Incest कैसे कैसे परिवार - Page 4 - SexBaba
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Incest कैसे कैसे परिवार

अध्याय १९: पहला घर - अदिति और अजीत बजाज ३

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अदिति एक ओर सोफे पर बैठ गयी. वो अपने सेक्स से वंचित दो और सप्ताह के बारे में सोच रही थी. इतने समय तक वो कभी चुदे बिना नहीं रही थी. पर ये दिन भी कट जायेंगे. और तो और इस बार उसे भी अपने बेटे के लंड का अनुभव होगा. उसकी सास तो वर्षों से ये सुख ले रही थी. अदिति ने स्वप्निल आँखों से सामने चल रहे कुकर्म पर दृष्टि डाली. अनन्या जिस प्रेम से अजीत के लंड को चाटने, चूमने और चूसने में व्यस्त थी उससे उसका अजीत की ओर प्रेम का आभास हो रहा था.

अजीत भी अनन्या के बाल सहलाकर उसे प्रोत्साहित कर रहा था. इस कली को फूल बने अभी २४ घंटे भी नहीं हुए थे. और उसके लंड चूसने में कला कम और प्रेम अधिक दिख रहा था. अदिति ने इस कमी को पूरा करने की प्रतिज्ञा की. फिर उसकी दृष्टि शालिनी की चूत में मुंह डाले अपने बेटे की ओर पड़ी. इस पूरे कार्यकलाप से गौतम का लंड भी अब तन चुका था. वो तो अदिति के बैठने का स्थान और कोण ऐसा था कि वो उस खड़े लंड को अच्छे से देख पा रही थी.

“इससे तो चुदना ही है. बस मैं ठीक हो जाऊं।” अदिति ने विचार किया.

अजीत ने कहा कि अब वो समुचित रूप से चुदाई के लिए उत्सुक है. अदिति ने एक बार और चाटकर लंड को प्रेम से देखा और फिर अपनी दादी की ओर मुड़ी जो अपनी कमर उछाल उछाल कर गौतम की योग्य जीभ के सञ्चालन से झड़ने की निकट थी. अजीत ने गौतम के सिर पर हाथ लगाया और गौतम ने अपने पिता को खड़ा देखा और समझ गया कि अब खिलाडी से दर्शक बनने का समय आ चुका है. वो अपने स्थान से उठा और अदिति की ओर बढ़ गया. अनन्या उसके लगभग साथ ही गयी और भाई बहन अपनी माँ को दोनों ओर बैठ गए.

अजीत आगे बढ़ा और शालिनी के होंठ चूमने लगा. दोनों जैसे एक दूसरे में समा जाने का प्रयास कर रहे थे. फिर अजीत ने चुम्बन तोड़ा और शालिनी के मम्मों पर अपना ध्यान केंद्रित किया. वो एक स्तन को चूसता तो दूसरे को दबाता. बदल बदल कर न जाने वो कितनी ही देर तक यही करता रहा. शालिनी कुनमुना रही थी और अपने कूल्हे हिला रही थी.

“दोनों एक दूसरे के साथ कितने सुन्दर लग रहे हैं न मॉम?” अनन्या बोल उठी.

अदिति जो इस संसर्ग को पहले भी देख चुकी थी आज भी इसकी अलौकिकता से प्रभावित हुए न रह सकी. उसका हाथ बेध्यानी से गौतम के लंड को सहलाने लगा. फिर वो गौतम के लंड को हाथ में लेकर उसकी मुठ मारने लगी. सामने के दृश्य में खोई हुई अदिति को इस बात का आभास नहीं था कि वो क्या कर रही थी.

“हाँ, मॉम, थोड़ा तेज करो.” गौतम की गुहार सुनकर उसने आश्चर्य से उसे देखा फिर अपने हाथ में गौतम के तने लंड को देखा तो जैसे वो नींद से जाग गयी.

“तुझे अच्छा लग रहा है?” अदिति ने मुस्कुराकर पूछा.

“इसमें पूछने की क्या बात है. बहुत अच्छा लग रहा है. मैं भी बस अब आपके ठीक होने की राह देख रहा हूँ.”

“तुझे कैसे पता कि मुझे कुछ हुआ है?”

गौतम को अपनी गलती का आभास हो गया. उसने तो ये उन वीडियो के द्वारा जाना था. उसने तुरंत बात को संभाला.

“कल दादी ने बताया था कि अभी आपको सेक्स से मना किया हुआ है.”

“तेरी दादी के पेट में कोई बात नहीं पचती. हाँ, अभी लगभग दो सप्ताह और हैं. उसके बाद ही डॉक्टर बताएँगे कि मैं सेक्स कर सकती हूँ या नहीं. मैं भी अब बहुत बेचैन हो रही हूँ. ठीक होने के बाद तेरे पापा के बाद तेरा ही नंबर लगने वाला है.”

“क्यों मॉम, पहले क्यों नहीं? पापा के पास तो दादी और अनन्या भी हैं.”

“नहीं. वो मेरे पति हैं. पहला भोग उन्हें ही चढ़ेगा. पर मुझे नहीं लगता कि अनन्या तुझे इतने दिन मना करेगी. क्यों अनन्या?”

“मॉम, मुझे तो अच्छा ही लगेगा। मेरा अपने कौमार्य के लिए पापा का चयन था पर मुझे तो गौतम भी उतना ही प्यारा है. और उसके लंड को देखकर तो लगता है कि वो भी मस्त चुदाई करेगा.”

अनन्या की भाषा सुनकर अदिति और गौतम के मुंह खुले रह गए. अनन्या खिलखिलाने लगी.

“क्या मॉम, अपने ही तो बोला था न कि चुदाई में संकोच नहीं करना चाहिए. और मुझे तो अब इस तरह की भाषा में बड़ा मजा आ रहा है.”

अदिति: “ये लड़की तो एक ही दिन में विशेषज्ञ बन गयी.” इस बात पर तीनों हंस पड़े और सामने चल रहे सहवास को देखने लगे.

अजीत अब अपने दोनों हाथों से अपनी माँ के मम्मे निचोड़ रहा था और उसका मुंह शालिनी की चूत में घुसा हुआ था. और जिस प्रकार से वो उसे चाट रहा था उसे देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वो रसमलाई खा रहा हो. उसने अपने हाथ मम्मों से हटाए और शालिनी की चूत की पंखुड़ियों को फैलाकर अपनी जीभ अंदर डाल दी. शालिनी की कसमसाहट अब बहुत बढ़ चुकी थी. उससे अब ये दूरी सहन नहीं हो रही थी, पर वो ये जानती थी कि जब तक उसका बेटा उसके रस को पी नहीं लेगा उसे चोदने का कोई प्रश्न ही नहीं था. उसकी चूत अब इस रहस्य से भली भाँति परिचित थी और वो अब तेजी से अजीत के मुंह में पानी बहा रही थी.

फिर शालिनी का बांध टूट ही गया. उसकी आनंदभरी चीख कमरे के अन्यथा शांत वातावरण को चीरती हुई दीवारों को हिला गयी. तीनों दर्शक मूक बने इस उत्सर्ग को देख रहे थे. उन्होंने जीवन में ऐसा उन्माद कभी नहीं देखा था. चीखती शालिनी के नितम्ब और शरीर बिना किसी लय के मानो झूम रहा था. उसके छटपटाते शरीर को देखकर किसी मिर्गी के रोगी का ध्यान आ रहा था. उसकी चूत अविरल गति से अजीत के मुंह और चेहरे को जलमग्न कर रही थी. पर अजीत था की हटने का नाम भी नहीं ले रहा था. वो इस पावन जल की एक एक बूँद को अमृत के समान ग्रहण कर रहा था. शालिनी धीरे धीरे शांत हो गयी और उसका शरीर भी शिथिल पड़ गया. अजीत ने उसकी चूत को पूरा सूखने के पश्चात् ही अपना भीगा हुआ चेहरा ऊपर किया. शालिनी उसे देखकर मुस्कुरा उठी.

“जानता है? तेरा बेटा भी तुझसे कम नहीं है, इस कला में. पर आज तो तूने सच में सारे आयाम ही तोड़ दिए.”

शालिनी में फिर अदिति की ओर देखकर बोली, “ अदिति, पर एक ही बात का मुझे खेद है कि गौतम ने ये सब तुमसे नहीं, कहीं और सीखा है. मुझे इस बात का गर्व भी है कि अजीत को ये सब सीखने वाली मैं थी.”

अदिति: “माँ जी, अब समय बदल गया है. आजकल के बच्चे समय से पहले ही सब कुछ करने लगते हैं. मुझे तो अनन्या पर गर्व है कि उसने अपना कौमार्य कल तक सुरक्षित रखा था.” फिर उसने गौतम के लंड की मुठ मारते हुए उससे ही पूछा, “कहाँ से सीखा तूने ये सब जो दादी कह रही हैं. अगर सच में तू इतना अनुभवी है तो तेरी आयु की लड़की तो नहीं सीखा सकती. कौन है तेरी शिक्षिका?”

गौतम थोड़ा असहज हो गया. अजीत ने बात संभाली, “गौतम, हम सब अब किसी भी प्रकार की बातें गुप्त नहीं रखेंगे. हमें तुम्हारे इस ज्ञान से कोई आपत्ति नहीं है. न ही हम ये कहेंगे कि तुम बाहर अपने सम्बन्ध समाप्त करो. हाँ, परन्तु ध्यान अवश्य रहे कि किसी प्रकार का रोग या समस्या घर न लाना.”

गौतम को समझ नहीं आया. इस बार अदिति ने उसे समझाया, “तेरे पापा का कहना है कि ऐसा कुछ मत करना कि कोई लड़की माँ बन जाये और हमें उसे मजबूरी में बहू बनाना पड़े.”

गौतम सोचने लगा कि कितना बताये. उसने देखा कि सब उसकी ही ओर देख रहे हैं. अदिति का भी हाथ अब ठहरा हुआ था.

“मेरी दो प्रोफ़ेसर हैं, पहले तो उन्होंने ही मुझे इस सब में पारंगत किया, पर बाद में मेरे कुछ दोस्तों की मम्मियाँ भी मुझ पर आसक्त हो गयीं. ये समझो कोई पांच स्त्रियों ने सिखाया.”

सब उसके इस कथन से प्रभावित हो गए. पर गौतम अब सब बता देना चाहता था.

“फिर मेरे एक दोस्त की बहन भी है, अनन्या भी उसे जानती है. कोई दो महीने पहले से मैं उसे भी चोद रहा हूँ. पर मैं उसके साथ कंडोम प्रयोग में लाता हूँ, क्योंकि वो भी अभी किसी प्रकार के स्थायी सम्बन्ध में रूचि नहीं रखती.” गौतम रुका और फिर बोलने लगा, “तो कुल मिलकर छह अन्य स्त्रियों को मैंने चोदा है, दादी को छोड़कर.”

अनन्या उस लड़की का नाम जानने को उत्सुक थी, पर वो इसके लिए प्रतीक्षा कर सकती थी.

अजीत: “ ये कुछ सीमा तक अच्छा भी है कि तुम्हें पांच स्त्रियों से सीखने का अवसर मिला. मेरे विचार से ये तीनों इस ज्ञान और अनुभव का भरपूर उपयोग करने वाली हैं. पर अब मुझे तुम सबकी इच्छा पूरी करनी है जो मुझे तुम्हारी दादी की चुदाई करते देखने के लिए उत्सुक थे.”

अनन्या ने ताली बजाकर अपनी सहमति दिखाई और अजीत खड़ा होकर अपने लंड को शालिनी के मुंह से लगाते हुए बोला, “थोड़ा इसे अपनी चूत में जाने के लायक बना दो.”

शालिनी तुरंत उठकर उसके लंड को मुंह में लेकर चूसने लगी और कुछ ही क्षणों में उसे लोहे के समान कड़ा कर दिया. अजीत ने अपने लंड को शालिनी की प्यासी चूत पर लगाया और एक ही बार में पूरा पेल दिया. शालिनी के मुंह से एक हल्की से आह निकली, पर अनन्या की आह उससे अधिक तेज थी. अब कल तक की कुंवारी कली जिसकी चूत में इंच इंच करके लंड जाने में भी दर्द हुआ हो ऐसी एक बार की ठुकाई से तो आश्चर्यचकित होना ही थी. अदिति भी तेजी से गौतम के लौड़े पर हाथ चलने लगी. अजीत बस कुछ ही क्षण के लिए रुका और फिर वो अपनी माँ को एक सही और सधी गति से चोदने लगा. शालिनी भी गांड उछाल कर उसका साथ से रही थी.

“ये दोनों सच में चुदाई करते हुए कितने सुंदर लग रहे हैं न, मॉम। “ अनन्या ने प्रतिक्रिया दी.

“हाँ, और मुझे उन्हें साथ देखने का कई बार सुअवसर मिला है. अधिक तो नहीं पर इतना अवश्य समझती हूँ कि इनके प्रेम का कोई सानी नहीं है. और मुझे इसमें कोई आपत्ति भी नहीं है, क्योंकि इनका और मेरा प्यार एक मजबूत नींव पर रखा है.”

“वैसे मॉम, आपकी सच में प्रशंसा करनी चाहिए, कि आपको जलन नहीं होती.”

“होनी भी नहीं चाहिए. कल जब गौतम ने दादी की चुदाई की तो इनको थोड़ी भी ईर्ष्या नहीं हुई. और जब गौतम कुछ दिन बाद मुझे चोदेगा तब भी ये किसी भी प्रकार से दुखी या चिंतित नहीं होंगे.”

अजीत ने अपनी गति अब काफी तेज कर दी थी और शालिनी भी उसका पूरा साथ दे रही थी. दोनों हाँफते हुए एक दूसरे में समाने की चेष्टा कर रहे थे.

“माँ, आज तो बड़ी उछलकर चुदवा रही हो, पहले तो जल्दी रुक जाती थीं.” अजीत ठहरते हुए स्वर में बोला।

“सब मेरे पोते का किया धरा है, कल इसने ऐसी चुदाई की थी की मेरी सारे जोड़ खोल दिए. बूढ़ी हड्डियों में नयी शक्ति आ गयी इसकी चुदाई से.”

अजीत ये सुनकर और भी तेज चुदाई करने लगा. वो शालिनी को दर्शना चाहता था कि वो गौतम से कुछ कम नहीं है. शालिनी उसका जोर जोर चिल्ला कर उत्साह बढ़ा रही थी. दोनों के मिलन में एक ऐसा सौहार्द्य था जैसे वे दो शरीर नहीं बल्कि एक ही हों. पर शालिनी इस आयु में कितना और भुगत पाती। उसकी चूत हाथ डालने के लिए आतुर थी और शालिनी की चिल्लाहट में एक नयापन आ गया. उसकी चीखें अब ठहर कर आ रही थीं और शरीर भी अब थरथरा रहा था. काँपते हुए शरीर ने अंततः सुख के शिखर पर अपने आपको समर्पित कर दिया और उसकी चूत ने अपनी धार खोल दी.

अजीत का लंड अब छप छप की आवाज से मानो एक नदी में चप्पू चला रहा था. पर इतनी चिकनाई और अपनी गति से वो भी हार ही गया और उसने अपना गाढ़ा सफ़ेद वीर्य से शालिनी की चूत को भर दिया. उसके बाद वो अपनी माँ पर ढह गया और कुछ देर दोनों माँ बेटे एक दूसरे को चूमते रहे. इस पूरे समय अजीत अपने लंड को शालिनी की चूत में हल्के से चलता रहा. फिर जब वो बिलकुल सिकुड़ गया तो उसने चुम्बन तोड़ा और शालिनी के शरीर पर से उठ गया. अनन्या खड़ी होकर ताली पीटने लगी.

अदिति: “अनन्या, अब तुम्हारा ये नया पाठ है. जाकर अपने पापा के लंड को चाटकर साफ करो. मैं तुम्हारी दादी की चूत साफ करती हूँ.”

ये कहते हुए अदिति ने अनन्या को उठाया और दोनों अपने अपने लक्ष्य की ओर चल दिए. गौतम जिसका लंड खड़ा था उसकी ओर किसी ने देखा भी नहीं और वो बेचारा मन मसोस कर ही रह गया.

***************

कुछ देर बाद सब उठे और साफ सफाई के बाद बैठक में लौट आये. अदिति चाय बनाने के लिए किचन में चली गई. शालिनी भी उसके पीछे गई और किचन के दरवाजे का लॉक खोला. पर ये क्या? ये तो पहले से ही खुला था. अब शालिनी को काटो तो खून नहीं. इसका मतलब कि राधा घर में थी! क्या देखा उसने? इस चिंता में डूबी वो बैठक में जाकर बैठ गयी. अदिति को कुछ पता नहीं था, न ही उसको शालिनी ने कुछ बताया ही. वो इस नयी समस्या को सुलझाने का रास्ता ढूंढ रही थी. वो अभी कुछ कह नहीं सकती थी. राधा के आने और उसके व्यवहार से ज्ञात होगा कि उसने क्या देखा. अगर वे सब कमरे में जा चुके थे तो उसे कुछ भी नहीं दिखा होगा.

पर शालिनी को इस बात पर शक था. उसे अपनी इस गलती पर बहुत ही शर्म आयी. क्योंकि राधा हमेशा बता कर जाती थी. आज उसने कुछ नहीं बोला था, अर्थात वो घर में ही थी. जो भी हो, उसे ही इस बात को संभालना होगा. गौतम भी उसे चोदने के लिए उतावला है, तो हो सकता है कि लंड की रिश्वत से उसका मुंह बंद हो जाये. शालिनी को अपनी इस बात पर हंसी आ गयी. “हाँ, मैं गौतम के लंड से उसका मुंह बंद करवा दूंगी.” उसने मन में सोचा.

“क्यों हंस रही हो दादी?” गौतम ने पूछा.

“कुछ अच्छी बात ध्यान में आयी है, जिससे तेरा भी मन खुश हो जायेगा। पर बताउंगी कल, पहले निश्चिंत हो जाऊं.”

“ओह दादी. कुछ हिंट दे दो?”

“नहीं. क्या आज रात जब तू मेरी गांड मारने आएगा?”

“ओह हो, मैं तो भूल ही गया. मेरी तो आज लॉटरी जो लगी है.

इतने में अदिति चाय ले आयी और सब चाय पीने में व्यस्त हो गए. हर व्यक्ति एक अलग चिंतन में था. पर एक विचार सब के मन में था. कि हम सब अब अधिक निकट आ चुके हैं. कुछ ही देर में राधा भी आ गयी. शालिनी उसे कनखियों से ताक रही थी. पर उसे देखकर लगता नहीं था कि उसने कुछ देखा था.

“हम्म्म, कैसे उगलवाऊं इससे.”

जब राधा चाय के कप लेकर किचन में गई और उन्हें धोने लगी तो शालिनी भी किचन में चली गई.

“अरे आज तू बोल कर नहीं गई कि जा रही है. कब गई थी?”

राधा सकपका गई.

“माँ जी, बैठक में कोई दिखा नहीं तो मैं बिना बोले ही चली गई आज. मैंने सोचा सब नहा धो रहे होंगे.”

“और कब गई थी? शालिनी इतनी सरलता से उसे छोड़ने वाली नहीं थी.

राधा ने समय बताया. उस समय तो हम सब कमरे में थे. हो सकता है इसने कुछ न देखा हो.

“मैं कमरे में जा रही हूँ. आज कुछ देर हो गई. काम समाप्त करके आ जाना.” ये कहकर शालिनी अपने कमरे में चली गई.

राधा ने लम्बी साँस ली. फिर उसके मन में ये विचार आया कि आज तो साहेब के लंड का स्वाद मिलेगा माँ जी की चूत से. यही सोचते हुए वो उत्साह से अपने काम को जल्दी समाप्त करने में व्यस्त हो गई.

***************

राधा जब काम समाप्त करके शालिनी के कमरे में आयी तो शालिनी सोफे पर ही बैठी हुई थी.

“क्या हुआ माँ जी, आज मालिश नहीं करवानी क्या?”

“नहीं, आज बस तू अपना दूसरा काम कर.”

“जैसा आप कहो. कपड़े तो उतार लीजिये.”

शालिनी ने कपड़े उतार कर एक ओर रखे, वहीँ राधा ने भी अपने कपड़े निकले और एक ओर रख दिए. शालिनी वहीँ सोफे पर ही बैठकर अपने पांव फैला ली. ताजी ताजी चुदाई के कारण उसकी चूत कुछ फूली हुई थी और लालिमा लिए हुई थी. राधा को ये समझते देर नहीं लगी कि इनकी अच्छी चुदाई हुई है, पर वो कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थी. तभी शालिनी की चूत में से कुछ सफेद सा द्रव्य बाहर निकला. इससे पहले कि शालिनी कुछ भी कर पाती राधा ने जीभ बढाकर उसकी चूत पर से उस रस को चाट लिया. और ये तय हो गया की ये वीर्य ही है.

राधा ने अपना मुंह शालिनी की चूत में डाल दिया और एक भूखी भिखारिन के समान उसे सड़प सड़प कर चाटने और चूसने लगी. अजीत का रस उसके इस पराक्रम से उसके मुंह में बहे जा रहा था. शालिनी को लगा कि उसने सफाई न करके बहुत बड़ी गलती कर दी थी. पर अब तीर कमान से निकल चुका था. शालिनी ने राधा का सिर पकड़ कर उसे अपनी चूत पर दबा लिया. राधा पूरी तन्मयता से उनकी चूत पिए जा रही थी. अब वो समय था जब शालिनी उससे सच्चाई उगलवा सकती थी.

“कहाँ थी तू जाने के पहले?”

चूत पर से मुंह हटाकर राधा बोली, “माँ जी छत पर टहल रही थी.”

“गोकुल के क्या हाल हैं, आजकल दिखता ही नहीं?”

“बाबूजी ने काम पर लगाया हुआ है.”

“अच्छे से चुदाई करता है तेरी?”

इस बार राधा सोचने लगी. उसे अपनी आँखों के सामने अजीत का मोटा लम्बा लंड झूलते हुए दिखने लगा.

“जी माँ जी. बहुत अच्छे से.”

“हम्म्म, लगता है तेरी गर्मी नहीं निकाल पाता है वो. तेरी जैसी जवान औरत को कैसे संभालता होगा?”

गोकुल राधा से आयु में कोई ७-८ साल अधिक था. शालिनी ने इसी बात का लाभ उठाया. और राधा उसके बिछाये इस जाल में आ फंसी.

“माँ जी, जितनी निकाल पाता उतनी बहुत है. अब और कौन करेगा ये?” कहते ही राधा को अपनी गलती का आभास हो गया.

“मेरी चूत का स्वाद कैसा लग रहा है?”

“हमेशा के समान मीठा और कसैला।” पर अब राधा समझ चुकी थी कि उसे सच्चाई बतानी ही होगी. “माँ जी, मुझे क्षमा करना. मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गयी.”

“हुंह, क्या कर बैठी अब?”

“माँ जी, मैंने छत से नीचे आकर बैठक में चल रहे खेल को देख लिया था. पर कसम से माँ जी, में किसी को नहीं कहूँगी, इनको भी नहीं.”

“ठीक है, तू तो मेरी बेटी के समान है, मैं जानती हूँ तू मुझसे विश्वासघात नहीं करेगी. सुन, मैं अजीत से कहकर गोकुल को ५-६ दिन के लिए बाहर भिजवाती हूँ. तू रात को मेरे ही कमरे में रहना कल से. फिर देखेंगे कि तेरी इस जवानी की आग को कैसे बुझाएं. पर ये तय है, कि अगर ये बात बाहर निकली तो चाहे मैं फांसी चढ़ जाऊं, पर तुझे नहीं छोडूंगी. मैं किसी को अपना घर तोड़ने नहीं दूंगी.”

शालिनी की शब्दों के तरीके ने राधा को चेता दिया कि वो अत्यधिक गंभीर हैं.

“माँ जी, आप जानती हो. मैं झूठी कसम नहीं कहती. ये बात मेरे मुंह से मरते दम तक नहीं निकलेगी.”

“ठीक है, चल आज के लिए इतना ही रहने दे. मैं अजीत से कहती हूँ गोकुल को बाहर भेजने के लिए. और तू चिंता न कर, तेरा भी ये राज कभी इस घर से बाहर नहीं जायेगा.”

राधा माँ जी को प्रणाम करके अपने काम के लिए निकल गयी. शालिनी ने भी कपडे पहने और अजीत से बात करने के लिए चल पड़ी.

**************

शालिनी तेजी के साथ अजीत के पास पहुंची और उसे बोला कि कुछ आवश्यक बात करनी है इसीलिए वो उसके कमरे में चले. अजीत को साथ लेकर वो कमरे में गयी और दरवाजा बंद कर लिया.

“क्या हुआ माँ, ऐसी क्या बात है जो अदिति के सामने नहीं हो सकती थी.”

“वो कहीं घबरा न जाये, बात ये है कि जब आज हम सब बैठक में थे तो राधा ने सब कुछ देख लिया है.”

“ओह, शिट! अब क्या होगा.”

“पहली बात ये है कि उसने चुप रहने का वचन दिया है. और मुझे नहीं लगता कि वो कहीं कुछ कहेगी. गोकुल से भी नहीं.”

“चलो, ये समस्या तो दूर हो गयी.”

“हाँ, और उसकी बातों से ये भी पता चल गया कि गोकुल उसे पूरी संतुष्टि नहीं दे पाता है.”

“ओके.”

“मैं चाहती हूँ, की गोकुल को कल से ५-६ दिन या अधिक के लिए किसी काम से बाहर भेज दो. इसके बाद हम राधा को ठीक से समझा देंगे.”

“पर आप तो कह रही हैं कि वो समझ चुकी है.”

“हाँ, पर कल वो पलट न जाये किसी कारण इसका भी हमें कोई सही न कोई प्रयोजन करना होगा.”

“ऐसा हम क्या कर सकते हैं?”

“तुमने सुना नहीं, गोकुल उसे संतुष्ट नहीं कर पाता है.”

“ओह, तो आप चाहती हो की मैं उसकी चुदाई करूँ ?”

“सही समझे. पर कल रात से मैंने उसे मेरे कमरे में ही सोने के लिए कहा है. और कल तो गौतम उसकी चुदाई करेगा. वो भी बहुत उत्सुक है उसकी चूत के लिए.”

“जवान लड़का है, तो चूत के लिए तो तत्पर ही रहेगा. ठीक है, तो मेरी जब भी आवश्यकता हो मुझे बता देना.”

“ठीक है. अभी तुम पहले गोकुल को भेजने का प्रबंध करो.”

अजीत चला गया और फिर उसने अपने दूसरे शहर के एक मित्र से बात की जो उसे कई दिन से किसी विश्वासपात्र आदमी के लिए कह रहा था, हालाँकि काम कुछ ही दिन का था पर गोपनीयता आवश्यक थी. समय निर्धारित करने के बाद उसने ऑफिस फोन किया और गोकुल को घर आने की आज्ञा दी. गोकुल के आने पर अजीत ने उसे अपने मित्र के कार्य के बारे में समझाया और ये भी बताया की ये किसी को भी न कहे. न घर में, न बाहर. अजीत ने कहा कि ये नियम वो स्वयं भी मान रहा है. इसके बाद उसे जाने की तैयारी करने के लिए कहा.

गोकुल अपने कमरे पर गया और उसने राधा को बताया कि उसे कल से सप्ताह भर के लिए बाहर जाना है. राधा जानती तो थी, पर उसके मन में फिर भी एक टीस सी उठी कि वो अपने पति को धोखा देने वाली है. पर वो ये भी जानती थी कि उन्हें इतने आराम की नौकरी और सुविधाएँ कोई और नहीं देगा. और न ही कोई इतना वेतन ही देगा. तो इसके लिए वो जो भी होगा, करेगी. पति पत्नी एक दूसरे की बाँहों में कुछ देर तक बंधे रहे फिर बिस्तर पर चुदाई में व्यस्त हो गए. आज न जाने क्यों राधा को गोकुल की चुदाई बहुत सुखदाई लगी. चुदाई के बाद दोनों सो गए और फिर एक घंटे के बाद उठे. राधा अपने काम पर बंगले में चली गयी और गोकुल अपना सामान बांधने लगा.

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शाम के सात बजने को थे. अजीत दोपहर में ऑफिस गया था और कुछ देर पहले ही लौटा था. अदिति ने उसे मुंह हाथ धोने और कपड़े बदलने के बाद उसकी ड्रिंक दी. शालिनी ने भी अदिति से उसके लिए एक ड्रिंक बनाने को कहा. अदिति उसे भी ड्रिंक बना कर लाई और फिर उनके साथ बैठ गयी. अनन्या और गौतम अभी लौटे नहीं थे. पर आने ही वाले थे. राधा किचन में काम कर रही थी, उसे आज जल्दी जाना था. वो ये समय गोकुल के साथ बिताना चाहती थी क्योंकि वो बाहर जा रहा था. उसके रहते किसी भी प्रकार का प्रेमालाप नहीं हो सकता था. पर सांकेतिक वार्तालाप तो संभव था.

“क्या हुआ माँ जी, आपका ड्रिंक लेने का मन कैसे हो गया आज?”

“मन तो हर दिन करता है, पर लेती नहीं थी बच्चों के कारण. पर अब जब बच्चे बड़े हो गए हैं तो अब अपने आप को रोकने का कोई अर्थ नहीं है.”

सभी बच्चों के बड़े होने का अर्थ समझ गए और उससे सहमति जताई. गौतम और अनन्या भी लौट आये और अपने कमरे में जाकर कपड़े बदलकर लौटे. राधा ने भी आकर बताया कि उसने खाना बना दिया है और वो शेष कार्य कल कर देगी. अदिति ने उसे जाने के लिए कहा. अब केवल परिवार वाले ही थे अकेले।

शालिनी ने अदिति को सीमित बात बताने का निश्चय किया. उसने अजीत की ओर देखा और फिर अदिति से बोली, “मुझे तुमसे कुछ बात करनी है, थोड़ा किचन में चलो.”

शालिनी ने किचन में जाकर ये बात न बता कर कि राधा ने उन्हें देख लिया है, उसे बताया कि गौतम राधा की चुदाई करना चाहता था तो उसने राधा को मना लिया है और इसीलिए गोकुल को बाहर भेजा है.

अदिति: ‘अगर उसे बाहर भेजा है तो अवश्य ही आप उसे अजीत से भी चुदवाने का संकल्प ले चुकी हैं. है न?”

शालिनी: “मुझे तो राधा की बात से उसकी इच्छा केवल अजीत के ही लिए लगी थी. इसीलिए मैं कल रात गौतम से चुदवा दूंगी. इससे हो सकता है कि अजीत से उसका मन कम हो जाये. पर ये सोच, इतनी भरोसे की कोई और मिलेगी नहीं. तो उसकी आग मुझाने में ही हमारी भलाई है. और गौतम गर्म लड़का है, आसानी से हम सबको चोद सकता है. हाँ उसकी बाहर की चुदाई पर कुछ अंकुश अवश्य लग जायेगा.”

“ठीक है, माँ जी. अपने सोचा है तो सही ही होगा. पर ये बात अलग से बताने की क्या आन पड़ी थी.”

“मैं ये बात दोनों बच्चों से नहीं करना चाहती और न ही उन्हें कल रात से पहले कुछ भी भनक पड़नी चाहिए.”

“ओके.”

ये कहकर दोनों बैठक में आ गयीं.

************

जब दोनों वापिस सोफे पर बैठीं तो अनन्या चहकते हुए बोली, “मॉम, मैं आज भी आपके साथ सो जाऊं?”

सभी उसकी इस बात पर हंसने लगे.

अदिति हँसते हुए, “अब तुझे मैं कैसे मना करूँ पर ये बता कि मुझे क्या मिलेगा.”

अनन्या सोच में पड़ गयी फिर बड़ी धीमे स्वर में बोली, “मैं आपकी चूत चाटूँगी. पर आपको मुझे सीखना पड़ेगा.”

अदिति: “हाँ हाँ क्यों नहीं, तुझे तो मैं सिखाऊंगी और फिर दादी तेरी परीक्षा लेंगी कि क्या और कितना सीखा.”

शालिनी: “हाँ ये सही है. तो चलो अब खाना खा लिया जाये नहीं तो ठंडा हो जायेगा.”

अजीत: “कुछ देर और रुको, मैं एक ड्रिंक और लूंगा.”

अदिति उठी और अजीत के गिलास को ले जाने लगी. फिर वो शालिनी के सामने रुकी और पूछा क्या वो भी लेना चाहेगी? शालिनी ने अपना गिलास उसे देते हुए हामी भर दी. अदिति जाने लगी और उसके पीछे गौतम भी चला गया.

गौतम: “मॉम, क्या मुझे भी एक ड्रिंक मिल सकती है. मैं दोस्तों के साथ पी लेता हूँ कभी कभी.”

अदिति सोच में पड़ गई, फिर सोचा कि अगर ये चोद सकता हैं तो पीने से रोकना व्यर्थ है. उसने गौतम को एक ग्लास लाने के लिए कहा और ड्रिंक बनाने में लग गई. गौतम ग्लास लाया तो उसके लिए भी अदिति ने ड्रिंक बनाई.

फिर धीरे से बोली, “ये वाला यहीं पी ले, और फिर दूसरा वहां ले चलेंगे.”

गौतम खुश हो गया और दो ही घूँट में अपनी ड्रिंक समाप्त की और अदिति ने उसे नयी ड्रिंक बनाकर दी और फिर दोनों बैठक में चले गए. गौतम के हाथ में ग्लास देखकर सब चौंक गए. फिर अजीत ने अपनी ड्रिंक ली और गौतम को चियर्स कहकर उसके घूँट लेने लगा.

“आपको बुरा तो नहीं लगा कि मैंने गौतम को ड्रिंक दे दी?” अदिति ने अजीत से पूछा.

“मुझे पता है कि ये कभी कभार पीता है. और अब जब हम सब हर चीज़ खुल कर रहे हैं तो ये भी ठीक ही है. कम से कम ये सीमा में रहेगा.”

“थैंक यू, पापा.”

“फिर मैं? “ अनन्या ने पूछा.

“जब तेरा मन करेगा तब पी लेना. पर अभी तो तुझे इसका अनुभव नहीं है तो जितना हो सके इससे दूर ही रह.”

“ओके, पापा. मैं समझ सकती हूँ.”

ड्रिंक के बाद सब खाने के लिए गए और फिर बर्तन रखने के बाद नए प्रबंध के अनुसार अपने कमरों में चले गए. अनन्या अदिति के साथ उसके कमरे में और गौतम शालिनी के साथ उसके कमरे में.

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शालिनी का कमरा

शालिनी गौतम को लेकर अपने कमरे में पहुंची और कमरा लॉक कर दिया. फिर उसने गौतम की ओर देखा और बोली, “मैं बाथरूम से आती हूँ. तब तक चाहे तो दो ड्रिंक बना ले, मेरी उस अलमारी के अंदर रखी है बोतल.”

गौतम: “वाओ, दादी. आप तो बड़ी कलाकार निकलीं.”

शालिनी बाथरूम में गयी और गौतम ने दादी की बताई अलमारी खोली और बोतल ढूंढ निकाली। फिर उसने दो ड्रिंक बनाये और दादी के लिए रुक गया. फिर कुछ सोचकर अपने कपड़े भी उतार दिए और नंगा अपने लंड को सहलाते हुए बैठ गया. शालिनी बाथरूम से निकली तो वो भी निर्वस्त्र ही थी. गौतम को देखकर वो मुस्कुराई.

शालिनी: “हम दोनों के मन एक जैसा सोचने लगे हैं अब तो.”

ये कहते हुए वो भड़काती हुई चाल में गौतम के पास आयी और उसकी गोद में बैठ गयी. गौतम के चेहरे को पास लेकर उसने उसे चूमा और फिर उठकर अपनी ड्रिंक ली और उसके सामने बैठ गयी. नंगी दादी निर्लज्जता ने अपने पांव फैलाकर गौतम को अपनी चूत के दर्शन करा रही थी.

“बड़ी औरतें चोदी हैं तूने तो, फिर मेरी जैसी बुढ़िया पर क्यों मरता है?”

“क्योंकि आप मेरी दादी हो, और मेरे लिए आप उन सबसे अधिक सुंदर हो. और आपसे मेरा मन का भी सम्बन्ध है, जबकि उनके साथ केवल शरीर की भूख. और सच कहूँ तो मैंने किसी को नहीं फँसाया, बल्कि उन्होंने ही मुझे फँसाया था और बाद में मुझे इसमें बहुत मजा आने लगा तो रुकने का कोई प्रश्न ही नहीं उठा.”

“ये बात सच है, ये एक ऐसी भूख है जो मिटाने से और बढ़ती है. तेरे दादाजी और मैं एक दूसरे को संतुष्ट करते थे. पर मुझे फिर भी अजीत से अपनी प्यास बुझानी पड़ी. पर ये तय है, अगर अजीत न होता तो मैं किसी और के पास तो किंचित भी नहीं जाती. घर में बात रही तो सब ठीक ठाक चलता रहा.”

“दादाजी को कभी शक नहीं हुआ?”

“मुझे लगता है कि उन्हें पता चल गया था. हालाँकि उन्होंने कभी ये दर्शाया नहीं, पर उनका व्यव्हार अजीत के प्रति बदल गया था. पर तब तक उनकी बीमारी भी बढ़ गयी थी. वो हमेशा अजीत को एक बात कहते थे कि मेरे जाने के बाद शालिनी का पूरा ध्यान रखना, इसे किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं होने देना. इसीलिए मैंने उनके अंतिम दिनों में अजीत का साथ छोड़ दिया था. मैं नहीं चाहती थी कि वे किसी प्रकार के दुःख के साथ जाएँ। “

“बहुत अच्छे आदमी थे न दादी? हम दोनों को तो इतना प्यार करते थे कि हम हमेशा आप लोगों के पास आने को उत्सुक रहते थे.”

दादी के चेहरे पर एक दुःख की छाया सी आयी, जैसे उन्हें कुछ याद सा आया हो. उनकी ऑंखें भीग गयीं.

“क्या हुआ दादी?”

“मुझे अभी उनकी एक बात याद आयी. मुझे लगता है कि उन्हें पक्का पता चल गया था अजीत और मेरे बारे में?”

“कैसे?”

“जाने के कोई एक महीने पहले जब तुम और अनन्या वहाँ आये हुए थे, तो उन्होंने मुझसे कहा था.

“देखना शालू, तेरा जितना ध्यान अजीत रखता है न, उससे भी अधिक ध्यान तेरा ये पोता गौतम रखेगा. तुझे हर प्रकार का सुख देगा ये. और जब ऐसा हो तो मेरी ये बात याद करना.”

दादी उठी और जाकर दादाजी के चित्र के सामने खड़ी हो गयीं. उन्हें ये आभास भी नहीं हुआ कि वे इस समय निर्वस्त्र हैं.

“आप सच कहते थे. कल तो मैं आपकी बात भूल गयी थी, पर आज मुझे याद आ गयी है. और मैं आपकी स्मृति में इसे भी उतना ही सुख दूंगी जितना ये मुझे देगा.” ये कहकर हाथ जोड़कर वो लौट आयीं, उनकी ऑंखें अभी भी भीगी हुई थीं.

गौतम चुप रहा, उसने कुछ भी कहना उचित नहीं समझा. फिर शालिनी ने अपनी ड्रिंक एक घूँट में समाप्त की और गौतम की गोद में आकर बैठ गयी. शालिनी के गौतम के होंठों पर अपने होंठ रखे और उसे चूमने लगी. गौतम के हाथ उसकी नंगी पीठ पर रेंगने लगे और फिर उसने उन्हें थोड़ा नीचे शालिनी के नितम्बों पर रखा और उन्हें दबाने लगा.

शालिनी: “मेरी गांड में लंड गए हुए कई दिन हो चुके हैं. तेरा बाप कई बार गांड मारने के लिए कहता है, पर न जाने क्यों मेरा ही मन नहीं किया. हाँ राधा से मैं गांड चटवाती हूँ और वो बहुत स्वाद लेकर चाटती भी है. पर आज तेरे लंड ने इसका बहुत दिनों का उपवास तोडना है, तो बहुत जल्दी मत करना. कल तूने मेरी हड्डियां हिला दी थीं.”

गौतम: “नहीं दादी, मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूँगा. मैं तो कहता हूँ कि आप ऊपर से अपनी गांड में लंड लेना जिससे आप गति और गहराई दोनों पर नियंत्रण रख पाओ. फिर आप जैसे चाहोगी, वैसे ही करेंगे.”

“मेरा प्यारा बच्चा. पहले आकर मेरी चूत और गांड चाटकर थोड़ा मुझे भी गर्म कर दे, फिर मारना मेरी गांड. और फिर चूत , फिर गांड, फिर…”

गौतम हंस कर: “दादी, क्या आज रात भर चुदने का मन है? फिर कल क्या करोगी ?”

शालिनी: “कल क्या पता क्या होगा, आज की रात तो मेरी हर इच्छा पूरी करने की है. चल अब उठ.”

शालिनी गौतम के साथ बिस्तर पर गई और घुटनों और कहनी के बल घोड़ी के आसन में आ गयी. उसने अपने कूल्हे कुछ इस प्रकार से ऊँचे उठाये कि उसकी चूत और गांड दोनों ही सामने उभर कर आ गयीं. गौतम ने अपना स्थान लिया और शालिनी की चूत पर पानी उँगलियाँ चलाने लगा. फिर उसने एक ऊँगली अपने मुंह में डालकर उसे गीला किया और शालिनी की चूत में डाल दी. शालिनी की चूत की गर्मी और गीलेपन का उसे तुरंत ही आभास हो गया. वो हल्के से ऊँगली चलाने लगा और फिर उसे निकल कर अपना मुंह उसपर लगा दिया और बहते हुए स्त्राव को चाटने का प्रयास करने लगा.

चाटते हुए उसे अपनी जीभ को शालिनी की चूत में डाला और उसे अंदर घूमने लगा. शालिनी आनंद के सागर में बह रही थी. उसका शरीर इसके लिए कितनी देर से प्रतीक्षा कर रहा था, ये उसे भी नहीं पता था. गौतम की जीभ उसके अंदरूनी गीलेपन को सहेजने में लगी थी. जब उसे लगा कि उसने इस छेद पर पर्याप्त ध्यान दे लिया है तो उसने अपने चेहरे को ऊपर उठाया और शालिनी के नितम्ब चाटने लगा. वो एक गोलाई में चाट रहा था और उस गोलाई का केंद्र शालिनी की गांड का लुप्लप करता हुआ भूरा छेद था. और ये छेद ऐसे खुल बंद हो रहा था मानो जैसे साँस ले रहा हो.

गौतम कुछ ही समय में अपने केंद्र पर पहुँच गया और उसने शालिनी की गांड के सिलवट पड़े भूरे क्षेत्र को चाटकर उसे गीला कर दिया. फिर हल्के हल्के प्रहारों से वो जीभ से उस छेद पर प्रहार करते हुए उसे खोदने का प्रयत्न करने लगा. पर वो गुफा का द्वार इतने सरलता से खुलने वाला नहीं लग रहा था. अंततः गौतम को अपने दोनों हाथों का भी प्रयोग करना पड़ा और उसे फ़ैलाने के बाद उसे उसके अंदर प्रवेश का रास्ता दिखाई दे ही गया. उसकी जीभ एक सर्प की भांति उस गुफा में प्रवेश कर गई. और शालिनी का पूरा शरीर एक नयी संवेदना से सिहर उठा.

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अदिति का कमरा

अदिति, अजीत और अनन्या अपने शयनकक्ष में पहुंचे तो अदिति वहीँ अपने कपड़े निकालने लगी.

अनन्या: “मॉम, पर आपको डॉक्टर ने मना किया है.”

अदिति: “पर क्या तुम अपनी बात इतनी जल्दी भूल गयीं? तुमने मेरी चूत चाटने का वचन दिया था.”

अनन्या: “ओह, हाँ. पर आपको मुझे बताना होगा.”

अदिति: “तेरे पापा को देखना कि वे क्या क्या करते हैं और उसी का अनुशरण करना. इनके जैसा शिक्षक तुझे कभी नहीं मिलेगा.”

अनन्या: “ओके, मॉम.”

अदिति: “अब कपड़े उतार ले, नहीं तो तेरे पापा कैसे चोद पाएंगे तुझे.”

अनन्या ने तुरंत ही अपने कपड़े उतार फेंके. अजीत उसके इस उतावलेपन पर हंसने लगा. वो भी अब तक नंगा हो चुका था.

अजीत: “इसे देखकर मुझे तुम्हारी जवानी याद आ गयी, अदिति. याद है हम कमरे में अंदर भी नहीं आ पाते थे और तुम नंगी हो जाया करती थीं.”

अदिति: “याद क्यों नहीं होगा. आज भी तो वही करती हूँ, हाँ पर अब पहले बाथरूम में जाकर मुंह हाथ धोती हूँ. जैसे मैं अब जा रही हूँ.”

अदिति के आने के बाद पहले अजीत और फिर अनन्या भी बाथरूम से होकर आये. जब अनन्या बाहर आयी तो देखा कि अदिति बिस्तर के एक कोने के त्रिकोण पर लेटी हुई है और उसके पांव दोनों ओर फैले हुए हैं. अजीत ने अनन्या का हाथ लिया और उसे एक ओर बैठाया और स्वयं दूसरी ओर बैठ गया.

“अब जैसा मैं करूँगा, वैसा ही तुम्हे भी करना है.” अजीत ने उसे समझाया.

अनन्या को इस विचित्र आसन का अर्थ तब समझ में आया. इस प्रकार से बाप बेटी एक एक करके बिना हटे हुए अदिति की सेवा कर सकते थे. अजीत ने अदिति की चूत के ऊपर अपनी उँगलियाँ चलाईं और फिर कुछ तेजी से उसे सहला कर छोड़ दिया. अनन्या देख रही थी. जब उसने कुछ भी नहीं किया तो अजीत ने उसे टोका. अनन्या जैसे सोते से जगी और उसने भी उसी प्रकार से अदिति की चूत पर ऊँगली चलकर तेजी से सहला कर छोड़ दिया.

“ऐसा करने से चूत को आभास हो जाता है कि उसकी सेवा होने वाली है और वो भी उत्सुक हो जाती है. देखो.”

ये कहते हुए अजीत ने अदिति की चूत की फाँको को फैलाया तो अनन्या को उसपर कुछ नमी सी दिखी। इसके बाद अजीत ने अदिति के भग्नाशे पर ऊँगली चलाई और फिर अंत में उसे पकड़ कर हल्के से मसल दिया. फिर उसने अनन्या की ओर देखा तो अनन्या ने वही चरण दोहराये. भग्नाशे के छेड़ने से अदिति एकदम से उत्तेजित हो गयी. इस बार अजीत ने फिर अनन्या को चूत का निरीक्षण कराया. ये समझने में अनन्या को देर नहीं लगी कि अब चूत में नमी की मात्रा बढ़ गयी थी और वो अंदर से भीगी हुई प्रतीत हो रही थी.

“भग्नाशा, जिसे अंग्रेजी में क्लिट कहते हैं, किसी भी स्त्री की उत्तेजना भीषण रूप से बढ़ा देती है. कई स्त्रियां तो केवल इसके मसलने से ही स्खलित हो जाती हैं. ये समझो कि अगर इससे खेलने में निपुण हो गयीं तो तुम किसी भी स्त्री को अपने वश में कर सकोगी. अब जो हमने उँगलियों के माध्यम से किया वही तुम्हें अपनी जीभ के द्वारा करना है. पर ये समझो कि जीभ अत्यंत मुलायम होती है तो तेजी से सहलाने के लिए ये काम नहीं आएगी. अब चाटो। ”

जैसे ही अनन्या आगे झुकी तो अदिति की चूत की मादक सुगंध उसके नथुनों में भर गयी. उसने गहरी साँस लेकर उस का आनंद लिया और फिर अपनी जीभ अदिति की चूत पर चलाने लगी. अदिति सिहर उठी. हालाँकि अनन्या ने नया कुछ भी नहीं किया था, परन्तु बस इस भाव से कि उसकी बेटी ने आज पहली बार उसका स्वाद लिया है, अदिति आनंदित हो गयी.

अनन्या आरम्भ में तो बहुत हल्के हल्के चूत को चाटती रही फिर उसे उसका स्वाद और सुगंध इतनी भाई कि वो मन लगाकर कर उसमे रम गई. उसके चाटने से न केवल अदिति को आनंद आ रहा था पर साथ में बैठ कर अजीत भी अनन्या की अपनी माँ की चूत के प्रति निष्ठा को देख रहा था.

“अदिति, अपनी बेटी को तुम्हारा स्वाद बहुत भा रहा है लगता है. ये तो बिना कुछ और बताये ही देखो कितने प्यार से तुम्हे चाट रही है.”

“सच में, अगर बिना अनुभव के ये इतनी अच्छी है तो कुछ ही दिनों में तो पारंगत हो जाएगी. इसकी दादी बहुत गर्व करेंगी.”

अपनी प्रशंसा सुनकर अनन्या फूली न समायी और अपने प्रयास में और भी तेजी ले आयी. फिर उसे अपनी माँ के भग्नाशे का ध्यान आया और वो उस पर भी जीभ चलाने लगी. फिर न जाने उसे क्या मन में आया उसने उस उभरे हुए फुदकते भग्नाशे को अपने होठों में लिया और उसे होठों से ही मसलने लगी.

अदिति उछल गयी, “उई माँ.”

और उसने एक बड़ी धार अनन्या में मुंह पर छोड़ दी. अब अनन्या इस से परिचित नहीं थी तो वो समझी कि अदिति ने पेशाब कर दिया है. पर जैसे ही उसने अपना मुंह हटाया उसने पाया कि उसके पापा उस धार में मुंह लगा चुके हैं. उसे इस बात पर बड़ा अचरज हुआ.

“पापा! वो मम्मी का सूसू था.”

“नहीं, ये मम्मी का रस था जो उसके झड़ने का प्रमाण है. तुमने इतने कम समय में ही इसका रस निकाल दिया. तुम सच में बहुत भी प्रतिभावान हो.”

अब तक अदिति का झड़ना रुक चुका था. उसने अपनी संतुष्टि जताते हुए अनन्या को शाबाशी दी और फिर उठकर बैठ गई.

अदिति: “मेरा तो आज के लिए हो ही गया. अब बस मैं ठीक हो जाऊं तो इसके आगे कुछ होगा.”

अजीत: “वैसे तुम्हें अब कैसा लग रहा है.”

अदिति: “अब मुझे कोई समस्या नहीं है. मैं तो चाहूंगी कि हम डॉक्टर से इसी सप्ताह मिल लें तो ठीक रहेगा. निरीक्षण भी हो जायेगा और आगे के लिए भी पता लग जायेगा. कुछ नहीं तो दवाइयाँ तो बदलेंगी. इन दवाइयों से मुझे बहुत सुस्ती रहती है.”

अजीत: “ठीक है, मैं कल ही उनसे बात करके समय लेता हूँ. परसों जा सकेंगे मेरे विचार से.”

अदिति: “जैसा भी है. अब तुम दोनों खेलो, मुझे तो थकान होने लगी है. ये दवाइयां तो बदल ही दें तो अच्छा होगा.”

ये कहते हुए अदिति बिस्तर की एक ओर लेट गयी और कुछ ही क्षणों में उसकी आंख लग गयी. अजीत अपनी पत्नी की ओर देखता हुआ उसकी स्थिति पर चिंतित सा था.

अनन्या: “पापा, आप डॉक्टर से समय लीजिये. मम्मी मेरे विचार से अब ठीक हैं, अब उनके चलने और झुकने में मुझे कोई समस्या नहीं दिख रही है. और आप भी चिंता मत करो. वो अब ठीक हैं. आप तो बस उनकी चुदाई करने का सही समय देखो. बहुत तरस गयी हैं.”

अजीत: “ठीक तो हो जाये. मैं इसे दिन रात इतना चोदुँगा कि इसकी सारी कमी पूरी कर दूंगा इतने दिनों की.”

अनन्या: “ये मत भूलिए कि अब आपके पास गौतम भी होगा आपके बोझ बाँटने के लिए.” कहकर अनन्या हंस पड़ी.

अजीत भी हँसते हुए बोला, “हाँ जैसे तू अपनी माँ का बोझ बाँट रही है.” ये कहते हुए उसने अनन्या को चूमा और उसे बिस्तर पर लिटाकर उसकी चूत में अपना मुंह डाल दिया.

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शालिनी का कमरा

जिस तन्मयता से गौतम शालिनी की गांड चाट रहा था उसे देख कर ये प्रतीत होता था जैसे वो कोई छप्पन भोग कर रहा हो. उसकी जीभ जहाँ तक सम्भव था शालिनी की गांड में प्रवेश करके उसका रोम रोम को भिगा रही थी. शालिनी भी इस सुख से दुहरी हो रही थी. हालाँकि राधा हर दिन उसे ये सुख देती थी, पर जिस प्रेम और भक्ति से गौतम उसकी गांड को चाट रहा था वो उसमे नहीं थी. जब गौतम को लगा की दादी की गांड अब पूर्ण रूप से उसके लंड के लिए इच्छुक हो गयी है तो वो खड़ा होकर अपने बलशाली लंड को शालिनी के मुंह के पास ले आया.

“दादी, अब थोड़ा इसे भी अपनी गांड में जाने के लिए थोड़ा गीला कर दो.”

शालिनी ने आव देखा न ताव और तपाक से लंड को मुंह में लिया और चाट चाट कर थूक से रज दिया. गौतम ने अपने थूक से लिपटे हुए लौड़े को दादी के मुंह से निकाला और इस बार उन्हें घोड़ी के आसन में दोबारा लिटा दिया. शालिनी आंख और साँस बंद करके अपनी गांड में अपने पोते के मोटे लौड़े की प्रतीक्षा करने लगी. और उसे अधिक समय रुकना भी नहीं पड़ा. उसे अपनी गांड के छेद पर एक दबाव का आभास हुआ और फिर उसे लगा जैसे उसकी गांड चौड़ी होने लगी है. गौतम ये जानकर कि उसकी गांड बहुत दिन से बंद है और फिर वो गांड उसकी प्यारी दादी की है, एक कछुए की गति से उसमे लंड डाल रहा था.

पक्क की एक हल्की सी ध्वनि के साथ ही गौतम का सुपाड़ा शालिनी की गांड में प्रवेश कर गया. गौतम रुककर इस नए संवेदन का आनंद लेने लगा. चूत और गांड दोनों में बहुत अंतर होता है. जहां चूत अपना रस छोड़कर राह को सरल करने का प्रयास करती है, गांड के पास अपनी रक्षा का ऐसा कोई भी अस्त्र नहीं होता. और इसीलिए भी गांड मारने में बहुत महारथ की आवश्यकता होती है. अनावश्यक तीव्रता या बल दोनों को चोटिल कर सकती है. पर यहाँ गौतम का अन्य स्त्रियों से सीखे हुए गुर काम में आये. उसने मन ही मन अपनी उस प्रोफ़ेसर का धन्यवाद किया जिसने उसे इस राह का सफल यात्री बनाया था.

कुछ पल उस तंग, गर्म और मुलायम कैद का आनंद लेने के बाद उसने पाया कि उसकी दादी सामान्य ही थी तो उसने अपने लंड को धीमी गति से अंदर डालने लगा. शालिनी उसकी इस बाजीगरी पर अचरज में थी. उसे गौतम से इतने धैर्य की आशा नहीं थी. जब लंड ने ४-५ इंच की दूरी तय कर ली तो शालिनी से रहा नहीं गया.

शालिनी: “बेटा, ये ठीक है कि मेरी गांड कई दिन से मारी नहीं गयी है. पर ये ऐसी कोरी भी नहीं कि इतना संभाल के मारे। कुछ तो जोर दिखा. तूने तो कल मेरी हड्डियां चटखा दी थीं, तो आज क्यों ऐसी सुस्ती दिखा रहा है. प्यार से मार पर इतने भी प्यार से नहीं कि मैं यूँ ही मर जाऊं.”

गौतम ये सुनकर कुछ आश्वस्त हुआ और उसने दबाव बढ़ाया और कुछ ही पलों में उसका पूरा लौड़ा उसकी दादी की गांड की गहराई नाप चुका था. अपने लंड के चारों ओर से गर्म करती हुई दादी की गांड की मांस पेशियाँ उसे एक अन्य ही सुख प्रदान कर रही थीं.

“दादी, पूरा लंड खा लिया आपकी गांड ने.”

“तो फिर चोद, प्यार से चोद, पर रुकना मत.”

गौतम अपने लंड को शालिनी की गांड में एक पिस्टन की भांति चलाने लगा. कुछ देर के बाद गांड की पेशियाँ भी ढीली पड़ गयीं और उसकी राह पहले से सरल हो गयी. इस कारण उसने अपनी गति बढ़ा दी. शालिनी को आनंद की अनुभूति हो रही थी जो उसे कई दिनों से अनुभव नहीं हुई थी. पर वो जानती थी कि अब गौतम का लौड़ा उसकी गांड का नियमित यात्री हो जायेगा. उसके मन में ये विचार भी कौंधा कि कल राधा को उसकी गांड से भी नया स्वाद मिलने वाला है.

गौतम को भी अपनी दादी की गांड मारने में बहुत अधिक सुख मिल रहा था. अब गांड तो वो पहले भी मार चुका था, पर आज के इस सहवास का आनंद कुछ और था. कुछ दिन पहले वो स्वयं को इस परिस्थिति में होने का स्वप्न भी नहीं देख सकता था. उसने कभी सोचा भी न था कि एक दिन ऐसा आएगा जब वो न सिर्फ अपनी दादी को चोद पायेगा बल्कि उसकी गांड भी मार लेगा. यही कुछ भावनाएं थीं जिसने उसका मन भटका दिया और उसने अनअपेक्षित रूप से अपनी गति बढ़ा दी. शालिनी ने भी अब अपनी गांड में चल रहे मूसल की कुटाई की बढ़ती हुई चोटों अनुभव किया. पर वो अपने पोते के प्रेम से इतनी विव्हल थी कि उसने कोई आपत्ति नहीं की. बल्कि उल्टा वो उसे प्रोत्साहित करते हुए और तेजी से गांड मारने का आव्हान करने लगी.

दादी की इन सीत्कारों से गौतम का ध्यान चल रहे कुकर्म की ओर लौट आया और उसने पाया कि दादी तो उसे और तेज चुदाई के लिए पुकार रही है. गौतम समझ गया कि दादी का असली रूप अब निखर कर सामने आया है और उसे भी थोड़ी ताबड़तोड़ गांड तोडू चुदाई की इच्छा है. फिर क्या था गौतम ने अपने दोनों पांव जोर से जमाये और लम्बे गहरे धक्कों से शालिनी की गांड में लंड पेलने लगा. उसका लंड अब ऐसी तेजी से अंदर बाहर हो रहा था जिसे देख पाना भी असंभव था. शालिनी को भी अपनी गांड में ऐसे चल रहे अपने पोते के लंड से इतना आनंद आ रहा था जिसका वो वर्णन करने में असमर्थ थी.

शालिनी की चूत भी गौतम के लंड के प्रहार अनुभव कर रही थी. गांड और चूत के बीच की पतली झिल्ली इस दुविधा में थी कि चुदाई हो किसकी रही है. और जब शालिनी आनंद में झूमने लगी तो उसकी चूत भी अपनी स्वीकृति दिखाने के लिए रस छोड़ने लगी. अगर गौतम के धक्के थोड़े भी धीमे होते तो शालिनी अपनी चूत को सहलाने का प्रयास करती. पर इन धक्कों की शक्ति के कारण वो अपना आसन तोड़ने की स्थिति में नहीं थी. पर गौतम की ट्रेनिंग फिर काम में आयी और उसने पैंतरा बदला और बिना गांड में लंड की गति कम किये हुए अपने एक हाथ से शालिनी के भग्नाशे को मसलने लगा.

अब शालिनी से सहन नहीं हुआ और उसकी चूत झरने के समान बहते हुए झड़ने लगी. और जब उसका झड़ना रुका तो शालिनी भी ध्वस्त हो चुकी थी. गौतम भी अब अपने चरम के निकट था तो एक असामान्य गति और पाशविक शक्ति के साथ शालिनी की गांड पेलने लगा. और जब शालिनी ढहने लगी तभी गौतम भी झड़ने लगा और दादी की गांड सींचने लगा. अपनी गांड में गिरते हुए रस के आभास से शालिनी कुछ क्षणों के लिए फिर से जाग्रत हुई. पर आयु की सीमा ने उसे फिर शिथिल कर दिया. अपना पूरा रस दादी की गांड में डालने के बाद कुछ देर तक गौतम यूँ ही लंड चलाता रहा और फिर धीमे से बाहर निकालकर शालिनी की बगल में लेट गया.

“सच में बेटा, जिसने भी तुझे सिखाया, उसकी में सदा ऋणी रहूंगी. क्या दमदार चुदाई करता है रे तू. अब ये समझ ले कि मेरी गांड का रखवाला है तू. मेरी गांड मारने का इकलौता लाइसेंस तुझे है. पर थोड़ी देर मुझे अब आराम करने दे फिर मेरी चूत की भी कुछ सेवा कर देना. ”

“आप जैसा कहो, दादी.” कहकर गौतम ने उन्हें बाँहों में भर लिया.

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राधा के घर:

गोकुल अपने सामर्थ्य के अनुसार राधा की चुदाई में लगा हुआ था. आज न जाने क्यों राधा को भी इसमें बहुत आनंद आ रहा था. उसे ये आभास ही नहीं था कि वो कल गोकुल के जाने की राह देख रही थी. और तो और वो इस समय गोकुल से चुदवा तो रही थी पर उसकी आँखों के आगे अजीत का तगड़ा लंड झूल रहा था. कल रात शायद दादी उसे अजीत को समर्पित करने वाली हैं. इस विचार से राधा एक बार और झड़ गयी. कुछ देर में गोकुल भी अपने रस को उसकी चूत में छोड़कर शांत हो गया. पास में लेते हुए दोनों बात करने लगे.

गोकुल: “क्या हुआ रानी, आज तो तुम्हारा तीन चार बार हो गया.”

राधा बात छुपाते हुए बोली” “आप जा जो रहे हो इतने दिन के लिए. बस इन यादों के ही सहारे निकालने होंगे ये दिन.”

गोकुल: “चिंता न कर मैं जल्दी ही लौट आऊंगा.”

दोनों एक दूसरे की बाँहों में खोये हुए कुछ देर में सो गए.

क्रमशः

1168500
 
कैसे कैसे परिवार

मिश्रण २.१

भाग B1


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कामिनी का पूर्ण सदस्यता का इंटरव्यू समापन

कामिनी ने अपने मोबाइल को बंद किया और शून्य में निहारने लगी. दिंची क्लब से फोन आया था और उसकी सदस्यता के लिए उसके बाकी के साक्षात्कार के लिए उसे कल बुलाया था. शून्य में देखती वो उस दिन की यादों में खो गयी जब पार्थ ने उसे सम्पूर्ण स्त्री बनाया था. पर उसे ये भी याद था कि अभी उसकी सदस्यता के निर्धारित होने के लिए उसे अपनी गांड समर्पित करनी शेष थी. गांड की सील तुड़वाने के विचार से उसका शरीर कांप गया. उसने कभी अपनी गांड में ऊँगली भी नहीं डाली थी. और कल उसे पार्थ के उस विशाल लंड को उसके अंदर लेना था. वो डर और रोमांच से व्यथित हो उठी. अचानक उसे कुछ याद आया और वो अपने कमरे में गई. अपनी अलमारी खोलकर एक छुपे हुए छोटे से बक्से को निकाला। उसमे एक गांड का प्लग था. उसके ही साथ उसमे एक तेल की बंद शीशी भी रखी थी.

उसे याद आया कि जब वो उस दिन क्लब से जाने को हुई तो सोनम ने उसे ये बक्सा दिया था. उसके बाद वो उसे बाथरूम में ले गयी थी और अपने साथ लाये एक दूसरे बक्से में से तेल और प्लग निकालकर कामिनी को दिखाया कि उसका प्रयोग कैसे किया जाता है.

“जब भी आपको क्लब से इंटरव्यू समाप्त करने का आमंत्रण मिले, उसी समय से आप इस प्लग को अपनी गांड में डाल लेना. हाँ अगर बाथरूम जाओ, तो निकाल अवश्य देना. अगर एक दिन लगा कर रखोगी तो युम्हारी गांड अभ्यस्त हो जाएगी और थोड़ी खुल जाएगी. अन्यथा पार्थ सर का लंड तो अपने देखा ही है. आपको बहुत कठिनाई होगी. दर्द भी होगा.”

इसके बाद उसने बक्से में से दूसरी लाल रंग की शीशी निकाली। “जब आप क्लब में आ जाएँ तो आपके निर्धरित कक्ष में जाकर आपको इस शीशी से तेल निकालकर उसी प्रकार से प्लग को लगा लेना ही.”

“इस शीशी में क्या है?”

“इसमें दवाई है जिससे की आपकी गांड की मांस-पेशियाँ कुछ समय के लिए ढीली पड़ जाएँगी. इससे आपको बिलकुल भी दर्द नहीं होगा. पर क्यूंकि इसका असर केवल १ घंटे ये उससे कम ही रहता है, इसीलिए आप इसे यहाँ अपने कमरे में हो लगाना.”

कामिनी ने उस बक्से को संभाल के छुपाया हुआ था. और आज उसके प्रयोग का समय आ चूका था. कामिनी उस बक्से के साथ बाथरूम में चली गई.

प्लग को अपनी गांड में डालना कामिनी के लिए सरल नहीं था. उसकी अछूती गांड इस आक्रमण के लिए किसी भी प्रकार से नहीं मान रही थी. दिए गए जैल ने रास्ता तो सरल किया था पर गांड इसे मानने के लिए तैयार नहीं थी. आखिर विचलित कामिनी ने अंतिम शास्त्र का उपयोग किया और जो क्रीम उसे कल के लिए दी गयी थी, उसने उसे ही अपनी गांड में लगाया. और १० मिनट रुकने के बाद प्लग को दोबारा अंदर डालने का प्रयास किया. इस बार उसकी गांड ने कोई प्रतिकार नहीं किया और उस प्लग का मानो अंदर स्वागत किया. एक बार अच्छे से अंदर बैठने के बाद कामिनी ने बची क्रीम को देखा तो उसमे बहुत कम मात्रा थी. उसे विश्वास था कि इस समस्या का हल कल उसे क्लब में मिल जायेगा.

जब तक क्रीम का असर रहा कामिनी को कोई असुविधा नहीं हुई, पर कुछ समय में ही उसे एक अनजाने सुख की अनुभूति हुई. जब वो चलती तो उसकी गांड का प्लग एक घर्षण करता जिसके कारण उसे एक नए सुख की अनुभूति होती. और इसी कारण वो अपने घर में ही न जाने कितनी देर यूँ ही चलती रही. एक खुजली थी जो अब मिटने का नाम नहीं ले रही थी. उसे पता था इस खुजली का उपचार क्या था, और वो था उसकी गांड में पार्थ का लौड़ा. इस विचार मात्र से वो न जाने आज कितनी बार झड़ चुकी थी.

शाम को भोजन के बाद कामिनी ने अपने पति को बताया कि उसे क्लब बुलाया गया है. उसके पति ने उसे अपनी स्वीकृति दी. वो देख रहा था कि वहां जाने के बाद से कामिनी का उसके प्रति व्यव्हार पहले से अच्छा हो गया है और वो इससे संतुष्ट था. हालाँकि उसे ये नहीं भा रहा था कि कामिनी अन्य किसी से संसर्ग कर रही थी परन्तु उसे अपनी कमी पता थी और वो इस एक तथ्य के सिवाय कामिनी से पूर्ण रूप से संतुष्ट था. कामिनी का भी यही विचार था. वो अपने पति से अत्यंत प्रेम करती थी और उसे पता था कि उसके लिए ये निर्णय सरल नहीं था.

कामिनी: “क्या आप आज मेरी चुदाई करेंगे?”

पति: “प्रयास करता हूँ.”

कामिनी: :मैं चाहूंगी कि आज आप मेरी गांड में अपना लंड डालें. मैं नहीं चाहती कि इसमें जाने वाला पहला लंड आपके सिवाय किसी और का हो.”

ये कहते हुए कामिनी ने उसे एक नील रंग की गोली दी, उसके पति ने इस भावनात्मक भेंट को स्वीकार किया, और वो गोली खा ली.

पति: “तुम्हें दर्द तो नहीं होगा न?”

कामिनी: “उन्होंने मुझे कुछ जैल दिए हैं जिसके कारण मेरी गांड खुल गयी है. वैसे भी अगर आप करोगे तो मुझे इस दर्द में भी आनंद आएगा. पर थोड़ा धीरे करियेगा.”

कामिनी के पति ने पहले भी वो गोली कई बार ली थी. समस्या ये नहीं थी कि वो चुदाई नहीं कर पता था, पर ये थी कि वो बहुत ही जल्दी झड़ जाता था और कामिनी प्यासी रह जाती थी.

पति: “तुम जानती हो कि मैं अधिक समय तक नहीं रुक पाता।”

कामिनी: “इसके बारे में मत सोचिए. बल्कि ये सोचिये कि आप अपनी पत्नी का अंतिम कुमारित्व भी भंग कर रहे हैं. जो भी हो, मैं किसी और को ये गांड आपके पहले भेंट नहीं करुँगी.”

कामिनी ये कहते हुए उठी और अपने पति के साथ शयनकक्ष में चली गयी जहाँ उसने अपने और अपने पति के वस्त्र उतारे और घोड़ी के आसन में अपने आपको प्रस्तुत किया.

“ये क्या है?” पति ने उसकी गांड में डले प्लग के बारे में पूछा.

“ये गांड को खोलने का खिलौना है. आप इसे धीरे धीरे बाहर निकाल दीजिये. और फिर अपने लंड से मेरी गांड का उद्घाटन कीजिये.”

पति ने यही किया और उसे ये देखकर अचम्भा हुआ कि अब कामिनी की कुंवारी गांड पूरी खुली हुई थी. उसने अपने लंड को साधा और बिना रुके उसकी गांड को भेद दिया. अपनी जवानी में पति ने बहुत औरतों को चोदा था परन्तु उस समय गांड मरना एक विकृति माना जाता था और उसकी किसी संगिनी ने उसे इस कृत्य के लिए स्वीकृति नहीं दी थी. और उसकी पहली पत्नी तो कारूँ के खजाने के समान अपनी गांड बचाकर रखी रही. पर आज कामिनी ने बिना संकोच के स्वयं ही उसे इस सुख से सक्षात्कार के लिए आमंत्रित किया था. उसके लंड ने कामिनी की गांड को अबाधित भेद दिया. क्या आनंद था. इतनी कसावट और गर्माहट उसने पहले कभी अनुभव नहीं की थी.

कामिनी भी अब उस जैल के प्रभाव से निकल चुकी थी. हालाँकि उसकी मांस पेशियाँ अभी भी ढीली थीं, परन्तु उसकी संवेदना लौट चुकी थी. उसे अपनी पति के गांड में जाते हुए लंड का अनुभव एकदम नया लगा. और जब उसके पति अपने लंड से उसकी गांड मारने लगा तो उसकी आत्मा और शरीर एक नयी अनुभूति से झूम उठे. उसके पति के लंड से उसे एक नए ही संसार का दर्शन हो रहा था. इस समय उसके मन में उसके पति को अपने प्यार से विव्हल करना छह रही थी. वो उसे उत्साहित कर रही थी और ये प्रार्थना कर रही थी कि उसके पति को भी इसमें आनंद मिले और वो अधिक देर तक ठहर पाए.

पर चाहने और मिलने में अंतर होता है. जब कामिनी इस नए सुख में अपने आप को डुबा रही थी उसका पति अपने आपको झड़ने से रोकने का असफल प्रयत्न कर रहा था. और अंत में उसके शरीर ने उसे हरा दिया और उसने अपना पानी कामिनी को गांड में डाल दिया. कामिनी का दिल टूट गया, पर उसने इसे दर्शाया नहीं. उसने उठकर अपने पति के लंड को अपने मुंह से साफ किया जिसे उसका पति आश्चर्य से देखता रहा.

“आप तनिक भी विचलित न हों. मैंने आज अपना अंतिम कौमार्य आपको सौंप दिया है, जिसके लिए मुझे बहुत ख़ुशी है. आपका लंड चाहे जहां भी रहा हो, मेरे लिए ये सदैव मेरा प्रिय रहेगा. आज आपने मुझे पूर्ण कर दिया है. और मैं इसके लिए आपकी आभारी हूँ.”

उसका पति उसके इस अनुराग से बहुत ही प्रसन्न हो गया. फिर कामिनी ने अपने पति से कहा कि वो अपने वीर्य को अंदर रखते हुए उसकी गांड को वापिस उस प्लग से सील कर दे. इसके बाद दोनों पति पत्नी एक दूसरे को बाँहों में लेकर सो गए.

अगले दिन अपने पति के जाने के बाद कामिनी भी तैयार हो गयी. १० बजे के आसपास क्लब की कार आयी और कामिनी क्लब के लिए निकल गई. उसकी गांड और दिल में तितलियाँ मचल रही थीं. और उसे पार्थ से मिलने का रोमांच भी था. उसने कामिनी का दिल जीत लिया था. उसके पति के समान नहीं, परन्तु एक अन्य ही स्तर पर, जिसका वो वर्णन नहीं कर सकती थी. ११ बजने के कुछ पहले वे क्लब पहुँच गए. वहां पहुँच कर कामिनी ने रिसेप्शन पर बैठी मंजुला से बात की और उसे अपना बक्सा दिखाया और पूछा कि इसमें से सुन्न करने वाली क्रीम मिल सकती है क्या? मंजुला अंदर गई और लौट कर उसने कामिनी को एक दूसरा बक्सा दिया.

मंजुला: “अलग से इसमें से कुछ भी नहीं मिलता है, पूरा सैट ही मंगवाते हैं हम. आप ये नया साईट भी रख लीजिये.”

कामिनी ने खोला तो देखा तो जैल और क्रीम तो वहीँ थीं, पर इस बक्से में प्लग के स्थान पर एक मोटा और लम्बा नकली लंड था.

मंजुला: “ये भी आपके लिए ही है. आपकी सदस्य्ता के साथ एते हैं. पिछली बार ये समाप्त हो गए थे, इसीलिए नहीं दे पाए थे. इस नए स्टॉक के लंड पिछलों से लम्बे और मोटे हैं. आपको बहुत मजा आएगा.”

ये कहते हुए मंजुला ने कामिनी को उसके कक्ष की कुंजी सौंप दी और कामिनी धड़कते मन और फड़कती गांड को लेकर उस कमरे में चली गयी. अंदर जाकर उसने बाथरूम में कपड़े निकाले और फिर अपनी गांड से प्लग निकालकर क्रीम लगाई और फिर प्लग को दोबारा अंदर दाल दिया. कामिनी को इस बात से अब अचम्भा था कि कल से आज के बीच में उसकी गांड इतनी सरलता से इस प्लग को अंदर ले पा रही थी. और तो और उसके पति ने भी इस गांड का कल बिना किसी कठिनाई के उद्घाटन कर दिया था.

फिर वो बाथरूम में टंगा हुआ गाउन पहन कर बाहर कमरे में पार्थ के आने की राह देखने लगी.

क्रमशः
 
अध्याय २०: दूसरा घर - सुनीति और आशीष राणा ३

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सुनीति के घर:

दो दिन बाद


शाम के समय जब आशीष घर पहुंचा तो देखा कि घर पर किसी की गाड़ी खड़ी थी. उसे आश्चर्य हुआ कि सुनीति ने उसे बताया नहीं कि घर पर अथिति आये हैं. उसने अपना चेहरा और बाल ठीक किये और अपना ब्रीफ़केस लेकर घर में गया. पर उसे आश्चर्य इस बात का हुआ कि बैठक में कोई नहीं था. हाँ सुनीति अवश्य सलोनी के साथ किचन में कुछ कर रही थी. उसने सुनीति को पास बुलाया तो उसने कहा कि वो मुंह हाथ धो ले फिर बात करेगी. आशीष असमंजस की स्थिति में अपने कमरे में गया और मुंह हाथ धोकर, कपड़े बदल कर १५ मिनट में बैठक में आ गया. सुनीति ने उसके हाथ में उसकी पसंद की ड्रिंक दी और सामने बैठ गयी.

आशीष ने पूछा: “कौन आया है?”

सुनीति: “असीम के लिए रिश्ता आया है.”

