Incest कैसे कैसे परिवार - Page 5 - SexBaba
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Incest कैसे कैसे परिवार

धन्यवाद कामदेव भाई.

मैंने भी ये कहानी कुछ सोचकर ही लिखना आरम्भ किया था.

१. अधिकतर कहानियों में कहानी नए पात्रों को आगे बढ़ने के लिए जोड़ती हैं, मैंने इसीलिए पात्र कहानी के साथ साथ परस्पर मिलेंगे, ये सोचकर लिखी है. कुछ पात्र अवश्य बाहर से आएंगे, जो आवश्यक हैं अन्यथा कहानी में रूचि कम हो सकती है.

२. कहानी में चुदाई का विवरण अधिक नहीं है, मैंने आयाम और परिस्थितियों पर अधिक ध्यान दिया है.

आपकी विवेचना से उत्साह बढ़ा है, और आशा रहेगी कि आप आगे भी इसी प्रकार से मनोबल बढ़ाएंगे।

वैसे,

पिक्चर अभी बाकी है.
 
अध्याय २६: आठवाँ घर - स्मिता और विक्रम शेट्टी 3

समुदाय का मिलन समारोह


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समुदाय का मिलन समारोह

आज सुबह :


समुदाय के कार्यक्रमों के आयोजन नगर के बाहर एक रिसोर्ट में होते थे. कुल मिलकर लगभग सौ से एक सौ बीस लोग भाग लेते थे और इसके लिए कोई भी और स्थान उपयुक्त नहीं था. रिसोर्ट के स्वामी समुदाय के सदस्य थे और वे सारा आयोजन बहुत गोपनीय रखते थे. जिस समय ये आयोजन होता था रिसोर्ट में समुदाय के सिवाय कोई नहीं होता था. सभी कर्मचारियों को छुट्टी दे दी जाती थी. सारे सदस्यों के आने के पश्चात् रिसोर्ट को बंद कर दिया जाता था. पूरे रिसोर्ट में CCTV लगे थे और किसी एक परिवार को लॉटरी द्वारा इन्हें देखने के लिए चुना जाता था. परिवार के एक सदस्य को सदैव कण्ट्रोल रूम में कैमरों द्वारा निगरानी रखनी होती थी.

समुदाय की सबसे वरिष्ठ सदस्या रिसोर्ट मालिक की माँ मधुलिका चड्ढा (मधु जी) थीं, प्रबंधन समिति की मुखिया थीं. ये कहा जाता है कि इस समुदाय की नींव इन्होने अपने पति के साथ रखी थी. प्रबंधन समिति में केवल वही एकमात्र थीं जिनके पास वीटो था, अर्थात वे किसी भी निर्णय को नकार सकती थीं, हालाँकि अकेले निर्णय लेने का अधिकार उन्हें भी नहीं था. प्रबंधन समिति के अन्य चार सदस्यों में दो पुरुष और दो महिलाएं थीं. कोई भी सदस्य एक परिवार से नहीं था. प्रति वर्ष अन्य चार सदस्य नए चुने जाते थे और इसके लिए भी एक निर्धारित पद्दति बनाई हुई थी. ये समुदाय का १२वां वर्ष था और आज तक इसे छोड़कर कोई भी नहीं गया था.

समुदाय में विवाह अंदर ही करने का प्रचलन था, हालाँकि अगर बाहर विवाह होता था तो परिवार को एक वर्ष के लिए अस्थायी रूप से निष्काषित किया जाता था जिससे वे नए वर या वधु को अपने रंग में ढाल सकें. अगर वे इसमें सफल होते थे तो एक वर्ष या उसके बाद वे समुदाय में लौट सकते थे. और जैसा कि बताया गया है, आज तक किसी को ये समुदाय छोड़ना नहीं पड़ा था.

प्रबंधन समिति की चर्चा प्रारम्भ हो चुकी थी. आर्थिक स्थिति को जांचने के पश्चात समुदाय के मासिक शुल्क में २०% की बढ़ोत्तरी का निर्णय हुआ. ये शुल्क प्रति सदस्य होता था, और स्त्रियों को इसमें १०% की छूट दी जाती थी. इसके बाद उन प्रस्तावों पर विचार किया गया जिसमें सदस्य अपने पुत्र या पुत्री को अगले महीने सम्मिलित करने के इच्छुक थे. इस बार कुल तीन नए प्रस्ताव थे. तीनों परिवार के सदस्यों को बुलाया गया और उनसे इस बात की पुनः पुष्टि की गयी. तदोपरांत उनके प्रस्ताव स्वीकार होने पर नए आने वाले सदस्य का पंजीकरण शुल्क एवं अगले वर्ष का शुल्क ले लिया गया. उन्हें बधाई देकर, आगे के कार्यक्रम के लिए सभा चलती रही.

एक नए सदस्य परिवार का आज परिचय दिया जाना था. और इस समय तक प्रबंधन समिति के पांच सदस्यों और उस परिवार के प्रायोजक के सिवाय किसी को भी इनके बारे में कुछ भी नहीं पता था. ये बताया गया कि परिवार के छह सदस्य रिसोर्ट में पहुँच चुके थे और वे अपने उद्घाटन के लिए उत्सुक थे. अन्य कई और विषयों पर चर्चा करने के बाद सभा समाप्त हुई. बाहर देखा तो समुदाय के अधिकतर लोग आ चुके थे और लॉन में होकर चाय या जूस पी रहे थे. समुदाय के आयोजनों में शराब पर कठोर पाबन्दी थी. आयोजन १२ बजे प्रारम्भ होता था और १.३० पर खाने का समय होता था. चूँकि अभी समय शेष था तो पांचों आगे बढ़कर अन्य सदस्यों से मिलने में व्यस्त हो गए. कुछ देर में ११.३० बजने को आये और सभी लोग सभागृह में चले गए.

सभी लोगों ने जाकर समुदाय की पोषक पहनी, जो एक चोगा और जो केवल एक डोर से बंधा हुआ था. ये रेशम के धागे से बने हुए थे और पुरुषों के गाउन नीले और स्त्रियों के लाल रंग के थे. अन्य किसी भी प्रकार के वस्त्र या आभूषण की अनुमति नहीं थी. स्त्रियां नाक और कान के आभूषण पहन सकती थीं, और कोई भी आभूषण, घडी, मोबाइल इत्यादि अपने लॉकर में ही छोड़ना था. गाउन में कोई जेब नहीं थी. वस्त्र परिवर्तन के पश्चात् सभी सभागृह में प्रविष्ट हो गए.

सभागृह में प्रवेश करने के बाद सभी दरवाजे बंद कर दिए गए, और रिसोर्ट में लगे कैमरों से ये स्थापित किया गया कि समुदाय के सिवाय वहां कोई और नहीं है. कैमरों की निगरानी के लिए मधुजी ने एक बड़े काँच के कटोरे में से एक पर्ची निकाली. जिस परिवार को कैमरों की निगरानी का दायित्व मिला, उस परिवार के लड़के ने, जो उनमे सबसे छोटा था जाकर मोर्चा संभाला. इसके बाद सभी लोग अपने परिवार के साथ ही बैठ गए. प्रबंधन समिति के सदस्य सामने बने स्टेज पर एक ओर जाकर बैठे.

आज उस स्टेज के दो छोर पर दो पलंग लगे हुए थे जो नए परिवार के सदस्यों के लिए थे. इस कमरे के पलंग केवल छह इंच ऊंचे थे, यानि बहुत ही कम ऊंचाई के थे. समय के साथ समुदाय ने सामान्य पलंग बदल कर उन्हें छोटा कर दिया था. इन्हें देखने के बाद सदस्यों में एक उत्साह की लहर दौड़ गई. सभी नए सदस्यों का दर्शन करने के लिए लालायित थे.

समिति की मुखिया श्रीमती मधुलिका चड्ढा (मधु) खड़ी हुईं और माइक पकड़ लिया. मधु जी इस समय ६५ वर्ष की आयु पार कर चुकी थीं पर उनके चेहरे की कांति और शरीर का स्वरूप आज भी लोगों को आकर्षित करता था. उनके पति, बेटा, बहू अपने बच्चों के साथ नियत स्थान पर बैठे थे.

मधु: “साथियों आज हम फिर अपने मासिक समारोह के लिए एकत्रित हुए है. आप सबका स्वागत है.”

सभी ने तालियां बजाकर उनका उत्तर दिया.

“मुझे ये घोषणा करते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है कि हमारे समुदाय में एक और विवाह तय हुआ है और उसे सम्पन्न किया जायेगा. मैं चाहूंगी कि भावी पति और पत्नी सामने आएं और आप सबका आशीर्वाद लें.” एक लड़का और एक लड़की निकल कर आये और स्टेज पर खड़े हो गए.

“जैसा कि हमारा प्रचलन है, हम सामाजिक विवाह को एक औपचारिकता मानते हैं. हम प्रबंधन समिति, आप सबकी अनुमति से, इन्हें आज ही विवाह सूत्र में बांध रहे हैं. अगर किसी को भी आपत्ति हो तो वो आज और इसी समय बोले, या जीवन पर्यन्त शांत रहने का निर्णय ले.”

कुछ समय तक किसी की आपत्ति की प्रतीक्षा करने के उपरान्त उन्होंने आगे बोलना आरम्भ किया, “इसके बाद सामाजिक विवाह अपने समय अनुसार होगा, पर हमारी दृष्टि में ये आज ही पति-पत्नी माने जायेंगे. इनके माता-पिता से भी यहाँ आने की विनती है.”

दोनों के माता पिता भी आकर खड़े हो गए. इसके बाद समिति के अन्य चार सदस्य मधु जी के साथ खड़े हो गए. लड़की के पिता ने अपनी बेटी के शरीर के चोगे की डोर खींची और उसके चोगे को निकाल कर उसकी माँ को दे दिया. उधर लड़के की माँ ने उसका चोगा निकाला और उसके पिता को दे दिया. भावी वर वधू सबके सामने खड़े हो गए. लड़के की माँ ने फिर उसका चोगा लड़की की माँ को सौंप दिया. वहीँ लड़की के पिता ने उसका चोगा लड़के के पिता को दे दिया.

“समुदाय के इस प्रतीक के एक परिवार से दूसरे परिवार में देने से अब ये परिवार एक हो गए हैं. वधू की सभी खुशियों और इच्छाओं का उत्तरदायित्व अब वर के परिवार का है.”

वर-वधू ने अपने माता-पिता और फिर पांचों समिति के सदस्यों का आशीर्वाद लिया.

मधु जी: “अब इनका सामाजिक विवाह २ महीने बाद है. समाज के नियमों के अनुसार ये तब तक साथ नहीं रह सकते और जैसा कि हमारी परम्परा है, समुदाय अपने व्यय पर इन्हें एक सप्ताह के लिए बाहर भेज रहा है. अब आप इन दोनों परिवारों के एकीकरण के लिए इन्हें बधाई दें. वर और वधू आयोजन के समापन के पश्चात् आप सबको एक साथ विदा करेंगे.”

ये कहकर मधुजी ने कार्यक्रम के इस चरण का समापन किया.

मधुजी: “मेरे प्यारे साथियों, जैसा आप जानते हैं अगले चरण के लिए, आपको किसी अन्य परिवार के साथ बैठना है. इसके लिए हमारी पर्चियां बनी हुई हैं. जैसा आप जानते हैं, पर्चियों पर स्त्रियों के नाम हैं. अगर पर्ची आपके ही परिवार के सदस्य की होगी तो अंत में आप उसे बक्से में डालकर नई पर्ची निकाल सकते हैं. अगर ऐसा होगा तो आपको उस कोने में जाकर खड़ा होना होगा. हर स्त्री की पर्ची पर एक का नंबर है, पर्ची निकलने के बाद उन्हें अपने साथी के साथ उस निर्धारित पलंग पर जाना है. क्योंकि आज मिलन में पुरुष अधिक हैं तो उनके साथी का निर्णय बाद में एक लॉटरी से होगा.”

इसके बाद उन्होंने एक लड़के को बुलाया और उसे पर्चियों से भरा एक कांच का बक्सा दिया. साथ में एक लड़की भी थी जो एक खाली कांच का बक्सा लिए हुए थी. इस बक्से में पढ़ने के पश्चात् स्त्रियों ने पर्ची लौटानी थी.

लड़के ने सबसे पहले समिति के पुरुष सदस्यों को अपनी पर्ची निकालने का आग्रह किया. पर्ची पर नाम देखकर वे अपनी साथी स्त्री के पास गए और निर्धारित स्थान पर बैठ गए. लड़के ने लगभग दस मिनट में सभी पर्चियां बाँट दीं. पर अभी भी ६ पुरुष शेष थे जिन्हें कोई साथी नहीं मिला था. और ४ पुरुष ऐसे थे जिन्हें उनके ही परिवार की सदस्य मिली थी. ये दस पुरुष एक ओर खड़े हो गए. चारों पर्चियां बक्से में लौटा दी गयीं और पहले उन ६ पुरुषों को निकालने के लिए दी गयीं. इस बार सबको सही साथी मिले और वे अपने साथी के साथ निर्धारित पलंग पर बैठ गए. लड़की के हाथ के बक्से में अब सारी पर्चियाँ थीं और लड़के के हाथ का बक्सा अब खाली था.

कुल आठ पुरुष (बक्से वाले लड़के और निगरानी पर लगे को मिलाकर) बिना साथी के थे. लड़की ने सबसे पहले लड़के की और बक्सा बढ़ाया. यही प्रक्रिया उसने उपस्थित अन्य पांच पुरुषों के साथ भी की. छटवें पुरुष को लड़की ने अपनी पर्ची सौंप दी. फिर उसने निगरानी पर लगे लड़के के लिए एक पर्ची निकाली और उसकी घोषणा कर दी. इसके बाद उसने अपनी पर्ची को बक्से में डाला और अपने साथी के साथ अपन बेड पर चली गई. इस पूरे आयोजन में लगभग ३० मिनट निकल गए थे.

इस पूरी गतिविधि पर छह जोड़े ऑंखें गढ़ाकर देख रही थीं. ये वो परिवार था जिसे आज सम्मिलित किया जाना था. वो पूरे आयोजन के सञ्चालन से बहुत प्रभावित हुए थे. और अब समय था उनके स्टेज पर बुलाये जाने का. मधुजी, जो स्वयं एक पलंग पर बैठी हुई थीं खड़ी हो गयीं और प्रबंधन समिति के सदस्यों के साथ स्टेज पर लौट गयीं.

“अब आप सबको अपने साथी मिल चुके हैं. आशा है आप सब लगे हुए पलंग पर सुखद अनुभव कर रहे होंगे. मैं देख रही हूँ आज की उन सौभाग्यशाली महिलाओं को जिन्हें आज दो दो पुरुष साथियों का सान्निध्य प्राप्त हुआ है. मुझे विश्वास है कि इन सभी को आनंद आएगा. अब हम अपने अगले चरण के लिए अग्रसर होंगे. आज का दोपहर का खाना देर से होगा, क्योंकि आज एक विवाह संपन्न करने और अब एक नए परिवार को परिचित करते हुए उन्हें समुदाय में सम्मिलित करने के कारण समय अधिक व्यतीत होगा. पर मुझे नहीं लगता कि किसी को खाने की इतनी तीव्र इच्छा होगी जब पकवान आपके साथ ही होगें.” इस बात पर सब खुल के हँसे और कुछ लोगों ने ताली भी बजाई।

“अब इस दूसरे चरण की समाप्ति के साथ हम आपको अपने से आज जुड़ने वाले एक नए परिवार से परिचय करवाते हैं. मैं समझती हूँ कि आपमें से कुछ उनके साथ के लिए उत्सुक होंगे.” ये कहते हुए मधुजी ने सभी परिवारजनों का बिना नाम लिए हुए परिचय कराया.

सभी लोग अपने स्थान पर खड़े हो गए स्वागत के लिए.

“तो आइये मिलते हैं हमारे समुदाय के नए सदस्य परिवार से: राणा परिवार”

सभी लोग तालियां बजाने लगे.

सबसे पहले घर के मुखिया श्री जीवन राणा.

जीवन ने प्रवेश किया.

उनके बाद उनके बेटे श्री आशीष राणा.

आशीष स्टेज पर आ गया.

आशीष की पत्नी श्रीमती सुनीति राणा।

सुनीति स्टेज पर आयी.

आशीष और सुनीति की पुत्री अग्रिमा.

अग्रिमा ने स्टेज पर कदम रखे.

आशीष और सुनीति का बड़ा पुत्र असीम.

असीम स्टेज पर आया.

और उनका छोटा पुत्र कुमार.

कुमार भी स्टेज पर आ गया.

राणा परिवार ने समुदाय के चोगे पहने हुए थे. और जैसा कि उन्हें समझाया गया था. सबसे पहले जीवन आगे बढ़ा और उसने अपने चोगे को उतार कर एक ओर पड़ी कुर्सी पर डाल दिया. उसके बाद वो सबकी ओर मुंह करके खड़ा हो गया. अब आशीष आगे बढ़ा और उसने भी अपने चोगे को निकाला और कुर्सी पर डाल दिया और अपने पिता के साथ खड़ा हो गया. सुनीति ने जैसे ही अपना चोगा उतारा तो कई सारी “आह” की आवाज़ें सुनाई दीं. सुनीति ने मुस्कुराते हुए अपने चोगे को कुर्सी पर रखते हुए आशीष के साथ का स्थान ले लिया. इसी प्रकार अग्रिमा, असीम और कुमार ने भी किया और समस्त परिवारजन पूरे समुदाय के समक्ष नंगे खड़े हुए थे. औरतों की चूतें पसीजने लगीं थीं तो वहीँ पुरुषों के लौड़े खड़े हो चुके थे.

इसके बाद मधुजी ने आगे बढ़कर सभी को समुदाय की शपथ दिलाई.

मधुजी: “मैं आज आप सबकी ओर से अपने नए सदस्यों का स्वागत करती हूँ. अब जैसा कि हमारा नियम है, ये हमारे समक्ष अपने पारिवारिक सम्भोग का प्रदर्शन करेंगे. मैं जीवन जी से पूछना चाहूंगी कि वो ये किस प्रकार से प्रस्तुत करेंगे. आप किसी भी भाषा में इसे समझा सकते हैं. अर्थात अगर आप सम्भोग के स्थान पर चुदाई शब्द का उपयोग करेंगे तो भी इसे उपयुक्त ही माना जायेगा.”

जीवन: “आप सभी को मेरा नमस्कार. मैं अपने परिवार की ओर से आप सबका धन्यवाद करता हूँ जो अपने हमें अपने समुदाय में स्थान दिया. हम समुदाय के सभी नियमों का पालन करेंगे और किसी भी प्रकार से आपको गलत सिद्ध नहीं होने देंगे. आज मैं और मेरा बेटा आशीष, मेरी पोती अग्रिमा की चुदाई करेंगे और मेरे दोनों पोते मेरी बहू और उनकी माँ सुनीति की. मुझे आशा है कि आपको हमारा ये प्रदर्शन आपको आनंदित करेगा.”

ये कहते समय आशीष अग्रिमा को लेकर जीवन के साथ खड़ा हो गया और असीम और कुमार सुनीति के दोनों ओर खड़े हो गए. पर इन सबसे अलग कुछ लोग सुखद आश्चर्य से उन्हें देख रहे थे. ये कोई और नहीं बल्कि शेट्टी परिवार के पांचों सदस्य थे, जो राणा परिवार के पड़ोसी थे और उनके समधी परिवार के चार सदस्य, जो उन सबसे पहले मिले हुए थे.

मधुजी: “मैं जानती हूँ, कि आपमें से कुछ इन्हें पहचानते होंगे, परन्तु इस जान पहचान को स्वयं तक ही सीमित रखें. समुदाय में सभी से एक ही व्यवहार किया जाता है. अब हम अपने मिलन समारोह का तीसरा चरण आरम्भ करेंगे. कृपया आनंद लें. हमारे सुमदाय का लक्ष्य यही है. मैं जीवन जी के परिवार को आमंत्रित करूंगी कि वे अपने पारिवारिक प्रेम का लीला का शुभारम्भ करें.”

जीवन और आशीष अग्रिमा के साथ एक ओर पड़े पलंग की ओर चले गए और सुनीति, असीम और कुमार के साथ दूसरी ओर।

मधुजी: “मैं आशा करूंगी कि सभी सदस्य इस प्रदर्शन पर ध्यान देंगे और अपनी भावनाओं पर अंकुश लगाएंगे और स्वयं सम्भोग में लिप्त नहीं होंगे. आप जानते हैं की इस परिवार के ऐसे प्रदर्शन का ये एकमात्र अवसर है और ये हमारे मिलन में कभी दोबारा इस प्रकार से नहीं मिलेंगे.”

सभी सदस्यों ने इस बात पर स्वीकृति दी. ये उनके संयम की भी परीक्षा थी. उनके अपने शारीरिक उत्सव में अभी देरी थी पर वे जानते थे कि ये समय और दृष्टान्त उन्हें दोबारा कभी भी देखने को प्राप्त नहीं होगा.

जीवन और आशीष, अग्रिमा को अपनी बाँहों में लेकर चूम रहे थे. जहाँ जीवन उसके होंठों का स्वाद ले रहा था, वहीँ आशीष उसके पीछे से उसकी गर्दन और कानों में अपने होठों से मिश्री घोल रहा था. सुनीति को भी उसके दोनों पुत्र अपने बाहुपाश में बाँधे हुए थे पर उनकी होंठों का लक्ष्य सुनीति के तने हुए स्तन थे. दोनों ने एक एक स्तन को अपने होंठों में लिया हुआ था. वहीँ जहाँ असीम के हाथ सुनीति की चूत को छेड़ रहे थे, कुमार ने अपने हाथ को सुनीति के नितम्बों पर रखा हुआ था और संभवतः उसकी एक या दो उँगलियाँ उसकी गांड को छेड़ रही थीं.

सुनीति पलंग पर बैठी और अपने दोनों बेटों के लौड़े अपने मुंह में लेकर चाटने लगी. दर्शक दीर्घा उस दोनों के लंड देखकर बहुत प्रभावित थी. औरतें अपनी चूतें सहला रही थीं और लड़के सुनीति के हिलते मम्मों में खोये हुए थे. पुरुषों का ध्यान दूसरी ओर चल रहे समागम पर था जहाँ अब अग्रिमा भी पलंग पर बैठी अपने नाना और पिता के लौड़े चूस रही थी. जब ये निश्चित हो गया कि लंड अपने सबसे कड़े स्तर पर पहुँच गए हैं तो अग्रिमा पलंग पर लेट गयी. जीवन उसके आगे झुका और उसकी चूत में अपना मुंह डालकर उसे चूसने लगा. दर्शकों को दूरी के कारण अधिक कुछ दिख नहीं रहा था, परन्तु उन्हें इस प्रेमालाप की भावना अधिक प्रिय थी.

सुनीति भी लेट गई और उसकी चूत में कुमार ने अपना मुंह डाल दिया.

आशीष ने ऊपर होते हुए अपने लंड को अग्रिमा के मुंह में डाल दिया जिसे वो बहुत प्रेम से चूस रही थी. असीम ने अपने लंड को सुनीति के मुंह में डाला हुआ था और सुनीति के बड़े बड़े मम्मे दबाने लगा. हालाँकि दर्शक सूक्ष्मता से कुछ भी नहीं देख रहे थे परन्तु उन्हें ये अवश्य चकित कर रहा था कि इस परिवार को इतने लोगों के सामने अपने प्रदर्शन में कोई भी कठिनाई नहीं हो रही थी. कई लोग अपने पहले प्रदर्शन की याद करके अचंभित थे, क्योंकि उन्हें बहुत ही कठिनाई हुई थी.

अब चूँकि समय सीमित था, इसलिए जीवन ने उठकर अपने लंड को अग्रिम की चूत में लगाकर अंदर धकेल दिया. जैसे ही उसका लंड अंदर प्रवेश किया हॉल तालियों की ध्वनि से गूँज उठा. और ये तालियाँ रुक नहीं पायीं क्योंकि कुमार ने भी अपने लंड को सुनीति की योनि में डाल दिया था. कुछ समय पश्चात् तालियॉँ थम गयीं, परन्तु चुदाई अभी प्रारम्भ ही हुई थी.

जीवन और कुमार अपनी समुदाय की अन्य स्त्रियों को अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए अच्छी गति से लम्बी और गहरी चुदाई कर रहे थे. और सच ये था कि उनके इस कौशल पर समुदाय की अधिकतर स्त्रियां अपनी चूत से बहते हुए पानी को रोक नहीं पा रही थीं. परन्तु इसका अर्थ ये नहीं था कि पुरुष वर्ग किसी भी प्रकार की ईर्ष्या से उद्विग्न था. सभी यहाँ पर सम्भोग को प्रेम का पर्याय मानते थे और जहाँ शक्तिशाली चुदाई अच्छी लगती थी, वहीँ प्रेम का सम्भोग ही इस पूरे समुदाय की नींव थी.

कुछ समय के बाद जीवन और आशीष ने अपने स्थान परिवर्तित किये और अब आशीष अपनी बेटी की चुदाई में व्यस्त हो गया वहीँ अग्रिमा अपने नाना के लंड पर से अपनी चूत के रस को चाटने के बाद चूसने लगी. परिवार के सामंजस्य की ये अति थी कि जहाँ एक ओर कुछ भी परिवर्तन होता कुछ ही समय में बिना किसी आग्रह के दूसरी ओर वही होता था. असीम अब अपनी माँ सुनीति की चुदाई कर रहा था और कुमार सुनीति को उसकी ही चूत के रस से लथपथ लंड चूसने के लिए प्रस्तुत कर रहा था. सुनीति ने उसे अपने मुंह में लेने में एक क्षण की भी देरी नहीं की.

हॉल का वातावरण अत्यंत वासनामयी हो चूका था. सभी बहुत कामातुर हो चुके थे परन्तु सामने चल रहे दृश्य पर से वे आंख नहीं हटा पा रहे थे. कुछ स्त्रियों अपने साथी के लंड अपने हाथ में लेकर हिला अवश्य रही थीं पर उनका पूरा ध्यान सामने चल रही चुदाई पर ही था. चूँकि प्रदर्शनी के लिए मात्र २० मिनट ही नियुक्त थे, एक घंटी ने खिलाडियों को सूचित किया कि अब केवल ५ ही मिनट बचे हैं. परन्तु इस सूचना की आवश्यकता नहीं थी, सुनीति और अग्रिमा की आनंदकारी सिसकारियां हॉल में गूंज रही थीं. और चारों पुरुष भी अपने चरम पर पहुँच चुके थे. कुछ ही क्षणों में प्रेम के लावे ने सुनीति और अग्रिमा की चूतों को भर दिया। दूसरे छोर पर भी कुमार और जीवन ने अपने रस से दोनों के मुंह भर दिए.

जीवन, आशीष, कुमार और असीम उठकर खड़े हुए और सबके सामने झुकते हुए तालियों का अभिनन्दन किया. अग्रिमा उठी और उसने अपनी माँ के मुंह पर अपनी चूत रखते हुए 69 की मुद्रा में सुनीति की चूत में अपना मुंह डाल दिया. माँ बेटी ने एक दूसरे की चूतों से बह रहे रस को चाटकर और चूसकर ग्रहण किया. हॉल में तालियां अब रुक नहीं रही थीं. जब अग्रिमा ने अपने चेहरे को ऊपर किया तो सभी उसके चेहरे पर चमक रहे कामरस को देख पा रहे थे. इस बार अग्रिमा उठ गयी और उसने झुकते हुए अभिनन्दन किया और उसके पीछे पीछे सुनीति ने भी आकर यही कार्य सम्पन्न किया. इसके बाद सबने अपने चोगे पहने और एक ओर खड़े हो गए.

इसके बाद मधुजी ने घोषणा की, “इसके साथ ही वो सारे कार्यक्रम जो आवश्यक तो हैं पर जिनसे आप सबके मिलन समारोह में रुकावट आती है, समाप्त हुए.”

पूरा हॉल इस टिप्पणी पर हंसने लगा.

“अब हम भोजन के लिए एक घंटे का विराम लेंगे. भोजन सदैव के समान उसी स्थान पर है. मैं प्रबंधन समिति के सदस्यों से आग्रह करूंगी कि वे आगे आएं और हमारे नए परिवार को भोजन के लिए ले चलें.”

भोजन भी एक प्रकार का मिलन समारोह ही था. सभी एक दूसरे के साथ मिल रहे थे. सबसे अधिक उत्सुकता राणा परिवार से मिलने की थी और उनके पास बहुत लोग जमा थे. एक दूसरे से परिचय हो रहा था पर चूँकि फोन या और कुछ भी उपलब्ध नहीं था तो सभी समुदाय की प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका की प्रतीक्षा कर रहे थे, जो समारोह के अंत में मिलती है. इसका प्रकाशन गुप्त रखा जाता था, हालाँकि इसमें ऐसा कुछ भी नहीं होता था जो आपत्तिजनक हो.

भोजन समाप्त होने में एक घंटा निकल गया और सभी लौट कर अपने निर्धारित स्थानों पर लौट गए. राणा परिवार भी स्टेज पर अपने पहले वाले स्थान पर पहुँच कर अगले कार्यक्रम की प्रतीक्षा करने लगा. हॉल को लॉक करने के पश्चात् मधुजी ने फिर से माइक संभाला, पर इस बार उनके साथ उनका साथी भी था जो २०-२२ वर्ष का लड़का था. घुंघराले बालों और लम्बे चौड़े व्यक्तित्व के उस लड़के की आभा बहुत आकर्षक थी. सुनीति के मुंह में पानी आ गया. परन्तु उसे अभी समुदाय के नियम ठीक से पता नहीं थे और इसीलिए उसने अपनी भावनाओं को संयत किया. और मधुजी की घोषणा सुनने लगी.

मधुजी: “मित्रों, आज मुझे बहुत प्रसन्नता है कि हमारा ये समुदाय अब २५ सदस्यों को छू चुका है. मैं ये भी बड़े गर्व से कहती हूँ, कि हमारे समुदाय से इन बारह वर्षों में आज तक कोई छोड़कर नहीं गया है. हम सब परिवार में स्वेच्छिक और बिना सीमा या ईर्ष्या के संबंधों में विश्वास रखते हैं. ये भी प्रसन्नता का विषय है कि आज हमारे दसवें जोड़े का विवाह संपन्न हुआ है. अर्थ ये है कि हमारे बीच में २० परिवार हैं जो अब सम्बन्धी भी बन चुके है.”

“इससे हमारा समुदाय और भी निकट आएगा और आशा है कि हम सब एक दूसरे को इसी प्रकार से प्रेम करते रहेंगे. क्योंकि आगे चलकर और विवाह भी होने हैं और उन्हें हमें यथोचित मधुमास के लिए भेजना है, तो जैसा हमारा पूर्व निर्णय था, हमारा मासिक शुल्क २० प्रतिशत से बढ़ाया जा रहा है. इसके साथ ही कुछ और भी परिवर्तन के सुझाव हैं जिन पर विचार किया जा रहा है, और उन्हें नई समिति के समक्ष हम अपनी टिप्पणियों के साथ रखेंगे. इस पर वे ही आगे निर्णय लेंगे.”

ये कहते हुए मधुजी ने अपने साथ खड़े लड़के की ओर देखकर सिर हिलाया और स्वयं माइक पर बोलती रहीं. लड़के ने उनके चोगे की डोर खोली और उसे उतारकर एक ओर रख दिया. लड़के ने भी अपना चोगा निकाला और मधुजी के चोगे के साथ रख दिया. सभी स्त्रियां उस कामदेव जैसे मोहक लड़के के देखकर आहें भरने लगीं. लड़का जिसने नाम सिद्धार्थ था मधुजी के पीछे खड़ा होकर उनके स्तन दबा रहा था. उसके पीछे खड़े होने के कारण उसका पूरा शरीर सबको दिख नहीं रहा था, पर जो औरतें उसके साथ समागम कर चुकी थीं वो जानती थीं कि वो एक पारंगत प्रेमी है और उन्हें मधुजी से जलन हो रही थी कि उन्हें आज उसका सामंजस्य प्राप्त हुआ है. मधुजी के लिए ये नया नहीं था, वे बिना रुके अपनी बात कहे जा रही थीं, और अब उनकी बातें समाजिक परिपेक्ष में अश्लील होने लगी थीं.

“हमारा ये चरण सदैव के समान सवा घंटे का होगा। मुझे आशा है कि ये समय एक बार चूत चुदवाने और एक बार गांड मरवाने के लिए पर्याप्त होगा. और आप में से कोई भी इस आनंद से वंचित नहीं रहेगा. मैं उन सदस्य महिलाओं को बधाई देती हूँ जिन्हे आज दो पुरुषों का संसर्ग प्राप्त हुआ है. मुझे आशा है कि वे इस अवसर का पूरा लाभ उठाएंगी और अपनी चूत और गांड दोनों में लौड़े लेकर अपनी शरीर और आत्मा की तृप्ति करेंगी. इसके बाद ३० मिनट का एक और विराम होगा. उसके बाद विवाह का कार्य पूर्ण किया जायेगा. तो आइये, अब इस परस्पर प्रेम का आनंद उठायें.”

ये कहते हुए मधुजी ने माइक बंद किया और मुड़कर सिद्दार्थ के बाँहों में लेकर उसे चूम लिया. और ये चुम्बन चलता रहा और एक दूसरे को चूमते हुए वे अपने निर्धारित पलंग पर पहुँच गए. अन्य पलंगों पर भी यही गतिविधि चल रही थी. राणा परिवार जो ऊपर स्टेज पर बैठा था उसे सामने का पूरा सामूहिक चुदाई का दृश्य दिख रहा था. उन्हें आज मात्र देखने की ही अनुमति थी, जिससे वो जान सकें कि समुदाय में किस प्रकार की क्रीड़ाएं इन मिलन के समय होती हैं. वे आज मात्र अपने परिवार में ही सहवास कर सकते थे.

इस सबसे अलग एक महिला निकल कर उस कक्ष में गयी जहां पर निगरानी पर लगा हुआ लड़का CCTV देख रहा था. कमरा बंद करते हुए उसने अपना चोगा निकाला और फिर उस लड़के को अपनी बाँहों में लेकर उसके चोगे को भी अलग कर दिया और उसके लंड को चूसने लगी.

मुख्य हॉल में वासना का तांडव हो रहा था. हर पलंग पर जोड़े एक दूसरे को संतुष्ट करने का पूर्ण प्रयास कर रहे थे. मधुजी की चूत में इस समय उस लड़के का मुंह था और उनके चेहरे के भावों से वो उन्हें सुख देने में उत्तीर्ण होता प्रतीत हो रहा था. किसी पलंग पर चूत चाटी जा रही थी, तो कहीं पर लंड. कहीं गांड में मुंह डाले हुए आदमी अपनी साथिन को सुख दे रहा था तो कहीं स्त्रियां अपने पुरुष साथी के लंड चूस रही थीं.

राणा परिवार ये सब देखते हुए स्वयं भी उत्तेजित हो रहा था. फिर जीवन ने अपना चोगा उतारा और सुनीति के सामने अपने लंड को हिलाया. परिवार के लिए ये संकेत पर्याप्त था. चंद पलों में ही सबके चोगे धूल चाट रहे थे. सुनीति के सामने चार लौड़े झूल रहे थे क्योंकि अग्रिमा तो सामने चल रही कामलीला से स्वयं को पृथक करने में असफल रही थी.

सुजाता के साथ उनकी ही आयु का एक पुरुष था जो उसकी चूत चाटने के बाद अब उसके मुंह में अपना लंड पेल रहा था. सुजाता अपनी चूत अपने ही हाथों से मसल रही थी. विवेक को आज एक ५६ वर्ष की स्त्री का संसर्ग प्राप्त हुआ था जो उसके लंड पर न्योछावर थी, और उसने चूत से पहले अपनी गांड मरवाने की इच्छा की थी. विवेक को एक भले मानुस होने के कारण इसमें कोई आपत्ति नहीं थी. मोहन जिस स्त्री के साथ था उसकी आयु ४५ वर्ष के निकट थी और वो उन सौभाग्यशाली महिलाओं में थी जिन्हें दो पुरुष साथी लॉटरी में मिले थे. और वो मधुजी के सुझाव अनुसार इसका पूरा लाभ उठा रही थी. जहाँ उसने मोहन के लंड को अपने मुंह में लिया हुआ था वहीँ एक ५० वर्ष का पुरुष उसकी चूत और गांड चाटने में व्यस्त था. इन सज्जन से वो पहले भी कई बार चुद चुकी थी और वो चूत को केवल चाटने और गांड को मारने के ही इच्छार्थी थे. चूत पर वो कम ही ध्यान देते थे. इसी कारण आज वो दोनों ओर से चुदवाने की इच्छुक थी.

अग्रिमा के ध्यान को न बाँटते हुए सुनीति ने चारों को स्वयं ही संतुष्ट करने का निश्चय किया. उसने जीवन को लिटाते हुए उनके लंड को अपनी चूत में सरकाया और अच्छी सवारी गांठ ली. इस ताल में आने के बाद जब उसे लगा की लंड सही बैठ गया है वो आगे की और झुकी. असीम ऐसी ही स्थिति के लिए आतुर था और उसने कुमार से बाजी मारते हुए, अपने लंड को सुनीति की गांड में पेल दिया. सुनीति की आनंद भरी कराह निकल गयी. पर उसे सोचने के लिए अधिक समय नहीं मिला क्योंकि इस बार कुमार ने अपने पिता को हराते हुए अपनी माँ के मुंह में लंड पेल दिया. आशीष मन मसोस कर रह गया. पर सुनीति ने उसे पास बुलाया और वो कुमार और आशीष के लंड एक एक करके चूसने लगी. माँ, पत्नी और बहू का ये दायित्व वो बिना किसी कठिनाई के निभा रही थी. जीवन अब उसकी चूत पेल रहा था और असीम गांड. मुंह में दो दो लंड गोचर कर रहे थे. इससे अधिक किसी भी स्त्री को जीवन में और क्या चाहिए भला?

स्मिता के हाथ आज कुछ निराशा हाथ लगी थी. मधुजी के पति उसके साथी थे और ये विदित था कि वे अब इस मिलन में समय निकालने हेतु ही आते थे. वो चुदाई तो करने में सक्षम थे, परन्तु उनमे इतना बल नहीं था कि वे सुनीति या समुदाय की अन्य चुड़क्कड़ औरतों को संतोष कर पाते। इसकी कमी वे चूत और गांड चाटकर पूरी करने का प्रयास करते थे, पर जो औरत लौड़ा खाने के लिए आयी हो, उसे मुंह से वो सुख नहीं मिलता था.

यही कारण था कि मधुजी के बिस्तर में उनका बेटा और बहू और उनके दो लड़के सोते थे. पलंग को इतना बड़ा बनवा लिया था कि सभी आसानी से उसमे समा जाते थे. सप्ताह में एक दो दिन मधुजी समुदाय के किसी लड़के या लड़की को बुला लेती थीं. उनके पति अब अलग कमरे में ही सोते थे. दोनों कमरों को कांच की दीवार से बाँटा था और वो जब तक इच्छा होती चुदाई देखते और सो जाते. उन्हें किसी भी प्रकार की कोई भी आपत्ति नहीं थी और वे अपने जीवन से संतुष्ट थे.

पर स्मिता के लिए ये दिन दुखदायक था. अन्य स्त्रियों का भी यही मत था परन्तु ये कहना नियमों के विरुद्ध था इसीलिए, कोई भी शिकायत नहीं करता था. स्मिता ने आज की रात किसी बहाने मेहुल के साथ बिताने का निश्चय किया. और इस निर्णय से उसकी आत्मा शांत हुई और वो अपनी चूत और गांड पर चलती हुई जीभ का आनंद लेने लगी. फिर उसने अगले आने वाले चरण के बारे में सोचा और एक नयी आशा से उसका मन भर गया.

हर पलंग पर एक नयी कथा लिखी जा रही थी. पर जो स्टेज पर चल रहा था उसका कोई सानी नहीं था. जो भी स्टेज की ओर देख पा रहा था वो सुनीति की क्षमता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पा रहा था. इस समय उसके शरीर में दो बड़े और मोटे लौड़े चूत और गांड की तीव्र और व्यग्र चुदाई कर रहे थे, पर वो इसके पश्चात् भी अपने सामने खड़े दो लौडों को अपने मुंह से समाप्ति की ओर ले जा रही थी.

पूरा हॉल इस समय सिसकारियों, आहों और चीखों से गुंजायमान था. मधुजी की चूत में एक बार रस गिराने के बाद सिद्दार्थ अब उनकी गांड की अच्छी और गहरी चुदाई कर रहा था. मधुजी जो चुदाई की अग्रणी खिलाड़ी थीं चीख चीख कर उसका उत्साह बढ़ा रही थीं. अन्य सभी पलंग से भी अब इसी प्रकार की वासनामयी चीखों की ध्वनि आ रही थी.

जब इस चरण का समय समाप्त होना था उसके १० मिनट पहले एक घंटी बजी. जो लोग अपने चरम पर थे उन्होंने अपने कार्य को शीध्र सम्पन्न किया. जो अभी भी दूर थे उन्होंने चुदाई में व्यग्रता लाई और अंततः सभी समय समाप्ति पर कम से कम दो बार झड़ चुके थे. महिलाओं ने अपने साथी के लंड को मुंह में लेकर साफ किया और फिर सब अपने चोगे पहन कर बाहर जलपान के लिए निकल गए, जैसे ये एक सामान्य थी.

इस बार भी जीवन के परिवार से मिलने कई परिवार पहुंचे। नवविवाहित जोड़े के दोनों परिवारों के पास भी लगभग उतनी ही भीड़ थी. और इसका एक विशेष कारण था. दूल्हे की माँ हर आने वाले पुरुष के हाथ पर कुछ लिख रही थी. वहीँ दुल्हन के पिता आने वाली स्त्रियों के हाथों पर लिख रहे थे. आधा घंटा यूँ ही समाप्त हो गया और सभी लोग अंदर लौट गए.

मधुजी ने फिर से माइक संभाला।

“साथियों, मुझे आशा है कि अपने पिछले चरण की चुदाई में आनंद लिया होगा. मुझे तो सिद्दार्थ ने बहुत दबा कर चोदा है और मेरी गांड में अभी तक सुरसुरी हो रही है. मैं उसकी माँ रुपाली का धन्यवाद करना चाहूँगी जिसने उसे इतनी अच्छी शिक्षा दी है. जिन महिलाओं ने सिद्धार्थ का लौड़ा अपने गांड में नहीं लिया है, मैं उन्हें इस त्रुटि को अति शीघ्र सुधारने का सुझाव देती हूँ.”

“अब जैसा आप सब जानते हैं, अगला चरण खुला चरण है. परन्तु क्योंकि आज हमने एक विवाह प्रमाणित किया है. इस विवाह को सम्पूर्ण करने हेतु अनमोल अर्थात दूल्हे की माँ लिपि जी ने जिन साथी पुरुषों के हाथों पर एक अंक लिखा है, वे सभी अनमोल की माँ लिपि, दुल्हन रेणु की माँ माया और रेणु को चोदने के लिए आमंत्रित हैं. उसी प्रकार से जिन महिलाओं को क्रमांक दिए गए हैं वो अनमोल के पिता विशाल, रेणु के पिता अश्विन और अनमोल से चुदाई करवाने के लिए आमंत्रित हैं.”

“मैं राणा परिवार से अनुरोध करुँगी कि वे स्टेज से नीचे आ जाएँ जिससे कि इन सभी को वहां आने का अवसर मिले.”

जीवन अपने परिवार के साथ नीचे उतर गया. मधुजी ने लड़कों को नीचे से और पलंग उठाकर स्टेज पर लगाने के लिए कहा और ये कार्य तुरंत ही सम्पन्न हो गया. लिपि, माया और रेनू एक एक पलंग से सम्मुख खड़ी हो गयीं. अन्य तीन पलँगो के सामने विशाल, अश्विन और अनमोल खड़े हो गए.

“अन्य कार्यक्रम सदैव के समान रहेगा और अब आप में से कोई भी किसी की भी चुदाई करने के लिए उन्मुक्त है. बस ये ध्यान रहे कि वो अपने परिवार का न हो. इस चरण का समय भी सवा घंटा है. और ये आज का आखिरी कार्यक्रम है. तो जिन्होंने लिपि और अश्विन से नंबर लिया है वो स्टेज पर जाएँ और अन्य सभी एक दूसरे के साथ मनमाना आनंद उठायें.”

ये कहकर उन्होंने माइक नीचे रखा और जीवन की ओर चल पड़ीं.

जीवन के सामने जाकर उन्होंने अपने चोगे को उतार फेंका और उनकी आँखों में आंखे डालकर पूछा, “जीवन साहब, क्या आपमें इस बुढ़िया की नसें ढीली करने का साहस है.”

जीवन मुस्कुराकर अपने चोगे को निकालते हुए बोला, “इसका निर्णय तो आप ही कर सकती हैं, परन्तु मैं प्रयास करने में पीछे नहीं रहूंगा.” ये कहते हुए उसने मधुजी को अपनी बाँहों में लेकर एक प्रगाढ़ चुंबन दिया.

परिवार के अन्य सदस्य ये देखकर कि वे भी अब अन्य लोगों से मिलन कर सकते हैं तितर बितर हो गए. असीम और कुमार दोनों मध्यम आयु की स्त्रियों को ढूंढ रहे थे, क्योंकि उनके आकलन में वही सबसे अधिक आतुरता से चुदवाती हैं. और उनकी ऑंखें स्मिता से मिलीं जो एक व्यक्ति से बात कर रही थी. स्मिता ने आँखों के माध्यम से उन्हें आमंत्रित किया और वे दोनों उसके समीप पहुँच गए. समीप पहुँच कर दोनों ने स्मिता का अभिवादन किया.

असीम: “हैलो आंटीजी, आपको यहाँ देखकर बहुत ख़ुशी हुई.”

स्मिता:”मुझे भी एक सुखद आश्चर्य हुआ. पर हम यहाँ समय व्यर्थ नहीं कर सकते, हम लोग एक दो दिन में मिलते हैं और आगे की बात वहीँ करेंगे. अभी तो मुझे तुम दोनों से वही उपचार चाहिए जो तुमने सुनीति को दिया था. ठीक है?”

ये कहकर स्मिता ने अपना चोगा निकाल फेंका और असीम और कुमार के लौडों को उनके चोगे के बाहर से ही दबा दिया. उसे इस बात से ख़ुशी मिली के ये दोनों मेहुल से बस कुछ ही कम थे. और इनके लंड से गांड मरवाने के बाद रात में मेहुल का लंड झेलना सरल हो जायेगा. असीम और कुमार को अपने चोगे हटाने में अधिक समय नहीं लगा. स्मिता उन दोनों के लंड एक एक हाथ में पकड़कर निकटतम खाली पलंग पर बैठ गयी और उन्हें चूसने लगी.

असीम के लंड को चूसते हुए उसने कहा, “हम्म्म इसमें तो अभी भी सुनीति की गांड की महक आ रही है.”

असीम कुछ झेंप गया, “मैंने उनकी गांड मारने के बाद लंड धोया नहीं. सॉरी आंटी।”

स्मिता: “कोई बात नहीं,मैं भी जल्दी ही सुनीति को अपनी गांड का स्वाद चखाऊँगी. ये बताओ तुममे से कौन गांड मारेगा?”

असीम बोल उठा: “कुमार. मैंने तो अभी ही मॉम की गांड मारी है. अब इसे अवसर मिलना चाहिए.”

स्मिता: “भाई हो तो ऐसा, कुमार?”

कुमार: “जी, आंटीजी. पर अब क्या हम आपकी चूत और गांड का स्वाद ले लें ?”

स्मिता: “वैसे तो मुझे इसमें आनंद आता.” फिर आसपास देखते हुए कि कोई सुने न, “पर मेरा साथी बस मेरी चूत और गांड की चाटता रहा था पीछे चरण में. तो इसीलिए, मैं तो अब असली चुदाई के लिए अधिक उत्सुक हूँ.”

ये कहकर उसने असीम को पलंग पर धक्का देते हुए लिटाया और उसके लंड पर चढ़कर सवारी कर ली. पूरे लंड को अच्छे से घुसा लेने के बाद उसने कुमार को संकेत दिया कि वो भी अब सवार हो जाये.

श्रेया और स्नेहा एक साथ अपने लिए साथी ढूंढ रही थीं. उन दोनों बहनों का ये हर मिलन का नियम था. उनकी ऑंखें दो लोगों पर जाकर रुकी। आशीष हर ओर चल रहे दुराचार को विस्मित आँखों से देख रहा था. और उसके कुछ ही दूर पर मधु जी के पुत्र और रेसोर्ट का स्वामी परख भी किसी को ढूंढ रहे थे. स्नेहा ने श्रेया को कोहनी मारकर उन दोनों की ओर संकेत किया. श्रेया ने तुरंत स्नेहा को परख को पकड़ने के लिए कहा और स्वयं आशीष की ओर चल पड़ी. आशीष ने उसे आते देखा और उसकी आँखों का आश्चर्य और बढ़ गया.

“नमस्ते अंकल, आपको यहाँ देखकर बहुत आश्चर्य हुआ. मैं चाहूंगी कि आपका स्वागत मैं और स्नेहा पूरी रीति के अनुसार करें.”

आशीष को कुछ सूझ नहीं रहा था. उसने श्रेया के बढे हाथ को थमा और श्रेया के पीछे एक पलंग पर जाकर ठहर गया.

“बस अब स्नेहा आ जाये तो स्वागत आरम्भ करेंगे.” ये कहते हुए उसने आशीष के चोगे को खोला और उसे नीचे डाल दिया. “लो, ये स्नेहा भी आ गयी.” स्नेहा परख के साथ आ रही थी.

“परख अंकल, इनसे मिलिए, ये हैं हमारे पडोसी राणा अंकल” श्रेया ने दोनों पुरुषों का परिचय कराया.

“हेलो, परख चड्ढा. मैं मधुजी का पुत्र हूँ.” रेनू के पिता ने आशीष का हाथ मिलते हुए कहा. उसे इस बात से कोई आपत्ति नहीं थी कि आशीष इस समय नंगा खड़ा था. हालाँकि आशीष को इस प्रकार से किसी से पहली बार मिलने में झिझक हो रही थी.

“हेलो, मैं आशीष राणा. मुझे भी आपसे मिलकर ख़ुशी हुई. वैसे इस ख़ुशी को ये दोनों प्यारी बहनें और भी बढ़ाने वाली हैं.”

“वैसे आप चाहें तो इसके बाद ऊपर स्टेज पर जा सकते हैं. मुझे विश्वास है कि लिपि, माया या रेणु आपसे चुदने में कोई आपत्ति नहीं करेंगी, आपका बिना नंबर के भी नंबर लगा देगी.” परख अपने इस परिहास पर हंस पड़ा.

“परख अंकल, आप व्यर्थ में हमारा समय क्यों नष्ट कर रहे हैं. उनके घर तो आज रात भर चुदाई पार्टी है. अभी तो वो केवल मुंह मीठा ही रहे हैं. आप हमारी ओर ध्यान दीजिये.” स्नेहा ने रुष्ट होकर कहा और परख का चोगा निकाल फेंका.

श्रेया और स्नेहा ने अपने चोगे भी उतारे और अपने संगमरमरी शरीरों का उन दोनों को प्रदर्शन किया. आशीष के लिए अब ठहरना असंभव था. उसने श्रेया को अपनी बाँहों में जकड कर उसे चूमते हुए बिस्तर पर लिटा दिया और उसकी चूत में अपना मुंह डाल दिया. ये तो समुदाय के नियमों का ही प्रभाव था कि सभी स्त्रियां पिछले चरण के पश्चात अपनी चूत और गांड को अच्छे से साफ कर चुकी थीं नहीं तो पता नहीं उसके मुंह में किसका रस जाता. स्नेहा ने परख के लंड पर धावा बोला और चाटने में व्यस्त हो गई.

सुजाता बहुत उत्सुक हो रही थी. स्टेज पर कई पुरुषों के चले जाने से वैसे भी हॉल में कमी आ चुकी थी. परन्तु ये हर विवाह कार्यक्रम में होता था तो कोई आपत्ति भी नहीं की जा सकती थी. कुछ पुरुष (अधिकतर युवा) वहाँ से उतरने के बाद भी चुदाई की शक्ति रखते थे और अधिक समय तक टिक पाते थे, पर उसमें कुछ भाग्यशाली स्त्रियों ने अपने साथी भी पा लिए थे. वो अपने चारों ओर चल रहे वासना के नंगे नाच को केवल देख ही पा रही थी क्योंकि उसे कोई नहीं मिला था. जो उपलब्ध थे उसके साथ से भूख शांत होने के स्थान पर और भड़कने की संभावना अधिक थी. समुदाय की स्त्रियों में कुछ महीनों से एक असहजता सी थी. कुछ पुरुष जो समुदाय की उत्पत्ति के समय पुरुषार्थ में उपयुक्त थे, समय के साथ उनकी ये शक्ति क्षीण हो चुकी थी और अपने साथी को संतुष्ट करने में असमर्थ थे. समस्या ये थी कि नियमानुसार किसी भी सदस्य को आने से रोका नहीं जा सकता था. और ये महानुभाव स्वयं रुकने के लिए उत्सुक नहीं थे.

इस समस्या की चर्चा पिछली प्रबंधन समिति में हुई थी और इस विषय पर को गंभीरता से सोचा गया था. समुदाय के इस नियम को परिवर्तित करने के दूरगामी परिणाम होने के कारण इसे न बदलने का निर्णय हुआ था. परन्तु, एक सदस्य ने समुदाय में प्रवेश की आयु को २० वर्ष से घटाकर १९ वर्ष करने का सुझाव दिया था. गणना करने से ये सामने आया था कि इससे ९ लड़के और ४ लड़कियां प्रवेश के लिए योग्य घोषित की जा सकेंगी. एक अन्य सुझाव में समुदाय के बाहर विवाह करने पर पूरे परिवार के स्थान पर केवल उस सदस्य को ही अस्थाई रूप से निलंबित करने का प्रावधान रहना चाहिए था.

परन्तु ये निर्णय केवल समिति नहीं ले सकती थी. इसी कारण आज समापन पर एक प्रश्नावली उन सभी अभिवाहकों को दी जा रही थी जिनकी संतानें इस कारण से समुदाय में शीघ्र जुड़ सकती थीं. प्रश्नावली में उनकी सहमति और आपत्ति का उल्लेख करना था. इसे अगले सप्ताहांत तक समिति के किसी भी सदस्य को सौंपा जाना था जिससे कि समिति अगली चर्चा में इस पर निर्णय ले सके.

पर सुजाता को तो आज के लिए लौड़े की खोज थी. अंततः उसने स्टेज के नीचे प्रतीक्षा करने का निर्णय लिया. उसके विचार से ऊपर से उतरते किसी जवान लौंडे को वो पकड़कर अपनी प्यास बुझा लेगी. और अगर उसके भाग्य ने साथ दिया तो दो भी मिल सकते हैं. तभी उसके कंधे पर किसी ने हाथ रखा. पीछे मुड़ी तो महक थी और उसके साथ में सिद्दार्थ था (जिसने मधुजी की पहली चुदाई की थी).

“आंटीजी, चलिए, सिद्धार्थ और मैं आपके अकेलेपन को दूर कर देंगे. और अगर मधुजी का सुझाव मानेंगी तो आपकी गांड की खुजली इसका लौड़ा मिटा देगा.”

महक उसके हाथ को थामकर सिद्धार्थ के साथ निकट खाली पलंग की ओर ले गयी. सुजाता ने पीछे मुड़कर स्टेज पर चल रहे चुदाई के खेल पर एक दृष्टि डाली और महक के साथ चल पड़ी.

स्टेज पर जो देखकर सुजाता मुड़ी थी वो वासना का नंगा नाच था. स्टेज पर कई पुरुष खड़े हुए अपने क्रम की प्रतीक्षा कर रहे थे. इस समय स्टेज पर दोनों परिवारों की बेटियां भी इस सामूहिक सम्भोग में सम्मिलित हो गयी थीं, परन्तु वे चुदाई नहीं करवा रही थीं. उन्होंने परिवार की चुदी हुई तीनों स्त्रियों की चूत और गांड को स्वच्छ रखने का बीड़ा उठाया था. वे शांति से एक ओर खड़ी हुई थीं. अभी उनके कार्य स्थगित था. इस समय लिपि, माया और रेनू तीनों को तीन तीन आदमी चोद रहे थे. हर एक चूत, गांड और मुंह में लौड़े लेकर चुदवा रही थीं. ऐसा दृश्य समुदाय के इतिहास में केवल विवाह के समय ही देखने मिलता था और हॉल में उपस्थित सभी लोग बीच बीच में उस ओर अवश्य देख रहे थे.

तीनों की आनंदकारी चीत्कारें हॉल में गूंज रही थीं. ये एक देखने वाली बात थी कि माया और लिपि की ओर लड़के आकर्षित थे जबकि अधेड़ पुरुष रेनू पर अधिक आसक्त थे. इसी प्रकार का चयन विशाल, अश्विन और अनमोल के लिए भी था. अब तक तीनों स्त्रियां न जाने कितने लौड़े झड़ा चुकी थीं. रेनू की गांड में पानी छोड़ते हुए एक पुरुष खड़ा हुआ और अपने आधे मुरझाये लंड को झुलाते हुए स्टेज से उतर गया. रेनू की बड़ी बहन जिसका पति नीचे हॉल में किसी की चुदाई कर रहा था आगे बढ़ी और उसने रेनू की उछलती गांड में अपना मुंह डाला और उससे बहता हुआ वीर्य चाट कर साफ किया और अंदर भी सफाई कर दी. रेनू की गांड अगले लौड़े के लिए प्रस्तुत थी, परन्तु उसकी बहन ने किसी को भी आगे बढ़ने से रोक दिया. जब रेनू की चूत में अपना रस छोड़कर उसके नीचे का आदमी हटा तब उसकी बहन ने उसकी चूत को भी उसी प्रकार से साफ किया और फिर अगले दो पुरुषों को आमंत्रित किया.

दूसरी और माया की भी गांड में पानी छोड़कर एक लड़का खड़ा हुआ और स्टेज से उतर गया. इस बार दूल्हे की बहन ने सफाई की और फिर उसी प्रकार से चूत की बारी आने पर उसे भी साफ किया और दो और सदस्यों को आमंत्रित कर लिया. यही क्रम वहां पर निर्बाध चलता रहा. स्मिता अब असीम और कुमार से एक साथ चुदवाकर आनंद विभोर हो रही थी. उसकी चूत और गांड में एक एक लंड था और उसे दोनों बहुत जोरदार और शक्ति के साथ चोद रहे थे. स्मिता के मन से आज की रात मेहुल के साथ बिताने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया क्योंकि उसकी वर्तमान की डबल चुदाई उसके तन और मन दोनों को तृप्त कर रही थी.

श्रेया और स्नेहा भी अपने हिस्से की चुदाई से आनंदित थीं. आशीष और परख उनकी मस्त चुदाई कर रहे थे. उधर सुजाता की दर्द और आनंद की चीखें निकल नहीं पा रही थीं क्यूंकि महक ने उनके मुंह को अपनी चूत में दबाया हुआ था. सिद्धार्थ के मोटा लम्बा लौड़ा सुजाता की गांड का वही हाल कर रहा था जो मधुजी ने सुझाया था. सुजाता ये सोचकर कि पिछले दिनों में उसकी गांड में ऐसे मोटे तगड़े दो लंड गए हैं कि उसका जीवन सार्थक हो गया था. जीवन ने अपने वचन को पूरा करते हुए जब मधुजी की चूत की गांठें खोल दीं तो उन्होंने लगे हाथ गांड को भी ढीला कराने का निश्चय किया.

स्टेज पर चल रहा रति कर्म भी अब समाप्ति की ओर था और अंतिम टोली चुदाई कर रही थी. समय समाप्ति की घंटी ने सबको चौंका दिया. मधुजी जो इस समय सीधे लेती हुई थीं और जीवन उनकी गांड की कसावट को ढीला कर रहे थे किसी प्रकार दोबारा माइक को पकड़ीं.

गांड मरवाते हुए ये उनके जीवन की पहली घोषणा थी, “मेर्रे साथियोऊं आज की घघोषणा विशेष्ष है क्योंकिकी अभी भीई मेरीइ इ गांड में लंड है. परर्र मैं ईसीई अवस्था में आज के कार्यक्रम्म की समाप्ति कीईई घघ्घोषणा करररती हूँ. आअह.”

अन्य जुड़े हुए जोड़े भी धीरे धीरे एक दूसरे से अलग हुए. कुछ समय तक लोग अपने स्थान पर ही बैठे रहे और फिर अपने चोगे पहनते हुए एक एक करके स्नानघर की ओर चल दिए. स्टेज पर दोनों बेटियों ने माया, लिपि और रेनू को सहारा देकर उठाया और उनके चोगे पहनकर उन्हें भी स्नानघर की ओर ले गयीं. स्नान करते हुए लोगों ने अपने परस्पर मिलने के कार्यक्रम तय किया।

मधु जी ने अंतिम घोषणा की, “विवाहित दम्पत्ति के घर पर आज से कल सांयकाल तक खुला खेल है. आपमें से जो भी चाहे लिपि के घर जाकर चुदाई में सम्मिलित हो सकता है. आशा है आप सब जाकर वर वधु को अपना आशीर्वाद अवश्य देंगे. ”

फिर सभी सदस्य अपने कपड़े पहनकर नयी प्रकाशित पत्रिका लेकर बाहर लॉन में चले गए. लॉन में रेनू और दूल्हे के पिता ने सभी को रात की चुदाई पार्टी का औपचारिक निमंत्रण दिया। सबने उन्हें आकर वर वधू को आशीर्वाद देने का वचन दिया. दोनों समधियों ने विचार विमर्श करने के बाद दो सप्ताह बाद एक और पार्टी का आयोजन करने की घोषणा की क्योंकि नव-विवाहित जोड़ा परसों प्रातः एक सप्ताह के लिए मधुमास पर जा रहा था. इसके बाद कुछ और औपचारिकताओं के पश्चात् सब अपने घरों के लिए निकल पड़े.

क्रमशः

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अध्याय २७: पहला घर - अदिति और अजीत बजाज ४

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एक नया दिन

अगला दिन सबके लिए एक नयी तरंग लाया था. शालिनी की गांड की खुजली मिटी या बढ़ी ये कहना अभी संभव नहीं था. परन्तु ये निश्चित था कि गौतम को उसकी गांड की यात्रा के अब अनगिनत अवसर मिलने थे. गौरव शालिनी के कमरे से बाहर आया तो सामने उसे अनन्या अपने कमरे में जाती हुई दिखी. अनन्या भी उसे देखकर ठहर गई.

दोनों भाई बहन एक दूसरे को देखते रहे फिर लगभग एक ही साथ पूछ पड़े, “कैसी रही रात?

गौतम: “अकल्पनीय, दादी में आज भी वही मादकता और भूख है जो उनकी जवानी में रही होगी. हालाँकि कल उन्होंने कुछ कोमल चुदाई की इच्छा की थी, पर मुझे लगता है कि आगे से ऐसा कम ही होगा. तुम्हारा कैसा रहा?”

अनन्या: “मॉम तो सो गयी थीं जल्दी ही, ये दवाइयाँ सच में उन्हें बहुत सुस्त बना रही हैं. पापा उन्हें कल डॉक्टर के पास ले जायेंगे. कह तो रही हैं कि अब वे अंदर से ठीक अनुभव कर रही हैं और आशा कर रही हैं कि डॉक्टर उन्हें चुदाई की आज्ञा दे देंगे. वैसे कल उन्होंने और पापा ने मुझे चूत चाटना भी सिखाया. और मुझे अच्छा भी लगा. मुझे लगता है कि ये भी अब हमारे सामान्य जीवन का अंग बन जायेगा. फिर पापा ने मुझे फिर उतने ही प्यार से चोदा। मेरा मन तो नहीं भरा पर ये समझना होगा कि वे मुझे धीरे धीरे आगे ले जाना चाहते हैं. अब मैं तुम्हारे जितनी अनुभवी तो हूँ नहीं.”

