गया तो उसे नीचे जाती हुई सीढ़ियाँ दिखाई दीं. पर जैसन और ईव नहीं दिखे. वो सोच में पड़ गया कि क्या करे. अधिक देर होने पर डेविड आ सकता था. उसने सोचा कि एक बार देखकर लौट जाता हूँ. अँधेरे में अनजाने रास्ते पर जाते हुए वो संभल कर चल रहा था. जब वो नीचे तक पहुंचा तो उसे लोगों के बातें सुनाई देने लगीं. अब वो असमंजस में था कि आगे बढ़े या लौट जाये. जिज्ञासावश उसने एक बार झाँककर लौटने का निर्णय लिया. वो आखिरी सीढ़ी पर आकर गया और ये समझ गया कि जल्दी लौटने की आवश्यकता नहीं थी. डेविड यहीं था.

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तलघर में खेल:

डेविड ने मामा मामी के लिए ड्रिंक बनाई. अब तक मिशेल पूल से बाहर आ चुकी थी और उसके नंगे शरीर पर पानी की बूंदें झिलमिला रही थीं. उसने सधे क़दमों से ईव के सामने खड़े होकर उसका हाथ अपने हाथ में लिया और फिर उसके होंठ चूम लिए.

“ईव, स्वीटहार्ट, तुम्हें नहीं लगता कि तुम कपड़े कुछ अधिक पहने हो. आश्चर्य मत करो, जैसन ने तुम्हारी जीवनशैली के बारे में रिचर्ड को बताया है. और जैसा तुम देख सकती हो हमारी भी कुछ भिन्न नहीं है. तो कम एंड ज्वाइन अस इन द फन.” ये कहकर मिशेल ने ईव के गाउन की डोर खोल दी और उसे ईव के कन्धों से सरका कर गिरा दिया.

डेविड ने एक सीटी बजाई, “वाओ, ईव आंटी, यु आर सो हॉट!” ये कहते हुए उसने अपने तने हुए लौड़े को हाथ में लेकर हिलाया.

शैली ने भी पास आते हुए ईव के होंठ चूमे और उसकी सुंदरता की प्रशंसा की. फिर वो जैसन की ओर मुड़ी.

“हे, यू आल. सबने मेरे हैंडसम अंकल को तो अकेले ही छोड़ दिया. वरी नॉट अंकल, आई विल टेक केयर ऑफ़ यू.” ये कहकर पंजों के बल ऊपर होकर उसने जैसन के होंठ चूम लिए और उसके लंड को अपने हाथ में लेकर सहला दिया.

“मेरे विचार से हमें इस मिलन के लिए एक ड्रिंक और लेना चाहिए. चलो सब अंदर चलते है. डेविड और शैली सबके लिए ड्रिंक्स लाओ अंदर. पर जैसन तुम अपना गाउन तो उतारो। अंदर कपड़े अलाऊ नहीं हैं.” ये कहकर सब अंदर की ओर चल दिए. जैसन ने भी अपना गाउन उतार फेंका और उनके पीछे हो लिया.

मार्क ने भी इस खेल में भागीदार होने का प्रण किया. शैली और डेविड सबके लिए ड्रिंक्स बना रहे थे. मार्क ने जल्दी से अपना शार्ट उतारा और उनके पीछे खड़ा हो गया.

मार्क: “मैं कुछ सहायता करूँ?”

डेविड: “नहीं, सब रेडी है.” उसने उत्तर दिया पर उसे एकदम एक झटका लगा जब उसने ये समझा कि इस समय कोई और साथ नहीं होना चाहिए. डेविड और शैली दोनों ने पलट कर देखा तो मार्क को नंगा खड़ा पाया.

मार्क: “मैंने सोचा शायद मेरी सहायता चाहिए होगी, इसीलिए पार्टी में आ गया.”

अब डेविड और शैली को कुछ सूझ नहीं रहा था.

“रिलैक्स गाइज़, हम भी अपने घर में ये खेल खेलते हैं. पर तुम्हारा सेटिंग बहुत बढ़िया है. सो, सहायता चाहिए?”

शैली ने अपनी ऑंखें झुककर मार्क के लंड को देखा. फिर उसने लंड को हाथ में लिया.

शैली: “सहायता के लिए कभी न नहीं करना चाहिए. है न डेविड.”

डेविड: “ओह, आई ऍम फ़ाईन विद इट.”

शैली: “तो चलो ड्रिंक्स ले कर जाने में हाथ बंटाओ.”

मार्क: “पर मेरी ड्रिंक.”

शैली: “ओह, या, ओके. बना लो और चलो हमारे साथ. हमारे पीछे चुप कर चलना. सरप्राइज़ देंगे.”

सबकी ड्रिंक्स लेकर मार्क उन दोनों के पीछे छुपते हुए कमरे में चला आया. जैसन और रिचर्ड को शैली ने ड्रिंक्स दे दीं। फिर ईव और मिशेल की ओर बढ़े, पर डेविड और शैली उन्हें छोड़कर आगे चले गए और मार्क उनके सामने खड़ा हो गया.

“ड्रिंक्स फॉर द लेडीज़।” उसने मुस्कुराकर कहा.

जैसन और रिचर्ड ने मार्क को देख तो लिया था पर सब कुछ इतना तेजी से घटित हुआ कि उन्हें कुछ भी करने का अवसर नहीं मिला. और यही स्थिति मिशेल और ईव की भी थी. पर मिशेल जल्द ही संभल गयी.

“ओह, यू स्वीट बॉय. थैंक यू.”

अब चूँकि सब पर्दे हट चुके थे तो सब आराम से अपनी ड्रिंक्स पीने लगे. पर रिचर्ड ने इस पूरे पात्रों के बीच एक कमी का अनुभव किया.

रिचर्ड: “अब अगर सब यहाँ आ ही चुके हैं तो क्यों ऐलिस को अलग रखा जाये. जैसन तुम्हे ठीक लगे तो मार्क जाकर ऐलिस को भी ले आए.”

जैसन: “बात तो ठीक ही है. मार्क, प्लीज ऐलिस को भी ले आओ।”

मार्क तुरंत ही ऐलिस के कमरे की ओर दौड़ पड़ा.

मिशेल हंस पड़ी, “पुअर बॉय, अपने कपड़े भी नहीं पहने जल्दी में.”

सभी लोग हंस पड़े.

मार्क इसीलिए जल्दी में था क्योंकि वो चाहता था कि आज मिशेल के साथ चुदाई का पहला अवसर उसे ही मिले. जब मार्क ऐलिस और शैली के कमरे के बाहर पहुंचा तो रुक कर अपनी साँस संयत करने लगा. वो ऐलिस को वैसे ही जगाने वाला था जैसे घर में जगाता था. उसने धीरे से दरवाजा खोला और अंदर झाँका. ऐलिस शांति से सोई थी. उसका गाउन उसकी जांघों तक चढ़ा था. रात को सोते समय वो पैंटी नहीं पहनती थी. मार्क ने ऐलिस के पाँव फैलाये और उसकी गुलाबी चूत में अपना मुंह लगा दिया और चाटने लगा.

ऐलिस कुनमुनाई, “मुझे सोने दे, ब्रो।”

मार्क: “उठो तो सही, एक बहुत बढ़िया सरप्राइस है.”

ऐलिस धीरे से आंख होली, “क्या है?”

मार्क: “यहाँ नहीं, तुम्हें मेरे साथ चलना होगा.”

ऐलिस धीरे से उठी और ऑंखें मिचमिचाते हुए मार्क को देखने लगी. उसे नंगा देखकर उसने शैली के बिस्तर की ओर देखा.

“तुम नंगे क्यों आ गए मेरे रूम में? और ये शैली कहाँ है?”

“सब बताता हूँ, तुम जल्दी से फ्रेश हो जाओ और मेरे साथ चलो.” मार्क अधीर हो रहा था. उसे चिंता थी कि मिशेल पर कोई और हाथ न मार ले, विशेष रूप से डेविड। ऐलिस न नुकुर करते हुए अंततः बाथरूम में घुस ही गयी और आश्चर्यजक रूप से केवल ५ मिनट में ही बाहर निकल आयी. उसने एक गाउन पहना हुआ था और उसके नीचे पजामा था.

“चलो, दिखाओ क्या सरप्राइज़ है.”

मार्क ने सामने पड़ा एक स्कार्फ उठाया और ऐलिस का हाथ थमा और उसे लेकर बाहर चल पड़ा. जब वो तलघर के प्रवेश पर पहुंचा तो उसने ऐलिस को रोका.

मार्क: “सरप्राइज़ के लिए मुझे तुम्हारी आंख पर ये पट्टी बांधनी पड़ेगी. और फिर इन सीढ़ियों से मेरे साथ नीचे चलना होगा. मैं तुम्हारा हाथ पकड़े रहूँगा। सो, डोंट वरी। और मैं बाद में तुम्हारा गाउन भी उतारूंगा, तो चिल्लाना मत. ओके?“

“ओके”

अब ऐलिस भी कुछ रोमांचित हो रही थी. ऐसा खेल उन्होंने कभी नहीं खेला था. उसने मार्क को अपनी आंख पर पट्टी बांधने दी. उसका हाथ पकड़कर वो सीढियाँ उतर गया और फिर ऐलिस को बताते हुए की सीढ़ी ख़त्म हो चुकी है उसे लेकर हॉल की ओर बढ़ा. ऐलिस को पानी की कुछ ध्वनि सुनाई दी.

“ओह! तो इनडोर स्विमिंग पूल है! ये मुझे नंगे स्विम करने के लिए उठाकर लाया है. वैरी नाइस.” ये सोचते हुए ऐलिस मुस्कुरा उठी.

हॉल के बाहर पहुँच कर मार्क ने ऐलिस का गाउन उतार दिया. अंदर से सबने उन्हें आते हुए देख ही लिया था और ऐलिस की आँखों पर पड़ी पट्टी भी. सब चुप हो गए. अगर सुई भी गिरती तो सुनाई देता। मौन को तोड़ते हुए मार्क ने द्वार खोला और ऐलिस को लेकर अंदर आ गया.

ईव और जैसन उठे और ऐलिस के सामने खड़े हो गए. मार्क ने ऐलिस की आँखों की पट्टी खोल दी. आंखे खुलते ही ऐलिस ने उन्हें मिचमिचाया और दृष्टि सामान्य होने पर अपने माँ बाप को सामने खड़ा पाया. उन्हें नंगे देखकर उसे कोई अचरज नहीं हुआ. वो जैसन के गले लग गयी. और जैसन ने उसकी गर्दन चूम ली और घूम गया. जब ऐलिस ने आंख खोली तो दृश्य बदला हुआ था. चार जोड़ी आंखे उसे ताक रही थीं. ये उसकी बुआ का परिवार था. और वो सब भी वार्ड परिवार के समान नंगे थे.

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इस सबमें सबसे उत्तेजित मार्क ही था. बार बार उसकी ऑंखें मिशेल को देखतीं और ये ताड़ने की चेष्टा करतीं कि वो किसे अपना साथी बनाएगी. इसीलिए उसका ध्यान डेविड पर भी था. इस सब में उसने ईव की ओर कोई ध्यान नहीं दिया. सारा आश्चर्य अब समाप्त हो चुका था और दोनों परिवार ये समझ चुके थे कि जीवन शैली एक सी है. और इसका भरपूर लाभ उठाना चाहिए. इसका उत्तरदायित्व उठाया मिशेल ने.

मिशेल: “वैल, अब जब यहाँ आ गए हैं और इस हॉल का प्रयोजन समझ भी चुके हैं, तो हमें अपने खेल को आगे बढ़ाना चाहिए. रात अधिक हो चुकी है, इसीलिए मैं सबके साथी तय कर रही हूँ. शैली तुम जैसन के पास जाओ. और ऐलिस तुम रिचर्ड के पास.” मिशेल ने मार्क की ओर देखते हुए,” डेविड, तुम…. ईव के पास, और मार्क अब जब मुझे इतनी देर से ललचाई आँखों से देख रहे हो, तो तुम मेरे पास आओ, बच्चे.”

सब मिशेल की इस बात पर हंस पड़े.

ईव: “ये इसीलिए तो ऐलिस को लाने के लिए भागा था कि तुम इसके हाथ से न निकल जाओ, मिशेल. है न मार्क?”

मार्क झेंप गया: “मॉम!”

ईव: “इट इस ओके, सन. योर आंटी इस वन हॉट मामा।” कहते हुए उसने मिशेल को आंख मारी.

मिशेल: “ऐ, मैडम. मेरे बॉयफ्रेंड को कोई कुछ नहीं बोलेगा.”

ईव: “ओह, सो स्वीट. ए डेविड फिर तुम मेरे बॉयफ्रेंड हो, ओके.”

डेविड: “आज रात के लिए तो पक्का. कल का बाद में देखेंगे.” ये कहकर वो हंसने लगा.

अन्य सभी उसकी इस हंसी सम्मिलित हो गए. ईव ने डेविड का हाथ अपने हाथ में लिया और एक बिस्तरनुमा सोफे पर बैठकर उसे चूमने में व्यस्त हो गई. अब डेविड भी कहाँ पीछे रहने वालों में था. उसने भी ईव के मम्मों को हाथ में लेकर मसलना शुरू कर दिया.

ईव उसके कान के पास अपना मुंह लेकर बोली, “थोड़ा ईसी, उखाड़ने वाले हो क्या? मैं यहीं हूँ, अभी और भी दिन हैं. आज थोड़ा प्यार दिखा दे अपनी मामी को.”

डेविड को अपनी गलती समझ आ गयी. उसने अपने हाथ हल्के कर दिए. फिर वो धीरे धीरे नीचे की ओर होते हुए ईव की चूत के समक्ष आकर रुक गया. ईव ने उसका आशय समझ गई और उसने अपने पैर फैलाकर डेविड को अपनी तिजोरी की चाभी दे दी. डेविड उसे सूंघते हुए हल्के हलके अपनी जीभ के स्पर्श से चाटने लगा. वो उसके भगनासे को भी अपनी जीभ से झटके देता. ईव को डेविड का ये ढंग बहुत अच्छा लगा.

मार्क को इस बात की अनंत ख़ुशी थी कि उसके हाथ मिशेल लगी है. मिशेल उसकी भावनाओं को समझ रही थी और उसने मार्क के हाथों को अपने स्तनों पर रखा और उसका चुंबन लिया. फिर उसने मार्क के भारी लंड को हाथ में लेकर सहलाया और लंड को हाथ में लेकर एक अन्य सोफे पर जाकर बैठा दिया. मार्क के सामने झुककर उसने मार्क के लंड के टोपे को अपनी जीभ चाटकर उसकी वीर्य की पहली बूंदो को पी लिया. फिर उसके लंड को मुंह लेकर चूसने लगी. उसकी गति इतनी धीमी थी कि मार्क को एक ऐसा लग रहा था मानो रेशम के कपड़े से सहला रहा हो.

क्रमशः मिशेल ने अपनी गति को बढ़ाया और अब वो मार्क के लंड को अपने मुंह के अंदर तक ले जा रही थी. कुछ देर वो उसे अंदर रखती, फिर चूसती और फिर बाहर निकल कर बड़ी तन्मयता से चाट कर उसका भरपूर स्वाद लेती. मार्क की माँ भी लंड चूसने में प्रवीण थी, पर मिशेल का ढंग उससे बिल्कुल ही अलग था और मार्क को अब समझ में आ रहा था कि स्वाद और अनुभव की भिन्नता किसे कहते हैं.

जैसन भी इस समय शैली की चूत में मुंह छुपाये था और उसका रसास्वादन कर रहा था. उसका स्वाद और सुगंध उसके लंड को तनाव की ओर ले जा रही थी. जैसन की जीभ शैली की तंग चूत की दीवारों से सटकर उसे अंदर तक स्पर्श कर रही थी. शैली इस अद्भुत अनुभव की अनुभूति से चरमोत्कर्ष की ओर अग्रसित हो रही थी. उसके ही साथ में लेटी ऐलिस का भी यही हाल था. रिचर्ड उसकी चूत के रोम रोम को पुलकित कर रहा था. दोनों कन्यायें इस दो अनुभवी पुरुषों की मौखिक कला के सामने अपने आप को बेबस पा रही थीं.

मिशेल ने अगला कदम आगे बढ़ाते हुए, सोफे पर लेटकर मार्क को संकेत दिया कि वो भी उसकी चूत का रस पिए. उधर ईव डेविड के आगे हाथ डालने ही वाली थी. उसकी चूत जो दोपहर की अधूरी चुदाई के कारण प्यासी थी, अपने ज्वालामुखी को मुक्त करने को आतुर थी. और जब डेविड ने उसके भगनासे को अपने दातों में पकड़कर हल्के से चबाया, तो वो बांध टूट गया. उसका शरीर छटपटाते हुए झटके लेने लगा. डेविड को अपने मुंह को अपने लक्ष्य पर लगाकर रखने में बहुत परिश्रम करना पड़ा. पर उसे शीघ्र ही इसका पारुतोष भी मिला जब ईव की चूत से गर्मागर्म कामरस ने अपनी धारा उसके मुंह के अंदर छोड़ दी. प्यासे राही के समान डेविड ने निःसंकोच वो अमृत पी लिया और ईव के शांत होने पर अपना चेहरा उठाकर एक अत्यंत सुखद मुस्कराहट से ईव को देखा. ईव ने उठकर उसका मुंह चूम लिया.

“यू आर गुड एट लिकिंग पूसी. बट लैट अस सी हाउ यू फक!” ये कहते हुए ईव ने उसके लंड को कुछ क्षणों के लिए चूसा और अपनी चूत को सहलाते हुए लेट गई और अपनी चूत की फांकें फैला लीं. “सो, कम हियर एंड फक मी नाउ.”

अब ये कल्पना भी करना कि अन्य दो कन्यायें व्यस्त नहीं होंगी ही गलत है. दोनों अपने साथियों के मुंह में पानी छोड़ चुकी थीं और अब उनके लंड को चुदाई के लिए तैयार कर रही थी. दोनों अपने थूक और मुंह से उन्हें अच्छे से गीला करते हुए कड़क कर दे रही थीं. और ये देखकर उन्हें संतुष्टि हुई कि दोनों हथियार उनकी चूत की कुटाई करने के लिए सक्षम और उत्तेजित थे.

पहले निशाना जैसन ले लगाया. शैली की चूत पर लंड लगाकर एक सही मात्रा का धक्का लगाया की सुपाड़े सहित ३-४ इंच लंड उस मखमली गुफा में धंस गया. शैली ने आनंद की चीख मारी। अभी उसकी चीख से लोग अभ्यस्त ही हुए थे कि उसके साथ के बिस्तर से एक उतनी ही आनंदित चीख और सुनाई दी. इस बार रिचर्ड ने अपने लंड को ऐलिस की चूत में पेल दिया था.

अब लड़कों की तो मानो साख पर बन आयी हो. चूँकि ईव पहले ही पांव चौड़ाये हुए थी, तो डेविड ने पलक झलकते ही अपने लंड को लक्ष्य पर साधा और एक ही बार में पूरा अंदर पेल दिया. इस बार वो सुखद चीख ईव ने निकाली। मार्क कैसे पीछे रहता, उसने अपने लंड को मिशेल के मुंह से बाहर खींचा और मिशेल को सही आसन में लिटाते हुए पूरी शक्ति से लंड को मिशेल की चूत में गाढ़ दिया. स्वाभाविक था कि मिशेल भी चीखी और इसके साथ ये चार सुरों का सरगम बज उठा.

एक लय में चार चूतें चुद रही थीं. जहाँ जैसन और रिचर्ड प्यार से चुदाई कर रहे थे, वहीँ मार्क और डेविड मानो लट्ठ गाड़ने के लिए चोद रहे थे. इन दोनों के पास होने से दोनों में एक अनकही प्रतियोगिता चल रही थी जिसका आनंद उनकी साथी स्त्रियां पूर्ण रूप से उठा रही थीं. पर दिन भर की थकान के कारण ये खेल अब अधिक लम्बा चलना सम्भव नहीं था. और सबकी इच्छा यही थी कि आज इस मिलन का शुभारम्भ करने के बाद कल से पूर्ण आनंद लिया जाये.

जैसन जो शैली के ऊपर चढ़कर उसे चोद रहा था अब झड़ने ही वाला था और उसने ये शैली को बता भी दिया. शैली ने इसके उत्तर में यही कहा कि वो चाहेगी कि जैसन उसे अपना पानी पिलाये. ये सुनकर जैसन ने ५-६ धक्कों के बाद अपना लंड बाहर निकला और शैली के मुंह से लगा दिया. शैली ने उसे चूसकर अपने चरम तक पंहुचा दिया और जब जैसन का बांध टूटा तो उसने उसके पानी को पी कर अपनी प्यास बुझाई. मार्क का भी यही हाल था. उसने भी मिशेल को बताया कि वो अन्त पर है, तो मिशेल ने भी उसका रस पीने की इच्छा जताई। मार्क ने कुछ ही देर में उसके चेहरे पर अपना गाढ़ा पानी छोड़ दिया. मिशेल ने उसे अपनी उँगलियों से अपने मुंह में डाला और जो बच गया उसे चेहरे पर ही मल लिया.

रिचर्ड के लंड से निकली प्रोटीन औषधि का ही ऐलिस ने भी रसास्वादन करना उचित समझा. रिचर्ड ने उसकी ये इच्छा पूरी करने में कोई कमी नहीं की. और डेविड ने ईव की चूत का बैंड बजा दिया था और उसकी शक्ति अब समाप्त हो चुकी थी. उसने बिना कोई घोषणा किये हुए, जैसे ही झड़ने को हुआ, ईव के चेहरे को उसने अपने वीर्य से पोत दिया. ईव ने अपने हाथों से उसे अपने चेहरे पर मलते हुए उँगलियाँ चाटकर अपनी अधूरी प्यास बुझा ली.

अब सब थक तो चुके ही थे. रिचर्ड ने ये सुझाव दिया कि आज के लिए सब यूँ ही सो जाएँ और जिसका जब मन करे सो अपने कमरे में चला जाये.

रिचर्ड: “आज हम लोगों के बीच एक नया सम्बन्ध बना है. मुझे लगता है कि कल की सुबह हमारे लिए नए और अनदेखे रोमांच लाएगी. हम आठ अनगिनत विधियों से चुदाई कर सकते हैं. कल सुबह से हम उन सब पर अपना प्रयोग प्रारम्भ करेंगे.”

सबने सहमति जताई और अपने साथी की बाँहों में नींद में चले गए.

***********

अगले दिन सुबह:

सब अपने समय से उठे. एक दूसरे से लिपटे होने के कारण कुछ असुविधा अवश्य हुई, पर उठकर अपने नित्यकर्म से निपट कर अपने कमरे की ओर चले गए. कल रात जो हुआ वो इतने वर्षों का एक लुका छुपा खेल और छेड़खानी का परिणाम था. दोनों परिवारों में कामुक छेड़खानी आम थी, पर कल उसका सुखद अंत हुआ. या ये समझिये कि सुखद आरम्भ हुआ, और अब ये रुकने वाला था नहीं.

मिशेल उठकर अपने कमरे में गयी और नहाकर किचन में सबके लिए नाश्ते का प्रबंध करने लगी. उसने कॉफी मेकर में कॉफी भी बनाने के लिए चढ़ा दी. ईव कुछ ही समय में उसके पास आयी. उसके चेहरे पर एक नई चमक थी और चेहरे पर अभी भी वीर्य की हल्की सी पपड़ी दिख रही थी.

ईव: “लास्ट नाईट वास वंडरफुल.”

मिशेल: “यस, आई इन्जॉयेड इट टू.”

ईव: “क्रिसमस का क्या प्लान है?”

मिशेल: “रिचर्ड बताएँगे. पर मुझे तो इस बार घर में ही रहने की इच्छा है.”

ईव: “मैं आती हूँ, बस दस मिनट में.”

मिशेल: “नो प्रॉब्लम, टेक योर टाइम.” कहकर मिशेल अपने काम में व्यस्त हो गयी.

रिचर्ड उबासी लेता हुआ आया और मिशेल को चूमकर बोला, “मॉर्निंग ब्यूटीफुल.”

मिशेल ने उसके चुंबन का उत्तर दिया और उसके चेहरे को पकड़कर एक गहरा चुंबन लिया, “मॉर्निंग, हैंडसम.”

रिचर्ड ने फिर कहा कि वो बस यूँ गया और आया. वो जब किचन से निकल रहा था तो शैली आ गयी. अपने पापा को चूमकर उसने मिशेल को चूमा और मिशेल का हाथ बँटाने लगी.

मिशेल: “हे, तुमसे गंध आ रही है, जाओ पहले ब्रश और नहाकर आओ.”

शैली: “ओके, मॉम। यू और ग्रेट.”

मिशेल अपने काम में लगी रही, कुछ ही समय में कॉफी बन गयी और उसने अपने लिए एक कप में ली और काम में लगी रही. इतने में ही ईव आ गयी और उसने भी मिशेल का साथ दिया. अपने लिए कॉफी लेकर वो मिशेल के साथ मिलकर सैंडविच बनाने में जुट गयी. जैसन अपने कमरे में गया और सीधा नहाने के लिए घुस गया. बाहर आकर वो बैठक में आया पर वहां किसी को न पाकर किचन में गया. वहाँ ईव और मिशेल थीं. उसने ईव को किस किया और उसके नितम्ब दबा दिए. फिर कॉफी ली और जाने लगा.

मिशेल: “हे ब्रो, नो किस फॉर मी ?”

जैसन: “ओह सिस, श्योर.”

जैसन ने जब मिशेल को किस किया तो मिशेल ने उसके लंड को दबा दिया. जैसन ने भी अवसर देखकर मिशेल की गांड दबा दी. फिर कॉफी लेकर बैठक में चला गया.

कुछ ही देर में ऐलिस, मार्क और डेविड भी ऊपर आ गए और जाकर सोफे पर बैठे.

जैसन: “ब्रश तो कर लो. फिर कॉफी ले लेना.”

डेविड और मार्क सीधे किचन में गए और ऐलिस अपने कमरे में चली गयी. डेविड ने मिशेल को पीछे से पकड़ा और उसकी गर्दन चुम ली. “मॉर्निंग माई ब्यूटीफुल मॉम!”

“मॉर्निंग, बेटा, क्या चाहिए.”

“जो चाहिए, वो आप अभी तो देने से रहीं. पर अभी के लिए कॉफी चलेगी.”

“शैतान, ब्रश किया कि नहीं?”

“मॉम, वो भी हो जायेगा.” कहते हुए वो कॉफी मशीन की ओर बढ़ा. मार्क ईव से लिपटा हुआ उसके होंठ चूस रहा था.

“कम ब्रो, कॉफी पीते हैं. अपनी मॉम को बाद में पीना.”

मार्क ने ईव को छोड़ा तो ईव गहरी साँसे ले रही थी. मार्क और डेविड ने कॉफी ली और वहीं खड़े होकर पीने लगे. फिर उन्होंने कप धोने के लिए डाले। फिर डेविड ने अपनी मामी को पकड़ा और उसे चूमकर अपने कमरे में चला गया. मार्क ने ये देखा तो उसने भी अपनी बुआ को चूमा और डेविड के पीछे चल दिया.

मिशेल: “मार्क समझदार और शांत है, डेविड का बस चले तो मुझे रात दिन चोदता रहे.”

ईव ये सुनकर हंसने लगी.

ईव: “यहाँ पर सीधा बन रहा है, घर पर तो मुझे एक पल भी नहीं छोड़ता.”

मिशेल: “तुम्हारी जैसी रसीली माँ हो तो मूर्ख ही छोड़ेगा?”

ईव: “जैसे तुम कुछ कम हो. रिचर्ड कहाँ है, क्रिसमस के बारे में पूछना था.”

मिशेल: “आने ही वाला होगा. नहाने में बहुत समय लगता है. पर कल तुम्हें इतनी देर क्यों हो गयी घर आने में?”

ईव ने कल घटित हुआ वृत्तांत सुनाया तो मिशेल की चूत बहने लगी.

मिशेल: “मुझे भी उन सबसे मिले बहुत समय निकल गया. मेरे विचार से इसका मुझे जल्दी ही कुछ प्रबंध करना होगा.”

नाश्ता बन चुका था. दोनों ने उसे खाने की टेबल पर लगाया और सबको पुकारा. पर जैसन के सिवाय कोई नहीं था. मिशेल और ईव जाकर बैठक में जैसन के साथ बैठ गयीं. मिशेल अपने जन्म देश के बारे में जानने के लिए उत्सुक थी और अपने अन्य परिवार के विषय में भी जानना चाहती थी. जैसन और ईव ने उसे नए समाचारों से अवगत कराया तब तक रिचर्ड भी आ गया और कॉफी लेकर साथ बैठ गया.

“जैसन आज पटेल बंधु अपने ऑफिस आने वाले हैं, आकार का इम्पोर्ट एक्सपोर्ट का काम है, पर आकाश भी इसमें कुछ जिज्ञासा दिखा रहा है. मेरे विचार से हम सब अच्छा व्यवसाय कर सकते हैं.

“ठीक है, मेरे पार्टनर्स को भी बुला लूँ क्या?”

“नहीं, उन्हें अपने अन्य ग्राहकों के पास भेज दो. वो भी आवश्यक है.”

“ओके, कब मिलना है?”

“वे ११ बजे आएंगे.”

“ठीक है, आप जब कहोगे मैं चलूँगा.”

मिशेल और ईव ने दोनों से नाश्ता करने का आग्रह किया.

“बच्चे बाद में खा लेंगे. उनका कोई समय नहीं है.”

चारों उठकर नाश्ते के लिए बैठे और नाश्ता करने के बाद मिशेल और ईव अपने अन्य कार्यों में व्यस्त हो गयीं और जैसन और रिचर्ड ऑफिस के लिए तैयार होने लगे. दस बजे के आसपास ईव और मिशेल को छोड़कर सभी लोग अपने अपने काम पर निकलने लगे. शैली मार्क के साथ कॉलेज चली गयी. डेविड ये कहकर निकला कि उसे कुछ काम से बाहर जाना है. सच ये था कि वो शैली की मित्र शिरीन की माँ एंजिल के घर उसके आमंत्रण पर जा रहा था. शैली ने शिरीन को अपने ही साथ बुला लिया था. शिरीन के पिता कुछ महीनों से उनसे अलग रह रहे थे. और एंजिल को घर के कामों में कोई न कोई सहायता चाहिए होती थी.

सबके जाने के मिशेल और ईव कॉफी लेकर बैठक में जाकर गप्पें मरने लगे. पर मिशेल ईव के उन चार काले लौडों से चुदाई के विषय में जानने के लिए अधिक उत्सुक थी. ईव ने उसे इस बार विस्तृत रूप में बताया तो मिशेल की चूत ने ढेर सारा पानी छोड़ दिया. उसके हाथ अनायास ही अपनी चूत पर चले गए. ईव से ये छुपा न रह सका.

ईव: “मिशेल, मैं इसमें तुम्हारी कुछ सहायता कर सकती हूँ, अगर तुम चाहो तो.”

मिशेल: “हम्म्म, चलो मेरे कमरे में चलते हैं.

मिशेल और ईव ने अपनी कॉफी के कप धोकर किचन में रखे और मिशेल के कमरे में चल दिए.

*******

पास के घर में:

“मामी, आज आज जाकर सारी व्यवस्था देख लीजियेगा. कल हमने सिमरन को जो सारे रोमियो के साथ एक दिन दिया था, तो उसकी पूरा आयोजन आपको ही देखना है.”

“ठीक है. मैं २ घंटे बाद चली जाऊंगी. अब मेरी गांड मार और अपनी माँ के लिए सुबह का नाश्ता बनाकर उसे बुला ला.”

**********

कॉलेज में:

मार्क शैली के साथ कॉलेज पहुंचा और कुछ ही देर में शिरीन भी आ गयी. शैली ने दोनों का परिचय कराया और फिर मार्क को कॉलेज दिखाने के लिए चल पड़ी. कोई बीस मिनट बाद शैली की क्लास का समय हो गया तो उसने शिरीन से कहा कि वो मार्क को कॉलेज घुमा दे. वो अपनी दो क्लास समाप्त करने के बाद १ बजे केंटीन में मिलेगी. उसकी आँखों को ये नहीं दिख पाया की पूरे समय शिरीन और मार्क एक दूसरे को देखकर आंख-मटक्का कर रहे थे. शैली के जाते ही मार्क ने अपना दांव खेला.

मार्क: “मेरे विचार से कॉलेज बाद में भी देखा जा सकता है, अब जब यहाँ पढ़ना ही है, तो मुझे ये सब समय के साथ पता चल ही जायेगा. मुझे ये समय अगर तुम्हारे साथ बिताने के लिए मिले तो अधिक ख़ुशी होगी.”

शिरीन की बाछें खिल गयीं. वो मार्क से आकर्षित थी और किसी प्रकार अपनी भावनाओं को संभाले हुए थी. पर मार्क के इस प्रस्ताव से उसका संयम टूट गया.

शिरीन: “क्यों नहीं. चलो केंटीन में चलते हैं, इस समय वहाँ कम ही लोग होंगे.”

मार्क: “तुम्हें क्लास में नहीं जाना.”

शिरीन: “आज नहीं.”

मार्क और शिरीन केंटीन चले गए, पर वहाँ पर उनके अनुमान के विपरीत अधिक लोग थे. कुछ समय बैठने के बाद मार्क ने तो समझ ही लिया कि यहाँ कुछ अधिक बात नहीं हो पायेगी. शिरीन ने भी ये भांप लिया. वो सोच रही थी कि क्या किया जाये. शैली एक घंटे में लौट ही आएगी. फिर उसने अपने मन में एक निश्चय किया. वो ये अवसर छोड़ना नहीं चाहती थी. शैली को वो बाद में मना लेगी. पर मार्क के साथ अगर उसे कुछ समय मिल जाये तो…

शिरीन: “चलो मैं तुम्हें दूसरी जगह ले चलती हूँ.”

मार्क: “कब तक लौटेंगे?”

शिरीन: “ये तुम्हारे ऊपर है, तुम इस समय का कैसे उपयोग करना चाहोगे.”

शिरीन की बात से ये तय हो गया कि वो चुदने के लिए तत्पर है. और मार्क भी शिरीन की चूत का मजा लेना चाहता था.

“चलो.”

“शैली को मैं बाद में समझा दूंगी. मेरी सबसे निकट सहेली है. अपने भाई के साथ समय बिताने के लिए मुझे नहीं लगता वो बुरा मानेगी.”

“आई होप यू आर राइट.” मार्क बुदबुदाया. और शिरीन के साथ चल पड़ा.

वहीँ शिरीन के मन में ये विचार चल रहे थे कि मैं इसे जहाँ ले जा रही हूँ अगर उसे वो अच्छा लगा तो ये सदा के लिए मेरा हो सकेगा. उसने मन में ये इच्छा भी की कि उसका अनुमान गलत न हो.

***********

मिशेल के घर:

ईव ने मिशेल के कमरे में आने के बाद उसे अपनी बाँहों में जकड़ लिया और दोनों एक दूसरे के होंठ चूसने लगी. कपड़े जैसे किसी स्वचालित प्रक्रिया से निकल कर अलग हो गए. एक दूसरे को चूमते हुए बिस्तर पर जाकर ढेर हो गयीं. कुछ देर की चूमा चाटी के बाद ईव ने आसन बदला और अपनी चूत को मिशेल के मुंह पर लगाते हुए मिशेल की चूत को चाटने लगी. भाभी नन्द एक दूसरे के प्यार में डूब कर एक दूसरे को मौखिक सम्भोग का सुख दे रही थीं. कुछ ही देर में दोनों ने झड़ कर अपना रस एक दूसरे के मुंह में छोड़ दिया. फिर एक दूसरे के साथ लेट कर चूमते हुए अपने हाथों से एक दूसरे को सहलाती रहीं.

ईव: “डेविड बहुत अच्छी चुदाई करता है, क्या सब आपसे सीखा है?”

मिशेल: “नहीं, कुछ मुझसे, कुछ औरों से, पर जो भी सीखा उसका उपयोग भरपूर करता है. आनंद आ जाता है उससे चुदवाने में.”

ईव : “सच है, मेरा मार्क भी ऐसा ही है, तुम्हे कल कैसा लगा उसके साथ?”

मिशेल: “बहुत अच्छा, दिल से चोदता है, लंड तो केवल एक निमित्त है.”

दोनों हंस पड़ीं.

मिशेल: “तुम्हारा उन चारों के लिए क्या प्लान है?”

ईव: “कहीं और जाना ठीक नहीं होगा. सोचना होगा, क्या करूँ?”

मिशेल कुछ देर सोचती रही.

“यहां बुला लो.”

ईव चौंकी, “यहाँ?”

मिशेल: “हाँ, मैं पहले भी रिकी और डॉन से चुदवा चुकी हूँ. तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है.”

ईव: “कल बुला लूँ?”

मिशेल: “हाँ, फिर हम सब क्रिसमस में व्यस्त हो जायेंगे.”

ईव: “ठीक है, मैं जैसन से पूछ लूँ, फिर उन्हें बुला लूँगी. आप भी रिचर्ड से पूछ लेना।”

दोनों इस बात पर सहमत हो गए और फिर एक बार फिर से एक दूसरे के शरीर का रसपान करने लगे.

क्रमश:

1152600
 
अध्याय १४: मिश्रण - दिंची क्लब और दो परिवार २

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शोनाली का घर:

दिन: शुक्रवार, सांयकाल ७ बजे


शुक्रवार शाम ७ बजे के करीब घर की घंटी बजी. शोनाली ने दरवाजा खोला और अपने अतिथियों का स्वागत किया. सुप्रिया इस समय एक पंजाबी सूट में थी. समर्थ एक महंगे कुर्ते पाजामे में, और उनकी पत्नी शीला साड़ी पहने हुए थीं. सब इस समय बहुत आकर्षक और संभ्रांत दिख रहे थे. शोनाली ने सुप्रिया के गले लगकर उसका स्वागत किया और उसके गाल पर एक चुम्बन किया. फिर उसने वही शीला के साथ किया और फिर उसके पांव छूकर आशीर्वाद लिया. उसने समर्थ के भी पांव छुए और उन्हें बैठक में आमंत्रित किया. समर्थ अपने हाथ में एक बैग लिए थे जो उन्होंने शोनाली को थमा दिया.

शोनाली के साथ वो बैठक में पहुंचे जहाँ जॉय ने सबका स्वागत किया. सुमति ने भी शोनाली की तरह ही सुप्रिया के गाल चूमे और शीला और समर्थ के पांव छूकर आशीर्वाद लिया. जॉय ने सबको आदर पूर्वक बैठाया और पूछ कि वो क्या लेना चाहेंगे. शोनाली ने देखा तो समर्थ एक महंगी विदेशी वाइन लाये थे. तब तक समर्थ ने स्कॉच का आग्रह किया तो जॉय ने भी वही चुना. शोनाली ने वाइन को ठंडा होने के लिए लगा दिया हालाँकि समर्थ ठंडा करके ही लाये थे. सुमति ने अल्पाहार को टेबल पर सजा दिया.

फिर सब लोग अपने काम के विषय में बात करने लगे. सुमति सुप्रिया के पास बैठी थी. समर्थ और शीला साथ तथा जॉय और शोनाली साथ बैठे थे. कुछ बातें व्यवसाय से सम्बंधित थीं और कुछ राजनीति से. सब एक दूसरे से अच्छे से घुल मिल गए. समय उचित देखकर शोनाली और सुमति जाकर सबकी ड्रिंक्स एक ट्रॉली पर ले आये. चर्चा का प्रवाह चलता रहा, अब बातें अपने परिवार के लोगों के बारे में थी कि कौन क्या करता है, किसकी क्या रुचियाँ हैं, इत्यादि. सुप्रिया और शीला ने निखिल और नितिन की बढ़ाई के पुल बांधे तो शोनाली और सुमति ने सागरिका और पार्थ के. वातावरण बहुत मित्रतापूर्वक और घरेलू था.

तभी सुप्रिया ने अपने बैग में से वो लिफाफा निकला जो शोनाली ने उसे कल दिया था. उसने लिफाफे को शीला के हाथ में दिया.

सुप्रिया: "मम्मी, ये है इनकी बेटी सागरिका. बिल्कुल माँ पर गयी है."

शीला ने फोटो निकले और समर्थ और शीला ने सारे फोटो देखे.

शीला, "बहुत ही सुन्दर और प्यारी बच्ची है. सच में शोनाली तुम्हारा ही जवानी का रूप लगता है."

शोनाली शर्मा गई.

सुप्रिया: "कुछ और फोटो भी हैं, जो शोनाली ने मुझे दिखाए तो थे परन्तु दिए नहीं थे. उन्हें भी देख लें, अगर सम्बन्ध बनना है तो उनको देखना भी नितांत आवश्यक है."

कहकर सुप्रिया ने शोनाली से आग्रह भरी आँखों से देखा. शोनाली ने जॉय से मूक सहमति ली और अंदर जाकर लॉकर से वो उन चित्रों का लिफाफा भी ले आयी और सुप्रिया को सौंप दिया. सुप्रिया ने चित्र लिफाफे से निकाले और शीला के हाथों में दे दिए.

अब चटर्जी परिवार साँस रोककर बैठा था. जॉय ने बेचैनी से अपनी ड्रिंक के एक साथ दो तीन घूँट लिए. शीला और समर्थ ने सारे चित्र देखे और फिर एक बार दोबारा देखे.

शीला: "न केवल आपकी बेटी सुन्दर है, पर ऐसा लगता है कि बहुत मीठी और स्वादिष्ट भी है. आपने तो उसका रस भरपूर चखा होगा."

समर्थ: "अरे भागवान, ये कोई पूछने की बात है."

शीला: "मुझे तो आपकी दोनों ही बेटियां पसंद हैं, पर हम अभी शायद केवल सागरिका की ही बात कर रहे हैं."

शोनाली: "जी, माँ जी. पारुल अभी छोटी है, तो उसकी शादी लगभग दो साल बाद ही करेंगे."

शीला: "सही सोचा है. तब तक उसका घर में ही आनंद लो."

शोनाली कुछ नहीं बोली.

शीला: "मुझे इस संबंध में कोई कठिनाई नहीं लगती. पर हम लोग एक दूसरे के परिवारों को निकट से जान लेते तो श्रेष्ठ होता."

जॉय: "जी, इसी विचार से पार्थ ने कल अपने क्लब में हम सबके लिए आयोजन किया है, जिससे कि हम सब एक दूसरे को अंतरंग रूप से जान पाएंगे. न सिर्फ इससे निखिल और सागरिका एक दूसरे को मिल लेंगे, बल्कि हम लोग भी समय बिता लेंगे. हमने दो दिन का आयोजन किया है. पूरा आयोजन गुप्त होगा और किसी को भी भनक नहीं लगेगी. आगे जैसा आप उचित समझें."

समर्थ, "पर..."

सुप्रिया, "पापा, मैंने निखिल और नितिन दोनों को आने के लिए मना लिया है. सुरेखा से इस समय मैं नहीं कुछ कहना चाहती."

शीला ने समर्थ की ओर देखकर सिर हिलकर अपनी सहमति दे दी.

समर्थ, "तो ठीक है. कब निकलेंगे?"

जॉय, "११ बजे. निखिल को स्थान पता है. आप लोग १२ से १ के बीच आ जाएँ. हम पहले जाकर शेष प्रबंध देख लेंगे."

समर्थ: "ठीक है."

शोनाली: "आइये, खाना भी तैयार है, आप लोग मुंह हाथ धोकर डाइनिंग टेबल पर बैठें, मैं और सुमति दीदी परोसते हैं."

शीला: "अरे शोनाली बिटिया, अब तो हम संबंधी बनने वाले हैं. चलो मैं भी तुम्हारे साथ आती हूँ."

सुप्रिया: "और मैं भी."

ये कहकर चारों महिलाएं रसोई में चली गयीं . शीला और सुप्रिया ने रसोई का छुपी आँखों से अवलोकन किया और पाया कि हर चीज़ साफ और यथोचित स्थान पर थी. उन्हें ये देखकर संतुष्टि हुई. खाना लेकर सबने टेबल पर लगाया और फिर बातें करते हुए आनंदपूर्वक भोजन किया.