आशीष भौचक्का रह गया.

“ये कब हुआ, कैसे.”

“समुदाय के द्वारा. लड़की हमने देखी हुई है.”

आशीष को कुछ समझ नहीं पड़ रहा था.

“कौन लड़की?”

“महक, विक्रम और स्मिता की बेटी, आठ नंबर वाले.”

“ओके, पर ये गाड़ी किसकी है? पापा और अन्य सब कहाँ गए? सुनीति, थोड़ा खुलकर बताओ, ये तुम्हारा सस्पेंस मुझे डरा रहा है.”

सुनीति मुस्क़ुरा कार बोली, “आपमें थोड़ा भी संयम नहीं है. ठीक है.” उसने बात आगे बढ़ाते हुए बताया.

“समुदाय के नियम के अनुसार वर वधू दोनों समुदाय के ही होने चाहिए, ये तो आपको पता ही है. पर विवाह योग्य लड़की का परिवार समुदाय में अपनी बेटी के लिए आवेदन लगता है. ये केवल लड़की वालों को ही अनुमति है. समुदाय की समिति योग्य लड़कों के देखकर, ये निश्चित करती है, कि क्या ये संबंध सम्भव है. असीम के सिवाय दो और लड़कों का भी इसके लिए चयन हुआ है. हालाँकि, हमारा संयोग अधिक है, क्योंकि हम एक दूसरे के परिवारों से पहले से ही परिचित हैं.”

“तो गाड़ी….” आशीष की बात पूरी न सुनकर सुनीति ने उसे रोका और आगे बताने लगी.

“मधु जी, जो कि समिति की मुखिया हैं, वही आयी हैं इस प्रस्ताव को लेकर. इसमें समिति, शेट्टी परिवार और हमारे परिवार में से कोई भी इसके लिए मना कर सकता है. उनका उद्देश्य ये होता है कि वे अपने चयन को लड़की के परिवार को बताएं और फिर दोनों परिवार ही ये निर्णय लेंगे कि आगे बढ़ना है या नहीं।”

सुनीति ने आशीष की बात का अब उत्तर देना आरम्भ किया. "मधु जी, समिति के एक और महिला और अपनी बहू के साथ आयी हुई हैं. असीम और कुमार पिताजी के कमरे में अपनी परीक्षा दे रहे हैं. महिलाओं का ये दायित्व है कि वे लड़कों की सेक्स की क्षमता और अनुकूलता की जाँच करें. पिता जी ने अपना पत्ता फेंका और कहा कि वे भी इसमें सम्मिलित होकर महिलाओं की अनुकूलता जांचेंगे.”

“ब्लडी हैल!” आशीष के मुंह से निकला. “पापा को चूत से दूर रखना कठिन ही नहीं असम्भव है. और इन समिति वाली औरतों की तो चांदी है. कितने ही ऐसे जाँच के अवसर इन्हें प्राप्त होते होंगे.”

सुनीति हंसने लगी, “ये तो है, पर समिति में मधु जी के सिवाय कोई भी स्थाई नहीं है, तो सबसे अधिक मजा वही लेती हैं.”

आशीष ने हंस कर पूछा, “क्या मैं इस जाँच के योग्य नहीं हूँ.”

सुनीति उठी और आशीष की गोद में बैठी और उसे चूमकर बोली, “घर की महिलाओं को ये अधिकार है कि वो अपने परिवार के पुरुषों को प्रमाणित कर सकती हैं. मैंने आपको कर दिया है. और मैं आपकी जाँच के हेतु आपको कमरे में लेकर जाऊंगी, एक बार ये सब लौट तो आएँ.”

फिर आशीष के कान में फुसफुसाकर बोली, “मधु जी ने परसों हम दोनों, केवल हम दोनों के अपने घर आमंत्रित किया है. रात में वहीँ रुकना भी है. अब एक बार उनकी बहू को फिर देख लो फिर बताना कि मैं स्वीकार करूँ या रहने दूँ.”

आशीष को मधु जी की बहू चारु भी भांति स्मरण में थी. समुदाय में उसे देखा जो था. वो तो तुरंत हाँ करने वाला था पर रुक गया. उस की ड्रिंक समाप्त हो चुकी थी, तो सुमति ने सलोनी ने एक और ड्रिंक लाने के लिए कहा, दोनों के लिए. और फिर ऑफिस और काम की बातों में व्यस्त हो गए.

**************

जीवन का कमरा

असीम का विश्लेषण अब समाप्ति पर था. समिति की अस्थाई सदस्य श्रीमती बालू सोफे पर बैठी सामने चल रही गतिविधि पर पैनी दृष्टि रखे हुए थीं. वो विश्लेषक थीं. उनका कार्य ये था कि चलने वाले समागम पर अपनी राय देना और ये देखना कि जिस लड़के का विश्लेषण हो रहा है वो इसमें उत्तीर्ण होगा या नहीं. उन्हें इस समागम में स्वयं हिस्सा लेने की अनुमति नहीं थी. इस प्रकार के आयोजन में अधिकतर एक महिला सदस्य और होती थी. अर्थात मधुजी, एक विश्लेषिका और एक अन्य सदस्या। विश्लेषेका और अन्य स्त्री बदल जाती थीं. इस बार जिस स्त्री का चयन हुआ था वो मधुजी की लाड़ली बहू चारु थी. ४५ वर्ष की इस आकर्षक और अनुभवी स्त्री की सेक्स की भूख अनंत थी. उसे देखकर कोई ये नहीं मान सकता था कि उसने तीन बच्चों को जन्म दिया है. और वे तीनों भी अपने पिता के साथ अपनी माँ की भूख मिटाने में कई बार अक्षम होते थे.

उन्हें इस खेल में लिप्त हुए लगभग एक घंटे से अधिक हो चुका था. और इस पूरे आकलन में असीम अभी तक पूर्णतया सटीक बैठा था. उसका उत्तीर्ण होना तय था. श्रीमती बालू जिनका नाम सुनंदा था, तमिल थीं पर इतने वर्ष यहाँ रहकर अब अच्छे से घुल मिल गयीं थीं. उनकी हिंदी पर पकड़ अच्छी थी, हालाँकि कुछ दक्षिणी पुट था जो सबको बड़ा सुहाता था. उन्हें विश्लेषिका के कार्य में विशेष आनंद आता था, क्योंकि उत्तीर्ण होने वाले लड़के पर समुदाय में पहला अधिकार उनका ही होता था. फिर इस प्रकार के आयोजन से उनकी कामोत्तेजना को शांत करने के लिए उनके दोनों पुत्र उनकी सहायता करते थे. उन्हें इस बात का अवश्य ही दुःख था कि उनके घर कोई पुत्री नहीं हुई, परन्तु उनकी दोनों बहुएं उन्हें माँ के ही रूप में देखती थीं और वे भी उन्हें उसी प्रकार से मानती थीं. इस प्रकार के आयोजन से उन्हें कई बार नए आसन भी देखने को मिलते थे जिनका उनके घरेलू चुदाई समारोह में समुचित उपयोग किया जाता था.

इस समय वो मधुजी की शक्ति और सहनशीलता पर आश्चर्य कर रही थीं. कुमार जो लड़के का छोटा भाई था, नीचे लेटा था और मधुजी उसके लम्बे तगड़े लौड़े को अपनी चूत में लिए हुए थीं. पीछे से उनके ऊपर असीम चढ़ा हुआ था और ये सर्वविदित था कि उसका लंड उनकी गांड में था. दोनों भाइयों की समकालिक जुगलबंदी भी देखने और अध्ययन का विषय थी. उसे विश्वास था कि आज के वीडियो को देखकर उसके पति और पुत्र उसे भी इसी प्रकार से चोदने के लिए तत्पर होंगे.

पर दोनों भाइयों की असीमित शक्ति के सामने हार न मानने के लिए मधु जी को श्रेय जाता था. जिस तरह से दोनों भाइयों के विशाल लंड उनके दो छेदों को चोद रहे थे, केवल विलक्षण प्रतिभा वाली कोई स्त्री ही इसमें भी आनंद ले सकती थी. और मधु जी की आनंदकारी चीखें और अधिक जोर से चोदने की गुहार सच में इनकी इस प्रतिभा को उजागर कर रही थी. अब ऐसा नहीं था कि उनकी बहू चारु व्यस्त नहीं थी. अपनी कोहनियों और घुटनों के बल घोड़ी के आसन में वो जीवन के लंड से अपनी गांड मरवाने में व्यस्त थी. और जीवन भी इस नयी गांड का भरपूर आनंद ले रहा था.

अगर समय का अभाव न होता तो संभवतः चारु भी दोनों भाइयों से अपनी सास की तरह ही चुदवाती, पर नियम के अनुसार समय की सीमा थी और उसे अपनी केवल गांड मरवाकर ही संतोष करना पड़ रहा था. इसके पहले वो दोनों भाइयों से एक एक बार अपनी चूत की धज्जियाँ उड़वा चुकी थी. पर एक अत्यंत काम पिपासु स्त्री होने के कारण उसे कभी भी पूर्ण शांति नहीं मिलती थी. उसकी गांड में अब जीवन का लंड तनके फूलने लगा था. और चारु की आभास हो गया था कि अब उसकी गांड में सिंचाई होने ही वाली है. उसने अपनी गांड की मांसपेशियों को कुछ सिकोड़ा जिससे कि उन दोनों के आनंद में कुछ वृध्दि हो. पर अब जीवन रुक नहीं पा रहा था और उसने अपने रस की फुहार से चारु को गांड भर दी और उसके ऊपर ढह गया.

कुछ देर यूँ ही पड़े रहने के बाद चारु और जीवन ने अपने बगल में चल रहे काम युद्ध को देखा तो वहां भी समापन निकट था. मधु जी की चीखें अब धीमी पड़ चुकी थीं और असीम के धक्के भी अब कुछ ठहर से गए थे. उन्हें ये देखकर आश्चर्य नहीं हुआ जब असीम ने अपने लम्बे लंड को मधुजी की गांड से बाहर निकाला। उससे बहता हुआ रस मधु जी की गांड पर फ़ैल गया. वो खड़ा हुआ तो चारु ने उसे बुलाया और उसके लौड़े को चाटकर साफ कर दिया. जीवन ने अपने लंड की ओर संकेत किया तो चारु ने अपनी सास की ओर देखकर बताया कि ये उनका अधिकार है. सास बहू के ऐसे पावन प्रेम से जीवन का मन प्रसन्न हो गया.

कुमार भी अब झड़ चुका था और मधु जी तो न जाने कितनी बार आकाश को छूकर लौटी थीं. वो कुमार के लंड से उतरीं और एक ओर निढाल होकर लेट गयीं. चारु ने कुमार को बुलाकर उसके लंड को भी चाटकर साफ कर दिया. फिर जीवन को मधु जी की ओर धक्का सा दिया. जीवन ने अपने लंड को मधुजी के सामने किया तो उन्होंने उसे बड़े प्रेम से चाटा और साफ कर दिया. सब कुछ समय के लिए सुस्ताने लगे. सुनंदा ने रिकॉर्डिंग बंद कर दी और फोन को पर्स में रख लिया. उसकी चूत में आग लगी थी, पर अभी भी घर पहुँचने में समय था.

कुछ देर के बाद सबने उठकर कपड़े पहने और फिर बैठक की ओर चल पड़े. बैठक में उनका स्वागत आशीष ने किया. मधुजी ने उसके गले मिलकर उनके होंठ चूमे. फिर चारु ने भी यही किया. चारु का विलक्षण सौंदर्य देखकर आशीष का मन मचल उठा. उसने सबको बैठने का आवेदन किया.

मधु जी: “सुनीति ने आपको मेरे आने का उद्देश्य बताया होगा. श्रीमती बालू बताएंगी कि उनका परीक्षण कैसा रहा.”

इस बार आशीष का ध्यान श्रीमती बालू पर गया और उसे आश्चर्य हुआ कि उन्होंने उसके साथ मिलन क्यों नहीं किया.

श्रीमती बालू, “मैं इस आयोजन की पर्यवेक्षिका हूँ और मुझे किसी भी प्रकार के सेक्स सम्बन्ध की अनुमति नहीं है. पर हम आज के बाद अवश्य ही मिल सकते हैं. पर वो बाद में देखेंगे. मैं ये सूचित करना चाहती हूँ की आपका पुत्र असीम अपनी परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया है. दोनों भाई सेक्स में पारंगत हैं पर ये केवल असीम का ही अनुमोचन है. इसका अर्थ ये है कि महक के लिए असीम को हम अपनी ओर से अनुमोदित करते हैं. इसके बाद आप दोनों के परिवारों पर इसके आगे का निर्णय होगा. पर मैं ये भी बताना चाहती हूँ कि एक और लड़के को भी हमने प्रस्तावित किया है. तो अब महक के परिवार को ही ये निर्णय लेना होगा कि वे किसे चुनेंगे.”

“इस सम्बन्ध की अगले ३ महीने में आपको पुष्टि करनी होगी. अन्यथा ये समाप्त हो जायेगा. आगे मधु जी बताएंगी.”

“नियम के अनुसार महक की माँ स्मिता को ये अधिकार है कि वो हमारे बताये हुए दोनों लड़कों को अपने मानकों के अनुसार तोले। इसमें किसी और का कोई भी योगदान नहीं होगा. पर मुझे लगता है कि असीम उन्हें भी संतुष्ट करने में सफल होगा.”

“धन्यवाद, आप लोग क्या पीना चाहेंगे?”

इसके बाद सब ने अपनी रूचि का पेय लिया और फिर तीनों स्त्रियों ने जाने की अनुमति चाही. जाने के पहले मधुजी ने आशीष को कहा कि सुनीति और वो परसों उनके घर पर आमंत्रित हैं और रात भी वहीँ ठहरेंगे.

जाते जाते चारु ने आशीष की ओर देखकर कहा, “आइयेगा अवश्य. मैं प्रतीक्षा करुँगी.”

सुनीति और आशीष ने उन्हें आने का आश्वासन दिया और फिर अथिति चले गए.

**************

बैठक में सुनीति और आशीष बातें कर रहे थे. अन्य परिवारजन अपने कार्यों में व्यस्त थे. जीवन बलवंत से फोन पर बात कर रहा था.

आशीष: “सुनीति, हमने समुदाय में प्रवेश तो किया है, पर मुझे लगता है कि हमें उसके पूरे नियम पता नहीं हैं. परसों जब हम मधु जी के घर जायेंगे तो हमें इसके बारे में बात करना और समझना आवश्यक है. हम अनजाने में ऐसा कुछ न कर बैठें जिससे कि हमारी सदस्य्ता समाप्त कर दी जाये.”

सुनीति: “आपकी बात ठीक है, पर मुझे आज मधु और सुनंदा से बात करने पर ये आभास भी हुआ कि वे नए सदस्यों को कुछ ढील देते हैं. अन्यथा समुदाय की सफलता और बढ़ोत्तरी सम्भव नहीं है. मेरा कहना है कि जब तक हम ऐसा कुछ न करें जो उन नियमों का उल्लंघन हो जो हमें समझाये गए हैं, कोई भी कठिनाई नहीं होगी. और मुझे जो बात सबसे अधिक भाई है वो ये कि परिवार की स्त्रियों को पुरुषों से अधिक अधिकार हैं. जो कि अपने आप में एक अनूठी परम्परा है.”

आशीष हँसते हुए बोला: “हमारे परिवार में तो तुम्हारी ही तूती बोलती है. हम सब तो बस काठ की कठपुतली हैं मैडम के सामने.”

सुनीति भी उसके साथ हँसते हुए बोली: “हाँ हाँ, जैसे आप मेरी हर बात मानते ही जाते हो.”

आशीष: “ऐसी कौन सी बात है तुम्हारी जो नहीं मानी गयी है. आने दो तुम्हारे मम्मी पापा को, उनसे भी ये सिद्ध करा दूंगा कि तुम ही घर की असली मालकिन हो.”

सुनीति: “अगर ऐसा है, तो इधर आइये और मेरी चूत को चाटकर शांत करिये. जब से ये तीनों आयी हैं, बहुत अधीर हो रही है.”

आशीष: “ जैसी मैडम की आज्ञा.”

ये कहकर वो सुनीति के सामने बैठा और उसकी साड़ी और पेटीकोट उठाकर उसकी चूत में अपना मुंह डाल दिया.

“तुम लोग ये सब अपने कमरे में नहीं कर सकते क्या?” जीवन के कर्कश स्वर ने उनका ध्यान बंटाया.

आशीष कुछ बोलता, इससे पहले ही सुनीति बोल पड़ी, “पिता जी, आप ने तो अपना मजा ले लिया पर मुझे क्यों रोक रहे हैं?”

जीवन ने ठिठोली करते हुए बोला, “क्योंकि, किसी ने चुदाई के बाद मेरे लंड को ठीक से नहीं चाटा, बस औपचारिकता ही पूरी की.”

सुनीति: “तो मैं किस दिन काम आऊंगी, आइये, मैं आपके लंड को चूस लेती हूँ.”

जीवन ने अपनी पैंट सरकाई और अपने लंड को सुनीति के मुंह में दे दिया. और यही वो क्षण था जब अग्रिमा ने घर में प्रवेश किया.

“ओह, तो मजा किया जा रहा है.” ये कहते हुए वो अपने कमरे में चली गई जैसे ये कोई साधारण बात हो.

***************

मधु जी का घर:

दो दिन बाद आशीष और सुमति मधुजी के आमंत्रण के अनुसार शाम सात बजे उनके घर पहुँच गए. मधु जी ने उनका स्वागत किया और अपने पति से परिचय कराया. उनके पति को देखकर आशीष और सुमति को कुछ आश्चर्य हुआ क्योंकि वे बहुत दुर्बल और थके हुए दिख रहे थे. मधु जी की आँखों के संकेत को देखकर उन्होंने इस बारे में कुछ नहीं कहा. मधु जी ने बताया कि उनका बेटा परख, बहू चारु और उनके बच्चे बाहर गए हैं और कुछ ही समय में लौट आएंगे. इसके लिए उन्होंने क्षमा भी माँगी। जब वो सब बैठ गए तो मधुजी ने अपने पति से सबके लिए कुछ पीने के लिए लाने का आग्रह किया. कुछ ही देर में वे बैठकर अपनी ड्रिंक्स की चुस्कियां के रहे थे.

तभी मधु जी ने अपने पति से कहा, “सुनिए, आपकी दवाई लेने का समय हो गया है. आप दवाई लेकर कुछ समय के लिए लेट लीजिये, फिर लौट आइयेगा।”

उनके पति बिना कुछ कहे उठकर चले गए. आशीष ने ये समय समुदाय के नियम समझने के लिए उपयुक्त समझा. मधु जी ने उन्हें कुछ अन्य नियम बताये. सक्षिप्त में सार ये था कि समुदाय के अस्तित्व के बारे में कभी भी किसी को नहीं बताना था. जो सदस्य ५ वर्ष से अधिक से सदस्य थे केवल वही नए सदस्यों के लिए आवेदन कर सकते थे. समुदाय अपने अंदर ही विवाह को बढ़ावा देता था, परन्तु अगर कोई बाहर विवाह करना चाहे तो १ वर्ष के लिए उसे समुदाय से निकाल दिया जाता था. इस समय में वे नए सम्बन्धियों को समुदाय के लिए स्वीकार्य कर सकते थे. अभी तक किसी का भी सम्पूर्ण निष्काशन नहीं हुआ था.

सुमति ने पूछा, “मधु जी, मेरे माता पिता इस महीने के अंत तक आने वाले हैं. हम सब वर्षों से घरेलु सम्भोग में लग्न हैं. मेरे और आशीष के परिवार में ये सम्बन्ध हमारे जन्म के पूर्व से है. वे कम से कम तीन महीने यहाँ रहेंगे. इस समय हमें क्या सावधानी रखनी होगी.”

मधुजी: “क्योंकि वे समुदाय में नहीं हैं, तो वे हमारे किसी भी कार्यक्रम में नहीं आ सकते. वे किसी समुदाय वाले के घर जब हमारी कोई पार्टी या गोष्ठी हो, नहीं जा सकते. अगर आपके घर कोई आता है और आप उन्हें सम्मिलित करते हो तो कोई आपत्ति नहीं है. पर ये ध्यान रहे कि उन्हें भी समुदाय की गोपनीयता का ध्यान रखना होगा, अन्यथा आपकी सदस्य्ता समाप्त की जा सकती है.”

सुमति: “क्या वो सदस्य बन सकते हैं?”

मधुजी: “अगर वे यहाँ के निवासी बन जाएँ तो छह महीने के बाद आप की गारंटी पर ये संभव है. पर अगर वे यहाँ के निवासी नहीं हैं तो मुझे आपको मना करना होगा.”

इसके बाद मधुजी ने वो बताया जो उनके मन में प्रश्नचिन्ह किये हुए था.

“आप अपितु मेरे पति को देखकर कुछ असमंजस में हैं. उनका स्वास्थ्य कुछ वर्षों से उनका साथ नहीं दे रहा. और उनका लंड भी अब खड़ा नहीं होता. पर नियम के अनुसार हम उन्हें समुदाय के मिलान में जाने से नहीं रोक सकते. मुझे कई महिलाओं की ज्ञाति मिली है जिन्होंने उनके साथ को अपर्याप्त बताया है. पर मैं इस विषय में कुछ नहीं कर सकती क्योंकि कोई भी ये नियम नहीं बदल सकता. है, अगर वे चाहें तो जाने से मना कर सकते हैं. पर हम उन्हें ये कहने के लिए असमर्थ हैं क्योंकि ये नियमों का उल्लंघन होगा.”

आशीष और सुमति को समझ आ गया कि समुदाय अपने नियमों का कितना आदर करता है, कि उसकी मुखिया भी उन्हें नहीं तिरस्कृत कर सकती.

मधु जी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “मेरे पति अब अलग कमरे में सोते हैं. मैं अपने बेटे, बहू और पोते पोती के साथ उनके कमरे में सोती हूँ. ये व्यवस्था उनके आग्रह पर ही की गयी है. हमारे कमरे कांच की दीवार से अलग किये हुए हैं और कई बार वे भी हमारे खेल में सम्मिलित होते हैं. परन्तु वे अपने मुंह और उँगलियों का ही उपयोग कर पाते हैं.”

तभी घर का दरवाजा खुला और ५ लोगों ने प्रवेश किया. चारु से तो आशीष और सुनीति मिल चुके थे. उसके साथ तीन छह फुट से भी लम्बे तीन पुरुष थे. इसमें से एक तो चारु का पति प्रतीत होता था और दो उसके पुत्र. एक बहुत ही सरल और भोली सी लड़की उनके साथ थी. हालाँकि कद काठी में वो भी कम नहीं थी, पर उसके चेहरे का भोलापन उसे उन सब से अलग कर रहा था. मधु जी उन्हें देखते ही अत्यंत खुश हो गयीं. लड़की के हाथ में एक बड़ा सा थैला था.

“दादी! देखो हम खाने के लिए क्या लाये हैं!” वो मधुजी के पास आकर बोली.

तब तक अन्य लोग भी बैठक में आ गए और सबका परिचय हुआ. मधु जी के बेटे लोकेश का अपना होटल की शृंखला थी जो अभी चार शहरों में थे. कुल आठ होटल थे और बहुत सफल भी थे. उसने अपने एक बेटे परेश को अपने साथ ही काम पर लगा लिया था. दूसरा बेटा कुणाल अभी होटल मॅनॅग्मेंट की पढाई कर रहा था. अगले वर्ष वो भी अपने पिता के साथ ही होटल के काम देखेगा. उनकी एक मात्र बेटी मान्या थी जो अभी कॉलेज में एम कॉम की पढ़ाई कर रही थी और CA की तैयारी भी. अंत में वो भी पिता के ही साथ काम करना चाहती थी.

इसके बाद आशीष और सुनीति ने भी अपना परिचय दिया। मान्या अपने दादाजी के पास चली गयी और वहां से कुछ देर में लौटी और अपने पिता की गोद में जा बैठी.

उसने आशीष की ओर देखकर कहा, “अंकल, आप अपने पापा से मेरे दादाजी को मिलवाओ. देखो आपके पापा अभी भी कितने स्वस्थ और सक्रिय हैं. पता नहीं मेरे दादाजी क्यों अब ऐसे हो गए हैं. हो सकता है उनसे मिलने के बाद इन्हें भी कुछ स्वास्थ्य लाभ हो.”

आशीष ने उत्तर दिया, “हाँ हाँ बिलकुल. मैं कल ही पापा से कहूंगा कि वे सर को मिलने आएं और उनसे मित्रता करें. मुझे विश्वास है कि सर को अवश्य लाभ होगा. वैसे सुनीति के पिताजी भी कुछ ही दिनों में आ रहे हैं और वे भी इसमें साथ देंगे. और मुझे इस बात की बहुत प्रसन्नता है कि तुम अपने दादाजी का इतना ध्यान रखती हो. पर तुमने मेरे पापा को कब देखा?”

“समुदाय में जब आपको प्रवेश दिया जा रहा था.”

आशीष हक्का बक्का रह गया, उसे लगा था कि ये १७-१८ वर्ष की सीधी सादी लड़की थी, पर अगर वो मिलन में थी तो अवश्य २० वर्ष से अधिक की है और चुदवाने में भी अनुभवी होगी. उसकी इस बौखलाहट को लोकेश ने समझ लिया.

“आशीष भाई, मान्या को समुदाय में सम्मिलित हुए ७ महीने हो चुके हैं. इसे देखकर सब इसे छोटा ही समझते हैं, पर इसके भोलेपन के पीछे बहुत ही चतुर और चुड़क्कड़ लड़की है.”

“पापा! आप मेरी प्रशंसा कर रहे हैं या बुराई?”

“मैंने कब तेरी बुराई की? क्यों माँ ये चतुर है कि नहीं?

“बिलकुल. और चुड़क्कड़ भी है.” मधु जी ने उत्तर दिया.

“दादी, आप भी! ठीक है आज मैं आपकी चूत नहीं चाटूँगी.” उसने अल्हड़पन में कहा.

दादी कहाँ पीछे रहने वाली थी. उसने आह सी भरकर कहा, “ठीक है. मैंने तो सोचा था की सुमति आंटी से तेरी चूत चटवाऊँगी, पर अब तू मना कर रही है तो ठीक है.”

“ए दादी! मैंने उन्हें चाटने के लिए मना थोड़े ही किया है.”

लोकेश ने उन दोनों को रोका. “चलो ठीक है. मैं अपनी गलती मानता हूँ, तुम लोग मत शुरू हो जाओ.”

“देखा अंकल, मेरे पापा कितने अच्छे है.”

ये कहकर उसने लोकेश के होंठों पर एक लम्बा चुंबन दिया. फिर उठी और अपनी दादी के पास बैठ गई.

“वैसे आंटी मेरी दादी भी बुरी नहीं है, बहुत प्यारी है.” और इस बार मधुजी को उसका चुंबन प्राप्त हुआ.

“और मैं?” चारु बोली.

“मम्मा, आप दुनिया की सबसे अच्छी मम्मा हो.” और चारु के भी होठ चूम लिए.

लोकेश बोला, “कुणाल, जाकर अपने दादाजी को ले आओ, तब तक हम खाना लगाते हैं.”

कुणाल चला गया और मधुजी, चारु और मान्या रसोई में जाकर खाना परोसने लगे. लोकेश ने आशीष से पूछा कि क्या वो कुछ पीना पसंद करेगा, तो आशीष ने उसे मना कर दिया. कुछ ही देर में मधु जी के पति भी आ गए और तीनों बैठे बातें करते रहे. कुणाल और परेश अपने मोबाइल पर ही व्यस्त थे. खाना परोसने के बाद उन्हें बुलाया गया और सबने बहुत चाव से भोजन किया. पता चला कि खाना लोकेश के ही एक होटल से मंगाया गया था. पूछने पर लोकेश ने उन्हें होम डिलीवरी का नंबर दिया और उन्हें बताया कि कल तक वो उन्हें कूपन देंगे जिस पर उन्हें २०% की छूट भी मिलेगी.

लोकेश के पिता को आशीष ने बताया कि उसके पिता उन्हें कल मिलने आएंगे और ये सुनकर उनका चेहरा खिल उठा. सम्भवतः, सबके व्यस्त होने के कारण वे अकेलेपन से भी बीमार हो रहे होंगे. खाने के बाद कुणाल अपने दादा को उनके कमरे में ले गया. फिर सामान समेटने के बाद सब लोग आज रात के कार्यक्रम के लिए मधुजी के कमरे में चले गए. कमरा देखकर आशीष और सुनीत ठगे से रह गए. ये कोई सामान्य कमरा नहीं था. पहले तले पर ये कमरा कोई तीन सामान्य शयनकक्षों के बराबर रहा होगा. ये समझिये कि एक हॉल था. उसके बीचों बीच जो बिस्तर था उसकी बनावट भी भिन्न थी. चार बड़े पलंग पलंग इस प्रकार से लगे हुए थे कि उनके बीच का स्थान खाली था. चूँकि राजसी पलंग थे तो उनके बीच बहुत स्थान रिक्त था. वहां पर एक टेबल और २ कुर्सियां रखी हुई थीं. आशीष और सुनीति एक दूसरे को अचरज से देख रहे थे. उन्हें मधु जी के अपने पास आकर खड़े होने का आभास हुआ.

“पहले यहाँ चार कमरे थे. पर जब हमें लगा कि हमें साथ ही रहना है तो हमने दो कमरे हटाकर उन्हें भी इसमें ही जोड़ लिया. लोकेश के होटल का अनुभव काम आया और हमने इसे अपने खेलने और सोने का स्थान बना लिया.” मधु जी ने समझाया.

“पर अगर कोई सम्बन्धी देखेगा तो…?”

“हम किसी को यहाँ नहीं आने देते. जैसा आप देख रहे हो, इसके तीनों दरवाजे अभी भी वैसे ही हैं जैसे कमरे मिलाने के पहले थे. सब अलग दरवाजों से अंदर आते हैं और सब पर नंबर वाला ताला है, तो कोई ताकने झाँकने के लिए नहीं आता. वैसे अतिथियों के कमरे इसके ऊपर वाले तल्ले पर हैं और एक कमरा नीचे भी है. अभी तक किसी प्रकार की समस्या नहीं आयी. समुदाय वाले अवश्य इसके बारे में जानते हैं, पर वे ईर्ष्या ही करते हैं.” मधु जी ने बताया.

तभी चारु आगे आयी और आशीष का हाथ पकड़कर उसे एक ओर ले गयी. एक दरवाजा खोला तो देखा कि बाथरूम था.

“आप तैयार हो जाइये, बाथ रोब वहीँ हैं, उसे पहन लीजियेगा. उसके सिवाय आपको किसी और वस्त्र की आवश्यकता नहीं पड़ेगी.” एक मीठी सी मुस्कराहट से साथ चारु ये कहकर चली गयी.

अंदर जाते हुए उसने देखा कि लोकेश सुनीति को भी एक दूसरे दरवाजे की ओर ले जा रहा है. नहाने के बाद आशीष ने वहां लटका हुआ रोब पहन लिया और कमरे में लौट आया. कमरे की भव्यता उसे अभी भी आश्चर्य चकित कर रही थी. कुछ ही समय में एक और दरवाजा खुला और लोकेश बाहर निकला. एक एक करके सभी लोग बाहर आये और सब ने उसी प्रकार के तौलिये के रोब पहने हुए थे. ये लोकेश के होटल के ही थे. तभी आशीष ने उस ओर देखा जहां से मधुजी निकली थीं. वस्तुतः एक और भी कमरा था और उन दोनों के बीच केवल कांच की ही दीवार थी. कमरे में प्रकाश था और उसे उसमें कोई बैठा हुआ दिख रहा था. अचानक से वो आदमी खड़ा हुआ और आशीष ने उन्हें पहचान लिया। वे मधु जी के पति थे. उनके अलग कमरे में होने पर उसे आश्चर्य हुआ, पर उनकी तबियत के कारण उन्हें अलग कमरा दिया गया था.

“अब बताओ, किसे क्या पीना है.” लोकेश ने एक कांच की अलमारी खोलकर पूछा, उसमे एक से एक मंहगी शराब की बोतलें थीं और एक छोटा फ्रिज भी था.

मधु जी और चारु ने वाइन पीने की इच्छा की तो सुनीति ने भी वही चुना. लोकेश और आशीष ने एक मंहगी स्कॉच ली और परेश, कुणाल और मान्या ने बियर ली. सब वहीँ बैठे बातें करने लगे. फिर मान्या ने एक बियर ली और कमरे से निकल गई. कुछ देर में उसे अगले कमरे में अपने दादाजी को बियर देते हुए देखा और फिर वो लौट आयी. पर इस बार वो लौट कर लोकेश की नहीं बल्कि आशीष की गोदी में बैठी.

और उसे एक गहरा चुंबन देकर बोली, “अंकल, उस दिन आपकी चुदाई देखकर मुझे बहुत मजा आया था. तो आज आपकी पहली चुदाई मेरी ही होनी चाहिए.”

चारु ने आपत्ति की, “अरे नहीं, मेरा नंबर पहले आएगा.”

लोकेश ने उसे समझाया, “क्यों बच्ची का दिल तोड़ रही हो. उसे चुदवा लेने दो पहले, तुम फिर आशीष से गांड मरवा लेना, उसके पहले तुम्हारी गांड को हम से से कोई नहीं छुएगा.”

चारु बेमन से मन गयी, पर उसने सोचा कि ये समझौता भी ठीक ही है.

पर मान्या ने भी अपना तर्क रखा: “मॉम, आप पहले ही अंकल के पापा और उनके लड़कों से चुदवा चुकी हो. प्लीज, मेरी बात का बुरा मत मानो।”

चारु ने उसके पास आकर उसके सिर को चूमा और कहा कि उसे कोई भी आपत्ति नहीं है, वो चाहे तो अंकल से गांड भी मरवा सकती है. आशीष के मन में लड्डू फूट रहे थे कि इतनी सुंदर और कमसिन लड़की की चुदाई का उसे अवसर म्मिल रहा था. उसने सुनीति की ओर देखा तो परेश को उसकी बगल में बैठा हुआ पाया और दोनों प्रगाढ़ चुंबन में लीन थे. लोकेश अपनी माँ को चूम रहा था और वहीँ कुणाल ने भी अपनी माँ चारु को जकड लिया था. चारु को देखकर आशीष के मन में एक क्षण के लिए ईर्ष्या हुई, पर मान्या ने उसका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया.

मान्या उसकी गोद से उतरी और उसके रोब को खोलते हुए उसके लंड से खेलने लगी. इतनी कमसिन लड़की को गोद में बैठाने से आशीष का लंड खड़ा तो हो ही चुका था और उसे अधिक प्रलोभन की आवश्यकता नहीं थी. परन्तु मान्या का ऐसा मानना नहीं था. उसने आशीष के सामने बैठते हुए उसके लम्बे मोटे लंड को अपने मुंह में लिया और उसे चूसने में व्यस्त हो गयी.

“मुझे आपके जैसे मोटे लंड बहुत अच्छे लगते हैं अंकल. और मम्मा ने तो मुझे इसे अपनी गांड में लेने की भी अनुमति दे दी है. आज मुझे बहुत मजा आने वाला है.” मान्या अपना मुंह लंड पर से हटाकर बोली.

“तुझे कब चुदवाने में मजा नहीं आता छुटकी ?” ये कुणाल था जिसने अपनी माँ के मोटे चुचों पर से अपने मुंह को हटाकर ये व्यंग्य किया था.

“आप जैसे अच्छे भाई हों तो चुदाई में मजा तो आएगा ही. आप क्यों जल रहे हो? आपको तो मम्मा मिली हुई हैं न?” ये कहकर मान्या ने दोबारा आशीष के लंड को निगल लिया. आशीष ने अपने चारों ओर चल रहे खेल को देखा। कुणाल अब चारु के रोब को हटा चूका था और चारु के मोटे मोटे स्तन लाल हो गए थे. लगता है बेटे ने माँ को अच्छे से दुहा था. और अब उसकी चूत में मुंह डाले उसे खाने का प्रयास कर रहा था. चारु उसके बालों को सहला रही थी और उसका उत्साह भी बढ़ा रही थी.

“खा ले मेरी चूत कुणाल. सुबह से इसका किसी ने इसका ध्यान नहीं रखा. अच्छे से चाट और खा जा इसे.”

कुणाल बिना कुछ कहे अपने कार्य में लगा रहा. आशीष ने फिर मधुजी की ओर देखा तो उनका भी रोब उतरा हुआ था और उसे इस आयु में भी उनके इतने गठे शरीर को देखकर कुछ अचरज हुआ. सम्भवतः उनकी दिनचर्या में चुदाई का इतना अधिक योगदान था कि उनका शरीर बुढ़ापे को धोखा दे रहा था. आशीष को अपनी सास गीता की याद आ गयी. मधु जी और वो लगभग एक ही आयु की थीं और दोनों अभी भी किसी भी जवान लड़की को ईर्ष्या करवा सकती थीं. और जवान लौंडे अभी भी उन्हें देखकर आहें भरते थे. इस मामले में मधु जी आगे थीं, क्योंकि उन्हें नए और जवान लंड आसानी से प्राप्त थे जबकि गीता को ऐसा अवसर प्राप्त नहीं था. पर उनके यहाँ आने के बाद ये स्थिति बदलने वाली थी.

मधु जी भी अपने बेटे लोकेश के लंड को चूस रही थीं और जैसा आशीष का अनुमान था वो भी एक अच्छा तगड़ा लंड था. सुनीति की चूत में अब परेश मुंह घुसाए हुए था और सुनीति अपनी प्रवृत्ति के अनुसार ऑंखें बंद करके उसके इस पराक्रम का आनंद ले रही थी. उसका लंड कुछ तन के छिटका तो उसका ध्यान वापिस मान्या की ओर आया. लड़की की इस अल्पायु में भी लंड चूसने की प्रतिभा विलक्षण थी. मान्या ने उठकर अपना तौलिया निकाला और फिर आशीष को भी नंगा कर दिया. फिर उसने कांच की दीवार को देखकर हाथ हिलाया और अपनी चूत को आशीष के लंड पर रखा और एक ही झटके में पूरा अंदर उतार लिया. आशीष ने कांच की ओर देखा तो मधु जी के पति वहां खड़े हुए कमरे में चल रहे संग्राम को देख रहे थे, उन्होंने भी अपने कपड़े निकाले हुए थे और उन्हें देखकर लगता था कि इस समय वे अपने लंड को मुठ मार रहे थे.

“क्या मस्त लंड है अंकल आपका, बिलकुल चीरकर अंदर गया है. मजा आएगा आज चुदाई में.” मान्या ने सीत्कार लेकर बोला तो आशीष का सीना फूल गया.

“बेटा कुणाल, अब बहुत खा लिया तूने मेरी चूत को, अब पेल भी से अपना लंड, सुबह से प्यासी हूँ.” चारु ने कहा.

कुणाल को अपनी माँ की इस लालसा का पता था. उन्हें दिन में न जाने कितनी बार चुदने की इच्छा होती थी. अगर उनका बस चलता तो वो लाइन में लोगों को लगाकर चुदवाती. चारु की इस बात से आशीष ध्यान उस ओर गया था और उसने कुणाल को चारु की चूत पर अपने लंड को रखते हुए देखा. उसे एक बार फिर न जाने क्यों कुणाल से ईर्ष्या हुई. पर उसके लंड पर भी चारु की बेटी जो उठक बैठक कर रही थी उसके कारण वो अधिक देर तक उस ओर न देख पाया और उसने मान्या के मम्मों को पकड़ा और उन्हें मसलने लगा.

“हाँ अंकल, ऐसे ही दबाओ, काटो, काटो भी.”

इतनी सीधी दिखने वाली लड़की की ऐसी इच्छा से आशीष ने फिर आश्चर्य किया और अपने दातों में लेकर एक निपल को हल्के से काटा और फिर दूसरे को. उछलती हुई मान्या का शरीर थरथराने लगा. आशीष के अपने लंड और जांघों पर कुछ तरल सा बहता हुआ अनुभव हुआ तो वो जान गया कि मान्या की चूत रस छोड़ रही है. अब तक स्थिर रहकर वो मान्या को ही पूरी मेहनत करने दे रहा था, पर अब उसे लगा कि उसका भी कोई कर्तव्य है. वो अपने शक्तिशाली कूल्हे उठाकर मान्या की चूत में लंड को गहराई तक धकेलने लगा. एक ओर से मान्या नीचे आती तो आशीष उसकी चूत में लंड पेलकर उसे ऊपर उछाल देता. मान्या की इन्द्रियां शिथिल होने लगीं.

उसके पिता और भाई भी उसे मस्ती से चोदते थे, पर वो नए लंड के लिए सदैव उतावली रहती थी. समुदाय से जुड़ने के बाद अब उसकी ये इच्छा अधिकतर परिपूर्ण होती थी. परन्तु उसे अपने घर और कमरे में चुदाई में अधिक आनंद आता था. और आशीष ने जिस प्रकार से अब धक्के आरम्भ किये थे, मान्या की मन की इच्छा पूरी हो रही थी. उसकी कसी चूत को आशीष का लंड बहुत अच्छे से चोद रहा था. उसकी चूत से बहता हुआ पानी आशीष की जांघों पर फ़ैल रहा था. अचानक ही उछलते हुए उसका शरीर अकड़ा और कांपने लगा. इस बार वो फिर से झड़ रही थी और कुछ निढाल सी हो गई. उसने उछलते रहने का प्रयास तो किया पर उसकी शक्ति क्षीण हो चली थी.

आशीष ने उसकी दुविधा को समझा और अपने लंड को बाहर निकाले बिना ही उसे अपनी बाँहों में लिया और पलट कर लिटा दिया और उसके ऊपर चढ़ाई करते हुए द्रुत गति से उसे चोदने लगा. मान्या की आँखें बाहर निकल पड़ीं, पर उसने आशीष को और जोर से चोदने के लिए उत्साहित किया. आशीष ऐसे अवसर खोने वालों में नहीं था, और उसने लम्बे सटीक धक्कों से मान्या की चूत का बैंड बजाना आरम्भ कर दिया. इसके कारण जब तक आशीष झड़ा, तो लगभग दस मिनट में, मान्या दो या तीन बार और झड़ गयी. अंत में आशीष ने एक चिंघाड़ के साथ मान्या की चूत में अपना रस छोड़ दिया और उसके ऊपर लेट गया.

जब उसे कुछ समय का ज्ञान हुआ तो उसने अपने आसपास देखा. कुणाल अभी भी अपनी माँ चारु की चुदाई में व्यस्त था और जवान होने के कारण शिथिल नहीं पड़ा था. सुनीति अब घोड़ी बनी हुई थी और परेश अपने विशाल लौड़े से उसे पीछे खड़ा होकर चोद रहा था. मधु जी लेटकर चुदवा रही थीं और लोकेश की गति से लगता था कि वो भी अब झड़ने के निकट था. और आशीष के देखते ही देखते लोकेश ने भी अपनी माँ की चूत को लबालब कर दिया. अपने लंड को बाहर निकालकर उसने मधुजी को प्रस्तुत किया और उन्होंने चाटकर उसे साफ किया और फिर अपनी चूत में उँगलियाँ डालकर उसमे से रस निकाला और अपने चेहरे पर मल लिया.

कुणाल ने अपनी माँ के सामने हाथ डाल दिए और चारु की चीत्कारों ने उसे अपने शिखर से नीचे धकेल दिया. उसके रस से चारु की चूत पूरी भर गई. अंत में परेश ने सुनीति की चूत को अनुग्रहित किया और उसमे अपना कामरस छोड़ दिया. सभी पुरुष बैठकर हांफने लगे और महिलाएं अपनी चुदाई के सुख में लीन एक मुस्कराहट के साथ लेटी रहीं. सबसे वरिष्ठ होने के बाद भी सबसे पहले मधु जी ही उठीं और आकर मान्या की चूत के सामने बैठीं और उसे चाटने लगी. फिर उन्होंने अपनी जीभ से उसकी चूत से आशीष का रस खींचा और मुंह से निकालकर अपने चेहरे और वक्ष पर मल लिया. यही कार्य उन्होंने सुनीति और चारु की चूत के साथ भी किया. फिर चारु ने उनकी चूत से रस पिया और अपने चेहरे पर मला.

“मम्मी जी की जवानी का यही रहस्य है, वो इस रस को कभी व्यर्थ नहीं जाने देतीं.” चारु ने अपनी सास के होंठ चूमकर सुनीति को ज्ञान दिया.

“चलो, एक ड्रिंक और लेते हैं फिर इस बार साथी बदलकर गांड मारने का कार्यक्रम करेंगे.”

“पापा, नहीं, मम्मा ने मुझे अंकल से गांड मरवाने की अनुमति दी है. आप बदलो साथी, मेरे लिए तो इस बार अंकल ही रहेंगे. मैं अगली बार बदलूंगी.”

“यार ये लड़की.” लोकेश ने सिर हिलाया. “चल ठीक है. हम बदल लेंगे.”

कुणाल और परेश उठकर ड्रिंक बनाने लगे. मान्या ने एक बियर ली और अपने दादाजी को देने नंगी ही चली गई.

****************

मान्या ने आने में कुछ अधिक ही समय लगा दिया था. न जाने क्यों आशीष उसकी राह देख रहा था.

सुनीति उसके पास आकर बैठी और उसके कान में फुसफुसाते हुए बोली, “बहुत देर लगा रही है तुम्हारी मान्या.”

आशीष झेंप गया. पर उसने सुनीति को भी छेड़ते हुए कहा, “तुम्हें भी तो नए नए लंड मिल रहे हैं, तो किस बात की शिकायत कर रही हो.”

सुनीति: “हाँ, अब देखें मेरी गांड के लिए किसे चुनती हैं मधु जी. जो भी हो, इन सबके भी लंड हमारे घर वालों से कम नहीं हैं.”

आशीष: “वो तो मैंने भी देखा.”

तभी मान्या उछलती हुई कमरे में आई. उसे देखकर ही पता चल गया कि उसे देर क्यों हुई थी. उसके होंठों के कोने पर सफेद द्रव्य था जो अवश्य ही वीर्य था. वो मधुजी के पास गई और उन्हें भी दिखाया.

मधुजी: “वाह रे मेरी गुड़िया रानी. दादाजी का रस पीकर आयी है. वैसे वो कैसे हैं ये सब देखकर?”

“दादी, आज तो दादाजी ने कमाल कर दिया. पूरे दस मिनट लगाए झड़ने में. मुझे लगता है, कि वो पुराने वाले दादाजी लौटने ही वाले हैं.”

मधुजी ने आशीष और सुनीति की ओर देखकर कहा, “मान्या का उद्घाटन उन्होंने ही किया था. हालाँकि लोकेश की बड़ी इच्छा थी, पर मान्या ने उन्हें ही चुना था. पिछले साल से न जाने क्यों वे बहुत दुर्बल हो गए हैं. पर मान्या आज भी उनके लंड से रस निकाल ही लेती है, जो मैं और चारु चाहकर भी नहीं कर पाते।”

आशीष ने अब दृढ निश्चय किया कि वो जीवन से उनके खोये हुए स्वास्थ्य के लिए उचित व्यवस्था करने का आग्रह करेगा. मान्या ने जाकर अपनी माँ को चूमकर उसे दादाजी का रस चटा दिया और आकर आशीष की गोद में बैठ गयी.

“आंटीजी, दादी अब आपको बताएंगी कि आगे क्या करना है, पर मेरा तो अंकल से गांड मरवाना निश्चित है.” सुनीति ने मधुजी की ओर देखा तो वो मुस्कुरा रही थीं.

“मैं चाहूंगी कि इस बार परेश अपनी माँ की गांड मरे, और कुणाल मेरी. और मेरा बेटा लोकेश जो इतनी देर से सुनीति के लिए लार टपका रहा है, उसे सुनीति को गांड मारने का अवसर दिया जाये. किसी को कोई आपत्ति?”

आपत्ति का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था. लोकेश ने आकर सुनीति का हाथ पकड़ा और उसे दूसरे बिस्तर पर ले गया. परेश चारु और कुणाल मधुजी के बिस्तर पर जाकर उनके सामने खड़े हो गए. आशीष ने एक दृष्टि साथ वाले कमरे पर डाली तो वहां अँधेरा हो चुका था. मान्या उठी और एक ओर चली गयी, लौटी तो उसके हाथ में जैल की तीन ट्यूब थीं. उसने एक एक ट्यूब अपने पापा लोकेश और भाई परेश को पकड़ाईं और एक अपने हाथ में लिया आशीष के पास आ गयी.

“अंकल, आपका लंड बहुत मोटा है, बिना इसके मेरी गांड फाड़ देगा.” उसने आशीष से कहा.

आशीष ने उसके चेहरे को अपनी ओर खींचा और उसे एक गहरा चुम्बन दिया, “ऐसा मैं कभी नहीं होने दूंगा. और इसका प्रयोग मुझे अच्छे से आता है.”

“ये मम्मा ने समझाया है मुझे.” मान्या ने बड़े गर्व से बताया. वो आज तक बिना जैल के किसी को अपनी गांड में नहीं घुसने देतीं. पापा को भी नहीं.”

चारु ने बताया: “ ओह हो हो! जैसे मेरी हर बात मानती है ये.”

इससे पहले कि माँ बेटी का एक और वाक्युद्ध प्रारम्भ हो, लोकेश ने कहा, “इस विषय में हम बाद में बात करेंगे. अभी तो मुझे सुनीति जी की गांड और आशीषजी को तुम्हारी गांड का आनंद लेना है.”

ये कहते हुए लोकेश ने सुनीति, जो कि घोड़ी का आसन ग्रहण कर चुकी थी, के नितम्ब फैलाये और उसके बीच में भूरे खुरदुरे छेद को खुलने का अवसर दिया. गांड के छेद में अपनी लार की एक धार छोड़ते हुए लोकेश ने उसने अपना मुंह घुसा दिया और उसे चाटने में व्यस्त हो गया.

“मेरे पापा इतनी अच्छी गांड चाटते हैं अंकल कि आंटी सब कुछ भूल जाएँगी.”

“हम्म, तो मैं भी तो देखूं कि तुम्हारी गांड का कैसा स्वाद है.” आशीष ने उसे छेड़कर कहा.

“अंकल, मेरी जैसी गांड आपको दुनिया में नहीं मिलेगी. एकदम कसी हुई और हमेशा लौड़े के लिए तत्पर.”

“हम्म्म, तुम्हारी बात सुनकर मुझे अपनी बेटी अग्रिमा की याद आ गयी. उसे भी अपनी गांड पर इतना ही गर्व है.”

“अगली बार मैं आपके घर आउंगी उससे मिलने, फिर हम आपको दोनों का अंतर बताने का अवसर देंगे. पर अभी तो आप मेरी गांड पर ध्यान लगाइये.”

मान्या ये कहकर घोड़ी के आसन में आ गयी और आशीष को मुस्कुराकर पीछे मुड़कर देखने लगी. आशीष को इससे अधिक आमंत्रण की आवश्यकता नहीं थी. उसने मान्या की गांड फैलाई और अपनी जीभ उसमे घुसा दी और उसे अंदर घुमाने लगा. मधु जी ने कुणाल के लंड को अपने मुंह में लिया और चूसने में व्यस्त हो गयीं.

“ओह, दादी. तुम जैसा लंड चूसने वाली आज तक नहीं मिली.” कुणाल ने उनसे कहा.

“अभी अगर तेरी माँ चूसेगी, तब तू उसे भी यही कहेगा. और जब भी कोई समुदाय की औरत चूसती है, तब भी यही कहता है. झूठ उतना कह जितना पकड़ा न जाये.”

“अरे दादी, आप कहाँ बात पकड़कर बैठ गयीं. मुझे लंड चूसने वाली हर औरत प्यारी लगती है. इसमें मेरा क्या दोष?”

आशीष ने धीमे स्वर में मान्या से पूछा, “तुमने सबके लिए जैल की ट्यूब लायी, अपनी दादी के लिए क्यों नहीं?”

“उन्हें आवश्यकता नहीं है. उनकी गांड वैसे भी इतने लौड़े खाकर खुल गयी है. जैल लगाने से उन्हें बिलकुल भी आनंद नहीं आता। अभी देखना जब आप उनकी गांड मरोगे तब आपको पता लग जायेगा.” ये सुनकर आशीष का लंड बल्लियों उछाल मारने लगा.

“और तुम्हारी मम्मा की गांड मिलेगी आज?” कुछ उत्सुकता से आशीष पूछ ही बैठा.

“ये तो आप के ऊपर निर्भर है, मम्मा तो सुबह से इसी आस में थीं. मैंने उनका नंबर काट दिया. पर आपका नंबर जरूर लगेगा. पर पहले मेरी गांड तो मार लो, अंकल.”

आशीष अपनी जीभ फिर से मान्या की गांड में घुमाने लगा. और मान्या भी अपनी गांड उछाल उछाल कर इसका आनंद लेने लगी. सुनीति की गांड को अब तक लोकेश भली प्रकार से चाटकर चिकना कर चुका था. उसने इस बार गांड खोली और ट्यूब से भरपूर मात्रा से सुनीति की गांड भर दी. सुनीति ने अपनी गांड को सिमटाया और खोला जिसके कारण जैल अच्छे से गांड में चला गया. लोकेश ने अपने लंड को सुनीति के मुंह के आगे किया तो सुनीति ने निसंकोच उन मुंह में लेकर चाटना शुरू कर दिया. जल्दी ही लोकेश का लंड अपने पूरे आवेश में आ चुका था.

परेश ने अपने लंड को चारु के मुंह से निकला और उसे भी घोड़ी का आसन लेने के लिए कहा. फिर उसकी गांड फैलाकर ट्यूब में से जैल अंदर डाला और बिना किसी और विचार के अपने लंड को चारु की गांड पर लगाया और एक शक्तिशाली धक्के के साथ एक ही बार में अंदर पेल दिया. धक्के की तीव्रता से चारु थोड़ा आगे की ओर ढुलक गयी पर उसने तुरंत अपने आप को संभाल भी लिया. वो इस प्रकार की चुदाई की आदी थी और जानती थी कि अब उसकी गांड बड़ी ही निर्ममता के साथ मारी जानी है. पर उसे ऐसी ही चुदाई में सुख मिलता था.

“वाह रे मेरे लाल, तूने कर दिया कमाल। मार मेरी गांड अच्छे से, खोल कर रख दे इसे आज फिर. दो दिन से किसी ने इसकी ओर देखा भी नहीं. और जोर से चोद.”

चारु की इस चिल्लाहट ने सबका ध्यान उसकी ओर खींच लिया. बगल के कमरे की भी बत्ती जली और मधु जी के पति कांच के उस ओर से कमरे में चल रहे व्यभिचार को एकटक देखने लगे. लोकेश ने अपनी पत्नी की चीख का उत्तर देने के लिए सुनीति की गांड पर अपने लंड को रखकर उतना ही भीषण धक्का मारा. सुनीति इस प्रहार के लिए जैसे उत्सुक थी और लोकेश को आशा थी कि अगर वो भी चारु के समान चीखेगी और चिल्लायेगी तो वातावरण में कुछ और आनंद व्याप्त होगा. तो सुनीति ने भी लोकेश को चीख चीखकर गांड फाड़ने का अनुरोध किया. लोकेश ने ये अपेक्षा नहीं की थी, उसे तो लगा था की इस झटके से सुनीति डर जाएगी और दया की याचना करेगी. पर उसे क्या ज्ञान था की सुनीति के बेटे उसे किस प्रकार से चोदते थे. उसने सुनीति की गांड में तेजी से लंड से हमला करना शुरू कर दिया.

“अंकल, अब मेरी गांड का नंबर लगा ही दो, नहीं तो दादी शुरू हुई तो हमारी कोई सुनेगा ही नहीं.” मान्या ने आशीष को समझाया.

आशीष ने अपने लंड को मान्या की छरहरी काया के बीच में लुपलुपाते हुए गांड के संकरे छेद पर लंड लगाया और बड़ी शालीनता और प्रेम से उसे अंदर डाल दिया. धीमी गति से कुछ ही समय में आशीष का लंड मान्या की तंग गांड में जाकर खो गया. आशीष अपने लंड को उस गर्म गुफा में चलाने लगा और कुछ ही समय में एक अच्छी गति पकड़ ली. इस पूरे समय मान्या ऐसी चीखें निकाल रही थी मानो ये उसकी गांड में पहली बार लौड़ा गया हो. आशीष को उसका ये खेल जल्दी ही समझ आ गया और उसने बिना संकोच अपनी पूरी शक्ति से उस कसी गांड की अपने लंड से मालिश करना चालू रखा.

मान्या का अपनी दादी के बारे में विचार भी आशीष को पता चल गए जब मधुजी की चीखों ने उन सबको दबा दिया. वो इस प्रकार से चिल्ला चिल्ला कर कुणाल को अपनी गांड मारने के लिए उत्साहित कर रही थीं कि और कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था. इस आयु में उनके इतने तीव्र स्वर में चुदाई करवाना सच में अचरज था. पर कुणाल ने भी अपनी ओर से कोई पराक्रम नहीं छोड़ा. बिना तेल या जैल के केवल थूक सी गीली की गई गांड उसके उतना ही सुख दे रही थी जितना उसकी माँ और बहन की गांड जैल के साथ देती थीं. कमरे में अब घोड़ी के आसन में चार औरतों की गांड की जोरदार चुदाई चल रही थी. अलग अलग स्वर में चीखती और अधिक तेजी से गांड मारने का आव्हान करने के स्वर कमरे में गूंज रहे थे.

“अंकल, मेरी गांड फाड़ दो. मेरी भाई और पापा भी फाड़ते है, पर हर दिन नहीं. दादाजी, पहले रोज मारते थे मेरी गांड, पर अब नहीं मारते। प्लीज अच्छे से मारो न.”

इसी प्रकार के स्वरों से कमरे का वातावरण अश्लील और वीभत्स हो चुका था. बगल के कमरे की बत्ती फिर बंद हो गई. पर इस कमरे में चुदाई का कार्यक्रम अनवरत चलता रहा. कोई दस से पंद्रह मिनट के अंतराल के बाद एक एक करके लौड़े अपने रस को गांड भरने लगे. आशीष के हिस्से में सबसे कसी गांड आयी थी और उसका रस भी सबसे पहले ही छूटा. लोकेश ने सुनीति की गांड को भरा और फिर परेश ने अपनी माँ चारु की गांड में अपना पानी छोड़ दिया. मधुजी की गांड में पानी सबसे अंत में कुणाल ने छोड़ा. फिर सारे पुरुष एक ओर बैठ गए. परन्तु महिलाएं अपने आसन में बनी रहीं. फिर मधुजी ने सबको बाथरूम ले जाकर धुलाई करवाई.

तभी मधुजी के पति आये और बोले, “अच्छा लगा आशीष तुम्हारा साथ हम लोगों को. अब तुम लोग आनंद लो. मधु का ध्यान रखना और इसे अच्छे से चोदे बिना मत जाना.” ये कहकर उन्होंने फ्रिज में से एक बियर निकाली और अपने कमरे में चले गए.

**************

आशीष अभी भी अचम्भे में था. उसने अपने सामने मधुजी को खड़ा पाया तो उनकी ओर देखा.

“हम उनकी खोई हुई शक्ति को वापिस नहीं ला पा रहे हैं. जिस दिन ऐसा कुछ हुआ, तो वे बदल जायेंगे. मुझे इस बात का अत्यंत दुःख है कि वे हमारे खेल में सम्मिलित नहीं हो सकते. पर सच कहूँ तो उनकी चुदाई के आगे मेरे लिए सारी ब्रम्हांड से चुदाई भी कम है.”

आशीष: “मैं अपने पिता से अवश्य इसके लिए सहायता लूंगा. न जाने क्यों मुझे ऐसा लग रहा है कि वो सर के पुराने दिन लौटा सकते हैं.”

इतने में ही कुणाल ने पूछा: “दादी, अब क्या सोचा है?”

मधुजी ने उसकी ओर एक आहत दृष्टि से देखा और कहा: “मैं तो आज के लिए तृप्त हो गयी, अब सुबह इनके जाने के पहले एक बार और चुदवा लूंगी। पर आज नहीं.”

मान्या जो अपने दादाजी से अत्यधिक प्रेम करती थी उसने भी आज के लिए मना कर दिया. इस पर मधु जी ने सुझाव दिया.

“अब केवल सुनीति और चारु ही हैं जो आगे चुदवाने की इच्छा रखती हैं तो क्यों न तुम चारों बदल बदल कर इन दोनों की ही डबल चुदाई करो. वैसे भी चारु को अपनी चूत और गांड में एक साथ लौड़े लेने में बहुत आनंद आता है.”

आशीष: “सुनीति का भी यही मन पसंद खेल है. उसे तो अपनी चूत में एक साथ दो लंड लेने में भी मजा आता है.”

मधु जी: “हाँ, मैं उस क्रीड़ा अपने लिए कल सुबह के लिए आरक्षित करती हूँ. चारु अपने लिए बताये.”

चारु: “मुझे तो अभी से दो दो लंड मेरी चूत में जायेंगे यही सोचकर रस बहने लगा है. पर मुझे एक चूत और एक गांड में अवश्य ही चाहिए.”

सुनीति ने उसे आश्वासन दिया, “चिंता न करो, तुम्हारी दोनों इच्छाएं पूरी हो सकती हैं. पर पहले चूत में दो लंड ले कर देखो, फिर आगे देखना. वैसे भी हम चारों को बदल बदल कर चोदने वाली हैं, तो हर लंड गांड भी मारेगा और चूत को भी सुख देगा.”

चारों पुरुष इस बात से अत्यंत प्रसन्न हो गए. और अपनी आगे की रणनीति पर विचार करने लगे.

परन्तु सुनीति ने चारु को पास बुलाकर कान में कहा, “चूत में अगर दो लंड लेने हैं, तो अपने बेटों के लेना. वही तुझे शांत कर पाएंगे और उनकी ताल भी मिली रहेगी. मैंने इन के साथ और अपने एक बेटे के साथ एक बार प्रयास किया था पर इन दोनों की ताल न मिलने से कठिनाई ही हुई थी. मैं इन दोनों को संभाल लूंगी।”

चारु ने बात समझ कर सिर हिला दिया. चारु ने बताया कि कैसे जोड़ियां बन रही हैं.

“चूत में दो लंड के लिए मेरे साथ परेश और कुणाल रहेंगे और सुनीति के साथ आशीष जी और आप.” लोकेश को देखकर उसने बताया. “चूत और गांड के लिए जिसे जो स्थान मिले वहीँ लग जाये. मेरे विचार से गांड में मेरे लिए पहले आशीष जी रहेंगे, और सुनीति अपने साथी को चुन लें. इसके बाद जिसे अवसर मिलेगा वो लग जाये.”

सुनीति ने अपना चयन बताया, “ कुणाल. कुणाल को पहला अवसर मेरी गांड में, बाद में जैसा चारु ने कहा.”

चारु: “मम्मी जी, आप और मान्या जाने के पहले इनमे से दो लंड चाटकर खड़े करते जाओ.”

मधुजी ने आशीष के लंड मुंह में लिया तो मान्या अपने पापा के लंड पर मुंह लगाकर चाटने लगी. सुनीति ने कुणाल और चारु ने परेश के लौडों को खड़ा करने का दायित्व उठाया. अब दो बार झड़े लंड इतनी सरलता से तो खड़े होने वाले थे नहीं, हालाँकि परेश और कुणाल के लौड़े जल्दी ही पूरे आक्रोश में आ गए. सुनीति ने चारु से कहा कि वो चारु को इस आसन के लिए सहायता करेगी जिससे उसे कोई चोट न लगे.

ये कहते हुए उसने परेश को नीचे लेटने के लिए कहा और उसके लेटने के बाद सुनीति ने ट्यूब लेकर बहुत सारा जैल चारु की चूत में अपनी उँगलियों से लगा दिया. फिर उसे परेश के लंड पर बैठकर अपने अनुसार चूत में लेने को कहा. उसने ये भी कहा कि इस आसन में उसकी पीठ परेश की ओर रहना चाहिए. चारु ने सामान्य रूप से परेश के लंड को अपनी चूत में समा लिया और ठहर गयी. ये देखकर अब लोकेश और आशीष के भी लंड तन गए. लोकेश विशेषकर इस पूरे वृत्तांत को ध्यान से देख रहा था. जब मधुजी ने देखा कि उनका कार्य सम्पन्न हो गया है तो उन्होंने मान्या को लिया और अपने पति के कमरे में चली गयीं.

अब सुनीति ने कुणाल को संकेत किया कि वो अपने लंड को अपने भाई के लंड के बगल से अपनी माँ चारु की चूत में डाले, पर उसे ये भी समझाया की अधिक जल्दी न करे अन्यथा लंड या चूत के छिलने की संभावना रहेगी. और इसीलिए जैल का प्रयोग किया है कि कठिनाई न हो. कुणाल ने एक सधी हुई धीमी गति से अपने लंड को चारु की चूत पर लगाया और उसे भीतर धकेलने लगा. आशीष ये खेल कई बार देख चुका था सुमति के साथ पर उसे आज भी स्त्री की चूत की बनावट पर अचरज होता था जो इस प्रकार से फ़ैल जाती है. और लोकेश! वो तो किंकर्तव्यविमूढ़ था, उसकी ऑंखें आश्चर्य ने फैली हुई थीं और मुंह खुला हुआ था. धीरे धीरे कुणाल ने भी अपने लंड को चारु की चूत में परेश के लंड के बगल में डाल ही दिया.

चारु आज अपनी चूत को जितना भरा हुआ अनुभव कर रही थी, उसका कोई पर्याय नहीं था. सुनीति ने अब दोनों लड़कों को आगे की प्रणाली समझाई। पहली बात ये थी कि उन्हें एक ही साथ दोनों लौडों को अंदर और बाहर करना था, अन्यथा छिलने की संभावना थी. उसने समझाया की चूत और गांड एक साथ मारने और चूत को दो लौडों से चोदने में यही वस्तुतः मुख्य अंतर है. और इसका ध्यान चाहे कितना भी जोश हो पूरे समय रखना होता है. दूसरा ये कि गति दोनों को एक ही रखनी होगी, और इसीलिए बहुत तीव्र गति सम्भव नहीं होती है, बिना समुचित अनुभव के. पर आनंद की ऊंचाई ऐसी होगी जो आज तक इन तीनों ने नापी नहीं होगी.

फिर उसने उन्हें ये भी समझाया कि जब वो बताये तब वे रुक जाएँ क्योंकि पहली बार के बाद इसमें चोटिल होने की संभावना बहुत रहती है. ये कहकर सुनीति ने उसे अपने कार्यक्रम को आरम्भ करने की आज्ञा दी. उसने देखा तो उसके दोनों ओर लोकेश और आशीष आकर खड़े हो चुके थे.

“बस कुछ समय दो, एक बार ये चुदाई ठीक प्रकार से करने लगें, फिर आप दोनों का ही नम्बर है मेरी चूत में.”

दोनों भाई का तालमेल सुचारु था और उन्होंने एक मध्यम लय में अपने लौडों से एक साथ अपनी माँ चारु की चुदाई करने में सफलता पाई. सुनीति ने आशीष को लेटने के लिए कहा और उसके लंड पर अपनी चूत लगाकर अंदर ले लिया. फिर उसने लोकेश को संकेत दिया और लोकेश ने जिस प्रकार से देखा था, उसी प्रकार अपने लंड को भी सुनीति की चूत में उतार दिया.

“अब दोनों मुझे चोदो पर ध्यान रहे जो मैंने कहा है.”

लोकेश और आशीष ने भी एक तय लय पकड़ ली और सुनीति की चुदाई शुरू हो गई. चारु ने जीवन में इस प्रकार के सुख की कल्पना नहीं की था. अद्भुत, अकल्पनीय आनंद के वो वशीभूत थी. उसके मुंह से केवल आहें और सिसकारियां ही निकल रही थीं. पर उसे सुनीति द्वारा दी गई निर्देशों का अर्थ भी समझा में आया. अगर उसके दोनों पुत्र इससे अधिक गति से चुदाई करते तो ये तय था कि उसे कठिनाई भी होती और चूत भी छिल जाती.

मंथर गति से ये दोनों तिकड़ी कुछ साथ आठ दस मिनट और इसी आसन में चुदाई करते रहे. इसके बाद सुनीति ने कहा कि अब आसन बदलना होगा नहीं तो चारु की चूत चरमरा जाएगी. आशीष और कुणाल ने अपने लंड बाहर निकाल लिए और फिर चारु और सुनीति ने आसन बदला और इस बार उनका मुंह नीचे लेटे हुए चोदू की ओर कर लिया. आगे झुकते हुए उन्होंने अपनी गांड को अगले आक्रमण के लिए प्रस्तुत किया.

आशीष ने अपने लंड को चारु की गांड पर लगाकर बड़े प्रेम से उसकी गांड में उतार दिया. अब उसका और परेश के लंड के बीच केवल चूत की एक पतली सी झिल्ली ही थी. परेश आशीष के लंड के अंदर जाने तक रुका रहा और फिर आशीष और परेश ने एक साथ तालमेल बैठाते हुए चारु की चूत और गांड दोनों में लंड पेलना आरम्भ कर दिया. चारु को इस प्रकार से चुदवाने में बहुत सुख मिलता था और आज भी उसे वही आनंद प्राप्त हो रहा था.

सुनीति की गांड में कुणाल ने अपना लंड पेला हुआ था और अपने पिता के साथ सुनीति को डबल चुदाई का आनंद दे रहा था. सुनीति और चारु की आनंदकारी चीखों ने कमरे को हिला रखा था. दोनों अधिक गहराई और तीव्रता से चोदने के लिए उत्साहित कर रही थीं. और पुरुष गण अपने सामर्थ्य के अनुसार उनकी ये इच्छा पूरी भी कर रहे थे. कुछ मिनट के बाद साथी बदलने का कार्य हुआ और इस बार परेश ने सुनीति की गांड मारी तो आशीष ने चारु की चूत. वहीँ लोकेश ने अपनी पत्नी चारु की गांड में लंड पेला और सुनीति की चूत में कुणाल पिल गया.

कोई दस मिनट की इस भीषण हृदयविदारक चुदाई के बाद सब थकने लगे और एक एक करके सबने अपना रस छोड़ दिया. हाँफते हुए थक कर चूर पुरुष एक एक करके ढेर हो गए. वहीँ चारु और सुनीति एक संतुष्ट मुस्कान के साथ बिस्तर पर ही लुढ़क गयी.

कुछ समय तक स्वयं को सामान्य करने के बाद कुणाल और परेश उठे और उनके बाद आशीष और लोकेश भी खड़े हो गए. समय देखा तो रात के दो बज रहे थे. लोकेश ने अपने और आशीष के लिए स्कॉच और अन्य सबके लिए बियर प्रस्तुत की. बातों के साथ ड्रिंक समाप्त करके बत्ती बुझाकर सब वहीँ लेट गए और धीरे धीरे निद्रा की गोद में चले गए.

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देर से सोने के कारण सुबह सब देर से उठे. सुनीति और आशीष सबके साथ नीचे गए तो देखा कि मधुजी, उनके पति और मान्या पहले ही वहां नाश्ते के लिए बैठे हैं. सबने बैठ कर सप्रेम नाश्ता किया. आशीष ने मधु जी के पति से कहा कि उसके पिता जीवन उनसे आज बात करेंगे और उनका फोन नंबर ले लिया. नाश्ते के बाद सुनीति ने घर लौटने की अनुमति चाही. उसे लगा कि मधुजी की इच्छा न होते हुए भी उन्होंने स्वीकृति दे दी.

सुनीति उनके पास गई और उनसे बोली, “आप इस विषय में अधिक चिंतन न करें. आप जब चाहें हमें बुला लें, या स्वयं चली आएं. देर से उठने के कारण आपकी सेवा का अवसर नहीं मिल पा रहा है. आप कृपया समझें.”

मधु जी ने सुनीति को गले से लगा लिया और फिर आशीष को. सब एक दूसरे से ऐसे मिले जैसे न जाने कितने वर्षों की पहचान हो. इसके बाद सुनीति और आशीष अपने घर के लिए निकल पड़े.

रास्ते में बात करते हुए आशीष ने कहा, “मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि जिस परिवार से हम पहली बार मिले हैं, वो इतनी मिठास और अंतरंग रूप से मिला है. ऐसा लगा ही नहीं कि हम इससे पहले अपरिचित थे.”

सुनीति: “ये बात मुझे भी बहुत आश्चर्यजनक लगी, परन्तु हो सकता है कि समुदाय की मुखिया होने के कारण ये व्यव्हार हो. अन्य परिवारों से मिलने के बाद ही कुछ सोचना उचित होगा. वैसे तुमने मधु जी के पति के बारे में क्या सोचा है.”

“हालाँकि ये दूसरे के घर का मामला है, पर मुझे लगता है कि एकाकीपन उन्हें चुभ रहा है. मधुजी समुदाय के कार्यों में व्यस्त, अन्य सभी अपने कार्यों में. उनका जब स्वास्थ्य गड़बड़ाया होगा, तब भी किसी ने उन पर विशेष ध्यान नहीं दिया. मुझे लगता है कि अगर उन्हें दो तीन सप्ताह के लिए वहां से निकाल लिया जाये तो न केवल उन्हें स्वास्थ्य लाभ होगा, बल्कि घर के अन्य सदयों को भी उनकी अनुपस्थिति और कमी का अनुभव होगा। ये भविष्य के लिए अच्छा होगा.”

सुनीति ने विचार किया तो उसे ये ठीक लगा. इतने में वे घर पहुँच गए. घर पर सबने उनके कल के अनुभव के बारे में पूछा तो आशीष ने सुनीति ने संक्षेप में पूरा वृत्तांत सुनाया. जीवन से आशीष ने बात की और उन्हें सर का नाम और नंबर दिया. फिर उसने अपने विचार रखे और जीवन से कहा कि वो जैसा उचित समझें, वैसा ही करें. जीवन आशीष की इस योग्यता को भली भांति जानता था. उसने जीवन को ये बता दिया था कि वो स्वयं क्या चाहता है पर निर्णय जीवन पर छोड़ा था.

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क्रमशः

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अध्याय २१ तीसरा घर - शीला और समर्थ सिंह ३

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शीला का घर:

दिंची क्लब के आयोजन के लगभग एक सप्ताह बाद, सांय काल में समर्थ और शीला अपने घर की बैठक में बैठे हुए थे. उनका ८५ इंच के विशाल OLED टीवी इस समय चल रहा था और दोनों उस पर चल रहे कार्यक्रम को देख रहे थे. ये कार्यक्रम उनके ही घर के एक कमरे से प्रसारित हो रहा था. और जैसा कि आप जानते हैं कि समर्थ के घर का हर कमरा वीडियो कैमरों से सज्जित था. और इस कार्यक्रम के कलाकार भी उनके ही परिवारजन थे.

टीवी पर इस समय उनकी छोटी बेटी का फिल्मांकन हो रहा था. सुरेखा की चूत में नितिन ने अपना लौड़ा डाला हुआ था और उसका मुंह निखिल के लंड से भरा हुआ था. सुरेखा पीठ के बल लेटी हुई थी और उसका चेहरा बहुत ही समीप से दिख रहा था. दोनों भाई उसे बड़े प्यार से चोद रहे थे और सुरेखा भी इसका आनंद ले रही थी. सुप्रिया आज ऑफिस अपने ही घर चली गई थी. परन्तु सुरेखा आ गयी थी दोपहर में ही. और निखिल और नितिन के आने के पश्चात् सुरेखा उनके साथ एक शयनकक्ष में चली गई थी.

शीला: “सुरेखा ने किसी प्यासी मछली के समान हमारी जीवन शैली को अपना लिया है. अब उसे भी चुदवाने में बहुत आनंद आता है. बेचारी न जाने कितने दिनों से प्यार की भूखी थी.”

समर्थ: “मुझे तुम्हें कुछ बताना है.” उसका स्वर गंभीर था.

शीला: “ऐसा क्या है जो बताने के पहले पूछ रहे हो. सब ठीक तो है.”

समर्थ खड़ा होते हुए: “नहीं, सब ठीक नहीं है.” ये कहकर वो अपने घर में बने ऑफिस में गया और एक लिफाफा ले कर आया और शीला के हाथ में दिया.

समर्थ: “मैंने अपनी सिक्युरिटी कंपनी के द्वारा नागेश की जासूसी करवाई, पिछले दस दिनों में. अभी भी चल रही है.”