गौतम: “तुम अधिक भाग्यशाली हो जो कि हर गुर अपनों से ही सीखोगी। मुझे जिन्होंने सिखाया है, उसमे केवल वासना और व्यभिचार था. प्रेम का एक अंश भी नहीं था.”

अनन्या: “ये सच है. चलाओ नहा धोकर मिलते हैं.”

उधर अजीत और अदिति भी तैयार होकर बैठक में पहुँचते हैं. अदिति चाय बनती है और अजीत पेपर पढ़ते हुए टीवी चलकर अदिति के साथ चाय पीता है. गोकुल का सामान लगा हुआ था. उसकी नौ बजे की बस थी और उसे जल्दी ही निकलना था. गोकुल और राधा तड़के सुबह ही उठकर एक बार और चुदाई कर चुके थे. गोकुल और राधा बंगले में गए और गोकुल को अजीत ने बुलाकर एक लिफाफा दिया.

अजीत: “इसमें मैंने दस हजार रूपये रखे हैं. अगर तुम्हें रहने का प्रबंध ठीक न लगे तो अपने मन का प्रबंध कर लेना. हालाँकि, मुझे नहीं लगता कि इसकी आवश्यकता पड़ेगी. ये पूरा तुम्हारा है, खर्चो या बचाओ, मुझे लौटना मत. अगर उन्हें तुम्हारा काम पसंद आया तो सम्भव है कि आगे भी बुलाएँ और इससे तुम्हारी कमाई बढ़ेगी. वो जो देंगे, यहाँ के वेतन के अतिरिक्त होगा. अब जाओ और अच्छे से रहना.”

गोकुल ने अजीत और अदिति के पाँव छूकर आशीर्वाद लिया और फिर राधा के साथ बाहर चला गया.

अजीत: “रुको दो मिनट, मैं गौतम को कहता हूँ, तुम्हें छोड़ आएगा.” ये कहकर अजीत ने गौतम को फोन लगाया.

गोकुल: “इसकी कोई आवश्यकता नहीं, बाबूजी.”

अजीत: “कोई बात नहीं. बस दो मिनट रुको, गौतम आ ही गया.”

गौतम आया और कार की चाभी लेकर राधा और गोकुल के साथ चला गया. आधे घंटे में वो राधा के साथ लौट आया. अदिति ने राधा के चेहरे पर आंसुओं की दाग देखे तो उसे पास बुलाकर अपने गले से लगा लिया.

“चिंता न कर, इनके अच्छे मित्र हैं, गोकुल को अपने घर जैसे ही रखेंगे. और तेरा ध्यान हम सब रखेंगे. १० ही तो दिन हैं, यूँ निकल जायेंगे. और जैसा माँ जी ने कहा है, तुझे अकेले नहीं रहना है, उनके साथ ही रहना है. समझी? अब दुखी मत हो और मुंह धोकर खुश हो जा कि गोकुल को इतने महत्वपूर्ण कार्य के लिए चुना गया है.”

राधा बाथरूम में गयी और फिर बाहर निकलकर रसोई में चली गयी.

अदिति ने उसे देखा तो बोल पड़ी, “यहाँ क्या करने आयी है. माँ जी तेरी राह देख रही होंगी.”

राधा के मन में तितलियाँ उड़ने लगीं. अब उसे पता तो था ही कल रात क्या हुआ था, सो वो उत्तेजित मन और पैरों से शालिनी के कमरे में चली गई. अब चूँकि घर में पूर्ण उन्मुक्त वातावरण बन ही चुका था तो शालिनी ने कोई कपड़ा नहीं डाला था और वो भी राधा की ही प्रतीक्षा कर रही थी. राधा के ध्यान के बिना भी उसे उपयुक्त प्रेम मिल रहा था, पर आज ये राधा को उस राह पर ले जाने के लिए आवश्यक था जिससे उसका लौटना असम्भव हो.

“बड़ी देर कर दी आने में आज, क्या कर रही थी?”

“माँ जी, इन्हें बस अड्डे तक छोड़ने गई थी. इसीलिए.”

“ये अच्छा किया. कुछ सुबह भी किया गोकुल के साथ या बेचारे को यूँ ही सूखा भेज दिया?”

राधा शर्मा गई.

“एक बाद करके गए हैं.”

“ये ठीक किया, अब उसका तो उपवास आरम्भ हो गया. पर तेरी दावत होने वाली है हर रात।”

राधा फिर से शर्मायी पर उसका मन ख़ुशी से उछलने लगा.”

शालिनी ने अपने पांव फैलाये और उसे अपनी चूत दिखाकर बोली, “बड़ी देर से ये तेरी ही राह देख रही है. अब देर न कर, फिर मुझे भी नीचे जाना है.”

राधा ने शालिनी के पांवों के बीच अपना स्थान लिया और उसकी चूत में अपना मुंह डालकर चाटने में व्यस्त हो गयी.

“आज तेरे लिए मैंने अपनी गांड में कुछ बचाकर रखा है. उसका ही स्वाद ले ले.”

राधा जानती थी कि वो गौतम के रस के बारे में कह रही हैं. पर उसने अनिभिज्ञता दर्शाई और अपना मुंह शालिनी की गांड में डालकर चूसने लगी. गौतम के वीर्य का पान करके उसे एक विशिष्ट उत्तेजना हुई. गोकुल ने कभी उसकी गांड को छुआ भी नहीं था. पर उसे शालिनी की गांड में से निकले रस का स्वाद कुछ ऐसा भाया कि उसने तय किया कि वो अपनी गांड में से भी इसका स्वाद लेगी.

“कैसा लग रहा है ये नया स्वाद?” शालिनी ने छेड़ते हुए पूछा.

“बहुत अच्छा लग रहा है माँ जी. क्या है ये?”

“मेरे पोते का रस. कल रात गौतम ने मेरी गांड मारी थी और तेरे लिए मैंने उसका रस संभालकर रखा था. कैसा लगा?”

राधा कुछ नहीं बोली.

“मैं सोच रही थी कि तुझे भी ये रस पिलाऊँ, पर इस बार तेरी गांड से निकालकर। और ये तो कुछ बासी सा है, जब ताज़ा पीयेगी तो इसकी दीवानी हो जाएगी.” शालिनी बोलती रही.

“माँ जी, क्या आपने भी ये पिया है कभी? “

“बिलकुल, जब अजीत मेरी गांड मारता था तो मैं अपनी गांड से निकाल कर पीती थी. कुछ कठिनाई होती है, पर हो जाता है. अब जब तू करेगी तब जानेगी.”

राधा ने शालिनी की गांड को पूरा साफ कर दिया तो शालिनी ने उसे हटने को कहा.

“बाकी आज रात में करेंगे. तू आज से मेरे ही साथ सोयेगी. चल अब नीचे भी जाना है.”

ये कहते हुए शालिनी उठी और कपड़े डालकर राधा को लेकर रसोई में चली गयी.

अदिति ने राधा को छेड़ते हुए पूछा, “चाय पीयेगी या मुंह का स्वाद नहीं बदलना चाहती. कैसा लगा तुझे नया स्वाद?”

राधा शरमाते हुए बोली: “अच्छा लगा, दीदी.”

अदिति: “मेरे बेटे का था, तुझे पता है न?”

राधा: “जी. माँ जी ने बताया.”

अदिति कुछ गंभीर होकर: “देख राधा, तू इस घर में हमारे परिवार जैसी है, ये तुझे अच्छे से पता है. बच्चे तुझे मौसी और तू मुझे दीदी कहती है. तुझे हम सबकी कसम कभी ये बात बाहर नहीं जाये.”

राधा: “दीदी, मैं सौगंध खाती हूँ, कभी ऐसा नहीं होगा. पर हमें इनके (गोकुल) के बारे में भी कुछ विचारना होगा. उन्हें अगर शंका हुई तो मैं कुछ भी नहीं कर पाऊंगी.”

अदिति: “इसके बारे में भी इन्होने (अजीत) ने कुछ सोचा हुआ है. दो तीन दिन रुक, फिर बताती हूँ, वो कुछ तय कर लें उसके बाद.”

राधा: “जी दीदी. पर उन्हें कोई कष्ट या अड़चन न हो.”

अदिति: “कैसी बात करती है, तेरा पति ही तो मेरा भी कुछ हुआ न? चिंता छोड़. सबके जाने का समय हो रहा है. हम बाद में भी बातें कर सकती हैं.”

तीनों महिलाएं अपने कार्य में व्यस्त हो गयीं. जब नाश्ता लगा तो राधा गौतम से आंख नहीं मिला पा रही थी.

गौतम: “मौसी, मुझसे कोई गलती हो गयी क्या? मुझसे क्षुभ्ध लग रही हो.”

राधा हड़बड़ा गई: “नहीं नहीं, ऐसा कुछ नहीं. बस इनके बारे में सोच रही थी. कैसे रहेंगे इतने दिन मेरे बिना.”

अजीत: “जहां भेजा है मेरा अच्छा मित्र है और उसे कह भी दिया है कि मेरे परिवार का ही सदस्य है गोकुल. निश्चिन्त रह, वो मुझसे भी अधिक ध्यान रखेगा उसका.”

राधा ने सिर हिलाकर स्वीकृति दी और अपने काम में लग गयी.

अजीत ने गौतम और अनन्या को सम्बोधित करते हुए कहा: “देखो, मौसी का ध्यान रखना. उसे अकेलापन नहीं लगना चाहिए बिलकुल भी.”

दोनों बच्चों ने उन्हें विश्वास दिलाया और नाश्ता करके वे तीनों अपने अपने गंतव्य की ओर निकल गए. शालिनी और अदिति के बीच आँखों से कुछ संकेत हुआ और वे मुस्कुराकर बैठक में चली गयीं.

बैठने के बाद शालिनी ने अदिति से पूछा, “क्या सोचा है अजीत ने?”

अदिति: “माँ जी, मुझे अभी बताया नहीं कुछ. पर ये जो काम दिलाया है, इसमें गोकुल को हर महीने १० दिन के लिए जाना होगा. पैसा भी उसे अच्छा मिलेगा. पर इससे अधिक कुछ भी नहीं बताया.”

शालिनी: “इसकी आज चुदाई तो हो ही जानी है. और फिर इसे लंड के बिना रहा नहीं जायेगा. गोकुल इसे पूरा संतुष्ट नहीं कर पाता है. पर मैं सोच रही थी कि क्यों न हम भी इसकी चूत का स्वाद लें?”

अदिति: “मुझे कोई आपत्ति नहीं. आज रात आप शुभारम्भ करो फिर मैं भी बाद में किसी दिन चख लूंगी।”

फिर दिनचर्या और अन्य कार्यों में समय निकल गया. दोपहर को अपने नियत कार्यक्रम के अनुसार अदिति और शालिनी ने एक दूसरे की चूत और गांड चाटी और कुछ देर के लिए सो गयीं. ५ बजे से परिवार के सदस्य लौटने लगे. और ७ बजे तक अजीत लौटा. अजीत नहाने के बाद आया और उसके हाथ में अदिति ने ड्रिंक दी. शालिनी को भी एक ड्रिंक थमा दी गयी. बाहर की बातों में समय व्यतीत हो गया.

अदिति ने बताया की समर्थ और जॉय के बच्चों का सम्बन्ध पक्का हो गया है और सगाई अगले महीने है. ये बात सुनकर सब अनन्या के विषय में सोचने लगे पर अजीत ने कहा कि अभी उसके विवाह की आयु नहीं है. अगर कोई विशेष ही बात हो जाये तो अलग, अन्यथा अगले वर्ष ही वो इस विषय में कुछ सोचेगा. आठ बजे खाना खाने के समय राधा की ऑंखें अजीत से हट नहीं रही बार उसे अजीत का तना खड़ा हुआ मूसल जैसा लंड याद आ रहा था. अगर उसने गलत नहीं सोचा था तो आज की रात उसकी खुदाई होनी थी. शालिनी ये सब देखकर मन ही मन मुस्कुरा रही थी.

खाने के बाद शालिनी ने राधा से कहा कि वो अपने कुछ कपड़े लेकर नौ बजे उसके कमरे में आ जाये. बार बार कपड़ों के लिए घर जाने की आवश्यकता नहीं होगी. उधर अदिति ने अनन्या को आज अपने ही कमरे में सोने को कहा क्योंकि उन्हें सुबह ही डॉक्टर के पास जाना था. चूँकि उनके डॉक्टर को कहीं जाना था तो उसने उन्हें सुबह सात बजे तक बुलाया था. अनन्या मन मसोस कर अपने कमरे में चली गयी. शालिनी ने गौतम को बुलाया और उसे कुछ समझाया और उसे भी उसके कमरे में भेज दिया.

नौ बजने में देर नहीं लगी और राधा अपने हाथ में एक छोटा सा बैग लेकर शालिनी के कमरे में जा पहुंची।

शालिनी ने उसे देखा तो बाँहों में ले लिया.

फिर पूछा, “ बड़ी अच्छी खुशबु आ रही है, नहा कर आयी है?”

राधा ने शर्माकर हामी भरी.

“ये अच्छा किया. अब आ जा. तेरे नए जीवन की नयी रात है. और अब जो तू मेरे साथ ही रहेगी कुछ दिन तो हम सखियों जैसे ही रहेंगी.”

राधा ने फिर केवल हामी ही भरी. उसका मन तेज गति से धड़क रहा था और वो देख रही थी कि अभी तक अजीत नहीं आये थे. तभी शालिनी ने उसका चेहरा ऊपर किया और उसके होंठ चूम लिए.

“जिसकी राह देख रही है, वो भी आएगा. पर कुछ ठहर कर. तब तक हम अपना खेल खेलते हैं. अब तू भी कपड़े उतार दे, देखूं तो सही कैसी लगती है नंगी होने के बाद.”

अब चूँकि राधा कभी शालिनी के सामने निर्वस्त्र नहीं हुई थी तो थोड़ी झिझकी.

शालिनी ने उसे समझाया, “जो खेल खेलने वाली है, उसमे शर्म और झिझक का कोई स्थान नहीं होता. अगर इसका सुख लेना है, तो बिलकुल निर्लज्ज बनाकर खेल, नहीं तो न मन संतुष्ट होगा न ही तन.”

राधा भी समझ तो चुकी ही थी, सो वो कुछ ही देर में नंगी हो गयी. शालिनी ने उसे भरपूर दृष्टि से निहारा और उसने जो देखा वो सच में सुंदर था. हाँ राधा का रंग अवश्य थोड़ा सांवला था पर उसमे जो आकर्षण था वो कई गोरी स्त्रियों में भी नहीं होता. और तो और उसका शरीर बेहद सुडौल और भरा हुआ था. अंग प्रत्यंग बिलकुल सांचे में ढाले गए हों जैसे.

शालिनी: “अरे राधा, तू तो सच में बहुत सुन्दर है. क्यों छुपाती है अपनी ये सुंदरता?”

ये कहते हुए शालिनी ने अपने भी वस्त्र उतारे और राधा को खींच कर उसके होंठ चूमने लगी. राधा के शरीर में मानो आग सी लग गयी. शालिनी उसे यूँ ही चूमते हुए बिस्तर पर ले गयी और उसे लिटा दिया.

शालिनी: “ हर दिन तू मेरी चूत चाटती है न, आज मुझे तेरा स्वाद लेने दे.”

ये कहते हुए उसने राधा के पांव फिलाये और अपना मुंह राधा की चूत में डाल दिया. राधा चिहुंक पड़ी. उसकी चूत में कभी किसी ने मुंह नहीं लगाया था. गोकुल हर बार उसे इसके लिए मना कर देता था. पर आज उसे इसका भी अनुभव होना निश्चित था. उसने अपना शरीर ढीला किया और स्वयं को शालिनी के वश में छोड़ दिया. शालिनी की अनुभवी जीभ और मुंह के पराक्रम से राधा अधिक देर न ठहर सकी. कल रात से ही वो एक उत्तजेना में थी जिसे शालिनी के स्पर्श ने एक बांध के समान तोड़ दिया था. शालिनी ने बिना रुके राधा के रस का सेवन किया. उसे इस बात का कोई क्लेश नहीं था कि राधा उनकी नौकरानी थी. उसे उन्होंने सदैव ही अपने परिवार का ही जो समझा था. जब राधा का ज्वर उतरा तो वो एकदम से निढाल हो गयी.

“माँ जी. ऐसा तो मेरे साथ कभी नहीं हुआ.”

“क्यों गोकुल के साथ ऐसे नहीं झड़ती है क्या?”

“नहीं माँ जी. मजा तो बहुत आता है, पर ऐसा कभी नहीं हुआ.”

“अभी तूने जीवन में कुछ देखा नहीं है मेरी बन्नो. असली सुख तो तुझे अब मिलने वाला है. अब मैं तेरे मुंह पर बैठूंगी और तू मेरी चूत चाटना। ”

ये कहते हुए शालिनी उठी और राधा के मुंह पर अपनी चूत लगा दी. इस कार्य में अभ्यस्त राधा चूत केंद्र तक चाटने लगी. तभी उसे ऐसा लगा जैसे कोई दरवाजा खुला और बंद हुआ. पर ये तो बाथरूम की ओर से ध्वनि आयी थी. राधा ने इसे अपनी कल्पना समझा और शालिनी की चूत में मुंह गढ़ाए रही. फिर उसे अपने दोनों पांव किसी के द्वारा फ़ैलाने का आभास हुआ. और फिर एक मुंह उसकी चूत पर लगा और उसे चूसने लगा.

राधा समझ गयी की अजीत आ चुके हैं और आज उसकी भरपूर चुदाई होगी. उसकी पानी छोड़ती हुई चूत भी इस बात का संकेत दे रही थी कि उसकी प्रतीक्षा समापन पर है. शालिनी ने राधा से कहा कि जब तक वो न कहे अपने ऑंखें बंद ही रखे, नहीं तो कार्यक्रम बंद कर दिया जायेगा. ये बताते हुए वो राधा के मुंह से हट गयी और बंद आँखों से राधा ने अनुभव किया कि उसकी चूत पर से मुंह हटा और फिर दोबारा लगा. ये मुंह कोमल था अर्थात अजीत ने शालिनी को स्थान दे दिया था. फिर उसने अपने सिर के पास कुछ हलचल का आभास किया. और उसके मुंह से कुछ छुआ. उसकी सांसों ने ये भान कर लिया कि ये किसी का लंड ही है क्योंकि उसके नथुनों में उसकी गंध घर कर गयी. पर डर के मारे उसने ऑंखें बंद ही रखी पर उसकी साँसे अब तीव्र गति से चलने लगीं और मन उसी गति से धड़कने लगा.

उसे शालिनी की पुकार कहीं दूर से आती हुई सुनाई दी, “आँख खोल ले बन्नो और अपने आज के दूल्हे का स्वागत कर.”

राधा ने धीरे से अपनी आंखे खोलीं और अपने आँखों के सामने एक मोटे बड़े लम्बे लंड को झूलता हुआ पाया. उसने अपनी आँखें ऊपर उठाकर अजीत की ओर देखा तो वो हतप्रभ रह गयी. ये अजीत नहीं, बल्कि गौतम था. और कल उसने दूर से जो लंड देखा था अगर वो बड़ा था तो पास से देखने पर ये लंड तो भयावह लग रहा था. उसकी साँस रुक सी गयीं, क्या ये लंड मेरी चूत में जायेगा? वो ये सोच ही रही थी कि उसे किसी ने बुलाया.

“मौसी, क्या इसको प्यार नहीं करोगी?” ये गौतम था और उसके चेहरे पर एक मुस्कराहट थी.

“ गौतम बेटा तुम? मैं तो समझी थी कि ..’”

“पापा होंगे. वो भी आएंगे मौसी, पर आज नहीं. दादी ने आज आपकी सेवा का कार्य मुझे सौंपा है. और इसके लिए आपको मेरे लंड को प्यार करना होगा.”

राधा ने जीभ निकालकर गौतम के लंड पर थिरक रही मदन रस की बूंदो को चाट लिया. उधर शालिनी ने अपनी जीभ राधा की चूत की गहराइयों में गुमा दी. राधा अपनी कामवासना में इतनी खो चुकी थी कि उसे गौतम से चुदवाने में भी कोई आपत्ति नहीं थी. बाप न सही बेटा ही चोद दे उसे. उसकी उबलती हुई चूत की प्यास मिटाना ही अब उसका उद्देश्य था. माँ जी भी उसकी चूत को जिस प्रकार से चाट रही थीं, उसे नहीं लगता था कि वो अधिक देर ठहर पायेगी. गौतम ने अपने लंड को उसके मुंह पर लगाया.

गौतम: “मौसी, देखो न, तुम्हारे प्यार के लिए कैसा लालायित है. इसे चूसोगी नहीं?”

राधा ने अपना मुंह खोला और लंड मुंह में ले लिया. पर इसका आकर गोकुल से कहीं बड़ा था. सुपाड़ा ही दो इंच से अधिक बड़ा और मोटा रहा होगा. पर एक कहावत है कि खाने का निवाला और लौड़े का सुपाड़ा मुंह में जगह बना ही लेते हैं. तो राधा ने भी जब लंड निगला तो सुपाड़े ने अपने पीछे चल रहे लंड के लिए भी स्थान बन ही गया. पर अब समस्या थी चूसने की, तो गौतम ने राधा की कठिनाई को समझते हुए ये काम भी अपने हिस्से में लिया और लंड को धीरे धीरे उसके मुंह में चलाने लगा. जब राधा कुछ अभ्यस्त हुई तो भी अपने गालों और जीभ से लंड पर अपना खेल खेलने लगी. ये देखकर गौतम रुक गया और उसने राधा के ही ऊपर ये कार्यभार सौंप दिया. राधा ने भी अपने सामर्थ्य के अनुसार लंड को चूसा. अब गौतम उसकी चूत का आनंद लेना चाहता था.

“दादी, मौसी की चूत का क्या हाल है.”

“मैं तो सोच रहेगी कि तू पूछेगा ही नहीं. बन्नो की चूत अपने सैंया के लौड़े के लिए बहे जा रही है. इतना पानी छोड़ रही है कि मेरी तो प्यास ही मिट गयी.”

फिर उसने राधा की चूत से मुंह निकाला और उसकी आँखों में ऑंखें डालकर बोली, “ क्यों रे मेरी बन्नो, तेरा आज का दूल्हा अब तेरी सवारी के लिए आ रहा है. तेरी चूत की तो आज खैर नहीं है. पर अगर उससे विनती करेगी तो वो इतने प्यार से चोदेगा कि तेरी आत्मा तृप्त कर देगा. तो क्या चाहती है उसे बता दे.”

राधा ने गुहार लगाई, “गौतम बेटा, आज अपनी मौसी न समझना बल्कि अपनी दुल्हन समझ कर मेरी चूत को खोल दे. तेरा लौड़ा बहुत बड़ा है, तो मुझे प्यार से चोदना नहीं तो तेरी ये दुल्हन मर ही न जाये. फिर न तुझे दुल्हन मिलेगी न मौसी.”

गौतम: “अरे मौसी, तुम बस आज रात भर की ही दुल्हन हो. सुबह होते होते तुम मेरी मौसी ही बन जाओगी. तो मेरी राधा रानी, अब मैं तुम्हारी चूत को अपना बनाने वाला हूँ.”

शालिनी हटकर राधा की बगल में बैठ गयी और उसका एक हाथ अपने हाथ में थाम लिया. गौतम ने राधा की टांगों के बीच में बैठकर अपने टनटनाये लौड़े को राधा की अनवरत बहती हुई चूत के मुहाने पर रखा.

राधा ने अंतिम अनुरोध किया, “बेटा, धीरे और प्यार से करना.”

गौतम ने दबाव बनाते हुए लंड को चूत में अंदर डाला, सुपाड़े के अंदर जाते ही राधा झड़ गयी और इसका लाभ उठाते हुए गौतम ने निर्विघ्न ४-५ इंच लंड अंदर उतार दिया. अब वो उस स्थान पर पहुंचा था जहाँ तक राधा का रास्ता गोकुल ने खोला हुआ था. आगे की राह संकीर्ण और कठिन अवश्य थी पर गौतम जैसे योद्धा के लिए अजेय तो थी नहीं. पर उस दुर्ग को भेदने के पूर्व गौतम राधा को सामान्य होने का समय दे रहा था. राधा को अधिक समय नहीं लगा, क्योंकि वो इस गहराई तक की चुदाई की अभ्यस्त थी, पर उसे ये भी पता था कि अभी गौतम का पूरा लंड उसकी चूत में नहीं गया है. डर और रोमांच ने उसकी चूत को फिर ढ़ेर सारा पानी छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया. गौतम ने जब अपने लंड पर नए जलपात का अनुभव किया तो उसने दादी की ओर देखा जो समझ गयी कि अब किला गिराने के लिए आक्रमण करने का समय आ गया है.

“बन्नो, एक बात बता, अगर तुझे चोट लगी हो और उस पर बैंडऐड लगाया हो, तो निकालने के लिए क्या करेगी? धीरे धीरे निकालेगी जिसमे अधिक देर कष्ट होगा या एक ही बार में जिससे कि दर्द हो भी पर जल्दी ही दूर भी हो जाये?”

राधा ने इस बात का अर्थ इस परिपेक्ष में समझा नहीं और वो समझी कि माँ जी उसका ध्यान बाँटने के लिए बात कर रही हैं.

तो उसने भी अनिभिज्ञता से उत्तर दिया, “माँ जी, एक ही बार का कष्ट ठीक है, वैसे भी मैं ऐसा ही करती हूँ.”

जिस समय वो उत्तर दे रही थी गौतम अपने लौड़े को बाहर की ओर निकाल रहा था जिससे आक्रमण के समय लम्बाई और गहराई एक साथ जल्दी तय हो सकें.

शालिनी: “तो मेरी बन्नो, आज तेरा दूल्हा भी तुझे अधिक देर तक न तड़पाते हुए एक ही बार का कष्ट देगा.”

राधा को जब अर्थ समझ आया तो वो न नुकुर करते हुए शालिनी का हाथ छोड़कर अपनी कमर पीछे करने का प्रयास करने लगी. पर दादी और पोता दोनों उसकी इस प्रतिक्रिया के लिए तैयार थे. शालिनी ने हाथ नहीं छोड़ने दिया और आगे झुकते हुए अपने होंठों से राधा का मुंह बंद कर दिया. पर राधा की चीखें निकलने लगी थीं. गौतम ने एक लम्बे तगड़े झटके के साथ अपना तीन चौथाई लंड राधा की चूत में उतार दिया था. राधा तड़प रही थी और किसी प्रकार से मुक्त होने का प्रयास कर रही थी. पर गौतम का बलिष्ठ शरीर और शालिनी के उसे चुप करते हुए होंठ उसे असमर्थ कर दे रहे थे.

राधा ने अपनी चूत में से गौतम के लंड को बाहर निकलते हुए अनुभव किया तो थोड़ा आश्वस्त हुई कि शायद गौतम को उस पर दया आ गयी है. पर ये विचार किंचित गलत सिद्ध हुआ जब बाहर निकलते हुए लंड ने तेजी के साथ उसकी चूत में एक और धक्का मारा और इस बार गौतम के पुरे लंड ने अपना लक्ष्य पा लिया. राधा इस तीव्र दर्द से निढाल हो गयी. उसकी आँखों से आंसू बहने लगे. गौतम ने शालिनी की पीठ पर थप्पी देकर उसे संकेत किया कि किला धराशायी हो गया है. शालिनी ने अपना चेहरा उठाकर राधा के बहते हुए आँसू चूम लिए और उसे सांत्वना देने लगी.

“बस मेरी बन्नो, हो गया. आज तू पूरी स्त्री बन गयी. आज तेरी चूत की पूरी गहराई को खँगालने वाले लंड ने तुझे एक नया जीवन दिया है. और जिसे तू अभी दर्द समझ रही है, वो तेरे इस नए जीवन का नया द्वार है जिसके खुलने से तुझे आनंद का एक नया मार्ग दिखेगा. बस कुछ देर ठहर, फिर देख मैं सच कह रही हूँ.”

राधा ने गौतम से पूछा: “मैंने आपसे कहा था कि प्यार से करना, मौसी हूँ मैं तेरी. मुझ पर थोड़ी भी दया नहीं आयी तुझे?’

गौतम: “मौसी, बस कुछ ही देर रुको फिर आप यही कहोगी कि मैंने सही किया. बस कुछ और देर.” गौतम बहुत हल्के हल्के अपने लंड को राधा की चूत में चलाते हुए उसे समझाने लगा.

राधा की चूत से उठता दर्द उसे कुछ भी न समझने के लिए विवश कर रहा था. गौतम उसकी चूत में उसी गति से लंड चलाता जा रहा था. शालिनी उसके होंठ और मम्मे चूम और चाट रही थी. राधा की चूत ने ही इस समस्या का निदान किया और अपने रस से उस सुरंग को जलमग्न कर दिया. छप छप की ध्वनि से ये विदित हो गया कि अब राधा की चूत उस लौड़े की उपस्थिति को स्वीकार कर चुकी है और संभवतः कुछ अधिक की इच्छा रखती है. राधा को अचानक ऐसा प्रतीत हुआ मानो उसका दर्द कम होने लगा हो.

और इस पीड़ा के साथ उसके एक नया आनंद भी आने लगा. पीड़ा और सुख का ये अद्भुत समागम उसने केवल कहानियों में ही पढ़ा था. पर आज उसका शरीर इसे स्वयं अनुभव कर रहा था. राधा ने अपने कूल्हे हिलाकर अपने आनंद को बढ़ाने का प्रयास किया तो गौतम ने भी उसका साथ देते हुए अपनी गति बढ़ाई। शालिनी वस्तुस्थिति भांपते हुए राधा के मम्मों को मसलने लगी जिसके कारण राधा एक बार फिर से अपने चरम की ओर बढ़ चली. शालिनी ने अब अपने मुंह और हाथों से राधा के मम्मों पर वार करना शुरू किया और नीचे से गौतम ने भी अपनी गति कुछ और बढ़ाई। राधा का मस्तिष्क एक नए उल्लास में लीन हो गया और उसे एक ऐसा आनंद आने लगा जिसमे वो अपना सब कुछ भूल गयी.

“चोद दे मुझे, और अच्छे से चोद। माँ जी अपने मुझे पहले ये सब क्यों नहीं दिया. आप बहुत बुरी हैं माँ जी. आअह, क्या हो रहा है मुझे. माँ जी! मेरी चूत में क्या हो रहा है.” राधा का अकड़ता बिखरता शरीर अब छटपटा रहा था. पर इस छटपटाहट में एक मुक्ति थी. उसके कूल्हे अचानक ही ऊपर की ओर हुए और काँपते हुए वो निश्चल हो गयी. उसकी चूत ने एक धार फेंकी जो गौतम के लंड से बंद होने के कारण बाहर न निकल पायी पर चलते हुए लंड के साथ कुछ कुछ मात्रा में बाहर रिसने लगी. फिर उसके कूल्हे एक थाप के साथ बिस्तर पर गिर गए पर उसका कम्पन अभी भी रुका नहीं. और इस पूरे प्रकरण के समय गौतम ने एक भी ताल छूटने नहीं दी. जब राधा अपने शीर्ष से उत्तरी तो वो शालिनी का चेहरा हाथ में लेकर उन्हें बेतहाशा चूमने लगी.

शालिनी हँसते हुए बोली, “ क्यों मेरी बन्नो, कैसी लगी चुदाई तुझे, अब दर्द है?”

राधा: “जी माँ जी, दर्द तो है, पर मीठा मीठा. और सच में ऐसे तो मेरी कभी चुदाई हुई ही नहीं.”

“तो अब मेरे पोते को अपने ढंग से चोदने दे.”

“जी माँ जी.”

ये सुनकर गौतम ने अपने धक्कों को और तेज कर दिया. गौतम के बढ़ते और तेज होते हुए धक्कों की थाप पूरे कमरे में गूंज रही थी. और इसमें मिले हुई थीं राधा की सिसकारियां और आनंदकारी चीत्कारें. गौतम के मोटे लम्बे लंड ने राधा की चूत को ऐसे पैक किया हुआ था कि उसे जीवन का अलग अनुभव हो रहा था. चूत अब तक हाथ डाल चुकी थी. कितना झड़ती आखिर. लगातार पानी के स्त्राव से सूख सी गयी थी. और इसी कारण अब गौतम के लंड को अधिक घर्षण मिल रहा था और वो स्वयं भी आनंद के महासागर में गोते लगा रहा था. शालिनी के मन में न जाने क्या आया उसने अपना हाथ बढाकर राधा के भग्नाशे को मसलना शुरू कर दिया. अब राधा के लिए एक नया आयाम था. उसे इस बात का आभास भी नहीं था कि उसके शरीर का कोई ऐसा अंग भी है जो उसे आनंद के शिखर पर मात्र मसलने से ले जा सकता है.

सूखती चूत में एक नया ज्वार सा उठा और और फिर राधा का शरीर अकड़कर काँपने लगा. परन्तु शालिनी ने भग्नाशे की छोड़ा नहीं, बल्कि और अधिक तीव्रता से उसे मसलने लगी. राधा के मस्तिष्क में मानो रक्त का संचालन रुक गया. वो अपने हाथ पैर इधर उधर फेंकने लगी और उसकी चूत फिर से जलमग्न हो गयी. अब गौतम को भी रुकना सम्भव नहीं लग रहा था और उसने भी स्वयं को छोड़ दिया और उसके लंड से निकलती हुई तेज धाराओं ने राधा की चूत को तृप्त कर दिया. उसने अपने अकड़े हुए लंड को इसी अवस्था में बाहर खींचा तो न जाने कितना पानी राधा की चूत ले बाहर बहने लगा.

शालिनी अब तक राधा के भग्नाशे को रगड़ती हुई पास आ चुकी थी. उसने तुरंत अपना मुंह राधा की चूत पर लगाया और उस धार को पीने का प्रयास किया. पर पानी इतनी तेजी से बहा था कि शालिनी के इस प्रयत्न के बाद भी उसे केवल कुछ ही रस पीने को मिला. पर वो ऐसे हार मानने वालों में तो थी नहीं. उसने गौतम के लंड को लपक कर अपने मुंह में डाला और उस मिश्रण को चाटकर अपनी प्यास बुझा ही ली. इसके बाद उसने फिर राधा की चूत पर धावा बोला और इस बार चूस कर उसे पूरा खाली कर दिया. राधा बेसुध सी लेटी दादी पोते के इन क्रियाकलापों को केवल देखती ही रही. पर उसके चेहरे पर एक मुस्कराहट थी. एक असीम संतुष्टि से उसका चेहरा खिला हुआ था.

“कैसी है मेरी बन्नो?” शालिनी ने पूछा.

राधा ने थकी मगर ख़ुशी से भरे स्वर में उत्तर दिया, “एकदम मस्त, माँ जी.”

फिर कुछ देर रुकी और बोली, “माँ जी, अब दोबारा कब करेंगे?”

“आज की रात अपनी ही है. पहले मैं भी तो अपने अपनी चूत और गांड की सिकाई करवा लूँ। “

गौतम: “दादी. पहले आपकी चूत , फिर मौसी की चुदाई, फिर आपकी गांड, फिर मौसी की चुदाई.”

राधा और शालिनी उसके इस उतावलेपन पर हंस पड़ीं. और रात भर गौतम ने उन दोनों की जी भर कर चुदाई की और सुबह तक तीनों संतुष्ट होकर सो गए.

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अदिति और अजीत सुबह डॉक्टर से मिलने के लिए निकल गए. अनन्या उठी तो देखा घर शांत है. पापा और मॉम तो चलो डॉक्टर के पास थे पर दादी, राधा और गौतम ही नहीं दिखे तो वो गौतम के कमरे में झाँकने गई तो उसे खाली पाया. उसने दादी के कमरे का दरवाजा खोला तो उसे कपड़े बिखरे हुए दिखे. आगे बढ़कर उसने दादी के बिस्तर को देखा तो उसे तीनों सोते हुए दिखे. उसकी आँखों ने गौतम के लंड को देखा और उसे अपने पापा के लंड की याद आ गयी. गौतम का लंड उनके लंड से बीस ही लग रहा था. उसने हल्के पैरों से आगे बढ़कर गौतम के लंड को देखा और अनायास ही झुकते हुए उसे अपने मुंह में ले लिया.

चूत और वीर्य का स्वाद तो वो जानती थी, पर कुछ एक अलग स्वाद भी था. उसकी आंख अपनी सोती हुई दादी की ओर गयी जिनकी पीठ उसकी ओर थी. उसने देखा की दादी की गांड का छेद कुछ खुला हुआ था और उसमे से कोई सफेद रंग का द्रव्य बाहर बहा हुआ था. अनन्या को समझ आ गया कि उस नए स्वाद का क्या कारण है. उसने एक बार फिर गौतम के लंड को चाटा और लौटने के लिए मुड़ी.

“कैसा लगा अपने भाई के लंड का स्वाद, अनन्या बिटिया?” ये राधा मौसी का स्वर था.

अनन्या चौंककर मुड़ी तो देखा मौसी बैठ चुकी थी. उनके स्तन लाल थे, लगता था रात में अच्छे से मसले गए थे.

“बहुत अच्छा मौसी. तुम्हारा भी तो स्वाद मिला हुआ है न इसमें.”

“हाँ, और अब वो दिन दूर नहीं जब इस लौड़े पर से तुम भी अपना स्वाद चाटोगी अपनी माँ के साथ.”

अनन्या उस आने वाले दिन के बारे में सोचती हुई कमरे से निकली और अपनी चूत सहलाने के लिए अपने कमरे में चली गई.

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दिन के ११ बजे के लगभग अदिति और अजीत भी लौट आये. अदिति के चेहरे पर एक चमक थी और पांव मानो जमीं नहीं छू रहे थे. उसने आते ही शालिनी को बाँहों में भर लिया.

“बताओ माँ जी, डॉक्टर ने क्या कहा?”

“तेरी ख़ुशी तो यही बता रही है, कि चुदाई की अनुमति मिल गयी है.”

“बिलकुल सही. माँ जी मैं आज बहुत खुश हूँ.”

“तो जा और अजीत को काम पर लगा दे. पर सुन. ध्यान रख. अधिक अधीरता मत दिखाना. नयी नयी सिलाई है, उधेड़ मत देना।”

“जी माँ जी. डॉक्टर ने भी यही कहा है. अगले दस दिन सीमा के अंदर ही सम्भोग करें. नहीं तो समस्या हो सकती है.”

“अब जा, और अपने पति को समर्पित कर दे तेरी ये नयी चूत.”

अदिति उड़ती हुई अपने कमरे में गयी जहाँ अजीत पहले ही जा चुका था. और उसने कमरा बंद किया और पीछे मुड़ी तो अजीत को नंगा खड़ा पाया.

“वापसी पर स्वागत है.” अजीत ने अपने लंड को हाथ से हिलाते हुए मुस्कुराकर कहा. “तुमने कुछ कपड़े अधिक नहीं पहने हुए हैं?”

अदिति ने आनन फानन कपड़े फेंके और जाकर अजीत से लिपट गयी.

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बाहर इतना शोर सुनकर अनन्या और गौतम भी आ गए. पर देखा कि दादी अकेली है.

“कुछ शोर सुनाई दिया था, क्या था?”

“तेरी माँ को चुदवाने की अनुमति मिल गयी है. अब अंदर है अजीत के साथ.”

अनन्या और गौतम के चेहरे पर प्रसन्नता छा गयी, पर दोनों के कारण भिन्न अलग थे.

क्रमशः

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अध्याय २८: दूसरा घर - सुनीति और आशीष राणा ४

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सुनीति का घर :

जीवन अपने कमरे में गया और फोन लगाया, “हैलो, गिरिधारी लाल जी? मैं आशीष का पिता जीवन बात कर रहा हूँ. नमस्कार.”

जीवन ने गिरिधारी लाल जी से कुछ दस मिनट बात की और इतने में ही वे उन्हें गिरि के नाम से सम्बोधित करने लगे. दोनों नए मित्रों में कुछ बात हुई और जीवन ने उनसे कहा कि वे शाम को मिलने आएंगे और आगे का कार्यक्रम तभी तय करते हुए अन्य परिवारजनों को भी बता देंगे. फिर उन्होंने एक और फोन मिलाया और वहां भी कोई दस मिनट बात की.

नीचे लौटे तो देखा कि सलोनी काम कर रही थी और भाग्या उसका हाथ बँटा रही थी. भाग्या का पेट अब निकलने लगा था और उसे कुछ कठिनाई भी अनुभव होने लगी थी. इसीलिए सलोनी उसे अब अधिक कुछ भी करने नहीं देती थी. सुनीति ने भाग्या की सास से बात की थी और उन्हें समझाया था कि प्रसव तक वो भाग्या को उसकी माँ के ही साथ रहने दे जैसा कि अधिकतर परिवारों में परम्परा है. उसे ये भी बताया कि सूरज और वो जब भी चाहे दोनों यहाँ रह सकते हैं और उसका यथोचित सत्कार और ध्यान रखा जायेगा. अब भाग्या आनंद से अपने माँ बाप के साथ रह रही थी.

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मधु जी का घर:

शाम जीवन मधु जी के घर के लिए निकले और साढ़े पांच बजे पहुंचे. इस समय गिरि अकेले थे पर छह बजते बजते लोकेश और चारु के सिवाय सब आ चुके थे. मान्या ने चाय पिलाई और फिर उन दोनों को बैठक में बैठा कर सब अपने काम में व्यस्त हो गए. जीवन ने अपना कार्यक्रम गिरि को बताया और गिरि उस पर सहर्ष ही तैयार हो गए. उन्होंने फिर मधु जी को बुलाया और बताया।

मधुजी, “तो आप इन्हें अपने साथ अपने पैतृक गांव ले जाना चाहते हैं?”

जीवन: “जी हाँ. मुझे जाना ही है, तो मैंने सोचा कि इनका साथ होगा तो दोनों का मन लगा रहेगा.” जीवन ने कुछ झूठ बोलते हुए कहा. वो अभी तो लौट कर ही आया था, पर उसे इसमें कोई संकोच नहीं हुआ.

मधुजी: “आप कितने दिनों के लिए जा रहे हैं? कब लौटेंगे?”

जीवन: “पांच छह दिन के लिए. सम्भव है कि लौटते हुए सुनीति के माता पिता भी साथ ही आ जाएँ. चिंता न करें, चालक हमारे विश्वास का है, और गाड़ी भी हम दूसरी लेकर जायेंगे जो इस यात्रा के लिए अनुकूल रहेगी. पर इसके सिवाय भी मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ.”

मधुजी: “अवश्य. आप तो हमारे समुदाय के सदस्य हैं तो मुझे आप पर विश्वास है.”

जीवन: “मैं चाहता था कि अगर आप अनुमति दें तो लौटने के पश्चात् मैं गिरिधारी जी को एक और सप्ताह के लिए हमारे ही साथ रहने के लिए निवेदन कर रहा था. क्या हैं कि हम कुछ इस आयु के मित्रों का एक क्लब बनाये हैं, जिसमे आने से इनका भी कुछ मन बहलेगा और स्वास्थ्य लाभ भी होगा. मुझे विश्वास है की इनकी पताका पहले जैसे ही फिर से फहराने लगेगी.” जीवन ने द्विअर्थी संवाद से मधुजी को सत्य से पहचान करा दी. मधुजी इस कारण के विरुद्ध कुछ भी न कह पायीं.

मधु जी: “अगर इन्हें कोई समस्या नहीं है तो मुझे भी कोई आपत्ति नहीं. और इस कारण हमें भी आपके घर आने का अतिरिक्त कारण मिलेगा.”

गिरि इस बात को सुनकर बहुत प्रसन्न हो गए.

मधुजी: “आप लोग कब निकलना चाहेंगे?”

जीवन: “कल सुबह, ५ बजे.”

मधुजी: “ठीक है, मैं इनके एक सप्ताह के लिए बैग लगा देती हूँ. कुणाल से इनकी दवाइयां भी मंगवा देती हूँ. लौटने पर मैं इन्हें एक और सप्ताह के कपड़े आप के घर पर देने आ जाऊँगी.”

इस के बाद जीवन अपने घर के लिए निकल गए.

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सुनीति का घर:

घर पर उन्होंने मिशन की सफलता की घोषणा की और बताया कि कल सुबह पाँच बजे निकलेंगे. आशीष ने अपने ड्राइवर करतार सिंह से कहा कि कल उन्हें जाना है और वो गाड़ी में डीज़ल और आयल इत्यादि जाँच ले. करतार गाड़ी ले कर निकल गया. शाम को सबने आगे आने वाले समय के बारे में बात की. सुनीति ने अपनी माँ से बात की और उन्हें इस बार साथ ही आने की विनती की. गीता ने भी इस बार साथ आने के लिए अपनी सहमति दी. सब लोग एक प्रसन्नता के साथ सोने चले गए.

अगले दिन सुबह जीवन घर से रास्ते के लिए नाश्ता एवं खाना बंधवाकर कुछ हल्का सा खाने के बाद पाँच बजे निकले और गिरि को साथ लिया. मधुजी ने गिरि और जीवन दोनों को गले लगाकर सावधानी रखने के लिए कहते हुए यात्रा की शुभकामना दी. उन्होंने ने भी खाने का बहुत सारा सामान दिया। इसके बाद वो यात्रा पर निकल पड़े.

हँसते, बोलते, खाते, पीते जब वे जीवन के गाँव से पहले पड़ने वाले एक शहर पहुंचे तो करतार ने गाड़ी उनकी पहचान की शराब की दुकान पर रोक दी. जीवन ने करतार को पैसे दिए और कुछ ही देर में करतार ने एक महंगी शराब की दो पेटियां गाड़ी में रख लीं.

“इतनी?” गिरि ने आश्चर्य किया.

“मैं जब पाँच दिन के लिए जाता हूँ तो एक पेटी लेकर जाता हूँ. ये केवल पीने के लिए नहीं बल्कि देने के लिए भी हैं. और इस बार आप भी साथ हो, तो कुछ अतिरिक्त तो लेना बनता ही है.” जीवन ने बताया.

करतार फिर गाड़ी दौड़ने लगा और लगभग तीन बजे वे बलवंत के घर पहुंच गए. बलवंत और गीता ने अत्यंत प्रसन्नता से उन दोनों का स्वागत किया और सभी एक दूसरे के गले मिले. गीता जिस प्रकार से जीवन से मिली उसे देखकर गिरि के मन में ईर्ष्या हुई, पर जब गीता ने वही आलिंगन उन्हें दिया तो उनकी शिकायत दूर हो गई. उन्हें न जाने क्यों ऐसा लगा कि गीता ने हटने के पहले उनके लंड को सहलाया हो. पर उन्होंने इसे निरी कल्पना मानकर भुला दिया. सब घर के अंदर गए. और उन दोनों की आवभगत आरम्भ हो गयी. उनके आने के कुछ ही देर में उनके अन्य तीन मित्रों की पत्नियां भी आ गयीं और चारों मिलकर बतियाते हुए खाने का प्रबंध करने में व्यस्त हो गयीं.

जीवन और गिरि कुछ देर सोने के लिए अपने लिए निर्धारित कमरे में चले गए और पाँच बजे उठकर तैयार होकर बाहर आ गए. अब तक उन सबके बैठने का घर के अंदर के ही आंगन में प्रबंध हो चुका था. पुराने घरों में जैसा होता था, एक ओर प्रवेश था, फिर बड़ा सा आंगन। एक ओर रसोई और अन्न घर इत्यादि. और दो ओर कमरे थे. दो तले के घर में ऊपर तीन कमरे थे तो नीचे एक बैठक और एक कमरा. पिछली बार नीचे के कमरे में चले सम्भोग की याद करके जीवन का लंड अकड़ने लगा. पर उन्हें उनके यहाँ आने का मुख्य प्रयोजन याद आया और उन्होंने गिरि की ओर देखा जो घर का निरीक्षण कर रहे थे.

“मेरा बचपन भी इसी प्रकार के घर में पल बढ़ के निकला था. न जाने समय कहाँ चला गया.”

जीवन ने उनकी बात समझ कर कहा, “मैं इसीलिए आपको यहाँ लाया हूँ. आपको अपने बचपन और जवानी में लौटने के लिए. अब बस हमारे खेल में साथ रहिये, आप मस्त हो जायेंगे. आपको कोई दवाई तो नहीं लेनी.”

“मैं कोई दवाई लाया ही नहीं. मुझे ऐसी कोई बीमारी नहीं जिसके लिए मुझे कोई दवाई नित प्रतिदिन लेनी पड़े. मैं उन सबको वहीँ छोड़ आया हूँ. नाम हैं मेरे पास, अगर अत्यधिक आवश्यकता हुई, तो यहाँ से ले लेंगे.”

जीवन: “ये हुई न बात. थोड़ी देर में मेरे बचपन के साथी भी आने वाले हैं. आप उन्हें बिलकुल अपना भी मित्र समझें, अगर कोई बात बुरी लगे तो मुझे संकेत कर दें, मैं संभाल लूंगा. पर अब आप पूरा खुल के एन्जॉय कीजिये. समझिये कि आप २० - २२ साल के हैं.”

गिरि के मुंह से निकली उन्मुक्त हंसी ने जीवन का मन जीत लिया और उसे विश्वास हो गया कि आशीष और उसकी योजना सफल होगी.

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कुछ ही देर में जीवन के अन्य मित्र भी आ गए और सभी लोग एक दूसरे के गले लगकर मिले.

“क्यों बेटीचोद जीवन, इस बार बड़ी जल्दी लौट आया. लगता है गीता भाभी की याद खींच लायी तुझे.” कँवल ने कहा.

जीवन हंस के बोला, “बेटी होती तो तेरी बात सही बैठती. सच बोलूं तो तेरी बीवी की याद ले आयी, पिछली बार बच जो गयी थी मुझसे.”

इतने में कँवल की पत्नी बबिता पकोड़े लेकर आयी. “मैं तो बड़ी आस से आपकी राह देख रही थी, पर आप न जाने किसकी याद में खोये थे जो मेरे पास फटके भी नहीं.”

“तो आज की रात आ जाऊँगा, तेरे पति से तो तेरी चुदाई होती नहीं है ठीक से.”

“अरे नहीं भाईसाहब, आज भी हर रात मेरी हड्डियां चटखा देते हैं. पर क्या है न कि आपके दोनों के साथ कुछ अलग ही आनंद है.”

गिरि समझ गए कि ये सब भी सामूहिक चुदाई के पक्षधर हैं. पर इतना खुलेपन की उन्होंने गांव में अपेक्षा नहीं की थी. उनके अन्य मित्र सुशील ने तब तक एक बोतल में से सबके लिए पेग बनाये और एक बोतल पत्नियों को दे दी. उसे लेकर बबिता चली गयी. सबने चियर्स करते हुए अपने पेग से पीना शुरू किया.

“गिरि मेरे मित्र हैं. इन्हें कुछ स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ हो गयीं थीं. तो मैंने सोचा कि सबसे अच्छे वैद्य तो मेरे ये मित्र ही हैं. तो इन्हें भी साथ ले आया. और ये भी जान लो, कि इन्होने भी अपने परिवार की हर महिला को चोदा हुआ है. न केवल उन्हें, बल्कि और न जाने कितनी महिलाओं की चुदाई की है. स्वास्थ्य के कारण कुछ कमी आ गयी है, तो मुझे आशा है कि तुम्हारी पत्नियां उस समस्या को दूर कर देंगी.”

गिरि को कुछ असहजता लगी कि उनके बारे में ऐसा बताया, पर फिर सोचा कि अगर उनकी सेक्स की इच्छा और शक्ति लौट आयी तो इसमें कोई भी आपत्ति नहीं होने चाहिए. इतने में महिलाएं, अपने ग्लास में पेग बनाकर कुछ मुर्गा और मीट के खाने का भी सामान ले आयीं और अपने अपने पति के साथ बैठ गयीं. गांव के बारे में बातें होने लगीं और गिरि को जैसे अपने जवानी के दिन याद आ गए.

दूसरा पेग जल्दी ही बना लिया गया.

दूसरे पेग का घूंट लेते हुए जीवन ने कहा, “अब गिरि अपने घरेलू चुदाई के बारे में बताएँगे.”

सब चुप हो गए.

गिरि: “मैं और मेरी पत्नी बचपन से ही साथ थे. हम पडोसी थे और कभी भी किसी के मन में ये विचार ही नहीं आया कि हमारा विवाह नहीं होगा. मैं मधु से दो वर्ष बड़ा था. जब मैं अठारह वर्ष का हुआ तो मधु की माँ ने मुझे एक दिन अपने घर पर बुलाया. तब तक मुझे सेक्स के विषय में अधिक ज्ञान नहीं था. हम सब जानते हैं कि उस समय इसके बारे में बात भी करना अनुचित समझा जाता था. मुझे मेरी माँ ने ही बताया की आंटी ने किसी कार्य के लिए मुझे बुलाया है. मुझे आज भी उनकी वो मुस्कराहट नहीं भूलती, जब वो मुझे ये बता रही थीं. तो मैं बिना किसी सोच के उनके घर चला गया.”

निर्मला (सुशील की पत्नी) बोल उठी: “तो भेड़ को शेरनी की मांद में भेज दिया.”

गिरि: “जी, कुछ ऐसा ही था. जब मैं वहां पहुंचा तो पूछा कि क्या काम था. तो आंटी जिन्हे मैं बाद में माँ ही बोलने लगा था, बोलीं कि काम है भी और नहीं भी. मुझे कुछ समझ नहीं आया. तब उन्होंने कहा कि क्या मैं मधु से विवाह करना चाहता हूँ? तो मैंने कहा कि इस प्रश्न का कोई औचित्य ही नहीं है क्योंकि ऐसा तो वर्षों से निर्धारित है.”

“उन्होंने पूछा कि क्या मैं विवाह के बाद मधु को संतुष्ट करने में सक्षम हूँ. मुझे अभी भी ज्ञात नहीं था कि हो क्या रहा था तो मैंने सहजता से कहा कि अवश्य. इस पर उन्होंने कहा कि मुझे इसका प्रमाण देना होगा. मैंने कहा कि कहिये क्या करना होगा? इस पर वो कुछ मुस्करायीं और कहा कि मैं अंदर कमरे में जा रही हूँ, और जब बुलाऊँ तब मैं भी पहुँच जाऊं. कोई दस मिनट बाद उन्होंने मुझे पुकारा तो मैं उनके कमरे में गया. तो देखा कि वे बिस्तर पर नंगी लेटी थीं. उन्होंने कहा कि सफल विवाह के लिए सेक्स में पारंगत होना आवश्यक है. और मैं देखना चाहती हूँ कि तुम इसमें किस स्तर पर हो.”

“इसके बाद उन्होंने मुझे लगभग हर दिन बुलाकर चुदाई के कई गुर सिखाये. जब उन्होंने मुझे उत्तीर्ण किया तो कहा कि कल तुझे अपनी माँ को ये सिद्ध करना हैं कि तू सच में विवाह के योग्य है. इस प्रकार मेरे चुदाई जीवन का आरम्भ हुआ. बाद में मुझे पता लगा कि इसी परीक्षा से मधु भी निकली थी और इसमें मेरे और उसके पिता का योगदान था. हमारे वैवाहिक जीवन में कभी कोई भी कठिनाई नहीं आयी. बच्चे आने के बाद भी कोई विशेष कमी नहीं हुई. जब मेरा पुत्र अठारह वर्ष का हुआ तब मेरी सास, जो तब जीवित थीं, ने उसे भी प्रवीण करने का बीड़ा उठाया, पर इस बार उन्होंने अपने साथ मधु और मेरी माँ को भी लिया. लोकेश ने अपनी शिक्षा उत्तम प्रकार से पूरी की और आठ वर्ष बाद उसका विवाह चारु से हुआ.”

“मेरी सास को कैसे ये पता था कि चारु के परिवार में भी हमारी शैली है, ये तो मुझे नहीं पता, पर विवाह के बाद चारु की चुदाई का अवसर मुझे सुहागरात के अगले दिन ही मिल गया. जीवन अनवरत चलता रहा. फिर मधु और चारु की माँ ने हमारे जैसे परिवारों का एक समुदाय बनाने का निर्णय लिया और बारह वर्ष पहले इसको नींव रखी गई. जीवन और उनका परिवार उस समुदाय के नवीनतम सदस्य हैं. ये भी बता दूँ की मेरी पोती की चूत और गांड दोनों की सील मैंने ही तोड़ी थी. और पिछले वर्ष मेरे कठिन समय में वह एक है जो सदैव मेरे साथ खड़ी रही है.”

उनकी संक्षिप्त कथा सुनते हुए दूसरा पेग भी समाप्त हो चूका था, महिलाएं भी अपने लिए नया पेग बना चुकी थीं. तीसरा पेग लगाया गया. पर इस बार सब खुल के बात कर रहे थे. जीवन की मंडली में तो ये सामान्य बात थी पर गिरि को इस परवाह में आने में समय लगा. पर अब वो अपने आपको मुक्त अनुभव कर रहे थे.

इसके पहले कि हम आगे बढ़ें, जीवन के मित्रों का परिचय हो जाये:

बलवंत और उसकी पत्नी गीता. ये सुनीति की माता पिता हैं.

कँवल और उसी पत्नी बबिता.

सुशील और उसकी पत्नी निर्मला.

जस्सी (जसवंत) और उसकी पत्नी पूनम.

ये सभी एक साथ पले बढे और बचपन के साथी हैं. जवानी में गाँव की न जाने कितनी विवाहित और कुंवारी औरतों ने इनके लौडों का आनंद लिया है. पर विवाह के बाद इन्होने केवल अपने ही मित्र मंडल में अपनी चुदाई को सीमित रखा था. लगभग यही कथा इनकी पत्नियों की भी थी. इनसे कम आयु की होने के कारण साथ तो नहीं पढ़ीं पर उसी स्कूल में रहीं. कभी कभार ऐसा हुआ कि अलग स्वाद लेने का अवसर मिला, परन्तु उनमे से कोई भी इस गांव का नहीं था. इस गाँव में इतने वर्ष बाद भी किसी को इनके अंदरूनी रहस्य की भनक भी नहीं थी. इसका कारण ये था कि वे कभी भी ऐसा विदित ही नहीं करते थे कि कुछ भिन्न है. एक दूसरे के घर जाना और वहीँ रुक जाना बचपन से चल रहा था तो किसी को इस बात पर कोई शंका नहीं थी. वैसे भी इनके घर इतने बड़े थे कि बाहर से अंदर की गतिविधियों के बारे में जानना असम्भव था.

तीसरे पेग की समाप्ति के बाद खाने का कार्यक्रम चला. भोजन इतना था कि सबने भरपेट खाया.

फिर बलवंत ने कहा, “यारों, आज अलग होने का मन नहीं कर रहा है. क्यों न अंदर ही बैठें और बातें करें. फिर यहीं सो जाना आज रात।”

ऐसे आवेदन को आज तक कभी भी नकारा नहीं गया था. इसका अर्थ भी सबको विदित था. तो दोनों बोतल, ग्लास इत्यादि के साथ सब पहले तल्ले पर बने हॉल में चले गए.

“लोग कहते हैं की खाने के बाद पीना नहीं चाहिए, पर हमें तो आज तक इससे कोई समस्या नहीं हुई.”

ये कहकर अगले पेग की बात चली तो इस बार पूनम ने आगे बढ़कर सबके लिए पेग बना दिए. बबिता और गीता ने खाने के लिए कुछ और चिकन और मीट के व्यंजन ले आये. बबिता ने जब प्लेट टेबल पर रखी तो जीवन ने उसे अपनी गोद में खींच लिया और उसके मम्मे दबाते हुए बोला, “आज तो आप मेरे साथ रहने वाली थीं न क्या हुआ?”

बबिता: “अगर मैं आपके साथ रहूंगी तो आपके नए मित्र का ध्यान कौन रखेगा?”

जीवन: “अरे भाभी, आज से पहले तो तुमने दो को एक साथ चोदने से कभी दूरी नहीं की, फिर आज क्या हुआ? बुढ़ापा आने लगा है तेरे ऊपर.”

बबिता: “अच्छा जी, मेरे बुढ़ापे में भी इतने इतना दम है, कि आप सबको एक साथ निपटा कर खेतों पर काम करने जा सकती हूँ.”

निर्मला ने इस बात पर ताली बजाकर कहा, “क्या बात कही बबिता. बुढऊ की बोलती बंद कर दी.”

जीवन: “हाथ कंगन को आरसी क्या. आज ही इसका भी निर्णय कर लेंगे कि बबिता खेतों में जाएगी या नहीं.”

निर्मला उठकर कँवल की गोद में जा बैठी और उसके गले में बाहें डालकर बोली, “भाई साहब, लगता है कि आपकी पत्नी आज जीवन भाई साहब और गिरि भाई साहब को निचोड़ने के लिए तत्पर है. तो आपको अगर अपने कसबल निकालने हैं तो मैं आपका साथ दे सकती हूँ.”

कँवल ने उसे चूमकर कहा, “है भाभी, आप न होती तो न जाने आज रात मेरा क्या होता?”

ये सुनकर सब हंस पड़े. गीता जाकर जस्सी की गोद में समा गयी और पूनम ने बलवंत की गोद में शरण ली. बबिता फिर जीवन की गोद से उठी और उसने गिरि की गोद में बैठकर उन्हें चूमना आरम्भ कर दिया.

“भाई साहब, हम सब हर चीज़ मिलकर कहते हैं. तो हम चारों आपसे भी चुदवाएंगी। अब जब तक आप हम चारों की चुदाई नहीं कर लेते गाँव से नहीं जा सकते.”

कमरे में वातावरण गर्माने लगा था. गिरि कुछ असहज हो रहे थे. उन्हें विश्वास नहीं था कि वे इनमे से किसी भी स्त्री को संतुष्ट कर पाएंगे.

बबिता ने अपने होंठ उनके कान के पास लाये और फुसफुसाकर बोली, “जीवन भाईसाहब ने हमें बताया आपके बारे में. उधर आप मेरे पति को देख रहे हैं न, वही जो निर्मला के थन निचोड़ रहा है. चार साल पहले जब हमारी फसल खराब हो गयी थी तो ये बहुत तनाव में थे. तीन चार महीने तक तो इनका लंड खड़ा ही नहीं होता था.”

गिरि ने कंवल कि ओर देखा तो उसने निर्मला की साड़ी और ब्लाउज़ निकाल दिए थे. ब्रा ये महिलाएं पहनती नहीं थीं और वो निर्मला के मम्मे मुंह में लेकर चूस रहा था.

बबिता ने अपनी बात आगे बताई, “एक बार मैंने चुदाई के प्रयास के बाद इन्हें बाथरूम में रोते हुए सुना. मेरा दिल टूट गया. फिर जब जीवन भाईसाहब आये तो मैंने सबको इनको समस्या बताई. भाईसाहब ने बैंक में जाकर इनका ऋण चुकता कर दिया। फिर रात में सबने इन्हे विश्वास दिलाया कि ये दिन भी निकल जायेंगे. फिर भाईसाहब इन्हें अपने साथ ले गए, जैसे आपको यहां लाये हैं. जब दस दिन बाद ये लौटे और बैंक गए तो पता चला कि ऋण समाप्त हो चुका था. ये बात हमें बाद में पता चली कि भाईसाहब ने न केवल ऋण चुकाया था, बल्कि इनके खाते में १ लाख भी जमा कर दिए थे. मेनेजर से पूछने पर उसने कहा कि एक लॉटरी में इनका नाम आया था तो ऋण भी चुक गया और पैसे भी बच गए. इन्हें इस बात पर विश्वास नहीं हुआ.”