दिंची क्लब ११ बजे :

अगले दिन पार्थ और शोनाली १० बजे सुबह ही निकल गए ताकि वो सारे आयोजन की व्यवस्था कर सकें. जॉय, सुमति और सागरिका लगभग एक घंटे बाद निकले. पारुल अभी यूरोप के दो सप्ताह के टूर पर थी और अगले रविवार आने वाली थी. पता करने पर समर्थ ने बताया कि वे भी कुछ देर ही में निकल पड़ेंगे. पार्थ और शोनाली क्लब में सिमरन से मिले और उससे सारा कार्यक्रम समझाया और खाने का मेनू इत्यादि भी निश्चित कर लिया. ये सब कल रात में निर्णीत हो चुका था इसीलिए कोई समस्या नहीं थी.

इसके बाद शोनाली और पार्थ ने छह रोमियो के साथ खेल कक्ष का निरीक्षण किया. ये एक बड़ा हॉल था जिसमे उनकी पखवाड़े की पार्टी होती थीं. पार्टी क्या असल में वो सामूहिक सम्भोग का नंगा नाच होता था. हर स्त्री अपने पसंद के सेक्स में लिप्त रहती थी और क्लब के रोमियों का ये दायित्व था कि कोई महिला असंतुष्ट वापिस नहीं जाए. कमरे के बीच में २० डबल बेड के गद्दे बहुत व्यवस्थित रूप से गोलाकार क्रम में रखे थे. कमरे के कोनों में सोफों की एक लम्बी रेखा थी जो कि गोलाकार क्रम में ही थी. कमरे में चार स्थानों पर बार थे जिसमे महंगी शराब, वाइन और बियर का इंतज़ाम था. हर बार के साथ में खाने की एक लम्बी मेज थी जिस पर व्यंजन और अल्पाहार परोसे जाते थे. उनके बगल में एक एक अलमारी थी कपडे इत्यादि रखने के लिए.

सिमरन के साथ पार्थ और शोनाली ने हर वस्तु को देखा और कुछ परिवर्तन करने का निर्देश दिया. रोमियो तुरंत उनकी आज्ञा के पालन में जुट गए. जब पूरा प्रबंध सही लगा तब पार्थ ने रोमियो और सिमरन को बताया कि चूँकि ये उसकी व्यक्तिगत पार्टी है वे विशेष ध्यान रखें. उन्हें इसके लिए अलग पारिश्रमिक मिलेगा. इसके बाद दोपहर के भोजन के लिए बने कमरे में जाकर निरीक्षण किया और संतुष्टि दिखाई.

पार्थ: "सिमरन जी, ये हमारे घर की पार्टी है जिसमे कुछ विशेष अथिति आ रहे है. अगर आपने उत्तम सेवा की तो में एक सप्ताहांत आपको सभी रोमियो के साथ उपहार में दूंगा. पर आज मुझे पूर्ण सफलता चाहिए."

सिमरन: "पार्थ, आप जानते हो कि मैं किसी भी प्रकार से कमी नहीं करती. पर आपका उपहार मैं अवश्य ले कर रहूंगी. अगर पार्टी में भी आपको मेरी किसी प्रकार की सहायता लगे, मुझे बेझिझक होकर बताईयेगा."

सिमरन लगभग ५५ वर्ष की एक कामांध महिला थी. पहले वो एक कॉलेज टीचर थी पर जब ये विदित हुआ कि वो पढाई के साथ छात्रों को चुदाई का भी ज्ञान देती है तो उसे शांतिपूर्वक और गोपनीय ढंग से निकल दिया था. उसने बाद में ये केटरिंग का व्यवसाय आरम्भ किया था, जो बहुत अच्छा चल रहा था. अधिकतर पार्टियों में वो कम से कम ४-५ रोमियो का पानी छुड़ाती थी. ये सोचकर इस समय भी उसकी चूत पनिया गई कि दो दिन तक वो इतने सारे जवान लड़कों पर राज करेगी.

उधर समर्थ, शीला, सुप्रिया नितिन और निखिल के साथ क्लब के लिए निकल पड़े थे. १२ बजे के आसपास जॉय, सागरिका और सुमति आ गए और उनके पीछे लगभग आधे घंटे बाद समर्थ अपने परिवार सहित पहुँच गए. सब लोग पहले भोजन के लिए डाइनिंग रूम में गए. वहां समर्थ और जॉय ने एक बियर ली और अन्य सभी ने सॉफ्ट ड्रिंक. उसके बाद सिमरन ने खाना लगवा दिया. किसी से ये न छुप पाया कि समर्थ और सिमरन के बीच नैन मटक्का हो रहा था. पर किसी ने इस को अधिक महत्त्व नहीं दिया. खाने के बाद पार्थ ने सबको क्लब का दर्शन कराया. क्लब की भव्यता और व्यवस्था देखकर सब लोग बहुत प्रभावित हुए. समर्थ ने पार्थ की पीठ थोक कर उसे बधाई और आशीर्वाद दिया कि वो अपने इस उपक्रम में सफलता पाए.

"और शीला, चाहो तो तुम भी शोनाली के साथ आ जाया करो कभी कभी. तुम्हें भी सदस्यता ले लेनी चाहिए. मुझे नहीं लगता कि इन दोनों में से कोई तुम्हें मना करेगा."

"नानाजी, अगर आप गंभीर हैं तो मैं अभी इन्हे सदस्य बना लेता हूँ." पार्थ ने कहा.

"अरे भाई, नेकी और पूछ पूछ."

पार्थ ने फोन पर सोनम को सदस्यता का फार्म लाने के लिए कहा. उसके बाद उसने उस पर नानी का नाम शीला सिंह लिखा, उनके हस्ताक्षर लिए और अपने हस्ताक्षर करके बताया कि अन्य औपचारिकताएं हम बाद में पूरी कर लेंगे पर आप आज से हमारी मान्य सदस्य है. शोनाली ने शीला को बढ़कर बधाई दी और बताया कि वो इस क्लब की एकमात्र सदस्य हैं जो बिना साक्षात्कार और जाँच प्रक्रिया के प्रविष्ट की गई है.

इसके बाद सब खेल कक्ष में प्रवेश कर गए और रोमियो बाहर खड़े हो गए. बुलाये जाने पर ही उन्हें अंदर जाने का आदेश था . कक्ष के द्वार रिमोट से बंद कर दिए गए. अब कमरे में केवल दोनों परिवार ही थे.

खेल कक्ष राउंड १:

कमरा बंद होने के बाद सब लोग बार की ओर बढ़े और अपने लिए अपनी रूचि की ड्रिंक बनाई. सब अपनी ड्रिंक पीते हुए बातें कर रहे थे. निखिल सागरिका से उसके भविष्य के बारे में पूछ रहा था. दोनों अपनी रूचि और अरुचि के विषय में बात कर रहे थे.

तभी समर्थ की आवाज आयी जिसने सबको उनकी ओर आकर्षित किया, "बातें तो और भी समय होती रहेंगीं. मेरे विचार से हम यहां बातें करने नहीं बल्कि ये जानने के लिए आये हैं कि हमारे परिवार एक दूसरे के कितना अनुरूप हैं. और अगर मैं गलत नहीं हूँ तो इसका अर्थ ये है कि हम एक दूसरे को चुदाई में संतुष्ट कर सकते हैं या नहीं."

सबने हाँ में हाँ मिलाई।

"तो फिर क्या करना है?"

"पापा, मैंने सोच रखा है. आप कहें तो बताऊँ?" सुप्रिया ने समर्थ के पास जाकर कहा.

"तुमने सब सोच रखा होगा, ये तो मैं जानता हूँ. अब हम सबको भी बताओ." समर्थ ने उसे अपनी बाँहों में लेकर उसके होंठों को चूमकर उत्तर दिया.

"पापा, आप हम सबसे बड़े है, तो अपनी होने वाली बहू पर सबसे पहले आपका ही अधिकार बनता है. इसीलिए सागरिका आपके साथ रहेगी." सुप्रिया ने बताया, "सागरिका, जाओ तुम नानाजी की पास जाओ."

सागरिका शर्माती हुई समर्थ के साथ खड़ी हो गई.

"अब मम्मीजी सबसे बड़ी है, तो इनको मैं पार्थ का साथ देती हूँ. पार्थ नानी जी के पास जाओ."

पार्थ जैसे ही शीला के पास पहुंचा शीला ने उसे अपनी बाँहों में भींच लिया.

"शोनाली और निखिल एक दूसरे का स्वाद ले चुके हैं, इसीलिए मैं निखिल को सुमति के साथ करती हूँ."

निखिल सुमति के पास गया. सुमति की तो आंखे ही चौंधिया गयीं.

"शोनाली को मैं अपने दूसरे बेटे नितिन का साथ देती हूँ, उसे पता होना चाहिए की मैं इतनी खुश और संतुष्ट कैसे रहती हूँ."

नितिन ने शोनाली हो अपनी बाँहों में ले लिया और उसके होंठ चूम लिए.

"और मैं अपने समधी जॉय के साथ रहूँगी. मुझे आशा है की वो अपना संबंध पक्का करने मैं मेरी सहायता करेंगे."

जॉय सुप्रिया के पास आया और उसके हाथों को लेकर उन्हें चूम लिया.

पार्थ ने तभी घोषणा की, "जैसे ही हमने कमरा रिमोट से बंद किया है, सारे कैमरे चालू हो चुके हैं और हम सबका ये खेल रिकॉर्ड हो रहा है. अगर इसमें किसी को आपत्ति हो तो बताये, मैं उसे रोक दूंगा."

किसी ने आपत्ति नहीं जताई.

समर्थ ने अपनी दबंग आवाज में कहा, "अब इन कपड़ों की क्या आवश्यकता है?" ये कहकर उसने अपने कपडे उतार दिए और नंगा हो गया.

उसका अनुशरण करते हुए अन्य लोग भी अपने कपडे उतार कर खड़े हो गए. शोनाली ने एक ओर लगी कपड़ों की अलमारी की और इशारा किया और सबने एक एक करके अपने कपडे उसमें लटका दिए. समर्थ ने सागरिका का हाथ अपने हाथ में लिया और उसे सोफे पर बैठा दिया.

समर्थ: "देखें तो कैसा रस है हमारी होने वाली बहुरानी का. बेटी तुम्हारी चूत तो देखने से ही बहुत मीठी और रसीली लग रही है.. मैं स्वाद चख लूँ तुम्हारा?"

सागरिका: "नानाजी, आपकी ही चूत है, जैसा मन हो वैसा कीजिये."

खेल कक्ष:

समर्थ ने नीचे बैठकर सागरिका के दोनों पांव अपने कन्धों पर रखे और अपना मुंह सागरिका की जांघों के बीच डाल दिया. सभी लोग ठहर कर ये दृश्य देख रहे थे. तभी शीला ने पार्थ के लौड़े को पकड़ा और उसे लेकर सोफे पर बैठ गई. अब शीला सागरिका के साथ बैठी थी, पार्थ ने अर्थ समझ कर शीला के आगे घुंटने तक दिया और अपना मुंह समर्थ जैसे ही शीला की जांघों में छुपा लिया. अन्य सभी यही विधि अपनाने के लिए अग्रसर हुए और कुछ ही क्षणों में जॉय सुप्रिया की, नितिन शोनाली की और निखिल सुमति के बीच में मुंह छुपा लिए. सभी स्त्रियां एक लाइन में बैठी थीं और सभी पुरुष उनकी चूतों में सिर घुसाए हुए थे.

शृंखला कुछ इस प्रकार से थी:

सागरिका - समर्थ, शीला - पार्थ, सुमति - निखिल, सुप्रिया - जॉय और शोनाली - नितिन.

हर पुरुष अपनी साथिन को अधिकतम मौखिक सुख देने का प्रयास कर रहा था. चूतें चाटी और चूसी जा रही थी. उँगलियाँ चूतों में कहीं धीमी तो कहीं द्रुत गति से विचरण कर रही थी. कहीं जीभ चूत के पपोटों के साथ गाँड के भूरे सितारे को भी गीला कर थी. कहीं भगनासे को इस प्रकार निचोड़ा जा रहा थे कि उसकी मालकिन थरथरा उठती थी. किसी ने चाटने के साथ एक ऊँगली चूत और एक गाँड में डाल रखी थी.

कहने का तात्पर्य ये है कि हर पुरुष अपनी क्षमता का परिचय अपने नए साथी को कराना चाहता था. और ये कहना उचित होगा की ऐसा ध्यान पाने से महिलाएं आनंद की लहरों पर डोल रही थीं. पूरा हॉल अब स्त्रियों की सीत्कार और सिसकारियों से गुंजायमान था. हर स्त्री कुछ न कुछ बोल रही थी पर इस वातावरण में किसके मुंह से क्या निकल रहा था ये किसी को समझ नहीं आ रहा था.

हर पुरुष का चेहरा इस समय कामरस से भीगा हुआ था और स्त्रियों ने अपना पानी छोड़ने में कोई कंजूसी नहीं की थी. जब स्त्रियाँ शांत पड़ीं तो पुरुष अपना चेहरा उठाकर उनकी ओर देखने लगे. सबकी आँखों में संतुष्टि के भाव देखकर सभी पुरुषगण गर्व से फूल गए. फिर समर्थ उठे और उन्होंने शीला के पास जाकर उसका एक गहरा चुंबन लिया.

"ले भागवान, चख ले अपनी होने वाली बहू की चाशनी, बहुत मीठी है अपनी बहू."

"सच में बहुत मीठी है, पर मैं तो बाद में स्रोत से ही पियूँगी, तभी प्यास बुझेगी।" ये कहकर शीला ने अपने साथ बैठी सागरिका को अपने पास खींचा और उसके मुंह में मुंह डालकर उसे चूम लिया. "सच बेटी, बहुत दिन से किसी जवान लड़की का रस नहीं पिया, ये बुढ़िया तरस गई थी."

"नानी, आप कहाँ से बूढ़ी हो गयीं. और आप जब चाहे मुझे बुला लेना में आकर आपका भी रस पियूँगी और अपना भी पिलाऊंगी."

"बहुत अच्छे संस्कार दिए है शोनाली ने तुम्हें."

उधर समर्थ के कृत्य को संकेत मानकर पार्थ ने उठकर सुमति को चूमा, निखिल ने सुप्रिया को, जॉय ने शोनाली को और नितिन उठकर सागरिका के पास गया और उसका मन भर कर चुम्बन किया.

"देवर भाभी अभी से एक दूसरे से घुल मिल रहे हैं. इससे अधिक प्रसन्नता की क्या बात हो सकती है." शीला ने समीक्षा की.

"सच है माँ, ऐसा ही रहा तो घर स्वर्ग बन जायेगा."

"मैं जानती हूँ सुप्रिया दीदी, जिस घर में सागरिका जाएगी उसे स्वर्ग बना देगी." सुमति ने अपनी टिप्पणी की.

किसी को भी इस बात से कोई आपत्ति नहीं थी.

कुछ समय के लिए सबने एक विराम लिया और कुछ लोग बाथरूम गए, कुछ ने अपने लिए एक ड्रिंक बनाई. कुछ उस बड़े कक्ष में यूँ ही चहलकदमी कर रहे थे. फिर एक एक करके सारे पुरुष इस बार सोफे पर बैठे, शृंखला वही थी, बस इस बार पुरुष सोफे पर थे. उनकी साथी स्त्रियों ने उनके पांवों के बीच अपना स्थान ग्रहण किया. स्पष्ट था की इस बार मौखिक सम्भोग का आनंद पुरुष उठाएंगे. और इसी के साथ इस सामूहिक सहवास का दूसरा चरण प्रारम्भ हुआ.

स्त्रियों ने अपने साथियों के लौंड़ों को प्यार से चूसना और चाटना शुरू कर दिया. इनमें से कुछ तो इस कला की पारखी थीं और अपने साथी को वो स्खलन के द्वार पर लाकर रोक देतीं और कुछ समय बाद दोबारा वहीँ लेकर आ जातीं। उनके साथी एक आनंद और पीड़ा की दो धाराओं में सवार थे. इसकी अग्रणी थी शीला जिसका लौड़े चूसने का उतना ही अनुभव था जितनी सागरिका और पार्थ की मिलकर आयु. और दूसरी भला उसकी शिष्य पुत्री के सिवा और कौन हो सकता था. सागरिका की जो कमी अनुभव की थी वो उसे अपने उत्साह और ऊर्जा से पूरी कर रही थी. अब समर्थ का लौड़े को चूसने वाली वो कोई पहली तो थी नहीं, पर ये अवश्य स्पष्ट था कि वो उसे हर रूप में सुख और संतुष्टि देने का प्रयास कर रही थी. और समर्थ के चेहरे के भाव उसकी सफलता को दर्शा रहे थे.

पार्थ को अब ये समझ आ गया था की उसके लौड़े पर अब पूरा वश शीला का है. अब जब वो चाहेगी तभी उसका पानी छूटेगा.

पार्थ ने अपने साथ बैठे निखिल से पूछा, "तुम कैसे इनके इस आक्रमण से अपने आपको सँभालते हो?"

निखिल: "सँभालने की आवश्यकता ही क्या है? हम सेक्स को स्पर्धा नहीं समझते. कभी जल्दी झड़ने में कोई शर्म नहीं मानते. इसे हम आनंद का एक साधन मानते हैं. हममें से कोई एक दूसरे से जीतने का प्रयास नहीं करता."

निखिल की ये बात सुनकर चटर्जी परिवार को थोड़ी सांत्वना मिली. जॉय को तो जैसे दूसरा जीवन मिल गया. उन्हें अब किसी प्रकार का प्रदर्शन नहीं करना था. सिंह परिवार की तरह इन दो दिनों केवल आनंद की उबलब्धि के लिए व्यतीत करने थे. संबंध हो या नहीं ये दिन उन्हें सदैव स्मरण रहने चाहिए थे. इस स्वीकारोक्ति ने उनके सभी सदस्यों को तनावमुक्त कर दिया. और इसका प्रभाव उनके उत्साह पर पड़ा जो चौगुना हो गया.

अपने लौंड़ों को अपने साथी के मुंह से चुसवाते हुए अब लगभग दस मिनट तो निकल ही चुके थे. और पुरुषगण अपना बीज गिराने के लिए तैयार थे. उनके लौंड़ों की नसों और सुपाड़े को फूलता हुआ महसूस करने पर ये पता चल गया कि वे सब झड़ने की कगार पर है. महिलाओं ने अपने आप को आते हुए सुनामी के लिए तैयार ही किया था कि एक एक करके सारे लौंड़ों अपना पानी छोड़ने लगे. इस स्वादिष्ट प्रोटीन युक्त प्रसाद की भेंट अपने मुंह में स्वीकारते हुए स्त्रियों ने एक बूँद भी बाहर न गिरने दी. पीने के बाद उन्होंने अपने हिस्से के लौड़े को एक बार और प्यार से चाटकर साफ किया और फिर अपने पांवों पर खड़ी हो गयीं.

शीला ने सागरिका से पूछा, "कैसा लगा मेरे पति का स्वाद बहू ?"

सागरिका: "बहुत अच्छा नानी जी. अब मुझे आपकी सुंदरता का रहस्य पता चल गया है."

शीला ने सागरिका को अपने गले से लगा लिया.

शीला: "और भी हैं इसके राज, एक बार तू बहू बनकर आ तो जा, देख तेरी सास को इसकी जवानी ही इसका साथ नहीं छोड़ती."

इसी तरह एक दूसरे से सब बातें कर रहे थे. समर्थ जॉय को एक ओर ले गया.,

समर्थ: "जॉय, तुम इतने सहमे से क्यों हो."

जॉय: "जी, लड़की का बाप हूँ, कुछ गलती न हो जाये."

समर्थ: "इस सोच को अपने मन से निकाल दो, अपने घर की लक्ष्मी हमें दे रहे हो और हम से ही डरते हो. संबंधों में मिठास रहनी चाहिए, औपचारिकता और डर नहीं. हमारे साथ वैसे ही रहो जैसे रहते हो. तुम हमसे छोटे नहीं हो. क्या मैं गलत कह रहा हूँ?"

जॉय: "बिल्कुल नहीं. अपने मेरे मन को जीत लिया, नानाजी." ये कहकर जॉय नानाजी के गले से लग गया.

फिर दोनों लौट कर रणक्षेत्र में आ गए, जहाँ अगले चरण की तैयारी चल रही थीं. शीला ने समर्थ को जॉय साथ वापिस आते देखा तो आँखों से पूछा कि सब ठीक है? समर्थ ने हल्के गर्दन के इशारे से बताया कि अब ठीक है. शीला ने चैन की साँस ली.

समर्थ: "तो मेरी प्यारी बहूरानी अब क्या चाहती है?"

सागरिका: "जो मेरे प्यारे नानाजी चाहते हैं. मेरी चूत में आपका लंड."

शीला: "देखा मेरी बहूरानी को, घर में आने के पहले ही सबका मन जीत रही है? क्यों जॉय, क्या कहते हो."

जॉय: "माँ जी, आप बिल्कुल सही कह रही हैं, इसका स्वभाव ही बहुत मिलनसार है. और अगर सामने कोई लंड तानकर खड़ा हो तो फिर ये संकोच नहीं करती. जितनी जल्दी हो सके उसे अपनी मुंह, चूत या गाँड में ले लेती है."

समर्थ ने जॉय को थम्स अप करके शाबाशी दी और सागरिका को बाँहों में लेकर उसके होंठों से अपने होंठ मिला दिए. दोनों ऐसे एक दूसरे को चूम रहे थे जैसे पृथ्वी का अंत निकट हो. समर्थ के हाथ सागरिका के वक्षस्थलों पर रेंग रहे थे. फिर उसने अपने हाथ पीछे किये और सागरिका के दोनों नितंबों को भरकर निचोड़ दिया. सागरिका की एक हल्की सी कराह निकल गयी और उसने चुम्बन को और भी गहरा करने का प्रयास किया. पर समय अब चुम्बन का नहीं, चुदाई का था. तो समर्थ ने उसका हाथ लिया और जमीन पर लगे मोटे गद्दों में से एक पर उसे ले जाकर बैठा दिया. फिर उसके साथ खुद बैठ चुम्बनों का आदान प्रदान पुनः आरम्भ हो गया.

फिर समर्थ ने सागरिका को लिटा दिया और अपना मोटा लम्बा लंड उसकी कमसिन गुलाबी चूत के मुंहाने रखा.

समर्थ: "बहू, डाल दूँ?"

सागरिका: "अब सोचिये मत, बना लीजिये आज मुझे अपनी. चोद दीजिये ये चूत।"

समर्थ ने अपने लंड को सागरिका की चूत में उतारना शुरू किया और कुछ ३-४ मिनट में पूरा लंड उसकी चूत में बैठ गया.

शीला ने जॉय को जाकर एक गहरा चुम्बन दिया, "कितने सुन्दर लग रहे हैं न दोनों?"

जॉय, जो अब खुल चुका था, ने शीला की गाँड दबाते हुए उसके चुम्बन का उत्तर दिया, "सचमुच, मुझे विश्वास है कि चुदवाती हुई आप भी बहुत ही सुंदर लगती होगी."

शीला: "ये देखने मैं अब तुम्हे ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करनी होगी, आओ पार्थ, तुम्हारे मामा को मेरी चुदवाती हुई मुद्रा देखनी है."

ये कहकर शीला पार्थ को लेकर एक गद्दे पर जाकर बैठ गई.

सुमति ने निखिल, शोनाली ने नितिन को अपने अपने गद्दों पर बैठा दिया. सुप्रिया और जॉय दोनों देख रहे थे.

सुप्रिया: "कितना मनोरम दृश्य है."

जॉय: "अगर पारुल भी होती तो और सुन्दर होता."

सुप्रिया: "हाँ, पर देखा जाये तो फिर लौंड़ों की कमी पड़ जाती."

जॉय हंस दिया. "वो तो वैसे भी पड़ने ही वाली है. अगले सप्ताह वो वापिस जो आ रही है."

सुप्रिया: "जॉय, प्लीज उसे आने के बाद मुझसे मिलने भेजना."

जॉय: "अवश्य. पर अब हम अपने विषय में भी कुछ सोचें?" ये कहकर जॉय ने सुप्रिया को बाँहों लिया और चुम्बनों की बौछार कर दी.

उसका हाथ लेकर वो भी एक गद्दे पर बैठ गया. और फिर उसने चारों ओर देखा. समर्थ अपने लंड को तीव्रता से सागरिका की चूत में पेल रहा था. वहीँ शीला के फैले हुए पांवों के बीच पार्थ का लंड चूत की गहराइयाँ नाप रहा था. सुमति ने निखिल को लिटा दिया था और वो उसके लंड पर सवार थी और आगे झुककर तेजी से अपनी गाँड उछालकर चुदवा रही थी. नितिन ने शोनाली को घोड़ी बनाया हुआ था और वो पीछे से उसकी चूत में अपना लंड पेल रहा था. चारों महिलाएं सिसकारियों और घुटी हुई चीखों से अपने आनंद का प्रदर्शन कर रहे थे. जॉय ने ये सब देखकर सुप्रिया को खड़े स्थिति में ही आगे झुका दिया और उसकी कमर को मजबूती से पकड़कर पीछे से उसकी चूत में एक ही झटके में लंड पेल दिया. अब पांचों जोड़े संभोगरत थे और आनंद में झूल रहे थे.

समर्थ: "जॉय, तेरी बेटी की चूत तो बहुत कसी है. बहुत मजा आ रहा है इसे चोदने में."

जॉय: "बाबू जी, आपकी बेटी की चूत भी कोई कम नहीं. क्या सट के जा रहा है मेरा लंड इसकी चूत में."

सागरिका: "नानाजी, थोड़ा और जोर से चोदिये न, आपका लंड बहुत मजा दे रहा है, थोड़ा और लम्बे धक्के मारिये. मेरी चूत फटेगी नहीं, सच में."

समर्थ ने ये सुनकर अपने धक्कों की गति और तेज कर दी. इस उम्र में भी उसकी शक्ति देखने वाली थी. उसके लम्बे और गहरे धक्के सागरिका की चूत को भरपूर सुख दे रहे थे. उसका पानी अब तक दो बार छूट चूका था. वहीँ शीला अपने आप को पूरी तरह से पार्थ को समर्पित कर चुकी थी. पार्थ अब उसकी बूढी चूत को प्रबल शक्ति से चोद रहा था. चूँकि शीला को इस प्रकार की चुदाई पसंद थी और वो इसकी प्रतिदिन की दिनचर्या थी, वो इस नए लंड का भरपूर आनंद ले रही थी.

शीला: "बहुत अच्छा पार्थ, तू तो बहुत बढ़िया चुदाई करता है बेटा। मेरे नातियों के साथ मिलकर एक दिन तुम मेरे तीनों छेद सील करना."

पार्थ: "नानी, आप जब कहोगी मैं आ जाऊँगा. आपके बस बुलाने की देर होगी, मैं सब काम छोड़कर आपकी सेवा में उपस्थित हो जाऊँगा."

शीला की पनियाई हुई चूत अब पार्थ को वो घर्षण नहीं दे पा रही थी. तो उसने अपना लंड बाहर निकाला और गद्दे पर बिछे हुए बिस्तर के कपडे से उसकी चूत को पोंछ कर सुखा दिया और फिर वापिस अपना पूरा लंड एक ही झटके में डाल कर बेरहमी से चोदने लगा.

शीला: "वाह रे मेरे शेर, अब फटेगी मेरी चूत सही से. चोद मुझे हरामी. दम लगाकर चोद। "

पार्थ भी कहाँ पीछे हटने वाला था. उसने ऐसी चुदाई शुरू की जिसे देखकर दुर्बल ह्रदय के व्यक्ति को आघात ही पड़ जाता. पर शीला को इसमें असीम सुख मिल रहा था.

सुमति निखिल के लंड पर पूरे जोर शोर से उछल रही थी. निखिल का लंड उसके पुत्र पार्थ के लंड के ही जितना बड़ा और चौड़ा था और उसे इससे बहुत संतुष्टि मिल रही थी. पार्थ उसको अब इतना समय नहीं देता था. घर में तीन और चुदने को तैयार चूतें जो थीं. उसे अब उसको किसी ने किसी के साथ बाँटना ही पड़ता था, अकेले माँ बेटे की चुदाई को बहुत समय हो गया था. पर आज निखिल से चुदने में उसे वही समय का ध्यान आ रहा था. और अभी नितिन भी तो था. अब भविष्य में उसे इन तीनों में से किसी न किसी के साथ अकेली रात मिल ही जाएगी. यही सोचकर उसकी चूत लगातार पानी छोड़ रही थी. वो आगे झुककर अपने मम्मे निखिल के मुंह में दबाकर उसके लंड पर जबरदस्त उठक बैठक कर रही थी. निखिल ने उसकी गाँड में एक ऊँगली डाली हुई थी जिससे वो उसके छेद को हल्के हल्के कुरेद रहा था.

सुमति फुसफुसा कर: "निखिल, मेरी गाँड जरूर मारना, उस दिन शोनाली की गाँड से तेरा रस पिया था, बहुत स्वादिष्ट था. पर मुझे अपनी गाँड से निकाल कर पीना है."

निखिल को याद आया की शोनाली ने अपनी गाँड को एक प्लग से बंद किया था क्लब में, जिससे उसका वीर्य बाहर न बहे. अब उसे समझ आ गया कि वो अवश्य सुमति के लिए सहेजी होगी. इतना प्यार और एक दूसरे का ध्यान रखने वाले परिवार की लड़की से शादी करने में कोई समस्या नहीं होने चाहिए.

निखिल: "बुआ, चिंता न करो. अब से मैं तुम्हें गाँड का इतना रस पिलवाऊंगा कि तुम्हारी सारी प्यास मिटा दूंगा. और नितिन और नाना से भी कहूंगा. आपके लिए अब कभी कमी नहीं होगी."

सुमति ये सुनकर भावुक हो गई. उसकी गति अब कभी तेज तो कभी धीमी पड़ने लगी. ये समझकर कि शायद वो थक गई हो निखिल ने उसे पकड़कर एक करवट ली और सुमति अब नीचे थी और निखिल उसके ऊपर. अब तक निखिल सुमति के परिश्रम से ठहरा हुआ था पर अब उसने चूत में अपने लंडों को ऐसे पेलना शुरू किया कि सुमति का रोम रोम कांप गया.

शोनाली और जॉय भी अपने अपने साथी की पूरे जोश से चुदाई कर रहे थे. सुप्रिया की चूत इतने बार चुदने के बाद भी व्यायाम के कारण काफी कसी थी. और उसे चोदने में जॉय को बहुत आनंद आ रहा था. उसके साथ ही शोनाली नितिन को तेज चुदाई के लिए उकसा रही थी और नितिन अपनी पूरी शक्ति उसकी चूत फाड़ने में झोंक रहा था.

लगभग पंद्रह से बीस मिनट की इस चुदाई के पश्चात एक एक करके सभी पुरुषों ने घोषणा की कि वो झड़ने वाले हैं. शीला ने सबको चेताया कि चूत में कोई नहीं झड़ेगा बल्कि सब चेहरे पर अपना कामरस छोड़ेंगे. उसने महिलाओं को भी चेताया कि वो अपना मुंह बंद रखें और अपने चेहरे पर ही पूरा वीर्य इकठ्ठा करें. सबसे पहले समर्थ की ही धार छूटी जिसने सागरिका के सुन्दर चेहरे पर गाढ़े श्वेत जल का लेप कर दिया. उसके बाद जॉय ने सुप्रिया, निखिल ने सुमति, नितिन ने शोनाली और अंत में पार्थ ने शीला के चेहरे को अपने पानी से पोत दिया. शीला ने उसे अपने चेहरे और स्तनों पर अच्छे से मला और वही अन्य महिलाओं ने भी किया.

उसके बाद शीला उठी और सागरिका के पास जाकर उसका चेहरा और स्तन चाटकर साफ कर दिया और सागरिका से अपना चेहरा और स्तन चटवा लिए. फिर उसने बाकी तीनों महिलाओं के चेहरे और स्तन चाटकर साफ किये और अंत में लेट कर ऑंखें बंद करते हुए आनंद की अनुभूति करते हुए विश्राम करने लगी. अन्य सभी लोग उठे और बार या बाथरूम की और अग्रसर हुए. कुछ ही देर में सब लोग वहीँ नंगे खड़े होकर अपनी अपनी ड्रिंक का सेवन करने लगे.

पार्थ: "नानी जी बहुत शांति से लेटी हैं. कोई परेशानी तो नहीं?"

समर्थ: "अरे नहीं, उसे लौडों का टॉनिक बहुत रुचिकर लगता है. शराब से ज्यादा उसे इस टॉनिक से नशा होता है."

पार्थ: "सच में नानाजी, सबके अपने अपने स्वाद और पसंद होती है. मम्मी को गाँड मरवाकर उससे वीर्य पीना बहुत अच्छा लगता है. न केवल इतना, बल्कि अगर गांड में वो माल कुछ समय तक ठहरा रहा हो तो उन्हें उसका स्वाद कई गुना अधिक स्वादिष्ट लगता है. हमारे यहाँ गाँड मारने के बाद उसका पूरा प्रसाद मम्मी को ही पिलाया जाता है."

सुमति ये सुनकर शर्माकर लाल हो गई.

समर्थ:" सुमति, लगता है अगले चरण में तुम्हे भरपूर भोजन मिलने वाला है. क्योंकि अगला राउंड गाँड खोलने का है."

सुमति की आँखों में एक चमक आ गयी जिसे देखकर कोई भी ये समझ सकता था कि वो इस समाचार से कितनी आनंदित हुई थी. समर्थ ने शीला को पास बुलाया और उसके कान में कुछ कहा. शीला ने मुस्कुरा कर सिर हिलाया और सुमति की ओर देखकर मुस्कुराई. सुमति झेंप गई तो शीला उसे अपने साथ अलग ले गई.

शीला: "समर्थ ने मुझे क्या बोले जानती हो?"

सुमति: "नहीं माँ जी."

शीला हँसते हुए बोली," उन्होंने कहा कि इस बार गाँड का पानी अकेले न पियूँ बल्कि इस बार पूरा तुम्हें पीने दूँ, अगली बार मैं बाँट कर पियूँ."

सुमति आश्चर्य से उसकी ओर देखने लगी.

शीला: "तुम क्या सोचती हो, तुम्हें ही सारी विकृत रुचियाँ हैं. मेरे पास आना कभी मेरी विभिन्नता देखोगी तो चौंक जाओगी."

सुमति: "माँ जी, इससे अधिक विकृत क्या हो सकता है?"

शीला ने सुमति को पास खींचा और उसके कान में कुछ कहा. सुमति की ऑंखें चौड़ी हो गयीं.

शीला: "इन सबका मजा लेना हो तो कभी आओ हमारी हवेली पर."

सुमति: "ज जज जज्जि माँ जी. आउंगी."

शीला: "चलो अब लंडों को तैयार करें, मेरी तो गाँड कल रात से खुजला रही है. समर्थ ने मुझे कल छुआ भी नहीं, अपनी ताकत बचाने के लिए."

उधर एक ओर शोनाली और पार्थ में भी कुछ गुप्त बातचीत चल रही थी. शोनाली उसकी बात से सहमत नहीं लग रही थी.

पार्थ: "मामी, मैं एक बार नानाजी से पूछ लूंगा अलग से. अगर उन्होंने सहमति दे दी, तब तो आपको कोई आपत्ति नहीं होगी न?"

शोनाली बेमन से मान गई.

पार्थ: "नानी बुला रही हैं, न जाने माँ के साथ क्या खिचड़ी पका रही थीं."

शोनाली: "बाद में पता चल जायेगा."

इसी के साथ सब अपनी ड्रिंक्स समाप्त कर चुके होते हैं और अगले चरण में प्रवेश के लिए कमर कस लेते हैं.

शीला: "अब गाँड मारने की बारी है. पर इसमें एक ही शर्त है. सारे मर्द पानी गाँड में ही छोड़ेंगे."

सबने अपनी स्वीकृति दी.

शीला ने आगे कहा, "और गाँड से निकला पूरा सूप सब मेरी सुमति को ही पिलायेंगे. तो ख़बरदार अगर किसी ने एक बूँद भी बाहर निकाला.”

ये सुनकर शोनाली सतर्क हो गई. वो तुरंत दरवाजे के पास गई और बाहर खड़े एक रोमियो से कुछ कहा. कोई ५-७ मिनट में सहायक ने उसके हाथ में कुछ थमा दिया.

शोनाली, "ये प्लग है जिससे गाँड से पानी बाहर नहीं निकलता. मैंने सबके लिए एक एक लिया है. और ये वेसलीन की ट्यूब, इतने बड़े लंडों हमारी गाँड में बिना वेसलीन के नहीं लेने वाले हम." ये कहते हुए उसने पांचों प्लग और वेसलीन की ट्यूब बाँट दिए.

समर्थ: "मैं चाहूंगा कि आप महिलाएं अपने साथी का लंडों चूस कर खड़ा करें. और इस बीच सुमति और शीला उनकी गाँड तैयार करें. बाद में सुमति शीला की गाँड तैयार करेगी."

जॉय: "पर सुमति दीदी का क्या होगा, और वैसे भी ये दोनों तीन गाँड कैसे संभालेंगी?"

इससे पहले कि समर्थ उत्तर देता शोनाली बोल उठी. "मेरे पास इसका भी उपाय है. बस ५ मिनट दो मुझे."

ये कहकर उसने टेबल से मोबाइल उठाया और एक संदेश भेजा. कुछ ५-७ मिनट में कमरे का एक दरवाजा खुला और सिमरन ने नग्नावस्था में प्रवेश किया. शोनाली ने सिमरन को उसकी भूमिका समझाई। सिमरन ने बेझिझक इस स्वीकार कर लिया. अब इस चरण की तैयारी हो चुकी थी. समर्थ गद्दे पर बैठ गए और सागरिका अपने घुटनों पर उनकी जांघों के बीच आ गई. उसने अपनी गाँड ऊपर उठाकर समर्थ का लंड अपने मुंह में ले लिया. शीला ने अपनी होने वाली बहू के पीछे स्थान लिया और उसकी जांघों से ऊपर चाटना आरम्भ किया.

जॉय ने अपना स्थान ग्रहण किया, फिर सुप्रिया ने सागरिका की तरह उसका लंड अपने मुंह में लिया और सुमति उसकी गाँड की ओर अग्रसर हुई. नितिन और शोनाली ने भी अपनी स्थिति तय की और इस बार शोनाली की गाँड के पीछे सिमरन थी. पार्थ और निखिल ने अपने लिए एक ड्रिंक बनाई और दोनों एक ओर खड़े होकर सामने चलने वाले सेक्स शो को देखने लगे. पार्थ को अपने क्लब के लिए एक नया आइडिया भी मिल गया. वो हर पार्टी में ऐसे शो अपने सदस्याओं और रोमियो से करवा सकता था. उसने मन ही मन नानाजी का धन्यवाद किया और निखिल के साथ खेल देखने लगा.

सागरिका इस समय समर्थ के लंड की पूरी श्रद्धा से चुसाई कर रही थी. ऐसा कोई अंश नहीं था जिसे उसे अछूता छोड़ा हो. उसे चाटने और चूसने में जैसे एक लालच का पुट था. जैसे कि वो कहीं खो न जाये. उसके पीछे शीला नानी उसकी चूत से लेकर गाँड तक चाटे जा रही थी. शीला अत्यंत अनुभवी और पारखी स्त्री थी. उसने अपने जीवन का लम्बा समय किसी न किसी लंड के छोर पर ही बिताया था. और कुछ ऐसी ही उनके मुंह की भी महिमा थी. वो लंडों, चूत हो या गाँड सबको इतने प्रेम से चाटती और चूसती थीं कि कोई बिरला ही उनसे स्पर्धा कर सकता था.

उनका मुख्य ध्यान सागरिका की गाँड पर ही था. उसकी गाँड के भूरे सितारे नुमा प्रवेश द्वार को वो अपनी उँगलियों से सहलाती और फिर चाट लेती. कुछ देर में उसने सागरिका की गाँड को दो हाथों से खोला और अपनी लम्बी जीभ को अंदर डालकर उससे ही जैसे उसे चोदने लगी. खुले छेद को थूक से भरकर उसने पहले दो फिर तीन उँगलियाँ अंदर डाल कर गाँड को थोड़ा चौड़ा कर दिया. फिर अपने हाथ से वेसलीन की ट्यूब लेकर लगभग एक चौथाई ट्यूब को गाँड के अंदर खाली कर दिया और दो उँगलियों से उसे अच्छी तरह से रगड़ रगड़ कर चिकना कर दिया. इस पूरे उपक्रम में गाँड का छेद अब काफी खुल गया था और समर्थ के लंड के प्रवेश के लिए अब उचित था.

दूसरी ओर सुमति जहाँ एक अनुभवी स्त्री थी पर उसका सर्वाधिक प्रेम गाँड से था. गाँड से सम्बंधित हर क्रिया की वो विशेषज्ञ थी. उसकी इस कला का एक नमूना सुप्रिया देख ही चुकी थी, और अब वो उस अनुभव के लिए दोबारा तैयार थी. बस इस बार उसके मुंह में जॉय का तमतमाया हुआ लंड भी था. सुमति उसकी गाँड खोलकर अपनी जीभ से ऐसे चाट रही थी जैसे किसी स्वादिष्ट व्यंजन खाने के बाद लोग थाली चाटते है. हर मिली मीटर को उसने चाट कर चमका दिया. और जब लगा की अब कुछ शेष नहीं है, तो वेसलीन की ट्यूब से गाँड को अच्छे से तर किया और उँगलियों से अंदर फैला कर अपने भाई के लिए उपस्थित कर दिया.

शोनाली नितिन के भारी लंड को दिल लगाकर चूस रही थी. साथ ही वो उसे अपने मुंह ने पूरी तरह लेकर अच्छे से गीला भी कर रही थी. उसके पीछे सिमरन को गाँड चाटने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, इसीलिए उसने सीधे से वेसलीन लगाकर शोनाली की गाँड को अच्छा चिकना कर दिया और तीन उँगलियों से छेद को चौड़ा भी कर दिया. ये गाँड अब चुदाई के लिए सबसे पहले तैयार हुई थी.

शीला ने सागरिका के नितम्ब पर एक हल्की चपत दी तो उसने समर्थ के लंड को अपने मुंह से निकाल दिया. समर्थ शीला के आगे खड़े हो गए और शीला ने वेसलीन से उनके लंड की अच्छी मालिश कर दी.

वहीँ जॉय और नितिन के साथ भी यही हुआ. अब तीन मोटे लंड तीन मखमली गाँड के लिए तैयार थे. शीला ने पार्थ को बुलाया और लिटा दिया. अब वो उसके लंड को चूम और चाट कर तैयार करने लगी. सुमति ने अपना स्थान शीला के पीछे लिया और अपना जादू दिखाना प्रारम्भ किया. शीला इस स्तर के गुदा प्रेम से अभी तक वंचित थी. कुछ ही क्षणों में उसकी गाँड इतनी उत्तेजित हो गई की रुकना असंभव सा लगने लगा. सुमति से उसकी मनस्थिति को समझा और गाँड में वेसलीन लगाकर तीन उँगलियों के प्रयोग से खोल दिया. फिर पार्थ उठकर पास आ गया और उसके लंड पर उसने बहुत प्रेम से वेसलीन लगाई.

सुमति: "बेटा, अच्छे से मारना नानी की गाँड, मेरे सम्मान का प्रश्न है. नहीं तो सब सोचेंगे कि मैंने तुझे कुछ सिखाया नहीं."

पार्थ: "अरे माँ, तुम चिंता न करो. नानी की मैं पूरे मन से सेवा करूँगा और उनकी गाँड का घी मथ दूंगा."

सुमति ने अब निखिल को अपने पास बुला लिया और उसके लंड पर जुट गई और सिमरन ने उसकी गाँड को तैयार करने का काम शुरू किया. कुछ ही देर में ये जोड़ा भी तैयार था. सिमरन ने सबसे विदा मांगी और बताया कि आधे घंटे में शाम का नाश्ता परोसा जायेगा.