शीला ने लिफाफा खोला तो हतप्रभ रह गई. इसमें नागेश अपने विदेश दौरे पर अन्य लोगों के साथ सम्भोग में सलग्न था. पर आश्चर्य की बात ये थी कि वो स्त्रियों नहीं बल्कि दूसरे आदमियों के साथ लिप्त था. कहीं वो लंड चूस रहा था तो कहीं गांड मरवा रहा था.

समर्थ: “मैंने अपने वकील से सुरेखा की ओर से तलाक का नोटिस बनवा दिया है. जब वो वापिस आएगा तब उसे वो सौंप दिया आएगा. इन चित्रों के साथ. मुझे नहीं लगता कि वो कोई आपत्ति करेगा. उसे शहर छोड़ने के लिए मैंने कुछ राशि का प्रबंध किया है. उसकी कंपनी के MD से भी बात की है, वो उसे दूसरे शहर स्थानांतरित कर देंगे. मैंने उन्हें कारण नहीं बताया पर उन्होंने मेरी विनती स्वीकार कर ली है.”

शीला: “पर सुरेखा?”

समर्थ: “तुम्हें उससे बात करनी है. मेरा कुछ कहना अभी सही नहीं होगा. मुझे नहीं लगता कि सुरेखा वैसे भी उसके साथ रहना चाहती है, और ये देखकर तो बिल्कुल ही नहीं. मुझे एक बात की संतुष्टि है.”

शीला: “क्या?

समर्थ: “अब चूँकि इन दोनों में कई महीनों से शारीरिक सम्बन्ध नहीं हैं, तो सुप्रिया किसी भी प्रकार के सेक्स रोग से बच गई.”

शीला: “मैं आज ही रात को सुरेखा से बात करती हूँ.”

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सुप्रिया का घर:

सुप्रिया अपने घर आज एक विशेष प्रयोजन से गई थी. आज अपनी भांजी संजना को अपने घर कुछ बात करने के लिए आमंत्रित किया था. संजना, मौसी के घर निर्धारित समय पर पहुँच गई. सुप्रिया मौसी को वो बहुत प्रेम करती थी. उनका स्वभाव और उनकी सुंदरता ने उसे सदा प्रभावित किया था. पर आज अकेले बुलाये जाने का उसे रहस्य नहीं समझ में आया. सुप्रिया ने उसे घर में अंदर बुलाया और दोनों बैठकर पहले तो संजना की पढाई के बारे में बातें करते रहे. संजना की बातों से उसकी व्यवसाय में रूचि तो समझ में आ गई. फिर सुप्रिया ने अपनी बात उस ओर मोड़ी जिसके लिए संजना को बुलाया था.

सुप्रिया: “आजकल सुरेखा का मूड कैसा है. मैंने देखा था कि कुछ दिन पहले तक वो बहुत उखड़ी हुई रहती थी.”

संजना: “पता है मौसी, अब तो लगता है की मम्मी बिल्कुल चेंज हो गयी हैं. जहाँ हम दोनों को हर बात पर डाँट देती थीं, अब तो बहुत प्यार और संयम से समझाती हैं. जो भी हुआ है, उनके लिए बहुत अच्छा है.”

सुप्रिया: “हम्म्म्म, मेरे विचार से मुझे पता है क्या हुआ है.”

संजना: “क्या मौसी?”

सुप्रिया: “मैं वो भी बता दूँगी। और, वैसे तुम्हारा कोई बॉयफ्रेंड वगैरह है या नहीं?”

संजना: “नहीं मौसी, मित्र तो बहुत हैं, पर बॉयफ्रेंड लायक कोई नहीं. और वो मित्र भी सच्चे हैं या नहीं मुझे पता नहीं. हमेशा ऐसे देखते हैं जैसे मुझे नंगा कर रहे हैं.” कहते हुए संजना ने अपने मुंह पर हाथ रख दिया अपितु कोई गलत बात निकल गई हो मुंह से.

सुप्रिया: “इसमें शर्माने वाली कोई बात नहीं, संजना. इस आयु में लड़कों को हर लड़की में एक ही आकर्षण होता है. और आजकल ऐसा भी नहीं कि लड़कियां इससे दूर भागती हैं. तुम्हारी कुछ सहेलियां तो अवश्य इसका लाभ उठाती ही होंगी.”

संजना: “जी मौसी, कुछ ने तो ४-४ बॉयफ्रेंड रखे हुए हैं.”

सुप्रिया: “इसमें कोई गलत नहीं है. ये जवानी दोबारा तो आनी नहीं, तो जितना हो सके उसका आनंद उठाना चाहिए.”

संजना ने आश्चर्य से मौसी को देखा.

संजना: “मौसी, आपको ये गलत नहीं लगता?”

सुप्रिया: “किंचित भी नहीं. जब मैं तुम्हारी अवस्था की थी तो मेरे तो ६ बॉयफ्रेंड थे.” और फिर थोड़ा आगे झुककर संजना के पास आकर कुछ षड्यंत्रकारी स्वर में, “और इतनी ही गर्लफ्रेंड भी थीं.”

संजना स्तब्ध रह गई.

संजना, “मौसी, गर्लफ्रेंड यानि?”

सुप्रिया ने अपने हाथ को संजना की जांघ पर हल्के हल्के चलते हुए उत्तर दिया, “हम्म्म्म! जो तुम समझ रही हो वो सच है. और पता है मेरी सबसे अच्छी गर्लफ्रेंड का नाम क्या था?”

संजना: “नहीं.”

सुप्रिया ने फुसफुसाकर बोला, “सुरेखा. सुरेखा था नाम उसका.”

संजना को काटो तो खून नहीं.

संजना: “मम्मी!”

सुप्रिया ने सिर हिलाकर मुस्कुराकर हामी भरी.

संजना: “आप तो बहनें हैं फिर कैसे.”

सुप्रिया: “क्योंकि सबसे बड़ा मानसिक सुख शारीरिक सुख में ही निहित होता है. और हम वैसे भी साथ ही सोती थीं, तो कोई समस्या ही नहीं थी.”

संजना सोच में डूब गई. उसे कभी सपने में भी ये विचार नहीं आया था की उसकी माँ लेस्बियन सम्बन्ध में कभी रही होगी. और तो और वो भी उसकी मौसी के साथ. तभी उसे दूर से किसी के बोलने की आवाज़ आयी. शायद मौसी उससे कुछ कह रही थीं. उसने उनकी बात पर ध्यान दिया.

सुप्रिया: “कहाँ खो गयीं, मेरी बात सुनी?”

संजना: “नहीं मौसी, सॉरी मैं कुछ सोच रही थी.”

सुप्रिया ने संजना की जांघ पर हाथ चलते हुए उसकी चूत के ऊपर रोक दिया. संजना उनकी ओर एकटक देख रही थी.

सुप्रिया: “मैंने कहा कि मैं चाहती हूँ कि हम दोनों भी वैसे ही प्यार करें.” ये कहकर वो रुक गई और संजना की प्रतिक्रिया देखने लगी. संजना ने उत्तर नहीं दिया पर सुप्रिया के हाथ को हटाया भी नहीं.

फिर संजना हकलाते हुए बोली, “पर मम्मी को पता लगा तो.....”

सुप्रिया ने अपने हाथ से संजना को चूत पर दबाव बनाकर कहा, “ कौन बताएगा? और सच कहूँ तो वो स्वयं तुम्हारी इस मिठास को चखना चाहेगी.” ये कहते हुए सुप्रिया ने संजना के होंठ चूम लिए.

कुछ ही क्षणों में ये चुम्बन प्रगाढ़ हो गया. संजना की प्रतिक्रिया को स्वीकारात्मक समझते हुए सुप्रिया खड़ी हो गई और अपना हाथ संजना की ओर बढ़ाया.

सुप्रिया, “बेबी, ये सही स्थान नहीं है. मेरे कमरे में चलते हैं.”

संजना वशीभूत सी होकर सुप्रिया के साथ उसके कमरे में जा पहुंची. सुप्रिया ने दरवाजा बंद किया और अपने कपडे निकालने लगी और पालक झपकते ही वो संजना के सामने पूरी नंगी खड़ी थी.

फिर वो संजना की ओर बढ़ी और उसका चेहरा हाथ में लेकर प्यार से बोली, “शर्मा मत मेरी गुड़िया, तुमने कभी किसी स्त्री के साथ कुछ भी नहीं किया न?”

संजना ने न में सिर हिलाया.

सुप्रिया: “तुम्हें आज से मैं वो सब सिखाऊँगी जो तुम्हें सीखना चाहिए.” कहते हुए सुप्रिया ने संजना के वस्त्र उतारने शुरू किये. पर जब सुप्रिया का हाथ उसकी पैंटी पर पड़ा तो संजना ने उसका हाथ पकड़ लिया.

संजना: “मौसी, ये गलत नहीं है न?”

सुप्रिया: “बिल्कुल भी नहीं.”

ये कहकर उसने संजना को बिस्तर पर लिटा दिया और उसकी पैंटी भी अलग कर दी. संजना की एकदम मलाईदार बुर अब उसके सामने थी. और उसे देखकर ये भी समझ आ गया की संजना एक अछूती कली है. उसने अपने भाग्य को धन्य माना जो उसे ऐसी बुर को भोगने का पहला अवसर मिला था. उसने दोनों पंखुड़ियों को थोड़ा सा खोला और अपनी जीभ से बुर पर चमक रही नमी को चाट लिया.

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शीला का घर:

निखिल कुछ देर में नंगे ही बैठक में आया, उसके चेहरे पर पसीना चमक रहा था और एक संतुष्टि का भाव भी.

निखिल: “मौसी बहुत कमाल की हैं. मेरे लंड का पानी पूरा निचोड़कर पी गयीं.”

शीला: “क्या हुआ, तूने उसे चोदा नहीं.”

निखिल: “अपने छोटे भाई के लिए छोड़ दिया. आज उसी को सेवा करने दो उनकी.” ये कहकर उसने बार से अपने लिए एक पेग बनाया और टीवी पर चल रहे कार्यक्रम को देखने लगा.

निखिल: “नाना, जो कैमरे आपने लगाए हैं उनसे पिक्चर इतनी साफ आती है कि ऐसा लगता है कि हम वहीं हैं.”

समर्थ: “हाँ, बहुत उच्च कोटि के कैमरे लगाए हैं. पर अब मैं कुछ और करने के बारे में विचार कर रहा हूँ.”

निखिल: “इससे अधिक क्या करेंगे नानाजी?”

समर्थ: “3D, ये सबसे नए कैमरे हैं, और ये टीवी भी 3D पिक्चर दिखा सकता है. जो अभी कमी लग रही है वो भी नहीं रहेगी.”

निखिल: “वाओ, पर सारे घर में लगाने में बहुत खर्चा नहीं आएगा?”

समर्थ: “हाँ, २८ लाख का बजट दिया है. अगले हफ्ते में उन्हें लगाने के लिए उनका दल आएगा.”

निखिल: “ओके, मैं तो अभी से उसके द्वारा बने वीडियो के बारे में सोच रहा हूँ.”

समर्थ और शीला हंसने लगे.

निखिल: “नानी, पार्थ का फोन आया था. आपका दिंची क्लब का प्रवेश की प्रक्रिया पूरी करने हेतु उसने आपसे कोई दिन चुनने के लिए कहा है.”

शीला समर्थ से, “आप क्या कहते हो, कब जाऊँ?”

समर्थ: “ऐसा करो जिस दिन ये लोग कैमरे लगाने आ रहे हैं उसी दिन चली जाओ. उस दिन मेरे सिवाय यहाँ किसी की आवश्यकता नहीं है.”

शीला: “निखिल, जैसा नानाजी ने कहा है, वही आगे बता दे.”

निखिल: “जी नानी.”

शीला टीवी की ओर संकेत करते हुए: “और इन दोनों को बोल, अब बस करें खाना भी खाना है.”

निखिल ये सुनकर उठकर उस कमरे में चला गया.

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सुप्रिया का घर:

सुप्रिया के शयनकक्ष के बिस्तर पर संजना कसमसा रही थी. उसके दोनों पाँव पूरी तरह से फैले हुए थे और उसकी मौसी उसकी चूत में अपना चेहरा घुसाए हुए थी. सुप्रिया जैसी अनुभवी चूत चाटने वाली स्त्री के सामने संजना ने हाथ डाल दिए थे. उसने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा थे कि इस प्रकार के सेक्स में भी इतना सुख है. और अब उसने ठान लिया था कि सेक्स के हर आयाम का वो सुख लेगी. परन्तु अभी उसे अपनी चूत में जो संवेदना हो रही थी उसके सामने उसकी आगे की किसी भी प्रकार की सोच पर पर्दा डल गया था.

सुप्रिया को भी इस अनछुई बुर के स्वाद ने विह्वल किया हुआ था. ऐसा स्वाद, ऐसी मिठास, ऐसी खुशबू उसे अपनी युवावस्था के दिनों का स्मरण करा रही थी. उसने निश्चय किया कि वो स्वार्थी बनकर जब तक उसका मन इस रस से भर नहीं जाता, वो इसे अपने लिए बचा के रखेगी. हालाँकि उसे ये पता था कि एक बार ये सुख पाने के पश्चात् संजना जल्दी ही इसके आगे बढ़ना चाहेगी. और तो और उन्होंने अभी ये भी निश्चित नहीं किया था कि संजना का उद्घाटन कौन करेगा। इस पंक्ति में समर्थ अवश्य सबसे आगे थे, पर वो इस शुभ कार्य को किसी और को भी सौंप सकते थे. संजना की अनचुदी बुर इस समय अश्रुधार बहा रही थी जिसके स्वाद से सुप्रिया अपने जीवन को धन्य मान रही थी.

“मौसी, मुझे अब बहुत अजीब लग रहा है, मौसी, ये क्या हो रहा है?”

मौसी तो अपने भोग में लीन थी, उसने कोई उत्तर नहीं दिया. वो जानती थी कि कुछ प्रश्न अपना उत्तर स्वयं ही ढूंढ लेते हैं. और यही हो भी रहा था.

“मौसी, मेरा सूसू निकल जायेगा मौसी. मुझे बहुत अजीब लग रहा हैं वहां. मौसी ..... मौ ...... सीईईईई .... मम्मीईईई उउउह आऊवोह मौसी मेरी सूसू निकल गई मौसी आपके मुंह में. ये क्या हो गया!”

संजना के पूरा झड़ने के बाद सुप्रिया ने अपना कामरस से ओतप्रोत चेहरा उठाकर उसकी ओर देखा.

“कैसा लगा मेरी लाडो?”

“बहुत अच्छा मौसी, पर अपने मेरा सूसू क्यों पिया.”

सुप्रिया ने उसकी चूत पर एक बार फिर जीभ चलते हुए कहा, “पहली बात तो ये है कि ये तुम्हारी सूसू नहीं थी. जब हम औरतें सेक्स के समय चरम पर पहुँचती है, तब उनका शरीर ये रस छोड़ता है. इसे कामरस भी कहते हैं. और जो तुमने आज अनुभव किया है, उसके लिए इस संसार की हर स्त्री व्याकुल रहती है. अब ये समझ लो कि तुमने आनंद के उस द्वार को देख लिया है जिसके लिए हर मनुष्य क्या नहीं करता.”

“मौसी, हम ये फिर कर सकते हैं.” संजना ने उत्सुकता से पूछा.

“बिल्कुल, आज तुम मेरे ही साथ रुक जो रही हो. मैंने सुरेखा से अनुमति ले ली थी.”

“और भैया लोग, वो भी तो आते होंगे?”

“नहीं आज नाना नानी ने उसे किसी विशेष अभियान में लगाया हुआ है. वो दोनों वहीं रहेंगे. आज हम दोनों अकेले ही हैं. चल अब खाना खा लेते हैं.”

ये कहते हुए सुप्रिया ने कपडे डाले और कमरे के दरवाजे पर रुक गई. संजना भी शीघ्र कपड़े पहन कर आ गई और दोनों रसोई में चले गए. जाते जाते सुप्रिया ने फोन से एक संदेश किया, “ मिशन सफल”

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सुरेखा का घर:

सजल आज घर जल्दी पहुँच गया था. सुरेखा ने उसे पहले ही बता दिया था की वो नाना नानी के घर जा रही है. और बाद में संजना का फोन आया कि वो भी मौसी के घर जा रही है. सजल को ऐसा अवसर कम ही मिलता था जब ये दोनों घर से इतनी देर एक साथ बाहर हों. उसने घर में जाकर फटाफट अपने कपडे बदले और बाथरूम में घुस गया जहाँ पर वाशिंग मशीन लगी थी. खंगालकर उसने सुरेखा की एक पैंटी ढूंढ निकाली और तुरंत अपने कमरे में घुसकर दरवाज़ा बंद कर लिया.

फिर टीवी पर उसने एक इन्सेस्ट (पारिवारिक सम्भोग) की वीडियो लगाई जो उसने नेट से डाउनलोड की थी. और ये सब करके वो अपने बिस्तर पर बैठकर मस्ती से मूवी देखते हुए मुठ मारने लगा. जब उसका एक बार झड़ गया तो उसने सफाई की और फिर दोबारा अपने लंड को खड़ा करने के लिए हिलाने लगा. कुछ ही देर में वो फिर तन गया था और उसने एक बार फिर अपनी माँ की पैंटी में मुठ मारकर अपना वीर्य छोड़ दिया. इस समय वो इतना आराम से था कि उसकी झपकी लग गई और वो सो गया.

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शीला का घर:

निखिल कमरे में पहुंचा तो देखा कि नितिन का वीर्य उसकी मौसी की चूत से बह रहा था जिसे अपनी उँगलियों में समेटकर चाटने का प्रयास कर रही थी. उसके बाद सुरेखा नितिन का लंड चूसने लगी जैसे फिर चुदवाने की इच्छा हो. दोनों भाई एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिए.

निखिल: “क्या हुआ मौसी?”

सुरेखा: “मुझे और चुदवाने का मन है, तुम जाओ.”

निखिल: “अरे मौसी, सारी रात पड़ी है. नानी बुला रही हैं. चलिए.”

नितिन और सुरेखा उसी अवस्था में बैठक की ओर बढ़ गए.

सुरेखा: “मम्मी, आपने बुलाया?”

शीला ने सुरेखा की चूत से बहता हुआ वीर्य देखा तो उसे हंसी आ गई.

शीला: “ये ठीक है कि सालों से तेरी अच्छी चुदाई नहीं हुई, पर ये भी नहीं कि तू सब कुछ भूल जाये. चलो, खाने का समय है, खाने के बाद मुझे तुझसे कुछ आवश्यक बात भी करनी है.”

सुरेखा ने हाथ मुंह धोकर एक गाउन पहन लिया और खाने के लिए बैठ गई. तभी उसे ध्यान आया कि आज सजल घर में अकेला है क्यूंकि संजना भी सुप्रिया के घर पर है. खाना समाप्त करने के बाद शीला सुरेखा को समर्थ के घर में बने ऑफिस में ले गई और दरवाजा बंद कर लिया.

सुरेखा: “क्या हुआ, मम्मी.”

शीला: “सुरेखा, विषय थोड़ा गंभीर है. पहले ये बता कि तेरे और नागेश के सेक्स सम्बन्ध कितने दिन पहले हुए थे.”

सुरेखा: “मम्मी, बात क्या है?”

शीला: “जो पूछा है उसका उत्तर दो, उलटे सवाल मत करो.” शीला का स्वर कठोर था.

सुरझा: “साल से अधिक हो गया. ठीक से याद नहीं पर साल से तो अधिक हो ही गया है.”

शीला ने कहा: “जो मैं अब बताने जा रही हूँ, तुम्हें इससे धक्का लगेगा, पर बताना भी आवश्यक है.” ये कहकर शीला ने वो लिफाफा सुरेखा की ओर बढ़ा दिया.

चित्र देखकर सुरेखा के चेहरे का रंग ही उड़ गया. वो रोने लगी. कुछ समय जब वो रो चुकी तब शीला ने उसे गले से लगाकर ढाढस बंधाया.

“तेरे पापा ने तलाक के पेपर बना लिए हैं. बाहर जाकर उस पर हस्ताक्षर कर देना. पापा ने नागेश का स्थानांतरण दूसरे शहर करवा दिया है. नागेश अगर कुछ न नुकुर करेगा तो ये चित्र हम कई लोगों को भेजेंगे. मेरे विचार से अब तुम उससे अपने आप को मुक्त मानो। ”

सुरेखा ने कुछ नहीं कहा और उठकर बाहर चली गई.

“पापा, पेपर कहाँ हैं?”

समर्थ उसके दुःख को समझ रहा था.

“सॉरी, बेटी.” फिर उसने उठकर अपने ऑफिस से पेपर्स ले आये और सुरेखा ने निश्चित स्थानों पर हस्ताक्षर कर दिए.

सुरेखा: “पापा, मैं घर जा रही हूँ. पता नहीं सजल ने कुछ खाया या नहीं.”

समर्थ: “निखिल, जाकर मौसी को छोड़कर आ.”

सुरेखा: “मैं चली जाऊंगी।”

समर्थ: “बिल्कुल भी नहीं. या तो यहीं रुको नहीं तो निखिल छोड़कर आएगा.”

सुरेखा: “ठीक है.”

ये कहकर वो अपने कपड़े बदलने चली गई और कोई १० मिनट में वापिस लौट आयी. समर्थ और शीला ने उसे गले लगाया.

“तू चिंता मत करना, हम अभी ज़िंदा हैं.”

“मुझे बस इस बात का दुःख है कि मुझे जानने में इतने साल लग गए. पर अब मैं मुक्त हुई.”

निखिल सुरेखा को लेकर निकल गया और उसे छोड़कर वापिस लौट आया.

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सुरेखा का घर:

सुरेखा ने अपने घर में देखा कि सारे घर की बत्तियां जल रही थीं. उसने रसोई में जाकर देखा तो पाया कि खाने के लिए कुछ भी नहीं था. उसे सजल की चिंता हुई. फिर वो अपने कमरे की और बढ़ी कि कपडे बदल कर खाने के लिए कुछ बना देगी. अचानक उसके पैर ठिठक गए. सजल के कमरे से कुछ आवाजें आ रही थीं जैसे कोई चुदाई कर रहा हो. उसने देखा कि दरवाजा तो बंद था पर लॉक नहीं था. उसने धीरे से खोलकर अंदर झाँका तो उसके होश उड़ गए. सजल सोया हुआ था पर उसका लंड उसके अंडरवियर से बाहर था और उसके ऊपर सुरेखा की पैंटी थी. उसने धीमे क़दमों से कमरे में प्रवेश किया और टीवी पर चल रहे दृश्य को देखा.

उसे ये समझने में अधिक समय नहीं लगा कि सजल एक इन्सेस्ट मूवी देख रहा था जिसमें संभवतः एक लड़का अपनी माँ की चुदाई कर रहा था. टीवी को देखा तो उसमें एक USB लगी हुई थी.उसने कमरे से बाहर जाकर दरवाजा बंद किया और अपने कमरे में जाकर एक पतली झीनी नाइटी पहन ली. उसके मन में सुप्रिया के सुझाव आ रहे थे. अगर घर में ही लंड उपलब्ध है तो उसका उचित उपयोग करना चाहिए. कपड़े बदलकर उसने सजल का दरवाजा खटखटाते हुए उसे खाने के लिए आने के लिए कहा.

अपनी माँ की आवाज़ से सजल की आंख खुल गई. उसने देखा कि कमरा बंद है, पर मम्मी ने पुकारा था. उसने तुरंत टीवी बंद किया, अपना अंडरवियर ठीक किया, सुरेखा के पैंटी को तकिये के नीचे रखकर बाथरूम में जाकर मुंह धोया और कमरे से बाहर निकला. उसने रसोई में कुछ आवाज सुनी तो समझ गया कि मम्मी कुछ बना रही है. धड़कते मन से वो किचन की ओर चल पड़ा. रसोई में पहुंचा और सुरेखा ने जो पहना था उसे देखकर सजल के लंड में फिर तनाव आ गया और उसके शार्ट में एक टेंट बन गया. इससे पहले कि वो कुछ समझता या करता सुरेखा उसकी ओर मुड़ी और उसकी भी ऑंखें सजल के टेंट पर पड़ीं.

“मैं आयी तो देखा तुम सो रहे थे.” सुरेखा ने सजल के शंका को और बढ़ाते हुए कहा. अब सजल को ये नहीं समझ आया कि उसकी माँ ने क्या और कितना देखा है.

“मेरी आंख लग गई थी, थक कर. आप कब आयीं? आपने तो कहा था आज नाना के घर पर ही रहोगे.”

“अब बिस्तर पर लेट तुम ऐसा क्या कर रहे थे जो थक गए थे? कोई मूवी भी लगी थी तुम्हारे टीवी पर, कौन सी थी. चलो खाने के बाद साथ देखेंगे.” सुरेखा को सजल को छेड़ने में कुछ अधिक ही आनंद आ रहा था.

“पता नहीं, टीवी पर कोई चल रही होगी. मैं तो टीवी चला कर सो गया था.”

“चलो, कभी और सही. लो अब खाना खा लो, बस हल्का सा ये बना दिया है. वैसे भी थके होने पर कम ही खाना चाहिए.”

सजल ने प्लेट ली और डाइनिंग टेबल पर बैठकर खाने लगा. सुरेखा उठकर किसी कमरे में गई और कुछ ही मिनट में लौट आई. अभी सुरेखा का मन नहीं भरा था सजल को सताने से.

“अरे, ये बताओ, तुमने मेरी पैंटी देखी है क्या वो नीली वाली? मैं वाशिंग मशीन में कपडे धोने डाल रही थी तो देखा वो नहीं है.”

सजल के गले में खाना अटक गया और उसे जोर का ठसका लगा. सुरेखा ने जल्दी से उठकर उसे पानी दिया और उसकी पीठ ठोकी. सजल की जब साँस सँभली तो उसने थोड़ा और पानी पिया.

“मुझे कैसे पता होगा आपकी पैंटी का? हो सकता है संजना ने ले ली हो गलती से.”

“हाँ, हो तो सकता है.”

सजल ने किसी तरह खाना खाया और प्लेट किचन में रखी और गुड नाइट कहकर अपने कमरे की ओर दौड़ गया. सुरेखा के चेहरे पर इस समय एक कुटिल मुस्कान नाच रही थी. सजल ने अपना कमरा लॉक किया और जल्दी से टीवी से USB निकाला जिसमे पॉर्न मूवी थी. फिर उसने अपनी तकिया के नीचे से पैंटी निकालने के लिए हाथ बढ़ाया तो वहाँ कुछ नहीं था. वो अचंभित हो गया. उसे याद था कि उसने पैंटी को तकिया के नीचे ही रखा था. उसे लगा कि शायद उसने वाशिंग मशीन में डाल दी हो. यही सोचकर उसने दरवाजा खोला तो हक्का बक्का रह गया.

दरवाजे पर उसकी माँ खड़ी थी और वो अपने हाथ में एक नीले रंग की पैंटी घुमा रही थीं.

“कुछ ढूंढ रहे थे क्या?”

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सुप्रिया का घर:

सुप्रिया ने खाने के बाद फिर एक बार संजना का रस चूसा और पिया. उसके मन को आत्मतृप्ति मिली.

सुप्रिया: “संजना, मुझे एक वचन दो.”

संजना: “क्या मौसी?”

सुप्रिया: “यही कि तुम अभी किसी भी पुरुष से नहीं चुदवाओगी। मैं इस कली का रस जी भर कर पीना चाहती हूँ. और भी कुछ लोग हैं जो इस कुंवारी चूत का रस पीना चाहेंगे. क्या है न आजकल अनछुई कली मिलना असंभव है. क्या वचन देती हो. हाँ, ये अवश्य है कि तुम्हें हम अधिक दिनों तक नहीं रोकेंगे, और संभव हुआ तो तुम्हारी चूत का उद्घाटन भी एक विशिष्ट व्यक्ति से ही करवाएंगे, जिससे कि तुम्हें जीवन भर के लिए एक मधुर स्मृति मिल जाये.”

संजना: “मौसी, सच कहूँ तो मैं यही सोच रही थी. पर मैं आपको वचन देती हूँ कि आपके बताये बिना मैं किसी भी पुरुष से नहीं चुदवाऊँगी।”

सुप्रिया: “अब तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि तुम्हें भी जानना चाहिए कि मुझे तुम्हारे रस में ऐसा क्या स्वाद आया कि मैं न्योछावर हो गई.”

संजना: “हाँ, पर मैं क्या करूँ ?”

सुप्रिया ने अपने पाँवों को फैला कर अपनी चूत की पंखुड़ियों को सहलाते हुए कहा, “वही जो मैं अब तक कर रही थी. मेरी चूत को चूस और चाटकर अब तुम मुझे सुख दो और जानो कि क्या जादू है इसके रस में.”

संजना: “पर मुझे तो कुछ आता ही नहीं.”

सुप्रिया: “तुम आरम्भ तो करो, कुछ मैं बताती रहूंगी, और कुछ तुम स्वयं ही सीख लोगी.”

संजना ने अपना चेहरा सुप्रिया की जांघों के बीच में डाला और सेक्स के ज्ञान का दूसरा अध्याय पढ़ना शुरू किया.

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शीला का घर:

निखिल जब वापिस पहुंचा तो देखा कि नाना और नानी दोनों गायब हैं. नितिन बड़े टीवी पर कोई शो देख रहा था.

निखिल: “नानी कहाँ हैं?”

नितिन: “सोने चली गयीं.”

निखिल: “तो हम भी चलते हैं.”

नितिन: “नहीं, आज मना किया है आने को. दोनों अकेले ही रहेंगे.”

निखिल: “यार पता होता तो मैं मौसी के ही घर रुक जाता.”

शीला और समर्थ अपने कमरे में लेटे हुए थे और आने वाले विवाह के विषय में बात कर रहे थे.

समर्थ: “सोच रहा हूँ, कल सुमति को बुला लेते हैं. कल हमारे सिवाय कोई और तो रहेगा नहीं, उसे बुला कर देखते हैं, कि विवाह में क्या आयोजन ठीक रहेगा. शोनाली और जॉय से सीधे पूछना अच्छा नहीं लगेगा.”

शीला: “ठीक है, कल बुला लूंगी। “

समर्थ: “क्या हुआ आज बच्चों को मना कर दिया आने के लिए.”

शीला: “रोज रोज की चुदाई से एक दो दिन छुट्टी भी चाहिए होती है. और हम दोनों को इस तरह लेटकर बातें किये हुए कितना समय हो गया.”

समर्थ: “सच है.”

शीला: “सुप्रिया ने संजना का भोग लगा लिया आज.”

समर्थ: “अच्छा है. चलो अब सो ही जाते हैं.”

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सुरेखा का घर:

सजल को काटो तो खून नहीं. अपनी माँ के हाथ में अपने वीर्य से सनी पैंटी देखकर उसकी सिट्टी पिट्टी गुम हो गई. उसके बचने के लिए कोई मार्ग नहीं था.

“अंदर चलो.” सुरेखा ने कठोर शब्दों में कहा.

सजल डरता हुआ कमरे में अंदर आ गया.

“बैठो” ये कहकर सुरेखा ने दरवाजा लॉक कर दिया.

उसके बाद वो टीवी को देखने लगी. उसने देख लिया की उसमें में USB नहीं लगी है.

“USB कहाँ है?”

“कौ क कौ कौन सी USB”

“मैंने पूछा कि USB कहाँ है, तो मुझे पता होगा कि कौन सी. अब बताओ कहाँ है.?”

सजल ने अपने पैंट से USB निकाल कर दे दी.

सुरेखा ने उसे टीवी में लगाकर टीवी चालू किया. सजल एकदम से सुरेखा के पांवों में लोट गया.

“मम्मी, नहीं. मुझे क्षमा कर दो. प्लीज. प्लीज़, मत देखो.”

“तो तुम्हें अपनी मम्मी की पैंटी अच्छी लगती हैं?”

सजल पांव पकडे लेटा रहा.

“बोलो?”

सजल ने सिर हिलाकर झुका लिया.

“और तुम ये माँ बेटे की चुदाई की फिल्म देखते हो और मेरी पैंटी को गन्दा करते हो?” सुरेखा को इस खेल में बहुत आनंद आ रहा था.

“मुझसे गलती हो गई. अब ऐसा नहीं करूंगा.”

अब तक सुरेखा अपने शरीर से वो झीनी नाइटी उतार चुकी थी और केवल एक लाल रंग की पैंटी में खड़ी थी. सजल उसके पांवो में पड़ा हुआ था. और ऊपर देख ही था.

“हम्म्म, तो तुम्हें क्या दंड मिलना चाहिए?”

सजल अपना सर नीचे ही किये हुए बोला , “बस मुझे क्षमा कर दो, जो दंड देना है दो, पर बस क्षमा कर दो.”

“ठीक है, ऊपर देखो, मेरी ओर.” ये कहते हुए सुरेखा ने अपने दोनों पांव फैला दिए.

सजल ने ऊपर देखा तो उसकी आंखे फट गयीं. उसके ऊपर उसकी माँ दोनों पांव फैलाये मात्र एक पैंटी में खड़ी थी. उसे उस पैंटी में कुछ गीलापन भी दिख रहा था. और उसके ऊपर माँ के दो पहाड़ जैसे मम्मे अपने पूरे सौंदर्य में तने हुए थे.

“तुम्हें मेरी पैंटी पसंद है न? आकर इसे चूसो. सावधान! जो उतारने का प्रयास भी किया!” ये कहते हुए सुरेखा बिस्तर के किनारे पैर फैलाकर बैठ गई.

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सुप्रिया का घर:

संजना अपने अनुमान के अनुसार सुप्रिया की चूत चाटने का प्रयास कर रही थी. अब एक अप्रशिक्षित और अनुभवी में अंतर तो होता ही है. ये ध्यान करते हुए कि मौसी ने क्या किया था उसका ही अनुशरण करने का प्रयास कर रही थी. परंतु उस समय वो अपने आनंद में इतनी व्याप्त थी कि उसे ठीक से कुछ याद ही नहीं था. परन्तु, वो जितना संभव हो उतने प्यार से अपने काम में लगी थी.

सुप्रिया यही सोच रही थी कि इस कच्ची कली को तो स्वयमेव सीखने में बहुत समय लगेगा. इसी कारण संजना को युक्तियाँ सुझाईं. संजना भी इस काम में आनंद पा रही थी. सुप्रिया ने अपनी चूत के कपाट खोलकर संजना को बताया कि किस प्रकार से उसे अपनी जीभ से भीतर का विश्लेषण करना है. अब संजना थी तो नयी पर जैसे ही उसने अपनी जीभ अंदर सरकाई मानो उसे ज्ञान स्वतः प्राप्त हो गया. उसने हर छिद्र, हर बिंदु को अपनी जीभ से टटोलना जब प्रारम्भ किया तो सुप्रिया के शरीर में आनंद की लहर दौड़ गई.

“हाँ, यूँ ही, बहुत अच्छा लग रहा है. उउउह व्वाआह संन्न ज न्नन्ना।”

संजना ने जब ये सुना तो उसे बहुत प्रसन्नता हुई की उसके उपक्रम से मौसी इतनी खुश है. उसने अपने प्रयास को और बढ़ा दिया. अचानक ही सुप्रिया का शरीर अकड़ गया, और संजना को अपनी जीभ पर कुछ खारे से पानी का अनुभव हुआ.

“उउउह व्वाआह संन्न ज न्नन्ना, मैं गईईई “

और संजना का पूरा मुंह सुप्रिया के रस से भर गया. सुप्रिया ने उसका सिर पकड़कर अपनी चूत में दबा लिया था इसीलिए संजना हट न पायी और उसे पूरा पानी पीना पड़ गया. पर उसे इसका स्वाद बुरा बिल्कुल भी नहीं लगा. जब सुप्रिया पूरी झड़ गई तो उसने बड़े प्यार से संजना के सिर पर हाथ फिराया और थपकी देकर संतोष व्यक्त किया. संजना ने अपना चेहरा उठाकर सुप्रिया को देखा.

“तू तो बहुत जल्दी सीख गई मेरी गुड़िया रानी. आ मौसी को एक पप्पी दे.”

संजना सुप्रिया के पास लेट गयी और दोनों एक दूसरे को चूमते हुए प्यार करते रहे. और कुछ देर यूँ ही प्यार करते हुए दोनों एक दूसरे से नंगी ही लिपटी हुईं नींद की गोद में चली गयीं.

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सुरेखा का घर:

घुटनों के बल चलकर सजल सुरेखा के पाँवों के बीच में आ गया. फिर उसने पैंटी पर अपनी नाक रगड़ते हुए एक गहरी साँस ली. सुरेखा की चूत की भीनी सुगंध उसके नथुनों में भर गई और उसे एक नशा सा हो गया. उसने ३-४ बार यही क्रिया दोहराई, जब तक उसके फेफड़े सुरेखा की मादक गंध से भर नहीं गए. फिर उसने अपना मुंह पैंटी पर लगाया जो इस समय गीली हो चुकी थी. एक बार अपना मुंह उस पर लगाकर उसने लम्बा घूंट सा लिया जिससे की उसके मुंह में सुरेखा का अमृत रस बहता चला आया. उस रस को पीते ही सजल का नियंत्रण समाप्त हो गया. वो किसी भूखे पशु के समान जोर जोर से चूस कर मानो अपना मन और पेट दोनों ही भरने का प्रयास कर रहा हो.

सुरेखा इस समय आनंद के सागर में हिलोरें ले रही थी. सुप्रिया न जाने कब से इसका आनंद ले रही है. अब उसका क्रम है, और उसने जीवन में खोये हुए सुख के हर क्षण को वापिस पाने का निर्णय लिया. उसने प्रेम से अपनी जांघों के बीच अपने बेटे को देखा. उसने एक हाथ बढाकर उसके सिर को सहलाया. उसने अब तक कठोरता दिखाई थी, परन्तु वो नहीं चाहती थी कि उसका बेटा दब्बू बन जाये. उसने खेल समाप्त करने का निर्णय किया.

“तुम चाहो तो पैंटी उतार सकते हो.” ये कहते हुए सुरेखा ने अपनी गांड उठा ली. सजल ने इसे शुभ संकेत मानकर धीरे से पैंटी को सरकाकर उतार दिया. अब उसकी माँ की सुन्दर गुलाबी चूत उसकी आँखों के समक्ष थी. इस दृश्य की चाह में उसने न जाने कितनी रातों को मुठ मारी थी.

“मैं छू कर देखूं?”

“अवश्य “

सजल ने अपने हाथ को बढ़ाते हुए सुरेखा की चूत के कपाल छुए. फिर उसे प्यार से सहलाने लगा. ऐसा करने से सुरेखा की चूत पर कामरस के मोती चमकने लगे. सजल ने अपना मुंह आगे किया और उस सुगन्धित जीवन रस को जीभ से चाट लिया. सुरेखा का शरीर काँप उठा. तो यही वो संवेदना थी जो सुप्रिया अनुभव करती होगी. उसका लाड़ला बेटा ही आज उस स्थान का अवलोकन कर रहा था जहाँ से उसने जन्म लिया था. सुरेखा से अब और संयम नहीं हुआ. उसने सजल का सिर पकड़कर अपनी चूत पर जोर से दबा लिया. सजल की तो साँस ही रुक गयी. सुरेखा ने उसके सिर को छोड़ा और खड़ा होने के लिए कहा.

सुरेखा: “अगर तुम्हें मेरी पैंटी ही चाहिए थी तो अलग बात है, पर अगर तुम्हें और कुछ भी इच्छा है, तो मैं उसे पूरी करने के लिए तत्पर हूँ. ये मैं तुम्हें इसीलिए कह रही हूँ क्योंकि तुम्हारे पापा से मुझे डेढ़ साल से छुआ भी नहीं है. और मैं चुदास से विह्वल हूँ. क्या तुम मुझे प्यार करोगे? बुझाओगे मेरी प्यास?”

सजल को मानो कुबेर का खजाना मिल गया. उसने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि आज के दिन ये चमत्कार लेकर आएगा. उसने सिर उठाकर अपनी माँ को एक प्रेमी की दृष्टि से देखा तो उसे अद्वितीय सौंदर्य की साक्षात् अप्सरा के दर्शन हुए. इस आयु में उसकी माँ का यौवन खिला हुआ था. अगर लड़कियों में सुंदरता होती है, तो उसकी माँ में एक अनूठा आकर्षण था.

सजल: “मम्मी, मेरा वश चले तो मैं संसार का आपको हर सुख देना चाहूंगा जो आपको मिलना चाहिए. आपके तन और मन दोनों को मैं अपने प्यार से ओतप्रोत कर दूंगा. आप जो भी इच्छा रखती हैं, मैं उसे अवश्य पूरा करूँगा. परन्तु, मुझे अभी कुछ आता नहीं है, बस फ़िल्में देखकर जो ज्ञान अर्जित किया है मेरा अनुभव वहीँ तक सीमित है. आप अगर इसमें मेरी शिक्षिका बनेंगी तो मैं अवश्य अच्छा शिष्य भी बनूँगा.”

सुरेखा की ऑंखें भीग गयीं. अपने पति के तिरिस्कार से व्यथित उसके मन में जीवन की एक नयी उमंग जाग गयी. वो उठकर सोफे पर जा बैठी और उसने सजल को अपने पास बैठने का संकेत किया. सजल के पास बैठते ही उसने उसके सीने पर अपना सिर रख दिया और सुबकने लगी. सजल को समझ नहीं आया कि वो क्या करे. बड़े से बड़े अनुभवी पुरुष भी स्त्री के रोने का अर्थ नहीं समझे तो ये तो एक प्रकार से नादान था.

“मम्मी, रो क्यों रही हो.”

“मैंने सोचा भी नहीं था कि मुझे कभी दोबारा प्यार मिलेगा.” ये कहते हुए उसे इस बात की ग्लानि थी.

इस बात की कि उसने अपने शरीर को अपने पिता और भांजों को समर्पित किया, न कि उससे अथाह प्रेम करने वाले पुत्र को. पर उसने एक बात का निश्चय किया। आज तक उसकी गांड कोरी थी, और ये वो अपने बेटे को ही भेंट में देगी, समय आने पर. और तब तक वो इसमें किसी भी और पुरुष का प्रवेश वर्जित ही रखेगी. उसने एक मुस्कराहट से सोचा कि उसके पिता और भांजों में जो शर्त लगी है उसकी इस कुंवारी गांड को लेकर, वो तीनों ही हार जायेंगे. ये सोचकर वो ठहठहा कर हंस पड़ी. अब सजल को फिर समझ नहीं आया कि रोते रोते उसकी माँ हंसने क्यों लगी. पर उसने मूर्ख सिद्ध होने के स्थान पर चुप रहने ही श्रेयस्कर समझा.

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शीला का घर:

हालाँकि समर्थ सो चुके थे, पर शीला को नींद नहीं आ रही थी. उसका मन अपने परिवार के बारे में चिंतित था. समर्थ ने उसे कभी भी किसी सुख से वंचित नहीं रखा. उसने समर्थ के सिर पर प्यार से हाथ चलाते हुए समर्थ के शांत चेहरे को देखकर ईश्वर का धन्यवाद किया जिसने उन्हें न केवल साथ ही रखा अपितु एक जैसी सोच भी दी. कुछ देर में उसने जब अपना हाथ हटाया तो एक हाथ ने उसकी कलाई पकड़ ली. समर्थ उसकी ओर देखकर मुस्कुरा रहे थे.

शीला: “आप सोये नहीं?”

समर्थ: “सो गया था, पर किसी खटके ने जगा दिया. देखा कि तुम सिर सहला रही हो तो सोने का स्वांग करता रहा. क्या हुआ? नींद नहीं आ रही?”

शीला: “नहीं, कुछ हुआ नहीं. बस प्रार्थना कर रही थी कि सब कुछ ऐसे ही अच्छे से चलता रहे. अब निखिल की भी बहू आ जाएगी. परिवार बढ़ने लगा है. हमें कभी बेटे की कमी नहीं लगी, पर अगर एक बेटा भी होता तो वंश आगे चलता.”

समर्थ: “सच कहूँ तो केवल बेटों से वंश चलने का मुझे बहुत औचित्य नहीं लगता. हमारी दोनों बेटियाँ हमारा ही वंश हैं, और उनके बेटे हमारा ही नाम आगे ले जायेंगे.”

शीला: “बात तो आप ठीक ही कह रहे हैं.”

समर्थ: “अब अगर तुम्हें बेटा किसी और कारण से चाहिए था तो अलग बात है. नातियों के लंड के लिए तुम्हें ३८ साल जो रुकना पड़ा था.”

शीला: “हटो, मुझसे मत बोलो.”

समर्थ: “ठीक है नहीं बोलता. पर तुम्हें नींद का इंजेक्शन लगा देता हूँ.” ये कहते हुए समर्थ ने शीला पर चढ़ाई कर दी.

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सुरेखा का घर:

सुरेखा: “सजल, मेरे लिए एक ड्रिंक बनाकर लाएगा? मुझे तुझसे कुछ और भी बात करनी है. अपने लिए चाहिए तो बियर ले ले.”

सजल को आश्चर्य हुआ क्योंकि सुरेखा कभी कभार ही ड्रिंक लेती थी.

सजल: “मम्मी, सब ठीक तो है.”

सुरेखा: “लेकर आ, तुझसे कुछ बात करनी है. सुन, बोतल साथ ही ले आना.” ये कहकर वो उठी और अपने कमरे की ओर बढ़ गई.

जब तक सजल उसकी ड्रिंक और कुछ नमकीन और अपने लिए बियर लाया तब तक सुरेखा ने वो नाइटी दोबारा ओढ़ ली थी. उसने अपनी ड्रिंक के दो घूंट लिए.

सुरेखा: “मैं तम्हारे पापा को तलाक दे रही हूँ.”

सजल भौचक्का रह गया. आज उसके लिए दिन कुछ अलग ही भूचाल ला रहा था. सुरेखा ने कुछ न बोलकर उसके हाथ में एक लिफाफा दे दिया.

“देख अपने बाप की गतिविधियाँ.” सुरेखा के शब्दों में घृणा का पुट था.

सजल ने लिफाफे के अंदर के देखा और कुछ ही चित्र देखकर उसके हाथों से लिफाफा छूटकर नीचे जा गिरा. अब पीने की बारी सजल की थी, सो उसने एक बार में ही बियर के चार पांच घूंट लिए. उसका सिर घूम रहा था.

“ये देखकर तो संजना पागल हो जाएगी, वो तो पापा को जैसे पूजती है.”

“मैं जानती हूँ, और इसीलिए मुझे इसमें तुम्हारी सहायता चाहिए. अच्छा होगा कि संजना को तुम इस बात को धीरे से बताओ. मैं नहीं चाहती कि इस कारण हम दोनों के बीच कोई मन मुटाव हो.”

सजल ने समझते हुए कहा, “ओके, मॉम. आई विल हैंडल इट। “

“अपने कपड़े उतारो “ सुरेखा ने कहा.

सजल ने अपने कपड़े उतार दिए पर अंडरवियर पहने रखा.

“ये भी निकालो. मुझे देखना है कि तुम कितने बड़े हो गए हो.”

सजल ने थोड़ा हिचकते हुए उसे भी उतार दिया और नंगा अपनी माँ के सामने खड़ा हो गया.

“बहुत अच्छा है, बहुत बड़ा और सुन्दर है, न जाने तुम्हारा ये लंड कैसे इतना बड़ा है, तुम्हारे पापा का तो इतना बड़ा था नहीं.” फिर कुछ सोचकर, “लगता है मेरे परिवार पर पड़ा है.”

सजल फिर चौंक गया.

“आपको कैसे पता?”

“मुझे और भी बहुत कुछ पता है, पर वो इस समय की चर्चा का विषय नहीं है. इधर आओ, आगे.”

सजल सुरेखा के आगे जाकर खड़ा ही गया. सुरेखा ने उसके लंड को अपने हाथ में लेकर तौला और धीरे धीरे सहलाने लगी. अब सजल उत्तेजित तो पहले ही था, आनन फानन में उसके लंड ने अपना पूरा रूप धारण कर लिया.

“हम्म, बहुत सुन्दर है.” ये कहकर सुरेखा ने अपना चेहरा आगे किया और अपनी नाक लगा कर सूंघा. “और बहुत सुगन्धित भी. स्वाद कैसा होगा?”

फिर कुछ देर यूँ ही उसे सहलाते हुए बोली, "ये जानने का तो केवल एक ही उपाय है.”

ये कहकर उसने सजल का लंड अपने मुंह में भर लिया. और फिर उसने चूसना शुरू किया. सजल तो मानो स्वर्ग में पहुँच गया. उसने कई बार इस प्रकार के सपने देखे थे, पर आज वो पूरे हो रहे थे.

सुरेखा पूरी तन्मयता से सजल के बढ़ते हुए लंड को चूस रही थी. वो उसको चाटती , फिर कुछ देर चूसती और फिर चाट लेती. साथ ही साथ उसने एक हाथ से सजल के अंडकोष भी सहला रही थी. सजल के पाँव काँप रहे थे. उसके लंड ने झटके लेने शुरू किये तो सुरेखा समझ गई कि अब सजल का पानी छूटने वाला है. पर उसने रुकने का नाम नहीं लिया. और फिर वही हुआ -- सजल ने उसके मुंह में ही अपना पानी छोड़ दिया. आज उसने पहली बार अपने हाथ के अलावा किसी दूसरे माध्यम से अपना पानी निकाला था. और वो भी अपनी ही माँ के मुंह में.

सुरेखा ने सजल के लंड का पानी पीकर उसके लंड को चाटकर साफ किया. और सोफे पर पीछे टिक कर बैठ गई. उसकी आँखों में एक संतुष्टि की चमक थी. उधर सजल भी खड़ा न रह सका और वहीँ सुरेखा के पास ही बैठ गया.

“थैंक यू, मॉम.”

“माई प्लेज़र.”

दोनों माँ बेटे बैठकर उनके सम्बन्ध के नए समीकरण के बारे में चिंतन करते हुए अपने ड्रिंक्स की चुस्कियाँ ले रहे थे.

सुरेखा: “तुम्हें नहीं लगता कि जो मैंने अभी किया उसका आभार तुम्हे भी प्रकट करना चाहिए.”

सजल: “मैं अपनी बियर पी लूँ उसके बाद. पर एक बात बताऊँ. ये मेरा वर्षों का सपना था, जो आज आपने पूरा किया है. मैं इसे कभी भी भूलूंगा नहीं.”

सुरेखा: “ऐसे प्रकरण भूलने के लिए नहीं होते. मैं भी तुम्हारा पहला स्वाद जीवन भर नहीं भूलूंगी.”

सजल की बियर जैसे ही ख़त्म हुई उसने सुरेखा के पांवों के बीच में अपना स्थान ग्रहण कर लिया.

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शीला का घर:

अगले दिन सुबह:


सुबह समर्थ की नींद देर से खुली थी. देखा तो शीला उठ चुकी थी. बाथरूम से नित्य कर्म के बाद वो बाहर निकले तो देखा कि शीला रसोई में भी नहीं है. तभी उन्होंने निखिल को नितिन के कमरे में जाते हुए देखा. वो भी सधे क़दमों से पीछे हो लिए. घर में कमरे बंद करने का स्वभाव किसी का था नहीं, तो वो बाहर जाकर अंदर का दृश्य देखने लगे. शीला इस समय नितिन के ऊपर नंगी ही उछलकूद कर रही थी. नितिन भी नंगा ही था. नितिन ने निखिल को अंदर आते देख लिया था पर उसने चुप्पी साधी हुई थी और अपने कमर उछाल कर अपनी नानी की चूत में अपने लंड को पेल रहा था.

निखिल ने भी अपना अंडरवियर उतारा और अपने लंड को थोड़ा हाथ से मसला. नितिन ने उसे आंख से संकेत किया तो उसने साथ पड़ी टेबल पर से वेसलीन उठाई और अपने लौड़े पर प्रचुर मात्रा में लगा ली. उसने फिर नितिन की ओर देखा. नितिन ने शीला की कमर को पकड़कर उसे अपने ऊपर झुका लिया और नीचे से लम्बे धक्के मरने लगा. इसके कारण शीला को अपने पीठ पीछे होती गतिविधि पर ध्यान नहीं गया. निखिल ने अपने लौड़े को शीला की गांड के छेद पर रखा और एक करारा धक्का मारा।

“गुड मॉर्निंग, नानी.”

उसका लंड शीला की मुलायम गांड को चीरता हुआ जड़ तक घुस गया. शीला के साथ ये इतना अकस्मात हुआ था कि उसे सोचने समझने का समय ही नहीं मिला. और जब होश आया तो बहुत देर हो चुकी थी. अब उसकी चूत और गांड दोनों में ही मोटे लम्बे लौड़े पिले हुए थे. पर शीला जैसी चुड़क्कड़ बहुत जल्दी ही संभल गई.

“ऐसे भी कोई गुड मॉर्निंग करता है? पर अच्छा लगा तेरा ये ढंग गुड मॉर्निंग का. अब दोनों अच्छे से चोदो मुझे, कल रात तुम्हारा कुछ हुआ नहीं तो लग जाओ काम पर.”

नितिन और निखिल ने अपनी लय से नानी की लेनी शुरू कर दी. नितिन ने नाना की ओर देखा जो इस पूरे वृत्तांत को देख रहे थे. नितिन ने नानी की ओर संकेत करके अपने मुंह से चूसने का इशारा किया. देखकर समर्थ ने भी अपना पजामा उतारा और अपने लंड को सहलाते हुए शीला के सामने खड़े हो गए.

“सुना है आज तुम सबको गुड मॉर्निंग कर रही हो.”

“अब आपने सुना है तो सही ही होगा. आइये, आपकी भी सेवा कर दूँ.” ये कहकर शीला ने समर्थ के लंड में लेकर उस पर धावा बोल दिया.

कुछ ही देर में तीनों ने अपने पानी को निर्धारित छेदों में छोड़ दिया, और फिर अलग हो गए. शीला बिस्तर पर लेट कर अपने छेदों से रस निकाल कर चेहरे पर मल रही थी.

“दिन प्रारम्भ करने का इससे अच्छा ढंग कोई हो नहीं सकता.” शीला ने कहा. “चलो अब नाश्ते की तैयारी भी करनी है.”

“नानी आप खाना बनाने के लिए किसी को क्यों नहीं रख लेतीं?”

“और अपनी स्वंत्रता खो दूँ? झाड़ू पोंछे बर्तन वाली ही बहुत हैं ताक झांक के लिए.” ये कहकर शीला बाथरूम में घुसी और सफाई करने के बाद किचन में चली गई.

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सुप्रिया का घर:

अगले दिन सुबह:


संजना जब सुबह उठी तो उसे एक सुखद अनुभूति का आभास हुआ. उसकी चूत में कुछ मीठा मीठा सा स्पंदन हो रहा था. उसने अपना हाथ नीचे किया तो वो किसी के बालों में उलझ गया.

“गुड मॉर्निंग, प्रेटी गर्ल.”

“मौसी! सुबह सुबह! वहां गन्दा होगा!”

“गन्दा तो हमेशा ही रहता है मेरी लाड़ो, इसीलिए तो साफ कर रही हूँ.”

ये कहकर सुप्रिया ने संजना के पांव फैलाये और अपने नाश्ते के पहले के बुर के मधु का रसास्वादन करने में जुट गई. संजना ने भी इसमें मौसी का साथ दिया और उनका सिर जोर से अपनी बुर पर दबा लिया. अब इतनी सुबह तो वैसे भी दबाव रहता है, तो संजना की बुर से एक तीव्र धारा छूटकर सुप्रिया के मुंह में समा गई. संजना जो इस खेल की नयी खिलाडी थी, उसे ये पता नहीं चला कि ये उसका पानी था या मूत्र. पर उसने सुप्रिया मौसी को देखा जो अब अपना चेहरा उठाकर उसे प्यार भरी दृष्टि से देख रही थीं तो उसने यही समझा कि वो अवश्य ही झड़ी है. पर सुप्रिया के अगले व्यक्तव्य ने उसके होश उड़ा दिए.

“तेरा हर रस बहुत मीठा है. मुझे अगर सुबह ये मिल जाता है तो जैसे एक अलग ही शक्ति आ जाती है.”

“मौसी, ये क्या था? मेरी सूसू तो नहीं पी ली आपने?”

“नहीं तो सुबह सवेरे तेरी चूत पीने का फायदा ही क्या होता?”

“आप… सूसू भी पीती हो?”

“सबकी नहीं. बस तेरी मम्मी की पीती थी और एक और स्त्री है उसकी जब तब अभी भी पी लेती हूँ. और कभी भी किसी की भी नहीं.”

संजना ये सुनकर सन्न रह गई. सुप्रिया उठकर बाथरूम में चली गई और संजना भी उठी और कपड़े पहनने लगी. वो रात रुकने के लिए कुछ भी नहीं लायी थी, अपना टूथ ब्रश भी नहीं. जब सुप्रिया बाहर निकली तो उसने घर जाने की अनुमति मांगी और अपनी कार से घर की ओर चल पड़ी.

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सुरेखा का घर:

पिछली रात


सजल अब अपने आत्मविश्वास को वापिस पा चुका था. अब उसे विश्वास था कि सुरेखा उससे खिन्न नहीं है. सुरेखा के पांवों के बीच बैठकर सजल ने उसके दोनों पांव फैला दिए. नाइटी को ऊपर करते हुए उसने सामने खुली बहुमूल्य निधि की ओर देख रहा था. पिछली बार के व्यवधान को याद करते हुए उसने अपने हाथ को हल्की ओस की बूंदों से भीगी चूत की पंखुड़ियों को छुआ. सुरेखा सिहर उठी. अपनी उँगलियों से उन्हें सहलाते हुए सजल अपने घुटनों के बल बैठ गया. फिर उसने अपनी ऊँगली हटाई और अपनी जीभ से उस सतह को चाटने लगा. सुरेखा आनंद से विभूत हो गई. उसने सजल के सिर को जोर से पकड़ कर अपनी चूत में दबा दिया. पर इस बार सजल चौकन्ना था. उसने अपने हाथ से सुरेखा के हाथ को हटा दिया.

“मम्मी, दम घुटता है.”

“ओह! सॉरी बेटा।”

अब सजल को इसके आगे क्या करना है इसका कोई प्रत्यक्ष अनुभव तो था नहीं. वही था जो उसने ब्लू फिल्मों में देखा था. और उनकी ही सीख को मानते हुए उसने सुरेखा की चूत को ऊपर से नीचे तक पूरी तन्मयता से चाटना शुरू किया. अपने मन में उन फिल्मों को रिवाइंड करते हुए उसने अपनी एक ऊँगली अंदर डाली और आगे पीछे करने लगा. सुरेखा की चूत पानी बहाने लगी और ऊँगली की यात्रा सरल हो गई. कुछ ही पलों में सजल की दो उँगलियाँ सुरेखा की थाह नाप रही थीं.

और इस सबके साथ सजल ने अपनी जीभ का अभियान चालू ही रखा था. सुरेखा की सिसकियों और कराहों से सजल को ये तो समझ आ ही चुका था कि वो सही राह पर है. उसने अपने परिश्रम को और तेज कर दिया. और अचानक सुरेखा का बांध टूट गया और उसकी चूत ने एक लम्बी धार में अपना पानी छोड़ दिया. सजल का चेहरा पूरा भीग गया. पर उसने हटने का प्रयास भी नहीं किया, बल्कि अपने काम में एकजुट होकर लगा रहा. पूरा झड़ जाने के बाद सुरेखा सोफे पर ही लम्बी साँसें लेते हुए ढेर हो गई. उसने प्यार से सजल के सिर पर हाथ फेर दिया. सजल उठा और सोफे पर ही उसके साथ बैठ गया.

थोड़ी देर दोनों माँ बेटे शांत ही बैठे रहे. सजल कुछ सोच रहा था.

सजल: “मैं ये नहीं सोच पा रहा कि संजना को पापा के बारे में बताएँगे कैसे?”

सुरेखा: “इसी कारण मैं चाहती हूँ कि तुम ये करो. सोचकर देखो. कल ही बताने की जल्दी मत करो. पर थोड़ी पृष्ठभूमि बना लो, फिर बताना.”

सजल: “ये भी सही है. पर पापा ऐसा कर सकते हैं विश्वास नहीं होता.”

सुरेखा: “मुझे नहीं लगता कि ये अधिक पुरानी बात है. और दूसरे क्या तुम ये विश्वास कर सकते थे कि हम दोनों यहाँ इस स्थिति में होंगे?”

सजल ने कुछ उत्तर नहीं दिया. उसे समझ आ गया था कि माँ क्या कहना चाह रही थी. उसने उठकर अपने लिए एक बियर लाई और सुरेखा का भी एक और पेग बना दिया. धीरे पीने के कारण वो नशे में नहीं थे बल्कि एक हल्की सी खुमारी थी.

सजल: “अब आगे क्या करना है, क्या चुदाई करें?”

सजल का आत्मविश्वास अब लौट चुका था.

“मैं भी यही सोच रही थी.”

ये कहकर सुरेखा ने अपनी ड्रिंक ख़त्म की और गाउन उतारते हुए बिस्तर की और बढ़ गई. सजल को कुछ समय लगा अपनी बियर पीने में, फिर वो भी बिस्तर पर पहुँच गया. सुरेखा ने रिमोट उठाया और USB की फिल्म चालू कर दी. इस बार सजल ने कुछ नहीं कहा, बस जाकर सुरेखा के बगल में बैठ गया.

“कब से देख रहे हो ऐसी फ़िल्में?”

“अभी एक दो ही देखी है.”

“हम्म्म”

तभी वहां परस्पर मौखिक सहवास का दृश्य आ जाता है. सुरेखा सजल की और देखकर, “ये करते हैं थोड़ा”

ये कहकर वो सजल को लिटा देती है और अपनी चूत को सजल के मुंह पर रखते हुए सजल का लंड अपने मुंह में ले लेती है. दोनों इस स्थिति में कोई ४-५ मिनट रहते है. जब सुरेखा को लगता है कि उसकी चूत और सजल का लंड पर्याप्त मात्रा में गीले हो चुके हैं तो ऊपर से हट जाती है, और लेटते हुए अपने पैर चौड़े कर देती है. सजल ने उनके बीच में अब अपना स्थान और अपने लंड को चूत पर रखते एक प्यार भरा धक्का दिया. लंड गप्प की ध्वनि के साथ सुरेखा की चूत में प्रवेश कर गया.

“अब धक्के मार, डरना नहीं और न ही रुकना जब तक तेरा हो न जाये.”

हालाँकि सजल का किसी चूत में ये पहला प्रवेश था, पर जैसे खाना मुंह में ही जाता है, उसी प्रकार सजल ने भी एक स्वाभाविक और प्राकृतिक लय में अपने लंड को अंदर से बाहर चलाना शुरू कर दिया. सुरेखा भी ये देख रही थी कि सजल की अपनी बुद्धि और क्षमता कितनी है. वो उसे पूरा सहयोग और प्रोत्साहन तो दे रही थी पर किसी भी प्रकार का सञ्चालन या निर्देशन नहीं कर रही थी. उसे ये भी भांपना था कि सजल को आगे कितनी और किस प्रकार की ट्रेनिंग आवश्यक होगी.

अब जैसा कि किसी के भी साथ पहली बार होता ही, सजल को रुकने में असमर्थता हुई. और वो अचानक ही सुरेखा की चूत में ही झड़ गया. इस हादसे से वो बहुत ही व्याकुल हो गया. उसका चेहरा झुक गया और उसे लगा कि वो अपनी माँ को संतुष्ट करने में असफल रहा था. सुरेखा ने उसकी इस भावना को ताड़ लिया और वो सजल को अपनी बाँहों में लेकर चूमने लगी.

सुरेखा: "अगर तुम्हें लग रहा है कि शीघ्र झड़ने के कारण तुम असफल हो गए और मैं संतुष्ट नहीं हुई, तो तुम्हारी ये सोच गलत है. पहली बात तो ये, कि आरम्भ में कई बार ऐसा होना संभव होता है. वो इसीलिए कि तुम्हें अपने शरीर की लय और क्षमता का अंदाजा नहीं है. ये सब ताल बनने में समय लगता है. अपने साथी के ऊपर कुछ निर्भर होता है. अपने झड़ने को कैसे रोकना और खींचना संभव है ये भी तुम्हें नहीं पता. जानते हो मैंने तुम्हे इस बार कुछ भी क्यों नहीं कहा?”

सजल ने नकारात्मक भाव में सिर हिलाया.

“इसीलिए, कि ये तुम्हारी पहली चुदाई थी, जो तुम्हें अपने ही तरीके से करनी थी. अब मान लो मेरे स्थान पर तुम्हारी नई पत्नी होती तो क्या तुम्हें तब भी ऐसा ही लगता?”

“नहीं, पर मॉम मूवी में तो वो….”

“बेटा, वो फिल्म है, उसमें दस बार में एक सीन होता है. उनके और अपने बीच में अंतर समझो. अब तुम चिंता करना छोड़ो. मैं तुम्हे सिखाऊंगी और संभव हुआ तो एक और शिक्षिका भी है मेरी पहचान की, जो तुम्हें इस कला में महारथी बना देगी. अब हंसो.”

सजल हंसने लगा और उसके मन से एक बोझ उतर गया.

“चलो अब तुम्हारी पहली चुदाई के लिए चियर्स करते हैं.”

सुरेखा ने अपनी नयी ड्रिंक बनाई और सजल ने एक और बियर ली. कुछ देर सामान्य बातें करने के बाद दोनों एक दूसरे की बाँहों में ही सो गए.

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क्रमशः

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अध्याय २२: चौथा घर - मिशेल और रिचर्ड डिसूज़ा ३

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एंजिल का घर :

एंजिल ने डेविड के लंड को पूरा मन लगाकर चूमा, चाटा और चूसा. वो डेविड के लंड के आकार से बहुत प्रभावित हुई थी. उसने और भी डेविड की आयु के लड़कों से अपनी वासना मिटाई थी, पर जो लंड डेविड के पास था उनके सामने वे क्षीण थे. उसकी बहती हुई चूत की मादक गंध कमरे में छा चुकी थी और डेविड को भी इसका आभास था. उसे लगा कि अधिक देर करने पर ऐसा न हो कि मुख्य व्यंजन से उसे हाथ धोना पड़े. उसे घर भी लौटना था. उसने एंजिल के सिर पर एक थप्पी दी तो एंजिल ने सिर उठाकर उसे देखा.

डेविड: “आपकी लीकेज की महक से लग रहा है कि उसका कोई प्रबंध करना होगा. आइये, पहले मैं उसका निकट से परिक्षण कर लूँ.”

एंजिल को समझ तो आ गया कि डेविड क्या चाहता है, पर उसकी आयु के अन्य लड़कों के साथ किये हुए सहवास के कारण उसे कुछ शक था. वो खड़ी हुई तो डेविड ने उसे बिस्तर पर लिटा दिया और उसके दोनों पाँवों को चौड़ा करते हुए अपने मुंह को उसकी अविरल बहती चूत पर रख दिया. एंजिल का शरीर कांप उठा. इसका यही अर्थ था कि डेविड अन्य लड़कों के समान नहीं था. अपितु वो स्त्री की प्यास हर पराक्रम से मिटाने में सक्षम था. एंजिल ने निर्णय किया कि वो डेविड को वो सुख भी देगी जिसे वो अन्य लड़कों को नकारती रही थी. इस विचार से ही उसके शरीर में झुरझुरी उठी और उसकी चूत ने ढेर सारा रस डेविड के मुंह में उढेल दिया.

डेविड चूत चूसने का रसिया था और उसे इसकी शिक्षा इतनी अनुभवी महिलाओं से मिली थी कि आज वो इसमें पारंगत हो चुका था. उसे सिखाने में उसकी अपनी माँ का अपूर्व योगदान था, और कुछ शैली का भी. डेविड ने अपने सारे अनुभव का रस निचोड़कर एंजिल की चूत को कुछ इस प्रकार से चूसा कि एंजिल की चूत का बहाव अनवरत रूप से चलायमान रहा. डेविड ने उस रस को अमृत की भांति पिया और फिर उसने उसने अपनी उँगलियों से चूत को खोलकर रस से भीगते हुए अपने लंड पर भी लगाया. अगले चरण के लिए इसका बहुत महत्व था.

जब डेविड को लगा कि अब एंजिल बहुत झड़ चुकी है और अगर और देर की तो चुदाई में वो ढिलाई करेगी तो वो खड़ा हुआ और अपने लंड को चूत के ऊपर घुमाने लगा. इस प्रक्रिया से बहता हुए रस से उसका लंड सुचारु रूप से गीला हो गया. एंजिल की ऑंखें अभी बंद ही थीं और वो अपने उल्लास में खोई हुई थी. उसे ये आभास नहीं था कि उसकी चूत को सहलाने के लिए उँगलियों का नहीं बल्कि लंड का प्रयोग किया जा रहा है. पर एक झटके में उसकी ये तंद्रा टूटी और उसकी ऑंखें बाहर निकल पड़ीं.

उसे अपनी चूत में किसी तेज धार वाली वस्तु के अंदर जाने का अनुभव हुआ. उसकी ऑंखें जब नीचे की ओर गयीं तो उसने जाना कि डेविड ने अपने लंड से उसकी चूत को चीर दिया था. अभी वो इस ज्ञान से अपने आप को अवगत ही करा रही थी कि डेविड ने एक और शक्तिशाली धक्का मारा और उसके लंड ने चूत पर अपनी जीत का झंडा गाढ़ दिया. एंजिल हतप्रभ थी. उसकी फैली हुई आँखें और होठों का निशब्द संचालन उसे लगे किसी सदमे का आभास दे रहे थे.

डेविड जानता था कि समय बहुमूल्य है, और अगर उसने देर की तो एंजिल झटपटाकर उसे हटाने का प्रयास न करने लगे. उसने हल्की गति से एंजिल की चुदाई आरम्भ कर दी. लंड के इस प्रकार गतिशील होने से एंजिल को भी कुछ आनंद आने लगा. वो छुईमुई कली तो थी नहीं, उसे केवल इस आकस्मक हमले से ही कुछ आश्चर्य हुआ था. लंड के चलने से उसकी चूत ने अपनी प्रसन्नता जताई और एंजिल ने अपनी ऑंखें दोबारा बंद कर लीं.

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मिशेल के घर:

एक दूसरे के साथ आत्मीय समय बिताने के बाद मिशेल और ईव अधिक निकटता अनुभव कर रही थीं. दोनों उठकर रसोई में गयीं और खाना बनाने में जुट गयीं. अब आठ लोगों का खाना जो बनाना था. मिशेल को लगा कि कुछ और सामान की आवश्यकता पड़ेगी. तो उसने ईव से बाहर चलने के लिए पूछा तो ईव मान गयी. कुछ ही देर में दोनों अपनी कार से एक बड़े स्टोर में गयीं और आवश्यक वस्तुओं को लेकर लौट आयीं। कुछ देर आराम करने के पश्चात् वे रसोई में जुट गयीं.

मिशेल: “डेविड की आदत है कि अगर मैं रसोई में रहूं और वो घर लौटे तो मुझे वो रसोई में ही चोद देता है.”

ईव खिलखिला पड़ी. “मार्क भी ऐसा ही कुछ करता है. मुझे बहुत सम्भल कर रहना पड़ता है उससे. पर अब जब वो यहाँ रहने वाला है, मुझे उसकी याद बहुत सताएगी.” ये कहते हुए ईव की आँखों में आंसू आ गए और गला भर उठा.

मिशेल: “हे ईव, ऐसा क्यों सोच रही हो. वो घर में ही रहने वाला है. और अब तुम जब मन हो यहाँ आ सकती हो. इस बहाने तुम्हारा भी चक्कर लगता रहेगा. मेरे विचार से जैसन किसी नए व्यापार में जाने वाला है. क्यों नहीं तुम उसका प्रबंधन अपने हाथ में ले लेतीं। इस प्रकार से तुम्हारा आना जाना लगा रहेगा और मार्क को भी दूरी का अनुभव कम होगा. और यहां तुम्हें चुदाई के लिए भी तीन तीन लौड़े मिल जायेंगे.”

ईव ये सुनकर खिल उठी. “ये सही है. मैं आज ही जैसन से बात करुँगी.”

मिशेल: “अगर चाहो तो ये प्रस्ताव मैं दे सकती हूँ, तुम उसे आगे ले जाना.”

ईव मिशेल के गले लग गयी. “यु आर ब्रिलियंट!”

अब ईव इस तेजी से काम करने लगी कि मिशेल को आश्चर्य हुआ. कुछ ही देर मैं सारा खाना बन चुका था और अभी अधिक समय भी नहीं हुआ था. दोनों ने कुछ देर सोने का विचार किया और मिशेल के कमरे में चली गयीं.

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एंजिल का घर :

डेविड के लंड के धक्कों और उसकी जांघों की एंजिल की जांघों के थापों के संगीत से एंजिल के मन के तार हिल रहे थे. अभी तक के अन्य लड़कों की तुलना में न केवल डेविड आकार में बड़ा था बल्कि वो अपने लंड का भरपूर उपयोग करना भी जानता था. उसे अपनी बेटी की विनती याद आ रही थी जो उसे किसी तगड़े लड़के से चुदवाने के लिए न जाने कब से मना रही थी. पर आज उसका मनोरथ स्वयं ही पूरा हो गया था. डेविड की चुदाई के ढंग ने उसके मन मस्तिष्क के तार झनझना दिए थे. आनंद से उसकी सीत्कारें निकल रही थीं, परन्तु अपार्टमेंट होने के कारण वो अधिक हल्ला नहीं मचा सकती थी, हालाँकि उसका मन इस समय चीख चीख कर अपने आनंद को बताने के लिए उत्सुक था.

डेविड भी अपनी पूरी शक्ति और अनुभव के साथ एंजिल की चूत में अपने लंड के प्रहार कर रहा था. एंजिल के शरीर में अचानक अकड़न हुई और उसके कूल्हे बिना लय के थिरकने लगे. काँपते शरीर ने अपनी हार मानते हुए चूत से एक लम्बी धार निकाली और एंजिल शिथिल पड़ गई. डेविड भी अब अधिक रुकने के लिए बाध्य नहीं था. उसे ऐसा लग रहा था कि एक राउंड और होगा और तभी उसे घर लौटने का अवसर मिलेगा. इस बार उसकी आँखों के सामने एंजिल की कसी हुई गांड नाच रही थी, पर उसे विश्वास नहीं था कि वो गांड मरवाने के लिए मानेगी. अपने लंड के रस से एंजिल की चूत को सरोबार करने के बाद डेविड उठा और बाथरूम चला गया. एंजिल उसी स्थिति में अपने पैर फैलाये हुए होंठों पर मुस्कान लिए हुए ऑंखें बंद करके लेटी रही.

शिरीन मार्क को लेकर एक अपार्टमेंट में गई और उसने एक घर को अपने पर्स में रखी चाबी से खोला. मार्क को कुछ आश्चर्य हुआ पर वो चुप ही रहा. अंदर जाकर शिरीन उसके गले लग गई.

शिरीन: “मैं तुम्हें कुछ बताना चाहती हूँ. ये मेरा ही घर है. मैं और मेरी मॉम यहां रहते हैं. मेरे पापा हमे छोड़कर किसी और के साथ घर बसा चुके हैं. मॉम बहुत अकेलापन अनुभव करती हैं. ”

मार्क उसकी बात ध्यान से सुन रहा था.

शिरीन: “मैंने मॉम से कई बार कहा है कि किसी दमदार लड़के से चुदवा लो, पर वो हमेशा ऐसे लड़कों को चुनती हैं कि उन्हें संतुष्टि नहीं मिलती. मैं तुमसे आज ये प्रार्थना करती हूँ कि आज तुम प्लीज मेरी मॉम को चोदो उसके बाद तुम जब चाहोगे मैं तुम्हारे लिए उपलब्ध रहूँगी.”

मार्क ने दीवार पर लगी फोटो से ये अनुमान तो लगा लिया था कि शिरीन की माँ कैसी है. और उसे इस बात में कोई विशेष आपत्ति भी नहीं थी.

मार्क: “पर तुम्हें कैसे पता कि मैं उन लड़कों जैसा नहीं हूँ?”

शिरीन: “क्योंकि तुम डेविड के कसिन हो और वो…” उसे लगा कि वो पहले ही अधिक बोल चुकी है.

मार्क मुस्कुराकर बोला, “ठीक है, पर याद रहे, मैं तुम्हें जब चोदना चाहूँगा तुम्हें आना होगा.”