“पर इसका ये प्रभाव हुआ कि जैसे इनमे नयी शक्ति आ गयी. और हम चारों औरतों ने मिलकर एक रात इनसे इतना चुदवाया कि उसके बाद से इन्हें कभी समस्या नहीं हुई.”

इसके बाद बबिता ने उनकी आँखों में ऑंखें डालीं, “आपको भी किसी बात से तनाव है. और ये आपको अंदर से ग्रस रहा है. जो कुछ भी है, अगर आप उसकी ओर ध्यान नहीं देकर उसकी उपेक्षा करेंगे तो ये समस्या नहीं रहेगी. आप जितना इस विषय में सोचेंगे, उतना ही डूबेंगे. अगर वो कोई मनुष्य है, तो आप सच मानें अगर वो आपको चाहता है तो इसीलिए नहीं कि आप चोदने में प्रवीण है, बल्कि अन्य हजारों कारणों से. क्या उसे कोई ऐसी बीमारी हो जाती जिसके कारण वो नहीं चुदवा पाती तो क्या आप उसे प्रेम नहीं करते?”

गिरि के मस्तिष्क को एक तीव्र झटका लगा. गांव की एक कम पढ़ी स्त्री ने उन्हें उनकी समस्या और उसका हल कुछ ही शब्दों में बता दिया था. मधु की ठीक से चुदाई न करने के कारण ही उन्हें कुंठा थी. पर क्या मधु उनसे प्यार नहीं करती? ये मानना असम्भव था. जो है, सो है. चुदाई कर पाऊँ तो ठीक नहीं तो माँ चुदाये संसार. इस विचार के मन में आते ही उन्हें अपने लंड में संवेदना अनुभव हुई जिससे वे बहुत दिनों से अनिभिज्ञ थे. बबिता उन्हें ध्यान से देख रही थी.

“आपको मेरी बात बुरी तो नहीं लगी न?”

उसे अपनी बाँहों में भरकर उसके होंठ चूमकर गिरि ने कहा, “नहीं, बल्कि तुमने मेरी समस्या को सुलझा दिया है.” और ये कहते हुए अन्य जोड़ों के समान उन्होंने भी बबिता के साड़ी ब्लाउज़ उतार फेंके.

गिरि ने अन्य सबकी ओर देखा तो पाया कि वे सभी उनकी ही ओर देख रहे थे. जीवन इस समय निर्मला के सामने खड़े थे और मुस्कुराते हुए गिरि को देख रहे थे. सबने उन्हें थम्ब्स अप का संकेत दिया. गिरि ने भी उनको उसी संकेत के साथ उत्तर दिया और अपने मुंह को बबिता के मम्मों के बीच डालकर उन्हें चूसने लगे. उनका लंड धीरे धीरे अपने आक्रोश में आ रहा था. उन्होंने देखा कि गीता और निर्मला ने अपनी साड़ी पूरी उतार दी और फिर पेटीकोट भी उतार फेंके. फिर निर्मला ने पूनम और बबिता को देखा.

“तुम किसकी प्रतीक्षा कर रही हो. सारे लौड़े तैयार हैं और तुम अभी भी आधे कपड़े डाले हुए हो.”

“हम तेरे जैसी बेशर्म नहीं हैं. पर अब कहती है तो ये लो.” बस आंख झपकते ही बबिता और पूनम भी नंगी खड़ी हो गयीं.

“गांव में तुम चारों जैसी कोई और नहीं है, न सुंदरता में न चुदाई में.” जस्सी ने कहा.

“कितनो को चोदा है तुमने.” उसकी पत्नी ने पूछा.

“जबसे शादी हुई है तब से चोदा तो नहीं, पर मुझे विश्वास अवश्य है कि तुम जितनी चुड़क्कड़ कोई और नहीं होगी गाँव में.”

अब तक गिरि के सिवाय अन्य सभी आदमी अपने ऊपर के कपड़े उतार चुके थे. गिरि ने उनके बलिष्ठ शरीर देखे तो उसे गाँव की मेहनत का लाभ समझ आया. बबिता ने उनकी ओर बढ़कर उनकी शर्ट उतार दी और खड़ा होने के लिए कहा. उनके साथ बाकी चार पुरुष भी खड़े हो गए. चारों पत्नियों ने सबके पाजामे उतारे और उसमे से सबके उफनते हुए लौड़े छिटक कर खड़े हो गए. केवल गिरि ने कच्छा पहना था जिसे अधिक देर तक शरीर पर ठहरने नहीं दिया गया. जैसे ही उनका लंड बाहर निकला तो चारों महिलाओं की आह निकल गयी.

जीवन ने भी जब गिरि के लंड को देखा तो बोल पड़े, “मैं समझ सकता हूँ कि ऐसे हथियार के होते हुए भी अगर आप चुदाई नहीं कर पते थे तो तनाव होना सुनिश्चित था. पर अब आप चिंता छोड़कर इन सुंदरियों का जी भर कर भोग करें इन छुट्टियों में. इनके जिस छेद में जब मन चाहे लंड पेल देना. यहाँ आपको हर प्रकार से सुख दिया जायेगा. मुझे नहीं लगता कि लौटने के बाद आपके लंड को चूतों की कमी पड़ेगी.”

गिरि आश्चर्य और कृतग्नता से उनकी ओर देख रहे थे, “आप सच में बहुत भले आदमी हैं. मुझे आज वो सारी संवेदना अनुभव हो रही हैं जो मुझे मेरी बीमारी के पहले होती थी. आपका ये परोपकार मैं जीवनपर्यन्त नहीं भूलूंगा.”

“इसकी कोई आवश्यकता नहीं है. अगर मित्र ही मित्र के काम न आये तो बेकार है. अब मजा करो और बिलकुल तनाव मत लो.”

बबिता ने झुककर घुटने टेके और उनके लंड को मुंह में ले लिया.

गिरि ने बबिता से पूछा, “भाईसाहब किसे चोदेगे?”

बबिता, “उनकी चिंता न करो, जिस छेद में मन करेगा वहां लौड़ा टिका देंगे. वैसे हम में से किसी एक की गांड की आज शामत आने वाली है.”

ये सुनकर गिरि के लंड ने झटका लिया.

“मुझे भी गांड मारने का बहुत शौक है.”

“वो भी मिलेगी, जिसकी चाहोगे. पर पहले मेरी चूत की आग बुझा दीजिये.” ये कहते हुए बबिता उनके लंड को अपने गले की गहराई तक ले जाकर चूसने लगी.

गिरि अपने लंड पर चल रहे उस आघात से ऑंखें बंद करने ही लगे थे कि उन्हें लगा कि आसपास की गतिविधि भी देख ली जाये. कंवल के लंड को निर्मला चूस रही थी और जस्सी के लंड को गीता. पूनम ने बलवंत के लंड को अपने मुंह में लिया हुआ था. जीवन एक ओर खड़े होकर अपना पेग लगा रहे थे. पर उन्होंने भी अपने कपड़े त्याग दिए थे और उनका लंड भी अपने पूरे यौवन पर था. गिरि ने ऑंखें बंद करके बबिता के लंड चूसने के आनंद में स्वयं को झोंक दिया. कुछ ही देर में बबिता ने उनके लंड को मुंह से निकाला।

“भाईसाहब, अब थोड़ा मेरी चूत को भी चाट दो.”

गिरि ने आव देखा न ताव और बबिता को एक ही झटके में नीचे किया और उसकी चूत में मुंह लगाकर ऐसे चाटने लगे जैसे कि रसमलाई खा रहे हों. बबिता भी उन्हें उत्साहित कर रही थी. अन्य जोड़े भी अब इसी प्रकार से चूत चाटने के कार्यक्रम में व्यस्त हो गए. गिरि ने ये आभास किया कि बबिता की आहें दब गयी हैं और उसने ऊपर देखा तो जीवन ने अपने लंड को बबिता के मुंह में डाल रखा था और इसी कारण बबिता कुछ कह नहीं पा रही थी. उन्होंने अपना ध्यान वापिस बबिता की बहती हुई चूत पर लगाया और उसे चाटते हुए जीभ से कुरेदने लगे. बबिता की सिसकियाँ सुनकर उन्हें ज्ञान हो गया कि जीवन अगले जोड़े को ओर जा चुके थे.

जब तक महिलाओं ने अपना पहला पानी अपने साथी के मुंह में छोड़ा तब तक जीवन अपने लंड को उन सबसे चुसवाने में सफल रहे थे. बबिता ने गिरि को बिस्तर पर लिटाया और उसके लंड को पकड़ते हुए अपनी चूत को उस पर रखा और एक ही बार में पूरे लंड को अंदर ले लिया. गिरि को ये आनंद बहुत समय के पश्चात मिला था. पहले उन्हें ये डर लगा कि कहीं वे जल्दी न झड़ जाएँ, फिर उन्होंने इस विचार को त्यागा और बबिता की चूत में अपनी ओर से भी धक्के लगाने लगे.

कमरे में अब यही दृश्य था, हर महिला अपने साथी के लंड पर चढ़कर चुदवा रही थी. आहों, सीत्कारों और कराहों से कमरा गूंज रहा था. गिरि को आभास हुआ कि बबिता कुछ अधिक ही आगे झुक गयी है. उसने अपनी आँखें खोलीं तो बबिता का चेहरा दिखा और उसके पीछे जीवन का. जीवन ने उन्हें आंख मारी और फिर उन्हें अपने लंड पर एक नए दबाव का आभास हुआ. जीवन अपने लंड को बबिता की गांड में डाल रहे थे. और फिर दोनों लौड़े एक दूसरे से एक पतली झिल्ली के माध्यम से पृथक थे पर एक दूसरे की उपस्थिति को अनुभव कर सकते थे.

“मेरे विचार से मधु को भी ऐसे ही चुदवाने में आनंद आता होगा. वापिस लौटने पर हम दोनों उसकी ऐसे ही चुदाई करेंगे. ठीक है न?” ये कहते हुए जीवन अपने पूरे लंड को बबिता की गांड में डालकर चलाने लगे.

“भाईसाहब, गांड तुम मादरचोद मेरी मार रहे हो और सपने इनकी पत्नी के देख रहे हो. क्या कमीने आदमी हो.”

“मैं तुझे बताता हूँ बबिता भाभी कि मैं कितना कमीना हूँ. गिरि भाई, थोड़ा तेज चलाओ अपने लंड को. मेरी भाभी को दिखाना है कमीनापन किसे कहते हैं.”

इतना कहना था कि जीवन बबिता की गांड में अपने मूसल को तेजी से अंदर बाहर करने लगे. अपने नए मित्र को निराश न करने की इच्छा से गिरि ने भी अपने पूरे सामर्थ्य से बबिता कि चूत की धज्जियाँ उड़ाने का प्रयास किया. बबिता की हृदय विदारक चीखें उसके आनंद की साक्षी थीं. अन्य स्त्रियां उसके इस आनंद से ईर्ष्या करने लगीं. उन्हें सबको जीवन से गांड मरवाने में जो सुख मिलता था वो अद्वितीय था. पर आज बबिता जीती थी. उन्हें विश्वास था कि आने वाले दिनों में उनकी गांड भी उस लंड की भेंट चढ़ेगी.

कोई दस मिनट की इस तीखी डबल चुदाई के बाद जब गिरि को लगने लगा कि वे झड़ने वाले हैं तो उन्हें अपने लंड पर दबाव कम होता हुआ अनुभव हुआ तो उन्होंने पाया कि जीवन ने अपने लंड को निकाल लिया है और वो अब पूनम की ओर जा रहे थे. उन्होंने अपने लंड से बबिता की चूत की चुदाई चालू रखी और देखा कि इस बार जीवन ने अपने लौड़े को पूनम की गांड में जड़ दिया। पूनम की चीख ने कमरे को फिर से हिला दिया, पर बलवंत और जीवन ने उसकी चुदाई में कोई कमी नहीं की. चारों मित्रों का ये सबसे प्रिय खेल और आसन था. न जाने कितनी बार इस कमरे में चुद रही स्त्रियों की ऐसी डबल चुदाई कर चुके थे. और जब जीवन की पत्नी जीवित थीं तो उन्हें भी इन दोनों से यूँ चुदवाने में बहुत आनंद आता था.

गिरि अब दोबारे झड़ने के निकट थे. और उन्होंने अपने माल को बबिता की चूत में भरने के बाद ही साँस ली. झड़ने के तुरंत ही बाद बबिता उनके लंड पर से उतरी और उनकें लंड को मुंह में लेकर रस को पीकर साफ कर दिया. इसके बाद ही गिरी को ये आभास हुआ कि लगभग एक वर्ष के बाद किसी चूत में स्खलित हुए हैं. उनकी पोती कई बार उन्हें चूसकर झडा दिया करती थी, पर चूत में जाकर इतनी देर तक चोदना उन्होंने एक समय से सम्पन्न नहीं किया था. इस विचार से उनकी आँखों से आंसू बहने लगे. पर चूँकि सब अपने खेल में व्यस्त थे तो किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया. अपितु, बबिता ने ये देख लिया था पर चुप्पी साधे रखी. वो इस प्रकार की भावनाओं को समझते थी.

जब उसने चोरी से देखा कि गिरि सामान्य हो गए हैं तो वो उठी और गिरि के पास बैठ गयी.

“मैंने कहा था न, आपको कुछ नहीं हुआ है, आपके मन में एक मानसिक ग्रंथि थी जिसने आपको इस समस्या में डुबाये रखा. अब आप इसी प्रकार से खुश और आश्वस्त रहिये. आपके लिए यहां चार चूत और गांड हमेशा चुदवाने के लिए उपलब्ध हैं.”

गिरि ने खुश होकर बबिता को चूम लिया. जीवन अपने लंड को अब पूनम की गांड से निकाल रहे थे. पर आज के लिए अन्य जोड़े झड़ चुके थे और इसी कारण उन्होंने अपने लंड की मलाई को पूनम की ही गांड में छोड़ दिया था. सब संतुष्टि से एक दूसरे को देखते हुए हंस रहे थे. बलवंत ने उठकर सबके लिए फिर पेग बनाये और सब यूँ ही हँसते बोलते और चुहल करते हुए उन्होंने अपनी ड्रिंक समाप्त की और वहीँ सो गए.

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सुनीति का घर :

जब तक जीवन अपने गाँव पहुंचे, सुनीति के पास स्मिता (शेट्टी महक की माँ विला ८ वाली) का फोन आया. स्मिता ने कल उसे और असीम को और केवल उन दोनों को साढ़े दस बजे अपने घर पर चाय के लिए बुलाया था. उन्होंने ये भी बता दिया था कि असीम को उनके ही पास रुकना होगा. सुनीति ने स्वीकृति दी और असीम को बताया कि वो कल किसी और स्थान पर न जाये. असीम ने भी सहर्ष स्वीकार कर लिया.

अगले दिन, जीवन का गाँव:

सभी तड़के सुबह उठ गए और पुरुष अपने व्यायाम में व्यस्त हो गए और महिलाएं खाने और अन्य घरेलु कार्यों में. ये पहले ही निश्चित कर लिया था कि जीवन के इस पूरे समय सब एक ही घर में रहेंगे, चाहे जिसका भी हो. आज बलवंत के ही रुकना श्रेयस्कर था. सुबह के कार्य समाप्त करने के बाद सब बैठ कर सामान्य बातें करते रहे और अपने बच्चों के बारे में सूचना साझा की. सभी के बच्चे और नाती पोते अच्छे से अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे. हालाँकि, सभी उतने सफल नहीं थे जितना कि आशीष, पर संतुष्ट थे और खुश थे.

जीवन ने ये सुझाया कि अगर हो सके तो सबको एक ही समय गाँव में बुलाया जाये. उनके बच्चों को एक दूसरे से मिले एक लम्बा समय निकल चुका था. और नाती पोते तो एक दूसरे को पहचानते भी नहीं थे ठीक से. सबने इस बात के लिए स्वीकृति दी और अपने बच्चों से बात करने का आश्वासन दिया. जीवन के लौटने के पहले समय निर्धारित करने का विश्वास दिलाया.

गिरि ने फोन पर मधु से बात की तो मधु ने पूछा कि वे अपनी दवाइयां क्यों नहीं ले गए. गिरि के पूछने पर कि उन्हें कैसे पता, मधु ने कहा कि वो कल उनके ही कमरे में सोई थी. और जब तक वे नहीं लौटते वहीँ रहेगी. गिरि को बबिता की बात सही सिद्ध होती लगी. पर उन्होंने मधु को ये नहीं बताया कि उन्होंने कल रात सफलता पूर्वक चुदाई की थी और आगे भी करने वाले हैं. हालाँकि इस बात से उनके संबंधों में कोई अंतर नहीं आता पर वे मधु को चकित करना चाहते थे.

अगले दिन, स्मिता का घर:

निर्धारित समय पर सुनीति और असीम आठ नंबर विला में स्मिता से मिलने के लिए पहुंचे. आज सुबह मधुजी का फोन आया था और उन्होंने इस मिलन का उद्देश्य समझाया था. उन्होंने दो लड़को के नाम स्मिता को दिए थे. जिसमे से एक से वो कल मिल चुकी थी और आज असीम से मिलना था. महक भी उस लड़के से मिली थी और असीम से भी मिलेगी. परन्तु मधु जी ने ये भी चेताया कि जिस भी लड़के को स्मिता और महक पसंद करेंगी, वो लड़का विवाह के पहले महक से किसी प्रकार का शारीरिक संबंध नहीं रख सकेगा. परिवार के अन्य लोगों के लिए बाध्यता नहीं थी.

स्मिता ने उनका स्वागत किया और फिर महक और असीम को दूसरे कमरे में भेज दिया बातचीत करने के लिए. ये बातचीत स्वाभाविक थी और इसमें चुदाई का लेशमात्र भी पुट नहीं था. दोनों एक दूसरे के बारे में जानने के लिए उत्सुक थे और एक दूसरे की रुचियों और अरुचियों को भी समझना चाहते थे. एक घंटे की गहन बातचीत से असीम को लगा कि महक उसके लिए एक उत्तम पत्नी सिद्ध हो सकती है. हालाँकि वो ये नहीं जानता था कि महक के भी उसके किये यही विचार थे. असीम को इसके बारे में समुदाय के माध्यम से ही पता लगना था.

जब दोनों बाहर आये तो स्मिता और सुनीति भी गहन वार्तालाप में लीन थीं. स्मिता ने महक की ओर देखा तो उसने बहुत हल्के से सर हिलाकर सकारात्मक उत्तर दिया. इसका अर्थ था कि अब असीम का चयन पूरे रूप से स्मिता के ही हाथ में था. कल वाले लड़के ने अपनी चुदाई से स्मिता को बहुत संतुष्ट किया था, परन्तु महक को वो लड़का अपने लिए उपयुक्त नहीं लगा था. अगर असीम भी चुदाई में पारंगत हुआ तो ये सम्बन्ध पक्का होने की संभावना बहुत अच्छी थी.

सुनीति ने उठकर दोनों को गले से लगाया और महक के माथे को चूमकर उसे आशीर्वाद दिया. इसके बाद महक अपने काम से निकल गयी. सुनीति ने भी स्मिता से प्रस्थान की अनुमति ली और फिर असीम को वहीँ छोड़कर अपने घर लौट गयी.

सुनीति का घर :

सुनीति घर पहुंची तो उसे ये देखकर आश्चर्य हुआ कि कुमार घर पर ही है.

“क्या हुआ, तुम गए नहीं?”

“माँ, मैंने सोचा कि जब आज सब लोग बाहर हैं, तो क्यों न हम मिलकर कुछ आनंद उठायें. आपका क्या विचार है?”

सुनीति ने कुछ नहीं कहा, और अपने कमरे की ओर बढ़ गयी. कुमार वहीं खिसियाया सा खड़ा रह गया.

कमरे में जाने से पहले सुनीति ने कुमार की ओर देखा और फिर मुस्कुराकर बोली, “वैसे आइडिया बुरा नहीं है.”

ये कहते हुए उसने अपनी गांड मटकायी और कमरे में घुस गयी. कुमार दौड़ता हुआ उसके पीछे गया और अंदर जाकर कमरा लॉक कर लिया. सुनीति को अपनी बाँहों में लेकर चुम्बनों की झड़ी लगा दी.

“बड़ा उतावला हो रहा है.” सुनीति बोली.

“चार दिन हो गए मॉम, उतावला तो होना ही है.”

“चल तू कपडे उतार मैं बाथरूम से अभी आयी.”

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स्मिता का घर:

स्मिता ने पैनी दृष्टि से असीम को देखा जो अभी भी खड़ा ही हुआ था.

“बैठो.”

असीम के बैठने के बाद स्मिता ने उससे कई प्रश्न किये जो किसी भी लड़की की माँ उस लड़के से करती है जिसके साथ उसके विवाह की संभावना हो. असीम के उत्तरों से वो संतुष्ट प्रतीत हो रही थी.

“क्या तुम जानते हो कि आज तुम्हारे यहाँ आने का क्या प्रयोजन है?”

“जी, मुझे अपनी संभावित पत्नी की माँ के मापदंड पर खरा उतरने का प्रयास करना है.”

“और ये मापदंड क्या हैं? तुम खुल के बात कर सकते हो, हम सब एक ऐसे समुदाय के सदस्य हैं जहां किसी भी प्रकार की भाषा अवैध नहीं है.”

असीम ने मुस्कुराकर कहा, “मुझे आपकी ऐसी चुदाई करनी है जससे आपको ये विश्वास हो जाये कि आपकी बेटी महक किसी भी प्रकार के सुख से वंचित नहीं रहेगी.”

स्मिता उसके इस उत्तर पर हंस पड़ी, “और तुम्हे लगता है कि तुम इसमें सक्षम हो?”

असीम: “मुझे विश्वास है कि आपको हर मापदंड पर मैं उच्च ही सिद्ध होकर दिखाऊंगा.”

स्मिता: “समुदाय में तुम्हारी आयु के कई लड़के हैं जिन्होंने मुझे चोदा है, पर उनमे से कम ही हैं जो मुझे पूर्ण रूप से तृप्त कर पाए.”

असीम: “जो कर पाए, आज उनमे आप मुझे भी जोड़ सकेंगी. पर क्या हम बातें ही चोदते रहेंगे या फिर कुछ असली में भी करना है.”

स्मिता खिलखिला पड़ी, “आई लाइक इट. आई लाइक इट ए लॉट. चलो मेरे बेडरूम में चलते हैं.”

स्मिता अपने कमरे की ओर चल पड़ी और असीम उसके पीछे हो लिया. स्मिता ने असीम के अंदर आने के बाद कमरा बंद किया.

स्मिता: “क्या पीना चाहोगे?”

असीम: “आपके होठों का रस और आपकी चूत का रस.”

स्मिता खिलखिला पड़ी, “आई लाइक इट. आई लाइक इट ए लॉट. तो फिर देर किस बात की है?”

असीम ने आगे बढ़कर स्मिता को बाँहों में लिए और अपने होंठ उसके होंठों से मिलकर उसका चुंबन लिया तो स्मिता का शरीर झन्ना गया. उसने सोचा कि अगर ये लड़का चुदाई भी वैसे करेगा जैसे चूम रहा है तो दामाद बनना तय ही है. असीम अपने शरीर को स्मिता के शरीर में मानो मिला देना चाहता हो. उसके हाथ पीछे पीठ पर गए और उसने सधे हाथों से स्मिता का ब्लाउज़ खोल दिया और उसे निकाल फेंका. उसने बिना चुंबन को तोड़े हुए ब्रा को भी अलग किया और अपने होंठ स्मिता के होंठों से हटाकर उसके मम्मों पर रख दिए. चुंबन इतना गहरा था की स्मिता अभी भी साँस संयत करने का प्रयास कर रही थी. एक मम्मे को मुंहे से चूसते हुए दूसरे पर असीम ने अपने हाथ जमाये और उन्हें मसलने लगा. स्मिता का शरीर इतनी जल्दी से इस आक्रमण के लिए तैयार नहीं था और उसके पैर कांपने लगे.

“मेरे विचार से हमें बिस्तर पर ही चलना चाहिए.” असीम ने कहा तो स्मिता शांति से बिस्तर पर जाकर बैठने ही वाली थी कि असीम ने उसे रोका।

“आप के कपड़े अनावश्यक ही बाधा उत्पन्न करेंगे, इन्हें निकाल ही दें तो ठीक होगा.”

और उसने स्मिता के उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना ही उसके पेटीकोट का नाड़ा खोला और पेटीकोट सरकते हुए नीचे गिर गया. फिर उसने स्मिता के सामने घुटनों के बल बैठकर उसकी पैंटी भी निकाल दी. स्मिता कमरे में आने के कुछ ही मिनट में असीम के सामने नंगी खड़ी थी.

“तुम्हारे कपड़े ?”

“आपको नहीं लगता कि ये कार्य आपको करना चाहिए?” असीम ने छेड़ते हुए कहा.

स्मिता: “आई लाइक इट. आई लाइक इट ए लॉट.”

ये कहकर स्मिता अपने कार्य में जुट गयी और चंद ही सेकंड में असीम भी उसके सामने नंगा खड़ा था. उसका लंड अब तक तक आधा खड़ा हो चूका था और उसे देखकर स्मिता की चूत पनिया गयी. उसे विश्वास हो चला था कि आज उसकी भरपूर चुदाई होने वाली है.

स्मिता, “आई लाइक इट. आई लाइक इट ए लॉट.”

असीम: “लगता है ये आपका प्रिय वाक्य है. अब क्यों न आप लेट जातीं जिससे कि मैं आपकी इस चमचमाती चूत के रस से अपनी प्यास मिटा लूँ.”

स्मिता पैर फैलाकर बिस्तर पर लेट गयी और असीम ने अपना चेहरा उसकी चूत में डाल दिया.

असीम जब चूत चाटने लगा तो स्मिता की शरीर में कंपकपी दौड़ गयी. इस लड़के को पता है की चूत चाटने का गुर, लगता है सुनीति ने इसे अच्छी शिक्षा दी है. असीम की लपलपाती जीभ अब स्मिता की बहती चूत में नर्तन कर रही थी. स्मिता ने सोचा कि ये लड़का अभी दस मिनट पहले ही कमरे में आया है और आआआह मुझे एक बार झाड़ भी दिया. कल वाला लड़का चुदाई में तो निपुण था पर चूत चूसने में इतना गुणी नहीं था. असीम स्मिता की चूत में इतना खोया हुआ था कि उसे ये विदित नहीं हुआ कि स्मिता ने उसे मन में अपना दामाद मान लिया है, बस अगर वो उसे अच्छे से चोद पाए तो.

स्मिता जब दो बार झड़ गयी तो उसने असीम के लंड को चूसने की इच्छा की. असीम ने बेमन से अपना मुंह स्मिता की चूत से निकाला और अपने लंड को स्मिता के लिए प्रस्तुत कर दिया. स्मिता ने बैठते हुए उसे अपने मुंह में लिया और ऐसे चूसा कि असीम की नसें हिल गयीं. उसकी माँ इस कला की पारखी थी पर स्मिता के लंड चूसने की कला एकदम भिन्न थी. वो अपने गले से उसके लंड की मुठ मार रही थी जो असीम के जीवन का पहला अनुभव था. कुछ ही देर में उसका लंड अपने विकराल रूप में आ गया. और स्मिता ने उसे अपने मुंह से निकाला।

“मेरे विचार से अब इसकी असली परीक्षा मेरी चूत ही लेगी.” स्मिता बोली.

“क्यों क्या आपकी गांड इतने बड़े लंड को लेने की सक्षम नहीं है?”

स्मिता: “मेरे अर्थ ये नहीं था, अवश्य ही गांड में भी लूंगी , पर परीक्षा में उत्तीर्ण मेरी चूत ही करेगी.”

असीम: :जैसा आप उचित समझें।”

स्मिता ने अपने पैर दोबारा फैलाये और लेट गयी. असीम जानता था कि ये बहुत चुदी हुई है और इसीलिए उसने समय व्यर्थ न करते हुए अपने लंड को लक्ष्य पर लगाया और एक ही बार में पूरा अंदर उतार दिया. स्मिता कुछ चिहुँकि पर उसने किसी प्रकार का प्रतिरोध नहीं किया. असीम ने अपने पूरे सामर्थ्य और शक्ति से स्मिता की चूत के छक्के छुड़ाने आरम्भ किये. स्मिता भी आनंद के सागर में गोते लगाते हुए इस तेज और निर्मम चुदाई का आनंद ले रही थी. उसे पता था की सम्बन्ध होने के पश्चात उन्हें प्यार और संयम से चुदाई के अनेक अवसर मिलेंगे. आज केवल ट्रेलर था, पिक्चर आनी अभी शेष थी.

असीम ने तेज और गहरी चुदाई करते हुए स्मिता को दो या तीन बार और स्खलित किया, पर जब उसके लंड से रस निकलने ही वाला था तो स्मिता की एक लम्बी चीख ने उसे चौंका दिया. स्मिता के काँपते तड़पते हुए शरीर को छटपटाते हुए देख वो समझ गया कि वो परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया है. स्मिता जब इस ऊंचाई से उतरने लगी तो असीम के लंड की पिचकारियों ने उसकी चूत को जैसे ही सींचना शुरू किया तो वो लौट कर उस ऊंचाई को फिर छूने लगी. जब दोनों शांत हुए तो एक गहरे चुंबन में बंध गए.

स्मिता: “सुनीति ने तुम्हे बहुत अच्छा सिखाया है. वो बहुत भाग्यशाली है.”

असीम: “धन्यवाद. उनके जैसी माँ सबको मिले.”

दोनों एक दूसरे की बाँहों में यूँ ही लेटे हुए एक दूसरे को चूमते रहे. पर असीम अधीर हो रहा था. उसे पता था कि परीक्षा समय बद्ध होती है. और वो स्मिता की गांड की यात्रा के बिना लौटना नहीं चाहता था.

“तो अब ये भी देख लें कि आपकी गांड मेरे लंड को ले पाएगी या नहीं.”

“इसमें कोई भी शक नहीं, तुम्हारा लंड मेरे बेटे के लंड से बहुत बड़ा नहीं है, तो ये मत सोचना कि गांड नहीं ले पायेगी. पर ये अवश्य है कि मैं गांड मरवाये बिना तुम्हें छोड़ने वाली भी नहीं.”

“पर परीक्षा की कोई समय सीमा नहीं है क्या?”

“है, पर उसमे अभी भी बहुत समय शेष है. चलो तुम्हें अपनी गांड चाटने का अवसर देती हूँ. और फिर उसे चोदने का भी मिलेगा.”

स्मिता ने घोड़ी का आसन लिया और असीम की ओर आशा से देखा. असीम को कोई निमंत्रण नहीं चाहिए था. उसने स्मिता की सुंदर सुडोल गांड के पाटों पर दृष्टि डाली तो उसके मुंह में स्वयं ही पानी आ गया. स्मिता की गांड भी उसकी माँ के समान बिलकुल गोलाकार थी. उसके उसके बीच में लुपलुपता हुआ भूरा छेद उसे अपनी ओर स्वतः ही खींच रहा था. स्मिता ने असीम की आँखों में वो देखा जिससे कि उसका मन प्रफुल्लित हो गया. असीम ने झुकते हुए स्मिता के दोनों नितम्बों को चूमा और फिर उनपर जीभ से थूक की रेखा खींचते हुए उसकी गांड के बहरी खुरदुरे छेद पर जीभ चलाने लगा. स्मिता एक बार फिर सिहर उठी. चाटते हुए असीम उसके दोनों नितम्बों को जोर जोर से मसल रहा था. फिर उसने ऐसा कुछ किया जो अप्रत्याशित था.

असीम ने स्मिता की गांड को चाटते हुए उसके दोनों नितम्बों पर थप्पड़ लगाने आरम्भ कर दिए. हालाँकि इसकी तीव्रता नगण्य के बराबर थी, पर इस आकस्मक आक्रमण ने स्मिता की वासना को कई गुना बढ़ा दिया. नितम्बों पर हल्के हल्के थप्पड़ लगते हुए असीम ने स्मिता की खुलती हुई गांड में अपनी जीभ डाली और उसके अंदर विचरण करने लगा. वो रुक रुक कर स्मिता की गांड को फैलता और स्थान मिलते ही जीभ को और अंदर डाल देता. स्मिता अब आपे से बाहर हो रही थी. उसकी चूत फिर नदी के समान बहने लगी थी. और अब उसे अपनी गांड में कुछ मोटा और लम्बा हथियार चाहिए था.

स्मिता: “अब और मत तड़पा, मेरी गांड में पेल दे अपना लौड़ा और फाड़ दे इसे. इसकी खुजली अब रुकने वाली नहीं तेरे लंड को खाये बिना.”

असीम उसकी इस प्रतिक्रिया के लिए तैयार था. उसकी माँ भी आज तक उसके इस पराक्रम के आगे विवश थी तो स्मिता तो क्या थी? उसने अपने तने लंड को स्मिता की गांड की छेद पर रखा. और स्मिता ने उसे पीछे मुड़ते हुए कामांध दृष्टि से देखा. असीम ने एक प्यारी सी मुस्कुराहट दी जिसे देखते हुए स्मिता भी मुस्कुरा उठी. पर तत्क्षण उसके चेहरे के भाव बदल गए. असीम ने एक ही तगड़े झटके में स्मिता की अनन्य बार चौड़ी की गयी गांड में अपना लौड़ा पेल दिया. स्मिता के भाव बदल कर कुछ क्षण के लिए पीड़ा के हुए पर उसे जब अपनी गांड पूरी पैक हुई अनुभव हुई तो आनंद ने उसे अपने वशीभूत कर लिया.

असीम समय का सदुपयोग करना चाह रहा था और उसे विश्वास था कि आज की चुदाई के बाद वो इस घर का दामाद बनेगा और इस गांड में कई बार उसके लंड को प्यार से जाने का अवसर मिलेगा. पर आज इसे फाड़कर सारे कसबल निकालने का समय था. स्मिता को भी गांड तेज और कर्कश तरीके से ही मरवाना अच्छा लगता था. गांड मरवाना ही हो तो ऐसे मरवाओ कि दो दिन तक याद रहे. ये उसके जीवन का सार था. चूत चाहे प्यार से चोदो पर गांड पर दया नहीं करनी चाहिए.

असीम उसकी इस इच्छा से अनिभिज्ञ अपने ही अंदाज में स्मिता की गांड को जैसे फाड़ने के लिए ही चोद रहा था. उसके भीषण लम्बे और तीव्र धक्के स्मिता जैसी खेली खिलाई स्त्री ही झेल सकती थी. और तो और स्मिता अब उसे उकसाते हुए और भी तेज और गहराई तक लंड पेलने के लिए प्रोत्साहित कर रही थी. स्मिता की चूत से रस की धार ने बिस्तर को इतना गीला कर दिया था की अब उसके घुटने फिसलने लगे थे. पर असीम अनियंत्रित अबाधित गति से उसकी गांड में लौड़ा पेले जा रहा था.

आठ दस मिनट की इस वीभत्स चुदाई के बाद स्मिता ने हार मान ली और उसकी चूत ने एक अंतिम धार फेंकी और उसे निश्चल कर दिया. असीम भी अब अपने लक्ष्य को पा चुका था. उसने स्मिता के मरणासन्न शरीर को अपने बलिष्ठ हाथों से पकड़कर अंतिम धक्कों के साथ स्मिता की गांड में अपनी मलाई डाल दी और फिर उसके ऊपर हाँफते हुए गिर पड़ा. स्मिता और असीम कुछ देर के लिए जैसे अचेत थे. जब दोनों अपनी मूर्छा से निकले तो एक दूसरे को चूमने में व्यस्त हो गए.

स्मिता: “तुम सच में चुदाई में निपुण हो. हालाँकि मुझे ये बताने का अधिकार नहीं है, पर मैं तुम्हें दामाद के रूप में स्वीकार करती हूँ. पर ये बात तुम्हे समुदाय के माध्यम से ही पता लगेगी. इसीलिए, कृपा करके इसे हम दोनों के सिवाय किसी और को न पता लगे इसका आश्वासन देना होगा. वैसे, कल तक तुम्हारी माँ को इसके बारे में सूचना दे दी जाएगी. और अब से महक तुम्हारे लिए अछूत है. जब तक विवाह सम्पन्न नहीं होता तुम दोनों एक दूसरे के साथ चुदाई नहीं कर सकते. घूमो फिरो , सब मान्य है, पर चुदाई किसी भी स्थिति में नहीं होनी चाहिए. मैं महक को भी ये समझा दूंगी.”

इसके बाद स्मिता और असीम एक दूसरे को न जाने कितनी देर तक चूमते रहे. फिर घर लौटने के पहले असीम ने स्मिता की एक बार प्यार से चुदाई की, जिसके कारण वो उसकी और भी प्रशंसक बन गयी. चार बजे के लगभग असीम अपने घर लौट गया.

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सुनीति का घर :

सुनीति और कुमार एक दूसरे के आलिंगन में बद्ध क्रमशः बिस्तर की ओर चल पड़े.
 
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जीवन का गाँव:

गिरि को घर पर ही छोड़कर जीवन और उसके मित्र बलवंत के खेत पर चले गए. जीवन ने अपने मैनेजर को भी बुला लिया था और उसे बलवंत के खेतों का दायित्व भी दिया जा रहा था. चूँकि उनका मैनेजर एक बहुत ही शालीन और सुलझी बुद्धि का मध्यम आयु का आदमी था, तो जाते हुए जीवन ने कँवल, जस्सी और सुशील से कहा कि क्यों न वे भी उसे अपने खेतों के रख रखाव का दायित्व दे देते.

जीवन: “उसकी मंडियों और अन्य बाजारों में अच्छी पहचान और पहुँच है. मेरे विचार से वो तुम सबको अबसे अच्छा दाम दिलवा पायेगा. और उसके वेतन की तुम सब चिंता न करो. मैं जो उसे देता हूँ, उसमे ही बढ़ोत्तरी कर दूंगा. और इसमें कोई आपत्ति मत करना. तुम लोगों के सिवाय मेरा कोई अभिन्न मित्र नहीं है. तुम सब अपने घर, परिवार पर ध्यान दो. अपने बच्चों के पास जाओ और आनंद से रहो.”

जीवन की बात को नकारने का कोई औचित्य नहीं था. सब उसकी बात मान गए. और फिर पूरे दिन वे सब अपने अपने खेतों पर जाकर नए मेनेजर को उसका काम सौंपने में व्यस्त रहे. चूँकि अब मैनेजर का काम बढ़ गया था तो जीवन से उससे बात करके उसे हर खेत के लिए उसके वेतन का ३५% अतिरिक्त देना का वचन दिया. चार खेत और मिल जाने से उसे अब अपनी पुरानी कमाई से १४०% अधिक मिलने लगा. वो बहुत प्रसन्न हो गया और उसने जीवन का मन से धन्यवाद किया. जीवन ने उसे एक नया ट्रेक्टर और मोटर साइकिल भी बुक करने के लिए कहा और बोला कि उसका पैसा वो ही दे देगा, और ट्रेक्टर उसके तीन मित्रों की पत्नियों के नाम से लिया जायेगा। मोटरसाइकिल वो बलवंत के नाम से ले ले. क्योंकि बाइक अगले दिन ही मिल सकती थी तो बलवंत के जाने से पहले ये कार्य सम्पन्न हो सकेगा.

सब कार्य अच्छे से सम्पन्न करने के बाद पाँचों मित्र बलवंत के घर लौट आये जहाँ उनका खाने की मनमोहक सुगंध ने स्वागत किया. नहाने के बाद सब यार फिर से आंगन में बैठे और शराब की बोतल फिर खुल गयी. सुशील ने महिलाओं को खेतों के आगे के प्रबंध के बारे में बताया तो सबने जीवन के गले लगकर उसका धन्यवाद किया. गिरि ने भी जीवन को गले से लगाकर उसे धन्यवाद किया. उसे इस आदमी के बड़प्पन पर विश्वास नहीं हो रहा था. कितने निश्छल मन से वो सबके भले के लिए प्रयत्न करता है.

जीवन ने गिरी से पूछा: “फिर क्या किया आज दिन भर.”

इसके पहले कि गिरी उत्तर देता गीता बोल पड़ी, “आज सच में भाई साहब ने इतना मजा करवाया कि कभी नहीं भूल पाएंगे.”

“ऐसा क्या किया, भाई.”

गीता ने कहा, “मैं बताती हूँ.”

गिरी को छोड़कर सब चले गए तो उन्हें घर में चार महिलाओं के साथ अकेले रहना कुछ खेलने लगा. घर में टीवी भी नहीं था. जीवन के किसी भी मित्र ने अपने घर में टीवी नहीं लगवाया था. उनका मानना था कि ऐसा करने से एक दूसरे से सम्पर्क टूट जाता है. और जब संगी साथी हों तो टीवी का क्या काम. कुछ देर समाचार पत्र पढ़ने के बाद गिरी ऊबने से लगे. तभी गीता उनके पास आयी और उनके पास बैठ गयी.

गीता: “आपको ऊब हो रही है न? पर हम भी अपने काम में व्यस्त होने के कारण आप की ओर ध्यान नहीं दे पाए.”

गिरी: “नहीं, ऐसा कुछ नहीं है.”

गीता: “शर्माइये नहीं भाईसाहब. हम भी समझते हैं. पर अब हम अपने काम समाप्त कर चुकी हैं और आपके कमरे में निर्मला आपकी राह देख रही है. बहुत अधीर हो रही है वो आपसे चुदने के लिए. तो अब मन मत मसोसिये और जाकर उसे अच्छे से रगड़िये। कल बेचारी की गांड अनचुदी रह गयी थी तो बहुत खुजला रही है. पहले वहीँ लगाना दाँव। वैसे आपको गाँव के बारे में और कुछ भी पता लग जायेगा उसके पास जाने पर.”

गिरी का लंड ये सुनकर अकड़ गया और वे उठे और अपने कमरे में चल दिए.

“गीता, पूनम कहाँ है?” बबिता ने पूछा.

“भाईसाहब को गाँव के बारे में समझने के लिए निर्मला के ही साथ है.”

‘गीता, तुम बहुत हरामी हो.”

“वो तो है. चल हम झरोखे से उनकी मस्ती का खेल देखते हैं.”

ये कहकर दोनों गिरी के कमरे के झरोखे से अंदर के दृश्य का अवलोकन करने लगीं. गिरी जब कमरे में पहुंचे तो देखा कि वहां कोई नहीं दिखा. फिर पायल की छम चम सुनाई दी तो देखा कि निर्मला एक कोने में झाड़ू लगा रही है.

“किसी को ढूंढ रहें हैं क्या भाई साहब.” ये पूनम थी जो कमरे के दूसरी ओर झाड़ू लगा रहे थी.

गिरी को कुछ सुझा नहीं, “वो गीता भाभी ने भेजा था कि आपने मुझे बुलाया है.” निर्मला को देखकर वो बोले.

निर्मला: “अब भला आपके कमरे में मैं आपको क्यों बुलाऊंगी भला.” उसने ऑंखें मटकाकर पूछा.

पूनम: “अरे दीदी, क्या पता किसी काम से भेजा हो आपके पास. क्या कहा था गीता दीदी ने आपसे?”

अब गिरी को काटो तो खून नहीं.

“वो वो वो.. मेरे सुनने में ही कुछ गलती हो गयी होगी. मैं चलता हूँ.”

पर अब तक निर्मला और पूनम उनके बहुत निकट आ चुकी थीं.

निर्मला: “गलत तो नहीं सुना भाई साहब, हमने भी यहां से उनकी बात पूउउउउउरि सुन ली थी.”

पूनम: “अब क्या है न भाई साहब, न आपने गलत सुना न दीदी ने गलत कहा.” फिर अपने चेहरे को गिरी के बिलकुल समीप लेकर कामुक स्वर में बोली, “खुजली ही तो है, और आपके पास वो हथियार भी जो उसे मिटा सके. तो आप कहाँ जाने की सोचने लगे.” पूनम ने गिरी के पीछे जाकर दरवाजा बंद कर दिया।

फिर दोनों जोर जोर से खिलखिला कर हंस पड़ीं.

“आपसे चुहल करने में बहुत मजा आया. आप सच में ये समझे न की गीता ने आपको बुद्धू बनाया है.”

गिरी ने हामी भरी और फिर वो भी उनकी हंसी में सम्मिलित हो गए. दूर झरोखे से झांकती हुई गीता और बबिता अपनी साड़ी के मुंह में ठूंस कर हंसी दबाने का प्रयास कर रही थीं.

निर्मला: “भाई साहब, हम गाँव वाले भी हंसी मजाक करना जानते हैं.”

गिरी: “सच भाभी, आप लोगों ने तो मेरे तोते ही उड़ा दिए थे. मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि हुआ क्या?”

निर्मला: “भाईसाहब तोते को उड़ने मत देना, उसे कहीं की खुजली मिटानी है.” और पूनम और निर्मला फिर से खिलखिलाने लगीं.

अब तक गिरी भी अपने आपको संयत कर चुके थे.

“खुजली जहाँ भी हो, जितनी भी भीतर हो, मेरा तोता अपनी चोंच से उसे मिटा देगा. अब आप जरा वैद्य गिरिधारी के सामने रोगी को लेकर आओ। “

ये कहकर गिरी एक कुर्सी पर बैठ गए और ऐसा दिखने लगे जैसे वो कोई वैद्य हैं. पूनम और निर्मला भी इस खेल में मिल गए और गीता और बबिता दूर से इस रोमांचक खेल को देख रहे थे. पूनम निर्मला को सहारा देती हुई उनके पास ले आई। निर्मला ऐसे चल रही थी जैसे लंगड़ा रही हो.

गिरी: “क्या हुआ भाभी, ये लंगड़ा क्यों रही हैं?”

पूनम: “वैद्य जी, इन्हे खुजली हो रही है, बहुत अंदर तक. इसी कारण इनसे ठीक से चला नहीं जा रहा.”

गिरी: “अरे रे रे रे, ये तो बहुत गंभीर रोग के लक्षण हैं. इनकी खुजली को अगर तुरंत नहीं मिटाया गया तो इनकी जान पर बन सकती है.”

पूनम और निर्मला ने अपने मुंह पर हाथ रखकर चौंकने का अभिनय किया, “हाय दैया ! वैद्य जी, अब आप ही इनको ठीक कर सकते हो.” पूनम बोली.

निर्मला ने हाँ में हाँ मिलायी, “हाँ वैद्य जी, मैं अभी मरना नहीं चाहती. मुझे बचा लीजिये.”

उधर गीता और बबिता खुसुर पुसुर कर रही थीं, “इसकी गांड में खुजली हो रही है या मिर्ची लगी है जो मर जाएगी. वैसे नौटंकी दोनों कमाल की करती हैं.”

गिरी: “नहीं भाभी, जब तक वैद्य गिरिधारी हैं मैं आपको मरने नहीं दूंगा. पूनम भाभी, आप इन्हे बिस्तर पर ले जाइये और जहां खुजली है उस स्थान को खोल दीजिये. इसका तो उपचार मेरा तोता ही कर सकता है.”

पूनम: “उइ माँ, वैद्य जी. दवाई से नहीं जाएगी क्या ये खुजली.”

गिरी: “दवा से ही जाएगी, पर वो दवा तोता अपनी चोंच से डालेगा तब.”

पूनम: “आप बहुत ही उच्च कोटि के वैद्य हैं. हम तो ये सब समझते नहीं. चलो भाभी, दिखाओ तो वैद्य जी को कहाँ खुजली है.”

ये कहकर पूनम ने निर्मला को बिस्तर पर घोड़ी के आसन में किया और एक ही झटके में उसकी साड़ी और पेटीकोट ऊपर करते हुए उसकी गांड को नंगा कर दिया.

फिर निर्मला की गांड के चारों ओर ऊँगली घुमाती हुई बोली, “खुजली अंदर है. पर तोते के जाने के लिए सुरंग की राह को पहले कुछ खोलना होगा.”

गिरी, “हम्म्म. समस्या गहरी है, मुझे अपने विशेष तोते की सहायता लेनी होगी. मैं उसे निकलता हूँ. आप ऐसा करो कि अन्य वस्त्र भी निकाल दो, अगर दवा उन पर लगी तो व्यर्थ में ही गंदे हो जायेंगे.”

किसी का भी मन इस खेल से हटने का नहीं था. तो पूनम अपने कपड़े निकालने लगी.

गिरी, “आप क्यों कपड़े उतार रही ही?”

पूनम: “वैद्य जी, आप ऑपरेशन करोगे तो नर्स भी तो लगेगी. और नर्स के कपड़े गंदे करके आप को क्या मिलेगा.”

गिरी, “आप बहुत बुद्धिमान हैं. बिलकुल सही कह रही हैं.”

गिरी अपने कपड़े निकालने लगे और पूनम अपने और फिर निर्मला के कपड़े उतार कर नंगी हो गयीं.

पूनम: “वैद्य जी, अगर आप आज्ञा दें तो मैं खुजली के स्थान को ऑपरेशन के लिए तैयार कर दूँ.” फिर आंखे झपकते हुए, “फिर आपके तोते को कर दूंगी.”

गिरी: “बिलकुल, नर्स को यही करना चाहिए.”

पूनम ने निर्मला को फिर घोड़ी बनाया और उसकी गांड चाटने में व्यस्त हो गयी. कुछ देर अपनी जीभ और उँगलियों के प्रयोग से निर्मला की गांड को लौड़े के लिए उपयुक्त जानकर पूनम ने गिरी से कहा.

“वैद्य जी, एक बार देखिये क्या अब आपका तोता इसके भीतर जाकर खुजली मिटा पायेगा?”

गिरी किसी अनुभवी डॉक्टर के समान पास गया और निर्मला की गांड का निरीक्षण किया और उसे भी लगा कि गांड अब तैयार है.

“नर्स पूनम, हम तुम्हारे काम से बहुत प्रसन्न हैं. पर अब तुम्हें मेरे तोते में वो दवा भरनी है जो इनकी खुजली का अंत कर पाए.”

ये कहते हुए गिरी ने पास पड़े एक ग्लास को लिया और लंड उसमे डालकर ऐसा दर्शाया जैसे इंजेक्शन भर रहे हों.

“अब दवा भर दी गई है.” गिरी ने कहा, “नर्स, अब आप मेरे तोते को अंदर जाने के लिए तैयार करें जिससे कि भाभी को किसी प्रकार की कठिनाई न हो.”

“जी वैद्य जी.” ये कहकर पूनम पूरे मन से गिरी के लंड को चूसने लगी और कुछ ही देर में उसे लोहे के समान कड़ा पाया. “वैद्य जी, आपका तोता ऑपरेशन के लिए तैयार है.”

“ठीक है, नर्स. पर आप भाभीजी को थोड़ा संभालिएगा क्योंकि आरम्भ में तोते के प्रवेश में उन्हें कुछ कष्ट हो सकता है.”

“अवश्य, वैद्यजी.” पूनम ने मुस्कुराकर उत्तर दिया और निर्मला के सामने बैठकर हंसती हुई उसके मुंह को अपनी चूत में दबा दिया. ‘अब आप ऑपरेशन आरम्भ करिये, वैद्य जी. खुजली का निवारण नितांत आवश्यक है.”

गिरी ने अपने लंड को निर्मला की फूली हुई गांड पर रखते हुए एक लम्बे धक्के के साथ पूरे लंड को अंदर डाल दिया. निर्मला कुछ कसमसाई, पर उसे गांड में लेने का लम्बा अनुभव था. पूनम ने गिरी का उत्साह बढ़ाने के लिए कहा, “वैद्य जी, मरीज की प्रतिक्रिया से लग रहा है कि तोते की चोंच सही स्थान पर गयी है. अब आप देर न करें और शीघ्र अति शीघ्र दवा से खुजली मिटायें.”

गिरी भी अब कुछ रुकने की स्थिति में नहीं था. उसने लम्बे और तेज धक्कों से निर्मला की गांड को चरमरा दिया. अगर पूनम से उसका मुंह अपनी चूत में न दबाया होता तो अवश्य वो चीख चीखकर और लौड़े की मांग करती. दस पंद्रह मिनट गांड मारने के बाद गिरी ने अपना रस निर्मला की गांड में छोड़ दिया. निर्मला इस समय में तीन बार झड़ी थी और बिस्तर को समुचित रूप से गीला कर चुकी थी. गांड से लंड निकालने के बाद गिरी ने पूनम की ओर देखा.

“नर्स पूनम, तोते ने दवा अंदर डाल दी है, मुझे लगता है कि इनकी खुजली मिट गयी होगी. आप एक बार देखिये और तोते को फिर से अपने यथावत रूप में करने का कष्ट करें.”

पूनम तुरंत उठी और गिरी के लंड को चाटकर उसे साफ कर दिया. लंड अब मुरझा भी गया था.

“वैद्य जी, तोता अपने सामान्य रूप में जा चुका है. अब आप इसे वापिस पिंजड़े में डाल सकते हैं. तब तक मैं भाभी का निरीक्षण करती हूँ. खुजली आगे के रास्ते पानी के रूप में निकली होने चाहिए.”

ये कहकर उसने हँसते हुए निर्मला को सीधा किया और देखा कि बिस्तर पूरा गीला है. उसने निर्मला की चूत को कुछ देर यूँ ही चाटा और फिर दोनों हँसते हुए बैठ गयीं.

पूनम: “वैद्य जी, खुजली पूरी मिट गयी है, देखिये बिस्तर पर कितना पानी पड़ा है. आपके तोते ने इनको नया जीवन दिया है.”

तीनों हँसते हुए लोटपोट हो गए. झरोखे में खड़ी गीता और बबिता भी हंस हंस कर पागल हो गयीं.

“सच में भाई साहब, इस खेल में अपने चार चाँद लगा दिए. जब ये सब सुनेंगे तो बहुत हँसेंगे”

सबने अपने कपड़े पहने और आंगन में लौट गए. गीता और बबिता भी आंगन में आ गए और सब हँसते खेलते हुए खाने के लिए बैठ गए.

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पूरा सुनते सुनते सभी हंस हंस कर लोटपोट हो रहे थे. हँसते हँसते सारे पुरुषों ने आकर गिरी की पीठ थपथपाई.

जीवन: “अरे पूनम, अगर मुझे पता होता कि तुम इतनी अच्छी नर्स हो तो मैं अपनी हर चोट तुम्हें ही दिखाता।”

पूनम: “आपको कभी किसी चोट के लिए मेरी याद ही नहीं आयी. पहले भाभी ….” कहते हुए पूनम ने अपने मुंह पर हाथ रख लिया. “मुझे क्षमा करना भाई साहब, मैंने भाभी का नाम ले लिया.”

जीवन को आघात तो लगा था पर उसे भी ये समझ थी कि पूनम ने ये अबोध मन से कहा था. “कोई बात नहीं, पूनम. उसे गए तो अब वर्षों हो गए. तुम कुछ कह रही थीं न, बोलो.”

पूनम: “मेरा कहना था भाईसाहब कि आपको नर्स की याद तभी आती है जब आपके लंड को इसकी याद आती है.”

जीवन: “नहीं. मैं दिन में अनगिनत बार तुम सबको याद करता हूँ. तभी तो हर बार खिंचा चला आता हूँ.”

सुशील: “तो वैद्यजी, अपने मेरी पत्नी की सही सही चिकित्सा तो की है न? या फिर ऐसी समस्या फिर आ सकती है.?”

गिरी: “समस्या का अस्थायी निदान ही हुआ है. ये ऐसा गंभीर रोग है जिसका कोई और स्थाई उपचार नहीं है. जब भी ऐसी परिस्थिति दोबारा बने तो आपमें से किसी के तोते को इन्हें दवा देने का कार्यभार संभालना होगा. वैसे नर्स पूनम की भी आप सहायता ले सकते हैं. इनके अनुभव का आपको भी अवश्य लाभ होगा.”

सुशील: “ठीक है वैद्यजी. तो क्यों न मैं आज नर्स पूनम का निरीक्षण करूँ और ये निश्चित करूँ कि वे इस कार्य के लिए उपयुक्त हैं. जस्सी, तुझे कोई आपत्ति तो नहीं है?”

“अरे मुझे कोई आपत्ति नहीं. मुझे तो बबिता भाभी से समझना है वैद्यजी के गुण जो उन्होंने कल रात जाने होंगे.

जीवन: “मुझे तो लगता है कि निर्मला का ठीक उपचार करने के लिए बलवंत और मैं उसका निरीक्षण करना चाहेंगे.” निर्मला की चूत ये सुनकर बह निकली. वो तुरंत उठकर जीवन के गले लग गयी.

फिर सुशील ने पूनम को साथ लिया, जीवन और बलवंत ने निर्मला को, जस्सी बबिता के साथ तो गिरी गीता के साथ कल वाले कक्ष में चले गए.

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सुनीति का घर :

जब गिरी निर्मला का उपचार कर रहे थे, तब सुनीति के कमरे में सुनीति और कुमार आलिंगनबद्ध थे.

सुनीति: “कुमार बेटा, मेरी एक बात मानेगा?”

कुमार: “बिल्कुल, बोलो तो सही.”

सुनीति: “आज बस मेरी गांड मार ले. कल तेरे पापा और लोकेश भाईसाहब ने मेरी चूत की दो लौडों से चुदाई की थी, तो आज के लिए उसे छोड़ दे.”

कुमार: “अरे मॉम, मुझे तो आपकी गांड मारने में वैसे भी अधिक आनंद आता है, तो भला मैं क्यों आपकी बात नहीं मानूंगा.” कुमार ने सुनीति के होंठों को चूमकर उत्तर दिया.

माँ बेटे बिस्तर की ओर बढे और सुनीति ने अपने कपड़े उतारे तो कुमार ने अपने. पलक झपकते ही दोनों एक दूसरे के सामने नंगे खड़े थे.

“मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा है कि असीम का विवाह होने की संभावना है. पता नहीं क्या कर रही होगी स्मिता उसके साथ.”

“अरे मॉम, भाई की चिंता छोड़ो. अगर मेरा आकलन सही है, तो आपकी बहू के रूप में महक का घर में आना निश्चित ही है.”

“पर समुदाय के नियम क्या करते हैं, ये भी निर्भर करता है.”

“क्या आपको लगता है कि आपने कोई नियम तोड़ा है? नहीं न. तो भाई आपके लिए बहू लेकर आएंगे. अब उनकी चिंता न करते हुए, स्मिता आंटी की चिंता करो तो फिर भी समझ में आये.”

“तुम दोनों अपने आपको बड़ा महारथी मानते हो न चुदाई में?”

“आप नहीं मानती?”

सुनीति कुमार के पास जाकर उसके होंठों को चूसने लगी. फिर जब अलग हुई तो बोली, “न मानती होती तो तुमसे कभी न चुदवाती.”

“मॉम आप अब घोड़ी बन जाओ. मैं आपकी गांड को चाटकर उसे लंड के लिए खोल देता हूँ.”

सुनीति ने अपेक्षित आसन लिया और अपनी गांड ऊपर उठा दी. कुमार ने भूखी दृष्टि से अपनी माँ की उभरी हुई गांड को देखा और उसके बीच के भरे सितारे को देखकर उसके मुंह में पानी आ गया. अपना आसन बनाया और सुनीति की गांड को चाटने लगा. जीभ से कुरेदते हुए सुनीति का सितारा कुछ देर तक तो अवरोध करता रहा पर जब देखा की आक्रमणकारी नहीं मानेगा तो उसके लिए स्थान बना दिया. गांड के खुलते छेद में कुमार ने अपनी जीभ को अंदर डाला और पूरी श्रद्धा से सुनीति की गांड का सेवन करने लगा. सुनीति को अपने परिवार के हर सदस्य का गांड चाटने का व्यसन अत्यंत प्रिय था.

अगर गांड मारने से पहले कोई उसे इस प्रकार से प्यार करता है, तो वो गांड मारने का सच्चा अधिकार रखता है. कुमार इस विचार को पूर्णतया सिद्ध कर रहा था. जिस प्रेम और अनुराग से वो सुनीति की गांड चाट रहा था, उसे देखकर ही उसका अपनी माँ के प्रति अथाह प्रेम का ज्ञान होता था. सरपट चलती जीभ ने गांड को अंदर से भी अपने थूक से चिकना कर दिया था. समय था अब किसी मासपिंड से उसके हनन का. पर अगर माँ की चुदाई कल धड़ल्ले से हुई थी तो आज उसकी गांड को प्यार की आवश्यकता थी. कुमार उसे इस प्यार से अवगत कराने का इच्छुक था.

“मॉम, अगर आप कहो तो अंदर डालूं लंड.”

“हाँ, बेटा। अब मार ही ले मेरी गांड. पता नहीं असीम स्मिता की गांड भी मरेगा या यूँ ही भेज देगी वो उसे घर.”

“अरे मॉम, उनकी चिंता आप न करो. भाई ने उनकी गांड बजाए बिना लौटना नहीं है. इस बात की सौ प्रतिशत गारंटी है. आप अपनी गांड की बात करो.”

“कहा तो तुझे, मार मेरी गांड।”

कुमार ने लंड साधा और पहले धक्के में तीन चार इंच अंदर पेल दिया. फिर उसने हल्की गति से बाकी के लंड को अंदर किया और सुनीति की गांड को बहुत प्यार से मारने में व्यस्त हो गया.

सुनीति उसके दोनों बेटों से तीव्र और निर्मम चुदाई की इतनी अभ्यस्त हो गयी थी कि उसे कुमार का ये रूप बहुत भा रहा था. उसे उनके संसर्ग के आरम्भ के दिन याद आ गए जब दोनों बेटे उसे बहुत प्यार से चोदते थे. पर जब वे बाहर की औरतों को चोदने लगे तो धीरे धीरे उनका अपनी माँ के प्रति भी चुदाई का ढंग बदल गया. ये इतना शनैः शनैः हुआ कि सुनीति को भनक भी न लगी और वो उसे भी ऐसी ही चुदाई की लत लग गयी. पर आज उसकी गांड में मंथर गति से चलता हुआ लंड उसके रोम रोम को जैसे चूमते हुए चल रहा था. उसे इस प्रकार की चुदाई में आज विशेष ही आनंद आ रहा था.

“कुमार, आज तुम जैसे मेरी गांड मार रहे हो न, समय समय पर ऐसे ही किया करो. तुम दोनों भाई इतना जोर से चोदते हो कि उसमे अब प्यार कम लगता है.”

“मॉम, मैं आपको वचन देता हूँ और भाई को भी समझा दूंगा. आपकी गांड तो हमारे लिए पूज्यनीय है. इसे अवश्य ही हम अब पूरे प्यार से मारा करेंगे. पर दादाजी का कुछ नहीं कर सकते.”

“उनकी छोड़, तुम दोनों ने ही अगर मुझपर दया की तो भी ये परोपकार ही होगा.”

गांड कि इस गति से चुदाई में आनंद से सुनीति की भी तृप्ति हो रही थी. उसने कुमार से कहा कि इसी प्रकार से वो कुछ गति बढ़ाते हुए गांड मारे। कुमार ने उसकी बात सुनकर अपनी गति कुछ कुछ बढ़ाई, पर इतनी नहीं कि सुनीति को कठिनाई हो. और चूँकि दोनों इसका आनंद ले रहे थे तो कोई बीस मिनट के बाद कुमार ने अपना माल सुनीति की गांड में छोड़ दिया. इसके बाद माँ बेटे वहीँ नंगे एक दूसरे से लिपट कर चूमा चाटी करते रहे और न जाने कब सो भी गए.