समर्थ ने अपना लंड सागरिका की मुलायम गाँड पर रखा और बड़े ही प्रेम से अंदर धकेल दिया. प्लप्प की आवाज़ के साथ सुपाड़ा गाँड की झिल्ली को छेदते हुए अंदर चला गया. सागरिका थोड़ी कसमसाई पर आगे के लिए सँभलने लगी. उसकी गाँड पहली बार तो मारी नहीं जा रही थी, और पार्थ के लंड को भी वो ले चुकी थी. पर गाँड मरवाना कुछ अधिक जटिल होता है. समर्थ पर इस कला के पारखी थे. न जाने कितनी ही गाँड उनकी इस कला से परिचित थीं. वो अविरल बिना रुके अपने लंड को बहुत हल्के से गाँड में उतार रहे थे. सागरिका साँस रोके इस प्रहार के समापन की राह देख रही थी, जब लंड गांड में पूर्ण रूप से समा चुका होगा. उसे अपनी गाँड धीरे धीरे भरती हुई अनुभव हो रही थी. अचानक ये प्रगति रुक गई. उसने समर्थ को आगे झुककर उसकी गर्दन पर चुम्बन लिया.

फिर फुसफुसाते हुए समर्थ ने कहा, "बहू तुमने तो मेरा पूरा लंड बड़ी सरलता से ले लिया."

ये कहकर एक झटका मारा तो रहा सहा लंड भी जड़ तक जाकर बैठ गया. इसके साथ ही समर्थ ने सागरिका की चूत पर एक हाथ रखकर उसे मसलने के साथ गाँड में अपने लंड की गतिविधि आरम्भ कर दी. धीरे धीरे उन्होंने अपनी गति बढ़ाई और उसी गति से सागरिका की चूत की रगड़ाई भी. सागरिका तो जैसे पागल ही हो गई, वो लगातार झड़ रही थी. न जाने कितना पानी था उसके शरीर में जो चूत के रास्ते बहा जा रहा था. समर्थ ने अपने पूरे जोश से सागरिका की गाँड कोई १० मिनट तक मारी और फिर एक ओर रखे प्लग को उठाया और अपना पानी सागरिका की गाँड में छोड़ दिया. लंड सिकुड़ जाने के बाद धीरे से बाहर निकालते हुए प्लग जो गाँड ने डाल कर उसे सील बंद कर दिया. सुमति के लिए पहला पकवान सीलबंद हो गया था.

पार्थ ने शीला की गाँड में अपना लंड टिकाया और एक बार जैसे ही प्रवेश हुआ उसने लंड बाहर खींचकर एक लम्बे झटके में पूरा एक ही बार में पेल दिया. अब शीला की गाँड इतनी बार पिल चुकी थी कि उसे उसमें भी मजा ही आया. वो आनंद की अधिकता से चीख पड़ी.

शीला: “वाह रे मेरे शेर. फाड़ दे ये गाँड, मिटा दे इसकी खुजली. कल से लपलपा रही है लंड के लिए. तेरे नाना ने तो कल छुआ भी नहीं मुझे. आज के लिए बचा रहा था. अच्छे से चोद, चिंता न कर फटेगी नहीं. बहुत राही इस रास्ते से गुजर चुके हैं. जरा जोर से और कस के मार. हाँ यूँ अब आया मजा. बहुत अच्छा लंड है रे तेरा. सुमति, तेरी किस्मत कितनी अच्छी है जो ऐसे लंड वाले लड़के को पैदा किया.”

यूँ ही बोलते हुए शीला की चूत भी पानी छोड़ रही थी. पार्थ ने अपनी दो उँगलियों में भग्नासे को पकड़ कर मसल दिया. शीला चीखकर झड़ गयी. पार्थ उसकी गाँड पूरी बेरहमी से मार रहा था, और शीला को यही प्रिय भी था. अगर गाँड मरवाने में आंसू न निकलें तो मारने वाले के सम्मान पर बात आ जाती है. पर पार्थ उसे उसकी इच्छा से अधिक गहराई और पाश्विक ढंग से चोद रहा था. १० मिनट की इस भयंकर चुदाई के बाद पार्थ ने बताया कि वो झड़ने वाला है. अपना पानी छोड़कर, उसने अपने लंड को निकला और प्लग से शीला की लगभग फटी गाँड को सील कर दिया. सुमति के लिए दूसरा पकवान भी पैक हो गया था.

लगभग उसी समय जॉय ने भी अपना माल सुप्रिया की गाँड में उड़ेल दिया और उसे भी सुमति के भोज के लिए पैक कर दिया। शोनाली की गाँड नितिन ने भर कर पैक कर दी. अब सुमति के लिए एक ही व्यंजन चार स्वाद में भोगने हेतु उपलब्ध थे. प्रतीक्षा थी तो स्वयं सुमति की, जिसकी गाँड में अभी भी निखिल का लंड अपनी पूरी कलाबाजियां दिखा रहा था. पर कुछ ही देर में उसने भी सुमति की गाँड को सींच दिया और उसे भी प्लग लगाकर सील कर दिया.

अभी सारी महिलाएं अपने घोड़ी ही बनी हुई थीं, और सबकी गाँड अभी भी उठी हुई थी. शीला ने पहल करते हुए सुमति को घुटनों के बल बैठने को कहा. उसके बाद उसने एक एक करके सारे पुरुषों को आगे करते हुए शीला से उनके लंडों चटवा कर साफ करवाए. फिर उसने निखिल को इशारा करके एक पेग बनाने को कहा और उसे एक बाउल (बड़ी कटोरी) में लाने को कहा. निखिल समझ गया और लेने चला गया.

शीला: “सुमति, आज मैं तुम्हे ये रस पीने का एक और स्वरूप सिखाती हूँ.”

निखिल ने वो शराब (लगभग २ पेग के बराबर) से भरा कटोरा नीचे रखा. शीला ने उसके ऊपर निशाना साधा और अपनी गाँड से प्लग निकाल कर रुका हुआ वीर्य कटोरे में छोड़ दिया. एक एक करके चारों महिलाओं ने अपनी गाँड में थमा वीर्य उस कटोरे में डाल दिया. अंत में बारी आयी सुमति की तो उसने देखा कि सब उसकी ही ओर देख रहे हैं.

“अरे माँ, देखो नानी ने तुम्हारी पसंद के खाने को एक नए ढंग में बनवाया है.”

अंततः सुमति ने भी अपनी गाँड से कामरस उस कटोरे में भर दिया. जब ये सब चल रहा था तो नितिन और सागरिका सबके लिए नए ड्रिंक्स बना कर ले आये थे. अब ९ नंगे लोग अपने हाथों में ग्लास थामे खड़े थे. सुमति ने कांपते हाथों से अपना शराब, वीर्य और गाँड के रस का कॉकटेल उठाया.

“चियर्स!” सब ने जोर से चिल्लाकर सुमति को प्रेरित किया और अपने ग्लास एक बार में ही खाली कर दिए. सुमति ने भी अपना प्याला अपने मुंह से लगाकर गटागट पीना शुरू किया. पर अधिक होने के कारण पूरा नहीं पी पायी. बाकी जो बचा वो अपने चेहरे पर डाल कर उसे कॉकटेल से धो दिया.

“कीमती पेय की बर्बादी.” ये कहकर शीला उसके पास आयी और उसकी ठुड्डी से लेकर ऊपर तक चाटकर खुद पी लिया.

“क्यों सुमति, कैसा लगा स्वाद?”

“अच्छा था, पर तुम लोग उसमे इतना सारा दारू क्यों डाला? क्या मुझे नशे में करके मेरी गाँड मारना चाहते हो?”

ये सुनकर सब खिलखिला उठे. और फिर बाथरूम में जाकर नहाकर, अपने कपडे पहनने लगे. कुछ ही देर में वे सब संभ्रांत व्यक्तियों की तरह शाम के नाश्ते के लिए डाइनिंग रूम की और बढ़ गए. उनके पीछे, रोमियो ने कमरे को साफ किया और सभी उपयोग किये हुए बिस्तरों को हटाकर नए लगा दिए. २० मिनट में वो कमरा पहले जैसा ही हो गया था. नाश्ते के समय यूँ ही हल्की फुल्की बातें चलती रहीं. समर्थ और सिमरन में आँखों से कुछ बात हुई. समर्थ और सिमरन कुछ देर के लिए गायब हो गए. उन्होंने प्रयास तो किया कि किसी को समझ न आये पर इतने चतुर लोगों से वो बच न पाए. जब कुछ देर बाद सिमरन आयी तो उसकी चाल बदली हुई थी. शोनाली ने उसे देखकर आंख मारी तो सिमरन भी मुस्कुरा दी. समर्थ भी कुछ ही देर में आ गए. सब उनकी ओर देखकर मुस्कुराने लगे.

समर्थ: “बेचारी, सुबह से काम में लगी थी. देखा तो सोचा थोड़ी उसकी मालिश कर दूँ.”

शीला: “अंदर बाहर दोनों से मसला लगता है. कैसी थी?”

समर्थ: “जैसे पुरानी शराब.”

सब लोग हंसने लगे. यूँ ही शाम के ७ बज गए. पार्थ ने पूछा कि कौन क्या लेगा. सबने अपनी इच्छा की ड्रिंक बता दी. उसके साथ ही सिमरन ने खाने के लिए भी भेज दिया. इस समय दोनों परिवार बिल्कुल एक ही लग रहे थे.

समर्थ: “मुझे हर्ष है कि हम लोग एक दूसरे से इतने जल्दी स्वाभाविक हो गए.”

जॉय: “बाबूजी, इसके लिए आपका और माँ जी का बहुत श्रेय है. “

समर्थ: "हम बुजुर्गों का काम भी यही होता है."

शाम ८. ३० तक यही सब चलता रहा उसके बाद सबने खाना खाया और कुछ देर के लिए बाहर लॉन में बैठ गए.

सुप्रिया: “अब रात के लिए मैंने ये जोड़े तय किये हैं. सब अपने कमरे में ही रहेंगें। इससे उन्हें अलग से बात करने का समय भी मिलेगा.”

१, निखिल और सागरिका: इन्हें जीवन साथ बिताना है, इसीलिए अच्छा हो जो एक दूसरे से पूछना हो पूछ लें.

२. माँ जी और जॉय: अब जब ये समधन से अंतरंग हो चुके हैं तो उसकी माँ से भी मिल लें.

३. पापा और शोनाली: अब बेटी की माँ का भी नाप देख लें.

४. सुमति और नितिन: ये दो भाई हर मिठाई को बांटते है.

५. पार्थ और मैं: क्यूंकि मैं इसकी शक्ति और विवेक दोनों से अचंभित हूँ.

सब ने अपनी सहमति जताई और उठने लगे. तभी पार्थ ने समर्थ से कुछ बात करने के लिए एक ओर बुलाया. जब बात पूरी हो गई तो समर्थ के हाव भाव से लग रहा था कि वो सहमत है. बात समाप्त होने पर पार्थ ने शोनाली को थम्ब्स अप का इशारा किया. शोनाली और पार्थ ने समर्थ और सुप्रिया से कुछ समय माँगा और एक ओर चले गए. लगभग १५ मिनट में वे लोग वापिस आ गए. तब तक शेष सभी अपने कमरों में जा चुके थे. ये चारों भी अपने कमरों में चले गए.

अगले दिन सुबह:

अगले दिन सभी अपने कमरों से निकलकर सुबह के नाश्ते के लिए डाइनिंग रूम में पहुँच गए. इस बार समर्थ शीला, शोनाली और जॉय साथ बैठे थे. ये देखकर सबको सुखद आश्चर्य हुआ कि सागरिका ने निखिल के साथ बैठने का निश्चय किया. सुप्रिया, नितिन और सुमति, पार्थ के साथ बैठी थी. सिमरन ने बहुत अच्छा नाश्ता लगवाया था और सबने भरपूर खाया.

निखिल और सागरिका एक साथ बोले: “हमें कुछ कहना है.”

सबकी दृष्टि उनकी ओर केंद्रित हो गई.

निखिल ने पहल की: “हम दोनों की इस विवाह से सहमति है. कल रात हमने काफी देर बात की और ये अनुभव किया कि हमारी सोच लगभग हर विषय में मिलती है.”

सागरिका: “दूसरा हमने देखा कि हमारे परिवार कितनी सरलता से एक दूसरे के करीब आ गए. आज ऐसा लग ही नहीं रहा कि एक सप्ताह पहले हम लोग एक दूसरे को ठीक से जानते तक न थे, सिवाय इसके कि हम पडोसी थे.”

निखिल: “इसीलिए हमने ये सोचा है कि हम दोनों एक दूसरे और दोनों परिवारों के साथ बहुत खुश रहेंगे. और तो और हमारी जीवन पद्धति पर भी कोई आंच नहीं आएगी.”

ये सुनकर शीला ने उठकर सागरिका को गले लगा लिया और अपने गले का हार निकलकर उसे पहना दिया. उसका माथा चूमा और सागरिका ने उसके पांव छूकर आशीर्वाद लिया. फिर सागरिका ने समर्थ और सुप्रिया के पांव छुए. सुप्रिया ने भी उसे गले से लगाकर अपने हाथ का कंगन उसे पहनाया.

सुप्रिया: ”शोनाली और जॉय, आज से सागरिका हमारे घर की बेटी हुई. आप मंगनी और शादी की समय निश्चित करिये.”

ये सुनकर सुमति और शोनाली दोनों रोने लगीं. परन्तु उनके इन आँसुओं में ख़ुशी थी और किसी ने भी उन्हें चुप करने का प्रयास नहीं किया. पार्थ निखिल के पास जाकर उसके गले लग गया.

“अब हम केवल दोस्त नहीं है, जीजा जी.”

निखिल ने हंसकर अपने मित्र को उत्तर दिया, “अब संभल के रहना साले साहब.”

जॉय ने उठकर अपने कमरे से एक डिब्बा लाया और निखिल के हाथों में एक बहुमूल्य आयातित घड़ी पहना दी. फिर उसे गले से लगाकर उसके माथे को चूम लिया.

“बेटा मुझे आज इतनी प्रसन्नता मिली है, जिसका मैं वर्णन नहीं कर सकता.”

सिमरन ने भी सबको गले मिलकर बधाई दी और विश्वास दिलाया कि अगर उसकी कंपनी से केटरिंग कराई जाएगी तो वो अपनी पूरी श्रध्दा से उसे सफल करेगी. सब लोग एक हंसी ख़ुशी के वातावरण में न जाने कितनी देर बातें ही करते रहे. फिर पार्थ ने समर्थ से पूछा कि क्या जो कल बात की थी वो अभी भी वैध है. समर्थ ने हामी भरकर कहा कि अब तो १०० गुना अधिक वैध है. पार्थ ने शोनाली की ओर देखकर उसे सिर हिलाकर स्वीकृति दी.

दोपहर के खाने के पहले दो चक्र शराब के चले, इस मौके का सबने जी भर के आनंद लिया.

भोजन के पश्चात् सभी लोग खेल कक्ष में चले गए. सभी बिना कुछ कहे बिना अपने वस्त्रों से अलग हुए और उन्हें अलमारी में टांग दिया.

तभी शोनाली और पार्थ ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा.

पार्थ: “कल मैंने नानाजी से कुछ पूछा था जिसकी उन्होंने मुझे अनुमति दे दी थी. इसीलिए आज का विशेष आयोजन हमारे दोनों परिवारों की स्त्रियों के लिए है.”

शोनाली: “सुमति दीदी ने कल माँ जी से हुई बात मुझे बताई थी, जो मैंने पार्थ को बताई.”

शीला के होठों पर एक मुस्कराहट और आँखों में चमक आ गई.

“इसीलिए, आज मैंने अपने क्लब के १० रोमियो को अपनी सेवा के लिए नियुक्त किया है, इनमे से छह से आप कल मिल चुके हो, जो हमारे साथ उपस्थित थे. दोनों सहायिकाएं सोनम और नूतन भी उपस्थित रहेंगी. अब चूँकि हम सब व्यस्त होंगे तो पूरे कार्यकर्म का निर्देशन सिमरन जी करेंगी.”

ये कहकर उसने दो बार ताली बजाई। एक ओर का दरवाजा खुला जिसमें से सिमरन नंग धडंग अंदर आयी. उसके दोनों ओर उनकी दोनों सहायिकाएं सोनल और आतिशी भी नंगी खड़ी हो गयीं.

उसके बाद दरवाजे से १० नंगे लड़कों ने प्रवेश किया. और वो सब सिमरन के पीछे एक व्यूह में खड़े हो गए.

पार्थ: “आज हम सब अपने परिवार की महिलाओं को एक साथ तीन पुरुषों से सम्भोग का सुख देंगे. पर इसमें कुछ नियम हैं जो हर स्त्री के स्वभाव के अनुरूप होंगे:

१. गाँड का रस मम्मी को ही अर्पित होगा.

२. नानी माँ को अंत में वीर्य से नहलाया जायेगा.

३. चूत मारने के बाद के रस का सेवन केवल सागरिका के लिए होगा.

शोनाली: “मेरे विचार में ये नियम सही हैं और अगर किसी को कोई आपत्ति है तो बता सकता है.”

समर्थ: “मुझे ये देखकर प्रसन्नता होती है कि तुम हर कार्य एक नियम के अनुसार करते हो. मुझे किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं है.”

अन्य सबने भी अपनी स्वीकृति दी.

"इसमें से पहले सागरिका और नितिन, सुमति दीदी और पापा जी साथ होंगे क्यूंकि उन्हें अभी तक एक दूसरे का साथ नहीं मिला है. शेष सब एक म्यूजिकल चेयर से जीते जायेंगे.”

ये कहकर शोनाली ने पाँचों स्त्रियों को एक गोले में खड़ा कर दिया. अब पुरुष लोग एक गोले में आ गए. शोनाली के कहने पर सिमरन ने एक गाना बजा दिया और सब आदमी गोले में घूमने लगे. इसमें होना ये था कि गाना रुकने पर जो भी आदमी जिस स्त्री के सम्मुख होता वो उसका साथी बन जाता. इसमें सागरिका और सुमति को केवल दो लोगों को चुनना था. तीन बार में सबके साथी निश्चित हो गए.

शोनाली के हिस्से में निखिल +२ आये , सुप्रिया को पार्थ +जॉय +१ मिले और शीला को तीनों नए रोमियो. २ २ रोमियो सागरिका और सुमति को भी मिले. .

और एक सामूहिक चुदाई का नंगा खेल प्रारम्भ करने के लिए बीच में आ गए.

कुछ ही समय में कमरा नंगे शरीरों का एक अखाडा बन गया था. पांचों महिलाएं एक गोल चक्र में एक दूसरे को देखती हुई बैठ गयीं. जब एक बार महिलाओं ने अपने हिस्से के लंड को चूस चाट कर कड़ा कर लिया तो उन्हें जल्द से जल्द अपने काम पर लगने के लिए उत्साहित करने लगीं.

शीला इस समय तीन रोमियो के बीच में सैंडविच बनी हुई थी. एक लंड उसकी चूत में था, एक गाँड में और एक मुंह में. सबसे बड़ी बात की तीनो लंडों १० इंच से अधिक बड़े थे यानि उसके शरीर में ३० इंच से अधिक लम्बाई के लंड भरे हुए थे. और वो सब उसके द्वारा उत्साहित किये जाने के कारण एक गहराई और बेदर्दी से उसके छेदों को मथ रहे थे. एक लंड जब चूत में घुसता तो गाँड वाला बाहर निकलता और इसी लय ने उसके दोनों छेदों का मंथन कर रखा था. उसके मुंह का लंड पहले तो शीला की दया पर निर्भर था पर बाद में उसने भी शीला का सिर पकड़कर उसे अपनी गति से चोदना शुरू कर दिया था.

यही कुछ स्थिति शेष महिलाओं की भी थी. इस समय प्रेम और प्यार नहीं बल्कि शरीर का सहवास हो रहा था, सिर्फ शरीर की भूख मिटाई जा रही थी. सिमरन एक घडी से समय देख रही थी. उसने ३ मिनट पूरे होने पर “CHANGE” की आवाज़ दी. ये सुनकर सबने अपने लंड बाहर निकाल लिए. फिर गाँड मारने वाले आदमी ने अगली औरत के पास जाकर अपना लंड उसके मुंह में डाल दिया. जिसका लंड मुंह था वो नीचे लेट गया और चूत में लंड पेल दिया और जो चूत में था उसे गाँड में स्थान मिला.

(समझने के लिए: शीला की गाँड मारने वाले व्यक्ति ने अपने लंड को सुमति के मुंह में डाला. शीला की चूत मारने वाले ने गाँड में लंड डाला और सागरिका की गाँड मारने वाले ने अपना लंड शीला के मुंह में डाला.)

इसी प्रकार से हर 3 मिनट में सिमरन आवाज़ देती और हर आदमी अपने हिस्से का छेद बदल कर अगले गंतव्य पर चला जाता. इस पूरे क्रम को पूरा करने में ४५ मिनट निकल गए और अब आदमियों से रुका नहीं जा रहा था. महिलाएं भी अब थकान की ओर जा रही थीं. अंत में जो जहाँ से आरम्भ किया था वहीँ वापिस पहुँच चुका था. एक एक करके लंडो ने पानी छोड़ना शुरू कर दिया और कुछ ही मिनटों में हर छेद पानी से लथपथ हो गया था. सागरिका अपने सामने आयी चूत से रस पिने लगी और सुमति गाँड. सब की साफ होने के बाद सब लोग निढाल पड़ गए.

सिमरन, सोनम और नूतन ने गर्म पानी से गीले तौलिये लाये और सबके शरीर एक एक करके पोंछकर साफ किये. उसके बाद सबके लिए एक नया ड्रिंक बनाया और सबको दिया. अपना ड्रिंक पीते हुए सब यही सोच रहे थे कि क्या हम लोग विकृत तो नहीं हैं. दोपहर के लगभग तीन बज चुके थे और ५ बजे निकलना भी था तो यही तय किया कि अब अंतिम चरण का खेल शुरू किया जाये. पर शीला ने अपनी मांग रख दी.

शीला: “देखो, ऐसा अवसर बार बार नहीं मिलता है. तो मैं अपनी एक इच्छा पूरी करना चाहती हूँ.”

समर्थ: “इतने वर्षों से इतना खेलने के बाद अभी भी कुछ है जो बचा है तुम्हारे मन में?”

शीला: “और क्या. मेरा मन एक साथ चार लंडों से चुदने का है. एक मुंह में, दो चूत और एक गाँड में.”

समर्थ: “इस उम्र में झेल पाओगी ये सब.”

शीला: “कोई नहीं, अगर झेल नहीं पायी तो कम से कम प्रयास करते हुए मरूंगी.”

समर्थ: “चुप कर. ऐसा क्यों बोलती है?”

शीला ने जॉय, पार्थ, निखिल और नितिन की ओर देखकर कहा, “करोगे इस बुढ़िया की इच्छा पूरी?”

जॉय: “अवश्य करेंगे, पर आप अपने आप को बूढ़ा समझना छोड़िये.”

ये कहकर चारों ने उसे घेर लिया. घर के चारों पुरुषों ने उसे घेर कर लिटा दिया. सोनल और नूतन आगे आयीं और सभी पुरुषों के लंड चूसकर अच्छे से खड़ा करने में लग गयीं. समर्थ बड़ी भूखी आँखों से दोनों को देख रहे थे.

शोनाली उनके पास गई, और धीरे से बोली, “आप का जब दिल करे बाबूजी, तब आप सोनम और नूतन की मार लेना.”

समर्थ: “मुझे पता है कि तुम मुझे निराश नहीं करोगी.”

इस समय सामने जॉय ने अपना स्थान गद्दे पर बनाया और सबने मिलकर सँभालते हुए शीला को उसके लंड पर बैठाया. निशाना गाँड पर था और कुछ ही मेहनत से जॉय का पूरा लंड शीला की गाँड में बैठ गया. अब बारी पार्थ और नितिन की थी दो लंड शीला की चूत में डालने की. कुछ अचरज भरी कलाबाजियों के साथ ये भी संभव हो गया और अब शीला की चूत में दो लंड थे और एक उसकी गांड में था. निखिल ने आगे आकर अपना लंड शीला के मुंह में घुसा दिया.

और अब आरम्भ हुआ चुदाई का वीभत्स नाच. वैसे भी सबके लौड़े एक से बढ़कर एक थे और जिस लयबद्ध तरीके से वो चोद रहे थे उससे ये प्रतीत होता था कि ये उन्होंने पहले भी किया हुआ है. शीला के मुंह में अगर निखिल का लंड न होता तो शायद उसकी चीखें क्लब को हिला देतीं. कुछ ही समय में शीला के झड़ने का सिलसिला थमा तो सबने एक दूसरा आसन में आक्रमण चालू रखा. इसी तरह से अलट पलट कर चारों मिलकर शीला को एक गुड़िया की तरह चोद रहे थे.

तभी एक धक्के में गलती से नितिन का लंड चूत से बाहर तो आया पर चूत में जाने की स्थान पर नितिन ने उसे निखिल के लंड के साथ जो उसकी नानी की गाँड में पहले ही डला हुआ था उसके साथ मिला दिया. अब शीला की गाँड में दो लंड थे और चूत में एक.

इस प्रकार से शीला मंथन यही कोई बीस मिनट चला होगा. जिसके अंत तक शीला चुद चुद कर और झड़ झड़ कर निर्जीव सी हो गई थी. उधर सभी महिलाओं ने बाकी के लंड भी चूसकर झड़ने की कगार पर ला दिए थे. जब चुड़क्कड़ चार झड़ने के करीब पहुंचे तो वो हट जाते. जैसे ही आखिरी आदमी ने अपना लंड शीला के मुंह से निकाला, सब उसके इर्द गिर्द घेरा बनाकर खड़े हो गए और मुठ मारने लगे. एक एक करके हर पुरुष ने अपना गाढ़ा सफ़ेद वीर्य शीला के चेहरे और शरीर पर गिरा दिया. जब सब हटे तो शीला का चूत से ऊपर का पूरा शरीर कामरस से पुता हुआ था. पर शीला निढाल पड़ी थी. सागरिका और सुप्रिया ने छाती और पेट, शोनाली ने चेहरा और सुमति ने चूत और गांड को चाटकर अच्छे से साफ कर दिया. सब खड़े होकर शीला के भोगे हुए शरीर को देख रहे थे.

कुछ देर में शीला ने आंख खोली और सबको अपनी ओर देखता पाया.

शीला: ” आऊवोह, मैं जीवित हूँ? मैं तो समझी थी कि मैं मर चुकी हूँ और देवलोक में मुझे चोद रहे हैं.”

सुप्रिया: “अरे मम्मी तुम पूरी जीवित हो.”

समर्थ ने हाथ बढाकर शीला को खड़ा किया.

समर्थ: “तो कैसा रहा तुम्हारा ये अनुभव?”

शीला: “अद्भुत, अद्वितीय, अकल्पनीय. मैं तो समझी थी कि मैं स्वर्ग में हूँ. पर इन लड़कों ने मुझ बुढ़िया की हड्डियां हिला डालीं ” फिर रूककर, “मुझे उसका नाम बताओ जिसने मेरी गाँड में दूसरा लंड डाला था.”

सब सहम गए, फिर नितिन ने हाथ खड़ा किया. शीला आगे बढ़ी और उसे चूम लिया.

“तूने मुझे वो सुख दिया जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी.”

पार्थ ने तभी कहा, “अब हमारे निकलने का समय हो रहा है, तो सब लोग नहाकर तैयार हो जाओ.”

सब एक एक करके तैयार हो गए. पार्थ ने सिमरन को बुलाकर कहा, “आपका बोनस पक्का है. अगले महीने के दूसरे शनिवार को सारे रोमियो आपकी सेवा में होंगे.”

तैयार होकर सब बाहर आये और एक दूसरे की गले मिलकर फिर संबंध बनने की बधाई दी और अपनी गाड़ियों में सवार होकर अपने घर के लिए निकल गए.

क्रमशः

1156000
 
अध्याय १५: छठा घर - दिया और आकाश पटेल २

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दिया के घर पर:

मेधा को कुछ सुझाई नहीं पड़ रहा था. कौन हैं ये लोग? कैसा है ये परिवार? बेटी बाप और ताऊ का वीर्य चाटती है और इस प्रकार दर्शाती है जैसे ये सामान्य सी बात हो. और ये भी साफ था कि निशा को इस बारे में पता था. इतनी जल्दी जल्दी शराब पीने से उसे वैसे भी नशा होने लगा था. तभी घर की घंटी बजी और उसका ध्यान उस ओर गया. उसने जल्दी से उठकर अपने कपड़े पहने और दरवाजा खोला. रेस्त्रां से खाना आ गया था. उसने पार्सल लिया और अपने पर्स से पैसे निकालकर डिलीवरी बॉय को दिए. ये तो अच्छा था कि दरवाजे से अंदर का दृश्य नहीं दिख सकता था नहीं तो डिलीवरी वाला भी लंड खड़ा करके जाता. फिर उसने रसोई में जाकर खाना बर्तनों में डाला और प्लेट इत्यादि को डाइनिंग टेबल पर सजाया और खाना भी लगा दिया.

इस पूरे समय में निशा दोनों भाइयों के बीच में बैठी चुहल करती रही. जब खाना लग गया तो निशा उठी और नंगी ही घर के अंदर चली गयी. कोई ५-७ मिनट में वो कनिका के साथ वापिस लौटी. कनिका ने अपनी खाली बियर की बोतल को फेंक कर फ्रिज से एक नयी बोतल निकली और उसे खोल कर एक ही घूँट में आधी पी ली.

“उफ्फ्फ्फ़, क्या गर्मी हो रही है. ए सी भी काम नहीं कर पा रहा.”

“कुछ तो गर्मी तुम्हारे पापा और ताऊजी ने भी बढ़ाई हुई है.” निशा ने हँसते हुए कहा.

“आंटी, आप जहाँ हो वहां गर्मी अपने आप हो जाती है.” कनिका ने भी उसका उसी स्वर में उत्तर दिया. उसने अपनी बियर अगले ही घूँट में समाप्त कर दी.

“आप क्या पी रही हो आंटी? मेरा मतलब लौड़े के रस के आलावा.”

अब जहाँ मेधा इस आदान प्रदान को आश्चर्य से देख सुन रही थी, वहीँ निशा खिलखिला उठी.

“व्हिस्की. मुझे बियर का नशा पसंद नहीं और इसके बाद मुझे सुस्ती भी आती है. और इन दोनों के साथ सुस्त होना मानो अपनी ऐसी तैसी करवाना है. खाना खा लें?”

“ओह, श्योर. खाने के बाद और बियर लूंगी.”

“खाने के बाद?”

“पीने और चुदने के लिए मेरा कोई नियम नहीं है.” दोनों इस बात पर फिर खिलखिला उठीं.

अब तक आकाश और आकार खाने की टेबल पर बैठ चुके थे और मेधा उन्हें परोस रही थी.

कनिका ने मेधा का हाथ पकड़ा और कुर्सी पर बैठाया, “आप बैठो, मैं परोसती हूँ.”

कुछ ही समय में सब खाने में मग्न हो गए. खाना शाकाहारी था और उनके प्रिय रेस्ट्रॉं से था. कुछ ही देर में सबने मन भर के भोजन किया और फिर स्त्रियों ने मिलकर सब सफाई की. फिर सब बैठक में जाकर टीवी देखने लगे.

आकाश: “कनिका, क्या हुआ तुम मम्मी के पास जाने के स्थान पर यहाँ क्यों आ गयीं.”

कनिका: “ताऊजी, वहां मम्मी और चाची अपने मजे के लिए जाती हैं. मेरे रहने से उनके लिए कमी होती है. यही सोचकर मैं घर ही आ गयी.”

मेधा अभी भी इस परिवार के बीच में संबंधों को नहीं समझी थी. निशा ने कनिका को संकेत किया तो कनिका बोल उठी: “निशा आंटी और मेधा दीदी, आइये मेरे कमरे में मैं कुछ दिखाना चाहती हूँ आप दोनों को.”

तीनों कनिका के कमरे में चले गए. कमरा बंद करके कनिका और निशा ने मेधा को प्रेम से बैठाया और समझाने लगे.

निशा: “मेधा, तुम्हें कुछ अचरज हो रहा होगा कि इस घर में सब सेक्स के बारे में इतना खुल कर क्यों बात कर लेते है. ये परिवार स्वच्छंद विचारों में विश्वास रखता है. और कोई भी किसी के साथ भी सेक्स कर सकता है.”

कनिका ने मोर्चा सँभालते हुए बात आगे बढ़ाई, “ये जीवनशैली सामाजिक नियमों के विपरीत है, और इसीलिए इस विषय में अधिक लोगों को नहीं पता है. आज तुम्हें जो पता लगा है, हम विश्वास करते हैं कि इसे तुम केवल अपने तक ही रखोगी. वैसे भी कोई तुम्हारी बात पर विश्वास नहीं करेगा, पर हम नहीं समझते कि इसकी आवश्यकता पड़ेगी.”

मेधा: “नहीं, इसकी आवश्यकता नहीं है. मेरे ऊपर सर के इतने उपकार हैं कि मैं जीवन पर्यन्त नहीं उतार सकती. उनके साथ छल तो कदापि नहीं करूंगी.”

निशा और कनिका ने उसे एक साथ बाँहों में भर लिया और बड़े प्यार से उसे चूमने लगे. इसके बाद वे लौटकर बैठक में आ गए और बैठ गए.

कनिका: “डैड, अब आपका क्या कार्यक्रम है?”

आकाश और आकार की ऑंखें मेधा की ओर मुड़ गयीं. मेधा के शरीर में सिहरन हुई.

“मेरे विचार से अब हम दोनों मेधा की सवारी करना चाहेंगे,” आकाश ने कहा.

“एक साथ” आकार ने जोड़ा.

निशा: “मैं इसे तैयार करती हूँ.”

कनिका: “मैं कुछ देर देखना चाहूंगी.”

आकाश: : “नो प्रॉब्लम.”

निशा उठी और मेधा के और अपने कपडे निकालने लगी.

**********

“तुम बहुत सुन्दर हो, मेधा दीदी.” कनिका ने उठकर अपने कपड़े उतारते हुए कहा. “मैं चाहूंगी कि आप मुझे अपना स्वाद चखने दें.”

ये कहते हुए कनिका मेधा के सामने घुटनों के बल बैठ गई और उसने अपने मुंह को मेधा की चूत पर जड़ दिया. अब वो अपनी जीभ से किसी कुतिया की भांति मेधा की चूत चाट रही थी. निशा ने भी अवसर देखकर मेधा के पीछे घुटनों के बल बैठकर अपना मुंह उसकी गांड में घुसा दिया और अपनी लपलपाती हुई जीभ से उसकी गांड के छेद को चाटने लगी. कनिका ने मेधा के नितम्ब पकड़कर उसे अपने मुंह की और खींचा और उसकी चूत में अपनी जीभ का प्रवेश कर दिया. नितम्ब खींचने से मेधा का गांड का छेद कुछ और खुल गया और इसका लाभ उठाकर निशा ने अपनी जीभ उसमे धकेल दी.

आकाश और आकार ये दृश्य देखकर पागल से हो गए और उनके लौड़े और अधिक तन गए. मेधा को खड़ा होने में परेशानी हो रही थी. उसका शरीर एक अद्भुत अनुभूति से काँप रहा था. कुछ ही देर में कनिका और निशा ने मेधा के दोनों छेद अच्छे से गीले और चिकने कर दिए. उसे छोड़कर अब दोनों आकाश और आकार की ओर बढ़ीं और उनके लंड अपने मुंह में लेकर उन्हें भी अच्छे से गीला और चिकना कर दिया.

“डैड, आप नीचे लेटो.” कनिका ने आकाश को कहा.

आकाश लेट गया और निशा हाथ पकड़कर मेधा को लेकर आयी और उसे आकाश के लंड को अपनी चूत में लेने के लिए कहा. मेधा ने अपने पैर आकाश के दोनों ओर किये और फिर उसके लंड पर बैठती गई. देखते ही देखते आकाश का पूरा लंड उसकी चूत में जड़ तक जम गया. मेधा सांस रोके अपने ऊपर होने वाले इस दुहरे आक्रमण की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रही थी. अब बारी थी आकार की. निशा ने अपने उंगलियों में थोड़ी वेसलीन लगाई और मेधा की गांड पर रख दी. अंदर डालने का कार्य आकार को करना था. आकार ने अपने लंड को मेधा की फैलती सिकुड़ती गांड पर रखा और हलके से दबाव के साथ सुपाड़े को प्रविष्ट कर दिया. मेधा थोड़ी कुनमुनाई. पर कोई विरोध नहीं किया. आकार ने हल्के धीमे दबाव को बनाये रखा और उसका लंड शनैः शनैः मेधा की गांड में अपनी उपस्थिति बनाता चला गया.

जब दो तिहाई लंड मेधा की गांड को नाप चुका, तब आकार ने अपने लंड को बाहर खींचा और हल्के धक्के लगते हुए और गहराई तय की. फिर उसने अपने लंड को बाहर खींचकर एक हल्का मगर शक्तिशाली धक्का दिया और मेधा की चीख के साथ उसकी गांड को चीरते हुए पूरे लंड का झंडा गाढ़ दिया. मेधा हल्के हल्के सुबक रही थी, पर विरोध अभी भी नहीं था. उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसके दोनों छेद किन्ही विशाल मूसलों से भर दिए गए हों. पर उसे पता था कि ये केवल प्रारम्भ था. असली गांड कुटाई तो अब होनी थी.

आकाश अब नीचे से चूत में लंड आगे पीछे करने लगा. आकार रुका रहा और मेधा को दो लंडों का सुख एक ओर के घर्षण में आ रहा था. फिर आकाश ठहर गया और इस बार आकार ने लंड मेधा की गांड में आगे पीछे करने लगा. कुछ समय तक यूँ ही चलता रहा, पहले आकाश चूत पेलता फिर आकार गांड. फिर ये क्रम बदल गया. इस बार जब आकाश ने चूत में लंड चलाया तो आकार ने भी साथ दिया. अब दोनों के लंड एक साथ अंदर और बाहर हो रहे थे. मेधा के आनंद की अति हो चुकी थी. पिछली बार इन भाइयों से उसे बहुत बेरहमी से चोदा था, पर आज जिस प्रकार से चोद रहे थे वो सच में आनंद दे रहा था.

उधर कनिका और निशा आपस में लिपटे हुए एक दूसरे की चूत पी रहे थे. रह रह कर दोनों इस तिकड़ी पर भी दृष्टि डाल लेते, परन्तु आपस में ही उन्हें अनंत सुख मिल रहा था. मेधा की चूत अब बहुत रस बहा रही थी और ये बहकर आकाश की जांघों पर फ़ैल रहा था. इसके कारण घर्षण कुछ कम हो गया था. और इसका एक उपाय यह था कि ताल बदली जाये. संकेत पाने पर आकार अपने लंड को अब आकाश के विपरीत चलाने लगा. जब आकाश लंड डालता तब आकार निकालता और इसी लय में दोनों भाई मेधा को चोद रहे थे.

मेधा पर भी अब एक मदहोशी सी छा रही थी. वो अलग अपनी गांड उछाल रही थी. अचानक मेधा का शरीर अकड़ गया और वो कुछ उल्टा सीधा बड़बड़ाते हुए चीखती हुई ढेर हो गई. उसकी चूत से निकले फौहारे ने इस बार आकाश और आकार दोनों को भिगा दिया था. ये देखकर कि मेधा झड़ चुकी है निशा और कनिका ने अपने खेल पर विराम लगाया और दोनों मेधा के एक एक ओर चली आयीं। भाई लोग समझ गए और सबसे पहले आकार ने अपने लंड को मेधा की गांड से निकाला और निशा के मुंह में डाल दिया.

निशा उसे बड़े प्रेम से चूम चाटकर दोबारा मेधा की गांड में डलवा दी. इस पुरे समय आकाश ने चोदना बंद नहीं किया था. पर जब आकार ने लंड अंदर डाला तो उसने अपने लंड को बाहर निकाल लिया। इस बार कनिका ने उसे चूम चाट कर प्यार किया और मेधा की चूत में लौटा दिया. इस क्रम से मेधा के शरीर और मन की शृंखला बाधित हो गई. वो इसमें अपूर्व आनंद ले रही थी, परन्तु उसके झड़ने के लायक उसकी चूत में अब रस बाकी न था.

अंततः आकार ने अपना माल मेधा को गांड में समर्पित कर दिया पर अपने लंड को वहीँ गड़ाए रखा. जब आकाश ने अपना पानी मेधा की चूत में छोड़ दिया, तब जाकर दोनों भाई मेधा से अलग हुए. मेधा वहीँ पर ढह गई. और कनिका उसके ऊपर टूट पड़ी. चूत और गांड से बहते कामरस का पूरा सेवन करने के पश्चात् ही कनिका ने अपना सिर ऊपर किया. निशा दोनों भाइयों के लौड़े और उनके टट्टों और जांघों पर बिखरे हुए मेधा के रस को चाट रही थी. जब कुछ शेष न बचा तब कनिका और निशा ने एक दूसरे का गहरा चुम्बन लेकर रसों का आदान प्रदान किया और फिर वहीँ लेट गयीं.

आकाश और आकार बाथरूम गए और लौटते हुए अपने लिए ड्रिंक बनाते हुए आये. फिर मेधा के पास जाकर उसको बड़े प्यार से सहलाते हुए पूछा कि वो ठीक तो है.

मेधा: “सर, ऐसा आनंद मुझे कभी कल्पना में भी प्राप्त नहीं हुआ. आप लोग सच में कमाल हैं.”

ये सुनकर दोनों भाइयों से संतोष की सांस ली. अब ये लड़की हमारे साथ नियमित चुदाई करेगी. कुछ देर बाद सब सोने ले लिए चल पड़े. मेधा आकार के साथ चली गई और निशा आकाश के साथ.

"पर डैड और ताऊजी, कल सुबह मुझे भी ऐसी ही चुदना है.” कहते हुए कनिका अपने कमरे में चली गई.

सुबह सबने नाश्ता किया और उसके बाद मेधा और निशा ने घर जाने की अनुमति मांगी. दोनों कुछ ही समय में नहा धोकर घर चली गयीं. आकाश और आकार भी अपने कुछ काम में व्यस्त हो गए. कनिका कुछ समय के लिए बाहर चली गई. खाने के लिए उसने कहा कि वो कुछ पैक करवाते हुए आएगी और इसीलिए घर में शांति थी. दोनों भाई टीवी पर एक मैच चल रहा था उसे देखने लगे और कुछ देर के लिए सोफे पर ही बैठे हुए सो गए. उठने के बाद दोनों अपने कमरे में जाकर लेट गए और वहीँ पर टीवी पर कुछ कार्यक्रम देखने लगे.

दोपहर १ बजे के बाद कनिका भी लौट आयी और सबके लिए खाना परोसा. सबने प्रेम पूर्वक खाना खाया. फिर कनिका अपने कमरे में चली गई. जाने के पहले उसने ३ बजे दोनों को तैयार रहने के लिए कहा. सबने अपने कमरे में जाकर कुछ समय निकाला और ३ बजे लौटकर बैठक में आ गए. कनिका सबसे अंत में आयी और उसने बस एक झीनी सी नाइटी पहनी थी और ये विदित हो रहा था कि उसने नीचे कुछ भी नहीं पहना है. आकाश और आकार के लौड़े टनटना गए. इसका अर्थ यही था कि कनिका ने जो कल डबल चुदाई की इच्छा व्यक्त की थी वो उसके लिए गंभीर थी.

‘क्या हुआ कनिका, तुम्हारा क्या विचार है?” आकाश ने पूछा.

“ताऊजी, मैंने कल ये निश्चय किया था कि मैं भी इस डबल चुदाई का मजा लेने के लिए तैयार हूँ.”

“पर अभी तक तो तुम मना करती आयी थीं. तुम्हारी मम्मी और ताई तो कब से ये आनंद ले रही हैं.”

“अब देखिये तो आप लोग मेरी चूत और गांड दोनों ही मार चुके हैं और मुझे इसमें मजा भी बहुत आता है. पर कभी दोनों एक साथ नहीं मरवाई हैं. मुझे डर लगता था, मम्मी और ताई जी बहुत अनुभवी हैं और वर्षों से ये सब कर रही हैं. दूसरे आप लोग जिस प्रकार से उनकी चुदाई करते थे उससे भी मुझे डर लगता था.”

