Incest कैसे कैसे परिवार - Page 2 - SexBaba
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Incest कैसे कैसे परिवार

अध्याय ३: तीसरा घर - शीला और समर्थ सिंह १

सुरेखा सिंह बहुत उदास थी. वो अपने पति को विमानतल छोड़कर घर वापिस जा रही थी. उसके पति नागेश को अपने काम से १ महीने के लिए विदेश जाना था. उसकी उदासी का कारण ये था कि उन दोनों के बीच में पिछले दो महीनों से कोई शारीरिक संबंध नहीं हुआ था. वो आज अपनी २० साल की शादी से पूरी तरह से असंतुष्ट थी. पर उसे इस समस्या के हल के लिए कोई और राह भी नहीं दिख रही थी. उसके दोनों बच्चे सजल और संजना अब बड़े हो चुके थे और कॉलेज में थे.

सुरेखा जानती थी की इस आयु में भी वो इतनी आकर्षक थी कि पुरुषों को आकृष्ट करती थी. पुरुष अक्सर उसके नितंब निहारा करते थे. पर अगर कोई आँख गढ़ाकर देखता था तो वो थी उसकी सुडोल और भारी चुचियाँ. अपने कार्यालय के पुरुषों को वो किसी भी तरह का भाव नहीं देती थी. उसने कभी भी अपने पति से विश्वासघात नहीं किया था. पर अब वो अपने पति के व्यवहार से उचट चुकी थी. उसे कोई न कोई समाधान निकालना ही था.

वो अपने माता पिता को देखकर आश्चर्य करती थी की वो आज तक एक दूसरे से कितना प्यार करते थे. दोनों की शादी उस समय के अनुसार बहुत छोटी आयु में ही हो गई थी. वो दोनों अभी भी स्वस्थ और सक्रिय थे. उसकी बड़ी बहन सुप्रिया का विवाह बहुत दिन नहीं चल पाया था. दो बच्चे होने के कुछ ही वर्षों में उसका तलाक़ हो गया था. पर सुरेखा ने तलाक़ के बाद भी कभी सुप्रिया को दुखी नहीं देखा. उसने अपना सारा समय अपने कार्य और बच्चों के पालन पोषण में लगा दिया था. आज उन दोनों के बच्चे बड़े हो चुके थे और कॉलेज से निकलने के निकट थे.

इसी चिंतन में उसने अपनी कार अपने घर को अपने घर की ओर से अपने पिता के घर संभ्रांत नगर मोड़ दी. उसके घर पर कोई था नहीं और वो बहुत बेचैन थी. सम्भवतः उसकी माँ उसकी इस समस्या के लिए कोई सुझाव दे पाएंगी. उसे ये देखकर खुशी हुई की सुप्रिया की कार भी वहीं थी. अब वो अपनी माँ और बहन से सलाह लेने का मन बना चुकी थी. ये तो अच्छा ही हुआ कि दोनों एक ही दिन एक ही साथ मिल गयीं. उसने घंटी बजाई, पर कोई उत्तर न मिलने पर अपनी चाबी से दरवाजा खोला और अंदर चली गयी. वो अपनी माँ को पुकारने ही वाली थी कि उसे ऊपर के कमरे से सिसकारियाँ सुनाई दीं. उत्सुकतावश वो दबे पाँव ऊपर की ओर बढ़ने लगी और अपने माता पिता के कमरे को ओर जाने लगी.

"उूउउह, और अंदर, और ज़ोर से." सुरेखा ने अपनी माँ की आवाज़ को पहचान लिया. वो अपनी हँसी दबाते हुए सोचने लगी कि उसके माता पिता दोनों दोपहर में चुदाई कर रहे हैं. उसकी बहन अपने पुराने कमरे में सम्भवतः सो रही होगी.

"मैं बाद में आ जाऊंगी, अभी इन्हे आनंद लेने दूँ ." सोचकर वो पलटी। फिर ये सोचकर की थोड़ी जासूसी की जाए, वो बढ़ी तो देखा कि द्वार पूरा बंद नहीं था. बचपन की शरारत याद करते हुए उसने पल्ला थोड़ा सा खोला और अंदर झाँका.

उसकी माँ निर्वस्त्र थी और अपने लाल होठों से अपने पति की लंबा और मोटा लंड चूस रही थी. सुरेखा ने ये देखकर अपने सूखे होठों पर जीभ फिराई. उसके पिता के लंड को देखकर सुरेखा विस्मित हो गई. उसकी माँ पिता के अंडकोष हल्के हाथों से दबा रही थी. उसके पिता का सिर ऊपर पीछे था और चेहरा आनंद विभोर था. अपनी माँ को लंड चूसते हुए देखकर सुरेखा को कोई आश्चर्य नहीं हुआ. पर उसे जिस दृश्य ने आतंकित किया वो ये था कि वो दोनों अकेले नहीं थे. एक और आदमी था जो उसकी माँ शीला की पीछे से चुदाई कर रहा था.

और वो कोई और नहीं, सुप्रिया का बड़ा बेटा निखिल था!

*****

निखिल का बांया हाथ उसकी नानी के नितम्ब पर था, और दाएं से वो उनका भग्नासा निचोट रहा था. शीला ने अपने मुंह को समर्थ ने लंड से हटाया और पीछे मुड़कर निखिल की ओर वासना से देखा.

"नानी की चूत को ऐसे ही अच्छे से धीरे धीरे पेल." उन्होंने आज्ञा दी.

"सच तो ये है, कि इस चूत में आज तक न जाने इतने लंड गए हैं, पर तेरे मूसल को लेने में अभी भी थोड़ी हिम्मत चाहिए.” शीला बोले जा रही थी, “हाँ ऐसे ही,ऐसे ही. किसी घोड़ी को भी तेरा लंड लेने में कष्ट होगा, पर आनंद भी भरपूर आएगा."

निखिल अपनी प्रशंसा सुनकर गर्व से फूल गया. "नानी आप भी बहुत मस्त चुड़क्कड़ हो, मैं सिर्फ एक ही और स्त्री को जानता हूँ जो मेरे पूरा लौड़ा बिना दुविधा के ले पाती है. और उन्हें भी इससे अत्यंत प्रेम है.”

"प्रेम? मैं न्योछावर हूँ इस पर." शीला बोली, "मुझे दो लोगों से एक साथ चुदवाने से अधिक कोई कार्य आनंद नहीं देता. और तुम्हारा तो ये ११ इंच का मूसल तो जैसे मेरे ही लिया बना था."

"११ इंच ?" सुरेखा के मुंह से अनजाने ही एक आश्चर्य भरी सिसकारी निकल गई.

तीन सिर कमरे के द्वार की ओर मुड़े। उनकी ऑंखें सुरेखा की आँखों से जा टकराईं, जो इस कौटुम्बिक व्यभिचार के कृत्य की जीती जागती साक्षी थी.

*****

सुरेखा जड़वत खड़ी थी, वो डर और शर्म से हतप्रभ थी. पर चुदाई में व्यस्त वो तिकड़ी न गुस्सा लग रही थी न ही दोषी. निखिल ने एक हलकी सी मुस्कान के साथ अपनी मौसी की आँखों में डालते हुए अपनी नानी की चूत में अपने लंड का आवागमन बनाये रखा. शीला ने अपना सिर मोड़कर सुरेखा की ओर देखा। उसके मुंह से समर्थ का लंड बाहर निकल गया.

उसने बेशर्मी की एक कुटिल मुस्कान से व्यंग्य किया,"ओह हो, मेरी मासूम बेटी, सुरेखा"

वो खिलखिलाई, "देखने आयी है कि उसके बूढ़े माँ बाप अपनी दवाइयाँ ले रहे हैं या नहीं? है न?"

समर्थ के थूक से लिपटे हुए लंड को अपने हाथ से हलके से सहलाते हुए आगे बोली," मैं तो अवश्य ले रही हूँ. मेरी सर्वप्रिय प्रोटीन शेक का डबल डोज़ जो लेने वाली हूँ."

"माँ, तुम ऐसा भद्दा मजाक कैसे कर सकती हो?" सुरेखा चिल्लाई, "दो दो पुरुषों आदमियों के साथ एक साथ ऐसा काम, और उसमे से एक तुम्हारा नाती है. ये इन्सेस्ट है."

"बिलकुल, और इसीलिए इतना अद्भुत है," शीला ने वासना से भरी आवाज़ में कहा, “और पुरुष इसीलिए क्योंकि कोई स्त्री उपलब्ध नहीं है, अन्यथा मुझे उसका स्वाद भी उतना ही प्रिय है..”

"और ये दोनों घोड़े भी कोई आपत्ति नहीं कर रहे." अपने नितम्बों को घुमाते हुए बोली. "ऐ लड़के, मुझे चोदना बंद मत कर."

ये सुनते ही निखिल ने फिर गति पकड़ ली और लम्बे और ताकतवर धक्कों से अपनी नानी को चोदने लगा.

शीला ने सुरेखा को कहा," अब टेंशन छोड़कर शांत हो जा और इस शो का आनंद ले."

"आनंद लूँ !" सुरेखा ने आश्चर्य से कहा, "माँ तुम मानसिक रोगी हो. तुमने सोचा भी कैसे कि मैं इसका आनंद लूंगी। "

उसके शब्द तो उसे इस दृश्य से दूर कर रहे थे, पर वो खुले हुए मुंह से अवाक् अपने भांजे को ताक रही थी जो हर धक्के में और गहरा जाता प्रतीत हो रहा था. निखिल ने अपनी शक्ति दिखाते हुए अपने दोनों घुटनों को और फैलाया, शीला के भी पैरों को और फैलाते हुए जोरदार धक्के लगाने लगा. शीला अपने बिस्तर पर सिसकती और कराहती हुई पेट के बल फ़ैल गई. समर्थ ने अपने लंड से शीला के चेहरे और होठों को हलके हलके पीटने लगा. शीला अभी भी उसे पकड़ने का प्रयास कर रही थी पर निखिल की गति से वो इतना हिल रही थी की असमर्थ थी.

"ठहरो सब! ठहर जाओ! माँ तुम छिनाल हो." सुरेखा ने फिर आपत्ति की.

शीला किसी प्रकार से बोलती रही, "और मुझे इस पर गर्व है. तुम ज्यादा पाखंडी न बनो, तुम्हारी पैंट क्यों गीली है? तुम्हारी चूत पानी छोड़ रही है न?"

सुरेखा का हाथ अपनी पैंट के सामने गया. उसे आभास हुआ कि उसकी माँ सच कह रही थी. उसका सिर झुक गया और वो शर्म से लाल हो गई.

"सुरेखा, गुड़िया, आराम से." उसके पिता ने पहली बार कुछ बोला। उसके लंड को इतने में शीला ने अपने मुंह में डाल लिया. "क्षमा करना, कि तुम्हें इस प्रकार पता चला. पर पता तो लगना ही था एक दिन. मैं तो कब से इस दिन की प्रतीक्षा कर रहा था."

एक रहस्यमई मुस्कान से उसने आगे बोला "बहुत सारी नयी संभावनाएं खुल जाती हैं इस तरह, क्यों शीला?"

"बिलकुल" एक स्त्री के पीछे से आते हुए स्वर ने सुरेखा को सनसना दिया.

दो छोटे कोमल हाथ उसके वक्ष के ऊपर आये, उसकी शर्ट के अंदर गए और आगे से उसके ब्लाउज के हुक खोल दिए. उन दोनों कोमल हथेलियों ने उसके स्तनों को मसलना और सहलाना प्रारम्भ कर दिया. सुरेखा डर और अचम्भे से पीछे मुड़ी तो उसने अपनी बड़ी बहन सुप्रिया को मुस्कुराता पाया. सुप्रिया भी पूरी नंगी ही थी और उसके बड़े बड़े स्तन सुरेखा के स्तनों से मेल जोल कर रहे थे.

सुरेखा ने विरोध करने के लिए मुंह खोला परन्तु सुप्रिया ने इसका लाभ उठाकर अपनी बहन को पास खींचा और गहरा चुम्बन लिया. सुप्रिया ने वासनामय आँखों से सुरेखा की आँखों में देखा और अपनी जीभ उसके मुंह में डालकर प्रगाढ़ चुम्बन लेने लगी. सुरेखा को ये जानने में अधिक देर नहीं लगी कि सुप्रिया के मुंह से वीर्य का स्वाद आ रहा था. पर किसका? अपने हाथों से सुप्रिया सुरेखा के माँसल स्तनों को भींचने लगी. अपने अनुभवी उँगलियों से वो सुरेखा की चूचियों को बिलकुल सही मात्रा में मसल रही थी.

सुरेखा का मनोबल टूट रहा था, "नहीं, नहीं, मुझे इसमें आनंद नहीं आना चाहिए, मेरी बहन गलत कर रही है. जैसे मैं गलत थी अपने भांजे से अपनी माँ की चुदाई देखकर."

पर उसका शरीर अब उसका साथ नहीं दे रहा था. महीनों से सेक्स से वंचित भूखा शरीर इस आक्रमण का प्रतिरोध करने में अक्षम था. अपनी जीत का अनुभव करते हुए सुप्रिया ने अपनी नंगी जांघों को सुरेखा की जांघों से सटा दिया। सुरेखा ने देखा की सुप्रिया की चूत बिलकुल चिकनी थी, और गीली भी.

"मत करो ऐसा, प्लीज."

पर अब सुप्रिया कहाँ रुकने वाली थी, उसने अपना पराक्रम और बढ़ा दिया.

"सही जा रही हो, मॉम." ये एक नए पुरुष के स्वर ने प्रोत्साहन दिया, "खेलो इन चूचियों से."

ये नितिन था, सुप्रिया का दूसरा बेटा, जो सुप्रिया से कुछ ही दूर खड़ा था. अन्य लोगों की तरह वो भी इस समय नंगा ही था और उसके गीले लंड से कुछ रस गिर रहा था. ये लंड भी निखिल से किसी तुलना में उन्नीस नहीं था.

नितिन चलकर सुरेखा के पीछे आया और उसने अपने बड़े हाथों से सुरेखा की पैंट के बटन और ज़िप खोली और बड़ी सादगी से उसे सुरेखा के लम्बे सुडौल पैरों से नीचे उतार दिया. सुरेखा तो मानो एक तन्द्रा में थी. उसने एक एक कर के अपने पाँव उठाये और पैंट निकल जाने दी. सुप्रिया भी सुरेखा के ब्लाउज निकालने में सफल हो चुकी थी. एक बार निर्वस्त्र होने पर सुप्रिया ने सुरेखा को फिर अपनी बाँहों में भर लिया. सुप्रिया उसे चुम्बनों से ओतप्रोत कर रही थी और उसके नितम्ब जोर जोर से मसल रही थी. सुरेखा ने अपने पीछे नितिन के लंड का स्पर्श महसूस किया जो उसकी गांड के ऊपर दस्तक दे रहा था. सुप्रिया ने एक हाथ सुरेखा की चूत पर लगा दिया और उसे सहलाने और मसलने लगी. सुरेखा इस समय अपने भतीजे और बहन के बीच फंसी हुई थी और उसे बहुत आनंद आ रहा था.

"ओह, मैं झड़ रही हूं !" शीला चीखी, "और जोर से चोद मुझे! फाड़ दे मेरी चूत अपने मूसल से! फक मी! समर्थ, समर्थ, अपना पानी मेरे मुंह में छोड़ दो."

"नहीं!" समर्थ ने अपना विशाल लंड शीला के मुंह से निकलते हुए कहा.

शीला अपने स्खलन के उत्कर्ष पर थी और निखिल ने भी अपने अण्डों में कसाव महसूस किया और अपनी गति और तेज कर दी.

"मैं भी गया नानी!" निखिल चीखा और अपने लंड को शीला की चूत की गहराई में जाकर जड़ कर दिया. "तुम्हारी चूत में झड़ रहा हूँ, मेरी प्यारी नानी! आआह!"

अंततः निखिल और शीला शांत होकर हाँफते हुए लेट गए. सुरेखा स्वयं सांसे रोके हुए थी सामने के दृश्य को देखकर. निखिल ने धीरे से अपना लंड अपनी नानी की बहती चूत से निकला.

"मुझे तेरा रस पीना है, इधर आ." निखिल ने अपना लंड नानी के मुंह में डाल दिया जिसे बहुत प्यार से शीला ने चाट चाट कर साफ किया. "तू अच्छा है, तेरे नाना ने तो मुझे अपना पानी पिलाने से मना कर दिया."

"मैं किसी और के लिए बचाकर रखा हूँ." समर्थ ने कहा.

ये सुनकर सुप्रिया और नितिन ने सुरेखा को छोड़ दिया.

"तुम्हें आज बहुत धक्का लगा है, है न?" समर्थ ने सुरेखा से पूछा.

सुरेखा ने हामी भरी.

"इधर आओ, मेरे पास, हमें बाप बेटी के बीच कुछ बात करनी है."

सुरेखा हलके क़दमों से अपने पिता के तने हुए लंड पर नज़र गढ़ाए हुए, समर्थ के पास बैठ गई.

"तुम जानती ही हो कि हम ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिससे तुम्हें आपत्ति हो. तुम ये भी जानती हो कि मैंने दो साल पहले पूरे घर को उच्च स्तर के CCTV से सुरक्षित किया था." समर्थ ने सुरेखा की चिकनी जांघ पर हाथ फिरते हुए कहा.

"जब तुम आयीं तब मैंने और नितिन ने तुम्हें CCTV पर देख लिया था। " सुप्रिया ने बीच में बताया. "मुझे TV पर दूसरों की चुदाई देखकर चुदने में बहुत मजा आता है."

समर्थ ने उसकी बात काटते हुए सुरेखा कहा, "पिछली बार जब तुम आयीं थीं तब हमने देखा था तुम्हे नागेश से चुदवाने की असफल कोशिश करते हुए." कहते हुए समर्थ ने सुरेखा का हाथ अपने लंड पर रख दिया. सुरेखा सिहर उठी. वो अचेतन मन से हलके हलके उसे मुठियाने लगी.

"आपने हमें देखा था?"

"हाँ, बिलकुल." शीला ने निखिल के लंड को मुठियाते हुए कहा. "और हमें बहुत दुःख भी हुआ था ये देखकर कि उसने तुम्हें एक प्रकार से झिड़क दिया था. पर अब तुम सही जगह आयी हो. यहाँ हमेशा खड़े हुए हलब्बी लौंड़ों से तुम्हे दोबारा कभी सेक्स से वंचित नहीं रहना होगा." निखिल के लंड को अपने मुंह में लेते हुए उसकी माँ बोली.

फिर समर्थ और निखिल के लंडों को अपने हाथ में लेकर बोली, "जो तुम्हारी प्यास मिटा सकें वो सब यहाँ है. बस आँखों से पट्टी हटा कर देखो. और ये सब अपने ही हैं. कहीं बाहर जाने की आवश्यकता ही नहीं है.” फिर हँसते हुए बोली, “हालाँकि उसमें भी कोई बुराई नहीं है.”

"मैं समझ नहीं पा रही हूँ. ऐसा कैसे कर सकती हूँ? सुप्रिया तुम अपने ही बेटों से चुदवाती हो? क्या ये पाप नहीं है?"

"सम्भव है. पर मैं पाप और पुण्य की परिभाषा में नहीं पढ़ना चाहती. अपनी सोच बदल." सुप्रिया ने डाँटते हुए कहा, "देख मेरे बेटों के लंड! मैं एक सदा चुदासी स्त्री हूँ, और मैं ढोंगी नहीं हूँ. मुझे जब लंड चाहिए तब मिलते हैं. ये तीनों मेरी चूत में उतने ही अच्छे से फिट बैठते हैं जैसे कोई और. असली पाप तो ये होगा कि ऐसे घोड़ों के साथ रहना और इनसे बिना चुदे जीवन बिताना. और क्योंकि ये मेरी ही संतान हैं, या मैं पापा की, इससे पूरे व्यभिचार का आनंद कई गुना बढ़ जाता है." ये कहकर सुप्रिया झुकी और सुरेखा की चूत को ऊपर से नीचे तक चाट लिया. फिर उसने सुरेखा का भग्नासा अपने होठों में लेकर दबा दिया.

सुरेखा बेबस हो गई और ऐसा लगे जैसे वो झड़ने वाली ही है. वो अब झड़ना चाहती थी, कई दिनों की प्यासी जो थी.

"देखो पापा, कैसे लुपलुपा रही है इसकी चूत, कितनी गीली हो गई है, देखो छूकर।" सुप्रिया ने समर्थ का हाथ पकड़कर सुरेखा की चूत पर रख दिया. समर्थ ने उसे थोड़ा सहलाया और अपनी एक उंगली अंदर डाल दी.

"ओह हाँ, ओह" सुरेखा सिसक उठी, "मेरा मतलब, नहीं नहीं."

पर अब देर हो चुकी थी. उसका शरीर उससे छल कर रहा था. उसने फिर अपने पिता के लंड की ओर हाथ बढ़ाया, पर वापिस खींच लिया. वो अपनी अनियंत्रित होती वासना पर कुछ अंकुश लगाना चाहती थी. सम्भव था कि वो स्वयं को इस भंवर में जाने से रोक सके.

"ह्म्म्मम्म, लगभग तैयार हो, है न? चलो तुम्हें सहमत करने के लिए एक और प्रलोभन देती हूँ." सुप्रिया ने नितिन को इशारा किया. नितिन अपने खड़े लंड को लेकर सुरेखा के चेहरे के पास खड़ा हो गया.

"मौसी, लगता है काफी दिन हो गए तुम्हें लंड चूसे हुए." उसने छेड़ते हुए बोला और अपना लंड सुरेखा के होठों से सटा दिया और रुक गया.

सुरेखा ने जीभ से टोपा चाटा और स्वाद और सुगंध से उत्तेजित हो गई. उसके मुंह में पानी आ गया.

"मेरे अण्डों से खेलो मौसी, मैं न तुम्हारा पिता हूँ न बेटा। इसे गलत मत समझो." नितिन ने चाल चली.

सुरेखा की आँखों में एक नयी चमक आई जैसे कि उसे नया उद्बोध हुआ हो. उसने मुंह खोला और नितिन का लंड निगल लिया. उसने नितिन को अपनी ओर खींचा. नितिन उसके रेशमी बालों को सहलाते हुए धीरे धीरे अपना लंड उसको खिलाने लगा. लंड चूसने में उसे अत्यधिक आनंद आता था परन्तु उसके पति ने उसे वर्षों से लंड चूसने का अवसर ही नहीं दिया था. और उसका लंड भी इस स्तर का नहीं था. उसने शर्म ताक में रखकर नितिन के लंड को संभव स्तर तक मुंह में ले लिया.

"ये हुई न बात!" उसके पिता ने उसका उत्साहवर्धन किया. "अब नितिन को अपने मुंह से चोदो। "

उसे अपने पीछे “स्लर्प स्लर्प” की ध्वनि आ रही थी और निखिल की आहें भी सुनाई दे रही थीं. उसकी माँ वाकई बहुत ऊँचे स्तर की चुड़क्कड़ है, ये सोचते हुए उसने नितिन के भारी लंड पर अपना आक्रमण तीव्र कर दिया. आज वो अपनी कई दिनों की प्यास बुझाने वाली थी. नितिन ने भी हलके हलके अपने लंड का दबाव बढ़ाया, फिर हलके से सिर पकड़कर थोड़ा तेजी से मुंह चोदने लगा.

अचानक नितिन ने अपना लंड एक ही झटके से निकला और छिटककर दूर चला गया. उसने अपनी माँ के कन्धों पर हाथ रखा और उसे भी हटा दिया.

सुरेखा निराशा से चिल्ला पड़ी, "नहीं नितिन, यहाँ आओ, मुझे इतने दिन हो गए, मुझे लंड पीना है."

"सॉरी मौसी" नितिन ने हलके मन से कहा, "मुझे लगता है कि ये नाना का अधिकार है. अच्छा नहीं लगेगा अगर मैं सबसे पहले आपको पानी पिलाऊँ." कहते हुए उसने अपनी माँ सुप्रिया के होंठ चूमे और मम्मे मसल दिए.

"चलो मम्मी, हमारा खेल बीच में रुक गया था. अब उसे आगे ले चलते हैं. यहाँ स्थान नहीं है इसीलिए नीचे लेटो और मुझे चोदने दो."

"देखा सुरेखा, मेरा राजा बेटा अपनी माँ का कितना ध्यान रखता है." वो नीचे कालीन पर लेटकर अपने पैर फैलाती हुई चिहुंक पड़ी. "मेरी चूत लबलबा रही है कर मेरी सवारी मेरे घोड़े. तेज और कठोर सवारी."

"जैसी आज्ञा, मॉम." नितिन ने कहा.

सुरेखा अब बेचैन हो रही थी चुदने के लिए. उसने ललचाई आँखों से नितिन को अपने घुटनों के बल बैठकर सुप्रिया की चूत पर लंड रखते देखा. और तब नितिन ने एक ही झटके में अपना खूंटा सुप्रिया के पनियाई हुई चूत में पेल दिया.

"आईईई!" सुप्रिया चीख पड़ी, और अपने कूल्हे मटका कर नितिन को प्रोत्साहित करने लगी. "मार डाल मुझे चोद चोद कर, और जोर से दबा दबा के चोद. अपनी मम्मी को चोद मेरे बेटे. मेरी प्यास बुझा दे रे, चीर दे इसे."

सुरेखा के पिता समर्थ ने सुरेखा की चूत की पंखुड़ियों को सहलाते हुए दो उंगलियां अंदर डाल दीं और अंदर बाहर करने लगे. अब सुरेखा की मोटर ऑन हो चुकी थी, उसके शरीर ने उसके मन में चल रहे नैतिक विचारों को पीछे धकेल दिया था. अब उसे उँगलियों नहीं, बल्कि किसी और हथियार की आवश्यकता थी.

उसने अपने पिता की ओर मुंह करते हुए बोलै, "पापा, प्लीज़। आप मुझे चोदोगे? प्लीज, पापा. चोद दो मुझे."

"क्या सच में?" समर्थ ने उसे छेड़ा, "क्या तुम्हें ये पाप नहीं लगता?" कहते हुए दो उँगलियों से भगनासे को मसल दिया.

"मुझे कोई अंतर नहीं पड़ता. मुझे अपनी आत्मा को तृप्त करना है. मेरी चूत अब और सहन नहीं कर सकती. मुझे आपका लंड चाहिए पापा! प्लीज मुझे मत तरसाओ!" सुरेखा ने विनती की.

समर्थ ने अपनी बेटी की याचना सुनी और उसे हलके से बिस्तर पर लिटा दिया. अपने लंड को सुरेखा की चूत पर रखा ही था कि सुरेखा कमर उचकाने लगी. समर्थ ने उसके पेट पर हाथ रखा और उसे संयत लिया. फिर धीरे धीरे अपने लंड को अंदर उतारने लगा.