शाम को दोनों की आंख तब खुली जब कमरे को किसी ने खटखटाया. पूछने पर सलोनी थी. कुमार ने उठकर नंगे ही कमरा खोला और सलोनी चाय लेकर अंदर आ गयी. उसे माँ बेटे को इस अवस्था में देखकर कोई अचरज नहीं हुआ. उसने चाय को सोफे के पास पड़ी टेबल पर रखा और सुनीति को गांड से निकलते रस को देखकर पूछा कि अगर सुनीति चाहे तो वो उसे साफ कर दे. सुनीति ने स्वीकृति दी तो सलोनी ने उसकी गांड चाटकर स्वच्छ कर दी और बड़ी प्रेम भरी दृष्टि से कुमार के लंड को देखा.

“मौसी, संकोच मत करो. चाट कर अपना मन संतुष्ट कर लो.” कुमार ने हंसकर कहा तो सलोनी ने इस कार्य को भी पूरा किया और कमरा बंद करके चली गयी.

“आज खाना देर से बनेगा.” सुनीति ने उठाते हुए कहा.

“क्यों, क्या हुआ. मॉम.”

“अभी जाकर ये शंकर पर चढ़ेगी. तो फिर खाना तो देर ही से चढ़ायेगी न.”

इस बात पर सुनीति और कुमार हंस पड़े और चाय की चुस्कियां लेने लगे. फिर दोनों ने कपड़े पहने और बैठक में टीवी देखते हुए अन्य परिवार जनों की प्रतीक्षा करने लगे.

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सबसे पहले असीम ही आया, और उसके चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान थी. सुनीति को एक क्षण के लिए जलन हुई पर तुरंत ही स्वयं को मनाया.

सुनीति: “क्या हुआ, सब ठीक रहा?”

असीम: “जी मॉम, पूछ रही थी, नहीं बता रही थी कि आपने मुझे बहुत अच्छा सिखाया है.”

सुनीति: “तो तुमने क्या कहा?” सुनीति के स्वर में गर्व छलक रहा था.

असीम: “क्या कहता, बस उन्हें संतुष्ट कर दिया.”

सुनीति: “क्या तुम सच में विवाह के लिए तैयार हो? समुदाय के प्रस्ताव के बाद हमें एक अवसर रहेगा मना करने का.”

असीम: “मेरी जो बातें महक से हुई हैं, उनको ध्यान में रखकर मैं कह सकता हूँ, कि मुझे इस विवाह में कोई आपत्ति नहीं है.”

सुनीति: “अगर स्मिता और समुदाय ने स्वीकृति दी तो.”

असीम: “हाँ वो एक अड़चन है, पर देखते हैं क्या होता है.” असीम से स्मिता के कहे अनुसार बात को छुपा लिया.

आशीष के आने के बाद सब बैठक में बैठे और सुनीति ने आशीष को उसकी ड्रिंक दी और अपने भी लिए एक ले ली.

आशीष, “असीम का क्या रहा?”

सुनीता ने बताया और गर्व से ये भी बताया कि स्मिता ने सुनीति की शिक्षा की बधाई दी है.

आशीष, “अरे जानेमन, तुम्हारे सिखाये हुए तो हम सब हैं.”

सुनीति, “धत, मसखरी मत करिये. आपने ही मुझे सब सिखाया है.”

दूसरी ड्रिंक अभी बनी ही थी कि सलोनी आ गयी.

सुनीति ने मसखरी से पूछा, “कुछ देर कर दी, लगता है शंकर तेरी गर्मी निकाल रहा था.”

सलोनी, “जी दीदी, आप दोनों को देखकर आग जो लगी थी.”

आशीष: “भाग्या कैसी है, उसे कोई परेशानी तो नहीं है. डॉक्टर से कब मिलना है?”

सलोनी: “तीन दिन बाद, वैसे अभी तक मुझे कोई समस्या नहीं लग रही.”

सुनीति: “शंकर से कहना थोड़ा प्यार से चुदाई करे, ज्यादा हीरो न बने.”

सलोनी: “नहीं दीदी, वे तो बहुत ध्यान रख रहे हैं, पर भाग्या का ही दिन रात चुदवाने का मन करता है. तो ये और मैं दोनों एक एक बार उसे ठंडा कर देते हैं.”

असीम: “मौसी, कभी हमें भी अवसर दे दीजिये, अगर आप दोनों से नहीं सम्भल रही.”

सलोनी: “आप जानते हैं भैयाजी, उसका विचार इस पर. पर मैं उससे कह अवश्य दूंगी. सम्भव है इस कारण आपको उसकी चुदाई का अवसर मिल ही जाये.”

आशीष: “सलोनी, खाना बना दो, मुझे आज कुछ जल्दी है. कल सुबह बाहर जाना है.”

सुनीति चौंक गयी, “कहाँ जा रहे हो.”

आशीष: “बाद में बताता हूँ.”

तभी अग्रिमा ने घर में प्रवेश किया. उसका चेहरा कुछ तमतमाया हुआ सा था. वो सीधे बार पर गयी और अपने लिए एक ड्रिंक बनाई. उसे एक ही साँस में समाप्त करके एक और ड्रिंक बनाई और इस बार सुनीति के पास आकर बैठ गई. इसके पहले कि कोई कुछ बोल पता, उसने असीम और कुमार की ओर ऊँगली से संकेत किया.

“आप और आप, दोनों, आज रात मेरे साथ रहोगे. और मुझे अच्छे से रगड़कर चोदोगे।”

दोनों भाइयों ने सिर हिलाकर कर हामी भरी.

सुनीति: “वो तो ठीक है, पर तुझे चुदवाने की इतनी आग कैसे लग गयी, वो भी इन दोनों दुष्टों से?”

असीम: “मॉम, आप हमें दुष्ट कह रही हो?”

सुनीति: “ध्यान रहे, दोनों इसे चोदोगे आज, पर फूल जैसी बच्ची है मेरी, थोड़ा प्यार से चोदना, मेरी चुदाई जैसे करते हो वैसे नहीं.”

असीम: “अरे माँ, हमारी भी बहन ही है, इसे पता भी नहीं लगेगा कि दो दो लौड़े इसकी बजा रहे हैं.”

सुनीति: “हाँ तो ऐसी गर्मी कैसे चढ़ गयी.”

आशीष: “तुम लोग मजे करना. मुझे सुबह जल्दी निकलना है काम के लिए. एक नया अनुबंध होने की संभावना है. पर शाम तक लौट आऊंगा.”

सलोनी ने खाने के लिए सबको पुकारा और सब खाना खाकर साथ न बैठकर अपने कमरों में जाने लगे. असीम ने अग्रिमा से कहा कि वे दोनों आधे घंटे में उसके कमरे में आएंगे. सुनीति आशीष के साथ अपने कमरे में गयी. आशीष ने बताया कि कल उसे उसी रिसोर्ट में नए काम के लिए जाना है. ये अनुबंध मिलने से उन्हें लगभग २० लाख का लाभ होने की संभावना है. पर ये बात पूरा होने तक गुप्त रहनी चाहिए. इसके बाद सुनीति ने आशीष और अपने लिए एक ड्रिंक बनाई और कुछ देर बाद वे सोने चले गए.

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अग्रिमा का कमरा:

अग्रिमा अपने कमरे में जाकर बाथरूम में घुस गयी और नहाकर तौलिया लपेटे हुए बाहर आयी और अपने भाइयों की प्रतीक्षा करने लगी. कुछ ही समय में असीम और कुमार भी आ गए. अग्रिमा अब सोच रही थी कि उसने जोश में अधिक ही मांग लिया. पर अब तीर चल चुका था और दोनों भी कमरे में भी आ चुके थे. अग्रिमा के चेहरे के भाव असीम ने पढ़ लिए.

असीम: “देख अगर तुझे लगता है कि कुछ नहीं करना है, तो कोई बात नहीं है. दिल करे तभी कुछ करना. नहीं तो बाद में दुखी हो जाएगी.”

अग्रिमा: “नहीं भाई, चुदवाने का तो मन पूरा है, पर आप दोनों को एक साथ झेलने का बूता अभी मेरा नहीं है.”

असीम: “हमने तो ये सोचा ही नहीं. अधिक से अधिक एक को चूसेगी और एक से चुदेगी। और वो भी प्यार से जैसे मॉम ने कहा है. तेरे भाई हैं शत्रु नहीं.”

अग्रिमा: “तो फिर हमें समय नहीं गँवाना चाहिए.”

कहते हुए अग्रिमा ने अपने तौलिये को ढ़ीला किया तो वो सरककर नीचे गिर गया और अग्रिमा का मनमोहक शरीर दोनों भाइयों के ऑंखें चौंधियाने लगा. असीम और कुमार तुरंत ही अपने कपडे निकालकर नंगे हो गए. अग्रिमा ने उन्हें बिस्तर पर बैठने के लिए कहा और फिर उनके सामने बैठकर उनके लंड चूसने लगी. असीम और कुमार ने उसे अपनी मन भर कर उनके लौडों को चूसने दिया फिर उसे उठाया।

“हमें भी कुछ चखने को दे दो अब तो.”

ये कहकर असीम बिस्तर पर लेटा और अग्रिमा को कुमार ने अपनी चूत असीम के मुंह पर रखने के लिए कहा. अग्रिमा उलटी होकर असीम में मुंह पर बैठी और असीम ने अपनी लपलपाती जीभ को उसकी कमसिन चूत की चाशनी चाटने के लिए अंदर धकेल दिया. अग्रिमा काँप उठी और वो अभी इस अनुभव का आनंद ही ले रही थी कि उसे अपनी गांड के ऊपर कुछ रेंगता हुआ अनुभव हुआ. उसने मुड़कर देखा तो कुमार अपनी जीभ से उसकी गांड कुरेद रहा था. आनंद विभोर होकर अग्रिमा ने एक गहरी साँस ली और अपने शरीर को अपने दोनों भाइयों को सौंप दिया.

असीम और कुमार इस विद्या में प्रवीण थे. उन्हें घर और बाहर दोनों से इन दोनों बिलों को कैसे आनंदित किया जाता है, की भरपूर शिक्षा दीक्षा प्राप्त थी. अग्रिमा को इसका आनंद एक साथ कम ही मिलता था क्योंकि वो जब भी इन्हें अपनी माँ और सलोनी की चुदाई करते देखती थी तो उसे एक भय सताता था कि कहीं उसके साथ ऐसा किया तो क्या होगा. पर आज उसने स्वयं को समर्पित कर दिया था. और दोनों ने उसे विश्वास भी दिलाया था कि वो उसे उतने ही प्यार से चोदेगे जितने प्यार से उसे उसके पिता आशीष और उसके दादा जीवन चोदते हैं.

अपने दोनों छेदों में चल रही जीभ का ही ये प्रभाव था कि अग्रिमा जल्दी ही अपने रस से असीम के चेहरे को भिगाने लगी. उसकी कसी तंग चूत अब अधिकाधिक रस छोड़ रही थी. उसका शरीर भी इस दोहरे प्रहार से अपने आप को प्रफुल्लित अनुभव कर रहा था. जब अग्रिमा दो तीन बार झड़ गयी तो असीम का चेहरा इतना भीग चुका था कि उसके लिए अब और रुकना असंभव था. उसने हाथ के संकेत से कुमार को कहा कि अब बस करो. कुमार ने अग्रिमा की गांड से अपना मुंह हटाया और उसके नितम्बों पर हल्की सी चपत लगाई. अग्रिमा असीम के मुंह से उठ गई.

“अब कुछ चुदाई हो जाये.”

अग्रिमा ने सिर हिलाया.

“तो ऐसा है कि पहले असीम आपकी चुदाई करेंगे और तुम मेरे लंड को चूसोगी और फिर हम दोनों अपने स्थान बदलेंगे.”

“पर आप में से कोई भी मेरी गांड मारने का प्रयास नहीं करेगा.”

असीम हँसते हुए, “पता है, मॉम ने पहले ही तुम्हारी गांड से दूर रहने को कहा है. पर एक बात बताओ, क्यों नहीं तुम पापा से अपनी गांड मरवा ही लेतीं, जिससे हमारे लिए भी ये उपलब्ध हो जाये.”

“पहले भाग्या को चोद लो, फिर मेरी गांड में लंड डालने के बारे में सोचना.”

“अरे, बकरी की माँ कब तक खैर मनाएगी. उसे तो चुदना ही हमसे, बस दिन गिन रहे हैं.”

“तो इसके लिए भी गिनो. अब छोड़ो और जो मिल रहा है उस का ही आनंद लो.”

कुमार बिस्तर पर जा लेटा और अग्रिमा ने उसके लंड को अपने मुंह में लिया और बड़े प्यार से चूसने लगी. असीम ने उसके पीछे जाकर उसकी चूत में अपने लंड को धीरे से डाला और कुछ ही देर में पूरे लंड को अंदर कर दिया. फिर वो हल्के धक्कों के साथ उसकी चुदाई करने लगा. अग्रिमा कुमार के लंड को चूसने में मस्त थी और उसे भी अपनी चूत की ये धीमी चुदाई बहुत सुख दे रही थी. उसे पता था कि अगर उसने गलती से भी थोड़ा तेज चोदने के लिए बोला तो उसके भाई लोग उसकी चूत की धज्जियाँ उड़ा देंगे.

असीम संभालते हुए उसे बड़े प्यार से चोदता रहा. उसने समय देखकर गति कुछ बढ़ाई पर इतनी नहीं कि अग्रिमा को पता चले. इस प्यार भरी चुदाई से अग्रिमा झड़ने लगी और जब वो दो बार झड़ गयी तो उसके भाइयों ने अपने स्थान बदले. कुमार, असीम से कुछ अधिक तीव्रता से चोद रहा था, पर अब तक अग्रिमा की चूत असीम के लंड और अपने स्खलन से उसकी इस चुदाई को सरलता से सहन कर रही थी. उसका शरीर अब उसका साथ छोड़ रहा था. उसकी चूत भी अब बिना रुके रस बहा रही थी.

अंत में अग्रिमा एक और बार झड़ी और फिर निढाल हो गयी. कुमार ने अपने लंड को बाहर निकाला और असीम और वो दोनों मुठ मारने लगे. उन्होंने अग्रिमा को सीधा किया और उसे अपना मुंह खोलने के लिए कहा. जैसे ही रस की फुहार निकलीं तो अग्रिमा के चेहरे पर और मुंह में कामरस की बौछार हो गयी. दोनों भाइयों ने अग्रिमा को वीर्य का स्नान करने के बाद ही अपने लौडों को छोड़ा. अग्रिमा के चेहरे पर सफ़ेद गाढ़ा चिपचिपा वीर्य बह रहा था. उसके चेहरे पर एक असीम संतुष्टि के भाव थे. उसने अपनी उँगलियों से वीर्य को एकत्रित किया और अपने मुंह में डाल लिया.

“सच में आज मुझे आप दोनों ने इतना आनंद दिया है कि इसकी मैं तुलना नहीं कर सकती. मैं व्यर्थ ही आपसे चुदवाने में संकोच कर रही थी. अब आप जब चाहो, तब मेरी इस प्रकार की चुदाई कर सकते हो.”

“जब तक तुम ऐसी चुदाई चाहोगी, ऐसी ही करेंगे. जिस दिन तुम्हारा मन बदला उस दिन भी हम तुम्हें पूरी संतुष्टि देंगे.”

“आज आप दोनों यहीं सो जाओ. आज के लिए इतना ही, पर मैं अकेले नहीं सोना चाहती.”

“ठीक है, चलो अब मुंह धो लो, फिर सोते हैं.”

“नहीं, मुझे इसी प्रकार से सोना है.”

ये सुनकर कुमार ने बत्ती बंद की और दोनों भाई अग्रिमा के अगल बगल लेट गए और कुछ ही देर मैं सब सो गए.

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अगले दिन:

आशीष सुबह तड़के ही निकल गया. असीम और कुमार भी अग्रिमा के कमरे से अपने कमरे में आकर कुछ देर और सो रहे थे. नौ बजे सलोनी ने उन्हें जाकर जगाया और दोनों नाश्ते के लिए आ गए. नाश्ते के बाद सब अपने अपने काम में लग गए. असीम और कुमार दोपहर का खाना खाकर बाहर चले गए. अग्रिमा अपने कमरे में ही रही. शाम होने को थी. सुनीति के पास किसी का फोन आया. बात करने के बाद उसके चेहरे पर एक ख़ुशी छा गयी. छह बजे तक आशीष भी आ गए. और उनके पीछे पीछे असीम और कुमार भी.

सभी लोग बैठक में बैठे तो सुनीति ने कहा, “आज मधुजी का फोन आया था. उन्होंने बताया कि स्मिता ने असीम के लिए स्वीकृति दी है. अब हमारे पास एक सप्ताह का समय है अगर हम मना करना चाहें तो. पर एक बात है, कि जो भी निर्णय हम उन्हें बताएँगे, वो तटस्थ होगा. फिर बदलने की अनुमति नहीं है.”

आशीष: “मेरे विचार से महक और असीम को एक दिन के लिए साथ घूमने के लिए भेजो. हाँ, उन्हें अपनी सीमा में रहना है. और अगर इसके बाद वो दोनों एक दूसरे को ठीक समझते हैं तो हमें भी स्वीकृति दे देनी चाहिए.”

सुनीति: “ये ठीक है, मैं एक बार मधुजी से इसके लिए पूछ लेती हूँ.”

उसने फोन पर बात की और बताया कि इसमें कोई आपत्ति नहीं है. फिर उसने स्मिता से बात की और उसकी स्वीकृति के बाद कहा कि असीम और महक ही ये निश्चित करें कि उन्हें कब जाना है.

अब आशीष बोला: “मैं जिस अनुबंध के लिए गया था वो हमारी खेतों की उपज को सीधे रिसोर्ट को देने का है. मनोहर जी के ऐसे पाँच और रिसोर्ट हैं और हमें उन पाँचों को अपनी उपज देनी होगी.”

सुनीति: “पर इतनी कैसे पूरी पड़ेगी उनके लिए?”

आशीष: “पापा ने उनके चारोँ मित्रों के खेत, जिसमे तुम्हारे पिताजी के खेत भी हैं, एक ही मैनेजर के प्रबंध में दे दिए हैं. मेरे विचार से वे भी इस अनुबंध का अपरोक्ष रूप से भागीदार बन सकेंगे. हम उन सबसे उपज लेकर सीधे रिसोर्ट को देंगे. उन्हें और हमें सबको इसमें लाभ मिलेगा.”

सुनीति: “आपने पापाजी से बात की? या स्वयं ही सब तय कर लिया.”

आशीष: “आज करूंगा. अभी तो स्वयं ही तय किया है. मुझे इसमें सबका लाभ दिख रहा है.”

सुनीति (कुछ चिंता से): आप पापाजी से बात कर लीजिये, अभी.”

आशीष: :ओके, बेबी.”

आशीष ने फिर जीवन से बात की और उसे नए अनुबंध के बारे में बताया और उनके मित्रों की उपज खरीदने का भी प्रयोजन समझाया. जीवन ने कहा कि वो सबसे बात करेगा और कुछ ही देर में बताएगा. जीवन का एक घंटे बाद फोन आया और उसने कहा कि उसके मित्र इस अनुबंध से खुश हैं, परन्तु वो आशीष की कम्पनी को दो प्रतिशत शुल्क देने की जिद किये बैठे हैं. उनका कहना है कि अधिकतर कार्य और आशंका के लिए आशीष को ही उत्तरदायी माना जायेगा. इसीलिए, ये शुल्क उसे लेना चाहिए. अंत में आशीष ने भी स्वीकार किया और सब ने इसे स्वीकृति दे दी.

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जीवन का गाँव, कुछ दिन बाद:

आज जीवन और गिरी अपने शहर लौट रहे थे. बलवंत और गीता भी उनके साथ थे. बलवंत ने भी एक ड्राइवर बुला लिया था जो उसकी गाड़ी शहर छोड़कर लौटेगा. निकलते समय गिरी की आँखों में आंसू थे. वो सबसे गले मिल मिलकर रो रहा था. सभी उसके इस अश्रुपूर्ण आलिंगन का अपनी ओर से भी यथावत उत्तर दे रहे थे. स्त्रियों ने विशेषकर उसके आलिंगन का भरपूर साथ दिया. इन दस दिनों में उसकी सेक्स की ऊर्जा लौट आयी थी और इसके लिए वो इन सबका हमेशा के लिए आभारी था. इन दस दिनों में उसने हर स्त्री के हर अंग को भरपूर भोगा था. उनके पति भी उसे इसके लिए उत्साहित करते रहे थे. मुंह, चूत हो या गांड कोई भी छेद अछूता नहीं रहा था. वो इस समय को कभी नहीं भूल सकते थे.

गिरी: “आपको कभी भी लगे की ऐसी कोई भी समस्या है जिसमे मैं आपकी सहायता कर सकता हूँ तो मुझे अवश्य बताना. आप ने मुझे नया जीवनदान दिया है, और इसके लिए मैं आपका सदैव के लिए ऋणी रहूंगा.”

उन सबको घर आने का निमंत्रण देकर वो गाड़ी में बैठने लगा तो उसे पीछे से निर्मला ने अपनी बाँहों में ले लिया.

“भाईसाहब, आप भी जब चाहें हमारे घर आईये. वैसे भी हमारे गाँव में वैद्य की बड़ी कमी है.”

सब इस बात पर हँसते हुए एक दूसरे से विदा लिए और गाड़ियां शहर की ओर दौड़ पड़ीं.

क्रमशः

1190700
 
अध्याय २९: तीसरा और पाँचवाँ घर - मिश्रण

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शोनाली का घर:

दिन: शुक्रवार, सांयकाल ७ बजे


शुक्रवार शाम ७ बजे के करीब घर की घंटी बजी. शोनाली ने दरवाजा खोला और अपने अतिथियों का स्वागत किया. सुप्रिया इस समय एक पंजाबी सूट में थी. समर्थ एक महंगे कुर्ते पाजामे में, और उनकी पत्नी शीला साड़ी पहने हुए थीं. सब इस समय बहुत आकर्षक और संभ्रांत दिख रहे थे. शोनाली ने सुप्रिया के गले लगकर उसका स्वागत किया और उसके गाल पर एक चुम्बन किया. फिर उसने वही शीला के साथ किया और फिर उसके पांव छूकर आशीर्वाद लिया. उसने समर्थ के भी पांव छुए और उन्हें बैठक में आमंत्रित किया. समर्थ अपने हाथ में एक बैग लिए थे जो उन्होंने शोनाली को थमा दिया.

शोनाली के साथ वो बैठक में पहुंचे जहाँ जॉय ने सबका स्वागत किया. सुमति ने भी शोनाली की तरह ही सुप्रिया के गाल चूमे और शीला और समर्थ के पांव छूकर आशीर्वाद लिया. जॉय ने सबको आदर पूर्वक बैठाया और पूछ कि वो क्या लेना चाहेंगे. शोनाली ने देखा तो समर्थ एक महंगी विदेशी वाइन लाये थे. तब तक समर्थ ने स्कॉच का आग्रह किया तो जॉय ने भी वही चुना. शोनाली ने वाइन को ठंडा होने के लिए लगा दिया हालाँकि समर्थ ठंडा करके ही लाये थे. सुमति ने अल्पाहार को टेबल पर सजा दिया.

फिर सब लोग अपने काम के विषय में बात करने लगे. सुमति सुप्रिया के पास बैठी थी. समर्थ और शीला साथ तथा जॉय और शोनाली साथ बैठे थे. कुछ बातें व्यवसाय से सम्बंधित थीं और कुछ राजनीति से. सब एक दूसरे से अच्छे से घुल मिल गए. समय उचित देखकर शोनाली और सुमति जाकर सबकी ड्रिंक्स एक ट्रॉली पर ले आये. चर्चा का प्रवाह चलता रहा, अब बातें अपने परिवार के लोगों के बारे में थी कि कौन क्या करता है, किसकी क्या रुचियाँ हैं, इत्यादि. सुप्रिया और शीला ने निखिल और नितिन की बढ़ाई के पुल बांधे तो शोनाली और सुमति ने सागरिका और पार्थ के. वातावरण बहुत मित्रतापूर्वक और घरेलू था.

तभी सुप्रिया ने अपने बैग में से वो लिफाफा निकला जो शोनाली ने उसे कल दिया था. उसने लिफाफे को शीला के हाथ में दिया.

सुप्रिया: "मम्मी, ये है इनकी बेटी सागरिका. बिल्कुल माँ पर गयी है."

शीला ने फोटो निकले और समर्थ और शीला ने सारे फोटो देखे.

शीला, "बहुत ही सुन्दर और प्यारी बच्ची है. सच में शोनाली तुम्हारा ही जवानी का रूप लगता है."

शोनाली शर्मा गई.

सुप्रिया: "कुछ और फोटो भी हैं, जो शोनाली ने मुझे दिखाए तो थे परन्तु दिए नहीं थे. उन्हें भी देख लें, अगर सम्बन्ध बनना है तो उनको देखना भी नितांत आवश्यक है."

कहकर सुप्रिया ने शोनाली से आग्रह भरी आँखों से देखा. शोनाली ने जॉय से मूक सहमति ली और अंदर जाकर लॉकर से वो उन चित्रों का लिफाफा भी ले आयी और सुप्रिया को सौंप दिया. सुप्रिया ने चित्र लिफाफे से निकाले और शीला के हाथों में दे दिए.

अब चटर्जी परिवार साँस रोककर बैठा था. जॉय ने बेचैनी से अपनी ड्रिंक के एक साथ दो तीन घूँट लिए. शीला और समर्थ ने सारे चित्र देखे और फिर एक बार दोबारा देखे.

शीला: "न केवल आपकी बेटी सुन्दर है, पर ऐसा लगता है कि बहुत मीठी और स्वादिष्ट भी है. आपने तो उसका रस भरपूर चखा होगा."

समर्थ: "अरे भागवान, ये कोई पूछने की बात है."

शीला: "मुझे तो आपकी दोनों ही बेटियां पसंद हैं, पर हम अभी शायद केवल सागरिका की ही बात कर रहे हैं."

शोनाली: "जी, माँ जी. पारुल अभी छोटी है, तो उसकी शादी लगभग दो साल बाद ही करेंगे."

शीला: "सही सोचा है. तब तक उसका घर में ही आनंद लो."

शोनाली कुछ नहीं बोली.

शीला: "मुझे इस संबंध में कोई कठिनाई नहीं लगती. पर हम लोग एक दूसरे के परिवारों को निकट से जान लेते तो श्रेष्ठ होता."

जॉय: "जी, इसी विचार से पार्थ ने कल अपने क्लब में हम सबके लिए आयोजन किया है, जिससे कि हम सब एक दूसरे को अंतरंग रूप से जान पाएंगे. न सिर्फ इससे निखिल और सागरिका एक दूसरे को मिल लेंगे, बल्कि हम लोग भी समय बिता लेंगे. हमने दो दिन का आयोजन किया है. पूरा आयोजन गुप्त होगा और किसी को भी भनक नहीं लगेगी. आगे जैसा आप उचित समझें."

समर्थ, "पर..."

सुप्रिया, "पापा, मैंने निखिल और नितिन दोनों को आने के लिए मना लिया है. सुरेखा से इस समय मैं नहीं कुछ कहना चाहती."

शीला ने समर्थ की ओर देखकर सिर हिलकर अपनी सहमति दे दी.

समर्थ, "तो ठीक है. कब निकलेंगे?"

जॉय, "११ बजे. निखिल को स्थान पता है. आप लोग १२ से १ के बीच आ जाएँ. हम पहले जाकर शेष प्रबंध देख लेंगे."

समर्थ: "ठीक है."

शोनाली: "आइये, खाना भी तैयार है, आप लोग मुंह हाथ धोकर डाइनिंग टेबल पर बैठें, मैं और सुमति दीदी परोसते हैं."

शीला: "अरे शोनाली बिटिया, अब तो हम संबंधी बनने वाले हैं. चलो मैं भी तुम्हारे साथ आती हूँ."

सुप्रिया: "और मैं भी."

ये कहकर चारों महिलाएं रसोई में चली गयीं . शीला और सुप्रिया ने रसोई का छुपी आँखों से अवलोकन किया और पाया कि हर चीज़ साफ और यथोचित स्थान पर थी. उन्हें ये देखकर संतुष्टि हुई. खाना लेकर सबने टेबल पर लगाया और फिर बातें करते हुए आनंदपूर्वक भोजन किया.

दिंची क्लब ११ बजे :

अगले दिन पार्थ और शोनाली १० बजे सुबह ही निकल गए ताकि वो सारे आयोजन की व्यवस्था कर सकें. जॉय, सुमति और सागरिका लगभग एक घंटे बाद निकले. पारुल अभी यूरोप के दो सप्ताह के टूर पर थी और अगले रविवार आने वाली थी. पता करने पर समर्थ ने बताया कि वे भी कुछ देर ही में निकल पड़ेंगे. पार्थ और शोनाली क्लब में सिमरन से मिले और उससे सारा कार्यक्रम समझाया और खाने का मेनू इत्यादि भी निश्चित कर लिया. ये सब कल रात में निर्णीत हो चुका था इसीलिए कोई समस्या नहीं थी.

इसके बाद शोनाली और पार्थ ने छह रोमियो के साथ खेल कक्ष का निरीक्षण किया. ये एक बड़ा हॉल था जिसमे उनकी पखवाड़े की पार्टी होती थीं. पार्टी क्या असल में वो सामूहिक सम्भोग का नंगा नाच होता था. हर स्त्री अपने पसंद के सेक्स में लिप्त रहती थी और क्लब के रोमियों का ये दायित्व था कि कोई महिला असंतुष्ट वापिस नहीं जाए. कमरे के बीच में २० डबल बेड के गद्दे बहुत व्यवस्थित रूप से गोलाकार क्रम में रखे थे. कमरे के कोनों में सोफों की एक लम्बी रेखा थी जो कि गोलाकार क्रम में ही थी. कमरे में चार स्थानों पर बार थे जिसमे महंगी शराब, वाइन और बियर का इंतज़ाम था. हर बार के साथ में खाने की एक लम्बी मेज थी जिस पर व्यंजन और अल्पाहार परोसे जाते थे. उनके बगल में एक एक अलमारी थी कपडे इत्यादि रखने के लिए.

सिमरन के साथ पार्थ और शोनाली ने हर वस्तु को देखा और कुछ परिवर्तन करने का निर्देश दिया. रोमियो तुरंत उनकी आज्ञा के पालन में जुट गए. जब पूरा प्रबंध सही लगा तब पार्थ ने रोमियो और सिमरन को बताया कि चूँकि ये उसकी व्यक्तिगत पार्टी है वे विशेष ध्यान रखें. उन्हें इसके लिए अलग पारिश्रमिक मिलेगा. इसके बाद दोपहर के भोजन के लिए बने कमरे में जाकर निरीक्षण किया और संतुष्टि दिखाई.

पार्थ: "सिमरन जी, ये हमारे घर की पार्टी है जिसमे कुछ विशेष अथिति आ रहे है. अगर आपने उत्तम सेवा की तो में एक सप्ताहांत आपको सभी रोमियो के साथ उपहार में दूंगा. पर आज मुझे पूर्ण सफलता चाहिए."

सिमरन: "पार्थ, आप जानते हो कि मैं किसी भी प्रकार से कमी नहीं करती. पर आपका उपहार मैं अवश्य ले कर रहूंगी. अगर पार्टी में भी आपको मेरी किसी प्रकार की सहायता लगे, मुझे बेझिझक होकर बताईयेगा."

सिमरन लगभग ५५ वर्ष की एक कामांध महिला थी. पहले वो एक कॉलेज टीचर थी पर जब ये विदित हुआ कि वो पढाई के साथ छात्रों को चुदाई का भी ज्ञान देती है तो उसे शांतिपूर्वक और गोपनीय ढंग से निकल दिया था. उसने बाद में ये केटरिंग का व्यवसाय आरम्भ किया था, जो बहुत अच्छा चल रहा था. अधिकतर पार्टियों में वो कम से कम ४-५ रोमियो का पानी छुड़ाती थी. ये सोचकर इस समय भी उसकी चूत पनिया गई कि दो दिन तक वो इतने सारे जवान लड़कों पर राज करेगी.

उधर समर्थ, शीला, सुप्रिया नितिन और निखिल के साथ क्लब के लिए निकल पड़े थे. १२ बजे के आसपास जॉय, सागरिका और सुमति आ गए और उनके पीछे लगभग आधे घंटे बाद समर्थ अपने परिवार सहित पहुँच गए. सब लोग पहले भोजन के लिए डाइनिंग रूम में गए. वहां समर्थ और जॉय ने एक बियर ली और अन्य सभी ने सॉफ्ट ड्रिंक. उसके बाद सिमरन ने खाना लगवा दिया. किसी से ये न छुप पाया कि समर्थ और सिमरन के बीच नैन मटक्का हो रहा था. पर किसी ने इस को अधिक महत्त्व नहीं दिया. खाने के बाद पार्थ ने सबको क्लब का दर्शन कराया. क्लब की भव्यता और व्यवस्था देखकर सब लोग बहुत प्रभावित हुए. समर्थ ने पार्थ की पीठ थोक कर उसे बधाई और आशीर्वाद दिया कि वो अपने इस उपक्रम में सफलता पाए.

"और शीला, चाहो तो तुम भी शोनाली के साथ आ जाया करो कभी कभी. तुम्हें भी सदस्यता ले लेनी चाहिए. मुझे नहीं लगता कि इन दोनों में से कोई तुम्हें मना करेगा."

"नानाजी, अगर आप गंभीर हैं तो मैं अभी इन्हे सदस्य बना लेता हूँ." पार्थ ने कहा.

"अरे भाई, नेकी और पूछ पूछ."

पार्थ ने फोन पर सोनम को सदस्यता का फार्म लाने के लिए कहा. उसके बाद उसने उस पर नानी का नाम शीला सिंह लिखा, उनके हस्ताक्षर लिए और अपने हस्ताक्षर करके बताया कि अन्य औपचारिकताएं हम बाद में पूरी कर लेंगे पर आप आज से हमारी मान्य सदस्य है. शोनाली ने शीला को बढ़कर बधाई दी और बताया कि वो इस क्लब की एकमात्र सदस्य हैं जो बिना साक्षात्कार और जाँच प्रक्रिया के प्रविष्ट की गई है.

इसके बाद सब खेल कक्ष में प्रवेश कर गए और रोमियो बाहर खड़े हो गए. बुलाये जाने पर ही उन्हें अंदर जाने का आदेश था . कक्ष के द्वार रिमोट से बंद कर दिए गए. अब कमरे में केवल दोनों परिवार ही थे.

खेल कक्ष राउंड १:

कमरा बंद होने के बाद सब लोग बार की ओर बढ़े और अपने लिए अपनी रूचि की ड्रिंक बनाई. सब अपनी ड्रिंक पीते हुए बातें कर रहे थे. निखिल सागरिका से उसके भविष्य के बारे में पूछ रहा था. दोनों अपनी रूचि और अरुचि के विषय में बात कर रहे थे.

तभी समर्थ की आवाज आयी जिसने सबको उनकी ओर आकर्षित किया, "बातें तो और भी समय होती रहेंगीं. मेरे विचार से हम यहां बातें करने नहीं बल्कि ये जानने के लिए आये हैं कि हमारे परिवार एक दूसरे के कितना अनुरूप हैं. और अगर मैं गलत नहीं हूँ तो इसका अर्थ ये है कि हम एक दूसरे को चुदाई में संतुष्ट कर सकते हैं या नहीं."

सबने हाँ में हाँ मिलाई।

"तो फिर क्या करना है?"

"पापा, मैंने सोच रखा है. आप कहें तो बताऊँ?" सुप्रिया ने समर्थ के पास जाकर कहा.

"तुमने सब सोच रखा होगा, ये तो मैं जानता हूँ. अब हम सबको भी बताओ." समर्थ ने उसे अपनी बाँहों में लेकर उसके होंठों को चूमकर उत्तर दिया.

"पापा, आप हम सबसे बड़े है, तो अपनी होने वाली बहू पर सबसे पहले आपका ही अधिकार बनता है. इसीलिए सागरिका आपके साथ रहेगी." सुप्रिया ने बताया, "सागरिका, जाओ तुम नानाजी की पास जाओ."

सागरिका शर्माती हुई समर्थ के साथ खड़ी हो गई.

"अब मम्मीजी सबसे बड़ी है, तो इनको मैं पार्थ का साथ देती हूँ. पार्थ नानी जी के पास जाओ."

पार्थ जैसे ही शीला के पास पहुंचा शीला ने उसे अपनी बाँहों में भींच लिया.

"शोनाली और निखिल एक दूसरे का स्वाद ले चुके हैं, इसीलिए मैं निखिल को सुमति के साथ करती हूँ."

निखिल सुमति के पास गया. सुमति की तो आंखे ही चौंधिया गयीं.

"शोनाली को मैं अपने दूसरे बेटे नितिन का साथ देती हूँ, उसे पता होना चाहिए की मैं इतनी खुश और संतुष्ट कैसे रहती हूँ."

नितिन ने शोनाली हो अपनी बाँहों में ले लिया और उसके होंठ चूम लिए.

"और मैं अपने समधी जॉय के साथ रहूँगी. मुझे आशा है की वो अपना संबंध पक्का करने मैं मेरी सहायता करेंगे."

जॉय सुप्रिया के पास आया और उसके हाथों को लेकर उन्हें चूम लिया.

पार्थ ने तभी घोषणा की, "जैसे ही हमने कमरा रिमोट से बंद किया है, सारे कैमरे चालू हो चुके हैं और हम सबका ये खेल रिकॉर्ड हो रहा है. अगर इसमें किसी को आपत्ति हो तो बताये, मैं उसे रोक दूंगा."

किसी ने आपत्ति नहीं जताई.

समर्थ ने अपनी दबंग आवाज में कहा, "अब इन कपड़ों की क्या आवश्यकता है?" ये कहकर उसने अपने कपडे उतार दिए और नंगा हो गया.

उसका अनुशरण करते हुए अन्य लोग भी अपने कपडे उतार कर खड़े हो गए. शोनाली ने एक ओर लगी कपड़ों की अलमारी की और इशारा किया और सबने एक एक करके अपने कपडे उसमें लटका दिए. समर्थ ने सागरिका का हाथ अपने हाथ में लिया और उसे सोफे पर बैठा दिया.

समर्थ: "देखें तो कैसा रस है हमारी होने वाली बहुरानी का. बेटी तुम्हारी चूत तो देखने से ही बहुत मीठी और रसीली लग रही है.. मैं स्वाद चख लूँ तुम्हारा?"

सागरिका: "नानाजी, आपकी ही चूत है, जैसा मन हो वैसा कीजिये."

खेल कक्ष:

समर्थ ने नीचे बैठकर सागरिका के दोनों पांव अपने कन्धों पर रखे और अपना मुंह सागरिका की जांघों के बीच डाल दिया. सभी लोग ठहर कर ये दृश्य देख रहे थे. तभी शीला ने पार्थ के लौड़े को पकड़ा और उसे लेकर सोफे पर बैठ गई. अब शीला सागरिका के साथ बैठी थी, पार्थ ने अर्थ समझ कर शीला के आगे घुंटने तक दिया और अपना मुंह समर्थ जैसे ही शीला की जांघों में छुपा लिया. अन्य सभी यही विधि अपनाने के लिए अग्रसर हुए और कुछ ही क्षणों में जॉय सुप्रिया की, नितिन शोनाली की और निखिल सुमति के बीच में मुंह छुपा लिए. सभी स्त्रियां एक लाइन में बैठी थीं और सभी पुरुष उनकी चूतों में सिर घुसाए हुए थे.

शृंखला कुछ इस प्रकार से थी:

सागरिका - समर्थ, शीला - पार्थ, सुमति - निखिल, सुप्रिया - जॉय और शोनाली - नितिन.

हर पुरुष अपनी साथिन को अधिकतम मौखिक सुख देने का प्रयास कर रहा था. चूतें चाटी और चूसी जा रही थी. उँगलियाँ चूतों में कहीं धीमी तो कहीं द्रुत गति से विचरण कर रही थी. कहीं जीभ चूत के पपोटों के साथ गाँड के भूरे सितारे को भी गीला कर थी. कहीं भगनासे को इस प्रकार निचोड़ा जा रहा थे कि उसकी मालकिन थरथरा उठती थी. किसी ने चाटने के साथ एक ऊँगली चूत और एक गाँड में डाल रखी थी.

कहने का तात्पर्य ये है कि हर पुरुष अपनी क्षमता का परिचय अपने नए साथी को कराना चाहता था. और ये कहना उचित होगा की ऐसा ध्यान पाने से महिलाएं आनंद की लहरों पर डोल रही थीं. पूरा हॉल अब स्त्रियों की सीत्कार और सिसकारियों से गुंजायमान था. हर स्त्री कुछ न कुछ बोल रही थी पर इस वातावरण में किसके मुंह से क्या निकल रहा था ये किसी को समझ नहीं आ रहा था.

हर पुरुष का चेहरा इस समय कामरस से भीगा हुआ था और स्त्रियों ने अपना पानी छोड़ने में कोई कंजूसी नहीं की थी. जब स्त्रियाँ शांत पड़ीं तो पुरुष अपना चेहरा उठाकर उनकी ओर देखने लगे. सबकी आँखों में संतुष्टि के भाव देखकर सभी पुरुषगण गर्व से फूल गए. फिर समर्थ उठे और उन्होंने शीला के पास जाकर उसका एक गहरा चुंबन लिया.

"ले भागवान, चख ले अपनी होने वाली बहू की चाशनी, बहुत मीठी है अपनी बहू."

"सच में बहुत मीठी है, पर मैं तो बाद में स्रोत से ही पियूँगी, तभी प्यास बुझेगी।" ये कहकर शीला ने अपने साथ बैठी सागरिका को अपने पास खींचा और उसके मुंह में मुंह डालकर उसे चूम लिया. "सच बेटी, बहुत दिन से किसी जवान लड़की का रस नहीं पिया, ये बुढ़िया तरस गई थी."

"नानी, आप कहाँ से बूढ़ी हो गयीं. और आप जब चाहे मुझे बुला लेना में आकर आपका भी रस पियूँगी और अपना भी पिलाऊंगी."

"बहुत अच्छे संस्कार दिए है शोनाली ने तुम्हें."

उधर समर्थ के कृत्य को संकेत मानकर पार्थ ने उठकर सुमति को चूमा, निखिल ने सुप्रिया को, जॉय ने शोनाली को और नितिन उठकर सागरिका के पास गया और उसका मन भर कर चुम्बन किया.

"देवर भाभी अभी से एक दूसरे से घुल मिल रहे हैं. इससे अधिक प्रसन्नता की क्या बात हो सकती है." शीला ने समीक्षा की.

"सच है माँ, ऐसा ही रहा तो घर स्वर्ग बन जायेगा."

"मैं जानती हूँ सुप्रिया दीदी, जिस घर में सागरिका जाएगी उसे स्वर्ग बना देगी." सुमति ने अपनी टिप्पणी की.

किसी को भी इस बात से कोई आपत्ति नहीं थी.

कुछ समय के लिए सबने एक विराम लिया और कुछ लोग बाथरूम गए, कुछ ने अपने लिए एक ड्रिंक बनाई. कुछ उस बड़े कक्ष में यूँ ही चहलकदमी कर रहे थे. फिर एक एक करके सारे पुरुष इस बार सोफे पर बैठे, शृंखला वही थी, बस इस बार पुरुष सोफे पर थे. उनकी साथी स्त्रियों ने उनके पांवों के बीच अपना स्थान ग्रहण किया. स्पष्ट था की इस बार मौखिक सम्भोग का आनंद पुरुष उठाएंगे. और इसी के साथ इस सामूहिक सहवास का दूसरा चरण प्रारम्भ हुआ.

स्त्रियों ने अपने साथियों के लौंड़ों को प्यार से चूसना और चाटना शुरू कर दिया. इनमें से कुछ तो इस कला की पारखी थीं और अपने साथी को वो स्खलन के द्वार पर लाकर रोक देतीं और कुछ समय बाद दोबारा वहीँ लेकर आ जातीं। उनके साथी एक आनंद और पीड़ा की दो धाराओं में सवार थे. इसकी अग्रणी थी शीला जिसका लौड़े चूसने का उतना ही अनुभव था जितनी सागरिका और पार्थ की मिलकर आयु. और दूसरी भला उसकी शिष्य पुत्री के सिवा और कौन हो सकता था. सागरिका की जो कमी अनुभव की थी वो उसे अपने उत्साह और ऊर्जा से पूरी कर रही थी. अब समर्थ का लौड़े को चूसने वाली वो कोई पहली तो थी नहीं, पर ये अवश्य स्पष्ट था कि वो उसे हर रूप में सुख और संतुष्टि देने का प्रयास कर रही थी. और समर्थ के चेहरे के भाव उसकी सफलता को दर्शा रहे थे.

पार्थ को अब ये समझ आ गया था की उसके लौड़े पर अब पूरा वश शीला का है. अब जब वो चाहेगी तभी उसका पानी छूटेगा.

पार्थ ने अपने साथ बैठे निखिल से पूछा, "तुम कैसे इनके इस आक्रमण से अपने आपको सँभालते हो?"

निखिल: "सँभालने की आवश्यकता ही क्या है? हम सेक्स को स्पर्धा नहीं समझते. कभी जल्दी झड़ने में कोई शर्म नहीं मानते. इसे हम आनंद का एक साधन मानते हैं. हममें से कोई एक दूसरे से जीतने का प्रयास नहीं करता."

निखिल की ये बात सुनकर चटर्जी परिवार को थोड़ी सांत्वना मिली. जॉय को तो जैसे दूसरा जीवन मिल गया. उन्हें अब किसी प्रकार का प्रदर्शन नहीं करना था. सिंह परिवार की तरह इन दो दिनों केवल आनंद की उबलब्धि के लिए व्यतीत करने थे. संबंध हो या नहीं ये दिन उन्हें सदैव स्मरण रहने चाहिए थे. इस स्वीकारोक्ति ने उनके सभी सदस्यों को तनावमुक्त कर दिया. और इसका प्रभाव उनके उत्साह पर पड़ा जो चौगुना हो गया.

अपने लौंड़ों को अपने साथी के मुंह से चुसवाते हुए अब लगभग दस मिनट तो निकल ही चुके थे. और पुरुषगण अपना बीज गिराने के लिए तैयार थे. उनके लौंड़ों की नसों और सुपाड़े को फूलता हुआ महसूस करने पर ये पता चल गया कि वे सब झड़ने की कगार पर है. महिलाओं ने अपने आप को आते हुए सुनामी के लिए तैयार ही किया था कि एक एक करके सारे लौंड़ों अपना पानी छोड़ने लगे. इस स्वादिष्ट प्रोटीन युक्त प्रसाद की भेंट अपने मुंह में स्वीकारते हुए स्त्रियों ने एक बूँद भी बाहर न गिरने दी. पीने के बाद उन्होंने अपने हिस्से के लौड़े को एक बार और प्यार से चाटकर साफ किया और फिर अपने पांवों पर खड़ी हो गयीं.

शीला ने सागरिका से पूछा, "कैसा लगा मेरे पति का स्वाद बहू ?"

सागरिका: "बहुत अच्छा नानी जी. अब मुझे आपकी सुंदरता का रहस्य पता चल गया है."

शीला ने सागरिका को अपने गले से लगा लिया.

शीला: "और भी हैं इसके राज, एक बार तू बहू बनकर आ तो जा, देख तेरी सास को इसकी जवानी ही इसका साथ नहीं छोड़ती."

इसी तरह एक दूसरे से सब बातें कर रहे थे. समर्थ जॉय को एक ओर ले गया.,

समर्थ: "जॉय, तुम इतने सहमे से क्यों हो."

जॉय: "जी, लड़की का बाप हूँ, कुछ गलती न हो जाये."

समर्थ: "इस सोच को अपने मन से निकाल दो, अपने घर की लक्ष्मी हमें दे रहे हो और हम से ही डरते हो. संबंधों में मिठास रहनी चाहिए, औपचारिकता और डर नहीं. हमारे साथ वैसे ही रहो जैसे रहते हो. तुम हमसे छोटे नहीं हो. क्या मैं गलत कह रहा हूँ?"

जॉय: "बिल्कुल नहीं. अपने मेरे मन को जीत लिया, नानाजी." ये कहकर जॉय नानाजी के गले से लग गया.

फिर दोनों लौट कर रणक्षेत्र में आ गए, जहाँ अगले चरण की तैयारी चल रही थीं. शीला ने समर्थ को जॉय साथ वापिस आते देखा तो आँखों से पूछा कि सब ठीक है? समर्थ ने हल्के गर्दन के इशारे से बताया कि अब ठीक है. शीला ने चैन की साँस ली.

समर्थ: "तो मेरी प्यारी बहूरानी अब क्या चाहती है?"

सागरिका: "जो मेरे प्यारे नानाजी चाहते हैं. मेरी चूत में आपका लंड."

शीला: "देखा मेरी बहूरानी को, घर में आने के पहले ही सबका मन जीत रही है? क्यों जॉय, क्या कहते हो."

जॉय: "माँ जी, आप बिल्कुल सही कह रही हैं, इसका स्वभाव ही बहुत मिलनसार है. और अगर सामने कोई लंड तानकर खड़ा हो तो फिर ये संकोच नहीं करती. जितनी जल्दी हो सके उसे अपनी मुंह, चूत या गाँड में ले लेती है."

समर्थ ने जॉय को थम्स अप करके शाबाशी दी और सागरिका को बाँहों में लेकर उसके होंठों से अपने होंठ मिला दिए. दोनों ऐसे एक दूसरे को चूम रहे थे जैसे पृथ्वी का अंत निकट हो. समर्थ के हाथ सागरिका के वक्षस्थलों पर रेंग रहे थे. फिर उसने अपने हाथ पीछे किये और सागरिका के दोनों नितंबों को भरकर निचोड़ दिया. सागरिका की एक हल्की सी कराह निकल गयी और उसने चुम्बन को और भी गहरा करने का प्रयास किया. पर समय अब चुम्बन का नहीं, चुदाई का था. तो समर्थ ने उसका हाथ लिया और जमीन पर लगे मोटे गद्दों में से एक पर उसे ले जाकर बैठा दिया. फिर उसके साथ खुद बैठ चुम्बनों का आदान प्रदान पुनः आरम्भ हो गया.

फिर समर्थ ने सागरिका को लिटा दिया और अपना मोटा लम्बा लंड उसकी कमसिन गुलाबी चूत के मुंहाने रखा.

समर्थ: "बहू, डाल दूँ?"

सागरिका: "अब सोचिये मत, बना लीजिये आज मुझे अपनी. चोद दीजिये ये चूत।"

समर्थ ने अपने लंड को सागरिका की चूत में उतारना शुरू किया और कुछ ३-४ मिनट में पूरा लंड उसकी चूत में बैठ गया.

शीला ने जॉय को जाकर एक गहरा चुम्बन दिया, "कितने सुन्दर लग रहे हैं न दोनों?"

जॉय, जो अब खुल चुका था, ने शीला की गाँड दबाते हुए उसके चुम्बन का उत्तर दिया, "सचमुच, मुझे विश्वास है कि चुदवाती हुई आप भी बहुत ही सुंदर लगती होगी."

शीला: "ये देखने मैं अब तुम्हे ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करनी होगी, आओ पार्थ, तुम्हारे मामा को मेरी चुदवाती हुई मुद्रा देखनी है."

ये कहकर शीला पार्थ को लेकर एक गद्दे पर जाकर बैठ गई.

सुमति ने निखिल, शोनाली ने नितिन को अपने अपने गद्दों पर बैठा दिया. सुप्रिया और जॉय दोनों देख रहे थे.

सुप्रिया: "कितना मनोरम दृश्य है."

जॉय: "अगर पारुल भी होती तो और सुन्दर होता."

सुप्रिया: "हाँ, पर देखा जाये तो फिर लौंड़ों की कमी पड़ जाती."

जॉय हंस दिया. "वो तो वैसे भी पड़ने ही वाली है. अगले सप्ताह वो वापिस जो आ रही है."

सुप्रिया: "जॉय, प्लीज उसे आने के बाद मुझसे मिलने भेजना."

जॉय: "अवश्य. पर अब हम अपने विषय में भी कुछ सोचें?" ये कहकर जॉय ने सुप्रिया को बाँहों लिया और चुम्बनों की बौछार कर दी.

उसका हाथ लेकर वो भी एक गद्दे पर बैठ गया. और फिर उसने चारों ओर देखा. समर्थ अपने लंड को तीव्रता से सागरिका की चूत में पेल रहा था. वहीँ शीला के फैले हुए पांवों के बीच पार्थ का लंड चूत की गहराइयाँ नाप रहा था. सुमति ने निखिल को लिटा दिया था और वो उसके लंड पर सवार थी और आगे झुककर तेजी से अपनी गाँड उछालकर चुदवा रही थी. नितिन ने शोनाली को घोड़ी बनाया हुआ था और वो पीछे से उसकी चूत में अपना लंड पेल रहा था. चारों महिलाएं सिसकारियों और घुटी हुई चीखों से अपने आनंद का प्रदर्शन कर रहे थे. जॉय ने ये सब देखकर सुप्रिया को खड़े स्थिति में ही आगे झुका दिया और उसकी कमर को मजबूती से पकड़कर पीछे से उसकी चूत में एक ही झटके में लंड पेल दिया. अब पांचों जोड़े संभोगरत थे और आनंद में झूल रहे थे.

समर्थ: "जॉय, तेरी बेटी की चूत तो बहुत कसी है. बहुत मजा आ रहा है इसे चोदने में."

जॉय: "बाबू जी, आपकी बेटी की चूत भी कोई कम नहीं. क्या सट के जा रहा है मेरा लंड इसकी चूत में."

सागरिका: "नानाजी, थोड़ा और जोर से चोदिये न, आपका लंड बहुत मजा दे रहा है, थोड़ा और लम्बे धक्के मारिये. मेरी चूत फटेगी नहीं, सच में."

समर्थ ने ये सुनकर अपने धक्कों की गति और तेज कर दी. इस उम्र में भी उसकी शक्ति देखने वाली थी. उसके लम्बे और गहरे धक्के सागरिका की चूत को भरपूर सुख दे रहे थे. उसका पानी अब तक दो बार छूट चूका था. वहीँ शीला अपने आप को पूरी तरह से पार्थ को समर्पित कर चुकी थी. पार्थ अब उसकी बूढी चूत को प्रबल शक्ति से चोद रहा था. चूँकि शीला को इस प्रकार की चुदाई पसंद थी और वो इसकी प्रतिदिन की दिनचर्या थी, वो इस नए लंड का भरपूर आनंद ले रही थी.

शीला: "बहुत अच्छा पार्थ, तू तो बहुत बढ़िया चुदाई करता है बेटा। मेरे नातियों के साथ मिलकर एक दिन तुम मेरे तीनों छेद सील करना."

पार्थ: "नानी, आप जब कहोगी मैं आ जाऊँगा. आपके बस बुलाने की देर होगी, मैं सब काम छोड़कर आपकी सेवा में उपस्थित हो जाऊँगा."

शीला की पनियाई हुई चूत अब पार्थ को वो घर्षण नहीं दे पा रही थी. तो उसने अपना लंड बाहर निकाला और गद्दे पर बिछे हुए बिस्तर के कपडे से उसकी चूत को पोंछ कर सुखा दिया और फिर वापिस अपना पूरा लंड एक ही झटके में डाल कर बेरहमी से चोदने लगा.

शीला: "वाह रे मेरे शेर, अब फटेगी मेरी चूत सही से. चोद मुझे हरामी. दम लगाकर चोद। "

पार्थ भी कहाँ पीछे हटने वाला था. उसने ऐसी चुदाई शुरू की जिसे देखकर दुर्बल ह्रदय के व्यक्ति को आघात ही पड़ जाता. पर शीला को इसमें असीम सुख मिल रहा था.

सुमति निखिल के लंड पर पूरे जोर शोर से उछल रही थी. निखिल का लंड उसके पुत्र पार्थ के लंड के ही जितना बड़ा और चौड़ा था और उसे इससे बहुत संतुष्टि मिल रही थी. पार्थ उसको अब इतना समय नहीं देता था. घर में तीन और चुदने को तैयार चूतें जो थीं. उसे अब उसको किसी ने किसी के साथ बाँटना ही पड़ता था, अकेले माँ बेटे की चुदाई को बहुत समय हो गया था. पर आज निखिल से चुदने में उसे वही समय का ध्यान आ रहा था. और अभी नितिन भी तो था. अब भविष्य में उसे इन तीनों में से किसी न किसी के साथ अकेली रात मिल ही जाएगी. यही सोचकर उसकी चूत लगातार पानी छोड़ रही थी. वो आगे झुककर अपने मम्मे निखिल के मुंह में दबाकर उसके लंड पर जबरदस्त उठक बैठक कर रही थी. निखिल ने उसकी गाँड में एक ऊँगली डाली हुई थी जिससे वो उसके छेद को हल्के हल्के कुरेद रहा था.

सुमति फुसफुसा कर: "निखिल, मेरी गाँड जरूर मारना, उस दिन शोनाली की गाँड से तेरा रस पिया था, बहुत स्वादिष्ट था. पर मुझे अपनी गाँड से निकाल कर पीना है."

निखिल को याद आया की शोनाली ने अपनी गाँड को एक प्लग से बंद किया था क्लब में, जिससे उसका वीर्य बाहर न बहे. अब उसे समझ आ गया कि वो अवश्य सुमति के लिए सहेजी होगी. इतना प्यार और एक दूसरे का ध्यान रखने वाले परिवार की लड़की से शादी करने में कोई समस्या नहीं होने चाहिए.

निखिल: "बुआ, चिंता न करो. अब से मैं तुम्हें गाँड का इतना रस पिलवाऊंगा कि तुम्हारी सारी प्यास मिटा दूंगा. और नितिन और नाना से भी कहूंगा. आपके लिए अब कभी कमी नहीं होगी."

सुमति ये सुनकर भावुक हो गई. उसकी गति अब कभी तेज तो कभी धीमी पड़ने लगी. ये समझकर कि शायद वो थक गई हो निखिल ने उसे पकड़कर एक करवट ली और सुमति अब नीचे थी और निखिल उसके ऊपर. अब तक निखिल सुमति के परिश्रम से ठहरा हुआ था पर अब उसने चूत में अपने लंडों को ऐसे पेलना शुरू किया कि सुमति का रोम रोम कांप गया.

शोनाली और जॉय भी अपने अपने साथी की पूरे जोश से चुदाई कर रहे थे. सुप्रिया की चूत इतने बार चुदने के बाद भी व्यायाम के कारण काफी कसी थी. और उसे चोदने में जॉय को बहुत आनंद आ रहा था. उसके साथ ही शोनाली नितिन को तेज चुदाई के लिए उकसा रही थी और नितिन अपनी पूरी शक्ति उसकी चूत फाड़ने में झोंक रहा था.

लगभग पंद्रह से बीस मिनट की इस चुदाई के पश्चात एक एक करके सभी पुरुषों ने घोषणा की कि वो झड़ने वाले हैं. शीला ने सबको चेताया कि चूत में कोई नहीं झड़ेगा बल्कि सब चेहरे पर अपना कामरस छोड़ेंगे. उसने महिलाओं को भी चेताया कि वो अपना मुंह बंद रखें और अपने चेहरे पर ही पूरा वीर्य इकठ्ठा करें. सबसे पहले समर्थ की ही धार छूटी जिसने सागरिका के सुन्दर चेहरे पर गाढ़े श्वेत जल का लेप कर दिया. उसके बाद जॉय ने सुप्रिया, निखिल ने सुमति, नितिन ने शोनाली और अंत में पार्थ ने शीला के चेहरे को अपने पानी से पोत दिया. शीला ने उसे अपने चेहरे और स्तनों पर अच्छे से मला और वही अन्य महिलाओं ने भी किया.

उसके बाद शीला उठी और सागरिका के पास जाकर उसका चेहरा और स्तन चाटकर साफ कर दिया और सागरिका से अपना चेहरा और स्तन चटवा लिए. फिर उसने बाकी तीनों महिलाओं के चेहरे और स्तन चाटकर साफ किये और अंत में लेट कर ऑंखें बंद करते हुए आनंद की अनुभूति करते हुए विश्राम करने लगी. अन्य सभी लोग उठे और बार या बाथरूम की और अग्रसर हुए. कुछ ही देर में सब लोग वहीँ नंगे खड़े होकर अपनी अपनी ड्रिंक का सेवन करने लगे.

पार्थ: "नानी जी बहुत शांति से लेटी हैं. कोई परेशानी तो नहीं?"

समर्थ: "अरे नहीं, उसे लौडों का टॉनिक बहुत रुचिकर लगता है. शराब से ज्यादा उसे इस टॉनिक से नशा होता है."

पार्थ: "सच में नानाजी, सबके अपने अपने स्वाद और पसंद होती है. मम्मी को गाँड मरवाकर उससे वीर्य पीना बहुत अच्छा लगता है. न केवल इतना, बल्कि अगर गांड में वो माल कुछ समय तक ठहरा रहा हो तो उन्हें उसका स्वाद कई गुना अधिक स्वादिष्ट लगता है. हमारे यहाँ गाँड मारने के बाद उसका पूरा प्रसाद मम्मी को ही पिलाया जाता है."

सुमति ये सुनकर शर्माकर लाल हो गई.

समर्थ:" सुमति, लगता है अगले चरण में तुम्हे भरपूर भोजन मिलने वाला है. क्योंकि अगला राउंड गाँड खोलने का है."

सुमति की आँखों में एक चमक आ गयी जिसे देखकर कोई भी ये समझ सकता था कि वो इस समाचार से कितनी आनंदित हुई थी. समर्थ ने शीला को पास बुलाया और उसके कान में कुछ कहा. शीला ने मुस्कुरा कर सिर हिलाया और सुमति की ओर देखकर मुस्कुराई. सुमति झेंप गई तो शीला उसे अपने साथ अलग ले गई.

शीला: "समर्थ ने मुझे क्या बोले जानती हो?"

सुमति: "नहीं माँ जी."

शीला हँसते हुए बोली," उन्होंने कहा कि इस बार गाँड का पानी अकेले न पियूँ बल्कि इस बार पूरा तुम्हें पीने दूँ, अगली बार मैं बाँट कर पियूँ."

सुमति आश्चर्य से उसकी ओर देखने लगी.

शीला: "तुम क्या सोचती हो, तुम्हें ही सारी विकृत रुचियाँ हैं. मेरे पास आना कभी मेरी विभिन्नता देखोगी तो चौंक जाओगी."

सुमति: "माँ जी, इससे अधिक विकृत क्या हो सकता है?"

शीला ने सुमति को पास खींचा और उसके कान में कुछ कहा. सुमति की ऑंखें चौड़ी हो गयीं.

शीला: "इन सबका मजा लेना हो तो कभी आओ हमारी हवेली पर."

सुमति: "ज जज जज्जि माँ जी. आउंगी."

शीला: "चलो अब लंडों को तैयार करें, मेरी तो गाँड कल रात से खुजला रही है. समर्थ ने मुझे कल छुआ भी नहीं, अपनी ताकत बचाने के लिए."

उधर एक ओर शोनाली और पार्थ में भी कुछ गुप्त बातचीत चल रही थी. शोनाली उसकी बात से सहमत नहीं लग रही थी.

पार्थ: "मामी, मैं एक बार नानाजी से पूछ लूंगा अलग से. अगर उन्होंने सहमति दे दी, तब तो आपको कोई आपत्ति नहीं होगी न?"

शोनाली बेमन से मान गई.

पार्थ: "नानी बुला रही हैं, न जाने माँ के साथ क्या खिचड़ी पका रही थीं."

शोनाली: "बाद में पता चल जायेगा."

इसी के साथ सब अपनी ड्रिंक्स समाप्त कर चुके होते हैं और अगले चरण में प्रवेश के लिए कमर कस लेते हैं.

शीला: "अब गाँड मारने की बारी है. पर इसमें एक ही शर्त है. सारे मर्द पानी गाँड में ही छोड़ेंगे."