शिरीन उसके गले से लिपट गई. “प्रॉमिस. तुम ऐसा करो कपड़े यहीं निकाल लो, मैं मॉम को सरप्राइज दूंगी.”

मार्क मान गया और उसके कपड़े उतारकर एक ओर समेट कर रख दिए. शिरीन उसके बलिष्ठ शरीर और तगड़े लंड को देखकर खुश हो गई. उसने ऊँगली के संकेत से मार्क को एक कमरे की ओर बुलाया. शिरीन ने दरवाजा खोला तो देखा कि उसकी माँ बिस्तर पर नंगी पड़ी है. उसने कमरे में अन्य कुछ और नहीं देखा और ये मान लिया कि एंजिल संभवतः आत्मसंतुष्टि करके सो गई है. शिरीन ने मार्क को अंदर बुलाया और कमरा बंद कर लिया. पर जो शिरीन ने अपने उत्साह में नहीं देखा था वो मार्क ने देख लिया। वहाँ पहले ही किसी आदमी के वस्त्र पड़े थे. वो सोच ही रहा था कि किस चक्कर में पड़ गया कि बाथरूम का दरवाजा खुला और वो लड़का नंगा ही बाहर आया.

शिरीन और मार्क के मुंह से एक साथ और अनायास ही निकल पड़ा, “डेविड! तुम यहाँ !”

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मिशेल का घर:

दो बजे होंगे जब शैली ने तमतमाते हुए घर में प्रवेश किया. मिशेल और ईव खाना बनाकर सोई हुई थीं पर शैली के कारण उनकी नींद खुल गई और दोनों कमरे से बाहर निकल आयीं।

मिशेल: “क्या हुआ? इतनी गुस्से में क्यों ही?”

शैली की आँखों से अंगार बरस रहे थे, उसने ईव को देखा और बोली, “मामी, आपका लड़का बहुत असभ्य है.”

ईव सकपका गई, “क्या हुआ? बताओ तो कुछ.”

शैली, “मेरी दो क्लास थीं तो मैंने उसे शिरीन के साथ छोड़ दिया था कॉलेज दिखने के लिए. पर आपके साहबजादे शिरीन को लेकर गायब हो गए और फोन भी नहीं उठाया. शिरीन की बच्ची से तो मैं निपट लूँगी, पर आप भी मार्क को समझा देना, कि ऐसा व्यव्हार मुझे बिलकुल पसंद नहीं है.”

ईव: “ठीक है, शैली. आएगा तो उसे समझा दूंगी. अब शांत हो जाओ. वैसे डेविड कहाँ है, उसने तो कहा था कि एक बजे आ जायेगा, पर अब दो से भी अधिक समय हो चुका है.”

अचानक ही शैली का गुस्सा छू मंतर हो गया. उसने इस पूरे प्रकरण में ये तो सोचा ही नहीं था कि डेविड कहाँ है. और कहीं शिरीन मार्क को अपने ही घर तो नहीं ले गई. ऐसा हुआ तो डेविड ने जो उसे वचन दिया था वो टूट गया होगा.

“ओह, शिट!” शैली के मुंह से निकला, “मॉम अपने डेविड से बात की क्या?”

मिशेल: “नहीं तो, मैं और तुम्हारी मामी एक दूसरे को समझने में व्यस्त थे.” मिशेल के स्वर ने बता दिया कि वो कैसे व्यस्त थे.

शैली ने उन दोनों को देखा और मुस्कुरा दी, “गुड फॉर यू बोथ. मुझे भी मामी को समझना था, पर अभी पहले डेविड को ढूँढना होगा. मैं आती हूँ.”

ये कहकर शैली चली गई और ईव मिशेल का मुंह ताकने लगी. “ये क्या हुआ?”

मिशेल: “पक्का तो नहीं कह सकती, पर मेरा अनुमान है.”

ईव ने जिज्ञासा से उसे देखा, “क्या?”

मिशेल ने साँस भरी, “शायद डेविड शिरीन की माँ के पास गया था. शिरीन को अपने घर से दूर रखने का काम शैली का था. पर अब शैली को लग रहा है कि शिरीन मार्क को उसके ही घर ले गई है. और अगर ये सच निकला तो डेविड शैली को अच्छी सीख देगा. पर ये केवल अनुमान है. सच तो उन सबके आने पर ही पता चलेगा.”

“अब हम क्या करें?”

“अब क्या कर सकते हैं, जो होना था हो चुका। आशा करो कि शिरीन मार्क को कहीं और ले गयी हो.”

“पर आप डेविड को ऐसे जाने देती हो?”

“मुझे कहाँ कोई कुछ बताता है, सब कुछ बाद में ही पता चलता है. पर मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है. डेविड का जवान खून है, तो उसे रोकना सम्भव नहीं है.”

“तो अगर मार्क यहाँ रहा तो वो भी यही सब करेगा.”

“मेरी प्यारी ननद, तुम भी तो चार आदमियों से चुदवाना चाह रही हो. उसे मजा करने दो, जब तक कि ये उसकी पढाई में अड़चन न बने.”

ईव ने कुछ सोचते हुए हामी भरी. अब उन दोनों को इस रहस्य के खुलने की प्रतीक्षा करनी थी कि आखिर मार्क और डेविड थे कहाँ.

शैली ने अपने कमरे में जाकर डेविड को फ़ोन मिलाया.

“हैलो, डेविड?”

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एंजिल का घर:

शिरीन और मार्क की आवाज़ सुनकर एंजिल ने अपनी ऑंखें खोल दीं और देखा कि अब कमरे में दो और लोग भी थे. एक तो उसकी बेटी ही थी और एक दूसरा लड़का था, और वो भी नंगा. लड़के के लंड को देखकर एंजिल के मन की धड़कन बढ़ गई. डेविड ने उसकी भरपूर चुदाई की थी, और ये लड़का भी डेविड से किसी भी ओर से कम नहीं लग रहा था. क्या वो इतने भाग्यशाली है कि एक ही दिन में दो दो जवान तगड़े लौंड़ों से चुद सके? उसकी आँखों में वासना की भूख जाग उठी.

एंजिल: “ये कौन है?”

शिरीन जो अभी भी सकते में थी, “ये डेविड का कसिन है, साउथ अफ्रीका से आया है, मैं मैं सोच रही थी कि ये तुम्हारे साथ…”

एंजिल समझ गई कि शिरीन इस लड़के को क्यों लाई थी. उसे अपनी बेटी पर बहुत प्यार आया.

एंजिल: “मैं तो आज डेविड को बुला चुकी थी, पर मार्क को भी सूखा भेजना ठीक नहीं होगा. क्यों?”

शिरीन: “पर पर…”

मार्क की आँखों में एंजिल के नंगे शरीर को देखकर चमक आ गई थी.

मार्क: “शिरीन ने मुझे बोला था कि अगर मैं आपको संतुष्ट कर पाया तो वो भी मेरे साथ चुदाई करेगी. और आपको देखकर मैं बिना आपको चोदे लौटने वाला भी नहीं.”

डेविड हंसने लगा, “आंटीजी, क्या मैंने आपको संतुष्ट किया है.”

एंजिल: “बिलकुल.”

डेविड: “तो शिरीन, मेरे विचार से आंटीजी के कथन और तुम्हारे मार्क को दिए वचन के अनुसार मैं तुम्हें चोद सकता हूँ.”

मार्क: “और मैं आंटी को खुश करने का प्रयास करूंगा.”

शिरीन को कुछ समझ नहीं पड़ रहा था. एक समस्या ये भी थी कि उनके घर में एक ही शयनकक्ष था. माँ बेटी साथ ही सोती थीं. शिरीन के पिता के जाने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि वो इससे बड़ा घर ले सकते. पर इस समस्या का हल भी एंजिल ने किसी अच्छी माँ के समान तुरंत ही निकाल लिया.

एंजिल: “शिरीन, ऐसा नहीं कि हमने एक दूसरे को चुदते हुए नहीं देखा है. अंतर यही है कि पहले एक ही लड़का होता था. तो आज हम एक साथ चुदवाती हैं इन दोनों भाइयों से, बड़ा आनंद आएगा.”

शिरीन ने कुछ सोचा और फिर अपने कपड़े निकालने आरम्भ कर दिए, “आप सही कह रही हो, वैसे भी हमारे बीच में कुछ छुपा तो है नहीं.”

डेविड शिरीन की ओर बढ़ा तो एंजिल उठी, “मैं बाथरूम से सफाई करके आती हूँ. आज सच में बड़ा अच्छा दिन है. दो दो लंड से चुदने का अवसर मिला है, मेरी तो क्रिसमस जल्दी आ गयी.”

डेविड ने शिरीन को बाँहों में लिया और उसे चूमने लगा. एक हाथ से वो शिरीन की चूत को मसल रहा था. शिरीन उसके इस हमले से सिहर उठी और उसका एक हाथ अनायास ही डेविड के तने लंड को सहलाने लगा. एंजिल बाहर निकली और उसके शरीर की मनोहर छटा ने मार्क को अचम्भित कर दिया. एंजिल ने आगे बढ़कर मार्क को पकड़ा और उसे चूमने लगी. कुछ ही पलों में माँ बेटी एक जैसे अपनी चूत को सहलाने और लंड मसलने में जुट गए.

एंजिल ने पहल की और मार्क को बिस्तर की ओर ले गई. बिस्तर पर उसे लिटाकर उसके लंड को चूसने लगी. मार्क आनंद से झूम गया. उसकी मन की इच्छा पूरी जो होने थी. डेविड शिरीन को भली भांति जानते हुए भी कभी उससे शारीरिक संबंध में नहीं बनाया था. दोनों को दूरी का कारण नहीं पता था और दोनों के मन में इसके लिए खेद था कि उन्होंने इतने वर्ष यूँ ही व्यर्थ कर दिए थे. एक दूसरे में समाने को आतुर एक दूसरे के शरीर में समाने की चेष्टा कर रहे थे. शिरीन से अब रहा नहीं जा रहा था, उसने डेविड की आँखों में देखा और उसे संकेत किया तो डेविड उसे लेकर बिस्तर की ओर बढ़ गया.

बिस्तर बहुत बड़ा तो नहीं था, पर शिरीन ने अपने शरीर को ऐसे बिछाया कि वो उपयुक्त लगने लगा. डेविड उसकी चूत में झुक गया और उसे चाटने में व्यस्त हो गया. शिरीन ने अपने साथ में अपनी माँ को मार्क के लंड को चूसते हुए देखा तो उसे कुछ ईर्ष्या हुई, पर डेविड ने उसकी चूत में वो संवेदनाएं जगायीं कि वो अपने सुख में खो गयी. हो सकता है कि उसे मार्क से भी चुदने का अवसर मिल ही जाये. डेविड ने किसी विशेषज्ञ के समान उसकी चूत हर कोने और रोम को अपने होंठों और जीभ से चाट कर उसे जल्दी ही अपने चरम पर लेकर झड़ा दिया.

रस से भीगे हुए चेहरे को डेविड ने उठाकर शिरीन की ओर देखा तो उसकी आँखों में प्यार और वासना की मिली जुली कसक दिखी. शिरीन ने मुस्कुराकर डेविड को देखा और फिर उसे खड़ा होने का संकेत किया. इस बार उसने डेविड को लिटाया और उसके लंड को चूसने लगी. वहीं पास में एंजिल ने मार्क के लंड को उपयुक्त रूप से चूस कर उसका स्वाद मन में बसा लिया था और अब समय था असली चुदाई का. उसने मार्क को उसी स्थान पर लेटे रहने दिया और अपनी दोनों टाँगे उसके दोनों ओर करते हुए अपनी बहती प्यासी चूत को मार्क के लंड पर रखा और उस पर बैठती गई. पूरा लंड अंदर लेने के बाद वो कुछ देर अपने अंदर घुसे हुए लंड का अनुभव संजोती रही फिर धीरे से उसके ऊपर उठने बैठने लगी.

शिरीन डेविड के लंड को किसी लॉलीपॉप के समान चूस रही थी, पर ये विदित था कि उसे इसका कोई विशेष ज्ञान नहीं था. पर डेविड आज उसे रोकने वाला नहीं था. उसने निर्णय किया कि अगली बार वो शिरीन को इसके बारे में समझायेगा. डेविड के फोन की घंटी बजी तो उसने टेबल पर देखा जहां उसका फोन रखा था. उसने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया और शिरीन के मुंह में अपने लंड को कुछ कुछ बढ़ाने लगा. फिर उसने सोचा कि ये बाद में भी किया सकता है. उसने शिरीन को संकेत किया कि वो अब हट जाये. शिरीन जब हटी तो डेविड ने फोन अपने पास ही लेकर रख लिया। उसने ये नहीं देखा कि किसने कॉल किया था. फोन पास में रखकर उसने शिरीन को लिटाया और उसकी चूत पर लंड लगाते हुए बड़े संयम से उसकी चूत में अपना लंड उतारने लगा.

शिरीन की ऑंखें बंद थीं और वो डेविड के लंड को उसकी चूत को भेदने के सुख की अनुभूति में खोई हुई थी. उसके चेहरे पर एक स्वप्निल मुस्कान थी. तभी डेविड का फोन फिर बज उठा. देखा तो शैली थी.

उसने फोन उठाया, “हैलो।”

शिरीन ने आंख खोली तो डेविड ने उसे चुप रहने का संकेत किया. शिरीन ने सिर हिलाकर ऑंखें बंद कर लीं।

शैली: “डेविड, तुम कहाँ हो?”

डेविड: “जहाँ मैं बताया था.”

शैली: “तुमने शिरीन को तो नहीं देखा?”

डेविड: “रुको, मैं कॉल करता हूँ.”

फिर डेविड ने वीडियो कॉल लगाया. शैली ने जब फोन उठाया तो डेविड ने फ्रंट कैमरा ऑन किया. शैली को शिरीन का चेहरा दिखाई दिया. फोन चलता रखते हुए डेविड ने धक्के लगाए तो शैली को समझ आ गया कि डेविड शिरीन को चोद रहा है. मजा लेने के लिए डेविड ने फोन घुमाकर एंजिल की ओर किया जहाँ मार्क और एंजिल चुदाई कर रहे थे. इसके बाद उसने फोन काटा और मूक कर दिया. इस पूरे प्रकरण से अन्य सभी अनिभिज्ञ थे. शैली अब कुछ निश्चिन्त हो गई. ये पक्का था कि डेविड उससे गुस्सा तो नहीं रहेगा. डेविड नीचे लेटी शिरीन को अब हल्के धक्कों से चोदने लगा.

उसका ध्यान शिरीन के मासूम चेहरे पर छाए हुए आनंद पर था. शिरीन और उसकी माँ उसके पिता के जाने के बाद जिस स्थिति से जूझ रहे थे, उसमे भी शिरीन ने अपना भोलापन बचाकर रखा था. वो केवल अपनी माँ को खुश रखने के लिए अन्य लड़कों से चुदवाती थी, पर ये विदित हो गया था कि वो चुदाई में निपुण नहीं है. डेविड उसे इसीलिए बहुत ही प्यार से चोद रहा था जिससे वो इस चुदाई को सदैव याद रखे.

उधर एंजिल के मार्क के लंड पर कूदने की गति शिथिल पड़ चुकी थी. मार्क ने इसे समझा और कम स्थान होने के पश्चात भी किसी प्रकार से एंजिल को पलट कर नीचे कर दिया और उसके ऊपर चढ़ कर चोदने लगा. एंजिल की आत्मा तृप्त हो रही थी. मार्क ने अपनी चुदाई की गति बढ़ा दी और चूँकि डेविड ने पहले ही एंजिल की चूत को कुछ ढीला कर दिया था, तो मार्क को अधिक परिश्रम करना पड़ रहा था. पर वो अपनी पहली शुद्ध भारतीय चूत का भरपूर आनंद लेना चाहता था.

उसके धक्कों से एंजिल का शरीर कांप उठता और बिस्तर भी हिल रहा था. डेविड के तो धक्के इतने प्रेम भरे थे कि उसका अनुभव भी नहीं हो रहा था. एंजिल के मुंह से अब सीत्कारें और घुटी हुई चीखें निकल रही थीं और अब उसकी चूत से रस की धार छूट रही थीं. मार्क के लंड छप छप की ध्वनि के साथ उसकी बहती हुई चूत में चप्पू चला रहा था.

“उह, उह , उहहहह “ ये शिरीन की आवाज़ थी जिसका शरीर अकड़ रहा था और सम्भवतः वो अपने चरम बिंदु को स्पर्श कर रही थी.

डेविड ने अब अपनी गति कुछ बढ़ा दी जिससे कि शिरीन अपने आनंद के शिखर से नीचे न उतर पाए. वो इस सुंदर भोली लड़की, जो उसकी बहन की घनिष्ठ मित्र थी, जीवन का वो सुख देना चाहता था जिसे वो सदा के लिए याद रखे. परन्तु डेविड को इस विषय में अधिक चिंता की आवश्यकता नहीं थी. शिरीन का लरजता शरीर इस अनुभव को सदा के लिए आत्मसात करने में व्यस्त था. शिरीन का मन मस्तिष्क इन क्षणों को कभी भी नहीं भूलने वाला था. सम्भवतः भविष्य में उसे डेविड की भांति और भी चोदने वाले मिलेंगे, पर ये इस आनंद की पराकाष्ठा का उसका पहला अनुभव था.

मार्क की गति अब इतनी तीव्र हो गयी थी कि एंजिल उसके लंड के लिए एक खिलौना मात्र बन गई थी. वो इस पूरी चुदाई में अब तक न जाने कितनी ही बार झड़ चुकी थी, हर बार वो यही समझती कि बस अब और नहीं, पर उसका शरीर उसे चुदाई की लहरों में ऊपर नीचे ले जा रहा था. ऊंचाई से वो जिस तेजी से नीचे आती थी, मार्क की चुदाई उसे उससे भी अधिक तेजी से फिर लहर के ऊपर ले जाती. अगर डेविड से चुदवा कर उसे आनंद मिला था तो मार्क ने उसे परमानंद की अनुभूति करा दी थी. अपनी चूत में मार्क के फूलते हुए लंड का आभास होने से उसे पता चल गया कि अब मार्क भी झड़ने के निकट है.

“मुंह में, मेरे मुंह में झड़ना, प्लीज़” उसने अनुरोध किया.

मार्क ने अपने लंड को बाहर निकाला तो एंजिल को अपनी चूत में एक खालीपन सा लगा. मार्क ने तेजी से उसके मुंह पर अपना लंड रखा और जैसे ही एंजिल ने मुंह खोलकर उसे अंदर लिया मार्क के लंड से रस की पट्टियाँ निकलीं जिसने उसके गले तक उसे सींच दिया. एंजिल इतने अधिक कामरस के लिए तैयार नहीं थी, उसे सारा रस पीना ही पड़ा. उसे मार्क का स्वाद बहुत अच्छा लगा और वो मार्क के लंड के बाहर निकलने के बाद भी उसे अपने मुंह में संजोये रही.

डेविड ने भी देखा कि शिरीन अब निढाल हो चुकी थी और वो भी झड़ने वाला था. पर उसने अधिक कुछ न सोचते हुए जैसे ही वो झड़ने लगा अपने लंड को बाहर निकाला और शिरीन के सपाट पेट के ऊपर ही अपने रस की वर्षा कर दी. लंड बाहर निकने पर शिरीन ने भी ऑंखें खोलीं और उसकी आँखों में डेविड के प्रति प्रेम स्पष्ट दिख रहा था. डेविड ने उसे मुस्कुरा कर देखा. शिरीन ने अपने हाथ अपने पेट पर बह रहे रस में डाले और उसे लेकर चाटने लगी.

“बाहर क्यों छोड़ा, मेरे मुंह में क्यों नहीं?” उसने डेविड से प्रश्न किया.

“मुझे पता नहीं था कि तुम्हे अच्छा लगेगा या नहीं. अगर तुम्हें अच्छा लगा है, तो अगली बार अवश्य इसका स्वाद तुम्हें चखाऊंगा।”

“अब मुझे चोदने में इतने दिन तो नहीं लगाओगे? सच में तुमसे चुदने के बाद अब मेरा इसके बिना मन नहीं लगेगा.”

“नहीं, अब हम जल्दी मिला करेंगे.”

फिर डेविड ने समय देखा तो चौंक गया. उन्हें बहुत देर हो चुकी थी. उसने मार्क से कहा कि अब उन्हें जल्दी ही निकलना होगा.

एंजिल ने इस बार अपनी बात रखी, “डेविड, मार्क. तुम दोनों ने मुझे अथाह सुख दिया है. डेविड, मैंने सोचा था कि आज मैं तुमसे अपनी गांड भी मरवाऊँगी। पर मुझे लगता है कि उसके लिए मुझे कुछ और दिन प्रतीक्षा करनी होगी. हाँ, और मार्क, ये प्रस्ताव तुम्हारे लिए भी है, पर डेविड के बाद.”

डेविड और मार्क एक दूसरे को देखकर मुस्कुराये.

डेविड: “आंटीजी, आप जब बुलाओगी, हम आपकी सेवा के लिए प्रस्तुत हो जायेंगे. बस एक शर्त है, शिरीन भी साथ होनी चाहिए.”

एंजिल: “मैं इसका ध्यान रखूंगी.”

मार्क और डेविड ने जल्दी से अपने कपड़े पहने और माँ बेटी से अनुमति लेकर अपने घर के लिए निकल गए.

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मिशेल का घर:

डेविड से बात करने के बाद शैली दुविधा में थी. एक ओर वो खुश थी कि शिरीन को डेविड जैसे तगड़े लंड से चुदने का सौभाग्य मिला था, वहीं उसे डेविड द्वारा दिए जाने वाले उपहार के न मिलने का दुःख भी था. पर उसने सोचा कि डेविड उसे उपहार दे ही देगा. आज या कल. ये सोचकर वो मुस्कुराती हुई बैठक में लौट आयी.

“डेविड का पता लगा? मार्क का?” मिशेल ने अधीरता से पूछा.

“हाँ दोनों साथ ही हैं.”

“मतलब..”

“शिरीन मार्क को उसके घर ही ले गई थी. पर डेविड वहां पहले से ही था. उसने मुझे वीडियो कॉल में दिखाया कि वो शिरीन को चोद रहा था और मार्क उसकी मॉम एंजिल को.”

“ओह गॉड! शॉकिंग!” ईव के मुंह से निकला.

“क्यों मामी हम सब भी तो एक दूसरे के साथ…”

“ओह, इट इस ओके.” मिशेल ने बात संभाली.

शैली ने अपनी मामी के गदराये शरीर को देखते हुए कहा, “मामी, मुझे भी आपके साथ मॉम के जैसे कुछ समय बिताना है.”

ईव: “शैली, मुझे भी ख़ुशी होगी. पर आज देर हो चुकी है, इसे हम कल के लिए स्थगित कर देते हैं. वैसे भी कुछ ही देर में सब लौटने ही वाले हैं, और तुमने अभी तक खाना भी नहीं खाया है.”

शैली, “हाँ, मुझे भूख तो बहुत लगी है. मैं खाना खा ही लेती हूँ.”

खाने के बाद शैली अपनी मॉम की बगल में बैठ गई.

“तो आज रात का क्या कार्यक्रम है?”

“वही जो कल था, पर आज जल्दी शुरू करेंगे.”

“गुड़, मुझे भी मार्क की परीक्षा लेनी है. और पापा लगता है आज मामी को नहीं छोड़ने वाले.”

“आई होप सो.” ईव ने कहा तो मिशेल हंस पड़ी.

मिशेल, “लगता है आज मुझे फिर जैसन ही मिलने वाला है. डेविड का मन ऐलिस पर आया हुआ है.”

शैली: “मॉम, अपने अभी तक मामा से गांड नहीं मरवाई है, आज उसे भी कर लो.”

“ऊह , ये सच कहा तुमने. वैसे शैली जैसन की भी तुम्हारी गांड के लिए कुछ ऐसी ही इच्छा है.”

“वो भी पूरी हो जाएगी मॉम, अभी तो दो ही दिन हुए हैं.”

तीनों हंस पड़ीं और अन्य बातों में व्यस्त हो गयीं. कुछ देर बाद डेविड और मार्क घर लौट आये. डेविड ने देखा कि शैली उसे कुछ कहना चाह रही थी. दोनों उठकर बाहर गए.

“डेविड, तुम शिरीन के बारे में क्या सोचते हो.”

“मुझे वो सच्ची और अच्छी लगी. पर उनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. क्या हम कुछ कर सकते हैं.”

“देखते हैं. क्या तुम उसे अपनी गर्लफ्रेंड बनाना चाहोगे.”

“मुझे तो ये ठीक लगता है. यस , मुझे उसे अपनी गर्लफ्रेंड बनाना अच्छा लगेगा.”

“पता है, वो तुम्हे कई दिनों से चाहती है, पर कुछ भी कहने में झिझक रही थी.”

“कोई बात नहीं, अब मैं बात करूंगा. और शैली, तुम्हारा पुरुस्कार तुम्हें मिलेगा.”

“थैंक्स, ब्रो।”

ये कहकर दोनों अंदर आ गए. सोफे पर बैठकर जैसन और रिचर्ड व्हिस्की पी रहे थे. ईव ने मिशेल की ओर देखा. मिशेल ने समझते हुए बात आरम्भ की.

मिशेल: “जैसन, मैं ये सोच रही थी, कि अगर तुम नया व्यापार आरम्भ कर ही रहे हो तो क्यों नहीं तुम इसका उत्तरादित्व ईव को दे देते. ऐसे मैं वो हर दो महीने में आ सकेगी. मार्क के यहाँ रहने के कारण उसे भी घर की इतनी याद नहीं सताएगी.”

जैसन ने रिचर्ड को देखा, “मुझे तो ये ठीक लगता है. मेरे पास वैसे भी इतना काम है कि मेरा इतना लगातार आना सम्भव नहीं है. अगर ईव ये चाहती है, तो मुझे स्वीकार है.”

ईव: “हाँ, मैं भी इसके लिए स्वीकृति देती हूँ.”

रिचर्ड: “तो फिर इस नयी कम्पनी के पंजीकरण में ईव का ही नाम देते हैं.”

शैली, “मामी, आप जो इतने दिनों के बीच आएंगी, आपको नहीं लगता कि आपके पास कोई विश्वस्त होना चाहिए जो आपकी अनुपस्थिति में आपको सब बातों की सूचना देता रहे?”

ईव: “हाँ, ये भी ठीक है, हमें किसी को देखना होगा.”

शैली ने डेविड की ओर देखकर कहा, “और अगर मैं कहूं कि मैं किसी को जानती हूँ, तो?”

मिशेल बोल पड़ी: “एंजिल ! तुम एंजिल की बात कर रही हो न?”

शैली: “यस, मॉम !”

मिशेल: “ईव, शैली सही कह रही है. एंजिल इसकी पक्की सहेली की माँ है और बहुत अच्छी स्त्री है. और मेरे विचार से वो बहुत निश्छल स्त्री है. शैली, मेरे विचार से भी एंजिल इस कार्य के लिए उपयुक्त रहेगी.”

ईव: “ठीक है, पंजीकरण के बाद हम उससे मिलेंगे.”

मार्क जो अब तक चुप था बोला : “मॉम दिस इस ग्रेट. यू कैन कीप कमिंग हियर. वाओ.”

सभी लोग इस निर्णय से संतुष्ट थे. डेविड ने शैली को देखकर मूक स्वर में धन्यवाद कहा. शैली ने उसे आंख मारी। फिर ड्रिंक्स का क्रम चला, जिसमें रिचर्ड और जैसन व्हिस्की पीते रहे, स्त्रियों ने वाइन ली और लड़कों ने बियर. दो राउंड के बाद खाने का समय हो गया. खाने के बाद ये चर्चा हुई कि सीधे क्रीड़ांगन में जाना है या कुछ देर और बैठना है. फिर ये निश्चित हुआ कि नीचे ही पूल के पास बैठकर बातें करेंगे. घर को ठीक से बंद करने के बाद मिशेल ने चतुर प्रबंधक के जैसे चारों बच्चों को काम पर लगाया. किसी को तौलिये, किसी को अल्पाहार तो किसी को व्हिस्की, वाइन और बियर नीचे ले जाने का आदेश दिया. चारों ने ये सारे काम शीघ्रता से निपटा दिए. घर का एक बार निरीक्षण करने के बाद सभी क्रीड़ांगन में चले गए.

वहाँ पर मार्क और डेविड ने पूल की कुर्सियों को गोलाई में लगा कर बीच में एक टेबल लगाई हुई थी. मिशेल ने दोनों को इस उत्तम व्यवस्था के लिए प्रशंसा दी. सब बैठ कर इतने दिनों में क्या कुछ घटित हुआ इस पर बातें करते रहे. हालाँकि सभी पी रहे थे पर कोई भी इतनी जल्दी नहीं पी रहा था कि नशे में धुत हो जाये. ईव के परिवार ने उनके देश में चल रही सामाजिक और राजनीतिक घटनाओं के बारे में भी बताया. डेविड और शैली को इसमें कोई खास रूचि नहीं थी, इसीलिए वो अपने कपड़े निकाल कर तैराकी करने लगे. जब तक वार्ड परिवार की बात समाप्त हुई डेविड और शैली बाहर निकलकर तौलिये में ही लिपटे हुए बैठ गए.

मार्क की आगे की पढ़ाई की भी बातें चलीं. ऐलिस भी सम्भवतः अगले वर्ष यहीं पढ़ने के लिए आ जाये. इससे ईव का यहाँ निरंतर आने का एक और कारण जुड़ गया. पर उन्हें ये भी लगा कि जैसन अब अधिक अकेला पड़ जायेगा. जैसन ने इस बात पर कोई विशेष टिप्पणी नहीं की. उसके विचार में ये जीवन का हिस्सा थे. और ईव यहां वर्ष में अधिकतम साठ दिन ही रहने वाली थी जिसमें से केवल तीस दिन ही वो अकेली आएगी, अन्य तीस दिनों में जैसन भी रहेगा.

मार्क और ऐलिस भी उठकर तैरने के लिए चले गए. डेविड और शैली अंदर कमरे को ठीक करने में लग गए थे.

अवसर देखकर ईव ने कहा, “मिशेल और मैं कल रिकी और अन्य तीनों को यहां आमंत्रित करना चाहते हैं. दूसरा ये भी है कि दो दिन बाद क्रिसमस का क्या प्रबंध किया जाये. और तीसरा, ये कि रिकी और साथियों को वो क्रिसमस में यहां नहीं बुलाना चाहती, पर अगर उनके मनोरंजन का कोई उपयुक्त प्रबंध हो सके तो अच्छा रहेगा.”

रिचर्ड बोला, “कल वो चारों आ सकते हैं. और मुझे कोई आपत्ति नहीं. पर केवल इसी स्थान का प्रयोग करना. अपने किसी भी शयनकक्ष में नहीं खेलना. क्रिसमस के लिए भी मैंने कुछ प्रबंध किया है, कल सुबह बताऊँगा, एक बार पुष्टि हो जाये. और मैं आकार से पूछूंगा उसकी सेक्रेटरी निशा के बारे में उसने कहा था कि वो किसी भी समय मनोरंजन के लिए उपलब्ध रहती है. उसकी कोई और भी सहेली हो तो अच्छा होगा.”

“क्या आकार से अभी पूछ सकते हो.” मिशेल ने जिद की.

“ठीक है, मैं ऊपर जाकर फोन पर पूछता हूँ.” रिचर्ड उठते हुए बोला।

रिचर्ड चला गया और मिशेल और ईव कपड़े उतारकर तरणताल में कूद गयीं. जैसन ने देखा कि वो अकेला ही है तो उसने भी तुरंत कपड़े फेंके और वो भी अंदर कूद गया. रिचर्ड जब तक आया तो वे तीनों तैराकी कर रहे थे. रिचर्ड ने भी उनके साथ तैरने के लिए कूद पड़ा. कुछ देर तैरने के बाद सब एक ओर रुक कर साँस संयत करने लगे. तब रिचर्ड ने बताया कि आकार ने विश्वास दिलाया है कि वो निशा से कह देगा और निशा पहले भी इस प्रकार के आयोजन कर चुकी है, क्योंकि उसके भी विदेशी अथिति आते रहते हैं. इससे आश्वस्त होकर मिशेल और ईव ने अपनी प्रसन्नता दिखाई और अपने पति को चूम लिया. गहरे चुंबनों के बीच रिचर्ड और जैसन के हाथ अपनी पत्नियों के नितम्बों को दबाने लगे. पर जैसे ही जैसन ने ईव की चूत को छूने का प्रयत्न किया तो वो छिटक गयी.

“जैसन! तुम जानते हो आज रिचर्ड मुझे चोदेगा न कि तुम! प्लीज़”

“ओके बेबी, तो फिर देर किस बात की. मुझे भी अपनी बहन की एक बार और चुदाई करने का मन है.”

मिशेल और ईव ने अपने स्थान परिवर्तिति किये और मिशेल जैसन की बाँहों में झूम गयी और उसे चूमने लगी. वहीं ईव ने रिचर्ड को चूमते हुए उसकी बाँहों में स्वयं को छोड़ दिया. चूमते हुए जीजा साले ने अपनी साथी स्त्री को उठाकर ताल के कोने पर बैठाया और उनकी जाँघे फैलाकर उनकी चूत का रस पीने लगे. ईव और मिशेल की किलकारियां सुनकर डेविड, शैली, मार्क और ऐलिस कमरे से निकले और देखा कि उनके अभिवाहक अपने खेल में तल्लीन हैं. चारों ने एक दूसरे को देखा और लगभग दौड़कर कमरे में घुस गए और एक बिस्तर पर ढेर हो गए.

ऐलिस और शैली ने लौंड़ों को अपने मुंहे में लेकर चूसने में देर नहीं की. उन्हें पहले लगता था कि सब साथ ही रहेंगे कल जैसे, और इसीलिए वे रुके हुए थे. पर अब इसका कोई अर्थ नहीं था. डेविड और मार्क के लंड पहले से ही फटने को आतुर थे. हालाँकि दिन में चुदाई की थी,पर यही जवान होने का लाभ है कि लंड चुदाई के लिए कभी झुकता नहीं.

“लैट अस 69” मार्क ने सुझाव दिया. और पल भर में ही आसन बदले और इस बार डेविड ऐलिस की चूत में मुंह डालकर चूसने लगा और ऐलिस उसका लंड. यही स्थिति मार्क और शैली की भी थी.

लड़कियों को अपनी चूत में चल रही जीभों से भी उतना ही आनंद मिल रहा था जितना उन्हें लंड चूसने में मिल रहा था. दोनों का अपना अलग सुख था और इस समय वो इन दोनों में ही लीन थीं. लड़कों को भी चूत चाटने का बहुत शौक था और इसमें उन्हें उतना ही आनंद मिल रहा था जितना लंड चुसवाने में. उनके मोटे लंड पर चलती हुई मलमली जीभ और मुंह के अंदर की गर्मी, चूत या गांड का तो नहीं परन्तु एक अन्य आनंद का स्त्रोत थी.

ईव और मिशेल की चूत से छूटता हुआ रस केवल रिचर्ड और जैसन के मुंह में ही नहीं गिर रहा था, बल्कि उसका एक अच्छा हिस्सा ताल के जल में भी अपना रास्ता बना रहा था. पर इससे कोई व्यथित नहीं था. जिस रस को पीना सम्भव था उसमे नहाने में कोई समस्या ही नहीं थी. अब तक ईव और मिशेल अपनी टाँगे ताल में छोड़कर किनारे पर लेट चुकी थीं और उनका शरीर अपनी चूत में चल रही जीभ की गतिविधि से छटपटा रहा था. रिचर्ड अब ईव को चोदने के लिए उतावला था. उसने ही पहल करते हुए अपने चेहरे को ईव की चूत से हटाया.

“हमें अब अंदर चलना चाहिए.” जैसन ने ये सुनकर मिशेल की चूत में से मुंह निकाला और ताल के बाहर उछाल मारी। रिचर्ड भी ताल के बाहर आया और उसने ईव का हाथ पकड़ा और कमरे की ओर बढ़ा.

“लगता है बच्चे पहले ही बाजी मर चुके हैं.” ईव ने कमरे के अंदर चल रहे रास को देखकर कहा.

“हमारी प्रतीक्षा में थक गए होंगे.”

कमरे में जाने पर चारों बच्चों ने अंदर आते अपने माता पिता को देखा पर कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं दी. ईव ने एक बिस्तर चुना और उसपर लेटकर अपनी पैर फैलाये और अपनी उँगलियों से चूत की पंखुड़ियों को अलग करते हुए रिचर्ड को आमंत्रण दिया,“कम,फक मी नाउ.”

रिचर्ड वैसे भी रुकने वाला तो था नहीं उसने अपने लंड का निशाना साधा और ईव की रसीली चूत में एक ही बार में जड़ तक अपने लंड को पेल दिया.

“येह, देट इस द वे टू फक मी.” ईव ने सीत्कारी लेते हुए कहा. “नाउ, डोंट स्टॉप, कीप फकिंग मी हार्ड एंड फ़ास्ट.”

रिचर्ड भी ऐसे ही चुदाई के लिए लालायित था और उसने अपने लंड के प्रबल प्रहारों से ईव की चूत को पेलना आरम्भ कर दिया. ईव की चीखों से अन्य सभी कुछ देर के लिए व्याकुल हुए, पर फिर अपने काम पर लग गए.

“हे सिस, हाउ डू यू वांट टू फक?” जैसन ने मिशेल से पूछा.

“मेरी गांड में, पर पहले मेरी चूत से अपने लंड को गीला कर लो. तुमसे गांड मरवाये हुए वर्षों हो गए.” मिशेल बोली।

“हाँ, इतने सालों के बाद भी मुझे तुम्हारी गांड मारने वाले दिन आज भी याद आते हैं.” जैसन ने कहा.

इस बात पर ऐलिस ने डेविड के लंड से मुंह हटाकर अपने पिता को देखा, “डैड, आप हर बार यही बोलते हो. मुझे भी और मॉम को भी. इस डायलॉग को थोड़ा बदलो अब.”

जैसन: “बिलकुल नहीं, जो सच है वही तो कहता हूँ.” जैसन अपने लंड को मिशेल की चूत में डालते हुए बोला। “मुझे तुम्हारी गांड मारने वाले दिन आज भी याद आते हैं.”

“ओफ्फोह, डैड, आप भी!” कहकर ऐलिस ने डेविड से कहा, “डेविड, ब्रो। टाइम टू फक मी।”

ये कहकर ऐलिस ने अपने आसन को बदलते हुए डेविड के छत को ताकते लंड के दोनों ओर पांव रखे और उसके लंड पर चूत लगाकर बैठती चली गई. जब उसने पूरे लंड को अंदर कर लिया तो ठहरी और डेविड को देखकर बोली, “वाओ, यू हैव ए नाइस बिग फैट कॉक. लवली.”

डेविड: “थैंक्स सिस, मुझे ख़ुशी हुई कि तुम्हें पसंद आया.”

ऐलिस अब उसके लंड पर उछलकूद करने लगी.

अब शैली ही थी जिसकी चुदाई अभी भी नहीं हुई थी और वो इस कमी को पूरा करने के लिए उत्सुक थी. उसने मार्क के लंड को चूसना बंद किया और अपनी मामी के समान बिस्तर पर पैर फैलाये और मार्क को चोदने का निमंत्रण दिया. मार्क भी अब पूरी तरह चुदाई के ही मूड में था तो उसने भी अपने लंड को शैली की कमसिन चूत पर रखा और बड़े प्रेम के साथ धीरे धीरे पूरे लंड को शैली की गहराई में धकेल दिया. शैली की ऑंखें बंद थीं, पर उसके होंठ पर एक मुस्कुराहट थी. मार्क को उसपर बड़ा प्यार आया और उसने झुककर शैली के होंठ चूम लिए. शैली ने ऑंखें खोलीं और मार्क की आँखों में झाँका. और फिर होंठ मिलकर दोनों चुम्बन लेने लगे. मार्क उसकी बहुत हल्की गति से चुदाई कर रहा था.

“थोड़ा तेज करो न, प्लीज.” शैली ने मार्क से कहा तो मार्क ने गति बढ़ा दी परन्तु ये अभी भी मध्यम ही थी. शैली को इसमें आनंद मिल रहा था और उसने भी अपने कूल्हे उचका कर मार्क के लंड को अंदर लेने में उसकी सहायता की.

मिशेल की चूत के रस से पर्याप्त रूप से अपने लंड को सेकने और रस से भिगा लेने के बाद जैसन ने मिशेल को घोड़ी के आसन में आने का सुझाव दिया. मिशेल तो न जाने कब से इस समय की प्रतीक्षा में थी. वो तुरंत ही पलटी और घोड़ी बनकर, अपनी गांड को हिलाया और फिर ऊपर की ओर किया. अपने सिर को नीचे तकिये पर रखा. मिशेल का सुडौल शरीर इस आसन में बहुत ही आकर्षक लग रहा था. जैसन ने मिशेल की चूत में अपनी तीन उँगलियाँ डालीं और उन्हें एक एक करके उसने मिशेल की गांड में डाला. इससे मिशेल की गांड में भी कुछ नमी बन गई जो जैसन को उसकी गांड मारने के लिए आवश्यक थी.

“सिस, इतने वर्षों बाद मैं फिर तुम्हारी गांड में घुस रहा हूँ.”

“वेलकम इन माई बैक होल, डियर ब्रदर.” मिशेल ने फिर गांड मटकाई।

जैसन ने उसके नितम्बों को थामा और फिर दाएं हाथ के सहयोग से मिशेल की गांड में अपने लंड का सुपाड़ा अंदर कर दिया. मिशेल थोड़ा कसमसाई, पर उसने अपनी गांड उछाली और जैसन को संकेत किया कि वो आगे बढ़े.

“शी लाइक्स इट हार्ड एंड फ़ास्ट, सो फक हर गुड.” रिचर्ड ने उसे मिशेल की रूचि से पुनः अवगत कराया.

जैसन ने रिचर्ड की बात पर अपने लंड के बाकी हिस्से को एक अच्छे तगड़े धक्के के साथ मिशेल की तंग गांड में अंदर तक पेल दिया.

“आई लाइक इट, ब्रो। आई लव इट. नाउ फक माई आस एंड मेक मी हैप्पी.”

“ओके, सिस डियर, एस यू से.” जैसन ने गांड में अपने लंड से चुदाई आरम्भ करते हुए कुछ ही देर में द्रुत गति प्राप्त कर ली.

ऐलिस अब डेविड के लौड़े पर कूदते हुए थक सी गई थी, तो डेविड ने उसको पतली कमर में हाथ डाला और पलट गया. अब ऐलिस उसके नीचे थी और डेविड उसके ऊपर. ऐलिस की उछलकूद से डेविड को ये पता था कि ऐलिस भी तेज चुदाई की ही इच्छा रखती थी, और उसने उसे भी देने का निर्णय लिया. उसके लंड की लम्बी शक्तिशाली थापों से ऐलिस की चूत द्रवित हो गई. उसकी हल्की चीखें निकल रही थीं पर डेविड पर तो अब जैसे भूत स्वर था. वो बिना रुके ऐलिस को चोदे जा रहा था. ऐलिस की आनंदातिरेक चीखें कमरे में गूंज रही थीं. पर ऐसा नहीं था कि उसकी ही ध्वनि से कमरा हिल रहा था.

उसकी माँ ईव की भी इस समय तीव्र और गहरी चुदाई हो रही थी और रिचर्ड अपने पूरे सामर्थ्य से उसे चोद रहा था. माँ बेटी की किलकारियां, सिसकारियां और चीखें जैसे लयबद्ध रूप में एक नए संगीत को जन्म दे रही थीं. मिशेल अनाव्यशक रूप से शांत थी और वो जैसन से अपनी गांड मरवाते हुए केवल अपनी कमर उछाल कर जैसन के लंड को जितना सम्भव हो उतना अपनी गांड में समाने का प्रयत्न कर रही थी. जैसन भी उसकी इस ताल में ताल मिलकर उसकी गांड की गहराइयों तक अपने लंड के हमले तेज कर रहा था. सबसे शांत और आनंद में इस समय शैली थी. मार्क और उसकी चुदाई उसी मंथर गति से चल रही थी. दोनों जैसे किसी जल्दी में नहीं थे और उनकी चुदाई प्रेमालाप अधिक लग रही थी.

मिशेल की संकरी तंग गांड का ही प्रभाव था कि जैसन से अब रुका नहीं जा रहा था. उसने मिशेल को बताया कि वो झड़ने के निकट है, और वो क्या चाहती है. मिशेल ने उसे गांड में ही पानी छोड़ने के लिए कहा. अब जैसन को और संयम की आवश्यकता नहीं थी. उसके शरीर ने अकड़कर अपना रस मिशेल की गांड में छोड़ दिया. मिशेल ने अपनी गांड सिकोड़ते हुए जैसन के लंड को जैसे चूस डाला और उसकी हर बून्द को अपने अंदर आत्मसात कर लिया. ऐलिस की चूत अब और झड़ने के लायक नहीं बची थी, और डेविड ने भी अपने लंड की तीव्र धक्कों में और बढ़ोत्तरी करते हुए उसकी चूत को अपने पानी से सींच डाला. उसने आगे झुककर ऐलिस के होंठों पर अपने होंठ रखे और दोनों एक दूसरे के साथ झड़ते हुए चूमने लगे.

ऐलिस: “देट वास ए गुड फक, ब्रो। आई लव्ड इट.”

डेविड ने उसे फिर चूमा,”इट वास रिअली ग्रेट, सिस.”

इसके बाद डेविड हटकर बैठ गया और अन्य जोड़ों को देखा. जैसन अपने लंड को उसकी माँ की गांड से बाहर निकाल रहा था. निकलते ही उसकी माँ की गांड में से सफेद तरल पदार्थ बहने लगा. डेविड का मन हुआ कि वो अपनी माँ की गांड में अपना लंड पेल दे. पर अपने लंड को देखा तो उसे आभास हुआ कि अभी सम्भव नहीं है. उसके पिता भी अब कुछ डगमगा रहे थे और मामी भी किंचित ठंडी पड़ रही थी. रिचर्ड ने कुछ ही पलों में एक चिंगाड के साथ अपने लंड को ईव की चूत में अंदर पेल कर उसे अपने पानी से भर दिया. डेविड को ये दृश्य भी बहुत मनोहर लगा और वो अपने कल मामी की चुदाई के क्षणों को याद करने लगा.

मार्क और शैली के प्रेम मिलन को देखकर उसे अपनी बहन के ऊपर स्वयं भी प्रेम आया. मार्क अब रुक गया था, उनकी गति और सहजता से ये पता भी नहीं चला था कि उसकी चुदाई समाप्त हो चुकी है. मार्क ने जब अपने लंड को बाहर निकाला तभी डेविड को पता लगा. उसे प्रसन्नता हुई कि मार्क ने शैली को इतने प्यार से संतुष्ट किया. पुरुष अब एक ओर बैठ चुके थे. महिलाएं लेटी थीं पर वे भी एक एक करके उठीं और दूसरी ओर जा बैठीं. बैठते ही मिशेल की गांड से एक श्वेत धक्का गिरा, पर उसने अपनी गांड पर हाथ फैलाकर शेष बचे रस को अंदर सोख लिया.

रिचर्ड: ‘ड्रिंक!”

ये सुनकर मार्क और डेविड उछले और सबके लिए ड्रिंक का प्रबंध करने चले गए.

ईव: “दिस वेकेशन इस गोइँग टू बी ग्रेट फन.”

रिचर्ड: “कुछ ठहरो, और कल मेरे क्रिसमस के प्रबंध को भी देख लो.”

सबने तालियां बजायीं और इतने में डेविड और मार्क ड्रिंक्स लेकर आ गए.

“ड्रिंक फॉर टुनाइट। रात अभी बाकी है.!”

सबने चियर्स किया और फिर चुदाई के अगले चरण के लिए विचारमंथन करने लगे.

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.......क्रमशः

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अध्याय २३: पाँचवा घर - शोनाली और जॉय चटर्जी ३

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शोनाली का घर:

आज चटर्जी परिवार में बहुत अधिक हलचल थी. सभी अत्यंत व्यस्त थे और जल्दी में भी. शोनाली को दिंची क्लब जाना था, कल के आयोजन की तैयारी हेतु. सुमति को शीला ने घर बुलाया था, संभवतः शादी के बारे में कुछ बात करने के लिए. सागरिका और पारुल को सुप्रिया ने शॉपिंग के लिए आमंत्रित किया था. इस बार उसकी छोटी बहन सुरेखा भी साथ रहने वाली थी. सागरिका सुरेखा से पहली बार मिल रही थी. सुरेखा की बेटी संजना के आने की भी सम्भावना थी.

पार्थ को कुछ आर्थिक निर्णय लेने थे. अगले सप्ताह उन्होंने एक बॉलीवुड अभिनेत्री का एक शो रखा था. उसे ये देखना था कि उनकी फीस कैसे दी जाएगी. हालाँकि उन्होंने सभी सदस्यों की राय ली थी और उन्होंने इस शो की लिए अलग से धनराशि के लिए सहमति दी थी. पर ये राशि पूरी फीस से कम थी और आज उसे अग्रिम राशि भेजनी भी थी. उसने शाम को मामा से सलाह लेने पर विचार किया.

जॉय की आज रिचर्ड और उसके साले जैसन के साथ गोष्ठी थी. उनकी कम्पनी कई दिनों से निर्यात के नए अवसर ढूंढ रही थी. रिचर्ड ने कुछ दिनों पहले उसे बताया था कि उसका साला जैसन भारत अपने व्यवसाय के लिए आ रहा है. जॉय ने उन्हें अपने ऑफिस में चर्चा के लिए आमंत्रित किया था और आज सुबह १० बजे उन्हें आना था. अब चूँकि सभी जाने की जल्दी में थे तो हड़बड़ी और अफरा तफरी का वातावरण था. ९ बजे से एक एक करके सब निकलने लगे. जॉय और शोनाली सबसे पहले गए. जॉय को अपनी कम्पनी के सहयोगियों के साथ कार्यनीति पर चर्चा करनी थी. शोनाली को पहुँचने में समय लगना था और उसे दो और लोगों को साथ ले जाना था.

सुमति और पार्थ १० बजे के आसपास निकले. सुमति को तो साथ के घर ही जाना था, परन्तु पार्थ को आज बहुत चक्कर लगाने थे. उसने कुछ सोचकर निखिल को अपने साथ ले जाने का निर्णय लिया. दो संपन्न परिवारों के वंश के कारण उन्हें वस्तुतः इस अल्पायु ऋण मिलने में सरलता होती.

सबसे अंत में पारुल और सागरिका निकले, उनका पूरे दिन केवल एक ही काम था - अपने पिता के धन को व्यय करना.

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शोनाली:

शोनाली ने अपने साथ सोनम और सचिन को लिया और क्लब की ओर गाड़ी दौड़ा दी. रास्ते में सबने क्या क्या आयोजित करना है इसके बारे में चर्चा की. अब चूँकि ये क्लब का पूर्णतया अंदरूनी आयोजन था, अधिक समय नहीं लगना था. परन्तु पार्थ और शोनाली सदैव हर बिंदु पर ध्यान रखते थे और किसी प्रकार की कमी उन्हें पसंद नहीं थे. मुख्य समस्या दोपहर के भोजन को लेकर थी. क्योंकि ये सिमरन का पुरुस्कार समारोह था तो उसके द्वारा केटरिंग नहीं की जा सकती थी.

अंत में ये निश्चय हुआ कि खाने का आयोजन किया तो सिमरन के ही साथ जाये पर अलग स्थान पर और दो महिला सदस्य उसे लाने और परोसने में सहायता करें. सोनम ने इसके लिए अपना सहयोग देने का आश्वासन दिया. सचिन ने कहा कि वो अपनी माँ रमोना से पूछ सकता है, परन्तु फिर हसंते हुए बोला कि अगर उसे पता चलेगा कि ऐसा भी कुछ संभव है, तो वो भरसक प्रयत्न करेगी इसी प्रकार का पुरुस्कार जीतने के लिए. इस बात पर सब हंस पड़े.

कुछ ही देर में क्लब पहुंचे जहाँ इस सप्ताह की रिसेप्शनिस्ट मंजुला ने उनका स्वागत किया. सोनम ने मंजुला से बात की और उसे कल के आयोजन में सोनम की सहायता के लिए प्रतिबद्ध कर लिया. उसके बाद शोनाली ने सिमरन से बात करके अपनी राय रखी. सिमरन ने उसे मान लिया और कहा कि वो आज ही सारा प्रयोजन कर लेगी. उसने एक बार शोनाली को धन्यवाद दिया कि उन्होंने अपनी बात को पूरा करने का साहस दिखाया. इस बात पर शोनाली ने चुटकी ली कि साहस तो सिमरन का है जो ऐसे खेल के लिए मान गई.

अब उन्हें दो महिलाओं को सफाई के लिए भी नियुक्त करना था. अब अगर १६ रोमियो एक अकेली महिला की चुदाई करने वाले थे तो उस महिला के गुप्तांगों को अधिक गीला और चौड़ा होने से भी रोकना होगा. इसके लिए क्लब की दो सदस्यों का चयन करना था जिन्हें चूत और गांड चाटकर कामरस पीने में आनंद आता हो. इसके लिए जब चर्चा हुई तो मंजुला ने वर्षा रेड्डी और एंजेला मैथ्यू के नाम सुझाये.

वर्षा एक राजनीतिज्ञ थी और नारी सशक्तिकरण के लिए बहुत प्रसिद्द थी. उसका बाहरी आडम्बर वाले चेहरे से पुरुषों के प्रति केवल अपशब्द ही सुनाई देते थे. पर बंद कमरे में उसका रूप अलग था जिससे क्लब के सदस्य भली भांति परिचित थे. एंजेला एक प्रकार से अस्थायी सदस्य थी. वो पुलिस के एक अति उच्च अधिकारी की पत्नी थी. परन्तु क्योंकि उनका स्थानांतरण कभी भी हो जाता था इसीलिए उसे “जब तक शहर में हैं” की श्रेणी में सदस्य्ता दी गई थी. उसका वीर्यप्रेम अद्भुत था. मंजुला ने इन दोनों महिलाओं से फोन पर बात की और उन्हें कल के कार्यक्रम के बारे में और इसमें उनकी भूमिका के सम्बन्ध में सहमति मांगी. जैसा अपेक्षित था दोनों ने इसके लिए अत्यंत प्रसन्नता से हामी भर दी.

अब जब सब कुछ स्थापित हो गया था तो सबने अंदर जाकर कुछ देर और मंत्रणा की और फिर वापिस शहर की ओर निकल पड़े.

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सुमति:

सुमति जब शीला के घर पहुंची तो केवल समर्थ और शीला ही घर पर थे. शीला ने उसका बड़े प्रेम से स्वागत किया. अंदर जाने के बाद शीला ने सबके लिए जूस लाया और सब बैठ गए. अधिकतर चर्चा विवाह प्रबंधन से सम्बंधित थी. शीला ने सुमति को कुछ संकेत दिए जो वो चाहती थी कि ध्यान में रखे जाएँ. दहेज़ की कोई भी बात नहीं थी और समर्थ और शीला ने इसके लिए कठोर शब्दों में मना कर दिया. हालाँकि ये बात निश्चित हुई कि दोनों परिवार मिलकर नवविवाहितों को एक घर खरीद कर देंगे. इसके लिए सुप्रिया की भी सहमति थी, परन्तु निखिल इससे किसी भी प्रकार से सहमत नहीं था. अंत में इसे निवेश समझकर निखिल ने स्वीकार कर लिया था. जिस घर के बारे में बात थी वो एक विशाल अपार्टमेंट था जो सुप्रिया के घर से अधिक दूर नहीं था.

इसके अतिरिक्त शीला ने ये भी बता दिया कि पूरा खर्चे का वहां दोनों परिवार मिलकर करेंगे.

शीला: “सुमति, हमारा जो भी कुछ है, इन बच्चों का ही है. अगर आज सुप्रिया की बेटी होती तो भी हम यही करते. इसीलिए, इसमें किसी प्रकार का संकोच करने की आवश्यकता नहीं है. हम इस विवाह को आर्थिक सम्बन्ध नहीं अपितु पारिवारिक सम्बन्ध बना रहे हैं.”

सुमति ने उनके विचार जॉय और शोनाली के समक्ष रखने का वादा किया. सुमति ने अपने साथ रखी डायरी में सब लिख लिया.

शीला: “आओ अब मैं तुम्हें अपने घर का टूर करवाती हूँ.”

ये कहते हुए उसने सुमति का हाथ पकड़कर उसे घर के अंदर ले गई.

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पार्थ और निखिल:

पार्थ और निखिल निर्धारित समय से अपने गंतव्य पर पहुंच गए. इस समय वो रूचि आहूजा के समक्ष बैठे थे. रूचि नगर की सबसे बड़ी फाइनेंसर थी. हर महीने वो लगभग १० से १५ करोड़ की फाइनेंसिंग करती थी. वो ४५ वर्ष की एक परिपक्व विधवा थी. उसके पति का निधन कोई ३ वर्ष पहले एक दुर्घटना में हो गया था. दबी हुई आवाज़ में लोग इसमें रूचि का हाथ होने का आकलन करते थे, परन्तु कभी किसी ने इस पर कोई शक नहीं जताया. अपने पति की अथाह संपत्ति को पाने के बाद रूचि ने अपने इस व्यापार का और विस्तार कर लिया था. कुछ लोगों का कहना था की वो बॉलीवुड और कन्नड़ फिल्म जगत में भी फाइनैंस करती थी.

रूचि ने कुर्सी में पीछे झुकते हुए दोनों की ओर देखा, “तो आपको ५० लाख रूपये चाहिए, २ सप्ताह के लिए. आप जानते हो कि मेरी ब्याज दर क्या है?”

पार्थ: “जी मैडम, हमें पता है और हम उसे स्वीकार करते हैं.”

रूचि: “मैंने तुम्हारे बिज़नेस के बारे में पता लगाया है. जो तथ्य तुम दुनिया से छुपा सकते हो, वो मुझसे छुपा नहीं है. काफी नया तरीका है तुम्हारा. आई ऍम इम्प्रेस्ड.”

पार्थ: “थैंक यू मैडम”

रूचि: “मुझे तुमसे एक दूसरी डील करनी है. मैं चाहती हूँ कि मैं तुम्हारे इस क्लब में पार्टनर बनूँ. मैं २६% हिस्सा लेने के लिए इच्छुक हूँ.”

पार्थ का दिमाग घूम गया. उसने ये स्थिति के बारे में तो विचार भी नहीं किया था.

पार्थ: “मुझे अपने पार्टनर से पूछना पड़ेगा.”

रूचि: “पूछना भी चाहिए. मैंने तुम्हारे पूरे बिज़नेस का आकलन किया है और जमीन और अन्य सभी संसाधनों का कुल मूल्य ६ करोड़ के लगभग है. पर जैसा तुम समझते हो, इसकी बाजार कीमत लगभग ९ से १० करोड़ हो सकती है. मैं इस बिज़नेस में २.५ करोड़ लगाने की इच्छा रखती हूँ. तुम्हारी बैलेंस शीट ये दिखाती है कि अभी ये उपक्रम ४० लाख के नुकसान में है. बैंक के ऋण की दर भी अधिक है. मेरे इस निवेश से तुम्हारा नुकसान समाप्त हो जायेगा और जो आगे के तुम्हारे विस्तार के जो लक्ष्य है, उसे भी जल्दी पूरा कर पाओगे.”

पार्थ सोच में पड़ गया. “मैडम क्या मुझे सोचने के लिए एक दिन का समय मिल सकता है?”

रूचि: “ये डील तुम्हारे इस ऑफिस में रहने तक ही है. यहाँ से निकलने के बाद ये प्रस्ताव समाप्त हो जायेगा. हाँ मैं जो ऋण लेने आये हो, वो मैं अवश्य दूँगी.”

पार्थ गहरी सोच में था. उसने निखिल की ओर देखा. अब चूँकि निखिल बचपन से बिज़नेस के बारे में सुनता आ रहा था उसने इस प्रस्ताव का सही मूल्य समझ लिया.

निखिल: “मैडम, अगर हम स्वीकार करेंगे, तो इस निवेश के अतिरिक्त और भी जो व्यय हैं, उन्हें कैसे करेंगे?”

रूचि: “इस राशि से तुम्हारे व्यय कम होंगे. नुकसान पूरा होने के पश्चात् तुम्हारे पास २.१ करोड़ बचेंगे. बैंक का लोन इस समय (एक पेपर पढ़ते हुए) ९० लाख बकाया है, जिसका वार्षिक ऋण ११ लाख के आसपास है. अगर ये ऋण चूका दो तो भी तुम्हारे पास 1.२ करोड़ बचेंगे और हर वर्ष ११ लाख भी बचेंगे. क्लब जिस प्रकार से चल रहा है, वैसे ही चलेगा, पर हर तीन महीने में मेरी टीम ऑडिट करेगी. कुल आय का २६% मेरा होगा.”

निखिल ने धीरे से पार्थ का हाथ दबाकर उसे स्वीकृति देने के लिए संकेत दिया.

पार्थ: “मुझे स्वीकार है.”

रूचि: “पर मेरी कुछ और भी शर्तें हैं.”

पार्थ: “कैसी शर्त.”

रूचि खिलखिला पड़ी. “घबरा मत बच्चे. तुम्हारे क्लब के रोमियो मैं जब भी इच्छा करुँगी, मेरी सेवा में उपस्थित होंगे. क्लब में तो मैं आऊंगी नहीं, तो उन्हें मेरे घर पर ही आकर मुझे संतुष्ट करना होगा. कब कितने रोमियो आएंगे ये मेरी इच्छा पर निर्भर होगा.”

पार्थ: “अन्य दिनों में तो इसमें कोई कठिनाई नहीं है, परन्तु जब क्लब के विशेष समारोह होते हैं उन दो दिनों ये संभव नहीं हो पायेगा.”

रूचि मुस्कुराते हुए: “कोई चिंता नहीं. मैं इतना तो अपने आप को बहला ही सकती हूँ. तो बताओ, क्या ये डील पक्की की जाये?”

पार्थ ने हामी भरी तो रूचि ने एक अग्रीमेंट अपने दराज से निकाला।

“इसे ध्यान से पढ़ लो. और इस पर अपने हस्ताक्षर कर दो. मैं बिज़नेस में धोखा नहीं करती यही मेरी सफलता का रहस्य है.” फिर निखिल की ओर सीखकर, “तुम चाहो तो समर्थ से विचार विमर्श कर सकते हो.”

उसने रिमोट से एक दरवाजा खोला जिसमे एक सभा कक्ष था. “वहां बैठकर तुम लोग अपना निर्णय करो, मैं एक घंटे में तुम्हें मिलूंगी. पर इस कमरे से बाहर जाने की तुम्हे अनुमति नहीं है. आवश्यक होने पर बाथरूम उस कक्ष से ही संलग्न है.”

पार्थ और निखिल उस कमरे में गए और रूचि ने उसे लॉक कर दिया. निखिल ने अपने नाना को फोन लगाया और सारी स्थिति समझाई। फिर उनके मांगने पर एग्रीमेंट को व्हाट्स ऐप से उन्हें भेज दिया. लगभग ४० मिनट में समर्थ का फोन आया. उसने अपने वकील से सलाह ली थी और उसने इसे सही पाया था. समर्थ ने पार्थ को हस्ताक्षर करने की सलाह दी. अब समय भी पूरा हो चला था. कुछ ही मिनटों में क्लिक की ध्वनि से सभाकक्ष का द्वार खुल गया. पार्थ और निखिल बाहर आये.

“क्या कहा समर्थ ने?”

“उन्हें ये अग्रीमेंट उचित लगा है.”

“जैसा मैंने कहा, मैं धंधे में धोखा नहीं करती.”

पार्थ और रूचि ने एग्रीमेंट पर साइन किया, फिर निखिल और रूचि की सेक्रेटरी ने गवाहों के स्थान पर साइन किये. सेक्रेटरी ने दो प्रतियां बनायीं और उसमें से एक पार्थ को सौंप दी. फिर वो कमरा बंद करके अपने स्थान पर चली गई. रूचि ने अपनी चेक बुक निकाली और २.५ करोड़ का चेक काटकर पार्थ को सौंप दिया.

पार्थ और निखिल दोनों बोल पड़े: “थैंक यू, रूचि मैडम.”

रूचि मुस्कुराई. “ये तो हुई धंधे की बात. अब इतने बड़े निर्णय के लिए कुछ मनोरंजन भी होना चाहिए, क्यों?”

पार्थ और निखिल ने बिना कुछ सोचे सिर हाँ में हिलाया.

“वेरी गुड़.” ये कहकर रूचि ने अपने रिमोट से एक बटन दबाया और उसके पीछे की दीवार दो पाटों में बँट गई.

उस दीवार के पीछे एक सुसज्जित शयन कक्ष था.

रूचि ने इंटरकॉम से अपनी सेक्रेटरी को कॉल किया: “एक घंटे तक मैं व्यस्त हूँ. नो कॉल्स, नो विज़िटर्स। ओके?”

रूचि अपनी कुर्सी से उठकर अंदर जाते हुए बोली,” ओके, बॉयज़, फॉलो मी.”

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सास बहू और शॉपिंग:

सागरिका और पारुल सुप्रिया के ऑफिस पहुंचे. सुप्रिया ने अपने ऑफिस में आमंत्रित किया और सुरेखा को भी बुला लिया. सागरिका और पारुल ने सुप्रिया और सुरेखा के पांव छूकर आशीर्वाद लिया। सुरेखा दोनों बहनों के सौंदर्य पर मुग्ध हो गई. चारों महिलाएं ऑफिस से निकलीं. उन्होंने अपनी सेक्रेटरी को कहा कि अगर कोई आवश्यक काम पड़े तो मोबाइल पर कॉल करे, अन्यथा वो लोग आज वापिस नहीं आएंगे.

सुप्रिया: “शोनाली का फोन आया था. वो भी ३ बजे के पहले हमारे पास पहुँच जाएगी. कह रही थी कि तुम्हें क्रेडिट कार्ड दिया है शॉपिंग के लिए. तो चलकर कुछ शॉपिंग भी करेंगे और कुछ मस्ती भी.”

सागरिका और पारुल दोनों बहुत खुश हुए. ऐसी सास सबको मिले जो मित्र अधिक थी. सब एक मॉल में गए और लगभग दो घंटे खूब घूमे, शॉपिंग की, खाया पिया और अच्छा समय बिताया. जब तीन बजने को हुए तो सुप्रिया ने कहा कि अब घर चलते हैं वहीँ गपशप करेंगे. सब गाड़ी में बैठकर सुप्रिया के घर चल पड़े. बीच ही में शोनाली की कॉल आ गई. सुप्रिया ने उसे भी घर पर ही पहुँचने का आमंत्रण दिया. घर पहुंचकर सबने अपने शॉपिंग के बैग डाइनिंग टेबल पर लगा दिए. सुरेखा अपने सैंडल उतारकर अपने पांव दबाने लगी. सागरिका तुरंत उसके सामने नीचे बैठी और उसके पाँवों की मालिश करने लगी. सुरेखा की आनंद और आराम से ऑंखें बंद हो गयीं.

तभी पारुल ने सुप्रिया से कहा, “आप भी बैठो, मैं आपके पैरों की मालिश करती हूँ. सुप्रिया को उस पर बहुत प्यार आ गया. उसने पारुल के गाल चूमे और सोफे पर बैठ गई. पारुल सुप्रिया के पाँवों की मालिश करने लगी. कुछ क्षणों के लिए सुप्रिया और सुरेखा की आंख लग गई. उन्हें सोता छोड़कर, पारुल और सागरिका किचन में गए और सबके लिए चाय का प्रबंध करने लगे. साथ ही उन्होंने कुछ हल्का सा अल्पाहार भी बना लिया. जब तक ये सब हुआ तब तक सुरेखा और सुप्रिया की आंख भी खुल गई. दोनों एक दूसरे को देखकर खिलखिलाने लगीं.

इतने में चाय नाश्ता आ गया और जैसे इसी समय की प्रतीक्षा हो रही हो, घर की घंटी बजी और शोनाली ने घर में प्रवेश किया. उसने डाइनिंग टेबल पर लगे शॉपिंग बैग देखे तो आश्चर्य में पड़ गई.

सुप्रिया: “ये सब इनके नहीं हैं. मेरे और सुरेखा के भी हैं.” ये कहते हुए उसने शोनाली को गले लगाकर उसके गाल चूमे. “आओ सुरेखा से मिलो.”

शोनाली सुरेखा के गले लगी और दोनों हाथ पकड़कर एक ओर बैठकर बातें करने लगीं. दोनों लड़कियों ने सबको चाय नाश्ता दिया। इस सब में ४ बजने को आ गए थे.

सुप्रिया ने कहा कि वो बियर पीने के मूड में है, क्या कोई उसका साथ देगा. सुरेखा ने हाँ की और फिर शोनाली ने भी अपनी सहमति दे दी. सुप्रिया उठने लगी तो सागरिका ने उसे रोका, “आप बता दो, मैं लेकर आती हूँ.” सुप्रिया ने उसे बताया तो सागरिका पारुल के साथ बियर लेने चली गई. सुप्रिया की ऑंखें छलक गयीं. आज तक किसी ने उसके काम में हाथ नहीं बंटाया था. उसने शोनाली को फिर से गले लगा लिया.

शोनाली: “दीदी, आप अब भावुक मत हो. मेरी बेटी सब संभाल लेगी. अब आपका आराम करने का समय आ चुका है.”

ये कहते हुए शोनाली ने सुप्रिया के होंठ चूम लिए. सुप्रिया के तन बदन में जैसे आग लग गई. उसने उस चुम्बन का उत्तर एक और चुम्बन से दिया. कुछ ही क्षणों में सुप्रिया और शोनाली के शरीर गुत्थमगुत्था हो गए. सुरेखा ये सब देख रही थी और उसके शरीर में भी भूख जाग गयी. सागरिका ने ये सब देखा तो उसने पारुल को संकेत किया और दोनों बहनें सुरेखा की ओर अग्रसर हुईं और उसे अपने बाहुपाश में ले लिया. सागरिका सुरेखा के होंठ चूम रही थी तो पारुल ने उसकी गर्दन और कानों पर अपनी जीभ का जादू चलाया.

शोनाली ने सुप्रिया के वस्त्र निकलते हुए उसे नंगा कर दिया और उसके मम्मे चूसने लगी. पारुल ने जब ये देखा तो उसने सुप्रिया के सामने बैठकर उसके पांव फैलाये और अपनी जीभ से उसकी चूत चाटना शुरू कर दिया. सुप्रिया इस दोहरे आघात से बेबस हो गई और उसने अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया. पारुल ने उसके पांवों को और फैलाकर अपने आक्रमण में तेजी कर दी. अब वो सुप्रिया की चूत के अंदर तक अपनी जीभ घुसा कर उसे चोद रही थी. इसके साथ उसने अपने बाएं हाथ के अंगूठे और ऊँगली से भगनासे को मसलते हुए दाएं हाथ की एक ऊँगली सुप्रिया की गांड के छेद पर हल्के से सहलाने लगी. शोनाली हर मिनट एक स्तन को चूसती फिर दूसरे को, फिर सुप्रिया के होंठ चूसती. सुप्रिया आनंद की लहरों में बह रही थी.

उधर सागरिका ने सुरेखा को निर्वस्त्र कर दिया था. पर चटर्जी परिवार की तीनों महिलाएं अभी भी अपने पूरे वस्त्र पहने थीं. सागरिका ने सुरेखा को बड़े प्रेम से सोफे पर बैठाया, फिर उसके पांव चौड़े करते हुए उसकी चूत में अपना चेहरा छुपा लिया. शोनाली अचानक खड़ी हो गई और उसने अपने कपड़े आनन फानन में उतार फेंके. उसने सुप्रिया का एक प्रगाढ़ चुम्बन लिया और फिर स्वयं पारुल के पीछे से उसकी गांड को चाटने लगी. उसकी जीभ पारुल की मखमली गांड से उसकी चूत के बीच की यात्रा करने लगी.

सुप्रिया ने उन्हें रुकने का संकेत दिया और वो जमीन पर लेट गई, फिर उसने सागरिका को अपनी और खींचा और उसकी चूत पर अपना मुंह लगा दिया. अब शोनाली की बारी थी. उसने सबको एक गोलाकार क्रम में आने का सुझाव दिया और देखते ही देखते एक नए व्यूह की रचना हो गई. पारुल सुरेखा की चूत चाट रही थी. सुप्रिया पारुल की, शोनाली सुप्रिया की सागरिका शोनाली की और सुरेखा ने सागरिका की चूत में अपना चेहरा गढाया हुआ था.

पांचों इस बात से अनिभिज्ञ थे कि उन्हें इस अवस्था में अचंभित आँखों से एक लड़की देख रही थी. और वो कोई और नहीं, संजना थी !

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जॉय का दिन:

जॉय ने अपने ऑफिस पहुँच कर अपने अतिथियों के आगमन का आयोजन किया. १० बजे रिचर्ड और जैसन पहुँच गए. सभी मिलकर सभाकक्ष में चले गए. जॉय के बॉस ने आकर सबका स्वागत किया और उन्हें दोपहर के भोज के लिए आमंत्रित किया और आगे की चर्चा के लिए छोड़कर अपने काम पर चले गए.

चर्चा में ये तय किया गया कि जॉय की कंपनी के उत्पादों को जैसन की कंपनी अपने देश में बेचेगी. इसके ऊपर जो कमीशन है, वो भी तय किया गया. इसी के साथ जैसन भी अपनी कंपनी के कुछ उत्पादों को भारत में बेचने के लिए उत्सुक था. इसके लिए रिचर्ड की कंपनी जॉय की कंपनी के साथ अनुबंध करेगी और उसका सहयोग करेगी. चर्चा बहुत सफल रही और तीनों पक्षों ने एक दूसरे के साथ काम करने के लिए अनुबंध पर हस्ताक्षर किये. इसके बाद जॉय के बॉस के साथ सभी एक पांच सितारा होटल में भोजन हेतु गए और उन्हें चर्चा और अनुबंध से अवगत कराया. बॉस ने सबको बधाई दी. इसके बाद बॉस अपने काम पर चले गए परन्तु ये तीनों वहीँ कुछ देर और बैठे.

जैसन के मन में कुछ चल रहा था, उसे जॉय के हाव भाव से ये प्रतीत हो रहा था कि वो एक खिलाड़ी प्रवत्ति का पुरुष है. एक तो जॉय की सेक्रेटरी के साथ कुछ अधिक खुला बर्ताव और कुछ जॉय की हर आती जाती स्त्री या लड़की का पीछे करती हुई ऑंखें उसे ये विश्वास दिला रही थीं कि ये रंगीन आदमी है. जब जॉय ने बाथरूम जाने की अनुमति ली तब उसकी अनुपस्थिति में जैसन ने अपनी राय रिचर्ड को बताई. रिचर्ड ने उसकी बात को स्वीकारा और कहा कि उसे जॉय और उसकी पत्नी के बारे में कुछ उड़ती हुई बातें सुनाई दी हैं. जैसन के पूछने पर रिचर्ड ने थोड़ा कुछ बताया कि तब तक जॉय लौट आया.

अब जैसन ने बात आगे बढ़ाई , “हम चाहेंगे कि अगर संभव हो सके तो हम दोनों, आप और आपकी पत्नी को अपने घर आमंत्रित करना चाहते हैं. दिन आप तय कर लें, समय शाम ७ बजे का रखें.”

जॉय ने अपने फोन में अपने कैलेंडर को देखकर शुक्रवार अथवा शनिवार का दिन उचित बताया. “परन्तु मुझे शोनाली से भी पूछना पड़ेगा. अगर वो सहमत होगी तो ये दिन ठीक रहेगा.”

रिचर्ड और जैसन ने इस बात को स्वीकार किया और जॉय ने रात में उन्हें अवगत कराने के लिए कहा. इसके बाद सब लोग उठे. जॉय अपने ऑफिस चला गया और रिचर्ड और जैसन अपने घर. शाम को उन्हें अपने अन्य पार्टनर्स के साथ दूसरी पार्टी से मिलने जाना था.

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सुमति:

शीला अपने घर का पूरा भ्रमण करवाने के बाद सुमति को वापिस बैठक में ले गई.

शीला: “इन्होने पूरे घर को वीडियो कैमरों से लैस किया हुआ है. हाँ बाथरूम छोड़ दिए है.”

समर्थ हंसने लगा.