"पापा, डाल दो अंदर" सुप्रिया ने नितिन के नीचे धक्के खाते हुए कहा. फिर उसने घोड़ी का आसन लिया और नितिन को पीछे से चोदने को कहा. "ऐसे अच्छे से दिखाई देगा. मौसी भी नाना के लंड की दीवानी होने वाली है."

ये यही सत्य भी था. सुरेखा अपने पांव इधर उधर फेंक रही थी. समर्थ ने बहुत संयम के साथ अपना पूरा लंड अंततः अंदर घुसा ही दिया. सुरेखा को अपनी चूत इससे अधिक भरी हुई कभी अनुभव नहीं हुई थी. उसने ये भी समझ लिया कि अब वो कभी भी अपने पिता को चोदने से मना नहीं कर पायेगी. इतना पूरी रूप उसकी पूरी गहराई तक छूने वाले लंड को छोड़ना असंभव था. उसे अपनी माँ और बहन का इन तीनों से अथाह प्रेम का कारण समझ में आ गया. समर्थ ने हलके हलके धक्के लगाने शुरू किये. उसे नागेश के लंड आकार पता था, और उसकी बेटी कई दिनों से चुदी भी नहीं थी. सुरेखा ने नीचे देखा और अचरज किया कि वो कैसे ऐसे मूसल को ले पाई. फिर चिंता छोड़ आंखे बंद कर सुख के सागर में गोते लगाने लगी.

"नानी देखो!" निखिल ने शीला का ध्यान आकर्षित किया. "नाना मौसी को चोद रहे है! और मैं झड़ने वाला हूँ!"

शीला ने सुरेखा से ऑंखें मिलायीं और एक संतुष्ट मुस्कान के साथ निखिल के रस का पान करने लगी.

"उह्ह्ह! हाय पापा, पहले क्यों नहीं क्या मुझे आप सबने अपने खेल में सम्मिलित?" सुरेखा ने अपने कूल्हों को ऊपर नीचे करते हुए पूछा. "मेरे अंदर ही झड़ना पापा. मुझे आपका पूरा पानी अंदर लेना है."

समर्थ इस बार अधिक समय तक नहीं रुक सकता था. वो पिछले दो घंटों से चुदाई कर रहा था और अब तो उसने अपनी छोटी बेटी को पहली बार चोदा था. समर्थ ने अपनी गति और तेज कर दी. वो सुरेखा की चूत से बहते हुए पानी में अपना चप्पू चलाये जा रहा था. सुरेखा झड़ती जा रही थी और समर्थ इस आयु में भी पूरी शक्ति के साथ उसे चोदे जा रहा था.

"सुरेखा, मैं झड़ने वाला हूँ. देख शीला, मैं अपनी बेटी की चूत में झड़ रहा हूँ."

"देख रही हूँ. भर दे उसकी चूत. मिटा दे अपनी बेटी की प्यास."

"बेटा क्यों न तुम भी नाना के साथ ही झड़कर हम दोनों बहनों को एक साथ तर कर दो." सुप्रिया ने नितिन से कहा.

नितिन ने बिना कुछ बोले अपने धक्को को अति तीव्र कर दिया. सुरेखा ने अपने पिता का बीज अपनी चूत को सींचते हुए महसूस किया. वो इस पूरे समय में तीन बार झड़ चुकी थी. उधर सुरेखा ने नितिन को भी सुप्रिया के अंदर झड़ते हुए देखा. उसने अपनी चूत पर हाथ रखा और उसे छूते ही एक बार और उसका पानी छूट गया. वो निढाल हो कर पड़ गई. समर्थ उसके ऊपर से हलके से हटा और लेट गया. सुरेखा ने सोचा न था कि उसे एक ही दिन में इतने चौंकाने वाले वृत्तांत देखने और खेलने के लिए मिलेंगे. वो स्वप्निल आँखों से एक मुस्कान लेकर अपनी सांसे संभाल रही थी.

उसकी आँखें बंद थीं और उसे ऐसा आभास हुआ जैसे कोई उसकी टाँगों को फैला रहा है. फिर अपनी चूत पर किसी की जीभ का अनुभव हुआ. इस बार उसने आँखें खोलीं. उसके पिता उसके साथ लेटे हुए उसे प्रेम से निहार रहे थे. और नीचे देखने पर उसे अपनी माँ का सिर दिखाई पड़ा.

“तेरी माँ ऐसे नहीं छोड़ने वाली. मेरा रस उसके मुंह में जाना था जब तुम आयी थी. तो वहीँ जा रहा है, बस उसका श्रोत इस बार तुम्हारी चूत के द्वारा है.” उसके पिता ने उसे समझाया.

सुरेखा के लिए ये एक नया अनुभव था. उसकी माँ उसकी चूत को मानो खोल कर उसमें से अपनी जीभ के माध्यम से पूरा रस पीने की इच्छुक थी. किसी स्त्री के द्वारा ऐसा कृत्य उसके साथ पहली बार हो रहा था. और इसका आनंद भी अत्यंत सुखद था. उसने आँखें फिर बंद कर ली.

कुछ ही पलों की देरी के बाद उसके दूसरी ओर का बिस्तर दबा और उसे अपनी बहन सुप्रिया की सुगंध आई. आँखों को खोलने पर उसने भी सुप्रिया को प्रेम से देखते हुए पाया.

“तुम बहुत सुंदर हो.” ये कहते हुए सुप्रिया ने उसके होंठों से फिर होंठ जोड़ लिए और दोनों बहनें चुंबन में लीन हो गयीं.

सुरेखा भाव विभोर थी, उसकी बहन उसे चूम रही थी और उसकी माँ उसकी चूत चाट रही थी.

“बहुत मीठी है मेरी बेटी, और आपके रस से मिलकर तो इसका स्वाद ही विलक्षण है.” शीला ने अपना कार्य समाप्त करने के बाद बोला।

“मॉम. मेरे लिए कुछ बचा या नहीं?” सुप्रिया ने प्रश्न किया.

“नहीं! परन्तु अब कोई बाधा नहीं है. जब चाहे पी लेना. अब तो ये भी हममें जुड़ गयी है.” शीला ने उत्तर दिया.

“मम्मम।” सुरेखा ने अपनी सहमति दर्शाई.

"मुझे आशा है कि ये सब वीडियो में ठीक से रिकॉर्ड हो गया होगा." उसने अपने पिता की आवाज़ सुनी.

ये सुनकर उसकी आँखें खुल गयीं और उसे अपने सामने उसकी माँ का हँसता हुआ चेहरा दिखा।

“रिकॉर्ड?

“और क्या, तुम्हारी पहली चुदाई की स्मृति तो रखनी है होगी न?” उसकी माँ ने उसे समझाया और फिर उठकर अपने पति के पास जाकर खड़ी हो गईं।

सुरेखा ने अपने परिवार को देखा तो उसका मन उदास न रहा. यहाँ आने से पहले उसे उसके जीवन में जो भी कमियाँ दिख रही थीं, वो मानो दूर हो चुकी थीं. वो अपने घर लौट आई थी. इस आभास के साथ उसने अपनी आँखों को फिर से बंद किया और शांति से सो गई.

क्रमशः

1126000
 
अध्याय ४: चौथा घर - मिशेल और रिचर्ड डिसूज़ा १

शाम को अपने कार्यालय से आने पर रिचर्ड ने मिशेल को किस किया.

"कैसी हो हनी?"

"आई ऍम फाइन. तुम?" मिशेल इतने साल बाद भी हिंदी में ठीक से बात नहीं कर पाती थी. रिचर्ड इस पर आश्चर्य करता था क्योंकि केरल का होने के बाद और विदेश में रहने के बाद भी उसकी हिंदी अच्छी थी.

"जैसन का कॉल आया था, वो दो सप्ताह बाद आ रहा है. कह रहा था की ईव, ऐलिस और मार्क भी आने को मान गए हैं." रिचर्ड ने बताया.

"वाओ, देट इस गुड न्यूज़. बहुत मजा आएगा. शैली तो ऐलिस की बड़ी फैन है."

"और मैं भी." रिचर्ड ने हंस कर कहा.

"यू नॉटी मैन ! बस तुम्हारा दिमाग में बस एक ही चीज़ रहता है."

"अरे जिसे तुम्हारे जैसी जूसी (रसीली) बीवी मिली हो वो और सोच भी क्या सकता है. अच्छा, सुनो वो क्लब के केयर टेकर को कहना चार रूम ब्लॉक कर दे. जैसन के बिज़नेस पार्टनर्स भी आ रहे हैं उसके साथ. कह रहा था यहीं रोक लें तो ठीक है."

"ओह, अच्छा, रिकी और डॉन से मिले हुए बहुत दिन हो गए."

"यू नॉटी गर्ल." रिचर्ड ने मिशेल के कुछ देर किये कथन को ही मोड़कर बोला।

दोनों हंस दिए. फिर रिचर्ड नहाने चला गया.

*************

"हे सिस !" डेविड ने खाने के बाद शैली को पुकारा।

"यस, ब्रदर डियर."

"तुमने सुना, मामा और फॅमिली आ रहे हैं."

"ओ या. कूल. पिछली बार बहुत मजा आया था साथ में. मार्क बहुत हॉट है."

"और ऐलिस बहुत स्वादिष्ट."

"हम्म्म, पापा की भी लार टपकने लगती है उसे देखकर. और तेरा कुछ बना एंजिल आंटी के साथ?"

एंजिल शैली की सहेली शिरीन की माँ थी. डेविड उसकी माँ के चक्कर में था.

"कल बुलाया है घर में कुछ सामान एडजस्ट करने के लिए. तुम और शिरीन कल कोई मूवी देखने चले जाओ. "

"अच्छा जी! और मुझे क्या मिलेगा?"

डेविड ने उसके कान में कुछ फुसफुसाया.

"ओके, मैन. डन. मैं उसे मूवी ले जाऊँगी और रात में तेरी मूवी देखूँगी."

डेविड ने अपनी हर आंटियों के साथ चुदाई का वीडियो बनाता था. इनका तात्पर्य मात्र मनोरंजन होता था. शैली को इनका ज्ञान था और वो कभी कभी उनका उपयोग भी करती थी.

"ओके गुड नाईट."

दोनों अपने अपने कमरों में चले गए.

**********

दो सप्ताह बाद:

मिशेल ने दरवाज़ा खोला तो अपने बड़े भाई जैसन को खड़ा देखा. उसके साथ कुछ सूटकेस भी थे.

"जैसन!" मिशेल ने ख़ुशी दिखते हुए कहा, "कैसे हो?"

"बहुत अच्छा!" जैसन ने अपनी बहन को बाँहों में लेकर कहा.

और फिर उसने मिशेल को अपनी बाँहों में उठा लिया. मिशेल उसके ताकतवर शरीर में सिमट गई. मिशेल ने अपनी बाहें जैसन के गले में डाल दीं। उसे उठाए हुए जैसन सोच रहा था कि हालाँकि वो हमेशा उसे अपनी बेबी समझता था, पर अब उसे देखकर उसकी परिपक्वता का अहसास होता था. ये सोचते हुए उसका लंड खड़ा होने लगा. मिशेल के चेहरे पर मुस्कान आ गई.

उसने मन में सोचा, "मेरा ठरकी भाई, फिर चुदाई के बारे में सोचने लगा है."

जैसन ने उसे नीचे उतारा और ध्यान से देखा. अब चूँकि वो घर में अकेली थी और ये अनुमान किये हुए थी कि जैसन २ घंटे बाद आएगा, तो वो एक हलके टॉप और शॉर्ट्स ही पहने हुए थी.

"तुम इन कपड़ों में बिलकुल गुड़िया लग रही हो."

"मैं इनके बाहर और भी अच्छी लगती हूँ, लोग तो यही कहते हैं."

"तुम पिछले ६ महीने में बहुत अच्छी लगने लग गई हो, मिशेल." जैसन बोला, "इतना जितना कि तुम सोच भी नहीं सकते." उसने मन ही मन सोचा.

"ईव और बच्चे कहाँ है?" मिशेल ने पूछा.

"वो थोड़ा कुछ सामान लेने के लिए रुक गई. आ जाएगी १ घंटे में."

"अरे मैं भी कितनी बुद्धू हूँ, बाहर खड़ा किया हुआ है. अंदर आओ और विश्राम करो."

मिशेल अंदर की ओर मुड़ी और जैसन उसके पीछे हो लिया. वो मिशेल के मटकते हुए नितम्ब देखकर विचलित हो गया. सोचने लगा की वो उनके साथ क्या क्या न करेगा. अपने बैग उसने बाहर ही छोड़ दिए.

"सब लोग कहाँ हैं?" जैसन ने पूछा।

'रिचर्ड तो ऑफिस में है, शैली अपनी सहेली के घर गई है, आएगी शाम तक. डेविड स्विमिंग पूल में तैर रहा है."

"हाँ गर्मी तो बढ़ गई है."

"चाहो तो उसको ज्वाइन कर लो पूल में."

"अभी नहीं. बाद में देखेंगे. अभी बहुत थकान है. अगर एक ड्रिंक मिल जाये तो अच्छा लगेगा." सोफे पर लुढ़कते हुए जैसन ने कहा.

मिशेल ने जैसन को उठाया और ऊपर के एक कमरे में ले गई. "ये तुम्हारा और ईव का कमरा है. मार्क सामने के कमरे में रहेगा. लड़कियों को मैंने एक साथ कर दिया है."

"थैंक्स, सिस!" जैसन ने अपने बैग बिस्तर पर रखते हुए कहा.

"तुम फ्रेश हो जाओ, और फिर नीचे आओ. कॉफी या ड्रिंक जो भी इच्छा हो, ले लेना. मुझे घर की सारी न्यूज़ और गॉसिप चाहिए."

मिशेल ने जैसन के होठों पर एक हल्का सा चुम्बन जड़ा और चली गई. बाहर डेविड ने अपने कसे शरीर को स्विमिंग पूल से बाहर खींचा और तौलिये से पोंछते हुए घर की ओर आने लगा. वो अपने मामा के परिवार के बारे में ही सोच रहा था. ऐलिस के बारे में सोचकर उसका लंड अकड़ने लगा. उसकी मामी भी कुछ कम न थी, झरहरी और हर अंग मानो नपा तुला हो.

"ये दो हफ्ते सच में बहुत आनंद दायक होने वाले हैं." उसने मन में सोचा.

घर में प्रवेश करते ही उसकी ऑंखें रसोई की ओर गयीं जहाँ उसकी माँ मिशेल कुछ काम कर रही थी. शॉर्ट्स में उसकी हिलती हुई गांड देखकर डेविड के लंड का हाल और बुरा हो गया. वो चुपके से मिशेल के पीछे गया और बाएं हाथ से एक मम्मा पकड़ लिया और दाएं हाथ सी उसकी चूत को कपडे के ऊपर से ही मसलने लगा.

"मॉम, कैन वी फक?" पलक झपकते ही उसे अपने दाएं हाथ में कुछ गीलापन महसूस हुआ.

"डेविड, नो !" मिशेल ने फुसफुसाते हुए कहा.

"क्या हुआ, मॉम. क्या मन नहीं है? "

"नहीं बेटा , जैसन आ गया है अभी 15 मिनट पहले. हमें अब संयम रखना होगा. समझे।"

पर डेविड ने रुकने की जगह अपने दाएं हाथ से मिशेल को चूत को मुट्ठी में ले लिया.

"तो हम अब ये सब नहीं कर सकते, मॉम?" डेविड ने चूत पर दबाव बढ़ाते हुए पूछा.

"मेरा भी बहुत मन है, मैंने सोचा था की जैसन २ घंटे बाद आएगा और हमारे पास समय रहेगा. पर वो पहले ही आ गया. हम अब कुछ नहीं कर सकते. समझो प्लीज."

"अरे वो सो गए होंगे इतनी लम्बी फ्लाइट के बाद, चलो एक राउंड लगाते हैं."

"नहीं, बिलकुल नहीं. बाद में. प्रॉमिस. जब सब सो जायेंगे."

"ओके मॉम"

डेविड को भी समझ में आ गया कि उसकी माँ, पिता और बहन के बीच जो है, उसे किसी को पता नहीं चलना चाहिए.

"आज रात, पक्का. अपनी ताकत बचा कर रखना।"

मिशेल ने अपने कपडे बदलने के लिए अपने कमरे ओर प्रस्थान किया. उसे चिंता थी की जैसन उसे इस गीली शॉर्ट्स में देख न ले. पर देर हो चुकी थी. जैसन ने जब डेविड की आवाज़ सुनी थी तो वो नीचे आ गया था उससे मिलने. पर उसने जो सुना उसके बाद उसका मन प्रसन्न हो गया. उसे अपने बेटे मार्क, पत्नी ईव और बेटी ऐलिस की याद आ गई. खास तौर पर पत्नी ईव की जिसे लम्बे चौड़े पुरुष जिनके लंड बड़े और मोटे हों अत्यंत लुभावने लगते थे. और जैसन को कमसिन लड़कियों में ज्यादा दिलचस्पी थी, वो भी लंड के मामले में कम नहीं था, वर्ना ईव उससे शादी कभी न करती. दोनों आपसी अनुमति से बाहर भी सेक्स का सुख उठाते थे. और कई बार एक साथ.

अब डेविड और मिशेल की बातें सुनकर उसे नई आशा दिखी कि जो हुआ अच्छे के लिए हुआ. पिछली बार दोनों परिवार निकट आने से कुछ ही दूर रह गए थे. समय के अभाव के कारण वो अंतिम सीमा पर न कर सके थे. पर ये अवश्य ही था कि वो इस बार चुदाई करने वाले थे, एक परिवार के रूप में.

"हमम्म , ये दो हफ्ते बहुत आनंदकर होने वाले हैं." सोचते हुए जैसन ने मिशेल के कमरे की ओर चल दिया.

कमरे का दरवाज़ा हल्के से ही अटका था. अंदर मिशेल कपडे बदल रही थी. इतने में ही जैसन को उसकी चूचियों और कसी गांड का दर्शन हो गया. उसका हाथ अनायास ही अपने लंड पर गया और वो उसे पैंट में ठीक करने लगा. मिशेल ने एक हल्की सी ड्रेस निकाली और पहनने लगी. ऐसा करने में जैसन को उसकी पनियाई हुई चूत भी दिख गई. घर के वातावरण के कारण आजकल मिशेल अंगवस्त्र नहीं पहनती थी.

"अब बहुत हो गया. इसे अब चोदना ही होगा। नहीं तो मैं पागल हो जाऊँगा." सोचते हुए जैसन मिशेल के पीछे गया और उसे बाँहों में ले कर उसके मम्मे दबाने लगा. मिशेल बिचक गई.

"डेविड, मैंने मना किया न. रात में चोद लेना मुझे, प्लीज अभी छोड़ो. जैसन कहीं देख न ले ".

"अब देर हो गई, सिस डियर!" जैसन ने उसके कान में हलके से फुसफुसाया और अपने हाथों से मम्मे दबाना चालू रखा, “ये जैसन ही है.”

मिशेल के मुंह से एक हलकी सी कराह निकल गई. जैसन अब उसके मम्मे और घुंडियां मसल रहा था.

"जैसन तुम! मैंने सोचा कि..." वो रुक गई "तुम यहाँ क्या कर रहे हो?"

"वही जो हम कई बार पहले भी कर चुके हैं,"

"नहीं जैसन, अब नहीं. प्लीज." मिशेल ने ऐतराज़ जताते हुए कहा. पर उसे जैसन का लंड पीछे से कड़ा होते हुए अनुभव हो रहा था.

"तो कब, स्वीट सिस? रात तो तुमने डेविड को प्रॉमिस किया है." जैसन ने एक हाथ से मिशेल के मांसल नितम्ब दबाते हुए पूछा.

"अहम्म्म्म" मिशेल को उत्तर नहीं सूझा. फिर यकायक उसने जैसन के मुंह को अपनी और खींचा और एक गहरा चुम्बन लिया.

"सच है, अभी जैसा कोई समय नहीं. मैं तुम्हें चोदना चाहता हूँ. अभी. शायद मुझे दुनिया में अभी कुछ और नहीं चाहिए." जैसन ने आग्रह किया.

"उउउउउउउह, मैं भी चाहती हूँ जैसन. पर ईव और बच्चे"

"उनकी चिंता न करो, वो इतनी जल्दी नहीं आने वाले। आ जाओ."

"इन कपड़ों के साथ? तुम कपड़े तो निकालो."

जैसन की ऑंखें मिशेल पर से हठ नहीं रही थीं. मिशेल आकर उसके गले लग गई.

"ओह जैसन! कितने दिनों बाद मिले हो. तरस गई थी मैं तुम्हारे लिए."

"मैं भी, सिस, मी टू. पर अब दो सप्ताह यहीँ हूँ. और तुम्हारे परिवार में अब लगता है म्हारे देश का खुलापन भी आ गया है, तो हम इसका पूरा बेनिफिट लेंगे."

जैसन ने जल्दी में अपने कपड़े उतारे और मिशेल को चूमते हुए उसे बिस्तर पर लिटा दिया. मिशेल के दोनों पांव फैलाकर अपना मुंह मिशेल की सुबकती चूत पर रखा और भूखों की तरह चाटने लगा. मिशेल की चूत तो पहले ही से पनियाई हुई थी, जैसन की जीभ अंदर जाते ही उसने पानी छोड़ दिया. मिशेल से भी अब रहा नहीं जा रहा था. डेविड ने उसके शरीर की अग्नि को प्रज्ज्वलित कर दिया था. अब वो चाहती थी कि जैसन देर न करे और जल्दी से उसे चोद दे, जैसे कि उसका बेटा और पति चोदते हैं.

"ओहहहह जैसन, माई डार्लिंग ब्रदर. अब मुझे चोद ही डालो, मुझसे सहन नहीं हो रहा. पुट योर कॉक इन माई पूसी."

जैसन ने दो उँगलियों को उसकी चूत में चलते हुए हलकी गर्जना के साथ कहा," येअहह बेबी सिस , मैं अब अपने मोटे लंड से तुम्हारी पूसी की धज्जियाँ उड़ा दूंगा."

"प्रॉमिसेस, प्रॉमिसेस!" मिशेल ने मचलते हुए उत्तर दिया, "बोलो मत करके दिखाओ."

"अपने पाँव और फैलाओ. क्योंकि बिग ब्रदर अपना ये लंड तुम्हारी चूत में पेलने वाला है."

जैसन ने अपना लंड चूत के मुंह पर रखा और धीरे धीरे अंदर डालने लगा.

"तुम्हें मेरा लंड बहुत पसंद है न, सिस ?"

मिशेल ने हामी भरी.

"अब पेल दो पूरा, अब देर मत करो, फक मी लॉन्ग एंड हार्ड."

"ओके, सिस ! एज़ यू विश." कहते हुए जैसन ने एक लम्बा शॉट मारा और पूरा लंड अंदर पेल दिया.

"आह!" मिशेल ने सीत्कार भरी. "क्या तुम ऐलिस को भी ऐसे ही चोदते हो?"

"एह एह यह." जैसन ने अपने लंड को अंदर बाहर करते हुए कुछ बुदबुदाया.

"तुम्हें उसकी चूत का स्वाद बहुत पसंद होगा, है न?" मिशेल ने जैसन को उकसाते हुए पूछा, "उउउउउउउह, फक!'

"और तुम्हें डेविड के लंड का स्वाद पसंद होगा. क्यों, सिस ?" जैसन ने प्रश्न किया.

"बहुत ज्यादा, मामा। " डेविड ने पीछे दरवाज़े से टिप्पणी की. "अरे मॉम, तुम चुदते हुए इतना हल्ला क्यों करती हो? मुझे किचन तक सुनाई दे रहा था."

मिशेल ने डेविड की ओर सिर किया तो देखा वो दरवाज़े से टेक लगाकर मुस्कुरा रहा था. स्विमिंग ट्रंक्स में से उसका तना हुआ लौड़ा टेंट बनाये हुआ था. जैसन की तो साँस रुक गई. उसने धक्के मारना बंद कर दिया और हतप्रभ खड़ा हो गया.

"डेविड!" मिशेल ने डांटने के अंदाज़ में कहा, "तुम दरवाज़ा खटखटाना कब सीखोगे? तुमने तो हमें डरा ही दिया."

डेविड ने उनकी बात को नकारते हुए जैसन को सम्बोधित किया, "हेलो जैसन अंकल, मॉम की चूत बहुत स्वादिष्ट और रसीली है, है न?"

जैसन और मिशेल इस प्रश्न पर हक्के बक्के हो गए.

अंततः मिशेल ने कहा "डेविड, इतनी अश्लीलता की कोई ज़रुरत नहीं थी. "

"पर आपको तो मेरी ऐसी ही बातें पसंद हैं न मॉम?" डेविड ने अपनी माँ के पास बिस्तर पर बैठकर उसके नंगे शरीर को भूखी आँखों से देखकर कहा, "और दूसरी बात ये कि ये सच है. हैं न जैसन अंकल?"

जैसन ने हकलाते हुए कहा, "ह ह ह हाँ. सच तो है." जैसन थोड़ा अजीब सा मह्सूस कर रहा था. यहाँ वो अपना लंड अपनी बहन की चूत में डाले खड़ा था और उसका भांजा ऐसे बातें कर रहा था जैसे ये साधारण घटना हो. हालाँकि रसोई में सुनी बातों से उसे अनुमान था कि ऐसा सम्भव है, परन्तु देखना और सुनना एक भिन्न अनुभव होता है.

"चोदने में भी बहुत मजा आता है न?"

मिशेल ने डेविड के पेट पर कोहनी मारी। "तुम बहुत नटखट हो रहे हो."

"क्या मॉम, चुदवा तुम रही हो और नटखट मैं. वाह क्या तर्क है."

सुनकर तीनों हंसने लगे. मिशेल ने डेविड को पास खींचकर उसे अपनी बाँहों में भर लिया.

"तुम क्या स्विमिंग से सीधे आ गए हो? तुम अपने कपडे निकाल ही दो, पूरा बेड गीला हो रहा है."

"अब आपने सार्थक बात की है, मॉम"

डेविड ने अपने स्विमिंग शॉर्ट्स को उतार फेंका. मिशेल के मुंह से लार टपकने लगी. जैसन भी उसके बलिष्ट शरीर और तगड़े लंड को देखकर इम्प्रेस हुआ. ईव इससे चुदवाती हुई कैसी दिखेगी? ये सोचकर उसका लंड और तन गया, और इसे मिशेल ने भी अनुभव किया. मिशेल को दो लौडों से एक चुदने में बहुत आनंद आता था. पति और पुत्र के साथ तो वो चुदवाती ही थी, पर आज वो उसके भाई और बेटे से चुदेगी तो सोने पर सुहागा होगा! मिशेल ने दोनों लंड अपने हाथों में ले लिए.

"क्या दमदार हथियार हैं ये दोनों. समझ नहीं आता कि किसे पहले चूसूं."