सबने अपनी स्वीकृति दी.

शीला ने आगे कहा, "और गाँड से निकला पूरा सूप सब मेरी सुमति को ही पिलायेंगे. तो ख़बरदार अगर किसी ने एक बूँद भी बाहर निकाला.”

ये सुनकर शोनाली सतर्क हो गई. वो तुरंत दरवाजे के पास गई और बाहर खड़े एक रोमियो से कुछ कहा. कोई ५-७ मिनट में सहायक ने उसके हाथ में कुछ थमा दिया.

शोनाली, "ये प्लग है जिससे गाँड से पानी बाहर नहीं निकलता. मैंने सबके लिए एक एक लिया है. और ये वेसलीन की ट्यूब, इतने बड़े लंडों हमारी गाँड में बिना वेसलीन के नहीं लेने वाले हम." ये कहते हुए उसने पांचों प्लग और वेसलीन की ट्यूब बाँट दिए.

समर्थ: "मैं चाहूंगा कि आप महिलाएं अपने साथी का लंडों चूस कर खड़ा करें. और इस बीच सुमति और शीला उनकी गाँड तैयार करें. बाद में सुमति शीला की गाँड तैयार करेगी."

जॉय: "पर सुमति दीदी का क्या होगा, और वैसे भी ये दोनों तीन गाँड कैसे संभालेंगी?"

इससे पहले कि समर्थ उत्तर देता शोनाली बोल उठी. "मेरे पास इसका भी उपाय है. बस ५ मिनट दो मुझे."

ये कहकर उसने टेबल से मोबाइल उठाया और एक संदेश भेजा. कुछ ५-७ मिनट में कमरे का एक दरवाजा खुला और सिमरन ने नग्नावस्था में प्रवेश किया. शोनाली ने सिमरन को उसकी भूमिका समझाई। सिमरन ने बेझिझक इस स्वीकार कर लिया. अब इस चरण की तैयारी हो चुकी थी. समर्थ गद्दे पर बैठ गए और सागरिका अपने घुटनों पर उनकी जांघों के बीच आ गई. उसने अपनी गाँड ऊपर उठाकर समर्थ का लंड अपने मुंह में ले लिया. शीला ने अपनी होने वाली बहू के पीछे स्थान लिया और उसकी जांघों से ऊपर चाटना आरम्भ किया.

जॉय ने अपना स्थान ग्रहण किया, फिर सुप्रिया ने सागरिका की तरह उसका लंड अपने मुंह में लिया और सुमति उसकी गाँड की ओर अग्रसर हुई. नितिन और शोनाली ने भी अपनी स्थिति तय की और इस बार शोनाली की गाँड के पीछे सिमरन थी. पार्थ और निखिल ने अपने लिए एक ड्रिंक बनाई और दोनों एक ओर खड़े होकर सामने चलने वाले सेक्स शो को देखने लगे. पार्थ को अपने क्लब के लिए एक नया आइडिया भी मिल गया. वो हर पार्टी में ऐसे शो अपने सदस्याओं और रोमियो से करवा सकता था. उसने मन ही मन नानाजी का धन्यवाद किया और निखिल के साथ खेल देखने लगा.

सागरिका इस समय समर्थ के लंड की पूरी श्रद्धा से चुसाई कर रही थी. ऐसा कोई अंश नहीं था जिसे उसे अछूता छोड़ा हो. उसे चाटने और चूसने में जैसे एक लालच का पुट था. जैसे कि वो कहीं खो न जाये. उसके पीछे शीला नानी उसकी चूत से लेकर गाँड तक चाटे जा रही थी. शीला अत्यंत अनुभवी और पारखी स्त्री थी. उसने अपने जीवन का लम्बा समय किसी न किसी लंड के छोर पर ही बिताया था. और कुछ ऐसी ही उनके मुंह की भी महिमा थी. वो लंडों, चूत हो या गाँड सबको इतने प्रेम से चाटती और चूसती थीं कि कोई बिरला ही उनसे स्पर्धा कर सकता था.

उनका मुख्य ध्यान सागरिका की गाँड पर ही था. उसकी गाँड के भूरे सितारे नुमा प्रवेश द्वार को वो अपनी उँगलियों से सहलाती और फिर चाट लेती. कुछ देर में उसने सागरिका की गाँड को दो हाथों से खोला और अपनी लम्बी जीभ को अंदर डालकर उससे ही जैसे उसे चोदने लगी. खुले छेद को थूक से भरकर उसने पहले दो फिर तीन उँगलियाँ अंदर डाल कर गाँड को थोड़ा चौड़ा कर दिया. फिर अपने हाथ से वेसलीन की ट्यूब लेकर लगभग एक चौथाई ट्यूब को गाँड के अंदर खाली कर दिया और दो उँगलियों से उसे अच्छी तरह से रगड़ रगड़ कर चिकना कर दिया. इस पूरे उपक्रम में गाँड का छेद अब काफी खुल गया था और समर्थ के लंड के प्रवेश के लिए अब उचित था.

दूसरी ओर सुमति जहाँ एक अनुभवी स्त्री थी पर उसका सर्वाधिक प्रेम गाँड से था. गाँड से सम्बंधित हर क्रिया की वो विशेषज्ञ थी. उसकी इस कला का एक नमूना सुप्रिया देख ही चुकी थी, और अब वो उस अनुभव के लिए दोबारा तैयार थी. बस इस बार उसके मुंह में जॉय का तमतमाया हुआ लंड भी था. सुमति उसकी गाँड खोलकर अपनी जीभ से ऐसे चाट रही थी जैसे किसी स्वादिष्ट व्यंजन खाने के बाद लोग थाली चाटते है. हर मिली मीटर को उसने चाट कर चमका दिया. और जब लगा की अब कुछ शेष नहीं है, तो वेसलीन की ट्यूब से गाँड को अच्छे से तर किया और उँगलियों से अंदर फैला कर अपने भाई के लिए उपस्थित कर दिया.

शोनाली नितिन के भारी लंड को दिल लगाकर चूस रही थी. साथ ही वो उसे अपने मुंह ने पूरी तरह लेकर अच्छे से गीला भी कर रही थी. उसके पीछे सिमरन को गाँड चाटने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, इसीलिए उसने सीधे से वेसलीन लगाकर शोनाली की गाँड को अच्छा चिकना कर दिया और तीन उँगलियों से छेद को चौड़ा भी कर दिया. ये गाँड अब चुदाई के लिए सबसे पहले तैयार हुई थी.

शीला ने सागरिका के नितम्ब पर एक हल्की चपत दी तो उसने समर्थ के लंड को अपने मुंह से निकाल दिया. समर्थ शीला के आगे खड़े हो गए और शीला ने वेसलीन से उनके लंड की अच्छी मालिश कर दी.

वहीँ जॉय और नितिन के साथ भी यही हुआ. अब तीन मोटे लंड तीन मखमली गाँड के लिए तैयार थे. शीला ने पार्थ को बुलाया और लिटा दिया. अब वो उसके लंड को चूम और चाट कर तैयार करने लगी. सुमति ने अपना स्थान शीला के पीछे लिया और अपना जादू दिखाना प्रारम्भ किया. शीला इस स्तर के गुदा प्रेम से अभी तक वंचित थी. कुछ ही क्षणों में उसकी गाँड इतनी उत्तेजित हो गई की रुकना असंभव सा लगने लगा. सुमति से उसकी मनस्थिति को समझा और गाँड में वेसलीन लगाकर तीन उँगलियों के प्रयोग से खोल दिया. फिर पार्थ उठकर पास आ गया और उसके लंड पर उसने बहुत प्रेम से वेसलीन लगाई.

सुमति: "बेटा, अच्छे से मारना नानी की गाँड, मेरे सम्मान का प्रश्न है. नहीं तो सब सोचेंगे कि मैंने तुझे कुछ सिखाया नहीं."

पार्थ: "अरे माँ, तुम चिंता न करो. नानी की मैं पूरे मन से सेवा करूँगा और उनकी गाँड का घी मथ दूंगा."

सुमति ने अब निखिल को अपने पास बुला लिया और उसके लंड पर जुट गई और सिमरन ने उसकी गाँड को तैयार करने का काम शुरू किया. कुछ ही देर में ये जोड़ा भी तैयार था. सिमरन ने सबसे विदा मांगी और बताया कि आधे घंटे में शाम का नाश्ता परोसा जायेगा.

समर्थ ने अपना लंड सागरिका की मुलायम गाँड पर रखा और बड़े ही प्रेम से अंदर धकेल दिया. प्लप्प की आवाज़ के साथ सुपाड़ा गाँड की झिल्ली को छेदते हुए अंदर चला गया. सागरिका थोड़ी कसमसाई पर आगे के लिए सँभलने लगी. उसकी गाँड पहली बार तो मारी नहीं जा रही थी, और पार्थ के लंड को भी वो ले चुकी थी. पर गाँड मरवाना कुछ अधिक जटिल होता है. समर्थ पर इस कला के पारखी थे. न जाने कितनी ही गाँड उनकी इस कला से परिचित थीं. वो अविरल बिना रुके अपने लंड को बहुत हल्के से गाँड में उतार रहे थे. सागरिका साँस रोके इस प्रहार के समापन की राह देख रही थी, जब लंड गांड में पूर्ण रूप से समा चुका होगा. उसे अपनी गाँड धीरे धीरे भरती हुई अनुभव हो रही थी. अचानक ये प्रगति रुक गई. उसने समर्थ को आगे झुककर उसकी गर्दन पर चुम्बन लिया.

फिर फुसफुसाते हुए समर्थ ने कहा, "बहू तुमने तो मेरा पूरा लंड बड़ी सरलता से ले लिया."

ये कहकर एक झटका मारा तो रहा सहा लंड भी जड़ तक जाकर बैठ गया. इसके साथ ही समर्थ ने सागरिका की चूत पर एक हाथ रखकर उसे मसलने के साथ गाँड में अपने लंड की गतिविधि आरम्भ कर दी. धीरे धीरे उन्होंने अपनी गति बढ़ाई और उसी गति से सागरिका की चूत की रगड़ाई भी. सागरिका तो जैसे पागल ही हो गई, वो लगातार झड़ रही थी. न जाने कितना पानी था उसके शरीर में जो चूत के रास्ते बहा जा रहा था. समर्थ ने अपने पूरे जोश से सागरिका की गाँड कोई १० मिनट तक मारी और फिर एक ओर रखे प्लग को उठाया और अपना पानी सागरिका की गाँड में छोड़ दिया. लंड सिकुड़ जाने के बाद धीरे से बाहर निकालते हुए प्लग जो गाँड ने डाल कर उसे सील बंद कर दिया. सुमति के लिए पहला पकवान सीलबंद हो गया था.

पार्थ ने शीला की गाँड में अपना लंड टिकाया और एक बार जैसे ही प्रवेश हुआ उसने लंड बाहर खींचकर एक लम्बे झटके में पूरा एक ही बार में पेल दिया. अब शीला की गाँड इतनी बार पिल चुकी थी कि उसे उसमें भी मजा ही आया. वो आनंद की अधिकता से चीख पड़ी.

शीला: “वाह रे मेरे शेर. फाड़ दे ये गाँड, मिटा दे इसकी खुजली. कल से लपलपा रही है लंड के लिए. तेरे नाना ने तो कल छुआ भी नहीं मुझे. आज के लिए बचा रहा था. अच्छे से चोद, चिंता न कर फटेगी नहीं. बहुत राही इस रास्ते से गुजर चुके हैं. जरा जोर से और कस के मार. हाँ यूँ अब आया मजा. बहुत अच्छा लंड है रे तेरा. सुमति, तेरी किस्मत कितनी अच्छी है जो ऐसे लंड वाले लड़के को पैदा किया.”

यूँ ही बोलते हुए शीला की चूत भी पानी छोड़ रही थी. पार्थ ने अपनी दो उँगलियों में भग्नासे को पकड़ कर मसल दिया. शीला चीखकर झड़ गयी. पार्थ उसकी गाँड पूरी बेरहमी से मार रहा था, और शीला को यही प्रिय भी था. अगर गाँड मरवाने में आंसू न निकलें तो मारने वाले के सम्मान पर बात आ जाती है. पर पार्थ उसे उसकी इच्छा से अधिक गहराई और पाश्विक ढंग से चोद रहा था. १० मिनट की इस भयंकर चुदाई के बाद पार्थ ने बताया कि वो झड़ने वाला है. अपना पानी छोड़कर, उसने अपने लंड को निकला और प्लग से शीला की लगभग फटी गाँड को सील कर दिया. सुमति के लिए दूसरा पकवान भी पैक हो गया था.

लगभग उसी समय जॉय ने भी अपना माल सुप्रिया की गाँड में उड़ेल दिया और उसे भी सुमति के भोज के लिए पैक कर दिया। शोनाली की गाँड नितिन ने भर कर पैक कर दी. अब सुमति के लिए एक ही व्यंजन चार स्वाद में भोगने हेतु उपलब्ध थे. प्रतीक्षा थी तो स्वयं सुमति की, जिसकी गाँड में अभी भी निखिल का लंड अपनी पूरी कलाबाजियां दिखा रहा था. पर कुछ ही देर में उसने भी सुमति की गाँड को सींच दिया और उसे भी प्लग लगाकर सील कर दिया.

अभी सारी महिलाएं अपने घोड़ी ही बनी हुई थीं, और सबकी गाँड अभी भी उठी हुई थी. शीला ने पहल करते हुए सुमति को घुटनों के बल बैठने को कहा. उसके बाद उसने एक एक करके सारे पुरुषों को आगे करते हुए शीला से उनके लंडों चटवा कर साफ करवाए. फिर उसने निखिल को इशारा करके एक पेग बनाने को कहा और उसे एक बाउल (बड़ी कटोरी) में लाने को कहा. निखिल समझ गया और लेने चला गया.

शीला: “सुमति, आज मैं तुम्हे ये रस पीने का एक और स्वरूप सिखाती हूँ.”

निखिल ने वो शराब (लगभग २ पेग के बराबर) से भरा कटोरा नीचे रखा. शीला ने उसके ऊपर निशाना साधा और अपनी गाँड से प्लग निकाल कर रुका हुआ वीर्य कटोरे में छोड़ दिया. एक एक करके चारों महिलाओं ने अपनी गाँड में थमा वीर्य उस कटोरे में डाल दिया. अंत में बारी आयी सुमति की तो उसने देखा कि सब उसकी ही ओर देख रहे हैं.

“अरे माँ, देखो नानी ने तुम्हारी पसंद के खाने को एक नए ढंग में बनवाया है.”

अंततः सुमति ने भी अपनी गाँड से कामरस उस कटोरे में भर दिया. जब ये सब चल रहा था तो नितिन और सागरिका सबके लिए नए ड्रिंक्स बना कर ले आये थे. अब ९ नंगे लोग अपने हाथों में ग्लास थामे खड़े थे. सुमति ने कांपते हाथों से अपना शराब, वीर्य और गाँड के रस का कॉकटेल उठाया.

“चियर्स!” सब ने जोर से चिल्लाकर सुमति को प्रेरित किया और अपने ग्लास एक बार में ही खाली कर दिए. सुमति ने भी अपना प्याला अपने मुंह से लगाकर गटागट पीना शुरू किया. पर अधिक होने के कारण पूरा नहीं पी पायी. बाकी जो बचा वो अपने चेहरे पर डाल कर उसे कॉकटेल से धो दिया.

“कीमती पेय की बर्बादी.” ये कहकर शीला उसके पास आयी और उसकी ठुड्डी से लेकर ऊपर तक चाटकर खुद पी लिया.

“क्यों सुमति, कैसा लगा स्वाद?”

“अच्छा था, पर तुम लोग उसमे इतना सारा दारू क्यों डाला? क्या मुझे नशे में करके मेरी गाँड मारना चाहते हो?”

ये सुनकर सब खिलखिला उठे. और फिर बाथरूम में जाकर नहाकर, अपने कपडे पहनने लगे. कुछ ही देर में वे सब संभ्रांत व्यक्तियों की तरह शाम के नाश्ते के लिए डाइनिंग रूम की और बढ़ गए. उनके पीछे, रोमियो ने कमरे को साफ किया और सभी उपयोग किये हुए बिस्तरों को हटाकर नए लगा दिए. २० मिनट में वो कमरा पहले जैसा ही हो गया था. नाश्ते के समय यूँ ही हल्की फुल्की बातें चलती रहीं. समर्थ और सिमरन में आँखों से कुछ बात हुई. समर्थ और सिमरन कुछ देर के लिए गायब हो गए. उन्होंने प्रयास तो किया कि किसी को समझ न आये पर इतने चतुर लोगों से वो बच न पाए. जब कुछ देर बाद सिमरन आयी तो उसकी चाल बदली हुई थी. शोनाली ने उसे देखकर आंख मारी तो सिमरन भी मुस्कुरा दी. समर्थ भी कुछ ही देर में आ गए. सब उनकी ओर देखकर मुस्कुराने लगे.

समर्थ: “बेचारी, सुबह से काम में लगी थी. देखा तो सोचा थोड़ी उसकी मालिश कर दूँ.”

शीला: “अंदर बाहर दोनों से मसला लगता है. कैसी थी?”

समर्थ: “जैसे पुरानी शराब.”

सब लोग हंसने लगे. यूँ ही शाम के ७ बज गए. पार्थ ने पूछा कि कौन क्या लेगा. सबने अपनी इच्छा की ड्रिंक बता दी. उसके साथ ही सिमरन ने खाने के लिए भी भेज दिया. इस समय दोनों परिवार बिल्कुल एक ही लग रहे थे.

समर्थ: “मुझे हर्ष है कि हम लोग एक दूसरे से इतने जल्दी स्वाभाविक हो गए.”

जॉय: “बाबूजी, इसके लिए आपका और माँ जी का बहुत श्रेय है. “

समर्थ: "हम बुजुर्गों का काम भी यही होता है."

शाम ८. ३० तक यही सब चलता रहा उसके बाद सबने खाना खाया और कुछ देर के लिए बाहर लॉन में बैठ गए.

सुप्रिया: “अब रात के लिए मैंने ये जोड़े तय किये हैं. सब अपने कमरे में ही रहेंगें। इससे उन्हें अलग से बात करने का समय भी मिलेगा.”

१, निखिल और सागरिका: इन्हें जीवन साथ बिताना है, इसीलिए अच्छा हो जो एक दूसरे से पूछना हो पूछ लें.

२. माँ जी और जॉय: अब जब ये समधन से अंतरंग हो चुके हैं तो उसकी माँ से भी मिल लें.

३. पापा और शोनाली: अब बेटी की माँ का भी नाप देख लें.

४. सुमति और नितिन: ये दो भाई हर मिठाई को बांटते है.

५. पार्थ और मैं: क्यूंकि मैं इसकी शक्ति और विवेक दोनों से अचंभित हूँ.

सब ने अपनी सहमति जताई और उठने लगे. तभी पार्थ ने समर्थ से कुछ बात करने के लिए एक ओर बुलाया. जब बात पूरी हो गई तो समर्थ के हाव भाव से लग रहा था कि वो सहमत है. बात समाप्त होने पर पार्थ ने शोनाली को थम्ब्स अप का इशारा किया. शोनाली और पार्थ ने समर्थ और सुप्रिया से कुछ समय माँगा और एक ओर चले गए. लगभग १५ मिनट में वे लोग वापिस आ गए. तब तक शेष सभी अपने कमरों में जा चुके थे. ये चारों भी अपने कमरों में चले गए.

अगले दिन सुबह:

अगले दिन सभी अपने कमरों से निकलकर सुबह के नाश्ते के लिए डाइनिंग रूम में पहुँच गए. इस बार समर्थ शीला, शोनाली और जॉय साथ बैठे थे. ये देखकर सबको सुखद आश्चर्य हुआ कि सागरिका ने निखिल के साथ बैठने का निश्चय किया. सुप्रिया, नितिन और सुमति, पार्थ के साथ बैठी थी. सिमरन ने बहुत अच्छा नाश्ता लगवाया था और सबने भरपूर खाया.

निखिल और सागरिका एक साथ बोले: “हमें कुछ कहना है.”

सबकी दृष्टि उनकी ओर केंद्रित हो गई.

निखिल ने पहल की: “हम दोनों की इस विवाह से सहमति है. कल रात हमने काफी देर बात की और ये अनुभव किया कि हमारी सोच लगभग हर विषय में मिलती है.”

सागरिका: “दूसरा हमने देखा कि हमारे परिवार कितनी सरलता से एक दूसरे के करीब आ गए. आज ऐसा लग ही नहीं रहा कि एक सप्ताह पहले हम लोग एक दूसरे को ठीक से जानते तक न थे, सिवाय इसके कि हम पडोसी थे.”

निखिल: “इसीलिए हमने ये सोचा है कि हम दोनों एक दूसरे और दोनों परिवारों के साथ बहुत खुश रहेंगे. और तो और हमारी जीवन पद्धति पर भी कोई आंच नहीं आएगी.”

ये सुनकर शीला ने उठकर सागरिका को गले लगा लिया और अपने गले का हार निकलकर उसे पहना दिया. उसका माथा चूमा और सागरिका ने उसके पांव छूकर आशीर्वाद लिया. फिर सागरिका ने समर्थ और सुप्रिया के पांव छुए. सुप्रिया ने भी उसे गले से लगाकर अपने हाथ का कंगन उसे पहनाया.

सुप्रिया: ”शोनाली और जॉय, आज से सागरिका हमारे घर की बेटी हुई. आप मंगनी और शादी की समय निश्चित करिये.”

ये सुनकर सुमति और शोनाली दोनों रोने लगीं. परन्तु उनके इन आँसुओं में ख़ुशी थी और किसी ने भी उन्हें चुप करने का प्रयास नहीं किया. पार्थ निखिल के पास जाकर उसके गले लग गया.

“अब हम केवल दोस्त नहीं है, जीजा जी.”

निखिल ने हंसकर अपने मित्र को उत्तर दिया, “अब संभल के रहना साले साहब.”

जॉय ने उठकर अपने कमरे से एक डिब्बा लाया और निखिल के हाथों में एक बहुमूल्य आयातित घड़ी पहना दी. फिर उसे गले से लगाकर उसके माथे को चूम लिया.

“बेटा मुझे आज इतनी प्रसन्नता मिली है, जिसका मैं वर्णन नहीं कर सकता.”

सिमरन ने भी सबको गले मिलकर बधाई दी और विश्वास दिलाया कि अगर उसकी कंपनी से केटरिंग कराई जाएगी तो वो अपनी पूरी श्रध्दा से उसे सफल करेगी. सब लोग एक हंसी ख़ुशी के वातावरण में न जाने कितनी देर बातें ही करते रहे. फिर पार्थ ने समर्थ से पूछा कि क्या जो कल बात की थी वो अभी भी वैध है. समर्थ ने हामी भरकर कहा कि अब तो १०० गुना अधिक वैध है. पार्थ ने शोनाली की ओर देखकर उसे सिर हिलाकर स्वीकृति दी.

दोपहर के खाने के पहले दो चक्र शराब के चले, इस मौके का सबने जी भर के आनंद लिया.

भोजन के पश्चात् सभी लोग खेल कक्ष में चले गए. सभी बिना कुछ कहे बिना अपने वस्त्रों से अलग हुए और उन्हें अलमारी में टांग दिया.

तभी शोनाली और पार्थ ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा.

पार्थ: “कल मैंने नानाजी से कुछ पूछा था जिसकी उन्होंने मुझे अनुमति दे दी थी. इसीलिए आज का विशेष आयोजन हमारे दोनों परिवारों की स्त्रियों के लिए है.”

शोनाली: “सुमति दीदी ने कल माँ जी से हुई बात मुझे बताई थी, जो मैंने पार्थ को बताई.”

शीला के होठों पर एक मुस्कराहट और आँखों में चमक आ गई.

“इसीलिए, आज मैंने अपने क्लब के १० रोमियो को अपनी सेवा के लिए नियुक्त किया है, इनमे से छह से आप कल मिल चुके हो, जो हमारे साथ उपस्थित थे. दोनों सहायिकाएं सोनम और नूतन भी उपस्थित रहेंगी. अब चूँकि हम सब व्यस्त होंगे तो पूरे कार्यकर्म का निर्देशन सिमरन जी करेंगी.”

ये कहकर उसने दो बार ताली बजाई। एक ओर का दरवाजा खुला जिसमें से सिमरन नंग धडंग अंदर आयी. उसके दोनों ओर उनकी दोनों सहायिकाएं सोनल और आतिशी भी नंगी खड़ी हो गयीं.

उसके बाद दरवाजे से १० नंगे लड़कों ने प्रवेश किया. और वो सब सिमरन के पीछे एक व्यूह में खड़े हो गए.

पार्थ: “आज हम सब अपने परिवार की महिलाओं को एक साथ तीन पुरुषों से सम्भोग का सुख देंगे. पर इसमें कुछ नियम हैं जो हर स्त्री के स्वभाव के अनुरूप होंगे:

१. गाँड का रस मम्मी को ही अर्पित होगा.

२. नानी माँ को अंत में वीर्य से नहलाया जायेगा.

३. चूत मारने के बाद के रस का सेवन केवल सागरिका के लिए होगा.

शोनाली: “मेरे विचार में ये नियम सही हैं और अगर किसी को कोई आपत्ति है तो बता सकता है.”

समर्थ: “मुझे ये देखकर प्रसन्नता होती है कि तुम हर कार्य एक नियम के अनुसार करते हो. मुझे किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं है.”

अन्य सबने भी अपनी स्वीकृति दी.

"इसमें से पहले सागरिका और नितिन, सुमति दीदी और पापा जी साथ होंगे क्यूंकि उन्हें अभी तक एक दूसरे का साथ नहीं मिला है. शेष सब एक म्यूजिकल चेयर से जीते जायेंगे.”

ये कहकर शोनाली ने पाँचों स्त्रियों को एक गोले में खड़ा कर दिया. अब पुरुष लोग एक गोले में आ गए. शोनाली के कहने पर सिमरन ने एक गाना बजा दिया और सब आदमी गोले में घूमने लगे. इसमें होना ये था कि गाना रुकने पर जो भी आदमी जिस स्त्री के सम्मुख होता वो उसका साथी बन जाता. इसमें सागरिका और सुमति को केवल दो लोगों को चुनना था. तीन बार में सबके साथी निश्चित हो गए.

शोनाली के हिस्से में निखिल +२ आये , सुप्रिया को पार्थ +जॉय +१ मिले और शीला को तीनों नए रोमियो. २ २ रोमियो सागरिका और सुमति को भी मिले. .

और एक सामूहिक चुदाई का नंगा खेल प्रारम्भ करने के लिए बीच में आ गए.

कुछ ही समय में कमरा नंगे शरीरों का एक अखाडा बन गया था. पांचों महिलाएं एक गोल चक्र में एक दूसरे को देखती हुई बैठ गयीं. जब एक बार महिलाओं ने अपने हिस्से के लंड को चूस चाट कर कड़ा कर लिया तो उन्हें जल्द से जल्द अपने काम पर लगने के लिए उत्साहित करने लगीं.

शीला इस समय तीन रोमियो के बीच में सैंडविच बनी हुई थी. एक लंड उसकी चूत में था, एक गाँड में और एक मुंह में. सबसे बड़ी बात की तीनो लंडों १० इंच से अधिक बड़े थे यानि उसके शरीर में ३० इंच से अधिक लम्बाई के लंड भरे हुए थे. और वो सब उसके द्वारा उत्साहित किये जाने के कारण एक गहराई और बेदर्दी से उसके छेदों को मथ रहे थे. एक लंड जब चूत में घुसता तो गाँड वाला बाहर निकलता और इसी लय ने उसके दोनों छेदों का मंथन कर रखा था. उसके मुंह का लंड पहले तो शीला की दया पर निर्भर था पर बाद में उसने भी शीला का सिर पकड़कर उसे अपनी गति से चोदना शुरू कर दिया था.

यही कुछ स्थिति शेष महिलाओं की भी थी. इस समय प्रेम और प्यार नहीं बल्कि शरीर का सहवास हो रहा था, सिर्फ शरीर की भूख मिटाई जा रही थी. सिमरन एक घडी से समय देख रही थी. उसने ३ मिनट पूरे होने पर “CHANGE” की आवाज़ दी. ये सुनकर सबने अपने लंड बाहर निकाल लिए. फिर गाँड मारने वाले आदमी ने अगली औरत के पास जाकर अपना लंड उसके मुंह में डाल दिया. जिसका लंड मुंह था वो नीचे लेट गया और चूत में लंड पेल दिया और जो चूत में था उसे गाँड में स्थान मिला.

(समझने के लिए: शीला की गाँड मारने वाले व्यक्ति ने अपने लंड को सुमति के मुंह में डाला. शीला की चूत मारने वाले ने गाँड में लंड डाला और सागरिका की गाँड मारने वाले ने अपना लंड शीला के मुंह में डाला.)

इसी प्रकार से हर 3 मिनट में सिमरन आवाज़ देती और हर आदमी अपने हिस्से का छेद बदल कर अगले गंतव्य पर चला जाता. इस पूरे क्रम को पूरा करने में ४५ मिनट निकल गए और अब आदमियों से रुका नहीं जा रहा था. महिलाएं भी अब थकान की ओर जा रही थीं. अंत में जो जहाँ से आरम्भ किया था वहीँ वापिस पहुँच चुका था. एक एक करके लंडो ने पानी छोड़ना शुरू कर दिया और कुछ ही मिनटों में हर छेद पानी से लथपथ हो गया था. सागरिका अपने सामने आयी चूत से रस पिने लगी और सुमति गाँड. सब की साफ होने के बाद सब लोग निढाल पड़ गए.

सिमरन, सोनम और नूतन ने गर्म पानी से गीले तौलिये लाये और सबके शरीर एक एक करके पोंछकर साफ किये. उसके बाद सबके लिए एक नया ड्रिंक बनाया और सबको दिया. अपना ड्रिंक पीते हुए सब यही सोच रहे थे कि क्या हम लोग विकृत तो नहीं हैं. दोपहर के लगभग तीन बज चुके थे और ५ बजे निकलना भी था तो यही तय किया कि अब अंतिम चरण का खेल शुरू किया जाये.

पर शीला ने अपनी मांग रख दी.

शीला: “देखो, ऐसा अवसर बार बार नहीं मिलता है. तो मैं अपनी एक इच्छा पूरी करना चाहती हूँ.”

समर्थ: “इतने वर्षों से इतना खेलने के बाद अभी भी कुछ है जो बचा है तुम्हारे मन में?”

शीला: “और क्या. मेरा मन एक साथ चार लंडों से चुदने का है. एक मुंह में, दो चूत और एक गाँड में.”

समर्थ: “इस उम्र में झेल पाओगी ये सब.”

शीला: “कोई नहीं, अगर झेल नहीं पायी तो कम से कम प्रयास करते हुए मरूंगी.”

समर्थ: “चुप कर. ऐसा क्यों बोलती है?”

शीला ने जॉय, पार्थ, निखिल और नितिन की ओर देखकर कहा, “करोगे इस बुढ़िया की इच्छा पूरी?”

जॉय: “अवश्य करेंगे, पर आप अपने आप को बूढ़ा समझना छोड़िये.”

ये कहकर चारों ने उसे घेर लिया. घर के चारों पुरुषों ने उसे घेर कर लिटा दिया. सोनल और नूतन आगे आयीं और सभी पुरुषों के लंड चूसकर अच्छे से खड़ा करने में लग गयीं. समर्थ बड़ी भूखी आँखों से दोनों को देख रहे थे.

शोनाली उनके पास गई, और धीरे से बोली, “आप का जब दिल करे बाबूजी, तब आप सोनम और नूतन की मार लेना.”

समर्थ: “मुझे पता है कि तुम मुझे निराश नहीं करोगी.”

इस समय सामने जॉय ने अपना स्थान गद्दे पर बनाया और सबने मिलकर सँभालते हुए शीला को उसके लंड पर बैठाया. निशाना गाँड पर था और कुछ ही मेहनत से जॉय का पूरा लंड शीला की गाँड में बैठ गया. अब बारी पार्थ और नितिन की थी दो लंड शीला की चूत में डालने की. कुछ अचरज भरी कलाबाजियों के साथ ये भी संभव हो गया और अब शीला की चूत में दो लंड थे और एक उसकी गांड में था. निखिल ने आगे आकर अपना लंड शीला के मुंह में घुसा दिया.

और अब आरम्भ हुआ चुदाई का वीभत्स नाच. वैसे भी सबके लौड़े एक से बढ़कर एक थे और जिस लयबद्ध तरीके से वो चोद रहे थे उससे ये प्रतीत होता था कि ये उन्होंने पहले भी किया हुआ है. शीला के मुंह में अगर निखिल का लंड न होता तो शायद उसकी चीखें क्लब को हिला देतीं. कुछ ही समय में शीला के झड़ने का सिलसिला थमा तो सबने एक दूसरा आसन में आक्रमण चालू रखा. इसी तरह से अलट पलट कर चारों मिलकर शीला को एक गुड़िया की तरह चोद रहे थे.

तभी एक धक्के में गलती से नितिन का लंड चूत से बाहर तो आया पर चूत में जाने की स्थान पर नितिन ने उसे निखिल के लंड के साथ जो उसकी नानी की गाँड में पहले ही डला हुआ था उसके साथ मिला दिया. अब शीला की गाँड में दो लंड थे और चूत में एक.

(नीचे मैंने इस पराक्रम के कुछ चित्र भी लगाए हैं.)

इस प्रकार से शीला मंथन यही कोई बीस मिनट चला होगा. जिसके अंत तक शीला चुद चुद कर और झड़ झड़ कर निर्जीव सी हो गई थी. उधर सभी महिलाओं ने बाकी के लंड भी चूसकर झड़ने की कगार पर ला दिए थे. जब चुड़क्कड़ चार झड़ने के करीब पहुंचे तो वो हट जाते. जैसे ही आखिरी आदमी ने अपना लंड शीला के मुंह से निकाला, सब उसके इर्द गिर्द घेरा बनाकर खड़े हो गए और मुठ मारने लगे. एक एक करके हर पुरुष ने अपना गाढ़ा सफ़ेद वीर्य शीला के चेहरे और शरीर पर गिरा दिया. जब सब हटे तो शीला का चूत से ऊपर का पूरा शरीर कामरस से पुता हुआ था. पर शीला निढाल पड़ी थी. सागरिका और सुप्रिया ने छाती और पेट, शोनाली ने चेहरा और सुमति ने चूत और गांड को चाटकर अच्छे से साफ कर दिया. सब खड़े होकर शीला के भोगे हुए शरीर को देख रहे थे.

कुछ देर में शीला ने आंख खोली और सबको अपनी ओर देखता पाया.

शीला: ” आऊवोह, मैं जीवित हूँ? मैं तो समझी थी कि मैं मर चुकी हूँ और देवलोक में मुझे चोद रहे हैं.”

सुप्रिया: “अरे मम्मी तुम पूरी जीवित हो.”

समर्थ ने हाथ बढाकर शीला को खड़ा किया.

समर्थ: “तो कैसा रहा तुम्हारा ये अनुभव?”

शीला: “अद्भुत, अद्वितीय, अकल्पनीय. मैं तो समझी थी कि मैं स्वर्ग में हूँ. पर इन लड़कों ने मुझ बुढ़िया की हड्डियां हिला डालीं ” फिर रूककर, “मुझे उसका नाम बताओ जिसने मेरी गाँड में दूसरा लंड डाला था.”

सब सहम गए, फिर नितिन ने हाथ खड़ा किया. शीला आगे बढ़ी और उसे चूम लिया.

“तूने मुझे वो सुख दिया जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी.”

पार्थ ने तभी कहा, “अब हमारे निकलने का समय हो रहा है, तो सब लोग नहाकर तैयार हो जाओ.”

सब एक एक करके तैयार हो गए. पार्थ ने सिमरन को बुलाकर कहा, “आपका बोनस पक्का है. अगले महीने के दूसरे शनिवार को सारे रोमियो आपकी सेवा में होंगे.”

तैयार होकर सब बाहर आये और एक दूसरे की गले मिलकर फिर संबंध बनने की बधाई दी और अपनी गाड़ियों में सवार होकर अपने घर के लिए निकल गए.

क्रमशः

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अध्याय ३०: चौथा घर - मिशेल और रिचर्ड डिसूज़ा ४

********************

रात की चुदाई से कुछ थकान तो थी, पर सबके मन प्रफुल्लित भी थे. सुबह के नाश्ते के बाद सब अपने काम से निकल गए. बचे तो फिर ईव और मिशेल ही. ईव ने डॉन से बात की और उसे कार्यक्रम बताया. उसे ये भी बताया कि उनके लिए कुछ विशेष प्रबंध भी किया गया है, इसीलिए वो २५ को उपलब्ध रहें. डॉन ने उसे बताया कि वे सब आज दो बजे के बाद आ सकते हैं. इसके बाद ईव और मिशेल अपने घर के कामों में व्यस्त हो गयीं.

एक घंटे के बाद रिचर्ड ने फोन करके बताया कि उसके सम्पर्क ने उनका नए वर्ष का प्रबंध पक्का कर दिया है.

रिचर्ड: “मेरी इवान स्टोन से बात हुई है. उसने नए वर्ष के लिए हम सबके लिए प्रबंध कर दिया है. हम सभी को ३० दिसंबर को चलना होगा और हम १ जनवरी की शाम को लौटेंगे.”

मिशेल: “हम क्या कहीं बाहर जायेंगे?”

रिचर्ड: “हाँ,शहर से लगभग ३०० किमी दूर एक रिसोर्ट है, जो विशिष्ट आयोजनों के लिए जाना जाता है. किसी नेता का है, इसीलिए वहां पर किसी प्रकार से भी कोई निरीक्षण के लिए नहीं आता। वहाँ पर बहुत ही विशिष्ट लोगों को ही आमंत्रण दिया जाता है. इवान ने हम सबके लिए वहीं प्रबंध किया है. उसका कहना है कि ऐसा अनुभव हमने कभी नहीं लिया होगा.”

मिशेल: “क्या विशेषता है वहां की?”

रिचर्ड: “वहाँ वस्त्र नहीं पहने जाते. और केवल ५० लोग ही आमंत्रित होते हैं. यहाँ तक कि वहाँ का स्टाफ भी वस्त्र नहीं पहनता. तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं?”

मिशेल: “नहीं,बिलकुल नहीं. मुझे लगता है कि मुझे इवान को पुरुस्कृत करना होगा.”

रिचर्ड हँसते हुए: “उसे इसमें कोई आपत्ति नहीं होगी.”

मिशेल: “और हाँ, डॉन और उसके मित्र २ बजे आएंगे. तो आप सब ६ बजे के पहले मत आना. बच्चों को भी दूर ही रखना, प्लीज.”

रिचर्ड: “ओके, डियर. आई विल टेक केयर. यू टू हैव फन.”

बात समाप्त होने पर मिशेल ने ईव को अपनी ओर उत्सुक दृष्टि से देखता पाया. उसने रिचर्ड के प्रबंध के बारे में बताया तो ईव की बांछें खिल उठीं.

ईव: “मैं भी इवान को गिफ्ट दूंगी.”

मिशेल: “ओके,उसमे समय है. चलो नीचे के क्रीड़ांगन को तैयार करते हैं.”

मिशेल और ईव फिर अपने काम में जुट गए. एक बजे दोनों ने खाना खाया और चारों अतिथियों की प्रतीक्षा करने लगीं.

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डेविड शैली के कॉलेज गया और उसने वहाँ शिरीन को ढूंढा. शिरीन उसे एक पेड़ की छाओं में पढ़ती हुई दिखाई दी उसे कुछ देर यूँ ही देखने के बाद वो उसके निकट गया. शिरीन ने सिर उठाकर देखा और डेविड को देखकर उसके चेहरे पर ख़ुशी छा गई.

शिरीन: “डेविड,तुम यहाँ?”

डेविड: “हैलो शिरीन. क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?”

शिरीन: “बिलकुल. आज कॉलेज कैसे आ गए?”

डेविड: “मैं तुमसे ही मिलने आया हूँ. कुछ कहना चाहता हूँ.”

शिरीन के शरीर में झुरझुरी हुई,क्या डेविड वही कहेगा जो वो सुनना चाहती है?

शिरीन: “हाँ,बताओ.”

डेविड: “मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी गर्लफ्रेंड बन जाओ.”

शिरीन: “ओह,डेविड. मैं तो कब से ये चाहती हूँ. पर मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी. तुम जानते ही हो हमारी स्थिति. कहाँ हम और कहाँ तुम.”

डेविड: “समय सदा एक जैसा नहीं रहता है. कल को तुम्हारा भी अच्छा समय आएगा. तुम जिस तरह पढ़ाई कर रही हो, एक दिन तुम बहुत सफल होने वाली हो. एक बात और है, मैं भी तुम्हें बहुत दिनों से चोरी छुपे चाहता था. पर कभी बोल नहीं पाया. तुम जानती तो हो ही कि मैं कितनी अन्य लड़कियों और स्त्रियों से सम्बन्ध रखता हूँ. पर कल मुझे विश्वास हो गया कि तुमसे मैं अधिक निकटता चाहता हूँ. तो क्या तुम मेरी गर्लफ्रेंड बनोगी?”

शिरीन: “सौ प्रतिशत. और डेविड,मेरे लिए तुम्हें अपनी जीवन शैली बदलने की अभी आवश्यकता नहीं है. जिस दिन मुझे उससे परेशानी होगी,मैं बता दूंगी.”

डेविड: “ग्रेट. अपनी मॉम को बोल दो कि आज तुम देरी से आओगी. हम तुम्हारे कॉलेज के बाद कहीं घूमने चलेंगे. अभी मैं चलता हूँ.”

शिरीन: “ओके” कहते हुए शिरीन ने अपना फोन निकाला और डेविड को बाय करते हुए अपनी माँ को कॉल लगा दिया.

********************

रिचर्ड का ऑफिस:

रिचर्ड के ऑफिस में निशा ने कदम रखा तो रिचर्ड कुछ स्तम्भित हुआ.

निशा: “आकार ने मुझे बताया कि आपको कुछ विशेष सेवा की आवश्यकता है अपने विदेशी अतिथियों के लिए.”

रिचर्ड: “हाँ, हाँ, बैठो, बैठो.”

निशा बैठ गई और कुछ आगे झुकी इससे उसके स्तन छलक गए. पर निशा ऐसे बात कर रही थी जैसे कुछ हुआ ही न हो.

निशा: “मुझे बताया है कि वे अफ़्रीकी लोग हैं. क्या लौड़े बड़े हैं?”

रिचर्ड समझ गया कि इससे सीधे बात करना की ठीक है.

रिचर्ड: “मेरे अनुमान से, हाँ.”

निशा: “परन्तु हम उनके होटल नहीं जायेंगे. एक घर है जहाँ हम उन्हें ले जायेंगे या बुलाएँगे. सुरक्षित स्थान है.”

रिचर्ड: “ठीक है, मेरे विचार से इसमें कोई आपत्ति नहीं है.”

निशा: “अब जो मैं आपको बताउंगी, उससे आप कुछ स्तब्ध हो सकते हैं, पर इसके लिए मुझे आप विशेष पुरुस्कार देंगे, तभी बताउंगी. उन चार महिलाएं जो आपके मित्रों से मिलेंगी.”

रिचर्ड समझ चुका था निशा का संकेत किस ओर था. इसीलिए उसने अपनी स्वीकृति दे दी.

निशा: “मैं तो रहूंगी ही. मेरे साथ अन्य तीन और भी रहेंगी.” इसके बाद निशा ने रिचर्ड की आँखों में झांककर कहा,“उसमे से एक से आप परिचित हैं.” सुनकर रिचर्ड कुछ चौंका,पर उसे अनदेखा कर दिया. “और उसके अनुमान में आप लोग उन्मुक्त सेक्स में विश्वास रखते हैं. उसने पूछा है कि क्या आप लोग उनके साथ कभी सेक्स पार्टी करने के इच्छुक हैं?”

रिचर्ड को झटके पर झटके लग रहे थे.

“मुझे पूछना पड़ेगा.”

“अवश्य,तो अब मेरा पुरुस्कार कब दे रहे हैं?”

“आज शाम तीन बजे?मैं कमरा बुक कर लेता हूँ.” रिचर्ड ने एक होटल का नाम लेकर कहा.

“ठीक है, मैं आपसे वहीं मिलूंगी.” ये कहकर निशा उठकर चलने को हुई. फिर दरवाजे पर पहुंचकर मुड़कर रिचर्ड की ओर देखा,“आप चाहें तो जैसन को भी बुला सकते हैं. मुझे डबल में अधिक आनंद आता है. और उस परिचित का नाम में काम के बाद बताउंगी.”

रिचर्ड ने सिर हिलाकर हामी भरी और चिंता में डूब गया.

******************

मिशेल का घर:

दो बजे ही थे कि घंटी बजी और मिशेल ने द्वार खोला. सामने रिकी, डॉन, बोरिस और मार्टिन खड़े थे. चारों को मिशेल ने अंदर बुलाया और घर लॉक कर दिया. उसने फिर मुड़कर पहले रिकी और फिर डॉन को चूमा और फिर बोरिस और मार्टिन की ओर हाथ बढ़ाया।

मिशेल: “स्वागत है, हम इसके पहले कभी मिले नहीं.”

बोरिस: “धन्यवाद, मुझे भी आपसे मिलकर अत्यंत प्रसन्नता हुई.”

मार्टिन ने उसके हाथ को चूमकर कहा, “मुझे भी. और ऐसे संदर्भ में मिलने की और भी प्रसन्नता है.”

मिशेल: “मैं भी यही कहना चाहूंगी. चलिए हम हमारे तरणताल में चलते हैं, ईव वहीं आपकी प्रतीक्षा कर रही है.”

मिशेल चारों को लेकर तरणताल वाले क्रीड़ांगन में पहुंची तो देखा कि ईव ने सारा प्रबंध किया हुआ है. फ्रिज में बियर रखी थी और तरणताल वाली कुर्सियों लगी हुई थीं, एक ओर तौलिये रखे हुए थे. चारों इतना विहंगम दृश्य देखकर बहुत प्रभावित हुए.

डॉन जो इस समूह का मुखिया था बोला, “पर हम तैरने के कपड़े नहीं लाये हैं.”

ईव ने भी आकर उन सबको गले से लगाया और चुंबन लिया. ईव ने इस समय बहुत छोटी सी दो हिस्सों की बिकनी पहनी हुई थी. देखने वाले ये सोचने को विवश हो जाते कि जो पहना है उसका कोई लाभ ही नहीं है. ईव ने डॉन की बात सुन ली थी.

ईव: “डॉन, कपड़े पहन कर कौन बेवकूफ तैरता है? हम तो नंगे ही तैरना पसंद करते हैं.”

डॉन और अन्य तीनों के चेहरे खिल उठे. ईव ने चारों को बियर के लिए आमंत्रित किया तो डॉन ने अपने हाथ में लिए हुए थैले को मिशेल को सौंपा.

डॉन: “आपके लिए साउथ अफ्रीका की सबसे उत्तम वाइन और रिचर्ड के लिए व्हिस्की लाये हैं. कृपया स्वीकार करें.”

मिशेल उनके इस औपचरिक और विचारशील व्यव्हार से बहुत प्रसन्न हुई. उसने थैले में से बोतलें निकालीं और डॉन को धन्यवाद देकर उन्हें बार में जाकर रख दिया. इन्हें क्रिसमस में खोलना होगा. बियर लेकर चारों पुरुष भारत और साउथ अफ्रीका के बीच में असमानता के बारे में बातें करने लगे. उनका ये पहला भारत भ्रमण था और उन्हें बहुत अच्छा लग रहा था. जैसे ही बियर समाप्त हुई तो ईव से रहा नहीं गया.

ईव: “मेरा तो मन तैराकी का है, तो मैं तो चली.” ये कहकर उसने क्षणभर में अपने अधोवस्त्र उतारे और ताल में कूद गई.

मिशेल ने उनकी ओर देखा, “आप चाहो तो आप भी…”

उसका वाक्य अभी समाप्त भी नहीं हुआ था कि चारों अपने कपड़े उतारने लगे. कपड़ों को एक ओर रखकर वो मुड़े तो उनके बलिष्ठ शरीर और मोटे लम्बे काले लौड़े देखकर मिशेल के मुंह में पानी आ गया. उसने भी अपने वस्त्र उतारे और उन पांचों के साथ ताल में सम्मिलित हो गई. ताल में पाँचों तैरते रहे और इसमें कोई बीस मिनट निकल गए थे. मिशेल को छोड़ अन्य चारों ताल के एक ओर जाकर सुस्ता रहे थे. अचानक डॉन ने ईव को अपनी ओर खींचा और उसके होंठ चूसने लगा. उसके हाथ पानी के नीचे थे पर ये विदित था कि वो ईव के नितम्ब मसल रहा था. बोरिस ईव के पीछे गया और उसके शरीर से चिपक कर उसके मम्मे मसलने लगा.

मिशेल को अब तक जो कुछ दिख रहा था वो तब बंद हो गया जब रिकी और मार्टिन ईव के दोनों ओर जाकर खड़े हो गए. मिशेल को बस इतना ही दिख पाया कि ईव के हाथ नीचे की ओर बढे थे फिर सब कुछ छुप गया. मिशेल ताल से बाहर निकली और उसने एक बियर ली और लॉउन्ज कुर्सी पर लेट कर सामने चल रही रासलीला को देखने लगी. इस ऊंचाई से अब उसे पानी के ऊपर चल रहे उत्पात सरलता से दिखाई दे रहा था. बियर की चुस्की लेते हुए वो उँगलियों से अपनी चूत को सहलाने लगी. ईव अब मुड़ मुड़कर चारों को बारी बारी चुम रही थी. उसके पीछे आने वाला उसके मम्मे दबाता और सामने वाला गांड.

बगल में से कोई एक उसकी चूत में भी ऊँगली कर रहा था. उसने ईव को कुछ कहते हुए सुना पर दूरी के कारण उसे समझ नहीं पड़ा. पर जब एक एक करके सब ताल से निकलने लगे तो उसने समझा कि ईव अब आगे के कार्यक्रम के लिए निकल रही है. पाँचों ने ताल से निकलकर अपने शरीर तौलिये से पोंछे बोरिस अब मिशेल को देख रहा था, मिशेल ने उसकी ओर देखकर अपने होंठों पर जीभ फिराई तो बोरिस ने अपने तौलिये को फेंका और अपने फनफनाते हुए लंड को लिए हुए मिशेल की ओर बढ़ा. मिशेल के सामने जब वो खड़ा हुआ तो मिशेल ने अपनी उँगलियाँ चूत से निकलीं और बोरिस के लंड को थामकर उसे अपने मुंह में ले लिया।

वो लंड चूसने में व्यस्त हुई ही थी कि उसने दो हाथों को उसकी जांघों को पृथक करते हुए पाया. उसने लंड मुंह से निकालकर देखा तो मार्टिन था. उसने मार्टिन को आंख मारी और बोरिस के लंड को चूसने में लग गई. ईव इस समय डॉन और रिकी के साथ व्यस्त थी. वो लॉउन्ज कुर्सी पर बैठी हुई दोनों के लौड़े एक एक करके चूस रही थी. अथाह प्रयासों के बाद भी वो डॉन के लंड को पूरा अपने मुंह में नहीं ले पा रही थी. थूक से लथपथ दोनों लंड इस समय ताल से प्रतिबिम्बित जल के दर्प से अलग ही छटा बिखेर रहे थे. उन सबके शरीर पानी के प्रतिबिम्ब से चमक कर रंग बदल रहा था. इसी बीच मिशेल के फोन की घंटी बजी.

मिशेल: “हैलो।”

दूसरी ओर रिचर्ड था.

रिचर्ड: “मैं और जैसन किसी ग्राहक से मिलने जा रहे हैं, मुझे लौटने में ६ या अधिक हो सकते हैं. वैसे तुम्हारा कार्यक्रम कैसा जा रहा है?”

मिशेल: “बिलकुल सही. असली खेल अब शुरू होने को है.”

रिचर्ड: “मैं और जैसन भी इसी कार्य से जा रहे हैं. सो लेट अस आल एन्जॉय. लव यू.”

मिशेल: “लव यू टू.”

मिशेल ने फोन रखा और देखा कि तीन बजने को हैं, बोरिस और मार्टिन उसे देख रहे थे.

मिशेल: “रिचर्ड का कॉल था, वो भी किसी के साथ चुदाई करने जा रहा है.”

बोरिस ने सिर हिलाया और उसके लंड को मिशेल दोबारा चूसने लगी. मार्टिन उसकी चूत चाटने के लिए लौट गया. ईव को अब अधलेटा कर दिया गया था और जहां रिकी के लंड को वो चूस रही थी, वहीं डॉन अब उसकी चूत चाटने में लग चुका था. डॉन को विश्वास था कि जो ईव के साथ वो उस दिन नहीं कर पाए थे, आज न केवल ईव, बल्कि मिशेल के साथ आज उसे करने में सफल रहेंगे.

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रिचर्ड जैसन के साथ होटल पहुंचा और अपने कमरे की चाबी लेकर दोनों ऊपर चले गए. उसने निशा को कमरे का नंबर मैसेज किया. दो ही मिनट में निशा का उत्तर आ गया. वो होटल में आ चुकी थी. कमरे में जाकर रिचर्ड और जैसन बैठे ही थे की घंटी बजी. खोलने पर निशा खड़ी थी. वो बिना कुछ कहे अंदर आयी और कमरा बंद कर दिया.

निशा: “तो आपने मेरी बात मान ही ली. जैसन जी को भी साथ लाये हैं. आपके पास कितना समय है?”

रिचर्ड: “छह बजे तक का. कमरा पूरी रात के लिए है, आप चाहो तो रुक सकती हो.”

निशा: “हम्म्म, सुझाव अच्छा है. सोचूंगी. क्या आप में से कोई रुकेगा?”

दोनों ने मना किया.

निशा बिना किसी और औपचारिकता के कमरे के बिस्तर पर बैठ गई और उछल कर देखा.

निशा: “देख रही थी बिस्तर चूँ चूँ तो नहीं करता.”

रिचर्ड और जैसन इस बात पर हंस पड़े. निशा बाथरूम में घुस गई और कुछ ही देर में कमरे में लौटी तो वो नितांत नंगी थी. उसने रिचर्ड और जैसन को संकेत दिया तो वे भी अपने कपड़े निकालने लगे. दोनों के नंगे शरीरों को देखकर निशा ने अपनी संतुष्टि दिखाई. फिर उसने आगे बढ़ते हुए दोनों के लंड पकडे और उन्हें अपने सामने करते हुए बिस्तर पर बैठ गई. दोनों के लंड कुछ देर हाथ से सहलाने के बाद वो उन्हें अपनी जीभ से चाटने लगी और फिर मुंह में अंदर लेकर चूसने लगी.

रिचर्ड और जैसन ने पाया कि वो इसमें उतनी ही निपुण ही जितनी कि उनकी पत्नियां. न चाहते हुए भी उनका ध्यान अपने घर में चल रहे खेल पर गया. रिचर्ड को इस बात का भी ध्यान आया कि उसने बच्चों को घर से बाहर रहने के लिए कहा था. इसके बाद उसने लौटकर अपने लंड पर चल रही निशा की गतिविधि में स्वयं को खो दिया.

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तीन बजे कॉलेज छूटने के बाद डेविड शिरीन को लेकर घूमने के लिए निकल गया. दोनों नए प्रेमी यूँ ही बातें करते हुए घूमते रहे. रुक रुक कर वे कहीं कॉफी पीते, तो कहीं आइसक्रीम खाते। समय बहुत अच्छा निकला और छह बजे डेविड ने शिरीन को उसके घर पर छोड़ दिया. वो निकलने को ही था कि उसने मार्क को शिरीन के अपार्टमेंट से निकलते देखा. वो रुका और फिर मार्क को लेकर घर चल पड़ा.

डेविड: “यहां कैसे?”

मार्क: “आंटी से मिलने आया था.”

डेविड: “तो मिल लिए?”

मार्क: “यस. आज गांड भी मारने को मिली. बहुत मजा आया. तुम शिरीन के साथ कैसे?”

डेविड: “मैंने उसे अपनी गर्लफ्रेंड बना लिया है. अच्छी लगती है वो मुझे.”

मार्क: “इसके आगे भी कुछ?”

डेविड: “अभी नहीं कह सकता, पर सम्भव है.”

मार्क: “गुड लक, ब्रो! पर मैं आंटी को चोदता रहूं तो तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं होगी?”

डेविड: “नहीं, बल्कि मैं भी उसकी चुदाई करता रहूंगा. शिरीन को भी इसमें कोई आपत्ति नहीं.”

मार्क: “वाओ, यू फाउंड ए नाइस गर्लफ्रेंड.”

डेविड: “यस.”

और कुछ देर में वे घर पहुँच गए. शैली और ऐलिस शॉपिंग करने गई थीं और जैसा उनका अनुमान था वे आठ बजने के पहले आने वाली नहीं थीं. दोनों घर में प्रवेश कर गए.

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मिशेल का घर:

ईव के कहने पर अभी लोग अंदर कमरे में आ चुके थे. मिशेल और ईव उसी प्रकार से व्यस्त थे. इस बार बोरिस मिशेल की चूत चाट रहा था और मार्टिन अपने लंड से उसके मुंह को चोद रहा था. ईव लेटी हुई थी और डॉन उसकी चूत की सेवा में लगा हुआ था और रिकी ने उसके मुंह में अपना लंड पेला हुआ था. डॉन अब और रुकना नहीं चाहता था. उसने अपने लंड को ईव की चूत पर रखा और हल्के दबाव के साथ अंदर डालना आरम्भ किया. ईव रिकी में लंड को चूसते हुए रुक गई और अपनी चूत में जाते हुए उस मोटे बेलन समान लौड़े का आभास कर रही थी.

डॉन ने इस बार बहुत संयम से काम लिया और जल्दी न करते हुए अपने लंड को अंदर पेलने में अधिकतम समय लिया. एक बार पूरे लौड़े को अंदर डालने पर वो रुका. ईव को ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसकी चूत पूरी भरी हुई है. उसने चूत को कुछ सिकोड़ने का प्रयास किया पर लंड इतना मोटा था कि ये सम्भव न हो पाया.

डॉन: “हैलो, ब्यूटीफुल, कैसा लग रहा है?” डॉन ने उसके उत्तर की प्रतीक्षा नहीं ही. अपने लंड को वो सधी हुई ताल से ईव की चूत में चलाने लगा.

ईव: “उँह उँह” रिकी के लंड को बाहर निकाले बिना ही ईव ने मानो अपनी सहमति दिखाई.

रिकी के लंड पर उसका मुंह दोबारा उसी गति से चलने लगा, पर अब उसका ध्यान अपनी चूत में चल रही गतिविधि पर केंद्रित था. डॉन का मोटा और लम्बा लंड उसकी चूत की उन गहराइयों को नाप रहा था जिन्हें अब तक किसी ने छुआ भी नहीं था. पसीजती हुई चूत डॉन के लंड का भरपूर स्वागत कर रही थी. बोरिस ने भी अपने तगड़े लंड से मिशेल की चुदाई आरम्भ कर दी थी. पर उसने डॉन के समान संयम नहीं दिखाया और तेज और करारी चुदाई करने लगा. मिशेल को कुछ असहजता के बाद इसमें भी आनंद आने लगा था जिसका लाभ मार्टिन को मिला जिसके लंड को मिशेल किसी पिस्टन के समान चूस रही थी.

तेज चुदाई के कारण ये आसन कुछ कठिनाई दे रहा था इसीलिए मिशेल के सुझाव पर मार्टिन लेट गया और मिशेल उसके लंड को घोड़ी के आसन में चूसने लगी. बोरिस ने अपने लंड को मिशेल की चूत में दोबारा रौंद दिया और अपनी तीव्र चुदाई चालू कर दी. इस आसन में बोरिस का लंड कुछ अधिक सट के जा रहा था और मिशेल को भी अधिक आनंद मिल रहा था. एक तेज चीख सुनकर मिशेल का ध्यान उस ओर गया. चीख ईव की थी जिसे अब डॉन ने अपने पूरे लंड की लम्बाई से तीव्रता से चोदना आरम्भ किया था. असामान्य रूप से बड़े लंड की इस द्रुत गति से ईव की चूत दया की भीख मांग रही थी, जिसे देने के लिए अब डॉन कतई बाध्य नहीं था.

रिकी ने उसकी चीखों को दबाने के लिए ईव के सिर को अपने लंड पर मजबूती से पकड़ लिया. चाहे ईव की चीखें निकल रही थीं, पर उसे अब इसमें कुछ कुछ आनंद भी आने लगा था. और बिना अधिक समय गंवाए हुए उसकी चूत पानी से अपने रास्ते को सींचकर डॉन के लंड के लिए सरल कर रही थी.

बोरिस: “शी इस लविंग हिस बिग कॉक.”

मार्टिन: “यस. पर जब डॉन उसकी गांड में डालेगा तो उसकी चीखें दबाना सम्भव नहीं होगा.”

दोनों इस बात पर हंसने लगे. मिशेल की गांड में सुरसुरी होने लगी. इनमे से उसकी गांड कौन मारेगा?ये सोचकर उसकी चूत फिर से पानी छोड़ने लगी.

मार्टिन : “बोरिस , क्यों न हम स्थान बदलें, मुझे भी कुछ चुदाई करने दो.”

बोरिस: “क्यों नहीं.“

ये कहकर उसने अपने लंड को मिशेल की चूत से निकाला और मार्टिन मिशेल से अलग होकर उसके पीछे गया. बोरिस लेट गया और मिशेल ने निसंकोच अपनी चूत के रस से भीगा हुआ उसका लंड अपने मुंह में भर लिया. मार्टिन बहुत देर से प्रतीक्षा में था तो उसने एक ही बार में अपने लंड को मिशेल की चूत में पेलते हुए निर्विरोध द्रुत गति से धक्के मरने आरम्भ कर दिया. न जाने क्या सोचकर रिकी ने अपना लंड ईव के मुंह से निकाल लिया. अब ईव की चीखों को दबाने वाला कोई न था और तलघर के विशाल प्रकोष्ठ में उसकी चीखें गूंज रही थीं. डॉन को इन चीखों के कारण और भी जोश आ रहा था और वो ईव की और तेज चुदाई करने लगा.

ईव की चीखें फिर बंद हो गयीं और केवल हल्की सिसकारियां ही सुनाई दे रही थीं. वो कुछ निढाल पड़ रही थी, पर डॉन मोटे लम्बे काले लंड की छाया में ईव का सुंदर श्वेत वर्ण अब दूषित सा हुआ प्रतीत हो रहा था. रिकी ने अपने मुंह में ऊँगली डालकर ईव के उभरे हुए पिछवाड़े को सहलाते हुए अपनी ऊँगली उसकी गांड में डाल दी. ईव की एक आनंदमयी चीख ने इस बार भूतल को दहला ही दिया. उसकी चूत ने ढेर सारा रस छोड़ा और वो बिस्तर पर औंधें मुंह गिर पड़ी.

डॉन ने अपने लंड को बाहर निकाला और ईव के सिर को उठाकर उसके मुंह में पेल दिया. ईव बेसुध सी थी पर उसे ये ज्ञात था की उससे क्या अपेक्षा है. उसने अपने रस को डॉन के लंड से चाटकर डॉन के लंड को चूसना आरम्भ किया. डॉन उसकी चूत में नहीं झड़ना चाहता था, इसीलिए उसने ईव के मुंह में अपने रस को छोड़ने का निश्चय किया था. कुछ ही क्षणों की देरी के बाद ईव को अपने मुंह में एक अविरल धार का बहाव अनुभव हुआ. वो इस समय कुछ भी और करने की स्थिति में तो थी नहीं, तो उसने उस कामरस को पीने में ही अपनी भलाई समझी. जब डॉन की पहली धार उसके मुंह में छूटी तो उसने अपनी चूत को फिर से भरता हुआ पाया. इस बार रिकी ने अपना लंड पेल दिया था और दनादन धक्के लगा रहा था.