शीला: “और हमारे घर में एक लाइब्रेरी है, जिसकी चाबी केवल इनके ही पास है. बस वही एक स्थान है जो तुमने नहीं देखा.”

समर्थ: “शीला, चाबी ले लो. सुमति तो अब अपने ही घर की सदस्य है. जाओ इसे दिखा लाओ. अगर इच्छा होगी तो मैं भी आ जाऊंगा.”

शीला चाबी लेकर सुमति को बेसमेंट में ले गई. कमरे में प्रवेश करते ही सुमति चकित रह गई. कमरे की एक दीवार पर दर्जनों टीवी लगे हुए थे. उनके सामने सोफे लगे हुए थे और अन्य दीवारें अलमारियों के प्रकार थीं. शीला ने एक अलमारी खोलकर सुमति को दिखाई.

“इन्होनें पिछले कुछ सालों के वीडियो संभाल कर रखे हैं. पहले सीडी में थे, फिर डीवीडी बनाये. और पिछले साल सबको इन्होने हार्ड डिस्क में स्थानांतरित कर दिया.”

“ये किस चीज़ के वीडियो हैं, माँ जी?” हालाँकि सुमति कुछ कुछ समझ चुकी थी पर पूछना ही ठीक समझा.

“चुदाई के, हमारे घर के अंदर के. संभवतः चुदाई का ऐसा कोई प्रकरण नहीं जिसे रिकॉर्ड करके सहेजा न गया हो. इन्हें कभी कभार पुराने वृत्तांत देखने का मन करता है. आओ मैं तुम्हें कुछ पुराने प्रकरण दिखती हूँ.”

ये कहकर शीला ने एक डिस्क निकाली।

“हम्म्म, ये कोई ७ साल पहले की है. देखें क्या है इसमें?” ये कहकर शीला ने एक मशीन में वो डिस्क लगाई और उसके साथ में लगा टीवी चालू कर दिया.

वीडियो की क्वालिटी इतनी अच्छी तो नहीं थी पर कुछ ही समय में सब पात्र समझ आ गए. नीचे लेती हुई सुप्रिया के मुंह के ऊपर शीला की चूत थी और सुप्रिया उसे चूस रही थी. और शीला की पीछे से समर्थ अपना तगड़ा लंड उसकी गांड में डालकर कर जोरदार चुदाई कर रहे थे.

“ओह, लगता है, शुरू में इन्होनें वीडियो चालू नहीं किया था.”

सुमति बोली, “माँ जी, मुझे वो दिखाओ न जिसमे आपके दोनों नाती हों.”

“तब तो दो साल पहले वाले देखने होंगे. रुको, मैं निकालती हूँ.” ये कहकर शीला ने उस समय की एक डिस्क निकाली और बदलकर लगा दी. पुरानी डिस्क उसने यथास्थान लौटा दी.

जब वीडियो चला तो कुछ समय तो अलग अलग दृश्य आते रहे. अचानक शीला ने एक स्थान पर रोक कर फॉरवर्ड करना बंद कर दिया. ये शीला और समर्थ का शयनकक्ष था. और इस समय उसमें शीला और समर्थ अकेले थे.

सुमति ने प्रश्न भरी आँखों से शीला को देखा, तो शीला मुस्कराने लगी.

“जैसे कोई लड़की अपनी पहली चुदाई नहीं भूलती, वैसे ही मैं वो दिन नहीं भूल सकती जब मेरे तीनों सबसे प्यारे पुरुषों ने मुझे एक साथ चोदा था. ये देखकर मुझे वो दिन दोबारा याद आ जायेगा.”

और तत्क्षण कमरे में नंगी सुप्रिया ने प्रवेश किया. उसकी चूत से बहता हुआ रस साफ दिखाई दे रहा था.

“मम्मी, ये सम्भालो अपने नाती. मुझे चोद चोद कर अधमरा कर दिया इन दोनों ने. पर इनके लौड़े हैं कि झुकते ही नहीं.”

उसके पीछे नितिन और निखिल ने नंगे ही प्रवेश किया.

और उसी समय उस कमरे में समर्थ भी आ गए.

“कौन सी वीडियो देख रहे हो?”

“जब आप तीनों ने मुझे पहली बार एक साथ चोदा था.”

“अच्छा।” ये कहकर समर्थ ने अपनी पैंट उतारी और सोफे पर बैठ गए.

“मुझे सुमति की याद आ रही थी. ये लंड बहुत अच्छा चूसती है.”

शीला समझ गई कि अब वीडियो देखना संभव नहीं होगा. पर उसने बंद नहीं किया और आगे बढ़कर सुमति के कपडे निकालने शुरू कर दिए. समर्थ भी अब अपने ऊपर के कपड़े निकाल चुके थे. शीला उनके सामने झुकी और उनके लंड को अपने मुंह में लेकर चूसने लगी. अब शीला ने अपने कपड़े उतारे और एक ओर की अलमारी से कोई १० इंच लम्बा एक नकली लंड निकला. उसने उस लंड को सुमति की चूत पर घिसना चालू कर दिया. सुमति की चूत पनिया गई और शीला ने पूरा लंड धीरे धीरे अंदर पेल दिया.

कुछ ही समय में शीला के हाथ तेजी से चल रहे थे. सुमति की चूत नदी के समान बह रही थी और उसका मुंह समर्थ के लंड पर उसी गति से चल रहा था जितनी शीला के हाथ. समर्थ ने सुमति के सिर पर हाथ फेरा और उसे रोक दिया.

“तेरी गांड मारने का बहुत मन है. पर यहाँ नहीं, चल कमरे में चलते हैं.” सुमति अपने कपड़े उठाने लगी तो शीला बोली, “अरे समय मत ख़राब करो. ये बाद में ले लेना.”

कमरा बंद करके तीनों नंगे ही शीला के शयनकक्ष में चले गए. कमरे में शीला लेट गई और सुमति को संकेत किया तो सुमति ने उलटे होकर शीला की चूत में अपना मुंह डाल दिया. अपने सामने सुमति की चूत को थोड़ा सा चाटने के पश्चात् शीला ने डिल्डो दोबारा उसकी चूत में डाल दिया और धीमी गति से उसकी चुदाई करने लगी. समर्थ ने साइड टेबल से वेसलीन निकाला और अपने लंड पर मल लिया. फिर उसने सुमति की गांड को खोलते हुए उसमे अच्छी खासी मात्रा ट्यूब से भर दी. अब जैसे ही समर्थ ने अपने लंड को सुमति की गांड पर लगाया, शीला ने पूरा का पूरा डिल्डो अंदर डाल कर पकड़ लिया और सुमति की चूत पर अपनी जीभ चलाने लगी.

समर्थ ने अपने लंड का दबाव बनाया और सुमति की गांड ने फैलकर उसका स्वागत किया. जब सुपाड़ा अंदर चला गया तो समर्थ ने दबाव बढ़ाते हुए ४ इंच लंड और अंदर डाल दिया. सुमति की चूत में फंसा डिल्डो अब तंग होने लगा था. उसने अपनी सांस रोकी हुई थी, वो जानती थी कि अब समर्थ पूरे लंड को पेलने वाला है. शीला ने सुमति का सिर पकड़कर अपनी चूत में घुसा लिया और उसी क्षण समर्थ ने एक तगड़े झटके के साथ पूरा लंड सुमति की गांड में पेल दिया. अगर शीला ने डिल्डो को पकड़ा न होता तो वो अवश्य ही बाहर निकल जाता. पर शीला के अनुभव ने इस परिस्थिति को पहले ही समझ लिया था. शीला एक हाथ से डिल्डो को दबाये हुए थी और एक से सुमति की सिर को. सुमति की गूँ गूँ की ध्वनि शीला की जांघों के बीच ही दबकर रह गई थी.

समर्थ ने अब अपने पसंदीदा कृत्य अपना ध्यान केंद्रित किया.

समर्थ: “वाह, क्या टाइट गांड है इसकी. सच में इसे चोदकर बहुत मजा आता है.”

शीला: “आप तो गांड के रसिया हो. ऐसी कोई गांड है जिसे आपको चोदने में मजा नहीं आता हो?”

समर्थ हंस पड़ा और अपने धक्कों से सुमति की गांड का कीमा बनाने में जुटा रहा. सुमति भी अब संभल गई थी और उसने शीला की चूत पर ध्यान केंद्रित किया और जो जादू उसने सुप्रिया को दिखाया था वही शीला पर भी किया. शीला अद्भुत अनुभूति से जल्द ही सुमति के मुंह में अपना रस बिखेरने लगी. समर्थ के हर धक्के के साथ सुमति की जीभ शीला की चूत के और भीतर तक चली जाती. सुमति उसे घुमाती और समर्थ के लंड बाहर निकलते हुए उसकी जीभ शीला के अंदरूनी हिस्से को चाटते हुए बाहर आती और फिर धक्के के साथ वापिस अंदर चली जाती.

शीला ने भी अब अपने हाथ के डिल्डो को सुमति की चूत में अंदर बाहर करना शुरू किया. अब सुमति के दोनों छेदों में चुदाई हो रही थी. उसकी चूत में एक अजीब सी खुजली होने लगी. गांड की खुजली तो समर्थ का लंड मिटा रहा था, पर चूत का नकली लंड उसे वो सुख नहीं दे पा रहा था. शीला को वस्तुतः ये समझ में आया. उसने समर्थ को हटने को कहा और फिर लेटने को. जब समर्थ लेट गए तो सुमति को अपनी गांड उसके लंड पर रखने के लिए शीला ने आदेश दिया. सुमति ने समर्थ के लंड पर गांड के छेद को टिकाया और पूरे लंड को अंदर ले लिया. अब शीला ने डिल्डो को दोबारा से सुमति की चूत में डाल दिया और अपने हाथों से तेज गति से चुदाई प्रारम्भ कर दी. समर्थ ने भी अपनी पूर्व गति को पाया और अब सुमति की दुगनी चुदाई होने लगी.

पर चाहे मनुष्य कितना भी हृष्ट-पुष्ट क्यों न हो, पर आयु फिर भी अपना अंकुश रखती है. समर्थ भी अब अधिक देर नहीं टिक सकते थे. पर उन्हें ये भी पता था कि झड़ना तो सुमति की गांड के अंदर ही है. यही हुआ समर्थ के लंड का उबलता हुआ लावा सुमति की फटी गांड को सींचते हुए उसे ठंडा कर रहा था. अपना पूरा माल अंदर छोड़कर जैसे ही लंड बाहर निकाला शीला ने डिल्डो को चूत से निकालकर गांड में डालकर उसे सील कर दिया. फिर उसने समर्थ के लंड को बहुत प्रेम के साथ चाटकर साफ किया और चमक उठने के बाद उसे चूम लिया.

फिर उसने सुमति की गांड से डिल्डो निकाला और अपने मुंह से उसे चाटकर साफ किया और समर्थ के रस को अपने मुंह में भर लिया. फिर वो उठी और सुमति के मुंह से मुंह लगाकर उसने आधा रस सुमति को समर्पित कर दिया. सुमति को ये प्रसाद अत्यंत ही रुचिकर लगा और शीला और वो बहुत समय तक एक दूसरे लिपटी हुई एक दूसरे को चुम्बनों से भिगोती रहीं।

अंत में सुमति ने घर जाने की अनुमति मांगी. सब अपने कपड़े लेने के लिए वीडियो कक्ष में गए. समर्थ ने जो डिस्क लगी थी उसे निकाल कर सुमति को दिया।

समर्थ: “आज तक कभी इनमें से कुछ भी बाहर नहीं गया है. मैं आज पहली बार एक अपवाद कर रहा हूँ. इसे संभाल कर रखना और किसी अन्य को बिल्कुल भी न देना. और मेरा अर्थ है किसी को भी. और जल्दी ही इसे वापिस लेकर देना.”

सुमति: “अगर मैं किसी के साथ देखना चाहूँ तो?”

समर्थ: “अपने कमरे में, अपने सामने. मुझे विश्वास है तुम मेरी अवहेलना नहीं करोगी.”

सुमति: “कभी नहीं.”

ये कहकर सुमति ने डिस्क अपने पर्स में राखी, दोनों के गले लगी और पांव छूकर अपने घर चली गई.

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पार्थ और निखिल:

निखिल और पार्थ दोनों मेमनों के सामान रूचि के पीछे चल दिए.

रूचि ने उस कक्ष के बाथरूम में जाते हुए बोली: “मुझे खुली भाषा में बात करने की आदत है. मैं नहा कर आयूंगी और तुम दोनों को भी नहाना होगा. नहाने के बाद शरीर मत पोंछना, मुझे भीगे हुए शरीर अच्छे लगते है, विशेषकर चुदाई के समय. तो अपने कपडे उतारो, यूँ गई और यूँ आई.”

पार्थ और निखिल ने अभी कपड़े निकाले ही थे कि रूचि बाथरूम से बाहर आ गई. उसका सुन्दर तराशा हुआ भीगा शरीर कमरे के उजाले में चमक रहा था. दोनों उसे आँखें फाड़े देख रहे थे. रूचि के चेहरे पर एक रहस्यमई मुस्कान थी. वो जानती थी कि वो बहुत सुन्दर है और बहुत भूखी भी.

“जाओ, मेरे सूखने के पहले वापिस आओ। “ ये कहकर वो एक लम्बे शीशे के आगे खड़े होकर अपने शरीर को देखकर मुग्ध हो रही थी. उसने अपनी चूत पर हाथ फिराया, बिलकुल चिकनी और मुलायम. दो साल पहले उसने वहां लेसर से बाल निकलवाए थे. अपनी फांकों को खोलकर उसने अंदर के गुलाबी छेद को एक ऊँगली से छुआ और उसे अपने होठों पर लेकर चखा। इतने में ही पार्थ और निखिल बाहर आ गए. दोनों के शरीर से पानी टपक रहा था.

“हम्म, बिल्कुल जैसा मुझे पसंद है. अब एक को मेरी चूत को चाटने का काम करना है. कौन करेगा?”

दोनों कुछ नहीं बोले. रूचि ने नाटकीय रूप से अपना हाथ गोल गोल घुमाया और निखिल की ओर ऊँगली करते हुए कहा: “तुम”

और फिर पार्थ की और देखकर बोली: “मैं तुम्हारे लंड का स्वाद लेना चाहूंगी.”

ये कहते हुए वो एक लम्बी लॉउन्ज कुर्सी पर पांव फैलाकर अधलेटी मुद्रा में बैठ गई. निखिल ने नीचे बैठकर उसकी चिकनी चूत का अवलोकन किया. पार्थ ने अपने लंड को रूचि के मुंह से लगाया.

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चूतों की शृंखला:

संजना का मुंह आश्चर्य से खुला हुआ था और वो कुछ बोलना तो चाहती थी, पर उसकी बोलती ही बंद हो गई थी. अब सुप्रिया मौसी ने उसे ये तो बताया था कि उसकी माँ लेस्बियन सम्बन्ध में पहले लीन हो चुकी थीं, पर आज अपनी आँखों से देखने पर भी उसे विश्वास नहीं हो पा रहा था. अंततः उसे अपनी वाणी प्राप्त हो ही गई.

“मम्मी ! मौसी !” उसकी हल्की टूटती हुई पुकार ने अचानक सबका ध्यान उसकी ओर आकर्षित किया. सुरेखा के तो जैसे पांवों के नीचे से जमीन ही निकल गई. पर सुप्रिया की चतुर बुद्धि ने यहाँ भी स्थिति को समझ लिया.

“ओह, माई स्वीट स्वीट संजू. तुम बिल्कुल सही समय पर आयी हो.” सुप्रिया ने उठकर संजना की ओर बढ़ते हुए कहा. “जैसा कि तुम देख रही हो ये हमारा पारिवारिक भोग चल रहा है. और मुझे विश्वास है कि तुम्हारी मिठास के लिए सब आतुर होंगे. पर पहले आओ, मैं तुम्हें अपने नए सम्बन्धियों से अवगत करा दूँ.”

सुप्रिया ने सबका परिचय कराया और सबको संजना से परिचित करवाया. संजना इस बात से ज्यादा विस्मित थी कि सुरेखा ने अपने आप को छुपाने या उसे कुछ समझाने की कोई चेष्टा नहीं की.

“संजना को मैंने अभी कुछ ही दिन पहले चखा था. पहली बार.” ये कहते हुए सुप्रिया ने संजना के वस्त्र निकालने का क्रम प्रारम्भ किया. “सच कहूँ, तो मुझे सुरेखा की याद दिला दी मेरी इस गुड़िया ने. मैंने इससे ये वादा लिया था कि ये किसी भी आदमी से मेरी अनुमति के बिना संसर्ग नहीं करेगी.” अब तक संजना के ऊपर के वस्त्र निकल चुके थे. सुप्रिया ने उसके सामने बैठकर उसके निचले वस्त्र निकालने का उपक्रम शुरू किया. “पर मैंने ये वादा नहीं लिया था कि वो किसी स्त्री से संसर्ग नहीं करेगी.”

वस्त्रहीन संजना के हाथ पकड़कर उसने उसे सुरेखा के आगे खड़ा कर दिया.

“मैंने मौसी के रूप में जो मिठास चखी है, उसकी माँ होने के कारण क्यों न तुम भी उसका रसपान करो.”

ये कहकर उसने संजना को वहीँ छोड़ दिया. और अन्य तीनों की ओर बढ़ती हुई बोली, “हम अपना खेल चालू रखते है.”

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पार्थ और निखिल:

रूचि बड़े चाव से पार्थ का लंड चाट रही थी.

रूचि: “मुझे लम्बे मोटे लौड़े बहुत पसंद हैं, पर उनका उपलभ्ध होना एक समस्या है. और आज तो मेरे हाथ में ऐसे दो दो अस्त्र हैं. ऑफिस में अधिक कुछ नहीं कर पाएंगे, पर मैं तुम्हें अपने घर आमंत्रित करना चाहूंगी.”

पार्थ: “अब आप हमारी पार्टनर हो, आपकी ख़ुशी और संतुष्टि हमारी प्राथमिकता रहेगी. आप अगर एक दिन पहले बता दें तो हम दोनों उपस्थित हो जायेंगे. परन्तु अगर क्लब का कोई कार्य हुआ तो हमें क्षमा करियेगा.”

“हम्म्म, क्लब में तो अब मेरा भी निवेश है, मैं क्योंकर अपना नुकसान करुँगी. क्या तुम दो दिन बाद मेरे बंगले पर आ सकते हो.”

“हाँ, ये संभव है. पर आज भी आपको अपने कौशल का प्रमाण देना चाहते हैं. अपने एक घंटा हमें दिया है, चलिए इसका सदुपयोग करें.”

निखिल अब चूत के पाट खोलकर उसमे अपनी जीभ से खुदाई कर रहा था. उसे इस उम्र की स्त्रियों को क्या अच्छा लगता है, भली भांति पता था. आखिर उसकी पहली शिक्षिका भी रूचि की आयु की ही थी. और उसके दिए हुए पाठ्यक्रम में चूत की चुसाई को अतिरिक्त महत्त्व दिया गया था. निखिल ने रूचि की चूत और उसके आसपास के स्थान को अपने हाथ, होंठ, उँगलियों और दाँतों से हर संभव प्रकार से उत्तेजित किया हुआ था. रूचि अपनी कमर और गांड उछाल कर निखिल के इस आक्रमण को प्रोत्साहित कर रही थी.

रूचि के भग्नासे पर निखिल की थिरकती उँगलियाँ एक लहर के समान चल रही थी. उँगलियाँ चूत के अंदर जाकर स्थान बनातीं और उस रिक्त स्थान को निखिल की जीभ शीघ्र ही भर देती. सांप की जीभ के समान चंचल निखिल की जीभ रूचि के रोम रोम को प्रफुल्लित कर रही थी. उसका रस बह कर उनके गीले शरीरों को और भी भीगा रहा था. पर ये नहीं था कि रूचि केवल अपने सुख में लीन थी. उसने भी पार्थ के लंड पर इतना प्रेम बरसाया हुआ था कि वो अब लोहे के समान तन चुका था. जैसे ही रूचि ने हल्की चीख के साथ अपना पानी निखिल के मुंह में छोड़ा, पार्थ ने अपने लंड को रूचि के मुंह से निकाल लिया.

“रूचि मैडम, अब हमारी परीक्षा का अगला पेपर लिखना है. अगर आपको आपत्ति न हो तो मैं आपकी इस मखमली चूत को चोदना चाहता हूँ. और अगर आप निखिल को अपने इस सुन्दर और सेक्सी मुंह से कुछ देर चाटकर उसे भी मेरी तरह सुख देंगी तो अच्छा रहेगा.”

“ओह, श्योर. मैं भी अब चुदाई के लिए रेडी हूँ. पर हम यहाँ नहीं, बिस्तर पर खेलेंगे.”

रूचि उस कुर्सी से इठलाती हुई उठी और बिस्तर पर जाकर लेट गई.

पार्थ और निखिल उसके ये नखरे देखकर मुस्कुरा दिए और एक सहमति में संकेत किया.

पार्थ: “रूचि मैडम, आपको कैसी चुदाई पसंद है. हम आपकी वैसे ही सेवा करेंगे.” पार्थ जानता था कि रूचि जैसी आत्मविश्वासी महिला ये कभी नहीं स्वीकारेगी कि उसे कोई हरा सकता है.

रूचि: “जितना तुम दोनों के लौंड़ों में दम है, उतनी ताकत से चोदकर दिखाओ मुझे.” विनाश काले विपरीत बुद्धि.

पार्थ ने उसे KBC की तरह एक अवसर और दिया.

“मैडम आपको तकलीफ न हो जाये. आप एक बार और विचार कर लें.”

ये सुनकर रूचि के तन बदन में आग लग गई कि कल के छोकरे मुझे डराने चले हैं.

“अबे सुन, तेरे जैसे लंड मैं तब से ले रही हूँ जब से मैं १९ साल की हुई थी. हाँ तुम्हारे उन सबकी तुलना में कुछ अधिक बड़े हैं, पर मैं भी कोई कच्ची कली नहीं हूँ. दिखाओ मुझे अपनी सबसे जोरदार चुदाई का नमूना. मैं भी तो जानूँ कि मैंने पैसा नाली में तो नहीं फेंके.”

अब पार्थ को क्रोध आ गया, पर उसने अपने आपको संयत किया और एक बड़ी ही सधे स्वर में बोला, “रूचि मैडम, अब आप जब ऐसे चैलेंज दे रही हैं, तो हम भी चाहेंगे कि ये चुदाई हम अपने तरीके से करें. हम जैसे चाहेंगे आपको मानना होगा. नहीं तो इस चुनौती का कोई अर्थ नहीं.”

रूचि अब अपने घमंड के घोड़े से चाहकर भी नहीं उतर सकती थी. हालाँकि उसे लगा कि वस्तुतः उसने गलत लोगों से पन्गा ले लिया है, पर पीछे होना उसकी शान के विपरीत था.

“मुझे स्वीकार है, अब समय मत बर्बाद करो, देखें तुम किस खेत की मूली हो.”

पार्थ और निखिल ने एक दूसरे को देखा और थम्ब्स अप किया कि मुर्गी ने दाना चुग लिया.

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संजना का मात्र प्रेम:

सुरेखा ने अपना हाथ बढाकर संजना को अपने पास खींचकर बैठा लिया.

“तुम मौसी के घर इस समय कैसे आ गयीं.”

“वो मौसी ने मुझे ये सब सिखाया है अभी कुछ दिनों में. मेरा मन कर रहा था तो मैंने सोचा कि मौसी अकेली होंगी तो हम दोनों….”

“अरे मेरी प्यारी गुड़िया रानी. तुझे पता है, हम दोनों कई वर्ष तक एक दूसरे के साथ रोज संसर्ग करते थे. जब नानी ने हमें अलग कमरा देने के लिए कहा, तब भी हम साथ ही रहीं. मौसी शादी के बाद अलग चली गयीं और हमारा ये सम्बन्ध भी समाप्त हो गया. मौसी के तलाक के बाद उन्होंने मुझे फिर साथ होने का निमंत्रण दिया था, परन्तु तब तक मेरी भी शादी हो गई थी. तो सब कुछ वहीँ समाप्त हो गया. पर कुछ दिन पहले, निखिल की शादी तय होने के लगभग एक सप्ताह पूर्व हम फिर से साथ आ गए.”

“और पापा, उनका क्या?”

सुरेखा ने अन्य लोगों की ओर संकेत किया और कहा कि ये बात हम घर पर करेंगे.

“पर अभी मैं भी तुम्हारा अमृत चखना चाहती हूँ.” ये कहते हुए सुरेखा ने अपने होंठ संजना के होठों से मिला दिए. कुछ ही क्षणों में माँ बेटी एक दूसरे में विलीन हो गए.

सुरेखा ने संजना को सोफे पर बैठने के लिया कहा और फिर उसके पांव फैलाकर अपना चेहरा उसकी कमसिन बुर में छुपा लिया.

“उफ्फ्फ ये सुगंध.” सुरेखा ने मन में सोचा. फिर उसने अपनी जीभ को संजना की योनि पर फिराया और वहां पर कामोत्तेजना से उत्पन्न नमी का चटकारा लिया. “उफ्फ्फ ये स्वाद. मैं कितनी भाग्यशाली हूँ जो मुझे इस कच्ची कली का रस प्राप्त हुआ है.” इस विचार के साथ उसने अपने पूरे मातृप्रेम के साथ उस कमसिन कुंवारी बुर पर अपनी जीभ का प्रहार तीव्र कर दिया. अपने हाथों से उस अमृतकलश के पट खोले और अपनी लपलपाती हुई जीभ से उसके अंदर प्रवेश किया. अंदर उस अमृतसुधा में उसकी जीभ एक एक किनारे को छूते हुए अपने लिए जीवनसुधा एकत्रित कर रही थी.

संजना जो इसके पहले सुप्रिया के संसर्ग से इस प्रणाली से अनिभिज्ञ तो न थी पर उसे अपनी माँ के प्रेम की थाह अब अनुभव हो रही थी. उसने अपनी माँ के बालों में प्यार से हाथ फिराने के साथ अपनी पतली बाली कमर को मटकाना शुरू किया. उसकी इस प्रतिक्रिया से उसकी जांघों के बीच छुपी उसकी माँ मन ही मन मुस्कुरा उठी. अब उसकी बेटी पूर्ण रूप से यौवन में पदापर्ण कर चुकी थी. और वो समय दूर नहीं था जब वो अपना कौमार्य किसी पुरुष को सौंप देगी. और तब इस झरने के पानी का स्वाद और सुगंध दोनों बदल जायेंगे. अगर उसका बस चलता और उसमे ऐसी शक्ति होती तो वो इस जल को एक ऐसी शीशी में बंद कर लेती जिसका वो जीवन भर स्वाद लेती.

संजना एक नयी नवेली खिलाड़िन थी. और उसे इस प्यार की चूमा चाटी ने स्वतः ही अपने चरम पर पहुंचा दिया. और उसने एक रुदन के साथ अपनी माँ की मुंह में अमृतवर्षा कर दी. वात्स्ल्य से भरपूर उसकी माँ ने एक बूँद का भी तिरिस्कार नहीं किया. जब संजना का झड़ना थम गया तो तब उसने अपना खिला और भीगा चेहरा अपनी बेटी की चूत से हटाया.

“सच में संजू. तेरा स्वाद अनुपम है. आज तू मेरे ही साथ सोना. हमें कई वर्षों की दूरी को समाप्त करना है.”

सुप्रिया ने ये सुना तो बहुत प्रसन्न हुई. उसने इस कली को फूल बनाने में एक अहम् योगदान जो किया था. कुछ देर में ही माँ बेटी ने सबसे विदा ली. अन्य सभी स्त्रियां भी अब अपने घर जाने को व्याकुल थीं. तो एक दूसरे को चूमकर सब अपने गंतव्य की ओर निकल गए.

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पार्थ और निखिल:

रूचि अपने आपको मानसिक रूप से तैयार कर रही थी. निखिल अपने लटकते हुए लंड को लेकर रूचि के मुंह के सामने आ गया और रूचि को अपना मुंह खोलने को कहा. रूचि ने अपने मुंह को खोलकर अपनी जीभ से निखिल के टोपे पर चमकते हुए मदन रस की बूंदों को चाट लिया और अपना सिर उठाकर निखिल की ओर देखा और मुस्कुराई. निखिल ने भी उसकी इस मुस्कराहट का उत्तर दिया. अब रूचि ने अपने मुंह में लंड को लिया और चूसने लगी. लंड की चौड़ाई अधिक होने के कारण उसे अपने मुंह को सामान्य से अधिक खोलना पड़ रहा था.

उसकी चूत पर भी एक भारी भरकम लंड दस्तक दे रहा था. वो लंड इस समय चूत की लम्बाई पर अपने टोपे से घिसाई कर रहा था. और उस चूत ने अपने ऊपर आने वाले संकट को समझते हुए और अपने लिए रास्ता सरल करते हुए ढेरों पानी को छिड़क दिया था. अचानक पार्थ के चेहरे पर एक पाशविक भाव आया, अगर रूचि इस समय उसे देखती तो संभवतः इस क्रीड़ा को तुरंत रोक देती. पर निखिल ने उसके मन को भटकाया हुआ था, और यही अपनी शक्ति से आश्वस्त रूचि के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ.

“रूचि मैडम!” पार्थ ने पुकारा. रूचि ने अपने मुंह में लंड रखते हुए उसकी और वासनामय आँखों से देखा. पर ये पुकार रूचि के लिए नहीं थी, निखिल के लिए थी. रूचि की ऑंखें एक क्षण के लिए पार्थ से मिलीं और उसकी शरीर भय से सिहर उठा. पर अब बहुत देर हो चुकी थी.

निखिल ने अचानक ही उसका सिर पकड़ा और अपने पूरे लंड को उसके मुंह में धकेल दिया. रूचि की ऑंखें फ़ैल गयीं और आंसुओं से लथपथ होने लगीं. पर उसके अहंकार पर असली आक्रमण पार्थ ने किया जब उसने एक ही लम्बे और शक्तिशाली धक्के में अपना लगभग तीन चौथाई लौड़ा उसकी चूत में गाढ़ दिया. रूचि छटपटाने लगी. उसके आँसू थम नहीं रहे थे. पर इन दोनों शक्तिशाली युवा चुदाई मशीनों के समक्ष उसका प्रतिरोध नगण्य था. पार्थ ने अपने लंड को लगभग पूरा बाहर खींचा और अगले ही धक्के में अपने पूरे मूसल को रूचि की ओखली में जड़ दिया. निखिल ने अपने लंड को बाहर निकाला जिससे रूचि का दम न घुट जाये. रूचि के आँसू अविरल बह रहे थे. पर अब वो सांस ले सकती थी. उसने दया भरी दृष्टि से पार्थ की ओर देखा पर उसे समझ आ गया कि उन आँखों में दया नहीं एक पैशाचिक चमक थी.

उसने अपने आप को अब भाग्य के भरोसे छोड़ दिया. पार्थ ने अपनी निर्दयता का परिचय देते हुए रूचि को अपने लंड की पूरी लम्बाई से ताबड़तोड़ गति से चोदना प्रारम्भ किया. रूचि निखिल के लंड को इन झटकों के कारण सही प्रकार से चूस भी नहीं पा रही थी. निखिल ने पार्थ को थोड़ी सहजता के लिए कहा तो पार्थ ने अपनी गति कुछ कम कर दी, केवल इतनी कि रूचि निखिल के लंड का भी आनंद ले पाए.

इस घनघोर चुदाई ने रूचि के पोर पोर को खोल दिया था. उसकी चूत अपनी खाल बचने के लिए पानी के धार छोड़ रही थी. रूचि ने जीवन में ऐसी चुदाई कभी नहीं करवाई थी. पर ये भी था कि उसके साथी उससे डरते भी थे और इसीलिए उसे बहुत सहजता से ही चोदते थे. पर आज रूचि ने इन्हे ललकार कर उस सुख को पाया था जो उसे आज तक प्राप्त नहीं हुआ था. उसकी चूत लगातार पानी छोड़ रही थी. इस कारण अब पार्थ का मूसल भी अब बड़ी सरलता से उसमे परेड कर रहा था. जब पार्थ को लगा कि उसका पानी छूट न जाये तो उसने अपने लंड को बाहर खींचा और निखिल को बागडोर सँभालने का न्योता दिया.

निखिल ने अपने लंड को रूचि के मुंह से निकले और रूचि की खुली चूत के गीलेपन को देखकर एक तौलिये से उसकी चूत को पोछकर कुछ सुखा दिया. उसके बाद उसने पार्थ के ही समान एक लम्बे झटके से अपने लंड को अंदर पेल दिया. अब चूँकि रूचि की चूत में पार्थ का आवागमन हो चूका था तो निखिल के पूरे लंड को भी वो एक ही धक्के में डकार गई. पार्थ ने रूचि को उसके रस से सना अपना लंड चूसने के लिए दिया जिसे रूचि ने बड़ी अधीरता से अपने मुंह में ले लिया। और इस बार निखिल ने अपने जोरदार धक्कों से रूचि की ईमारत हिला दी. पर उसने गति इतनी ही रखी कि पार्थ अपने लंड को रूचि से चुसवा पाए.

पर पार्थ ने ऐसा कोई दया का कार्य नहीं किया वो रूचि के मुंह को चूत समझ कर चोदने लगा. पर अब रूचि भी इस खेल का आनंद उठा रही थी. आज उसने अनुभव किया था कि जिनसे वो अब तक चुदवाती आयी थी वो पहली कक्षा के विद्यार्धी थे और जो आज उसे चोद रहे हैं वो उनसे बहुत आगे. उसके मन में क्लब के अन्य रोमियो से भी चुदने की इच्छा बल पकड़ने लगी. इन सबके बीच उसकी चूत का झड़ना अबाधित था. न जाने कितने वर्षों की प्यास थी जो उसकी चूत के आँसू मिटा रहे थे. पर अंत में उसके शरीर ने हाथ डाल ही दिए. एक फौहारे के साथ उसकी चूत ने एक लम्बी पिचकारी सी मारी और वो ठंडी होकर ढीली पड़ गई.

पार्थ और निखिल का भी अब समय पूरा हो चुका था, पर वो रूचि को अपने प्यार के रस से नहलाना चाहते थे जिससे उसे ये दिन सदैव याद रहे. निखिल अपने लंड को चूत ने निकालकर रूचि के चेहरे के पास आ गया और अपने हाथों से मुठ मारने लगा. उधर पार्थ ने मुंह को तब तक चोदा जब तक कि पक्का न हो गया कि वो झड़ने वाला है. इसके बाद उसने भी अपने लंड को निकाल लिया. दोनों मित्रों ने एक साथ अपने लौंड़ों से रूचि के चेहरे पर गाढ़ा सफ़ेद पानी सींचना शुरू किया. जब चेहरा भर गया तो उसके स्तनों पर भी छिड़क दिया. अंत में पार्थ ने अपने लंड को रूचि के मुंह में डालकर साफ करने के लिए कहा. उसके बाद निखिल ने भी अपने लंड की सफाई करवाई.

इसके बाद दोनों मित्र खड़े होकर अपने संपन्न कार्य का आकलन करने लगे. उनके वीर्य से भीगी सुन्दर रूचि अब उन्हें और भी रुचिकर लग रही थी. इस समय वो एक अति संपन्न और बड़ी व्यवसाई न होकर एक सस्ती वेश्या प्रतीत हो रही थी. रूचि ने कुछ समय बाद अपनी आंख खोलकर उन दोनों को उसे इस स्थिति में देखते हुए पाया.

“क्या देख रहे हो? ऐसा माल पहले नहीं भोगा होगा.”

पार्थ और निखिल ने उत्तर देना आवश्यक नहीं समझा, क्योंकि ये धंधे की बात थी पर हामी में सर हिला दिया.

“तुम चुदाई बहुत अच्छी करते हो. मेरा घर के लिए निमंत्रण अभी भी है. और इस बार... “ रूचि ने अपनी ऊँगली से एक थक्के वीर्य को लिया और अपनी गांड में उस ऊँगली से डाला. “... इस छेद का भी स्वाद दूंगी.”

अब ऐसा प्रलोभन हो और कोई न करे ऐसा हो ही नहीं सकता.

“चलो अब नहा कर साफ हो जाओ. अपनी एक घंटे की छुट्टी समाप्ति पर है. तीनों साथ ही नहा लेते हैं.”

तीनों जल्दी से नहाये और कमरे से बाहर निकले. रूचि ने रिमोट से कमरे को लॉक किया. फिर इंटरकॉम उठाया.

“आधे घंटे और रुकना फिर अगले अपॉइंटमेंट वाले को भेजना. और घर जाने के पहले मेरे कमरे की सफाई कर देना और कपड़े बदलकर जाते हुए लॉन्ड्री में देती जाना.”

फिर उसने पार्थ को देखा, “मुझे तुम्हारे साथ बिज़नेस करना रास आएगा. पहली बार मैं कोई बिज़नेस आनंद के लिए करूंगी.”

पार्थ: “रूचि मैडम. आप क्यों नहीं उस अभिनेत्री के शो को देखने आतीं? और कुछ बातें और....”

रूचि: “सोचकर बताती हूँ. और क्या बात है?”

पार्थ: “आप क्यों नहीं हमारी चयन समिति में शामिल हो जातीं? पार्टनर होने के कारण हर दूसरे नए रोमियो का इंटरव्यू आपको लेना होगा। और इंटरव्यू का तात्पर्य होता है प्रार्थी की चुदाई की तकनीक और क्षमता का आकलन.”

रूचि: “ओह, तो तुम मुझे रिश्वत दे रहे हो. मैं इस बारे में भी सोचकर ही बताऊंगी. पर प्रस्ताव अच्छा है. और क्या बात है.”

पार्थ: “कल क्लब में एक विशेष आयोजन है, ११ बजे से. हमें शुशी होगी अगर आप आ सकें तो. एक तो आप क्लब की व्यवस्था देख लेंगी. और कल सभी रोमियो उपस्थित होंगे और आप उनकी क्षमता को देख सकती है. इससे आपको अपने लिए सेवादार चुनने में मदद होगी.”

रूचि: “हम्म्म तब तो कल छुट्टी ही लेनी होगी. मैं प्रयास करुँगी आने का. अरे प्रयास नहीं, मैं अवश्य आऊंगी. पर किसी से अभी मिलूंगी नहीं. वो सब बाद में. क्लब की व्यवस्था इत्यादि भी मैं किसी और दिन देखूँगी. पर अब प्लीज मुझे क्षमा करो, मुझे अब दूसरे कार्य भी संपन्न करने है. तुम दोनों का धन्यवाद, मुझे इतना सुख देने के लिए.”

पार्थ ने अपना ब्रीफ़केस खोलकर चेक किया और देखा कि चैक ठीक से रखा है. तभी रूचि ने रिमोट उठाया और पार्थ को अपने पीछे दरवाजा खुलने की आहत सुनाई दी.

“थैंक यू, रूचि मैडम.” कहते हुए पार्थ और निखिल वहां से निकल गए.

********************

शोनाली का घर:

शाम हो चुकी थी. सारे पंछी लौट कर घर पहुँच चुके थे.

बैठक में बैठे सब भोजन के पहले की ड्रिंक ले रहे थे.

पार्थ ने सबको नयी पार्टनर और फाइनेंस के बारे में बताया. जॉय को बहुत गर्व हुआ कि पार्थ ने रूचि जैसी शक्तिशाली स्त्री को अपना पार्टनर बनाया है. इसके बाद उनके क्लब की सफलता निश्चित थी.

जॉय ने जैसन के साथ हुई नयी संधि के बारे में बताया और शोनाली से पूछा कि वो कब जाना चाहेगी. शोनाली ने उसे सोचकर बताने के लिया कहा.

सुमति ने शादी की तैयारी से समर्थ और शीला के संतुष्ट होने का शुभ समाचार दिया. सब इस बात से बहुत प्रसन्न हो गए. शोनाली ने फिर सागरिका और पारुल के साथ सुप्रिया के घर का प्रकरण बताया और सुरेखा और उसकी बेटी के अद्वितीय सौंदर्य की भरपूर प्रशंसा की. ये सुनकर सबके मन ललचा गए और उनके मुंह में पानी आ गया. फिर सबने भोजन किया और कुछ समय के लिए टीवी पर कुछ कार्यक्रम देखे.

“हम्म्म्म, तो सभी लोग किसी न किसी खेल में व्यस्त रहे आज, मुझे छोड़कर.” जॉय ने हँसते हुए कहा.

“ओह, पापा ! अगर दिन सूना गया है तो क्या हुआ. हम आपकी रात रंगीन करेंगे.” सागरिका और पारुल ने एक स्वर में कहा.

दोनों ने उठकर जॉय का हाथ लिया और लगभग घसीटते हुए उसे अपने कमरे में ले जाने लगीं. अचानक पारुल ने पीछे मुड़कर देखा.

“बुआ, आप भी आ ही जाओ. आपको डबल प्रसाद खिलाएंगी हम दोनों बहनें.”

सुमति तपाक से उठी और अपने होंठों पर जीभ फिरते हुए उन तीनों के पीछे चल पड़ी.

“मामी, अब आप किसके बिस्तर पर चुदना चाहोगी? अपने या मेरे?”

शोनाली बिना कुछ बोले पार्थ का हाथ पकड़कर अपने कमरे में चली गई.

क्रमशः

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अध्याय २४: छठा घर - दिया और आकाश पटेल ३

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तनाव

पटेल परिवार में कुछ दिनों से लगातार तनाव का वातावरण था. आकार को ये बात बिलकुल भी रास नहीं आयी थी कि नीलम ने उनका बंगला अफ्रीकी लोगों से चुदवाने के लिए प्रयोग में लाया था. अधिक गंभीर विषय ये था कि उसने ये बात घर में सबसे छुपा कर भी रखी थी. उनका परिवार इस प्रकार के संबंधों पर कोई आपत्ति अधिकतर नहीं करता था, परन्तु नीलम जिस प्रकार इसे छुपाया था, वो किसी को भी ठीक नहीं लगा था. आकार निशा पर भी कुपित था और उसे दो सप्ताह के लिए छुट्टी पर भेज दिया था. पीठ पीछे इस प्रकार का स्वांग उसे बिलकुल नहीं भाया था.

नीलम ने सबसे अपनी गलती का पछतावा किया था पर न जाने क्यों कोई उसे क्षमा करने के लिए लालायित नहीं था. और इसी कारण जहां घर के अन्य लोग अपना जीवन सामान्य रूप से व्यतीत कर रहे थे, नीलम दूर एक ओर पड़ी थी. हाँ, वो शारीरिक रूप से वहीँ रह रही थी पर मानो अकेले. हितेश और दर्शन भी, जो सदा ही उसे चोदने के लिए लालायित रहते थे, उससे कन्नी काट रहे थे. अंततः उसने हार मानकर बाहरी सहायता लेने का निर्णय किया. उसने एक बार फिर आकार से क्षमा याचना की और उससे विनती की कि क्या वो दो तीन दिनों के लिए बाहर जा सकती है. उसे विश्वास था कि उसके न रहने से परिवार वालों के मन में कुछ दयाभाव जागृत हो जाये.

आकार ने उसे अनुमति दे दी और वो अगले दिन सुबह निकल गयी. इस बार भी उसने एक गलती की थी. उसने इस बार भी किसी को नहीं बताया कि वो कहाँ जा रही थी. पर इस समय वो निराश थी और उस व्यक्ति से मिलने जा रही थी जो घर के एक या दो सदस्यों को मना सकता था. अपनी गाड़ी स्वयं चलाते हुए वो उस नगर में पहुंची जहाँ उसे एक आशा की किरण दिख रही थी. पर उसे ये भी दुविधा थी कि वो व्यक्ति मिलेगा भी या नहीं. सुबह छह बजे की निकली हुई वो एक बार रुकी जहाँ उसने कुछ जलपान किया। फिर साढ़े दस बजे वो एक घर के सामने अपनी कार खड़ी कर रही थी.

घंटी बजाने के बाद वो बहुत उत्तेजित हो गयी. उसे समझ नहीं पड़ रहा था कि उसका ये कदम उसकी कठिनाई दूर करेगा या और बढ़ा देगा. घर के दरवाजे के खुलते ही सामने वाले की आँखें उसे देखकर आश्चर्य से खुली रह गयीं.

“नीलम तुम! यहाँ कैसे?” उसने पूछा.

नीलम से अब रुका नहीं गया. वो उसके गले से लिपट गयी और फूट फूट कर रोने लगी. उसे अपनी बाँहों में लेकर अंदर ले जाकर द्वार बंद कर दिया. नीलम को सोफे पर बैठाकर उसके लिए पानी लाया और उसे पिलाया. नीलम अब कुछ संयत हुई.

“नीलम, अब बताओ, ऐसा क्या हुआ कि तुम चार घंटे गाड़ी चलाकर मुझे मिलने आयी हो. और इतनी द्रवित हो.”

“दीदी, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गयी.” ये कहते हुए नीलम ने बिना रुके पूरा वृत्तांत सुना दिया.

“गलती तो है पर आकार तुम्हे क्षमा नहीं कर रहा ये भी बड़ी बात है. दिया क्या कहती है?”

“मुझसे कोई भी बात नहीं कर रहा. हितेश भी नहीं. मैं कहाँ जाऊँ दीदी, मैं क्या करूं. बस मेरा अब एकमात्र आप ही सहारा हैं.”

“कब जाना है तुम्हें वापिस?”

“मैं दो तीन दिन का बोल कर आयी हूँ.”

“ठीक है, हम कुछ न कुछ सोच लेंगे. इनकी भी सलाह लेंगे कि क्या किया जा सकता है. तुम अपना सामान निकालो और अथिति कक्ष में रख लो. फिर नहा धोकर नाश्ता करो. फिर बात करेंगे. चिंता न करो, सब ठीक हो जायेगा.”

नीलम ने अपना सामान रखा और नहाकर बाहर आ गयी. सामने खड़ी स्त्री को देखकर उसे अचरज होता था कि उनके परिवार वाले उन्हें और उनकी बहन में अंतर कैसे कर लेते थे. क्योंकि जिसकी शरण में नीलम आयी थी वो और कोई नहीं दिया की बहन सिया थी.

******************

मंत्रणा:

जब नीलम गयी हुई थी तब नाश्ते के बाद घर के सभी सदस्य बैठे हुए पिछले दिनों की घटना पर मंत्रणा कर रहे थे. आकार इस पूरी चर्चा का मुख्य बिंदु था.

दिया: “भाई, हम सब आपके साथ हैं और समझते हैं कि नीलम ने जो किया वो अनुचित था. और वो भी इसके लिए कई बार क्षमा मांग चुकी है. एक बात और, ऐसा नहीं है कि ऐसा पहली बार हुआ हो. अपने पहले कभी भी कोई आपत्ति नहीं की, फिर इस बार क्यों?”

आकार: “बात सीधी सी है, भाभी. हम सब किसी से भी कोई बात नहीं छुपाते. अगर वो हमें बताकर जाती तो कोई आपत्ति नहीं थी. पर उसने ऐसा हमारे पीठ पीछे किया जो गलत है.”

कनिका: “पापा, मॉम इसके लिए बहुत ही लज्जित हैं. और मुझे लगता है कि वे आगे ऐसा कुछ न करेंगी. इसीलिए, हम सब आपसे विनती कर रहे हैं, उन्हें इस बार क्षमा कर दीजिये.”

आकार: “अभी कहाँ गयी है, किसी को पता है?”

दिया: “नहीं, पर जिस मनस्थिति में वो गयी है, मैं अनुमान अवश्य ही लगा सकती हूँ.” उसने हितेश की ओर देखकर कहा.

आकार ने हितेश से पूछा, “तुम्हें पता है?”

हितेश हड़बड़ा गया. “नहीं, मुझे नहीं पता, मौसाजी.”

दिया: “सिया से मिलने गयी होगी. मेरे बाद वो उसके ही सबसे निकट है. उस बेचारी के परिवार में तो कोई है नहीं हमारे सिवाय. और कहाँ जाएगी.”

आकार का हृदय द्रवित हो गया. नीलम के परिवार में अब कोई नहीं था. उसके माता पिता को एक एक्सीडेंट में खोने के बाद अब नीलम का उन सबके सिवाय और कोई न था. उसे ग्लानि हुई कि उसने नीलम से इस प्रकार का व्यव्हार किया. उसने आकाश की ओर देखा तो आकाश ने सिर हिलाकर अपनी सहमति व्यक्त की. एक गहरी साँस लेते हुए आकार ने दिया को देखा.

“भाभी, ठीक है. आप सब से मैं अलग नहीं सोच सकता. मैं नीलम को क्षमा करता हूँ. और अगर सिया जी का फोन आये तो उन्हें भी बता देना. नीलम दो चार दिन वहाँ रह ले, उसका मन भी लग जायेगा और कुछ चिंतन भी कर लेगी.”

“और चुदाई भी. बेचारी इतने दिनों की प्यासी है. ये बात सुनकर मुझे नहीं लगता कि जीजाजी और देवर जी को आज रात सोने को मिलने वाला है.”

सब हंसने लगे तो हितेश ने भी साथ दिया, “अगर मुझे पता होता तो मैं भी चला जाता.”

आकाश: “अब चला जा, उसे साथ लिवा लाना लौटने में. हाँ अपने आप जाना होगा, गाड़ी तो नीलम ले गयी है.”

हितेश: “सच! मैं अभी बस से निकल जाता हूँ.”

आकाश ने दिया को देखा, “तब तक तुम ये समाचार अपने तक ही रखो. जब हितेश पहुंचे तब ही सिया को बताना.”

दिया: “आप बहुत कुटिल हैं. पर इसीलिए मैं आपसे इतना प्यार करती हूँ. दर्शन जाकर हितेश को बस अड्डे तक छोड़ आ. समय नहीं खोना चाहिए.”

कुछ ही देर में दर्शन हितेश के साथ निकल गया. हितेश शाम तक ही पहुंच सकता था. दर्शन लौटा तो प्रसन्न था.

“पापा, एक टैक्सी वाला जा रहा था, तो हितेश को उसने ले लिया. दोपहर के खाने तक पहुंच जायेगा.”

“जैसे खाना खाने वाला हो वो. चलो अब हम सब अपने काम पर लगें. दिया, बताना क्या हुआ.” ये कहते हुए आकाश ने मंत्रणा समाप्त कर दी.

******************

योजना:

नीलम बाहर निकली तो सिया किसी से बात कर रही थी. उसने नीलम को बैठने का संकेत किया और बात करती रही. उसकी बातों से ये पता चल ही गया कि वो अपने पति से बात कर रही थी और उसे सारी स्थिति से अवगत करा रही थी. नीलम के मन में हूक सी उठी. अगर उसने भी आकार से छुपाया न होता तो आज इस स्थिति ने न होती. पर अब केवल सिया ही उसकी सहायता कर सकती थी. पर क्या उतना पर्याप्त होगा? ये तो केवल समय ही बता सकता था. पर सिया के पास आने से उसे एक आशा अवश्य थी.

सिया ने फोन रखा और नीलम की ओर देखा. “इनका कहना है कि समस्या इतनी गंभीर नहीं है. और तुम्हारे यहाँ रहने से सम्भव है कि आकार का मन शीघ्र द्रवित भी हो जाये. तुमने जो तीन चार दिन के बारे में सोचा है वो सही है. अब अगर चाहो तो तुम कुछ समय के लिए सो जाओ. इन्होनें कहा है कि ये और मेरा देवर आज समय पूर्व ही आ जायेंगे.” फिर नटखट मुस्कान के साथ बोली, “कोई विशेष कारण ही होगा, मेरे लिए तो ये कभी ऐसा नहीं कहते।”

नीलम शर्मा गयी. “दीदी, मैं उन सब विषयों के बारे में जब से ये हुआ है सोच भी नहीं पा रही हूँ. और कोई समय होता तो मुझे बहुत प्रसन्न होती.”

सिया: “मैं समझती हूँ, पर इस प्रकार से तुम्हारा मन कभी शांत नहीं होगा और तुम्हें कोई रास्ता भी नहीं मिलेगा.”

नीलम ने कहा कि वो कुछ देर सो लेती है, उसे कुछ थकान तो थी ही, शारीरिक और मानसिक दोनों. सिया ने उसे आश्वासन दिया कि अब वो दिया से बात करने वाली है, परन्तु उसका न रहना ही अच्छा होगा. नीलम अपने दिए हुए कमरे में गयी और छत की ओर देखते हुए न जाने कब नींद में चली गयी. सिया ने दिया को फोन लगाकर बताया कि नीलम आयी है तो दिया ने कहा कि उसे यही अनुमान था. उसके बाद दोनों बहनें दो घंटे तक बात करती रहीं. बातों में हर विषय था, सखी सहेलियों से लेकर चुदाई तक. जब फोन काटा तो सिया को आश्चर्य हुआ कि इतना समय निकल गया. उसने तुरंत ही खाने का प्रबंध करने के लिए किचन में कदम रखा.

दिया ने सिया से बात करके फोन रखा तो कनिका ने पूछा क्या हुआ. दिया ने संक्षेप में पूरी बात सुनाई और फिर खाने की तैयारी में जुट गयी. खाना बनाकर जैसे ही दिया बैठक में आयी हितेश का फोन आया और उसने बताया कि वो अपने शहर पहुंच गया है और बीस मिनट में घर भी पहुंच जायेगा. दिया ने आकार को बताया और फिर अगले फोन की प्रतीक्षा में टीवी लगाकर बैठक में बैठ गयी.

******************

सिया को भी जब समय का पता लगा तो उसे भी आश्चर्य ही हुआ. उसने सोचा कि अब नीलम को जगा देना ही अच्छा होगा क्योंकि अधिक सोने से सुस्ती चढ़ेगी. वो उठे इसके पहले ही घर की घंटी बज उठी. अब इस समय कौन आ गया? ये सोचते हुए उसने द्वार खोला तो आश्चर्य से जैसे चीख ही पड़ी.

“हितेश, बेटा तू? हाय मेरा बच्चा. कैसे आया? अंदर आ. खाना खाया?” सिया के प्रश्न जैसे अंत ही नहीं हो रहे थे.

“अरे रे रे मॉम, थोड़ी साँस तो ले लो. सब बताता हूँ. पहले ये बताओ मेरी मिठाई कहाँ है?” हितेश ने अंदर आकर घर लॉक करके पूछा.

“जहाँ हमेशा रही है.” सिया ने उसे जकड़ लिया.

हितेश ने उसके होंठों पर होंठ रखे और गहरा चुंबन लिया।

“इस मिठाई का स्वाद हर मिठाई से अधिक मीठा है. पर ये बताओ मौसी कहाँ हैं?”

“अंदर सो रही है.”

“ठीक है, आपके कमरे में चलो, मैं बताता हूँ मैं क्यों आया.”

सिया के कमरे में जाकर हितेश ने उसे अपने आने का कारण बताया. सिया को ख़ुशी हुई कि नीलम की समस्या सुलझ गयी.

“और मॉम, आपका कैसा चल रहा है. पापा और चाचा आपका ध्यान रखते तो हैं न?”

“हाँ, पर तेरी कमी हमेशा खलती है.”

“चाचा को कोई चाची मिली?”

“उन्हें न मिलने की. वो सबमे मुझे और दिया को ढूंढते हैं, और वैसी मिलने वाली नहीं.”

हितेश कुछ सोचने लगा. “मॉम, मुझे कुछ अधिक तो नहीं पता पर मौसा के मोहल्ले में एक विधवा स्त्री है, बंगाली है और उनका मेरी आयु का एक लड़का भी है. बहुत सुंदर भी है. और न जाने जब जब मैं उन्हें देखता हूँ, मुझे लगता है कि वो बहुत चुदक्क्ड़ भी है. चाचा के लिए मुझे सही लगती हैं, पर आगे आप लोगों को देखना पड़ेगा.”

“फोटो या कुछ है?”

“नहीं, पर आप मौसी से कहोगी तो वो भेज सकती हैं. उनके व्हाट्सएप्प ग्रुप में हैं.”

“पर हमारे परिवार के जिस प्रकार के सम्बन्ध हैं वो समस्या बन सकते हैं.”

“हाँ, पर आगे की जानकारी के बिना आगे बढ़ना ठीक नहीं है.”

“जब तू आया तो मैं नीलम को जगाने जा रही थी. पर अब मुझे लगता है कि ये काम तू अच्छे से कर सकता है.” इस बार सिया के चेहरे पर मुस्कान थी.

“मैंने उन्हें पहले भी कई बार जगाया है, मुझे पता है उन्हें कैसे जगाते हैं. वैसे आपको भी वैसी ही जागना पसंद है.”

“फिर जल्दी कर, अगर स्वयं जाग गयी तो हमारा सरप्राइज़ व्यर्थ हो जायेगा.”

हितेश उठकर जाने लगा तो सिया ने उसे रोका. “कपड़े यहीं छोड़ जा.”

हितेश ने आनन फानन कपड़े उतारे तो सिया ने उसे पास बुलाया और उसके लंड को चूमकर थोड़ा चाटा और चूसने के बाद उसे जाने के लिए कहा.

“बड़े दिन बाद तेरे लंड का स्वाद लिया है. बिना नीलम की चूत के रस के बिना एक बार चाटना चाहती थी. अब जा और बजा दे अपना डंका।”

हितेश उस कमरे में चला गया जहाँ नीलम अभी तक सोई पड़ी थी.

******************

घर की बात:

सिया के फोन का उत्तर देने में दिया ने देर नहीं की. कुछ देर की हल्की फुलकी बातों के बाद सिया ने धमाका किया. उसने हितेश के द्वारा अपने देवर के लिए किसी विधवा बंगाली महिला के बारे में पूछा. दिया सोच में पड़ गयी. सुमति से वो कई बार मिली थी परन्तु इतनी घनिष्टता भी नहीं थी कि आगे बात की जा सके. फिर उनके परिवार की जीवन शैली का भी अंतर था. अगर सुमति को ये सब रास न आया तो क्या होगा? फिर ये बात भी थी कि क्या वो अपने भाई जॉय से दूर जाना चाहेगी? जहाँ तक उसे पता था उसका बेटा पार्थ का भी अपना काम था. उसने अपनी राय सिया को दी.

सिया ने कहा कि इसका एक ही उपाय है, कि किसी प्रकार से उसके देवर प्रकाश से सुमति को मिलाया जाये और फिर देखा जाये कि आगे क्या होता है. अचानक ही दिया को एक कड़ी का ध्यान आया जो उन्हें जोड़ती थी. उसका नाम था रमोना. रमोना पार्थ को जानती थी. कैसे? ये तो उसे पता नहीं था. पर रमोना उससे चुदी न हो इसकी संभावना कम ही थी. सिया के कहने पर उसने सुमति का एक फोटो अपने व्हाट्सएप्प ग्रुप से उसे भेज दिया. जब बात समाप्त हुई तो उसने रमोना को फोन लगाया और मिलने की इच्छा की.

रमोना ने उसे कल आने के लिए कहा और इसी के साथ इस नए समीकरण की नींव पड़ गयी. अब आगे क्या होना है ये तो किसी को पता न था. दिया ने सिया को फोन पर कहा कि वो प्रकाश को नीलम और हितेश के साथ यहाँ आने के लिए कहे, पर उसका अभिप्राय न बताये। अब चूँकि दिया के पास तीन दिन का समय था तो वो अपनी योजना को सफल बनाने के लिए जुट गयी. शाम को उसे ये बात परिवार के अन्य सदस्यों से साझा करनी होंगी. इसके बाद दिया ने खाना खाया और कुछ देर टीवी देखकर सोने के लिए चली गयी.

******************

भारमुक्ति:

हितेश कमरे में गया तो नीलम अभी भी बेसुध सोई पड़ी थी. उसके चेहरे पर एक चिंता का भाव था जिसे हितेश ने भलीभांति पढ़ लिया था. एक हल्की नाइटी में नीलम सीधी ही लेटी हुई थी पर उसकी गर्दन एक ओर ढुलकी हुई थी. नाइटी उसके घुटनों तक मुड़ी हुई थी और अगर हितेश का अनुमान सही था तो अंदर पैंटी नहीं थी. उसने परिवार की किसी स्त्री को पैंटी पहने नहीं देखा था. अगर वो बाहर जाते समय पहनती थीं तो इसका उसे ज्ञान नहीं था. हितेश ने आगे बढ़ते हुए नीलम की नाइटी को ऊपर उठाया और उसे अपने अनुमान पर गर्व हुआ. नीलम की चूत उसके सामने खुली पड़ी थी.

हल्के से उसने बिस्तर पर कोहनी रखी और नीलम की टाँगो को फैलाया और उसकी चूत को देखा. कई दिन की बिना चुदी चूत को देखकर उसके मुंह में पानी आ गया. अपनी जीभ से उसने नीलम की चूत की फांकों को चाटा। नीलम सिहर उठी, पर जागी नहीं. हितेश अपने गंतव्य पर आगे बढ़ता रहा और कुछ ही देर में उसकी लपलपाती जीभ नीलम की चूत के आसपास के हिस्से पर लहराने लगी. नीलम स्वप्न समझकर इस आनंद में डूबी रही. हालाँकि वो अब नींद से बाहर आ रही थी, परन्तु उसकी आँखें अभी भी बंद ही थीं. जब वो जाग भी गयी तो इस डर से आँखें नहीं खोलीं कि कहीं सपना टूट न जाये.

पर उसे तब आश्चर्य हुआ जब उसके भग्नाशे को उसके स्वप्न के पुरुष ने मसला और काटा। उसकी आँखें खुल गयीं. ये स्वप्न नहीं हो सकता. उसने अपनी टांगों के बीच में एक सिर को घुसा पाया, पर वो पहचान न पायी. उसे लगा कि सिया के पति चंद्रेश जिन्हें सब चंदू पुकारते थे, वो उसकी चूत चाट रहे थे. उसने आँखें बंद कर लीं. पर उसे कुछ ठीक नहीं लग रहा था. चंदू के सिर पर तो इतने बाल नहीं थे, और वो भी कुछ कुछ सफेदी ले चुके थे. पर उसकी चूत चाटते हुए पुरुष के बाल घने और काले थे. तो क्या सिया ने भी कोई और चोदू पाला हुआ है? उसने अपनी चूत में घुसे सिर पर एक थपकी दी तो वो रुक गया. पल भर में ही उसका सर उठा और उसकी ऑंखों से आँख मिला बैठा.

“हितेश, तू? यहाँ क्या कर रहा है. अब तो मेरी समस्या और बढ़ गयी. किसी को न कहना बेटा कि मैं यहाँ हूँ.” नीलम ने गिड़गिड़ाते हुए कहा.

हितेश: “अरे मौसी, सबको पता है कि आप यहाँ हो. और मौसा ने ही मुझे यहाँ भेजा है. ये कहकर कि आपको लौटने में अकेले गाड़ी न चलने दूँ और साथ लेकर आऊँ.”

नीलम के मन से एक बड़ा बोझ जैसे हट गया. “और क्या कहा तेरे मौसा ने?”

“यही कि आप निश्चिन्त होकर अपने मन के अनुसार यहाँ रहो और आनंद करो. जब लौटने का मन करे तब मेरे साथ चलना .”

“तो तू मुझे आनंद देने आया है.”

“बिलकुल, पापा और चाचा भी आते ही हैं.” ये कहते हुए हितेश ने अपना मुंह नीलम की चूत पर वापिस लगा दिया.

******************

दिया के घर अब वातावरण सामान्य हो चला था. वैसे तो सभी नीलम और हितेश की कमी अनुभव कर रहे थे, पर ये जानकर संतुष्ट थे कि सब कुछ ठीक ही है और रहेगा. दिया ने सुमति के बारे में बात चलाई तो सब एक दूसरे की ओर देखने लगे. फिर दिया ने बताया कि वो कल रमोना से मिलने जा रही है क्योंकि रमोना उनके परिवार से परिचित है. वो जानने का प्रयास करेगी कि क्या ये संबंध सम्भव है? आकाश ने उसे सतर्क रहने का सुझाव दिया. इसके बाद सभी अपने अपने कमरों में चले गए. चुदाई का ऐसा किसी का कोई विशेष मूड नहीं था और जल्दी ही सब नींद में खो गए.

अगले दिन दिया घर से दस बजे रमोना के घर पहुंची. रमोना ने उसे बताया था कि उसके पति पाँच छह दिनों के लिए बाहर गए हैं और वो आराम से बातें कर सकती हैं. रमोना ने जब द्वार खोला तो ये विदित हो गया कि उसकी अभी अभी चुदाई हुई है. यही नहीं उसके होंठों के एक कोने में एक सफेद द्रव्य का थक्का था जो निश्चित रूप से वीर्य ही था. दिया रमोना की चुदाई की भूख को जानती थी, पर उसे भी इतनी सुबह चुदने में आश्चर्य हुआ.

“अरे, मैंने तुम्हारे कार्यक्रम में व्यवधान तो नहीं डाला?” दिया ने औपचारिक रूप से पूछा.

“नहीं नहीं. अभी एक ही राउंड हुआ है. आगे तुम्हारे जाने के बाद खेलेंगे.” रमोना ने बेझिझक और बेशर्मी से कंधे उचकाते हुए कहा.

“कौन है?” दिया की जिज्ञासा ने उसे पूछने पर विवश कर दिया.

“सचिन ही है, और कौन आएगा इतनी सुबह मुझे चोदने?”

रमोना ने अपने बेटे सचिन के बारे में कहा और दिया का हाथ पकड़कर उसे बैठक में ले गयी और सोफे पर बैठाया. फिर वो किचन से पानी और कुछ अल्पाहार लायी और बीच टेबल पर रखा और दिया के सामने के सोफे पर बैठ गयी. उसका गाउन ढलक गया और उसके स्तन बाहर झलक पड़े. रमोना ने उन्हें छुपाने का कोई प्रयास नहीं किया. ये साफ था कि वो गाउन के नीचे नंगी ही थी.

“क्या बात है, कुछ विशेष बात करनी थी क्या?” रमोना ने समय व्यर्थ न करना ही उचित समझा.

दिया ने एक गहरी साँस ली और फिर अपनी बहन के देवर और सुमति के बारे में बात की. उसने बताया कि उसका देवर विवाह तो करना चाहता है, परन्तु वो अपनी भाभी सिया को भी नहीं छोड़ना चाहता. बात जब समाप्त हुई तो रमोना के चेहरे पर मुस्कान थी.

“तो मुझसे क्या चाहती हो?” रमोना ने पूछा.

“मुझे पता है कि तुम भी उस परिवार को जानती हो, विशेषकर शोनाली को. मैं ये जानना चाहती हूँ कि क्या सुमति हमारी जीवनशैली में स्थापित हो पायेगी?” दिया ने अपना प्रयोजन बताया.

रमोना का अट्टहास ने उसे डरा ही दिया. जब रमोना की हंसी रुकी तो उसकी आँखों में आँसू थे.

उसने कहा, “वैसे इसका उत्तर मैं दे सकती हूँ, पर मैं चाहूँगी कि सचिन तुम्हारी ये दुविधा दूर करे.” रमोना ने सचिन को पुकारा और कहा कि दिया आंटी आयी हैं.

दिया अपनी आपत्ति भी न जता पायी कि इस संदर्भ में सचिन को न बुलाया जाये. पर अब देर हो चुकी थी. सचिन कमरे में आया तो उसने भी एक गाउन ही पहना हुआ था और उसके लंड का उभार साफ दिख रहा था.

वो दिया के पास गया और उसके गाल चूमे, “हैलो आंटी।”

“हैलो सचिन. मम्मी ने तुम्हे बेकार ही बुला भेजा.” दिया ने बोला।

“नो प्रॉब्लम आंटी, आपसे मिलकर हमेशा अच्छा ही लगता है.” सचिन ने मक्खन लगाया.

रमोना ने बात को आगे चलाया, “आंटी जानना चाहती हैं कि सुमति के लिए अगर कोई विवाह का संबंध आये और वो भी ऐसे घर से जहाँ पारिवारिक चुदाई चलती हो तो क्या ये ठीक होगा?”

सचिन अचम्भे से कभी दिया को तो कभी अपनी माँ को देखने लगा.

“इसका उत्तर तो आप भी दे सकती थीं, मुझे क्यों बुलाया?” सचिन थोड़ी खीझ के साथ बोला।

“क्योंकि तुम सागरिका और निखिल के विवाह के तय करने वाली पार्टी में सम्मिलित थे, मैं नहीं.”

दिया का सिर घूम रहा था. अब ये नया मोड़ कहाँ से आ गया.

सचिन: “ओके मॉम. अब अपने मुझे बुलाया ही है तो ठीक है, पर इसके लिए आपको मुझे विशेष पुरुस्कार देना होगा.”

रमोना की आँखों की चमक बढ़ गयी, “जो मेरा बेटा चाहे.”

सचिन: “आंटी, आपको बता दूँ की पार्थ के घर में भी इसी प्रकार की जीवन शैली है. पार्थ अपनी माँ, बुआ और अपनी दोनों बहनों को चोदता है. इसीलिए, इस मापदंड पर कोई भी समस्या नहीं है. और तो और पार्थ की बहन सागरिका का विवाह जो निखिल के साथ तय हुआ है, उसके पहले उन्होंने दोनों परिवारों के मिलन की एक पार्टी रखी थी, जिसमे मैं और कुछ अन्य मित्र भी बुलाये गए थे पार्थ के द्वारा. सौ बात की एक बात निखिल के परिवार में भी यही प्रचलन है. तो आप बिना चिंता के इस संबंध के बारे में आगे बढ़ सकती है. आपको मेरी शुभकामनायें हैं.”

दिया को अभी तक विश्वास ही नहीं हुआ था.

“मतलब, शोनाली और शीला के परिवार भी…”

“आपका मोहल्ला आठ बंगलों का ही है, पर वहाँ क्या क्या होता है, ये अभी भी आपको नहीं पता. बस ये जानिए की स्मिता (शेट्टी) का परिवार भी ऐसी ही जीवन शैली में लिप्त है.”

“और कोई?”

“समय के साथ सब जान जाइएगा. ओके मॉम मैंने अपना वादा पूरा किया अब मेरा पुरुस्कार दो.”

“हट बदमाश, घर पर अथिति है और मुझसे मांग रहा है. दिया, क्या तुम सचिन से चुदवाने की इच्छुक हो?”

तभी सचिन बोल पड़ा, “आंटी आप चाहो तो मैं पार्थ से चार बजे आने का अनुरोध कर सकता हूँ. आप उससे अन्य प्रश्न भी पूछ सकती हैं. और चाहे तो हम दोनों को भी ट्राई कर सकती हैं.”

दिया ने बिना सोचे ही उत्तर दे दिया, “ठीक है, बुला लो.”

सचिन ने पार्थ को फोन किया तो पार्थ ने चार बजे आने में असमर्थता जताई पर पाँच बजे के लिए स्वीकृति दे दी. फोन रखकर सचिन ने दिया को देखा, “पाँच बजे.”

“ठीक है.” ये कहते हुए दिया उठने लगी तो रमोना ने टोका, “पक्का तुम्हें सचिन से नहीं चुदना है अभी?”

“हाँ. मुझे कुछ सोचना है और सिया से भी बात करनी है.”

“ये अच्छा ही है. क्योंकि अब मैं सचिन से गांड मरवाकर उसे उसका पुरुस्कार दूँगी।”

ये कहते हुए रमोना उठी और अपना गाउन हटाकर सचिन के गाउन को एक ओर किया और सचिन के पहले से तने लंड को अपनी गांड के छेद पर रखा और उसपर बैठती चली गयी. दिया ने रमोना को देखा और फिर घर से बाहर निकल गयी. द्वार स्वतः उसके पीछे बंद हुआ और लॉक भी हो गया.

******************

दिया घर जाते हुए दुविधा में थी. किसे पहले बताये? आकाश को? या सिया को? उसने जो आज जाना था वो बहुत विस्फोटक था. उसने कभी ये सोचा भी न था कि शोनाली, शीला और स्मिता के परिवार इस प्रकार से लिप्त होंगे. फिर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी. यही बात अगर लोगों को उनके बारे में पता चली तो वो भी यही सोचेंगे. ऐसा नहीं था कि संबंध तय होना ही था. कई अड़चनें थीं. क्या सुमति अपने परिवार को इस आयु में छोड़कर जाना चाहेगी? फिर पार्थ का या उसके व्यवसाय का क्या होगा? अगर ये न हुआ तो क्या प्रकाश यहाँ आना चाहेगा? कुछ चिंतन के बाद उसे लगा कि प्रकाश को यहाँ आने में कोई अधिक आपत्ति या समस्या नहीं होगी.

घर पहुंचने पर उसने देखा कि सब जा चुके थे. उसने अपने लिए कॉफी बनाई और सोफे पर बैठ गयी. पहले उसने आकाश को फोन किया.

“हैलो, हाँ मैं रमोना से मिलने गयी थी. समाचार अच्छा ही है. शाम आप जब आओगे तब बताती हूँ. और हाँ, मैं रमोना के पास शाम पाँच बजे फिर जाऊँगी, कुछ और जानकारी लेने और किसी से मिलने.”

“,”

“ शाम सब बता ही दूंगी, अधिक उत्सुक मत हो जाइये अभी से. हो सकता है कि बात उलटी ही निकले.”

“बाय, लव यू।”

कॉफी पीते हुए उसने इस बार सिया को फोन किया. फिर काट दिया. “खाने के बाद करूंगी नहीं तो लम्बा समय निकल जायेगा।” ये सोचकर कॉफी समाप्त करने के बाद उसने खाना बनाने का काम आरम्भ किया.

जब तक खाना बना तो एक बजे से ऊपर हो चुका था और कनिका भी आ गयी.

“हैलो मॉम, क्या बनाया है? अपने खाया?’

दिया ने उसे बताया और कहा कि वो भी अब खाने ही जा रही है.

“फिर आप बस दस मिनट रुको, मैं भी साथ में खा लेती हूँ. ओके?”

दिया ने खाना टेबल पर लगाया और कनिका की राह देखने लगी. कनिका कहे अनुसार दस मिनट में ही आ गयी. और माँ बेटी गपशप करते हुए खाना खाती रहीं. इसके बाद कनिका अपने कमरे में चली गयी और दिया ने भी सोचा आधे घंटे सोने के बाद सिया से बात करुँगी. आधे घंटे की नींद के बाद उसने अपने कमरे में से ही लेटे हुए सिया को फोन लगाया.

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जब सिया का फोन बजा तो वो फोन उठाने की स्थिति में ही नहीं थी. उसने अपने फोन को टेबल पर बजते हुए देखा और कुछ न कर पायी. करती भी कैसे. उसका पति चंद्रेश और देवर प्रकाश अपने कहे अनुसार जल्दी आ गए थे. ये जानकर भी कि नीलम घर में है, प्रकाश ने सिया को अपनी गोद में उठाया और उसके कमरे में ले गया. उसका पति चंद्रू भी हँसता हुआ उनके पीछे हो लिया. सिया उन्हें ये तक न बता पायी कि हितेश भी आया है. आननफानन में उसके कपड़े उतारकर उन्होंने सिया को नंगा किया और चंद्रेश नीचे लेटे और सिया को अपने लंड पर चढ़ा लिया. पीछे से प्रकाश ने भी आव देखा न ताव और अपना लंड उसकी गांड में ठूंस दिया. दोनों भाई सिया की ताबड़तोड़ चुदाई में व्यस्त हो गए.

सिया भी अब सब कुछ भूलकर अपनी इस अकस्मात चुदाई का आनंद लेने लगी. हालाँकि ये इन दोनों का लगभग प्रतिदिन की दिनचर्या बन गई थी. दोनों जब भी लौटते थे तो पहले सिया को चोदते फिर कुछ और बात करते. बस कौन किस छेद को पेलता था यही बदलता था. जैसे आज प्रकाश को उसकी गांड मारने का अवसर मिला था. इस घनघोर चुदाई के बीच में ही सिया का फोन बजा था और फिर शांत हो गया था. दोनों भाई पूरी शक्ति के साथ सिया को चोदने के बाद जब झड़े तब उन्होंने ने चैन की साँस ली. तीनों हाँफते हुए बिस्तर पर लुढ़क गए.

“हितेश भी आया है.” सिया ने साँसे समान्य होने पर कहा.

“अरे! तो बताया क्यों नहीं. तुम्हारा मुंह व्यर्थ ही में खाली रह गया.” चंद्रेश ने हंस कर कहा.

“आपको इसके सिवाय कुछ सूझता भी है. मुझे अपने एक पल का भी समय नहीं दिया और पेल दिया.”