"फर्स्ट कम, फर्स्ट सर्वड, मॉम। तो पहले जैसन अंकल. वैसे भी वो हमारे गेस्ट हैं तो पहले उनकी ही सर्विस होनी चाहिए."

"क्या संस्कार दिए हैं तुमने अपने बच्चों को, सिस !" जैसन ने व्यंग्य से हँसते हुए कहा.

"तुम इसे अच्छे से समझ लो, बिग ब्रदर." जैसन को बिस्तर पर लिटाते हुए मिशेल ने कहा, "क्योंकि अगले दो सप्ताह हम सब एक दूसरे को बहुत अंतरंग रूप से जानने वाले है." ये कहकर मिशेल ने बिस्तर पर घुटनों के बल होकर जैसन का खड़ा लंड अपने मुंह में गपक लिया.

पीछे से डेविड ने मिशेल के पिछवाड़े का निरीक्षण किया। दोनों नितम्बो की गोलाईयों पर प्यार से हाथ फिराते हुए उसने अपने दाएं हाथ से चूत की पंखुड़ियों पर घर्षण आरम्भ किया. मिशेल ने अपने पांव थोड़े और फैला दिये. डेविड ने उस आनंद की गुफा को फड़फड़ाते हुए महसूस किया.

"ये लंड माँग रही है." उसने सोचा. “परन्तु जैसन अँकल को ही पहले चोदना चाहिए. वैसे भी मैंने उनकी चुदाई में रोक भी लगाई है.”

मिशेल ने पीछे मुड़कर डेविड के चेहरे के भाव देखे. वो जान गई की डेविड को क्या चाहिए था. पर आज वो पहले अपने भाई से चुदवाने के लिए कटिबद्ध थी. उसे डेविड का दिल तोडना पड़ा.

"डेविड, सन. थोड़ी देर मेरी चूत से खेलो जब तक में तुम्हारे अंकल के लंड को तैयार कर लूँ। "

"मॉम, मैं तो इसे चोदना ज्यादा पसंद करूंगा." डेविड ने मायूसियत से कहा, "पर कि अंकल गेस्ट हैं और उनको पहले हक़ है."

"डेविड, प्लीज मुझे चुदने के लिए तैयार करो. बदले में तुम जो चाहोगे मैं करूंगी."

"ओके, मॉम, डील." गांड लुपलुपाते छेद पर नज़र डालकर डेविड ने अपनी उंगलियां मिशेल की खुली चूत में डाल दीं।

मिशेल ने फिर अपना ध्यान जैसन के लण्ड को चूसने में लगाया. मिशेल इस कला में पारंगत थी. कुछ ही समय में जैसन की हवा निकल गई. उसका पानी छूटने लगा और वो मिशेल के मुंह में ही झड़ गया. मिशेल ने बिना किसी आपत्ति के सारा रस पी लिया. नीचे उसकी चूत अब बेचैन हो रही थी. उसने एक बार फिर से चाट चाट कर जैसन के लंड को तैयार किया.

“एक बार झड़ चुके हो ब्रो डियर, अब लम्बी चुदाई कर सकते हो. प्लीज फक मी नाउ! अब वेट नहीं हो रहा."

"और मेरा क्या, मॉम ?"

"तुम माय डियर सन, कम टू मम्मी. मैं तुम्हारा लंड को चूसूंगी."

"ओह येह!"

जैसन ने उसकी चूत में लंड पेला और डेविड ने उसके मुंह में लंड पेलना आरम्भ कर दिया. सब इतने उत्तेजित थे, कि कुछ ही क्षणों में द्रुत गति पकड़ ली. पर इस आसान में मिशेल को परेशानी हो रही थी, तो उसने दोनों को रोका, डेविड को लिटाया और घोड़ी के आसन में उसका लंड मुंह में भर लिया. जैसन ने पीछे जाकर उसकी चूत में लंड वापिस पेल दिया और जबरदस्त धक्के लगाने लगा.

"ओह्ह्ह्हह, आआआआह जैसन, तुम कितने अंदर तक दस्तक दे रहे हो. चोदो जोर से, हार्डर ब्रदर हार्डर। "

"माँ चिल्लाओ मत, मेरा लंड चूसो."

"मममममपहहहफ़फ़फ़फ़फ़."

"तुम्हारी चूत तो बहुत कसी हुई है." जैसन धक्कों के साथ बोला।

"बिलकुल टीन-एजर लड़कियों की तरह, है न अंकल? ये सब मम्मी की विशेष व्यायाम का कमाल है. केजेल एक्सरसाइज का."

"सच में, ऐसा लग रहा है की लंड वैक्यूम क्लीनर में हो. प्लीज़ ईव को भी सीखा देना।"

“अवश्य सीखा दूँगी.”

परन्तु मिशेल अब झड़ कर अपने घर के काम में लगना चाहती थी. सबकी सहमति से बाद में कभी भी चुदाई की जा सकती थी. न जाने कब ईव और बच्चे आ जाएँ और अवसर आपदा बन जाये. उसने दोनों को उकसाते हुए तेज होने को कहा.

"अब ये कमेंटरी बंद करो और फटाफट चोदो , मैं झड़ने के निकट हूँ."

"ओके" मामा भांजा एक स्वर में बोले और लगे धुआंधार चुदाई करने.

कुछ ही क्षणों में मिशेल चीखती हुई झड़ गई. ये देखकर जैसन और डेविड भी गति बढ़ाते हुए शिखर पर पहुँच गए. पहले जैसन का पानी छूटा. उसके पानी से जैसे मिशेल की चूत में झील बन गई. और फिर डेविड ने उसके मुंह में अपना पानी छोड़ दिया. मिशेल ने लगभग पूरा पी लिया, जो बचा उसे अपने मुंह पर मल लिया.

"आज मेरे प्रोटीन शेक के दो डोज़ हो गए." उसने संतुष्टि से कहा.

"अभी और बाकी हैं मॉम. अभी मॉर्निंग ही है."

"चलो, अब हटो और मुझे रेडी होने दो."

तीनों ने फटाफट कपडे पहने, और कमरे के दरवाज़े को खोला तो स्तब्ध रह गए. सामने रिचर्ड और शैली खड़े थे और मुस्कुरा रहे थे. जैसन हड़बड़ा गया. पर शैली ने उसे गले लगा लिया. और गाल पर एक चुम्बन दिया. रिचर्ड ने अपना जैसन के हाथ से मिलाया.

"लगता है तुम्हारी बहन ने तुम्हे वेलकम पार्टी दे दी है. वेलकम टू अवर होम, ब्रो इन लॉ. " रिचर्ड ने आंख मारते हुए कहा.

जैसन ने थोड़ा सकुचाते हुए रिचर्ड से हाथ मिलाया।

“अगर थके न हो तो, एक ड्रिंक हो जाये.” रिचर्ड ने आग्रह किया.

“ठीक है.”

जीजा साले बैठक में अपनी ड्रिंक लेकर बैठ गए.

रिचर्ड: “मुझे तुम्हारे और मिशेल के पूर्व संबंधों के बारे में पहले से पता है. उसने मुझे विवाह से पहले ही सब कुछ बता दिया था. और अब तुम ये भी जान गए होगे कि हमारे घर में भी हम सब एक दूसरे के साथ चुदाई करते हैं. मेरा और मिशेल का ये समझौता भी है कि हम बाहर भी किसी से सेक्स कर सकते हैं, कुछ नियमों को मानकर.”

जैसन: “अच्छा.”

रिचर्ड: “तुम तो जानते हो साउथ अफ्रीका में उन्मुक्त सेक्स का चलन है. इसी कारण हम दोनों ने एक दूसरे को कभी रोका नहीं. परन्तु, ये बात बाहर भी किसी को पता न हो, इसीलिए हम अन्य लोगों से संबंध इस नगर में नहीं करते. अब जब तुम यहाँ हो तो समस्या नहीं रहेगी. हालाँकि तुम्हारा संघर्ष मेरे और डेविड के समय से भी होगा. ये तो हमारी बात हुई. क्या तुम ये सब मैनेज कर पाओगे? तुम्हारे घर में कैसा वातावरण है?”

जैसन: “मैं जैसे आपकी बात सुन रहा था तो मुझे लग रहा था कि आप मेरे ही शब्द बोल रहे हैं और मेरे ही परिवार की बात सुना रहे हैं. हमारी भी एकदम यही जीवन शैली है. ईव और मैं एक क्लब के सदस्य भी हैं जहाँ हम अदला बदली करके एक दूसरे की पत्नियों को चोदते हैं. ये हमारे लिए और भी सटीक बैठता है क्योंकि मुझे अफ़्रीकी औरतें बहुत भाती हैं, और ईव को पुरुष.”

“हाँ, मिशेल बता रही थी कि ईव को लम्बे,कड़क और तगड़े लंड बहुत पसंद हैं. इसीलिए उसने तुमसे शादी भी की थी क्यूंकि तुम इस विभाग में वरदान प्राप्त है. “मार्क और ऐलिस भी इसमें भाग लेते हैं?”

“हाँ आपके पिछले बार आने के बाद एक और शयनकक्ष बनवाया है जिसमे हम चारों एक साथ चुदाई कर पाते हैं. इसका उपयोग हम सप्ताह में १-२ दिन कर ही लेते हैं. परन्तु वो कक्ष केवल हम चारों के ही लिए है. ईव तो अब कह रही है कि वहीँ सोने लगें, पर उसमे बिस्तर के सिवाय कुछ और लगाने का स्थान ही नहीं है.”

“आइडिया बहुत अच्छा है, हमने तो पहले ही ऐसा एक क्रीड़ांगन बनवा लिया था, नीचे तलघर में. आओ, तुम्हें दिखाता हूँ.”

ये कहकर रिचर्ड ने ड्रिंक समाप्त की और खड़ा हो गया और जैसन को लेकर तलघर में चला गया.

नीचे पहुंचकर जैसन की ऑंखें चौंधिया गयीं। तलघर इतना बड़ा था, जितना कि ऊपर का पूरा घर. उसके अंदर एक आधुनिक जिम था, एक छोटा तरण ताल, एक बार जिसमें अभी कोई बोतल नहीं थी. एक छोटी रसोई जिसमें फ्रिज और डीप फ्रिज थे. उसमे बारबेक्यू करने का भी प्रबंध था, और एक प्रोजेक्टर था.

एक कांच से बना हुआ कमरा था जो कि काफी बड़ा था. अंदर दो बड़े टीवी थे और बड़े बड़े सोफे लगे हुए थे. ये सोफे कम और बिस्तर अधिक लग रहे थे. इतना विहंगम दृश्य देखकर जैसन सम्मोहित ही गया.

“ब्रो, दिस इस अमेजिंग. यहाँ पार्टी भी करते हो क्या?”

“हाँ घर की पार्टियां यहीं होती हैं.” रिचर्ड ने आँख मारते हुए कहा, “बाहर की भी पार्टी में इधर ही करते हैं, पर उस समय हम कुछ परिवर्तन कर देते हैं.”

“ईव तो इसे देखकर पागल ही हो जाएगी. पर ये रह कहाँ गई है? दो घंटे होने को आये, अभी तक न जाने कहाँ है. ऐलिस भी साथ में ही है. मार्क का भी कुछ पता नहीं.” उसने फोन निकाला तो सिग्नल नहीं था.

“ऊपर चलकर कॉल करता हूँ.”

ऊपर आने के पश्चात् उसने ईव को फोन मिलाया.

क्रमशः

1128200
 
अध्याय ५: पाँचवाँ घर - शोनाली और जॉय चटर्जी १

दृश्य १

समय: शाम के आठ बजे

स्थान:घर में .


हलकी मद्धिम प्रकाश से नहाये हुए कमरे में तीन लोग थे. एक नंगी स्त्री अपने पांव फैला कर लेटी हुई थी. एक दूसरी स्त्री, जो उस ही की तरह नंगी थी, उसके ऊपर लेटी थी और उसकी जांघों के बीच अपना चेहरा छुपाये हुए थी. पहली स्त्री अपने मोटे और गुदाज मम्मों को अपने ही हाथों से मसल रही थी. बीच में रह रह कर वो दूसरी स्त्री का सिर अपने जांघों के बीच में जोर से दबा देती. उसके मुंह पर दूसरी स्त्री अपनी चूत लगाए हुए थी जिसे वो बड़ी बेसब्री और प्यार से अपनी जीभ से कुरेद रही थी. दूसरी स्त्री बीच बीच में सिहर उठती थी. उसकी सुन्दर मखमली नितम्बों के बीच इस समय एक लम्बा और मोटा लंड घुसा हुआ था जो उसकी गांड के अंदर आवागमन कर रहा था.

"सागरिका, तुम बार बार मेरी चूत से अपना मुंह क्यों हटा लेती हो?" नीचे वाली स्त्री ने शिकायत से कहा.

"बुआ, अभी थोड़ी देर में जब हमारी जगह बदलेगी और पापा का ये लौड़ा तुम्हारी गांड फाड़ रहा होगा न तब मैं भी तुमसे यही पूछूँगी."

सुमति हल्के से हंस दी. "अभी देर है उसमें. जॉय तेरी गांड को इतनी जल्दी नहीं छोड़ने वाला. मेरा नंबर आने में अभी समय है. ऊई माँ. काटती क्यों है! "

सागरिका ने अपना सिर घुमाकर पीछे अपने पिता को प्यार से देखा. "पापा थोड़ा तेज करो न. मेरी गांड में खुजली हो रही है आपके इतना धीरे करने से."

"ओके, बेटी." कहकर जॉय ने अपनी गति थोड़ी बड़ा दी. पर बहुत नहीं. उसे अपनी बेटी की अपेक्षा का अच्छे से पता था. उसे पता था की कब और कितना गहरा और तेज़ जाना है.

दृश्य २: उसी दिन दोपहर ४ बजे.

स्थान: दिंची क्लब


दिंची क्लब में आज नए सदस्य का साक्षात्कार था. ये एक बहुत ही विशिष्ट क्लब था, जिसकी सदस्यता मात्र और एकमात्र अनुशंसा या आमंत्रण से मिलती थी. इस समय इसके मात्र १३ सदस्य थे. ये सभी महिलाएं थीं. १५ युवक भी थे परन्तु उनका विवरण और पद सदस्य नहीं था, इन्हें रोमियो की उपाधि दी गई थी. इस क्लब का विचार और संकल्पना शोनाली की थी. परन्तु इसका सञ्चालन पार्थ के ही हाथ में था.

इस क्लब की विशेषता थी, इसकी सदस्यता के माप दंड.

१. इसमें स्त्रियों को ३० वर्ष की आयु से अधिक, विवाहित, तलाकशुदा, या विधवा होना आवश्यक था. अविवाहित महिलाओं को इसमें सदस्यता वर्जित थी.

२. युवकों की आयु की १९ वर्ष से २६ वर्ष की सीमा थी. २६ वर्ष के बाद उन्हें रिटायर कर दिया जाना था. हालाँकि अभी तक ऐसा हुआ नहीं था क्योंकि अभी कोई भी अगले ३ वर्ष तक २६ की आयु का नहीं होने वाला था.

३. ये वो विशेषता थी जिस के आधार पर इस क्लब का नाम रखा गया था. उस में रोमियो युवकों के लंड की लम्बाई १० इंच या अधिक होनी चाहिए थी. इस कारण इसका नाम दिंची (दस इंची) क्लब रखा गया था. पहले इसे Ten Plus का नाम देने का विचार था, परन्तु इससे शंका होने का भी था. हालाँकि इसका पूरा नाम सिर्फ चुने हुए लोगों को ही पता था.

४. इस बात का ध्यान रखने के लिए कि किसी भी तरह की सूचना बाहर न जाये, हर सदस्य के लगभग दस प्रकरण वीडियो में रिकॉर्ड किये जाते थे. इन्हे एक बहुत सुरक्षित स्थान पर रखा जाता था, जिसका पता केवल पार्थ और शोनाली को ही था. इन्हें एक क्लाउड स्टोरेज में भी रखा गया था जिसकी पहुँच भी केवल इन दोनों को ही थी.

५. क्लब का सदस्यता शुल्क २ लाख प्रति माह था और युवकों को प्रति माह १ लाख का पारश्रमिक मिलता था. इसका मात्र २५% ही उन्हें हर माह दिया जाता था, अनुबंध के अनुसार, उन्हें २९ वर्ष की आयु प्राप्त करने या क्लब से जाने के तीन वर्ष पश्चात् उन्हें उनकी शेष राशि दे दी जानी थी. नयी सदस्या का पंजीकरण शुल्क १० लाख था, जो सुरक्षा जमा राशि के रूप में ली जाती थी और छोड़ने के ३ साल बाद वापिस की जाती थी. एक वर्ष के पहले छोड़ने पर ये राशि नहीं लौटाई जाती थी.

क्लब के रखरखाव इत्यादि के व्यय के कारण अभी तक इसमें लाभ मिलना आरम्भ नहीं हुआ था. कुछ अन्य सदस्यों को जोड़ने के लिए वर्तमान सदस्याओं ने नाम सुझाये थे. उनके बारे में प्राथमिक जानकारी प्राप्त कर ली गई थी.

आज इस क्लब में एक नए स्त्री सदस्य और एक रोमियो का साक्षात्कार था. सदस्या का साक्षात्कार पार्थ दायित्व था और रोमियो का शोनाली का.

घर में :

जॉय सागरिका की मखमली गांड में अब तेज और लम्बे धक्के लगा रहा था. सागरिका एक सुखद पीड़ा से कराह रही थी. पर उसने अपनी बुआ की चूत चाटने में कोई ढील नहीं दे रही थी. उसकी चूत में सुमति बुआ की जीभ अपना जादू दिखा रही थी और उसकी गांड में उसके पिता का लंड अपना पराक्रम। इस समय वो स्वर्ग के द्वार पर थी. अचानक जॉय ने हाथ बढाकर उसकी भगनासे को दो उँगलियों से मसल दिया. बस फिर क्या था, सागरिका चरम सुख की सीमा लाँघ गई. उसने अपना मुंह अपनी बुआ की चूत में गाढ़ दिया और स्खलित होने लगी. उसके मुंह से एक भी शब्द नहीं निकला. उसका शरीर उन्माद से कम्पित हो रहा था. उसकी बुआ के मुंह में उसका ये रस पूरा भर गया.

सागरिका के इस आक्रमण से सुमति भी अब ठहर नहीं पायी और वो भी गों गों की ध्वनि करते हुए झड़ने लगी. दोनों स्त्रियों के चेहरे एक दूसरे के काम रस से भीग गए. उधर जॉय भी अब अपने आप को ज्यादा देर तक रोकने में सक्षम नहीं था. उसने सागरिका की गांड में धक्के तेज कर दिए और कुछ ही क्षणों में अपना लंड अंदर गाढ़ कर अपना पानी अपनी बड़ी बेटी की गांड में डाल दिया. सब लोग कुछ देर के लिए यूँ ही स्थिर रहे.

"सग्गू, मुझे ऊपर आने दे न." सुमति ने हिलते हुए कहा. "मुझे अपना टॉनिक लेना है."

सागरिका समझ गई की बुआ क्या चाहती है.

"बुआ, आप वहीँ रहो, मैं आपको आपकी खुराक पिलाती हूँ."

ये कहते हुए सागरिका उठी और अपनी गांड को सुमति के मुंह पर रख दिया. जॉय के लंड का प्रसाद सुमति के मुंह में गिरने लगा. जब प्राकृतिक रूप से रस गिरना बंद हुआ तो सुमति ने अपना मुंह सागरिका की गांड के छेद पर रखा और लम्बे लम्बे सांसों के साथ अंदर का रस खींचने और चूसने लगी. हालाँकि सागरिका ये कई बार कर चुकी थी पर फिर भी इस अश्लील और घिनौने कृत्य से वापिस एक बार और झड़ गई और इस पानी ने सुमति के चेहरे को नहला दिया. गांड के अंदर से सारा रस खींचने के बाद सुमति ने सागरिका को उठने को कहा.

सागरिका उठ कर एक ओर बैठ गई और लम्बी लम्बी सांसों से अपने आपको संयत करने लगी.

"दीदी, अमार की होबे (मेरा क्या होगा) ?"

"एखाने आशुन (इधर आओ )"

जॉय सुमति के पास गया तो सुमति ने बड़े प्यार से उसका लंड अपने हाथ में लिया और फिर मुंह में लेकर चाटने और चूसने लगी.

"सच में तुम्हारे लंड और सागरिका की गांड का ये मिला जुला स्वाद मुझे बहुत अच्छा लगता है."

"दीदी, मुझे आज तक नहीं समझ आया कि तुम्हे ऐसा करना कैसे पसंद है. मैं शिकायत नहीं कर रहा. पर ये इतना गन्दा काम है कि मुझे बहुत अजीब लगता है."

"हाँ बुआ. पापा सही बोल रहे हैं."

"सबके अपने अपने स्वांग होते हैं. मुझे गांड मरवाने और उसके अंदर से वीर्य पीने में बहुत आनन्द आता है. अगर वो गांड किसी और की भी हो तो मुझे अच्छा लगता है. आवश्यक नहीं कि तुम्हे भी रुचिकर लगे. पर कभी स्वाद लेना, हो सकता है इसका व्यसन लग जाये।” सुमति बोली, “मुझे अगर वो कुछ समय बाद पीने मिले तो और स्वादिष्ट लगता है. इसीलिए मैं शोनाली की प्रतीक्षा करती हूँ. उसकी गांड में जब भी क्लब जाती है तो माल एक डेढ़ घंटे पकने के बाद आता है."

सागरिका के भाव देखकर वो समझ गई कि लड़की कहीं भाग न जाये.

"हम्म्म लगता है तुझे अभी नहीं भायेगा, सग्गू, एक बड़ा ड्रिंक बना दे मेरे लिए." सुमति उठकर पास पड़े सोफे पर बैठती हुई कहती है.

सागरिका उठती है और दो ड्रिंक्स बनती है और सुमति और जॉय को थमा देती है.

"अब अच्छी बच्ची की तरह मेरी चूत और गांड चाट और अपने बाप के लंड के लिए तैयार कर."

सागरिका नीचे बैठकर अपने काम में जुट जाती है. जॉय अपने मोबाइल पर कुछ देखने में व्यस्त हो जाता है. फिर वो एक मैसेज करता है.

"कहाँ हो?"

"घर वापिस आ रही हूँ. आज एक साक्षात्कार था नए लड़के का क्लब में."

"पास हुआ?"

"अव्वल नंबर से. दीदी के लिए उपहार भी ला रही हूँ. बस ठहरो १० मिनट में पहुँच रही हूँ."

जॉय ने फ़ोन एक ओर रख दिया.

"शोनाली तुम्हारे लिए प्रसाद ला रही है, दीदी."

"वो सच में अपनी ननद से बहुत प्यार करती है."

दिंची क्लब में:

क्लब में साक्षात्कार करने के पहले दोनों सदस्यों से अलग अलग फॉर्म भरवाए गए और साक्षात्कार का शुल्क (मात्र रु १०,०००) लिया गया जिसे वापिस नहीं किया जाना था. दोनों आवेदकों को अलग अलग लाया गया था और दोनों ने एक दूसरे को देखा नहीं था.

फॉर्म के स्वीकृत होने के पश्चात्, दोनों को अलग अलग कमरे में ले जाया गया. दोनों कमरे आलीशान ५-सितारा होटल की तरह थे. दोनों कमरों में कई वीडियो कमरे लगे थे और उनका सञ्चालन दूर से कण्ट्रोल रूम से होता था. क्लब का एक वीडियो ग्राफर था जो इस तरह की फिल्में बनाने में निपुण था. महीने में तीसरे शनिवार को ही सिर्फ ये इंटरव्यू होते थे.

घर में:

बताये समय पर शोनाली घर पहुँच गई और गाड़ी पार्क करके घर में चली गई. फिर उसने जॉय को फ़ोन लाया और पता किया कि वो किसके कमरे में हैं. जानने के बाद उसने अपने कदम तेजी से उस ओर बढ़ा दिए. सुमति उसे देखकर आनंदित हो जाती है.

"मेरी प्यारी भाभी!" सुमति उससे लिपट जाती है. फिर उसे देखकर कहती है, "भाभी क्या बहुत मजा आया?"

"हाँ, बहुत बड़े लंड वाला था. मेरी गांड के तो तार ढीले कर दिए. सच कहूँ दीदी तो मैं तुम्हारे प्रसाद के ही लिए अब गांड मरवाती हूँ. किसी दिन कोई मेरी गांड सच में न फाड़ दे."

"अरे भाभी, गांड अगर तरीके से मारने वाला हो तो एक क्या दो दो लंड भी ले ले, इतनी लचीली बनाई है ऊपर वाले ने. अब समय न गंवाओ, लाओ मुझे मेरा प्रसाद खिलाओ."

जॉय और सागरिका एक साथ बैठकर इस प्रसंग को देख रहे थे. न जाने कितनी बार देखने के बाद, आज भी उन्हें घिन और रोमांच दोनों का अनुभव होता था. शोनाली ने अपने कपडे उतर कर अलग किये. सुमति तो नंगी ही थी, वो बिस्तर पर लेट गई और शोनाली ने अपनी गांड का छेद उसके मुंह पर रख दिया. सुमति ने बड़े प्यार के साथ प्लग के इर्द गिर्द शोनाली की गांड को चाटा और फिर प्लग बाहर खींच लिया. प्लग के बाहर आते ही शोनाली की गांड से निखिल का वीर्य बहने लगा. सुमति ने अपना पूरा मुंह शोनाली के गांड में डाल दिया और चूसने लगी.

"ओह शिट " इस आघात से शोनाली की गांड में कीड़े चलने लगे और उसके मुंह से अनायास ही निकला.

सागरिका दूर से खिलखिलाई. जब सुमति को विश्वास हो गया कि शोनाली की गांड में कुछ बाकी नहीं है तो उसने शोनाली की गांड पर एक चपत लगाई. शोनाली उठी और सीधे लेट गई. उसे पता था की सुमति का अगला आक्रमण कहाँ होना है. सुमति ने भूखी आँखों से शोनाली को देखा. उसके सुन्दर चेहरे और वक्ष पर एक पतली सी पपड़ी जमी थी.

"क्या मैं जो सोच रही हूँ ये वही है?"

"हाँ, आपकी खुराक. दीदी, पर इस तरह इतनी देर रहने में मुझे अच्छा नहीं लगता."

"मेरी प्यारी भाभी, इसीलिए तो मैं तुम्हें इतना प्यार करती हूँ. तुम मेरे लिए बेमन भी सब कुछ करती हो." कहते हुए सुमति ने शोनाली के चेहरे से सूखा वीर्य चाटना शुरु किया.

सागरिका ने जॉय से कहा, "आइये पापा, आपको तैयार कर दूँ, अभी बुआ बुलाने वाली है. उससे पहले ही आप छोटे भाई का कर्तव्य निभाइये और पहले ही हमला कर दीजिये."