डॉन के लंड का पूरा रस पीने के बाद डॉन ने अपना लंड निकाला और बाहर जाकर अपने लिए एक बियर ले आया और कमरे में चल रहे व्यभिचार को देखने लगा. ईव पर रिकी चढ़ा हुआ था. और मिशेल पर इस समय मार्टिन. देखने से लग रहा था कि मार्टिन भी अब अपने चरम पर पहुँचने के निकट था.

डॉन ने कुछ ऊँचे स्वर में कहा: “उसकी चूत में मत झड़ना.”

मार्टिन धक्के लगते हुआ अचानक रुका और फिर डॉन की ओर देखकर सिर हिलाकर हामी भरी और फिर चुदाई में व्यस्त हो गया. मिशेल भी अब तक एक बार जड़ चुकी थी पर उसे पता था कि ये केवल आरम्भ है. ये चारों चुड़क्कड़ उन्हें एक मिनट का भी विश्राम नहीं लेने देंगे. पर उसे इसमें कोई आपत्ति नहीं थी. वो इस सम्भोग का पूर्ण आनंद ले रही थी. उसे मार्टिन के लंड का चूत बाहर निकलने का आभास हुआ और साथ ही बोरिस को उसके मुंह से लंड निकालने का. अब उसे मार्टिन के रस को पीने का भी सुख मिलने वाला था. मार्टिन ने उसे अधिक प्रतीक्षा नहीं कराई और बोरिस के हटने और मार्टिन के उसके मुंह में लंड जड़ने में बहुत अंतराल नहीं हुआ.

अपनी चूत के रस की गंध से नहाये हुए काले लंड को उसने बड़े प्रेम से चाटा और मुंह में लिया. मार्टिन ने भी लंड अंदर जाते ही उसके मुंह में धार छोड़ दी. बोरिस ने अपने लंड को मिशेल की चूत में फिर डाला और चोदने लगा. पर अब बोरिस और रिकी भी झड़ने के निकट थे तो दोनों ने अपने लंड निकाले और मिशेल और ईव के मुंह को सौंप दिए. अपने रस को उन दोनों को प्रदान करने के बाद वे हट गए. अब तक मार्टिन सबके लिए बियर की ठंडी बोतलें ले आया था.

मार्टिन और डॉन दोनों एक ओर खड़े होकर रिकी और बोरिस के खेल समाप्ति को देख रहे थे. झड़ने के बाद रिकी और बोरिस भी अपनी बियर लेकर घूंट लेने लगे. मिशेल और ईव दोनों अभी उठने की अवस्था में नहीं थीं. और दस मिनट अपने रौंदे हुए शरीर को विश्राम देने के बाद वे भी बैठ गयीं. मार्टिन ने उन दोनों को बियर थमाई.

“दॅट वास सम ग्रेट फकिंग.” ईव ने कहा.

“होप यू लाइकड इट.” मार्टिन ने कहा.

“लव्ड इट, कान्ट वेट फॉर मोर.” ईव हंसकर बोली.

“यू विल गेट मोर, मच मोर.” मार्टिन के स्वर ने ईव के शरीर में सिहरन दौड़ा दी. उसने मिशेल की ओर देखा तो उसे मिशेल प्रतिक्रिया से भी वही भावना दिखी.

ईव: “ओके, लेट अस सी.”

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चार बज चुके थे. कुछ देर और बातें करने के बाद अगले चरण के लिए सबके मन उत्सुक हो उठे. इस बार रिकी ने मिशेल की और बढ़कर उसे अपनी बाँहों में ले लिया. बोरिस ने डॉन का साथ दिया और ईव को आगे और पीछे से पकड़ लिया. बोरिस और डॉन के मध्य आँखों से सांकेतिक समझौता हुआ. उधर मिशेल अब दोनों लौड़े चूस रही थी. डॉन ने ईव को बैठकर उन दोनों के लंड चूसने के लिए कहा जिसे ईव ने सहर्ष स्वीकार किया. दोनों स्त्रियां लंड चूसकर उन्ही शक्ति और कड़ाई दोबारा स्थापित करने लगीं. इसमें अधिक समय भी नहीं लगा.

डॉन और मार्टिन बिस्तर पर लेट गए और ईव और मिशेल ने उनके ऊपर चढ़ते हुए अपनी चूत में उनके लंड ले लिए. दोनों एक ही साथ लौडों पर उछलकूद करने लगीं. जब दोनों ने एक ताल स्थापित कर ली तो बोरिस ने टेबल पर पड़ी जैल की ट्यूब ली और उसने ईव की गांड में ऊँगली से पर्याप्त मात्रा में लगाई. अपने लंड पर मलने के बाद उसने ट्यूब रिकी की ओर फेंकी जिसे रिकी ने पकड़कर मिशेल की गांड और अपने लंड पर वही उपक्रम दोहराया.

ईव और मिशेल को ज्ञात था कि ये चरण उनके लिए सबसे कष्टदाई हो सकता ही, परन्तु आनंद की एक ऐसी ऊंचाई भी मिलेगी जिसका वर्णन सम्भव नहीं है.वैसे भी ये दोनों इस सुख को अपने परिवार के पुरुषों एवं यदा कदा अन्यत्र भी भोगती थीं परन्तु जो लंड आज उन्हें मिले थे उनकी उपमा नहीं थी. अपनी गांड में चलती हुई ऊँगली से दोनों को आने वाले प्रचंड प्रहार का आभास हो चला था. दोनों ने अपनी उछलकूद की गति कम की और फिर आगे झुकते हुए रोक दी. रिकी और बोरिस को इससे अधिक आमंत्रण की आवश्यकता नहीं थी.

बोरिस ने बिस्तर पर चढ़कर अपने लंड के टोपे को ईव की गांड पर रखा और हल्के से अंदर डाल दिया. ईव की गांड स्वतः खुली और उसने बोरिस का लंड निगल लिया. हल्के धक्कों के साथ बोरिस ने अपने लंड की पूरी लम्बाई को ईव की गांड की गहराई में बैठा दिया. यही कार्य मिशेल की गांड में रिकी करके ठहरा हुआ था. इसके बाद चारों आदमी अपनी एक ताल में दोनों स्त्रियों की चूत और गांड में अपने लंड चलाने लगे. धीमी गति से मध्यम और मध्यम से तीव्र होते हुए उनके शरीर एक ऐसी भीषण गति को प्राप्त किये कि उनके बीच की दोनों महिलाएं केवल चीखने के सिवाय कुछ और करने में समर्थ थीं.

कुछ देर की इस कुत्सित चुदाई के उपरांत दोनों और गहरे और तेजी से चोदने की गुहार लगाने लगीं. कुछ देर इसी प्रकार से चोदने के पश्चात रिकी और बोरिस ने अपने स्थान बदले और रिकी अब ईव की गांड और बोरिस मिशेल की गांड में लंड पेलने लगा. गति न थमी न कम हुई. चीत्कारें बढ़ते हुए सीत्कारों में परिवर्तिति हो चली थीं. कुछ समय की चुदाई के बाद, बोरिस और रिकी ने अपने लंड निकाले और वो एक दूसरे बिस्तर पर जा लेटे। संकेत समझ कर मिशेल ने रिकी के लंड पर चढ़ाई की और ईव ने बोरिस के लंड पर. डॉन दोनों उछलती हुई गाँडों को देख रहा था और सोच रहा था कि किसकी ली जाये. अंत में उसने ईव को ये सुख देना ही उचित समझा. आखिर पिछली बार वही वंचित रही थी.

डॉन को उस और बढ़ता देख मार्टिन को मिशेल की गांड पर अपना ध्यान लगाना पड़ा. उसने अपने लंड को पकड़ा और मिशेल की उछलकूद को रोकते हुए अपने लौड़े को गांड के खुले छेद पर लगाया और एक दमदार झटके से मिशेल की गांड में पेल दिया. मिशेल ने आनंद भरी सिसकारी ली और अब फिर से दो लौडों के बीच में पिसने लगी. आनंद ही आनंद था कि इतने में एक भीषण चीख ने उसकी तंद्रा भंग कर दी. देखने पर जान पड़ा कि डॉन ने भी अपने पूरे लौड़े को एक ही बार में ईव की गांड में पेल दिया था. मिशेल को ईव पर दया तो आयी पर वो कुछ करने में असमर्थ थी. फिर उसे ध्यान आया कि जिस प्रकार ये अदला बदली कर रहे हैं तो उसकी गांड में अगला लंड डॉन का ही होने वाला है. डर और रोमांच से उसका शरीर सिहर उठा.

मार्टिन और रिकी जहां मिशेल की गांड और चूत की दुर्दशा करने में जुटे थे, ईव को एक असीम पीड़ा और आनंद के समावेश का आभास हो रहा था. उसका मस्तिष्क पीड़ा और आनंद के बीच में व्यथित था. उसकी इन्द्रियां ये निर्णय नहीं कर पा रही थीं कि उसका आनंद अधिक था या पीड़ा. दो विशाल लौडों से चूत और गांड का सत्यानाश हो रहा था और उसका शरीर और मन असीम ऊंचाइयों को छूकर नीचे आता और फिर ऊपर चला जाता. डॉन उस पर किसी प्रकार की दया नहीं कर रहा था.

न ही उसके नीचे से चूत चोदता हुआ बोरिस. फिर उसे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे उसकी गांड में कुछ ठंडी हवा का प्रवेश हुआ हो. डॉन ने अपना लंड निकाल लिया था. पर अधिक देर न हुई कि उसकी गांड का छेद फिर से बंद हो गया और उसकी गांड में इस बार मार्टिन के लंड ने अपना स्थान ले लिया. मिशेल को भी अपनी गांड के खाली होते ही ये ज्ञात हो गया कि अब उसकी असली परीक्षा की घड़ी आ चुकी है. उसने अपनी गांड को ढीला करने का प्रयास किया. तीन लौडों से फ़टी गांड में अब वो लचक नहीं थी. और इसका पूरा लाभ उठाकर डॉन ने उसकी गांड में निर्ममता से अपने पूरे लौड़े को पेल दिया. इस बार दुर्दांत चीखें मिशेल की थीं. और रिकी और डॉन एक समन्वय में तीव्र गति से उसकी चूत और गांड को पेल रहे थे.

समय अधिक हो चला था. चारों पुरुष अपनी क्षमता के अनुसार चुदाई कर चुके थे. मार्टिन और डॉन ने अपने रस को गांड में ही छोड़ दिया. और हटकर एक ओर हो गए. बोरिस और रिकी ने ईव और मिशेल को नीचे करते हुए तेज गति से उनकी चूत की धज्जियां उड़ाने का प्रयास किया. पर वे सफल न हुए और डॉन की आज्ञा को ध्यान रखते हुए झड़ने के निकट पहुँचने पर दोनों ने अपना रस ईव और मिशेल के मुंह में ही विसर्जित कर दिया.

मिशेल और ईव अब बेसुध सी टाँगे फैलाये पड़ी थीं. दोनों के मुंह और गांड से वीर्य बह रहा था. मार्टिन ने डॉन को देखते हुए बियर लाने का निश्चय किया. इस बार मिशेल और ईव को बीस मिनट बाद चेतना लौटी. दोनों ने अपने आप को किसी प्रकार से खड़ा किया और लड़खड़ाते हुए बाथरूम में चली गयीं. पंद्रह मिनट बाद दोनों बाहर आयीं और बियर लेकर पीने लगीं.

मिशेल: “आशा से अधिक आनंद आया. आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद. पर शरीर अब टूट सा रहा है.”

ईव ने भी सहमति में सिर हिलाया. कुछ देर और रुकने के बाद चारों अतिथियों ने अपने वस्त्र धारण किया और मिशेल उन्हें घर के बाहर तक छोड़ आयी. लौटने पर दोनों ताल में कुछ देर तक बैठीं और फिर पोछते हुए कपड़े पहन लिए. जैसे ही वे ऊपर की ओर पहुंची, तो मार्क और डेविड घर में प्रवेश कर रहे थे.

दोनों ने लगभग एक साथ ही कहा, “हाय मॉम”

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होटल में:

रिचर्ड और जैसन इस समय निशा के अनुभवी और दक्ष मुंह द्वारा दिए जा रहे मौखिक सम्भोग का सुख उठा रहे थे. रह रह कर उन्हें घर पर उनकी पत्नियों के द्वारा चार अफ़्रीकी पुरुषों से चुदाई का ध्यान आता और उनके लंड कुछ और तन जाते. निशा ने उनसे अभी तक कुछ कहा नहीं था परन्तु ये विदित था कि वो भी अब इसके आगे कुछ चाहती थी. जैसन ने मौन तोड़ा।

जैसन: “निशा, क्यों न अब हम दोनों को भी तुम्हारी सेवा का अवसर दो? तुम्हारी चूत और गांड भी तो कुछ ध्यान चाहने लगी होगीं.”

निशा ने अपने थूक से लथपथ मुंह को उनके लंड से अलग किया.

निशा: “मुझे प्रसन्नता हुई कि आप मेरे बारे में भी सोच रहे है. और मैं आपसे सहमत हूँ.”

जैसन: “तो चलो बिस्तर पर लेटो, मैं और रिचर्ड तुम्हे दोहरे मुख मैथुन का आनंद देने के इच्छुक है.”

निशा जाकर बिस्तर पर लेटी तो जैसन ने उसे एक करवट कर दिया। इसके बाद रिचर्ड और जैसन उसके साथ उलटी दिशा में ले गये. रिचर्ड के सामने निशा की चूत थी तो जैसन को उसकी गांड अपने आगे दिख रही थी. जीजा साले अपने अपने छेदों पर नियुक्त हो गए और निशा के दोनों छिद्रों को अपने मुंह और जीभ से चाटने लगे. हालाँकि निशा दुहरे सम्भोग की आदी थी और दो लौंड़ों से चुदवाने में विशेषज्ञ, परन्तु इस आसन में उसे कभी भी किसी ने भी प्रेम नहीं किया था. और इसीलिए उसे इसमें असीम आनंद की अनुभूति हो रही थी.

रिचर्ड और जैसन अपने कार्य में पारंगत थे और उनकी थिरकती हुई जीभों का निशा की चूत और गांड खुल कर स्वागत कर रही थीं. अपने मुंह के सामने रिचर्ड के तने हुए लंड को देखकर निशा से रहा नहीं गया और उसने उसे अपने मुंह में लेकर चूसना आरम्भ कर दिया. उसने अपने ऊपर वाले हाथ से जैसन के लंड को ढूंढा और उसे अपनी मुट्ठी में लेकर सहलाने लगी. दोनों लौड़े इस समय पूरे तनाव में थे और निशा को सांत्वना मिली कि वे दोनों ही उसे रगड़कर चोदने की क्षमता रखते हैं.

चूत और गांड जब भली भांति गीली हो चुकी तो जैसन ने अपनी जीभ को निकाला और फिर अपना आसन बदला. अब वो निशा के पीछे उसकी ही दिशा में था. अपने लंड पर थूक लगाने के बाद लंड को निशा की गांड पर रखा और अंदर डाल दिया. निशा मानो आनंद से दूभर हो गई. पहले गांड मारने वाले कम ही होते थे. अधिकतर पहले उसकी चूत का आनंद लेने के पश्चात् ही लोग उसकी गांड मारते थे. यही नहीं, इस समय भी रिचर्ड की जीभ उसकी चूत में अठखेलियां कर रही थीं. अब जब उसका ऊपर वाला हाथ स्वतंत्र था तो उसने रिचर्ड के सिर को अपनी चूत में दबा लिया. रिचर्ड ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और उसकी चूत को चाटने में व्यस्त रहा.

जैसन के लंड की बढ़ती गति ने उसकी गांड में थिरकन की हुई थी. उसने रिचर्ड के सिर को छोड़ा और उसके लंड को भी अपने मुंह से निकाला। रिचर्ड के लिए ये संकेत था कि अब वो भी चढ़ाई कर सकता था. रिचर्ड ने भी अपने शरीर को सही दिशा में मोड़ा और अपने लंड को चूत में लगाकर अंदर कर दिया. निशा की पहली चुदाई ही दोनों ने डबल कर दी. और निशा जैसी घनघोर चुदक्क्ड़ स्त्री को और क्या इच्छा हो सकती है. आनंद से उसके मुंह से सिसकारियां ही निकल रही थीं. देखने वाली बात ये थी कि कब ये जीजा साला उसे चीखने के लिए बाध्य करेंगे. पर उसे विश्वास था कि इसमें अधिक समय नहीं लेंगे.

परन्तु चुदाई का ये आसन सरल नहीं था. रिचर्ड और जैसन के घुटने एक दूसरे से लड़ रहे थे जिसके कारण चुदाई की लय ठीक नहीं बन पा रही थी. इस समस्या को भांपते हुए निशा ने ही स्वयं आसन बदलने का सुझाव दिया. जैसन ने अपना लंड निकाला और रिचर्ड ने निशा को अपने ऊपर रखते हुए एक करवट ली. अब वो नीचे था और निशा उसके लंड पर चढ़ी हुई थी. जैसन ने पीछे जाकर अपने लंड को फिर से निशा की गांड में पेल दिया. डबल चुदाई का वैसे भी ये सबसे प्रचलित और प्रभावी आसन है और तीनों इससे परिचित थे. निशा रिचर्ड के लंड पर लम्बी छलाँगे लगाने लगी पर जैसन ने उसे थामे हुए अपने लंड से उसकी गांड का मंथन करने लगा.

जैसन ने निशा की पीठ पर हाथ रखकर उसे धीमा किया और इसके बाद वो और रिचर्ड अपनी स्वाभाविक गति से निशा की डबल चुदाई करने लगे. निशा का स्वयं से प्रश्न कि चीखें कब निकलेंगी का उत्तर शीघ्र ही मिल गया. अगर उनके अगल बगल के कमरों में कोई था तो उसे अवश्य ही इन चीखों की ध्वनि सुनाई दी होगी. पर इन तीनों को इससे कोई भी संबंध नहीं था. तीनों अपनी शरीर की भूख के आगे कुछ भी देख सुन नहीं पा रहे थे. वैसे भी जैसे आज उनकी पत्नियों की चुदाई हो रही थी, घर पर कुछ शांति मिलने का कम ही अवसर था. उनकी बेटियां अवश्य उबलब्ध थीं परन्तु उनके बेटों को वो प्यासा और अकेला नहीं छोड़ सकते थे.

तेजी से चूत और गांड को भेदते हुए लौडों के बीच में पिसती हुई निशा आनंद की सीमा पार कर चुकी थी. उसकी चीखें और उन दोनों से और तेज और गहरी चुदाई की विनती रिचर्ड और जैसन को भी और शक्तिशाली और गहरी चुदाई के लिए प्रेरित कर रही थीं. जैसन ने रिचर्ड को देखा तो रिचर्ड की आँखों में उसे गांड मारने की इच्छा दिखी. उसने अपने लंड को निशा की गांड में से निकाला और उसके मुंह में डाल दिया. निशा बिना चिंतन के कि ये लंड अभी उसकी गांड की गहराइयों में से निकला है उसे पूरी तन्मयता से चूसने लगी. रिचर्ड निशा के नीचे से हटा और अपने लंड को उसकी आँखों के सामने लहराया. निशा ने उसे भी चाटने में देरी नहीं की.

इस बार जैसन लेट गया और उसने निशा को अपने ऊपर करते हुए उसकी चूत में लंड पेला। एक बार आसन स्थापित होने के बाद रिचर्ड ने इस बार गांड में लंड पेल दिया और जीजा साला एक बार फिर से द्रुत गति से निशा की चुदाई करने लगे. निशा कुछ ही देर में फिर से चिल्ला चिल्ला कर उन्हें उसकी चूत और गांड फाड़ने के लिए उत्साहित कर रही थी. दस मिनट की भीषण गांड फाड़ चुदाई के बाद रिचर्ड ने अपना पानी निशा की गांड में छोड़ दिया. उसने झड़ने के बाद अपने लंड को बाहर निकाला और कुर्सी पर बैठकर सुस्ताने लगा. जैसन ने निशा को पलटकर नीचे किया और उसके ऊपर आकर लम्बे गहरे धक्कों के साथ उसे कुछ देर और चोदा।

जैसन: “कहाँ छोडूं?”

निशा: “मुंह में.”

जैसन ने कुछ और धक्के मैरे और अपना लंड निशा के मुंह की ओर किया ही था कि उसके लंड से धार निकलने लगी जिसने निशा के चेहरे और मुंह पर वीर्य की एक चिपचिपाती पार्ट बना दी. पूरा झड़ने के बाद निशा ने अपनी उँगलियों से उसे इकठ्ठा किया और अपने मुंह में डालकर पी लिया. तीनों कुछ देर बाद बैठे हुए बातें करते रहे. फिर रिचर्ड ने जाने की इच्छा की तो निशा ने उसे बताया कि उनके मित्रों के लिए जो आयोजन किया है, उसकी वो चाहें तो वीडियो बनाई जा सकती है, परन्तु ये केवल उनके देखने के लिए ही होगी. रिचर्ड ने स्वीकृति दी और फिर सबने अपने आपको बाथरूम में जाकर साफ किया और कपड़े पहनकर निकल गए.

****************

मिशेल के घर:

जब रिचर्ड और जैसन घर पहुंचे तो देखा कि शैली और ऐलिस अभी भी आयी नहीं थीं. मार्क और डेविड कोई वीडियो गेम खेल रहे थे और मिशेल और ईव रसोई में थी. रिचर्ड ने जाकर मिशेल को चुंबन दिया और जैसन ने ईव को. फिर रिचर्ड ने ईव को और जैसन ने मिशेल को चूमा.

“हाउ वास योर डे.”

‘फन.”

“ओके, हम अपने लिए ड्रिंक बना रहे हैं, तुम दोनों कुछ लोगी?” रिचर्ड ने पूछा.

“वाइन। पर आप लो, हमें कुछ समय लगेगा. हम आती हैं.”

रिचर्ड और जैसन ने अपने लिए लम्बे पेग बनाये और मार्क और डेविड के पास बैठ गए. मार्क और डेविड ने कुछ देर में अपने गेम को रोका और फिर अपने पिता को हेलो कहा. मार्क ने बियर पीने की इच्छा की तो जैसन ने अनुमति दे दी. डेविड ने रिचर्ड को देखा तो उसने भी हामी दे दी. बियर लेकर दोनों आये और अपने दिन के बारे में बताया. रिचर्ड और जैसन ने अपने दिन के बारे में कुछ अधिक नहीं कहा. मिशेल और ईव अपने वाइन के ग्लास के साथ आकर बैठी ही थीं कि मार्क पूछ बैठा.

“हम नीचे कब चलेंगे?”

मिशेल ने उत्तर दिया: “आज नहीं.”

मार्क का मुंह उत्तर गया.

जैसन ने कहा, “हम अपनी पत्नियों के साथ ही रहना चाहेंगे आज. तुम बच्चे इंजॉय करो.”

डेविड: “हम म्यूजिक बजा सकते हैं.”

रिचर्ड: “बिल्कुल , पर अधिक ऊँचा मत करना कि पूरे घर में हल्ला हो.”

डेविड: “ओके, डैड.”

कुछ देर में ऐलिस और शैली ढेर सारे शॉपिंग के थैले लेकर अंदर आयीं.

“कुछ छोड़ा कि नहीं दुकानों में?” डेविड ने छेड़ते हुए कहा.

“नहीं. और अब बकवास बंद कर.”

मिशेल: “कूल इट गर्ल्स.”

शैली: “सॉरी मॉम. सॉरी ब्रो, थक गए चलते चलते इसीलिए थोड़ा गुस्सा आ गया.”

डेविड: “नो प्रॉब्लम. तुम दोनों बैठो, मैं तुम्हें ठंडी बियर पिलाता हूँ.”

शैली: “थैंक्स ब्रो, वी नीड इट। “

डेविड ने दोनों को बियर लेकर दी और फिर बताया कि आज उनके माँ बाप खेल में नहीं रहेंगे और वे म्यूजिक सुन सकते हैं.

“लवली. खाने के बाद चलते हैं.”

बच्चों की उत्सुकता देखकर उनके माँ बाप हंसने लगे. और कुछ देर में खाने के लिए बैठ गए.

****************

खाने के बाद बच्चे खेलने के लिए नीचे के तरणताल में चले गए और चारों बड़े वहीं बैठे बातें करते रहे. मिशेल और ईव ने अपनी चुदाई की कथा बताई तो रिचर्ड और जैसन ने उनकी. इस सबसे चारों उत्तजित तो हुए पर आज कुछ भी करने की शक्ति किसी में न थी. ऐसा न था कि रिचर्ड और जैसन चुदाई नहीं कर सकते थे, परन्तु वे रिचर्ड का ध्यान रह रह कर निशा की बातों पर जा रहा था. उसके अनुमान से वो विवाहित थी. तो क्या उसका पति उसके क्रिया कलापों के बारे में जानता था? कहीं वे किसी अन्य कठिनाई में तो नहीं पड़ जायेंगे? यही बातें उसे व्यथित कर रही थीं.

जब उसने अपनी चिंता तीनों को बताई तो मिशेल ने पहले निशा से बात करके सब साफ करने के लिए कहा. आकाश और आकार पटेल से भी इस विषय में सुझाव लेने में कोई समस्या नहीं थी. कल बात करने का निश्चय किया गया. कुछ और देर बैठने के बाद दोनों जोड़े अपने कमरों में चले गए. जाते हुए उन्हें तलघर से संगीत सुनाई दिया परन्तु उसका अधिक ऊँचा न होने के कारण उन्हें कोई समस्या नहीं थी.
 
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तलघर में चारों युवा इस समय नंगे नहा रहे थे. उन्होनें अपना प्रिय संगीत चला रखा था और चारों उसका भी आनंद ले रहे थे. मार्क और डेविड ऊपर से कई सारी बियर की बोतलें ले आये थे और इस समय सब बियर, संगीत और स्नान का आनंद ले रहे थे. शैली पहले ताल से बाहर आयी और फिर अपने आपको पोंछने के बाद संगीत कुछ तेज किया और नंगी ही उसकी ताल पर थिरकने लगी. उसे देख अन्य तीन भी शीघ्र बाहर निकले और उसके साथ नाचने में व्यस्त हो गए. शैली डेविड की बाँहों में समाकर नाचने लगी तो ऐलिस ने मार्क का साथ किया. यूँ नाचते हुए एक दूसरे के चुंबन भी लेने लगे और जब उनसे रहा नहीं गया तो कमरे की ओर चल पड़े. 69 के आसन में दोनों भाई बहन की जोड़ियाँ एक दूसरे को संतुष्ट करने में जुट गयीं.

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भाई बहन के प्रेम का दृश्य मनमोहक तो था ही, अपितु रोमांचित और उत्तेजित करने वाला भी था. हालाँकि कमरे में चार थे परन्तु इस समय प्रेमी जोड़े केवल अपने साथी के ही विषय में सोच रहे थे. चूत में चलती सरपट जीभ का उत्तर लौड़े पर चल रही जीभ उसी लय में दे रही थी. चूत की चाशनी को पीते हुए अपने लंड के स्वाद को चखाने का आनंद ही अलग था. अब परिस्थिति ये थी कि लड़के ऊपर से अपने लंड अपनी बहनों के मुंह में डाले हुए थे और अपने नीचे फैली हुई चूत का सेवन कर रहे थे. डेविड ने शैली को ऊपर आने के लिए कहा. शैली ने बिना किसी संकोच पलटते हुए उसके लंड को मुंह में ले लिया.

अब डेविड के मुंह के आगे शैली की टपकती हुई चूत थी. उसकी जीभ ने आगे बढ़कर स्वयं को शैली की चूत में डाला और फिर एक ऊँगली से उसे भेदने लगा. शैली की बढ़ती हुई चूसने की गति ने उसे बता दिया कि उसे भी ये अच्छा लग रहा था. अपनी गीली ऊँगली को डेविड ने बाहर निकाला और शैली के गांड के छेद तो ढूंढकर उसके अंदर धीरे से सरका दिया. शैली ने मुंह से लंड निकालते हुए एक हल्की सी आह भरी और उसका शरीर कुछ कंपकपाया. फिर उसने अपना ध्यान डेविड के लंड पर केंद्रित कर दिया.

मार्क और ऐलिस एक दूसरे को चूम रहे थे. मार्क का खड़ा लौड़ा ऐलिस की चूत के ऊपर रगड़ खा रहा था और ऐलिस उसे चूमते हुए अपनी चूत में डालने का प्रयत्न कर रही थी. मार्क ने उसकी इस कठिनाई को दूर किया और अपने हाथ से लंड को ऐलिस की तपती चूत में डाल दिया. मार्क और ऐलिस एक दूसरे को चूमते हुए चुदाई में लीन हो गए. ये चुदाई शारीरिक नहीं बल्कि मन को मिलाने के लिए थी. दोनों किसी प्रकार की शीघ्रता में नहीं थे. मार्क एक मंथर गति से ऐलिस को चोद रहा था. दोनों एक दूसरे में तन मन से समाये हुए थे. शैली ने डेविड के लंड को मुंह से निकाला और अपने शरीर को ऊपर उठाकर डेविड के लंड के दोनों ओर पाँव किया।

उसकी ओर प्रेम से देखकर बोली, “मैं तेरा लंड अपनी गांड में ले रही हूँ. इस आसन में गांड मरवाने में बहुत आनंद मिलता है.”

डेविड: “यू नो, आई कैन फक योर आस एवरीडे.”

शैली: “यस, बट आई वांट इट ओनली सम डेस. लाइक टुडे.” ये कहते हुए शैली ने अपनी गांड में डेविड के लंड को बिठाया और हल्की गति से उस पर बैठती गयी. जब वो रुकी तो उसकी गांड में डेविड का लंड जड़ तक समाया हुआ था. उसने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा, “यू कैन फक मॉम इन हर आस व्हेन यू वांट, शी लव्स इट.”

डेविड: “आई नो. आई लव हर आस टू. पर अभी तुम्हारी गांड की बात चल रही है.”

शैली धीमी गति से डेविड के लंड को अपनी गांड से चोदने लगी. आगे झुकते हुए उसने डेविड के होंठ अपने होंठों से चूमे और डेविड ने अपने हाथों से उसके मम्मे मसले. दोनों एक दूसरे में खोये हुए थे. जैसे ये कोई साधारण जीवन का अंग हों. इसी प्रकार की चुदाई में दोनों जोड़े न जाने कितने समय तक एक दूसरे को आनंद देते रहे. कोई शीघ्रता या तीव्रता नहीं दिखा रहा था. ये प्रेम का बंधन था जिसमे शरीर केवल साधन थे. युवा तन एक दूसरे में समाये हुए कितनी ही देर तक एक ही आसन में चुदाई करते रहे. किसी ने कुछ भी बदलने के बारे में विचार भी नहीं किया. समय के साथ मार्क और डेविड झड़ने के निकट पहुँच ही गए.

डेविड का तो लौड़ा गांड में था तो उसे अपना रस वहां छोड़ने में कोई संकोच नहीं था. पर मार्क ऐलिस की चूत में नहीं झड़ना चाहता था. और इसीलिए उसने अपने लंड को बाहर निकालते हुए अपने रस को ऐलिस की चूत के ऊपर छोड़ा. ऐलिस ने अपने हाथों से उसे अपनी चूत और जांघों पर मला और मार्क को ऊपर खींचकर फिर से उसे चूमने लगी. शैली ने अपनी गांड से बहते हुए रस को बाथरूम में जाकर धोया और लौटकर डेविड की बाँहों में समा गयी. दोनों एक दूसरे को चूमते रहे. कुछ देर बार उठकर सबने एक बियर और ली और संगीत की धुन पर थिरकने लगे. रात में अभी और चुदाई शेष थी. प्रेम का दृश्य पूर्ण हो चूका था, अब वासना का क्रम था.

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रिसोर्ट में नववर्ष का समारोह:

अगले छह दिन कब निकल गए पता ही नहीं चला. इस बीच नई कंपनी का पंजीकरण किया गया जिसमे ईव को निदेशक रखा गया. जैसन के आग्रह पर मिशेल भी इसमें एक और निदेशक बनी. एंजिल का इंटरव्यू लेने के बाद ईव ने उसे नियुक्त कर लिया. पहले उसे जैसन और रिचर्ड उसके काम के बारे में ईव के साथ समझाने वाले थे. जैसन ने अपने ठहरने का समय दो सप्ताह आगे बढ़ा दिया था. उसके अन्य साथी अपने पूर्व निर्धारित समय के अनुसार ३० दिसंबर को अपने देश लौट गए. उन्होंने भी कई सारे नए अनुबंध किये थे, जिन पर उन्हें लौट कर काम करना था. जैसन के आगे स्थगित हुए कार्यक्रम के अनुसार भी कुछ कार्य उन्हें संभालने थे.

एंजेल ने २ जनवरी से काम पर आना था और उसके बाद घर के चारों बड़े व्यस्त होने वाले थे. मिशेल ने भी ईव के साथ काम सीखने का निश्चय किया था. रिचर्ड और जैसन भी कम्पनी में पार्टनर थे, परन्तु उनकी भूमिका केवल सलाहकार की ही थी. सम्पूर्ण अधिकार ईव और उसकी अनुपस्थिति में मिशेल के पास ही थे. हर रात नए नए समीकरणों और सम्मिश्रणों के कारण सबके तन और मन सेक्स की ओर से संतुष्ट थे. वैसे भी डेविड और मार्क शिरीन और एंजेल को भी बीच में चोद लेते थे.

नए वर्ष के लिए इस नए आयोजन के लिए सबने अपनी प्रसन्नता दर्शाई थी. हर वर्ष की एक जैसी समान पार्टियों से सब ऊब चुके थे. इस बार रिचर्ड के मित्र इवान स्टोन ने उन्हें एक विशिष्ट आयोजन में निमंत्रित किया था. रिचर्ड और इवान कॉलेज के दिनों से मित्र थे. परन्तु, इवान के दूसरे शहर में चले जाने के बाद उनका मेलजोल अब बहुत कम हो गया था. इवान और रिचर्ड को एक दूसरे के परिवार के बारे में लगभग हर बात पता थी.

मिशेल इवान और उसकी पत्नी हेलेन से मिली तो थी, परन्तु उन्हें वो इतने अंतरंग रूप से नहीं जानती थी जितना कि रिचर्ड. हेलेन भी रिचर्ड और इवान की ही कक्षा में थी, और जब रिचर्ड पढ़ाई के बाद अफ्रीका चला गया तो उनका संबंध टूट गया था. लौटने के उपरांत रिचर्ड ने जब इवान को ढूंढा तो उसने बताया कि उसने हेलेन से ही विवाह किया था. रिचर्ड को इसमें बहुत प्रसन्नता हुई थी. मिशेल और वो, इवान और हेलेन से मिलने उनके घर गए और विवाह के उपलक्ष में उन्हें अफ्रीका से लायी हुई हुई विशेष कलाकृतियां भेंट करी थीं.

शहर भिन्न होने के कारण अब मिलना कभी कभार ही होता था. परन्तु दोनों मित्रों ने अपने घर में जिस प्रकार का वातावरण है उससे एक दूसरे को परिचित करवा दिया था. हालाँकि वे कभी एक दूसरे के परिवार से इस प्रकार से अंतरंग नहीं हुए, पर उन्हें इस विषय में कोई खेद नहीं था. हेलेन के पिता की मृत्यु के बाद उसकी माँ अब उनके ही साथ रहती थी. उनके एक पुत्र था, फिलिप्स। एक बेटी भी थी, परन्तु उसकी अकाल मृत्यु ने हेलेन को झिंझोड़ दिया था. पिता और बाद में पुत्री की मृत्यु के पश्चात बहुत प्रयासों और मनोचिकित्स्कों के परामर्श और परिवार के अथाह प्रेम ने उसे जीवन को फिर से जीने का उत्साह दिया था.

इवान ने इस बार उन्हें इस विशिष्ट आयोजन में इसीलिए आमंत्रित किया था क्योंकि उसे लगता था कि अब उनके परिवारों के घनिष्ट होने का समय आ गया है. इस रिसोर्ट में वो सर्वोच्च पद पर था, और जिस प्रकार की गोपनीयता नव वर्ष की पार्टी के लिए रखी जाती थी वो अभूतपूर्व थी. रिसोर्ट एक किले की भांति सुरक्षित था और वहाँ पक्षी भी पर नहीं मार सकता था. इसकी नितांत आवश्यकता भी थी क्योंकि कुछ व्यक्ति जो यहाँ आते थे वे शहर, राज्य और कुछ देश के विख्यात लोगों में थे.

इवान की इन सब बातों से रिचर्ड ने अपने परिवार को अवगत कराया और उन्हें किसी भी मूल्य पर कभी भी वहाँ पर किससे मिले इसका उल्लेख नहीं करना है. अगर वो व्यक्ति कभी समाजिक परिपेक्ष में मिलें भी तो उन्हें अज्ञात समझकर ही बात करनी है. इवान के अनुसार इस नियम को विरोध उन्हें महंगा पड़ सकता है. इसी के साथ उसने ये भी बताया कि व्यवसाय हेतु सब एक दूसरे की सहायता करते हैं और उन्हें इससे लाभ मिलना सुनिश्चित था. घर के सभी लोगों ने गोपनीयता की शपथ ली और रिचर्ड ने इवान से उनके सम्मिलित होने की पुष्टि कर दी.

तीस दिसंबर प्रातः दोनों परिवारजन दो कारों में रिसोर्ट के लिए निकल पड़े.

बीच में एक बार रुकने के बाद वे सब साढ़े दस बजे रिसोर्ट को जाने वाली सड़क पर पहुंचे. ये मुख्य हाईवे से संबद्ध थी. उस सड़क पर कोई ५०० मीटर जाने पर एक बड़ा फाटक था जहां पर उनके पहचानपत्र और उनके आमंत्रणपत्र की जाँच की गयी. रिचर्ड का फोटो लेकर उसे अंदर से अनुमोदित किया गया और इस पूरे समय वे लोग कार में ही रहे. जाँच पूर्ण होने पर उनसे क्षमा मांगते हुए और उनका स्वागत करते हुए उन्हें रिसोर्ट के नियत स्थान पर पहुंचने के लिए आवश्यक निर्देश दिए गए. इसके साथ ही उन सबको एक नीले रंग का कड़ा (चूड़ीनुमा) पहनाया गया जिसे उन्हें पूरे समय पहने रहना था. इसके बाद दोनों कारें रिसोर्ट की ओर चल दीं.

रिसोर्ट उस फाटक से लगभग एक किमी अंदर था. पास पहुंचने पर उन्हें ऊँचे परकोटे से घिरा हुआ एक भवन का शीर्ष दिखाई दिया. उसके फाटक पर पहुँचने के बाद उनकी एक बार फिर से जाँच हुई. इसके बाद वो अंदर प्रवेश कर गए. अंदर जाने पर दो लड़कों ने आकर उनकी कार की चाबियाँ ले लीं और उन्हें पार्किंग टिकट दे दिए. जब वे अपना सामान निकालने को हुए तो लड़कों ने कहा कि वे इसका प्रबंध कर देंगे. आठों आगे बढ़कर स्वागतकक्ष में पहुंचे जहां उन्हें रिसोर्ट में पंजीकृत क्या गया और इस समय उन्हें जलपान भी कराया गया. उन्हें बताया गया कि इस समय बारह में से केवल तीन ही परिवार आये हैं परन्तु सांयकाल तक अन्य सबके आने का अनुमान है.

उन्हें चार कमरों के प्रवेश पत्र (card) दिए गए और एक सुंदर लड़की को उन्हें उनके कमरों में ले जाने के लिए नियुक्त किया गया. उनके एक कार्ड से सहायिका ने एक द्वार खोला और उन्हें आगे जाने के लिए कहा. सभी उस द्वार से अंदर चले गए. सहायिका उनके पीछे आयी. सभी सामने फैले रिसोर्ट को देख रहे थे जो बहुत ही संदर प्राकृतिक सौंदर्य से नहाया हुआ था.

“प्लीज, मेरे साथ आईये.” ये कहते हुए सहायिका उन्हें एक कमरे में ले गयी जो कि बाथरूम और स्नानागार थे. वहाँ पहुंचकर उसने अपने गाउन को उतारकर एक हँगर पर टांगा और उन सबसे भी अनुरोध किया कि वे भी अपने कपड़े उतारकर एक स्थान पर रख दें. उन्हें धोने के बाद उनके सामान में रख दिया जायेगा.

“इस स्थान के आगे किसी भी प्रकार के वस्त्र पहनने की अनुमति नहीं है. आज से १ जनवरी की दोपहर १२ बजे तक यही पोशाक रहेंगी. आपत्ति होने की स्थिति में उस व्यक्ति को इसके आगे नहीं ले जाया जा सकता है.”

किसी ने आपत्ति नहीं की और सभी अपने वस्त्र उतारकर दिए हुए डिब्बे में रख दिए. अब समस्या एक ही थी, कि मोबाइल फोन को ऐसे हाथ में रखना बहुत ही अटपटा था. परन्तु इसका समाधान एक छोटे से लटकने वाले बैग जिसमे केवल मोबाइल ही आ सकता था उन्हें दिया गया.

“आप मोबाइल के साथ अपने कमरे के बाहर नहीं निकाल सकते. इसीलिए आप इन्हें अपने कमरे में ही रखियेगा. इनके चार्जर आपको दे दिए जायँगे.”

सबने सहमति में सिर हिलाया. युवाओं को इसमें बड़ी समस्या दिख रही थी, पर अब तीर कमान से निकल चुका था. परन्तु गोपनीयता बनाये रखने के लिए इतनी सावधानी आवश्यक भी थी. वस्त्र निकालने के बाद सहायिका उन्हें उनके कमरों को ओर ले गयी, जो झोपडी नुमा थे. अपने कमरों में जाते हुए उन्होंने अन्य कुछ लोगों को भी घूमते देखा। सहायिका ने बताया कि रिसोर्ट के कर्मचारी एक लाल रंग का कड़ा पहने हुए हैं और उनके पास भी एक थैला है जिसमे आर्डर लेने ले लिए पेन और डायरी है. नीले रंग के कड़े पहने हुए भी तीन लोग दिखे पर उनके चेहरे नहीं दिख पाए.

कमरों के पास जाकर सहायिका ने उन्हें समझाया.

“आप के कमरे में आप चाहें तो फोन द्वारा कोई भी आर्डर दे सकते हैं. अगर आप बाहर हैं तो अपने जो कड़ा पहना है, उसे तीन बार थपथपाइयेगा तो आपके पास कोई आर्डर लेने हेतु आ जायेगा.”

उनके चेहरे पर आश्चर्य के भाव देखकर उसने समझाया कि उसमे एक छोटा सा ट्रांसमीटर है क्योंकि रिसोर्ट के बड़े होने के कारण कभी कुछ लोग यहाँ पर गुम हो गए थे उसके बाद ढूंढने में आसानी के लिए ऐसा किया गया था. उनके स्थान के सिवाय कोई और गतिविधि नहीं पता लगती, पर थपथप से कण्ट्रोल को पता चलता है और वो आर्डर के लिए किसी को भेज देते हैं. उसने रिचर्ड के कड़े पर तीन बार थपथप की. कुछ ही देर में एक कमरे का फोन बज उठा. इसके बाद वो चली गयी और कमरों को बाँटने के बारे में बात हुई.

जैसन: “बाँटने से क्या होगा, हमारी कोई भी वस्तु तो हमारे पास है नहीं. जिसका जहाँ मन होगा सो जायेगा. दो ही तो रातों की बात है.” बात सही थी और इसीलिए सबने स्वीकृति दे दी.

‘कुछ घूमा जाये?” अपने फोन कमरे में रखने के बाद वे सभी रिसोर्ट में घूमने के लिए निकल पड़े. कमरे में उन्हें रिसोर्ट का नक्शा मिला था जिसमे कहाँ क्या था दर्शाया गया था. मार्क ने तो सबसे पहले खाना खाने का ही प्रस्ताव रखा. देखा तो रेस्त्रां कुछ ही दूर पर था.

“एक बात और है, यहाँ रहने से चलना बहुत हो जायेगा. स्वास्थ्य के लिए अच्छा है.” रिचर्ड की बात पर किसी ने कुछ नहीं कहा.

रेस्त्रां पहुंचकर उन्होंने अपने लिए एक टेबल ली और बैठे ही थे कि रिचर्ड की आयु का एक व्यक्ति उनके सामने आ खड़ा हुआ.

“हैलो, रिचर्ड. लॉन्ग टाइम.”

रिचर्ड उठकर उसके गले लगने को बढ़ा फिर देखा कि दोनों नंगे हैं तो हाथ मिलाकर ही संतोष किया.

“इवान, दिस प्लेस इस कूल, माई फ्रेंड.”

इवान के साथ में एक सुंदर महिला थी, जो उसकी पत्नी हेलेन थी. और हेलेन के साथ में उनका बेटा फिलिप्स था. सबका परिचय कराया गया और इवान, हेलेन और फिलिप्स भी उनकी ही टेबल पर आ गए. बातों का जब प्रवाह आरम्भ हुआ तो दो घंटे तक यूँ ही चलता रहा. फिर इवान ने उन्हें रिसोर्ट घूमने के लिए हेलेन और फिलिप्स के हाथों सौंप दिया क्योंकि अब अन्य अथिति आने आरम्भ हो गए थे और उसे उन पर भी ध्यान देना था.

हेलेन और फिलिप्स सबको लेकर रिसोर्ट दिखाने के लिए निकल पड़े. उन्होंने बहुत देर तक इस रिसोर्ट की सुंदरता का अवलोकन किया. इसके बाद हेलेन उन्हें उनके कमरों की ओर ले जाने लगी. वे अन्य कमरों के सामने से निकल कर अपने कमरे की ओर चल पड़े. एक कमरे से उन्हें कुछ कोलाहल सा सुनाई पड़ा तो हेलेन ने बिना हिचक उस कमरे का द्वार खोला. अंदर का दृश्य देखकर सब रोमांचित हो गए. एक ४५ वर्ष की महिला को इस समय दो लड़के चोद रहे थे. उनके हाथों को देखकर ये स्पष्ट हो गया कि वे रिसोर्ट के ही कर्मचारी थे. महिला का चेहरा दरवाजे की ओर था और उसे देखकर मिशेल ने उसे पहचान लिया.

वो राज्य की एक सुप्रसिद्ध समाज सेविका थी, जिसका चेहरा आये दिनों टीवी और समाचार पत्रों में छाया रहता था. उसके इस रूप के बारे में किसी ने स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा. इस समय उसकी चूत और गांड दोनों में लंड चल रहे थे और उसके चेहरे पर उन्माद के भाव दिख रहे थे. कमरे में एक आदमी ने बाथरूम में से कदम रखा. ये उसका पति था पर उसने उनकी ओर देखा भी नहीं जैसे ये कोई सामान्य घटना हो. बाथरूम में से एक सुंदर लड़की बाहर आयी और उसने उस आदमी का हाथ लिया और कमरे के बाहर निकलने को हुई तो उसने दर्शक मंडली देखी।

“हेलो हेलेन आंटी, मॉम अभी थोड़ी व्यस्त हैं, आपको कोई काम था क्या?”

“नहीं, हम तो यूँ ही आ गए थे.” ये मेरे मित्र हैं. ये कहते हुए हेलेन ने रिचर्ड और जैसन के परिवारों की ओर संकेत किया.

“हेलो, मैं @#$ हूँ.” उस आदमी ने अपना परिचय दिया. “आप सबसे मिलकर प्रसन्नता हुई. हम शाम को मिलते हैं.”

ये कहते हुए पिता पुत्री कमरे से निकल गए. हेलेन भी अब चलने को हुई तो उसने उस समाज सेविका से हाथ हिलाकर विदा ली. कमरे को यूँ ही खुला छोड़कर वे सब आगे बढ़ गए. अंदर चल रहे व्यभिचार को अपने मन से कोई भी निकाल नहीं पा रहा था. हेलेन उनके कमरे में पहुंचकर उन्हें बोली, “कमरे यहाँ पर लॉक नहीं किये जाते हैं. वैसे भी कमरे में सामान कुछ होता ही नहीं है, और बाहर सब वैसे भी नंगे ही रहते हैं. कुछ लोग इस प्रकार से अन्य लोगों के सामने चुदाई करने में अधिक आनंद पाते हैं. शाम को आपको अधिक पता चलेगा. अभी मुझे फिलिप्स की सेवा की इच्छा है, तो मैं आपकी आज्ञा चाहूंगी.”

ये बताकर हेलेन मिशेल को आंख मारकर फिलिप्स के साथ चली गयी.

“इतने बड़े रहस्य को गोपनीय कैसे रखते होंगे ये लोग? कर्मचारी अगर बाहर कुछ बोल दिए तो बहुत बड़ा स्कैंडल हो जायेगा.”

“मंत्री का बहुत दबदबा है, मुझे नहीं लगता कि कोई भी कर्मचारी अपने ऊपर उन्हें क्रोधित देखना चाहेंगे. वैसे भी अगर देखो तो उन्हें वेतन के साथ महिलाओं के साथ चुदाई का भी आनंद मिल रहा है. ऐसी नौकरी से कौन हाथ धोना चाहेगा.”

“और लड़कियां?”

“सम्भवतः वही कारण हो. कुछ लड़कियों को बड़ी आयु के आदमियों से ही अधिक सुख मिलता है.”

“तब तो आप दोनों की चांदी हो गयी. नई नई चूतें मिलने वाली हैं दो दिन.” मिशेल ने उन्हें छेड़ा.

“और तुम्हें कौन से नए लंड नहीं मिलने वाले?” रिचर्ड ने हँसते हुए उत्तर दिया. “चलो नहाकर अपने खेल खेलते हैं, बाद में क्या कार्यक्रम हैं कुछ पता नहीं है.”

जिसके मन में जहाँ मन हुआ उस कमरे में घुस गया और नहाकर बाहर निकला.

ईव ने सुझाव दिया, “जब यहाँ उन्मुक्त हैं तो क्यों न आज हम अपने कमरों के पीछे बने लॉन में ही चलें. हमने कभी खुले आकाश के नीचे चुदाई की नहीं।”

सबको ये बढ़ रुचिकर लगा. बच्चे कमरों में से चादर और तकिया ले आये. ऐलिस के हाथ में मोबाइल वाला थैला था, पर वो खाली था. उसे देखकर सबने उसे प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा.

“पास द पार्सल. मैं वहाँ उल्टे मुंह बैठकर ताली बजायूँगी. आप पार्सल पास करोगे. जिस जिस के हाथ में पार्सल रुकेंगे, उनकी जोड़ी बनेगी. हाँ अगर दो पुरुष या दो स्त्री को मिलीं तो पार्सल फिर चलेगा. ओके, अब सब गोले में बैठ जाओ.” ये कहते हुए ऐलिस ने वो थैली जैसन के हाथ में दी और उनकी ओर पीठ करते हुए ताली बजाने लगी.

पहला पार्सल मार्क के हाथ में रुका.

दूसरा पार्सल मिशेल के हाथ में. मिशेल और मार्क की जोड़ी बन गयी और वो हट कर बैठ गए.

तीसरे पार्सल के साथ जैसन पकड़ा गया.

चौथे में इस बार रिचर्ड आया तो फिर से क्रम चला और इस बार शैली के हाथ में रुका. शैली और जैसन हट हए.

अब केवल ईव, रिचर्ड और डेविड ही शेष थे. और डेविड के हाथ में पार्सल रुकते ही सब जोड़े बन गए. डेविड को केवल ईव ही मिल सकती थी और इसीलिए रिचर्ड को ऐलिस के साथ का अवसर मिला.

“कुछ विस्मित करने वाली बात नहीं है, कि जैसा सबका मन था वैसे ही हुआ.”

ऐलिस ने अपना रहस्य नहीं बताया. वो कमरे की ओर मुंह करे बैठी थी और उसे कमरे की खिड़की में प्रतिबिम्ब दिख रहा था. उसने अपने मन के अनुसार जोड़ों को पार्सल के साथ छोड़ा था. एक गलती उसने पकड़े न जाने के लिए की थी. पर किसी को उसके इस छल का अंदेशा नहीं हुआ. अपने साथी को आलिंगनबद्ध करके सब चूमने में जुट गए. वे इस बात से अनिभिज्ञ थे कि रिसोर्ट के सुरक्षा केंद्र में उनकी इन गतिविधियों को टीवी पर देखा जा रहा था. तीन पुरुष और दो महिला कर्मी उनके इस खेल पर आंख लगाए हुए थे.

“मस्त माल हैं ये दोनों आंटियाँ , चोदने मिल जाएँ तो मजा आ जाये.” एक आदमी बोला।

“वैसे अंकल लोगों के भी लौड़े अच्छे बड़े हैं. मेरी तो चूत में पानी आ रहा है.” एक लड़की ने अपना विचार रखा.

रिकॉर्ड का बटन दबाकर वे अन्य स्थानों पर चल रही गतिविधियों को देखने लगे.

घास में चादर पर पारिवारिक सम्भोग में मग्न इस परिवार को इस बात का आभास नहीं था कि उनकी फिल्म बन रही है. ऐलिस रिचर्ड के लंड को चूस रही थी तो रिचर्ड उसकी चूत को. चार जोड़े इस समय 69 के आसान में अपने साथियों के जननांगों को चूमने, चाटने और चूसने में लगे थे. जैसन बहुत दिनों से एक कमी का अनुभव कर रहा था, उसे लगा कि आज वो अपनी इच्छा पूरी कर सकता है. इस विचार से उसने अपनी जीभ को कुछ आगे बढ़ाया और इस बार उसने शैली की गांड के भूरे छिद्र को चाटा। शैली चिहुंक पड़ी. उसने अपनी गांड कई बार मरवाई थी और उसे इस बात का ध्यान आया कि हालाँकि परिवार के सभी पुरुष उसकी गांड का आनंद ले चुके थे, पर किन्ही कारणों से उसके मामा इस सुख से वंचित थे. शैली ने जैसन को कई बार अपनी गांड को भूखी आँखों से ताकते देखा था. उसे भी लगा कि ये दिन और स्थान उसके मामा की इच्छा पूरी करने के लिए उपयुक्त है.

ईव डेविड के लंड को चूस कर पूर्ण आक्रोश में लेन में सफल हुई थी. उसके मन में इस समय ये उहापोह थी की वो इसे चूत में ले या गांड में. उसकी चूत बह रही थी तो गांड भी खुजला रही थी. उसने ये निर्णय डेविड के ऊपर ही छोड़ दिया. पर मिशेल ने निर्णय ले लिया था कि मार्क से गांड मरवाना ही उसकी प्राथमिकता थी. उसे ज्ञात था कि आज और कल उसे चूत चोदने वाले बहुत लौड़े मिलने वाले हैं. पर गांड कितने मारना चाहेंगे ये निश्चित नहीं था. वैसे भी दो तीन दिनों से उसकी गांड में कोई लौड़ा गया नहीं था और उसे इसकी कमी खल रही थी.

जैसन ने समय व्यर्थ न करते हुए शैली को एक तकिया के ऊपर अपने घुटनों के बल होने का निर्देश दिया. शैली ने बड़ी तत्परता से उसके इस निर्देश का पालन किया. उसकी चिकनी उभरी गांड को देखकर रिचर्ड से रहा नहीं गया और उसने उसे दोबारा चाटना आरम्भ किया, पर इस बार उसकी जीभ अंदर जाकर भी शैली की गांड को साफ कर रही थी. इसके बाद उसने अपने लंड को शैली की गांड के छेद पर लगाया. तो शैली बोल पड़ी.

शैली, “फक इट हार्ड एंड फ़ास्ट. जस्ट फक इट अंकल.”

जैसन कुछ आराम से उसकी गांड मारना चाहता था उसके इस कथन से उसने अपना मन बदल लिया और गांड में सुपाड़ा अंदर जाते ही एक लम्बे धक्के के साथ अपने लंड को शैली की गांड में जड़ तक बैठा दिया. धक्के के कारण शैली आगे की ओर गिरने को हुई पर जैसन ने उसकी पतली कमर को पकड़कर उसे संभाल लिया.

शैली, “गुड जॉब. नाउ फक मी. फक माई आस. आई लव इट.”

जैसन ने अब किसी प्रकार से भी कमी नहीं रखने का प्रण किया और शैली की गांड में पिस्टन के समान अपने लौड़े को पेलने लगा. शैली के मुंह से घुटी हुई सिसकारियां उसके कानों में एक अद्भुत संगीत का आभास करा रही थीं.

“वाओ, ये अंकल तो गांड मारने में बिलकुल दया नहीं दिखा रहा, मेरी तो गांड में खुजली हो रही है ये देखकर. इसके लंड से गांड मरवाना ही है मुझे.” सुरक्षा कक्ष में एक लड़की ने अपनी गांड खुजलाते हुए टिप्पणी की.

उसकी साथी लड़की हंस कर बोली, “तुझे आज तक कोई लंड दिखा है जिसे तुझे गांड में नहीं लेना हो? इन दो दिनों में तू सारे अतिथियों से गांड मरवाने वाली है.”

“तुझे क्यों जलन हो रही है? पर इस बार मेरी ड्यूटी यहां लगाकर इवान सर ने मेरा मूड ऑफ कर दिया.”

“क्या मजा खराब कर दिया तेरा?” ये स्वर इवान के थे जो कक्ष में निरीक्षण के लिए आया था.

“सॉरी सर, मैं तो मजाक कर रही थी.”

पर दूसरी लड़की अब मजे ले रही थी. “ये कह रही थी कि इस बार अपनी गांड अधिक लौडों से नहीं मरवा पायेगी क्योंकि आपने इसकी ड्यूटी यहाँ जो लगा दी है.”

“हम्म, चलो देखते हैं, कुछ हो पाए तो. वैसे मेरा भी मन है किसी की गांड मारने का तो तुम्हारी अभी की इच्छा तो मैं पूरी कर ही देता हूँ.” ये कहकर इवान ने उस लड़की को कुर्सी के ऊपर झुकाया और एक ही बार में अपने लंड को उसकी गांड में उतार दिया.

“उई माँ. आह. सर अब मारो मेरी गांड. वैसे सामने भी यही चल रहा है.” इवान ने अब तक टीवी की ओर देखा नहीं था और वहाँ देखकर उसे अपने मित्र के परिवार को चुदाई में संलग्न देखकर सुखद आश्चर्य हुआ. उसकी ऑंखें ऐलिस की गांड पर टिकी थीं जो इस समय घोड़ी की मुद्रा ले रही थी. ऐलिस की गांड के उभार देखकर उसके मुंह में पानी भर आया और उसने अपने सामने झुकी लड़की की गांड में ताबड़तोड़ लंड चला दिया.

अब ये इस रिसोर्ट के लिए सामान्य बात थी, तो अन्य सभी उनकी ओर ध्यान न देकर अपने काम पर ही केंद्रित थे.

इवान का ध्यान रह रह कर टीवी पर चल रहे उसके मित्र के परिवार पर जा रहा था. इस समय सुंदर पृष्ठ ऊपर उठे हुए थे और उन सब में एक एक लंड पिला हुआ था. उसे इस बात का दुःख हुआ कि वो उनकी बातें नहीं सुन सकता था. वहाँ चादर पर चारों महिलाएं अपनी गांड में लंड लिए हुए सिसकारियां ले रही थीं और अपने अपने घुड़सवार को प्रोत्साहित कर रही थीं. मार्क और डेविड जिन्हें अपनी माँ की आयु की स्त्रियों में अधिक रूचि थी अपने लंड धुआंधार रूप से चला रहे थे. रिचर्ड और जैसन को भी इन दोनों बालाओं की गांड मारने में अत्यंत सुख मिल रहा था. शाम होने को थी और सूर्य ढलने लगा था. चारों लंड अपने अपने रस को अपनी घोड़ी की गांड में विसर्जित करने लगे. वो उनके पास ही ढह गए और लम्बी गहरी साँसों के साथ समाप्त हुए कार्यक्रम का सुख अनुभव करते रहे.

इसके बाद सब उठे और बच्चों ने चादर और तकिये उठाये और कमरों में जाकर उन्हें धोने के लिए डाल दिया. रिचर्ड ने फोन पर चादरें बदलने का अनुरोध किया और फिर बाथरूम में जाकर मुंह हाथ धोकर सब बाहर आकर खड़े हो गए. कुछ ही देर में दो लड़कियाँ आयीं और उन्होंने चादरें और तकिये बदले और उनकी ओर मुस्कराते हुए चली गयीं. लड़की की गांड मार लेने के बाद इवान ने लड़की को विश्वास दिलाया कि वो उसकी गांड में अधिकतम लंड डलवाने का प्रयत्न करेगा. इसके बाद वो अपने ऑफिस गया जहां उसने पाया कि लगभग सभी अतिथि आ चुके हैं. उन्हें सात बजे रेस्त्रां में आमंत्रित करने के बाद वो अपने परिवार के पास लौट गया.

अपने कमरे में पहुंचा तो देखा कि फिलिप्स हेलेन की गांड मार कर अपने लौड़े को उसकी गांड में से निकाल रहा था. उसने अपना सिर हिलाया और सोचा कि बाप बेटे को गांड मारने का कितना शौक है. और उसे हेलेन के ऊपर भी गर्व हुआ जो गांड मरवाने में कभी पीछे नहीं हटती थी.

फिलिप्स इवान को देखकर मुस्कुराते हुए बोला, “हाय डैड, माँ की गांड मारनी है क्या?”

इवान ने हेलेन की गांड से रिसते हुए फिलिप्स के रस को देखा और उसे कहा कि अब समय नहीं है, और वैसे भी वो अभी सुरक्षा कर्मी लड़की की गांड बजा कर आया है.

“वेल डन, डैड.”

इवान ने हेलेन को पुकारा, “हनी, सात बजे के पहले हमें रेस्त्रां पहुंचना है, तो तैयार हो जाओ. नेताजी भी आ चुके हैं अपनी पत्नी और बेटी के साथ. तो मैं उन्हें मिलने के बाद तुम दोनों को वहीं मिलूंगा. हम दोनों को ही सबका स्वागत करना है, तो जल्दी करो.”

हेलेन, “नो प्रॉब्लम, जानू। बस मैं अभी तैयार होती हूँ. बस मेकअप ही करना है. हम औरतों को देर तो कपड़े पहनने में होती है, जिसकी आज कोई आवश्यकता ही नहीं है.”

ये कहते हुए दोनों हंस पड़े. फिर इवान ने फिलिप्स को बोला, “तुम्हारा काम है रिचर्ड के परिवार को लेकर आना. वैसे उन्हें स्थान पता है, परन्तु पहली बार आये अतिथि को साथ लाया जाता है.”

फिलिप्स ने ये कार्य सहर्ष स्वीकार किया और अपनी माँ के ही साथ बाथरूम में घुस गया. उन दोनों के बाहर आने पर इवान भी तैयार हुआ और मंत्रीजी के बंगले के लिए निकल गया.

***********

मंत्रीजी का बंगला रिसोर्ट से कुछ दूर था, बंगला क्या था एक महल ही समझो. उनके बंगले पर अलग सुरक्षा थी और उनसे मिलने के लिए उनकी अनुमति के बिना अंदर जाना असम्भव था. इवान चूँकि रिसोर्ट का सर्वोच्च अधिकारी था तो उसे बंगले में किसी भी समय जाने के अनुमति प्राप्त थी, परन्तु मंत्रीजी को उसके आने की सूचना देने के बाद ही. बंगले के दो गेट थे, एक जो कुछ दूरी पर मुख्य सड़क पर खुलता था और दूसरा रिसोर्ट में. मंत्रीजी के सरकारी सुरक्षाकर्मी पहले गेट के बाहर ही रोक दिए जाते थे. इसीलिए उन्हें मंत्रीजी के क्रियाकलापों के बारे में कोई ज्ञान नहीं था.