“क्या करें भाभी, आपको देखने की चाह में ही लंड खड़ा हो जाता है और चोदे बिना नहीं बैठता.”

“अब नीलम भी आ गयी है, तो मुझे कुछ विश्राम मिलेगा.”

“हितेश कहाँ गया?” इस बार चंद्रेश ने पूछा.

“नीलम को जगाने गया था जब आप लोग आये थे, अब तक तो चोद रहा होगा.” सिया ने कहा.

“चलो अच्छा है, आज रात मजे आएंगे.” चंद्रेश ने कहा और बाथरूम में घुस गया.

बाहर आया तो कपड़े पहने फिर सिया से पूछा कि नीलम किस कमरे में ठहरी है. सिया ने बताया कि हितेश के कमरे में ही है, और वो भी बाथरूम में घुस गयी. प्रकाश कपड़े हाथ में लिए अपने कमरे में चला गया. चंद्रेश हितेश के कमरे की ओर चल दिया.

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सिया ने भी बाथरूम जाने के बाद कपड़े बदले और फिर अपना फोन देखा तो दिया का फोन आया था. उसने दिया को फोन लगाया.

सिया: “हाँ, फोन किया था?”

दिया: “कहाँ थी”

सिया: “ये दोनों जल्दी आने को कहे थे न, तो जल्दी आ टपके. और चढ़ गए मेरे ऊपर. तुम्हारा फोन आया तो दोनों चोद रहे थे. ये चूत में थे तो प्रकाश गांड मार रहा था. कैसे उठाती फोन?”

दिया: “वैसे तुम्हारी चाँदी है. तीन तीन के बीच में अकेली हो, खूब चुदती हो.”

सिया: “जिसकी फटती है उसे ही पता रहता है. ये तो अच्छा है हितेश तुम्हारे घर पर है नहीं तो तीनों मेरी गांड फाड़ देते थे. कहाँ से इनमे इतना दम है?”

दिया: “तुम्हें देखते ही दम आ जाता है. पर क्या तुम आपत्ति कर रही हो?”

सिया: “अरे बिलकुल नहीं. पर कभी थोड़ा विश्राम भी तो चाहिए होता है. वैसे आज मुझे नीलम की चिंता हो रही है. ये तीनों आज उसका माँ चोद देंगे. मुझे दो तीन दिन का विश्राम मिल जायेगा. और बताओ फोन क्यों किया था?”

दिया ने रमोना से मिली हुई जानकारी सिया को दी. सिया ने उसकी पूरी बात सुनी.

सिया: “वैसे ये प्रकाश से सांकेतिक भाषा में कह चुके हैं कि वो इनका काम किसी और शहर में भी फैलाये. इनका स्वयं जाना सम्भव नहीं है, और प्रकाश अभी अकेला है तो जा सकता है. तो एक समस्या का तो हल है. अब रही बात कि ये दोनों एक दूसरे को लाइक करेंगे या नहीं, इसका केवल यही उपाय है कि उन्हें साथ लाया जाये. अगर बात बनी तो ठीक, नहीं तो कोई बात नहीं.”

दिया: “वैसे मैं सुमति के बेटे से मिलने वाली हूँ शाम पाँच बजे. टटोल कर देखती हूँ, कि वो क्या इसके पक्ष में है. अगर उसने सहमति दी तो संभावना बढ़ जाएँगी. पर बेचारा प्रकाश तुमसे दूर रह भी पायेगा?”

सिया: “अरे रह लेगा. सिया नहीं तो दिया सही. और उसे तो इतनी और स्त्रियां मिल जाएँगी. पागल ही होगा जो नहीं मानेगा.”

दिया और सिया ने कुछ देर और बातें के बाद फोन काट दिया. सिया बाहर गयी तो घर शांत था. प्रकाश का तो समझा जा सकता था कि वो अपने कमरे में होगा, पर चंद्रेश को देखने के लिए वो हितेश के कमरे में गयी. देखा तो चंद्रेश नीलम से बात कर रहा था और हितेश नीलम के पास बैठा था. नीलम की चूत से पानी बह रहा था जो हितेश का ही था. तीनों बड़े सामान्य रूप से बातें कर रहे थे. जब सिया अंदर गयी तो नीलम की आँखें भीग गयीं.

“दीदी, अपने मुझे बचा लिया.”

सिया: “ऐसा कुछ नहीं है, अब आराम से तीन चार दिन रहो फिर जाना.” फिर चंद्रेश को देखते हुए बोली, “तुम रहोगी तो ये दोनों भाई मुझे थोड़ा छोड़ देंगे. और मैं भी अपने बच्चे के साथ कुछ रातें बिता पाऊँगी.”

चंद्रेश को ख़ुशी हुई कि अब तीन चार दिन के लिए उसे नीलम की चुदाई का लाइसेंस मिल गया. प्रकाश भी खुश ही होगा. अब चूँकि प्रकाश नहीं था तो उसने दिया से की हुई बात को संक्षेप में बताया. नीलम को भी आश्चर्य हुआ पर उसने कहा कि उसे लगता है कि पार्थ सुमति को मना लेगा. कोई भी बेटा अपनी माँ को यूँ अकेला नहीं देखना चाहेगा. इस सकारात्मक सोच के साथ मंत्रणा हुई कि प्रकाश को कैसे मनाया जाये.

नीलम: “ऐसा करते हैं कि दीदी और हितेश को किसी बहाने से बाहर भेज देते हैं और जीजाजी प्रकाश को मुझे छोड़कर आने के लिए कहेंगे. आगे का पूरा कार्यक्रम मैं और दिया भाभी संभाल लेंगे. हमसे बच कर कहाँ भागेगा?”

सब इस षड्यंत्र पर हंस पड़े.

“पर मैं जाऊँगी कहाँ?”

‘अपनी बहन के घर, और कहाँ? जब मैं प्रकाश को लेकर पहुँचूँ बस उस समय आप दोनों वहाँ मत रहना.”

चंद्रेश ने दुखी चेहरा बनाकर कहा, “यानि मुझे अकेले छोड़ दोगे?”

नीलम, “जीजाजी, आप भी चलो न. बिलकुल आखिरी समय पर बोलना कि आप भी चलोगे. तब तक प्रकाश भी वचनबद्ध होगा.”

“हम्म्म, स्त्रियों के षड्यंत्रों के सामने हम भोले भले पुरुष कहाँ टिक सकते हैं. समझे हितेश?”

“बिलकुल पापा.”

सब हँसते हुए अपनी योजना पर खुश हो गए. नीलम और हितेश ने बाथरूम में जाने के बाद कपड़े पहने और फिर सबके साथ बैठक में चले गए.

******************

जब दिया रमोना के घर की ओर चली तब उसे इस पूरी योजना के सफल होने की भरपूर आशा थी. देखना ये था कि पार्थ क्या निर्णय करता है. अब जब ये भी तय हो गया था कि प्रकाश यहाँ कम्पनी का नया ऑफिस खोल सकता है, तो उसे अधिक कठिनाई नहीं दिख रही थी. परन्तु पहले पार्थ और फिर सुमति क्या निर्णय लेगी ये अभी तक पता नहीं था. और तो और प्रकाश को अभी भी उनकी इस योजना की भनक नहीं थी. पर सिया विश्वस्त थी कि उसकी ओर से कोई विशेष प्रतिरोध नहीं होगा.

पाँच बजने के कुछ पूर्व ही दिया ने रमोना के घर की घंटी बजे और सजी संवरी रमोना ने उसे घर में आने के लिए कहा. रमोना ने कोई इत्र लगाया था जो बहुत ही आकर्षक था. सचिन भी यथोचित वस्तओं में था. उन्हें देखकर सुबह के दृश्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. रमोना और दिया बातें करने के लिए अभी बैठे ही थे कि फिर से घंटी बजी और इस बार सचिन पार्थ को लेकर अंदर आया. पार्थ दिया को देखकर भौंचक्का सा रह गया, परन्तु उसने अपने आपको तुरंत संभाला.

“हैलो, दिया आंटी। आप रमोना जी को जानती हो?”

दिया को दोनों सम्बोधनों के अंतर का कारण समझ आ गया. उसने हामी भरी और फिर रमोना उठकर पार्थ के पास गयी.

“बहुत व्यस्त हो गए हो जो मुझे समय ही नहीं देते. कितने दिनों से तुम्हारी राह देख रही हूँ, पर…”

इससे पहले कि रमोना कुछ राज खोल पाती पार्थ ने उसे चुप करा दिया.

“ऐसा नहीं है, आपने भी तो याद नहीं किया. और देखो, सचिन ने मुझे बुलाया और मैं चला आया.”

रमोना भी समझ गयी कि क्लब की बात दिया के सामने बोलते बोलते उसे पार्थ ने रोका था. उसने पार्थ को बैठाया और फिर बात आरम्भ की.

“पार्थ, मैं दिया को बहुत समय से जानती हूँ. हम दोनों एक साथ खेलते भी हैं कभी कभी.” इस बात पर पार्थ ने दिया को देखा तो दिया ने उसे मुस्कुराकर देखा.

“बात ये है, और मैं सीधे असली बात पर आ रही हूँ, कि दिया की बहन सिया है जो दूसरे शहर में रहती हैं, उनका एक देवर है. आयु कोई चालीस के लगभग होगी. परन्तु उन्होंने आज तक विवाह नहीं किया. मुख्यतः क्योंकि वो सदा से सिया जैसी लड़की ढूंढते रहे और दूसरे उन्हें सिया का साथ भी मिला हुआ था. तीसरी बात ये थी कि उन्हें भी ऐसा परिवार चाहिए था जो परिवारिक सम्भोग को बुरा न मानता हो, या उसमे लीन हो. पर कल ही हितेश ने बिना ये जाने कि तुम्हारा परिवार भी इस प्रकार के संबंधों का अनुगमन करता है, सिया से सुमति के बारे में कहा.”

पार्थ के चेहरे के भाव पढ़ने की चेष्टा करते हुए रमोना आगे बोली, “दिया सुबह मेरे पास आयी थी और मैंने उसे विश्वास दिलाया कि ये जीवन शैली रुकावट नहीं है. अब हम ये जानना चाहते हैं कि क्या तुम अपनी माँ के लिए प्रकाश को पति के रूप में और अपने पिता के रूप में स्वीकार करोगे.”

पार्थ सोच रहा था. उसने दिया को देखा जो आशापूर्ण आँखों से उसे देख रही थी. वो खड़ा हुआ और कुछ देर यूँ ही कमरे में घूमता रहा. कमरे का वातावरण तनावपूर्ण हो चला.

फिर वो बैठा और पहले रमोना को देखा और फिर दिया से बोला, “वैसे मुझे पिता की आवश्यकता तो नहीं है, परन्तु माँ को एक पति की कमी कई बार खलती है. वो हम सबसे अपना प्यार बाँट तो लेती हैं, पर पापा के गुजरने के बाद उनके मन में एक विषाद अवश्य है. तो मुझे इस प्रस्ताव में कोई बुराई नहीं लगती. और आवश्यकता हो न हो, अगर मुझे एक पिता भी इसमें मिल जाएँ तो सोने पर सुहागा.”

दिया से अब रुका नहीं गया वो उठी और पार्थ से चिपक गयी.

“मुझे तुम्हारी यही बात सुननी थी, पार्थ. अब हमें आगे क्या करना है ये भी बताओ. वैसे नीलम तीन चार दिनों में प्रकाश के साथ आ रही है. उन दोनों को मिलाना और फिर आगे ले जाना, ये कैसे हो पायेगा?”

पार्थ: “इस सारे का उत्तरायित्व अच्छा हो अगर हम शोनाली बुआ, और परिवार की स्त्रियों पर छोड़ दें. ये मेरे अकेले के बस की बात नहीं है. मैं अपनी स्वीकृति देकर उन्हें ये काम सौंपना ही ठीक समझता हूँ.”

रमोना: “देखा दिया, मैंने कहा था न, लड़का बहुत समझदार है.”

पार्थ: “तो सचिन अगर और कुछ न हो तो मैं चलूँ. मैं बुआ से बात करके उन्हें इस कार्य पर लगा देता हूँ. वैसे शीला नानी भी सहायता कर सकती हैं.”

रमोना के स्वर में वासना भर गयी, “पार्थ, इतने दिनों में मिले हो और बिना कुछ किये चले जाओगे क्या?”

पार्थ हंस पड़ा, “आप बताओ, क्या करना है.”

“तुमसे गांड मरवाये हुए बहुत दिन हो गए. तो क्यों नहीं तुम और सचिन पहले जैसे मेरी डबल चुदाई करते?”

“और दिया आंटी क्या करेंगी?”

“अरे उसे भी आज अपने लंड का स्वाद दो, तभी तो वो तुम्हारी माँ की सहायता पूरे मन से करेगी. पर मेरे बाद. क्यों दिया, तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं?”

“नहीं, वैसे मैं इसके लिए तैयार ही होकर आयी थी.”

“तो चलो फिर शयनकक्ष में, यहाँ समय व्यर्थ करने से क्या मिलना है.”

चारों उठकर रमोना के शयनकक्ष में चले गए.

******************

शतरंज के मोहरे बिछ चुके थे. पर एक ओर के राजा और दूसरी ओर की रानी की अभी इसकी भनक भी न थी. वे दोनों अपनी जीवनचर्या में व्यस्त थे. प्रकाश अपनी भाभी की गांड मारने के बाद उनके जैसी ही कोई और चुदक्क्ड़ स्त्री को अपनी पत्नी बनाने के सपने में खोया हुआ था. पर अब इस आयु में उसे इसकी संभावना धूमिल ही लगती थी.

सुमति अपने सर्वाधिक प्रिय कार्य में व्यस्त थी. वो सागरिका की गांड से बहते हुए नितिन के वीर्य को पीने में व्यस्त थी. ये बात अलग थी कि अभी उसे अपनी गांड में से भी निखिल के वीर्य को पीने का अवसर मिलने वाला था. निखिल उसकी गांड मारकर अब झड़ने के निकट था. वो अपनी इस स्वप्निल जीवन के लिए अपने भाई को धन्य करती थी. हालाँकि, उसके मन में रह रह कर एक हूक सी उठती थी कि कोई उसका अपना भी हो. पर उसकी आयु की विधवा से विवाह करने के लिए कोई भी नहीं मानेगा. उसने सागरिका की गांड साफ की और निखिल के निस्तार होने की राह देखने लगी.

बिस्तर पर लेटी हितेश से चुदवाती हुई नीलम भी अपने भाग्य को धन्य कर रही थी. उसकी एक गलती ने जीवन भर का श्राप न बनकर उस पर एक कर्ज सा चढ़ा दिया था. सिया ने उसकी जितना सहायता की थी, वो अपूर्व थी. सिया के बेटे हितेश की पीठ पर अपनी टाँगें जकड़ते हुए वो अपर्याय रूप से उसे धन्यवाद करने लगी. सिया अपनी चुदाई से संतुष्ट होकर अब दिया के फोन की प्रतीक्षा में थी. उसे आशा थी कि चंद्रेश और प्रकाश चाहे दोनों नीलम को रात भर चोदे पर उसके लिए उसके बेटे को छोड़ दें.

पटेल परिवार के अन्य सदस्य घर जाने के लिए निकल चुके थे. आकार ने निशा को क्षमा करते हुए काम पर वापिस बुला लिया था, जिसका आभार उसने अपनी गांड में आकार के लंड को लेकर व्यक्त किया था.

दिया रमोना को चुदाई के लिए तैयार होते देख रही थी और अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रही थी.

शाम सात बजे दिया को छोड़कर सभी घर पहुंच चुके थे.

******************

सिया का घर:

जब चंद्रेश और प्रकाश सिया की चुदाई में व्यस्त थे, हितेश नीलम की सवारी कर रहा था. नीलम की चूत को मन भर के चाटने के बाद जब उसने नीलम की चूत से छूटा हुआ रस पी लिया तो उसने अपने लंड पर ध्यान दिया. लंड कड़क हो चुका था, और सामने चूत खुली हुई थी. नीलम ने आँखें खोलकर उसे आगे बढ़ने का निमंत्रण भी दे डाला और हितेश को कोई संकोच नहीं हुआ. उसने नीलम के फैले हुए पैरों के बीच में यथावत स्थान बनाया और फिर अपने लंड को नीलम की चूत पर रगड़ने लगा. नीलम कुनमुनाई.

“अब समय मत व्यर्थ कर. चोद दे, इतने दिनों से तुम सबने मुझे जो अलग किया हुआ था मेरी तो चूत सिकुड़ ही गयी होगी. अब देर न कर. चोद डाल अपनी मौसी को.” नीलम ने विनती की.

हितेश ने अपने लंड को अब सीधा किया और एक तगड़े धक्के के साथ नीलम की प्यासी चूत में उतार दिया. चूत सम्भवतः सच में सिकुड़ गयी थी, क्योंकि हितेश के इस धक्के से जहाँ पहले पूरा लंड अंदर चला जाता था, आज आधा या उससे कुछ ही अधिक जा पाया था.

“सच में मौसी, आपकी चूत तो तंग हो गयी है. लगता है इस प्रकार का सन्यास थोड़े थोड़े दिनों में अच्छा रहेगा आप सबके लिए.”

“गांड मार दूँगी भोसड़ी के अगर ऐसी बकवास की तो. मादरचोद अपनी माँ को सन्यास दिलवाना, जिसकी गांड और चूत में दिन रात लौड़े जाते हैं.” नीलम तिलमिला गयी.

“अरे मौसी, गुस्सा क्यों कर रही हो. मैंने तो बस यूँ ही कहा था.” हितेश डर के बोला।

“ठीक है. पर ऐसी बात फिर मत करना. तुम सबसे से चुदने में ही तो मेरे जीवन का आनंद है. कैसे तड़पी हूँ मैं इतने दिन, तू क्या जाने. अब अच्छे से चुदाई कर और ढीली कर दे मेरी चूत को फिर से. रात में न जाने कौन पेलने वाला है आज.”

हितेश को पता था कि आज नीलम की रात में भयंकर चुदाई होगी. उसके पिता और चाचा उन्हें छोड़ने वाले नहीं थे. वो तो उसकी माँ न होती तो उसे भी साथ ले लेते. पर सिया की चुदाई किये भी हितेश को एक लम्बा समय हो चला था और वो आज की रात अपनी माँ की चुदाई करना चाहता था. हितेश अब पूरे लंड से नीलम की चुदाई कर रहा था. नीलम भी इतने दिनों के बाद चुदाई होने से आनंद के महासागर में गोते लगा रही थी. अपनी गांड उछाल कर वो भी हितेश के शक्तिशाली धक्कों का पूरा प्रतिउत्तर दे रही थी. चुदाई की थापों ने कमरे में शोर मचाया हुआ था. नीलम की चूत से इतना पानी झरने के समान बह रहा था कि चुदाई की ध्वनि भी थप थप से बदल कर छप छप हो चली थी.

हितेश अपने पूर्ण सामर्थ्य से नीलम को चोद रहा था और नीलम भी बिना पीछे हटे अपनी कमर और गांड उठा उठा कर चुदवा रही थी. नीलम की एक तेज चीख ने कमरे को हिला दिया. उसका शरीर ढीला पड़ गया और वो शांत हो गयी. हितेश अभी भी अपने लंड से उसे चोद रहा था, पर अब वो भी रुक न पाया और नीलम की चूत में अपने लंड के रस की वृष्टि करने लगा. पूरा झड़ने के बाद वो नीलम के ऊपर से हटा और उसके साथ ही लेट गया. दोनों एक दूसरे को चूमने लगे.

“मुझे इसकी बहुत आवश्यकता थी. मेरी एक गलती के कारण मेरा इतने दिनों का उपवास जो हो गया था.” नीलम ने संतुष्टि की साँस लेकर हितेश को चूमते हुए कहा.

“आपका उपवास टूटा है अभी तो, रात को देखिये क्या होता है. मुझे पूरा विश्वास है कि आज की रात आपको पापा और चाचा एक साथ चोदने वाले हैं.” हितेश ने उसे अपने विचार बताये.

“मुझे भी यही आशा है. पर अब मैं कुछ देर के लिए सोना चाहती हूँ. तुम भी मेरे साथ ही लेटो, कहीं जाना मत. किसी की बाँहों में सोये हुए बहुत दिन निकल गए.” नीलम ने कहा. “और फिर रात में न जाने कितनी देर जागना पड़े.”

हितेश ने उसे अपनी बाँहों में लिया और कुछ ही देर में नीलम सो गयी. कोई आधा घंटा ही हुआ था कि कमरे का द्वार खुला और चंद्रेश ने प्रवेश किया. नीलम और हितेश को आया देखकर उसने कुछ न कहा. पर नीलम के नंगे शरीर को देखकर उसका लंड फिर से अंगड़ाई लेने लगा. आज की रात इसे अच्छे से चोदुँगा ये सोचते हुए उसने उनके ऊपर एक चादर डाली और कमरे से निकल गया. प्रकाश अपने कमरे में था. कुछ सोचकर वो दोबारा नीलम के कमरे में गया तो देखा कि हितेश जागा हुआ था और नीलम का हाथ पकड़कर बैठा था. नीलम भी जाग गयी थी. चंद्रेश को देखकर वो बैठ गयी और चादर नीचे सरक गयी. नीलम ने अपने शरीर को छुपाने का कोई प्रयास नहीं किया. बल्कि उसने चादर हटा दी.

चंद्रेश और नीलम बात करने लगे और तभी सिया अंदर आयी और नीलम की चूत से हितेश के रस को बहते हुए और अपने पति की नीलम से बात करते हुए देखा. फिर वे चारों प्रकाश और सुमति के लिए अपनी योजना को पक्का करने में जुट गए.

******************

दिया का घर:

सब लोग दिया को ही देख रहे थे. और फिर दिया ने बताना आरम्भ किया.

“जैसा कि मैंने बताया, पार्थ को ये संबंध स्वीकार है और वो शोनाली और शीला को इसके लिए पहल करने की विनती करेगा. हम चारों रमोना के शयनकक्ष में चले गए. रमोना और सचिन के साथ तो आप सब जानते ही हो मैं चुदाई पहले भी कर चुकी हूँ. पर पार्थ के बारे में मैं उत्सुक थी. रमोना ने ही पहल की और अपने कपड़े निकालने में अधिक देर न लगाई. मैं भी यही कर रही थी. सचिन को भी नंगा होने में अधिक समय नहीं लगा. उसका मोटा लंड खड़ा हो चुका था. पार्थ कुछ अधिक ही समय ले रहा था. पर अंततः जब वो नंगा हुआ तो मैं उसे देखकर आकर्षित हुए बिना नहीं रह पायी.”

“ये कोई नयी बात नहीं है. आप हर नए लंड को देखकर आकर्षित ही होती हो, मॉम.” दर्शन के इस कथन पर सब हंस पड़े और दिया शर्मा सी गयी.

“बात ये है कि पार्थ का लंड सचिन से भी अधिक लम्बा और मोटा दिख रहा था, और अभी भी वो अपने पूरे जोश में नहीं था. मैं रमोना की क्षमता से प्रभावित हो गयी क्योंकि उसके कहे अनुसार वो पार्थ से गांड भी मरवा चुकी थी. पार्थ अपने लंड को झुलाता हुआ मेरे सामने आ खड़ा हुआ.”

“आंटी, आप इसे प्यार करो तो इसे बहुत ख़ुशी होगी.”

“मैंने रमोना को देखा जिसने सिर हिलाकर सहमति दिखाई और स्वयं सचिन के लंड को अपने मुंह में लेकर चाटने लगी. मैंने भी पार्थ के लंड को हाथ में लिया तो वो बहुत ही भारी लगा. कुछ देर तक उसे यूँ सहलाते हुए मैं उसे बढ़ता हुआ देखती रही. पार्थ में संयम बहुत है. उसने इस पूरे समय एक बार भी किसी प्रकार से मुझे नहीं छुआ. पर जब उसके लंड पर मैंने मदन रस की बून्द को चमकते हुए देखा तो रुकना मेरे लिए सम्भव न हुआ. मैंने उसके लंड को मुंह में लिया और चाटने लगी. इस बार पार्थ ने मेरे सिर को अपने हाथ से हल्के से पकड़ा और अपनी ओर से भी लंड मुंह में डालने का प्रयास करने लगा.”

परिवार के सदस्य दिया की इस कहानी को बड़े ध्यान से सुन रहे थे.

“कुछ देर के बाद पार्थ ने कहा कि क्यों न हम बिस्तर पर चलें जिससे कि वो भी कुछ स्वाद ले पाए. हम दोनों उठे और बिस्तर पर गए. सचिन और रमोना पहले ही वहाँ जमे हुए थे और रमोना लेटी थी और सचिन उसके ऊपर चढ़ा हुआ अपने लंड से उसका मुंह चोद रहा था. साथ ही साथ उसका मुंह रमोना की चूत में घुसा हुआ था. पार्थ ने कहा कि वो नीचे रहेगा जिससे कि मैं अपने अनुसार उसके लंड को चूस सकूँ। मुझे भी ये सुझाव सही लगा और मैंने पार्थ को लेटने दिया. लेटने के बाद उसके लंड के आकार को देखकर मुझे थोड़ा डर सा लगा. मोटा अजगर की तरह लम्बा लंड है उसका. मैंने साहस बांधकर उसके मुंह पर अपनी चूत रखी और फिर आगे झुकते हुए उसके लंड को चाटा। फिर धीरे धीरे अपने मुंह में लिया. जब मुझे लगा कि और लेना मेरे लिए सम्भव नहीं है तो मैं उतने ही लंड को चूसने लगी. चूसने से मुझे लगा कि उसका लंड और कड़ा और बड़ा हो गया. पर अब मैं भी रुकने वाली तो थी नहीं. मन लगाकर उसके लंड को चूस रही थी. कुछ और लंड भी इस प्रक्रिया में अंदर गया पर अधिक नहीं.”

“बिस्तर के दूसरी ओर कुछ गतिविधि हुई तो मैंने सिर घुमाकर देखा तो अब सचिन रमोना की टाँगों के बीच बैठा अपने लंड को उसकी चूत पर घिस रहा था. रमोना की सिसकारियां उसके अंदर भड़कते ज्वालामुखी को दर्शा रही थीं. आप लोग तो जानते ही हो, रमोना चुदवाती है तो कितना चिल्लाती है. और उसकी सीत्कार निकली जब सचिन ने अपना लंड अंदर डाला. मेरा ध्यान उचट गया था, पर मैंने पार्थ के हाथ को अपने सिर पर अनुभव किया और अपने लंड पर दबा दिया. इसके कारण मेरे मुंह से लंड गले में चला गया और मैं साँस लेने के लिए व्याकुल हो उठी. पार्थ ने तुरंत ही अपना हाथ हटाया और मैंने भी लंड को मुंह से निकाला और फिर से मुंह डालकर चूसा..”

“अब हम चुदाई कर सकते हैं, आंटी।”

“पार्थ ने जब कहा तो मेरी चूत जो उसके मुंह पर थी भकभकाकर झड़ गयी. मुझे ऐसी गुदगुदी सी हुई कि मुझे कुछ क्षणों के लिए कुछ समझ ही नहीं पड़ा. पर जब मैं चेतना में आयी तो इस बार मैं बिस्तर पर लेटी थी और पार्थ मुस्कुरा रहा था. मैंने नीचे देखा तो उसका लंड मेरी चूत के मुहाने पर था और हल्के हल्के से मेरी चूत को रगड़ रहा था. मैंने पार्थ को देखा तो उसे सम्भवतः कुछ भी दिखा होगा. उसने मुझे विश्वास दिलाया कि वो मेरी इच्छा और मांग के अनुसार ही चोदेगा और मैं भी उसकी बात से आश्वस्त हो गयी. मैंने एक तकिया अपने सिर के नीचे लगाई और अपनी चूत को देखने के लिए सिर उठा लिया. पार्थ का लंड मेरी चूत के अंदर अपनी लम्बी यात्रा आरम्भ कर चुका था.”

दिया कुछ ठहरी और उसने दर्शन को देखा तो दर्शन समझ गया और अपनी माँ के लिए एक और पेग बना लाया. फिर कीर्तिका भी उठी और दोनों भाई बहन सबके लिए पेग बनाकर ले आये. दो घूंट लेकर दिया ने सबको देखा और अपनी कथा आगे बढ़ाई।

“पार्थ ने अपने लंड को जब मेरी चूत में डालना आरम्भ किया तो मुझे लगा कि न जाने कैसे मैं पूरा लंड ले पायूँगी। परन्तु पार्थ सम्भवतः ऐसी परिस्थितियों से अवगत था, उसने लगभग आधे लंड को डालने के बाद ही मुझे धीरे धीरे चोदना आरम्भ कर दिया. उसके मौखिक प्रेम के कारण मेरी चूत भी पर्याप्त मात्रा में गीली थी और उसे अधिक कठिनाई नहीं हुई, न ही मुझे. पर पास में मानो रण छिड़ चुका था. सचिन अपनी माँ रमोना को पूरे लंड से भीषण गति से चोद रहा था. हम दोनों जोड़ों में कितना अंतर था ये विदित था. जहाँ सचिन और रमोना चुदाई को एक युद्ध के स्तर पर ले रहे थे वहीं पार्थ और मेरी चुदाई प्रेम पूर्वक और अत्यंत शालीनता से चल रही थी. मुझे पार्थ के इस संयम पर बहुत गर्व हुआ.”

“पार्थ ने मुझे चोदते हुए कुछ ही देर में कुछ और गहराई तक अपने लंड को डाला. सच तो ये है, कि मुझे पता भी नहीं चला. मेरी भी चूत उसके लंड से अब अभ्यस्त हो गयी थी और अब मैं भी अपनी कमर उछालते हुए उसके लंड को और अंदर तक लेने का प्रयास कर रही थी. और तभी मुझे आभास हुआ कि अब मेरी और पार्थ की जाँघें एक दूसरे को छू रही हैं. मैंने नीचे देखा तो मेरी चूत में अब पार्थ का लंड पूरी गहराई तक समाया हुआ था. मैंने एक गहरी साँस ली और स्वयं को बधाई दी कि मैं बिना चोटिल हुए उस लंड से चुदवा रही हूँ.”

कनिका बोल पड़ी, “ताईजी, आप लोग बुरा न मानो तो एक बात पूछूँ?”

“हाँ”

“मॉम ने क्या गलत किया था अगर वो भी बड़े लौंड़ों से चुदवाने गयी थी तो?”

“केवल ये कि उन्होंने हम सब से छुपकर ये किया था. अन्यथा हमारे घर में किसी प्रकार की कोई रोक टोक नहीं है. समझीं?”

“हाँ, मेरा भी यही सोचना था. आप आगे सुनाओ.”

“मैं कहाँ थी?” दिया ने पूछा.

आकार ने बताया तो दिया आगे बताने लगी.

“जैसा कि मैंने कहा कि न केवल मैं पार्थ के धैर्य बल्कि उसकी कला से भी अचम्भित हुए बिना न रह सकी. उसने जिस संतोष और संयम से मेरी चूत में अपना पूरा लंड पेला था उसकी प्रशंसा करनी होगी. उधर दूसरी ओर रमोना की चीख चिल्लाहट कमरे के वातावरण को अशांत करने के लिए पर्याप्त थी. पर इसका कारण ये भी था कि सचिन भी उसे अपनी माँ न समझते हुए किसी सस्ती रंडी के समान चोद रहा था. बिस्तर पर उसकी शक्तिशाली थापों के कारण जो कम्पन हो रहा था वो अगर मैं और पार्थ भी उसी लय में चोदते तो टूट ही जाता. पार्थ अपनी गति बढ़ा रहा था, मैं और मेरी चूत दोनों अब उसका पूरा साथ दे रही थीं. मैं कुछ बार झड़ चुकी थी, पर वो शिखर अभी भी दूर था जहां जाना और नीचे गिरना ही चुदाई का मुख्य आकर्षण है.”

“पार्थ मेरे मन को पढ़ सक रहा था या उसे इतना अनुभव था कि वो जान गया कि मैं अभी उस ज्वालामुखी के समान बिखरने के लिए लालायित हूँ. उसने मेरे मम्मे अपने हाथों में लेकर उन्हें मसलते हुए अपने धक्कों को और गतिशील कर दिया. मेरे मम्मे जैसे निचोड़ ही दे रहा था, पर मुझे उसमें कितना आनंद आता है ये आप सब जानते ही हो. फिर उसने अपना एक हाथ हटाया और मेरे भग्नाशे को छेड़ने लगा. कुछ देर तो मुझे संज्ञान ही नहीं हुआ कि क्या हुआ पर जब उसने उसे मसला तो मेरा शरीर बिखर ही गया. मेरी कमर ऊपर उठी ही थी कि पार्थ ने एक भीषण धक्के के साथ मुझे बिस्तर पर चिपका दिया. उसकी उँगलियों ने मेरे भग्न को मसलने में कोई कोताही नहीं की, न ही उसके धक्के धीमे पड़े और उसका दूसरा हाथ मेरे एक मम्मे को अब निर्ममता से निचोड़ रहा था. वो एक से दूसरे पर जाता पर गति न कम पड़ती न ही मेरे भग्न पर उसकी उँगलियों का दबाव.”

“मेरा शरीर मेरा साथ छोड़ चुका था, पूरा शरीर काँप रहा था और चूत में वही संवेदना थी जो मुझे चेता रही थी कि वो भी इस समय अपने आनंद में लीन है. शिखर दिखा और मैं बहुत समय तक वहीँ ठहरी सी रही, जैसे एक लहर थी जो मुझे नीचे ही नहीं आने दे रही थी. पर फिर न जाने क्या हुआ मुझे अपनी ही चीखें सुनाई पड़ीं. और फिर ऐसा लगा जैसे मैं डूब रही हूँ. और फिर सब कुछ अँधेरे में डूब गया.”

“उस अंधकार में भी मैंने अपनी चूत में से कुछ बाहर निकलने का अनुभव किया. फिर ऐसा लगा जैसे कुछ ठंडा सा उसके भीतर गया और कुछ गर्म सा बाहर बहा. बस चेतना इतनी ही थी. तारे मेरी आँखों के सामने घूम रहे थे. मैंने अपने होंठों पर किसी के होंठों का स्पर्श अनुभव किया। बिस्तर अभी भी हिल रहा था या मैं ही लहरों में तैर रही थी ये तो नहीं पता. पर जब मैंने कुछ देर बाद आँख खोली तो सब कुछ शांत था. मैं अकेली पड़ी हुई थी. मेरी चूत में से पार्थ का रस बह रहा था. आँखें मीचते हुए मैं भी उठी, तो देखा कमरे में कोई न था. मैंने कपड़े डाले और बाहर आयी तो देखा की वे तीनों अभी भी नंगे ही थे और कुछ पी रहे थे.”

“पार्थ ने मुझे देखा तो मुझे भी एक ग्लास दिया. उसमे जूस था, जो मैंने पिया और पार्थ को देखा. “आपको अच्छा तो लगा न आंटीजी.” मैं केवल सिर ही हिला पायी.”

“समय देखा तो देर हो रही थी. मैंने रमोना को कहा तो उसने कहा कि अगली बार कुछ अधिक समय लेकर जाऊँ ताकि पार्थ मेरी गांड का भी आनंद ले पाए. फिर उसने बताया कि अब वो सचिन और पार्थ से डबल चुदाई करवाने वाली है. और मुझे आँख मारते हुए बोली कि पार्थ का लंड उसकी गांड में बहुत खलबली मचाता है. मैंने उन तीनों से विदा ली और फिर अपना मेकअप ठीक किया और घर चली आयी.”

“वावो, मॉम. काफी मस्त रही आपकी शाम तो.”

“और रात और भी मस्त होने वाली है. भाई आज तो गांड पहले मैं ही मारूँगा।” आकाश ने अपने पति होने का हक जताया.

“अरे भैया, पूरी रात है. पहले आप मार लेना, बाद में मैं. बाद में मत कहना जब नीलम लौट आये तो.” आकार ने कहा तो सभी हंस पड़े.

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रात हो चुकी थी और आज की रात पटेल परिवार की दोनों बहुओं के लिए स्मरणीय होने वाली थी. बड़ी बहू दिया को उसके पति और देवर के साथ एक साथ चुदाई का एक और अवसर मिला था. वहीं दूर घर की छोटी बहु भी अपनी जेठानी की बहन के पति और उनके भाई से साथ एक साथ चुदने के लिए व्याकुल थी. दर्शन और कनिका ने भी अपना प्लान बना लिया था और दोनों एक दूसरे के साथ अकेले समय बिताने के लिए खुश थे. हितेश को आज कई दिनों के बाद अपनी माँ का संसर्ग मिला था और सिया भी अपने बेटे से चुदने के लिए लालायित थी. प्रकाश इस बात से अनिभज्ञ था कि उसके जीवन में कितना बड़ा बदलाव उसकी प्रतीक्षा कर रहा था. उसे तो केवल इस समय नीलम की गांड का ही ध्यान आ रहा था.

सभी अपने अपने साथियों के साथ खाने के बाद निर्धारित कमरों में चल पड़े. आज की रात दो घरों के चार कमरों में चुदाई का निरंतर संगीत बजने वाला था. कुछ ही देर में चारों कमरों के द्वार बंद हो गए.

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दिया का घर:

दर्शन और कनिका:


दर्शन कनिका के साथ अपने कमरे में चला गया. कनिका ने भी उसका कमरा ही अधिक उपयुक्त समझा, कारण था कि वो एक कोने में था और शांति से वे चुदाई कर सकते थे.

कनिका: “तुम्हें नहीं लगता कि जिस प्रकार से सब मौसा और सुमति आंटी को मिलाने का षड्यंत्र रच रहे हैं वो सही है?”

दर्शन: “नहीं. प्रकाश मौसा के साथ मेरी जब भी बात हुई उनके मन में कहीं न कहीं एक फ़ांस सी अनुभव हुई कि वे अकेले ही रह गए. ठीक है, मौसी के कारण उन्हें इतना अकेलापन न लगा हो, पर मौसी रात में तो उनके साथ रहती नहीं हैं. वो अकेले ही सोते हैं. ऐसा मुझे उनकी बातों से लगा है. जहां तक सुमति आंटी की बात है, मैं अधिक कुछ नहीं कह पायूँगा, क्योंकि मुझे उनके बारे में कुछ पता ही नहीं है. पर इतने वर्ष पूर्व विधवा होने के बाद अगर वो आज अपने भाई के परिवार के साथ संलग्न हैं, तो उन्हें भी वही अकेलापन सताता तो होगा. देखो न मम्मी ने बताया नहीं कि पार्थ कितनी सरलता से इसके लिए मान गया.”

कनिका: “हाँ, बात तो सही है. मम्मी के अनुसार पार्थ भी अपने जीवन में इस पिता स्वरूप की इच्छा रखता है. संभवतः ये समाधान सबके लिए ठीक ही रहेगा. पर मेरे प्यारे भाई, अब अपनी भी बात कर लो कुछ.” ये कहकर कनिका दर्शन के पास गयी और उसके सीने से चपक गयी.

दर्शन ने उसका चेहरा उठाया और चूमते हुए कहा, “मैं भी यही सोच रहा था. आज इतने समय बाद हम दोनों को अलग मिलने का अवसर जो मिला है. नहीं तो पापा या चाचा तुम्हे छोड़ते ही नहीं हैं.”

“बोल तो ऐसे रहे हो जैसे स्वयं ताई या मम्मी के पल्लू को छोड़ते हो. वो तो भला हो कि ताईजी आज व्यस्त हैं नहीं तो उनके ही पिछवाड़े में घुसे रहते.”

“वैसे उनका पिछवाड़ा है मस्त, और मम्मी को भी गांड मरवाने में बहुत मजा आता है.”

“तो मेरा कैसा है?”

दर्शन ने अपने हाथों से कनिका की गांड दबाई, “तुम्हारे पिछवाड़े का स्वाद और तंगी बहुत मस्त हैं. माँ की गांड तो अब वैसे कुछ चौड़ी भी हो गयी है.”

“समझ गयी, आज मेरी गांड मारनी है तो मुझे मस्का मार रहे हो. कल जाकर अपनी मम्मी की गांड चाटोगे.”

“अरे क्यों जल रही है? हम सबने कब से इन बातों में जलना सीख लिया?”

ये कहकर दर्शन ने उसके मुंह को अपने मुँह से बंद किया और दोनों गहरे चुंबन में लीन हो गए. इसी प्रकार एक दूसरे में समय हुए उन्होंने एक हाथ से अपने कपड़ों को अलग किया और चूमते हुए एक दूसरे को नंगा करने में सफल हो गए. अब दोनों एक दूसरे के शरीर पर अपने हाथ सहला रहे थे. धीरे चलते हुए दर्शन ने कनिका को बिस्तर पर लिटाया और फिर उसकी चूत में अपना मुंह डालकर उसे चाटने लगा.

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दिया, आकाश और आकार:

दिया के साथ आकाश और आकार उसके कमरे में चले आये थे. हल्की फुल्की बातों में ही आकार ने दिया को छेड़ा.

“भाभी, ये तो आपके लिए अच्छा है कि नीलम नहीं हैं नहीं तो आपको हम दोनों के साथ चुदाई का ये अवसर नहीं मिलता.”

दिया को ये बात कुछ ठीक नहीं लगी. उनके परिवार में इतना सामंजस्य था कि अगर वो भी नीलम से कहती तो नीलम भी इसके लिए उसे कदापि मना नहीं करती.

“देवरजी ऐसी बात मत करिये. क्या नीलम मुझे मना करती? या मैं नीलम को? और ये मत भूलिए कि उसकी सेवा मैं भी मेरे जीजा और उनके भाई उन्नत हैं. आज उसकी भी मन भरके चुदाई होने वाली है. आप दोनों भाई सौभाग्यशाली हैं कि आज आपकी पत्नियां दो दो लौंडों से चुदाई का आनंद लेने वाली हैं.”

“हाँ, भाभी. मैंने तो बस यूँ ही कहा था. आप लगता है बुरा मान गयीं. वैसे भी आप दोनों की दिन में एक चुदाई हो ही चुकी है. बताइये मैं क्या करूं कि आप मुझे क्षमा कर दें.” आकार ने भोला सा चेहरा बनाकर कहा.

“हम्म्म, ये सोचने वाली बात है. क्यों न आप आज मेरे पॉँव से लेकर ऊपर तक अपनी जीभ से चाटकर अपनी गलती का प्रायश्चित करते?” दिया ने एक शरारती स्वर में कहा.

इस बात पर आकाश हंस पड़ा और अपने भाई से बोला, “फंस गया न बच्चू? अब चाट इसके तलवे. मैं उधर बैठकर देखता हूँ कि कैसे तू अपनी भाभी की सेवा करता है.”

“क्या भाई, आप भी?” आकार ने कहा और फिर दिया की ओर मुड़ा।

“भाभी, आपकी सेवा करने में मुझे कोई हिचक नहीं है. अब आप कपड़े निकाल दो और फिर देखो अपने देवर का कमाल।”

दिया तुरंत ही नंगी हो गयी और आकार ने उसे सोफे पर बैठने का आग्रह किया।

दिया बोली, “ठहरो, मैं पहले हाथ पाँव धो लेती हूँ. न जाने क्या क्या लगा होगा.” ये कहकर वो बाथरूम में गयी और कुछ ही देर में लौट आयी और सोफे पर पसर गयी.

आकार उसके सामने बैठा और उसके एक पांव को उठाकर उसकी उँगलियाँ चाटने लगा. फिर दूसरे पैर की चाटीं। उसके बाद तलवे और इस प्रकार से नीचे के हर अंग प्रत्यंग को चाटते हुए वो ऊपर की ओर बढ़ता चला गया. दिया को इस प्रकार का अनुभव नहीं था. वैसे तो आकार को भी नहीं था पर वो अपनी लग्न और परिश्रम से दिया को सुख देने का पूर्ण प्रयत्न कर रहा था.

और जब तक आकार दिया की जांघों तक पहुँचा दिया का शरीर काँप रहा था. ऐसी सुखद अनुभूति उसे पहले कभी नहीं हुई थी. जैसे ही आकार की जीभ ने उसकी जाँघों के अंदर के भाग को चाटा दिया की चूत ने आकार के मुंह पर ढेर सारा रस छोड़ दिया. आकार सकपका के पीछे हटा पर उसके पूरे चेहरे से वो रस टपक रहा था. उसे हटा जानकर दिया ने उसकी ओर देखा तो उसकी स्थिति देख कर आकाश और दिया हँस पड़े.

“देवर जी, मेरी उँगलियाँ और तलवे और चाटो न, बहुत अलग भावना आयी थी उसमें.”

आकार ने अपने चेहरे को हाथों से पोंछा और दिया की पांवों को चाटने में जुट गया. परन्तु इस समय उसने अधिक समय नहीं व्यर्थ किया. उसका लंड भी अब अकड़ा हुआ था और उसे भी शांति की आस थी. उसने इस बार सीधे दिया की चूत पर ही हमला किया और दिया खिलखिलाते हुए उसके सिर को अपनी चूत पर दबाने लगी. लपलपाते हुए आकार ने पहले मन भर के दिया की चूत को चाटा और फिर उसने अपना ध्यान दिया की गांड के छेद की ओर किया. अब तक आकाश भी नँगा हो चुका था और उसने अपने पत्नी के मुंह में अपने लंड को डाला जिसे दिया सप्रेम चूसने लगी.

आकार दिया की चूत को उँगलियों से सहलाते हुए उसकी गांड को अपनी जीभ से कुरेद रहा था. उसका पर्याय केवल दिया की गांड को पर्याप्त रूप से ढीला करना था जिससे कि उसे दो दो लंड से चुदने में अधिक कठिनाई न हो. वैसे दिया अब इसमें पारंगत हो चुकी थी, परन्तु दोनों भाई एक दूसरे की पत्नियों का बहुत ही ध्यान रखते थे.

दिया की गांड और चूत अब आवश्यक रूप से चुदाई के लिए अनुकूल ही चुके थे. आकार ने उठकर इस बार अपने कपड़े उतारे हुए नंगा हुआ ही था कि आकाश ने अपने लंड को दिया के मुंह से निकाल लिया और अपने भाई को उस रिक्त स्थान को भरने के लिए आमंत्रित किया. दिया ने उसी प्रेम से आकार के भी लंड को चूसा जिस प्रेम से उसने अपने पति का लंड चूसा था. कुछ ही क्षण में अब दोनों लंड उसकी सेवा करने के लिए उपयुक्त हो चुके थे.

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सिया का घर:

सिया और हितेश:


उधर कुछ मील दूर माँ बेटे का मिलन एक लम्बे समय के बाद हो रहा था. हितेश बिस्तर पर लेटा हुआ था और सिया की चूत उसके मुंह पर थी, जिसे वो चाशनी समझ कर चाटे जा रहा था. सिया भी उसके मुंह में रस की धारा छोड़ने में कोई कसर नहीं रख रही थी. और साथ ही साथ वो आने बेटे के लंड को भी चाट कर उसके स्वाद से स्वयं को तृप्त करना चाहती थी. टोपे को भली भांति चाट लेने के बाद उसने हितेश के लंड को मुंह में लेकर चूसने की प्रक्रिया भी आरम्भ कर दी थी. वो तो भला हो नीलम का जिसने दिन में हितेश को दो बार झाड़ दिया था नहीं तो जिस लालसा से सिया उसे चूस रही थी, वो अब तक झड़ ही चुका होता.

पर अब माँ और बेटा एक दूसरे के साथ मिलन के लिए बेचैन हो रहे थे. मुंह से सुख मिलता तो है, पर जो सुख लंड के चूत में जाने पर मिलता है, उसका कोई और पर्याय तो है नहीं। और यही सत्य गांड में लंड के लिए भी उपयुक्त है. दोनों एक दूसरे की भावनाओं से अवगत थे और हितेश के लंड के सिया के मुंह में उछाल से सिया भी जान चुकी थी कि लौड़ा अब उसकी चूत के लिए लालायित है. और यही संदेश उसकी कुलबुलाती चूत भी हितेश को दे रही थी, जो इस अल्प आयु में भी स्त्री के अंगों की सांकेतिक भाषा पढ़ने में निपुण हो चला था.

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नीलम, चंद्रेश और प्रकाश:

उनके कमरे से कुछ ही दूर एक दूसरे कमरे में नीलम भी दो भाइयों के साथ गुत्थम गुत्था थी. जहां प्रकाश उसकी चूत और गांड को तर कर रहा था वहीँ नीलम भी चंद्रेश के लंड को मुंह में निगले हुए पूरी श्रद्धा से चूस रही थी. दिन की चुदाई ने उसकी कामाग्नि को और बढ़ा दिया था. इतने दिन का उपवास तो उसने जीवन में अपनी माहवारी के समय भी नहीं किया था, जब वो अपनी गांड मरवाकर संतोष करती थी. और आज हितेश से उसकी गांड बची रह गयी थी, पर उसकी भरपाई इन दोनों भाइयों में से एक ने करनी ही थी, और अगर सम्भव हो पाया तो दूसरा भी उसकी गांड पर हाथ साफ कर ही लेगा.

इन्ही सब विचारों ने उसकी उत्तेजना को बहुत बढ़ा दिया था. और अगर उसने सही समझा था तो आज परिवार के सभी सदस्य सम्भोग में व्यस्त होंगे. उसे अपने घर के बारे में अभी अधिक सूचना नहीं थी, पर ये जानती थी कि सूखा तो वहां भी कोई नहीं सोयेगा. नीलम चंद्रेश के लंड पर थूक थूक कर उसे चिकना करने में जुटी थी, अपने मुंह में लेकर चाटती और फिर उसे निकलकर थूक से सना देती. चंद्रेश भी नीलम की इस कला से बहुत प्रभावित था, और समझ रहा था कि नीलम चुदाई के लिए तरसी एक प्यासी स्त्री है. और उसे गर्व था कि ऐसी दुखिया का दुःख दूर करने हेतु वो दोनों भाई उपस्थित थे.

प्रकाश भी अब ये अनुभव कर रहा था कि नीलम अब चुदने के लिए तैयार हो चुकी है, उसने सिर उठाकर प्रकाश को देखा जिसने संकेत किया कि लोहा पर्याप्त मात्रा में गर्म हो चुका है, और अब उसे अपने अनुसार ढालने में समय नहीं लगाना चाहिए. दोनों भाइयों ने ये तय किया कि नीलम को आज अकेले नहीं चोदा जायेगा. हर समय उसकी चूत और गांड में लौड़ा रहेगा. जब तक दोनों भाइयों के लौड़े खड़े रह पाए तब तक नीलम के भी दोनों छेद रिक्त नहीं रहेंगे. और रस का अनुदान नीलम के मुंह में ही किया जायेगा.

इसी रूप रेखा के अनुसार चंद्रु ने अपना लंड नीलम के मुंह से निकाला और नीचे प्रकाश ने अपना मुंह उसकी चूत और गांड से हटा लिया. नीलम समझ गयी कि एक लम्बी रात का आरम्भ हो चुका है. और उसके मुंह से एक कामुक सीत्कार निकली जिसका अर्थ था कि वो भी अब इस रण के लिए आतुर है.

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दिया का घर:

दर्शन और कनिका:


कनिका ने भी अपनी टाँगे फैलते हुए दर्शन के लिए अपनी चूत का रास्ता सुलभ कर दिया. दर्शन का लंड भी अब तन चुका था पर वो कनिका की चूत को पहले भली भांति चाटना चाहता था. चाटते हुए उसने अपनी एक ऊँगली कनिका की चूत में डाली और अपनी जीभ और ऊँगली के समंजस्य से कनिका को जल्दी ही कामोत्तेजित कर दिया. अपने मुंह को हटाने से पहले दर्शन ने कनिका के भग्न को अपनी उँगलियों से मसला तो कनिका की आनंदकारी सिसकारी ने उसका मन मोह लिया. उसने कनिका को बिस्तर पर सही रूप से लिटाया और फिर अपने लंड को उसकी चूत के मुहाने पर रखा.

“भैया, आज मुझे अच्छे से चोदना और फिर मेरी गांड भी मारना। ताईजी की तो डबल चुदाई हो रही होगी, उस दिन पापा और ताऊजी ने मेरी भी डबल चुदाई की थी. सच में बहुत मजा आया था. उसके बारे में सोचकर ही मेरी गांड में फुरफुरी होने लगती है. इसीलिए गांड में भी मुझे तुम्हारा लंड चाहिए.” कनिका बोले जा रही थी.

दर्शन ने उसका मुंह अपने मुंह से बंद कर दिया और कनिका की आँखों में आँखें डालकर उसे चूमने लगा.

“हितेश भी आने ही वाला है दो चार दिन में. फिर उसके साथ मैं तेरी इस डबल चुदाई की इच्छा भी पूरी कर दूंगा. और ऐसा सोचना भी मत कि आज तेरी गांड बचने वाली है. तेरी गांड मारे बिना मुझे भी चैन नहीं मिलने वाला.”

इतना कहते हुए दर्शन ने एक धक्का लगाया और उसके लंड ने कनिका की चूत में अपना पदापर्ण किया. कनिका ने अपनी टाँगे जोड़कर अपनी चूत को और तंग कर दिया. दर्शन को उसकी कसी चूत में अब लंड पेलने में कुछ अधिक घर्षण मिलने लगा. उसने लंड को कुछ देर अंदर बाहर किया और फिर एक तीव्र झटके के साथ पूरा लंड अंदर पेल दिया. कनिका की टाँगे खुल गयीं और उसकी आँखें भी. पर उन आँखों में वासना की डोरियाँ लहरा रही थीं. पूरा लंड अंदर जाने के बाद दर्शन ने कनिका की चुदाई करनी आरम्भ की और कनिका ने अपनी टाँगों को कभी खोलकर तो कभी बंद करते हुए दर्शन को अपनी फैलती सिकुड़ती चूत के द्वारा एक नया ही अनुभव कराया.

दर्शन ने भी अपनी ओर से परिश्रम में कोई कमी नहीं की और वो भी पूरी शक्ति और सामर्थ्य के साथ कनिका को चोदने लगा. दोनों एक दूसरे को देखते हुए एक दूसरे में खोने का प्रयास कर रहे थे. दोनों के जुड़े हुए शरीर क्षण भर के ही लिए पृथक होते और फिर नयी शक्ति के साथ फिर मिल जाते. कमरे में चुदाई का संगीत बज रहा था और दोनों की आहों और सिसकारियों ने उस संगीत में नए सुर जोड़ दिए थे.

कोई दस मिनट की इस चुदाई के बाद दोनों एक दूसरे को देखकर झड़ने लगे. दर्शन ने कनिका की चूत में ही अपना रस छोड़ दिया और फिर उसे चूमते हुए उसके ऊपर ही लेट गया. कनिका और दर्शन के मिलन का रस अब बिस्तर को गीला कर चुका था. कनिका ने धीरे से दर्शन को ऊपर से हटाया और अपनी चूत में उँगलियों से मिलन रस को लिया और अपने मुंह में डाल लिया. दर्शन उसके पास में लेटे हुए ये देख रहा था. कनिका ने फिर उठकर दर्शन के मुरझाते हुए लंड को मुंह में लिया और उसपर लगे प्रेम रस के मिश्रण को चाट लिया.

“इसका स्वाद अलग ही होता है. और सुगंध भी.” कनिका ने संतुष्टि से आह भरते हुए कहा.

कनिका दर्शन के पास लेट गयी और दोनों अन्य बातों में व्यस्त हो गए. पर दर्शन और कनिका को अपने प्रेम का अगला चरण भी याद था. कनिका की गांड मारने का. पर उसके लिए दोनों ने कुछ देर विश्राम करना उपयुक्त समझा था.

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दिया, आकाश और आकार:

दिया ने दोनों लौंड़ों को देखा और फिर आकाश की ओर देखा. पति होने के कारण वो किस छेद में जाना चाहता था इस पर उसका पहला अधिकार था. आकाश भी उसकी इस बात को समझ गया.

“आकार, जिस प्रकार से तुमने आज अपनी भाभी की सेवा की है, उसके लिए मैं तुम्हें उनकी गांड पहले मारने का न्योता देता हूँ. वैसे तुम्हारी क्या इच्छा है?”

“भाई, आपने जैसा कहा है, बस वही मेरी भी इच्छा बन गई है.” आकार ने चतुराई से उत्तर दिया.

दिया: “आप दोनों ही तय करोगे या मुझसे भी कुछ पूछोगे?”

आकाश: “ये तो मैंने सोचा नहीं था. तुम्हारी क्या इच्छा है दिया?”

दिया हंसकर बोली, “जो आपकी है. हालाँकि मुझे इतना कोई भेदभाव नहीं करना है. मैं जानती हूँ कि आप भी मेरी गांड अवश्य ही मारने वाले हैं. बस अपने भाई को पहला अवसर दे रहे हैं.”

“बिल्कुल, अब ये बेचारा अपनी बीवी के बिना इतने दिनों से कितना तड़प रहा है.” आकाश ने कहा.

दिया: “ऐसा तो नहीं लगता. ऑफिस में तो आज अपनी सेक्रेटरी की गांड मारी ही होगी। है न देवर जी?”

आकार: “और क्या, उसे वापिस काम पर बुलाया तो वो मुझे धन्यवाद करने की इच्छुक थी. मैं भला कैसे मना करता?”

आकाश बिस्तर पर लेट गया, “अब बातें बंद करो, देखो मेरा लंड अब चुदाई के लिए कैसे तड़प रहा है.”

दिया ने उसे देखा और अपने मुंह में लेकर कुछ क्षणों के लिए चूसा और फिर उसके ऊपर चूत रखकर बैठती चली गयी. पूरे लंड को अंदर लेकर उसने कुछ देर उछलकूद की और फिर आगे झुकते हुए अपनी गांड को दोनों हाथों से फैला लिया. आकार के लिए ये खुला निमंत्रण था और वो इस अस्वीकार नहीं करने वाला था. उसने अपने लंड के ऊपर थूक लगाया और उसे सहलाते हुए दिया की गांड के छेद पर लगा दिया. दिया ने उसे मुड़कर देखा और सहमति में सिर हिलाया. आकार ने एक तगड़ा धक्का लगाया और अपने पूरे लंड को दिया की गांड में अंत तक गाड़ दिया. दिया की पीड़ा और आनंद से मिश्रित चीख ने कमरे को थर्रा दिया.

दोनों भाइयों के बीच में दिया इस समय एक गुड़िया ही बनी हुई थी. दिन में हुई चुदाई से उसकी वासना और भड़की हुई थी और इसका ही प्रभाव था कि उसे आज दो दो लौड़े एक साथ लेने का मन था. उसे ये भी पता था कि उसके घर आने के पश्चात् रमोना की भी ऐसी ही घनघोर चुदाई की गई होगी. पर अभी जो लौड़े उसकी चूत और गांड को खंगाल रहे थे वे भी कम नहीं थे. दोनों भाइयों की इस प्रकार की चुदाई का अनुभव उन्हें दिया की हर इच्छा को पूर्ण करने के लिए समर्थ था.

पहले तो आकाश बिना कुछ किये हुए यूँ ही लंड उसकी चूत में पेल कर पड़ा रहा था, पर जब आकार ने उसकी गांड में अपने लंड से लम्बे धक्के लगाने आरम्भ किये तो आकाश ने भी उसमे ताल मिलाकर नीचे से उसकी चूत में भी उसी गति से धक्के दे मारे। दिया अब सातवें आकाश पर थी, उसकी आँखों के सामने तारे नाच रहे थे. उसके दोनों छेद इस समय तीव्र और बलशाली धक्कों की आपदा का सामना कर रहे थे परन्तु इसमें भी वे आनंद का अनुभव कर रहे थे.

धक्कों की बढ़ती शक्ति और गति के आगे दिया अब बेबस थी. उसकी चूत से अवश्य पानी बहा जा रहा था, और गांड में एक पूर्व परिचित सी खुजली भी होने लगी थी. और उसे मिटाने का एक ही उपाय था. गांड की और भीषण चुदाई. और उसने चिल्लाकर आकार को अपनी इच्छा बताई। आकार ने अपनी स्थिति कुछ बदली और वो पीछे के स्थान पर दिया की गांड के ठीक ऊपर आ गया. इस स्थिति में उसके लंड के आघात अब और लम्बे और गहरे हो गए क्योंकि अब लंड के नीचे का हिस्सा निर्विरोध हो गया था.

दिया अब आकाश के सीने से चिपकी हुई थी और आकाश भी अपनी पत्नी की निर्ममता से चूत को चोद रहा था. नीचे से वो इतनी शक्ति के साथ चुदाई कर पा रहा था वो यही दर्शाता था कि वो शारीरिक रूप से कितना सक्षम था. उसके धक्कों की गति बढ़ने का एक कारण और भी था. आकार के नए आसान को लेने के कारण उसके ऊपर से बोझ कम हो गया था और वो अब अपनी कमर को अधिक तीव्रता से चला पा रहा था. और इसका पूरा आनंद उन दोनों के बीच में सैंडविच के समान फंसी हुई दिया ले रही थी. आकार के लंड से जहां एक ओर उसकी गांड की गहराई नपी जा रही थी, वहीं उसके पति ने उसकी चूत की दुर्गति करने में भी कोई कमी नहीं छोड़ी थी.

कमरा बंद होने के बाद भी उसकी चीखें बाहर तक सुनी दे रही थीं, परन्तु उन्हें सुनने वाला कोई न था. और सुनता थो भी आश्चर्य ही करता कि ये पीड़ा से उभरी हैं या आनंद से. दोनों भाई अपनी पूरी शक्ति के साथ दिया को चोदते हुए अब कुछ थकने से लगे थे. एक दूसरे के लंड के कारण कसे हुए छेद अब उन्हें अपने गंतव्य की और शीघ्रता से ले जा रहे थे. और जैसा कि होता है, गांड मारने वाला पहले झड़ता है. आकार ने भी अपने स्खलन की घोषणा की और फिर बिना कुछ और कहे उसका शरीर जड़ हो गया. शरीर तो जड़ था पर उसकी कमर अप्राकृतिक रूप से हिल रही थी. और उसके लंड से वीर्य की धार उसकी भाभी दिया की गांड की तंग गली को सींच रही थी.

उसके इस प्रकार से रुकने के कारण आकाश की भी ताल टूट गयी और साथ ही साथ दिया का हिलना भी कुछ असामान्य हो गया. इसी कारण उसके लंड ने भी अपने रस से दिया की चूत के भीतर अपना फौवारा छोड़ा और उसकी अंदरूनी घाटी को ओतप्रोत कर दिया. उसके ठहरते ही दिया उसपर निढाल सी होकर लेट गयी. आकार ने अपना लंड बाहर खींचा और हट गया. दिया आकाश के ऊपर से हटती हुई एक ओर ढुलक गयी. उसका शरीर थका था पर आत्मा तृप्त थी.

कुछ देर बाद उठकर दिया ने दोनों लौंड़ों को चाटकर साफ किया. फिर बाथरूम में जाकर अपनी चूत और गांड को भी अच्छे से स्प्रे के द्वारा अंदर से साफ किया। अपने मुंह को धोकर वो कमरे में लौटी तो आकार ने सबके लिए पेग बना रखे थे. उसके बाद आकाश फिर आकार भी बाथरूम में जाकर साफ सफाई किये और फिर बैठकर अपने पेग पीने लगे.

और अभी रात शेष थी.

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सिया का घर:

सिया और हितेश:


सिया की कुलबुलाती चूत भी हितेश को संदेश दे रही थी, जो इस अल्प आयु में भी स्त्री के अंगों की सांकेतिक भाषा पढ़ने में निपुण हो चला था. कुछ समय तक अपनी माँ की चूत को प्रेम से देखने के बाद हितेश ने अपने लंड को पकड़ा और सिया की चूत पर लगाया. सिया ने एक गहरी साँस ली और बिना कुछ बोले अपने होंठों से कहा “डाल दे.”

हितेश वैसे भी अब रुकने वाला तो था नहीं, पर सिया के इस निशब्द संकेत ने उसे अपने लंड को अंदर डालते हुए अनुभव किया. माँ बेटे के आनंद का इस समय कोई पर्याय नहीं था. अभी लंड का केवल टोपा ही अंदर गया था, पर दोनों एक शांति का अनुभव कर रहे थे. एक अवधि के बाद के मिलाप से दोनों आनंदित थे. हितेश का लंड एक धीमी गति के साथ सिया की चूत को बेधता चला गया. सिया उसे प्रेम भरी दृष्टि से देखती रही और अपनी चूत में उसके लंड का आव्हान करती रही. हितेश जब रुका तो उसका लंड उसकी माँ की चूत में पूरा समाया हुआ था.

हितेश रुक गया और दोनों एक दूसरे के गुप्तांगों के स्पंदन का आभास करते रहे. कोई शीघ्रता नहीं थी. न किसी ने आना था, न किसी ने टोकना, न उन्हें कहीं जाना ही था आज की रात. एक दूसरे की आँखों में देखते हुए हितेश का अपनी माँ के प्रति प्रेम उमड़ पड़ा. वो आगे झुका और उसने सिया के होंठों से अपने होंठ मिला लिए. लंड को चूत में डाले हुए दोनों एक दूसरे को चूमने में व्यस्त हो गए. अचानक ही हितेश ने अपने लंड को बाहर खींचा और सिया के होंठों को चूमते हुए एक लम्बे धक्के के साथ उसे फिर अंदर पेल दिया.

हितेश को सिया के होंठों का कम्पन अपने होंठों पर अनुभूत हुआ. उसने अपनी जीभ को सिया के मुंह में डाला और अब उनका चुंबन माँ बेटे से अधिक प्रेमियों की श्रेणी में स्थापित हो गया. सिया ने भी हितेश की जीभ को चूसते हुए अपनी स्वीकृति दर्शाई. हितेश अब सिया की लम्बे पर धीमे और सधे हुए धक्कों से कर रहा था. सिया ने अपने दोनों मम्मों को अपने हाथों से ही मसलना आरम्भ कर दिया. हितेश दुविधा में पड़ गया. अगर वो अपनी माँ के मम्मों पर ध्यान देता तो अवश्य ही चुंबन तोड़ना पड़ता. वो इतना अनुभवी भी नहीं था कि चुदाई और चुम्बन के साथ सिया के मम्मे मसल सकता.

सिया ने उसकी इस दुविधा को स्वयं ही दूर कर दिया. उसने हितेश के बाएँ हाथ को अपने स्तन पर रखा और अपना हाथ हटाकर उसके सिर पर रख दिया. अब सिया हितेश के सिर को पकड़े थी और उनके होंठ अभी भी जुड़े हुए थे. हितेश दाएँ हाथ के सहारे उसकी चुदाई कर रहा था और बाएँ हाथ से उसके मम्मों को मसल रहा था. पर इस कारण चुदाई की गति क्षीण हो चली थी. कुछ देर तक यही स्थिति बनी रही.

सिया ने ये समझते हुए कि ऐसा आसन अनुपयोगी है, अपना हाथ हितेश के सिर से हटाया और उसे बोली कि मेरे मम्मे निचोड़ दो. हितेश के चेहरे के आनंद को देखकर सिया को भी लगा कि हितेश भी यही चाहता था. हितेश ने अपने दोनों हाथ सिया के मम्मों पर जमाये और उन्हें मसलते हुए अपनी चुदाई की गति तीव्र कर दी. अब सिया को सच्चा सुख मिल रहा था. एक ओर उसकी चूचियों पर आक्रमण हो रहा था वहीं दूसरी ओर उसकी चूत को भी अपने बेटे के लंड का सुख मिल रहा था.

बहुत समय तक हितेश सिया की इसी आसन में चुदाई करता रहा. दोनों को मानो थकान का बोध भी नहीं था. सिया की चूत अब पानी से लबालब हो चुकी थी और हितेश के लंड के अंदर बाहर होने उसे उसकी थापों की ध्वनि भी बदल चुकी थी. हितेश ने आसन बदलने के लिए सिया से आग्रह किया और सिया ने उसकी बात को मानते हुए तुरंत ही घोड़ी का आसन ले किया. हितेश ने पास पड़े अपने अंडरवियर से सिया की चूत को पोंछा और फिर अपने लंड को उसकी चूत में फिर से पेल दिया। चूत पोंछने के कारण कुछ सीमा तक फिर से तंग लग रही थी और हितेश को चुदाई का आनंद फिर से प्राप्त होने लगा.

इस आसन में वैसे भी वो अधिक नियंत्रण में था और उसका लाभ उठाते हुए वो अपने धक्कों को प्रभावशाली रूप से मारने में सफल हो रहा था. सिया को भी इस आसन में अधिक आनंद मिल रहा था क्योंकि पिछले आसन में पाँवों को फ़ैलाने से उसे थकान सी हो चली थी. वो रह रह कर पीछे देखती और हितेश से और गहरी चुदाई करने के लिए आग्रह करती. हितेश अपनी गति और धक्कों की लम्बाई को संभावित रूप से बढ़ा रहा था, पर उसकी सीमा अब समाप्त हो चुकी थी. सिया की भी चूत का रस एक बार फिर से उसी तेजी से निकल रहा था और उन दोनों के संसर्ग मार्ग से गिरता हुआ बिस्तर को गीला कर रहा था.

हितेश से अब और रुका न गया और उसने एक चिंघाड़ के साथ सिया की चूत को अपने वीर्य से भर दिया. सिया भी बिस्तर पर लुढ़क गयी और उसके ऊपर ही हितेश भी जा गिरा.

“तुम्हारा हुआ न, मम्मी?’ हितेश ने पूछा.

“मेरा तो पहले ही हो चुका था, वो तो तेरे लिए ही इतनी देर तक टिकी रही, नहीं तो तू फिर मुझे अलग हो जाता.”

हितेश ने सिया की गर्दन को चूमा और फिर उसके साथ ही लेट गया.

“मैं अलग नहीं हूँ, पर पढ़ाई पूरी किये बिना भी अब नहीं आ सकता. बस अब कुछ और महीनों की ही तो बात है, फिर यहीं लौट आयूंगा और पापा का बिज़नेस में हाथ बाटूंगा.” दोनों यूँ ही लेटे हुए बात कर रहे थे.

“हाँ, उन्हें भी अब तेरी आवश्यकता पड़ेगी, अगर तेरे चाचा चले गए तो. अब तक उनका बहुत सहारा था.”

“मैं समझता हूँ, पर मुझे लगता है कि चाचा के जाने और मेरे आने के मध्य अधिक समय नहीं रहेगा. कुछ दिन तक तो पापा को कठिनाई होगी, पर एक बात और भी है जो अपने अब तक नहीं सोची.” हितेश ने मुस्कुराकर कहा.

“क्या नहीं सोचा, बदमाश!”

“यही कि न जाने कितने वर्षों बाद उस अवधि में आप और पापा अकेले रहेंगे. उस समय का सदुपयोग करना. अब तक हम सबके लिए आप दोनों त्याग करते रहे, अब किसी को बीच में मत आने देना.”

सिया सोच में पड़ गयी. ये सच था. हितेश के जन्म के दो वर्ष बाद से वो और चंद्रेश कभी अकेले नहीं रहे थे. चंद्रेश के पिता की मृत्यु के बाद प्रकाश उनके ही पास जो आ गया था. उसने अपने बेटे को देखा.

“सच कह रहा है, तेरी बात से तो लगता है की तेरे चाचा को शीघ्रातिशीघ्र भगा देना चाहिए. और मैं स्वयं इनके काम में साथ दूंगी. कुछ तो कर ही लूँगी.”

“मम्मी, आप बहुत कुछ कर लोगी. सबसे बड़ी बात ये होगी कि पापा को किसी भी समस्या या कठिनाई में उनके सबसे घनिष्ठ मित्र का साथ रहेगा. ये और भी अच्छा होगा.”

“बेटा, सच में तू बहुत बुद्धिमान है. और हम दोनों के लिए इतना चिंतन करता है. तो इसी बात पर अब मेरी गांड को भी ठोक डाल. तेरी प्रतीक्षा में बहुत व्याकुल सी हो गयी है.”

“हाँ हाँ, जैसे आज चाचा ने नहीं मारी हो. पर सच में मुझे भी इसकी बहुत याद आती है.”

“तो चल फिर पहले इसे चाटकर अपने अनुकूल बना और फिर पेल दे.” सिया ने वही घोड़ी का आसन फिर से ले लिया और अपनी गांड को लहराकर हितेश को आमंत्रित किया.

हितेश ने अपनी माँ की आँखों में मंडराती वासना और प्रेम की छाया देखी और उसके होंठों को चूमकर उठा और सिया की गांड के पीछे आ गया. सिया की गांड दोपहर की चुदाई के कारण अभी भी कुछ खुली हुई थी पर हितेश को इससे कोई अरुचि नहीं हुई. उसने सिया के नितंबों पर अपनी जीभ से वार किया और एक गोलाकार आकृति में उसकी गांड के छल्ले तक पहुंच गया. सिया ने एक आह भरी और हितेश ने अपने हाथों से उसकी गांड को फैलाते हुए अपनी जीभ से उसे छेड़ दिया.

कुछ ही पल में उसकी जीभ सिया की गांड के भीतर थी और सिया की सिसकियाँ तेज हो रही थीं. अपनी माँ की गांड को कुछ समय तक अपनी जीभ से अनुकूल करने के पश्चात् हितेश ने अपने लंड को सहलाया. उसका लंड आने वाले सुख की कामना से तना हुआ था और फिर थूक निकालकर अपने लंड के टोपे पर लगाया. सिया अब उसके लंड की प्रतीक्षा में थी. और हितेश ने उसकी कामना पूरा करते हुए अपने लंड को उसकी मखमल जैसी गांड पर लगा दिया.

“कैसे मरवाना है अपनी गांड मम्मी?”

“जोर से. नहीं तो दोपहर की चुदाई की खुजली मिटेगी नहीं.”

“जैसा आप कहो.”

और इसी के साथ हितेश ने एक शानदार धक्का मारा और उसका लंड सिया की गांड को चीरता हुआ अंदर चला गया. सिया कुलबुलाकर रह गई. फिर हितेश ने उसकी गांड को बिना दया भावना के पूरी शक्ति के साथ छेदना आरम्भ कर दिया. सिया की खुजली का उपचार अब उसका बेटा उसी रूप में कर रहा था जैसा उसकी इच्छा थी. हितेश की चक्रवाती गति के आगे सिया ने हाथ डाल दिए और वो भी अपनी गांड का सत्यानाश करने में हितेश का साथ देने लगी. अपनी गांड को पीछे उछालते हुए वो अब हितेश के हर धक्के का बराबर उत्तर दे रही थी. हितेश को अपनी माँ की गांड मारने का अवसर बहुत दिनों के बाद मिला था. उसकी इच्छा तो थी कि वो इसे प्रेम पूर्वक चोदे पर दोपहर की चुदाई के कारण सिया की वासना चरम पर थी.

हितेश किसी भी आज्ञाकारी पुत्र के समान अपनी माँ की इच्छा के सामने नतमस्तक था और उसकी गांड को सम्पूर्ण मनोबल और शक्ति के साथ चोद रहा था. सिया की सिसकारियां अब चीखों में परिवर्तित हो चुकी थीं और हितेश को उनसे और भी अधिक प्रोत्साहन मिल रहा था. अपनी अनियमित और प्रचंड गति से उसने सिया की गांड के तार खोल दिए थे. सिया की इस प्रकार से गांड मारते हुए हितेश ने कोई दस मिनट और लिए. और उसके बाद उसके शरीर ने भी उसे उत्तर दे दिया. उसका लंड सिया की गांड में फूलने लगा और सिया भी जान गई कि अब हितेश झड़ने के निकट पहुंच गया है.

“मुझे अपने लंड का रस का स्वाद देना अब. अंदर मत छोड़ देना.”

“ओके, मम्मी.”

हितेश इसके बाद कोई चार मिनट ही और टिक पाया फिर उसने गति तोड़कर अपने लंड को सिया की गांड में से बाहर निकाल लिया. सिया के सामने जब तक पहुंचता, सिया ने एक पलटी ली और फिर सीधी होते हुए बैठ गई. उसके सामने हितेश का सना हुआ लंड नाच रहा था. उसे बिना हाथ से छुए सिया ने जीभ से चाटा और साफ होने के बाद हाथ में लेकर अपने मुंह में लेकर चूसने लगी. हितेश का लंड फिर से फूलने पिचकने लगा और फिर उसे अपना लावा सिया के मुंह में छोड़ दिया. एक बार झड़ चुकने के कारण इस बार मात्रा इतनी ही थी कि सिया सरलता से पी सके और उसने पूरा स्वाद लेकर अपने पुत्र के वीर्य को ग्रहण किया. लंड के शांत होने के बाद उसने एक बार उसे चूमा और चाटकर हितेश को प्रेम से देखा.