ये कहकर सागरिका ने जॉय के लंड को मुंह में लेकर चाटते हुए अच्छे से खड़ा और गीला कर दिया. जॉय आगे रणक्षेत्र की ओर चल दिया. उधर सुमति शोनाली के चेहरे, वक्ष और पेट से चाटती हुई उसकी चूत के द्वार पर पहुंची. उसने चूत की फाँके खोलीं और सागरिका की ओर देखा. जॉय को न देखकर उसे हैरानी हुई.

"जॉ..." कहने के पहले ही जॉय ने अपना लंड एक ही झटके में सुमति की गांड में पेल दिया. सुमति की ऑंखें बाहर आ गयीं. जॉय ने शोनाली को इशारा किया और शोनाली ने सुमति के सिर पर हाथ रखकर अपनी चूत पर दबा दिया.

"चाटो मेरी चूत दीदी. उसके अंदर भी मेरे घोड़े का पानी है."

सुमति गुं गुं की आवाज़ के साथ छटपटाती हुई चूत चाटने लगी. पीछे जॉय उसकी गांड में लम्बे करारे धक्के लगा रहा था. सागरिका सोफे पर बैठी संतुष्टि में ये कामक्रीड़ा देख रही थी. शोनाली ने अपना हाथ सुमति के सिर से हटाया तो सुमति ने साँस लेने के लिए अपना चेहरा ऊपर लिया. उसका चेहरा शोनाली के रस से सराबोर था.

"तुम दोनों मुझे शॉक दिए न." उसने हल्के शिकायत भरे स्वर में कहा.

"नहीं दीदी, वही किये जो आप हर बार चाहती हैं. बस इस बार हमने पहल की. आपको बुरा लगा क्या."

"तुम्हारी चूत पीना, और अपने भाई से गांड मरवाने में मुझे क्यों बुरा लगेगा. जॉय अब तू अच्छे से पेल मेरी गांड और इसकी खुजली मिटा दे."

"बिलकुल, दी." ये कहकर जॉय ने तेज और लम्बे धक्के लगाने शुरू कर दिए.

शोनाली नीचे से उठी और फिर दूसरी ओर जाकर नीचे लेट गई और सुमति की चूत चाटने लगी. सुमति ने तुरंत ही शोनाली के मुंह पर अपना पानी छोड़ दिया. उधर जॉय भी अब झड़ने वाला था. सुमति ने उसके लंड को अपनी गांड में फूलते हुए महसूस किया.

"जॉय, मेरे मुंह में डालना, गांड में नहीं."

ये सुनकर जॉय ने अपना लंड हल्के से बाहर खींच लिया. सुमति की गांड का छेद इस समय दस रुपये की सिक्के जितना खुला हुआ था और उसकी गांड का छेद लुप लुप कर रहा था. जॉय अपना लंड लेकर सुमति के सर के पास आकर खड़ा हो गया. शोनाली नीचे से हटी और सोफे पर सागरिका के साथ बैठ गई. दोनों माँ बेटी सामने हो रहे भाई बहन की प्रणय लीला देख रहे थे. सुमति ने जॉय का लंड अपने गले तक लिया हुआ था और वो अपना सिर आगे पीछे कर रही थी. जॉय का शरीर अकडने लगा और वो कांपते हुए उसने अपनी बहन के मुंह में अपने लंड का प्रसाद छोड़ दिया. सुमति ने कुछ पिया और कुछ अपने चेहरे पर मल लिया. फिर वो थक कर लेट गई और गहरी सांसे लेने लगी.

कुछ समय पश्चात् सागरिका ने सबके लिए एक डबल ड्रिंक बनाया और इस बार खुद भी लिया.

"तो माँ, कैसा रहा आज का इंटरव्यू." सागरिका ने शोनाली से पूछा.

"एकदम फर्स्ट क्लास. और जॉय मुझे शायद अपना पहला दामाद मिल गया है. सागरिका के लिए मुझे ऐसा लड़का मिला है जो हमारे परिवार के लिए बिल्कुल उपयुक्त है."

कहकर उसने अपनी पूरी ड्रिंक एक ही साँस में समाप्त कर दी.

"और उसका नाम है ......”

“निखिल!”

“क्या?”

“वो समर्थ सिंह का नाती!”

“यस! और अब सुनो क्या हुआ.....”

क्रमशः

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अध्याय ६: छठा घर - दिया और आकाश पटेल १

घर में:

दर्शन आज कार्यालय से समय पूर्व घर लौट गया था. आकाश से आज्ञा लेने पर उसे घर जाने की अनुमति मिल गई थी. घर पहुंचा तो वहां पर नीलम चाची के अलावा कोई और नहीं था.

"चाची, सब लोग कहाँ है?"

"भाभी तो अपनी किट्टी पार्टी में गई हैं. कनिका और हितेश कालेज में हैं. तुम कैसे जल्दी घर आ गए."

"बस मन नहीं लग रहा था और कोई काम भी ज्यादा नहीं था. इसीलिए घर चला आया, एक चाय पिलाओगी चाची?"

"क्यों नहीं, मैं अपने लिए बनाने ही वाली थी. तुम मुंह हाथ धो लो, कपडे बदलना चाहो तो बदल लो, तब तक मैं चाय और थोड़ा सा नाश्ता बनती हूँ."

"ठीक है."

दर्शन अपने कमरे में जाकर मुंह हाथ धोकर, टी शर्ट और शॉर्ट्स पहन कर आ गया. तब तक नीलम ने बैठक में दोनों के लिए चाय और नाश्ता लगा दिए.

"और चाची इस सप्ताह का क्या कार्यक्रम है? कुछ रोमांचक या यूँ ही."

"अरे कुछ नहीं. मैं और भाभी अपने नए बंगले पर जा रहे हैं. भाभी कह रही थी कि हितेश और तुम्हें भी ले चलने के लिए. रात में अकेले में उन्हें वहां घबराहट होती है."

"हाँ, अभी अधिक लोग नहीं हैं वहां. दूसरा यहाँ रहने के बाद उन्हें हर जगह डर लगता है. हितेश से पूछा था?"

"भाभी ने बात की थी सुबह, वो कह रहा था की शाम को वहीँ आ जायेगा. कुछ काम है तो साथ नहीं चल पायेगा."

"और कनिका?"

“वो अपनी सहेली के घर जाएगी. कह रही थी कि अगर ८ बजे तक फ्री हो गई तो वहां आएगी, नहीं तो यहाँ."

"ये भी ठीक है."

"पापा और चाचा क्या बोले. सप्ताहांत में घर में अकेले."

"तेरे चाचा तो ओके कर दिए. तेरे पापा से भाभी ने पूछा होगा. वही बताएंगी."

"आजकल हितेश पर बहुत प्यार आ रहा है चाची। " दर्शन ने चुटकी ली.

"जब तेरे पास अपनी चाची के लिए समय ही नहीं है तो क्यों जलन हो रही है तुझे ?"

"अरे चाची एक इशारा तो करो, मैं दौड़ा चला आऊंगा."

"पहले तो बिना इशारे के ही मेरे पल्लू में बंधा रहता था."

"मैं तो अभी भी बंधा हूँ तुम पल्लू तो हटाओ." दर्शन ने मसखरी से कहा.

"ह्म्म्मम्म , चल तू अपने कमरे में जा, मैं ये सामान रखकर आती हूँ." कहकर नीलम सामान समेटने लगी और दर्शन अपने कमरे की ओर बढ़ गया.

उधर आकाश के ऑफिस में:

आकाश अपनी सेक्रेटरी मेधा को बुलाता है.

"आज के सारे ईमेल भेज दिए ग्राहकों को?"

"जी सर."

"वैसे इस सप्ताहांत में क्या कर रही हो?"

"कुछ नहीं सर, वही घर के काम और टीवी या कोई मूवी देखने चली जाऊंगी."

"घर पर आना चाहोगी, मैं और आकार ही रहेंगे. और लोग बाहर जा रहे हैं."

"सर, आप दोनों के साथ अकेले नहीं, प्लीज. पिछली बार आप लोगों ने मेरी हालत ख़राब कर दी थी. ३ दिन तक दर्द रहा था."

"हम्म्म, निशा को पूछ लो. उसे तो दो लोगों के साथ भी कोई तकलीफ नहीं होती."

"जी सर, वो मान गयी तो ठीक, नहीं तो प्लीज मुझे क्षमा करना."

"ठीक है, नो प्रॉब्लम."

निशा उसके भाई आकार की सेक्रेटरी थी. कोई ४० वर्ष की थी, पर कामुकता में उसकी कोई तुलना नहीं थी. उसके मना करने की सम्भावना कम ही थी. हुआ भी यूँ ही, कुछ देर में मेधा ने आकर कहा कि निशा आएगी. मेधा ने भी आने का विश्वास दिलाया.

"वैरी गुड. मेधा, ये तुम मेरे कहने पर बेमन से तो नहीं...."

"नो सर, पर मैं एक को ही संभाल सकती हूँ. निशा जी की तरह मैं इतनी अनुभवी नहीं हूँ."

"ओके. मुझे बुरा लगेगा अगर तुम दबाव में ऐसा करोगी तो. चलो फ्राइडे को साथ चलेंगे।"

“जी.”

आकार के ऑफिस में:

"सर, मेधा ने इस शुक्रवार को आपके घर आने को कहा है." निशा ने पास आकर आकार से कहा.

"आहा, बहुत खूब. भैया प्लान बनाने में नंबर वन है."

दिया की किट्टी पार्टी:

"और सबीना, तेरा क्या चल रहा है आजकल. तेरे तो पति दुबई में हैं पर तेरा चेहरे से तो बहुत संतुष्टि झलक रही है."

"अब तुम लोगों को तो सब पता है. मेरे तीनों भतीजे आजकल मेरे ही साथ रहते है. आये तो ये कहकर थे कि पढाई पूरी करनी है, पर हरामखोर मेरे और सना पर ही चढ़े रहते हैं दिन रात."

"तभी तेरी बेटी की जवानी निखरी जा रही है. और तेरी तो जैसे आयु ही दस साल कम हो गयी लगती है. लगता है खूब प्रोटीन पीती है." सभी सहेलियां हंसने लगीं.

"वैसे जवानी तो गुप्ता आंटी की भी नहीं जा रही. इस उम्र में भी आपके जलवे कायम हैं."

श्रीमती गुप्ता किट्टी की सबसे वृद्ध सदस्य रहीं. कुछ ६५ की होंगी, विधवा थीं पर उनकी सुखवादी प्रकृति दूसरों के लिए एक उदाहरण था. उनके घर में तीन नौकर थे: एक नौकरानी, एक बावर्ची और एक ड्राइवर. जानकार ये मानते थे की बावर्ची खाना तो बनाता ही था पर इनकी भट्टी की आग भी बुझाता था. उसी तरह ड्राइवर केवल इनकी गाड़ी में इन्हें सवारी कराता था, बल्कि इनकी भी सवारी करता था. और नौकरानी सफाई में निपुण थी, सुना था कि वो कुछ खास स्थानों में लगे श्वेत चिपचिपे पदार्थ को तो चाट चाट कर साफ करती थी.

"अरे, तुम कौन मुझसे कम हो? घर बाहर सब तरफ तो लगी रहती हो खेल में."

यूँ ही सब एक दूसरे के प्रेम प्रसंगों की बातें करती रहीं.

"और दिया, तेरा क्या चल रहा है."

"अरे कुछ खास नहीं, इस सप्ताहांत में मैं और नीलम उसके गेटवे वाले बंगले पर जायेंगे."

"ओह हो हो! कौन होगा तुम्हारे साथ?"

"हितेश और दर्शन जायेंगे."

"तब तो तुम दोनों की खूब अच्छी खातिर करेंगे दोनों."

"हाँ, वैसे तो घर में भी करते हैं, पर इस बार नीलम कह रही थी कि उसने कुछ और भी सोचा है."

"बाहर से लौंडे बुलाएँ होंगे उस चुड़क्कड़ ने."

"पता नहीं. जो भी है. उसी दिन पता चलेगा."

यही सब करते करते खाते पीते समय हो गया और सबने नए अनुभवों और मसाले के साथ अगली किट्टी तक के लिए छुट्टी ली.

घर में:

थोड़ी देर बाद नीलम सब कुछ समेट कर दर्शन के कमरे में प्रविष्ट हुई. दरवाज़े से अंदर जाते ही वो ठिठक गई. दर्शन बिस्तर पर नंगा होकर लेटा हुआ था और अपने लंड को सहला रहा था. इस समय उसका लंड ९० अंश के कोण पर खड़ा हुआ था. नीलम ने दरवाज़ा बंद किया.

"बड़ा बेसब्र हो रहा है तू?"

"अरे चाची ३ दिन हो गए हैं तुम्हें चोदे हुए. बेसब्र क्यों नहीं होऊंगा?"

नीलम ये जान कर खुश हो गई कि दर्शन को उसे चोदे बिना दिन गिनने पड़ते है.

"क्यों? क्या और कोई नहीं मिली तुझे इन ३ दिनों में. तेरा तो एक दिन भी नहीं चलता." नीलम अपने कपड़े निकालते हुए बोली.

"अरे वो सब तो टाइम पास है चाची, असली भोग तो तुम हो."

"बड़ा मस्का मार रहा है चाची को. तेरे इरादे ठीक नहीं लगते कुछ. क्या करेगा रे तू मेरे साथ.?" नीलम ने नंगे होकर बिस्तर पर पास में बैठते हुए पूछा.

"पहले चाची की चूची पियूँगा. फिर चाची की चूत पियूँगा."

"फिर?"

"फिर चाची से लंड चुसवाऊँगा, और चाची की गांड चाटूँगा."

"और फिर?"

"फिर की माँ की चूत." कहते हुए दर्शन ने नीलम को पकड़कर बिस्तर पर धकेल दिया और उसके होंठ चूमने लगा.

फिर उसने एक हाथ में एक मम्मे को दबाया और अपने मुंह से दूसरे को भूखे भेड़िये की तरह चूसने चाटने लगा.

नीलम ने नकली विरोध जताया, "क्या कर रहा है, कोई ऐसा करता है अपनी चाची के साथ."

दर्शन बिना कुछ बोले अपने आक्रमण में लगा रहा. वो एक मम्मे को दबाता, दूसरे को चूसता, फिर बदल कर यही कार्य करता. नीलम अब वासना के भंवर में डूब रही थी.

"तूने तो बोला था की तू चाची की चूत पियेगा."

ये सुनकर दर्शन ने अपना सिर उठाया और नीलम के शरीर को चूमते चाटते हुए नीचे की ओर बढ़ा. जब वो जांघों के बीच पहुंचा तो उसने नीलम के दोनों पैर चौड़े कर दिया और कुछ देर तक लपलपाती चूत को निहारता रहा. फिर उसने धीरे से अपनी जीभ चलाई और नीलम के चूत की दोनों फांकों को हलके से चाट लिया. नीलम सिहर उठी और उसने पानी छोड़ दिया.

दर्शन ने अपना आक्रमण बनाये रखा और फिर अपना मुंह उसकी चूत में लगा दिया और पूरे जोश से चूसने चाटने लगा. नीलम अब कुनमुना रही थी और उसका पानी शायद एक बार फिर छूटने वाला था.

"अब और न तरसा अपनी चाची को, डाल दे मेरी चूत में अपना लौड़ा."

"चूसोगी नहीं, चाची ?" दर्शन ने थोड़ी निराशा से पूछा.

"अरे चोद दे, फिर चूसूंगी. मुझे भी पीना है तेरा रस."

ये सुनकर दर्शन की बांछे खिल गईं. उसने खड़े होकर नीलम की स्थिति को ठीक किया और उसके पांवों के बीच में आकर अपने लंड को नीलम की चूत पर रगड़ा और फिर एक दमदार धक्का लगाया.

"उई माँ. बड़ी जल्दी पड़ी है तुझे. थोड़ा आराम से नहीं डाल सकता था."

"चाची जब आराम से डालता हूँ तो कहती हो जोर से."

कहकर दर्शन लम्बे लम्बे धक्के लगाने लगा, पर अभी उसने गति नहीं पकड़ी. वो नीलम की चूत का पूरा आनंद उठाना चाहता था और जो आनंद धीरे चुदाई में है वो ताबड़तोड़ में नहीं. हालाँकि वो जानता था की नीलम उससे तेज और उग्र चुदाई की इच्छा रखती है. पर आज नीलम चुप थी और वो भी इस चुदाई का आनंद ले रही थी. पर जैसे कि दर्शन का अनुमान था वो जल्द ही इस प्यार भरी चुदाई से ऊबने लगी.

"थोड़ा जोर लगाकर चोद, ये क्या लौंडियों की तरह चोद रहा है."

दर्शन ने अपनी गाड़ी को थर्ड गियर में डाला और लम्बे और थोड़े तेज शॉट मरने लगा. वो चौथे और पांचवें गियर में जाने के लिए तैयार था. कुछ ही समय में वो चौथे और फिर पांचवे गियर में पिलाई करने लगा.

"हाँ यूँ ही. अबे हरामी अगर ऐसे चुदाई न हो तो तेरे से चुदने क्या मजा ही क्या है. पेल चाचीचोद. आह हा हा हा."

दर्शन अब तेज और पाशविक गति से चोद रहा था और नीलम नीचे से गांड उचका उचका कर उसका साथ भी दे रही थी. वो अब तक की इस चुदाई में दो बार और झड़ चुकी थी पर उसकी प्यास अभी पूरी तरह नहीं बुझी थी. अचानक नीलम का शरीर अकडने लगा, वो आनंद की चरम सीमा को छू रही थी. उसके मुंह से कराहें और आनंदातिरेक चीखें निकल रही थीं. फिर उसका शरीर शिथिल हो गया और वो निश्चल सी पड़ गई. दर्शन अपने कार्यक्रम में बिना रुके लगा रहा. वो भी अब झड़ने के करीब था और उसके लम्बे और शक्तिशाली धक्कों से नीलम का शरीर इस गुड़िया की तरह उछाल रहा था.

"चाची मेरे होने वाला है."

नीलम ने बिना कुछ बोले उसे अपना मुंह खोलकर संकेत किया. दर्शन ने अपना लंड बाहर निकला तो गप्प की एक आवाज़ हुई. फिर वो नीलम के रस से सने अपने तमतमाये हुए लंड को नीलम के मुंह के पास ले गया. नीलम ने मुंह खोला और दर्शन ने अपना लंड उसके मुंह में डाल दिया. अब वो दोबारा धक्के मरने लगा जैसे कि मुंह न हो बल्कि चूत हो. नीलम के मुंह से गौं गौं की ध्वनि निकल रही थी. ये देखकर दर्शन ने धक्के धीमे किये और फिर रुक गया. अब नीलम की बारी थी. वो मन लगाकर लंड को आइस क्रीम की तरह चूसने लगी.

दर्शन से अब रुका नहीं गया और उसके लंड ने फौहारे छोड़ने शुरू कर दिए. नीलम जितना हो सका पी गई और बाकी उसके मुंह से बाहर छलक गया. ठंडा पड़ने के बाद दर्शन ने लंड बाहर निकला और नीलम से गालों पर थपथपाया. नीलम हलके से मुस्कुरा दी.

"क्यों चाची, कैसा रहा?"

"एकदम मस्त."

"आपकी ही ट्रेनिंग है."

"चल झूठा, पचासों को चोद चुका था, जब मेरा नंबर आया."

"पर सिखाया तो अपने ने ही कि स्त्री को कैसे संतुष्ट किया जाता है. अब उसका मुझे भरपूर लाभ मिलता है. चाची इस शुक्रवार को कुछ खास है क्या?"

"क्यों?"

"पता नहीं, पर आप हर दो तीन महीने में कुछ नया करती हो. अब काफी समय से..."

"हाँ कुछ प्रोग्राम रखा है."

"कितने लड़के और बुला लिए चाची, हमारा पत्ता कट जाता है."

"इस बार तुम्हारे लिए भी जुगाड़ किया है."

"सच चाची, यू आर ग्रेट." कहते हुए नीलम को बाँहों में भरकर चूम लेता है.

"चल अब उठ, बाकी लोग आते होंगे।"

नीलम अपने कपडे पहनकर निकल गई. दर्शन ने भी कपडे बदले और नीलम के पीछे हो लिया. तभी देखा तो कनिका सामने से आ रही थी. उसे देखकर वो थोड़ा सकपका गया. कनिका जैसे ही पास पहुंची उसने एक अर्थपूर्ण मुस्कराहट के साथ दर्शन को देखकर नीलम की ओर इशारा करते हुए आंख मार दी और आगे बढ़ गई.

शुक्रवार:

अंततः शुक्रवार भी आ गया. आकाश और आकार ऑफिस के लिए निकले और उधर दिया और नीलम गेटवे के बंगले की ओर. दर्शन ऑफिस गया, हितेश और कनिका अपने कॉलेज. सब अपने अपने काम में शाम ५ तक व्यस्त रहने वाले थे. शाम को दोनों भाई अपनी अपनी सेक्रेटरी के साथ अलग अलग गाड़ियों में अपने घर पहुंचे. कनिका अपनी सहेली के घर जा चुकी थी.

उधर नीलम के बंगले पर ५ बजे दो गाड़ियां रुकीं. उसमे से दो महिलाएं और दो लड़के निकले और घर की घंटी बजाई। नीलम ने दरवाज़ा खोला और उन्हें अंदर आने का न्योता दिया. सब लोग अंदर चले गए. जब दिया ने नए अतिथि देखे तो अचरज में पड़ गई. अधिकतर नीलम १ या २ लड़कों को बुला लेती थी, पर दो अपनी आयु की महिलाओं को देखकर उसे आश्चर्य हुआ. नीलम ने सबका परिचय कराया।

नीलम: "दिया भाभी, ये मेरी सहेली रमोना है, जिससे आप पहले भी मिले हुए हो. और ये है उसका बेटा सचिन. रमोना, ये मेरी भाभी हैं दिया. अभी दर्शन और हितेश आने वाले होंगे."

"और ये है प्रीति और उसका भांजा पुनीत."

चारों लोगों ने दिया को नमस्ते किया और फिर सब लोग वहीं उस आलीशान बैठक में लगे सोफों पर बैठ गए. कुछ ही देर में दर्शन और हितेश भी आ गए. रमोना और प्रीति को देखकर दोनों की बांछें खिल गयीं. वो भी आकर सोफे पर बैठ गए और बातें करने लगे.

घर में:

चारों बैठ कर कुछ देर तक इधर उधर की बातें करते रहे. फिर आकार ने उठकर सबके लिए ड्रिंक बनाई जिसे निशा ने सबको दिया. एक ड्रिंक लेने के बाद निशा उठी और आकाश के पैरों के पास जाकर बैठ गई, उसने आकाश की बेल्ट निकाली, फिर पैंट को खोला और नीचे सरका दिया. उसके बाद उसने अंडरवियर को भी उतार के बगल में रख दिया.

"हमें ज्यादा समय बेकार की बातों में नहीं बिताना चाहिए. जिस काम के लिए जमा हुए हैं, पहले उस पर ध्यान देना चाहिए."

ये कहकर उसने आकाश का लंड अपने मुंह में डाला और बड़े प्यार से चूसने लगी.

"अरे निशा, मैंने तो सोचा था कि तुम मेरे साथ रहोगी." आकार ने शिकायत की.

"आपके साथ तो लगभग रोज ही रहती हूँ, आकाश सर से कभी कभी मिलना होता है. क्यों मेधा सही है न."

"जी दीदी." ये कहते हुए उसने भी आकार के साथ वही कार्यक्रम दोहराया.

अब दोनों भाई अपने अपने लंड एक दूसरे की सेक्रेटरी से चुसवा रहे थे. दोनों ने अपने शर्ट और बनियान भी निकाल दिए और पूरे नंगे हो गए.

तभी निशा बोली, "मेधा हम ही क्यों इन कपड़ों में रहें, बेकार में गंदे हो जायेंगे."

दोनों उठीं और अपने कपडे उतार दिए. फिर नंगी होकर अपने चुसाई चटाई के काम में लग गयीं. कुछ ही समय में दोनों लंड बिलकुल तनकर लोहे समान हो गए.

"सवारी का समय" निशा ने घोषणा की.

और अपने दोनों पांव आकाश के पांवों के बगल में किये और अपनी बहती हुई चूत को लंड पर रखा और बहुत प्यार से पूरा लंड अंदर ले लिया. उधर मेधा ने भी यही किया और वो आकार की सवारी करने लगी. दोनों भाई अपने चेहरे के सामने हिलते हुए मम्मों को चूसने और दबाने लगे. निशा बहुत तेजी से ऊपर नीचे हो रही थी जबकि मेधा की गति कम थी.

इस समय कमरे का माहौल बहुत कामुक और गर्म हो चुका था.

नीलम के बंगले में:

इस समय आठ लोग कमरे में बैठे बात कर रहे थे. ये देखकर कोई सोच नहीं सकता था कि कुछ ही देर में यहाँ सामूहिक चुदाई का कार्यक्रम चलेगा. तभी घंटी बजी. दरवाजे पर डिलीवरी बॉय अल्पाहार और खाना लेकर आया था. डिलीवरी लेकर नीलम ने तीनों स्त्रियों के साथ मिलकर अल्पाहार को सजाया और खाने को किचन में रख दिया. फिर नीलम ने सबसे उनकी पसंद की ड्रिंक पूछी. स्त्रियों ने बियर और लड़कों ने व्हिस्की का अनुरोध किया. सब अपनी ड्रिंक्स लेकर अल्पाहार के साथ ग्रहण करने लगे.

"सचिन तुम आजकल क्या कर रहे हो." दिया ने पूछा.

"आंटी, वैसे मेरा कॉलेज चल रहा है पर मैं एक क्लब में पार्ट टाइम काम भी कर रहा हूँ. मम्मी ने ये जॉब दिलवाई थी."

"चलो बहुत अच्छा है, इस आयु में अपना व्यय स्वयं उठाना आना चाहिए."

"और तुम, पुनीत?"

"अभी मेरा पूरा ध्यान बस कॉलेज पर ही है. मैं अगले साल एम बी ए की तैयारी करूंगा. आगे प्रभु इच्छा."

"सच कह रहे हो."

"रमोना, यार तुम इतने खुले तरीके से ये सब करती फिरती हो, तुम्हे अजीब नहीं लगता." नीलम ने रमोना से प्रश्न किया.

"तुम गलत सोच रही हो. मैं कुछ भी खुले आम नहीं करती. इसीलिए मुझ पर कोई ऊँगली नहीं उठता. हाँ प्रवेश को थोड़ा ठीक नहीं लगता कभी कभार, पर चूँकि वो अब सेक्स नहीं कर पाते सो उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया है. पर शर्त यही है कि न ही बात और न ही उसकी शंका फैलनी चाहिए."

(प्रवेश रमोना के पति हैं जो लगभग ६४ साल के हैं)

"और उन्हें तुम दोनों के बारे में..."

".. पता है. मैं उनसे कोई बात नहीं छुपाती."