“फिर अब क्यों?”

“कल मैंने जब आप दोनों को मेधा दीदी को यही सुख इतने प्यार से देते हुए देखा तो मैंने भी इसका आनंद लेने का प्रण किया. पर वैसे ही प्यार और संयम से जो अपने कल दिखाया था.”

“तुम जैसे चाहोगी, वैसे ही करेंगे.”

ये सुनकर कनिका का चेहरा खिल उठा. वो मटकते हुए आकाश और आकार के सामने खड़ी हो गई. उसने सधे हाथों से बड़े ही कामुक अंदाज में अपने उस झीने गाउन की डोरी खोली और कन्धों को झटका. गाउन धरती पर धराशयी हो गया. दोनों भाई इस शरीर को कई बार देख और भोग चुके थे, पर आज के इस दृश्य ने उनके शरीर में आग लगा दी. दोनों ने अपनी टी-शर्ट उतार फेंकी. कनिका उसी मादक चल के साथ आगे आयी और उसने दोनों के बीच में स्थान ले लिया.

“मेरे प्यारे पापा और ताऊजी, आज मुझे वही सुख दीजिये जो घर और बाहर की हर स्त्री को आप मिलकर देते है.” ये कहते हुए उसने एक एक करके दोनों के होंठ चूमे और नीचे उनके शॉर्ट्स पर हाथ फेरने लगी.

दोनों भाइयों के इससे अधिक निमंत्रण की आवश्यकता नहीं थी. उन्होंने तुरंत अपने शॉर्ट्स को उतार फेंका और कनिका के एक एक स्तन को अपने मुंह में लेकर भूखे बच्चे के समान चूसने लगे. कनिका भी कहाँ पीछे रहने वाली थी. उसने अपने दोनों हाथ एक एक लंड पर रखे और उनके ऊपर हाथ चलने लगी. पहले से ही तने लंड अब फटने की कगार पर जा पहुंचे. कनिका ने दोनों को अपने मम्मों से अलग किया और आकाश के लंड को अपने मुंह में लेकर भूखी भिखारन की तरह चूसने लगी, फिर उसने आकार के लंड को मुंह में लिया और उसे भी चूसने लगी. कुछ देर यूँ ही वो बदल बदल कर लंड चूसती रही. पर आकार ने उसे रोक दिया.

आकार ने उसे सोफे पर लेटने के लिए कहा और उसके पैर फैलाकर उसकी चूत में अपना मुंह डालकर चाटने लगा. आकाश ने कनिका के चेहरे के दोनों ओर पांव रखते हुए उसे अपना लंड प्रस्तुत किया. कनिका ने उसे अपने मुंह में लिया और इस बार चाटते हुए चूसना भी शुरू किया. कमरे में इस समय वासना का उन्माद था. आकाश का लंड कनिका के मुंह में था तो आकार का मुंह कनिका की चूत की खुदाई कर रहा था.

परन्तु आकाश ने ये त्रिकोण को तोड़ दिया और अपने लंड को कनिका के मुंह से निकाला और उसने कनिका और आकार को शयनकक्ष में चलने के लिए कहा. वहां जाते ही आकाश ने कनिका को उसके मुंह पर बैठकर उसके लंड को चूसने के लिए कहा, जिसे 69 का आसन कहा जाता है. जब कनिका ने ये आसन लेते हुए आकाश का लंड चूसने लगी तो आकार ने उसकी उठी हुई गांड पर अपना ध्यान केंद्रित किया. उसकी उभरी हुई गांड के बीचों बीच बने सितारे को देखकर उसके मुंह में पानी आ गया. उसने अपना मुंह उस सितारे पर लगाया और अपनी जीभ से उसे चाटने लगा. इस आक्रमण से कनिका की गांड का छेद स्वतः ही खुलने बंद होने लगा.

उसकी जीभ उस कुलबुलाते छेद को अपनी नोक से छेड़ने लगी तो स्वाभाविक रूप से वो अब फ़ैल गया. आकार ने अपने हाथों से उसकी गांड के पाट खोलकर अपनी जीभ से धीरे धीरे अंदर विचरण करना आरम्भ किया. कनिका चिहुंक पड़ी. उसे अपने पिता की इस योग्यता का कई बार अनुभव हो चुका था और वो हर बार की तरह इस बार भी इस कला की प्रशंसा करने से नहीं चूकी.

“पापा, सच में आप जैसे गांड चाटते हो न, इतना मजा आता है कि मैं बता नहीं सकती. इतनी मीठी सी गुदगुदी होती है कि लगता है मैं स्वर्ग में हूँ.”

“तुम्हारी गांड है ही इतनी स्वादिष्ट कि कितना भी इसे चाटो, मन नहीं भरता. पर अब ये बताओ की तुम किसका लंड अपनी गांड में लेना पसंद करोगी?”

“पापा, इस बार तो आपका ही. ताऊजी, आप नाराज़ तो नहीं हो रहे हो?”

“अरे तुझसे मैं कभी नाराज़ हो सकता हूँ, आज नहीं तो कल सही. हम कहाँ जा रहे हैं?” आकाश ने उसे विश्वास दिलाया.

आकार: “तो फिर सही आसन लिया जाये?”

ये सुनकर आकाश सीधा लेट गया और उसका लंड ऊपर की ओर तन कर खड़ा हो गया. कनिका ने अपनी चूत को उसके लंड की सीध में लिया और उसके ऊपर बैठते हुए उसे निगल लिया. उसकी चूत इतनी रसीली हो चुकी थी कि उसे पूरा लंड लेने में न समय लगा न कोई बाधा ही आई. एक बार जब उसकी चूत में लंड अच्छे से जम गया तब आकाश ने उसकी कमर पकड़कर उसे आगे झुकाया जिससे उसकी गांड ऊपर उठ जाये. कनिका ने आगे झुककर आकाश के होंठों से अपने होंठ लगा दिए. और जब ये चुम्बन चल रहा था, तब आकार ने अपने लंड पर और कनिका की चूत में तेल अच्छे से मला और ऊँगली से ये तय किया कि कनिका की गांड उसके लंड के लिए तैयार थी.

इसके बाद आकार ने अपने लंड को कनिका की गांड पर रखा और दबाव दिया. उसका सुपाड़ा कुछ प्रतिरोध के पश्चात् गांड में प्रविष्ट हो गया. कनिका के मुंह से एक हल्की सी हूक निकली. पर आकाश के होंठ उसे अपने में बांधे हुए थे. आकार ने अपने दबाव को कम नहीं किया, लगातार वो अपने लंड को कनिका की गांड में बढ़ाता रहा. जब उसका लंड लगभग आधा अंदर चला गया तब आकार रुक गया. वो कनिका को कुछ समय देना चाहता था इस दोहरे हमले के द्वारा हो रहे किसी भी पीड़ा या असुविधा से स्वयं को अभ्यस्त होने के लिए. कुछ समय उसी प्रकार ठहर कर कनिका की प्रतिक्रिया को देखता रहा. जब उसे लगा कि कनिका को कोई कठिनाई नहीं है, तो उसने दोबारा अपने लंड को अंदर धकेलना शुरू कर दिया. और कुछ ही समय में उसके लंड ने कनिका की गांड को पूरा भर दिया.

ये नया अनुभव कनिका की कल्पना के परे था. उसे आज अपनी माँ और ताईजी का इस दुहरी चुदाई से प्यार समझ आ रहा था. अगर दो लंड उसके अंदर सिर्फ ठहरे हुए इतना आनंद दे रहे थे, तो आगे आने वाले सुख का कोई पर्याय नहीं होगा.

“पापा, ताऊजी, अब आप मुझे चोदिये. पर प्लीज प्यार से. मुझे इस ऊंचाई से भी ऊपर जाना है. और मुझे विश्वास है कि आप दोनों मुझे आनंद का वो शिखर स्पर्श करवाएंगे जो मेरे स्वप्न में भी कभी नहीं आया होगा.”

आकाश अपने लंड को अब कनिका की चूत में एक सधी हुई लय में चलने लगा. आकाश और आकार ने वही प्रक्रिया अपनाई जो उन्होंने मेधा के लिए अपनायी थी. पहले आकाश अपने लंड से चूत पेलता, फिर आकार अपने लंड से गांड. ऐसा करने से कनिका के दोनों छेद और बीच की झिल्ली ने स्वयं को इसके अनुकूल ढाल लिया. और अब उसे और अधिक सुख की कामना होने लगी.

कनिका के बदलते भावों को देखकर दोनों भाइयों ने भी अपनी ताल बदली और अब वो एक लंड अंदर और एक बाहर करने लगे. गति सामान्य से कम रखी, जिसके कारण कनिका का रोम रोम प्रज्वलित हो उठा. उसने आकाश को गहरे चुम्बनों से लथपथ कर दिया. दोनों भाई इस प्रकार की चुदाई के प्रवीण महारथी थे. उन्होंने अपनी गाड़ियों के गियर बदले और अब एक साथ दोनों लंड अंदर बाहर विचरण करने लगे. कनिका स्वयं को भूल चुकी थी. उसका मस्तिष्क अब केवल उसकी चूत और गांड की भावनाओं पर ही केंद्रित था, मानो बाकी अंगों का कोई स्थान ही न हो. अन्य अंग जैसे शिथिल हो गए थे. कनिका की आँखों के आगे ब्रह्मांड के सभी तारे घूम रहे थे. अलग अलग चमक और अलग अलग रंग लिए हुए.

आकाश और आकार अब अपनी गति भी बढ़ा चुके थे, कनिका इस मंथन में पिसती हुई एक अकल्पनीय कामोन्माद से उत्तेजित थी. उसकी आँखों के आगे के तारे कभी झिलमिलाकर तो कभी बस यूँ ही ठहर कर उसे ब्रह्मांड की यात्रा में ले चले थे. दोनों भाई उसकी इस खोई हुई मति का पूरा लाभ उठा रहे थे और एक दूसरे की विपरीत दिशा में पूरी गति और शक्ति से लंड चला रहे थे. अचानक जैसे कनिका के आँखों के आगे से वो चमकती हुई वस्तुएं लुप्त हो गयीं और उसे अपने शरीर के निचले हिस्से में से कुछ भिन्न सा होता हुआ प्रतीत हुआ. उसकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया परन्तु निचले शरीर से स्त्राव रुक नहीं रहा था. उसे कुछ ज्ञान न था कि उसे क्या हो रहा है. वो एक झूले पर थी और कभी आगे तो कभी पीछे से कोई उसे धकेल रहा था.

आकाश और आकार ने कनिका के उन्माद और उत्सर्ग की इस अधिकता को समझ लिया और दोनों ने तेज और गहरे धक्कों के साथ कनिका के दोनों छेद अपने श्वेत रस से भर दिए. कनिका को ये लगा कि जैसे उसके सूखे निचले शरीर में किसी ने पानी से उसकी जलन दूर की हो. ये जल ठंडा भी था और गर्म भी. पतला भी, गाढ़ा भी. ऐसा क्या था जो उसकी भूख और प्यास दोनों मिटा रहा था. वो मूर्छा की स्थिति में भी उसके शरीर से बहते हुए रस के स्त्राव और उसमे प्रवेश करते हुए रस के मिलाप का अनुभव तो कर रही थी, पर वो कुछ भी समझ पाने की अवस्था में न थी.

वो आगे की ओर झुककर गिर गयी. आकाश ने उसकी कमर पकड़कर उसे संभाला और आकार ने अपने लंड को उसकी खुली फटी गांड में से धीरे धीरे बाहर खींच लिया. फिर वो हट कर खड़ा हो गया. आकाश ने कनिका की कमर पकड़कर एक कुलाटी लगाई और वो उसके ऊपर आ गया. दो तीन बार अपने लंड को चलाने के बाद उसने भी अपने लंड को बाहर निकला और आकार के पास खड़ा हो गया.

“लगता है इसका भी नीलम वाला ही हाल हुआ है, जब उसकी पहली बार डबलिंग की थी.”

“हाँ, बेटी माँ पर ही गई है. चलो इसके मुंह पर पानी छिड़ककर इसे इस संसार में लौटा लाते हैं.”

आकार ने पानी के कुछ छींटे कनिका के चेहरे पर मारे तो वो हड़बड़ाकर उठ गई.

“मैं कहाँ हूँ? कौन हो आप लोग? और ऐसे क्यों खड़े हो?”

दोनों भाई मुस्कुराते रहे. कनिका के मस्तिष्क में जब लहू प्रवाहित हुआ तो उसे जैसे सब याद आने लगा.

“पापा, ताऊजी. क्या सचमुच.”

दोनों भाइयों ने हाँ में सिर हिलाया.

“मैं मूर्ख थी जो इतने दिनों से इसे टाल रही थी. पर अब नहीं. मैं क्या सच में मर कर जीवित हुई हूँ?” कनिका ने दोनों हाथों से एक एक लंड पकडकर पूछा.

“लगता तो यही है. वेलकम बैक.”

कनिका बिना उत्तर दिए उन लौडों को चूसने लगी जिसने उसे ये असीम सुख दिया था, बिना इस विचार के कि वो इसके पहले किस गली से विचरण करके निकले थे.

**********************

नीलम के बंगले में:

सुबह सभी लोग आराम से ही उठे. किसी को कोई जल्दी तो थी नहीं. कुछ लंड चाटे गए, कुछ चूतें चाटी गयी. कुछ चुदी तो कुछ अनचुदी ही नाश्ते के लिए आ गयीं. सब बड़े ही अनौपचारिक रूप में बैठे और नाश्ता किया. इसके बाद दिया ने जैसे बम्ब फोड़ा.

“कल जो फोन आया था, वो मेरी किट्टी की सहेली सबीना का था. उसे पता है कि हम लोग यहाँ हैं और उसने आने का हठ कर रही है. शायद वो आने ही वाली हो कुछ देर में.” ये कहते हुए दिया ने सबीना के बारे में बताया कि किस प्रकार उसके जेठ के तीन लड़के उसके घर में रहते हैं और माँ बेटी को चोदते है.

“कह रही थी कि कल से उनके कॉलेज परीक्षा की तैयारी के लिए २ हफ्ते के लिए बंद हैं और वो तीनों अपने घर गए हुए है. इसीलिए वो यहाँ आ रही है.”

ये सुनकर जहाँ लड़कों की बांछे खिल गयीं वहीँ महिलाओं के चेहरे उतर गए.

“प्लीज, मैं उसे मना नहीं कर सकती हूँ. हम सब एक दूसरे के राज जानते हैं, और सब समझ सकते हो कि ये बातें बाहर जाने का क्या अर्थ है.” सबने सिर हिलाकर माना कि ये बहुत हानिकारक होगा.

“पर एक बात और है, जो सबको अटपटी और शायद बुरी लगे.”

“अब और क्या बचा है?” नीलम ने चिढ़कर पूछा.

“नीलम, प्लीज. मैं भी तुम्हारी तरह इस बात से प्रसन्न नहीं हूँ. मैंने सोचा था कि वो अपना मन बदल लेगी, पर उसने सुबह फिर आने की पुष्टि कर दी. रियली सॉरी।”

“ठीक है, भाभी. अब जो है सो है. आप कुछ कह रही थीं इस सबीना के बारे में.”

“हाँ, क्या है न वो गालियाँ बहुत देती है. क्यों न हम उसे फटाफट चुदवाकर भेज दें और फिर अपना आनंद लें. शाम वापिस घर लौट चलेंगे.”

सबने सलाह करके यही सही समझा की चारों लड़कों को उस पर छोड़ देंगे और फिर उसे भागने का प्रयास करेंगे. नाश्ते के बाद सब नहाने और तैयार होने के लिए चले गए. नहाने के बाद सब लौटकर आये ही थे कि एक कार रुकने की आवाज़ आयी और फिर घंटी बजी.

दिया उठते हुए बोली, “सबीना ही होगी. इसे जल्दी भगाना होगा.”

दरवाज़ा खोलने पर एक अति सुन्दर, पर थोड़ी गुदाज मध्यम आयु की स्त्री ने प्रवेश किया और दिया के गले लग गयी और उसे चूमने लगी.

“दिया, दिया, दिया, मेरी प्यारी सखी. तू तो बड़ी निखरी हुई लग रही है. लगता है खूब चुदाई हुई है तेरी.”

दिया का चेहरा लाल हो गया.

“सबीना, आ जा अंदर. सबसे मिलती हूँ तुझे.”

दिया अंदर आयी और सबसे सबीना का परिचय कराया. लड़कों के मुंह से लार टपकने लगी. औरतों के मुंह पर कोई भाव नहीं थे.

“क्या हुआ सबीना, मेरी याद कैसे आ गई तुझे? और सना कहाँ है. मैं तो सोची थी कि तेरे साथ ही आएगी.”

अब सबीना ने जो बोलना शुरू किया तो सबके छक्के छूट गए.

“अरे यार, तू तो जानती है की मेरे बेटीचोद जेठ के तीनों मादरचोद लौंडे इतने दिन से मेरे घर में पढाई के बहाने रुके हुए थे. पिल्ले भोसड़ी के पढाई न जाने कब करते थे, जब देखो तब मेरे और सना पर ही चढ़े रहते थे. सुबह उठते ही चूत और गांड मारकर भोसड़ी वाले लाल कर देते थे. और कॉलेज से लौटकर फिर पिल जाते थे. मेरी तो गांड का इंडिया गेट बना गए बहनचोद.”

सबकी इस बात पर हंसी छूट गयी, पर सबीना के चेहरे को देखकर सबने अपनी हंसी रोक ली.

“कल साले रंडी की औलाद बोले कि दो हफ्ते के लिए कॉलेज बंद है तो अम्मी ने बुलाया है. बहन की चोदी की गांड खुजला रही होगी, इतने दिनों से लौंडो के लौड़े जो नहीं खाये, सारे मोहल्ले के लौंडों को चोद चुकी पर आग नहीं बुझती उसकी. मैंने कहा कि रहने दो यहीं घर में रहकर पढाई करो तो बोले नहीं अम्मी कह रही थी कि दो हफ्ते उन की चुदाई करने के लिए. कहने लगे बड़ी बेताब हो रही है. आखिर में न माने और चले गए माँ के लौड़े. और तो और भोसड़ी वाले सना को भी साथ ले गए. और वो भी बहन की लौड़ी बड़ी इठलाती हुई बाय अम्मी कहकर चली गई.”

“चल अच्छा है, अब तुझे दो हफ्ते तो आराम मिला. रोज़ रोज़ चुदने से तेरा हाल ख़राब हो गया होगा.”

“चुदवाने से भी कभी हालत खराब होती है. कल से चूत और गांड सूनी और सूखी है मेरी. मेरा चेहरा देख कैसा उतर गया है. मुझे तो वजन भी कम हो गया लगता है.”

दिया ने व्यंग से उत्तर दिया,”हाँ दिख तो रहा है कि बिलकुल सूख ही गयी हो”

सबीना के कटाक्ष को समझा नहीं और अपनी बात फिर आरम्भ कर दी.

“फिर मुझे कल शाम को ध्यान आया कि तू नीलम भाभी के घर आयी हुई है, चुदाई के लिए, तो मैंने भी अपनी चुदाई के लिए तेरे पास आने का तय किया. सुन, तेरे पास ये चार चार लौड़े है. कुछ देर चुदवा दे इनसे, तेरा बड़ा करम होगा. बड़ी दुआयें मिलेंगी.”

दिया ने कुछ सोचने का नाटक किया.

“ऐसा है सबीना. मुझसे तेरी ये हालत देखी नहीं जा रही.” फिर नीलम, प्रीति और रमोना की ओर देखकर. “क्यों न हम इस दुखी आत्मा को इन चारों के साथ एक ही बार में चुदवा दें जिससे इसकी तृप्ति हो जाये और फिर ये अपने घर शांति से लौट सके.”

पहले निश्चित किये अनुसार सबने हामी भर ली. सबीना ने दिया का चेहरा फिर चूम लिए.

“तेरी जैसी सहेली ऊपर वाला सबको दे. तुझे बड़ी बरक्कत मिलेगी.” ये कहते हुए सबीना खड़ी होकर अपने कपड़े उतारने लगी.

“यहाँ?” दिया आश्चर्य से पूछ बैठी.

“अरे अब तुझसे क्या छुपाना. तुम सब भी तो मिलकर चुदवाती हो.”

फिर हतप्रभ बैठे लड़कों को देखकर. “तुम भोसड़ी वालों को क्या में सोने से जड़ा न्योता भेजूं. आ जाओ जल्दी से. फिर न जाने कब मुझे लौड़े मिलेंगे.”

लड़कों में यकायक तत्परता आ गयी और सब पलक झपकते ही नंगे हो गए.

सबीना ने जब उन्हें देखा तो उसका मुंह खुला रह गया.

“क्या लौड़े हैं इन मादरचोदों के. अगर ये मुझे मिल जाएँ तो मैं उन तीनों हरामियों को वहीँ अपनी अम्मी की झांटों में लिपटे रहने के लिए कह दूंगी. दिया, क्या तुम सच में इस सबसे चुदवाती हो?”

दिया ने सिर हिलाकर हाँ कहा तो सबीना बोल पड़ी, ”तुम्हे किस्मत से ऐसे लौड़े मिले हैं. मैंने तो बस इनके सपने ही देखें हैं आज तक.”

चारों लड़कों ने अब तक सबीना को घेर लिया था.

“आंटी, आप मम्मी की मित्र हो तो आपको खुश करना हमारा कर्तव्य है. आप विश्वास कीजिये कि आज की चुदाई के बाद आप हमारे सिवाय किसी से चुदवाने नहीं जाएँगी.”

ये कहते हुए दर्शन ने सबीना के कन्धों पर हाथ रखा और उसे नीचे बैठा दिया. अब सबीना की आँखों के सामने चार विशाल तने हुए लंड थे.

“आंटी, देखें आप कितना अच्छा लंड चूस सकती हैं. चिंता मत करना, हम झड़ने वाले नहीं हैं आपको चोदे बिना.”

सबीना भूखी शेरनी की तरह एक एक करके लंड अपने मुंह में लेकर चूसने लगी. फिर हितेश उसके पीछे गया और उसकी गांड पर हाथ रखकर उसे ऊपर घोड़ी की अवस्था में लेकर छोड़ दिया. सबीना के मुंह से लंड नहीं निकला और वो एक विक्षिप्त स्त्री की तरह लौडों को चाट रही थी. अन्य सभी स्त्रियां इस खेल को देख रही थीं. वो सबीना की प्यास को समझ सकती थीं.

हितेश ने घुटनों के बल बैठकर सबीना की चूत में एक ही झटके में अपना पूरा लंड पेल दिया. सबीना चीख उठी पर उसने दोबारा लंड चूसना शुरू कर दिया. हितेश ने कोई दस बारह धक्के लगाए और खड़ा हो गया. इस बार पुनीत ने अपने लंड को अंदर डाला और उसी प्रकार दस बारह धक्के मारकर हट गया. सचिन ने अब अपने लंड को अंदर डाला तो सबीना की ऑंखें निकल गयीं. उसके मुंह से लंड छूट गया.

“ये लंड है या मूसल?”

‘आंटी, लंड ही है. अभी तो इसने आपकी गांड की भी सैर करनी है. आप लंड चूसो.” सचिन ने उसे आज्ञा दी.

सबीना फिर से लंड चूसने में व्यस्त हो गई. सचिन ने दस बारह धक्कों के बाद दर्शन के लिए स्थान खाली किया. सबीना के मुंह में अब हितेश का लंड आया और उसमे से उसे अपनी चूत की भी खुशबु आयी. पर उसने बिना रुके अपना काम चालू रखा. एक बार इस क्रम के बाद अब दूसरा राउंड शुरू हुआ. इस बार लड़कों ने सबीना की चूत में ज्यादा देर तक, लगभग ५ मिनट तक एक लड़के ने चुदाई की. रस से लथपथ सबीना की चूत अब बह सी रही थी.

और यही कारण था कि जब तीसरा राउंड आया तो हितेश ने अपने लंड को सबीना की गांड पर सेट किया और एक तगड़ा और लम्बा शॉट मारा. सबीना की आत्मा काँप गई. उसके मुंह से लंड छूट गया और उसकी दर्द भरी चीख ने चारों औरतों के पसीने छुड़ा दिए. पर हितेश ने अपना लक्ष्य साधा हुआ था और उसका अपने पथ से हटने का कोई विचार नहीं था. उसने लम्बे और तेज धक्कों के साथ सबीना की गांड को लगभग ५ मिनट मारने के बाद ही अपने लंड को बाहर निकाला.

पुनीत ने सबीना की खुली हुई गांड पर थूका और अपने लंड को लगाकर उसी बेदर्दी से धक्का मारा जैसा कि हितेश का था. इस बार सबीना भी तैयार थी और उसने लंड चूसना बंद नहीं किया. अब गांड जब खुल गई थी तो उसे भी मजा आने लगा था. पुनीत ने ५ मिनट ले पश्चात् सचिन के लिए स्थान छोड़ दिया.

“आंटी, जिसे आप मूसल कह रही थीं अब आपकी गांड की ओखली में जाने वाला है.”

सबीना ने मुंह से लंड निकले बिना अपनी स्वीकृति दे दी. और सचिन ने कुछ दया भाव रखते हुए उसकी गांड में धीरे धीरे पूरा लंड पेल दिया.

“बेटीचोद, ये लौड़ा तो मुझे दस्त लगवा देगा. थोड़ा धीरे पेलना भोसड़ी वाले. तेरी माँ की गांड नहीं है ये.”

सचिन ने कुछ समय तो उसकी बात को ध्यान में रखा पर जैसे ही उसे आवागमन में सरलता होने लगी, तब उसने पूरा लंड को बाहर खींचा और एक निर्मम धक्के के साथ पूरे लंड से गांड फाड़ दी. सबीना इस बार छटपटा उठी पर तीन जोड़े हाथ उसे थामे हुए थे और वो उनके बंधन से न छूट पाई. अंततः उसकी गांड इस लंड के आकार की अभ्यस्त हो गई. सचिन के जोरदार और पाशविक धक्कों ने सबीना की गांड के वो सब रोम खोल दिए थे जो इतने सालों से बंद थे. ५ मिनट होने के बाद सचिन ने अपने लंड को अलग किया. दर्शन ने अपना स्थान लिया. और उधर सचिन ने गांड से निकले हुए लंड को सबीना के मुंह में पेल दिया. अगर सबीना को कोई आपत्ति थी भी तो उसने दर्शाई नहीं. दर्शन ने सबीना की गांड को ५ मिनट मारने के बाद अपना स्थान छोड़ दिया.

उसने पीछे मुड़कर अपनी माँ की ओर देखा तो दिया ने दो हाथों के संकेत से डबल चुदाई के लिए बताया। दर्शन ने अपने साथियों को ये चेताया. इस बार सबने अपने लंड सबीना से साफ करवाने के बाद उसे खड़े होने के लिए कहा. सबीना काँपते पैरों पर खड़ी हुई. सचिन लेट गया और पुनीत ने सबीना को उसकी लंड पर सवार होने का आदेश दिया. सबीना समझ गई कि अब उसके साथ क्या होने वाला है. उसने दिया की ओर देखा पर दिया तो दूसरी ही ओर देख रही थी. सबीना ने सचिन के लंड पर सवारी पूरी की. इतने में दो हाथों ने उसके कन्धों को दबाकर आगे की ओर झुका दिया. और उसे अपनी गांड के ऊपर फिर से दबाव लगा और पक्क्क की आवाज़ से एक लौड़ा उसकी गांड में घुस गया.

उसे पीछे देखकर ये जानने का भी अवसर नहीं मिला कि गांड में किसका लंड था क्योंकि पुनीत ने सामने आकर उसके मुंह में अपना लंड डाल दिया और ऐसे धक्के लगाने लगा जैसे कि वो मुंह न हो चूत हो. लंड उसके गले को छू रहा था. अचानक उसकी आँखों के सामने दर्शन आया और उसने भी अपने लंड को उसकी आँखों के आगे लहराया. पुनीत ने हटकर दर्शन को उसकी मुंह की चुदाई करने का अवसर प्रदान किया. अब ये तो साफ हो गया कि हितेश उसकी गांड में था. हुए दोनों मुश्तंडे बेरोकटोक अपनी पूरी ताकत से उसके दोनों छेदों को दुह रहे थे. अभी तक जिन लौडों से सबीना चुदी थी वो बहुत सीमा तक सामान्य आकार के थे. पर अब उसकी कुटाई ऐसे लौंड़ों से हो रही थी जो आम पुरुष के भाग्य में नहीं होते.

वो इस समय एक अलग ही संसार में विचरण कर थी. उसने कभी इस निर्ममता और इतने सुख की कल्पना भी नहीं की थी. अपने भतीजों से चुदवाने में जो आनंद आता था, आज वो नगण्य हो चुका था. सचिन और हितेश उसकी ऐसी चुदाई कर रहे थे कि किसी की भी आत्मा कांप जाती. अचानक हितेश ने अपना लंड बाहर निकाला और सबीना के सामने आ खड़ा हुआ. कुछ ही पलों में गांड के खालीपन को दर्शन ने अपने लंड से भर दिया और उसी तीव्रता और शक्ति से चुदाई करने लगा. फिर क्या था, यही एक क्रम बन गया. एक लंड निकलता और दूसरा उसका स्थान ले लेता. निकला हुआ लंड अपना स्थान सबीना के मुंह में बनाता और सबीना उसे चाट कर अगले आक्रमण के लिए साफ कर देती. एक ही कमी थी कि सचिन का स्थान नहीं बदल रहा था.

सबीना झड़ते झड़ते हुए अब निश्चल हो चुकी थी. और यही समय था जब उन पुरुष रूपी दानवों ने उसे ऐसा खेल दिखाया कि सब भौचक्के रह गए. इस बार जब हितेश के हटने का समय हुआ तो वो हटा नहीं बल्कि उसने थोड़ी जगह बनाई और दर्शन ने भी अपने लंड को सबीना की गांड में डाल दिया. पुनीत से सबीना के मुंह में लंड डालकर उसके सिर को दबा रखा था, इसीलिए सबीना कुछ भी न कर सकी. उसकी चूत में एक मोटा लम्बा लंड पहले ही उपस्थित था, मुंह में एक लंड था और गांड में दो लंड घुस गए थे. श्वास लेने के लिए भी इन पशुओं ने स्थान न छोड़ा था. पर ये अधिक समय तो हो नहीं सकता था, इसीलिए हितेश ने अपने लंड को निकाल लिया और सबीना के मुंह में पेल दिया.

ये खेल तब तक चला जब तक हर लड़का अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच गया. पर जैसे ही उसे लगा कि उसका होने वाला है, वो अलग होकर खड़ा हो जाता. कुछ ही समय में तीनों हटकर खड़े थे. सचिन ने सबीना को पलटी मारते हुए नीचे किया और १० से १५ भयंकर धक्के मारकर वो भी हट गया. चारों ने सबीना के इर्दगिर्द एक गोला बनाया और अपने लंड मुठियाने लगे. लगभग बेसुध पड़ी सबीना एक मूर्छित सी अवस्था में थी. पर उसकी आंख अचानक ही खुल गई, जब उसे अपने ऊपर पानी गिरता हुआ अनुभव किया. पर उसे कुछ ही क्षणों में ये ज्ञात हो गया कि ये पानी साधारण पानी नहीं बल्कि लौडों की टूटियों से निकलता कामरस है जो उसके चेहरे और स्तनमण्डल पर गिराया जा रहा है.

जब लड़के झड़ चुके तो वो हटकर एक सोफे पर बैठ गए और आपस में बातें करने लगे. ये विदित हुआ कि सब सबीना से इस तरह बिन बुलाये आने पर क्रुद्ध थे और उसे पाठ पढ़ाना चाहते थे. उन्हें सबीना को चोदने में कोई आपत्ति नहीं थी पर प्रीति और रमोना जो पहली बार आये थे उनके लिए ये अनुचित था. चारों ने मिलकर उसे और दण्ड देने का प्रण किया. कुछ देर में सबीना के शरीर में हलचल हुई तो पुनीत ने उसे सहारा देकर उठाया और उसे बाथरूम की ओर ले चला. अन्य ३ भी पीछे हो लिए.

पुनीत ने सबीना को बाथ टब में लिटाया और कहा, “आंटी, हम सबके लंड का पानी भी एक बार अपने मुंह और शरीर में ले लो.”

अर्धमूर्छित सी सबीना मान गई. पुनीत ने अपने लंड को उसके मुंह में डाला और अपना मूत्र उसके मुंह में छोड़ने लगा. सबीना आनाकानी करने लगी पर बाक़ी तीन लड़कों ने उसके हाथ पैर पकड़ लिए. फिर किसी ने उसके चेहरे तो किसी ने उसके मम्मों पर मूत्र त्याग करना आरम्भ कर दिया. जब सब हटे तो सबीना के पूरे शरीर पर मूत्र लगा हुआ था.

सचिन ने टब में पानी चलाते हुए कहा, “आंटी, अगर आप हमें घर पर बुलातीं तो भी हम आपको पूरा आनंद देते. पर अपने हमारे घरेलू उत्सव में इस प्रकार नहीं आना चाहिए था.”

सबीना को अपनी गलती का आभास हुआ. उसने कहा, “मुझे क्षमा करो. पर मुझे एक पल भी इस चुदाई और तुम्हारे मुझ पर मूतने से भी कोई परेशानी नहीं हुई. मैं चाहूंगी कि तुम चारों जल्द से जल्द मेरे घर आकर मुझे इसी प्रकार से चोदो। मैं दिया से भी क्षमा मांग लूंगी और उस से ही तुम सबको घर पर भेजने का अनुरोध करूँगी.”

ये सुनकर लड़के सबीना को स्नान के लिए छोड़कर लौट गए. कुछ समय बाद सबीना बाहर निकली और अपने कपड़े पहनने लगी. उसके बाद वो दिया के पास गई और उसके दोनों हाथ पकड़ कर उसके पैरों में गिर गई और बोली, “दिया, मुझे क्षमा करना, मैं तुम लोगों के कार्यक्रम में इस प्रकार से घुस गई. मैं ये अवश्य कहूँगी कि जो आज सुख और जो पाठ इन लड़कों ने मुझे दिया है, उसने मुझे बहुत कुछ सिखाया है. मैं यही कहूँगी, कि हमारी दोस्ती की कारण, उन लड़कों को मेरे घर आने की अनुमति दे दो. सच में मेरी ऐसी चुदाई कभी नहीं हुई.”

दिया ने उसे विश्वास दिलाया कि वो नाराज़ नहीं है और चारों से सबीना की चुदाई नियमित रूप से करने के लिए कहेगी. सबीना ने उसके सर को चूमा और अपने घर चली गई.

कुछ देर में खाने के बाद चुदाई का अंतिम चरण आरम्भ हुआ. और इस बार चारों महिलाओं की डबल चुदाई की गई. फिर शाम ६ बजे नीलम ने घर को लॉक किया और सब अपने घर चले गए.

क्रमश:

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अध्याय १७: सातवां घर - वर्षा और समीर नायक २

कुसुम का परिवार विशेष

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कुसुम का घर:

अंदर जाने के बाद चारों एक दूसरे के गले लग गए. पूरा परिवार बहुत दिन बाद साथ में आया था. सब बहुत भावुक हो चले थे. कुसुम की तो आँखों से आंसू रुक ही नहीं रहे थे. ये देखकर काम्या और कमलेश ने उसे आगे और पीछे से पकड़कर चूमना आरम्भ कर दिया और कुछ गुदगुदी करने लगे. कुसुम के आंसू थम गए और उसकी खिलखिलाहट निकल पड़ी. फिर कमलेश ने कुसुम को गोद में उठाया और उसे उठाकर अंदर ले गया और सोफे पर लिटा दिया और फिर गुदगुदाने लगा.

“बस कर, दुष्ट. मेरी जान लेगा क्या?”

कमलेश ने गुदगुदाना बंद किया और ऊपर उठकर कुसुम के होंठ चूम लिए.

“हम सबकी आत्मा तुम में है, माँ. तुम्हारी जान क्यों लेंगे. तुम्हारी तो आज रात भर जी भर कर चूत और गांड लेंगे. क्यों पापा?”

“और क्या? इतने दिन हो गए हम सबको एक साथ मिले हुए. आज तो इसे प्यार से भर देंगे.”

“और मेरा क्या होगा, पापा?” काम्या ने झूठा स्वांग रचा.

“अरे बिटिया रानी. तू तो हम सबकी राजकुमारी है. रानी की सेवा हो तो राजकुमारी कैसे उससे वंचित रहेगी? और सुनो, भाईसाहब ने कल की छुट्टी दे दी है तुम्हारी माँ को. मुझे कुछ समय के लिए बुलाया है, काम की प्रगति समझने के लिए, पर कहा है कि कुसुम अपने बच्चों के ही साथ रह ले आज. और कल सबको साथ ही बुलाया है.”

ये सुनकर कमलेश ने फिर से कुसुम को गुदगुदी की, “देख ले माँ, अब तो तेरा पूरा ध्यान हम पर ही रहना चाहिए. बड़े दिन बाद मिली हो, तो आज पूरी रात और दिन तुम्हारा भोग लगाएंगे.”

“मैंने कब मना किया है. देख मुई कैसे बह रही है शाम से, जब से पता लगा कि तुम तीनों आ रहे हो.” ये कहकर कुसुम ने अपने गाउन को ऊपर उठाया और अपनी चूत की फांके फैलाकर दिखाया। सच में चूत इतनी गीली थी कि जैसे कोई झरना हो. कमलेश ने अपनी नाक उसपर लगाकर एक गहरी सांस ली.

“उन्न्ह क्या मदमस्त खुशबू है माँ तेरी चूत की. सच में इतने दिनों से इसके लिए तड़प रहा था. इस बार तू हमारे साथ चलना कुछ दिनों के लिए.”

“वो बाद में देखेंगे, अभी तो ये देख कि उस कमीनी का बहना कैसे बंद होगा.” कुसुम ने मचलते हुए कहा.

तभी संतोष बोल पड़ा, “अरे सब कुछ यहीं करना है क्या. चलो बिस्तर पर. मैं भी तो अपनी राजकुमारी का स्वाद ले लूँ, वहां जल्दी में बस चोदकर ही निकल लिए थे.”

ये सुनकर सबने सामान उठाकर अपने अपने कमरे में रखा. काम्या और कमलेश का कमरा एक ही था. संतोष ने अपने और कुसुम के कमरे में अपना बैग रखा और बाथरूम में घुस गया. मुंह हाथ धोने के बाद बाहर आया तो अभी तक कमलेश और काम्या नहीं आये थे.

“कुछ पीयेगी?”

“जो तुम पिला दो.”

संतोष ने बैग में से एक बोतल निकाली और किचन से दो ग्लास और खाने का सामान ले आया. इसके बाद संतोष ने दोनों के लिए पेग बनाया और पीने लगे. तभी कमलेश और काम्या भी आ गए. दोनों ने मुंह हाथ धोकर अपने कपड़े बदल लिए थे. शराब देखकर कमलेश के मुंह में पानी आ गया. संतोष ने उसके भाव देख लिए और संकेत में पूछा. कमलेश ने हामी भरी.

संतोष: “तू भी लेगा क्या कमलेश?”

कमलेश: “जी, पापा. और अगर आज्ञा हो तो काम्या भी थोड़ी सी ले लेगी.”

कुसुम: “ये क्या कर रहे हो. बच्चों को ये सब क्यों पिला रहे हो?”

संतोष: “अरे कुसुम, थोड़ी पीने में कोई बुराई नहीं होती. बस आदत नहीं होनी चाहिए. और इससे ये भी होगा कि अगर कोई पिला भी देगा तो इन्हें अधिक असर नहीं होगा.”

कुसुम: “अब आप जानो और आपका काम. पर मुझे ये ठीक नहीं लगता.”

संतोष: “तेरी चूत के रस से अधिक नशा नहीं है इसमें.”

कुसुम को छोड़ तीनों हंस पड़े. अंत में कुसुम ने भी मजाक को समझा और उनकी हंसी में जुड़ गई.

“माँ, अब भी बह रही है, या कुछ रुकी?” कमलेश ने कुसुम ने हँसते हुए पूछा.

“कैसे रुकेगी, जब तक रोकने के लिए कोई नीड़ नहीं डालेगा.”

“दिखा तो सही.”

पर इस बार कुसुम ने केवल अपनी नाइटी नहीं उठाई, बल्कि खड़े होकर पूरी ही उतार दी. उसका नंगा सांवला शरीर कमरे के रौशनी में नहा रहा था. उसने अपने दोनों पांव फैलाकर अपनी चूत की फांके खोलीं तो उसपर चमकती नमी किसी मोती की बूंदों के सामान चमक रही थीं. उसने अपनी चूत के ऊपर हाथ चलते हुए अपनी ऊँगली अंदर डाली और फिर उसे निकालकर अपने मुंह में लेकर चाट लिया.

“हम्म्म, अभी तक तो बहे जा रही है.”

कमलेश को अब किसी और निमंत्रण की आवश्यकता नहीं थी. वो वैसे भी कई दिनों से अपनी माँ से दूर था और आज उसने इस दूरी को समाप्त करने का प्रण लिया था. उसके कपड़े पलक झपकते ही एक ओर जाकर गिर पड़े. उसने अपने कदम बढ़ाये और कुसुम के सामने घुटनों के बल बैठकर, उसके नितम्बों को अपने हाथ में लिया और अपना मुंह उसकी बहती हुई चूत के मुहाने पर रह कर जोर से मुंह से खींचा जैसे आम को चूसते है. कुसुम का शरीर छटपटा गया. उसकी चूत ने ये जान कर कि उसकी देखभाल करने कोई आ गया है, स्वागत में और ढेर सारा रस उगल दिया. कमलेश ने इसे भी अमृत समझ कर सेवन किया.

कमलेश खड़ा हो गया और उसने कुसुम को बहुत प्यार के साथ बिस्तर पर लिटाया, कुछ इस प्रकार कि उसके पांव नीचे झूल रहे थे और कूल्हे बिस्तर के कोने पर थे. इस प्रकार की स्थिति ने वो अब उसके सामने बैठकर मन भर कर अपनी माँ की चूत से प्यार दुलार कर सकता था. कनखियों से उसने देखा कि काम्या ने भी अपने वस्त्र निकाल दिए थे. और ये समझा जा सकता था कि उसके पिता भी पीछे नहीं रहे होंगे. उसका अनुमान सही सिद्ध हुआ जब काम्या भी कुसुम के बगल में उसी आसन में आ लेटी और उसने अपने बगल में अपने पिता की उपस्थिति अनुभव की.

“पापा, आपको किसकी चूत अधिक मीठी लगती है.” कमलेश ने पूछा.

“बेटा, अभी तू इतना बुद्धिमान नहीं हुआ कि मेरी लड़ाई लगवा सके. जो मेरे सामने होती है, मुझे वही मीठी लगती है. क्यों काम्या?”

“पापा, इसकी बातों में मत पड़ना. पता नहीं क्यों इसे अब चुदाई के समय बातें करने की नयी आदत पड़ गई है.”

सब हंसने लगे और कमलेश ने कुसुम की बहती चूत के झरने में अपना मुंह डाला और पीने में जुट गया. एक बार अपनी प्यास बुझाने के बाद उसने चूत को बहुत प्यार से चाटने का कार्यक्रम आरम्भ किया. संतोष तो पहले ही काम्या की चूत को चाटकर उसे उकसा रहा था. कुसुम ने अपने एक हाथ से काम्या के मम्मे पकडे.

“भरने लगे हैं तेरे ये मम्मे।”

“दिन रात आपका लाडला जो चूसता और दबाता रहता है. और तो और अविनाश (काम्या का बॉयफ्रेंड) भी अब जब अवसर मिले इनसे खेलता है.”

“कैसा लड़का है ये अविनाश?”

“ठीक है, टाइम पास के लिए. चोदना नहीं आता उसे ढंग से. पर चूत और गांड चाटना सीखा दिया है मैंने. और तो और कई बार तो कमलेश से चुदवाने के बाद भी मैं उससे अपनी चूत चटवाई हूँ. उसे पता भी नहीं लगा कि वो केवल मेरा नहीं कमलेश का भी पानी पी रहा है.”