“बहुत अच्छा किया जो तू घर आ गया. आज पूरी रात अपनी माँ को चोदकर निहाल कर देना.”

“इसमें कोई शंका ही नहीं कि ऐसा ही होगा. अगर कल आप सीधी चल पायीं तो मेरे लिए शर्म की बात होगी.”

“मुझे भी यही आशा है. वैसे नीलम की स्थिति तो और भी बुरी होने के संभावना है. तेरे चाचा आज कुछ अलग मूड में हैं.”

“फिर तो उनकी खैर नहीं.”

दोनों माँ बेटे इस बात पर हंस पड़े और फिर उठकर बाथरूम में चले गए.

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सिया का घर:

नीलम, चंद्रेश और प्रकाश:


सिया और हितेश नीलम के बारे में बात करके कुछ देर तक बैठे हुए सोचते रहे. उनके मन में एक ही विचार थे. बात ये थी कि प्रकाश अकेलेपन से अब कुछ खिन्न रहने लगा था. और इसी कारण कुछ सीमा तक उसका व्यक्तित्व भी अब कुछ कठोर और आक्रोशित सा हो चला था. सिया के साथ भी वो कई बार कुछ अधिक निर्मम चुदाई करता था, परन्तु चंद्रेश उस पर कुछ अंकुश रखता था. सिया का पति होने के कारण वो सिया की रक्षा के लिए वचनबद्ध जो था. परन्तु आज नीलम उनके साथ थी. और जहाँ तक सिया ने सही समझा था उसका मुख्य कारण यही था कि चंद्रेश प्रकाश को नीलम के साथ अकेला नहीं छोड़ना चाहता था.

और हितेश अभी उस स्थिति में नहीं था कि प्रकाश को कुछ भी करने से रोक सके. चंद्रेश ने प्रकाश को भी ये बात समझाई कि नीलम घर की अथिति है और प्रकाश को स्वयं पर अंकुश रखना होगा. चंद्रेश ने समझाया कि वो उसे एक सीमा तक नहीं रोकेगा, परन्तु अगर उसके कहने पर भी प्रकाश नहीं रुका तो वो उसी समय इस कार्यक्रम को समाप्त कर देगा. प्रकाश ने अपने बड़े भाई की बात को स्वीकार किया और उसे विश्वास दिलाया कि वो उसकी आज्ञा का उल्लंघन कदापि नहीं करेगा.

इस सहमति के पश्चात चंद्रेश और प्रकाश उस कमरे में चले गए जहाँ नीलम रुकी थी. नीलम सम्भवतः अभी बाथरूम में थी, क्योंकि कमरा खाली था. चंद्रेश ने देखा कि टेबल पर एक बोतल और तीन ग्लास रखे थे. एक में कुछ पेय शेष था पर अन्य दो ग्लास उलटे थे. उसने प्रकाश को देखा और प्रकाश ने आगे बढ़कर तीनों ग्लास में नए पेग बना दिए. नीलम के ग्लास में कम शराब डाली थी क्योंकि उसे पता नहीं था कि उसकी क्षमता कितनी है और वो अब तक कितना पी चुकी थी. उसी समय बाथरूम के द्वार के खुलने की आहट हुई और नीलम बाहर निकली. उसने स्नान किया था और मात्र एक तौलिये में ही लिपटी हुई थी. उसे किसी और के कमरे में होने का ज्ञान नहीं था और उन दोनों को देखकर वो हतप्रभ रह गयी.

“हमने समय नष्ट न करने का निर्णय लिया और जल्दी आ गए. तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं है न?” चंद्रेश ने पूछा.

“नहीं भाईसाहब, बस थोड़ा चौंक गई. आपने नई ड्रिंक बना ली है. ये अच्छा किया. अब ये बताइये कि मैं कपड़े पहनूँ या ये तौलिया ही पर्याप्त है.”

“मैं इसे तुम्हारे ऊपर छोड़ता हूँ, जिसमे तुम्हें सुविधा लगे. हाँ अगर तुम इस तौलिये में रहना चाहती हो तो हम भी वैसे ही रहना चाहेंगे.”

“तब तो आप लोग भी बाथरूम में जाकर यही पहन लीजिये. दीदी ने बड़े सारे तौलिये रख छोड़े हैं.”

चंद्रेश और प्रकाश भी कुछ देर में तौलिये पहनकर आ गए और तीनों ने बैठते हुए चीयर्स किया और अपने पेग की चुस्की लेने लगे. चंद्रेश ने प्रकाश पर अपना ध्यान लगाया हुआ था. आज उसे प्रकाश कुछ अधिक उत्तेजित लग रहा था. पर उसने आरम्भ में कुछ न करने का निर्णय लिया. उसे पूर्ण ज्ञान नहीं था कि नीलम किस प्रकार के व्यभिचार से संतुष्ट होती है. स्वाभाविक दिखने वाले लोग भी चुदाई के समय कई बार अलग ही रूप धारण कर लेते हैं, इसीलिए उसने प्रतीक्षा करने में ही भलाई समझी. दो पेग पी लेने के बाद दोनों भाई अपने बीच में बैठी नीलम के शरीर से खेलने लगे.

जहाँ चंद्रेश ने उसके मम्मों को अपने हाथों में लिया वहीं प्रकाश के हाथ नीलम के तौलिये को हटाकर उसकी चूत को रगड़ रहे थे. नीलम भी इसके कारण अब चुदासी हो उठी थी और वो अपनी गांड मटका रही थी. चंद्रेश ने नीलम के तौलिये को अलग किया और अपने मुंह से उसके मम्मों को चूसने लगा. नीलम ने एक हाथ से उसके सिर को दबा लिया, पर बहुत हल्के से, इसी कारण चंद्रेश एक एक करके दोनों चूचियों को चूसने में लगा रहा. वहीं अब प्रकाश की ऊँगली नीलम की चूत चोद रही थी. नीलम की चूत की सुगंध से कमरा महक उठा था. प्रकाश ने अपने भाई को देखा और फिर खड़ा हो गया. उसके अपना तौलिया हटा दिया और उसका लंड उछलकर सामने आ गया. नीलम ने अपने मुंह के सामने लंड देखा तो उसकी लार टपक गई, पर चंद्रेश के बीच में रहते हुए वो कुछ कर नहीं सकती थी. चंद्रेश ने इस समस्या का समाधान किया और वो भी उठ गया और तौलिया हटाकर नंगा हो गया. अब नीलम के सामने दो लौड़े झूल रहे थे.

दोनों भाई उसके दो ओर खड़े हो गए और नीलम ने उनके लौंड़ों को चाटकर उनका स्वाद लिया. इस स्वाद से वो भलीभांति परिचित थी. कुछ देर तक यूँ ही चाटने के बाद वो एक एक करके दोनों लौंड़ों को अपने मुंह में लेकर चूसने लगी. पहले एक को चूसती फिर दूसरे को. उसकी इस क्रिया में धीरे धीरे गति बढ़ रही थी और उसके साथ ही दोनों लौंड़ों का तनाव भी. अचानक जैसे ही उसने प्रकाश के लंड को मुंह में लिया, प्रकाश ने उसके सिर को पकड़ा और अपना पूरा लंड उसके मुंह में घुसा दिया. इस कारण नीलम की साँस रुक सी गई, परन्तु वो इस प्रकार से भी लंड चूस चुकी थी, इसीलिए आरम्भिक आश्चर्य के बाद उसने अपने गले को खोला और प्रकाश के लंड का स्वागत किया. चंद्रेश के लंड को उसने अब हाथों से सहलाना आरम्भ किया.

प्रकाश नीलम के मुंह को अब तीव्रता से चोद रहा था, पर उसका आक्रोश इस बात पर बढ़ रहा था कि नीलम किसी प्रकार से भी आहत नहीं लग रही थी, बल्कि वो इसे बड़ी सरलता से झेल रही थी. प्रकाश ने नीलम के बालों को पकड़ा और इस बार अपना लंड स्थाई रखते हुए उसके बालों से पकड़कर नीलम के मुंह को अपने लंड पर बाहर अंदर करने लगा. इस बार नीलम को कुछ असुविधा हुई और उसकी गुं गुं की ध्वनि ने चेताया कि उसे कठिनाई हो रही है. प्रकाश के आक्रोश में कुछ कमी हुई, पर वो बिना रुके नीलम के चेहरे की चुदाई करता रहा. जब चंद्रेश को लगा कि इतना बहुत है तो उसने प्रकाश को कहा कि उसे भी अपना लंड चुसवाना है.

प्रकाश ने संकेत समझा और अपने लंड को नीलम के मुंह से निकाला और उसके दोनों गालों पर थप्पड़ के समान मारा और हट गया. चंद्रेश ने नीलम को देखा तो उसकी आँखों में आँसू थे, पर ये उसकी साँस रुकने के कारण निकले थे. नीलम ने पलटते हुए चंद्रेश के लंड को मुंह में लिया और चूसने लगी.

पर अभी नीलम को चूसते हुए कुछ ही देर हुई थी कि प्रकाश बोल उठा, “बिस्तर पर चलते हैं.”

नीलम ने जैसे ही अपने मुंह से चंद्रेश का लंड निकाला उसे अपने बालों में एक झटका सा लगा और प्रकाश उसे बालों से खींचकर बिस्तर को ओर ले गया. हालाँकि नीलम ने बहुत शीघ्र वस्तुस्थिति को समझ लिया था और वो तुरंत ही घुटनों के बल बिस्तर की ओर चल दी थी, पर उस झटके के कारण उसे कुछ दर्द हुआ और अब इस प्रकार खींचे जाने पर भी हो रहा था. सौभाग्य से बिस्तर पास में था और नीलम की ये दुर्दशा शीघ्र ही दूर हो गयी. वो बिस्तर पर चढ़ी ही थी कि प्रकाश ने उसे घोड़ी बनने का आदेश दिया. नीलम ने बिना आपत्ति किये हुए आसन लिया.

चंद्रेश समझ गया था कि क्या होने वाला है, पर वो भी नीलम की सहनशीलता को देखना चाहता था. अभी तक नीलम ने ऐसा कुछ नहीं दर्शाया था कि उसे किसी भी कृत्य में आपत्ति है. वो बिस्तर पर चढ़ा और नीलम के सामने बैठ गया. नीलम ने उसके लंड को अपने मुंह में लिया और अपना पूर्व बाधित कार्य को फिर आरम्भ कर दिया. उसे अभी भी अपने बालों में हल्का सा दर्द था, पर इससे पहले कि वो इसके लिए चिंतन करती उसे अपनी गांड के छेद पर कुछ छूता हुआ अनुभव हुआ. उसे ये समझने में देर नहीं लगी कि प्रकाश उसकी गांड को चाट रहा है. और इस आनंद से उसकी गांड लुप लुप करने लगी और प्रकाश ने भी अपनी जीभ के प्रहार को तेज कर दिया.

चंद्रेश ने नीलम के सिर पर हाथ रखा और उसे अपने लंड पर केंद्रित किया. नीलम के पीछे प्रकाश खड़ा हुआ और नीलम को इस बात की भनक भी न लग पाई. प्रकाश ने अपने लंड पर थोड़ा थूक लगाया पर नीलम की गांड को यूँ ही रहने दिया. उसे सुखी गांड मारने में अधिक आनंद आता था, हालाँकि गांड मरवाने वाली स्त्री को कई बार इसमें अत्यधिक कष्ट होता था. पर प्रकाश इस बात से अनिभिज्ञ रहता था या यूँ समझें कि वो इसका नाटक करता था. प्रकाश ने नीलम की गांड पर अपने लंड को लगाया ही था कि चंद्रेश ने अपने लंड को नीलम के मुंह से निकाला और नीलम के सिर को कुछ और जोर से पकड़ लिया.

नीलम को अब कुछ कुछ समझ आने लगा था कि क्या हो रहा है. उसने अपनी गांड को हटाने का प्रयास किया पर प्रकाश ने उसकी गांड में अपने लंड को डाल दिया था. अभी क्योंकि केवल सुपाड़ा ही प्रविष्ट हुआ था तो नीलम को कुछ असहजता अवश्य हुई, पर उसने समय की गंभीरता को देखते हुए अपनी गांड को बिलकुल ढीला छोड़ दिया. ये उसकी बुद्धिमता ही थी कि उसने समय से इस कार्य को सम्पूर्ण किया क्योंकि अगले ही पल प्रकाश ने लंड को कुछ बाहर खींचते हुए एक दुर्दांत धक्का मारा और उसके आधे से अधिक लंड ने नीलम की गांड को चीरते हुए अंदर प्रवेश कर लिया.

नीलम ने अपने होंठ भींच लिए और इस दर्द को सहन करने की चेष्टा करने लगी. चंद्रेश ने भी नीलम के मुंह से अपने लंड को निकलकर बुद्दिमानी की थी अन्यथा उसका लंड नीलम के दाँतों से दबकर चोटिल हो सकता था. चंद्रेश नीलम से किसी प्रकार की याचना की अपेक्षा कर रहा था, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ था. दूसरी ओर प्रकाश ने फिर अपने लंड को बाहर निकालते हुए एक और शक्तिशाली धक्का मारा और इस बार उसका लंड नीलम की गांड में पूरा बैठ गया. नीलम की गांड में एक तेज जलन सी हुई और पीड़ा से उसका शरीर ऐंठ गया. उसके दाँत अब तक भींचे ही हुए थे और वो स्वयं को संयत करने का प्रयास कर रही थी.

पर गांड से उठती हुई पीड़ा की लहरें और एक तीव्र जलन उसके मन मस्तिष्क के ऊपर अब एक अँधेरे का आवरण पहना रही थी. उसने फिर से अपनी गांड को हटाने का प्रयास किया, पर इसका अब कोई लाभ नहीं था. उसकी गांड में प्रकाश का लंड जमा हुआ था और निकलने की कोई आशा भी नहीं थी. उसके दाँत अब ठिठुरते हुए से बज रहे थे. प्रकाश ने अपने लंड को बिना हिलाये इसी अवस्था में कुछ तक रहने दिया. नीलम की पीड़ा कुछ कम हुई और उसे अपने आसपास का ज्ञान हुआ. उसे एक अत्यंत सुखद सी सांत्वना देती हुई ध्वनि सुनाई दी.

“बस हो गया, नीलम. बस हो गया.” ये चंद्रेश का स्वर था और इसे सुनकर नीलम को भी कुछ सांत्वना मिली.

उसकी गांड की जलन और पीड़ा अब सहने के स्थिति में थी. उसके मुंह से एक कराह सी निकली और उसकी साँस धीरे धीरे सामान्य हो चली. प्रकाश ने नीलम की स्थिति को समझा और फिर अपने लंड को बाहर निकाला और एक ही धक्के में फिर अंदर कर दिया. नीलम की चीख ने इस बार कमरे को हिला दिया। पर प्रकाश अब पाशविक रूप ले चुका था और वो अपने लंड की पूरी लम्बाई और चौड़ाई से नीलम की आहत गांड पर आघात पर आघात किये जा रहा था. नीलम अब पीड़ा की पराकाष्ठा पर कर चुकी थी और शनैः शनैः आनंद के सागर में प्रवेश कर रही थी. इस समय वो ऐसी स्थिति में थी जहाँ पर पीड़ा और आनंद का समागम होता है. कभी सुख कभी पीड़ा.

नीलम ने कुछ देर बाद चंद्रेश के लंड को ढूंढा और फिर से उसे चूसने लगी. प्रकाश का लंड अब उसकी गांड में उतनी पीड़ा नहीं दे रहा था और उसे अब कुछ कुछ आनंद की अनुभूति भी हो रही थी. चंद्रेश के लंड को चूसने से उसे जो रही सही पीड़ा थी उसका भी भान नहीं रहा. प्रकाश ने जब देखा कि नीलम उसके लंड से व्यथित नहीं है तो उसने इस खेल को अगले चरण में ले जाने का निर्णय लिया.

“भैया, आप भी आ जाओ, नीलम की चूत भी तो सुलग रही होगी चुदाई के लिए. उसे क्यों नहीं चोदते आप?” प्रकाश ने चंद्रेश से कहा.

चंद्रेश ने नीलम के मुंह से अपने लंड को निकाला. नीलम ने भी कोई आनाकानी नहीं की. चंद्रेश ने प्रकाश को संकेत किया तो प्रकाश ने अपने लंड को नीलम की गांड से निकाला और नीलम को उठने के लिए कहा. नीलम उठी तो चंद्रेश लेट गया और फिर नीलम ने अपनी चूत को चंद्रेश के लंड के ऊपर साधा और बैठ गई. उसे चंद्रेश के पूरे लंड को अंदर लेने में कोई दुविधा नहीं हुई. नीलम ने चंद्रेश के लंड पर कुछ देर उछलकर जब उसे अपनी चूत में सही से बैठा लिया तो वो आगे झुक गई. वो जानती थी कि प्रकाश की इच्छा क्या थी और वो स्वयं इन दोनों भाइयों से दोहरी चुदाई करना चाह रही थी. कई दिनों के सन्यास ने उसकी कामोत्तेजना को भड़का दिया था और दोपहर में हितेश से चुदने के बाद भी उसके शरीर की आग ठंडी नहीं हुई थी.

“जैसे ये कभी ठंडी होगी भी.” उसने मन ही मन सोचा और प्रकाश के आक्रमण प्रतीक्षा करने लगी. प्रकाश के साथ ऐसा कम ही होता था कि एक ही दिन में उसे दो दो स्त्रियों के साथ दोहरी चुदाई का अवसर मिले और उसमे भी उसे दोनों बार गांड मारने मिले. उसने अपने लंड को नीलम की खुली हुई गांड पर रखा और इस बार भी एक तगड़े झटके के साथ ही पूरे लौड़े को गांड में उतार दिया. नीलम अब उसकी इस पाशविक सोच को समझ चुकी थी और उसने एक चीख के साथ उसके लंड का स्वागत किया.

“चोदो अब मुझे तुम दोनों मादरचोद. फाड़ दो मेरी चूत और गांड. देखूं तो क्या सोचकर सिया दीदी तुम दोनों से हर दिन मरवाती हैं.”

उसने दोनों को छेड़ने के उद्देश्य से ये सब कहा था. और जैसी अपेक्षा थी उसका परिणाम भी वही हुआ. चंद्रेश जो अब तक उसका सहायक था इस बात से वो भी चिढ़ गया. उसने अपने लंड को उसकी चूत में तीव्रता से अंदर बाहर करना आरम्भ किया. प्रकाश तो पहले से ही आक्रोशित था तो उसपर इस कथन ने आग में घी डालने का काम किया. अब नीलम की चूत और गांड की दोनों ओर से भयंकर धुनाई हो रही थी. उसकी चीखों ने कमरे में आतंक सा मचाया हुआ था. उसकी चीखें इतनी तेज थीं कि घर के दूसरे कोने में भी उनका रुदन सुनाई दे रहा था.

हितेश और सिया ने एक दूसरे को देखा और सिया ने बोला कि लगता है तेरी नीलम मौसी की आज पलंग तोड़ चुदाई हो रही है. हितेश ने भी उसकी हाँ में हाँ मिलाई पर सिया की चूत में हल चलाने में कोई कमी नहीं की. नीलम को कुछ क्षणों के लिए लगा था कि उसने इन दोनों को चिढ़ा कर गलती कर दी है. पर फिर उसके शरीर ने इस निर्मम चुदाई से आनंद के अवशेष निकाल लिए. और धीरे धीरे वो अवशेष बढ़ते गए और उसके पूरे व्यक्तित्व को आनंद के महासागर में ले गए. नीलम की चीखों ने अब आनंद की सिसकारियों और किलकारियों को स्थान दे दिया था. दोनों भाई एक सधी ताल में उसे चोद रहे थे और नीलम उस बहाव में बह रही थी.

आनंद की पराकाष्ठा अगर किसी स्त्री को अर्जित करनी हो तो उसे अपनी चूत और गांड में एक साथ लौंडों से चुदाई करवानी चाहिए. आरम्भ में इसमें अवश्य कठिनाई हो सकती है, परन्तु इसका अंत केवल चूत या गांड मरवाने से कहीं अधिक होता है. यही नीलम को अब अनुभव हो रहा था. उसकी चूत और गांड के बीच की झिल्ली जिसे अकेला लौड़ा कभी उस प्रकार नहीं घिस सकता था, दो लौंड़ों के उसके दोनों ओर होने के कारण पूरा ध्यान मिल रहा था. चंद्रेश और प्रकाश भी एक दूसरे के लौड़े के साथ अंदर मिलाप कर रहे थे और उन्हें भी अत्यधिक आनंद मिल रहा था.

प्रकाश चूँकि बहुत समय से चुदाई कर रहा था तो उससे अब रुका नहीं जा रहा था. उसने तेज धक्कों के साथ नीलम की गांड में अपना पानी छोड़ ही दिया. उसके बाद भी वो उसकी गांड में लंड चलाता रहा जिसके कारण उसका रस झाग के रूप में नीलम की गांड के बाहर निकलने लगा. जब तक उसके लंड में शक्ति रही उसने धक्के लगाए पर उसके बाद अपने सिकुड़ते लंड को बाहर निकाल कर हट गया.

उसके हटते ही चंद्रेश ने नीलम की कमर को पकड़ कर बिना अपने लंड को बाहर निकाले पलटी मारी और अब नीलम नीचे थी और वो ऊपर. इस आसन में वो तीव्र चुदाई कर सकता था और नीलम की चूत को अपने जीजा की शक्ति का फिर से उदाहरण मिला. चंद्रेश के लंड ने नीलम के कई ऐसे स्थानों को छुआ जो उसे ज्ञात भी नहीं था कि उसकी चूत में उपस्थित थे. चंद्रेश का लंड बहुत अधिक बड़ा नहीं था, परन्तु उसकी चुदाई की कला का ही ये जादू था कि उससे चुदने वाली हर स्त्री को यही अनुभव होता थे. कला, शक्ति और गहराई से चुदाई करने में चंद्रेश का कोई पर्याय नहीं था. नीलम थक चुकी थी, पर उसे अपनी चूत की गर्मी को दूर करने के लिए भीतर सिंचाई भी करवानी थी. उसने भी अपनी कमर उछालकर चंद्रेश का साथ दिया. इसके फलस्वरूप, इस चुदाई का अंत अगले दस मिनट में हुआ जब चंद्रेश के लंड के रस ने नीलम की प्यासी चूत की धरती पर वर्षा की और उसे ठंडा कर दिया.

झड़ने के उपरांत चंद्रेश भी हट गया और सोफे पर प्रकाश के पास जाकर बैठ गया. नीलम बहुत देर तक यूँ ही पड़ी रही और अपने दोनों छेदों से उठ रही आनंद की लहरों का सुख लेती रही. फिर वो भी उठी और दोनों चुड़क्कड़ भाइयों को देखा जो अब सोफे पर बैठे पेग मार रहे थे. उसने उनके मुरझाये लौंड़ों को देखा जो अब भी उसके रस से चमक रहे थे. वो उठी और उनके सामने बैठकर उनके लौंडों को चाटने लगी. अपने दोनों छेदों के स्वाद पाने के बाद उसने सिर ऊपर उठाकर उन्हें देखा. चंद्रेश के हाथ में उसके लिए एक पेग था. नीलम ने उसे लिया और एक ही घूँट में समाप्त कर दिया।

चंद्रेश उसके लिए एक और पेग बनाने लगा, नीलम उठकर उन दोनों को सरका कर उनके बीच में बैठ गई.

“बहुत दिन बाद ऐसी चुदाई हुई है. बहुत मजा आया आप दोनों के साथ.” अपने अगले पेग को लेते हुए उसने कहा.

“हम दोनों को भी.”

“अब अगले राउंड के लिए आपको कितना समय चाहिए” नीलम ने उनसे हँसते हुए पूछा.

“लालची.” चंद्रेश ने कहा, “बस कुछ ही देर ठहरो फिर तुम्हारी माँ चोद देंगे.”

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इस प्रकार से दो नगरों के चार कमरों में चुदाई की शृंखला पूर्ण हुई. अगले तीन दिनों तक नीलम और सिया की चंद्रेश, प्रकाश और हितेश ने भरपूर चुदाई की. उसके बार वो योजना के अनुसार नीलम को लेकर उसके घर के लिए निकल पड़े. प्रकाश को अभी ज्ञात नहीं था पर उसके जीवन में एक बड़ा परिवर्तन आने वाला था. उसने नए नगर में व्यवसाय को स्थापित करने की योजना को सहर्ष स्वीकार कर लिया था. उसके मन में ये भी विचार था कि अब सिया अगर छूट भी गई तो दिया और कनिका तो मिल जाएँगी. फिर उसका ध्यान आकाश और आकार की सेक्रेटरी की ओर भी गया. उसे विश्वास था कि उसे उन दोनों के साथ भी चुदाई का अवसर अवश्य मिल जायेगा.

“वैसे भी मैंने भाई भाभी को कभी अकेले नहीं रहने दिया. अब ये दोनों भी एक दूसरे के साथ मन लगाकर रह पाएंगे.” उसे मन में एक विचित्र सी शांति का अनुभव हुआ. “काश मेरा भी कोई साथी होता जिसके लिए मेरा भी जीवन समर्पित होता.”

उसके मन की इच्छा कितने शीघ्र पूर्ण होने वाली थी अगर उसे इसका आभास होता तो उसकी मन की शांति में संतुष्टि भी जुड़ जाती.

चार घंटे बाद पाँचों संभ्रांत नगर में नीलम के बंगले पर पहुंच गए.

क्रमशः

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अध्याय २५: सातवां घर - वर्षा और समीर नायक ३

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अब तक:

वर्षा और समीर के परिवार में सब कुछ अच्छा चल रहा है. उनका कृषि का काम अच्छा लाभ दे रहा है. जयंत और राहुल संतोष के साथ मिलकर पूरे काम को सुचरु रूप से चला रहे हैं. परिवार ने कुसुम और संतोष को भी अपने परिवार का ही अंग माना हुआ है. कुछ मर्यादाओं को छोड़ दें तो उनके मध्य में कुछ भी छुपा नहीं है. कुसुम और संतोष के बेटे कमलेश और बेटी काम्या को भी अपनी पढ़ाई समाप्त करने के बाद इसी नगर में नौकरी भी मिल चुकी है. राहुल और जयंत ने भी संतोष का वेतन बढ़ाने का निश्चय किया और इसके कारण संतोष के परिवार में समृद्धि का आनंद फ़ैल गया.

राहुल क्लब में अपने स्कूल की एक शिक्षिका से मिला. उनका उसके जीवन की सफलता में बहुत बड़ा योगदान था. उन्होंने तो राहुल को नहीं पहचाना, परन्तु राहुल ने उन्हें पहचान लिया और घर पर आमंत्रित किया. परिवार वाले भी उसके इस निर्णय का स्वागत किये. उधर कमलेश और काम्या बेंगलोर से घर आ चुके थे और रात और दिन सभी संभोगरत रहे थे. अगले दिन कमलेश और काम्या वर्षा और समीर से आशीर्वाद लेने गए और फिर उनके ही कमरे में दोनों वर्षा की चुदाई कमलेश और काम्या की चुदाई समीर ने की.

नायक परिवार में एक और आनंद से भरपूर सामान्य दिन का आरम्भ हो चुका था.

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अब आगे:

वर्षा का घर:


कुछ ही दिन में शनिवार भी आ ही गया. राहुल ने शुक्रवार को ही अपनी पूर्व शिक्षिका से मिलने का कार्यक्रम पक्का कर लिया था. परन्तु उन्होंने घर आने में आनाकानी की तो राहुल ने उन्हें नगर के एक बड़े होटल में दोपहर के भोजन के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने स्वीकार भी कर लिया.

निर्धारित समयानुसार राहुल होटल पहुँचा जहाँ पर उसे उसके द्वारा आरक्षित टेबल पर बैठा दिया गया. ये टेबल भीड़भाड़ से कुछ अलग थी और यहाँ पर शांति के साथ बात की जा सकती थी. उसने मेसेज के माध्यम से उसकी टेबल के बारे में बता भेजा. कुछ ही देर की प्रतीक्षा के बाद उसने अपनी पूर्व शिक्षिका को अंदर आते हुए देखा और उसने खड़े होकर अपनी उपस्थिति दर्शाई. गरिमा मैडम ने एक सादी परन्तु लुभावनी पोषक पहनी थी. उन्हें देखकर राहुल उनके प्रति फिर आकर्षित हुए बिना न रह सका. टेबल पर आने पर वेटर ने उनकी कुर्सी बाहर खींची और उन्हें बैठाया.

“गुड आफ्टरनून.” राहुल ने कहा.

“गुड आफ्टरनून.” मैडम ने उत्तर दिया.

“आप क्या लेना चाहेंगी? कोई पेय? या सीधे भोजन का ही मन है.”

मैडम सोचने लगीं तो राहुल बोला, “वैसे मैं बियर ले रहा हूँ, आप भी चाहें तो ले सकती हैं.”

मैडम ने भी हाँ कहा तो वेटर को बुलाकर राहुल ने उसे बियर लाने का निर्देश दिया.

“आप सोच रही होंगी कि ऐसा क्या है कि मैंने आपको अलग से बुलाया है. इसके दो तात्पर्य हैं. और मैं कुछ विगत बातें बताना चाहता हूँ.” इतने में वेटर ने बियर को दे ग्लास में डाला और कुछ अल्पाहार सामने रखकर चला गया.”

“मैडम, मैं %^*( स्कूल में पढ़ा हूँ.”

ये सुनते ही मैडम के चेहरे का रंग उड़ गया.

“मैं उस आयु में भी आपको बहुत चाहता था, और आज भी उतना ही चाहता हूँ. मेरे जीवन की सफलता का अधिकांश श्रेय में आपके प्रोत्साहन को देता हूँ.”

“शिर्के,.... राहुल शिर्के, क्या तुम राहुल शिर्के हो? मैडम ने पूछा.

“जी, अपने सही पहचाना.”

“आप सोचेंगी कि मैंने उस दिन आपका चयन क्यों किया? तो सच ये है कि मेरी पूर्ण भावनाएं आपको देखकर जाग्रत हो गयी थीं. यही नहीं मैं ये भी जानना चाहता था कि आप इस व्यवसाय में कैसे आ गयीं. मुझे स्पष्ट याद है कि आप गणित की बहुत अच्छी शिक्षिका थीं. अगर आप मुझे बताना चाहेंगी और उस स्थान से निकलना चाहेंगी तो मैं आपकी सहायता करना चाहूँगा।”

मैडम सोच में पड़ गयीं. फिर धीरे धीरे उन्होंने बताना आरम्भ किया.

“तुम्हें अगर याद हो तो मेरे पति भी उसी स्कूल में पढ़ाते थे. हमारी एक बेटी थी और हम सब बहुत खुश थे. परन्तु विधि को ये स्वीकार नहीं था. चार वर्ष पहले मेरे पति का एक दुर्घटना में देहांत हो गया. बीमा से कुछ राशि अवश्य मिली, पर पर्याप्त नहीं थी. मैंने घर में ट्यूशन लेना आरम्भ किया. मेरी बेटी कॉलेज में थी और उसकी पढ़ाई का व्यय वहन करना केवल मेरे वेतन से सम्भव नहीं था. इस वर्ष उसकी पढ़ाई पूरी हो जाएगी.”

बियर के दो घूँट लेने के बाद उन्होंने आगे बताना आरम्भ किया, “पर मेरे ट्यूशन लेने के कारण स्कूल ने मुझे चेतावनी भी दी, परन्तु मेरे कारण बताने से उन्होंने मुझे कुछ समय दिया और फिर बंद करने के लिए कहा. प्रिंसिपल मेरी परिस्थिति समझते थे और उन्होंने वेतन बढ़ाने का अनुरोध भी प्रबंधन को दिया. परन्तु हुआ उल्टा ही. प्रबंधन ने वेतन बढ़ाना तो दूर, मेरे ट्यूशन लेने के कारण मुझे स्कूल से ही निकाल दिया. हमारी यूनियन ने कुछ आपत्ति की, पर फिर इस पूरे प्रकरण को मानो भूल ही गए. मेरी स्थिति अब विषम हो गयी.”

“मेरी एक सहेली ने मुझे इस क्लब के बारे में बताया और समझाया कि अपनी बेटी के भविष्य के लिए मुझे अपने शरीर और आत्मा का होम लगाना ही होगा. परन्तु उसने ये भी बताया कि इसमें मुझे मेरे पूर्व वेतन से कई गुना अधिक आय हो सकती है और आगे की भी कठिनाइयां दूर हो जाएँगी. कुछ दिन के चिंतन के बाद मैंने उसे अपनी स्वीकृति दी और उसने मुझे क्लब में काम दिलवा दिया. आज लगभग साढ़े तीन वर्षों से मैं वहाँ काम कर रही हूँ. आप जिस दिन आये थे वो मेरा अवकाश होता है, पर उस दिन मुझे बुलाया गया था क्योंकि दो और महिलाएं नहीं आ रही थीं. सम्भव है कि आप उसी वार को क्लब जाते होंगे इसीलिए अब तक मुझे नहीं देखा.”

“हाँ, ये सच है. अब आप क्या चाहती हैं?”

“अगर सम्भव हो तो निकलना, मेरी बेटी की पढ़ाई के लिए मैंने पर्याप्त धन एकत्रित कर लिया है. अगर कोई अच्छा काम मिल जाये तो मैं इस कार्य से निवृत्त होना चाहूँगी।”

“क्या आप किसी अन्य नगर जाने के लिए भी मानेंगी?”

“हाँ, मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं होगी. क्यों? क्या तुम्हारे पास कोई काम है?”

राहुल सोच में पड़ गया.

“हमारा कृषि का बहुत अच्छा काम है. जिसे हमारे परिवार के समान ही एक व्यक्ति देखते हैं. वे हमारे सगे तो नहीं हैं, परन्तु उन्हें हमारे परिवार का ही अंग माना जाता है. और यही रहेगा भी. वे खेतों और अन्य काम तो अच्छे से देख लेते हैं, परन्तु जो हमारा लेखा जोखा देखता है, वो भी इतना निपुण नहीं है. अगर आप चाहें तो हम आपको इस कार्य के लिए नियुक्त कर सकते हैं. आपका वेतन ५० हजार होगा, रहने और भोजन इत्यादि का प्रबंध हमारा ही होगा. संतोष, जिनके बारे में मैंने आपको बताया, आपके मैनेजर होंगे. वर्ष में दो महीने को छुट्टी मिलती है. आपको अगर यहाँ आना हो तो वो भी सम्भव है. अगर आप संतोष के साथ आएंगी तो उसे छुट्टी नहीं माना जायेगा.”

“मुझे तो ये सपने जैसा लग रहा है. मुझे स्वीकार है.”

उसके बाद राहुल ने कुछ और बातें बतायीं और गरिमा संतुष्ट हो गयी. राहुल ने अपने फोन से किसी को मेसेज किया और फिर खाने के लिए वेटर को बुलाकर खाने का ऑडर दे दिया. भोजन समाप्त हुआ ही था कि राहुल को एक मेसेज मिला. उसने द्वार पर देखा तो संतोष था. उसे संकेत करके राहुल ने बुलाया. संतोष के आने पर राहुल ने सरककर उसे अपने साथ बैठाया.

“मैडम, ये हैं संतोष जी, जिनके विषय में मैंने आपको बताया था. संतोष जी, ये गरिमा मैडम हैं और इन्होने मुझे पढ़ाया है. मैंने जयंत और पापा से बात कर ली है और गरिमाजी हमारे कृषि के अकॉउंट को संभालने के लिए मान गई हैं. ये आज से ही काम आरम्भ कर रही हैं और इसके लिए अब आपको इन्हें प्रशिक्षण देना होगा.”

राहुल ने आगे कहा, “ये भी आपके साथ ही हमारे गेस्ट हाउस में रहेंगी, इनका कमरा अलग होगा, पर ये चाहे जिस कमरे में सो सकती हैं.” राहुल की इस बात पर गरिमा का चेहरा लाल हो गया.

“संतोष को भी इस बात की अनुमति है और आपको भी रहेगी. वैसे हम भी जब जाते हैं तो संतोष हमारे लिए भी हर प्रकार का प्रबंध करते हैं. अगर आप एक दूसरे के साथ संबंध बनाना चाहेंगे तो हमें किसी प्रकार की आपत्ति नहीं है. वैसे इनकी पत्नी भी बीच बीच में आती हैं वहाँ और आप तीनों क्या निर्णय लेंगे ये आप पर निर्भर है.”

गरिमा के सामने नए नए विकल्प खुल रहे थे. उसके मन में इस क्लब को छोड़ने के समय एक ही विचार आया था कि उसकी चुदाई का क्या होगा, क्योंकि अब वो उसकी अभ्यस्त ह चुकी थी. पर अब लगता था कि इसकी भी कोई समस्या नहीं होगी.

राहुल: “मुझे कुछ समय के लिए एक अन्य कार्य है, होटल में ये कमरा अपने लिए बुक है, और आप दोनों वहाँ जाकर एक दूसरे से पहचान बढ़ाइए, मैं कार्य समाप्त होते ही आ जाऊँगा। और आप दो पुरुषों को संभालने का पूरा सामर्थय रखती ही हैं तो कोई कठिनाई नहीं होगी.”

ये कहते हुए राहुल ने कमरे का कार्ड संतोष को दिया और फिर बिल के लिए वेटर को बुलाया. बिल देकर वो शीघ्र लौटने के लिए कहकर निकल गया. संतोष और गरिमा भी उठे और लिफ्ट की और अग्रसर हो गए. कमरे में पहुंचकर उन्होंने कमरे को बंद किया और फिर एक दूसरे को देखने लगे.

“तो आप यहाँ मेरा इंटरव्यू लेंगे?” गरिमा ने कुछ इठलाते हुए पूछा.

“आपकी शैक्षणिक योग्यता का तो परिचय राहुल भैया दे ही चुके हैं, मुझे अन्य योग्यता के बारे में जानने की उत्सुकता है.”

“आपको विश्वास दिलाती हूँ कि उसमें भी मैं कम नहीं हूँ.” ये कहते हुए गरिमा अपने वस्त्र उतारने लगी.

उसे संतोष के बलिष्ठ शरीर को देखकर अपनी चूत में पानी बहता हुआ अनुभव जो होने लगा था. संतोष ने भी समय का सदुपयोग करते हुए अपने कपड़े उतार फेंके. कुछ ही देर में दोनों एक दूसरे के सामने नंगे खड़े थे.

“आपकी पत्नी को आपत्ति नहीं है आपके इस प्रकार के व्यवहार से?”

संतोष हंसने लगा, “अभी आपको कुछ पता नहीं है और अभी के लिए यही सही भी है, पर सीधी बात ये है कि क्योंकि हम बहुत समय तक अलग रहते हैं तो मुझे और उसे अन्य लोगों के साथ सहवास की अनुमति है. हम दोनों एक दूसरे की इस आवश्यकता को समझते हैं और इसे अनावश्यक रूप से अपने बीच में नहीं लाते हैं.”

“बहुत सुलझी हुई सोच है आप दोनों की.” ये कहकर संतोष को बिस्तर पर लिटाकर गरिमा उसके लंड को मुंह में लेकर चूसने लगी.

संतोष को आश्चर्य हुआ कि वो इतनी शीघ्र ही इस कार्य में जुट गई थी, पर उसे गरिमा के वर्तमान कार्य के बारे में पता जो नहीं था. संतोष के लंड ने गरिमा के अनुभवी मुंह में अकड़ना आरम्भ किया और गरिमा ने भी उसके लंड को अपने मुंह में संभावित रूप तक अंदर लेते हुए उसे चूसने में कोई कमी नहीं की. संतोष का लंड अब फटने जैसी स्थिति में आ रहा था और गरिमा को इस बात का ज्ञान हो गया था.

उसने लंड को मुंह से निकाला और फिर उसे थूक से पूरा गीला कर दिया. फिर उसने अपनी चूत पर कुछ थूक लगाया, हालाँकि इसकी आवश्यकता नहीं थी. उसने संतोष की ओर देखा और फिर उसके दोनों ओर पैर करते हुए उसके लंड पर बैठ गई. संतोष के लंड को पूरा अंदर लेने में उसे कोई कठिनाई नहीं हुई और वो उछल उछल कर उसे चोदने लगी. संतोष इस बात से चकित था कि अभी उन्हें कमरे में आये हुए कुल पंद्रह मिनट ही हुए थे और उसका लंड इस सुंदर शिक्षित स्त्री की चूत को मथ रहा था. उसने भी अब अपनी कमर उछालते हुए गरिमा को चोदने के लिए परिश्रम आरम्भ कर दिया. स्थिति तनावपूर्ण अवश्य थी, पर पूर्ण नियंत्रण में थी. दोनों मानो जल्दी से जल्दी अपने लक्ष्य को पाने के लिए व्याकुल थे.

कुछ देर इस आसन में चुदाई करने के बाद गरिमा उतर गई और वो लेटकर अपने पांवों को फैला दी. संतोष ने अपने लंड को उसकी चूत में पेलकर इस बार अधिक शक्ति के साथ उसकी चुदाई आरम्भ कर दी. गरिमा को भी इसमें आनंद अधिक मिल रहा था क्योंकि संतोष का कसा हुआ शरीर जिस कर्मठता से उसे चोद रहा था वो उसके ऊपर वाले आसन में सम्भव नहीं था. संतोष का आंतरिक बल भी अधिक था और वो इस आसन में भी गरिमा को दस मिनट से अधिक तक चोदता रहा.

गरिमा की चूत से बहते हुए पानी से होटल का गद्देदार बिस्तर भीग चुका था. संतोष ने भी अपने झड़ने की घोषणा की तो गरिमा ने उसे मुंह में ही झड़ने के लिए कहा. संतोष ने कोई आनाकानी नहीं की और जैसे ही झड़ने को हुआ उसने अपना लंड गरिमा के मुंह को सौंप दिया. गरिमा के मुंह में जाते ही उसके लंड से रस की फुहारें छूटने लगीं जिसे गरिमा ने निसंकोच पी लिया. झड़ते ही संतोष उसे साथ लेट गया.

“तो मेरा इंटरव्यू कैसा रहा सर?” गरिमा के प्रश्न में वही इठलाहट थी.

“आप नीचे और ऊपर के काम अच्छे से संभाल सकती है. अभी ये देखना है कि आप पीछे के काम में कितनी अनुभवी हैं.” संतोष ने भी उसे प्रकार से उत्तर दिया.

दोनों हंस पड़े और तभी कमरे का दरवाजा खुला और कमरे में राहुल ने प्रवेश किया. राहुल को देखकर गरिमा कुछ शर्मा गई क्योंकि वो अभी ऐसी अवस्था में थी. राहुल आगे बढ़ा और उसके बढ़ते ही गरिमा और संतोष ने उसके पीछे खड़ी एक सांवली सलोनी स्त्री को देखा. गरिमा अपनी अवस्था पर अब और भी शर्मा गई. पर संतोष का चेहरा खिल उठा.

“अरे कुसुम, तू यहाँ कैसे?”

“भैया जी ले आये. बोले आपके साथ के लिए किसी को नियुक्त किये हैं और मुझे मिलवाने ले आये. तो ये हैं गरिमा दीदी.” कुसुम ने आगे बढ़कर कुछ बताया और कुछ पूछा.

“हाँ, यही हैं गरिमा मैडम.”

“आपकी पसंद बहुत अच्छी है भैया जी.” कुसुम ने कहा, “अब हम भी चख के देख लेते हैं कितनी मिठास है इनमें.”

कुसुम ने अपने वस्त्र उतारने में अधिक समय नहीं खोया और राहुल भी अपने कपड़े निकालकर सोफे पर जा बैठा. उसे अब कोई जल्दी नहीं थी. ये खेल अब लम्बा चलने वाला था.

कुसुम ने बिस्तर पर लेटी हुई गरिमा को देखा. वो इस समय अत्यधिक सुंदर दिख रही थी.

“कैसी रही मैडम के साथ चुदाई?” उसने अपने पति से पूछा जो एक मुस्कराहट के साथ उसे ही देख रहा था. कुसुम को उसकी आँखों में अपने प्रति अपार स्नेह और प्रेम दिखाई पड़ा. कुसुम संतोष के चौड़े सीने से लग गई. फिर उसने संतोष को चूमा, “आपने बताया नहीं.”

“मैं तुम्हें ही देख रहा था. बहुत अच्छी रही. मैडम सच में बहुत उत्साह से चुदाई करती हैं.”

“चलिए, अब आपको मुझसे दूर रहने पर अधिक कठिनाई नहीं होगी.”

“ऐसा क्यों बोल रही हो? तुमसे दूर रहना मेरे वश में नहीं है. पर मैडम का साथ अवश्य इसे कुछ सरल बना देगा.”

“चलो मैं भी मैडम का स्वाद चख लूँ.” ये कहकर कुसुम संतोष से अलग हुई और गरिमा को देखा जिसने अपने घुटने मोड़े हुए थे.

गरिमा के पास जाकर कुसुम ने उसके पैर अलग किये और उसमे से झाँकती हुई चूत को देखा जो इस समय कुछ लालिमा लिए हुए थी. कुसुम आगे झुकी और गरिमा की चूत पर अपनी उँगलियाँ फिराईं. गरिमा सिहर उठी. कुसुम बिस्तर पर चढ़ी और गरिमा के पैरों के बीच बैठ गई.

“अपने कभी किसी स्त्री से चूत चटवाई है?”

गरिमा ने हामी में सिर हिलाया। कुसुम अभी भी उसकी चूत सहला रही थी. फिर उसने एक ऊँगली अंदर डाली और घुमाकर बाहर निकाली और उसे अपने मुंह में लेकर चखा.

“आपने मेरे लिए मैडम के अंदर कुछ नहीं छोड़ा?” उसने संतोष से रूठे हुए स्वर में कहा.

“मुझे क्या पता था कि तुम आने वाली हो. वैसे भी मैडम ने मुंह में ही छोड़ने के लिए कहा था.” संतोष ने बताया.

कुसुम: “अच्छा स्वाद है न मेरे पति का मैडमजी?”

गरिमा: “हाँ, सच में. अब अगर आप चाहो तो मैं आपका भी स्वाद लेना चाहूँगी।”

कुसुम ये सुनकर चहक उठी. फिर बोली, “आप मुझे आप आप कहकर मत पुकारो. आपकी छोटी बहन हूँ.”

“ठीक है कुसुम, अब हम दोनों बहनें एक दूसरे का स्वाद लें?”

“पहले मुझे अपना मुंह मीठा कर लेने दो, फिर.” ये कहकर कुसुम ने अपने मुंह को गरिमा की चूत पर रखा और चाटने लगी. संतोष ने देखा कि कुसुम की गांड कुछ खुली हुई थी और सम्भवतः उसमे से वीर्य बाहर निकलने का प्रयास कर रहा था.

“गांड मरवाकर आई हो क्या?” उसने पूछ ही लिया.

“हाँ, कमलेश माना ही नहीं. बहुत जोर से मारी मेरी गांड उसने, हड्डियां हिला कर रख दीं आज तो. पर आप चिंता न करो, आपके लंड के लिए अभी भी लालायित है.”

“ए छोटी बहन, अभी मेरी गांड की बारी है तेरे पति के लंड से चुदने की.”

“तो मैं किस खेत की मूली हूँ, कुसुम, मैं तेरी गांड मारूंगा जब संतोष मैडम की मार रहे होंगे.” राहुल ने उसे ढाढ़स बँधाया।

“ये हुई न बात भैया जी. तो दीदी चलो अब हमें एक दूसरे की चूत को ही नहीं बल्कि गांड को भी उन दोनों के लौंड़ों के लिए उपयुक्त बनाना है.”

कुसुम ने पलटकर अपनी चूत को गरिमा के मुंह पर रखा और दोनों एक दूसरे के साथ समलैंगी चटाई में व्यस्त हो गयीं. राहुल और संतोष सोफे पर बैठे उन दोनों के इस प्रेम प्रसंग को देख रहे थे.

**********************************

राहुल, संतोष और कुसुम लगभग पाँच बजे अपने घर पहुंचे. घर में शांति थी. कुसुम और संतोष अपने घर में चले गए और राहुल ने अपने कमरे की राह पकड़ी. उसे स्नान करने की इच्छा थी. होटल से निकलते समय उसने स्नान नहीं किया था. संतोष और राहुल ने गरिमा की इच्छानुसार ही चुदाई की थी. संतोष को गरिमा की गांड मारकर उसके इंटरव्यू को पूरा करने का अवसर मिला तो कुसुम की गांड ने राहुल के लंड को ठंडा किया. लौटते हुए कुसुम ने हंसकर बोला कि आज उसकी चूत की ओर तो किसी ने देखा ही नहीं, बस सुबह से सब उसकी गांड ही मार रहे हैं. संतोष के याद दिलाने पर कि गरिमा ने उसकी चूत से प्रेम किया था कुसुम बोली कि आप जानते हो मुझे चूत में लौड़ा अधिक प्रिय है, जीभ से. संतोष ने रात में उसकी इस इच्छा को पूरा करने का वचन दिया.

राहुल ने जब अपने कमरे में प्रवेश किया तो बिस्तर पर जयंत को लेटा हुआ पाया. वो इस समय नंगा लेटा अपने लंड को सहला रहा था. राहुल को देखने पर भी उसने अपनी गतिविधि को न रोका न ही किसी प्रकार से घबराया.

“दे दिया मैडम को उनका नियुक्ति पत्र, जीजाजी?” जयंत ने मुस्कुराकर पूछा.

हुआ ये था कि गरिमा ने जब उसके प्रस्ताव को स्वीकारा तो संतोष के आने के बाद उसने आज ही गरिमा का नियुक्ति पत्र देकर विषय को निर्णायक रूप देने का संकल्प लिया. इसी कारण वो गरिमा को संतोष के साथ छोड़कर घर आया और जयंत को अपने कमरे में बुलाकर अंजलि और जयंत को पूर्ण विवरण दिया. उसके बाद जीजा साले ने मिलकर गरिमा का नियुक्ति पत्र बनाया, और फिर जयंत ने उसपर हस्ताक्षर कर के उसे राहुल को सौंप दिया था. जब वो बाहर निकला तो कुसुम दिख गई जो अब अपने घर से आ रही थी. राहुल ने कुसुम को बुलाया और पूछा कि क्या वो उसके साथ संतोष के पास चलना चाहेगी? कुसुम तुरंत मान गई. उसने कमलेश को फोन से बताया और राहुल के साथ होटल चली गई थी.

“हाँ, ये कार्य भी सम्पन्न हुआ. और लगता है तुम भाई बहन भी मजे लेने में व्यस्त थे मुझे काम पर लगाने के बाद.” राहुल ने हँसते हुए कहा और वो भी अपने कपड़े उतारने लगा.

“अगर आपको इसमें कोई आपत्ति थी तो मुझे कह देते, मैं चला जाता, मैडम के पास. वैसे मैडम के साथ कुछ मजा आया?” जयंत ने चुटकी ली.

तभी बाथरूम में से अंजलि निकली उसके बाल भीगे हुए थे और उसका नंगा शरीर पानी की बूंदों से चमक रहा था. उसने अपने शरीर को पोंछने का कष्ट नहीं उठाया था. राहुल अंजलि की सौंदर्य को देखकर ठगा सा रह गया. वो सच में किसी अप्सरा जैसी लग रही थी. अंजलि ने जयंत की बात भी सुन ली थी.

“भैया, तुम्हारे जीजा ने मैडम की चुदाई न की हो ये सम्भव ही नहीं है. हैं न पतिदेव?” अंजलि राहुल के पास पहुंची और उसके शेष वस्त्र उतारने में उसकी सहायता करने लगी.

“नहीं, आज मैंने उन्हें छुआ भी नहीं. उनका पूरा आनंद संतोष और कुसुम ने ही उठाया.”

“अरे रे रे रे, मेरा बेचारे पतिदेव. आप तो यूँ ही सूखे रह गए.”

राहुल ने अंजलि के होंठ चूमे, “मैंने ऐसा भी नहीं कहा. कुसुम जो थी.”

“ओह तो आप होटल में जाकर कुसुम को चोदकर चले आये?”

“हाँ, मैंने यही उचित समझा, वैसे कुसुम को भी चोदा नहीं, केवल उसकी गांड ही मारी।”

“बताओ भैया, अब क्या करें. मेरा मन था इनसे गांड मरवाने का और ये पहले ही कुसुम को मार आये.”

“अरे तो क्या हुआ, जीजा है मेरा, अब मार लेंगे तुम्हारी गांड। इसमें इतना आहत होने की क्या आवश्यकता है.”

“बिलकुल, तुम्हारी गांड तो मैं मरते समय भी मारकर ही जाऊँगा.” राहुल ने अंजलि से कहा.

अंजलि ने राहुल के मुंह पर हाथ रखा और बोल पड़ी, “मरने की बात मत करना मेरे सामने कभी. समझे?” उसकी आँखों से आंसू छलक पड़े. राहुल ने उसे बाँहों में लिया और कहा कि वो आगे से ऐसा नहीं बोलेगा.

“ठीक है, नहीं तो…” इस बार राहुल ने उसका मुंह बंद कर दिया.

“अब भैया जब यहाँ हैं ही, और आप मेरी गांड मरोगे ही, तो क्यों न आप दोनों मुझे एक साथ चोदो? मैं वैसे भी भैया से एक बार और चुदने के लिए आतुर थी.”

राहुल और जयंत उसकी बात को टालने की स्थिति में नहीं थे. राहुल ने अंजलि का हाथ पकड़ा और बिस्तर की ओर ले गया. बिस्तर पर से उठकर जयंत ने अंजलि का स्वागत किया.

“ऐसा है, मुझे अब बस चोद दो आप दोनों. शक्तिपूर्वक और तेज चुदाई चाहिए मुझे. उसके बाद रात में देखेंगे प्यार वाली चुदाई.” अंजलि ने बिस्तर पर बैठकर कहा और जयंत के लंड को मुंह में लिया और कुछ समय चूसा और फिर राहुल के लंड को भी चूसकर खड़ा कर दिया. इसके बाद उसने समय नष्ट न करते हुए जयंत को फिर से लिटाया और उसके लंड पर थूका और फिर अपनी चूत पर लगाया.

“चलो भैया, आपकी सवारी चढ़ रही है.”

ये कहते हुए उसने अपनी चूत को जयंत के लंड पर उतार दिया. लंड पूरा अंदर जाने के बाद उसने उछलना आरम्भ कर दिया. फिर राहुल को पास बुलाया और जयंत के लंड पर उछलते हुए उसके लंड को मुंह में लेकर फिर से चूसने लगी. राहुल का लंड था भी बड़ा और जाना भी था उसकी गांड में, तो वो सावधानी के लिए उसे पर्याप्त गीला कर रही थी. संतुष्ट होते ही उसने राहुल से अब गांड मारने का अनुरोध किया. राहुल अपनी सुंदर पत्नी के पीछे गया और उसकी उछलती हुई गांड को प्रेम से देखने लगा. फिर उसने हाथ बढ़कर उसकी गांड में अंगूठा डाला और कुछ अंदर बाहर किया. इस पूरे समय अंजलि जयंत के लंड पर कूदे जा रही थी. अंगूठे को बाहर निकालकर राहुल ने दो उँगलियों को मुंह से गीला किया और अंजलि की गांड में दो तीन मिनट तक घुमाया.

जब उसे विश्वास हो गया कि गांड अब मारने की उचित स्थिति में आ चुकी है तो उसने अंजलि के पीछे जाकर घुटने टेककर अपने लंड को उसकी गांड के छेद पर लगाया. अंजलि रुक गई और पीछे मुड़कर उसने राहुल को अपनी चिर परिचित मुस्कान दी जिसका अर्थ था कि अब उसे प्रतीक्षा नहीं करनी है. राहुल अंजलि के इस मूड को भली भांति पहचानता था. माँ बेटी की इस समानता के बारे में सोचकर उसे अपने भाग्य पर गर्व हुआ. फिर उसने हल्के हल्के से अपने लंड को अंजलि की गांड में घुसना आरम्भ किया. अंजलि और जयंत इस आक्रमण के समाप्त होने के लिए रुक गए.

अंजलि का मुंह दूसरी ओर होने के कारण राहुल को उसके भाव नहीं दिख रहे थे. परन्तु अगर देख सकता तो उसे दिखता कि अंजलि को कुछ असहजता अवश्य थी पर उसके भाव किसी प्रकार से भी पीड़ायुक्त नहीं थे. राहुल के मोटे लंड ने अपनी मद्धम गति के साथ अंजलि की गांड की यात्रा को पूरा किया और अपने पूरे लौड़े को गांड में स्थापित कर लिया. अंजलि को अब अपने भाई और पति के लंड एक दूसरे से भिड़ते हुए अनुभव हो रहे थे. दोनों के बीच में एक पतली सी चमड़ी की दीवार थी जिसके दोनों ओर दो मोटे लंड साँस भर रहे थे. अभी तक किसी ने भी हिलना आरम्भ नहीं किया था, पर अंजलि को इस स्थगित अवस्था में भी आनंद की अनुभूति हो रही थी. उसकी चूत और गांड आने वाले अनंत सुख की कल्पना से ही उत्तेजित हो रहे थे. चूत रस से चूने लगी थी तो गांड अपने ढंग से सिकुड़ कर लंड को अंदर समाने का प्रयास कर रही थी.

इस समीकरण को किसी न किसी ने तो तोड़ना ही था. और ये शुभ कार्य जयंत ने किया. उसने अपने लंड से अंजलि को चोदना आरम्भ किया और ये धक्के हल्के हल्के ही थे. उसके कुछ ही धक्के लगे होंगे कि राहुल ने भी उसी लय में अंजलि की गांड में अपने लंड की आवाजाही आरम्भ की. अंजलि को जिस सुख की प्रतीक्षा थी उसका शुभारम्भ हो चुका था, और अब इसे सुख में बढ़ोत्तरी ही होने थी. जयंत और राहुल अपने अपने निर्धारित लक्ष्य को अब एक लय से भेद रहे थे. अंजलि आनंद सागर में हिलोरे ले रही थी. उसने पीछे मुड़ते हुए राहुल को आँख मारी और फिर झुकते हुए जयंत के होंठों से होंठ मिला दिए.

ये मानो एक संकेत था. जयंत और राहुल ने अपनी गति बढ़ा दी. अंजलि जयंत के होंठ चूस रही थी. साथ साथ अब उसने भी अपनी गांड हिलाना आरम्भ कर दिया था. अब तीनों अपनी अपनी दिशा में गतिविधि कर रहे थे. जयंत और राहुल को अपने लंड परस्पर एक दूसरे से घिसते हुए अनुभव हो रहे थे और इस कारण उन्हें भी इस चुदाई का पूर्ण आनंद आ रहा था. और अंजलि. उसकी तो बात ही और थी. उसके दोनों छेदों में चल रहे लौड़े उसके आनंद को चरम सीमा तक ले जा रहे थे. यही कारण था कि उसने भी अपनी गांड अब जयंत के लंड पर पटकनी आरम्भ कर दी थी.

राहुल को अपनी पत्नी की गांड मारते हुए जो सुख मिल रहा था वो इस समय के लिए अकल्पनीय था. वैसे ये सुख अपनी माँ और सास के साथ भी कई बार ले चुका था तो ये कहना कि ये उनसे अपेक्षाकृत अधिक आनंददाई था अनुचित था. पर जिस गांड में लौड़ा हो वही सबसे प्रिय लगती है. जयंत और राहुल आप अपने शीर्ष पर पहुंच चुके थे. अंजलि ने कुछ बताया नहीं था कि वो क्या चाहती है और इसीलिए राहुल ने उसकी गांड में ही अपना पानी छोड़ने का निर्णय ले लिया था. चुदाई की गति तीव्र हो चुकी थी. तीनों अब शीघ्रतिशीघ्र झड़ने की लालसा रखते थे. और अंजलि ने इसका शुभारम्भ किया. उसने जयंत के होंठ छोड़े और एक किलकारी या कामोदमक चीख के साथ जयंत के शरीर पर शिथिल हो गई. जयंत और राहुल अपने लंड फिर भी उसकी चूत और लंड में पेलते रहे. अंततः राहुल ने अपने लंड की वर्षा से अंजलि की गांड को सींच दिया. जयंत भी पीछे न था और उसके रस की फुहार अंजलि की चूत में बह चली थी.

राहुल ने अपने लंड को अंजलि की गांड से निकाला तो उसे एक सुखद आश्चर्य हुआ. अभी लंड अंजलि की गांड से बाहर निकला ही था कि उसे आभास हुआ कि किसी ने उसके लंड को पकड़ा और मुंह में ले लिया. उसने नीचे देखा तो उसकी माँ सुलभा अब उसके लंड को चूसकर साफ कर रही थी. राहुल ने देखा कि वो भी नंगी ही थी. वो कुछ बोलने को हुआ ही था कि सुलभा ने उसे अपने होंठों पर ऊँगली रखकर चुप रहने का संकेत किया. राहुल ने सिर हिलाया और अपनी माँ से अपने लंड को साफ करवा लिया.

अब सुलभा का लक्ष्य था अंजलि की गांड जो इस समय भी उठी हुई थी और जिसमें से उसके बेटे राहुल का गाढ़ा वीर्य चू रहा था. अपनी जीभ से बाहर बहते हुए रस को एक ही बार में सुलभा ने चाटा और फिर अंजलि की गांड में ऊँगली डालकर और वीर्य को बाहर प्रेषित किया. गांड में ऊँगली डाल कर अंजलि की गांड से निकलते रस को सुलभा बड़े चाव से चाट रही थी. फिर उसने अपनी जीभ अंदर की और एक बार घुमाकर रहा सहा रस भी चाट लिया. अंजलि को ये तो समझ आ गया था कि कोई और ही उसे चाट रहा था पर उसे ये न पता था कि वो कौन थी.

सुलभा ने अंजलि के कूल्हे को पकड़कर उसे पलट दिया. ऐसा करते ही अंजलि की चूत से जयंत का लंड मुक्त हो गया. सुलभा ने झपट कर जयंत के लंड को मुंह में लिया और चूसने लगी. अंजलि अब अपनी सास के इस क्रियाकलाप को देख रही थी. उसके मुख पर एक संतुष्टि की मुस्कान थी. जयंत के लंड को चाटने के बाद सुलभा अपनी बहू अंजलि की चूत पर टूट पड़ी और उसे कुतिया के समान चाटने लगी. अंजलि सिहर उठी. अंजलि की चूत से जयंत के वीर्य और अंजलि के स्खलन के मिश्रण को पीने के बाद ही सुलभा ने अपना मुंह हटाया.

“हो गया?” राहुल ने व्यंग्य से पूछा.

सुलभा भी उसकी माँ थी, तो वो कैसे पीछे रहती, “हाँ अभी के लिए इतना पर्याप्त है.” ये कहने के बाद सुलभा ने उठकर अंजलि के मुंह से मुंह जोड़ दिया और सास बहू रस का आदान प्रदान करने लगीं.

फिर सुलभा हटी और सबको देखते हुए बोली, “मैं अंजलि को बुलाने आई थी किसी काम से, देखा तो तुम सबकी चुदाई अंतिम चरण में थी तो सोचा कि और नहीं तो तुम सबका रस ही पी लेती हूँ. तुम सब इतना व्यस्त थे कि मेरी उपस्थिति का आभास भी न कर पाए.”

“कैसा लगा माँ जी स्वाद.” अंजलि ने उन्हें बाँहों में लेकर चूमते हुए पूछा.

“सदैव जैसा स्वादिष्ट. अब तो ये अपनी माँ को भूल ही गया है. कितने दिन हो गए इसे मेरी चुदाई किये हुए, कुछ याद भी है?” सुलभा ने राहुल पर अभियोग लगाया.

“माँ…” राहुल को अंजलि ने बीच में ही टोक दिया.

अंजलि, “कैसे बेटे हो आप, अपनी माँ का भी ध्यान नहीं रख सकते? चलिए आज आप माँ बाबूजी के साथ रहिये रात में.” फिर सुलभा की ओर देखकर, “माँ जी, मुझे क्षमा करना, मैं स्वार्थी हो चली थी. अब से ऐसा नहीं करुँगी. हम सबका इन पर बराबर अधिकार है.”

सुलभा अपनी बहू की बात सुनकर भावुक हो गई.

“अंजलि तुम जितनी सुन्दर बाहर से हो, अंदर से उससे भी अधिक हो. मेरा सौभाग्य है जो मुझे तुम जैसे बहू मिली.”

“माँ जी, हम सब भाग्यशाली हैं जो हम एक दूसरे को मिल पाए. अब आज आप अपने बेटे के साथ आनंद लें. और जयंत भैया, आप भी मम्मी पापा के ही पास जाओ आज रात.”

“और तू क्या करेगी अकेली?”

राहुल बोल पड़ा, “ओह, उसके लिए मेरे पास एक सुझाव है.”

“वो क्या?” तीनों के मुंह से एक साथ निकला.

राहुल ने अपना सुझाव दिया तो सब सोच में पड़ गए. फिर राहुल ने अपने कारण गिनाये तो सबको उचित लगा. अंजलि ने अपने पति के होंठ चूमे और फिर बाथरूम में चली गयी. सुलभा ने भी अपने कपड़े पहने और फिर बाहर निकल गई, उसके साथ में जयंत भी चला गया. अंजलि के बाहर आते ही राहुल भी बाथरूम में गया और स्नान करने के बाद बाहर निकला तो अंजलि वस्त्र पहन चुकी थी. राहुल ने भी घर वाले कपड़े पहने और दोनों बैठक में चले गए. और यहाँ सब पहले से ही उपस्थित थे. वर्षा और सुलभा के चेहरे खिले हुए थे. समीर ने वर्षा से सबके लिए पेग बनाने का आग्रह किया तो सुलभा और अंजलि भी उसके साथ चले गए. कुछ ही समय में टेबल पर अल्पाहार सजे हुए थे और सबके हाथों में उनका पेय था.

कुछ समय की गपशप के बीच में ही कुसुम भी आ गई और खाना बनाने में व्यस्त हो गई. अंजलि और सुलभा भी जाकर उसका साथ देने लगे. साथ साथ उसे छेड़ भी रहे थे. और कुसुम इसका पूरा आनंद ले रही थी. इतने दिनों के बाद उनका पूरा परिवार एक साथ था और कोई भी एक दूसरे से अलग नहीं होना चाहता था.

“सुना इन्होनें आज तेरी गांड फिर से बजा दी होटल में.” अंजलि छेड़ते हुए बोली.

“बिटिया, मुंह मत खुलवाओ, आपकी चाल से तो लग रहा है कि आपकी भी बजाई गई है.” कुसुम ने भी हंस कर कहा.

“हाँ, सच कह रही हो मौसी, और कल सुबह माँ जी की चाल भी बदली हुई होगी.” अंजलि ने कहा तो सुलभा शर्मा गई.

“सच, दीदी. तब तो आपकी अच्छी चुदाई होगी रात भर. राहुल बेटे को चूत जो नहीं मिली आज, बस गांड ही मारने का अवसर मिला है.”

“देखती हूँ, क्या करते हैं ये बाप बेटा रात में. मेरी तो चूत और गांड में अभी से गुदगुदी हो रही है.”

“अरे दीदी, ठहरो फिर जो मजा आएगा उन दो दो लौडों के साथ कि गुदगुदी भूल जाओगी.”

“अच्छा सुन, तुझसे कुछ कहना था.” सुलभा ने कुसुम से कहा.

“बोलो दीदी.”

तब तक वर्षा भी आ गई और सुलभा अपनी बात किसी प्रकार ही समाप्त कर पाई. अंजलि और वर्षा खाना टेबल पर लगा रहे थे. कुसुम ने सुलभा को विश्वास दिलाया कि उनकी इच्छा पूरी होगी. फिर वे दोनों भी खाना टेबल पर लगाने लगीं. इसके बाद कुसुम अपने घर को चली गई और परिवार वाले अपनी अपनी ड्रिंक का आनंद लेने लगे. फिर खाना खाया गया और पूर्वनियोजित योजना के अनुसार सभी अपने कमरों में चले गए.

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वर्षा का कमरा:

जयंत समीर और वर्षा के साथ उनके कमरे में गया. आज वो कुछ समय बाद आया था, पर कुछ भिन्नता लग रही थी. उसने समीर की ओर प्रश्न भरी दृष्टि से देखा तो समीर ने बताया कि दो नए चित्र लगाने के लिए कमरे में कुछ फेर बदल किया गया था.

“नहाना है या नहीं?” समीर ने जयंत से पूछा.

“नहीं डैड, अंजलि के कमरे से आकर नहा चुका हूँ.”

“ठीक है, मैं तो नहाने जाऊँगा एक बार तुम्हारी मम्मी बाहर आ जाये तो.”

“आप भी घुस जाओ, ऐसा कौन सा नियम है कि साथ नहीं नहा सकते?:

समीर ने जयंत को देखा और फिर मुस्कुराया, “गुड आइडिया.”

ये कहकर उसने फटाफट कपड़े उतारे और बाथरूम में घुस गया. वहाँ से जयंत ने अपनी माँ की हल्की सी चीख सुनी और फिर खिलखिलाहट. अपना सिर हिलाते हुए जयंत ने अपने कपड़े निकाले और अपने पिता के बार से एक छोटा पेग बनाया. आज उसे कई दिन बाद अपने पिता के साथ अपनी माँ की चुदाई का अवसर मिल रहा था. और वो अपनी माँ को पूर्ण सुख देना चाहता था. बाथरूम से अपने माता पिता की हंसी और खिलखिलाहट सुनकर जयंत बहुत प्रसन्न हुआ. उसके लंड ने भी इसका स्वागत किया और शीघ्र ही अपनी पूरी प्रतिष्ठा को प्राप्त कर लिया। बाथरूम से पानी चलने की ध्वनि बंद हुई तो जयंत ने उस ओर देखा.

कुछ ही पलों में समीर और वर्षा बाहर आ गए. इस बार दोनों नंगे ही बाहर निकले थे और जयंत को ये देखकर आश्चर्य हुआ कि सम्भवतः उन्होंने अपने शरीर पोंछे नहीं थे. उसकी माँ के बालों से पानी चू रहा था और बाल आगे को ढले हुए थे. उसका एक स्तन इन बालों के कारण छुपा हुआ था और इस दृश्य को देखते ही जयंत का मुंह सूख गया. उसकी माँ इस समय एक अप्सरा सी लग रही थी. समीर ने वर्षा को पीछे से पकड़ा और उसकी गर्दन चूमने लगा. एक स्तन को पकड़ कर हल्के से दबाते हुए वो वर्षा की गर्दन और कान चूम रहा था. जयंत समझ गया कि उसे कोई विशेष आमंत्रण नहीं मिलेगा. उसने अपने पेग को समाप्त किया और अपने माँ बाप की ओर बढ़ा. वर्षा उसे आता देखकर मुस्कुरा दी, पर कुछ बोली नहीं.

उसने केवल अपनी गर्दन से संकेत किया जिसे जयंत समझ गया. अपनी माँ के सामने जाकर जयंत घुटनों के बल बैठ गया और उसने वर्षा की चूत पर अपना मुंह लगा दिया. वर्षा ने अपनी मुद्रा को ठीक किया और पैर थोड़े फैला दिए. अब जयंत के लिए उसकी चूत का लक्ष्य सुलभ हो गया. जहाँ उसके पीछे उसके पति उसे चूम रहा था वहीँ अब उसके बेटे ने उसकी चूत पर अपना अधिकार बना लिया था. वर्षा ने संतुष्टि की एक गहरी साँस ली. आज रात बहुत कामोन्मद और संतोषप्रद होने वाली थी.

समीर ने जब जयंत को वर्षा की चूत पर आक्रमण करते हुए पाया तो उसने वर्षा के दोनों स्तनों को अपने हाथों में जकड़ लिया और उन्हें भींचने लगा. वर्षा की कामोत्तेजक आहों और कराहों ने जयंत को और गहराई तक अपनी जीभ को अंदर डालने के लिए प्रेरित किया. वर्षा ने भी अपने पाँव कुछ और फैलाये. परन्तु कुछ ही देर में ये विदित हो गया कि ये आसन अत्यंत कष्टदायक और कठिन है. समीर ने वर्षा को बिस्तर के कोने पर बैठा दिया और उसके पीछे जाकर उसके मम्मों का दबाना और उसे चूमने का कार्य पुनः आरम्भ कर दिया. जयंत को भी अब वर्षा की चूत में अपनी जीभ डालने में सरलता होने लगी और वर्षा ने अपने कूल्हे आगे कर दिए.

आज वर्षा की चुदाई में बाप बेटे कोई कमी नहीं रखना चाहते थे. और इसके लिए वर्षा भी अपेक्षित थी.

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सुलभा का कमरा:

राहुल ने अपनी माँ के पीछे उनके कमरे में प्रवेश किया तो उसके पिता जीवन ने उससे कहा, “अगर इतने दिन बाहर रहते हो तो आने के बाद कभी माँ बाप की भी सुध ले लिया करो.”

राहुल अपने पिता की बात को समझ गया. ये सच था कि अधिक व्यस्तता के कारण वो उनके साथ अधिक समय नहीं बिता पा रहा था.

“जी बाबूजी, अंजलि ने भी आज मुझे यही कहा है. आगे से मैं ध्यान रखूँगा।”

“सच कहती हूँ, अंजलि बहू नहीं है, हीरा है हीरा। हम सबके लिए कितना चिंतन करती है. उसने ही आज राहुल को मेरे पास भेजा।”

“हमारे पास.” जीवन ने उसकी बात की सही करते हुए कहा.

“जी.”

“तेरे बाबूजी सच कह रहे हैं. हमारी आँखें तरस जाती हैं तुझे देखने को.”

“अरे माँ, जब कहता हूँ कि हमारे साथ चलो तो मना करती हो. काम तो करना ही होगा न.”

“चल अगली बार चलती हूँ तेरे साथ.”

“धन्य भाग्य.” जीवन ने हंस कर कहा.

“हाँ हाँ आपको तो यही चाहिए न कि मैं आपके रास्ते से हटूँ तो आप गुलछर्रे उड़ाओ।” सुलभा ने भी हँसते हुए कहा.

“तू कौन सा रोकती है, या रूकती है. ठीक है, अगली बार इसके साथ चली जाना. दो दो जवान लौंडे तेरी दिन रात सेवा करेंगे.”

“और क्या, करेंगे ही, है न बेटा।”

“बिलकुल माँ, वैसे आज भी सेवा करने ही आया हूँ.”

“जाकर मुंह हाथ धो ले, तब तक मैं भी आती हूँ.”

राहुल बाथरूम में चला गया. राहुल बाथरूम से बाहर आया तो देखा उसकी माँ नंगी खड़ी हुई है.

“क्या हुआ माँ, तुम तो तैयार होने के लिए कह रही थीं.”

“चुदाई के लिए तैयार हो रही थी, तुमने क्या समझा था?” जीवन ने ठहाका मारते हुए कहा तो माँ बेटे की भी हंसी छूट गई.

“क्या माँ, तुम अभी तक वैसी ही शरारती हो.”

“क्यों न रहूँ, तुम सबने मुझे इतना सुख दिया है कि मुझे अब अपनी जवानी का समय याद आ जाता है.”

“जवान तू अभी भी है, सुलभा. बस देखने वाले को आँखें चाहिए.” जीवन ने अपनी पत्नी की प्रशंसा करते हुए कहा.

अब तक जीवन भी अपने वस्त्र उतार चुका था और उसका लंड खड़ा हुआ था. राहुल भी अपने कपड़े उतारने लगा और कुछ ही पलों में तीनों नंगे हो गए. राहुल और जीवन के लंड लगभग एक जैसे ही थे. मोटे और लम्बे. और ये दोनों जब किसी स्त्री को एक साथ चोदते थे तो उस स्त्री को स्वर्ग का सुख इस धरती पर ही मिल जाता था. सुलभा, वर्षा, अंजलि और कुसुम इसकी पुष्टि कर सकते थे. वैसे अब इन बाप बेटों की दृष्टि कुसुम की बेटी काम्या पर थी. जिस दिन से उसे देखा था उसकी चुदाई के बारे में सोच रहे थे. जिस दिन वो बेचारी इनके हत्थे चढ़ेगी उसका क्या हाल होगा इसकी कल्पना अभी करना सम्भव नहीं था.

सुलभा ने दोनों लंड अपने हाथ में लिए.