फिर प्रीति को ओर देखते हुए नीलम ने उससे पूछा, "तुम कब से अपने भांजे के साथ?"

"ज्यादा नहीं, बस यही कोई ७ महीने हुए हैं. पुनीत को इसकी माँ ने यहाँ पर आगे पढाई के लिए भेजा है. तुम्हारे हितेश की तरह. तो वो हमारे साथ ही रहता है. मैं और मेरे पति कुछ दूसरे जोड़ों के साथ अदला बदली करते हैं. तो एक बार हम लोगों से गलती हो गई और पुनीत ने हमें देख लिया. फिर मेरे पति ने पुनीत को भी न्योता दिया सम्मलित होने का, जो इसने मान लिया. तो हम लोग अब काफी खुल गए हैं."

"आकार और हमने भी सोचा था ये करने का, पर हमारी अभी की सेटिंग सही है, तो कुछ किया नहीं. पर भविष्य में क्या होगा, कोई नहीं जानता."

अब तक सबकी ड्रिंक ख़त्म हो गई थी. सो नीलम ने सलाह दी कि अपने साथी को तय करने के बाद सब लोग एक ड्रिंक और लेंगे. वैसे भी समय की कोई कमी नहीं थी. सबसे पहले प्रीति को चयन का अधिकार दिया. उसने दर्शन को चुना. फिर दिया ने सचिन को, रमोना ने हितेश को चुना, नीलम ने पुनीत को चुना. नीलम ने देखा कि सचिन उसे लालची आँखों से ताड़ रहा है. तो उसे आंख मारकर मूक शब्दों से इशारा किया कि बाद में.

नीलम पुनीत के साथ सबके लिए ड्रिंक बनाने चली गई और बाकी सब अपनी जोड़ियों में सोफों पर बैठ गए.

घर में:

घर में चुदाई का घमासान युद्ध चल रहा था, निशा उछल उछल कर आकाश के लंड से अपनी चूत की गहराइयों को नाप रही थी. मेधा ने भी अब गति पकड़ ली थी और वो भी तेजी से अपनी गांड उठा उठा कर आकार के लंड को अपनी चूत की गहराई नपवा रही थी. तभी आकाश ने निशा की गांड थपथपाई. निशा रुक गई तो आकाश ने उसे उलटी तरफ मुंह करने को कहा. निशा ने बिना लंड को निकले अपने आप को घुमाया और फिर से उछलने लगी. इस आसन में आकाश अब उसके मम्मे अच्छे से पकड़ कर मसल सकता था और उसने ऐसा ही किया. मेधा जो निशा की नक़ल कर रही थी, वो भी पलट कर चुदवाने लगी और आकार उसके मम्मे भींचने लगा.

ये उछलकूद बहुत देर तक चलती रही. निशा को आकाश ले लंड में अकड़न का आभास हुआ, तो उसने पूछा कि क्या वो झड़ने वाला है? आकाश के हाँ कहने पर वो रुक गई और लंड पर से उतर कर आकाश का लंड अपने मुंह में लेकर चूसने लगी. वो अपना मुंह पूरा खोलकर आकाश के लंड को अपने गले तक ले जाती फिर बाहर करती, चाटती, चूसती और फिर वही क्रिया दोहराती. मेधा इतनी अनुभवी नहीं थी इसीलिए वो उतर कर आकार का लंड सामान्य रूप से चूसने लगी. निशा के अनुभवी मुंह के आगे आकाश ने हाथ डाल दिए और बताया कि वो झड़ने वाला है. निशा ने बिना लंड निकले उसे बताया कि वो भी तैयार है.

बस फिर क्या था, आकाश ने अपनी पिचकारी को निशा के मुंह में खोल दिया और उसके मुंह को भर दिया. निशा ने थोड़ा ही पिया पर अधिकतम उसके मुंह से रिस कर उसके होंठ, ठोड़ी और स्तनों पर बहने लगा. आकाश का लंड अच्छे से चूस कर उसने लंड को पूरा सुखा दिया. फिर अपने चेहरे और वक्ष पर वीर्य को मल लिया.

मेधा ने भी यही किया और दोनों स्त्रियां इस समय वीर्य से नहाई हुई प्रतीत हो रही थीं. निशा मेधा के पास गई और उसके स्तन और चेहरे से काम रस चाटने लगी. फिर उसने मेधा का एक गहरा चुम्बन लिया और खड़े होकर बाथरूम की ओर बढ़ गई. मेधा उसके पीछे हो गई.

"भाई, ये निशा वाकई में बहुत चुड़क्कड़ औरत है. आदमी को पूरा निचोड़ लेती है."

"सही है, पर मेधा में जो सादगी और नयेपन की मिठास है, वो उसमें नहीं है."

दोनों ने एक दूसरे की बात पर हामी भरी और ये माना कि कुल मिलाकर ये दोनों हर तरह से उन्हें संतुष्ट कर सकती है.

निशा और मेधा बाथरूम से निकलकर रसोई की ओर चली गयीं और जल्दी ही सबके लिए एक नया ड्रिंक ले आयीं। सब यूँ ही नंगे बैठकर अपनी अपनी ड्रिंक की चुस्कियां लेने लगे. हालाँकि निशा और मेधा इस बात से अनजान थीं कि वे दोनों भाई इस समय नीलम के बंगले में क्या चल रहा होगा ये सोचने में ध्यानमग्न थे.

नीलम के बंगले में:

किचन में जाते ही पुनीत ने नीलम को पीछे से भींच लिया और उसकी गर्दन और कान के चुम्मे लेने लगा.

"सब्र कर बेटा, कहीं भागी नहीं जा रही हूँ. तेरी ही हूँ जो करने का मन हो सो कर लेना, पर पहले ये ड्रिंक बनाने में मेरी सहायता कर."

पुनीत ने फटाफट आठ ड्रिंक्स बनवाये और एक ट्रे में सजा दिए. फिर उसने अपने कपडे खोले और केवल कच्छा पहने रखा. उसने नीलम को पकड़ा और उसकी साड़ी अलग कर दी, यही उसने पेटीकोट और ब्लॉउस का भी किया. अब नीलम भी मात्र ब्रा और पैंटी में थी.

"ये ड्रेस सही है न आंटी, ड्रिंक सर्व करने के लिए?"

"हम्म्म, सो तो है. तू मेरे पीछे ट्रे लेकर आ."

जब दोनों बैठक में पहुंचे तो देखा कि वहां भी लगभग वही दृश्य था. सभी जोड़े अर्धनग्न अवस्था में चूमा चाटी कर रहे थे. नीलम ने हलकी खांसी से सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया.

"अरे पहले एक और ड्रिंक ले लो. और नियम सुन लो."

सब ध्यान से नीलम को ओर देखने लगे.

"अभी ७ बजे हैं, और अब से कल शाम ७ बजे तक तुम सारे लड़के हम स्त्रियों के दास हो. जो हम चाहेंगे, तुम वही करोगे. कल शाम तक ये तुम्हारा काम है कि हमें पूरी तरह से खुश और संतुष्ट करो. कल शाम ७ बजे ये उल्टा हो जायेगा और हम महिलाएं तुम्हारी दासियाँ होंगी. है ठीक."

किसी को आपत्ति नहीं थी. सबने हाँ कर दी. और अपनी ड्रिंक्स को उठा कर "चियर्स" कहा और चुस्कियां लेने लगे. पर आधे नंगे लोग कितनी देर अपना संयम रखते, तो देखते ही देखते सारी औरतों की ब्रा धरती पर धूल चाटने लगी. एक दूसरे के होंठ चूम चूम कर लाल हो गए. तब दर्शन उठा और वो प्रीति के पांवों के बीच में बैठ गया. उसने प्रीति की पैंटी नीचे की जिसके लिए प्रीति ने अपनी गांड उठाकर उसकी सहायता की. प्रीति के पांव फैलाकर उसने चूत का एक चुम्बन लिया और जीभ से ऊपर से नीचे तक चाटा। प्रीति सिहर उठी और उसकी चूत पनिया गई. दर्शन ने अपना मुंह अब उसपर लगाकर जीभ से कुरेदना शुरू किया और फिर अपनी एक उंगली उसकी चूत में डाल दी. अब वो कभी अपनी जीभ अंदर डालता तो कभी अपनी उंगली प्रीति अब कामांध हो कर आहें भर रही थी. उसने बाकी जोड़ों की ओर देखा तो वहां भी यही दृश्य चल रहा था.

सचिन दिया की चूत पर हमला बोले हुए था, हितेश रमोना को आनंदित कर रहा था और नीलम की सेवा में पुनीत लगा हुआ था. पूरे कमरे में अब आहों और कराहों की ध्वनि फैली हुई थी. सारे लड़के इस खेल में पारंगत थे और इसका श्रेय उनके घर पर हुए प्रशिक्षण को जाता था. उनकी जवानी का पहला स्वाद उनके घर की ही किसी महिला ने चखा था और उन्हें महिलाओं को कैसे संतुष्ट किया जाता है इसके लिए भरपूर अभ्यास कराया था. इस समय चारों महिलाये झड़ने के कगार पर थीं.

और यही हुआ भी.

सबसे पहले प्रीति ने ही अपना पानी छोड़ा, उसकी चीख सुनकर एक पंक्ति में नीलम, रमोना और दिया भी अपने अपने बैलों के मुंह में झड़ गयीं. बैलों ने भी इस अमृत को पूरी श्रद्धा से ग्रहण किया और चूतों को चाटना बंद नहीं किया. जब चूतें अच्छे से झड़ गयीं तो चारों एक एक करके खड़े हो गए और अपने जांघिये उतार फेंके. उन्होंने रसोई में जाकर सबके लिए एक और ड्रिंक बनाई. और वापिस आकर सोफे पर बैठे और अपने साथी को उसकी ड्रिंक थमा दी. चारों महिलाएं यही बात कर रही थीं कि वो कितने अच्छे से चूत पीते हैं. चारों युवाओं ने कुछ कहना उचित न समझा और सिर्फ एक मुस्कराहट से इस प्रशंसा का अभिवादन किया.

चारों महिलाएं अपने ड्रिंक के घूँट लेते हुए अपने साथी के लंड को एक हाथ से मुठिया रही थीं. रमोना ने पहले अपनी ड्रिंक एक तरफ की.

"मुझे अब कुछ और पीने का मन है." ये कहते हुए उसने हितेश के लंड को अपने मुंह में ले लिया और बड़े प्यार से चूसने लगी.

देखा देखी बाकी तीनों ने भी रमोना का अनुसरण किया और अपने साथी के लंड पर प्यार जताने लगती. कुछ ही देर में वापस आह वाह उम्म्म की आवाज़ें कमरे में भर गयीं. बस अंतर इतना ही था कि इस बार ये ध्वनियाँ लड़कों के मुंह से निकल रही थीं. अब चूँकि लड़के देर से स्वयं को रोके हुए थे तो उनसे अधिक संयम नहीं रखा गया. जब हितेश ने कहा कि उसका होने वाला है तो रमोना ने अपनी ड्रिंक का ग्लास उठा लिया और जम के चूसने लगी. जैसे ही उसे ये आभास हुआ कि हितेश छूटने वाला है, उसने लंड को मुंह से निकाल लिया और ग्लास पर लगा दिया. हितेश का कामरस रमोना की ड्रिंक में मिलने लगा. जब उसका रस निकल गया, तो रमोना ने ग्लास को एक तरफ रखा, वापिस लंड मुंह में लेकर साफ किया और अपना ग्लास उठा लिया.

"हे गर्ल्स, देखो मेरा नया ड्रिंक, व्हिस्की और लौड़े के रस का कॉकटेल." ये कहकर उसने एक लम्बे घूँट में उसे पी लिया. "ये है न असली नशा."

उसकी देखा देखी बाकी तीनों ने भी यही उपक्रम किया. तब रमोना ने कहा कि वो सब हर चुदाई के बाद फिर इस प्रकार से तरह रस इकट्ठा करें पर पियें नहीं. उसे एक और युक्ति सूझी है. सब अब अल्पाहार करने के लिए रुक गए और वहीँ बैठकर अपने प्लेट में खाने लगे.

घर में:

आकाश और आकार अब दूसरे चरण के लिए उत्सुक थे. पर मेधा को देखकर उन्हें लगा कि शायद वो अभी सहमत नहीं है. आकार ने निशा से इशारा करके पूछने के लिए कहा.

"मेधा, क्या तुम दूसरे राउंड के लिए रेडी हो."

"दीदी, थोड़ी देर आराम करना चाहती हूँ. सर का लंड बहुत बड़ा है मुझे बहुत थका देते हैं ये." मेधा ने विनती भरे स्वर में कहा.

"हम्म्म ठीक है. तुम तब तक देखो खाने के लिए क्या है. अगर है तो गर्म करके परोसने की तैयारी करो. मैं दोनों के डबल ट्रिप पर ले जाती हूँ."

मेधा सिहर उठी. उसे पिछली बार का समय याद आ गया. और वो झट से उठकर रसोई में चली गई. वहां उसने एक ड्रिंक बनाई और एक ही घूँट में पी गई. निशा के साहस की वो प्रशंसक थी. फिर उसने फ्रिज खोला और खाने का सामान ढूंढने लगी. जब देखा कि कुछ उचित नहीं है तो रेस्टोरेंट से आर्डर कर दिया और उन्हें ४५ मिनट बाद आने को कहा. फिर वो वहीँ एक कुर्सी पर बैठ गई और बाहर की आवाज़ें सुनने लगी.

"तो मालिकों क्या इरादा है?" निशा ने दोनों के बीच बैठकर उनके लंड मुठियाते हुए कहा.

"जाकर बाथरूम से जैल लेकर आ जाओ. इरादा तो तुम्हें समझ आ ही गया होगा." आकाश ने कहा.

"तो आप लोग मेरी चूत और गांड एक साथ मारोगे। दया नहीं आएगी?" निशा ने हंसकर कहा और उठकर बाथरूम चली गई और जैल की ट्यूब ले आयी.

नीलम के बंगले में:

अल्पाहार के बाद महिलाओं ने अपने अपने साथी के लंड मुंह में लेकर उन्हें फिर अच्छे से खड़ा किया और थूक से गीला कर दिया. फिर उन्होंने अपनी पीठ अपने सांड की तरफ करते हुए अपनी चूत को उनके लंड पर बैठाया और अंदर ले लिया.

"जो भी अपने सांड को पहले झड़ायेगी, उसे इनाम मिलेगा." रमोना ने घोषित किया.

"उफ्फ्फ, सचिन कितना बड़ा है तेरा लंड? " दिया ने आश्चर्य से पूछा.

"१० इंच से अधिक." रमोना ने हितेश की सवारी करते हुए बड़े गर्व से कहा.

"इतनी गहराई तक अब तक कोई नहीं गया." दिया ने भी अपनी सवारी गांठते हुए कहा, हालाँकि वो अभी धीरे ऊपर नीचे हो रही थी अपनी चूत को सचिन के लंड के अनुकूल बनाते हुए.

दूसरी ओर अन्य सवारियां गति पकड़ने लगी थीं. वे सब उस अनजाने पुरुस्कार की प्रतियोगिता को जितने का प्रयास कर रही थीं जिसकी घोषणा रमोना ने की थी. लड़के अपने साथी के मम्मों को पकड़ कर दबा रहे थे और अपने सवार को संतुलन रखने में सहायता कर रहे थे. परन्तु उनका ये भी उद्देश्य था कि वो पहले न झड़ें, चाहे इस कारण उनकी साथिन हार ही क्यों न जाये. ये उनके पौरुष की क्षमता का भी परीक्षण था. चारों दिशाओं में इस समय चुदाई की ढप, ढप, छप, छप की ध्वनि निहित थी. और उउउह आअह मेरी माँ की कराहों से पूरा कमरा भरा हुआ था.

दिया स्वयं को संभालने में अक्षम थी और उसकी चूत लगातार पानी छोड़ रही थी. इसके कारण अब सचिन का पूरा लंड उसकी अछूती गहराइयों पर खटखटा रहा था. रमोना जैसी अनुभवी चुड़क्कड़ औरत के सामने सबसे पहले हितेश ने ही हाथ डाल दिए. उसने बताया कि उसका पानी छूटने वाला है. रमोना ने कहा कि उसे अपने ग्लास में व्हिस्की के साथ उसे मिलाना है. ये कहते हुए वो उतर गयी और ग्लास को हितेश के लंड पर लगा दिया. हितेश मुठ मारने लगा और उसने उस ग्लास में अपना कामरस छोड़ दिया.

रमोना वो ग्लास लेकर खड़ी हो गई. उसने ऐलान किया की सारे लड़के अपना पानी उसी ग्लास में छोड़ेंगे.

कुछ ही देर में बाक़ी तीनों लड़कों ने भी अपना रस ग्लास में डाल दिया। रमोना ने ग्लास को थोड़ा हिलाया और फिर लेट कर पहले अपने मम्मों पर डालकर माला, फिर अपने चेहरे पर डाला और वहां भी मल लिया. आखिर में उसने ग्लास मुंह में लगाया और एक घूँट में खाली कर दिया.

"वाह, इसे कहते हैं ड्रिंक."

सबने ताली बजाकर रमोना को जीत की बधाई दी और सभी महिलाओं ने वादा किया कि अगली सभी प्रतियोगिताएं में वे जीतने की कोशिश करेंगी.

तब रमोना ने रहस्यमयी स्वर में कहा, "जरूरी नहीं कि सारे पुरुस्कार हम महिलाओं को ही मिलें. लड़कों के लिए भी हैं पुरुस्कार." ये कहते हुए उसने अपनी एक उंगली से अपनी गांड की छेद को छुआ और उंगली उसके इर्द गिर्द एक गोला बनाया. ये देखकर लौड़े तनतना गए.

घर में:

निशा बाथरूम से जैल की ट्यूब ले आयी और वो दोनों के बीच में आ बैठी और ट्यूब से जैल निकलकर दोनों लौडों पर अच्छे से मला और उनको एकदम चिकना कर दिया.

"गांड कौन मारेगा ?" निशा ने पूछा.

"आकाश भाई, इन्हें तुम कम ही मिलती हो." आकार ने स्पष्ट किया.

"ये होता है छोटा भाई." निशा हंसी।

फिर जैल अपनी चूत पर मला और दो उँगलियों से अपनी चूत के अंदर भी अच्छे से लगा लिया. उसके बाद वो उठी और अपनी चूत आकार के लंड पर रखकर उस पर बैठ गई और जैल की ट्यूब आकाश को थमा दी. आकाश ने ट्यूब को निशा की गांड में डाला और एक अच्छी खासी मात्रा अंदर डाल दी और दो उँगलियों से उसकी गांड में अच्छे से फैला दिया.

उधर अब मेधा से किचन में ठहरा नहीं जा रहा था, वो इस चुदाई को देखने की उत्सुक थी. उसने अपने लिए एक डबल पेग बनाया और सामने सोफे पर बैठ गयी. आकार के लंड पर चूत लगाए निशा को देखा और फिर आकाश ने निशा को आगे की ओर झुकाया और अपना लंड उसकी गांड के छेद पर रखा. आकार ने निशा के मम्मों को पकड़ा और बेरहमी से निचोड़ने लगा.

"१, २, ३" की गिनती के साथ ही आकाश ने एक ही लम्बे शॉट में अपना पूरा लंड निशा की गांड में जड़ दिया. निशा के मुंह से एक तीव्र कराह निकली पर उसने लंड बाहर निकालने का कोई प्रयास नहीं किया. उसे इस तरह की डबल चुदाई में बहुत आनंद आता था और वो गांड मरवाने की अभ्यस्त थी. रात में जब तक वो अपनी गांड नहीं मरवाती थी उसे नींद नहीं आती थी. और जब चूत और गांड दोनों का बाजा बज रहा हो तो वो उन्माद की सारी सीमाएं पार कर जाती थी.

"अब चोदो मुझे, कोई दया मत करना, पेल दो अपने लौड़े मेरी चूत और गांड में. फक मी, डबल फक मी."

नीचे से आकार और ऊपर से आकाश ने एक लयबद्ध तरीके अपने लौडों से उसके छेदों को भांजना शुरू किया. जब एक अंदर जाता तो एक बाहर आता। इस समय निशा की चूत और गांड के बीच की झिल्ली पर दोनों ओर से घर्षण हो रहा था. और निशा सातवें आसमान की यात्रा कर रही थी. दोनों भाइयों ने अपनी गति को धीमे धीमे बढ़ाई और तेजी से निशा को चोदने लगे.

पंद्रह मिनट की इस प्रकार की चुदाई के बाद गति कुछ क्षीण पड़ने लगी. निशा अब तक न जाने कितनी बार झड़ चुकी थी पर उसकी प्यास नहीं मिटी थी. वो दोनों भाइयों को और तेज और गहराई से चोदने के लिए प्रोत्साहित कर रही थी. सामने बैठ कर मेधा ये देखकर हतप्रभ थी और अपनी उंगली से अपनी चूत कुरेद रही थी. तभी उसकी ऑंखें डर और आश्चर्य से फ़ैल गयी. सामने से कनिका आ रही थी. शायद उसका प्लान बदल गया था. कनिका आकर मेधा के बगल में खड़ी हो गई और इस डबल चुदाई को बड़ी दिलचस्पी से देखने लगी. फिर वो रसोई में गई और अपने लिए एक बियर ले आयी और सामने चल रहे खेल को देखती रही.

इतने समय की चुदाई के बाद अब आकाश और आकार स्वयं को रोकने में असमर्थ थे. गांड की तंगी के कारण आकाश ने अपना पानी निशा की गांड में छोड़ दिया. और लगभग साथ ही आकार ने निशा की चूत भर दी. तीनों उसी स्थिति में रुक गए और गहरी सांसे लेते हुए विश्राम करने लगे. फिर आकाश ने अपना लंड निशा की गांड से निकाला। निकलते ही उसका वीर्य निशा की गांड से बहने लगा. फिर निशा उठी और सोफे पर पीठ के बल ढेर हो गई. उसकी चूत और गांड दोनों से कामरस बह रहा था.

"नाइस शो डैड एंड ताऊजी. मेरे ख्याल से मुझे भी ये एक बार ट्राई करना होगा." कनिका ने ताली बजाते हुए प्रशंसा की.

फिर उसने अपना ग्लास मेधा को पकड़ाया और उसे रखने को कहा. वो आगे गई और निशा के सामने बैठ गई. निशा ने एक उसे संतुष्टि की निगाहों से देखा.

"वांट टू टेस्ट (स्वाद लेना चाहोगी) ?" निशा ने पूछा।

"बिलकुल" ये कहते हुए कनिका ने अपना मुंह उसकी चूत पर लगाया और चूत से गांड तक अपनी जीभ चलते हुए अपने पिता और ताऊजी के लौडों का अमृत पी गई.

फिर वो उठी और निशा का एक गहरा चुंबन लिया. "धन्यवाद,"

पीछे मुड़कर उसने ठगी सी बैठी मेधा के हाथ से अपनी ड्रिंक का एक घूँट भरा और गांड मटकाते हुए अपने कमरे में चली गयी.

नीलम के बंगले में:

जब लड़कों ने रमोना की गांड का प्रस्ताव सुना तो उनकी बांछें खिल उठीं. अब ये नहीं था कि उनमें से किसी ने गांड नहीं मारी थी, पर एक नयी गांड में अपने लंड को पेलने का सपना सबका होता है. पर उन्हें ये भी लग रहा था कि रमोना शायद कुछ अधिक नशे में है. यही सोचकर सचिन उसके पास गया.

सचिन: “मॉम, मेरे विचार से अब आपको और नहीं पीनी चाहिए. नहीं तो आपको चुदाई का असली आनंद नहीं आएगा.”

सचिन जानता था कि केवल यही एक कारण था जिसके कारण रमोना पीने पर रोक लगाती थी. उसने कई बार उसे इतना धुत देखा था कि वो चलने या बोलने तक में असमर्थ थी. और ये उसके साथी हितेश के साथ अनर्थ होता.

रमोना: ”मेरा लाल, माँ का कितना ध्यान रखता है. ठीक है अब कुछ देर के लिए कुछ नहीं पियूँगी.”

सभी उठकर खाने में मग्न हो गए. अच्छी शराब और अच्छी चुदाई से सबकी भूख चमक उठी थी. तब रमोना से दिया ने पूछा कि क्या उसके मन में कुछ और भी खेल हैं?

रमोना ने लड़खड़ाते स्वर में कहा: “यार मेरा तो हर समय खेलने का ही मन करता है. पर मैं आज अपनी गांड पर शर्त लगवाना चाहती हूँ. वैसे तो हितेश ही मेरी गांड मारने का पहला अधिकार होना चाहिए, पर मैं एक दूसरा खेल सोच रही हूँ.”

ये सुनकर हितेश का मुंह उतर गया. रमोना उसे देखकर खिलखिलाने लगी.

“खेल ये है”, वो बोली, “हम चारों स्त्रियों को एक पर्ची में नंबर मिलेगा १ से ४ तक. खाने के बाद जब भी हम अगला राउंड खेलेंगे उसमें हम अपने साथी का लंड चूसकर झड़ायेंगे. जो पहले झड़ेगा उसे १ नंबर वाली की गांड मिलेगी और जो अंत में उसे ४ वाली की. पर किसका क्या नंबर है ये तुम लड़कों को कोई नहीं बताएगा जिससे तुम लोग कोई बेईमानी न करो. अगर दो स्त्रियां आपस में बदलना चाहें तो वो एक दूसरे से बदल लेंगे. कैसा है ये आइडिया खेल का.”

सबने कुछ देर सोचा फिर इस प्रस्ताव को पारित कर दिया. और फिर खाने पर टूट पड़े.

खाने के बाद सब लोग आराम से बैठ कर बातें करने लगे. रमोना का भी नशा कुछ कम हो गया और वो भी अब ठीक से बात कर पा रही थी. सचिन और हितेश के कहने पर और ड्रिंक्स न लेने का निर्णय हुआ. अगर कोई चाहता तो सोने के पहले पी सकता था. अचानक दिया का फोन बज उठा. वो फोन लेकर कमरे से बाहर चली गई. लौटी तो गहरे सोच में थी.

“हितेश, क्या तुम्हारे कॉलेज की छुट्टी है कुछ दिनों?”

“नहीं तो, मौसी. पर हाँ विश्वविद्यालय के कुछ कॉलेज बंद हैं २ सप्ताह के लिए, परीक्षा की तैयारी के लिए. पर हमारे कॉलेज में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है. पर बात क्या है ?”

“अरे कुछ नहीं. चल मजा करते हैं.”

रमोना किचन में जाकर एक कागज और कलम ले आई और उसने चार पर्चियां बना दीं. स्त्रियों ने एक एक करके पर्ची में अपना नंबर पढ़ा और रमोना को लौटा दिया. रमोना ने नंबर के साथ नाम लिखा और किचन में जाकर कहीं रख दिया. अब कपड़े तो किसी ने पहने थे नहीं और लड़के पर्ची निकलते देखते ही वापिस टनटना गए थे. सोफे पर बैठकर वो अपने तने हुए लंड सहला रहे थे. हर स्त्री ने अपने निर्धारित साथी के सामने बैठकर उसके लंड को प्यार से पुचकारते हुए चूमने, चाटने और चूसने का कार्यक्रम शुरू कर दिया. लड़के अपने भाग्य पर इतराते हुए अपनी साथी महिला का जोश बढ़ा रहे थे.