गेट पर पहुंचने पर सुरक्षाकर्मी ने मंत्रीजी को फोन पर बताया कि इवान आये हैं और उनसे अनुमति मिलने पर गेट खोलकर इवान को सैलूट करके उन्हें प्रवेश दिया. गेट से भी उनके बंगले का मुख्य द्वार कोई आधा किमी था. इवान कई बार आश्चर्य करता था कि उनके पास इतना धन कैसे आया, पर उसने कभी भी अपने विचार मुखर नहीं किये. मुख्य द्वार पर पहुंचकर उसने घंटी बजायी और रिसोर्ट की ही एक लड़की ने उसे अंदर प्रवेश दिया. लड़की की लिपस्टिक उसके सुंदर चेहरे पर बिखरी हुई थी. उसने इवान को भव्य बैठक में एक सोफे पर बैठाया. मंत्रीजी अभी बाहर नहीं आये थे. वो कमरे की भव्यता का अवलोकन कर ही रहा था कि उस लड़की ने उसके हाथ में उसकी प्रिय शराब का पैग थमा दिया. इसमें कोई अचरज नहीं था, मंत्रीजी इन सब का कोई संज्ञान नहीं लेते थे.

“आप और कुछ लेंगे?” लड़की के द्वीअर्थी वाक्य को समझने में इवान को देर नहीं लगी. उसने विनम्रता से मना किया और अपनी ड्रिंक की चुस्कियां लेने लगा.

कुछ ही मिनट बीते होंगे कि मंत्रीजी भी आ गए. वे भी रिसोर्ट की ही वेश भूषा में थे, अर्थात पूर्णतया नंगे. उनकी ऊँची कद काठी पर काली घनी मूछें थीं और उनका लंड अभी भी तना हुआ था और उस पर कुछ नमी थी जिसके कारण वो अभी भी चमक रहा था.

“कैसे हो इवान?” उन्होंने आगे बढ़कर इवान से हाथ मिलाया. फिर उस लड़की की ओर देखकर कहा, “तुम्हें मैडम बुला रही हैं.”

“जी सर.” ये कहते हुए वो लड़की पलक झपकते ही बंगले के अंदर चली गयी.

“मैं अच्छा हूँ, सर. आप कैसे हैं?”

“जैसा हमेशा रहता हूँ, बिल्कुल चंगा. कल के आयोजन की सभी तैयारियां हो चुकी हैं?”

“जी सर, अपने जैसा आदेश किया था उसके अनुसार शो के लिए स्टेज की व्यवस्था कर दी है, कल सुबह उस पर पूरी सज्जा भी कर देंगे.” ये कहते हुए इवान रुक गया.

मंत्रीजी ने भांप लिया कि इवान के मन में कोई प्रश्न है.

“तुम ये सोच रहे होंगे कि इस बार मैंने सारे आयोजन प्रबंध तुम्हारे ऊपर न छोड़कर स्वयं अपने ऊपर लिया है. है न?”

“जी सर.”

“बात ये है कि $%^& शहर की एक प्रसिद्ध फाइनैंसर से मेरी एक डील हो रही थी. उन्होंने एक नए क्लब में निवेश किया है. वो भी हमारी तरह का ही विशिष्ट क्लब है, परन्तु वो केवल महिलाओं के लिए है.” ये कहते हुए मंत्रीजी ने इवान को पैनी दृष्टि से देखा.

“जी.”

“तो बात ये है कि उन्हें भी किसी प्रकार का संरक्षण चाहिए है, अन्यथा उन्हें कभी भी शासन बंद कर सकता है अगर उनकी गोपनीयता भंग हुई तो. फिर हमारी ये डील हुई है कि हमारे रिसोर्ट और उनके क्लब के बीच एक समझौता किया जाये जहाँ पर वे अपने कर्मियों को हमारे रिसोर्ट में विशेष प्रयोजनों के लिए उपलब्ध कराएँगे और इसके लिए वे मेरे संरक्षण में रहेंगे.”

“ये तो बहुत ही अच्छी बात है सर. आपको इसके लिए मेरी ओर से बधाई.”

“बात यहाँ तक ही नहीं है, उन्होंने अभी हाल ही में एक अतिविशिष्ट आयोजन किया था, जिसके बाद उन्हें मैंने भी अपने रिसोर्ट में उसी प्रकार का शो करने के लिए मना लिया है. महंगा तो है, परन्तु आनंद बहुत आने वाला है.”

“जी सर.”

“तुमने बॉलीवुड की अभिनेत्री “केके” को तो देखा ही होगा, जिसने अपनी आयु से कहीं अधिक आयु के अभिनेता से विवाह किया है.”

इवान का गला सूख गया, उसने अपने ग्लास से दो घूंट लिए और गले को गीला किया.

“जी”

“अभिनेता का पुत्र अपनी सौतेली माँ की चुदाई करता है, क्यूंकि अभिनेता अब कुछ विशेष समय और परिस्थितियों में ही अपनी पत्नी को चोद सकता है. उसका लंड अपनी पत्नी को औरों से चुदते हुए देखने पर ही खड़ा होता है. तो कल उनका शो है.”

“ओह शिट.” इवान के मुंह से अनजाने में ही अपशब्द निकल गया. पर मंत्रीजी ने उस पर कोई टिप्पणी नहीं की.

“वो फाइनेंसर और क्लब का मालिक भी मेरे साथ ही आये हैं और अभिनेत्री, अभिनेता और उनका बेटा भी. इसी कारण मुझे आने में देर हुई. वे सभी अब आते ही होंगे.”

इवान इस समय सकते में था. वो प्रसिद्ध अभिनेत्री से मिलने का उसे अवसर मिलने वाला है. तभी मंत्री जी की बेटी बैठक में आयी और उसके साथ एक युवक था, जिसका चेहरा अभिनेता से मिल रहा था.

“पापा, मैं इन्हें रिसोर्ट दिखा दूँ?” ये कहते हुए वो आकर मंत्रीजी की गोद में बैठ गयी.

“लोग पहचान लेंगे तो कल के कार्यक्रम की गोपनीयता समाप्त हो जाएगी. वैसे भी ये तीनों नए वर्ष के पहले दो दिन यहीँ हैं, तो अच्छा होगा कि उस समय दिखाओ.”

“ओके, पापा.” कहकर मंत्रीजी को एक गहरा चुंबन देकर वो खड़ी हुई और युवक के हाथ को पकड़कर बोली, “जैसा पापा ने कहा, अभी नहीं. तो चलो हम कुछ अपना खेल खेल लेते हैं.”

वो दोनों अभी वहाँ से हटे ही थे कि मंत्री जी की पत्नी ने एक सुंदर मध्यम आयु की स्त्री और एक हृष्टपुष्ट नवयुवक के साथ बैठक में प्रवेश किया.

“हैलो इवान, कैसे हो?” मंत्रीजी की पत्नी ने इवान के पास आकर उसके होंठ हल्के से चूमकर पूछा.

“मैं अच्छा हूँ, मैडम. आप कैसी हैं?”

मंत्री जी की पत्नी शिखा उनसे आयु में कोई दस वर्ष कम थीं और उनकी दूसरी पत्नी थीं. पहली पत्नी के देहांत के पश्चात् मंत्रीजी ने कुछ वर्ष बाद उनसे विवाह किया था. वो उनकी पुत्री की शिक्षिका थीं और उनको मिलाने में उनकी पुत्री का ही हाथ था.

“इवान, मैंने कितनी बार कहा है की मुझे शिखा ही पुकारा करो. इन्हें चाहे जैसे भी पुकारो, पर मेरे लिए ऐसे सम्बोधन की कोई आवश्यकता नहीं है.”

इवान ने मंत्रीजी को देखा तो उन्होंने अपने कंधे उचकाए और उसे इसकी अनुमति दे दी.

“ओके, शिखा जी.”

“चलो, ये फिर भी चलेगा. हेलेन कहाँ है? और तुम्हारा लड़का कहाँ है. उसकी मुझे बड़ी याद आती है.”

“जी हेलेन आज के कार्यक्रम के लिए रेस्त्रां में गयी है, फिलिप्स नए अतिथियों को लेकर वहीँ आएगा.”

“हाँ, इन्होने बताया कि तुमने इस बार अपने मित्र के परिवार को बुलाया है. और ये भी की उनमे दो जवान लड़के भी हैं.”

“जी”

शिखा को नवयुवकों से चुदवाने में बहुत आनंद मिलता था. मंत्रीजी अब ५५ वर्ष के थे, और उनकी चुदाई की क्षमता आज भी शिखर पर थी. ४५ वर्ष की शिखा को उनसे तो सुख मिलता ही था, पर वो रिसोर्ट में अपने जवान लड़कों से चुदवाने की लालसा को पूरा करती थी. यहाँ से दूर, उसे कभी भी किसी और के साथ नहीं देखा गया.

“आओ, मैं तुम्हें मिलाती हूँ. ये हैं रूचि आहूजा, जो कि हमारी नयी पार्टनर हैं, और ये हैं पार्थ जो एक क्लब के मालिक हैं, रूचि के साथ.”

इवान ने पार्थ से हाथ मिलाया और फिर रूचि से.

“आपसे मिलकर बहुत ख़ुशी हुई. मुझे सर ने आपके क्लब के बारे में संक्षेप में बताया है. मुझे विश्वास है कि हमारे संबंध अच्छे रहेंगे.”

“मुझे भी ये विश्वास है.” पार्थ ने उत्तर दिया. रूचि इवान की ओर बस देखती रही मानो उसे पढ़ रही हो.

शिखा: “तो मेरे विचार से हमें रेस्त्रां चलना चाहिए.”

इवान अभिनेत्री से मिलना चाहता था, तो पूछ उठा.

“मंत्रीजी ने कहा कि आपके अन्य अतिथि भी हैं.”

“यू नौटी. तुम्हें केके से मिलना है. चलो मैं तुम्हें मिलवा देती हूँ, वैसे वो अभी कुछ व्यस्त है.”

उसकी बात सुनकर रूचि और पार्थ मुस्कुरा उठे और मंत्रीजी की खिलखिलाहट निकल गयी. इवान को कुछ संकोच हुआ. तब तक शिखा उसे हाथ से पकड़कर घर में अंदर ले गयी.

इवान इस बंगले में कई बार आया था परन्तु वो बैठक तक ही सीमित रहा था. घर के अंदर की भव्यता को देखकर वो चकित था. शिखा उसके हाथ को थामे हुए गलियारे के अंतिम कमरे की ओर पहुंची और रुक गयी.

“इवान, जो तुम इन बॉलीवुड वालों के बारें में विचार रखते हो, ये उनसे बहुत भिन्न हैं. हम लोग भी उन्मुक्त सेक्स के पक्षधर हैं, परन्तु जो गंदगी और घिनौनापन इन लोगों में है, उसे हम कभी नहीं पा सकते. जिस केके से तुम मिलना चाहते हो उसका असली रूप भी देख लो.”

ये कहते हुए शिखा ने दरवाजा खोला और इवान को अंदर ले गयी. अंदर का दृश्य देखकर न केवल इवान भौचक्का रह गया बल्कि उसके मन में जो इस जोड़े के प्रति भाव थे वो एक ही क्षण में तहसनहस हो गए. बिस्तर पर केके तीन लड़कों से एक साथ चुदवा रही थी. हालाँकि उसका चेहरा नहीं दिख रहा था पर शिखा ने बताया था कि ये केके ही है. एक लंड उसकी चूत में, और एक गांड में था. एक लंड उसके मुंह में था. इवान इनमे से किसी भी लड़के को नहीं पहचानता था. उसने उनकी कलाइयों में अतिथि वाले कड़े देखे. पर उसको केके के इस रूप को देखकर उतना आश्चर्य नहीं हुआ, जितना उस अभिनेता को देखकर.

अभिनेता के गले में एक कुत्ते का पट्टा पड़ा हुआ था और वो घुटनों और कोहनियों के बल बैठा हुआ था, उसका चेहरा उसकी पत्नी की ओर था. उसके पट्टे को एक लड़की ने अपने हाथों में थमा हुआ था और उसके सामने एक बड़ा सा कुत्तों को खाना खिलाने वाला कटोरा था. इवान इस दृश्य को अपने मन में समाहित कर ही रहा था कि गांड मारने वाले लड़के ने अपना लंड केके की गांड से निकाला। वो झड़ने वाला था. उस लड़की ने कुत्ते वाला प्याला उठाया और उस लड़के के लंड के आगे लगा दिया. इवान को अब समझ आ रहा था कि यहाँ क्या होने वाला है. उस लड़के ने अपने लंड को झटकते हुए अपना वीर्य उस कटोरे में डाल दिया. जब उसका लंड झड़ चुका तो लड़की ने वो कटोरा अभिनेता के सामने रख दिया.

“कम ऑन, डैड, ड्रिंक योर डाइट. मॉम की गांड से सीधा निकला है.”

ये कहते हुए उसने पट्टे को एक झटका दिया और अभिनेता उस कटोरे में भरे वीर्य को पी गया. इवान का मन मचल उठा. चुदाई करना अलग बात थी, पर अपने पिता और पति का यूँ तिरिस्कार करना बिलकुल अलग. जब अभिनेता अपना कटोरा साफ कर चूका तो लड़की ने उसे शाबाशी दी. हालाँकि वे इवान और शिखा को देख चुके थे, पर किसी ने उनकी उपस्थिति का संज्ञान नहीं लिया. इवान ने शिखा को ओर देखा और सिर से संकेत दिया कि उसे अब कुछ नहीं देखना। शिखा ने उसको साथ लिया और कमरे के बाहर निकल गयी और कमरा बंद कर दिया.

“इतनी गंदगी है इन लोगों के अंदर!”

शिखा ने कुछ नहीं कहा. बैठक में पहुंचकर मंत्रीजी ने उसके चेहरे के भाव पढ़ लिए और बात बदल दी.

“वैसे अँधेरा हो चुका है और रेस्त्रां जाने का भी समय होने वाला है. इवान कृपया तुम रूचि और पार्थ को अपने साथ ले जाओ. इनका परिचय में कल सबको दूंगा. आज इन्हें केवल मेरे अतिथि के रूप में ही मिलवाओ.”

“जी.” इवान की दबी हुई हामी को सुनकर मंत्रीजी बोले, “हर बार जो हमें दिखता है वो पूर्ण सत्य नहीं होता. अन्य लोगों के जीवन या उनकी शैली पर विचार न करते हुए हमें ये देखना चाहिए कि हम अपने वातावरण में कितने सुखी है.”

इवान रूचि और पार्थ को लेकर बंगले से निकल गया और रेस्त्रां की ओर चल पड़ा. रूचि इवान के मन के भाव को समझ पा रही थी. उसने चलते हुए इवान का हाथ पकड़ा और उसे दबाया.

“अपने मन को शांत रखो, जिस प्रकार का रिसोर्ट आप चला रहे हो, सम्भव है इस प्रकार की विकृतियां आपको देखने के लिए मिलती रहें. अपनी व्यक्तिगत और व्यावसायिक मान्यताओं को अलग रखिये. जो दिखता है वो बिकता तो है, पर वो सच कितना होता है इसका अनुमान लगाना असम्भव है.”

इवान इतना अनुभवी होने के बाद भी कुछ सकते में था. पर उसने रूचि की ओर देखा और मुस्कुराकर कहा, “धन्यवाद, आप सच कह रही हैं. मैं उसके बारे में इतने अच्छे विचार रखता था कि उन्हें बिखरता देख कुछ कष्ट हुआ है. पर अब मैं ठीक हूँ. पर वो लड़के कौन थे?”

“उन्हें शो के लिए हम लाये हैं. वे हमारे क्लब से हैं.”

“ओके”

वे अब तक रेस्तराँ पहुंच चुके थे. अंदर अभी कुछ ही लोग थे क्योंकि अभी सात बजने में समय था. अंदर जाने पर विदित हुआ कि केवल हेलेन, फिलिप्स और रिचर्ड का परिवार आ चुके थे. अन्य केवल सेवाकर्मी ही थे. हल्का मद्धम संगीत बज रहा था. और वातावरण बहुत ही रोमांटिक था. रेस्त्रां में टेबलों के बीच में अच्छी दूरी बनाई गयी थी. रेस्त्रां में दस सीटों के पाँच टेबल थीं और छह सीटों की दस. आठ लड़के लड़कियां सेवा के लिए तत्पर खड़े थे.

इवान ने सबसे पहले रूचि और पार्थ को हेलेन से मिलाया और कुछ देर तक हेलेन और रूचि बातें करते रहे. इवान अन्य आयोजनों को देखने के लिए आगे चला गया तो हेलेन ने पार्थ और रूचि को रिचर्ड के परिवार से मिलवाना उचित समझा. जैसे ही वो पार्थ को लेकर उनकी टेबल पर पहुंची मिशेल और रिचर्ड के मुंह खुले रह गए. उन्हें समझ नहीं आया कि वे क्या कहें. हेलेन समझ गयी कि वे एक दूसरे को पहचानते हैं. पार्थ ने रिचर्ड को नमस्ते किया और डेविड को अलग आने के लिए कहा. डेविड उठकर पार्थ के साथ चला गया और हेलेन रूचि को सबसे परिचित करवाने लगी.

पार्थ और डेविड रेस्त्रां के बाहर आये.

“हे डेविड, पहली बात कि चिंता बिलकुल मत करो. ये बात मेरे आगे कहीं नहीं जाएगी. अगर तुम चाहो तो.”

“क्या कहना चाहते हो.” डेविड को लगा कि पार्थ उन्हें ब्लैकमेल करना चाह रहा है.

“जिस प्रकार से सम्भवतः तुम्हारे परिवार में चुदाई चलती है, हमारे परिवार में भी वही होता है. ये तुम्हें इसीलिए बता रहा हूँ कि तुम्हे किसी प्रकार का डर न रहे.”

“ओह, दैट इस ग्रेट.” फिर वो कुछ सोचकर बोलै, “पर सागरिका की तो शादी हो रही है.”

“वहाँ भी वही चलता है. और इसीलिए हमारे परिवार अब कई बार मिलजुल कर चुदाई करते हैं.”

“तो अब क्या होगा.”

“मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा परिवार भी इसमें सम्मिलित हो जाये. सोचो, आठ में से चार परिवार अगर ऐसे मिलजुल कर रहें तो.”

“चार? पर ये तो तीन ही हुए.”

“सरप्राइज़! शेट्टी परिवार में भी यही चलन है.”

“होली शिट, वर्ल्ड इस गोइंग क्रेजी, ब्रो।”

“यस, इट इस. नाउ लैट अस गो इनसाइड. यू कैन टैल योर फॅमिली.”

“या, मैन. दे विल बी सरप्राइज़्ड लाइक हैल.”

इसके बाद दोनों अंदर चले गए. जहाँ पार्थ रूचि की ओर मुड़ा, डेविड अपने परिवार की टेबल की ओर चला गया. कुछ ही देर में उन आठों की आश्चर्य से खुली ऑंखें पार्थ को देख रही थीं. पार्थ ने उन्हें आंख मारी और मुस्कुरा दिया. रूचि ने उससे पूछा कि मामला क्या है तो उसने बताया कि वो भी उनके ही पड़ोसी हैं और ये साफ है कि उनके घर में भी पारिवारिक सम्भोग की प्रथा है. रूचि ने इस बार उनकी ओर देखा. फिर उनकी ओर मुस्कुराते हुए हाथ हिलाया. मिशेल ने उसका उत्तर दिया.

जैसे ही सात बजे एक एक करके अन्य अतिथि भी रेस्त्रां में आने लगे. रेस्त्रां में नियुक्त लड़के उन्हें उनकी टेबल पर बैठा रहे थे और लड़कियां उनके ड्रिंक्स का आर्डर ले रही थीं. आधे घंटे के भीतर ही रेस्त्रां में लगभग सभी लोग आ चुके थे. उनके सबके बैठने के बाद कुछ ही देर में मंत्रीजी, उनकी पत्नी और पुत्री भी आ गए. सबने खड़े होकर उनका स्वागत किया. वे तीनों ने हर टेबल पर जाकर सबसे मिले और सबका स्वागत किया. देख के ये साफ था कि वे सबको भली भांति जानते थे. मंत्रीजी सभी महिलाओं से आलिंगन करके मिल रहे थे और शिखा और उनकी पुत्री मनीषा पुरुषों के साथ आलिंगनबद्ध हो रही थीं.

इवान ने रेस्त्रां में अब कुल ५० लोग थे. इनमें २४ पुरुष थे और अन्य स्त्रियां. पुरुषों में आठ लड़के थे और अन्य प्रौढ़. महिलों में भी १६ महिलाएं थीं और १० लड़कियां थीं. जैसे जैसे मंत्रीजी का परिवार एक परिवार से मिलता, वे लोग बैठते जा रहे थे. अन्य लोगों से मिलकर अंत में मंत्रीजी का परिवार रिचर्ड के परिवार से मिलने आया.

“आप आज पहली बार आये हैं इसीलिए मैं आपसे मिलने अंत में आया हूँ. मुझे आपके बारे में इवान ने बहुत कुछ बताया है. मैं आपसे व्यापार के संबंध में भी कुछ बातें करना चाहूंगा, और इसके लिए आपको मैं कल अपने बंगले पर आमंत्रित कर रहा हूँ. अब आप सब आज के भोजन का आनंद लें. मैंने इवान से कहा है कि वो सभी से आपका परिचय करवा दे. जो कुछ ही देर में करने वाला है. आप अपनी प्रिय ड्रिंक लें. मैं आपके पास कुछ देर में फिर आऊंगा.”

ये कहते हुए मंत्रीजी अपनी टेबल पर चले गए. सभी लोग अपनी ड्रिंक्स पी रहे थे. इवान ने माइक लिया और सबका ध्यान आकर्षित किया.

“आप सबका हमारे रिसोर्ट में फिर स्वागत है. मुझे प्रसन्नता है कि इस बार की थीम, जिसे हमने प्रकृति कहा है, आप सबने इस ठंड में भी स्वागत किया है. हम इस बात के लिए धन्य हैं कि हमारे यहाँ इतनी तीव्र ठंड नहीं पड़ती है, परन्तु इस समय कुछ तापमान कम हो रहा है. इसीलिए यहाँ हीटर चला दिए गए हैं. आप सबके कमरे भी इस समय गर्म किये जा रहे हैं.”

“जैसा आप सब जानते हैं की ये हमारा पाँचवाँ नव वर्ष का आयोजन है और इस बार मंत्रीजी ने एक अति विशिष्ट आयोजन किया है. मैं अपनी ओर से उनका इसके लिए आभार व्यक्त करता हूँ. आज हमारे बीच आठ नए अतिथि हैं, जिनमे से चार अफ्रीका के निवासी हैं. मैं आप सबको उनका परिचय देता हूँ. मैं आपसे विनती करूंगा कि उनके परिचय के उपरांत आप सभी एक एक करके उन्हें भी अपना परिचय दें.”

ये कहते हुए इवान ने रिचर्ड के परिवार के बारे में बताया और कुछ जैसन के परिवार के बारे में भी. इसके बाद हर परिवार ने उनसे मिलकर अपना परिचय दिया. सबसे मिलते मिलते, उन्हें दो परिवारों से रात्रि के लिए आमंत्रण मिला. किसी किसी को अलग आमंत्रण भी मिला. अर्थात कुछ परिवार उनके किसी एक या दो सदस्यों को ही आमंत्रित करने के इच्छुक थे. उन्होंने कहा कि वे कुछ विचार करके उन्हें बताएंगे. मंत्रणा में ये निश्चित हुआ कि अलग अलग परिवारों से मिला जाये जिससे कि उनके बारे में अधिक ज्ञान हो सके. ये तय होते ही उन्होंने पास खड़ी सेविका को ये बात इवान को बताने के लिए कहा.

कुछ महिलाएं जाकर मंत्री जी की टेबल पर बैठ गयी थीं और उनके साथ चुहल कर रही थीं. उनके हाव भाव से प्रतीत होता था कि वे उनके साथ रात बिताने में इच्छुक हैं. पर मंत्रीजी के कुछ बताने के बाद वे कुछ उदास हो गयीं. खाना खाने के पश्चात् एक गाड़ी से सबको उनके निश्चित स्थान (जहाँ उन्हें रात बितानी थी.) छोड़ा गया. मिशेल को इवान के कमरे में छोड़ा गया. अन्य सभी परिवार वाले भी अलग अलग परिवारों के साथ चले गए. आज वे अन्य परिवारों के पारिवारिक सम्भोग में सम्मिलित होने वाले थे.

मंत्री जी आज केके की चुदाई करने वाले थे, तो उनकी पत्नी शिखा ने जिस परिवार के साथ जाना चुना था उसी में डेविड भी गया था. वहीं जैसन वाले परिवार में उनकी पुत्री आयी थी. सभी लोग अपने गंतव्य पर पहुंच चुके थे.

आज रिसोर्ट के हर कमरे में चुदाई का संग्राम होना था.

और जो कल होना था वो अभी तक अनुसूचित था, जिसे केवल रूचि, पार्थ और मंत्रीजी ही जानते थे. पार्थ रूचि के साथ उसके कमरे में गया था. उन्होंने किसी के साथ जाने की आवश्यकता नहीं समझी थी. वैसे भी उन्हें कल के कार्यक्रम के बारे में और मंत्रीजी के साथ व्यवसाय के बारे में चर्चा करनी थी. बाहर सर्दी बढ़ रही थी. पर रिसोर्ट के उन कमरों में जहां लोग थे, इस समय गर्मी थी, न केवल हीटर द्वारा उर्जित, बल्कि उनके शरीरों से निकलता वासना का ज्वर तापमान को बढ़ाता जा रहा था.

अभी केवल शाम ढली थी, रात तो जवान हुई थी.

क्रमश:

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अध्याय ३१: पाँचवाँ घर - शोनाली और जॉय चटर्जी ४

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शोनाली का घर:

जब पार्थ घर से ३०० किमी दूर मंत्रीजी के रिसोर्ट में डेविड से बात कर रहा था, उनके घर में सागरिका और निखिल की सगाई का प्रबंध कैसे हो ये चर्चा चल रही थी. क्योंकि ये स्त्री-विशेष कार्य था तो इस समय शोनाली, सुमति, शीला, सुप्रिया और सुरेखा इस में व्यस्त थें. वैसे संजना भी आयी हुई थी, पर वो सागरिका और पारुल के साथ उनके कमरे में थी. संजना उन दोनों बहनों की बातें सुनकर चकित भी थी और कुछ उदास भी. उनकी बातों से ये साफ था कि वे चुदाई के खेल में पारंगत हैं और कई साथियों के साथ चुदाई कर चुकी हैं. और यहाँ वो थी जो अपनी सील टूटने की प्रतीक्षा कर रही थी. पर उसकी माँ ने उसे विश्वास दिलाया था कि वो दिन भी अब दूर नहीं है.

“पारुल, यार, आज शाम की पार्टी का क्या किया है. सात बज रहे हैं, पर मम्मी लोग तो सब दूसरे ही काम में लगी हैं. लगता है इस बार की पार्टी फीकी ही निकलेगी.” सागरिका ने बुझे मन से कहा.

पारुल, “दीदी, तुम चिंता क्यों कर रही हो. पापा ने सुबह ही तो बताया था कि आज उन्होंने और नानाजी ने पार्टी का पूरा बीड़ा उठाया है. कल की नए वर्ष की पार्टी को निखिल, नितिन और सजल आयोजित करेंगे. अब हम सब तैयार हो जाते हैं. संजना, चलो तुम्हे मैं सजाती हूँ.”

संजना को इस बात से बहुत ख़ुशी हुई. उसे इस प्रकार का साथ कभी मिला नहीं था. उसके तीन तीन भाई थे, पर बहन एक भी न थी, पर पारुल और सागरिका उसकी ये कमी पूरी करने का प्रयास कर रही थीं.

सागरिका, “अरे पारुल, दो दिन में दो पार्टी, मजा आएगा. तू जा. संजना को मेरे साथ छोड़ दे. वैसे भी मेरे और इसके नाप में अधिक अंतर नहीं है. और फिर तुझे जितना समय लगता है उतने में तो हम दोनों तैयार हो जाएँगी. कल की पार्टी के लिए संजना को सजाने का काम तेरा. फिर देखेंगे कौन जीतेगा.”

इस बात पर सागरिका और संजना दोनों हंस पड़े और पारुल ने मुंह बनाने का स्वांग किया और अपने कमरे में चली गयी. तभी संजना का फोन बजा. उसकी माँ थी.

“हाँ, मॉम. सागरिका दीदी कह रही हैं कि वो मुझे तैयार करेंगी. आप चलो. वहीँ मिलेंगे.”

सुरेखा भी इस बात पर खुश हुई और स्त्री मंडली पार्टी के लिए उठ गयी.

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सुरेखा को आज की पार्टी का कारण नहीं पता था, उसकी माँ शीला ने उन्हें आज सुबह ही बताया था कि आज उनके घर में पार्टी है और उनका एवं जॉय का परिवार ही होंगे. और कल फिर पार्टी थी, नए साल की. इसे तीनों लड़के आयोजित कर रहे थे. पार्थ के न होने से अन्य तीनों पर अत्यधिक बोझ था. सुरेखा पार्टियों में कई दिनों से नहीं गयी थी. उसके पिता के घर जब पार्टी होती थी, तब वो अवश्य ही जाती थी, पर अब उसे पता चल चुका था कि उन्हें कम ही पार्टियों में बुलाया जाता था. सुप्रिया की बातों से उसे लग रहा था कि ये सामान्य पार्टी नहीं होगी. और इस सोच ने उसकी चूत में खलबली मचाई हुई थी.

घर पर पहुँच कर उसने सजने संवरने में अधिक देर नहीं की. वैसे भी उसकी सुंदरता प्राकृतिक थी, जिस हल्के से मेकअप से ही उभरा जा सकता था. हाँ, उसने अपनी पोशाक चुनने में समय लगाया और पहनने में भी. जब उसने तैयार होकर स्वयं को देखा तो उसे अपने से ही ईर्ष्या हो उठी.

“हम्म्म, अब भी मैं ठीक दिखती हूँ.” उसने स्वयं को सराहा.

“मॉम, आप ठीक नहीं बहुत सुंदर दिखती हो.” सजल ने उसके कमरे के द्वार से ही उसे देखते हुए कहा. “आप अगर लेट न हो रही होतीं, तो मैं एक बार आपकी चुदाई अवश्य करता.”

सुरेखा मन ही मन खुश हो गयी, “पर तुम अभी तक ऐसे क्यों खड़े हो, तैयार नहीं होने क्या?’

“बस मॉम, अभी कपड़े बदलकर आता हूँ, फिर सब साथ चलेंगे. संजना को भी बता देता हूँ.”

“संजना को सागरिका ले कर आएगी, वो उसके ही घर पर है.”

“ओह, ये तो बड़ी अच्छी बात है.”

“हाँ, अब जल्दी कर, फिर हम निकलते हैं.” ये कहते हुए सुरेखा अपने मेकअप को फिर से ठीक करने लगी.

सजल के लौटते ही उसने अपना पर्स लिया और माँ बेटे घर को बंद कर कर सजल के नाना के घर के लिए निकल पड़े.

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सागरिका: “संजना, तुम पहले नहा लो, फिर मैं तुम्हारा मेकअप करूंगी. तब तक तुम्हारे लिए कपड़े निकाल लेती हूँ.”

संजना: “थैंक यू , भाभी.”

ये कहकर संजना बाथरूम में गयी और जल्दी ही नहाकर तौलिया लपेटे हुए बाहर आयी. सागरिका ने उसे देखा तो उसे देखती रह गयी.

“क्या देख रही हो भाभी?”

“तुम सच में बहुत ही अधिक सुंदर हो. ऐसे बेकार कपड़े क्यों पहनती हो जिसमें तुम इतनी साधारण लगती हो. कोई बात नहीं, अब मैं तुम्हारे लिए सारे नए कपड़े लूँगी।”

“अरे नहीं, भाभी. मुझे ये ठीक लगते हैं.”

“भाभी की बात टालोगी?”

संजना ने हाथ डाल दिए. “ओके, भाभी.”

“तुम ये लहँगे वाली ड्रैस पहनो, तब तक मैं भी नहा लेती हूँ.”

संजना ने सागरिका द्वारा दिए कपड़े पहने तब तक सागरिका भी बाहर आ गयी. पर संजना का मुंह खुला ही रह गया. बात ये थी कि सागरिका नंगी ही बाहर आ गयी थी. संजना की ऑंखें सागरिका के अदम्य सौंदर्य से चौंधिया गयीं.

“भाभी आप तो बहुत सुंदर हो. निखिल भैया बहुत भाग्यशाली हैं.” ये कहते हुए संजना की आँखें सागरिका के तराशे हुए शरीर पर फिसल रही थीं. उसकी आँखें सागरिका की चूत के ऊपर ठहरीं जहाँ बाल का एक भी रेशा नहीं था. एकदम स्पॉट और चिकनी चूत को देखकर संजना चकित रह गयी और पूछ बैठी.

“भाभी आपकी चू… पर बाल नहीं हैं?”

“लेसर से निकलवा दिए. तुम्हारी भी ऐसी ही चिकनी करवा दूंगी. मॉम बता रही थीं कि तुमने अच्छा जंगल बनाया हुआ है.”

संजना शर्मा गयी.

“भाभी, मैंने कभी सोचा नहीं इस बारे में.”

“मुझे सासू माँ से पूछना पड़ेगा, उन्होंने भोग के बाद क्यों नहीं करवाया उसे साफ.”

संजना को समझ नहीं पड़ रहा था कि क्या कहे.

सागरिका उसके पास आयी और बोली, “मेरी प्यारी ननद, अब मैं तुम्हारा ध्यान रखूँगी। और एक बात और शर्माना बंद करो.”

संजना को अपनी माँ के द्वारा दिया गया यही पाठ याद आ गया. “ओके, भाभी.”

सागरिका ने संजना को ड्रेसिंग टेबल पर बैठाया और उसका मेकअप करने लगी. जल्दी ही संजना का रूप मानो बदल ही गया. वो स्वयं को ही पहचान नहीं पा रही थी. इसके बाद सागरिका ने उसे उठाया और फिर अपने कपड़े पहने और मेकअप किया. कुछ ही देर में दोनों सुंदरियां पार्टी के लिए तैयार थीं. सागरिका ने संजना का हाथ लिया और कमरे से निकलकर बैठक में आ गयी. वहाँ देखा तो जॉय बैठा था, पर शोनाली, पारुल और सुमति का अता पता नहीं था. जॉय अपनी बेटी को देखकर मंत्रमुग्ध हो गया और फिर उसने संजना को देखा तो उसका मुंह खुला रह गया. वो उसे पहचान नहीं पाया, वैसे भी वो संजना से एक ही बार मिला था.

“ये कौन है?”

“ओह डैड, आप संजना को नहीं पहचाने?”

“ओह, वाओ. संजना तुम बिलकुल परी लग रही हो.”

“थैंक यू अंकल. ये भाभी का कमाल है.”

“कौन भाभी?” जॉय की बुद्धि काम नहीं कर रही थी.

“डैड, डैड, डैड. मैं इसकी भाभी बनने वाली हूँ. आप भी न.”

जॉय खिसियानी हंसी हंस पड़ा.

“तुम दोनों को देखकर मैं बिलकुल अवाक् हूँ.”

तब तक पारुल, शोनाली और सुमति भी आ गए. जॉय का लौड़ा इन पाँच सुंदर स्त्रियों को देखकर खड़ा हो गया. सभी स्त्रियों ने एक दूसरे की प्रशंसा करते हुए एक दूसरे को हल्के से चूमा. फिर जॉय को देखा तो उसे देखकर लगा कि वो जड़वत है. शोनाली उसके सामने गयी.

“चलिए, हमें बाद में देख लेना. देर हो जाएगी.”

“हाँ, हाँ, चलो, चलो .”

घर बंद करते हुए पहले ये विचार किया कि पैदल जाएँ या कार से, फिर कार से ही जाने में भलाई समझी और ५ मिनट में ही वे सब समर्थ के घर की घंटी बजा रहे थे.

उधर सुप्रिया और उसके दोनों बेटे निखिल और नितिन भी तैयार थे. सुप्रिया ने दोनों को देखा तो उसका मन भर आया. फिर अपने मन को संयत करते हुए उसने कहा, “लगता है आज तुम दोनों मम्मी की अच्छी सेवा करोगे रात भर.”

निखिल ने उत्तर दिया, “पहले तो ये पता नहीं कि नानाजी ने क्या कार्यक्रम बनाया है. उनके और नानी के बीच में इस पार्टी के लिए क्या तय हुआ है, ये वही जानते हैं. तो सम्भव है कि आपकी रात हमारे बीच न बीते बल्कि किसी और के साथ बीते। “

सुप्रिया ने कुछ सोचा फिर कहा, “जो भी हो, कल सुबह तो तुम दोनों मेरी अच्छी चुदाई करोगे ही. अगर जाना न होता तो मैं तो अभी से चुदाई के मूड में हूँ.”

निखिल ने आगे बढ़कर सुप्रिया के दोनों गालों पर हाथ रखा, “मॉम, कोई ऐसा समय बता सकती हो, जब आप चुदाई के मूड में नहीं रहती हो.”

“हट, बदमाश. पर तेरी बात सही है. चलो निकलें.”

कुछ ही देर में वे तीनों भी समर्थ के घर में प्रवेश कर रहे थे. उनके आगे सुरेखा और सजल अंदर गए थे. उन्हें आश्चर्य हुआ कि संजना नहीं आयी, फिर सोचा कि बाद में आएगी. अंदर अब लोग खड़े बातें कर रहे थे. निखिल अपनी भावी पत्नी को ढूंढ रहा था. उसे जब सागरिका दिखी तो उसके साथ एक नयी लड़की को देखकर उसे हैरानी हुई. इस समय उस लड़की को सुरेखा मौसी देखकर कुछ कह रही थीं और उसके चेहरे और माथे को बार बार चूम रही थीं. निखिल उस ओर गया और सागरिका ने उसे देखकर अपनी ४०० वाल्ट की मुस्कुराहट से उसका स्वागत किया. सागरिका की ओर देखकर वो उस लड़की को देखने लगा, कुछ जानी पहचानी सी लगी.

“मौसी, ये कौन है?” उसने सुरेखा से पूछा.

“बूझो तो जानें.” सुरेखा और सागरिका एक साथ बोल पड़ीं.

निखिल ने उस लड़की को देखा और फिर चिल्लाया, “संजू, तू! ओह भगवान! तू कितनी सुंदर लग रही है!” ये कहकर उसने संजना को गले से लगा लिया. संजना भी अपने भाई के सीने से चिपक गयी. निखिल ने उसका माथा चूमकर कहा. “इतनी सुंदर है तू, फिर क्यों झल्ली बनी घूमती है?”

सागरिका: “यही मैंने इससे पूछा था. और मौसी, अब मैं इसके कपड़े और मेकअप का ध्यान रखूंगी. आप कृपया मना मत करना.”

सुरेखा ने सागरिका को बाँहों में ले लिया, “तुम्हारी किसी बात के लिए मैं कभी मना नहीं करूंगी. आज तुमने मेरी संजू के लिए किया है, मैं इसे हमेशा ध्यान में रखूंगी.”

निखिल ने सागरिका से पूछा, “इसे तुमने सजाया है?”

संजना बोल उठी, “हाँ, भैया, ये भाभी का ही जादू है.”

निखिल, “थैंक यू, सग्गू. यू आर वंडरफुल.”

सागरिका, “अरे कुछ नहीं, मेरी इकलौती ननद है. इसके लिए नहीं करूंगी तो किसके लिए करूंगी?”

सभी लोग भावनाओं के सागर में भीग गए. इतने में समर्थ ने सबका ध्यान खींचा। समर्थ की ओर सबकी ऑंखें चली गयीं. इस समय सब अलग अलग खड़े हुए थे.

समर्थ: “सब बैठ जाओ, मुझे और शीला आपको कुछ बताना चाहते हैं.”

बैठक बड़ी होने के बाद भी इतने लोगों के लिए अपर्याप्त थी. पर किसी प्रकार सभी लोग बैठ गए. कुछ लड़कियां अपने पिता की गोद में जा बैठीं और कुछ माताएं अपने बेटों की. सबका ध्यान अब समर्थ और शीला की ओर था. शीला ने इस समय बहुत सरल मेकअप किया था, परन्तु इसमें भी उसका आकर्षण बढ़ा ही था.

समर्थ: “निखिल के विवाह की बात जब से चली है, मैं और शीला अपने विषय में कुछ चिंतन कर रहे हैं. ये जानकर कि हमारे नाती, नातिन विवाह करने वाले हैं, जानकर मन में इतनी प्रसन्नता है कि उसका वर्णन सम्भव नहीं है. पर इसके साथ ये भी आभास है कि अब हमें अपने आप को कुछ गतिविधियों से अलग कर देना चाहिए.”

ये सुनकर सबके चेहरे पर आश्चर्य और उदासी छा गयी.

समर्थ: “चिंता न करो, इनमें वो गतिविधियां नहीं हैं जो हमारे घर का अभिन्न अंग हैं. मैंने ये निश्चय किया है, कि मैं अब अपने बिज़नेस को सुप्रिया और सुरेखा के हाथों सौंप रहा हूँ. मैं उन्हें किसी भी प्रकार की सलाह के लिए अवश्य उबलब्ध रहूँगा, पर अब ये इन दोनों का ही उत्तरदायित्व है. इसके लिए मैंने आवश्यक अनुदेश दे दिए हैं और १ जनवरी से पूर्ण नियंत्रण इन दोनों के पास चला जायेगा. हाँ, मैं वेतन के रूप में कुछ राशि हर माह लूँगा, परन्तु मुझे नहीं लगता कि इसमें किसी को कोई आपत्ति होगी. ये राशि मुझे और शीला को बराबर मिलेगी और जीवन पर्यन्त मिलेगी. हम में से किसी की मृत्यु होने पर पूरी राशि जीवित व्यक्ति को मिलेगी. अगर किन्ही कारणों से कम्पनी किसी और को बेची जाती है, तो उसमें से ३०% भाग हमारा होगा. कल इस आशय के पत्र सुप्रिया और सुरेखा को दे दिए जायेंगे. इसीलिए, मैं निखिल, नितिन और सजल को कल की पार्टी के लिए पहले से धन्यवाद देता हूँ, क्योंकि ये मेरी कम्पनी के भागीदार के रूप में अंतिम होगी.”

सभी समर्थ की इस बात को चुपचाप सुन रहे थे. सुप्रिया और सुरेखा की आँखों से आंसू बह रहे थे.

“कुछ और आवश्यक बदलाव भी मैंने सोचे हैं. जैसा कि तुम सब जानते हो कि परिवार बढ़ रहा है. इसीलिए मैंने अपने बंगले में कुछ और विस्तार करने का निर्णय लिया है. बंगले की पश्चिम दिशा में बढ़ोत्तरी की जाएगी. ठेकेदार के अनुसार इसमें लगभग आठ महीने का समय लगेगा. मेरा ये विचार है, कि उसके समापन पर सुरेखा और सुप्रिया दोनों अपने परिवारों के साथ इसी घर में रहें. वैसे भी तुम लोगों का आधा समय यहीं बीतता है, तो अधिक अंतर नहीं पड़ेगा. तुम दोनों अपने वर्तमान बंगलों का क्या करना चाहते हो, ये तुम्हारा निर्णय रहेगा. पर शीला के अनुसार सुरेखा का घर संजना को दिया जाये जिससे कि वो विवाह के बाद उसमें ही रह सके. अगर उसका विवाह शहर से बाहर हो, तो ये निर्णय बदला जा सकता है. घर के विस्तार का नक्शा जो देखना चाहे वो देख सकता है.”

“अब जैसा कि सब देख सकते हैं, की हमारी बैठक अपने बढ़ते परिवार के लिए छोटी पड़ रही है, इसीलिए इसके लिए भी प्रयोजन किया गया है. पर मैं देख रहा हूँ कि गोदी में बैठने में बहुत सुख मिल रहा है.”

इस बात पर सब हंस पड़े.

“सागरिका और निखिल की अगले सप्ताह सगाई है. और उसके दो दिन बाद मैं और शीला दो माह के विश्व दर्शन पर निकल रहे हैं. इसमें से एक मास हम भारत भृमण करेंगे और शेष विश्व के कुछ और देशों का. मुझे विश्वास है कि इस अवधि में सुप्रिया और सुरेखा को मेरी आवश्यकता कम्पनी के कार्यों के लिए नहीं पड़ेगी. मैं जॉय और सुमति से भी अनुरोध करूंगा कि जहाँ तक सम्भव हो वे भी इन दोनों की सहायता करें. जॉय के वर्षों का अनुभव और सुमति की आंतरिक बुद्धिमत्ता मेरी बेटियों के लिए अमूल्य सिद्ध होगी.”

“अब अगर किसी के मन में कोई प्रश्न हो तो मुझसे, सॉरी, हम दोनों से पूछ सकता है.”

प्रश्न कई थे, पर समर्थ और शीला ने उन सबका शांति और सफलता से उत्तर दिया. इसके बाद सुप्रिया और सुरेखा जाकर दोनों के गले मिलीं. समर्थ ने सुरेखा के कान में कुछ कहा और सुरेखा ने सिर हिलाकर हामी भरी. जॉय ने उठकर समर्थ का हाथ मिलाया. सुमति की आँखों में नमी थी, आज उसके भाई भाभी के सिवाय किसी और ने उसकी प्रशंसा जो की थी. समर्थ ने उसे गले से लगाया और सुरेखा को संकेत किया. सुरेखा ने भी सुमति को गले लगाया और कहा कि १ जनवरी से वो भी उनकी कम्पनी में उन दोनों के साथ काम करेगी. उसका क्या काम रहेगा, इसका निर्णय ये देखकर किया जायेगा कि वो किस कार्य में उत्कृष्ट है.

फिर समर्थ की हुंकार सुनाई दी, “तो अब पार्टी हो जाये!”

समर्थ की इस घोषणा ने सबको एकाएक सक्रिय कर दिया. नितिन, निखिल और सजल ने जल्दी ही व्हिस्की, वाइन और बियर को बार में सजा दिया. उनके संकेत पर पारुल और संजना ने सबसे पूछकर तीनों भाइयों को बता दिया. सागरिका ने आगे बढ़ कर सहायता करनी चाही तो उसे सुप्रिया ने रोक लिया.

“उन्हें करने दो, तुम अब घर की रानी जो बनने जा रही हो.”

“ओह नहीं मॉम, रानी तो नानी, आप और मौसी ही रहेंगीं. मुझे राजकुमारी समझ लीजिये.” ये कहकर सागरिका ने अपनी हँसी से सुप्रिया के दिल के तार गुदगुदा दिए.

शीला ने सुप्रिया के पास आकर उसे कहा तो सागरिका ने भी उनके इस खेल में सम्मिलित होने की इच्छा की. पर शीला ने उसे बताया कि उसके लिए समर्थ ने कुछ अलग सोचा है. और वैसे भी, आज रात लम्बी रहने वाली है. अब जब समर्थ ने अवकाश लेने का संकल्प लिया है, तो उन्हें अब अपने जीवन को नए रंग में जीने का अवसर मिला है.

सबकी ड्रिंक्स हाथ में देने के बाद निखिल ने व्हिस्की ली, और अन्य चारों ने बियर. महिलाओं ने वाइन को चुना. जॉय और समर्थ भी व्हिस्की ही पी रहे थे. घुल मिल कर बातें करते हुए दूसरे राउंड की ड्रिंक्स भी आ गयीं. इतने में रेस्त्रां से खाना भी आ गया. कुछ देर के बाद सबने ड्रिंक समाप्त की और खाने पर जुट गए. खाना कम कैसे नहीं पड़ा ये एक रहस्य ही रहेगा क्योंकि सभी भूखे तो थे ही. खाने के बाद समर्थ ने जॉय को बालकनी में बुलाया. समर्थ ने एक सिगरेट निकाली और जॉय से भी पूछा. जॉय ने एक सिगरेट ली और दोनों सुलगाकर कुछ देर चुप खड़े रहे.

समर्थ: “जॉय, मैंने जो कहा था, उसे गंभीरता से लेना. मैं चाहता हूँ कि मेरी बेटियाँ इस व्यवसाय को और आगे ले जाएँ, पर समाज में स्त्री द्वारा चलाये व्यापार के साथ अधिक धोखा करने का अनुभव है मुझे. मेरी दोनों बेटियाँ कुछ भावुक हैं और इसका लाभ कुछ लोग उठाकर बिज़नेस को हानि पहुंचा सकते हैं. मैं तुमसे निवेदन करता हूँ, कि सेल और पैसे की वसूली की ओर अगर तुम बीच बीच में देखते रहोगे तो किसी भी हानि से बचा जा सकता है. मैं सुमति को इसीलिए भी इसमें मिलाना चाहता हूँ क्योंकि वो बहुत दृढ मन की है, और वो इन दोनों के दयालु स्वभाव की काट के रूप में काम कर सकती है.”

जॉय ने समर्थ को विश्वास दिलाया कि वे इसका ध्यान रखेगा और उसे भी समय समय पर अपने सुझाव भी देता रहेगा.

“वैसे पार्थ ने रूचि आहूजा के साथ जो डील की है तो मैं रूचि को भी आग्रह कर सकता हूँ. मैं उसके पिता और पति से अच्छे से परिचित था. परन्तु उसका मुख्य कार्य ये नहीं है. परन्तु तुम्हारे साथ अगर वो भी ध्यान रखेगी तो सब ठीक चलेगा.”

जॉय ने उसकी बात की सराहना की.

समर्थ: “आज तुम्हें मेरी छोटी बेटी का भी स्वाद चखने मिल सकता है, अगर हम जल्दी अंदर चलें और तुम उस पर पहले हाथ डाल दो. नहीं तो मेरे नाती उस पर लट्टू हैं.”

ये सुनकर जॉय ने तुरंत सिगरेट फेंकी और अंदर चल दिया. समर्थ भी एक छुपी मुस्कान लिए उसके पीछे हो लिया. अंदर खेल आरम्भ तो नहीं हुआ था पर देर भी नहीं थी. जॉय ने सीधे सुरेखा की ओर कदम बढ़ाये. और उसने नितिन को कुछ ही सेकंड से पछाड़ दिया. सुरेखा को देखकर जॉय ने कहा कि वो इतने दिन से उसका साथ पाने के लिए आतुर था, पर अवसर न मिलने के कारण हर बार चूक गया था. तो क्या सुरेखा आज उसके साथ कुछ समय बिताना पसंद करेगी. सुरेखा ने उसके बढ़े हाथ को लिया और हामी भरी. नितिन जो इस आशा में था कि अगर सेटिंग नहीं हुई तो मौसी को वो चोदेगा निराश होकर मुड़ा तो सागरिका से भिड़ गया.

“मेरे प्यारे देवर जी, आज आपको अपनी भाभी की सेवा करनी होगी. आप किसके चक्कर में थे? मौसी को आज मेरे पापा के साथ छोड़ दीजिये न प्लीज.”

सुमति समर्थ के पास जाकर उनके गले लग गयी.

“अपने मेरे ऊपर इतना विश्वास किया है, बाबूजी. मैं इसे कभी नहीं तोडूंगी.”

“मुझे पता है. मेरी दोनों बेटियां लोगों पर बहुत भरोसा कर लेती हैं. अन्यथा वे बहुत चतुर हैं.” समर्थ ने सुमति के नितम्ब पर अपने हाथों से दबाव बनाया और सुमति उनसे और अधिक सट गयी.

सुप्रिया ने संजना को अपने साथ लिया. संजना अपने चारों और बन रहे वातावरण से कुछ अचरज में थी. सुप्रिया ने उसे शीला के सामने लेकर खड़ा कर दिया.

“मम्मी, सम्भालो अपनी नातिन को. ये अब कली से फूल बनने के लिए आतुर है, और मुझे नहीं लगता कि अब इसे अधिक दिन तक रोक पाएंगे. तो आज इसके रस का पान करने का एक अवसर है, सबके लिए. इससे पहले कि पापा इसका कौमर्य लें, आप भी इसका स्वाद ले लो.”

शीला ने प्यार से संजना के चेहरे को हाथ में लेकर कहा, “हाँ, समर्थ बहुत अधीर है इसके लिए. हमारे भृमण पर निकलने के पहले वो इसे अवश्य फूल बना देंगे. और आज इस कच्ची कली का रस में तो पियूँगी ही, पर इसे भी अपना रस पिलाऊँगी। क्यों संजू, नानी का रस तो पिएगी न?”

“जी नानी” इसके अधिक संजना कुछ न कह सकी.

सुप्रिया: “मम्मी, आप इसे सम्भालो, मैं पारुल को देखती हूँ.”

निखिल शोनाली से बात कर रहा था, “तो सासु माँ, क्या मन है आज आपका?”

शोनाली ने उत्तर दिया, “देख रही हूँ कि हम दोनों और सजल ही बचे हैं, तो क्यों न सजल को साथ ले लेते. दोनों मिलकर मुझे चोदो।”

“नेकी और पूछ पूछ.” ये कहकर निखिल ने सजल को पुकारा जो निराश सा एक ओर खड़ा था. निखिल के बुलाने पर उसका चेहरा खिल गया. वो तपाक से पास आ कर खड़ा हो गया.

“मामीजी की इच्छा है कि हम दोनों इनकी एक साथ चुदाई करें. क्या सोचते हो?”

सजल ने तुरंत अपनी स्वीकृति दे दी. अब समस्या यही थी कि किसे कहाँ जाना है. और समर्थ ने इसका विचार पहले ही किया हुआ था.

"मैं और शीला अपने कमरे में जा रहे हैं. सुप्रिया और सुरेखा सुप्रिया के कमरे में जाओ. नितिन और निखिल तुम तीसरे कमरे में जाओ. मैंने रिकॉर्डिंग चला दी है. बाद में हम सब देखेंगे. किसी को कोई आपत्ति?”

इसका कोई प्रश्न ही नहीं था. शीला और समर्थ संजना और सुमति को लेकर अपने कमरे में चले गए. सुप्रिया और सुरेखा पारुल और जॉय को अपने कमरे में, और नितिन, निखिल और सजल शोनाली और सागरिका को लेकर अपने कमरे में चले गए.

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समर्थ और शीला:

कमरा बंद होते ही समर्थ ने सुमति को खींचा और उसे चूमते हुए उसके ब्लॉउस के हुक खोल दिए. उधर शीला संजना को लेकर बिस्तर पर बैठी और उसका चेहरा उठाकर चूमने लगी.

“बहुत मीठी है तू संजना, बहुत प्यारी. सदा ऐसे ही रहना बिटिया.” शीला ने उसे एक बार फिर चूमा और अपने गले का हार उतारकर संजना को पहनाया. “अब तू और भी अधिक सुंदर लग रही है. जाकर देख तो अपने आप को.”

संजना तुरंत उठकर शीशे में अपने आप को देखने लगी. सगारिका द्वारा किया गया मेकअप, सुंदर पोशाक और गले में ये कीमती हार, सच में उसकी सुंदरता को अद्वितीय बना रहे थे. कई मिनट तक वो स्वयं को भिन्न भिन्न कोणों से निहारती रही. फिर उसने प्रतिबिम्ब में नानी को पीछे खड़े होते देखा.

“सुंदर लग रही है न?”

“जी नानी, थैंक यू.” ये कहते हुए संजना पीछे मुड़ी तो चौंक गयी. उसकी नानी ने अपने कपड़े उतार दिए थे और अब वो नंगी ही संजना के सामने खड़ी थी. संजना ने उनके शरीर को एक बार देखा.

“नानी, आप भी बहुत सुंदर हो. तभी मम्मी, मौसी और मैं भी ऐसी हैं.”

“चल झूठी, इस बुढ़िया को मक्खन लगा रही है.”

“नहीं माँ जी, सच बोल रही है.” ये सुमति ने कहा था.

संजना ने उस ओर देखा तो उसने सुमति को भी नंगा पाया. और वो अपने घुटनों के बल थी और उसके मुंह के सामने नाना का विशाल लंड तना खड़ा था. संजना नाना के लंड को देखकर अचम्भित हो गयी. अब तक उसने केवल सजल का ही लंड देखा था, जो उसे बड़ा लगता था, पर नाना का लंड तो सजल से भी बड़ा था. अधिक नहीं, पर बड़ा अवश्य था.

“चल आ, बस अब तू ही रह गयी है अपने कपड़ों में, तुझे तो मैं अपने हाथ से नंगा करूंगी.”

ये कहते हुए शीला बारी बारी से संजना के वस्त्र उतारकर एक ओर अच्छे से रखने लगी.

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सुप्रिया और सुरेखा:

दोनों बहनें बाप बेटी (जॉय और पारुल) के साथ सुप्रिया के कमरे में आ गए. वैसे तो एक कमरा सुरेखा का भी था, पर वो वहाँ कम हो रूकती थी. इसीलिए इतना व्यवस्थित भी नहीं था, पर अब समर्थ की घोषणा के बाद इस विषय में भी कुछ करना होगा. कमरे के अंदर आने के बाद जॉय ने एक ड्रिंक मांगी. सुप्रिया ने उसे उसकी ड्रिंक बनाकर दी. पारुल जो घरेलू चुदाई की अभ्यस्त थी, उसके पिता की ड्रिंक बनते समय ही अपने कपड़े उतार कर सोफे पर बैठ गयी थी. सुरेखा ने उसे इतनी सरलता से निर्वस्त्र होते देखा तो आश्चर्य किया, पर अब वो अपने परिवार में भी व्यभिचार के दर्शन कर चुकी थी, इसीलिए उसने इसे सहर्ष स्वीकार किया.

जॉय के हाथों में उसकी ड्रिंक देकर सुप्रिया ने उसके होंठ चूमे, “मेरी बहन का अच्छा ध्यान रखना समधी जी.”

जॉय ने उसे विश्वास दिलाया कि वो अपनी ओर से कोई कमी नहीं छोड़ेगा. सुप्रिया ने पारुल को देखा जो पहले ही नंगी हुई बैठी थी.

“वाह, बहुत सुंदर और स्वादिष्ट.”

पारुल की नमी से भीगी पारुल की चूत की ओर देखकर सुप्रिया के मुंह में पानी आ गया. उसने भी अपने कपड़े उतारने में अधिक देर न की. और जब तक वो नंगी होकर पारुल के आगे खड़ी हुई, जॉय और सुरेखा भी अपने बंधनों से मुक्त हो चुके थे. जॉय ने सुरेखा को अपनी बाँहों में लेकर एक गहरा चुंबन दिया. सुरेखा इस चुंबन में खो सी गयी और जॉय के सीने से लगकर खड़ी हो गयी. पर जॉय का मन अभी नहीं भरा था. वो सुरेखा का चेहरा उठाकर फिर से उसे चूमने लगा और इस बार सुरेखा ने उसका पूरा साथ दिया. एक दूसरे के चुंबन में खोये इन दोनों को अब कमरे में उपस्थित अन्य दो व्यक्तियों का भान ही नहीं था.

“मुझे तुम्हारी चूत का स्वाद लेना है.” सुप्रिया ने पारुल से कहा.

“और मुझे आपकी.” पारुल ने उत्तर दिया.

“तो फिर समय नष्ट करने का कोई अर्थ नहीं. तुम नीचे या मैं?”

“जैसा आप चाहो.”

“हम्म, ठीक है, तुम नीचे लेटो.”

ये कहते हुए पारुल को बिस्तर पर लिटाकर सुप्रिया ने अपनी चूत उसके मुंह पर रखी और फिर आगे झुकते हुए पारुल की पसीजी चूत पर अपनी जीभ फिराई। उसने पारुल के शरीर में एक कम्पन अनुभव किया और अगले ही पल उसके शरीर में भी वही कम्पन हुआ जब पारुल की जीभ ने उसकी चूत पर अपनी जीभ चलाई. जॉय ने सुरेखा से अपना चुंबन तोड़ा और उसे बिस्तर पर बैठकर उसके दोनों पांव फैला दिए. सुरेखा ने भी जॉय का आशय समझते हुए अपनी जांघें और फैला दीं. जॉय ने उसके जांघों को चूमते हुए उनपर बारी बारी अपनी जीभ चलाई. सुरेखा के शरीर में बिजली सी कौंध गयी. हल्के हल्के जाँघों को चूमते हुए जॉय ने सुरेखा की चूत के ऊपर अपना मुंह जोड़ा और गहरे चुसाव के साथ चूत को चूस लिया. सुरेखा की साँस रुक गयी. ऐसा उसने पहले कभी भी अनुभव नहीं किया था. जॉय ने अब बिना रुके उसकी चूत के चारों ओर और अंदर अपनी जीभ को चलाया तो सुरेखा का मन विव्हल हो गया.

इस समय दोनों बहनों की चूत को बाप बेटी चूसने चाटने में लगे थे. पर पायल भी सुप्रिया की चूत पी रही थी, जबकि सुरेखा का मुंह खाली था. सुरेखा ने इसे ठीक करने के लिए जॉय से कहा कि वो भी उसे अपने लंड चूसने के लिए दे. सुरेखा बिस्तर पर लेटी और जॉय ने ऊपर से अपने लंड को उसके चेहरे के सामने लहराया. सुरेखा ने हाथ में लेकर उसे अपने मुंह में लिया और जॉय ने आगे झुकते हुए सुरेखा की चूत का सेवन पुनः आरम्भ कर दिया.

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शोनाली और सागरिका:

शोनाली अपनी बेटी सागरिका, अपने होने वाले दामाद निखिल और उसके दोनों भाइयों के साथ तीसरे शयनकक्ष में प्रविष्ट हुई. उसके पीछे चल रहे तीनों भाई उसके उचकते कूल्हों को देखकर मंत्रमुग्ध थे. शोनाली भी उन्हें कुछ अधिक ही उछालते हुए चल रही थी. सागरिका के ऊपर तो मानो किसी का ध्यान ही नहीं था. अगर सागरिका की ऑंखें पीछे देख पातीं तो उसे अवश्य ईर्ष्या होती, अपनी माँ से. पर सृष्टि की रचना ऐसी नहीं है. कमरे में अंत में सजल ने कदम रखा और दरवाजे को बंद कर दिया.

शोनाली: “ओके, देखो, अब हम सब यहां हैं, तो मैं सीधी बात कहती हूँ. मुझे तीनों के लंड चाहिए, एक साथ. ऐसा किये हुए मुझे बहुत समय हो चुका है, और मैं इस अवसर को खोना नहीं चाहूंगी. सागरिका, तुम क्या चाहती हो?”

सागरिका: “मॉम, आप ने तो मेरे दिल की बात छीन ली. मैं भी यही चाहती थी. पर क्योंकि सजल हमसे पहली बार मिला है, तो मैं उससे जानना चाहूंगी कि वो क्या चाहता है. पहले आप या मैं?” सागरिका अपने कपड़े निकाल रही थी और उसकी सुंदरता को देखकर सजल ठगा सा खड़ा था.

शोनाली: “क्यों न हम उसे दिखा दें कि उसे क्या मिलने वाला है, जिससे उसे निर्णय में कठिनाई न हो.” शोनाली ने अपनी साड़ी का पल्लू नीचे किया और फिर उसे उतारने लगी.

सजल इन दोनों को देखकर विस्मित था. किसे चुने? इसका समाधान उसके बड़े भाई निखिल ने कर दिया.

निखिल: “मैं तो कहूंगा कि आप दोनों को सजल का लंड पहले अपनी चूत में लेना चाहिए. जब तक वो ऐसा नहीं करेगा, हम दोनों आपको छुएँगे भी नहीं. और फिर उसके बाद हम दोनों भी आपकी चुदाई करेंगे, जैसा आप चाहती हो.”