“ये गलत है, काम्या. इस प्रकार किसी को धोखा नहीं देते. आगे से सफाई करने के बाद जाया कर. और अगर उसके प्रति गंभीर नहीं है, तो उसे छोड़ दे. किसी की भावनाओं से नहीं खेलते.”

“अब कौन बातें कर रहा है?” कमलेश ने कुसुम की चूत से सिर उठाकर पूछा.

“उई माँ. पकड़ी गई.” काम्या बोल पड़ी.

“हम इतने दिन बाद साथ हैं, इसीलिए बातें समाप्त नहीं हो रहीं. कुछ ऐसा करें कि बोलती बंद हो जाये.” संतोष ने प्रस्ताव रखा.

“ठीक है पापा, पर जब तक मेरा मन माँ के रस से भर नहीं जाता मैं और कुछ भी नहीं करूँगा.” ये कहते हुए कमलेश ने कुसुम की चूत की फाँको को फैलाया और अपनी जीभ से अंदर का स्वाद लेने लगा.

देखा देखी संतोष ने भी यही किया पर काम्या बीच में टोक दी.

“पापा, मुझे आपका लंड चूसना है अब. वहां घर में सीधे चुदाई पर आ गए थे. पर आपका लंड पीने का बहुत मन है.”

संतोष ने बेमन से अपना चेहरा काम्या की चूत से अलग किया और खड़ा हो गया. काम्या बिस्तर पर बैठ गई और उसने संतोष के लंड को मुंह में लेकर चाटने और चूसने लगी. कमलेश ने कुसुम की चूत में अपनी जीभ की बढ़त बनाये रखी और भग्नाशे पर भी केंद्रित हो गया. हल्के हाथों से उसे सहलाते हुए उसने उसे बीच बीच में मसलते हुए कुसुम की चुदास को और भड़का दिया, पर अति तो तब हुई जब उसने कामरस से भीगी एक ऊँगली कुसुम की गांड में डाल दी. ऊँगली के अंदर जाते ही कुसुम का शरीर अकड़ गया और वो भरभरा कर झड़ गई. उसके मुंह से निकलती सिसकियाँ और दबी हुई आनंद की चीखें उसके इस कामोत्कर्ष की साथी थीं.

संतोष का भी लंड अब भली भांति तन चूका था. इस बार भी वो काम्या के मुंह में नहीं झड़ना चाहता था. उसने काम्या को बिस्तर पर सीधा लिटाया और उसके पैरों के बीच स्थान बनाते हुए उसकी चूत पर अपना लंड रखा.

“पापा, इस बार देर तक चोदना. और जोर जोर से चोदना।’

“जैसी मेरी राजकुमारी चाहे.” ये कहते हुए संतोष ने एक ही झटके में अपने लंड को काम्या की गर्म चूत में उतार दिया. काम्या की एक संतुष्ट कराह निकली.

जब कुसुम कुछ शांत हुई तो संतोष से बोली, “आपका बेटा बहुत शरारती हो गया है. माँ की गांड में ऊँगली करने लगा है.”

संतोष ने भी उसी मजाक में उत्तर दिया, “जहाँ उसका लंड होना चाहिए, वहाँ ऊँगली कर रहा है. शरारती नहीं मुझे तो बेवकूफ लगता है.”

अब माँ की ममता जाग गई, “ख़बरदार, जो मेरे बेटे को बेवकूफ कहा तो. ये गांड जब वो चाहे तब मार सकता है. हैं न कमलेश?”

“बिल्कुल, माँ की गांड में जो मजा है वो कहीं और नहीं.”

“ला बेटा, अपना लंड ला, मुझे थोड़ा इसका स्वाद लेने दे. फिर एक बार मेरी चूत में डालकर मेरी प्यास मिटा दे.”

कमलेश खड़ा हो गया और कुसुम ने बैठते हुए उसके लंड को अपने मुंह से प्यार करने लगी. कमलेश का जवान लंड वैसे ही तना हुआ था, उसकी माँ के परिश्रम ने उसे फटने की स्थिति में ला दिया.

“माँ अब और नहीं, अब मैं आपको चोदना चाहता हूँ. इतने दिन से आज की प्रतीक्षा में था.”

“आ जा मेरे लाल.” ये कहकर कुसुम बिस्तर पर फ़ैल गयी और अपने पांव फैलाकर अपनी चूत को अपने हाथों से खोल दिया.”

कमलेश ने अपना लंड ऊपर रखकर, अपनी माँ को प्यार से देखते हुए एक ही धक्के में अपने लंड को अपने जन्म स्थान में डाल दिया.

“माँ, सच में तेरी चूत जैसा सुख कोई और नहीं देता मुझे.”

“कितनी चोद ली हैं तूने?”

“अरे माँ, इसकी बड़ी सारी गर्लफ्रेंड हैं. और तो और इसने कई आंटियों को भी अपना दोस्त बनाया हुआ है. हर दूसरे दिन किसी न किसी को चोदकर ही आता है.”

“सच बोल रही है ये?” कुसुम ने पूछा.

“बात मत करो, माँ. इतने दिन बाद नीचे आयी हो, आनंद लो.” ये कहकर कमलेश अपने लंड की पूरी लम्बाई से कुसुम को चोदने लगा.

साथ में उसके पिता भी उसकी बहन को उसी शक्ति से चोद रहे थे. यात्रा की थकान और रात का ढलता समय संतोष पर अब दिखने लगा था. उसके धक्कों की तीव्रता कम हो चली थी. फिर जैसे ही काम्या अपनी योनि को संकुचित करने लगी, उसके शरीर ने उसका साथ छोड़ दिया और वो काम्या की चूत में झड़ गया. काम्या ने उठकर संतोष के लंड को मुंह से साफ किया।

“पापा, आपके लंड का स्वाद मेरी चूत से निकलकर बहुत स्वादिष्ट हो जाता है.”

उधर, अब कमलेश से भी ठहरना भारी पड़ रहा था.

“बेटा, अगर होने वाला है तो रोक मत. पूरा दिन पड़ा है हमारे पास और इतने दिन है.”

ये सुनकर कमलेश ने रुकने का प्रयास छोड़ दिया और उसने भी कुसुम की चूत को अपने रस से लबालब कर दिया. कुसुम ने उठकर उसके लंड को चाटकर साफ किया और चूम लिया.फिर वो काम्या की ओर मुड़ी और काम्या के मुंह पर अपनी चूत रखकर काम्या की चूत से अपने पति का अंश पीने लगी. काम्या ने भी कुसुम की चूत से अपनी भाई के रस को पिया और फिर दोनों माँ बेटी सीधी होकर एक दूसरे से लिपटकर चूमा चाटी करने लगीं.

संतोष और कमलेश ने अपने लिए एक पेग बनाया और एक ही घूँट में पी कर लेट गए. कमलेश ने कुसुम को बाँहों में ले लिया और संतोष ने काम्या को. कुसुम में नींद में जाने के पहले घड़ी देखी तो सुबह के ६ बजने को थे. कुछ ही समय में वे सब निद्रा में लीन हो गए.

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वर्षा का घर:

जहाँ कुसुम के घर में लोग सोने जा रहे थे, यहाँ घर में एक एक करके सब उठ रहे थे. सभी अपने कमरों से निकलकर बैठक में आ गए. सुलभा और अंजलि ने सबके लिए चाय बनाई और थोड़ा कुछ हल्का नाश्ता. पूरा नाश्ता तो ८ बजे के बाद ही होना था. समीर, पवन और जयंत समाचार पत्र पड़ने में व्यस्त थे. राहुल बैठ कर कोई बही-खाता देख रहा था. फिर वो उठकर सबके बीच में बैठ गया.

“मैंने बुक्स को देखा है. मुझे लगता है कि चूँकि इस साल हमें अच्छा लाभ मिलने वाला है, तो क्यों न हम अपने कामगारों के लिए कुछ अच्छा बोनस दे दें. पर इसे समय पर देना भी आवश्यक है.”

“तुम्हारे गणित से कितना बोनस देना ठीक है.?

“मैंने इसे तीन भागों में बाँटा है. एक नगद बोनस, जो उनके बैंक में जायेगा. दूसरा एक जीवन बीमा, जिसकी हर साल हम भरपाई करेंगे, जब तक वो हमारे साथ रहेंगे. और तीसरा एक स्वास्थ्य बीमा, जो सबको कम से कम २ लाख तक का खर्चा वहन करेगा.”

“और इसमें खर्चा कितना आएगा?”

“मैं नगद में २ महीने का वेतन देना चाहूँगा। इसमें लगभग २० लाख का खर्च आएगा. पर इससे हमारे कर का भी बोझ कम होगा. जीवन बीमा और स्वास्थ्य बीमा में लगभग १० लाख का व्यय रहेगा. कुल लगभग ३० लाख. कर कम करने के बाद समझिये २७ लाख के आसपास. इसके बाद भी हमारा कुल लाभ २ करोड़ से अधिक रहेगा.”

“मुझे कोई आपत्ति नहीं है. जयंत और तुम्हें ये निर्णय लेना है. वैसे संतोष भी आएगा कुछ समय बाद उससे भी पूछ लेना.” समीर ने कहा.

“उसके लिए अलग प्रावधान किया है. उसका वेतन जयंत और मैंने १ लाख महीना करने का निश्चय किया है. वैसे भी अब उसके दोनों बच्चों की भी नौकरी लग चुकी है. तो अब वो कुछ पैसा बचाने में भी सफल होगा.”

राहुल बोला, “पापा, क्या आप किसी प्रकार से कमलेश की नौकरी अपने ही शहर में नहीं लगवा सकते क्या? इससे हम लोग जब नहीं होंगे तो आप सबको कुछ सहायता रहेगी.”

“देखता हूँ, मुझे नहीं लगता इसमें कोई समस्या आनी चाहिए, वेतन कुछ कम हो सकता है, परन्तु फिर भी उसके व्यय कम होंगे. मैं आज अपने एक मित्र से बात करता हूँ. पर कमलेश या उनके परिवार में किसी को ये पता न लगे कि हमने उसकी सहायता की है. इससे उसका मनोबल टूटेगा.”

“ठीक है, पापाजी.” राहुल ने कहा. वो उठकर अपने कमरे की ओर जाने लगा तो समीर ने पुकारा.

“राहुल, यहाँ आओ जरा.”

जब राहुल उसके पास पंहुचा तो समीर ने खड़े होकर उसे गले से लगा लिया.

“मुझे तुम पर गर्व है. जो अपने साथ और अपने लिए काम करने वालों का ध्यान रखता है, ईश्वर उसका भी ध्यान रखता है. मुझे इस बात की ख़ुशी है कि अंजलि ने तुम्हारे जैसा पति चुना.”

अंजलि और सुलभा जो कमरे में अभी ही आये थे सुनकर भावविभोर हो गए. सुलभा की आँखों में प्रसन्नता और गर्व के आंसू थे और अंजलि की आँखों में प्यार के. अंजलि ने मुड़कर सुलभा को गले लगा लिया. सुलभा ने उसका माथा चूमा और उसका हाथ पकड़कर सबके सामने आ गई.

“अगर अंजलि ने सही पति चुना है भाई साहब तो मुझे ये कहना होगा कि राहुल उससे भी अधिक भाग्यशाली है जिसे अंजलि जैसी पत्नी और आपके जैसा परिवार मिला.”

इस भावपूर्ण प्रकरण के साथ नायक परिवार के दिन का शुभारम्भ हुआ.

नहा धोकर सबने नाश्ता किया और इसमें ही दस बज गए. आज सबका क्लब जाने की योजना थी. वर्षा ने बताया कि तीनों स्त्रियां क्लब जा रही हैं. इस पर समीर ने तीनों स्त्रियों से वहीँ ४ बजे मिलने के लिया कहा. महिलाएं कुछ देर बाद निकल गयीं. समीर संतोष की प्रतीक्षा कर रहा था. कुछ ही देर में संतोष भी आ गया. उसकी लाल आँखों से लग रहा था कि उसकी नींद अभी पूरी नहीं हुई थी.

संतोष को बैठाकर समीर, राहुल और जयंत ने खेतों की स्थिति जानी। सब कुछ अच्छा चल रहा था. इसके बाद राहुल ने अपने बोनस के प्रस्ताव को संतोष से साझा किया. संतोष ने इस पर सहमति जताई पर कुछ छोटे मोटे बदलाव भी प्रस्तावित किये. सबकी सहमति के बाद जयंत ने इस पर काम करने का विश्वास दिलाया. इसके बाद जयंत ने संतोष को उसके नए वेतन के बारे में बताया. संतोष इस पर सहमत नहीं था. उसका कहना था कि उन्हें हर प्रकार का सुख और सुविधा उनके पास है तो इसकी आवश्यकता नहीं पड़ेगी. परन्तु समीर ने उसे भविष्य के बारे में समझकर मना लिया.

“रात कितने बजे पहुंचे तुम सब?” काम की बातें समाप्त होने पर समीर ने प्रश्न किया.

“२.३०.”

“और सोये कब? समीर ने मुस्कुरा कर पूछा.

“६ बजे.” संतोष ने निसंकोच उत्तर दिया.

“लगता है काफी लम्बा पारिवारिक मिलन रहा.”

“हम सब कोई ५ महीने बाद एक साथ थे. तो बातें करने में समय यूँ ही निकल गया.”

“मैं जानता हूँ क्या बातें की होंगी. चलो, अब तुम घर जाओ और आराम करो. कल से काम की बातें करेंगे.”

“ठीक है, भाई साहब.” ये कहते हुए संतोष ने अपने घर का रास्ता पकड़ा ही था कि समीर को कुछ याद आ गया.

“संतोष, सुनो.”

“जी?”

“वर्षा और मेरी बात हो रही थी, कुछ दिन पहले. अब जब काम्या भी तुम्हारे ही साथ रहेगी, और नौकरी करेगी तो हमारा विचार था कि तुम्हारे आउट हाउस में एक कमरा और जोड़ दिया जाये. देर सवेर कमलेश को भी यहाँ नौकरी मिल गई तो तुम्हे कठिनाई होगी. बच्चे अब स्कूल में तो हैं नहीं.”

“मैं कुसुम से पूछूंगा.”

“पूछ लो, पर मैंने तय कर लिया है. बच्चों के कॉलेज समाप्त होने तक वो बन जायेगा. तुम लोगों के जाने के बाद कार्य प्रारम्भ होगा. करीब चार महीने में समाप्त होगा, क्योंकि अभी वाले घर में भी कुछ बदलाव करने होंगे. तब तक कुसुम कुछ दिन यहाँ, कुछ दिन तुम्हारे पास और कुछ दिन बेंगलोर में बच्चों के पास रह लेगी.”

“भाई साहब, आप सच मैं देवता हैं. अपने जैसा उचित सोचा है, वैसा ही करें. आपका ही घर है.”

“चलो, हम भी बाहर जा रहे है.”

संतोष अपने घर की ओर निकल गया और समीर, जयंत, राहुल और पवन क्लब की ओर।

समीर ने रास्ते में अपने मित्र को फोन किया और उससे कमलेश के बारे में बात की. उसके मित्र ने कमलेश से बात करने के बाद ही कुछ निर्णय लेने का विश्वास दिलाया. फिर समीर ने जयंत से कमलेश का नंबर लेकर अपने मित्र को दिया. उसने इस बात को गुप्त रखने का अनुरोध किया. राहुल गाड़ी चलते हुए कभी बात नहीं करता था और कोई २० मिनट में वे सब क्लब पहुँच गए. देखा तो १२ बजने वाले थे. सभी अंदर चल पड़े.

*************************

कुसुम का घर:

संतोष जब घर पहुंचा तो देखा कि खाना बन रहा है. वो कुसुम और काम्या को दूर से देखकर बहुत गर्वित अनुभव कर रहा था. दोनों सांवली अवश्य थीं, पर सुंदरता का कोई सानी नहीं था. काम करने के कारण शरीर भी गठा हुआ था. वो दोनों को यूँ ही एक तक निहारता रहा. तभी उसने अपने पास कुछ हलचल देखी। ये कमलेश था.

“दोनों बहुत सुन्दर हैं न?”

“सच में. हम बहुत भाग्यशाली हैं.”

कुसुम उनकी बातें सुनकर पीछे मुड़ी और उसकी आँखों से प्यार छलक उठा. काम्या ने भी दोनों को देखा और अपने काम में व्यस्त हो गई. कुछ ही देर में वे अपना कार्य समाप्त करके संतोष और कमलेश के पास आकर बैठ गए.

संतोष: “मैंने भाईसाहब को कार्य की प्रगति बता दी है. अब आज की छुट्टी है. कुछ और भी बातें हुईं हैं.”

कुसुम: “और क्या बात हुई. अगर बताना चाहते हो तो बता दो.”

संतोष: “पहली ये कि मेरा वेतन अब १ लाख प्रति माह हो गया है, इसी महीने से.”

सब ख़ुशी से चिल्ला उठे. “बधाई हो, बधाई हो.”

“और दूसरी?” कुसुम की उत्सुकता दोगुनी हो गई.

“दूसरी ये, कि भाईसाहब हमारे जाने के पश्चात् अपने इस घर में एक कमरा और जोड़ रहे हैं.”

“तो मैं कहाँ रहूंगी? इतना शोर और धूल होगी.”

“उन्होंने कहा है कि कुछ समय मेरे साथ रहना, कुछ समय बच्चों के साथ और शेष उनके साथ.”

सबको ये आयोजन पसंद आ गया.

“पापा, पार्टी दो इंक्रीमेंट की.”

“क्यों नहीं. चलो कमलेश, चिकन वगैरह लाते हैं.”

“चलिए.”

दोनों निकल गए और १ घंटे में सब कुछ लेकर लौट आये. कुसुम ने जब सामान देखा तो गुस्सा होने लगी. संतोष १ पेटी बियर और बहुत सारा खाने का सामान लाया था.

“ये क्या है? क्या बच्चों को पियक्कड़ बनाना है? इतनी सारी क्यों ले आये?”

“मेरी जान, सब कुछ अच्छा हो रहा है, क्यों न इसका आनंद लिया जाये.”

तभी कमलेश के मोबाईल की घंटी बजी. उसने फोन उठाया और फिर “यस सर, यस सर” कहते हुए बाहर चला गया. १० मिनट बाद आया तो वो ख़ुशी से झूम रहा था. उसने पहले काम्या और फिर कुसुम को उठाकर घुमाया और चूमा.

“बताओ, क्या हुआ है?”

कुसुम ने सिर हिलाया कि पता नहीं.

“मेरी नौकरी इसी शहर में लग गई है. वेतन भी पिछले वाले से अधिक है. माँ, आज तू बस मजा कर. आज बहुत अच्छा दिन है.”

कुसुम ख़ुशी से रो पड़ी और ईश्वर के हाथ जोड़कर उनका धन्यवाद करने लगी.

संतोष: “देखा मैंने कहा था न, सब अच्छा होगा. चल अब ग्लास ला हम सब मिलकर मजा करेंगे.”

सबने अपने अपने ग्लास में बियर ले ली.

“सोचो, कितना अच्छा हो गया. छह महीने बाद तुम तीनो फिर साथ रहोगे. घर भी बड़ा हो जायेगा और वेतन भी. ये दोनों भी कमाने लगेंगे.”

कुसुम की ख़ुशी का सच में ठिकाना नहीं था.

“बस आप भी साथ रह पाते तो सब ठीक हो जाता.”

“तुम तो जानती हो, ये संभव नहीं. पर महीने में दो बार मैं आया करूँगा, जब काम कम होगा. फिर तुम भी तो आया ही करोगी सप्ताह दस दिन के लिए. समय के साथ सब ठीक हो जायेगा.”

“अब नहीं आ पाऊंगी मैं. बच्चों का ख्याल कौन रखेगा?”

कमलेश और काम्या हंस पड़े. “माँ अभी भी हम अपना ख्याल रखते ही हैं. आप अब शांति से जाया करो. अब तो ये पता रहेगा कि हम अपने ही घर में हैं किसी अन्य शहर में नहीं.”

ये कहते हुए दोनों भाई बहन ने कुसुम को अपनी बाँहों में भर लिया.

“ये फ़ाउल है. मैंने क्या गलत किया?” संतोष हँसते हुए बोला। इस बार तीनों ने आकर उसे अपनी बाँहों में ले लिया. और अचानक काम्या ने उसके होंठ चूम लिए. “मेरे प्यारे पापा.”

“मेरे विचार से अब इन कपड़ों की कोई आवश्यकता नहीं है. और फिर हमारा खेल भी अधूरा ही रहा था. क्या बोलते हो?”

बोलना किसने था, सब लग गए अपने कपड़े उतारने में और तुरंत ही नंगे होकर खड़े हो गए.

कुसुम: “सुनिए, अभी आप का लंड चाहिए मुझे. इतने दिन से दूर हो. तरस गई हूँ मैं.”

संतोष: ”तेरी तो रोज सिकाई होती होगी।”

कुसुम: “पर वो आप नहीं हो न.”

ये कहते हुए कुसुम संतोष की छाती से लिपट गयी. संतोष ने उसकी भावना को समझते हुए उसकी पीठ हाथों से सहलाने लगा.

“पर तू समझती तो है न, कि मेरा काम वहां खेतों पर ही है. ये तो भाईसाहब का बड़ा दिल है जो हमें परिवार वाला ही समझते हैं, अन्यथा इतना प्यार और सम्मान कोई देने वाला था हमें?”

“समझती हूँ, और अब आपको को भी अच्छे से समझती हूँ?” कुसुम ने ठिठोली की.

संतोष ने उसे आश्चर्य भरी दृष्टि से देखा तो कुसुम उसे बहुत प्रेम से देख रही थी. फिर वो अपने घुटनों से झुककर संतोष के सामने बैठ गई और उसका लंड पुचकारने लगी. संतोष ने एक गहरी साँस ली और अपने शरीर को कुसुम के मुंह को समर्पित कर दिया. कमलेश और काम्या उन्हें देखकर बहुत खुश थे.

“कोई सोच सकता है कि इतने साल शादी के बाद और इतना दूर रहने पर भी इनमें कितना प्यार है. यही है हमारे देश की सच्ची पहचान जहाँ प्यार दूरी नहीं समर्पण को समझता है. काश हम भी इसी प्रकार के जीवनसाथी को पा पाएं.” जुड़वां बही बहन की सोच भी एकाकार ही थी.

“काम्या, चल बिस्तर पर, तेरी चूत का स्वाद लिए २ दिन हो गए.”

“सच में. और मुझे तुम्हारे लंड का. ६९ (69) करते हैं.”

कमलेश बिस्तर पर जाकर लेट गया और काम्या ने उसके मुंह पर अपनी चूत रखते हुए उसके लंड को अपने मुंह में डाल लिया. दोनों भाई बहन एक दूसरे को मौखिक सुख देने में जुट गए. कुसुम की तो पीठ उनकी ओर थी पर संतोष उन्हें देख रहा था. उसने कुसुम को खड़ा किया और बिस्तर की ओर संकेत करते हुए कहा कि क्यों न हम भी यही करें. संतोष ने भी कुसुम की चूत का सेवन कई दिन से नहीं किया था. कुसुम उठ गई और संतोष कमलेश के साथ में लेट गया और कुसुम ने भी वही आसन अपनाकर उसके लंड को अपने मुंह में लिया और अपनी चूत को संतोष के मुंह पर लगा दिया.

कुछ १० मिनट में चारों अपने चरम पर पहुँच गए और एक दूसरे के मुंह में झड़ गए. इसके बाद सबने बैठकर फिर से बियर पी और फिर खाना खाया. खाने के बाद कुछ सुस्ती आ गयी क्योंकि सब रात में कम सोये थे. १ घंटे सोने के बाद सब उठे. कुसुम ने चाय बनाई और सब चाय पीते हुए अपने भाग्य पर खुश होने लगे. कुसुम ने सबसे कहा कि सुबह नहाकर मंदिर चलेंगे ६ बजे फिर आगे कुछ करेंगे. सब ने सहमति जताई.

कमलेश ने कुसुम का हाथ पकड़ा और उससे कहा,”माँ, कल कुछ अच्छे से चुदाई नहीं हुई. चल आज मुझे तेरी चूत और गांड दोनों का मजा लेना है.”

काम्या ने भी अपना अंश जोड़ा, “हाँ माँ, मेरी भी यही इच्छा है. और मुझे आपको चूत और गांड में एक साथ चुदते हुए भी देखना है.”

“ये लड़की मेरी जान के पीछे पड़ी रहती है.” कुसुम ने हँसते हुए कहा. “ठीक है, पर मैं भी तेरी दुहरी चुदाई देखने को उत्सुक हूँ.”

“ओके, माँ. पहले आप इन दोनों से चुदवाओ फिर मैं चुदवाऊँगी।”

ये तय होने के बाद अब रुकने का कोई अर्थ नहीं था.

संतोष: “किसको क्या मिलेगा, ये भी बता दो अब.”

कुसुम ने मोर्चा संभाला, “आपको मेरी चूत मिलेगी और कमलेश को गांड. फिर कमलेश को काम्या की चूत मिलेगी और आपको उसकी गांड. क्या विचार है.”

संतोष ने संतुष्टि के साथ कहा, “हमेशा की तरह, बहुत उत्तम.”

संतोष अब बिस्तर पर लेट गया. काम्या ने आकर उसका लंड चूसकर चिकना कर दिया। कुसुम ने संतोष के ऊपर अपनी चूत की सवारी गाँठी। तब तक काम्या एक पिचकारी वाली प्लास्टिक की बोतल में रसोई से तेल ले आयी. फिर उसने वो बोतल की चोंच से कुसुम की गांड में तेल भर दिया. उसने कमलेश के लंड को चाटकर उसके ऊपर भी तेल लगाया. अब कमलेश कुसुम की गांड की सवारी के लिए तैयार था. कमलेश बहुत ही प्यार से कुसुम की गांड में लंड डालने लगा. सुपाड़ा पक्क से अंदर गया तो जैसे आगे का रास्ता साफ था. आखिर ये गांड सालों से लौड़े खा रही थी. कमलेश का लंड कुछ ही समय में गांड के अंदर चहलपहल करने लगा. नीचे से संतोष भी अपनी पूरी शक्ति के साथ कुसुम की चूत में लंड पेल रहा था. जो कुछ कसर शेष थी, उसे कुसुम ऊपर नीचे उछलकर पूरी कर दे रही थी.

तीनों इस समय वासना के समुद्र में हिचकोले खा रहे थे. साथ बैठी काम्या ये देखकर अपनी बारी की बड़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रही थी. इसका अर्थ ये नहीं था कि वो व्यर्थ ही बैठी थी. उसकी उँगलियाँ उसके चूत में चल रही थीं पर उसे इससे शांति नहीं मिल रही थी. पिता के लंड से गांड मरवाये बिना इस कन्या को शांति कैसे मिलती.

कुसुम की आनंदकारी चीत्कारें संभवतः मुख्य घर में भी सुनाई दे रही होंगी, पर उन्हें पता था कि परिवार इतने दिन बाद साथ आया है तो कुछ तो हल्ला गुल्ला होगा ही. कुसुम इस दुगने आघात से आनंदित अपना रस कुछ नहीं तो २-३ बार तो छोड़ ही चुकी थी, पर असली बड़ा स्खलन अभी भी शेष था. पर अधिक दूर भी नहीं था. जब बाप बेटे अपनी ताल बदल बदलकर चूत और गांड में लंड पेलने लगे तो कुसुम के शरीर और मस्तिष्क को समझ ही नहीं आया कि क्या हो रहा है. वो शिथिल हो गया और सारी इन्द्रियां कुसुम के निचले संवेदनशील पर केंद्रित हो गयीं. और इसके बाद कुसुम का बांध टूट गया. वो चीखते हुए झड़ी और संतोष के सीने पर लुढ़क गई. कमलेश अब झड़ने ही वाला था पर संतोष अपने ऊपर लेटी कुसुम की चूत में उसी समय झड़ गया. कमलेश ने भी अपनी गति बढ़ाई क्योंकि अब घर्षण कम हो चुका था. अंत में उसने भी अपने वीर्य से कुसुम की गांड को भर दिया और एक ओर बैठकर गहरी सांसे लेने लगा.

काम्या ने अपना अवसर देखा और वो अपनी माँ की गांड और चूत से बहते कामरस को चाटकर पी गई. पर अब उसे इन दोनों के लंड दोबारा करने खड़े थे अपनी दुहरी चुदाई के लिए. इसके लिए कुछ देर का विश्राम आवश्यक था. और विश्राम के लिए बियर का एक और चक्र चलाया गया.

बियर समाप्त होते होते संतोष और कमलेश भी अगले चरण के लिए तत्पर थे. पर काम्या को कुछ और तैयारी की आवश्यकता थी. और इसके लिए पहल की कुसुम ने. काम्या को बिस्तर पर लिटा कर उसने काम्या की चूत और गांड को चाटकर उत्तेजित किया. फिर गांड में तेल से अच्छे मालिश कर के उसे लंड झेलने के लिए चिकना किया और अपनी दो उँगलियों से उसे इतना खोल दिया कि संतोष का लंड आसानी से उसे भेद सके. जब उसने ये पाया कि काम्या तैयार है तो उसने अपने पति और बेटे के लौडों को चूसकर खड़ा तो किया ही पर इतना गीला भी कर दिया कि उसकी बेटी को कोई कठिनाई न हो.

कमलेश को लिटाकर कुसुम ने उसके लंड को एक बार और चूसा फिर काम्या की चूत को भी चाटकर उसे कमलेश के लंड पर बैठने के लिए कहा. काम्या ने सरलता से कमलेश को अपनी चूत में समा लिया. अब वो आगे झुकी, जैसा उसने अपनी माँ को करते हुए देखा था. अब संतोष की बारी थी. कुसुम ने एक बार और काम्या की गांड पर जीभ फिराई और ऊँगली से एक बार और सहलाया. फिर उसने संतोष के लंड को चाटकर उसे काम्या की गांड के छेद पर रख दिया. संतोष ने अपने लंड का दबाव बनाया और काम्या की गांड ने खुलकर उसका स्वागत किया और सुपाड़ा अंदर जाकर बैठ गया.

दबाव बनाये रखते हुए उसने अपने लंड को काम्या की गांड में पूरी लम्बाई तक डालने के बाद ही साँस ली. अब काम्या दो शरीरों से दबी हुई थी और उसके दो छेदों में दो लौड़े थे, जो अभी तक शांत पड़े थे. पर ये शांति टूट गई जब कमलेश ने अपने लंड से उसे चोदना शुरू किया. कुछ ही देर में कमलेश ने अच्छी गति पकड़ी और ३-४ मिनट तक चोदने के बाद रुक गया. उसके रुकते ही संतोष ने काम्या की गांड में अपने लंड का संचालन करने लगा. वही ताल अपनाते हुए उसने भी अपनी गति धीरे धीरे बढ़ाई और फिर ३-४ मिनट के बाद रूक गया. अब कमलेश चुदाई करने लगा, पर २-३ मिनट बाद कमलेश के रुके बिना ही संतोष ने भी गांड मारनी फिर शुरू कर दी. काम्या तो जैसे पागल हो गई. कुसुम उसके पास जाकर उसे चूमने लगी.

“ओह, माँ. कितना मजा है ऐसी चुदाई में. सच में स्वर्ग दिखता है. ओह, माँ. मुझे जब तक हम साथ हैं हर दिन ऐसे ही चुदना है.”

“ठीक है, इसमें कोई बड़ी बात नहीं, घर की ही तो बात है.”

कमलेश और संतोष अब पूरी गति से लंड चला रहे थे. काम्या की आनंदातिरेक चीखें उसकी माँ के होंठों ने बंद की हुई थी. काम्या दो झड़ गई थी, और अब उसका विशाल उत्कर्ष निकट था. संतोष और कमलेश भी अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच चुके थे. गांड अधिक तंग होने से और कुछ आयु के कारण, संतोष ने अपने पानी से काम्या की गांड भर दी. गांड में छूट रहे फौहारे की गर्मी से काम्या भी अपने अंत पर पहुँच गई और थरथराते हुए झड़ गई और इतना पानी छोड़ दिया की कमलेश के लंड की ध्वनि किसी चलती हुई नाव के समान प्रतीत होने लगी. और कमलेश अब कितना रुकता. उसने भी अपने रस से काम्या की चूत लबालब कर दी.

संतोष काम्या के ऊपर से हटा, और काम्या एक ओर ढुलक गई. कुसुम ने तुरंत उसकी चूत और गांड से बहते रिसते कामरस को पिया और दोनों छेद चाटकर साफ कर दिए. फिर उसने संतोष के लंड को साफ किया और अंत में कमलेश के लंड को. सब लोग बिस्तर पर लेटकर पंखे की चाल देख रहे थे. सबके चेहरे पर संतुष्टि के भाव थे और एक चमक थी. कुछ समय पश्चात सब धीरे धीरे उठे और बाथरूम जाने लगे. आज पूरे शेष समय में केवल चुदाई ही होनी थी, हर संभव सम्मिश्रण में. और अन्य हर कार्य निरर्थक था.

घर कुछ दिनों के लिए स्वर्ग बन गया था.

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अगले दिन सुबह:

अगले दिन कुसुम और परिवार तड़के उठ कर स्नानादि से निवृत्त होकर मंदिर दर्शन के लिए गए और वहां धन्यवाद किया और आशीर्वाद माँगा. लौटते हुए उन्हें ७ बज गए और कुसुम सीधे बंगले में अपने काम पर चली गई. अभी लोग सोकर उठने ही लगे थे. सुलभा किचन में थी और कुसुम ने जाकर उनके पांव छुए और दूध गर्म करने के लिए चढ़ा दिया. साथ ही नाश्ते बनाना आरम्भ कर दिया. फिर चाय के लिए पानी चढ़ाया. इसके बाद दोनों को कुछ समय मिला तो बातें शुरू हो गयीं.

सुलभा: “बड़ी खिली हुई लग रही है. लगता है कल बाप बेटे ने अच्छे से चोदा है पूरे दिन.”

कुसुम: “हाँ दीदी, इतने दिन बाद सब मिले तो ये तो होने ही था. पर आपकी भी सुंदरता और चेहरे की चमक बता रही है की आपकी भी अच्छी सेवा हुई है.”

सुलभा ने षड्यंत्रकारी मुद्रा में फुसफुसाते हुए बोला: “कल सब क्लब गए थे.”

कुसुम सब समझ गई. “तभी सब अभी तक लोटे पड़े है.”

“नहीं, उठ गए होंगे. मैं तो कमरे में अकेली ही थी तो यहाँ आ गई. पर कल मजा आ गया. चूत और गांड इतनी चुदी कि मन तृप्त हो गया.”

कुसुम: “दीदी, आपका मन कभी तृप्त नहीं होता. सच बताओ, अपने घर आने पर भी किसी न किसी से चुदवाया तो होगा ही.”

सुलभा: “कल जयंत आया था. पर एक एक बार चूत और गांड मारकर चला गया. और इन्हें न जाने क्या सूझी, उसके आने के बाद वर्षा के पास चले गए. दोनों समधियों ने उसे चोदा होगा रात भर. बस मैं ही रह गयी.”

कुसुम: “दीदी, तुम चिंता मत करो. कमलेश आया हुआ है. तुम्हारी सेवा किया करेगा, जब चाहो. बस मेरे लिए कुछ दम छोड़ देना लड़के में.”

सुलभा: “तेरा बेटा है. चुदवाने के बाद इधर भेजा करना, नहीं तो हम दोनों निचोड़ देंगी उसे.”

कुसुम: “ठीक है दीदी.”

सुलभा: “वैसे कब आएंगे दोनों यहाँ आशीर्वाद लेने.”

कुसुम: “१० बजे के बाद. तब तक सब नाश्ता पानी कर चुके होंगे.”

सुलभा मुस्कुरा कर: “मेरी मान तो ९ बजे बुला लेना, नाश्ते के पहले. और संतोष को भी ले आना. नाश्ता सब साथ कर लेंगे सब परिवार वाले मिलकर.”

कुसुम अपने आप को परिवार का हिस्सा समझे जाने पर धन्य हो गयी.

“ठीक है, दीदी. मैं उन्हें बोलकर आती हूँ, फिर चाय परोस दूंगी सभी को.”

“ठीक है, जल्दी आजा. तुझसे और भी बातें करनी हैं.”

कुसुम घर जाकर सबको ९ बजे आने के लिए बोलकर लौट आयी. और चाय लेकर निकल पड़ी. ९ बजे तक सभी परिवारजन नाश्ते के लिए आये ही थे कि संतोष, काम्या और कमलेश भी आ गए.

“आओ संतोष. आओ काम्या, आजा कमलेश.” समीर ने तीनों का स्वागत किया. कमलेश और काम्या ने समीर, पवन. वर्षा और सुलभा के पांव छूकर आशीर्वाद लिया. सबने उन्हें आशीर्वाद भी दिया और गले भी लगाया.

“बहुत दिन हो गए तुम दोनों को देखे हुए. कितने दिन बाद आये हो घर?”

“ताऊजी, ३ महीने से अधिक हो गए. सच मैं हम भी आप सबसे मिलने के लिए तरस गए थे.” कमलेश ने बताया.

“हाँ बहुत समय जो गया. अब आये हो तो नाश्ते के बाद अच्छे से मिलते हैं.” समीर ने द्विअर्थी बात कही जिसे समझने में किसी को कठिनाई नहीं हुई. जयंत, अंजलि और राहुल इस बात पर मुस्कुराने लगे. काम्या ने सिर झुका लिया.

“चलिए, पहले नाश्ता करिये, फिर आगे के दिन का सोचेंगे.”

सबने अपना नाश्ता लिया और कुछ लोग डाइनिंग टेबल पर ही खाने लगे और अन्य बैठक में चले गए. समीर, कमलेश, वर्षा और काम्या बैठक में जाकर बैठे.

“ताऊजी, एक अच्छा समाचार और भी है. कल यहाँ से () कंपनी का फोन आया था और उन्होंने फोन पर ही इंटरव्यू ले लिया और मुझे नौकरी का प्रस्ताव भी दे दिया. वेतन पिछले प्रस्ताव से अधिक है.”

वर्षा ख़ुशी से बोली: “ये तो बहुत ही शुभ समाचार है. रुको, मैं तुम्हारा मुंह मीठा करने के लिए कुछ लाती हूँ.”

वो किचन में गई और कुसुम को गले से लगा लिया और बोली; “तू कब बताने वाली थी कि कमलेश को यहीं नौकरी मिल गई?”

कुसुम झेंप गई, “दीदी, बस आपके ही पास आने वाली थी. इसके पहले समय ही नहीं मिला.”

वर्षा: “कोई बात नहीं. बच्चे इतने दिन बाद आये हैं, तुझे सच में कहाँ समय मिल पाया होगा. अब कमलेश का मुंह मीठा करने के लिए कुछ दे.”

मिष्ठान लेकर वर्षा कमलेश के पास आयी जो आदर से खड़ा हो गया. उसके मुंह में मिठाई डालकर वर्षा ने उसे फिर से आशीर्वाद दिया.

फिर उसके कान में बोली: “ तेरी सबसे पसंद वाली मिठाई भी मिलेगी तुझे, बस थोड़ी प्रतीक्षा कर ले.” ये कहकर उसने कमलेश के लंड को पैंट के ऊपर से सहलाकर अपना तात्पर्य जता दिया.

कमलेश का लंड एक झटके में खड़ा हो गया. इसके बाद वर्षा ने काम्या को मिठाई खिलाई और उसे भी आशीर्वाद दिया.

समीर: “वर्षा, तुम तो जानती ही हो मेरे आशीर्वाद का ढंग. हम दोनों जब तक इन्हें अपना प्रसाद नहीं देंगे इनका आशीर्वाद अधूरा ही रहेगा.”

वर्षा: “बिल्कुल, पर नाश्ता कर लीजिये उसके बाद.”

सब नाश्ता समाप्त करने में व्यस्त हो गए. नाश्ते के बाद समीर और वर्षा ने कहा की वो अपने कमरे में जा रहे हैं. उसके बाद वो दोनों काम्या और कमलेश को लेकर अपने कमरे में चले गए. कमरे में जाने के बाद समीर और वर्षा अपने कपड़े उतारने लगे. कमलेश और काम्या अभी वैसे ही खड़े थे.

“क्या हुआ तुम दोनों को? प्रसाद नहीं लोगे आशीर्वाद के साथ?”

ये सुनकर काम्या और कमलेश भी नंगे हो गए. समीर और वर्षा पास पास सोफे पर बैठ गए. अर्थ समझकर कमलेश वर्षा के आगे जा बैठा और उसकी चूत को चाटने लगा. काम्या ने भी समीर के आगे बैठकर उसके लंड पर अपनी जीभ चलाई और उसे चाटने लगी.

“तुम बच्चों की बहुत याद आती थी, अब ये जानकर ख़ुशी है कि ६ महीनों में यहीं आ जाओगे.” वर्षा बोली।

“ताईजी, हमें भी घर की याद बहुत सताती थी. पर आज हमारा भविष्य बन गया दूर रहकर.” कमलेश ने अपना सिर उठाकर वर्षा को उत्तर दिया. “और विशेषकर आपकी ये चूत की खुशबू और स्वाद जिसे हम बहुत मिस करते थे.”

“अब आया है तो जी भर के पी ले मेरा पानी. जब मन करे आ जाया कर. तेरे लिए तो हमेशा खुले है ये.” वर्षा ने प्यार से उसके बालों को सहलाते हुए कहा. “जब तेरी माँ काम पर आया करे, तब तुझे उसकी सेवा नहीं करनी होगी. तब यहाँ आ जाया कर. क्यों जी मैंने ठीक कहा न?”

“तुमने कभी गलत कहा है?” समीर ने चुहल की.

कमलेश और काम्या अपने कथित ताई और ताऊ की चूत और लंड को चूसने चाटने में लगे रहे. दोनों के सिर पर हाथ फेरते हुए वर्षा और समीर आनंद ले रहे थे. साथ ही साथ वे अपनी गांड पर भी दोनों भाई बहन की जीभ को अनुभव कर रहे थे. कुछ देर की इस गतिविधि के बाद वर्षा ने कमलेश और समीर ने अपना माल काम्या के मुंह में उड़ेल दिया, जिसे दोनों युवाओं ने प्रसाद समझ कर ग्रहण किया. पर दोनों ने अपने चेहरे को उसी स्थान पर रहने दिया और अपने बुजर्गों से आशीर्वाद लेते रहे.

वर्षा: “चलो जी. इनको तो हमने आशीर्वाद और प्रसाद दे दिया. अब इनको भी कुछ सुख दे दें?”

समीर: “तुमने तो मेरे मुंह की बात छीन ली.”

ये कहते हुए पति पत्नी ने उठकर अपने साथ बहन भाई को लिया और बिस्तर की ओर चल दिए. और कुछ ही देर में कमलेश का लंड वर्षा की चूत की गहराई नाप रहा था और समीर का लंड काम्या की चूत की.

नायक परिवार में एक और आनंद से भरपूर सामान्य दिन का आरम्भ हो चुका था.

क्रमश:

1162000
 
अध्याय १७: आठवाँ घर - स्मिता और विक्रम शेट्टी २

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स्मिता का घर

आज की सुबह :


घर में मेहुल को छोड़कर सभी लोग बाहर जाने के लिए बन संवर रहे थे. आज उनके समुदाय का मासिक मिलन समारोह था. हर बार की तरह पहले प्रबंधन समिति के ५ सदस्य उन परिवारों से मिलेंगे जिनके पुत्र या पुत्री अगले महीने २० वर्ष के होने वाले थे. इसमें ये निर्धारित करने का प्रयास किया जाता था कि क्या वे समुदाय में सम्मिलित होने योग्य हैं या नहीं. समुदाय में ये देखा गया था कि कुछ परिवार इसमें कुछ अधिक समय लेते थे और उनकी संतानें कुछ महीनों बाद सम्मिलित होती थीं.