इस बार के खेल में कोई प्रतियोगिता का पुट नहीं था, क्योंकि किसी को नहीं पता था कि किस गांड में कौन सा लंड जाने वाला है. इसी कारण सब आनंद ले रहे थे. स्त्रियां बहुत प्यार और पुचकार से लंड पी रही थीं, जैसे कि कोई पसंद की आइसक्रीम चाट रही हों. लड़कों को भी कोई जल्दी तो थी नहीं. आज वो स्त्रियों के दास जो थे. लंड, टोपा, टट्टे और कभी कभी गांड को चाटती हुई महिलाएं अब स्वयं भी उत्तेजित हो रही थीं . कमरे में अगर लड़कों के रस की गंध थी तो चूतों से झरते पानी की भी मादक सुगंध व्याप्त थी. दर्शन पहला लड़का था जो झड़ा. असली में वो बैठे हुए लंड तो चुसवा ही रहा था पर उसके सामने बैठे हितेश के लंड को चूसती रमोना की गांड ने उसे इतना आकर्षित किया कि वो जल्दी ही झड़ गया.

उसके बाद एक एक करते हुए हितेश, पुनीत और अंत में सचिन भी झड़ गए. सबके लौंड़ों के पानी ने गले सींचे और अपनी साथिन की प्यास बुझाई. अब ये देखना था कि किस लंड के भाग्य में किसकी गांड लिखी थी. सो रमोना उठकर किचन में गई और पर्चियां उठा लाई. उसने जिस नंबर से लड़के झड़े थे उस नंबर की पर्ची उन्हें सौंप दी. और फिर कहा कि वो अपने साथिन का नाम घोषित करें. और जब नाम पढ़े गए तो सभी आश्चर्य में आ गए.

दर्शन: “प्रीति”

हितेश: “रमोना”

पुनीत: “नीलम”

सचिन: “दिया”

आश्चर्य इसीलिए था कि सबको अपने ही साथी का नंबर मिला था. ऐसा चमत्कार कैसे हुआ, कोई नहीं समझ पाया. पर अगले राउंड के पहले लंड सही तरह से खड़े हो पाएं इस कारण कुछ देर रुकना आवश्यक था. गांड में पेलने के लिए लंड अधिक कठोर जो होना चाहिए. नीलम ने दर्शन और हितेश को स्टोर रूम से गद्दे ले कर आने के लिया कहा. इनके साथ पुनीत और सचिन भी गए और गद्दे, उसके लिए चादरें और तकिये लेकर आये और उन्हें बीचों बीच बिछा दिया. उसके बाद दर्शन किचन से सरसों के तेल से भरी एक पिचकारी वाली बोतल ले आया. अब सब तैयार था: गद्दे बिछे हुए थे, तेल की शीशी भरी हुई थी, लौड़े गांड फाड़ने को तत्पर थे और गांड वालियाँ उत्सुकता से अपनी गांड में खुजली कर रही थीं. ये खेल अब आरम्भ होने वाला था.

महिलाओं ने अपना स्थान ले लिया, सबने घोड़ी का आसन ग्रहण किया हुआ था और सिर को तकिये पर लगाया हुआ था. इससे उनका पिछवाड़ा ऊपर उठा हुआ था और गांड उभरी हुई थी. पहले नीलम, फिर प्रीति, फिर दिया और रमोना एक दूसरे को देख सकती थीं क्योंकि उनके चेहरे एक दूसरे के सामने थे. अब सारे लड़कों ने अपनी निर्धारित गांड के पीछे अपना स्थान लिया. पुनीत नीलम के पीछे, आलोक प्रीति के, हितेश रमोना के और अंत में सचिन दिया की गांड के पीछे खड़ा हो गया.

आलोक ने अपने हाथ एक हाथ से प्रीति की गांड को फैलाया और दूसरे हाथ से अपने हाथ में उपस्थित तेल की शीशी के नोक से प्रीति की गांड में उपयुक्त मात्रा में तेल भर दिया. उसने प्रीति के नितम्बों को थोड़ा हिलाया जिससे कि तेल अंदर चला जाये. जो तेल बाहर निकला उसने अपने हाथ में लेकर उसे अपने लंड के टोपे पर लगा लिया. फिर उसने बोतल हितेश को दी जिसने समान उपक्रम के साथ रमोना की गांड ने तेल डाला और अपने लंड पर भी लगाया . यही प्रणाली सचिन और पुनीत ने भी अपनाई। अब चारों लौड़े अपने लक्ष्य को भेदने के लिए तत्पर थे. और उन्हें ये दिख रहा था कि उनके सामने उपस्थित गांड भी खुलकर और बंद होकर उनके इस आगंतुक की प्रतीक्षा में थी.

चार लंड अपने लक्ष्य के मुंह पर अपने हथियार को लगाए और दबाव बनाते हुए अपने टोपे को उस तंग गली में प्रविष्ट कर दिया. चारों स्त्रियां ने जो इस आगमन के लिए उत्सुक थीं, एक गहरी साँस ली. उनकी इच्छा जो पूरी होने वाली थी. धीरे धीरे लंड अपने अपने लक्ष्य को भेदने लगे. हर गांड इस प्रतीक्षा में थी कि कब उसकी गहराई भरी जाएगी. लंड बिना रुके अपनी लम्बाई को गांड की गहराई से नाप रहे थे. औरतों में से कुछ बेचैन होने लगीं थीं, वो चाहती थीं कि जल्द ही उनकी चुदाई शुरू हो, पर लड़कों के मन में ऐसा कोई विचार नहीं था. अगर उन्हें आज्ञा दी जाती तो वो अवश्य उसका पालन करते, पर तब तक वो अपने मन से चुदाई कर सकते थे. गांड मारने के सुख में से सबसे अप्रतिम आनंद लंड को पहली बार अंदर डालने का ही होता है.

जैसे जैसे एक एक मिलीमीटर लंड का रास्ता तय होता है, लंड में एक भिन्न अनुभूति होती है. एक एक करके लंड अपनी जड़ तक जा समाये, पर सचिन अभी भी लगा हुआ था. जिनकी ऑंखें दिया को देख रही थीं वो उसके चेहरे पर पीड़ा भरे आनंद के भाव देखतीं. दिया की गांड में इतना मोटा और लम्बा लौड़ा कभी नहीं गया था, हालाँकि उसने खेला बहुतों से था. पर फिर उसके चेहरे पर कुछ सांत्वना के भाव दिखाई दिए. सचिन के पूरे लंड ने उसकी गांड पर अपना अधिकार जमा लिया था.

लंड अब गांड के अंदर अपना आवागमन प्रारम्भ कर चुके थे. छोटे और हल्के धक्कों से लंड अपनी राह सरल कर रहे थे. इसमें तेल का भी समुचित योगदान था. ये सर्वविदित था कि ये केवल चक्रवात के पहले की शांति है. कुछ ही समय में ये शांति टूटेगी और तूफ़ान उनकी गांड की धज्जियाँ उड़ा देगा. पर उनके इस पूरे आयोजन का प्रयोजन ही ये था. उन सबको अपनी गांड प्यार से नहीं बल्कि दमदार ढंग से मरवाने का शौक था. और ये पूरा प्रेम का नाटक बस कुछ ही क्षणों के लिए था. रमोना जैसी महा चुड़क्कड़ औरत से ये सब प्रेम प्यार अब सहन नहीं हो रहा था.

“गांड ऐसे ही हिजड़े की तरह मारता है क्या? कुछ तो दम दिखा.” हितेश के तन बदन में जैसे आग लग गई. उसने अपने पूरे लंड को निकला और एक जानदार धक्के में अंदर पेल दिया.

“ये हुई न बात, अब लगा कुछ हो रहा है. अब मिटा मेरी गांड की खुजली. अगर तू जरा भी हल्का पड़ा तो तेरा लंड काटकर खा जाऊंगी कच्चा ही.”

हितेश ने भी अब अमानवीय रूप धारण कर लिया. और उसके धक्के लम्बे और तीव्र हो गए. रमोना की गांड का रोम रोम आनंद से चीत्कार करने लगा. उसकी आनंदभरी सीत्कारों और चीखों से कमरा भर गया. और उसके साथ एक एक करके अन्य महिलाएं भी जुड़ गयी. सबसे अधिक दर्दनाक चीख दिया की थीं. उसकी गांड में ऐसा मूसल कभी नहीं गया था. और उसे कोई जल्दी नहीं थी गांड की धज्जियाँ उड़वाने की, वो तो पहले वाली गति से ही संतुष्ट थी, पर रमोना के कारण उसे भी उसी अमानवीयता को झेलना पड़ रहा था. सचिन ने ये सोचा था कि दिया भी उसकी माँ की तरह ही उसके लंड पर झूम उठेगी. पर उसके लिए अभी समय था.

दिया की चीखों में आनंद कम और पीड़ा अधिक थी. अन्य दो महिलाएं भी इसी नौका में थीं पर उनकी गांड में सचिन जैसा लंड नहीं था. अब ऐसा भी नहीं था कि लड़कों को गांड मारने मिली थी तो उन्होंने चूत का ध्यान नहीं रखा था. चूत में किसी ने एक तो किसी ने दो उँगलियाँ डाली हुई थीं और उन्हें वो अंदर बाहर कर रहे थे, जितना संभव हो पा रहा था. चारों औरतें अब दो तीन बार झड़ चुकी थीं और आनंद की चरम सीमा प्राप्त कर चुकी थीं.

पुनीत ने नीलम के भग्नाशे को अपनी उँगलियों से मसला तो नीलम को जैसे बिजली का झटका सा लगा और वो चीखती हुई एक बार फिर झड़ गई और उसके पानी से नीचे बिछा बिस्तर और गद्दे भीग गए. उसकी गांड पुनीत के लंड को अपने अंदर समाने के लिए सिकुड़ गयी और इसका परिणाम ये हुआ कि पुनीत भी अपने चरम पर जा पहुंचा. उसने नीलम की गांड में अपने लंड का रस छोड़ दिया. नीलम और पुनीत वहीँ ढेर हो गए. पुनीत का लंड अभी भी उसकी गांड में ही था. दोनों एक दूसरे से लिपटे हुए थे. नीलम ने उसे चूमने के लिए सिर घुमाया और दोनों एक दूसरे के साथ चुम्बन में लीन हो गए.

रमोना जो इन सबसे अधिक अनुभवी थी उसने हितेश के लंड पर अपनी गांड से चुसाव करना शुरू किया. अब हितेश का लंड उसकी गांड में और भी सट कर और तंग होकर जाने लगा. रमोना की चूत जितना पानी छोड़ सकती थी छोड़ चुकी थी. अब वो लौड़े का पानी पीने के लिए उत्सुक थी. हितेश ने जब अनुभव किया कि वो अब अधिक समय नहीं टिक पायेगा तो वो रमोना की चूत, विशेषकर उसके भग्नाशे को जोर जोर से रगड़ने लगा. रमोना के शरीर ने उसके इस विचार को कि वो अब और नहीं झड़ सकती गलत सिद्ध कर दिया.

हितेश ने जैसे ही अपने गाढ़े वीर्य से उसकी गांड को सींचा, उस गर्म संवेदना और चूत पर प्रहार से रमोना इस बार काँपते हुए झड़ने लगी. उसके शरीर ने अब उसका साथ छोड़ दिया और वो उसी स्थिति में आनंद से कराहते और सुबकते हुए ढीली पड़ गई. हितेश ने धीरे से अपना वीर्य और गांड के रस से सना हुआ लंड बाहर निकाला और रमोना के ही पास लेट गया. रमोना ने उसके चेहरे को हाथ में लिया और चूमने लगी.

आलोक और सचिन भी बहुत पीछे नहीं रहे और उन्होंने भी प्रीति और दिया की गांड में अपना पानी छोड़ा और उनके साथ लेटकर प्रेमालाप करने लगे. कुछ समय पश्चात् औरतों ने सफाई के लिए बाथरूम की राह ली और लड़कों ने भी दूसरे बाथरूम का उपयोग किया. बाहर आने के बाद चादरें उठाकर धोने के लिए डाल दी गयीं और गद्दे और तकिये वापिस स्टोर में लौटा दिए. सबको प्यास लगी हुई थी तो इस बार दिया ने सबके लिए बियर खोल ली. उसकी चाल की लचक बता रही थी कि सचिन के लंड ने भीतर तक आघात किया है. पर उसके चेहरे पर छाई लालिमा और चमक इससे मिली संतुष्टि को भी दर्शा रही थी.

सबने अपनी बियर समाप्त होने के बाद सोने के लिए अपने कमरे की ओर प्रस्थान किया. कल सुबह एक नया दिन था और कुछ तो नया होने की आशंका थी.

क्रमशः

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अध्याय ७: सातवां घर - वर्षा और समीर नायक १

आज राहुल, जयंत और कुसुम अपने खेतों के दौरे से लौट रहे थे. जब भी दोनों सप्ताह के लिए जाते थे कुसुम भी लगभग साथ चली ही जाती थी. घर में उस समय काम कम होता था जिसे बाक़ी तीनों महिलाएं अच्छे से संभाल लेती थीं. कुसुम की एक पहचान की औरत इन दिनों आती थी और इसके लिए उसे अच्छा पैसा भी मिल जाता था. सभी लोग बैठे हुए बातें कर रहे थे, शाम के ५ बजे थे और तीनों किसी भी समय आ सकते थे. तभी एक गाड़ी की आवाज़ आयी और फिर कार के दरवाजे के खुलने और बंद करने की. जयंत ने ड्राइवर से सामान अंदर लाने को कहा और तीनों अंदर प्रविष्ट हुए.

"आ गए तुम लोग, बहुत प्रतीक्षा कराई. हम तो २ बजे से राह देख रहे हैं." वर्षा ने कहा.

"हाँ माँ, हम लोग बीच में थोड़ा रुक गए थे, इसलिये देर हो गई. पर अभी तो ५ ही बजा है."

"जाओ तुम लोग नहा धो के कपड़े बदलो मैं तुम लोगों के लिए खाने को कुछ लगाती हूँ." सुलभा ने कहा और रसोई की ओर बढ़ गई.

"माँ जी, आप रहने दो, मैं हूँ न, मैं कर लूंगी." कुसुम ने आग्रह किया.

"अरे तू खुद भी तो थकी होगी. वैसे भी सप्ताह भर संतोष ने खूब रगड़ा होगा तुझे. जा तू भी तैयार हो जा. कल से कर लेना काम."

"अरे संतोष ने क्या रगड़ा होगा, इसे तो हम हर दिन यहाँ रगड़ते हैं तब तो नहीं थकती है." समीर ने हँसते हुए कहा.

"बाबू जी. आप बहुत गंदे हो." कुसुम ने मुंह बनाया पर उसके चेहरे पर मुस्कुराहट थी.

"तुझे आज रात बताएँगे कि हम कितने गंदे हैं." पवन ने भी हँसते हुए अपनी इच्छा प्रकट की.

कुसुम शर्मा के भाग गई और सब लोग हंसने लगे. कुछ ही देर में सभी आ गए.

"और राहुल और जयंत, खेतों के क्या हाल हैं?" समीर ने पूछा.

"पिताजी, इस बार फिर अच्छी फसल होगी. बाजार में दाम भी अच्छे मिलने की आशा है. इस बार हमने अपनी ६०% फसल का अनुबंध एक विदेशी कंपनी से कर लिया है. २५% का अगले दौरे में कर लेंगे. शेष खुले बाजार में बेचेंगे." राहुल ने बताया.

"हाँ ये ठीक रहेगा. कामगारों से कोई परेशानी तो नहीं है?"

"नहीं, संतोष ने सब अच्छे से संभाल रखा है. हर प्रकार से."

समीर ने अपनी ऑंखें टेढ़ी कीं तो राहुल ने समझाया, "उसने दो औरतों को पटाया हुआ है, और दोनों बिलकुल चटक माल हैं."

"तुमने कैसे जाना?"

"परसों दोनों के ले आया था गेस्ट हाउस में, बहुत एन्जॉय किया."

"राहुल, पर ये समझो कि इस प्रकार से कामगारों के साथ करना ठीक नहीं है. आगे से इस बात का ध्यान रखना. संतोष और कुसुम हमारे घर वाले हैं, पर ये तुम लोगों ने ठीक नहीं किया."

"ठीक है पापा, आगे से नहीं होगा. पर हफ्ते भर बिना चुदाई के रहना मुश्किल होता है."

"तो अंजलि को ले जाया करो, या अपनी दोनों मम्मियों को ले जाओ. पर ऐसा मुझे दोबारा नहीं सुनना है."

"तेरे पापा ठीक कह रहे हैं. जिसे चाहे उसे साथ ले जाओ. साथ भी रहेगा." वर्षा ने समर्थन किया.

"ओके पापा, मम्मी, अगली बार से ऐसा ही करेंगे. इस बार जयंत अंजलि को ले जायेगा. और मेरे साथ आप दोनों में से कोई चलना."

तभी कुसुम भी आ गई और रसोई में जाने लगी.

"अरे रहने दे आज, बोला न. सुलभा कर रही है. आ मेरे पास बैठ यहाँ." वर्षा ने उसे अपने पास बुलाया. "अंजलि तुम थोड़ा अपनी सासू माँ की सहायता करो और सबके लिए ड्रिंक्स बना दो."

"ओके, मॉम." अंजलि ने रसोई की ओर चल दी.

अंजलि रसोई में पहुँच कर सुलभा का हाथ बटाने लगी.

"अंजलि बिटिया, एक बात बोलूं?"

"जी माँ जी."

"आज राहुल को वर्षा के पास रहने दे, वो कह रही थी कि उसकी गांड में कीड़े चल रहे हैं जो सिर्फ राहुल ही निकाल सकता है. वो खुद तो तुझे कहेगी नहीं, सप्ताह भर बाद जो आया है. अगर तुझे ठीक लगे तो अपनी ओर से कह देना."

"ठीक है, माँ जी. मैं जयंत के पास रह लूंगी. बहुत दिन हुए भैया से अच्छे से मिलन नहीं हुआ है. और आपका क्या प्लान है?" अंजलि ने चुटकी ली.

"तेरे ससुर जी और पापा कह रहे थे कुछ. शायद कुसुम को भी बुला लें. पता नहीं, जैसे इनका मन में होगा, सो मेरे लिए ठीक है."

"हम्म्म, अगर पापा रहेंगे तो आपकी गांड की खैर नहीं." कहकर अंजलि ने उनकी गांड पर एक चपत लगाई और ग्लास की ट्रे लेकर बार की ओर चली गई.

सुलभा ने अपनी गांड को हलके से सहलाया, "कहीं दोनों न चढ़ जाएँ इस बुढ़िया पर. पर सच कहूँ तो आज मेरी ज्यादा शक्ति नहीं है. इनकी इच्छा के लिए एक बार कर लूंगी."

फिर उसने खाने का सामान एक ट्रे में लगाया और बैठक में आ गई. उधर अंजलि ने स्कॉच की बोतल, बर्फ और सोडा लिया और बीच टेबल पर रखकर सबके लिए पेग बनाने लगी. पहले अपने ससुर, फिर पिता को पेग दिए. फिर सास को दिया. अपनी माँ को पेग देते हुए कहा, "मम्मी आज मैं जयंत भैया के साथ सो जाऊं? बहुत दिन से हम लोगों की बात ही नहीं होती. आप अगर चाहो तो राहुल के साथ सो जाना. ठीक है?"

वर्षा का चेहरा खिल गया. "ठीक है, जैसे तेरी इच्छा। अब बात ही तो करोगे न?" उसकी हंसी छूट गई.

यूँ ही ड्रिंक लेते लेते बहुत समय हो गया. सुलभा ने सबको खाने के लिए बुलाया और सब खाना खाते हुए बातें करते रहे.

"भाईसाहब अब कोई अच्छी सी लड़की देखकर जयंत की भी शादी दीजिये." सुलभा ने समीर से कहा.

"हमारे परिवार में उसे दुविधा न हो और न हमें उससे, ये देखना बहुत आवश्यक है." समीर ने उत्तर दिया.

"ये बात तो सही है, फिर भी ढूंढने में क्या समस्या है?"

"मेरे लिए पहले ही कोई कमी है जो मुझे शादी करके एक और लड़की दिला रहे हो?" जयंत ने मजाक में बोला।

"हम सब तुम्हारे अकेले के लिए थोड़े ही सोच रहे हैं." अंजलि ने उसे छेड़ा, "यहाँ और भी पुरुष हैं, जिनके लिए ये सोचा जा रहा है."

सब हंसने लगे.

"चलो अब देर हो रही है. तुम जयंत से बात करने के लिए उसके साथ रहो." समीर ने कहा. "आइये समधन जी, आज आपकी थोड़ी सेवा कर दें."

समीर ने सुलभा का हाथ लिया और उसे खड़ा करते हुए, सुलभा के कमरे की ओर चल पड़ा. देखा देखी अंजलि ने जयंत के साथ अपने कमरे की ओर प्रस्थान किया. और वर्षा को राहुल हाथ पकड़कर वर्षा के कमरे की ओर ले गया.

"हम दोनों ही बचे हैं, कुसुम. क्या करें?" पवन ने पूछा.

"हम भी बाबूजी के साथ ही चलते हैं."

"ठीक है, चलो."

ये कहकर दोनों सुलभा और पवन के कमरे की ओर बढ़ गए.

वर्षा और राहुल:

"जी, मम्मी जी, क्या प्लान है."

"तुम्हारी शॉर्ट्स बहुत टाइट लग रहे हैं, क्या बात है."

"आपको देखकर ये हाल हुआ है. मुझे निकाल ही देना चाहिए, क्यूंकि अब कष्ट हो रहा है. आप सहायता करेंगी?"

वर्षा ने राहुल की टी-शर्ट उतार कर एक तरफ रख दी. और फिर शॉर्ट्स को खोलकर नीचे सरका दिया। राहुल ने अपने पावों को उठाकर उन्हें अलग किया. अब वो वर्षा के सामने नंगा खड़ा हुआ था. वर्षा ठगी सी उसके तने हुए लंड को देख रही थी.

"क्या हुआ माँ जी?"

"मुझे विश्वास नहीं होता की कोई लंड इतना बड़ा हो सकता है."

"अपने पहली बार तो नहीं देखा है."

"हाँ पर ये सच में बहुत अविश्वसनीय है." ये कहते हुए वर्षा उसे हाथ में लेकर सहलाने लगी. "मुझे याद है जब तुम अंजलि का हाथ मांगने आए थे. उस दिन भी तुम्हारा अजगर पैंट में दिख रहा था. तभी मैंने अंजलि से पूछकर तुम्हारी परीक्षा के लिया कहा था. अंजलि ने कहा था कि ये फेल जो जाये हो ही नहीं सकता."

"बात तो सही कही थी उसने. पापा के शुक्राणु का प्रभाव है."

"हाँ, पवन के बराबर ही हो तुम."

राहुल ने वर्षा को अपनी बाँहों में ले लिया, और उसे चूमने लगा. वर्षा भी उसका साथ दे रही थी. दोनों एक दूसरे के होंठ जैसे खा जाना चाहते थे. राहुल ने पीछे हाथ बढाकर वर्षा के ब्लॉउस के बटन खोले दिए और चूमते हुए ही उसका ब्लाउज निकाल दिया. उसके इस कृत्य से ये साफ था कि वो इस खेल का पारंगत खिलाडी है. फिर उसने नीचे से साड़ी खोली और वर्षा के शरीर से अलग कर दी. वर्षा ब्रा और पेटीकोट में बहुत लुभावनी लग रही थी. राहुल ने उसके पेटीकोट का नाड़ा खोला और वो भी धरती पर ढेर हो गया.

"आप सुंदरता की देवी हो. सच मैं अंजलि ने आप से ही अपनी सुंदरता पाई है." ये कहकर राहुल ने ब्रा के हुक खोले और उसे भी वर्षा के शरीर से अलग कर दिया. फिर वो घुटनों के बल बैठ गया और वर्षा की पैंटी को हलके से सरकाते हुए निकाल दिया. अब सास और दामाद एक दूसरे के सामने नंगे खड़े हुए थे. वर्षा एकटक राहुल के लंड को ताक रही थी.

"क्या माँ जी, क्या मेरा लंड सुपर लंड है"

"सच में तुम्हारा लंड बहुत बड़ा है. हाँ, ये सुपर लंड ही है, तुम्हारे पिता की श्रेणी का."

राहुल ने वर्षा के कंधे पर हाथ रखकर उसे धीमे से दबाया, "मम्मी जी, आपको मोटे और बड़े लंड अच्छे लगते हैं, इसमें कोई बुराई नहीं है. आइये, और अब अपने सुन्दर मुंह से इसकी प्रशंसा कीजिये."

वर्षा घुटनों के बल बैठ गई. उसे राहुल का ये स्वभाव अच्छा लगता था. वो चुदाई के समय उसे अपनी दासी के समान उपयोग करता था. पर चुदाई के बाद वो उसे पूरा आदर देता था. वर्षा ने उसके लंड को मुंह में लेकर चूसना शुरू किया. पर जैसा राहुल का स्वभाव था, उसने वर्षा के सिर के पीछे हाथ रखा और अपने लंड से उसके मुंह को चोदने लगा. वो ८-१० बार अंदर बाहर करता फिर उसका चेहरा पूरा अपने लंड पर दबा देता. इससे उसका लंड वर्षा के गले तक चला जाता था. कुछ पल रूककर वो दोबारा चोदने लगता. जब लंड गले तक जाता तो वर्षा की साँस रुक जाती और आंखों में आंसू आ जाते. ये सिलसिला कुछ ६ -७ मिनट तक चला. फिर एक बार पूरा सिर दबाकर राहुल ने वर्षा को छोड़ा और अपना लंड बाहर निकाल लिया.

"मुझे आपकी चूत का रस पीना है, मम्मी जी."

वर्षा बिस्तर पर लेट गई और एक तकिया अपनी गांड के नीचे लगाकर उसे उठा दिया. राहुल उसके सामने झुक कर चूत की फांकों को फैलाकर, वर्षा की चूत अपनी जीभ से चारों ओर चाटने लगा.

"उई माँ." वर्षा फुसफुसाई.

राहुल के अनुभवी मुंह के प्रभाव से वर्षा ज्यादा देर रुक नहीं पाई और उसने राहुल के मुंह में अपना पानी छोड़ दिया. वैसे भी जब अंजलि ने उसे राहुल के साथ सोने के लिए कहा था उसकी चूत पानी छोड़ रही थी. राहुल ने बेझिझक उसका सेवन किया और चूत पर अपना आक्रमण चलने दिया.