सजल ये सुनकर खुश हो गया. उसे उसके मन की इच्छा पूरी होते दिखी. “हाँ ये ठीक है. पर पहले आंटी।”

शोनाली ने सागरिका की ओर विजयी मुस्कान के साथ देखा. सागरिका ने उसे देखा और मुस्कुराई.

“मॉम, आप अगर ये सोचकर इतरा रही हो कि सजल पहले आपको चोदने वाला है, तो मैं आपको ये बता देती हूँ कि मैं भी सजल से अपनी गांड पहले मरवाऊँगी उसके बाद इन दोनों को छूने दूँगी.”

अब तो सजल की ख़ुशी की सीमा ही नहीं रही. न केवल उसे शोनाली की चूत मिलने वाली थी, बल्कि उसकी होने वाली भाभी उससे गांड भी मरवाने के लिए तैयार थी.

निखिल: “लगता है छोटे भाई, आज तेरी बहुत अधिक माँग है. चल आगे बढ़ और मम्मी जी को चोद, हम तेरा साथ देने के लिए जल्दी ही आते हैं.”

नितिन अब तक बिना कुछ बोले नंगा हो ही चुका था. निखिल ने भी अपने कपड़े उतार दिए. सजल के हाथ अपने कपड़े उतारते हुए कांप रहे थे, तो सागरिका ने आगे बढ़ते हुए उसका साथ दिया और जल्दी ही वो भी नंगा था.

नितिन ने उसे देखकर सीटी बजाई, “भाई अब छोटा नहीं रह गया.”

और सच में सजल का खड़ा लंड गर्व से तन कर खड़ा था. शोनाली भी उसके लंड को प्यासी आँखों से देख रही थी. फिर वो आगे बढ़ी.

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समर्थ और शीला:

शीला ने जब संजना के नंगे शरीर को देखा तो उसे ईर्ष्या सी हुई. जवानी की अनछुई कली थी संजना. एक समय शीला भी ऐसी ही दिखती थी. पर आयु ने उसके शरीर को ढाल दिया था. कसे हुए कटाव, चिकनी त्वचा, कहीं भी किसी सिलवट का नामोनिशान नहीं था उसकी नातिन के शरीर पर. उसे प्यार से बिस्तर पर लिटाते हुए वो संजना की आँखों में देख रही थी. पर उसे वहां वासना नहीं बल्कि शीला के प्रति अपार प्रेम और समर्पण दिख रहा था. संजना के भोलेपन पर शीला का भी प्रेम उमड़ पड़ा. वो संजना के चेहरे को हाथों में लेकर चूमने लगी. उसके चेहरे का कोई भी रोम नहीं था जिसे शीला ने नहीं चूमा. संजना केवल अपनी नानी के इस प्रगाढ़ प्रेम को प्राप्त कर रही थी. बिना कुछ कहे. शांत.

पर समर्थ को ये सब दिख रहा था और उसने शीला के इस प्रेम को समझा. उसे संजना के यौवन में शीला की जवानी याद आ गयी. सुमति इन सबसे अनिभिज्ञ समर्थ के लंड को चाटकर अपने लिए खड़ा करने में लगी थी. पर उसे अन्य लोगों की भी चिंता थी. किसी को याद भी रहेगा कि नहीं उसके प्रोटीन का डोस का. उसे विश्वास था कि अन्य कमरों में जब गांड में माल छोड़ा जायेगा तो उसके लिए सहेजा जायेगा. उसके मुंह में पानी आ गया और ये पानी समर्थ के लंड के ऊपर बहने लगा.

शीला बिस्तर पर लेटी अपनी नातिन संजना के शरीर को ऊपर से चूमते हुए नीचे की ओर बढ़ रही थी. उसकी गर्दन, मम्मे, पेट, नाभि को चूमते हुए वो अपने गंतव्य की ओर आ रही थी. शीला के मुंह और जीभ के कभी हल्के और कभी गहरे स्पर्श से संजना आनंद से दूभर हो चुकी थी. उसकी मौसी और माँ के साथ किये सहवास ने उसे आगे आने वाले सुख की कल्पना तो करा ही दी थी, पर नानी जिस प्रकार उसके शरीर को पूज रही थीं, वो उसके लिए एकदम नया अनुभव था. उसकी अब तक अक्षत योनि पसीज गयी थी. हालाँकि उससे रस की वृष्टि तो नहीं हो रही थी, पर उसे अपनी चूत में कुछ नयी संवेदना अवश्य हो रही थी.

“नानी, आप क्या कर रही हो. ओह, नानी. मुझे क्या हो रहा है. मेरा शरीर जल रहा है. प्लीज नानी. आपने क्या किया है. मुझे कुछ हो रहा है. नानी.” वो बोले जा रही थी.

शीला उसके इस उद्गार समझ रही थी, और रुकने का उसका कोई भी आशय नहीं था. वो अपने लक्ष्य के निकट पहुँच चुकी थी. उसके अपनी उँगलियों से संजना की कच्ची चूत की पंखुड़ियाँ छेड़ीं तो संजना सिहर गयी. पंखुड़ियों को अलग करते हुए शीला ने उनकी अंदरूनी त्वचा को सहलाया तो संजना की चूत ने रस छोड़ दिया. शीला ने अपनी उँगलियों को अपने मुंह में लिया और प्रथम रिसाव को चखा. अद्भुत स्वाद और सुगंध ने उसके मुंह और नाक को विह्वल कर दिया.

उसने समर्थ की ओर देखा जो उसे ही देख रहा था. आँखों के संकेत से उसे बुलाकर शीला ने संजना की चूत के रस से अपनी उँगलियाँ भिगोयीं. समर्थ ने सुमति को प्यार से हटाते हुए शीला की उँगलियाँ चाटीं। और उसे भी शीला का ही अनुभव हुआ. ये स्वाद बस अब कुछ ही दिनों के लिए थे. कुछ ही दिनों के अंदर वो अपनी नातिन के कौमार्य को भंग जो करने वाला था. अब तक सुमति भी आ गयी और शीला ने उसे भी संजना का स्वाद चखाया. इसके बाद समर्थ और सुमति अपने कार्य में व्यस्त हो गए और शीला के होंठ संजना की चूत को पहुंच गए.

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सुप्रिया और सुरेखा:

हालाँकि सुप्रिया अन्य लोगों की उपस्थिति में इस प्रकार से कई बार चुदाई कर चुकी थी, पर सुरेखा के लिए ये एक प्रकार से पहला ही अवसर था. उसने अब तक केवल अपने सगे परिवार के साथ ही ऐसा किया था, परन्तु आज पहली बार उसे किसी अन्य परिवार के साथ ऐसा अवसर मिला था. पहले वो कुछ झिझक रही थी, पर उसने सुप्रिया को देखा जो बिना किसी चिंता के पारुल पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित किये हुए थी. उसने भी केवल जॉय के बारे में ही सोचने का निश्चय किया और इसी कारण अब वो जॉय के लंड को पूरे मन से चूस रही थी और जॉय के द्वारा उसकी चूत को मिलते सुख को भी अनुभूत कर रही थी.

जॉय अपने पूरे अनुभव को अपनी समधन की बहन की चूत को चाटने में झोंक दे रहा था. और उसे इसका प्रत्याशित फल भी मिल रहा था. सुरेखा की चूत अब खिल चुकी थी और उसे अपनी जीभ से उसकी अंदर की गहराइयों को छूने में कोई अधिक प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ रहा था. सुरेखा की चूत भी पर्याप्त मात्रा में अपना कामरस छोड़कर उसकी जीभ और उँगलियों का भरपूर स्वागत कर रही थी. उँगलियों से चूत को खोलकर जॉय अपनी जीभ से उसे अंदर और बाहर चाट रहा था. सुरेखा भी उसी तन्मयता से जॉय के लंड को चूस रही थी. ये उसके पति और परिवार के बाहर का पहला लंड जो था, और वो इसका पूरा आनंद लेना चाहती थी.

पारुल इस आयु में भी चुदाई में पूरी निपुण थी. और इसका श्रेय उसके घर की महिलाओं को जाता था. उसकी माँ शोनाली, बुआ सुमति और बहन सागरिका ने उसे पुरुष और स्त्री दोनों के साथ सम्भोग में पूर्ण रूप से पारंगत कर दिया था. सुप्रिया की अपने चेहरे पर उपस्थित चूत को वो बड़े ही प्रेम से चाट रही थी. हालाँकि सुप्रिया की चूत बहुत खुली हुई थी, क्योंकि उसकी चुदाई अच्छे बड़े लौंड़ों से होती थी, और बहुत समय से हो रही थी, परन्तु पारुल को इसके कारण अपनी जीभ को अंदर तक डालने में कोई भी व्यवधान नहीं आ रहा था. सुप्रिया भी अपनी गांड मटका कर उसके मुंह पर अपनी चूत को रह रह कर रगड़ देती थी. और जब वो ऐसा करती तो पारुल भी प्रतिउत्तर में अपनी गांड हिलती और सुप्रिया को उसकी चूत में अपने मुंह को लगाए रखने में कुछ प्रयास करना पड़ता था. पर दोनों एक दूसरे के साथ इस खेल का पूरा आनंद ले रही थीं.

सुरेखा की इच्छा अब चुदने की थी और उसने जॉय को इस बात के लिए संकेत किया. जॉय भी अब चुदाई के ही मूड में था, वो अपना पहला रस सुरेखा के मुंह में उसकी चूत के रस के साथ मिलाकर छोड़ना चाहता था. उसने पलटकर सुरेखा की टाँगों के बीच अपना स्थान बनाया और अपने लंड को उसकी स्पंदन करती चूत के मुहाने पर रखा. उसने सुरेखा को देखा तो उसकी दृष्टि भी उन दोनों के समागम के क्षेत्र पर ही टिकी थीं और उसके चेहरे पर प्रसन्नता और आत्मीयता के भाव थे.

सुरेखा की आँखों में देखते हुए जॉय ने अपने लंड को उसकी चूत में डालते हुए दबाव बनाये रखा. वो सुरेखा के चेहरे के बदलते भावों को पढ़ने का प्रयास कर रहा था. सुरेखा की मुस्कान, जैसे पल भर के लिए हटी, फिर दोबारा उसके चेहरे को सजाने लगी. उसके चेहरे पर आनंद और आश्चर्य के भाव थे. सुख की अनुभूति थी. जब जॉय के लंड ने पूरा रास्ता तय कर लिया तो वो भाव एक संतुष्टि के थे, जैसे किसी रिक्त स्थान और इच्छा की पूर्ति हो गयी हो.

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शोनाली और सागरिका:

शोनाली ने सजल के लंड पर से आँख हटाए बिना सधे कदमों से बढ़ते हुए उसके लंड को हाथ में थाम लिया. लंड उसके हाथ में फुदकने लगा. शोनाली के चेहरे पर मुस्कुराहट बिखर गयी.

“लगता है मुझे देखकर खुश हो रहा है.” शोनाली ने कहा.

सागरिका भी सजल के लंड पर आँखें गढ़ाए थी. जब शोनाली के हाथ में सजल का लंड मचला तो सागरिका की गांड में भी कुछ खलबली सी हुई. पर उसे पता था कि अभी उसकी गांड की खुजली मिटाने में समय लगेगा. परन्तु उसे एक नए लंड को अपनी गांड में लेने की कल्पना से ही उत्तेजना हो रही थी. निखिल उसके चेहरे के भाव देखकर समझ गया कि उसके मन में क्या है.

“थोड़ा रुको, जान. फिर तुम्हारी गांड में ये जायेगा, जैसा कि तुम चाहती हो.”

सागरिका ने निखिल को देखा और मुस्कुराते हुए सिर हिलाया.

शोनाली अब सजल के लंड को अपने हाथ में लिए हुए सहला रही थी. सजल का लंड इससे अधिक तन नहीं सकता था और उसे कुछ पीड़ा सी हो रही थी. शोनाली ने उसका दर्द समझा और उसे बिस्तर के कोने पर बैठाया और उसके सामने बैठते हुए उसके लंड को अपने मुंह में ले लिया. सजल के मुंह से एक सिसकी निकली. तीनों दर्शक सामने चल रहे दृश्य को उत्सुकता से देख रहे थे. इनमें से किसी ने सजल को पहले इस रूप में नहीं देखा था.

निखिल और नितिन अपने इस भाई के पराक्रम को देखने और उसकी सफलता की कामना कर रहे थे. वहीं सागरिका अपनी माँ को कुछ स्त्री सुलभ ईर्ष्या के साथ देख रही थी. फिर उसने ये सोचकर अपना मन मनाया कि सजल गांड तो पहले उसकी ही मारेगा। शोनाली के प्रतिष्ठित लंड चूसने की प्रतिभा का इस समय सजल पूरा आनंद ले रहा था. उसे ये आभास हुआ कि शोनाली उसकी माँ से इस कला में कोसों आगे है. उनकी जीभ जिस प्रकार से उसके टोपे पर नाच रही थी वो अपने आप में ही अविस्मरणीय था. उनका लंड को अपने मुंह में लेना, चूसना, निगलना और फिर बाहर निकाल देना, सब किसी कलाकार की सिद्धि का प्रारूप थे.

उसके लंड को मन भर चूसने के बाद शोनाली खड़ी हुई. सजल के सामने उसकी चूत बहार बिखेर रही थी. सजल ने अपना हाथ बढाकर उसकी चूत को छुआ और उसकी उँगलियों में शोनाली का रस आ गया. उसने अपनी ऊँगली सूंघने के बाद उसे अपने मुंह में लेकर चाट लिया. निखिल और नितिन ने ताली बजाकर उसके उस कार्य की सराहना की तो सागरिका ने भी उनका साथ दिया. उनके इस प्रोत्साहन से सजल को आगे बढ़ने का साहस हुआ और उसने शोनाली को अपनी ओर खींचकर उसकी चूत में अपना मुंह लगा दिया. फिर वो शोनाली की चूत को कुत्ते के समान चाटने लगा. शोनाली केवल ऊह आह ही करती रह गयी और सजल अपनी प्यास उसकी चूत से बुझाता रहा.

शोनाली को खड़ा रहना कुछ असहज लग रहा था तो उसने सजल के सिर को प्यार से थपथपाया और फिर हटाते हुए बिस्तर पर जा लेटी। अपने पाँव फैलाते हुए उसने सजल को उसकी चूत के सेवन करने का निमंत्रण दिया. इस बार सजल ने कुछ संयम से काम लिया और अपनी माँ के सिखाये अनुसार शोनाली की चूत का भोग लगाने में जुट गया.

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समर्थ और शीला:

समर्थ ने सुमति के कान में धीरे से फुसफुसाया: “किस किस की गांड से रस पीना है आज?”

सुमति के शरीर में रोमांच दौड़ गया, उसने काँपते शब्दों में कहा, “जिस जिस की सम्भव हो.”

“सबको तुम्हारा ये व्यसन पता है. और मैनें लड़कों को भी बता दिया है. तो तुम्हारा बुलावा आएगा जैसे ही वे गांड मारना आरम्भ करेंगे. तुम्हें इतना समय मिलेगा कि जाकर अपनी इच्छा पूरी कर सको. जॉय से मैंने कुछ नहीं कहा, पर सुप्रिया को बता दिया है.”

“थैंक यू” सुमति ने उनका आभार व्यक्त किया.

“अब लंड चुसाई बहुत हो गयी आओ अब तुम्हारी चूत को थोड़ा आनंद दें, उसके बाद तुम्हारी गांड की बारी रहेगी.” समर्थ ने उसे और उत्तेजित करने के लिए बताया. “वैसे चाहो तो शीला की गांड भी मार लूंगा तुम्हारे लिए, पर उसके पहले मुझे लगता है तुम्हें दूसरों कमरों का बुलावा आ जायेगा.”

समर्थ ने फिर उठकर सुमति को बिस्तर पर लिटाया और स्वयं जाकर टीवी ऑन करते हुए अन्य कमरों में लगे कैमरों पर लगा दिया. दो कमरों के दृश्य अब टीवी पर चल रहे थे. पर समर्थ ने टीवी को मौन कर दिया. वो इस कमरे के आनंद में विघ्न नहीं डालना चाहता था. सुमति समर्थ को प्यासी दृष्टि से देख रही थी और अपनी टाँगे चौड़ी करते हुए समर्थ द्वारा उसकी चुदाई का निमंत्रण दे रही थी. समर्थ ने उसकी भी न बुझने वाली प्यास को समझा और उसकी टॉँगों के बीच बैठकर अपने लंड को उसकी चूत पर रखते हुए एक लम्बा धक्का मारा. सुमति की चूत को चीरता हुआ उसका लंड अंदर जड़ तक समा गया. सुमति ने आनंद भरी एक सिसकारी ली. और समर्थ को अपने ऊपर खींचकर उसके होंठों से अपने होंठ जोड़ दिए.

उसकी सिसकारी सुनकर संजना का ध्यान उस ओर गया और उसने अपने नाना को सुमति की चूत के अंदर लंड डाले हुए देखा. न जाने कब मेरी भी चूत का उद्घाटन होगा. नाना और सुमति के चुंबन और नाना के इस आयु में भी गठे शरीर के संचार को देखकर वो प्रभावित थी. उसके आनंद को चार चाँद लगाने में उसकी नानी भी अपना योगदान दे रही थी. शीला ने अपने शरीर को ऐसे कोण में कर लिया था जहाँ से वो समर्थ और सुमति की चुदाई को देख सकती थी, वहीं वो अपनी प्यारी कमसिन नातिन की चूत का भी भरपूर सेवन कर सकती थी.

उसकी उँगलियों से उन मासूम पंखुड़ियों को एक दूसरे से दूर कर दिया था और उसे संजना की बुर के अंदर की गुलाबी त्वचा दिख रही थी. बस कुछ ही दिनों में इसका रंग गुलाबी नहीं रहेगा, कुछ लालिमा ले लेगा. और जब तक वो अपने भृमण से लौटेंगे, तब तक न जाने कितनी लाल हो चुकी होगी. शीला की जीभ अब संजना की चूत के चारों ओर के मखमली क्षेत्र को चाट रही थी. संजना की चूत से उठती हुई कौमार्य की सुगंध उसे एक नए नशे का आभास करा रही थी. चूत के आसपास चाटते हुए वो शनैः शनैः संजना की चूत की ओर बढ़ रही थी.

संजना की चूत पर जैसे ही शीला की जीभ लगी, संजना झड़ गयी. और बहते हुए रस को शीला चाटने लगी जैसे कोई कुतिया पानी पीती है. और फिर उसने अमृत को पीने के बाद अपनी उँगलियों से संजना को चूत को खोला और अपनी जीभ से उसके अंदर चाटने लगी. संजना की चूत की लुभावनी सुगंध उसके नथुनों में बस गयी. वो कभी प्यार तो कभी प्यास के साथ संजना की चूत को चाट रही थी. समर्थ का लंड अपनी यात्रा में सतत आगे बढ़ रहा था. सुमति की चूत में उसका लंड बड़ी सरलता से अंदर बाहर हो रहा था. सुमति की चूत भी अपना पानी छोड़कर उसके रास्ते को सुगम बना रही थी. लम्बे शक्तिशाली धक्कों से सुमति की चूत को चोदते हुए समर्थ किसी भी प्रकार की दया नहीं दिखा रहा था. सुमति वैसे भी इसी प्रकार की चुदाई की इच्छा रखती थी. समर्थ का लंड उसकी प्यासी चूत में खलबली मचा रहा था.

उसे इस बात का भी आभास था कि अब उसके भाई जॉय और उसके बेटे पार्थ के साथ उसे अब चार और लंड मिले थे. समर्थ, निखिल, नितिन और सजल. वो सजल के रस को पीने के लिए उतावली थी, एक बार सीधे उसके लंड से और एक बार उस गांड से जिसमे सजल अपना रस छोड़े। चूत में जो आनंद आ रहा था उसके साथ ही इन विचारों ने उसकी गांड में भी एक खुजली उत्पन्न कर दी. उसने एक हाथ पीछे करते हुए अपनी गांड को एक ऊँगली से टटोला और उसमे अपनी ऊँगली डाल दी.

“मैं सहायता करता हूँ.” ये कहकर समर्थ ने उसके हाथ को हटाकर अपनी एक ऊँगली उसकी गांड में डाल दी.

सुमति की पतली ऊँगली की तुलना में समर्थ की ऊँगली मोटी थी और सुमति की सिसकारी निकल गयी. समर्थ उसकी चूत में अपने लंड को चलाते हुए उसकी गांड में भी ऊँगली अंदर बाहर करने लगा. सुमति का शरीर ढीला पड़ गया और उसकी चूत से रस की धार बह निकली. वो बिस्तर पर शिथिल सी पड़ गयी. समर्थ ने अपने लंड को उसकी चूत से निकाला और अपनी ऊँगली को गांड में से निकालकर उसकी गांड का निरीक्षण किया. उसकी ऊँगली के प्रताप से गांड का छेद खुला हुआ था और उसे आमंत्रित कर रहा था. समर्थ ने एक गहरी साँस ली और अपने लंड का टोपा सुमति की गांड पर रख दिया.

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सुप्रिया और सुरेखा:

जॉय सुरेखा के चेहरे पर छाए आनंद के भावों को देखकर गर्व कर रहा था. हालाँकि वो मानसिक रूप से एक शक्तिशाली पुरुष था, परन्तु कुछ दिनों से उसे इस परिवार के सम्पर्क में आकर शारीरिक हीनता का आभास हो रहा था. जीवन का चक्र भी कुछ इस गति से चल रहा था कि वो इस बारे में अधिक कुछ सोच नहीं पा रहा था. उसे लग रहा था कि पार्थ, और सिंह परिवार के पुरुषों की तुलना में वो कम बैठता है. परन्तु सुरेखा के भावों को देखकर उसे अपनी इस हीनता से मुक्ति सी मिल गई।

सुरेखा ने अपने पाँव जॉय की पीठ पर लपेट लिया और उसे और तेज चुदाई के लिए उत्साहित करने लगी. जॉय को इसमें कोई कठिनाई न थी और वो अब सुरेखा के गहरे, लम्बे और तीव्र धक्कों से चोदने में लग गया. सुरेखा भी अपनी इस चुदाई का भरपूर आनंद ले रही थी. अपने परिवार के बाहर ये उसका किसी अन्य पुरुष के साथ पहला अवसर था और उसे इसमें बहुत सुख मिल रहा था.

दूसरी ओर पारुल और सुप्रिया एक दूसरे की चूत में अपनी उँगलियों, जीभ और अंगूठों से भिड़ी हुई थीं. एक दूसरे को खाने के लिए लालयित ये दोनों चूत को अंदर तक न केवल चाट रही थीं, बल्कि अब दो उँगलियों से चोद भी रही थीं. स्त्री समलैंगिक सहवास के आनंद से ये दोनों भलीभांति परिचित थीं और एक स्त्री को दूसरी से क्या इच्छा होती है, ये जानते हुए एक दूसरे की संतुष्टि का प्रयास कर रही थीं. सुप्रिया जो ऊपर थी, उसने पारुल की गांड के नीचे से अपनी एक ऊँगली को पारुल की तंग गांड में डाला तो पारुल ने तुरंत अपनी गांड को ऊँचा उठाकर सुप्रिया के लिए राह सहज कर दी. सुप्रिया ने गांड से ऊँगली निकाली, और फिर पारुल की चूत में डालते हुए अपने मुंह से चाटी और फिर से पारुल की गांड में पेल दी. इस बार उसने ऊँगली को पहले से अधिक अंदर धकेला था.

पारुल भी कौन सी पीछे रहने वाली थी. उसके लिए तो सुप्रिया का पूरा पिछवाड़ा खुला हुआ था, पर एक ही समस्या थी कि उसके हाथ हटाने से सुप्रिया की चूत उसके मुंह पर बैठकर उसकी साँसे रोक सकती थीं. उसने फिर भी एक प्रयास का अवसर लेने का निर्णय लिया और दाएं हाथ से सुप्रिया को पकड़े हुए बाएं हाथ से सुप्रिया की गांड के छेद को टटोला. छेद मिलते ही उसने अपनी एक ऊँगली गांड में डाल दी. सुप्रिया इस खेल की पुरानी खिलाडी थी. वो समझ गयी कि अब उसे अपनी चूत को पारुल के मुंह पर अपने ही बलबूते रखना है, तो उसने आसान में कुछ बदलाव किया जिसके कारण अब वो पारुल के हाथों के सहारे के बिना भी चूत चटवा सकती थी. पारुल के मन में सुप्रिया के प्रति आदर और बढ़ गया. और उसने सुप्रिया की गांड में अपनी ऊँगली की गति को अपना सम्मान दिखाने के लिए बढ़ा दिया.

जॉय सुरेखा की चुदाई अब पूरी तन्मयता और अपनी शक्ति के अनुसार कर रहा था. उसकी आँखें उसके साथ चल रहे पारुल और सुप्रिया के प्रेमालाप पर भी जा रही थीं. हालाँकि वो अपनी बेटी पारुल को देख नहीं पा रहा था पर उसे पारुल पर भी गर्व था कि वो सुप्रिया को पूरा प्यार दे रही थी. घर की सबसे छोटी होने के कारण वो जॉय की सबसे चहेती भी थी. जॉय ने ही उसकी चूत का उद्घाटन किया था. और अब तक केवल उसने और पार्थ ने ही उसकी मादक जवानी का आनंद लिया था. जॉय ने ही उसकी गांड भी पहली बार मारी थी. और पारुल ने अब तक पार्थ को अपनी गांड से दूर ही रखा था. हाँ सुमति को अवश्य उसने गांड चाटने और उसकी गांड से जॉय के वीर्य को पीने का अवसर दिया था. अब देखना ये था कि वो कब तक अपनी गांड अन्य लौडों से बचा कर रख सकती थी.

जॉय के धक्कों की बढ़ती गति से सुरेखा अब तक दो तीन बार झड़ चुकी थी. वर्षों की प्यासी सुरेखा अब अपने जीवन का पूरा आनंद लेने की ओर अग्रसर थी और वो जॉय को और तीव्र और गहरी चुदाई के लिए प्रोत्साहित कर रही थी. जॉय ने सुरेखा को काँपते हुए और शरीर को अकड़ते हुए अनुभव किया। इस बार सुरेखा बहुत तीव्रता से झड़ने वाली थी. जॉय भी बहुत निकट था और उसने इसकी घोषणा करते हुए सुरेखा को चेताया. पर सुरेखा अब किसी भी चेतावनी से परे थी. वो चाहती थी कि जॉय उसकी चूत को अपने रस से सींच दे. उसके लरजते हुए शरीर ने जॉय के बीज के लिए स्वयं को तैयार कर लिया.

जैसे ही एक चीख के साथ सुरेखा झड़कर ठंडी पड़ी, वैसे ही जॉय ने भी अपना पानी उसकी चूत में छोड़ दिया और हाँफता हुआ सुरेखा के शरीर पर गिर गया. सुरेखा ने उसके चेहरे को हाथ में लेकर उसके होंठों से अपने होंठ लगाए और दोनों एक दूसरे को चूमने लगे. उधर सुप्रिया और पारुल भी झड़ रही थीं, एक दूसरे का रस पीते हुए दोनों ने अपना शीर्ष प्राप्त कर लिया था. एक दूसरे की चूत के रस की हर बूँद को पीने के बाद ही दोनों एक दूसरे से अलग हुईं. पर पारुल की एक प्यास अभी भी शेष थी. उसने अपने आपको सुप्रिया के नीचे से निकाला और अपने पिता के पास चली गयी. जॉय ने उसे देखा तो समझ गया और वो सुरेखा के ऊपर से हट गया.

पारुल ने अपने होंठ सुरेखा की चूत पर रखे और अपने पिता का जीवन रस उसकी चूत से पीना आरम्भ कर दिया. सुप्रिया ने उसे देखा फिर जॉय की ओर देखा जिसके लंड पर उसकी बहन सुरेखा का रस अभी भी चमक रहा था. उसने जॉय को पास बुलाया और अपने मुंह से उसके लंड को चाटकर साफ कर दिया. अपने होंठों पर जीभ फिराते हुए उसने चटखारे लिए और सुरेखा को देखा जो इस समय बिलकुल शांत पड़ी थी. उसके चेहरे के भाव और चमक उसके सुखद अनुभव की साक्षी थी. सुप्रिया को एक बार फिर अपनी बहन पर प्यार उमड़ आया. पारुल ने सुरेखा की चूत से सारा रस पीने के बस सुरेखा की चूत से अपना चेहरा हटाया.

“पापा, बहुत स्वादिष्ट है आप दोनों का मिश्रण. अच्छा है कि अब ये नियमित रूप से पीने मिलेगा.” पारुल ने जॉय से कहा.

“बिलकुल, हम तुम्हें इसका समय समय पर सेवन कराते रहेंगे.”

“थैंक यू, जॉय!” ये सुरेखा ने कहा था. वो ऑंखें खोले तीनों को देख रही थी. उसने सुप्रिया की आँखों में अपने लिए अनंत प्रेम देखा और एक बार मुस्कुराते हुए फिर से अपनी ऑंखें बंद कर लीं.

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शोनाली और सागरिका:

सजल अपनी माँ के सिखाये गुर को शोनाली पर उपयोग कर रहा था. अब शोनाली जितनी खेली खिलाई स्त्री को मुंह से सुख देना कोई सरल चुनौती तो थी नहीं. पर सजल अनुभवी तो नहीं था पर आतुर था. चूत के आसपास और ऊपर अपनी जीभ के प्रहारों से उसने शोनाली को जल्दी ही उत्तेजित कर दिया. जब उसकी जीभ ने शोनाली की चूत के अंदर प्रवेश किया तो शोनाली झड़ गयी. सजल प्रथम परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया और उसने शोनाली द्वारा भेंट किये रस की हर बून्द को पीते हुए अंत में उसकी चूत को चाटकर साफ कर दिया.

अब मुख्य आकर्षण का समय था. उसने शोनाली की ओर देखा. शोनाली को उसकी समस्या समझ आ गयी. शोनाली ने सजल को नीचे लिटाया और उसके लंड को मुंह लेकर चूसने, चाटने लगी, और कुछ ही मिनट में सजल झड़ आया. सजल झड़ना नहीं चाहता था, पर शोनाली के निपुण मौखिक आघात के सामने टिक भी नहीं सका. शोनाली ने भी सजल के वीर्य की हर बून्द को पी लिया.

शोनाली: “अब जब तुम एक बार झड़ गए हो, तो तुम्हें अगली बार समय लगेगा और तुम मुझे देर तक चोद सकोगे। सग्गू, आकर अपने देवर के लंड को चाटकर खड़ा करो, तब तक मैं इन दोनों मुश्टण्डों को तैयार करती हूँ.”

सागरिका: “पर मॉम, हमने माना था कि सजल जब तक आपको चोदना आरम्भ नहीं करता तब तक मैं उसे छूऊँगी भी नहीं।”

शोनाली: “वो ठीक है. अपने मुंह से चोद तो चुकी हूँ. अब नखरा न कर, ये भी तेरी ओर देख कैसे लालच से देख रहा है. और तुम दोनों, इधर आओ.”

निखिल और नितिन तुरंत शोनाली के आगे अपने खड़े लंड लेकर चले आये. सागरिका ने सजल के लंड को मुंह में लिया तो उधर उसकी माँ ने अपने दामाद और उसके भाई के लंड को चूसने के लिए अपना मुंह खोल लिया. सागरिका बहुत प्रेम से सजल के लंड को चूस रही थी, पर उसे ये भी ध्यान था कि उसे सजल के लंड को अपनी माँ की चुदाई के लिए तैयार करना है, न कि झड़ाना है. और जब उसे लगा कि सजल का लंड उपयुक्त अवस्था में पहुंच गया है तो उसने लंड के सुपाड़े पर एक चुंबन लिया और फिर शोनाली को बताया।

शोनाली के दामाद निखिल और उसके भाई नितिन के लंड तो पहले ही से अपना आतंक मचाने के लिए आतुर थे. शोनाली तो उन्हें केवल इसीलिए चूस रही थी कि वो कुछ चिकने हो जाएँ. नहीं तो उन दोनों के भारी लौंड़ों से चोटिल होने की संभावना थी. शोनाली ने सागरिका की बात सुनकर सजल की ओर देखा जो बिस्तर पर लेटा उसे आशा से देख रहा था. शोनाली ने उन दोनों लौंड़ों को छोड़ा और सजल के लंड पर एक चुबंन किया और फिर अपने पांव दोनों ओर करते हुए उसके ऊपर खड़ी हो गयी. फिर उसने अपनी चूत को एक हाथ से फैलाया और नीचे की ओर बैठने लगी. नीचे आकर उसने सजल के लंड को दूसरे हाथ से संभाला और अपनी चूत के मुंह पर लगाया. फिर उसके लंड पर बैठती चली गयी. लंड को अपनी चूत में पूरा लेने के बाद वो झुकी और सजल के चेहरे को चूमने लगी.

सजल ने उसके होंठ से अपने होंठों से मिलाये और दोनों एक दूसरे को पागलों के समान चूमने लगे. शोनाली ने चुंबन के चलते हुए अपनी गांड को हिलना आरम्भ किया और सजल के लंड पर उठक बैठक करने लगी. सजल के लिए ये आनंद के क्षण थे. आज तक उसने केवल अपनी माँ को ही चोदा था और आज उसे अपनी माँ की आयु की दूसरी स्त्री की चुदाई करने का अवसर मिल रहा था. वो भी अपने कूल्हे उचकाते हुए शोनाली की चुदाई करने लगा. कुछ ही देर में दोनों ने अच्छी गति पकड़ ली. पर शोनाली की इच्छा ये तो थी नहीं, ये जानते हुए नितिन उसके मुंह के आगे खड़ा हो गया और शोनाली ने उसके लंड को एक ही बार में अपने मुंह में गपक लिया और पूरे जोश से चूसने लगी.

उसे अपनी पीठ पर एक हाथ का आभास हुआ तो उसने अपनी उछलकूद रोक दी. फिर उसने किसी की जीभ को गांड पर चलता हुआ अनुभव किया. और फिर वो जीभ हटी तो उसे अपनी गांड पर एक लंड के रखे जाने का ज्ञान हुआ. सागरिका ने ही चाटी होगी मेरी गांड, ये सोचते हुए वो नितिन के लंड को चूसते जा रही थी. जब उसे अपनी गांड पर दबाव का आभास हुआ तो उसने नितिन के लंड को मुंह में तो लिया पर चूसना रोक दिया. निखिल अपनी भावी सास की गांड में अपना लंड बड़े प्रेम से डाल रहा था. उसे पता था कि शोनाली एक ही बार में भी उसका लंड गांड में लेने के लिए सक्षम है, परन्तु वो उसकी गांड के हर रोम से अपने लंड का परिचय करना चाहता था. सासूमाँ के लिए उसका इतना तो कर्तव्य बनता ही था.

जब लंड ने अपना पूरा रास्ता तय कर लिया तो निखिल ने थोड़ा सा लंड निकालते हुए शोनाली की गांड मारना आरम्भ किया. शोनाली ने जब देखा कि अब उसके तीनों छेदों में लौड़े लगे हुए हैं तो वो नितिन के लंड को चूसते हुए सजल के लंड पर उछाल मारने लगी. निखिल ने उससे ताल मिलाते हुए उसकी गांड में अपना लंड पेलने में अब गति पकड़ ली. सजल का ये पहला अवसर था जब उसे एक दूसरे लंड के साथ चुदाई करना मिला था. शोनाली की चूत और गांड के बीच की पतली सी झिल्ली के दोनों ओर दो लंड चलायमान थे. इसमें से सजल के लिए ये एकदम नया ही अनुभव था. अब तक उसे केवल चूत के घर्षण का ही आनंद मिला था, पर आज उसे न केवल चूत बल्कि उसके दूसरी ओर गांड में चल रहे लंड के घर्षण का भी आभास हो रहा था. और ये अतुलित आनंद था.

सजल के सिवाय सभी इस प्रकार की चुदाई के अभ्यस्त थे. और शोनाली को इसमें अनंत आनंद मिलता था. अगर उसके मुंह में नितिन का लंड न होता तो उसकी चीखों से कमरे में हड़कंप मच जाता. पर इसका अर्थ ये नहीं था कि उसे आनंद कुछ कम आ रहा था. उसकी चीखें नितिन के लंड को दबा रही थीं. नितिन को उसकी गले से निकलती गुं गुं की ध्वनि और गले की हलचल से पता लग रहा था कि वो चीख रही थी. और उसकी चीख के लिए खुलता मुंह नितिन के लंड को और अंदर निगल लेता था. सागरिका इस दृश्य से अपने समय की प्रतीक्षा कर रही थी. उसे भी तीन लौंड़ों से चुदने का जो अवसर मिला था, उसे वो किसी भी मूल्य पर गंवाँ नहीं सकती थी.

निखिल के धक्के तीव्र होने के बाद शोनाली की उछलकूद कम हो चली थी. और इसके कारण अब सजल अपने लंड को उसकी चूत में उछल उछल कर पेल रहा था. पहली बार इस प्रकार की चुदाई करने के बाद भी उसने शीघ्र ही अपना काम सीख लिया था और शोनाली को उसकी चुदाई से बहुत मजा आ रहा था. गांड में चल रहे निखिल के दिंची लंड ने भी उसे सुख की पराकाष्ठा पर लेकर खड़ा कर दिया था. सजल को अपने लंड पर कुछ बहता हुआ अनुभव हुआ तो वो जान गया कि शोनाली झड़ रही है. शोनाली के शरीर का संचालन भी अब कुछ बिगड़ने लगा था. निखिल बिना रुके अपने लंड से शोनाली की गांड के परखच्चे उड़ने में व्यस्त था. सास हो या माँ, उसे गांड मारते समय कभी भी दया नहीं आती थी. वैसे उससे गांड मरवाने वाली स्त्रियों को भी उसके मोटे लम्बे लौड़े से ऐसी ही चुदाई पसंद थी जो उनकी गांड के पोर पोर को खोल दे.

निखिल ने अंततः अपने रस से शोनाली की गांड को भर ही दिया पर वो हटा नहीं. उसने सागरिका को देखकर संकेत किया और सागरिका ने फोन लगाया. निखिल के लंड को अपनी गांड में लिए हुए अब शोनाली सजल के लौड़े पर और तेजी से कूदने लगी. और उसकी चूत ने झड़कर अपने सुख की घोषणा की. नितिन के लंड को अब शोनाली इतनी अधिक जोर से चूस रही थी कि अगर नितिन का लंड थोड़ा भी कमजोर होता तो कट के गिर पड़ता. पर इसके कारण ये अवश्य हुआ कि नितिन के लंड ने अपना पानी उसके मुंह में छोड़ दिया. सम्भवतः उसे शोनाली के आक्रमण से बचने का यही एकमात्र रास्ता दिखा होगा.

सजल ने जैसे ही अपने रस से शोनाली की चूत को भरना आरम्भ किया कि कमरे खुला और सुमति ने प्रवेश किया. परिस्थिति के अनुसार उसने कपड़े पहनने में समय नहीं खोया था. उसे अंदर आते देख निखिल ने अपने लंड को शोनाली की गांड से निकाला। सजल इस पूरे घटनाक्रम से अचम्भित था और उसे सुमति का आना और भी आश्चर्य में डाल गया. निखिल हटकर खड़ा हुआ तो सागरिका ने उसके लंड को मुंह में लेकर चाटते हुए साफ कर दिया. सजल शोनाली के नीचे से ये देखकर और चकित हो गया जब सुमति ने शोनाली की गांड में अपना मुंह लगाया और सड़प सड़प की ध्वनि के साथ उसकी गांड में से निखिल का वीर्य पी लिया.

शोनाली सजल के ऊपर से उठी और सुमति ने उसकी गांड के नीचे जाकर अपना मुंह खोल दिया. शोनाली ने अपनी गांड में जोर लगाया और कुछ और रस सुमति के मुंह में समा गया. सुमति ने चटखारा लिया और बिना कुछ और कहे कमरे से चली गयी. सागरिका ने निखिल के लंड को साफ करने के बाद अपनी माँ की चूत में मुंह लगा दिए और उसमे से सजल का रस पी लिया. सजल के पास ही खड़े हुए गीले लंड को देखा तो वो उसे चाटे बिना भी न रह सकी.

सागरिका को छोड़कर सभी संतुष्ट थे. पर उसे यूँ छोड़ने का किसी का भी आशय नहीं था. पर उसके लिए कुछ देर ठहरना आवश्यक था.

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समर्थ और शीला:

सुमति की गांड ने फैलते हुए समर्थ के लंड स्वागत किया. समर्थ ने भी बड़े संयम के साथ सुमति की गांड में लंड डाला. सुमति का चेहरा बिस्तर पर लगा हुआ था और उसका मुंह संजना और शीला की ओर था. साँस रोके सुमति समर्थ के लंड को अपने अंतिम पड़ाव तक पहुँचने की प्रतीक्षा कर रही थी. किस कारण आज समर्थ इतना समय ले रहा था उसे ये समझ नहीं पड़ा. फिर आँखों ने संजना को देखा तो उसे समझ आया कि संजना भयभीत न हो इस कारण समर्थ उसकी गांड इतने प्रेम से मार रहे थे. परन्तु इस प्रकार से सुमति की गांड की खुजली और बढ़ गयी. वो कसमसाते हुए अपनी गांड को उछाल कर समर्थ के लंड पर फेंक रही थी. समर्थ समझ तो गया पर कुछ करने का साहस नहीं जुटा पाया. सुमति का धैर्य टूट गया उसने समर्थ को मुड़कर देखा तो उसकी आँखों में विनय था.

“थोड़ा तेज करो न बाबूजी, ऐसे क्यों तड़पा रहे हो मुझे. प्लीज, जोर से मारिये न गांड, मेरी तो खुजली बढ़ा दी है आपने .”

शीला ने समर्थ को देखा और उसे संकेत किया कि वो संजना को संभाल लेगी, वो सुमति की इच्छा पूरी करे. बस फिर क्या था, समर्थ ने अपने पूरे लौड़े को गांड से बाहर निकाला और एक भयंकर धक्के के साथ सुमति की गांड में ठोक दिया. सुमति बिलबिला उठी. और फिर उसके चेहरे पर संतोष की छाया आयी. उसकी सिसकारियां समर्थ को और तेजी से गांड मारने के लिए उद्वेलित करने लगी और समर्थ भी इस कार्य में पूरे जोश के साथ जुट गया.

संजना भी अपनी नानी के मुंह में लगातार अपना पानी छोड़ रही थी और उसकी प्यारी नटखट नानी उसे पीने में कोई कोताही नहीं कर रही थी. शीला इस रस की मिठास का कुछ और दिन सेवन करना चाहती थी. अपने पति की ओर कनखियों से देखते हुए उसे समर्थ के भाग्य पर गर्व हुआ. अपनी बेटियों का तो वो कौमार्य नहीं ले पाए, परन्तु अपनी नातिन के रूप में उन्हें ये सुअवसर मिला था. शीला की जीभ के उसकी नातिन की चूत अब बेबस थी. जब शीला ने पाया कि संजना की चूत के रस की हर बूँद वो पी चुकी है तो अपना चेहरा उठाकर उसने संजना को देखा.

संजना के चेहरे की लुभावनी मुस्कान ने उसे प्रसन्न कर दिया. ऑंखें बंद किये लेटी संजना अपने ही स्वर्ग में विचरण कर रही थी. उसे इस बात का भी आभास नहीं था कि उसकी नानी अब उसकी चूत से हट चुकी है. वो तो उस सुखद अनुभव में अभी भी लीन थी. शीला को इस बात पर गर्व हुआ कि उसके प्रयासों ने संजना का ध्यान समर्थ और सुमति की ओर नहीं जाने दिया. अन्यथा उसके कोमल मन को कुछ आघात लग सकता था. शीला ने एक बार फिर अपने सामने खिली हुई कुंवारी चूत पर जीभ फेरी और एक चुम्बन देते हुए हट गयी. संजना ने अधखुली आँखों से अपनी नानी को देखा.

“क्या हुआ नानी?”

“झड़ तो चुकी है इतनी बार, अब नानी को भी तृप्त कर दे, मेरी लाड़ो।”

“हाँ नानी. पर मुझे इतने अच्छे से नहीं आता.”

“तेरा प्यार ही बहुत है मेरे लिए, जैसा मन करे वैसे ही कर लेना.” शीला ने उसे सांत्वना दी.

“अच्छा नानी.”

ये कहते हुए संजना ने अपने नाना की ओर देखा जिनके चेहरे पर अब कुछ तनाव दिख रहा था. उसने नाना के आगे घोड़ी बनी सुमति को देखा जिसका मुंह उनकी ही ओर था. उसके चेहरे के भाव संजना को कुछ समझ नहीं आये. वो पीड़ा में थीं या आनंद में, उनके मिश्रित भावों को समझना अभी संजना की समझ के परे थे. पर सुमति की सिसकारियां ये दर्शा रही थीं कि उसे इसमें सुख मिल रहा था. नाना के चेहरे के तनाव में भी एक जीत का भाव था. उसने उन दोनों के समागम स्थल को देखा तो चौंक गयी. नाना तो उनकी गांड मार रहे हैं. उसने एक बार आश्चर्य से नाना की ओर फिर देखा. क्या वो भी इस प्रकार की चुदाई करते हैं? पर संजना को अधिक सोचने का समय न देकर शीला उसके बगल में आ लेटी।

“तेरे नाना को गांड से बहुत प्रेम है, किसी भी स्त्री को वो बिना गांड मारे नहीं छोड़ते.” संजना को अपनी माँ की याद आयी.

“उन्होंने मम्मी की…?”

“नहीं, अब तक नहीं, तेरी माँ बहुत हठी है. नाना को गांड पर हाथ भी नहीं रखने देती. क्या सजल ने उसकी गांड मारी है?”

संजना को आश्चर्य हुआ कि नानी को सजल और उसकी माँ के बारे में पता है. उसने स्वीकृति में सिर हिलाया.

“तो अब वो अपनी गांड तेरे नाना से अधिक दिन नहीं बचा पायेगी. हमारे यात्रा पर निकलने से पहले तेरी चूत का उद्घाटन और उसकी गांड की चुदाई किये बिना इन्हें शांति नहीं मिलेगी.”

समर्थ की झड़ने की हुंकार ने उस दोनों का ध्यान तोड़ दिया. वहीँ सुमति की आनंद से भरी चीख भी उन्हें आकर्षित कर उठी. समर्थ के लंड की रस को अपनी गांड में भरता हुआ अनुभव कर सुमति भी झड़ रही थी. उसकी गांड इस समय उछाल कर समर्थ के लंड को अपने में आत्मसात करने का प्रयास कर रही थी. पर समर्थ का लंड अब ढीला पड़ चुका था. उसने अपने लंड को सुमति की गांड से निकाला।

“अब देख, सुमति क्या करती है. पर इसे देखकर चकित या द्रवित मत होना। चुदाई में हर एक के अपने प्रिय खेल होते हैं. और इसके लिए सुमति से घृणा मत कर बैठना.” शीला ने संजना के कान में धीमे से कहा.

संजना देख रही थी. सुमति ने अपना आसन बदला और सीधे लेट गयी. फिर उन अपना दायाँ हाथ अपनी गांड के नीचे किया और उसपर समर्थ का वीर्य गिरने लगा. एक हथेली भरने के बाद सुमति ने उसे अपने मुंह से लगाया और उसे पीने के बाद अपनी हाथ और उँगलियों को चाटकर फिर अपनी गांड के नीचे लगा दिया. चार पांच बार इस उपक्रम के बाद उसने अपनी दो उँगलियाँ गांड में डालीं और रस के जो अवशेष थे उन्हें भी इकठ्ठा करने के बाद उन उँगलियों को चाट लिया. उसने अपने मुंह से एक संतोष भरी ध्वनि की और चटखारे लेकर समर्थ को देखा और फिर मुड़कर शीला और संजना को.

शीला तो उसके इस व्यसन से परिचित थी पर संजना का मुंह खुला हुआ था. सुमति ने उसे आंख मारी तो संजना ने शर्मा के सिर झुका लिया. सुमति ने उठकर समर्थ के लंड को चाटा और बिलकुल साफ कर दिया. इतने में ही समर्थ के फोन पर एक संदेश आया और उसने सुमति को बताया कि उसे शोनाली के कमरे में याद किया जा रहा है. सुमति तपाक से उठी और वैसे ही नंगी चल पड़ी जहां शोनाली की चुदाई समाप्त हुई थी और उसकी रस से भरी गांड सुमति की प्रतीक्षा में थी.

इसके बाद समर्थ ने कपड़े डाले और शीला से कहा कि वो बैठक में जाकर अन्य कमरों में क्या चल रहा है देखने जा रहा है. शीला ने कुछ न कहा, बस बिस्तर पर लेटकर अपने पाँव फैला लिए, संजना के लिए. संजना अब कम से कम इस खेल से तो परिचित थी और उसने भी अधिक संकोच नहीं किया और अपना मुंह अपनी नानी की चूत पर लगाकर चाटने लगी. सुप्रिया द्वारा सिखाये हुए गुर का उसने भली भांति प्रयोग किया, और शीला को आनंद के सागर में गोते लगवाने लगी. पर वो ये भूल गयी कि सुप्रिया अगर सेर थी तो नानी सवा सेर. शीला ने उसे इस कला का और भी गहन अध्ययन कराया और संजना को अपने नए पाठ का प्रयोग करने के लिए भी उत्साहित किया.

संजना को नानी की चूत में वो आनंद और स्वाद नहीं मिला, जो उसकी माँ की चूत में था. पर सुरेखा की चुदाई उस प्रकार से अब तक हुई भी नहीं थी, जिस प्रकार से शीला की, जिसे लगभग प्रतिदिन ही किसी न किसी लंड से चुदने का सौभाग्य प्राप्त था. और सम्भवतः यही कारण था कि संजना जैसी नयी विद्यार्थी भी दोनों में भेद करने में समर्थ थी. पर शीला संजना की इन भावनाओं से अनजान संजना को नए नए कोण और बिंदुओं पर ध्यान देने के लिए पथ प्रदर्शन कर रही थी. संजना भी नानी के इन निर्देशों का पालन करते हुए उन्हें अपने अंतर्मन में लिख रही थी, और अगली बार उसकी माँ सुरेखा और सुप्रिया मौसी को इसका लाभ होना स्वाभाविक था.

शीला की चूत चूसने और चाटने के साथ ही संजना बताये अनुसार शीला की जांघों और उसकी जंघाओं और चूत के मिलन स्थल के बीच की दरार को भी चाट रही थी. हल्की गुदगुदी के साथ शीला हँसते हुए संजना के इस कर्म का आनंद उठा रही थी. चूत को खोलते हुए संजना ने अपनी स्वचालित जीभ से शीला के अंदर की त्वचा को भी अपनी जीभ से चाटा। शीला उसके इस कृत्य से आनंदित होते हुए संजना के मुंह में झड़ गयी. फिर उसने संजना के सिर को बड़े प्रेम से सहलाते हुए अपनी चूत पर दबा लिया. संजना चाटती रही और शीला झड़ती रही. पर शीला की वृद्ध चूत की निस्तारण क्षमता घट चुकी थी. चुदाई की अनंत इच्छा होते हुए भी उसकी चूत और रस वर्षा करने में असमर्थ थी. शीला ने प्रेमपूर्वक संजना के चेहरे को उठाया और फिर स्वयं उठकर उसके होंठ चूमने लगी.

“अच्छा सीखी है रे तू, बहुत स्त्रियों को सुख देगी तू अपने जीवन में.” शीला ने उसे प्रोत्साहन देते हुए कहा.

“मम्मी को भी?”

“वो तो तेरी वैसे भी प्रशंसा करते नहीं थकती, अब तो न जाने क्या करेगी. तेरी माँ सच में भाग्यवान है तेरी जैसी बेटी पाकर.”

फिर शीला ने कहा की उन्हें भी समर्थ के पास चलना चाहिए, देखें कि और लोग क्या कर रहे है. कपड़े पहनकर नानी और नातिन बैठक में चले गए. बैठक में समर्थ बैठे बियर पीते हुए सामने 3D में दोनों कमरों में चल रहे दृश्य देख रहे थे. सुमति नहीं दिखी तो उन्हें कुछ आश्चर्य हुआ पर कुछ ही देर में सुमति भी कपड़े डालकर आ गयी और समर्थ के पास बैठ गयी. शीला पहले ही संजना को अपनी गोद में लिए थी. सुमति उठी और वो भी समर्थ को गोद में बैठ गयी और चल रहे दृश्यों को देखने लगी.

“कम से कम अब किसी को फोन नहीं करना पड़ेगा. जैसे ही किसी की गांड में लंड जायेगा, मैं चली जाऊँगी.” सुमति ने मन में सोचा. न जाने कैसे समर्थ ने उसके मन के भाव पढ़ लिए.

समर्थ: “दौड़ मत जाना, कुछ देर गांड मारने भी देना. अलग कमरे में इसीलिए भेजा है सबको.”

सुमति शर्मा गयी और उसने अपनी स्वीकृति दी. समर्थ ने टीवी पर CCTV को सुप्रिया के कमरे पर केंद्रित कर दिया.

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सुप्रिया और सुरेखा:

सुरेखा की चूत का रस पीने के बाद पारुल हटी ही थी कि सुप्रिया बोल पड़ी, “सुरेखा, तुम्हे भी अब पारुल का रस चखना चाहिए. सच कहूँ तो संजना के जैसे ही मीठा है. चुदी हुई है तो कुछ अंतर अवश्य है, पर मेरे लिए पारुल और संजना एक जैसी ही हैं.”

पारुल बोल पड़ी, “मौसी, मुझे भी अपनी चूत का स्वाद लेने का बहुत मन है, संजना का भी मैं रस पियूँगी, पर अभी आपका रस पीने की इच्छा है.”

सुप्रिया, “तो हो गया, पारुल और सुरेखा एक दूसरे के साथ. तो समधी जी, हमें अपना खेल खेलने का अवसर मिल रहा है.”

जॉय, “बिलकुल समधन साहिबा, आपकी सेवा करना तो मेरा परम कर्तव्य है.”

सुप्रिया उठी और जॉय के होठों को चूमकर उसे लेटने के लिए कहा. जॉय अभी ही झड़ा था और उसका लंड मुरझाया हुआ था, पर सप्रिया के चुम्बन ने उसे पुनर्जीवन का वरदान दिया. बिस्तर पर लेटकर वो सुप्रिया के सुंदर शरीर को अपनी आँखों से पीने का प्रयास कर रहा था. उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि कुछ ही दिनों में वे इतने निकट आ गए थे. उसकी पत्नी शोनाली और बहन सुमति भी अत्यंत सुंदर स्त्रियों में थीं, पर जो आकर्षण इन दोनों बहनों में था वो अद्वितीय था.

सुप्रिया जान रही थी कि जॉय उस पर आसक्त है, और उसने इसे दूर करने का कोई प्रयास भी नहीं किया. अपने पाँवों को जॉय के मुंह के दोनों ओर करते हुए अपनी चूत उसके मुंह पर लगा दी और आगे झुकते हुए जॉय के लंड को अपने मुंह में ले लिया. जॉय की लहराती जीभ ने अपनी समधन की चूत को लक्ष्य बनाते हुए अपना प्रभाव दिखाना आरम्भ किया. जॉय चूत चाटने में इतना निपुण था कि उसकी जीभ और उँगलियों के बल पर ही वो किसी भी स्त्री को अनगिनत बार स्वर्ग का द्वार दिखा सकता था. सुप्रिया वैसे तो जॉय की इस कला से परिचित थी, परन्तु उसने कभी इसका पूरी श्रध्दा से अनुभव नहीं किया था.

आज इस अवसर पर अपनी चूत को पूर्णतया जॉय को सौंप दिया. और जॉय ने भी इसका अधिकाधिक लाभ उठाते हुए उसकी चूत पर अपनी कला का प्रदर्शन किया. सुप्रिया भी किसी से कम न थी, उसके भी लंड चूसने का एक अलग ही ढंग था और उसका ये कहना था कि वो किसी को भी ५ मिनट के अंदर ध्वस्त कर सकती है. उसने अपनी इस कला को जॉय के लंड को जब चाटने और चूसने में लगाया. जॉय की आनंद की सीमा ही जैसे पुनर्धारित हो चली. अगर जॉय कुछ समय पहले सुरेखा की चूत में न झड़ा होता तो उसका ठहरना सम्भव न था.

सुरेखा ने पारुल को लिटाया और उसके ऊपर चढ़ गयी. दोनों एक दूसरे की चूत को चाटने लगीं और जल्दी ही आनंद से दूभर ही उठीं. हालाँकि पारुल ने सुरेखा की चूत से अपने पिता जॉय का रस खींच लिया था, पर इस आसन में जो रस अंदर गहराई में ठहरा हुआ था वो भी अब बाहर निकल रहे थे और पारुल के मुंह में जा रहे थे. पारुल इसके कारण और भी उत्तेजित हो उठी और उसने सुरेखा के भग्नाशे को दाँतों में लेकर काट लिया. सुरेखा पीड़ा से बिलबिला उठी पर अगले ही क्षण उसे ऐसा लगा कि वो अपना शरीर छोड़कर अन्य ही लोक में है. इतना तीव्र स्खलन उसके जीवन में उसने कभी अनुभव नहीं किया था.

झड़ते हुए शरीर के कम्पन के कारण उसका ध्यान पारुल की चूत से हट ही गया. जब उसे अपने शरीर का ज्ञान हुआ तो उसने भी पारुल की उसी प्रकार से भग्नाशे पर काटा। अब ये प्रतिस्पर्धा चल पड़ी कि दोनों में से कौन जीतेगा. पर जॉय ने ये देखा तो उन्हें सावधान किया.

“इसमें अधिक उत्तेजित होने से एक दूसरे को चोट पहुंचा सकते हो. दाँतों से नहीं होंठों से काम लो, आनंद भी आएगा और पीड़ा भी नहीं होगी.” उसने समझाया.

ये सुनने के बाद सुरेखा और पारुल एक दूसरे की चूत को पीते हुए केवल अपने होंठों और उँगलियों से ही भग्न को छेड़ती रहीं. जॉय और सुप्रिया चुदाई के लिए उत्सुक थे और सुप्रिया ने घोड़ी का आसन लिया.

“जॉय, आज तुम प्लीज मेरी गांड मारो. चूत बाद में चोद लेना. मेरी गांड बहुत देर से झुँझला रही है और अगर इसमें लौड़ा नहीं गया तो मुझे पागल ही कर देगी.” सुप्रिया ने कहा.

“जैसा मैंने कहा है समधन साहिबा, आपकी सेवा करना तो मेरा परम कर्तव्य है.”

जॉय ने अपने लंड पर थूक लगाया और फिर अपनी ऊँगली को सुप्रिया की चूत में डालकर उसके रस से सुप्रिया की गांड को तर किया और अपने लंड को उसकी गांड पर रखते हुए हल्के दबाव के साथ अपने लंड से सुप्रिया की गांड को बंद कर दिया.

“जहाँ खुजली है, वहाँ अब मेरा लंड आपको खुजलायेगा और फिर औषधि का लेप लगाकर ही बाहर आएगा.”

उसकी इस बात पर सुरेखा खिलखिला पड़ी. जॉय दमदार धक्कों के साथ सुप्रिया की कसी गांड में अपना हल चलने लगा. बैठक में सुमति बेचैन हो रही थी. उसका भाई अपनी समधन की गांड मार रहा था और जॉय के हर धक्के के साथ सुमति की चूत और मुंह में पानी आ रहा था. वो समर्थ की गोद में कसमसा रह थी. समर्थ भी समझ गया कि सुमति की इच्छा क्या है. उसने सुमति की चूत पर अपना हाथ रखा और उसे मसलने लगा. सुमति सामने 3डी में चल रहे दृश्य के कारण वैसे भी बहुत चुदासी हो रही थी, समर्थ के हाथ के कारण उसका धैर्य टूट ही गया.

“बाबूजी, मुझे जाने दो न, उसके बाद आप जो चाहो मेरे साथ कर लेना.” उसने समर्थ से विनती की.

समर्थ ने अपना हाथ उसकी चूत से हटाया और उसकी गर्दन चूमकर उसे जाने की आज्ञा दे दी. सुमति गोली की गति से आगे बढ़ी, पर रुक गयी. उसे ये तो पता ही नहीं था कि जाना किधर है. उसने विनयी आँखों से समर्थ को देखा तो समर्थ ने संकेत से बताया कि पहले तल के दूसरे कमरे में. इस बार सुमति की गति और अधिक हो गयी.

जॉय सुप्रिया की गांड में अपने लंड का प्रताप दिखा रहा था. पारुल और सुरेखा अपने प्रेमालाप के बीच में उनकी ओर देख रहे थे. सुप्रिया के चेहरे पर उन्माद था तो जॉय का कुछ भींचा हुआ चेहरा उसके परिश्रम को दर्शा रहा था. जॉय के धक्के लम्बे और पलंगतोड़ थे और सुप्रिया को इसी प्रकार से अपनी गांड फड़वाना भाता था. उसी समय उनके कमरे के दरवाजे के खुलने और फिर बंद होने की ध्वनि हुई. सुरेखा का मुंह उस ओर था इसीलिए उसने सुमति को देखा जो अंदर आयी थी. सुमति अपने कपड़े उतार कर एक ओर डालकर जॉय के द्वारा सुप्रिया की गांड की चुदाई समाप्त होने की प्रतीक्षा करने लगी.

जॉय का अब झड़ने का समय हो चूका था, और सुप्रिया ने भी अपनी गांड को सकुचा कर उसके लंड को दुहने का कार्य आरम्भ कर दिया था. सुप्रिया की गांड की इस प्रकार से खुलने और बंद होने से जॉय भी ठहर न सका. उसे सुप्रिया की इस कलाकारी पर सुखद आश्चर्य हुआ और अगले ही पल उसके लंड ने अपना माल सुप्रिया की गांड में छोड़ दिया. सुप्रिया और जॉय पारस्परिक सिसकारियों के साथ झड़ गए.

जॉय ने कुछ देर तक अपने लंड को सुप्रिया की गांड में ही रखा और फिर सिकुड़ते लंड को बाहर खींच लिया. प्रकाश से भी अधिक गति से उसके सामने उसकी बहन आ खड़ी हुई. सुमति को देख जॉय को पहले आश्चर्य हुआ फिर वो हंस पड़ा. सुमति ने भी उसे मुस्कुराते हुए हटने के लिए कहा. अब तक सुप्रिया भी सुमति को देख चुकी थी.

“देखो मैंने आपके लिए अपनी गांड में क्या बचा के रखा है.”

सुमति जॉय के हटते ही सुप्रिया की गांड पर टूट पड़ी और अपना मुंह लगाते हुए उसकी गांड से जॉय के रस को चूस कर पीने लगी. जॉय अपनी बहन के इस उपक्रम को देखता रहा और जब उसने पायल की पुकार सुनी तो उस ओर देखा.

“बुआ की आज पूरी पार्टी ही रही है. है न डैड?” पारुल बोली तो जॉय ने हामी भरी.

जब सुमति सुप्रिया की गांड को खाली करने के बाद उठी तो पारुल ने उससे पूछ ही लिया, “क्यों बुआ, कितनी हो गयीं आज?”

“तीन.” और फिर उसने जॉय के मुरझाये लंड को मुंह में लेकर साफ किया और कपड़े पहन के वहाँ से चल पड़ी. द्वार पर पहुंचकर वो ठहरी और बोली, “जब हो जाये तो बैठक में ही आ जाना.”

ये कहते हुए वो कमरे को बंद करते हुए बैठक में चली गयी.

क्रमशः

1197000
 
भाई,

इसमें सबसे अधिक योगदान आपका ही है.

और इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ.

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