इसके बाद एक नया परिवार जो जुड़ने वाला था उसका परिचय कराया जायेगा. किसी भी परिवार को जोड़ने के पहले उनके बारे में बहुत गहन छानबीन की जाती है, जिसमें ३ से ५ महीने निकल जाते हैं. और इस परिवार को प्रस्तावित करने वाले परिवार से भी इस पूरी पड़ताल के समय पैनी आंख रखी जाती है. ये अत्यंत आवश्यक था क्योंकि सभी शहर में प्रख्यात नागरिक थे और किस भी प्रकार का प्रतिकूल समाचार या कुप्रचार उन्हें नष्ट कर सकती थी.

मेहुल को समझा दिया गया था कि उसे अगले महीने से सम्मिलित करने का प्रस्ताव वो देने वाले हैं. मेहुल ने इसके लिए स्वीकृति दे दी थी. मेहुल भी तैयार हो रहा था बाहर जाने के लिए, पर किसी अन्य स्थान पर.

१०.३० बजे सब निकल गए. पहले अन्य सदस्य और अंत में मेहुल.

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सुजाता का घर

पिछले सप्ताह:


अविरल जैसे ही अपने ऑफिस से घर में अंदर आया तो उसकी ऑंखें भौंचक्की रह गयीं. सोफे पर ही उसकी पत्नी सुजाता झुकी हुई थी और उसका बेटा विवेक उसे पीछे से चोद रहा था.

अविरल: “ये कुछ अधिक खुलापन नहीं है? कम से कम कमरे में जा सकते हो. कोई आ गया तो?”

सुजाता: “आता तो घंटी बजता. आपकी तरह चाबी नहीं है उसके पास. दरवाजा लॉक तो कर ही दिया था.”

अविरल: “पर फिर भी…”

सुजाता: “ फिर भी कुछ नहीं.” उसकी आवाज़ में थोड़ी खीज थी. “आप आज जल्दी निकल गए बिना कुछ किये हुए. विवेक जब कॉलेज से आया तो इसे भी चुदाई की तीव्र इच्छा थी. तो बिना समय गंवाए हमने यहीं आसन जमा लिया. आप जाकर नहा लो, तब तक हम भी निपट लेंगे.”

अविरल सिर हिलता हुआ अपने कमरे में चला गया. सुजाता की चुदास दिन प्रति दिन बढ़ती ही जा रही थी. उसकी जितनी भी चुदाई करो, उसकी भूख बढ़ती ही थी. कभी कभी तो बाप बेटे दोनों से चुदवाकर भी वो प्यासी रह जाती थी. काश कोई ऐसा मिल जाये जो इसे शांत करे कुछ नियंत्रण में लाये. वो नहा कर निकला तो सुजाता कमरे में आ चुकी थी. उसने अविरल के होंठ चूमे।

सुजाता: “आपको बुरा लगा न. ठीक है, मैं आगे से बाहर नहीं करुँगी. पर क्या करूँ स्वयं को रोकना कभी कभी कठिन हो जाता है.”

अविरल: “श्रेया के घर का क्या समाचार है?”

सुजाता: “स्मिता से बात हुई थी. मेहुल अब ठीक है. स्मिता कल उसे यहाँ भेजेगी. पर वो स्नेहा को इस प्रकार से देखने के बाद दुखी है. स्नेहा को उससे बात तो करनी ही होगी. तभी कुछ ठीक होगा. वो तो स्नेहा पर लट्टू है, पर स्नेहा उसके शर्मीले और सीधे स्वभाव के कारण उस पर अधिक ध्यान नहीं देती.”

अविरल: “पता नहीं क्यों, मैं जब उससे मिलता हूँ तो मुझे एक अनुभूति होती है जैसे वो कुछ छुपा रहा है. और जैसे वो जो दिखाता है, वो उसका सच्चा रूप नहीं है. और तुम तो जानती हो मैं किसी के चरित्र के बारे में अक्सर सही ही सोचता हूँ. अगर वो कल आ रहा है, तो मैं तुम्हे थोड़ा संभल कर रहने की राय दूंगा.”

सुजाता: “जैसा आप ठीक समझो. चलिए आपकी ड्रिंक के लिए सब रख दिया है, कुछ देर आराम करिये फिर खाना परोस दूंगी. आपकी रूचि का खाना बनवाया है.”

अविरल ने कपड़े पहने और सुजाता के साथ बाहर आ गया. बाहर विवेक उसकी प्रतीक्षा कर रहा था.

विवेक: “डैड, आई एम सॉरी, आज के लिए.”

अविरल उसका हाथ थामकर: “जाहे कुछ भी हो, इस प्रकार का प्रदर्शन सही नहीं है. सुजाता ने भी आगे से ऐसा न करने का वचन दिया है. मैं तुमसे भी यही चाहूंगा.”

विवेक: “यस डैड. आई ऑल्सो प्रॉमिस.”

अविरल: “कूल. लेट अस गेट ए ड्रिंक एंड वाच सम न्यूज़.”

तीनों बैठक में आ गए. सुजाता सबकी ड्रिंक्स के लिए ट्रे लेकर आयी और बनाकर हाथों में सौंपी. फिर सब समाचार देखने में व्यस्त हो गए.

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स्मिता का घर

पिछले सप्ताह, अगली सुबह


स्मिता से ठीक से चलते नहीं बन रहा था. उसने क्रीम लगाकर स्वयं को थोड़ा ठीक किया. उसने बिस्तर पर सोते हुए अपने बेटे की ओर देखा. उसका लंड इस समय भी बहुत भयावह लग रहा था. उसके चेहरे पर एक मुस्कराहट आ गई. सुजाता की तो अब शामत आएगी. अपने आप को बड़ा चुड़क्कड़ समझती है. एक बार मेरे बेटे का लंड उसकी गांड में जायेगा तो सारी अकड़ निकल जाएगी.

सम्बन्धी होते हुए भी नारी सुलभ ईर्ष्या के कारण उसकी सुजाता से एक अनकही अनबन थी. सुजाता जहाँ स्वयं को अधिक सुंदर और चुदाई में अधिक प्रवीण मानती थी. स्नेहा के विचार उससे भिन्न थे परन्तु वो कुछ कहती नहीं थी. पर अब उसके पास वो हथियार था जिसकी चोट से सुजाता की नींव हिलने वाली थी. उसने झुकते हुए मेहुल के लंड पर एक चुम्बन लिया और उसके टोपे को चाट लिया. मेहुल ने एक अंगड़ाई ली.

स्मिता: “अब उठ जा, सब ये सोच रहे होंगे कि ये माँ बेटे क्या कर रहे हैं.”

मेहुल ने उसका हाथ पकड़कर उसे अपने ऊपर खींच लिया और उसके होंठों पर एक प्रगाढ़ चुम्बन लिया.

मेहुल: “यही कि आप मुझे अभी कुछ और सिखा रही हो. सबके मन बड़ी शांति अनुभव कर रहे होंगे, ये सोचकर कि आपने मुझे सांचे में ढाल लिया है.”

स्मिता: “उन्हें ये नहीं पता कि मैं अब तेरे सांचे में ढल चुकी हूँ और कमरे के अंदर तेरी दासी हूँ.”

मेहुल: “नहीं, मॉम. वो कल की बात थी. आप कभी मेरी दासी नहीं बनोगी. आप तो मेरी जान हो. मैं तो कल आपको सरप्राइस देने के लिए ये सब कह रहा था.”

स्मिता: “और अगर मैं कहूँ कि मुझे तुम्हारा वो रूप अच्छा लगा तो.”

मेहुल: “तो हम ये खेल इसी प्रकार से खेल सकते हैं.”

स्मिता: “मेरी एक बात मानेगा.” स्मिता ने षड्यंत्रकारी आवाज़ में कहा.

मेहुल: “मॉम, तुम्हें पूछने की भी कोई आवश्यकता नहीं है. मैंने आज तक तुम्हे किसी बात के लिए मना किया है. बताओ किसका खून करना है.”

स्मिता ने मेहुल के मुंह पर हाथ रखा: “ये क्या कह रहा है. शुभ शुभ बोल. मैं चाहती हूँ कि तू सुजाता को अपनी दासी बना ले. उसे अपना daasi बना ले. वो मुझे बहुत अकड़ दिखती है, बहुत बनती है मेरे सामने.”

मेहुल अपने शर्मीले और सरल रूप में परिवर्तित हो गया, “मैं ये सब कैसे कर सकता हूँ. मैं तो छोटा सा, नन्हा सा बच्चा हूँ.”

दोनों खिलखिला पड़े. फिर मेहुल गंभीर हो गया.

“मॉम, हम जब परसों उनके घर जायेंगे तो आप मुझे उन्हें सौंपकर चली आना. ये कहना कि आप तो कुछ सीखा नहीं पायीं अब वो ही कुछ सीखा सकती है. उन्हें लगेगा कि वो आपसे श्रेष्ठ है. उसके बाद मैं उन्हें सबक सिखाऊंगा. अगर आप वहां रहेंगी, तो मैं जानता हूँ कि आपको उन पर दया आ जाएगी और सारा खेल बिगड़ जायेगा.”

स्मिता खुश होकर: “ये ठीक है. अच्छा पाठ पढ़ाना उसे चुड़ैल को.”

मेहुल कुछ सोचकर: “मॉम. मैं कल आपको दो वीडियो कैमरे दूंगा. आप उसे उनके कमरे में छुपा देना. मैं चाहता हूँ कि आपके पास ये प्रमाण रहे कि वो मेरी दासी बन चुकी हैं.”

मेहुल: “मॉम, एक बात और. जब तुम अपना कैमरा लगाने जाओ, तो एक बार ये अवश्य देखना कि कहीं कोई अन्य कैमरा तो नहीं लगा हुआ.”

स्मिता: “ऐसा कौन करेगा?”

मेहुल: “अविरल अंकल. मुझे विश्वास है कि उस कमरे में कम से कम एक और कैमरा होगा.”

स्मिता: “अगर हुआ तो?”

मेहुल: “उसकी बैटरी निकाल देना. मैं खेल की समाप्ति पर फिर लगा दूंगा. अगर कोई ये सोचता है कि उसे हमारे विरुद्ध कोई साक्ष्य मिल सकता है, तो उसे गलत सिद्ध करना हमारा कर्तव्य है.”

स्मिता: “मेहुल, मुझे तुमसे अब कुछ डर सा लग रहा है.”

मेहुल: “डोंट वरी, मॉम मेरे लिए सारी दुनिया से अधिक अपना परिवार प्यारा है. मैं किसी को इस पर आंच नहीं लाने दूँगा।”

स्मिता की ख़ुशी का अब कोई अंत नहीं था. वो मेहुल के षड्यंत्र की भागीदार बनाने के लिए तुरंत मान गई. इसके बाद दोनों बाथरूम में जाकर निवृत्त हुए और फिर सबसे मिलने के लिए बैठक में चले गए. मेहुल ने अपना सीधेपन का मुखौटा लगा लिया.

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सुजाता का घर

पिछले सप्ताह:


खाने के समय स्नेहा भी पहुँच गई. सबने बैठ कर खाना खाया और बातें चलती रहीं. हालाँकि अविरल के प्रयासों के बाद भी हर बार विषय मेहुल की ओर ही जा रहा था था. स्नेहा ने ये बात साफ की कि उसे मेहुल केवल इसीलिए अच्छा नहीं लगता है क्योंकि वो उसे एक दब्बू लड़का समझती थी.

अविरल: “स्नेहा, मैं कुछ देर पहले सुजाता को यही समझा रहा था. मेरे विचार से मेहुल जो प्रदर्शित करता है, उसका असली चेहरा वो नहीं है. अगर उसे ये बात पता लगी कि तुम उससे चिढ़ती हो, तो न जाने क्यों मुझे तुम्हारे लिए एक डर की भावना आती है. क्या तुमने कभी उसका अपमान किया है?”

स्नेहा: “नहीं, मैं उसे इसीलिए सहन करती हूँ क्योंकि वो श्रेया दीदी का देवर है. पर जैसे वो मेरे पीछे पालतू कुत्ते के समान दुम हिलाता है, कई बार तो उसकी गांड पर लात मारने का मन करता है. मुझे तो लगता है कि उसका लंड भी ३-४ इंच से बड़ा नहीं होगा. साला भड़वा.”

अविरल ये भाषा सुनकर स्तब्ध रह गया. उसे स्नेहा के लिए एक अंजाना सा डर सताने लगा.

अविरल: “स्नेहा, मैं चाहूंगा कि तुम अपनी इन भावनाओं पर अंकुश लगाओ. देर सवेर तुम्हें उसके साथ चुदाई करनी ही है. ये हमारे समुदाय का नियम है. अगर इस प्रकार की भावना रहेगी तो हम बहुत कठिनाई में आ सकते है. जहाँ तक मेरा विचार है, सुजाता के पास वो कल आएगा. श्रेया और महक के बाद तुम्हें ही उसके साथ चुदाई करनी है. तो अगले ६-७ दिनों में या तो अपनी सोच बदलो, या समुदाय से निष्काषित होने के लिए तैयार रहो.”

स्नेहा ने समझ लिया कि अविरल बहुत गंभीर हैं. उसने समय की मांग को समझ कर अपने आप को नियंत्रित करने का वादा किया. अविरल ने भी चैन की साँस ली. पर उसे अभी भी एक अदृश्य भय सता रहा था. उसने अपने कमरे में वीडियो रिकॉर्डर रखने का निश्चय किया. वो देखना चाहता था कि मेहुल का असली रूप क्या है. स्नेहा ने हालाँकि अपना वादा किया था पर उसे इसपर टिकने का कोई भी विचार नहीं था. पर वो नहीं जान रही थी कि ऐसा करने से वो अपने लिए कितनी बड़ी समस्या खड़ी कर रही है.

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स्मिता का घर

पिछले सप्ताह, अगली सुबह


स्मिता और मेहुल जैसे भी बैठक में पहुंचे सब उठ खड़े हुए. सबसे पहले महक दौड़कर अपने भाई के गले लग गई. “भैया, आई एम सो हैप्पी.” उसके मेहुल के गाल पर एक चुम्बन लिया और फिर उसके गले लगी.

उसने कुछ देर में उसे छोड़ा तो मोहन ने उसे गले लगाया. “आई एम हैप्पी फॉर यू ब्रो। वेलकम टू योर न्यू लाइफ.”

फिर विक्रम ने भी इसी सन्देश के साथ उसे गले लगाया. अंत में श्रेया महक के समान उसके गले से लगी और उसके गाल को चूमकर बोली, “क्यों देवर जी, मेरा नंबर कब आएगा?” मेहुल ने झेंपने का स्वांग किया.

मेहुल: “मैं क्या जानूँ भाभी आप ही बताना.”

श्रेया: “मम्मीजी खुश तो हो गयीं न?”

मेहुल: “मैं क्या जानूँ आप उनसे ही पूछो.”

“ए देवर भाभी, एक दूसरे को छोड़ो और चलो नाश्ता करो. बहुत देर हो रही है.” विक्रम ने कहा.

नाश्ता करने के बाद सब अपने काम पर निकल पड़े और मेहुल कॉलेज के लिए. अब श्रेया और स्मिता अकेली ही थीं. कुछ समय किचन इत्यादि का काम करने के बाद श्रेया स्मिता के पास आकर बैठ गयी.

“कैसा रहा माँ जी?”

स्मिता बताना तो सच चाहती थी पर उसे मेहुल की बात याद थी.

“ठीक ही था. अभी और सिखाना पड़ेगा. सुजाता ही आगे की शिक्षा देगी तो ठीक रहेगा. मुझसे बहुत शर्मा रहा था.”

ये सुनकर श्रेया को अपनी माँ पर बहुत गर्व हुआ. उसने ये न समझते हुए कि ऐसा करना सही है या नहीं तुरंत सुजाता को फोन लगा लिया. स्मिता भीतर से तिलमिला उठी. वो तो अच्छा हुआ कि सुजाता ने फोन नहीं उठाया नहीं तो वो अवश्य ही कुछ कर बैठती. कुछ देर में श्रेया ने कहा कि वो नहा कर आती है और फिर खाना बनाएगी. स्मिता टीवी पर अपना कोई सीरियल देखने लगी. अभी श्रेया नहा कर निकली ही थी कि उसकी माँ का फोन आ गया.

सुजाता: “हेलो श्रेया, फोन किया था.”

श्रेया: “हाँ मॉम, मैंने मम्मीजी से पूछा कि कल मेहुल के साथ कैसा रहा. तो कह रही थीं कि उसे सीखना पड़ेगा. फिर कहने लगीं कि उनसे तो मेहुल शर्मा रहा था, इसीलिए आप सिखाएंगी तो अच्छा रहेगा.”

सुजाता: “सिखाऊंगी उसे. अभी भी एक लौंडा ट्रेनिंग पर है. अपनी चूत और गांड चाटना पहले सिखाऊंगी. ऐसे सीधे लड़के को तो मैं अपना दास बनाकर रहूंगी, जैसा इसे बना लिया है. हो सका तो विवेक से चुदवाकर उससे सफाई कराऊँगी.”

श्रेया: “मॉम, ऐसा कुछ मत करना जिससे मुझे इस घर में कठिनाई हो जाये. अभी कौन है तुम्हारी ट्रेनिंग में?”

सुजाता: “तू चिंता न कर, ये सब अभी नहीं, एक बार मेरे सांचे में उतर गया तब. ये अपनी शीतल का बेटा है, केशव। शीतल ने भेजा है सीखने के लिए.”

श्रेया: “माँ, फोन मत काटना, जरा मैं सुनूँ तो कैसे ट्रैन करती हो.”

सुजाता हँसते हुए: “अच्छा मैं फोन रख रही हूँ.”

ये कहकर सुजाता ने फोन एक ओर रख दिया पर बंद नहीं किया. अब श्रेया को साफ सुनाई दे रहा था.

सुजाता: “हाँ बेटा, ऐसे ही चाटते है, अच्छे से खोल मेरी गांड। हाँ अब अपनी जीभ अंदर कर.”

केशव: “आंटी, ये गन्दा है.”

सुजाता: “भोसड़ी वाले, तेरी माँ की चूत नहीं चाटता है क्या?

केशव: “चाटता हूँ.”

सुजाता: “और गांड?”

केशव: “नहीं.”

सुजाता: “तभी तेरी माँ तुझे अच्छा मादरचोद नहीं बना पाई और सिखाने के लिए इधर भेज दिया. अब नखरे मत कर और डाल अपनी जीभ अंदर और अच्छे से चाट, नहीं तो….”

अब श्रेया के फोन रख दिया, उसके भी मन में भी चुदाई की इच्छा उठ गई थी. उसने हल्का सा गाउन पहना और बैठक में चली गई.

श्रेया स्मिता के पास जा बैठी. “मम्मी का फोन आया था. मैंने बताई आपकी बात. कह रही थीं कि उन्हें मेहुल भैया को सिखाने में ख़ुशी ही होगी.” बड़ी सफाई से उसने पूरी बात छुपा ली.

स्मिता सीधे देखते हुए बोली, “हाँ, वही सही सिखाएगी, सही सही.” स्मिता ने एक कुटिल मुस्कान के साथ कहा.

श्रेया: “मम्मीजी, अभी आप कुछ कर रही हैं क्या?”

स्मिता समझ गई. “क्यों, तेरी चूत में खुजली हो रही है क्या?”

श्रेया: “जी, आप तो समझती ही हैं.”

स्मिता: “जा, मेरी अलमारी से डिल्डो लेकर आजा, दोनों एक दूसरे को मजा देते हैं.”

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सुजाता का घर:

आज मेहुल और स्मिता घर आने वाले थे. सुजाता ने स्वयं को बना संवार कर बहुत भड़काऊ कपड़े पहने हुए थे. उसने अपनी झांटे और बगल को आज ही फिर से साफ किया था. घर में उसके सिवाय कोई और नहीं था. इस समय उसकी चूत बिल्कुल चिकनी थी. उसकी चूत आने वाले आनंद के अंदेशे में पानी छोड़ रही थी. इतने में ही घंटी बजी. सुजाता ने लपक कर दरवाजा खोला तो पाया कि स्मिता और मेहुल ही हैं. उसने स्मिता को गले लगाया और उसके गाल पर चुम्बन लिया. इसके बाद उसने मेहुल को भी गले लगाया.

सुजाता: “आओ, आओ. मैं तुम्हारी ही राह देख रही थी.”

स्मिता: “क्या हमें आने में देर हो गई?”

सुजाता: “नहीं, नहीं. मैं ही कुछ उत्सुक हो रही थी. आज एक नया लौड़ा जो मिलने वाला है.”

स्मिता: “श्रेया तो बता रही थी कि तुम आजकल केशव को ट्रैन कर रही हो.”

सुजाता: “हाँ, पर उसकी बात और है. मेहुल तो अपने घर का बेटा है. इसे तो मैं ऐसा प्यार करना सिखाऊंगी कि ये सबसे तेज चुड़क्कड़ बनेगा नए लड़कों में से.”

स्मिता: “वैसे तुम्हारे इस ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट से कितने चुड़क्कड़ निकले हैं.”

सुजाता गर्व से: “मैंने गिनना छोड़ दिया है. अरे अंदर तो आओ।”

सब अंदर चले आते हैं और बैठक में बैठ जाते हैं. स्मिता अपने रोल के अनुसार सुजाता को बताती है कि मेहुल का पारिवारिक सम्भोग में उद्घाटन तो हो चुका है, पर उसके शर्मीले स्वभाव के कारण स्मिता उसे कुछ सीखा नहीं पाती है.

“इसीलिए मैंने सोचा कि तुमसे अच्छा और कौन होगा जो ये शुभ कार्य करे. अपने ही घर में जब इतनी अनुभवी शिक्षिका है तो बाहर क्यों जाना. और अगले महीने इसे समुदाय में भी सम्मिलित जो होना है. कहीं हंसी न उड़े इसकी.”

सुजाता उठकर मेहुल के पास बैठी और उसके गाल पर हाथ फिराते हुए बोली: “मेरे ऊपर से निकला कोई भी हंसी का पात्र नहीं बनता.”

स्मिता: “पर मेहुल ने एक शर्त रखी है. अगर वो मानोगी तभी वो आगे बढ़ेगा अन्यथा मेरे साथ लौट जायेगा.”

सुजाता: “कैसी शर्त?”

स्मिता: “ये कि जब तक ये घर की अन्य स्त्रियों के साथ चुदाई नहीं कर लेता, तुम इसके प्रदर्शन के बारे में किसी से भी नहीं बोलोगी. अन्यथा हमारे संबंधों में टूटने की भी स्थिति आ सकती है.”

सुजाता समझी कि मेहुल बहुत कमजोर होगा और संभवतः उसका लंड भी छोटा होगा इसीलिए ऐसी शर्त रखी है. उसने बिना झिझक के इसे स्वीकार कर लिया.

इस बार स्मिता ने कठोर शब्दों में कहा: “किसी से नहीं अर्थात किसी से भी नहीं. अगर हमें पता चला कि तुमने इसका उल्लंघन किया है तो श्रेया को इस घर से नाता हमेशा के लिए तोड़ना होगा या हमारे घर से.”

सुजाता समझ गई कि स्मिता बहुत गंभीर है, क्योंकि इस स्वर में उसने कभी भी उससे बात नहीं की थी. सुजाता ने फिर विश्वास दिलाया कि उसे अपने वचन को तोड़ने का कोई भी अभिप्राय नहीं है. जब स्मिता जान गई कि मछली जाल में फंस चुकी है तो उसने बाथरूम जाने के लिए कहा.

स्मिता: “अगर तुम्हे कोई आपत्ति न हो तो मैं उस कमरे में जाकर देखना चाहती हूँ कि सब ठीक है.”

सुजाता ने कहा कि वो उसके कमरे में चली जाये. स्मिता ने उस कमरे में जाकर अच्छा सा स्थान देखकर दो कैमरे लगा दिए और उनकी वीडियो रिकॉर्डिंग चालू कर दी. दोनों ८ घंटे तक रिकॉर्ड कर सकते थे. फिर उसने अन्य कैमरे की तलाश की और उसे एक कैमरा मिल गया. मेहुल के बताये अनुसार उसने उस कैमरे की बैटरी निकली और कैमरे के पीछे रख दी. फिर वो बाथरूम में गई और मुंह धोकर बाहर आ गई. उसने मेहुल को अंगूठे से संकेत दिया कि काम पूरा हो गया है.

स्मिता: “सुजाता, अब मैं जाना चाहूंगी. अपने बेटे को तुम्हे सौंप कर जा रही हूँ. इसका ध्यान रखना. अरे मेहुल जरा सुनो तो.”

मेहुल उसके पास गया तो स्मिता ने उसे तीनों कैमरे के स्थान बता दिए. इसके बाद उसने दरवाजा खोला और सहर्ष अपने घर की ओर चल पड़ी.

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सुजाता इस समय फूली नहीं समा रही थी. उसके वश में आने वाला ये चौथा लड़का होगा. और इसे वश में करने में उसे सबसे अधिक आनंद भी आएगा और गर्व भी होगा. उसे इस बात से कोई संकोच नहीं था कि वो उसकी बेटी का देवर है. मेहुल भी कुछ कुछ उसका स्वभाव समझ चुका था. वहीँ उसकी माँ ने उसे न भूलने वाला सबक सीखने का भी आदेश दिया था. और उसने अपनी माँ के अपमान का बदला तो लेना ही था. पर इससे पहले उसे कुछ और भी जानना था. और अभी.

“आंटी जी, एक बात तो बताइये, प्लीज.” उसने सकुचाने का स्वांग किया.

“पूछो”

“ये स्नेहा मेरे बारे में क्या सोचती है?” अगर सुजाता ने सच कहना था तो यही समय था. उसको चोदने के बाद उससे सच की अपेक्षा नहीं थी. और सुजाता अपने अभिमान में कि वो मेहुल को अपना दास बनाएगी, सच कह बैठी. उसने ये सोचा कि लड़के को झटका देने का यही सही समय है.

सुजाता: “वो तुमसे बहुत चिढ़ती है. अब तुम हो ही ऐसे दब्बू और डरपोक. कोई भी तुम्हारा सम्मान क्यों करेगा. वो तो श्रेया न हो तो तुम्हें अच्छे से पाठ पढ़ाये. अरे भोंदू, लड़की को लड़के में दम दिखना चाहिए. जो तू कुत्ते के समान उसके पीछे लार गिराता घूमता है, ये जान ले वो कभी तुझे घास नहीं डालने वाली.”

तो ये थी सच्चाई. अब एक प्रश्न और था.

“और श्रेया भाभी?”

“वो तो तुझे बहुत चाहती है. जब तेरा इस सब में सम्मिलित होने का निर्णय हुआ, तो मुझे बोली थीं कि माँ देखना मैं मेहुल भैया को ऐसा तेज बनाऊंगी कि सब दंग रह जायेंगे. तुझ पर जान छिड़कती है.”

“हम्म्म, चलो अब सब कुछ साफ हो गया.” मेहुल ने मन में सोचा.

सुजाता: “और कुछ पूछना है या तेरी ट्रेनिंग शुरू करें?”

मेहुल: “यहाँ?

सुजाता: “अरे भोंदू, यहाँ नहीं, मेरे कमरे में.”

मेहुल अपने लिए निकले अपशब्दों को खून का घूँट पी कर सह रहा था. उसने अपनी माँ के साथ अपने अपमान का भी बदला लेना था.

उधर अविरल का मन अपने ऑफिस में बहुत बेचैन था. उसे डर था कि कुछ अनहोनी घटने को है. उसने अपना फोन निकला और सुजाता को कॉल किया. सुजाता ने फोन पर अविरल का नाम देखा और उसे उत्तर नहीं दिया. बल्कि उसने मेहुल को अपने पीछे आने का आदेश दिया. दोनों सुजाता के कमरे में चले गए और सुजाता के फोन ने भी बजना बंद कर दिया. सुजाता ने कमरा बंद किया.

सुजाता और मेहुल दोनों एक दूसरे को शिकार के रूप में ताक रहे थे. अब इसमें से एक ही की जीत निश्चित थी, और वो अभी भी भीगी बिल्ली ही बना हुआ था. बंद कमरे में सुजाता एक सिंगल सोफे पर महारानी के समान जाकर बैठ गयी.

सुजाता: “मेहुल, तुमने तो सुन ही लिया है कि मैंने कई लड़कों को चुदाई की विद्या सिखाई है. मैं तुम्हें भी वही ज्ञान दूंगी. पर उसके लिए तुम्हें शिक्षण समाप्त न होने तक मेरे दास की तरह रहना होगा. उसके बाद तुम स्वतंत्र हो जाओगे.”

मेहुल: “इसमें समय कितना लगेगा?

सुजाता: “तीन महीने.”

मेहुल: “या जब तक मैं सीख न जाऊं.”

दोनों ने इसका अर्थ अलग समझा. सुजाता समझी कि मेहुल अधिक समय लेगा, जबकि मेहुल आज ही सुजाता का मालिक बनने के लिए आतुर था.

मेहुल: “आंटीजी, क्या मैं आपसे एक अनुरोध कर सकता हूँ”

सुजाता: “बोलो.”

मेहुल: “मुझे काजल लगाए हुए महिलाएं बहुत भाती है, तो क्या आप भी लगा सकती हो.”

सुजाता: “हाँ, लगा लेती हूँ.”

सुजाता अपनी ड्रेसिंग टेबल पर गयी और काजल लगाकर लौट आयी.

मेहुल: “आप बहुत सुंदर लग रही हो, एकदम अप्सरा जैसी. अब बताइये क्या करना है. ”

सुजाता: “इसके लिए तुम्हें सबसे पहले मेरे पैरों में स्थान लेना है, और मेरे दोनों पैरों को तलवे सहित पूरा चाटकर साफ करना है. उसके बाद मैं अगला चरण बताऊंगी.” ये कहकर सुजाता ने अपने सुंदर पैर आगे बढ़ा दिए.

मेहुल उन्हें देखकर उनकी सुंदरता पर लट्टू हो गया. पर मेहुल के लिए ये कुछ नया नहीं था. उसकी अनगिनत प्रशिक्षिकाओं में से एक ने उसे इस कला में भी निपुण किया था. और आज उस कला को एक नए साथी पर आजमाने का समय था. मेहुल ने एक पांव उठाकर उसके अंगूठे को चूसना शुरू किया और क्रमशः उसने उस पूरे पांव को अपने थूक से गीला करके चाट और चूस कर साफ किया. यही क्रिया उसने दूसरे पैर के साथ भी की. सुजाता जहाँ उसे डांट कर, गाली देकर अपनी श्रेष्ठता दिखाना चाहती थी, वासना की लहरों में बहने लगी. इस लड़के में दासता के सब गुण हैं, ये सोचकर उसने अब अगले चरण में जाने का निश्चय किया.

सुजाता: “अगला चरण होता है, औरत की चूत और गांड को चाटना। चूत चाटना तो बहुत लोग कर लेते हैं, पर गांड चाटने में कुछ ही निपुण हो पाते हैं.”

मेहुल: “पर आंटी जी, मेरे लंड का नंबर कब आएगा?”

सुजाता उसकी ओर उलाहना भरी दृष्टि से देखकर: “आज तो मैं तेरे लंड को केवल हाथ से झड़ा दूंगी. शेष समय तुझे बस मेरी गांड और चूत ही चाटना है आज. अगली बार, हुआ तो तेरे लंड को चूस दूंगी. ये मत भूल कि तू मेरा दास है. मैं जो कहूँगी, वही होगा.”

मेहुल डरने का अभिनय करते हुए: “जी आंटी।”

सुजाता: “और अब तू मेरे कपड़े निकाल और उन्हें अच्छे से संभाल कर वहां पर रख.”

ये कहकर सुजाता खड़ी हुई और एक मादक सी अंगड़ाई ली. मेहुल ने पास जाकर उसके नाममात्र के वस्त्रों को उसके सुन्दर मखमली शरीर से अलग किया और संभालकर बताये हुए स्थान पर रख दिया. ये करते हुए उसने एक पैनी दृष्टि से उन स्थानों का अवलोकन किया जहाँ पर उसके कैमरे थे. उसने पाया कि वे पूरा विवरण अच्छे से रिकॉर्ड कर रहे हैं. उसने ये भी तय कर लिया कि उसे किस कोण से सुजाता के अभिमान को तोडना है.

सुजाता इस बार बड़े सोफे पर बैठी और अपने पांव फैला लिए. उसकी चिकनी सपाट चूत बहुत ही लुभावनी लग रही थी. मेहुल ने निश्चय किया कि जब वो अपने कर्मकांड से निपटेगा तब इसकी सुंदरता ऐसी नहीं रह पायेगी. और फिर आंख सुजाता की गांड पर पड़ी. उस संकरी गली में लगता था बहुत राही नहीं गए थे. या अपनी छाप नहीं छोड़ पाए थे. इतनी चुड़क्कड़ औरत की गांड की कसावट देखकर उसे आश्चर्य हुआ और उसने निश्चय किया कि आज ही वो उसके भी बल निकाल देगा. अभी १२ भी नहीं बजे थे और उसके पास ५ घंटे थे. पर अभी उसने इस दासता और सिधाई का मुखौटा कुछ देर और लगाकर रखना था.

बस कुछ और देर….

मेहुल: “आंटीजी, क्या मैं भी अपने कुछ कपड़े निकल लूँ, बैठने में कठिनाई हो रही है.”

सुजाता: “ठीक है, पूरे मत निकाल देना. बनियान और अंडरवियर पहने रखना।”

मेहुल: “जी, आंटीजी.”

मेहुल ने अपने कपड़े एक ओर रखे और सुजाता की जांघों के बीच स्थान ले लिया. उसका असली चमत्कार अब आरम्भ करने वाला था. सुजाता उसकी जीभ और उँगलियों की कला से अवगत होने वाली थी. ये सम्भव था कि उसे समझ आ जाये कि वो उतना नौसिखिया नहीं है जितना उसने सोचा था. पर ये खतरा तो उठाना आवश्यक ही था. मेहुल ने सुजाता की जांघें कुछ और फैलायीं और एक गहरी साँस में चूत की पहली सुगंध भर ली. फिर उसने जीभ से उसकी चूत की फांकों को चाटना शुरू किया.

सुजाता ने मेहुल के इस कदम पर एक आह भरी और अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया वो देखना चाहती थी कि इस लड़के में कितना दम है. मेहुल ने चूत के बाहरी हिस्से को अच्छे से चाटकर सुजाता की चूत का मुंह खोला और उस पर फूंक मारी। सुजाता को एक नयी ही अनुभूति हुई. और इससे पहले कि वो कुछ कहती मेहुल की जीभ ने अपना रास्ता खोजकर अंदर प्रवेश कर लिया था और वो अपनी जीभ से अंदर की परतों को चाट कर छेड़ रहा था. उसकी चूत चाटने की कला नयी तो नहीं थी, पर विकसित अवश्य थी. सुजाता की चूत भी इस नए आगंतुक का स्वागत अपने बहाव से कर रही थी. बहती चूत से मेहुल बिलकुल भी विमुख नहीं हुआ, अपितु उसने अपनी पहुंच और भी अंदर तक बढ़ा ली.

अब मेहुल ने अपने गियर बदले. अगर सुजाता उसके लंड से साक्षात्कार नहीं करेगी, तो सारा बना बनाया प्लान चौपट हो जायेगा. और इसके लिए आवश्यक था उसे एक ऐसे शीर्ष पर ले जाना किसके लिए वो मेहुल को कुछ प्रोत्साहन दे और उसके लंड का दर्शन करे. मेहुल ने अपनी दो उँगलियों को सुजाता की बहती चूत में डुबाया और फिर उसके नितम्बों के नीचे हाथ करते हुए उसकी गांड के छेद को खुजाने लगा. सुजाता फिर एक नयी ऊंचाई की ओर उड़ चली. जब मेहुल ने ऊँगली के पानी को गांड के छेद पर मल दिया तो उसने दोबारा चूत के पानी से उसे भिगोया. और इस बार गांड में छोटी ऊँगली प्रविष्ट कर दी.

सुजाता उछल पड़ी. उसकी चूत भी नयी धाराएं छोड़ने को तत्पर थी, कि मेहुल ने अपने होंठों के बीच सुजाता के भग्नाशे को लिया और जोर से मसल दिया. अगर चूत का कोई प्रतिरोध था भी, तो वो समाप्त हो गया. सुजाता का निचला शरीर एक फुट से अधिक ऊपर उछला. पर मेहुल इस प्रतिक्रिया के लिए तैयार था और उसने अपने लक्ष्य से न जीभ हटाई, न उँगलियाँ. बल्कि गांड की ऊँगली सुजाता के नीचे की ओर गिरते ही पूरी अंदर चली गई. इस बार मेहुल ने चूत के अंदर जीभ को सरपट दौड़ते हुए भग्नाशे को दाँतों से दबा दिया. सुजाता चीख पड़ी और संभवतः कुछ सेकण्ड के लिए अचेत हो गई. उसकी चूत नदी के समान बहे जा रही थी और मेहुल उस जल से अपनी प्यास बुझा रहा था. जब सुजाता सचेत हुई तो मेहुल ने अपनी ऊँगली गांड से निकाली और भग्नाशे को चूमकर चूत के चारों ओर चाटकर साफ कर दिया.

मेहुल: “आंटीजी, मैंने ठीक तो किया न?”

सुजाता: “अरे दुष्ट, बहुत अच्छा किया. किसने सिखाया तुझे? बहुत ही अच्छा मजा आया.”

मेहुल: “आंटीजी, बस ब्लू फिल्मों से ही सीखा है. आंटीजी, अगर अच्छा हुआ है तो अपने विद्यार्थी को कुछ पुरुस्कार दीजिये.”

सुजाता कुछ सोचकर: “सच में तुझे कुछ तो मिलना ही चाहिए. वैसे भी मैं तेरे लंड की मुठ मरने वाली तो हूँ ही. आज उतना ही करूंगी, पर अगली बार चूस भी दूंगी. और अभी तुझे मुझे अपनी गांड भी चटवानी है.”

मेहुल: “आंटीजी, आप जब बोलेंगी, मैं आपकी गांड चाट दूंगा. अभी आप मुझे मेरा पुरुस्कार दे दीजिये, बहुत दर्द हो रहा है.”

सुजाता: “ठीक है. अभी अपने पास समय भी है. चल अपने बाकी कपड़े निकाल। तेरी मुठ मार देती हूँ.”

मेहुल ने पहले बनियान और फिर अंडरवियर उतार फेंका. इसके साथ ही उसका विकराल लौड़ा सुजाता के चेहरे के सामने लहरा उठा. सुजाता की ऑंखें फट गयीं. और मेहुल ने अपना मुखौटा उतार फेंका. अब वो कामदानव का मिश्रित रूप ले चुका था. बस कुछ ही समय में सुजाता इसकी निर्ममता का उदाहरण देखने वाली थी. उसके बचने का एक ही उपाय था. और मेहुल उसे वो उपाय न करने देने के लिए कटिबद्ध था.

सुजाता: “इतना बड़ा लंड है तेरा.”

मेहुल: “जी आंटीजी. क्यों आपको अच्छा नहीं लगा?”

सुजाता: “नहीं नहीं. ऐसा नहीं है. और तूने स्मिता की चुदाई भी की थी इससे?”

मेहुल: “जी आंटीजी. पर मम्मी को तो अच्छा लगा था.”

ये सुजाता के अभिमान पर चोट थी.

सुजाता: “मेरे विचार से जब मैं इससे चुदूँगी तब मुझे भी मजा ही आएगा. पर चल अभी मैं इसे मुठ मार देती हूँ.”

मेहुल: “जैसा आप चाहो. मैं तो आपका दास हूँ. पर मम्मी ने तो मुंह में भी लिया था. आप शायद न ले पाओ .....”

मेहुल ने अपना अंतिम अस्त्र छोड़ा. अगर सुजाता इसे मुंह में ले ली तो आज उसका अवस्था दया करने वाली होने वाली थी. पर जैसा कहा गया है, “विनाश काले, विपरीत बुद्धि.” तो सुजाता ने भी इस चुनौती को स्वीकार कर लिया.

सुजाता: “मेरे विचार से स्मिता को कठिनाई हुई होगी. पर चल मैं थोड़ा चूस ही देती हूँ. तू भी क्या याद रखेगा.” सुजाता हार मानने को तैयार नहीं थी. और ये सुनकर मेहुल की आँखों का रंग बदल गया. उसके अंदर का राक्षस पूर्ण रूप से जग गया. बस …

और सुजाता ने मेहुल के लंड को अपने मुंह में डाला और बाहरी रूप से पुचकारने लगी. उसने जैसे ही लंड को थोड़ा सा अंदर लिया, मेहुल ने अपने पत्ते खोल दिए. अपमान का बदला लेने का समय आ चुका था और शिकार उसके जाल में स्वयं फंस गया था. उसने सुजाता के सिर के पीछे हाथ रखा. सुजाता ने अपनी ऑंखें ऊपर करके इसका अभिप्राय समझना चाहा. उसकी ऑंखें मेहुल से मिलीं और उसने उन आँखों में जो देखा उससे उसका अस्तित्व हिल गया. उसने लंड को मुंह से निकालने का प्रयास किया. पर मेहुल की शक्तिशाली पकड़ उसके आगे बहुत अधिक थी. मेहुल ने एक कुटिल मुस्कान के साथ उसे देखा.

मेहुल: “आंआंआंआंआंआंटी जी…” और इसी के साथ एक झटके के साथ अपने हाथ से सुजाता का सिर अपने लंड की ओर खींचा और अपनी कमर के झटके से अपने लंड को सुजाता के मुंह में पेल दिया. लंड गले से भी आगे तक उतर गया और सुजाता साँस न ले सकने के कारण छटपटाने लगी. उसकी आँखों से आंसू निकल आये.

मेहुल ने लंड को गले तक दबाकर रखते हुए १० तक गिनती गिनी और फिर लंड को बाहर निकाल लिया जिससे कि सुजाता साँस ले पाए. सुजाता के चेहरे पर अब आंसुओं से मिलकर काजल बह रहा था. मेहुल ने उसे साँस सँभालने का समय दिया और फिर अपने लंड को उसके मुंह में डालने लगा. सुजाता ने डर से मुंह खोल दिया और मेहुल ने वही प्रक्रिया अपनायी.

मेहुल: “आंआंआंआंआंआंटी जी, आन.. टी…जी. आपका दास आपकी सेवा में लगा है आंटी जी.” लंड बाहर निकालकर फिर वही क्रम २ बार और दोहराया. उसके बाद मेहुल ने अपना लंड बाहर निकला और सुजाता के मुंह पर उसे मारने लगा. सुजाता इस समय कोई उत्तर देने की स्थिति में नहीं थी. मेहुल ये समझता था और उसने सुजाता के लिए ही उत्तर दे दिया.

मेहुल: “आंटीजी, आपका कुछ न कहना ही आपकी सहमति है. और क्या है न आपका ये दास अब आपकी चूत की सेवा करने की आज्ञा मांग रहा है. तो बिस्तर पर ही चलते है.” मेहुल ने अपना हाथ सुजाता के सिर से हटाया ही नहीं था.

और इस बार उसने सुजाता को बालों से पकड़ा और बिस्तर की ओर धीमी गति से चल पड़ा. सुजाता को समय से होश आ गया और वो बालों को बचाने के लिए अपने हाथ और पांवो के बल मेहुल के पीछे कुतिया के जैसे चल पड़ी. मेहुल बाल खींच नहीं रहा था, पर सुजाता को डर था कि अगर उसने नानुकुर की तो ये भी संभव है.

बिस्तर के पास जाने के बाद मेहुल खड़ा हो गया और मुड़कर सुजाता की आँखों में देखकर बोला: “आंटीजी, जाकर थोड़ा वेसलीन या कोई अन्य जैल ले आईये. अगर नहीं है तो जो भी तेल आप लगाती हैं उसे ले आइये. मुझे पता नहीं है कहाँ रखा है, नहीं तो ये दास आपको ऐसा कष्ट नहीं देता.”

सुजाता लड़खड़ाते हुए उठी और वेसलीन क्रीम ले आयी.

मेहुल: “अब थोड़ा इस लौड़े को चूस लीजिये और इस पर ये क्रीम लगा दीजिये.”

सुजाता ने उसके लंड को जितना संभव हो सका चूसा और क्रीम से लथपथ कर दिया. ये सोचकर कि इस क्रीम उसकी चूत की धज्जियाँ उड़ने से बचा सकेगी.