"राहुल, अब बस करो प्लीज. मेरी चूत बहुत संवेदनशील हो गई है. अब देर न करो और चोदो मुझे. तुम्हारे बड़े लंड के लिए ये इतने दिन से व्याकुल है."

"क्यों माँ जी, क्या पापा ने आपको नहीं चोदा इतने दिनों."

"चोदे क्यों नहीं, हर दिन ही चोदते थे, पर तेरी बात अलग है. तू मेरा दामाद है, मेरी बेटी का पति."

राहुल ने अपने लंड को वर्षा की चूत पर रखा.

"राहुल, मेरी चूत ज्यादा देर मत चोदना. आज तुझसे अपनी गांड मरवाने का बहुत मन है."

"अरे माँ जी, आप क्यों इतना सोचती हो. आपकी चूत भी अच्छे से चुदेगी और आपकी इच्छा के अनुसार आपकी गांड का भी भुर्ता बनाऊंगा."

ये कहते हुए राहुल ने एक नपा हुआ धक्का लगाया और वर्षा की खेली खिलाई चूत में एक ही बार में पूरा लंड ठोक दिया. वर्षा का शरीर अकड़ गया. राहुल अपना पूरा खम्बा डाल कर रुक गया जिससे वर्षा को पूरी गहराई भरने की अनुभूति हो सके. राहुल झुककर वर्षा के होंठ चूसने और मम्मे दबाने लगा. वर्षा उसका पूरे मन से साथ दे रही थी.

उसके बाद राहुल ने वर्षा की चूत में अपने लंड से उठक बैठक शुरू की. और शीघ्र ही एक अच्छी गति पकड़ ली. वर्षा अब आनंद की ऊँचाइयाँ छू रही थी. राहुल का जवान और तगड़ा लंड उसकी चूत की वो गहराइयाँ छू रहा था जो मानो अछूती थीं. वो मन ही मन अपने आपको धन्य मान रही थी कि उसकी बेटी ने ऐसा तगड़ा सांड अपने पति के रूप में चुना था. वो लगातार झड़ रही थी और उसकी मुंह से निशब्द चीखें निकल रही थीं.

अंजलि और जयंत:

दोनों भाई और बहन एक दूसरे का हाथ थामे हुए अंजलि के कमरे में आ गए.

"वैसे विवाह का आईडिया बुरा नहीं है. तुम्हे इस बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए."

"पर हमारे परिवार में स्थापित भी होनी चाहिए. मुझे नहीं लगता कि हम लोग अपना रहने के ढंग बदलने वाले हैं. और अगर बात बाहर चली गई तो बहुत समस्या हो जाएगी."

"वो ठीक है, पर अगर तुम हाँ करोगे तो हम इन्हीं मापदंडों पर ढूंढेगे. देर सवेर कोई सही लड़की मिल ही जाएगी."

"हम्म्म, वैसे विचार बुरा नहीं है. हर रोज मुझे अकेले सोना पड़ता है. कम से कम एक स्थायित्व तो आएगा. ठीक है. मुझे स्वीकार है."

"मेरा प्यारा भाई." कहकर अंजलि ने जयंत के होठों को चूमा. “पूरा परिवार इस समाचार से प्रसन्न हो जायेगा. मैं थोड़ा बाथरूम से आती हूँ, तब तक तुम २ पेग बना लो."

जयंत ने कमरे के बार से दो पेग बनाये और अपने कपड़े उतारने लगा और सिर्फ अंडरवियर पहन कर सोफे पर बैठ गया. कुछ ही देर में अंजलि एक तौलिया लपेटकर बाहर आ गयी. जयंत ने कपड़े उठाये और बाथरूम में घुस गया. मुंह हाथ धोकर वो भी एक तौलिया लपेटकर बाहर निकला और सोफे पर बैठ कर अपने पेग की चुस्कियाँ लेने लगा.

"पर ये बात तुम्हारी सास ने क्यों उठाई?"

"पता नहीं, शायद उनके मन में कोई लड़की होगी. जब तुमने न किया था तो उनका चेहरा उतर गया था."

"हाँ ये हो सकता है. और इस सप्ताह तुम लोगों ने क्या किया?"

"अरे इस बार तो पता नहीं क्या बात थी, दोनों पापा और ससुरजी मेरे पास फटके ही नहीं. एक दिन मम्मी के साथ सोते और अगले दिन सासू माँ के साथ. सच में मेरी तो चूत इतनी प्यासी है कि क्या बताऊँ. मैंने सोचा था कि तुम और राहुल को आज एक साथ चोदूगी, पर सासु माँ ने किचन में कहा कि मम्मी को राहुल से अपनी गांड की खुजली मिटानी है. अब मैं क्या करती. अच्छा हुआ तुम्हे किसी ने नहीं हथियाया नहीं तो मैं आज भी प्यासी ही रह जाती."

"मेरे रहते हुए तुम प्यासी रहो, ये कैसे हो सकता है. पर मम्मी को अब राहुल कुछ ज्यादा ही नहीं भाने लगा है?" जयंत ने कहा.

"मम्मी को अब राहुल या ससुरजी से गांड मरवाये बिना अब चैन नहीं आता. कल देख लेना रात में हमारे कमरे में आ जाएँगी."

जयंत ने अपना ग्लास समाप्त किया और अंजलि के पांवो में जाकर बैठ गया. फिर उसके तौलिये को एक ओर करके उसकी चूत पर एक चुम्मा लिया और अपनी जीभ उसकी दरार पर फिराई.

"उई आह." अंजलि ने सीत्कार ली.

"प्यासी तो है." ये कहकर जयंत उसकी चूत पर टूट पड़ा और कभी प्यार कभी आक्रोश से चूमने और चाटने लगा.

जयंत के लगातार और अनुभवी मौखिक सम्भोग और उसकी सप्ताह भर का सेक्स से व्रत के प्रभाव से अंजलि झड़ चुकी थी और अब वो निढाल सी पड़ी थी.

"क्या हुआ अंजलि."

"ये लोग ऐसा क्यों किये? सप्ताह भर के लिए मुझसे दूर रहे. और आने पर राहुल को भी अलग कर दिया. भला हो तुम्हारा, नहीं तो मैं आज भी प्यासी रह जाती."

"अरे अंजलि, मुझे नहीं लगता की उन्होंने ऐसा तुम्हे सताने के लिए किया होगा. तुम भी जा सकती थीं न अगर मन था. हमारे घर में कोई रोक टोक तो है नहीं."

"ज्यादा उनका पक्ष मत लो. अब मुझे चोद दो जल्दी." अंजलि ने आग्रह किया. "पर शायद तुम सच ही कह रहे हो. हम में से कोई ऐसा नहीं सोचता."

जयंत ने अपने लंड को अंजलि की चूत के मुंहाने रखा और रगड़ने लगा.

"यार, अब तू ये सब खेल बंद कर, और पेल अपना लौड़ा अंदर." अंजलि ने गुस्से से कहा.

"ओके, बेबी." ये कहकर एक ही झटके में जयंत ने पूरा लंड अंजलि की प्यासी चूत में उतार दिया.

"उफ्फ्फ" अंजलि ने एक संतुष्टि भरी आह भरी. वो आँखें बंद करके इस आनंद की अनुभूति कर रही थी.

जयंत एक धीमी और स्थिर गति से अंजलि को बहुत प्यार से चोद रहा था. वो आगे झुका और अंजलि के होंठ चूमने लगा. अंजलि भी उसका पूरा साथ दे रही थी. फिर जयंत उसके मम्मों के चूसने और चाटते हुए उसी गति से चोदने में लगा रहा. अंजलि को अपनी चूत में एक उबाल का अहसास हुआ.

"दादा, मेरा होने वाला है."

ये सुनकर जयंत ने अपना परिश्रम बढ़ा दिया और उसकी चूचियों को दबाने और हलके हलके से चबाने और काटने लगा. अंजलि का शरीर थरथराने लगा और वो फिर से झड़ गई. इससे जयंत के लिए घर्षण काम हो गया और उसका लंड अब और तेजी से अंदर की यात्रा करने लगा.

"रुको" अंजलि ने उसे हटने का इशारा किया. जयंत के लंड निकलने पर अंजलि ने बिस्तर के कपडे से अपनी चूत को पोंछ दिया।

"अब करो. तुम्हें इतनी गीली चूत में क्या मजा आ रहा होगा."

जयंत दोबारा अपने काम में लग गया पर इस बार उसके धक्के लम्बे और अधिक शक्तिशाली थे. उसके इन धक्कों के कारण बिस्तर इस समय बुरी तरह हिल रहा था। अंजलि को भी अब बहुत आनंद आ रहा था. वो अपनी गांड उछाल उछाल कर जयंत के धक्कों का प्रतिउत्तर दे रही थी. इस समय कामक्रीड़ा का वीभत्स नृत्य अपनी चरम सीमा पर था. दोनों को इसकी बिलकुल भी चिंता नहीं थी की ये सामाजिक विश्वासों के विरुद्ध है.

अंजलि का इतने दिनों का उपवास और जयंत की यात्रा की थकान अब दोनों पर हावी हो रही थी. दोनों अब अपने रतिक्षण के निकट पहुंच गए थे. जयंत ने अपनी गति बढ़ाते हुए बताया कि वो अब झड़ने वाला है, तो अंजलि ने उसे इशारा किया कि उसके चेहरे पर अपना कामरस डाले। जयंत ने अपना लंड बाहर खींचा और अंजलि के चेहरे के करीब कर दिया. अंजलि ने बड़े प्यार से उसे अपने मुंह में लिया और चूसने लगी. जैसे ही उसे ये लगा की जयंत का होने वाला है उसने अपने मुंह से निकल कर अपने चेहरे की ओर साध दिया और ऑंखें बंद कर लीं।

जयंत की पिचकारियाँ उसके सुन्दर चेहरे को गाढ़े सफ़ेद रस से सींच रही थीं. जब जयंत का प्रवाह समाप्त हुआ तो अंजलि ने एक बार उसके लंड को मुंह में लेकर चूसा और छोड़ दिया. फिर उसने वीर्य को अपने चेहरे पर मला और कुछ कतरे अपनी उँगलियों से बटोर कर अपने मुंह में डाल लिए और पी गई.

"पता नहीं राहुल क्या कर रहा होगा. अब तक मम्मी की गांड मारी भी होगी या नहीं? चाहे वो कितना भी थका हो, पर चुदाई में कमी नहीं रखता."

"मारी नहीं होगी तो मार लेगा. तुम्हें क्यों मम्मी की गांड की इतनी चिंता हो रही है. चलो एक एक पेग और लेते हैं और फिर सोते है."

ये कहकर जयंत बार की ओर बढ़ गया.

समीर, सुलभा, पवन और कुसुम:

जब पवन और कुसुम कमरे में अंदर गए तो वहां कार्यक्रम आरम्भ हो चुका था. समीर सोफे पर बैठा था और उसका पायजामा गायब था. उसका लंड इस समय सुलभा के मुंह में था और सुलभा ने अभी केवल साड़ी ही उतारी थी जो एक ओर पड़ी थी. ब्लाउज और पेटीकोट में इस समय उसका गदराया शरीर एक लुभावनी रंगभूमि का दर्शन करा रहा था.

"हम यहाँ रहें या जाएँ?" पवन ने समीर से पूछा.

"अब जब आ ही गए हो तो जाना क्यों?"

ये सुनकर कुसुम अपनी साड़ी उतारने लगी. और पवन ने भी अपने कपड़े निकलने में कोई संकोच नहीं किया. पल भर में ही कुसुम ने अपने कपड़े निकाल दिए और नंगी ही खड़ी हो गई. उसे कोई शर्म नहीं थी कि इस समय कमरे में तीन लोग और थे. यहाँ लज्जा के लिए कोई स्थान नहीं था, क्यूंकि अन्य सब भी काम क्रीड़ा में मग्न थे. पवन का लंड इस समय अपने पूरे रोब में था. उसका शरीर इस आयु में भी बहुत गठा हुआ था. सालों की मेहनत का फल था. और इस सबमे सबसे ज्यादा शक्तिशाली अगर कोई अंग था तो वो था उसका लंड, जो उसे एक उत्कृष्ट बीज के कारण प्राप्त था, जिसे उसने आगे अपने पुत्र राहुल को प्रदान किया था. कुसुम वहीँ अपने घुटनों के बल बैठ गई और पवन के लंड को अपने मुंह में ले लिया और उसे बड़े ही प्रेम और आसक्ति से चूसने लगी.

"बाबूजी, आपका लंड इतना बड़ा है की आसानी से मुंह में नहीं जाता है, पर मुझे इसे चूसना बहुत पसंद है." कुसुम बोली.

"मुझे भी तेरी चूत का स्वाद बहुत अच्छा लगता है, चल बिस्तर पर चलते है, मैं तेरी चूत का स्वाद लूँगा और तू मेरे लंड का."

पवन कुसुम के साथ बिस्तर पर गया और लेट गया, कुसुम आकर उसके ऊपर चढ़ गई और अपनी चूत उसके मुंह पर रख दी. और झुककर पवन का लंड मुंह में लेकर चूसने लगी. पवन अपनी जीभ से कुसुम की चूत कुरेद रहा था और उसके चारों और चाट रहा था. कुसुम इस समय स्वर्ग में थी. वो अपनी क्षमता के अनुसार पवन के विशालकाय लौड़े को अपने मुंह में ले रही थी. पवन ने कुसुम की गांड पर हाथ रखकर उसकी चूत को अपने मुंह की ओर खींचा और अपने मुंह से जोर जोर से चूसने लगा.

"बाबूजी!!!!!!" कहते हुए कुसुम झड़ गई. अब पवन के मुंह में उसका सारा पानी चला गया, जिसे पवन ने बड़े प्रेम से पी लिया. कुसुम हांफते हुए उसके बगल में लेट गई.

"लो, कुसुम का तो इन्होनें एक बार निकाल भी दिया पानी." सुलभा बोली.

"अरे समधन जी, आप क्यों निराश हो रही हो. चलो बिस्तर पर."

सुलभा बिस्तर पर आकर पवन के पास लेट गई. पवन ने उसका हाथ थम कर उसे बड़ी प्रेम भरी आँखों से देखा. सुलभा ने उसके होंठ पवन के होंठों पर रखे और एक गहरा चुम्बन लिया. उसे पवन के मुंह से कुसुम की चूत का स्वाद आया. और पवन को सुलभा के मुंह से समीर के लंड का स्वाद. पर अब इन सब भावनाओं को एक परे धकेला जा चुका था. सामूहिक सम्भोग में इस प्रकार होना स्वाभाविक था.

"बहुत मीठी है कुसुम की चूत, है न."

"सच में."

तब तक समीर आ गया और उसने सुलभा को उठाया और उसका ब्लाउज, पेटीकोट, ब्रा और पैंटी निकाल कर नंगा कर दिया. फिर उसने सुलभा की दोनों टांगे फैलायीं और अपने मुंह को उसकी चूत पर लगाकर आनन फानन चाटने लगा. इस समय उस डबल किंग साइज बिस्तर पर चार नंगे बदन एक दूसरे से लिपटे हुए थे.

कुसुम पवन के होंठ का रस पी रही थी और अपने एक हाथ से उसके लंड हो सहला रही थी. सुलभा का एक हाथ अब कुसुम की चूची पर था क्योंकि उसने अपना स्थान बदल लिया था और वो सुलभा की ओर आ चुकी थी. इससे उसका दांयां हाथ मुक्त हो गया था जिससे वो पवन के लंड को सहला रही थी. समीर ने सुलभा की चूत पर अपना आक्रमण निरंतर बनाये हुए था. वो सुलभा की चूत से लेकर उसकी गांड तक एक लकीर में चाट रहा था. उसकी एक उंगली सुलभा की चूत में अंदर बाहर हो रही थी. जब वो सुलभा की गांड के छेद को चाटता था तो उसकी ऊँगली सुलभा की चूत के अंदर खेलती. और जब वो सुलभा की चूत पर हमला करता तो वही उंगली सुलभा की गांड के अंदर यात्रा करती.

सच ये था की समीर मौखिक सम्भोग का विशेषज्ञ था. रुक रुक कर वो अपने दोनों हाथों से चूत की फांके खोलकर अपनी जीभ से अंदर का भ्रमण करता, और फिर यही क्रिया वो सुलभा की मखमली गांड के साथ भी करता. ये कहना अनुपयुक्त नहीं होगा कि सुलभा इस निरंतर आनंद से अनुभूत होकर २ बार झड़ चुकी थी, पर सुलभा की विनतियों की अपेखा करते हुए समीर ने उसे अभी भी छोड़ा नहीं था. समीर अपने साथ सम्भोग करती स्त्री को तब तक मौखिक सुख देता जब तक वो ये नहीं जान लेता कि अब वो स्त्री अब उसे अपने साथ किसी भी प्रकार का व्यव्हार करने से रोक नहीं पायेगी. इसके विपरीत वो स्त्री इतनी विकृत सम्भोग कि आशा करती की समीर भी कई बार चकित रह जाता.

और इस समय सुलभा उस अवस्था में पहुँच चुकी थी. जैसे ही सुलभा ने तीसरी बार अपना रस छोड़ा, समीर ने उससे प्रश्न किया, "तो समधन जी, क्या इच्छा है आपकी आज."

"आज कुछ खास नहीं. आज दिन भर काम और प्रतीक्षा करते करते थक गई हूँ. बस एक बाद अच्छे से चोद दीजिये. फिर मैं सोना चाहूंगी."

ये सुनकर समीर ने अपना लंड सुलभा की चूत पर रखा और बड़े प्यार से अंदर डालकर उसे चोदने लगा. अगर सुलभा ने बताया न होता कि वो थकी है तो समीर उसकी अच्छी मरम्मत करने के मन बनाये था. पर उसे प्यार करना भी उतने ही अच्छे से आता था और अब वो अपनी उसी कला का बखूबी प्रदर्शन कर रहा था. वो अपने लंड को चलते हुए जितना संभव हो सकता था उतना सुलभा के शरीर को चूम रहा थे. उसके कानों, गालों और गर्दन पर उसने चुम्बनों की झड़ी लगा दी थी. रह रह कर वो उन्हें चाटता और अपने होठों से बिना दाँत उपयोग किये हुए हलके से काटता। यही वो उसकी चूचियों के साथ भी कर रहा था और अपने लंड से उसकी चूत की चुदाई भी.

उनके बगल में ही कुसुम अब पवन के लंड पर सवार उठक बैठक कर रही थी. इस आसन में पवन का विशाल लंड कुसुम की उन गहराइयों को छू रहा था जहाँ अब तक कुछ ही पहुँच पाए थे. उसने अपने शरीर को इस अभ्यास में आगे झुकाया हुआ था और पवन के शक्तिशाली हाथ उसके दोनों मम्मों को बेरहमी से मसल रहे थे. पर अब कुसुम की गति धीमी पड़ गई थी. सफर की थकान और शराब के प्रभाव से उसका शरीर उत्तर देने लगा था. उसके ३ बार झड़ने के कारण भी ये संभव था. उसकी ये अवस्था देखकर पवन ने उसकी कमर को पकड़ा और उसे पलटा कर नीचे लिटा दिया और उसके ऊपर चढ़ गया. ये पवन के बलशाली व्यक्तित्व का ही प्रभाव था की इस काम में उसका लंड कुसुम की चूत से बाहर नहीं आया. पर कुसुम को जहाँ इसमें थोड़ा आराम मिला वहीँ उसे ये भी आभास हो गया कि अब उसकी चूत की असली कुटाई होगी. अभी तक उसके ऊपर रहने के कारण वो नियंत्रित कर रही थी.

"समीर, ये दोनों आज काफी थकी है. चलो अब इनको दबा के पेलें और फिर आराम करने दें."

"ठीक है पवन. १, २, ३, गो. "

बस फिर क्या था दोनों समधियों ने अपनी गति बढ़ा दी और पूरी गहराई तक लम्बे और ताकतवर धक्के लगाने लगे. सुलभा तेजी के साथ झड़ गई और वहीँ निढाल हो गई. यही उसके साथ लेटी कुसुम का भी हुआ. दोनों समधियों ने लगभग ७-८ मिनट और चोदा और फिर अपने अपने पानी से दोनों चूतों को सरोबार कर दिया. दोनों बाजू में लेट कर सुस्ताने लगे. फिर समीर उठा और कुसुम को उठाने ही वाला था तो देखा कि वो सो चुकी है.

उसने अपने लिए एक पेग बनाया और सोच में डूब गया. उसका ध्यान अब उस समय पर गया जहाँ से ये सब प्रारम्भ हुआ था.

वर्षा और राहुल:

राहुल ने वर्षा को कुतिया का आसन ग्रहण करने के लिए कहा. वर्षा अपने घुटनों के बल बैठकर आगे झुक गई और अपना मुंह तकिया में गाढ़ दिया. राहुल ने अपना लौड़ा वापिस वर्षा की चूत में डाला और भयंकर गति से धक्के लगाने लगा. वर्षा की चूत में से फच्च फच्च की आवाज़ आ रही थी. उसने अपनी चीखें तकिया में दबा रखी थीं. परन्तु राहुल को मन में कोई दया भावना नहीं थी, क्योंकि वो जानता था कि उसकी सास को उससे ऐसी ही चुदाई की इच्छा रहती है. प्यार से चोदने के लिए तो उसके पति और बेटा ही पर्याप्त है.

पर जब भी उसे कठोर और निर्दयी चुदाई की इच्छा होती तो वो हमेशा राहुल और उसके पिता पवन की शरण में ही आती थी. हफ्ते में एक बार तो बाप या बेटे में से कोई एक तो उसकी सेवा करता ही था. और जब उसे ज्यादा ही चुदास चढ़ती तो बाप बेटा दोनों ही जुगलबंदी करते. परन्तु ऐसा कम ही होता था, क्योंकि राहुल और पवन जब एक साथ होते तो कभी कभार उनकी चुदाई एक वीभत्स रूप ले लेती थी जो किसी भी स्त्री के लिए झेलना वीरता का कार्य होता है.

पर इस समय वर्षा अपने आपे में नहीं थी. राहुल ने उस पर ऐसी चढ़ाई की थी कि उसका रोम रोम चीख रहा था. पर अभी खेल का आखिरी पड़ाव शेष था. जिसके कारण ही उसने सुलभा से राहुल द्वारा गांड मरवाने की इच्छा जताई थी.

"माँ जी, आपकी चूत अब बहुत बह रही है, मेरे ख्याल से अब आपकी गांड का नंबर लगा दिया जाये. खुजली तो आपको वहीँ हो रही है न." राहुल ने अपनी ऊँगली को चूत के रस से भिगो कर वर्षा की गांड में डालते हुए सवाल किया.

"हाँ बेटा, मार दे मेरी गांड. पता नहीं कब से तेरे लौड़े के लिए खुजला रही है."

राहुल ने वर्षा की चूत के नीचे से उसका बहता हुआ पानी इकठ्ठा किया और उसकी गांड के छेद पर मला, फिर यही कार्य उसने दोबारा किया और इस बार उसने गांड के अंदर की मालिश की. फिर वो उठा और टेबल से वेसलीन की ट्यूब उठाई. अपने बाएं हाथ के अंगूठे और एक ऊँगली से गांड के छेद को खोला और ट्यूब से वेसलीन डालकर लबालब भर दिया. फिर उसने ट्यूब फेंक दी और गांड के छेद को बंद किया. थोड़ी वेसलीन पिचक कर बाहर निकल आयी जिसे अपने लंड पर मल लिया. फिर उसने दो उँगलियों से गांड के अंदर की अच्छी तरह से मालिश की.

अब वर्षा की गांड उसके लौड़े के लिए तैयार थी.

"माँ जी, कैसे मरवानी है? प्यार से या..."

"फाड़ दे." वर्षा ने राहुल की बात पूरी भी न होने दी.

"पहले कहतीं हो बिना वेसलीन लगाए फाड़ता, पर जैसी आपकी इच्छा." ये कहकर राहुल ने अपना लंड वर्षा की गांड पर लगाया और धीरे से अपने लंड के टोपे को गांड में डाला. जब गांड की झिल्ली से उसका टोपा अंदर चला गया तब उसने एक तगड़ा धक्का मारा. धक्का इतना तेज था की बिस्तर हिल गया और वर्षा का शरीर आगे की ओर ढकल गया. अगर राहुल ने उसकी कमर जोर से न पकड़ी होती तो वर्षा धराशायी हो गई होती. परन्तु वर्षा का चेहरा तकिये में और अंदर तक गढ़ गया. पर राहुल के लंड ने अपना लक्ष्य पा लिया था. इस समय उसका पूरा लंड वर्षा की गांड में जड़ समेत गढ़ा हुआ था.

राहुल कुछ समय के लिए रुका, जिससे की वर्षा को अपनी गांड के पूरा भरा होने का आनंद आये। फिर उसने अपने लंड से उसकी मुलायम और मखमली गांड की चुदाई शुरू की. हलके छोटे धक्कों से शुरू करके राहुल थोड़ी ही देर में अपने पूरे लंड से वर्षा की गांड का बंटाधार कर रहा था. देखने वाले इस समय वर्षा पर दया करते, पर राहुल में ऐसी कोई भावना नहीं थी. उसकी सास ने खुद अपनी गांड की सर्वनाश की इच्छा जताई थी और वो किसी भी चुनौती से डरने वाला नहीं था. वर्षा का चेहरा तकिये में गढ़ा हुआ था, इस समय उसे इतनी पीड़ा मिश्रित आनंद आ रहा था कि वो अपने सुध खो बैठी थी. उसका सिर आनंद की अधिकता से चक्कर खा रहा था. उसके शरीर का सारा लहू उसकी गांड की और ही बह रहा था.

राहुल ने एक हाथ से उसकी पीठ और एक हाथ से उसके सिर को दबाया और भयावने रूप से उसकी गांड में अपने पूरे विशाल लंड से पिलाई करने लगा. वर्षा इस समय पीड़ा और आनंद के परस्पर विरोधी भावों में खोई हुई थी. जब लंड अंदर जाता तो उसे पीड़ा का संवेदन होता और बाहर निकलने पर आनंद का. पर इनके बीच का समय इतना क्षणिक था की वो एक ऐसी लहर पर सवार थी जिसका हर पल एक नए सुख की अनुभूति करा रहा था. राहुल अब अपनी शक्ति के अनुसार उसकी गांड मार रहा था. फिर उसने वर्षा के बाल पकडे और उसे घोड़ी के आसन में ले आया. एक हाथ से पीठ दबाये, एक हाथ से बाल पकड़कर वो अपने लंड से गांड में लम्बे, गहरे और शक्तिशाली धक्के मार रहा था.

"मर गई मैं. अब बस कर दुष्ट. मेरी गांड फट गई पूरी. अब छोड़ दे, राक्षस."