“मेरे सबसे प्रिय यही दो हैं, और मुझे इनसे इतने दिन दूर रहना अच्छा नहीं लगता. यही कारण है कि मैं और ये तुम्हारे साथ रह रहे हैं.”

“ठीक है माँ, आगे से तुम्हें भी उचित समय दूंगा।”

“बस सप्ताह में एक बार आकर अपनी माँ को चोद जाया कर, इससे अधिक मैं तुझसे कुछ नहीं चाहती.”

“कहा न माँ, अब यही करूँगा। और इस बार तुझे भी साथ ले चलूँगा. अब दुखी मत हो.”

“सच कहा न तूने. बस मुझे यही तो चाहिए.”

ये कहते हुए सुलभा जीवन और राहुल को उनके लंड पकड़कर बिस्तर की ओर ले गई. वहां बिस्तर पर बैठकर उसने राहुल के लंड को चाटा फिर कुछ देर बाद अपने पति जीवन के लंड को. आज की रात न केवल उसकी तगड़ी चुदाई होनी थी, बल्कि उसके बेटे ने भी उसे नियमित चोदने का संकल्प भी ले लिया था. अब उसे मन की शांति मिल चुकी थी. तन की शांति के लिए उसके हाथ में दो हथियार थे जो उसकी चूत और गांड की भरपूर कुटाई करने वाले थे.

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अंजलि का कमरा:

अंजलि अपने कमरे में बैठी अपना मेकअप ठीक कर रही थी जब उसके कमरे पर किसी ने खटखटाया.

“अंदर आ जाओ.” उसने कहा. वो जानती कि कौन आया है.

कमरे में कमलेश और काम्या ने प्रवेश किया. काम्या ने आज लहँगा चोली पहना हुआ था और बहुत सजी हुई भी थी.

“वाह काम्या, तू तो बड़ी प्यारी लग रही है. इधर आ.”

काम्या कुछ शर्माती हुई अंजलि के पास गई तो अंजलि ने अपने श्रृंगारदान से काजल निकाला और उसके माथे के एक कोने पर लगा दिया.

“इतनी सुंदर लग रही है कि मेरी ही दृष्टि लग जाती तुझे.” फिर उसने काम्या को भरपूर देखा और फिर उसे घुमाकर भी देखा.

“बहुत सुंदर हो गई तू तो. उस दिन लगता है थकी हुई थी. आज तो सच में अप्सरा लग रही है.”

“हट दीदी, आपके सामने मेरी क्या बिसात. आप तो जहाँ जाती हो वहाँ प्रकाश की आवश्यकता भी नहीं रहती.”

“हम्म्म, बातें करना भी सीख गई है अच्छी अच्छी. और क्या क्या सीखा है?”

“चुदाई.” कमलेश ने इस बार अपनी उपस्थिति बताने के उद्देश्य से कहा.

“तू चुप कर दुष्ट!” अंजलि ने उसे प्यार भरी झिड़की दी. “जब दो लड़कियाँ बात कर रही हों तो बीच में नहीं बोलते.”

कमलेश चुप हुआ तो काम्या खिलखिला पड़ी. “मजा आया, दीदी की डांट से?”

“अरे दीदी की डाँट भी प्यार से भरी है. है न दीदी?”

“बिलकुल। अब मुझे बताओ कि तुम्हारे जीवन में चल क्या रहा है?” फिर उसने कमलेश को देखकर कहा, “चुदाई के अलावा.”

“अभी तो दीदी छुट्टी है न, इसीलिए बस वही चल रही है.”

इसके बाद कमलेश और काम्या ने अपनी पढ़ाई के बारे में बताया और नई नौकरी के बारे में भी अंजलि को बताया. कुछ देर तक यूँ ही बातें हुईं.

“तुम लोग बियर पियोगे?”

दोनों ने सिर हिलाया.

“कमलेश, जाकर बाहर के फ्रिज से बियर और ग्लास ले आ.”

कमलेश जब बियर लेकर लौटा तो उसकी आँखें चौड़ी हो गयीं. अंजलि दीदी और काम्या एक दूसरे से लिपटी हुई चूमा चाटी कर रही थीं. उसे अंदर आते देखकर अंजलि ने उसे भी पास बुला लिया और कुछ ही पलों में अब तीनों एक दूसरे को चूम रहे थे. अंजलि ने ही इसे विराम दिया और बियर पीने का आव्हान किया. अब तक तीनों की कामपिपासा बढ़ चुकी थी और बियर पीने का कोई मन नहीं था. बियर आधी होते होते अंजलि ने काम्या के वस्त्र उतारने का कार्य आरम्भ कर दिया था. कमलेश को समझ आ गया कि उसे अपना काम स्वयं ही करना होगा. अतः उसने अपने कपड़े उतारे और बियर पीते हुए अपनी बहन और अंजलि दीदी को देखने लगा.

अंजलि ने काम्या की चोली ही खोली थी और उसके सुंदर सुडौल स्तन बाहर निकल चुके थे. अंजलि ने उन्हें अपने हाथों में थामा।

“क्यों री लड़की, इतने बड़े कैसे कर लिए अपने मम्मे तूने?” अंजलि ने पूछा.

“ये जो बैठा है न दीदी, जब भी मन करता है, दबाने लगता है. इतने बड़े कर दिए.”

“अरे तुझे तो खुश होना चाहिए. तेरा पति बहुत आनंद लेगा. पुरुषों को मम्मे दबाने में बहुत आनंद आता है. वैसे कोई लड़का है? कोई बॉयफ्रेंड?”

“नहीं दीदी. अभी नहीं.” काम्या ने बात छुपाते हुए कहा.

“तब तो बस कमलेश ही तेरी जवानी लूट रहा है. किसी और को भी अवसर दे.”

“पापा भी.”

“फिर भी. एक आधा लौड़ा घर के बाहर वाला भी होना चाहिए, स्वाद बदलने के लिए.”

“क्या आपके भी?”

“हाँ एक दो हैं, पर राहुल जैसी चुदाई कोई नहीं कर पाता इसीलिए ये जब जाते हैं और दोनों पापा व्यस्त हों, तभी उनके पास जाती हूँ.”

“और जीजाजी?”

“उनके भी साथ यही है. अब छोड़ ये बात, तेरे मम्मों का स्वाद ले लूँ.” ये कहते हुए अंजलि काम्या के मम्मों को चाटने लगी. काम्या आनंद से लेने सीत्कारें लगी.

अंजलि ने अपने मुंह को काम्या के मम्मों से हटाया और कमलेश की ओर देखा, “तू वहाँ क्या बैठा ताक रहा है? इधर आ न.”

कमलेश झट से उठा और अंजलि के सामने जा खड़ा हुआ. अंजलि ने उसके टनटनाये लंड को देखा तो हंसने लगी.

“लगता है तुझे भी अब संयम नहीं हो रहा है. चिंता न कर आज तुझे दो दो चूतों का स्वाद मिलेगा. पर पहले अपनी बहन के कपड़े उतार मुझे भी तो दिखे कि जवानी कहाँ कहाँ इसे कचोट रही है.”

कमलेश ने काम्या के लहंगे का नाड़ा खोला और उसे निकालने का प्रयास करने लगा. काम्या के न हिलने से ये कार्य सम्भव न हो पाया.

“भाई की सहायता कर, क्यों गांड अड़ा कर बैठी है?”

ये सुनकर काम्या खड़ी हो गई और लहंगा लहराकर नीचे गिर गया. उसने पैंटी नहीं पहनी थी इसीलिए अब वो नंगी हो गई थी. भाई बहन नंगे थे पर अंजलि अभी तक अपने वस्त्रों में ही थी. काम्या बैठने को हुई तो अंजलि ने उसे रोका और खड़ी होकर उसका हाथ लेकर बिस्तर पर ले गई. कमलेश उनके पीछे चल रहा था और काम्या की मटकती गांड से उसकी आँखें ही नहीं हट रही थीं. अंजलि ने काम्या को बिस्तर पर लिटाया और फिर अपने कपड़े उतार कर उसे साथ लेट गई. उसके होंठ काम्या के मम्मों को फिर से चूसने लगे. कमलेश ने बिना कुछ बोले काम्या की चूत पर अपना मुंह लगाया और उसे चूसने में जुट गया.

कुछ देर तक काम्या की रसीली चूत को चाटने के बाद कमलेश ने अपना ध्यान अंजलि की ओर किया. उसने अंजलि की टाँगें फैलायीं और अपना मुंह इस बार अंजलि की चूत में डाल दिया. इस बार अंजलि की आनंद भरी सिसकारी ने उसका स्वागत किया. कमलेश के सामने अब दो दो चिकनी चूत खिली हुई थीं और वो बारी बारी से उन्हें चाटने और चूसने में व्यस्त हो गया.

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कुसुम:

कुसुम का मन आज अत्यंत प्रसन्न था. पिछले कुछ दिनों की घटनाओं के कारण उसे एक असीम शाँति प्रतीत हो रही थी. उसके पति के बढ़े वेतन, उसकी बेटी और बेटे का उसके ही नगर में नौकरी लग जाना. इन सब के कारण अब उसके पाँव जैसे धरती पर ही नहीं पड़ रहे थे. पूरे परिवार को साथ देखकर उसे अपने जीवन में छाई नई सम्पन्नता की आशा उसे प्रफुल्लित किये थे. फिर न जाने कैसे आज काम्या और कमलेश को अंजलि ने बुला लिया और वो अपने पति के साथ कई दिनों के बाद अकेली थी.

पिछली बार भी जब संतोष आया था तो उन्हें एक दूसरे के साथ अच्छा समय मिला था. पर जब भी कुसुम संतोष के कार्य स्थल पर जाती तो उन दोनों के एकांत नहीं मिलता था. जयंत या राहुल भी उनके साथ ही रहते थे. वैसे कुसुम को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी, पर अपने पति के साथ उसका समय क्षणिक ही रह पता था. और अब ये गरिमा आने वाली थी तो पता नहीं क्या होना था. वैसे अब उसके साथ वर्षा भी जाने वाली थी, तो सम्भव था कि संतोष के साथ उसे अधिक समय मिल पाए. पति पत्नी एक दूसरे से लिपटे हुए लेटे थे. बातें जो मानो समाप्त ही नहीं हो रही थीं. खाना खाने के बाद से ही दोनों पहले बैठे हुए बात करते रहे और फिर लेट गए थे.

“गरिमा बहुत सुंदर है न? आपको अच्छी लगी न?” उसने काँपते स्वर में पूछा.

“हाँ सुंदर तो है. क्या तुझे कोई ईर्ष्या हो रही है?”

“कुछ कुछ. अब तक जिन्हें आप चोदते थे उनके साथ आपका कोई अधिक संबंध नहीं रहता था. पर इसके साथ तो दिन रात का साथ रहेगा.”

“ये सच है, पर तुम्हें इस बात से ईर्ष्या करने का कारण नहीं है.” संतोष ने उसके होंठ चूमकर कहा.

“जानती हूँ. देखा जाये तो मैं कौन सी यहाँ सूखी रहती हूँ. हर रात कोई न कोई मुझे चोदता ही है. नहीं, मुझे ईर्ष्या नहीं होने चाहिए.”

“स्त्री में ईर्ष्या न हो तो उसके स्त्रीत्व पर संदेह होने लगता है.”

ये कहते हुए दोनों हंस पड़े.

“वैसे आज बंगले में चुदाई का वातावरण छाया हुआ है. वर्षा और सुलभा दीदी अपने कैसे रोकेंगी जब वहां आएँगी? गरिमा को पता लग ही जायेगा.”

“मैं राहुल से बात करूँगा, और उन्हें धीरे धीरे इस बारे में अवगत करा दूँगा। मुझे तो लगता है कि उन्हें कुछ तो ज्ञान होगा, क्योंकि क्लब में चारों साथ गए थे और उनके बाप बेटे होने का तो छुपाना असम्भव ही है, इतने मिलते हैं चेहरे.”

“हाँ, आप बात कर लो.” ये कहते हुए कुसुम ने संतोष को उठाया और उसकी शर्ट उतार दी. संकेत समझते हुए कुछ ही देर में दोनों नंगे हो गए और 69 के आसन में चूत और लंड की चुसाई आरम्भ कर दी.

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वर्षा:

समीर ने वर्षा को पलंग के कोने पर बैठा दिया और उसके पीछे जाकर उसके मम्मों का दबाना और उसे चूमने का कार्य पुनः आरम्भ कर दिया. जयंत को भी अब वर्षा की चूत में अपनी जीभ डालने में सरलता होने लगी और वर्षा ने अपने कूल्हे आगे कर दिए. आज वर्षा की चुदाई में बाप बेटे कोई कमी नहीं रखना चाहते थे. और इसके लिए वर्षा भी अपेक्षित थी.

समीर वर्षा के मम्मों को मसलते हुए उसके कान और गर्दन को चूम रहा था. उसका अपनी पत्नी के कामाँगो से परिचय पुराना था और वर्षा भी उसके इस उपक्रम से उत्तेजित हो रही थी. उसने अपनी गर्दन को पीछे मोड़कर समीर के मुंह को चूमने का प्रयास किया पर सफल न हो पाई. उसने निराश होकर अपनी गर्दन सामने कर ली और अपनी पाँवों के बीच उसकी चूत में मुंह घुसाए अपने बेटे के सिर को देखा. जयंत पूरी तन्मयता के साथ उसकी चूत को चाटे जा रहा था. ऊपर पति के द्वारा मम्मों और अन्य स्थलों पर चल रहे होंठ और जीभ और नीचे उसके पुत्र की अनुभवी जीभ उसे कामोत्तेजना के शिखर पर अति शीघ्र ले जा रही थी.

जयंत ने अपनी एक ऊँगली को अपनी माँ की चूत में डाला और अंगूठे से उसके भग्न को सहलाया तो वर्षा के मुंह से आनंद की सीत्कार निकल गई. उसके पैर काँप उठे और उसके शरीर में ही एक चिर परिचित सिहरन सी उठी. उसके अपने बेटे के सिर को अपने पांवों के बीच दबा लिया.

“जयंत अब बहुत निपुण हो गया है, है न?” समीर ने वर्षा के मम्मों को अब कुछ अधिक कठोरता से दबाते हुए पूछा. वर्षा ने अपने सिर से उसके साथ सहमति व्यक्त की.

फिर वर्षा बोली, “मुझे आपका लंड चूसने के लिए दो. मेरा मुंह मुझसे कुछ माँग रहा है चूसने के लिए.”

समीर वर्षा के पीछे से हटा और उसे अपने हाथों का सहारा देकर लिटा दिया। फिर एक तकिया अपनी पत्नी के सिर के नीचे लगा दी. उसके चेहरे के पास अपना तना हुआ लंड किया तो वर्षा ने झपट कर उसे अपने मुंह में ले लिया. वर्षा के इस उपक्रम से नीचे जयंत का अंगूठा वर्षा के भग्न पर कुछ अधिक जोर से दब गया और वर्षा के मुंह से एक आनंदकारी कराह निकली. पर उसने समीर के लंड को अपने मुंह से बाहर नहीं आने दिया. वर्षा इस आसन में अपने हाथ को जयंत के सिर पर अधिक देर तक नहीं रख सकी और उसने उस हाथ से समीर के नितम्ब अपने और निकट लाने का प्रयास किया.

समीर ने भी उसकी इस चेष्टा के लिए अपने कूल्हे आगे किये जिससे वर्षा को अब लंड चूसने में कुछ सरलता हुई. जयंत के सिर से हाथ हटते ही जयंत जैसे उन्मुक्त हो गया. उसने दो उँगलियों से अपनी माँ की चूत के पटल खोले और अपनी जीभ के अंदर डाला. वर्षा ने समीर के लंड पर अपना दबाव बढ़ा दिया. बेटे के प्रयास का फल पति और पति के प्रयास का फल अब बेटा पा रहा था. यही इस प्रकार की चुदाई का आनंद था. तीनों एक दूसरे के आनंद में भागीदार थे. न केवल स्वयं का सुख बल्कि अन्य दोनों का सुख भी मन में सर्वोपरि था.

जयंत की जीभ अपनी माँ की चूत में अपनी क्षमता के अनुसार विचरण कर रही थी. उसकी चूत के अंदर के गुलाबी त्वचा को चाटने में जो आनंद जयंत को मिल रहा था उतना ही सुख उसकी माँ भी अनुभव कर रही थी. जयंत इस राह पर अब तक अनगिनत बार चल चुका था. परन्तु उसे हर बार इसमें कुछ न कुछ भिन्न प्रतीत होता था. उसे हर बार एक नए स्वाद और एक नई सुगंध का आभास होता था. ऐसा क्यों था उसने कभी जानने या समझने का प्रयास नहीं किया.

उसे ये अवश्य ग्लानि हुई कि वो अपने कार्य और अन्य कलापों पर अधिक केंद्रित होने के कारण इस भोग से न केवल स्वयं वंचित रहा था, परन्तु उसने अपनी माँ के प्रति प्रेम में भी कुछ कमी कर दी थी. पर अब ऐसा होने की संभावना कम हो चली थी. वैसे भी अब उसकी और राहुल की माँ उनके बाहर जाने पर उनके साथ जो रहने वाली थीं. अपनी सोच को एक झटके से दूर करते हुए जयंत ने अपनी माँ की चूत में अपनी जीभ से अपने प्रहार और परिश्रम को बढ़ा दिया.

वर्षा के लंड चूसने में समीर को आज एक नया ही आनंद प्राप्त हो रहा था. बहुत समय के बाद वर्षा उसके लंड को एक प्रेम और समर्पण की भावना के साथ चूस रही थी. समीर ने अपनी पत्नी के सिर पर हाथ रखा और उसके मुलायम बालों में अपना हाथ फिराने लगा. वर्षा ने सिर उठाकर अपने पति को देखा और दोनों की एक दूसरे से जब आँख मिली तो उसमे प्रेम की वर्षा का अनुभव हुआ. वर्षा ने लंड पर अपना ध्यान लौटाया और अपनी चूत में चल रही जीभ का भी आभास किया. उसके शरीर में एक सिहरन सी हुई.

जयंत अपनी माँ की चूत को चाटते हुए शनैः शनैः उसकी गांड की ओर बढ़ रहा था. वो जानता था कि उसकी माँ को न केवल गांड मरवाने में आनंद आता है, बल्कि उसे गांड चटवाने में भी उतना ही सुख मिलता है. और वो अपनी माँ को किसी भी सुख से वंचित नहीं रखना चाहता था. विशेषकर आज, जब वो इतने दिनों के पश्चात अपने माँ बाप के बिस्तर में उनके साथ था. जयंत ने अपनी एक ऊँगली को वर्षा की चूत में डाला और उसे अंदर बाहर करने लगा. वर्षा का शरीर अभी जिस कोण में था उसके कारण जयंत के लिए उसकी गांड तक पहुंचना सरल नहीं था. इसी कारण उसने हल्के हाथों से वर्षा के कूल्हों को पकड़कर वर्षा को उपयुक्त आसन में मोड़ दिया. वर्षा ने कोई आपत्ति नहीं की और वो अपने पति के लंड को चूसती रही.

वर्षा को सही आसन में लाने से अब जयंत के लिए उसकी गांड के छेद तक पहुंचना सरल हो गया. अपनी ऊँगली को वर्षा की भीगी चूत में से निकालकर उसने अपनी माँ की गांड के द्वार पर घिसा. वर्षा के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई. उसने समीर के लंड पर अपने मुंह का दबाव बढ़ा दिया. समीर भी समझ गया कि जयंत ने वर्षा की गांड से खेलना आरम्भ किया होगा. वो अपनी पत्नी को भली भांति जानता जो था. उसने वर्षा के बालों में अपने हाथ चलाते हुए उसे प्रोत्साहित किया. वर्षा के उठे घुटनों के कारण वो जयंत को देख नहीं सकता था, पर उसे अपने अनुमान पर विश्वास था.

जयंत ने वर्षा की गांड के खुरदुरी भूरी त्वचा को वर्षा के चूत के रस से गीला करने के बाद अपनी ऊँगली को वर्षा की शहद भरी चूत में डालकर कुछ और रस एकत्रित किया और इस बार उसने गांड के अंदर उस ऊँगली को डाला. वर्षा के मुंह से एक दबी हुई सिसकी निकली. पर उसने समीर के लंड को नहीं छोड़ा. अपनी ऊँगली से अपनी माँ की गांड को कुछ देर चोदने के बाद जयंत ने यही प्रक्रिया कुछ देर और दोहराई. इस पूरे प्रकरण में जयंत का लंड भी अब फूल कर तन चुका था. इस बार जब जयंत ने अपनी ऊँगली को वर्षा की चूत में डाला तो निकाला नहीं, बल्कि उस ऊँगली से ही हल्की गति से उसकी चूत को चोदने लगा.

फिर उसने अपनी जीभ से वर्षा की गांड की भूरी खुरदुरी बाहरी त्वचा को चाटा। वर्षा की सीत्कार को सुनने के बाद उसने वर्षा की कुछ सीमा तक खुली गांड में अपनी जीभ डाल दी. जीभ से वो जितना भीतर तक जा सकता था उतना गया और अंदर जीभ को घुमाने लगा. वर्षा के जिस भी अंश को जयंत को जीभ स्पर्श करती, वही अंश जैसे सिकुड़ जाता और स्पंदन करने लगता. वर्षा को अपने बेटे से गांड चटवाने में अब अत्यधिक आनंद आ रहा था और उसका ध्यान अपने मुंह में अपने पति के अधिक अपनी गांड में अपने बेटे की जीभ पर चला गया.

समीर ने हल्के हाथ से वर्षा के मुंह को अपने लंड से हटाया और स्थान बदलते हुए अपना मुंह वर्षा को चूत की ओर किया. जयंत के हाथ को हटाकर उसने अपना मुंह अपनी पत्नी को चूत में डाल दिया. अब वर्षा के पति उसकी चूत चाट रहे थे और बेटा गांड. मुंह से लंड निकलने से अब वर्षा अपनी भावना व्यक्त करने के लिए उन्मुक्त थी. और उसकी सीत्कार और कामोन्मादक चीखें कमरे में गूंज उठीं. अब दृश्य यूँ था कि वर्षा अपने पति का लंड चूस रही थी, उसका पति उसकी चूत चूस रहा था और उनका बेटा अपनी माँ की गांड चाट रहा था. वर्षा अब चुदाई के लिए अत्यधिक उत्सुक हो चुकी थी. उसने समीर के लंड को मुंह से निकाला।

वर्षा, “अब मुझसे रहा नहीं जा रहा. अब दोनों मिलकर मुझे चोद दो नहीं तो मैं पागल हो जाऊँगी।”

समीर बैठ गया और जयंत ने भी अपनी जीभ को वर्षा की गांड से बाहर निकाला। बाप बेटा अब वर्षा को देख रहे थे कि वो क्या चाहती है. वर्षा ने जब जयंत के लंड को देखा तो उसने निर्णय ले लिया.

“आप लेट जाएँ. आपको इस बार मेरी चूत मिलनी है. और जयंत, बेटा तुम्हारे लंड को तो मैंने अब तक चखा ही नहीं तो जब मैं तुम्हारे पापा पर चढ़ जाऊँ तो मेरे सामने आकर चूसने के लिए देना.....”

जयंत सुन रहा था. क्योंकि अभी बात समाप्त नहीं हुई थी.

“फिर तुम मेरी गांड मार सकते हो.”

“ये हुई न बात, मॉम! आई लव यू.”

“तो चलो, आ जाओ अपने अपने स्थान पर.”

समीर लेट गया. उसके लंड पर अभी भी वर्षा का थूक चमक रहा था. वर्षा ने उसके ऊपर जाकर लंड को अपनी चूत पर लगाया और बैठ गई. जयंत उसके सामने था, पर जब तक वर्षा ने लंड को सही रूप से चूत में जमा नहीं लिया तब तक उसे छुआ भी नहीं. एक बार सही सवारी गाँठ लेने के बाद उसने अपनी गांड उछालनी आरम्भ की और जब लंड अंदर बाहर होने लगा तो जयंत के लंड को अपने मुंह में लेकर चूसने लगी.

जयंत अपनी माँ के मुंह में अपने लंड के प्रवाह को देख रहा था. इस समय उसके लौड़े की नसें फट रही थीं और वो चाहता था कि वर्षा कुछ गहराई से उसके लंड को चूसे. परन्तु वो उन्हें किसी प्रकार से भी दबाव नहीं देना चाहता था, तो उसने जो मिला उसे ही सहर्ष स्वीकारा. वर्षा ने उसके लंड को कुछ ही देर में अपने मुंह से निकाला और उस पर थूका और उसे अच्छे से लंड मला.

“तेरा लौड़ा बाद में चूस लूँगी चुदाई के बाद. अभी जाकर मेरी गांड मार. तूने इतना चाटा है की निगोड़ी लौड़े के लिए लुपलुप कर रही है.”

जयंत के मन में लड्डू फूट पड़े. उसने संभलकर बिस्तर पर चलते हुए अपनी माँ के पीछे का स्थान लिया. वर्षा अभी भी समीर के तगड़े लंड पर उछले जा रही थी और समीर भी उसे नीचे से अच्छे लम्बे धक्कों के साथ उत्तर दे रहा था. जयंत उनके मिलन स्थान से बह रही रस की धार देख रहा था. उसने अपने आप को सही स्थिति में स्थापित किया और वर्षा की नितम्बों पर हाथ रखा. वर्षा ने उछलना रोक दिया और समीर ने भी समय की आवश्यकता को देखते हुए धक्के रोक दिए.

जयंत की आँखें अपने पिता से मिलीं तो समीर ने उसे आँख मार कर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया. जयंत के लंड पर थूक तो लगा ही था और उसने अपनी माँ की गांड को चाटने में जो परिश्रम किया था उसके कारण वर्षा की भी गांड अब लौड़ा खाने के लिए तत्पर थी. जयंत ने लंड वर्षा की गांड पर रखा और धीरे से अंदर डाल दिया. वर्षा की गांड के पेंच तो उसके दामाद राहुल और राहुल के पिता के महाकाय लौड़े इतने ढीले कर चुके थे कि जयंत के लंड को पूरा अंदर जाने में कुछ ही पल लगे.

समीर तो मानो इसीलिए रुका था. जयंत के लंड के अंदर ही, उसने अपने वर्षा की चूत चोदना आरम्भ कर दिया. जयंत कुछ समय रुका और अपने पिता की ताल को नापा। फिर उसी ताल में उसने वर्षा की गांड मारनी आरम्भ कर दी. अपने बेटे के लंड के गांड में प्रवेश करते ही वर्षा की चूत ने रस की फुहार छोड़ दी. इतने समय बाद उसका लंड आज उसकी गांड की गहराइयों को जो नाप रहा था. उसकी चूत से झरते रस से समीर का लंड भीग गया और उसकी जांघों से निकलता हुआ बिस्तर को गीला करने लगा. समीर के लिए अब अपने लंड के प्रहार करना कुछ सरल हो गया क्योंकि चूत ने अपना मुंह जो खोल दिया था.

उसने भी अपनी पत्नी के इस आनंद को बढ़ाने के लिए अपने धक्कों की गति को कुछ और बढ़ाया. वर्षा इस बढ़ी गति से और आनंदित हो गई. जब जयंत ने अपने पिता के गति में परिवर्तन देखा तो उसने भी गति को उनके ही समीप लाने के लिए अधिक परिश्रम करने लगा. बाप बेटे के इस अथक परिश्रम का फल ये हुआ कि वर्षा की आनंदमई चीखों से कमरा काँप गया. पिता पुत्र ने इसे अपनी विजय या सफलता का सम्मान समझा और दोनों वर्षा के दोनों छेदों की निर्ममता से चुदाई करने लगे. वर्षा का आनंद अब बढ़ता जा रहा था और उसकी चूत लगातार अपना पानी बहा रही थी. समीर को घर्षण कम होने के कारण और चूत के अत्यंत चिपचिपे होने के कारण अपने लंड से मथने में अब कठिनाई होने लगी. उसने गति कुछ कम की, पर अब वर्षा उस आयाम में थी जहां उसे ये स्वीकार्य नहीं था.

वर्षा ने स्वयं ही अपनी चूत की चुदाई करवाने का बीड़ा उठाया और समीर के सीने पर हाथ रखते हुए अपनी गांड उसके लंड पर पटकने लगी. लय बदलने से जयंत कुछ समय के लिए विचलित हुआ फिर उसने अपनी माँ की गति को नापते हुए अपने लंड के धक्के भी उसके अनुसार बदल दिए. गांड में चलते लंड से अब वर्षा इतनी कामोत्तेजित थी कि वो शीघ्र ही अपने शीर्ष पर पहुंच गई. एक ह्रदय विदारक चीख, जो उसके असीम आनंद की परिचायक थी, के साथ ही वर्षा अपने पति के सीने पर ढह गई. उसकी चूत ने पानी छोड़ने में अभी भी कोई कमी नहीं की. जयंत को अब अपने धक्के अपने मन के अनुसार मारने का सुअवसर प्राप्त हुआ तो उसने कभी तेज तो कभी धीमे, कभी गहरे तो कभी हल्के धक्कों के साथ अपनी माँ की गांड मारता रहा.

वर्षा का शरीर अब न केवल उसके निस्तार के कारण काँप रहा था बल्कि जयंत के धक्के भी इसमें अपना योगदान कर रहे थे. समीर ने पत्नी के चेहरे को उठाया और उसके होंठों से अपने होंठ जोड़ दिए. पति पत्नी चुंबन में खो गए और उनका पुत्र माँ की गांड में झड़ने के निकट पहुंच गया और उसने वर्षा को बताया. वर्षा ने उसे लंड बाहर निकालकर उसके सामने आने का अनुरोध किया. जयंत ने बहुत सावधानी से अपने लंड को बाहर खींचा और वर्षा की गांड के छेद को लुपलुपाते हुए बंद होते हुए देखने लगा.

वर्षा समीर के ऊपर से हटी और बैठ गई. जयंत ने उसके मुंह के सामने अपना लंड किया जिसे चाटने में वर्षा ने कोई झिझक नहीं दिखाई. लंड को चाटकर उसने मुंह में लिया ही था कि जयंत के लंड ने अपनी फुहार छोड़ दी. वर्षा पूरा रस गटक गई और फिर लंड को मुंह से निकालकर चाटी और उसके टोपे पर एक चुंबन लेकर अपने बेटे की ओर कृतग्न भाव से देखने लगी. जयंत हट गया. फिर वर्षा ने समीर के लंड को देखा.

“आपका नहीं हुआ न?”

समीर ने बताया कि नहीं. तो वर्षा ने कहा की लाइए मैं मुंह से आपका रस निकल दूँ. पर समीर ने मना किया.

“नहीं, मैं भी चाहूंगा कि तुम मेरे भी लंड को चाटकर रस पियो जब मैं तुम्हारी गांड मार चुका होऊं.”

वर्षा ने मुस्कुराकर उसे देखा, “उसके लिए कुछ समय रुकना होगा. अभी जयंत ने मेरी गांड पूरी खोल जो दी है.”

“कोई बात नहीं, मुझे कहीं नहीं जाना है. अब जाओ और सफाई कर लो. मैं भी ये चादर बदल दूँ बहुत गीली हो गई है.”

वर्षा बाथरूम में चली गई और बाप बेटे ने चादर बदली और फिर सोफे पर बैठकर वर्षा के आने की राह देखने लगे.

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सुलभा:

सुलभा इन दोनों लौडों से पूर्व परिचित थी. और उनके विशाल आकार से भी. आज दोनों को चूसने में उसे आनंद तो आ ही रहा था, पर कठिनाई भी हो रही थी. उसने दोनों लंड एक साथ मुंह में लेने के एक दो प्रयास किये, पर दोनों की चौड़ाई अधिक होने के कारण उसने हार मान ली. पवन और राहुल ने एक दूसरे को देखा और मुस्कुरा पड़े. सुलभा अब एक लंड को चूसती तो दूसरे को अपनी हथेली से मुठियाती, फिर यही प्रक्रिया वो दूसरे के साथ भी करती. दोनों लौड़े अब अपने पूरे आक्रोश में आ चुके थे. सुलभा ने अपने पति को देखा तो सांकेतिक भाषा में दोनों के बीच में कुछ वार्तालाप हुआ.

पवन: “मेरे विचार से अब हमें आगे बढ़ना चाहिए। मैं तुम्हारे मुंह में झड़ने की इच्छा नहीं रखता, सुलभा.”

राहुल: “और मैं भी.”

सुलभा: “हम्म्म।” सुलभा ने एक एक बार फिर दोनों लौड़े अपने मुंह में लिए और फिर बाहर निकाले।

“राहुल बेटा, क्या तेरा लौड़ा अब कुछ और बड़ा हो गया है?” सुलभा ने राहुल के लंड को अपने हाथ से तौलते हुए पूछा.

राहुल: “मुझे तो नहीं लगता माँ, पर सम्भव है कि आपको इतने दिनों बाद चोदने की इच्छा से बढ़ गया हो.”

सुलभा, “अपना वचन याद रखना, अब मुझसे इतने दिनों दूर मत रहना. ये ऐसे बढ़ता रहा तो मेरी गांड फाड़ देगा.”

पवन, राहुल हंसने लगे तो सुलभा भी हंस पड़ी.

“सच बच्चे, तेरे लंड को गांड में लेने में पहले भी कठिनाई ही होती थी, पर आज लगता है कुछ अधिक होगी.”

“क्यों माँ, बाबूजी ठीक से नहीं मारते क्या आपकी गांड?”

“ऐसा कभी हुआ है कि तेरे बाबूजी मेरी गांड छोड़ दें. पर आज तेरा लौड़ा उनसे बड़ा लग रहा है.”

“तो भागवान, इसे अपनी गांड में लेकर भी देख लो कितना बढ़ा है. वैसे अंजलि और वर्षा तो सरलता से ले पा रही हैं.” पवन ने उसे छेड़ने के उद्देश्य से कहा.

“और कुसुम भी.” राहुल ने जोड़ा.

“और कुसुम भी.” पवन ने दोहराया.

“तो आप क्या समझते हो, मैं इसका लंड अपनी गांड में नहीं ले पाऊँगी? माँ हूँ इसकी।”

“ठीक है, तो चलो बिस्तर पर. तेरी चूत चाटे हुए बहुत समय हो गया.” पवन ने कहा.

“क्यों, आज ही तो दोपहर में चाटे और चोदे थे.”

“क्या करूँ, मन नहीं भरता.”

सुलभा इस बात से बहुत प्रसन्न हो गई. वो बिस्तर पर लेट गई और अपने पाँव फैला लिए. राहुल ने पवन को संकेत किया तो उसने सुलभा को उठाया और उसके नीचे लेट गया. सुलभा ने अपनी बहती चूत को अपने पति के मुंह पर लगाया। पवन की जीभ ने सुलभा के भग्न को छेड़ा तो सुलभा सिसक पड़ी. फिर पवन ने अपनी जीभ का इंद्रजाल बुना और सुलभा की सिसकारियाँ कमरे में गूँज उठीं. कुछ समय तक अपने माता पिता के इस प्रेमालाप को देखने के बाद राहुल ने अपनी माँ की गांड पर अपनी जीभ फिराई। सुलभा जो पहले ही पवन की जीभ के सम्मोहन में थी, इस नए आक्रमण से चिहुंक पड़ी. राहुल अपनी माँ की गांड के छल्ले को अपनी जीभ से हल्के हल्के चाटता रहा. सुलभा की कामुकता उसी अनुपात में बढ़ती रही. फिर राहुल ने अपनी माँ की गांड के दोनों पाटों को खोला तो सुलभा की गांड का छेद खुल गया.

राहुल ने अब अपनी जीभ को गांड में डाला और अंदर चाटने लगा. सुलभा का शरीर कम्पन करने लगा. बाप बेटे स्त्रियों को चोदने में निपुण थे और वो इसका प्रमाण सुलभा को दे रहे थे. उन दोनों के मुंह और जीभ सुलभा के दोनों छेदों में चल रही थीं और सुलभा मानो स्वर्ग का अनुभव कर रही थी. राहुल झुके हुए अपनी माँ की गांड चाट रहा था. बैठने का स्थान था नहीं, इसी कारण उसने अपनी माँ की गांड में दो उंगलिया डाल दीं और सीधे खड़े होकर उँगलियों से ही उसकी गांड मारने लगा. सम्भवतः सुलभा को आभास हो गया कि क्या हो रहा है, परन्तु इस समय वो अपने पति के मुंह में झड़ रही थी तो न कुछ कह पाई न कर पाई. पर एक बार जब उसका स्त्राव समाप्त हुआ तो उसने मुड़कर राहुल को देखा. फिर पवन से बोली.

“सुनिए, आप नीचे से हटिये, राहुल को मेरे पीछे आने दीजिये.” पवन किसी आज्ञाकारी पति के समान हट गया और सुलभा ने बिस्तर पर आगे होते हुए अपनी गांड को ऊँचा उठा दिया. फिर राहुल से बोली.

“आजा बेटा, अब अच्छे से चाट ले अपनी माँ की गांड. बेचारा बहुत दिनों का भूखा है.”

राहुल ने माँ की ममता को समझा और इस बार बिस्तर पर चढ़ गया और लपलप करके अपनी माँ की गांड को चाटने लगा. सुलभा फिर एक बार आनंद के सागर में गोते लगाने लगी. कोई दस मिनट सुलभा की गांड चाटकर राहुल हट गया.

“मन भर गया तेरा?”

“कभी नहीं, पर गांड मारने का भी तो आनंद लेना है, माँ.”

“कितना सयाना है मेरा बेटा, देखा आपने?” सुलभा ने पवन को सम्बोधित किया, “अपनी माँ का कितना ध्यान रखता है.”

“हाँ हाँ, वही ध्यान रखता है, मैं तो कुछ करता ही नहीं.” पवन ने हंसकर कहा तो माँ बेटे ने भी उसका साथ दिया.

“तो क्या चाहती हो अब?” पवन ने अपनी पत्नी से पूछा.

“गांड तो राहुल से ही मरवानी है पहले, पर आप इतनी देर नीचे थे तो इस बार राहुल को नीचे से गांड मारने दो और ऊपर चढ़ जाओ.”

पवन के चेहरे पर मुस्कराहट छा गई. उसने राहुल को देखा तो उसके चेहरे पर आनंद के भाव थे. होते क्यों न. नीचे से गांड में लंड डालने में गहराई और अच्छे से नपती है और गांड का कसाव भी अधिक रहा है. और अगर दूसरी ओर से चूत में लौड़ा हो तो गांड मारने का आनंद दस गुना हो जाता है. राहुल ने देर न की और तुरंत ही बिस्तर पर जा लेटा। अपने लंड को कुछ सहलाया और थूक लगाकर उसे कुछ चिकना किया. सुलभा की गांड अभी तक उसके चाटने और ऊँगली से मैथुन के कारण खुली थी तो सुलभा उसके सिर के ओर पीठ करते हुए उसके ऊपर आई. फिर उसने राहुल के विशाल लौड़े को अपने हाथ में लिया और अपनी गांड के छेद पर रखा.

“अच्छे से चोदना तुम दोनों, ठीक है. ऐसी चुदाई करो कि युग युग तक याद रहे.” सुलभा ने उन्हें निर्देश दिया.

बाप बेटे को ये समझ गए कि सुलभा पलंगतोड़ चुदाई चाहती है. और दोनों उसकी इच्छा पूरी करने में सक्षम थे. सुलभा ने राहुल के लंड पर बैठते हुए कुछ समय लिया. उसका लंड पवन से कुछ अधिक मोटा था और सुलभा की गांड को फैलने में कुछ कष्ट हुआ. पर अपने बेटे से अपनी गांड मरवाने के लिए वो इतनी आतुर थी कि इस दर्द को सहर्ष सह रही थी. कुछ पल तक पवन अपनी पत्नी को अपने बेटे के लंड पर उतरते देखता रहा. लंड अंततः सुलभा की गांड की गहराइयों में खो गया. सुलभा ने एक ठंडी गहरी साँस ली.

“बहुत मोटा है तेरा लंड, मेरी गांड को पूरा फैला दिया. न जाने अंजलि और वर्षा कैसे सहती हैं.”

“अरे वो भी तुझसे कम चुदक्क्ड़ नहीं हैं. वर्षा को तो राहुल के लंड से इतना प्रेम है कि वो हर समय इसे अपनी गांड में लेने के लिए आतुर रहती है.” पवन ने उसे समझाया.

सुलभा ने अब अपने दोनों हाथ पीछे कर के अपने शरीर को आगे की ओर धकेला. अब उसकी चूत सामने आ गई. उसने पवन को प्यासी दृष्टि से देखा. जब राहुल का लंड उसकी माँ की गांड में सही से बैठ गया तो राहुल ने अपने हाथ ऊपर करते हुए अपनी माँ के दोनों मम्मे अपने हाथों में भर लिए और उन्हें मसलने लगा.

“अब आ जाओ, और चोद लो अपनी पत्नी को अपने बेटे के साथ.”

पवन ने आसन जमाया और उसकी खुली उभरी चूत पर लंड लगाया. अपनी पत्नी की आँखों में झांकते हुए उसने अपने लंड को धीरे से अंदर डाला, और एक बार टोपे के अंदर जाते ही लम्बे धक्के के साथ पूरा लौड़ा पेल दिया. सुलभा की आँखों के भाव बदले परन्तु कुछ ही देर के लिए. उसकी आँखों में पीड़ा की एक झलक सी दिखी जो तुरंत ही लुप्त हो गई. उसका स्थान संतुष्ट और कामोन्माद ने ले लिया. आँसू की दो बूंदें अवश्य उसकी आँखों से गिरीं। अब सुलभा की गांड में नीचे से और चूत में ऊपर से लंड डला हुआ था. सब ठहरे हुए थे. एक दूसरे के शरीर के अंदरूनी भागों का आभास हो रहा था. चूत और गांड के बीच की पतली झिल्ली के दोनों और दो शक्तिशाली लंड एक दूसरे के स्पंदन को अनुभव कर रहे थे.

सुलभा की चूत और गांड सुकड़ कर उन्हें जैसे अंदर समा लेना चाहती थीं. सुलभा ने अपनी आँखें बंद कर लीं और इस सम्भोग का आनंद लेने लगी. उसके सर्वप्रिय दोनों पुरुष इस समय उसके शरीर के साथ आत्मसात थे. पर यहाँ ठहरने का कोई तात्पर्य नहीं था. उसने आँखें खोलीं तो अपने पति के अपनी ओर देखता पाया. उसके मुंह से शब्द तो नहीं निकले पर होंठों से दिख गया कि उसने कहा था “चोदो।”

“राहुल, तेरी माँ अब चुदने के लिए कह रही है. तो बेटा अपना वही फार्मूला अपनाते हैं. क्या कहता है?”

“बिलकुल, माँ को भी उसमे बहुत आनंद आता है.”

बाप बेटे ने अपनी एक ताल बनाई हुई थी दुहरी चुदाई के लिए. इसका आकर्षण ये था कि हालाँकि उन्हें इस ताल का सम्पूर्ण ज्ञान था पर उनसे चुद रही स्त्री कुछ ही समय में इतनी विवश हो जाती थी कि वो उसे याद नहीं रख पाती थी. तो पवन और राहुल ने अपने मंत्र अब सुलभा पर छोड़ा. दोनों की ताल कुछ इस प्रकार से सम्मिलित थी कि सुलभा कुछ ही समय में झड़ने लगी. गांड में चल रहे लम्बे मोटे लौड़े ने उसकी गांड की खुजली को पूरा मिटा दिया था और उसकी गांड में अब एक नया ही अनुभव हो रहा था. जैसे कीड़े चल रहे हों. वहीँ उसकी चूत में भी जो लंड था वो उसके बेटे के लंड से बस कुछ ही कम था पर चूत से बहते रस के कारण उसे उसकी कठोरता का पूरा अनुभव नहीं हो रहा था. पर जो अनुभव हो रहा था वो स्वर्गिक था. दो दो मोटे तगड़े लौड़े उसके शरीर पर जैसे कोई संगीत वाद्य के समान खेल रहे थे. उन दोनों के बीच में पिसते हुए जिस सुख की अनुभूति हो रही थी वो अकल्पनीय थी.

इन आनंद के क्षणों में उसे उस दिन की याद आयी जिस दिन राहुल ने उसे पहली बार चोदा था, वो भी उसके पति के सामने जो उस दिन दर्शक मात्र थे. इस मधुर स्मृति ने उसके शरीर में एक कम्पन उत्पन्न किया और साथ ही उसकी चूत से ढेर सारा पानी उढेल दिया. पवन के लंड के ऊपर वो धार गिरी और फिर उसकी चूत से होती हुई राहुल के लंड पर बहने लगी. राहुल को इस पानी के कारण अब सुलभा की गांड मारने में और सरलता हो गई और उसने अपनी गति की बढ़ा दिया.

वहीँ अब पवन भी अपने पूरे जोश में आ चुके थे और अब दोनों बाप बेटे जिस प्रकार से सुलभा के दोनों छेदों को चोद रहे थे वो किसी भी सामान्य स्त्री के सहनशक्ति के परे थी. उनकी ताल और गहरे लम्बे धक्के बिस्तर को हिला रहे थे. सुलभा की चीखें अब कमरे के बाहर तक सुनाई दे रही थीं. अगर परिवार के अन्य सदस्य अपने खेल में व्यस्त न होते तो सम्भवतः उनका ह्रदय काँप जाता. राहुल और पवन सुलभा की चीख पुकार से पूर्ण रूप से परिचित थे और जानते थे कि ये चीखें उसके अनंत आनंद की साक्षी हैं.

“मार दिया आज तुम दोनों ने मुझे. फाड़ दी क्या मेरी चूत और गांड. हाय हाय क्या मजा है. चोदो मुझे और जोर से चोदो। बेटा मेरी गांड का फालूदा बना ही दे अब. तेरे लौड़े के लिए बहुत तरसती है. और आप भी आज मेरी चूत की माँ चोद दो. अब दोनों से चुदने के लिए मैं इतने दिन नहीं रुकने वाली. अधिक हुआ तो वहीँ बैठक में चुदवा लूँगी। और चोदो। हाय मेरी माँ. उह उउउह ईईई!”

सुलभा का अब निरंतर पतन हो रहा था. पवन भी अब झड़ने के निकट था और राहुल तो तंग गांड में झड़ने के लिए आतुर था. पर उसका कर्तव्य था कि अपनी माँ से पूछे कि वो उसके रस को कहाँ छोड़ना चाहती थी.

“माँ, पानी कहाँ छोड़ूँ?”

“क्या तू अभी से?”

“नहीं अभी नहीं, पर..”

“मेरे मुंह में ही छोड़ना. और आप भी. समझे?”

“समझ गया” इस बार राहुल और पवन ने एक स्वर में कहा और फिर तीव्र गति से सुलभा को मथने लगे.

सुलभा की चीखें अब विकराल हो चुकी थीं, पर बाप बेटे उसे पूरी निर्ममता से चोदे जा रहे थे. राहुल ने अपने पिता को संकेत किया कि उसका रस निकलने वाला ही है. इसके बाद दोनों ने अपनी गति धीरे धीरे कम की और फिर पवन ने अपना लंड सुलभा की चूत में से निकाल लिया.

“माँ उतरो नीचे. मेरा भी होने वाला है.” राहुल ने अपनी माँ के मम्मों को निचोड़ते हुए कहा.

पवन ने देखा कि उसकी पत्नी के दोनों मम्मे पूरे लाल हो चुके थे. नीचे उसकी जांघ भी ताबड़तोड़ चुदाई के कारण लाल थी और चूत खुली हुई अपनी गुलाबी छटा बिखेर रही थी. सुलभा ने बहुत सम्भलते हुए राहुल का लंड अपनी गांड से निकाला और फिर हट गई. उसने दो बार कुलाटी ली और बिस्तर के कोने पर जा पहुंची. वहाँ जाकर वो बैठ गई. बाप बेटे के लिए ये निमंत्रण था. पवन तुरंत उसके सामने आ गया. सुलभा ने उसके लंड पर बिखरे अपने रस को चाटा और फिर उसे मुंह में लेकर चूसने लगी. राहुल ने जब देखा कि उसका क्रम आने में समय लगेगा तो वो सुलभा के पीछे ही बैठ गया और फिर से उसके मम्मों को मसलने लगा.

“अपनी माँ के मम्मे उखाड़े बिना नहीं मानेगा क्या?” पवन ने पूछा। तभी सुलभा ने अपने मुंह से उसका लंड निकाला।

“आप चुप रहो जी. मसलने दो मेरे लाड़ले को. दबा ले बेटा जितना मन करे.” सुलभा ये कहकर फिर से पवन का लंड चूसने लगी.

पवन और राहुल एक दूसरे की ओर देखकर मुस्कुरा पड़े. कुछ ही देर में पवन ने अपना रस सुलभा के मुंह में उढेल दिया. जिसे सुलभा ने पीने में कोई संकोच नहीं किया.

पवन: “अब जा तू भी अपनी माँ को अपना पानी पिला दे, तब तक इसके पपीतों को मैं संभालता हूँ.”

राहुल उठा और अपनी माँ के आगे खड़ा हो गया. इस देरी के कारण अब उसका झड़ना थम गया था. सुलभा ने बड़े ही प्रेम से उसके लंड पर जमा अपनी गांड के रस का स्वाद लिया और उसे अच्छे से चाटा। फिर मुंह में लेकर पूरी तन्मयता से चूसने लगी. उसके पीछे पवन अब उनके मम्मे दुह रहा था. फिर पवन ने अपना दायाँ हाथ हटाया और सुलभा की चूत को सहलाने लगा. राहुल इस पूरे दृश्य को देखकर अत्यंत उत्साहित हो गया. उसका लंड फड़फड़ाने लगा और अनुमान से पहले ही उसने अपना रस अपनी माँ के मुंह में छोड़ दिया.

उसके रस का स्वाद, नीचे से खिलवाड़ और मम्मे पर उसके पति के हाथ उसे एक बार फिर से चरम पर ले गए और वो फिर से झड़ गई. अपने बेटे के रस को मुंह में लिए हुए वो वहीँ पर लेट गई और फिर मुंह खोलकर उन दोनों को दिखते हुए गटक गई.

चुदाई के संग्राम का पहला अध्याय समाप्त हो चुका था. पारिवारिक व्यभिचार के अभी अन्य कई अध्याय शेष थे और रात भी.

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अनुलेख:

सुलभा की चीखें आज कुछ अधिक ही तेज थीं. बंगला नंबर आठ में श्रेया और मोहन के कमरे तक उसकी ध्वनि पहुंची थी. हालाँकि स्वर बहुत सीमा तक दब गया था, पर सुनाई दे ही गया. श्रेया ने अपना मुंह महक की चूत से हटाया और पीछे अपने पति मोहन को देखा जो इस समय उसकी गांड मार रहा था.

“मुझे लगता है सात नंबर में अवश्य किसी की डबल या ट्रिपल चुदाई हो रही है.”

मोहन ने अपने धक्के रोके और सुना.

“हाँ, लगता तो है.”

“तो क्या इसका अर्थ है कि वे सब भी हमारे जैसे.......?”

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अंजलि:

अंजलि की चूत पर अपनी जीभ लगते हुए ही कमलेश को ऐसा अनुभव हुआ जैसे वो किसी सुगंधित बगीचे में आ गया हो. चूत से उठती भीनी गंध का उसे पहली बार आभास हुआ था. वर्षा और अपनी माँ कुसुम की चूत में से उसे इस प्रकार की सुगंध की अनुभूति नहीं हुई थी. काम्या की चूत से अवश्य उसे सदा एक प्रकार की महक आती थी, पर ये महक कुछ अलग ही थी. उसने अपनी नाक को चूत पर रगड़ा और फिर एक गहरी श्वास भरी. उसके नथुनों से होते हुए उसके सीने में अंजलि की सुगंध समा गई. उसने लपलप करते हुए अंजलि की चूत में अपनी जीभ चलनी आरम्भ कर दी.

अंजलि भी इस सम्भोग का पूरा आनंद ले रही थी. काम्या उसके स्तन दबाते हुए उसके होंठ चूस रही थी. दोनों की जीभ एक दूसरे से अंजलि के मुंह के अंदर भिड़ी हुई थीं. ये समझना सरल नहीं होगा कि अंजलि जैसी धनी और सुंदर स्त्री इस समय अपने नौकरों के बच्चों के साथ कामक्रीड़ा में मग्न थी. परन्तु, कुसुम और उसके परिवार को कभी उस तराजू में तौला भी नहीं गया था. ये सच है कि उसके विवाह के बाद अंजलि और वर्षा की संतोष के साथ चुदाई में बहुत कमी हो गई थी. एक कारण ये भी था कि संतोष भी अब आठ नौ महीने बाहर ही रहता था. इसी कारण अब उसका मन भी उसके स्वयं के परिवार को समर्पित रहता था.

आज भी कुसुम और संतोष अगर इच्छुक होते तो नायक परिवार उन्हें अवश्य किसी न किसी रूप में सम्मिलित कर लेता. पर उन दोनों ने एक दूसरे का साथ अधिक उपयुक्त लगा था. वैसे कुसुम की चुदाई में परिवार वाले कोई कमी नहीं रखते थे. वहीँ संतोष को भी गाँव में नई नई महिलाएँ उपलब्ध थीं, जो उसकी चुदाई के असीम अनुभव से तृप्त होने के लिए लालायित रहती थीं. कभी कभी तो वो कमसिन कलियाँ भी संतोष के भोगने के लिए उसे अर्पण करती थीं. अंजलि का एक हाथ अब काम्या की चूत को स्पर्श कर रहा था. काम्या भी अब अंजलि के बाहुपाश में पूर्ण रूप से समर्पित थी.

कमलेश अपने पूरे मन के साथ अंजलि की चूत को चाट रहा था और अंजलि इस प्रकार से भाई बहन के साथ बहुत आनंदित थी. उसके मन में कमलेश के लिए एक अन्य ही योजना थी. वो उसे कुछ देर और तड़पाना चाहती थी. उसे विश्वास था कि उसके बाद कमलेश उन दोनों की समुचित चुदाई करेगा.

“काम्या, तेरे भाई ने तो मेरी चूत का रस चख लिया. अब क्यों न हम भी एक दूसरे का स्वाद ले लें.” उसने काम्या के कान में धीरे से कहा. काम्या भी समझ गई कि अंजलि दीदी कमलेश को सताने का मन बना चुकी हैं. उसे अपने भाई पर दया आई.

“चिंता न कर उसके बाद हम दोनों उससे गांड मरवाएँगी. उसे बिना पुरुस्कृत किये नहीं छोडूंगी. पर तुझे मेरा साथ देना होगा.” धीमे स्वर में बात करते हुए भी अंजलि ने सावधानी का ध्यान रखते हुए अपनी दोनों जांघों से कमलेश के सिर को जकड़ लिया था.

कमलेश के कान बंद होने के कारण उसे अपने विरुद्ध चल रहे षड्यंत्र का ज्ञान नहीं था. वो बेचारा तो पूरी श्रध्दा से अंजलि दीदी की चूत में खोया हुआ था. काम्या के स्वीकार करते ही अंजलि ने अपनी जांघों की पकड़ हटा दी. कमलेश ने अपने मुंह को उठाकर देखा तो अंजलि उसे देखकर मुस्कुरा रही थी.

“जा उधर जाकर बैठ थोड़ी देर. बियर वियर पीनी हो तो ले ले. हम बहनें एक दूसरे के साथ थोड़ी चूत चटाई कर लें, फिर देखेंगे तेरा क्या करना है.” अंजलि ने कमलेश को कहा तो कमलेश का मुंह उतर गया.

पर उसने उठकर अंजलि के कमरे के मिनी फ्रिज से बियर ले ली. उसके लंड की शोभा देखते ही बन रही थी. अंजलि और काम्या को एक पल के लिए लगा कि क्यों न चुदवा ही लिया जाये. फिर उन्होंने अपनी योजना पर ही तथस्ट रहने का निर्णय लिया. काम्या का मन अपने भाई को देखकर पिघल गया. जब कमलेश ने मायूसी से उसकी ओर देखा तो उसने पलकें झपक कर उसे समझा दिया कि सब ठीक है, तेरा नंबर आएगा. कमलेश के चेहरे के भाव बदल गए. वो तो भला हो जो अंजलि उसे देख नहीं रही थी अन्यथा भाई बहन का खेल समझ जाती.

अंजलि इस समय लेटी हुई थी और उसने ये आसन ही चुना था. अब काम्या को उसके ऊपर आना था. काम्या ने कमलेश को संकेत करने के बाद अंजलि के मुंह पर अपनी चूत को रखा. अंजलि ने उसकी गांड को पकड़कर उसकी चूत को अपने मुंह पर उचित स्थित पर लाया और फिर काम्या के भग्न को अपने होंठों में लेकर मसल दिया. काम्या अभी अंजलि की चूत पर झुकी ही थी और इस आक्रमण से उसका शरीर सिहर उठा और उसका मुंह अंजलि की चूत से जा टकराया. काँपते शरीर को संतुलित करते हुए उसने अपने लक्ष्य पर अपने होंठ लगाए और उसने भी अंजलि के भग्नाशे को मसल दिया. इस बार अंजलि का शरीर काँप उठा.

पर इसके साथ ही एक नई लय बनी और अद्भुत ऊर्जा का संचार हो गया. दोनों एक दूसरे की चूत पर मानो टूट पड़ीं. होंठ, जीभ, उँगलियाँ हर संभावित क्षेत्र को चाट, चूम और छेद रही थीं. कमलेश बैठा हुआ बियर पीते हुए सामने चल रहे प्रेमालाप को देख रहा था. उसने कभी काम्या और अपनी माँ को इस प्रकार से इतनी तत्परता के साथ नहीं देखा था. सम्भवतः आगे देखने को मिलेगा. ये सोचकर वो अपने तने लौड़े को हाथ में लेकर धीरे से सहलाने लगा.

एक दूसरे में समाई हुई दोनों बहनें आनंद से झूम रही थीं. काम्या की चूत को किसी ने ऐसे कभी चूसा नहीं था और जैसा अंजलि उसके साथ करती काम्या भी उसका प्रत्युत्तर उसी रूप में देती. एक प्रकार से देखा जाये तो अंजलि काम्या को सीखा रही थी और जो वो काम्या से अपेक्षा कर रही थी उसी को काम्या पर भी उपयोग कर रही थी. काम्या को भी आनंद की सुखद अनुभूति हो रही थी और वो भी अपना रस रह रह कर अंजलि के मुंह में छोड़ दे रही थी. अंजलि का रस पीने के लिए काम्या को अधिक कार्य करना पड़ रहा था क्योंकि ऊपर होने के कारण उसे अंजलि की चूत में डूब कर रस को सोखना पड़ रहा था. अंजलि ने अपना मुंह काम्या की चूत से हटाया और उसके नितम्ब पकड़कर उसे ऊपर किया. काम्या को समझ नहीं आया.

“अब तू नीचे आ जा. मुझे ऊपर आने दे.” अंजलि ने कहा.

एक पलटी के साथ ही अब उनकी स्थिति बदल गई. अब काम्या के मुंह के ऊपर अंजलि की चूत थी और जो रस वो सोख कर न पी पाई थी अचानक ही उसके मुंह में भर गया. अंजलि के इस रस को पीने में काम्या को कोई हिचक नहीं हुई. पर अंजलि का तात्पर्य कुछ और ही था. उसने इस बार कमलेश को देखा. कमलेश के मन में एक हलचल हुई.

“बियर पी ली?”

“जी दीदी.”

“चल तो यहाँ आ और मेरी गांड मार.”

कमलेश की बांछें खिल उठीं. उसे समझ आ गया कि काम्या ने उसे क्यों संकेत किया था. वो इतनी तेजी से उठा कि बियर उसके हाथ से छिटक गई. अंजलि जो उसका उतावलापन देख रही थी खिलखिला कर हंस पड़ी और फिर अपना मुंह काम्या की चूत में डाल दिया. कमलेश अंजलि के पीछे आया तो उसने सोचा कि अगर सूखी गांड में लंड डालूँगा तो कहीं दीदी को दर्द न हो जाये. वो दौड़ कर उनके बाथरूम में गया और क्रीम की ट्यूब ले आया. अंजलि की सुंदर मखमली गांड देखकर अब उसका लंड और अधिक कड़क हो गया था. उसने अंजलि की गांड में क्रीम लगाई और कुछ देर तक अपनी उँगलियों से उसे अंदर डालता रहा. जब उसे लगा कि गांड उपयुक्त रूप से खुल गई है तो कुछ क्रीम उसने अपने लंड पर लगाई और फिर अंजलि की गांड के छेद पर लंड लगाया.

“डरना मत, अच्छे से मार. तेरे जीजाजी का लौड़ा खाती है ये तेरा भी खा लेगी.”

कमलेश को अब कोई और प्रोत्साहन नहीं चाहिए था. उसने अंजलि की कोमल गांड को बड़ी लालसा से देखा और अपने लंड को उसमे धीरे से डाल दिया. एक बार जब उसके लंड का सुपाड़ा अंदर गया तो अंजलि ने सिर उठाकर उसे मुड़कर देखा

अंजलि, “अब तक तो ठीक था पर अब गांड मारने में कोई दया नहीं दिखानी है. नहीं तो अपने लौड़े को लेकर घर लौट जा और अपनी माँ की गांड मारना प्रेम से.”

कमलेश ऐसा सुनहरा अवसर गँवाने के लिए आतुर न था. उसने एक लम्बे धक्के के साथ अपना लंड अंजलि की गांड में पेल दिया. अंजलि से संतुष्टि भरी आह भरी और फिर काम्या की चूत में घुस गई. काम्या को अंजलि की चूत चाटने के साथ साथ अपने भाई के लंड के भी दर्शन हो रहे थे. ये दृश्य कोई नया नहीं था, पर इस बार गांड उसकी माँ की न होकर अंजलि दीदी की थी. उसने अपने ध्यान को अंजलि की चूत पर ही लगाए रखा और जैसा जैसा अंजलि कर रही थी वो उसी का अनुकरण करते हुए चूत को चूसती और चाटती जा रही थी.

कमलेश के तीव्र धक्कों के कारण काम्या की जीभ बार बार फिसल कर बाहर आ जाती थी. तो उसने अंजलि के दोनों नितम्ब पकड़े जिससे कि अंजलि का हिलना कुछ कम हो गया. अंजलि को गांड मरवाने का पूरा आनंद आ रहा था और साथ में उसे काम्या जैसी कम चुदी लड़की की चूत का भी रस पीने मिल पा रहा था. और इसी कारण उसकी चूत ने भी अपनी रस की बौछार काम्या के मुंह में कर दी. काम्या उसे अमृत के समान गटक गई. कमलेश अपने पूरे सामर्थ्य से अंजलि की गांड मार रहा था.

“बहुत अच्छे, बढ़िया गांड मारता है तू. मौसी की मौज रहती होगी. उन्हें भी ऐसे ही पेलता है क्या?” अंजलि ने काम्या की चूत में से मुंह हटाते हुए कमलेश की प्रशंसा की. उसे सच में कमलेश की स्फूर्ति और जवान लंड की अधीरता रास आ रही थी.

कमलेश ने धक्के लगाते हुए हाँफते स्वर में उत्तर दिया, “हाँ दीदी, माँ की गांड मारने में मुझे बहुत मजा आता है. माँ को भी मेरा लंड अपनी गांड में लेना अच्छा लगता है. वैसे, काम्या भी गांड मरवाने में एक्सपर्ट है पर उसे पापा का लंड अधिक प्यारा है. कभी कभी जो मिलता है.”

अंजलि कमलेश की बात सुनने के बाद काम्या की चूत चाटने लगी पर उसके मन में एक विचार आया, संतोष ने उनके परिवार के लिए बहुत त्याग किये हैं. अपनी पत्नी और बच्चों से दूर रहते हुए भी उसने कभी अपने कार्य से कोताही नहीं की. उनकी आय का एक कारण सम्भवतः संतोष का परिश्रम ही है. हाँ, उसका पति और भाई भी उसमे साझी हैं, पर संतोष को पारिश्रमिक और अभी बढ़े वेतन इत्यादि के ऊपर भी हमारा कोई उत्तरदायित्व बनता है. काम्या की कमसिन चूत को चूसते हुए उसने राहुल से इस बारे में विमर्श करने का मन बनाया.

“ऐ, छुटकी बहन, अब ऐसा कर तू ऊपर आ जा. मेरी गांड तो हमारे भाई ने मार ही ली है, अब तेरी भी इस सुंदर सलोनी गांड भी उसे मारने दे. कमलेश, भैया, मेरी गांड से लंड निकाल. अब तेरी बहना की गांड में ठोक.”

कमलेश ने अपना लंड बाहर निकाला तो अंजलि की गांड का छेद खुला रह गया. धीरे धीरे बंद होता वो छेद कमलेश के मन को लुभा रहा था. उसे एक बात का और आभास हुआ, दीदी ने हमारे भाई कहा था. और आज उसे पहली बार भैया भी पुकारा था, अब तक तो उसे नाम से ही बुलाती थी. उसने इसे शुभ संकेत माना।

“दीदी, आप न आगे हो जाओ. मेरी चूत अब आपकी जीभ की छेड़छाड़ और नहीं सहन कर सकती. आप पेट के बल लेटो, मैं आपकी चाटती हूँ और ये मेरी गांड मार लेगा.” काम्या ने सुझाव दिया.

अंजलि को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी. वो औंधे मुंह लेट गई और अपनी गांड ऊपर कर ली जिससे कि काम्या नीचे जा पाए. पर काम्या के मन में कोई और ही इच्छा थी. उसने अंजलि दीदी के गांड के छेद को देखा जिसमें से उसके भाई का लौड़ा अभी भ्रमण करके आया था. छेद अब तक पूरा बंद नहीं हुआ था और उसे उसमें कुछ वीर्य या किसी अन्य रस की बूंदें दिख रही थीं. काम्या उचित स्थिति में आ गई और उसने कमलेश को पीछे देखा जो अब उसकी गांड को ही ताक रहा था.

“अब घूरना बंद कर, अपना लौड़ा पकड़ और मेरी गांड मार.” काम्या ने कमलेश को जैसे नींद से जगाया.

“उह उह.” कमलेश की तंद्रा टूटी और उसने अपने लंड को काम्या की गांड के छेद पर लगाया.

“मुझे प्यार से गांड मरवानी है, तो अधिक तेजी मत दिखाना, भाई.”

“ओके.”

ये कहते हुए कमलेश ने अपने लंड से काम्या की गांड को भेदा और फिर हल्के दबाव के साथ अपने लंड को अंदर डालता रहा. अब तक काम्या ने अंजलि की चूत को छुआ भी न था. पर जब उसकी गांड कमलेश के लंड से भर गई तो उसने अपनी जीभ से अंजलि के छेद को चाटा। अंजलि सिहर उठी, क्योंकि काम्या ने आशा के विरुद्ध उसकी चूत को नहीं उसकी गांड पर अपनी जीभ चलाई थी. कमलेश अपने लंड को काम्या की गांड में डालकर रुक गया और काम्या की गतिविधि देखने लगा. काम्या अंजलि की गांड चाट रही थी, जहाँ से कुछ देर पहले ही उसने अपना लंड निकाला था. ये दृश्य देखकर कमलेश का लंड काम्या की गांड में और भी कड़क हो गया, जिसका आभास काम्या को भी हुआ.

“अच्छा लग रहा है न देखकर?” काम्या ने पूछा और फिर गांड को फैलाकर अपनी जीभ अंदर डाल दी.

कमलेश को लगा मानो उसका लंड फट ही जायेगा. उसने हल्के धक्कों के साथ काम्या की गांड में अपने लंड का भृमण आरम्भ किया. काम्या को अब अपनी गांड में लंड और मुंह में गांड दोनों का आनंद मिल रहा था. कमलेश उसकी गांड में हल्के ही धक्के लगाते हुए सामने का मनोहारी दृश्य देख रहा था. उसकी गति स्वतः ही बढ़ गई, पर इतनी नहीं कि काम्या को कष्ट हो. वो जानता था कि अगर काम्या धीरे गांड मरवाने की इच्छुक है तो वो इसे लम्बा खींचना चाहती है.

कमलेश काम्या की गांड मारता रहा और काम्या अंजलि की गांड और चूत दोनों को चूसती और चाटती रही. अंजलि को आनंद मिल रहा था और उसकी सिसकारियाँ इस की साक्षी थीं. काम्या ने अपनी दो उँगलियों को भी जोड़ लिया था. जब वो गांड चाटती तो वो उँगलियाँ चूत का विचरण करतीं, और जब चूत चाटती तो गांड का. उसने कोई तय लय नहीं बनाई थी और इसीलिए अंजलि को आनंद अधिक मिल रहा था.

“मेरी चूत में अपना मुंह लगा दे, मैं इस बार पूरी झड़ने वाली हूँ.” अंजलि ने काम्या को चेताया.

काम्या ने अपने हाथों से अंजलि के कूल्हे पकड़े और उसे कुछ और उठा दिया और फिर अपनी जीभ उसकी चूत में डालकर खेलने लगी. अंजलि ने सच कहा था पल दो पल में ही जैसे बाँध टूटा और काम्या के मुंह में अंजलि का कामरस झरने लगा. क्योंकि काम्या की स्थिति पूरा रस पीने के लिए उपयुक्त नहीं थी, इसीलिए वो जितना पी सकी उतना पिया और फिर शेष नीचे बिखर गया. झड़ने के बाद अंजलि हट गई और उसने एक बियर ली और सोफे पर जा बैठी और भाई बहन की रासलीला देखने लगी. जिस प्रेम के साथ कमलेश अपनी बहन की गांड मार रहा था, उसे देखकर अंजलि को भी जयंत की याद आ गई.

“आज तो भाई की रात मॉम पूरी रंगीन कर देंगी.” ये सोचकर वो मुस्कुरा दी.

धीमी गति से गांड मारते हुए अब कमलेश थक रहा था तो उसने कुछ और गति बधाई और फिर पाँच सात मिनट में काम्या की गांड में अपना रस छोड़ दिया. फिर वो काम्या के ही ऊपर गिर गया. इसके बाद उसने काम्या को पकड़ कर एक पलटी मारी और दोनों एक दूसरे के साथ लेट गए.

“कैसा रहा भाई?” काम्या ने पूछा.

“अनुपम.”

“ पर अब तक हमारी चूत को लंड नहीं मिला है, क्यों दीदी?”

“और नहीं तो क्या. कुछ देर विश्राम करें फिर अपनी चूत का भी कल्याण करवाते हैं.”

कमलेश की प्रसन्नता से आँखें चमक उठीं और उसने काम्या को उठाया. काम्या बाथरूम में अपनी गांड साफ करने चली गई और कमलेश एक बियर लेकर अंजलि दीदी के साथ बैठ गया.

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अगली सुबह:

परिवार के सदस्य कमरों से निकलकर बैठक में आ रहे थे. स्त्रियों की लड़खड़ाती चाल और चेहरे पर बिखरा संतोष का सौंदर्य उनकी बीती रात्रि की सफलता के साक्षी थे. कुसुम पहले ही आ चुकी थी और चाय बना रही थी. उसने सबकी प्रिय सैंडविच भी बना दिए थे. कमलेश और काम्या अपने कमरे में अभी तक सोये थे. बिना नहाये ही सब लोग खाने पर टूट पड़े और पलक छपकते ही सारा कुछ साफ हो गया. कुसुम ये देखकर मुस्कुरा दी. तभी सुलभा किचन में आ गई.

“दीदी, लगता है रात बहुत मस्त निकली है, सब इतने भूखे जो हैं.” कुसुम ने पूछा.

“अरे इतनी अच्छी चुदाई की है बाप बेटे ने मिलकर कि आत्मा प्रसन्न हो गई.” सुलभा ने कहा.

“देख रही हूँ दीदी, आपके चेहरे पर इतनी चमक और इतनी संतुष्टि कम ही देखी है.”

“चल ये सब छोड़, जल्दी से पकोड़े निकाल देते हैं, सबके पेट में चूहे दौड़ रहे हैं.”

अभी सब लोग खाना समाप्त ही किये थे कि घर की घंटी बजी. कुसुम ने खोला तो सामने श्रेया थी. उसने श्रेया को अंदर बुलाया और फिर अंजलि की ओर देखा.

“अरे श्रेया, माई डॉल. कैसी है. आज कैसे मेरी याद आ गई? मोहन जी ने छोड़ दिया तुझे?” अंजलि ने उसे गले लगाते हुए पूछा.

“बात ही कुछ ऐसी थी कि छोड़ना ही पड़ा. हम कहीं अकेले में बात कर सकते हैं?”

“हाँ हाँ, चल मेरे कमरे में.” अंजलि ने झोंक में बोल दिया और श्रेया को कमरे में ले गई.

अंदर जाते ही उसे अपनी गलती का आभास हो गया. बिस्तर की स्थिति और बियर की बोतलें रात की कथा सुना रही थीं. अंजलि इससे पहले कि कुछ और कहती, श्रेया ने कमरा बंद कर लिया.

“तो मेरी शंका सही है.” श्रेया ने कहा. अंजलि को काटो तो खून नहीं.

“कैसी शंका?” अंजलि का स्वर काँप रहा था.

“कल रात मैंने किसी स्त्री की चीख सुनी थी. हमारे घर की ओर किसका कमरा है?” श्रेया ने अंजलि की आँखों में झांकते हुए पूछा.

“माँ जी का, सासू माँ.”

श्रेया आगे बढ़ी और उसने अंजलि के कंधों पर हाथ रखा. उसकी आँखों से आँख मिलाये हुए बोली, “उनकी चीख से मुझे ऐसा लगा जैसी कि उनकी जोरदार चुदाई हो रही है.”

अंजलि, “हो सकता है. राहुल के पिता हैं तो चुदाई में चीख निकलवा ही देते होंगे.”

श्रेया: “सम्भवतः, पर मैंने ऐसी चीखें पहले भी सुनी हैं, तब जब किसी की चुदाई एक नहीं बल्कि अनेक पुरुष कर रहे हों.”

अंजलि हकलाते हुए, “क्या कह रही हो, तुम जानती भी हो?”

श्रेया: “अंजलि, मैं जानती भी हूँ और समझती भी हूँ. वो चीखें उनसे कोई बहुत भिन्न नहीं थीं जो मैं या मम्मी या सासू माँ निकालते हैं.”

अंजलि का सिर घूम रहा था. वो सहारा लेकर सोफे पर बैठ गई. पर श्रेया खड़ी रही. अंजलि ने श्रेया को देखा. श्रेया मुस्कुरा रही थी.

“अंजलि, अगर मैं गलत नहीं हूँ तो कल सुलभा आंटी को एक नहीं दो दो पुरुष चोद रहे थे. हैं न?”

अंजलि ने सिर हिलाकर स्वीकार किया. उसे इस जाल से निकलने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था. पर श्रेया भी रुकने वाली नहीं थी.

“दूसरा तुम्हारा पति और उनका बेटा राहुल था क्या?”

अंजलि ने सिर हिलाया.

“वाह, वाह, वाह.”

अंजलि अवाक् थी.

श्रेया उसके सामने आकर खड़ी हुई. उसने अंजलि की आँखों में झाँका और उसकी मुस्कान से अंजलि को कुछ शांति मिली.

“बात ये है, अंजू डार्लिंग, कि जो खेल तुम लोग अपने घर में खेलते हो, हमारे घर में भी वही चलता है. मेरा और मेरे पति का परिवार इस प्रकार के सम्भोग में बहुत समय से लिप्त हैं. आज मुझे प्रसन्नता है कि हम एक ही नाव के यात्री हैं. अपने परिवार से बात करो. अगर वो माने तो फिर हम सब मिलकर पार्टी करेंगे. पार्टी का अर्थ समझ रही हो न?”

अंजलि ने मूक रहकर सिर हिलाया.

“तो स्वीटहार्ट, मैं चलती हूँ. तुम्हारे उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी.”

ये कहकर श्रेया कमरे से बाहर गई और सबको नमस्ते करने के बाद घर चली गई. कुछ देर में अंजलि कमरे से निकली उसका रंग अभी भी उड़ा हुआ था. राहुल उसके पास गया और पूछा कि क्या हुआ.

अंजलि सोफे पर बैठी और श्रेया से हुई बात बताने लगी. सबकी आँखें आश्चर्य से चौड़ी हो गयीं.

“ओह शिट.” जयंत के मुंह से निकला. अन्य सभी भी सोच में डूबे हुए थे. ये एक नया मोड़ था जिसके लिए कोई भी तैयार न था. चिंतन में डूबे हुए सब अपने कमरों में चले गए.

क्रमशः

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