मेहुल: “आप बहुत अच्छी मालकिन हैं, आंटीजी. चलिए अब बिस्तर पर लेट जाइये. जो आप अगले दिनों के लिए सोच रखी थीं, उस कार्यक्रम को क्यों न आज ही कर लें जिससे आप मेरी क्षमता को देख सकें और मेरे प्रशिक्षण में किन बिंदुओं पर ध्यान देना हो उसे आप गहराई से नाप सकें.”

सुजाता ने अब स्वयं को अपने भाग्य के हाथों सौंप दिया था. उसकी आँखों से आंसू बहकर काजल को भी उसके चेहरे पर बहा रहे थे. वो अपने पति और बच्चों को याद करते हुए बिस्तर पर लेट गई. मेहुल ने उसकी दशा को समझ लिया पर अब रुकना सम्भव नहीं था. सुजाता को उसका स्थान दिखाना आवश्यक था. उसने सुजाता के दोनों पांव चौड़े किये और क्रीम की शीशी से उसकी चूत में क्रीम डालकर दो उँगलियों से उसे चारों ओर मल दिया. जब उसने पाया कि सुजाता की चूत उपयुक्त रूप से चिकनी हो गई है तो उसने उसकी जांघों के बीच स्थान लिया.

“आंटीजी, आपने मुझे सेवा का अवसर प्रदान किया, इसीलिए आपका ये दास आपकी आज हर तरह से और हर छेद में सेवा अर्पण करेगा.”

कहते हुए मेहुल ने अपने लंड को सुजाता की चूत पर रखा और बहुत ही संयम के साथ दबाव बनाने लगा. पहले उसके टोपे ने लक्ष्य भेदा और फिर उसके पीछे शेष लंड आगे बढ़ने लगा. कोई पांच से छः इंच अंदर जाने के बाद मेहुल ठहर गया. सुजाता ने भी गहरी साँस ली. अभी तक सब सामान्य था. सम्भव है कि अब ये ठीक से ही चोदे. वैसे लौड़ा है भी काफी चौड़ा, मेरी चूत फैला दी इसने. उसके चेहरे पर संतुष्टि के भाव आ गए. काजल की कालिख से पुते चेहरे के होते हुए भी मेहुल ने इन्हें पढ़ लिया.

“आंटीजी, आपने मेरी मम्मी का अपमान करके बड़ी गलती की. क्या है न आप मुझे कुछ भी कहो, मुझे कोई अंतर नहीं पड़ता. पर मम्मी का ये अपमान, मैं सहन नहीं कर सकता.”

“मुझे क्षमा कर दे, बेटा. मैं स्मिता से भी क्षमा मांगूगी. मैं आत्म-मुग्ध होकर अपने नशे में इतनी खो गई थी कि अपने पराये का भी ध्यान नहीं रखा.”

मेहुल अब अपने लंड को बहुत धीमी गति से चूत में आगे पीछे चला रहा था.

“आपका नशा इतना था कि आप अपनी बेटी के देवर को दास बनाना चाहती थीं. आपने स्नेहा को कभी ये नहीं समझाया कि उसकी सोच सही नहीं है. आंटीजी, ऐसे नशे को सदैव के लिये उतारना आवश्यक है.”

ये कहकर मेहुल ने टोपे को अंदर रखकर शेष लौड़े को बाहर खींचा, उसने सुजाता के दोनों मम्मों को हाथ में लिया और जोर से भींचते हुए एक लम्बा करारा धक्का मारा. कमरा सुजाता की चीख से सहम गया. सुजाता तड़प रही थी और अपने हाथ पांव हर ओर फेंक रही थी. मेहुल उसके मम्मों को बेदर्दी से मसले जा रहा था.

मेहुल: “दासी मैं बनाता हूँ आंटीजी, दास नहीं बनता हूँ.”

सुजाता की आँखों के आगे तारे नाच रहे थे. उसे लग रहा था कि किसी ने उसकी चूत के न जाने कितने भाग कर दिए है. ऐसा दर्द तो उसे अपनी पहली चुदाई में भी नहीं हुआ था. ये तो अच्छा था कि अब मेहुल रुका हुआ था और उसकी चूत को अभ्यस्त होने दे रहा था. कुछ समय के बाद सुजाता की आँखों के आंसू सूख गए और काजल की कालिख ने उसके सुंदर चेहरे पर एक अजीब सा चित्र बना दिया था. उसने दयनीय दृष्टि से मेहुल को देखा.

सुजाता: “मुझे क्षमा कर दो, बेटा। मुझ पर दया करो. मेरे बच्चे क्या करेंगे मेरे बिना. मैं मर गयी तो तुम्हें भी जेल हो जाएगी. मुझे मत मार.”

मेहुल: “अरे रे रे रे, आंटीजी, मेरी मालकिन होकर आप ऐसे बोल रही हैं. ऐसे कैसे चलेगा.”

जब मेहुल ने भांप लिया कि सुजाता की पीड़ा कम हो रही है, इसीलिए वो इतना कुछ बोल पा रही है तो उसने अपने लंड को सुजाता की फटी पड़ी चूत में चलना शुरू किया. पहले उसने बहुत ही धीमी गति रखी. जब उसे लगा कि चूत ने अपने रस से रास्ते को सरल बना दिया है, तो उसने गति बढ़ा दी. चूत के पानी छोड़ने से सुजाता को भी अब पीड़ा में कमी लग रही थी और उसके अंतरंग भागों में एक अनजानी सी अनुभूति हो रही थी. एक मीठी कसक जो उसने पहले कभी अनुभव नहीं की थी. संभवतः ये मेहुल के विकराल लौड़े की पहुँच ही थी जिसने उसके अनछुए हिस्सों को भी सहला दिया था.

सुजाता के चेहरे आते आनंद और पीड़ा की भावों को मेहुल पढ़ने में सक्षम था. उसने अपनी गति को बढ़ाया और अब वो लौटकर दुर्दांत चुदाई में जुट गया. सुजाता एक गुड़िया के समान उसके इन भीषण आक्रमण को झेल रही थी. उसके चूत को जिस प्रकार मथा जा रहा था वो उसकी कल्पना के परे था और उसे अब इसमें आनंद आने लगा था. अचानक उसकी ऑंखें कामोतकर्ष की अधिकता से बंद हो गयीं. उसे पता भी नहीं चला कि वो चिल्ला रही है.

“मार ले मेरी चूत, फाड़ डाल इसे. बहुत सताती है. आज इसकी प्यास मिटा दे. बस और नहीं सह सकती. चोद डाल मुझे. मैं तेरी दासी बन गयी. सौ लोगों के सामने तेरा लंड चूसूंगी. सूसू पियूँगी तेरा. जो तू कहेगा सो करुँगी. बस मुझे चोदना बंद मत करना. मरते दम तक मुझे चोदना।”

मेहुल भी सुजाता के इस आत्मसमर्पण से खुश हो गया. वो यही सुनने के लिए आतुर था.

“आंटीजी, तो आप मेरी दासी बनने के लिए उत्सुक हो.”

“हाँ बेटा। मैं तो तेरी दासी हो गई और स्नेहा को भी बनवा दूंगी. मेरे मालिक को बुरा भला कहती है. तू मेरा मालिक पहले है और वो मेरी बेटी बाद में. चोद दे मुझे. बस चोदते रह.”

अब सुजाता की चूत से इतना पानी बहे जा रहा था कि वो बीच बीच में झड़ते हुए कुछ सेकंड के लिए अचेत हो जाती थी. फिर सचेत में आते ही फिर बड़बड़ाने लगती. उसका मानसिक संतुलन मानो खो गया हो. शरीर की भूख ने उसकी बुद्धि हर ली थी. पर इस बार जब वो झड़कर बेहोश हुई तो उसका शरीर कांपते हुए जैसे एक तंद्रा में चला गया. वो इस अवस्था में कोई दो से तीन मिनट तक रही. और फिर उसका शरीर ढीला पड़ गया. मेहुल ने उसकी इस अवस्था को समझा और अपने लंड को उसकी चूत से बाहर निकाल लिया. वो अभी भी नहीं झड़ पाया था. वो उठकर खड़ा हुआ और अपने द्वारा किये हुए संहार का अवलोकन करने लगा. सुजाता का पूरा शरीर लाल हो चुका था. हमेशा अत्यंत सुंदर लगने वाली वो स्त्री इस समय एक अश्लील लग रही थी. उसकी फटी हुई चूत अभी भी अपना रस बहा रही थी.

मेहुल ने उठकर अपना फोन उठाया और सुजाता के इस अवस्था में कई चित्र लिए. सुजाता ने आंख खोली और उसकी ओर देखकर मुस्कुराई. और चित्र लिए गए. फिर मेहुल ने वीडियो ऑन किया और पूरे शरीर का एक एक हिस्सा फिल्माया, विशेषकर चूत जो अभी भी अपने सामान्य आकार में नहीं आयी थी. सुजाता ने अपनी उँगलियाँ अपनी चूत पर लगायीं तो उसकी ऑंखें फ़ैल गयीं. फिर उसने बहते हुए रस को लिया और अपने चेहरे पर मला.

“मालिक, जब आपका रस पियूँगी और मुंह पर मलूँगी, तब मुझे शांति मिलेगी.”

मेहुल ने फोन बंद कर दिया, और बोला: “ तुम्हारी ये इच्छा भी अवश्य पूरी होगी, क्यूंकि तुमने मेरी दासता को स्वीकारा है. तो मालिक होने कारण मेरा भी ये दायित्व है कि मैं तुम्हारा ध्यान रखूं. जाओ अपना चेहरा धोकर आओ.”

सुजाता ने बाथरूम में जाकर अपना चेहरा देखा तो उसे घिन आ गयी. उसने अच्छे से उसे साफ किया और फिर मूत्र विसर्जन के बाद अपने शरीर पर एक दृष्टि डाली. उसकी वासना आज शांत हो गई थी. पर उसे नहीं लगता था कि मेहुल अभी रुकने वाला है. उसके हाथ अकस्मात ही उसकी गांड पर चले गए. मेहुल ने इसकी भी माँ चोदनी ही है. उसके शरीर में एक सिहरन हुई. फिर वो एक स्वप्न के भांति चलती हुई शयनकक्ष में लौट आयी. अब मेहुल बाथरूम में चला गया.

सुजाता खड़ी रही, उसका लाल हुआ नंगा शरीर बहुत ही मादक लग रहा था. मेहुल बाथरूम से आकर उसी सिंगल सोफे पर बैठा जिस पर पहले सुजाता बैठी थी. सुजाता समझ गई कि ये संकेत है कि पासा अब पलट चुका है. पर उसे इसमें कोई समस्या नहीं लगी. पहली बार किसी ने उसके शरीर को तोड़ने वाली चुदाई की थी. और उसकी चूत अभी भी इस चुदाई के असर से कुलबुला रही थी.

सुजाता: “मेहुल बेटा, क्या बियर पियेगा?”

मेहुल: “हाँ, लेकर आओ.”

सुजाता अपना गाउन डालने लगी तो मेहुल ने रोक दिया. “ऐसे ही जाओ. वैसे भी घर खाली ही है.”

सुजाता उसी अवस्था में किचन से बियर और कुछ अल्पाहार लेकर आयी.

मेहुल: “वैसे खाने में क्या बनाया है आज?”

सुजाता ने ध्यान किया कि अब मेहुल उसे आंटी नहीं बुला रहा है.

सुजाता: “ चिकन करी.”

मेहुल: “ठीक है, बाद में खाएंगे.”

ये कहकर उसने बियर का एक घूँट लिया. सुजाता उसके पांवों के बीच में बैठ गयी और फिर उसके लंड को मुंह में लेकर चाटने लगी. मेहुल ने उसके सिर पर हाथ फिराया.

“आप बहुत अच्छी दासी बनोगी. पर उसके लिए आपको मेरे पांव चाटकर साफ करने होंगे.”

सुजाता ने अपनी बात को उस पर ही विपरीत पड़ते देख अचरज किया. पर उसने लंड को छोड़कर निखिल के पांव चाटकर उन्हें साफ कर दिया. निखिल ने उसके सिर पर थप्पी देकर उसे शाबाशी दी.

मेहुल: “अब जरा अपनी जीभ से मेरी गांड को भी साफ करो.”

ये कहकर मेहुल सोफे पर उलट कर लेट गया. सुजाता बिना कुछ कहे अपने कर्तव्य का पालन किया. फिर मेहुल सीधा बैठ गया और दोबारा बियर के घूँट लेने लगा. सुजाता ने उसके अकड़ते लंड को फिर से चूसना चूरू कर दिया.

मेहुल: “तुम्हारा घर का नाम क्या है?”

सुजाता: “अविरल मुझे कभी कभी सूजी बुलाते हैं.”

मेहुल: “अच्छा नाम है, सूजी डार्लिंग.”

जब मेहुल ने बियर समाप्त की तो समय देखा. अभी २.२० हुए थे. सूजी डार्लिंग की गांड के यज्ञ का समय आ चुका था.

मेहुल: “सूजी डार्लिंग, अब जब तुम मेरी दासी बन चुकी हो तो तुम्हें मुझे पूर्ण रूप से समर्पित करना होगा.”

सुजाता समझ गई कि मेहुल किस ओर संकेत कर रहा है.

“जी”

“और इसके लिए आवश्यक है कि तुम मुझे अपने अन्य दो छेद भी भेंट करो. तुम्हारे मुंह में तो मेरा लंड जा नहीं पाया, इसका मैं दूसरा उपाय करूंगा. पर तुम्हारी गांड की भेंट तुम्हें ही मुझे अर्पण करनी होगी.”

सुजाता खड़ी हो गयी और बहुत हिम्मत के साथ बिस्तर पर बैठी और उसने शीशी से क्रीम निकालकर अपनी गांड में डाली और दो उँगलियों से उसे जितना संभव था खोलकर चिकना कर लिया. उसके बाद उसने बिस्तर पर घोड़ी का आसन किया और मुड़कर मेहुल की ओर देखकर बोली.

“मेरे मालिक. आपकी दासी सूजी आपको अपनी गांड की भेंट अर्पण करना चाहती है. मेरे मालिक, मेरी इस भेंट को स्वीकार करें और मुझे अपनी दासी के रूप में अपना लें.”

मेहुल प्रसन्न हो गया. वीडियो में इतने अच्छा संवाद उसने सोचा नहीं था. उसे इस बात का भी ध्यान हुआ कि उसने अभी तक अपनी माँ की गांड नहीं मारी है. मेहुल ने खड़े होकर बिस्तर पर से क्रीम अपने लंड पर मली और गांड मारने के सबसे प्रचलित आसन में स्थिति ले ली. सुजाता ने अपने जीवन के लिए प्रार्थना की और उसे फिर उसके परिवार के सदस्यों की याद आ गयी. तभी उसे अपनी गांड में कोई मोटी वस्तु के जाने का अनुभव हुआ. उसकी तन्द्रा टूटी और वो लौटकर वर्तमान में आ गयी. उसे याद आया की मेहुल अब उसकी गांड मारने में मग्न है. उसने साँस रोकी और दाँत भींचकर आने वाली पीड़ा की प्रतीक्षा करने लगी.

मेहुल अपने लंड को सुजाता की गांड में बहुत संयम के साथ एक एक मिलीमीटर करके उतार रहा था. उसका क्रोध अब बहुत कुछ शांत हो चुका था. सुजाता के समर्पण के पश्चात उसे अधिक कष्ट देने में कोई लाभ नहीं था. अपितु उनकी इस दासता से वो बहुत कुछ पा सकता था. और यही सोच थी जिसने सुजाता की गांड को उस बर्बादी से बचा लिया था. इसी प्रकार कुछ समय में मेहुल के लंड ने अपना स्थान सुजाता की पूरी गांड में स्थापित कर लिया.

“सूजी डार्लिंग, तुम्हारी गांड की भेंट स्वीकार कर ली गयी है. मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ जो तुमने मुझे इस प्रकार से मुझे अपनी गांड अर्पित की है. पर अब इसके अच्छे से चोदने का भी समय चुका है. मैं जितना हो सके उतने प्यार से इसे चोदने का प्रयास करूँगा पर अगर तुम्हें कष्ट हो तो मुझे बताना अवश्य.”

ये कहकर मेहुल अपने मूसल को सुजाता की गांड में चलाने लगा. एक मंथर गति से चुदाई करते हुए उसने धीरे धीरे गति बढ़ा दी. सुजाता के झड़ने का क्रम फिर से आरम्भ हो गया. उसकी गांड में इतना बड़ा लौड़ा आज तक नहीं गया था और आश्चर्य ये था की उसे किंचित मात्र भी पीड़ा नहीं हुई थी. उसकी गांड में एक विचित्र सी जलन हो रही थी जो एक लहर के समान आ और जा रही थी. उसकी गांड को खोलने वाले इस बलशाली लौड़े ने उसके रोम रोम को पुलकित किया हुआ था. और जैसे जैसे मेहुल ने गति बढ़ाई वैसे वैसे उसके आनंद में बढ़ोत्तरी होती गयी. उसकी चूत भी उसके इस आनंद में उसकी साथिन थी और अपने रस की नहर बहाये जा रही थी.

सुजाता एक हाथ से अपनी चूत को रगड़ने लगी और देखते ही देखते उसके शरीर ने एक भीषण स्खलन से स्वयं को तृप्त किया. अब मेहुल भी झड़ने के करीब था और उसने सुजाता की गांड को पेलना बंद नहीं किया और जब वो झड़ गया उसके भी बहुत देर तक वो गांड को मथता रहा. फिर बहुत ही ध्यान से अपने लौड़े को खुली हुई गांड से बाहर निकाल लिया. उसका लंड वीर्य और अन्य रस से गीला था. उसने उठकर अपने फोन से सुजाता की खुली गांड और उससे टपकते हुए वीर्य का फोटो लिया और छोटा सा वीडियो बनाया. फिर उसने सुजाता को बैठने की आज्ञा दी.

“सूजी डार्लिंग. अब समय है तुम्हारे तीसरे छेद की भेंट स्वीकारने का. आओ और मेरे लंड को चाटकर साफ करो. ध्यान रहे कि ये किस स्थान से निकला है.”

सुजाता सकपका गई. उसने ऐसी आशा नहीं की थी, पर उसे पता था कि मना करने का कोई प्रश्न ही नहीं था. उसने अपनी जीभ बढ़कर लंड को चाटते हुए बिलकुल साफ कर दिया. मेहुल ने नीचे देखकर उसके इस कार्य की प्रशंसा की.

“सूजी डार्लिंग, तुम सचमुच में मेरी सबसे अच्छी दासी बनोगी. आओ अब मैं तुम्हे अपने पानी से चिन्हित कर दूँ.”

ये कहते हुए उसने सुजाता को उठाया और बाथरूम में ले गया. वहां उसने सुजाता को बाथटब में लेटने की आज्ञा दी.

सुजाता के लेटने के बाद मेहुल ने अपने लंड का निशाना लगाया और बोला: “सूजी डार्लिंग, तुम तो जानती हो कि कुत्ता किस प्रकार से अपनी कुटिया को चिन्हित करता है. चूँकि उनका सर्वश्रेष्ठ संवेदनशाली अंग उनकी नाक होती है और सूँघने की क्षमता मुख्य संवेदन, तो वो इस प्रकार से अपनी कुतिया को अपनाता और उस पर अपना स्वामित्व स्थापित करता है.”

उसे चेहरे से लेकर पूरे शरीर पर अपने मूत्र से नहला दिया. सुजाता कुछ न कह सकी पर जब ये परित्याग समाप्त हुआ तो उसे एक असीम सुख और रोमांच की अनुभूति हुई.

“धन्यवाद, मेरे स्वामी.”

“सूजी डार्लिंग. में तुम्हे अपने दासी के रूप में स्वीकार करता हूँ. अब तुम स्नान करो और फिर सब कुछ वैसे ही सामान्य हो जायेगा.”

स्नान करके जब सुजाता बाहर आयी तो मेहुल अपने कपडे पहन चुका था. उसने अपने दोनों कैमरे भी निकालकर अपने बैग में रख लिए थे. तीसरे कैमरे की बैटरी भी लगा दी पर उसे बंद ही छोड़ दिया था.

“आंटीजी, मुझे विश्वास है कि आपको मेरे साथ आनंद आया होगा.”

“मेहुल, मैं बता नहीं सकती इस आनंद को. अकल्पनीय था.”

“पर आपको शर्त याद है न? एक भी शब्द किसी ने नहीं कहना है जब तक मम्मी आपको अनुमति नहीं देतीं.”

“अच्छे से याद है. और मैं कभी नहीं चाहूंगी कि तुम मुझसे रुष्ट हो.”

सुजाता ने अपने सामान्य वस्त्र पहमे और दोनों बैठक में आ गए. ४ बज कर निकल चुके थे स्मिता ने ४.३० आने का समय दिया था. सुजाता ने खाना लगाया और दोनों ने सामान्य बातें करते हुए खाना समाप्त किया. उसके बाद चाय का पानी चढ़ाया और जब तक चाय बनी स्मिता भी आ गयी.

सुजाता ने चाय दी हुए स्मिता से कहा, “दीदी, मुझे क्षमा करना, मैं आपको कई पर अपमानित कर चुकी हूँ. आपके बेटे ने मुझे आज इसकी सजा दे दी है. आगे से मैं ऐसी भूल कभी नहीं करूंगी.” ये कहकर सुजाता स्मिता के पांवों से लिपट गयी.

स्मिता ने उसे उठाकर गले लगाया.

“जो अपनी गलती मान लेता है, उसे क्षमा करना ही होता है. मुझे विश्वास है की अब हमारे सम्बन्ध पहले से अधिक मधुर होंगे. पर तुम्हें अपने वादे पर टिकना होगा अन्यथा ठीक नहीं होगा.”

सुजाता ने विश्वास दिलाया और फिर दूसरी बातें करते हुए चाय समाप्त हो गई और स्मिता मेहुल को लेकर घर चली गई. सुजाता उन्हें जाते हुए देखती रही और अपनी गांड सहलाते हुए अपने घर में आ गई. और साथ ही साथ अविरल भी घर आ गया.

क्रमशः

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अध्याय १८: आठवाँ घर - स्मिता और विक्रम शेट्टी ३

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स्मिता का घर

घर लौटते हुए स्मिता बहुत खुश थी. उसे विश्वास था कि मेहुल ने अवश्य सुजाता के घमंड को चकनाचूर कर दिया होगा, तभी तो उसने मुझसे भी क्षमा मांगी. स्मिता गाड़ी चलते हुए इसी ख़ुशी से गुनगुना रही थी. मेहुल ने अपने बैग में से दोनों कैमरे निकाले और उनके मेमोरी कार्ड निकाल लिए.

मेहुल: “घर पहुंचकर मैं इन्हें एक USB में कॉपी कर दूंगा, फिर कल आप देखना.”

स्मिता: “क्या तुम मेरे साथ देखोगे?”

मेहुल: "अगर आप कहोगी तो, पर मुझे कल १ बजे बाहर जाना है.”

स्मिता: “किसी से मिलना है?”

स्मिता: “हाँ. आने के बाद बता दूंगा.”

स्मिता: “ठीक है.”

कुछ ही देर में वो घर पहुँच गए. श्रेया उनकी प्रतीक्षा में बैठी हुई थी. उसने उठकर मेहुल को गले से लगा लिया.

“मेहुल, मुझे पक्का है कि अपने मम्मी को संतुष्ट कर दिया होगा.”

मेहुल का माथा ठनका, क्या सुजाता ने कुछ बोला?

मेहुल: “आप ऐसा कैसे कह रही हो भाभी?”

श्रेया: “मेहुल, आप इतने अच्छे हो कि आप सबका ध्यान पहले रखते हो. मैंने मम्मी से पूछा तो बोल रही थीं कि आप बहुत जल्दी सीख जाओगे और उनको आपके साथ बहुत अच्छा लगा.”

मेहुल: “और क्या बोलीं आंटीजी?”

श्रेया: “और कुछ भी बताने से मना कर दिया. कहा कि मुझे इसका अनुभव स्वयं ही करना होगा. तो आप मुझे कब समय दे रहे हो.”

मेहुल: “भाभी, कल तक तो नहीं हो पायेगा. परसों का रख लेते हैं.”

श्रेया: “महक और स्नेहा? उनका नंबर कब आएगा?”

मेहुल: “एक दिन छोड़कर. स्नेहा का अंत में.”

श्रेया: “अच्छा है. मैं स्नेहा को बता दूंगी.”

मेहुल मन ही मन में: “जैसे वो मेरे लिए मरी जा रही हो.”

फिर स्मिता से: “आप जैसा उचित समझो, भाभी.”

श्रेया: “माँ जी आप और मेहुल थोड़ा मुंह हाथ धो लो, मैं चाय बनाती हूँ. अगर मम्मी ने कुछ नहीं बताया तो आप भी बताने से रहे. मैं तो सोच रही थी कि गर्मागर्म कहानी सुनने मिलेगी. आप ने तो मन ही तोड़ दिया.”

इस बार मेहुल श्रेया को अपने पास खींचकर बाँहों में ले लेता है. “भाभी, आपका दिल कभी नहीं तोड़ सकता, बस ये है कि आंटीजी और मैंने ये तय किया है कि स्नेहा के साथ होने के बाद मैं सब बता दूंगा.”

श्रेया: “कोई बात नहीं मेहुल, मैं तो परसों स्वयं ही जान लूंगी।” ये कहकर उसने मेहुल के होंठ चूमे और उसे जाने के लिए कहा.

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सुजाता का घर

अविरल जब तक घर पहुंचा, मेहुल और स्मिता निकल चुके थे. वो बिना रुके सीधे अपने कमरे में गया और कैमरे में से मेमोरी कार्ड निकाल लिया. इसे वो कल ऑफिस में देखेगा. सुजाता ने खाने का प्रबंध किया हुआ था और अन्य सभी के आने की प्रतीक्षा में दोनों बैठ गए. सुजाता ने अविरल को उसकी ड्रिंक दी. अविरल पूछना तो बहुत कुछ चाहता था पर उसे समझ नहीं आ रहा था कि बात शुरू कैसे करे. इस समस्या का हल सुजाता ने कर दिया.

सुजाता: “आप कुछ सोच रहे हो?”

अविरल: “सब ठीक तो रहा न? कोई परेशानी?”

सुजाता: “नहीं. पर मेहुल को सेक्स का अनुभव है और उसे अधिक कुछ बताने की आवश्यकता नहीं पड़ी. मेरे विचार से माँ बेटे के सम्बन्ध के कारण स्मिता से वो ठीक प्रकार से चुदाई नहीं कर पाया. मैंने उसे समुदाय के बारे में कुछ समझाया है, और ये भी बताया कि ये सम्बन्ध अनैतिक भले ही हों, परन्तु अत्यंत सुखद होते है. उसे मेरी बात समझ आ गयी.” सुजाता ने संभवतः पहली बार अपने पति से झूठ बोलते हुए कहा. अविरल ने एक चैन की साँस ली. पर उसे अभी भी मेहुल पर पूरा विश्वास नहीं था. उसने इस बात को यहीं समाप्त करना ठीक समझा.

अविरल: “तो आज क्या तुम चुदाई के लिए फिर तत्पर हो. मैं कुछ थका हुआ हूँ.”

सुजाता: “नहीं. आज मैं आपके ही साथ रहूंगी.”

अविरल ये सुनकर खुश हो गया क्योंकि सुजाता हर दिन उठकर विवेक के पास चली जाती थी. कुछ ही देर में स्नेहा और विवेक भी आ गए.

स्नेहा: “और मॉम, कैसा रहा भोंदू का प्रशिक्षण?”

इससे पहले कि सुजाता उत्तर देती अविरल बोल उठा:”स्नेहा, मैंने तुम्हें पहले भी समझाया है और अब आखिरी बार बता रहा हूँ. अगर तुमने इस प्रकार से परिवार के किसी भी सदस्य के लिए बात की तो मैं स्वयं तुम्हे समुदाय ने निकाले जाने का प्रस्ताव रखूँगा। और तुम समझ सकती हो कि इसका क्या अर्थ होगा. आज से एक सप्ताह परिवार का कोई भी तुम्हे छुएगा भी नहीं. और अगर तुमने बाहर कुछ करने की चेष्टा की और मुझे पता लगा तो तुम्हें समुदाय और घर दोनों से निकाल दूँगा।”

स्नेहा के पावों तले से जमीन निकल गई. उसे कल ही चेतावनी मिली थी और उसने गंभीरता से नहीं लिया था. उधर सुजाता और विवेक भी सन्न रह गए.

सुजाता ने बचाव करने के लिए कहा: “मत गुस्सा हो. बच्ची है. मैं समझाती हूँ इसे.”

अविरल ने सुजाता को जलती हुई आँखों से देखा: “और अगर नहीं समझा पायीं तो तुम भी इस घर में नहीं रहोगी इसकी अगली गलती के बाद, ये सोचकर इस आग में हाथ डालना. मैं ये बच्ची है, बच्ची है सुनते हुए थक चुका हूँ. चुदवा सकती है, गांड मरवाती है, दो दो लौड़े खाती है तब इसका बचपन कहाँ चला जाता है.”

स्नेहा सहमे हुए स्वर में बोली: “पापा, आगे से कभी ऐसी गलती नहीं होगी. आय एम रियली सॉरी।”

अविरल ने कोई उत्तर नहीं दिया. विवेक सब सुनते हुए भी शांत रहा. उसने अपने पिता का ये रौद्र रूप कम ही देखा था. और इस समय उनसे कुछ भी कहना अपने लिए समस्या खड़ी करना ही था. सब लोगों ने इसी तनाव में खाना खाया. फिर अविरल अपने लिए एक ड्रिंक बनाकर बिना कुछ कहे अपने कमरे में चला गया.

स्नेहा: “मॉम, सच में, मैं ऐसा कभी नहीं करूंगी.”

सुजाता ने इस बार बुद्धिमानी से काम लिया और उठते हुए कहा: “मेरे विचार से तुम्हारे लिए यही ठीक रहेगा. पर जैसा तुम्हारे पापा ने कहा, मैं इस हाथ से अपना बसा हुआ घर नहीं उजाड़ूंगी. तुम जो करोगी, तुम्हें स्वयं ही उसका मोल चुकाना होगा.”

इसके बाद सुजाता अपने कमरे में अपने पति के पास चली गई.

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स्मिता का घर

कुछ समय बाद स्मिता और मेहुल बैठक में अकेले थे.

स्मिता: “मेहुल, मेरे विचार से ये जो तुम्हारा सीधेपन का स्वांग है, उसे थोड़ा कम करो. अब अगर मेरे और सुजाता से मिलने के बाद भी तुम यही रूप रखोगे तो बाद में इसे बदलना असम्भव हो जायेगा. धीरे धीरे इस हटाकर अपने असली चरित्र में आ जाओ.”

मेहुल: “हाँ मॉम, आप सही सोच रही हो. फिर श्रेया भाभी भी तो हैं. मुझे आंटी ने बताया कि भाभी मुझे बहुत चाहती हैं और वो मुझे ट्रेन करने के लिए भी उत्सुक है. पर स्नेहा को ठीक करने के पहले मैं उन्हें कुछ नहीं बता सकता.”

इतने में ही श्रेया आ गई और मेहुल के साथ बैठ गई.

श्रेया: “मेहुल, आप कभी हमारे साथ बैठते ही नहीं हो.”

मेहुल: “हाँ भाभी, ये मेरी कमी है. पर अब से मैं आप सबके साथ अधिक समय बिताऊंगा.”

श्रेया: “तो क्या कोई गर्लफ्रेंड है जिसके चक्कर में हम सबको भूल गए.”

मेहुल: ‘है तो भाभी, पर ऐसी नहीं कि आपको भुला सके. ये पूर्ण रूप से मेरी ही गलती है. पर मम्मी और आंटीजी से मिलकर मुझे अपने परिवार के लिए अपना कर्तव्य याद आ गया. भाभी, एक बात बोलूँ ?

श्रेया: “हाँ हाँ.”

मेहुल: “क्या मैं महक के बाद स्नेहा के साथ चु चु चुदाई कर सकता हूँ. आपके साथ बाद में?”

श्रेया: “ओह, बच्चू तो ये बात है. मुझे क्यों आपत्ति होगी. मैं जानती हूँ तू स्नेहा पर कितना लट्टू है. और इसमें बुरा लगने वाली बात भी नहीं है. मैं मम्मीजी को बता दूंगी कि स्नेहा को यहाँ भेज दें चार दिन बाद.”

मेहुल: “भाभी, प्लीज़, आंटीजी को मत कहिये, आप सीधे स्नेहा से ही बात करो और इसे हमारी सीक्रेट रहने दो. मैं आंटीजी से सीखी कला को आजमाना चाहता हूँ, और अगर उन्हें पता लगा तो मुझे बहुत अजीब लगेगा.”

श्रेया को मेहुल की बात का कोई औचित्य तो नहीं लगा पर उसने ये बात मान ली. फिर उसने अपने कमरे में जाकर स्नेहा को फोन किया और उसे चार दिन बाद आने के लिए कहा. उसे लग रहा था कि स्नेहा कुछ उल्टा सीधा बोलेगी, पर उसकी तुरंत स्वीकृति ने उसे अचंभित कर दिया. उसे लगा कि स्नेहा ने मेहुल के प्रति अपना विचार बदल लिया है. इस बात से खुश होकर उसने मेहुल और स्मिता को ये शुभ समाचार दे दिया.

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सुजाता का घर

अविरल अभी भी गुस्से से तमतमाया हुआ था. सुजाता जब अंदर आयी तो उसने ये सोचकर कि कहीं वो सुजाता पर और न भड़क उठे, अपने शयनकक्ष से सटे अपने ऑफिस में चला गया. इसका उपयोग वो कम ही करता था, पर आज इसके लिए समय उचित था. उसने दरवाजे को बंद किया और सोच में पड़ गया. फिर उसने कैमरे से निकले हुए कार्ड को निकला और बैग से अपने लैपटॉप को निकालकर ऑन किया. उसने कार्ड को लैपटॉप में लगाया और उसमे देखने लगा. पर ये क्या? उसमें तो कुछ भी नहीं था. कार्ड पूरा खाली था. ये कैसे हुआ? कहीं मेहुल ने इसे देख तो नहीं लिया था? अब उसकी घबराहट स्नेहा को लेकर और बढ़ गयी. उसने लैपटॉप बंद किया और कमरे में लौट गया. सुजाता वहीँ सोफे पर बैठी उसकी राह देख रही थी.

सुजाता: “सुनिए, आप परेशान मत हो. मैं स्नेहा को समझाऊंगी.”

अविरल उसकी बात अनसुनी करते हुए: “कमरे में मेहुल और तुम्हारे सिवाय कोई और भी आया था?”

सुजाता: “हाँ, स्मिता आयी थी बाथरूम जाने के लिए.”

और इस समय अविरल की ऑंखें कमरे के उन स्थानों को देख रही थीं जहां कुछ छुपाया जा सकता है.

सुजाता: “कुछ हुआ क्या?”

अविरल: “नहीं. ठीक है. मैं स्नेहा को समझाने का दायित्व तुम्हें देता हूँ. और तुमसे क्षमा मांगता हूँ अभी के व्यव्हार के लिए.”

सुजाता: “नहीं, अपने ठीक ही किया था. आपकी इस डाँट से स्नेहा को अब समझ आ गया होगा कि आप कितने गंभीर हो. आप बैठो, मैं आपकी ड्रिंक बनाती हूँ और फिर सिर दबा देती हूँ.”

अविरल ने हामी भरी और सुजाता दोनों के लिए ड्रिंक लेकर आ गयी. अविरल का सिर गोद में लेकर उसके सिर को हलके हाथों से दबाने लगी. बीच बीच में वो ड्रिंक का एक घूँट लेती और अविरल के मुंह से मुंह लगाकर उसे पिला देती.

अविरल: “कभी कभी मैं सोचता हूँ कि मैं कितना भाग्यशाली हूँ जो तुम्हारे जैसी पत्नी मिली.”

सुजाता: “आपको जो भी मिलती, आप उसे अपने रूप में ढाल लेते.” सुजाता अपने पति के बाल सहलाते हुए बोली. “मेरा सौभाग्य है जो मुझे आप मिले और अपना ये परिवार.”

कुछ समय में ही अविरल गोद में सिर रखे हुए ही सो गया. सुजाता भी ऊँघने लगी. तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया और फिर धीरे से खोलते हुए अंदर प्रवेश किया. ये स्नेहा थी. बहुत डरी और सहमी हुई. उसने देखा कि अविरल सो रहा है.

स्नेहा: “मॉम, मुझे आपसे कुछ बात करनी है.”

सुजाता: “हाँ इधर आकर बात करो. तुम्हारे पापा सो रहे हैं.”

स्नेहा: “मॉम, आप प्लीज़ पापा को बोलना, आय एम रिअली सॉरी। मैं अब कभी मेहुल का अनादर नहीं करुँगी. सच में.”

अविरल ये सब सुन पा रहा था और चुप रहा.

सुजाता: “तुम्हारे पापा तम्हारे लिए बहुत चिंतित हैं. मैंने उन्हें इतना परेशान केवल एक ही बार देखा है जब तुम बचपन में बीमार पड़ी थीं. चार दिन तक तुम्हें गोद में लिए रहे थे. नीचे उतारते ही तुम रोने जो लगती थीं. उनके मन में कुछ खटक रहा है. और अगर वो ऐसा कह रहे हैं तो तुम्हें उनकी बात पर बहुत ध्यान देना चाहिए. तुम चिंता मत करो, अभी उठेंगे तो मैं बता दूंगी कि तुम आयी थीं.”

अविरल: “मुझे पता है कि मेरी लाडो आयी है. ये आये और पापा को पता न चले?”

स्नेहा रो पड़ी: “पापा, मुझे प्लीज़ क्षमा कर दो.” और फफक फफक कर रोते हुए अविरल से लिपट गई. अविरल उठा और उसे अपने सीने से लगा लिया.

अविरल: “रो मत. मैं तुझसे कभी गुस्सा रह सकता हूँ भला ?” ये कहकर उसने स्नेहा को साथ में बैठा लिया.

स्नेहा के आँसू अभी भी नहीं रुक रहे थे. वो अविरल के गले से लगकर रोये जा रही थी.

स्नेहा: “पापा, मुझे आपसे दूर नहीं जाना है. मुझे अपने से अलग मत करो.”

अविरल का दिल भी रो रहा था उसके भी आँसू निकल रहे थे. उसने स्नेहा के बहते हुए आँसुओं को चूमते हुए कहा: “कभी नहीं. वैसे भी तेरा विवाह भी इसी शहर में ही होना है, अपने समुदाय में ही, तो तू मुझसे कभी दूर हो ही नहीं सकेगी. पर गुड़िया, जब भी मेहुल मिले उससे मन से क्षमा माँगना। उसे बता देना कि तेरे ये विचार क्यों थे और क्यों तुझे लगता है कि तू गलत थी.”

स्नेहा: “जी पापा.” ये कहते हुए उसने अविरक के होंठ चूम लिए.

बाप बेटी इस भावनात्मक घड़ी में एक दूसरे के पास थे और दोनों की भावनाएं इस समय चरम पर थीं. सुजाता पास बैठी उनके इस मिलन को देख रही थी और प्रार्थना कर रही थी कि मेहुल स्नेहा से बदला न ले. उसने मेहुल से सुबह बात करने का प्रण किया, स्मिता के घर जाकर. वो पूरा प्रयास करेगी कि उसकी फूल जैसी बेटी को मेहुल क्षमा कर दे.

उधर अविरल और स्नेहा का चुम्बन प्रगाढ़ हो चला था. और कोई समय होता तो सुजाता की वासना उभर आती, पर संभवतः मेहुल ने उसकी इस भूख को समाप्त कर दिया था. और वो इस परिवर्तन से संतुष्ट थी. उसने ये भी निर्णय लिया कि केशव या कोई और जिसे भी उसके पास प्रशिक्षण हेतु भेजा जायेगा, उन्हें वो उनकी माँ के समान ही प्यार देगी। न जाने क्यों, इस निर्णय से उसकी आत्मा को एक शांति मिली. अविरल अब तक स्नेहा का टॉप निकालकर उसकी ब्रा के ऊपर से ही उसकी चूचियों को प्यार से मसल रहा था. स्नेहा के हाथ भी अविरल के खड़े होते लंड को उसके गाउन में सहला रहे थे.

फिर स्नेहा उठी और उसने अपनी ब्रा और अन्य वस्त्र उतार दिए और अपने पिता के पांवों के बीच में बैठकर उसके लंड को अपने मुंह से चाटने लगी. अविरल ने अपने सिर को पीछे करते हुए ऊपर की ओर कर दिया और वो स्नेहा के इस कार्य का आनंद लेने लगा. सुजाता अभी भी उन दोनों को देखकर बहुत ही संतुष्टि अनुभव कर रही थी. अच्छा हुआ कि उसके कुछ किये बिना ही, सब कुछ सामान्य हो गया. वो उठी और अपने लिए एक ड्रिंक बनाकर सामने घटित हो रहे प्रसंग को देखने लगी. तभी कमरे का दरवाजा खुला और विवेक ने अंदर झाँका. उसने सोफे पर चल रहे प्रेमालाप को देखा और सुजाता की ओर देखते हुए थम्ब्स अप किया. सुजाता ने उसे संकेत देकर अंदर बुला लिया। विवेक अंदर आया और उसने दरवाजा बंद कर दिया.

इस सब से अनिभिज्ञ स्नेहा अपने पिता के लंड को चूस रही थी और अविरल अपने हाथ से उसके सिर को सहला रहा था. फिर अविरल ने उसे उठने के लिए कहा और उसे लेकर बिस्तर की ओर बढ़ गया. विवेक ने अपने लिए एक ड्रिंक बनाई और वो सोफे पर बैठकर सुजाता कि भांति अपने पिता और बहन के बीच चलते हुए संसर्ग को देखने लगा. अविरल ने स्नेहा को लिटाकर उसकी चूत पर धावा बोल दिया और उसे पागलों के समान चाटने लगा. स्नेहा के रस से सराबोर उसके चेहरा चमक रहा था. वो अपनी जीभ से स्नेहा की चूत को अंदर से चाटने लगा.

“ओह, पापा.”

अविरल ने उसे अनसुना करके अपनी जीभ का हमला नहीं रोका. बल्कि उसने अब अपनी दो उँगलियाँ भी स्नेहा की चूत में डालकर उसे चोदने लगा. पर आज समय मिलन का था और इसीलिए अविरल ने उठकर अपने लंड को स्नेहा की चूत पर रखा और एक बार में आधा और दूसरे झटके में पूरा अंदर कर दिया. स्नेहा आनंद से चीख पड़ी और फिर से रोने लगी.

स्नेहा: “मुझे जोर से चोदो, पापा. मैंने जो अब तक गलती की हैं, इसी चूत के नशे में की हैं. आज इसकी सारी अकड़ निकाल दो. पर मुझे अपने से अलग मत करना कभी भी. मैं मर जाऊंगी. इससे तो अच्छा आप मुझे चोद चोद कर ही मार डालो.”

अविरल उसका दर्द समझ रहा था. उसने अपनी गति को अच्छा तेज रखा हुआ था, ऐसे जैसे कि वो स्नेहा को सजा दे रहा हो. पर ये उसका गुस्सा था, मेहुल पर, सुजाता पर और स्नेहा पर. और कुछ स्वयं पर भी. उसे लगा कि उसने स्नेहा को सुजाता के भरोसे छोड़कर ठीक नहीं किया था. पिछले साल से जब से सुजाता की चुदास बड़ी थी, तो उसने स्नेहा पर ध्यान देना कम कर दिया था. वो स्नेहा के बहते हुए आंसुओं के लिए अपने आप को भी दोषी समझ रहा था.

उसने आगे झुकते हुए स्नेहा के चेहरे को चाट कर उसके नमकीन आंसुओं को पी लिया. फिर उसने स्नेहा के होंठ पर अपने होंठ लगाए और एक सशक्त चुम्बन का आरम्भ किया. इस चुम्बन के साथ ही उसने अपनी चुदाई की गति और बढ़ा दी. स्नेहा इसी प्यार की प्यासी थी और उसकी चूत ने उसकी भावनाओं की समझकर पानी छोड़ना शुरू ही किया था कि स्नेहा का शरीर अकड़ कर काँपने लगा और उसके झड़ने का क्रम शुरू हो गया. अविरल बिना रुके उसे चोदे जा रहा था, और स्नेहा बिना ठहराव झड़ रही थी. फिर उसका शरीर ढीला पड़ गया और अविरल ने भी अपने शरीर में उत्कर्ष की भावना अनुभव की और वो भी चिंघाड़ते हुए स्नेहा की चूत में अपने लंड का रस बिखेरने लगा. उसका शरीर भी अकड़ा हुआ था और उसकी कमर बिना किसी लय के झटके ले रही थी. फिर अविरल ने अपने लंड को बाहर निकाला और अपने होंठों को स्नेहा से अलग किया.

“थैंक यू, पापा.” स्नेहा उसके गले में बहन डालकर बोली.

“थैंक यू, गुड़िया.” ये कहकर अविरल ने सुजाता की ओर देखा तो सुजाता की ऑंखें चमक उठीं.

वो उठी और उसने स्नेहा की चूत पर धावा बोल दिया और चाट चाट कर अविरल और स्नेहा के मिलेजुले रस को ग्रहण किया. फिर उसने उठकर स्नेहा को चूमा और कुछ रस उसे दान कर दिया.

“वी ऑल लव यू, बेबी. सब ठीक है.”

स्नेहा ने अपनी माँ को बाँहों में लेकर चूमते हुए उसका भी धन्यवाद किया.

विवेक: “लगता है कि अब सब ठीक हो गया है घर में. मुझे बहुत चिंता थी.”

अविरल ने अपने लंड को सुजाता के मुंह से लगाकर कहा: “ऐसी कोई समस्या नहीं जिसे चुदाई से दूर नहीं किया जा सके. क्यों ठीक है न ?”

इस बात पर सब हंसने लगे और घर का वातावरण सामान्य हो गया. कुछ ही देर में सब लोग शांति से सो रहे थे.

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स्मिता का घर

नाश्ते के समय श्रेया बोली: “मम्मी का फोन आया था, कह रही थीं आने के लिए.”

स्मिता: “हाँ, मुझसे भी पूछा था. मैंने १० बजे के बाद आने के लिए कहा है.”

विक्रम: “क्या हुआ, आज उन्हें पूछ के आने की क्या आवश्यकता पड़ी. वो तो कभी भी आ सकती हैं.”

स्मिता: “मैंने भी यही पूछा था. तो बोली कि मैं और श्रेया कहीं बाहर न जा रहे हों. आप आज कितने बजे तक आएंगे?”

विक्रम: “आज कुछ विशेष काम तो है नहीं. तो समय से ही आ जाऊँगा. और अगर तुम कहो तो जल्दी आ जाऊं.”

स्मिता: “आप देख लेना, जब मन करे, तब चले आना.”

विक्रम: “तुम इधर देख लो अगर, तो मैं जाऊंगा ही नहीं.”

स्मिता: “चलिए, बड़े रोमांटिक मत बनिए. जब मन करे आ जाना.”

विक्रम: “जैसी आज्ञा, देवी.”

सब हंस पड़े और उनके प्यार को देखकर ईर्ष्या भी करने लगे. फिर विक्रम और मोहन महक को लेकर निकल गए. मेहुल अपने कमरे में चला गया. श्रेया और स्मिता ने सुजाता के आने का प्रबंध किया. सवा दस बजे सुजाता आ गयी और साथ में स्नेहा भी. सुजाता स्मिता के साथ बैठ गई और श्रेया स्नेहा को अपने कमरे में ले गई.

सुजाता स्मिता से: “मैं आपसे विनती करने आयी हूँ. आप तो जान गयी होगी मेहुल ने मेरे साथ क्या किया?”

स्मिता: “नहीं, उसने मुझे कुछ भी नहीं बताया.” स्मिता ने अभी तक वीडियो भी नहीं देखे थे तो उसे ये कहने में कोई झिझक नहीं हुई.

सुजाता: “मेरी बस यही विनती है, कि वो स्नेहा को प्यार से चोदे, मेरी फूल सी बच्ची पर दया करे.”

स्मिता ने सुजाता का हाथ पकड़ा, “मैं नहीं जानती कि उसने क्या किया पर मैं उसे अवश्य समझाऊंगी कि वो स्नेहा को अपनी बहन के समान ही समझे. अब तुम मत घबराओ, वो मेरी बात नहीं टालेगा.”

सुजाता स्मिता के पैरों से लिपट गयी. उसने रोते हुए कहा, “प्लीज, स्मिता. भूलना नहीं. कल उसके पापा ने उसे बहुत डाँटा और घर से निकालने तक की चेतावनी दी है, वो कभी मेहुल का अपमान नहीं करेगी, जीवन भर.”

स्मिता: “उठ जाओ. मैंने कहा न, मेहुल मेरी बात नहीं टालेगा। अच्छा रुको मैं उसे यहीं बुलाकर समझती हूँ.”

स्मिता ने मेहुल को बुलाया और बैठकर कहा: “मेहुल, सुजाता की ये विनती है कि तुम स्नेहा पर दया दिखाना और उसे सुजाता के समान मत चोदना। और मैं भी यही चाहती हूँ.”

इससे पहले कि मेहुल कुछ कहता सुजाता उसके पांवों से लिपट गयी. “हमें क्षमा कर दो बेटा। कल उसके पापा ने उसे अपना व्यव्हार सुधारने या घर से निकल जाने के लिए कह दिया है. वो बहुत पछता रही है. उस पर दया करना बेटा, मैं तुमसे भीख मांग रही हूँ.”

मेहुल का दिल पसीज गया और फिर उसकी माँ की आज्ञा भी थी. उसने सुजाता को उठाया और उठकर उसे गले से लगा लिया.

“आंटीजी, मैं आपको वचन देता हूँ, कि स्नेहा को बिलकुल भी कष्ट नहीं दूंगा. आप मेरी ओर से निश्चिंत रहिये. और किसी और को भी उसे दुखी नहीं करने दूंगा. चलिए मम्मी के कमरे में चलते हैं, वहां मैं आपको अपने प्यार का भी उदाहरण दे देता हूँ.”

इसके साथ ही वो तीनों स्मिता के कमरे की और बढ़े ही थे की श्रेया और स्नेहा आ गए. स्नेहा मेहुल के गले से लिपट गयी.

“मेहुल, प्लीज़ मुझे क्षमा कर दो. मैंने तुम्हे कई बार अपमानित किया है. पर कल पापा ने मेरा घमंड ठिकाने लगा दिया. आगे से मैं तुम्हें कभी भी नीचा दिखाने का प्रयास नहीं करुँगी.”

ये कहते हुए स्नेहा भी उसके पांवो से लिपट गई. मेहुल का तो सिर ही भन्ना गया. इसका अर्थ यही था कि अविरल अंकल बहुत सुलझे हुए आदमी हैं और उन्होंने बिना कुछ देखे भी स्थिति की गंभीरता को समझ लिया था. उसने स्नेहा को उठाया और उसे बाँहों में भर लिया.

“मैंने तुम्हें क्षमा कर दिया. अब तुम निश्चिन्त हो जाओ. मैं थोड़ी देर के लिए मम्मी और आंटीजी की कुछ दिखाने के लिए मम्मी के कमरे में जा रहा हूँ. तुम भाभी के साथ रहो. मैं तुमसे कल बात करूँगा, मुझे अभी कुछ देर में बाहर जाना है. अब खुश होकर अपनी प्यारी वाली स्माइल दो.”

स्नेहा के रोते हुए चेहरे पर मुस्कराहट आ गई. मेहुल ने उसके होंठ चूमे और उसे गले से लगाकर भाभी के पास भेज दिया और स्वयं स्मिता और सुजाता के साथ स्मिता के कमरे में चला गया.s

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मेहुल का नया मित्र:

मेहुल दोपहर का खाना खाने के बाद बाहर चला गया. आज उसने कॉलेज को पूरा ही बंक मार दिया था. उसे पता था कि दो पीरियड में तो उसे उपस्थित दिखा दिया जायेगा. उसका मूल्य उसे अवश्य उन दोनों शिक्षिकाओं को चुकाना होगा. घर से निकलकर वो अपनी बाइक से एक कॉलोनी में बने एक घर में अपनी बाइक लगा दी. घर में इस समय एक कार और एक और बाइक भी खड़ी थी. बाइक को देखते हुए वो घर के दरवाजे पर गया और चाबी से दरवाजा खोला. घर में जाने के बाद उसने अपने जूते निकालकर एक ओर लगे स्टेण्ड में लगा दिए और फिर किचन से पानी की ठंडी बोतल निकालकर आधी बोतल पानी पिया.

उसे घर के शांत वातावरण में ऊपर के कमरे से कुछ हल्की मद्धम ध्वनि आ रही थी. वो मुस्कुराते हुए धीमे पांवों से ऊपर की ओर चल पड़ा. ऊपर तीन कमरे थे, जिसमे से एक का ही दरवाजा कुछ खुला लग रहा था और ये ध्वनि भी वहीँ से आ रही थीं. उसने अपनी टी-शर्ट उतारी और अपनी बेल्ट खोलकर फिर अपनी पैंट भी उतार दी. उसने ये सब वहीँ रखी एक कुर्सी पर रख दिया. फिर अपनी अंडरवियर भी उतारा और उसे भी कपड़ों पर फेंक दिया. अपने लंड को उसने अपने ही हाथों से सहलाया और फिर कमरे में प्रवेश कर गया. सामने के दृश्य ने उसे चकित कर दिया.

उसके प्रिंसिपल की माँ मरियम घुटनों पर नंगी बैठी हुई एक हृष्ट पुष्ट लड़के का लंड चूस रही थी. मेहुल ने देखा कि उस लड़के का भी लंड उसके नाप का ही होगा. पर मेहुल को जलन जैसी कोई भावना नहीं आयी. जब वो माँ और बेटी (प्रिंसिपल मैरी) को साथ चोद सकता था तो उसे इस लड़के से ईर्ष्या करने का कोई अर्थ नहीं था.

लड़का: “हे, डूड. आय एम सचिन.”

मेहुल: “हाई, आय एम मेहुल.”

तभी बाथरूम से फ़्लश चलने की आवाज़ आयी और फिर बाथरूम का दरवाजा खुला और प्रिंसिपल मैरी कमरे में आ गयीं. वो भी अपनी माँ के समान नंगी ही थी.

मैरी: “हैलो मेहुल, चलो अच्छा हुआ तुम भी समय से आ गए. ये मेरी शैली रमोना का बेटा सचिन हैं. और जैसा तुम देख रहे हो ये भी लौड़े के मामले में तुम्हारे जैसा घोड़ा ही है.”

इस बार सचिन ने मेहुल के लंड को देखा और सीटी बजाई।

मैरी: “मैं कई दिनों से रमोना से कह रही थी कि उसने अपने लड़के से कभी मिलाया नहीं. तो आज उसने भेज ही दिया, उचित प्रकार से मिलाने से. अच्छी बात ये है कि हम दोनों को अब तुम्हारे लंड के लिए प्रतीक्षा नहीं करनी होगी. दोनों एक साथ चुद सकती हैं. और तुम्हें इसमें कोई आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए.”

ये कहकर मैरी मेहुल के आगे घुटनों के बल बैठ गयी और उसके लंड को मुंह में लेकर चाटने और चूसने लगी.

मरियम: “और हम दोनों की तुम डबल चुदाई भी कर सकोगे. क्यों है न सही?”

मेहुल का लौड़ा ये सुनकर एकदम टनटना गया. वहीँ सचिन का भी लंड अकड़ कर लोहे जैसा हो गया. मेहुल ने अभी तक कभी डबल चुदाई का आनंद नहीं लिया था, हालाँकि सचिन इसमें अनुभवी था. दोनों लंड अपने जोश में देखकर मैरी मैडम ने कहा, “अब टाइम वेस्ट करने का कोई मतलब नहीं है. मॉम, आपको किसके साथ चुदाई करनी है.”

मरियम: “मुझे तो ये नया लौड़ा ही चाहिए आज. मुझे बहुत दिन हो गए नए लंड से चुदे हुए. तुम तो फिर भी नया आनंद लेती रहती हो.”

ये सच भी था. कॉलेज के लड़के मैरी मैडम को तो चोदने के लिए तत्पर रहते थे, पर मरियम तक सबको लाना सम्भव नहीं था. उसके पास बहुत भली भांति देखे गए लड़कों को ही प्रिंसिपल मैरी घर लाती थीं. उनमे से भी कुछ मरियम की आयु के कारण बिदक जाते थे. मरियम इस अपमान को अपनी बेटी के लिए सहन कर लेती थी. पर आज सचिन ने किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं की और सीधे उसके मम्मे दबाकर अपना आशय व्यक्त किया तो मरियम झूम उठी. सचिन ने मरियम और मेहुल ने मैरी मैडम को उठाया और बिस्तर पर घोड़ी के आसन में कर दिया. इस आसन में दोनों माँ बेटी एक दूसरे के चेहरे के सामने थीं. मरियम ने मैरी मैडम को चूम लिया और तब तक उनके दोनों घोड़ों ने उसने पीछे अपना स्थान ले लिया.

इधर माँ बेटी एक दूसरे को चूम रही थीं और उनके पीछे सचिन और मेहुल अपने लौड़े उसकी चूतों में उतार रहे थे. माँ बेटी को बड़े और मोटे लौड़े लेना का वृहद अनुभव था और अपनी चूत को खुलते हुए और उसके अंदर जाते हुए लौड़े के आनंद से दोनों काँपती हुई एक दूसरे को चूमे जा रही थीं.

सचिन: “मेहुल, इन्हें कैसी चुदाई पसंद है?”

मेहुल: “बड़े लौड़े पसंद करती हैं तो प्यार वाली चुदाई तो चाहती नहीं होंगी. जैसे मन हो वैसे चोदो।”

सचिन: “थैंक्स, भाई. और हाँ इसके बाद मुझे तुमसे कुछ और भी बात करनी है.”

ये कहते हुए सचिन ने अपने लंड से मरियम को ताबड़तोड़ गति से चोदना शुरू कर दिया. पर उस बुढ़िया को इसमें इतना आनंद आया कि वो चिल्ला चिल्लाकर उसे और जोर से चोदने के लिए उत्साहित करने लगी. सचिन कब रुकने वाला था. उसने अपने दोनों पांव अच्छे से जमाये और दे दनादन धक्के लगाने आरम्भ कर दिए. बूढ़ी मरियम कि चूत इस आयु में भी पानी छोड़ने लगी और सचिन के लंड के अंदर बाहर होने में छप छप की ध्वनि आने लगी.

सचिन: “ये तो बहुत गर्म औरत है, भाई. ऐसे पानी छोड़ रही है जैसे कि नहर.”

मेहुल अपनी प्रिंसिपल की चूत में अटका हुआ था और उसे भी उसी तेज गति से चोद रहा था और मैरी मेडम भी झड़े जा रही थीं.

मेहुल: “अरे अभी तुमने कुछ देखा ही नहीं. जब मैडम उनकी चूत चाटेंगी और तुम इनकी गांड मारोगे तब देखना इनका हाल. मैडम को कई लीटर पानी पिला देती हैं दादीजी.”

मरियम ने भी अब अपनी बात रखी. “पर आज मैरी को चूत चाटने का अवसर नहीं दूंगी. आज एक लौड़ा चूत में और एक गांड में लूँगी।”

मेहुल ने छेड़ा: “तो मुंह का क्या होगा दादीजी?”

मरियम: “उसके लिए मैरी की चूत और गांड रहेगी. और फिर मैरी मेरी चूत और गांड से तुम्हारा रस पीयेगी. क्यों मैरी, ठीक कहा न मैंने.”

मैरी मैडम: “बिलकुल मॉम, और यही मेरे साथ भी होगा. आज सच में ऐसे दो लौडों से चुदवाकर आत्मा तृप्त हो जाएगी.”

दोनों माँ बेटी अब बुरी तरह से कांपती हुई झड़े जा रही थीं. अंततः दोनों चीखते हुए धराशायी हो गयीं. पर सचिन और मेहुल ने उनको चोदना बंद नहीं किया. और कुछ देर बाद ही दोनों घोड़ों ने अपना माल उन प्यासी चूतों में अर्पित कर दिया और उनके ऊपर ही लेट गए. दो चार मिनट के बाद दोनों ने अपने लंड बाहर निकाले और वहीँ बैठ गए. लंड बाहर निकलते ही दोनों माँ बेटी जैसे जाग उठीं. पहले दोनों ने अपने घोड़े के लौड़े को चाटकर उसे साफ करके चमका दिया और फिर एक दूसरे की चूतों पर टूट पड़ीं और एक एक बूँद पी कर अपनी प्यास बुझाई.

मैरी मैडम: “आह, आनंद आ गया आज मॉम।”

मरियम: “बहुत, मैरी. पर अभी असली खेल शेष है.” उनका तात्पर्य दुहरी चुदाई से था और प्रिंसिपल मैरी ने उनके कथन का समर्थन किया.

इतने में सचिन बोला: “आंटी, मुझे मेहुल से कुछ बात करनी थी अकेले में. क्या हम बाहर बैठक में बैठ सकते हैं?”

मैरी मैडम: “हाँ हाँ क्यों नहीं. हम दोनों को भी कुछ समय चाहिए.”

सचिन और मेहुल ने बिना अंडरवियर के ही अपने कपड़े पहने और बाहर बैठक में बैठ गए.

सचिन: “तुम मैडम को कबसे जानते हो?”

मेहुल: “यही कोई डेढ़ साल से.”

सचिन: “अगर मैं तुम्हे कुछ बताऊँ तो क्या तुम उसे गुप्त रख सकते हो?”

मेहुल: “अवश्य. मेरे दिल में वैसे भी कई बातें दबी हुई हैं.”

सचिन: “ठीक है. मैं एक क्लब में पार्ट टाइम काम करता हूँ. उस क्लब में अधेड़ उम्र की स्त्रियां सदस्य हैं और हम लड़के उनकी शारीरिक भूख को मिटाते हैं. और इसमें लड़कों का जो मुख्य मापदंड है, वो है आयु २६ से कम, लौड़ा १० इंच से बड़ा और सम्पूंर्ण गोपनीयता रखने का सामर्थ्य. इसके साथ चुदाई में निपुण भी होना चाहिए. मेरे विचार से तुम उसमे कार्य कर सकते हो अगर तुम्हारी पृष्ठभूमि के आकलन में तुम उत्तीर्ण हो जाते हो.”

इसके बाद सचिन ने उसे दिंची क्लब के बारे में बताया पर कोई नाम या स्थान नहीं बताया. मेहुल ने उसमे काम करने के लिए अपनी स्वीकृति दे दी.

सचिन: “ठीक है, मैं पार्थ सर और शोनाली मैडम से बात करूँगा. इसके आगे उनके ऊपर निर्भर है.”

नाम सुनकर मेहुल का माथा ठनका.

मेहुल: “क्या ये दोनों संभ्रांत नगर में रहते हैं.”

सचिन को तभी ये लग गया कि उसने नाम लेकर गलती कर दी है. पर तीर कमान से निकल चुका था.

सचिन: “हाँ, पर..”

मेहुल: “तुम मेरा विश्वास करो, ये बात मेरे आगे नहीं जाएगी. बिलकुल भी नहीं. और ये भी जान लो कि मैं भी संभ्रांत नगर में ही रहता हूँ.”

सचिन के चेहरे पर अब घबराहट दिख रही थी.

मेहुल: “ये जान लो कि उन दोनों को कभी ये नहीं पता लगेगा कि तुमने उनके बारे में मुझसे कुछ भी कहा है. अब ये बताओ कि अगर मैडम तुम्हारी मॉम को जानती हैं तो तुम यहाँ कैसे आ गए?”

सचिन को मेहुल पर अब विश्वास हो चला था. उसकी बातों में कोई छल नहीं दिख रहा था. उसने उसे सच बताने का निश्चय किया.

सचिन: “मेहुल, मैं अपनी माँ की चुदाई भी करता हूँ. उन्होंने ही मुझे दिंची क्लब में शामिल करवाया था. ये सुनकर हो सकता है कि तुम मुझसे घृणा करने लगो. पर मैं तुम्हे अपना मित्र समझने लगा हूँ.”

मेहुल ने अपना हाथ बढाकर सचिन से हाथ मिलाया, “मेहुल मित्रों को कभी धोखा नहीं देता. और घृणा तो तब करूंगा अगर मैं भी ऐसा नहीं कर रहा होता.” मेहुल के चेहरे पर मुस्कराहट थी.

सचिन: “यानि, तुम भी…?”

मेहुल: “हाँ, और ये अभी कुछ ही दिन पहले शुरू हुआ है. अभी तक मैंने अपनी मॉम और अपनी भाभी की मॉम को ही चोदा है.”

सचिन: “यू लकी बास्टर्ड!”

मेहुल: “चलो, तुम मुझे दिंची में रोमियो का काम दिलाने का प्रयास करो. इन दोनों को ऐसे छोड़ना है कि ये दोनों और देखने वाले सबको आनंद आये.”

सचिन: “हमारे सिवाय कौन देखेगा.”

कुछ समय दोनों और बातें करते रहे जिसमे सचिन ने पटेल परिवार और सबीना के बारे में भी बताया. क्योंकि ये मेहुल की पहले डबल चुदाई थी तो सचिन ने उसे कुछ गुर दिए और किस तरह से ताल बैठानी है ये भी बताया. फिर दोनों उठकर शयनकक्ष की ओर चल पड़े. अंदर जाने के पहले मेहुल ने सचिन का हाथ पकड़ा.

मेहुल: “आओ, मैं तुम्हें कुछ दिखता हूँ.”

ये कहते हुए वो हॉल के एक दूसरे कमरे की ओर चल पड़ा. सचिन उसके पीछे हो गया. उस कमरे के बाहर जाकर उसने दरवाजे को खोलने के लिए घुंडी घुमाई और वो खुल गया. उसने चौथाई के लगभग दरवाजा खोला और सचिन को अंदर देखने के लिए आमंत्रित किया. अंदर एक अत्यंत वृद्ध पुरुष और एक अधेड़ पुरुष सोफे पर बैठे थे और टीवी देख रहे थे. टीवी पर जो दृश्य था उसे देखकर सचिन अचंभित हो गया. ये मैडम के शयन कक्ष का दृश्य था और इस समय मैडम और उनकी माँ दिखाई दे रही थीं.

वृद्ध: “क्या हुआ लौडों को, कहाँ चले गए?”

अधेड़: “पापाजी, धीरज रखो, अभी आते ही होंगे.”

वृद्ध: “गांड मारने में मेहुल तो सही है, इस नए लड़के को तो सही से आता होगा न? ऐसा न हो ये मेरी मरियम को गांड फाड़ दे.”

अधेड़: “ऐसा कुछ नहीं होगा, वैसे भी मम्मी की गांड इतनी खुली हुई है कि फाड़ना सम्भव ही नहीं है.”

दोनों हंसने लगे. और अपने हाथ में लिए हुए ग्लास से कुछ पीने लगे. मेहुल ने सचिन को पीछे करते हुए दरवाजा वापिस बंद किया और मैडम के कमरे की ओर चल पड़ा. उसने देखा कि सचिन के मन में कुछ सवाल हैं.

मेहुल: “मैडम और उनकी मम्मी के पति. अब केवल उन्हें चुदते देखकर ही सुख पाते हैं. मैडम के पति की किसी बीमारी के कारण सेक्स की क्षमता नहीं रही. पर वो मैडम को चुदने से नहीं रोकते. उनके बारे में मैडम से कभी कुछ न बोलना. उनके बारे में कोई अपशब्द उन्हें सहन नहीं होगा.” ये कहकर मेहुल ने मैडम के कमरे का दरवाजा खोला और दोनों अंदर प्रवेश कर गए.

अंदर का दृश्य तो उन्हें पता ही था, अभी टीवी पर देखकर जो आ रहे थे. पर सचिन की ऑंखें उन कैमरों को ढूँढ रही थी. मेहुल समझ गया और उसके कान में बोला, “कैमरे के चक्कर में मत रहना, अगली बार नहीं आ पाओगे फिर. इन्हें पता नहीं है कि मुझे पता है. इसीलिए सावधान रहना.” सचिन ने सिर हिलाकर समझने का संकेत दिया.

मरियम: “आ गए मेरे शेर, हो गयी बात तुम्हारी?”

सचिन: “जी आंटी, अब बताएं हमारे लिए क्या आदेश है?”

मैरी मैडम ने अपनी माँ की जांघों के बीच से अपना सिर निकाला, “पहले मॉम की डबलिंग करो. मैंने गांड भी खोल दी है.”

मेहुल अचम्भे से, “पर पहले क्या केवल गांड नहीं मरवाएँगी?”

मैरी मैडम: “जब दो दो लौड़े उपलब्ध हैं तो एक से क्यों संतुष्ट होना, क्यों?”

मेहुल: “जी, आप सही कहती हैं. तो फिर हमारे लंड कौन खड़ा करेगा?”

मैरी मैडम: “मॉम, आपको गांड किससे मरवानी है?”

मरियम: “सचिन. नए लंड का स्वाद लेना है.”

मैरी मैडम: “ठीक है तो फिर मैं इसके लंड को बढ़ाती करती हूँ आप मेहुल को सम्भालो.”

ये कहते हुए दोनों एक एक लंड को अपने मुंह में लेकर चाटने लगीं. शीघ्र ही जवान लौड़े अपने पूरे तनाव में आ गए. मरियम ने मेहुल को लेटने के लिए कहा और उसके ऊपर आकर दोनों ओर पांव करते हुए उसके लंड को अपनी चूत में डाल लिया. खुली चूत में लंड आसानी से घुस गया. कोई छह सात बार उसपर उठक बैठक करने के बाद मरियम आगे झुक गई. और सचिन को उसकी गांड का छेद दिखने लगा. मैडम मैरी ने उसमे बहुत मन से जैल लगाया था, और उसके लंड को जाने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए थी.

मैडम मैरी: “मॉम, गेट रेडी, ही इस गोइंग तो फक योर आस. एन्जॉय योर डबल फक.”

मरियम: “कितने दिनों के बाद ये सुख मिलेगा. और सुनो तुम दोनों, अच्छे से चोदना, प्यार व्यार के लिए नहीं चुदवाती हूँ तुम सबसे. हड्डियां हिल जानी चाहिए आज तो. और चिंता न करना, मुझमें सब सहन करने की शक्ति है. अब पेलो मुझे.”

सचिन को किसी और आमंत्रण की आवश्यकता नहीं थी. उसने अपने लंड को मरियम की गांड पर रखा और दबाते हुए लंड के टोपे को अंदर कर दिया. मरियम चिहुंक पड़ी, और अपने आप को आश्वस्त कर रही थी कि सब ठीक होगा कि सचिन ने एक लम्बे धक्के के साथ पूरा लौड़ा अंदर पेल दिया. मरियम की खुली गांड भी इस आक्रमण से दहल गई. उसे लगा जैसे उसकी गांड में आग लग गई हो.

लंड जब अच्छी तरह से गांड में जम गया तो मेहुल सचिन के सिखाये अनुसार अपने लंड से चूत की चुदाई करने लगा. दस धक्कों के बाद वो रुका और इस बार सचिन ने गांड की चुदाई की. दोनों ने ये क्रम सात आठ बार दोहराया और फिर इस ताल को बदल दिया. अब दोनों एक साथ लौड़े अंदर बाहर चलने लगे. पर अभी गति सामान्य ही रखी थी. मरियम ने ऐसा सुख पहले कई बार पाया था, परन्तु उसे समय को वर्षों हो चुके थे. इन दोनों के लौडों के नाप के लौडों से डबल चुदाई का कभी अनुभव नहीं किया था. उसने पहले जब डबल चुदाई की भी थी तो लंड सामान्य नाम के ही थे. ऐसे मोटे और लम्बे लौडों के साथ उसका पहला अनुभव था. और वो इसका पूरा आनंद ले रही थी.

“फाड़ो मेरी चूत, फाड़ो मेरी गांड. चोदो मुझे, फक मी, फक मी , फक मिइइइइइइइइ.”

सचिन और मेहुल ने अब अपनी गति तेज कर दी और उस चुड़क्कड़ बूढी पर दोनों ओर से हमले तेज कर दिए. कुछ समय तक तो वो अपनी लय रख पाए फिर ये ले टूट गई और दोनों अपनी लय में मरियम को चोदने लगे. ये मरियम के लिए बहुत कष्टदायक हो गया क्योंकि उसका शरीर इस प्रकार के अत्याचार के लिए अभ्यस्त नहीं था. पर बुढ़िया थी दमदार और उसने हार न मानकर उन दोनों को उत्साहित करने के लिए चीखना बंद नहीं किया. मैडम मैरी भी अपनी प्रतिक्रिया में उन्हें उकसा रही थी.

“या बॉयज, फक द शिट आउट ऑफ़ हर. फक हर, फक हर गुड़. कम ऑन, फक हर फ़ास्ट, फक हर हार्ड.”

मेहुल और सचिन अब एक दूसरे को भूलकर मरियम की चूत और गांड का कीमा बनाने में जुट गए. मरियम जो बढ़ी आयु के कारण कम झड़ती थी, आज उस अवरोध को तोड़ते हुए रस की धार बहा रही थी. उसके शरीर में अब अकड़न होने लगी थी. बूढ़ा शरीर अब थकने लगा था. उसकी चूत ने रक्षा स्वरूप अंतिम अवसाद किया और ये इतना तीव्र था कि मरियम चीखकर ढह गई. उधर मेहुल और सचिन भी नहीं रुके. पहले सचिन ने अपना गाढ़ा द्रव्य मरियम की गांड में छोड़ा तो मेहुल भी लगभग उसी समय अपने रस से मरियम की चूत सींचने लगा.

कुछ देर रुकने के बाद सचिन ने अपना लंड को फटी हुई गांड से बाहर निकाला और एक ओर बैठ गया. मैडम मैरी ने तुरंत उठकर उसके गंदे और गीले लंड को चाटकर चमका दिया. मरियम भी मेहुल के लंड से हट चुकी थी. मेहुल उठा तो उसने बेसुध मरियम को देखा जिसके होंठों पर एक असीम आनंद और तृप्ति की मुस्कान थी. वो भी बैठ गया और मैडम मैरी ने सचिन के लंड पर अपना कर्तव्य निभाकर उसके लंड को भी चाटकर चमका दिया. सचिन और मेहुल वहीँ बैठे आसन में ही बिस्तर पर लेट गए.

“मॉम, लगता है तुमने इन दोनों की बैटरी पूरी डिस्चार्ज कर दी.” ये कहते हुए मैडम मैरी ने अपना मुंह अपनी माँ की जांघों के बीच स्थापित किया और उनके दोनों छेदों से जीवन के अमूल्य रस को ग्रहण कर लिया. फिर उन्होंने उठकर अपनी माँ के होंठ चूमते हुए कुछ अमृत पान उन्हें भी कराया.

“जवान लड़के है, अभी फिर खड़े हो जायेंगे. और तेरी तो माँ चोद देंगे.”

“हाँ हाँ, जैसे अभी तक किसी और की चोद रहे थे.” मैडम मैरी ने भी हंसकर उत्तर दिया. इस बात पर सब लोग ठहाका मारकर खिलखिला उठे.

मेहुल: “मैडम, हम बियर लेकर आते है. बहुत प्यास लगी है.”

मैडम मैरी: “ओके. हमारे लिए भी ले आना.”

मेहुल और सचिन किचन में गए और बियर लेकर लौटने लगे.

मेहुल: “मैडम की गांड ज्यादा टाइट है, उसे ऐसे चोदेेंगे तो छिल सकती है.”

सचिन: “नहीं. इतना जैल उन्होंने डाला है कि छिलेगी तो नहीं. पर देखते हैं उन्हें क्या पसंद है.”

कमरे में जाने के पहले सचिन ने उस दूसरे कमरे की ओर संकेत किया. मेहुल उसके साथ गया और दरवाजे से उन दोनों पुरुषों को देखने लगा. दोनों बैठे हुए कुछ पी रहे थे और टीवी पर अगले प्रकरण की प्रतीक्षा कर रहे थे. मेहुल और सचिन लौटकर मैडम के कमरे में चले गए. दोनों ने बियर बाँटी और बैठकर पीने लगे.

मैडम मैरी: “अगर तुम रमोना को बताओगे तो वो अवश्य मेहुल से चुदवाने के लिए कहेगी.”

सचिन: “मुझे नहीं लगता कि मेहुल को इसमें कोई आपत्ति होगी. मैडम, आपको कैसे चुदवाना पसंद है?”

मैडम मैरी: “पहले तो मैं मॉम के ही समान सोच रही थी पर मुझे लगता है कि आज थोड़ा सामान्य ही रहे तो ठीक है. इतने बड़े लौडों से एक साथ कभी चुदाई की नहीं है. और मॉम की बात अलग है, पर मुझे इतनी भयंकर चुदाई से डर लग रहा है.”

मेहुल: “आप चिंता न करें, आपको जैसी चाहिए, हम वैसी ही चुदाई करेंगे.”

बियर समाप्त करने के बाद फिर से दोनों के लंड चाटकर खड़े किये गए और इस बार सचिन लेटा और मैडम मैरी ने उसकी सवारी गांठी. और गांड की सेवा का कार्य मेहुल ने संभाला.

और एक नया घमासान युद्ध उस कमरे में फिर से छिड़ गया.

************

स्मिता का घर

अंजलि से मिलकर श्रेया जब घर पहुंची तो सभी नाश्ता कर रहे थे. उसे बाहर से आता देख मोहन और महक के सिवाय सबको आश्चर्य हुआ. अपना नाश्ता लेकर वो बैठ कर खाने लगी. सबकी आँखें अपने ऊपर देखकर उसने बताया.

“कुछ काम आ पड़ा था अंजलि से, इसीलिए चली गई थी. सोचा कहीं बाहर न निकल जाये.”

“बता कर तो जा सकती थीं.” विक्रम ने बोला।

“मुझे बताया था डैड, मुझे लगा कि थोड़ी ही देर की बात है सो कुछ कहा नहीं.” मोहन ने उत्तर दिया.

“ओके, ओके.”

नाश्ता समाप्त होते ही श्रेया ने मोहन को संकेत दिया.

“श्रेया, आज क्या तुम मेरे साथ चलना चाहोगी?”

“ठीक है, मैं कपड़े बदल लूँ. बस पाँच मिनट.”

“ठीक है, मैं यहीं बैठता हूँ. तब तक मैं और पापा बिज़नस की बातें भी कर लेंगे.”

“पाँच मिनट में क्या बात कर लोगे?” विक्रम ने आश्चर्य से पूछा।

“क्या पापा, इतने साल शादी के हो गए, आपको तो पता होगा मम्मी और श्रेया का पाँच मिनट एक घंटे से पहले पूरा नहीं होने वाला.”

दोनों हंस पड़े और स्मिता मुंह बनाने लगी. अनुमान के विपरीत एक घंटे पूरा होने के पहले ही श्रेया आ गई.

“अरे अभी ५ मिनट पूरा होने में दस पंद्रह मिनट और हैं.” मोहन ने हसंते हुए कहा.

“तो क्या इस बार आप पंद्रह मिनट रुकोगे?” श्रेया ने मुस्कुरा कर पूछा.

“अरे नहीं, चलते हैं. मॉम श्रेया लंच तक आ जाएगी.”

“ठीक है, ध्यान से आना जाना.”

मोहन और श्रेया कार में बैठे और मोहन ने कार चलाई.

“तो क्या पता चला?”

“मेरा संदेह सही निकला है. हालाँकि अंजलि ने कुछ कहा नहीं पर उसने हाव भाव से अपनी पोल खोल दी.”

“तो अब क्या करना है?”

“मधु जी से मिलने चलते हैं. उन्हें इस परिवार का सत्यापन करने में तीन चार महीने लग ही जायेंगे. तब तक अगर ये सम्मिलित होने के लिए माने तो ठीक, नहीं तो हमें इसका व्यय वहन करना ही होगा.”

“उनसे पूछा है आने के लिए?”

“नहीं, पर अगर नहीं मिलीं तो संदेश छोड़ देंगे और बाद में लौट आएंगे.”

“ठीक है.” मोहन ने कार की गति बढ़ाई और मधु जी के बंगले की ओर चल पड़ा.

************

मधुजी का घर:

मधुजी के बंगले पर पहुंचने के बाद श्रेया ने घंटी बजाई। मान्या ने दरवाजा खोला और किलकारी ली.

“श्रेया आंटी, मोहन अंकल. कैसे हो आप दोनों. दादी अपने ऑफिस में हैं और मैं बाहर जा रही हूँ. चलिए मैं आपको उनके पास ले चलती हूँ.”

मोहन और श्रेया को ये पता नहीं था कि मधुजी के घर में भी ऑफिस है. मान्या उन्हें ले गई जहाँ मधुजी किन्ही फाइलों में डूबी हुई थीं.

“दादी देखो कौन आया है.” मान्या ने कहा तो मधुजी ने उनकी ओर देखा.

“अरे श्रेया और मोहन, आओ आओ. मान्या कुछ खाने पीने के लिए ले आओ, प्लीज.”

“ओके दादी, फिर मुझे जाना है तो मैं शाम को ही आऊंगी।”

“ठीक है.”

मान्या कुछ अल्पाहार और जूस देकर चली गई. जाने के पहले उसने अपनी दादी के होंठ चूमे और फिर फुर्र से चली गई.

“क्या हुआ, बिना बताये आये हो. कोई विशेष कारण है?”

“जी. श्रेया ही बताएगी.” मोहन ने कहा.

श्रेया ने नायक परिवार के बारे में संक्षिप्त में बताया.

“मेरे विचार से वे भी हमारे समुदाय का हिस्सा बन सकते हैं. इसके लिए जो भी जाँच आवश्यक है, उसे आरम्भ कर दीजिये.”

“पर”

“अगर निरीक्षण समाप्त होने तक वे उत्तीर्ण नहीं हुए तो फिर इसका व्यय हम उठाएंगे.”

मधुजी अपनी कुर्सी पर पीछे झुकते हुए सोच में पड़ गयीं. शेट्टी परिवार नए सदस्यों के लिए आवेदन करने के लिए मुक्त था. पर उन्हें कुछ अधिक सूचना भी चाहिए थी.

“कोई विशेष कारण?”

“उनकी एक पुत्र है, जयंत, जो हमें स्नेहा के लिए उपयुक्त लगता है. विवेक भी उसे जानता है और मुझसे कह चुका है. पर वो समुदाय के नियमों से बँधा है. इस प्रकार से उन दोनों को आत्मीय होने का अवसर मिल सकता है और अगर बात बढ़ती है तो विवाह भी हो सकता है.”

“ठीक है, इस आवेदन पत्र को भर दो. मैं इसे आगे ले जाऊँगी। ध्यान रहे व्यय के विवरण में अपना नाम ही लिखना. मुझे नहीं लगता कि इतनी धन राशि के लिए आपके परिवार को कोई कठिनाई होगी.”

“बिलकुल.” मोहन ने आवेदन पत्र भरा और श्रेया ने उस पर हस्ताक्षर किये. मधु जी ने उसे एक बार ध्यान से पढ़ा. फिर अपनी टेबल पर रखा फोन उठाया और पास रखी डायरी से एक नंबर देखकर मिलाया.

“नमस्कार सिंह साहब. आपके लिए एक नया काम आया है.”

“ .”

“श्रेया और मोहन की ओर से.”

“ .”

“ही ही ही. आपको कहने की आवश्यकता ही नहीं है सिंह साहब. पर कार्य आरम्भ करने से पहले आप पारुतोष लेना चाहते हैं, ये नया है.”

“ .”

“हाँ, ये सच है कि नए परिवारों के जुड़ने की संख्या गिर गयी है. पर हमें अपना प्रयास सतत रखना होगा.”

“ .”

“जैसा आप चाहें. इसका व्यय श्रेया ने उठाने का निश्चय किया है तो आप अपने बिल उन्हें ही भेजिएगा.” फिर मधुजी ने कैलेंडर देखा और बोलीं, “आप तीन दिन बाद आ सकते हैं. हरप्रीत कैसी है?”

इसके बाद कुछ देर एक दूसरे के परिवार के बारे में बातें हुईं और फिर उन्होंने फोन काट दिया.

“डेढ़ लाख का व्यय बताया है, अगर स्वीकृत है तो बताओ.”

ये सुनकर मोहन चौंक गया. उसने श्रेया को देखा जो उत्तर दे रही थी, “आप चिंता न करें. उन्हें आगे बढ़ने के लिए कहें.”

“कुछ और भी है.” मधुजी ने कहा, “कार्य आरम्भ करने के पहले वो अपने परिवार सहित हमसे मिलेंगे.” मिलेंगे शब्द के वाचन से उसका अर्थ स्पष्ट था. “और समाप्त होने पर आपके परिवार से. पहले इन्होने कभी ऐसा नहीं किया, पर मैंने अपनी ओर से हाँ कर दी है.”

शेट्टी परिवार सिंह परिवार से पूर्व परिचित था तो आपत्ति का कोई प्रश्न ही नहीं था. इसके ही साथ श्रेया और मोहन ने जाने की आज्ञा मांगी और फिर मोहन के ऑफिस के लिए निकल गए. मधुजी ने उसके बाद चार फोन और लगाए. ये प्रबंधन कमेटी के सदस्यों को किये गए थे. उसके बाद वे अपने कार्य में लीन हो गयीं.

**********

कार में मोहन ने श्रेया से पूछा, “तुम जानती हो कि मेहुल स्नेहा को चाहता है, फिर भी?”

श्रेया, “पर उसे मैं आज समझा दूँगी, इस प्रकार से हमारे परिवार में एक और परिवार भी जुड़ जायेगा. और स्नेहा को तो मेहुल जब चोदना चाहे चोद ही सकेगा.”

“पता नहीं, पर तुम देखो. मेहुल को कोई दुःख नहीं पहुंचना चाहिए.”

“वो आप मुझ पर छोड़ दो.”

इसके बाद मोहन और श्रेया मोहन के ऑफिस पहुंचे जहाँ से मोहन ने एक ड्राइवर को श्रेया को घर छोड़ने के लिए भेज दिया. श्रेया भी अब सजने के लिए उत्सुक थी. आज उसे मेहुल के साथ चुदाई जो करनी थी. घर पहुंचकर श्रेया ने मेहुल के बारे में पूछा और फिर उसके कमरे में गई.

क्रमशः

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दोस्तों,

ये मिश्रण का अंक संभवतः चार भागों में आएगा। इसमें वो सब प्रकरण होंगे जो अब तक अपने अलग अलग अध्यायों में पढ़े हैं, परन्तु कुछ कुछ हिस्से शेष रह गए हैं.

इसमें से कुछ तो एकदम नए वृत्तांत है, और कुछ उन पात्रों से सम्बन्धित हैं जो पहले आप देख चुके हैं और जिनकी आगे भी कुछ भूमिका रहने की संभावना है.

अभी तक मैंने कुल आठ ऐसे प्रकरण ढूंढें है.

1. कामिनी का दिंची क्लब ली पूर्ण सदस्यता (इंटरव्यू का समापन)

2. शीला का दिंची क्लब में औपचारिक इंटरव्यू.

3. दिंची क्लब में सिमरन का परितोष.

4. बॉलीवुड परिवार का शो.

5. स्मिता के समुदाय का मिलन समारोह.

6. रमोना का जीवन

7. रूचि आहूजा का दिंची क्लब में स्वागत।

8. दिया के किट्टी क्लब की करतूतें.

जो इस कहानी को पूरा पढ़ रहे हैं, उन्हें अगर लगता है कि कोई छूट गया है तो अवश्य बताएं।

एक भाग में उपर्लिखित प्रकरणों में से दो को प्रकाशित किया जायेगा।

आपके बहुमूल्य सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी।

इस मिश्रण के पश्चात् हम वापिस मुख्य कथा पर लौट जायेंगे। हालाँकि ये भी उन्ही पत्रों के जीवन का अभिन्न अंग हैं और इन्हे जानना भी उतना ही आवश्यक है.
 
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