राहुल ने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया क्योंकि अब वो भी अपने स्खलन के निकट था. उसने धक्कों की गति कम की फिर जैसे ही उसे लगा कि उसका पानी छूटने वाला है, उसने पड़े सावधानी से अपना लंड वर्षा की गांड से बाहर निकाला। उसने बड़े प्रेम से वर्षा की गांड के खुले छेद को देखा, जिसका अंदरूनी भाग लाल चुका था और मानो बाहर आने के लिए छटपटा था. राहुल मुस्कुराया, यही दृश्य उसे अत्यंत सुख देता था, जब वो अपने लंड के प्रताप से क्षत विक्षत गांड को देखता था. इस समय वो छेद इतना चौड़ा था कि उसमें ४ इंच गोलाई कोई भी वस्तु बना रोक टोक के जा सकती थी.

वो उठकर वर्षा के सामने गया और अपने वीर्य और वर्षा की गांड के रस से सना लंड वर्षा के मुंह में डालकर उसके मुंह को बेरहमी से चोदने लगा. २-३ मिनट में उसका लंड अपना पानी वर्षा के मुंह में वृष्टि करने लगा. जब उसने अपनी टंकी खाली कर दी तो एक झटके से वर्षा का मुंह अपने लंड से अलग कर दिया. वर्षा इस समय गहरी सांसे ले रही थी. उसके मुंह से राहुल का वीर्य जो उसके पेट में न जा पाया था बाहर निकल रहा था. राहुल ने अपने लंड से ही उस वीर्य को वर्षा के चेहरे पर मल दिया. फिर गहरी सांसे लेता हुआ वो सामने पड़े सोफे गया.

वर्षा अब उलटी ही लेती हुई अपनी सांसों की संयत कर रही थी. राहुल ने उठकर दो एक्स्ट्रा लार्ज पेग बनाये। वो फिर वर्षा के पास गया और उसे बड़े प्रेम से उठाकर सोफे पर बैठा दिया और उसे उसका पेग दे दिया. वर्षा ने दो ही घूँट में वो पेग ख़त्म कर दिया और राहुल से एक और बनाने को कहा. राहुल ने भी अपना पेग समाप्त किया और दोनों के लिए नए पेग बना लाया.

"जानते हो, मैं कभी कभी सोचती हूँ कि तुमसे ऐसी चुदाई के लिए न कहूँ, तुम हड्डियाँ हिला देते हो. पर कुछ ही दिन में मेरा ये संयम टूट जाता है. शरीर ऐसी ही चुदाई में लिए लालायित हो जाता है."

"माँ जी, इतना मत सोचा करिये. जीवन में जिस भी क्रिया में आपको सुख मिलता हो करिये."

"तुम सच में बहुत अच्छे हो, मेरी बेटी बड़ी भाग्यशाली है जिसे तुम्हारे जैसा पति मिला."

"हम भी माँ जी, जिसे आप लोगों जैसा परिवार मिला."

*****

उधर पास के एक कमरे में अंजलि की नींद एक चीख सुनकर खुल गई थी. ये चीख उसकी माँ की थी.

वो मन ही मन मुस्कुराई, "चलो माँ ने अपनी गांड की खुजली मिटा ही ली." और ये सोचते हुए वो जयंत से सट कर दोबारा सो गई.

बेंगलुरू का एक घर:

कमलेश अपनी सेमेस्टर समाप्ति की अंतिम क्लास करने के बाद ४ बजे घर पहुंचा. आज वो अपनी बहन काम्या के साथ संभ्रांत नगर जाने वाला था, रात १० बजे की ट्रेन से. काम्या की छुट्टी २ बजे ही हो गई थी और वो घर आ गई थी सामान लगाने के लिए. अब ६ सप्ताह का अवकाश था और फिर उनका अंतिम सेमेस्टर शुरू होना था. दोनों भाई बहन को अच्छी नौकरी मिल गई थी. काम्या को तो उनके ही शहर में मिली थी, पर कमलेश को कोई १०० किमी दूर दूसरे शहर में. पर वो भी अपने ही शहर के लिए प्रयास कर रहा था.

उसने अपने घर का दरवाजा खोला तो शयनकक्ष से कुछ आहों और सीत्कार के साथ थप थप की ध्वनि सुनाई पड़ी. कमलेश के चेहरे पर मुस्कान बिखर गई. घर को लॉक करने के बाद वो सोच में पड़ गया. लगता है काम्या अपने बॉयफ्रेंड को साथ ले आयी थी. सामान्य रूप से वो ऐसे समय में बाहर चला जाता था कुछ समय के लिए, पर उसे बाथरूम जाना अति आवश्यक लग रहा था. इसीलिए उसने दबे पांव कमरे में प्रवेश किया और बाथरूम की ओर जाने लगा.

उसने एक चोर भरी आंख से बिस्तर की और देखा तो उसे आश्चर्य हुआ. ये काम्या का बॉयफ्रेंड नहीं था. एक अधेड़ उम्र का आदमी इस समय काम्या को चोद रहा था. कमलेश बाथरूम में गया और अपना काम समाप्त करने के बाद उसने अपने कपडे उतार कर खूंटी पर टांग दिए. फिर एक छोटा सा स्नान किया और वैसे ही नंगा कमरे में चला आया. उस आदमी ने कमलेश को देखा और मुस्कुरा दिया. कमलेश ने अपने लंड को काम्या के मुंह से लगाया और काम्या ने निसंकोच उसे एक प्यार भरी दृष्टि से देखते हुए लंड को अपने मुंह में निगल लिया.

“आप कब आये, पापा?” कमलेश ने उस आदमी से पूछा.

“बस ये समझो कि काम्या और मैं एक साथ ही पहुंचे थे घर.” उस आदमी ने अपनी चुदाई के क्रम को बिना तोड़े हुए उत्तर दिया.

“पहले क्यों नहीं बताया. हम तो आज घर जा रहे थे रात को. पता होता तो एक दिन और रुक जाते.” कमलेश अपने लंड को काम्या के मुंह में चलाते हुए बोला।

“ऐसे ही कार्यक्रम बन गया. अब दो सप्ताह कोई काम नहीं है खेतों में. मैंने भाईसाहब से कल बात की तो उन्होंने घर आने के लिए कहा. कुछ समझौते २ सप्ताह बाद ही होने हैं. और भाईसाहब चाहते हैं की सुपरवाइसर पर कुछ जिम्मेदारी छोड़ी जाये हर काम मैं ही न करूँ।”

“आप दोनों मेरी चुदाई कर रहे हो या अपनी मीटिंग? पापा, आपने तो बहुत ही धीमा कर दिया सब कुछ.” काम्या कुछ गुस्से से बोल पड़ी.

“बस एक बात और, मैं गाड़ी और ड्राइवर दोनों लाया हूँ, हम लोग खाने के बाद निकलेंगे, साथ में.”

ये कहकर सब लोग चुदाई में व्यस्त हो गए.

७ बजे वे सब घर बंद करके निकल पड़े. पास ही के एक रेस्त्रां में खाना खाने के बाद वो संभ्रांत नगर के लिए चल पड़े. रात के २ बजे तक पहुँचने का अनुमान था. रास्ता बहुत अच्छा था और १० बजे के लगभग कमलेश और काम्या सो गए. संतोष ड्राइवर के साथ बैठा हुआ बात करता रहा. यात्रा बहुत शांति से निकल गयी और रात के २.३० बजे, वे सब घर पहुँच गए.

वहां पहुंचकर संतोष ने ड्राइवर को एक बोतल शराब की दी और काफी सारा चिकन वगैरह जो उन्होंने बीच में रूककर लिया था. बचे हुए खाने को, जो अभी भी बहुत था, लेकर वे सब घर के अपने हिस्से में चले गए. कमलेश ने सामान निकाला और साथ में अंदर चला गया. कुसुम बहुत देर से प्रतीक्षा कर रही थी. अपने बच्चों को देखकर माँ की आँखों में आंसू आ गए. दोनों बच्चे अपनी माँ के गले से लग गए. और सब अंदर चले गए.

क्रमशः

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अध्याय ८: आठवाँ घर - स्मिता और विक्रम शेट्टी १


मेहुल कॉलेज से घर पहुंचा तो उसने घर में स्नेहा की गाड़ी खड़ी देखी। उसका मन प्रसन्न हो गया. वो अंदर गया तो स्मिता बैठक में टीवी देख रही थी.

"माँ, स्नेहा आयी है क्या?"

"हाँ, जब गाड़ी देख चुका है तो पूछ क्यों रहा है."

"कहाँ है, भाभी के साथ?"

"हाँ दोनों बहनें श्रेया के ही कमरे में हैं. अरे तू कहाँ चल पड़ा? अरे रुक तो!" स्मिता ने उसे रोकने का प्रयास किया.

"मिल कर आता हूँ." मेहुल ने उत्सुकता से उत्तर दिया और सीढ़ी से ऊपर मोहन और श्रेया के कमरे की ओर चल पड़ा.

जब वो कमरे के बाहर पहुंचा तो उसे कुछ आवाजें आती सुनाई दीं. उसका माथा ठनका क्योंकि ये निःसंदेह चुदाई की आवाजें लग रही थीं. पर ये कैसे हो सकता है? उसकी उत्सुकता बढ़ गई. नीचे से उसकी माँ उसे पुकार कर बार बार नीचे आने को कह रही थी. तो क्या माँ को पता था की यहाँ कुछ खेल चल रहा है? उसने हलके से दरवाजे को धकेला तो वो खुल गया. उस दरार से उसने जब अंदर झाँका तो उसके होश उड़ गए.

बिस्तर पर उसकी भाभी श्रेया नंगी पड़ी थी. उसकी जांघों के बीच में एक लड़की का सिर छुपा हुआ था. वो लड़की भी नंगी ही थी. अवश्य ही स्नेहा थी क्योंकि वो उसे अच्छे से पहचानता था. बहनों के बीच ऐसे सम्बन्ध बनना संभव था, उसने कई जगह यह पढ़ा था. इसीलिए उसे इस बात पर इतना झटका नहीं लगा. जिस दृश्य ने उसके होश गुम कर दिए वो था वो पुरुष जो स्नेहा के पीछे था और उसे चोद रहा था.

वो कोई और नहीं बल्कि विक्रम शेट्टी था, उसके पिता!

मेहुल सकते में था और वो दरवाजे का सहारा लेकर ठगा सा देख रहा था. तभी उसे पीछे से आहट सुनाई दी और उसकी माँ ने आकर दरवाजा वापिस बंद कर दिया और उसका हाथ पकड़कर उसे अपने साथ लगभग घसीटते हुए नीचे ले गई. मेहुल कुछ भी न बोल पाया. नीचे स्मिता ने उसे सोफे पर बिठाया और पानी लेने किचन में चली गई.

पानी पीकर मेहुल ने अपने शब्द संजोये, "माँ हमारे घर में ये क्या चल रहा है?"

"तुम पहले जाकर कपड़े बदल लो. फिर मैं तुम्हे बताती हूँ."

**********

उस कमरे में बाहर क्या हुआ था इससे अनिभिज्ञ विक्रम स्नेहा को बड़े प्यार से चोद रहा था. वहीँ स्नेहा अपनी दीदी की चूत चाट रही थी.

"दीदी, जीजू कब तक आएंगे" स्नेहा ने पूछा.

श्रेया ने घड़ी की ओर देखा तो अभी ४ बजे थे. "अभी समय है, ६ के पहले नहीं आते कभी. तुझे क्या काम है उनसे?"

"मुझे उनकी कंपनी में ट्रेनिंग लेनी है, उसी के लिए बात करनी थी."

"अरे तुझे थोड़े ही मना करेंगे मोहन, तू तो उनकी सबसे प्यारी साली है."

"इकलौती साली हूँ." स्नेहा ने श्रेया की चूत पर जीभ फिरते हुए कहा.

"थोड़ा अच्छे से और अंदर तक चाट न. कुछ पता नहीं लग रहा."

ये सुनकर स्नेहा ने अपनी गतिविधि तेज कर दी और एक उंगली भी श्रेया की चूत में डालकर उसके भगनासे को चूसने लगी. श्रेया उछल गई पर स्नेहा ने अपना चेहरा नहीं हटाया. उसके पीछे विक्रम अब अपनी चुदाई को गतिशील कर रहा था. कसी चूत में उसका लंड बहुत घर्षण के साथ जा रहा था.और उसने भी स्नेहा की नक़ल करते हुए, स्नेहा के भग्नासे को दो उँगलियों में लेकर हलके से मसल दिया और रगड़ने लगा. अब बारी स्नेहा के उछलने की थी.

"अंकल मेरा होने वाला है."

"जा अपनी दीदी के मुंह पर बैठ, उसे पिलाना अपना शरबत."

स्नेहा तुरंत उठी और अपनी चूत को श्रेया के मुंह पर लगा दिया. विक्रम घूमकर उसके पीछे गया और अपना लंड फिर उसकी चूत में ठोककर चोदने लगा. स्नेहा कांपने लगी और थरथराते हुए उसने पानी छोड़ दिया। विक्रम ने अपना लंड बाहर निकला और स्नेहा का रस श्रेया के मुंह में जाने लगा. श्रेया ने निसंकोच उस रस को पी लिया और अपनी जीभ अपने होठों पर फिराई. विक्रम भी अब निकट था, उसने अपना लंड वापिस स्नेहा को चूत में पेला और तेज धक्के लगाने लगा. कुछ ही समय में उसका भी पानी छूटने को हुआ तो उसने अपने लंड को श्रेया के मुंह पर रखा.

"ले श्रेया, तेरी आज की औषधि."

श्रेया ने अपना मुंह खोलकर लंड को गपक लिया और चूसने लगी. विक्रम ने बिना देरी किये अपना रस उसके मुंह में छोड़ दिया. और फिर अपना लंड बाहर खींच लिया और एक ओर हट के खड़ा हो गया. अगला दृश्य उसका सबसे प्रिय दृश्य था. श्रेया बैठ गई, उसका मुंह फूला हुआ था. उसने वीर्य पिया नहीं था. फिर उसने अपने मुंह को स्नेहा के मुंह से लगाया और कुछ अंश स्नेहा के मुंह में छोड़ दिया.

फिर दोनों बहनों ने अपने हिस्से का टॉनिक पी लिया और एक दूसरे को फिर से चूमा.

"चलो नीचे माँजी प्रतीक्षा कर रही होंगी."

सबने अपने कपडे पहने और नीचे के और चल पड़े.

**********

जब मेहुल कपडे बदलने के लिए गया तो स्मिता ने अपना फ़ोन से एक नंबर लगाया.

"हैलो, मनोज, हाँ सुनो तुम तुरंत घर आ जाओ. मेहुल आज जल्दी आ गया और उसने श्रेया, स्नेहा और तुम्हारे पापा को देख लिया. अब समय आ गया है की उसे सब बता दिया जाये."

दूसरी ओर की बात सुनकर उसने फ़ोन काटा और एक दूसरा नंबर लगाया.

"सुनिए, आप अभी नीचे मत आना. मैंने मनोज को भी बुला लिया है. मेहुल ने आप तीनों को देख लिया है. यस, आई थिंक इट इस टाइम टू टेल हिम द ट्रुथ। आप लोग वहीँ रुको जब तक मैं न बुलाऊँ."

फोन रखकर वो सोचने लगी कि मेहुल को कैसे बताएगी. पर उन्हें पता था कि ये दिन दूर आना है, इसीलिए वो तैयार तो थे पर इस आकस्मक घटना से उनका समय चक्र अब बदल गया था.

मेहुल नीचे आ गया, उसे देखकर स्पष्ट था कि वो इस समय एक भ्रम की स्थिति में है.

"तुम्हारी गर्लफ्रेंड शीबा कैसी है?"

"ठीक है. आप कुछ बताने वाली थीं."

"हाँ. हम तुम्हे तुम्हारे २०वें जन्मदिन पर अगले महीने बताने वाले ही थे. पर अब उस वार्तालाप को आज ही करना होगा. मनोज भी कुछ ही देर में आने वाला है. महक भी अपने समय से आने ही वाली होगी."

"ये क्या है, क्या इसमें सब सम्मलित हैं?"

"हम सब ये बात एक साथ करेंगे। प्लीज, थोड़ा धीरज रखो. मेरे लिए."

मेहुल मन मार कर बैठ गया.

**********

लगभग २० मिनट में मोहन घर पहुँच गया. उसने देखा कि मेहुल बहुत उत्तेजित अवस्था में था. उसने एक गहरी श्वास ली और स्वयं को संयत किया. ये दिन तो आना ही था, पर उन्होंने इसे किसी और समय और प्रकार में इसकी योजना की थी, जो अब व्यर्थ हो चुकी थी. उसकी ऑंखें स्मिता से मिलीं तो स्मिता ने अपना फोन निकला और विक्रम को एक मिस कॉल दे दिया. ये संकेत था नीचे आने का. विक्रम, श्रेया और स्नेहा नीचे आये, विक्रम ने स्नेहा को चले जाने के लिए पहले ही कह दिया था. इसीलिए स्नेहा सीधे बाहर जाने लगी. पर उसे अपने ऊपर मेहुल की ऑंखें गढ़ती हुई लग रही थीं.

"मेहुल, बेटा हम तुम्हारे २०वें जन्मदिन की प्रतीक्षा कर रहे थे कुछ बताने के लिए. पर शायद वो समय आज ही आ गया है." विक्रम ने कहा.

"पापा, ऐसा क्या है जिसे आप मुझे पहले नहीं बता सकते थे. और जो अभी आप लोग कर रहे थे, ये कैसे संभव है? और मोहन दादा भी ऐसा नहीं लगता कि इससे विचलित है."

"नहीं. हम ये पहले नहीं बता सकते थे. हमारा परिवार और हमारी जैसे सोच वाले परिवार एक विशिष्ट समुदाय के सदस्य हैं. और उसमे प्रवेश के लिए २० साल का होना अनिवार्य है." विक्रम ने उत्तर दिया.

"कैसा समुदाय? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा."

"हम सब एक ऐसे समुदाय के सदस्य हैं जिसमे अपने परिवार वालों के साथ हम अपार प्रेम करते हैं. और यह हर रूप में होता है, मानसिक, सामाजिक और शारीरिक." मोहन ने बताया.

मेहुल का सिर घूम गया. "मैं कुछ समझा नहीं."

"इसका मतलब ये है की हम सब एक दूसरे के साथ सम्भोग करते हैं."

"यानि आप मम्मी....."

"हाँ और महक भी. श्रेया का परिवार भी उसका हिस्सा है और हमारी शादी भी उनकी सम्मति से हुई है. और अगले महीने जब तुम २० वर्ष के होंगे तो तुम भी उसमे सम्मिलित हो सकोगे. "

"क्या मतलब, फिर मैं मम्मी के साथ."

"हाँ, मम्मी, महक, श्रेया, स्नेहा और उनकी माँ सबके साथ तुम सम्भोग कर सकते हो."

मेहुल अब सकते में था. वो हमेशा अपनी माँ को केवल माँ नहीं बल्कि एक स्त्री के रूप में भी देखता था. और स्नेहा पर तो वो लट्टू था. अगर वो इस प्रस्ताव को मान लेगा तो न सिर्फ ये दोनों बल्कि उसकी भाभी, बहन और श्रेया की माँ भी उसके बिस्तर में होंगी. उसका मन प्रफुल्लित हो गया.

"तो क्या मुझे इस सब के लिए अगले महीने की प्रतीक्षा करनी होगी?"

"नहीं मेहुल, अपने घर और मोहन की ससुराल में तो तुम चाहो तो आज से ही सम्मिलित हो सकते हो. पर शेष सदस्यों से भेंट के लिए रुकना होगा." ये महक थी जो आ चुकी थी और सारी बातें सुन चुकी थी. "मेरे विचार से इस एक महीने के लिए हम चारों ही तुम्हारे लिए पर्याप्त होंगे."

"मुझे पहले मम्मी चाहिए।"

सबने एक चैन की सांस ली और हंस दिए. जितना कठिन उन्होंने सोचा था उससे कहीं सहज रहा था.

"आपने सुना. आज मैं मेहुल के साथ सोऊंगी. आप अकेले ही रहेंगे."

"ओह, यू डोंट वरी डियर. मुझे विश्वास है कि महक आज अपने पापा को अपने प्यार से ओतप्रोत कर देगी."

"पूर्ण रूप से" महक ने हँस के कहा.

"तो चलो इस बात पर एक पार्टी हो जाये. श्रेया व्हिस्की की बोतल और सब सामान ले आओ." विक्रम ने श्रेया को आदेश दिया.

"ओके, पापा."

और एक पार्टी आरम्भ हुई.

*********

स्मिता का शयनकक्ष: स्मिता और मेहुल

स्मिता ने मेहुल का हाथ पकड़ा और उसे अपने कमरे में ले गई. कमरे में जाकर उसने मेहुल को बिस्तर पर बैठा दिया.

"क्या तुम्हें कोई असहजता लग रही है?" स्मिता ने प्यार से पूछा.

मेहुल ने सिर हिलाया.

"चिंता न करो, मोहन की भी यही स्थिति थी, पर एक बार जब उसने चढ़ाई की मेरे ऊपर, तो रात भर रौंदा था मुझे. सारे छेद भर दिए थे." स्मिता ने अर्थपूर्ण ढंग से समझाया.

मेहुल के दिमाग की बत्ती जल उठी जब उसने सारे छेद सुना. क्या मम्मी का मतलब..?

"सारे छेद, यानि?"

"यानि मेरा मुंह, चूत और गांड. आज तुम्हें ये तीनों को अपने रस से भरना होगा."

"आ आ आप गांड भी मरवाती हो?"

"बिलकुल. और तुम्हारे जैसे जवान लड़कों को तो मैं बिना गांड मारे हुए छोड़ती ही नहीं." स्मिता ने हँसते हुए बताया.

"क्या तुमने कभी किसी को चोदा है."

धीरे धीरे अब मेहुल को अपना आत्मविश्वास को लौटता हुआ अनुभव कर रहा था. उसे ये समझ आ गया था कि उसका परिवार कोई आम परिवार नहीं है और इसमें हर संभव सेक्स क्रीड़ा होती है.

"हाँ, कईयों को."

"गर्लफ्रेंड्स?"

"नहीं, टीचर्स और फ्रेंड्स की मम्मियों को."

"अपने उम्र की कोई लड़की?"

"कुछ, क्योंकि एक बार में वो शादी की बात शुरू कर देती हैं."

"स्मार्ट, वैरी स्मार्ट. अभी खेलने के दिन हैं, बंधने के नहीं."

"वही."

"कितनी औरतों को चोद चुके हो?"

"बारह औरतें और तीन लड़कियाँ."

अब आश्चर्यचकित होने की बारी स्मिता की थी. "बारह औरतें?"

"हाँ, और आज का मिलकर तेरह हो जाएँगी." मेहुल ने बताया, "वैसे वो बारह की बारह आज भी मुझसे चुदवाती हैं. मैं इसलिए कालेज से ३ बजे घर नहीं आ पाता क्योंकि उनमें से किसी एक के बिस्तर में उसे रगड़ रहा होता हूँ."

"तो फिर आज क्यों जल्दी आये?"

"भाग्य. आज उन सबसे ज्यादा आकर्षक और प्यारी महिला को मेरी झोली में गिरना था."

मेहुल का ये विश्वास देखकर स्मिता विस्मित थी. ऐसा क्या था मेहुल में जो उसे अधिक आयु की महिलाएं पसंद करती हैं. मेहुल भी अब अपने उस रूप में आ रहा था जिसके लिए महिलाएं उस पर लट्टू थीं. उसका ४ घंटे पहले का आश्चर्य अब एक अवसर में बदल चुका था. उसे ये जानकर बहुत प्रसन्नता थी की न केवल अपनी माँ, बल्कि उनके चुदाई समूह की और औरतें भी उसके बिस्तर की शोभा बढ़ाएंगी. इसीलिए वो अब पूरे फ़्लर्ट की शैली में आ चुका था. वो आज अपनी माँ को ये दिखाना चाहता था कि वो उसे ही नहीं बल्कि औरों को भी पूरी संतुष्टि दे सकता है.

"कैसे?" स्मिता अभी भी अचरज में थी, "मुझे बताओ सब."

"क्या?"

"यही कि तुम इतनी जल्दी एक शर्मीले और शांत लड़के से इतने अनुभवी चुड़क्कड़ कैसे बन गए कि इतनी औरतें तुम्हें चाहती हैं."

"एक आयु के बाद स्त्रियाँ ऐसे भोले भाले लड़कों को सेक्स में दीक्षित करना चाहती है जिससे उनका मनोबल और अपने ऊपर विश्वास बढ़ता है कि वो अभी भी आकर्षक हैं." मेहुल एक कुटिल मुस्कान के साथ बोला।

"पर उन्हें ये नहीं पता होता की इस भोले चेहरे के पीछे सेक्स में निपुण एक आदमी छुपा है." स्मिता ने बात समझते हुआ कहा.

"हाँ और ३-४ मिलन के बाद उन्हें ये लगता है की मैं उनके द्वारा सिखाये हुए पाठ पर ही अनुशरण कर रहा हूँ."

"बेचारी भोली औरतें." स्मिता ने हैरत में सिर हिलाया. "तुमने किस आयु की औरतों को चोदा है?

"लड़कियों को छोड़ दें तो करीब ३० साल से ६५ साल तक की."

"६५? वो कैसे? कौन?"

"हमारी प्रिंसिपल की माँ."

"तुमने अपने प्रिंसिपल की माँ तक को चोद दिया!" स्मिता ने आश्चर्य से कहा.

"क्या करता, जब मैं उनके घर में अपनी प्रिंसिपल की गांड मार रहा था तो वो पता नहीं कैसे अंदर आ गयी कमरे में. और जाने का नाम ही नहीं ली. आखिर में मुझे उसके तीनों छेद पैक करने पड़े. पर अब सप्ताह में एक बार दोनों बुलाती है और साथ में चुदवाती है."

"तुम कौन हो? मेरा सीधा सादा बेटा कहाँ गया."

मेहुल ने एकदम से अपना भाव बदला और वही घबराया और परेशान लड़का दिखने लगा जिसे सब जानते थे.

"पर मम्मी हम ये सब बातें करने तो यहाँ आये नहीं है. आप तो मुझे सेक्स का ज्ञान देने के लिए आमंत्रित की थीं न?"

"जो इतनी औरतों को चोद चुका हो उसे ज्ञान देने की नहीं उससे सुख लेने की आवश्यकता है."

मेहुल ने अपनी माँ का हाथ पकड़कर उसे खड़ा किया और उसके रसीले होंठ चूमने लगा. स्मिता का शरीर वासना से थरथरा उठा और वो भी इस चुम्बन में पूरा साथ देने लगी. मेहुल ने पीछे करते हुए स्मिता के ब्लाउज और ब्रा के हुक खोल दिए. फिर उसने होंठों को छोड़कर गर्दन को चूमते और चाटते हुए स्मिता के पीछे गया और उसके कानों को चूमते हुए उसका ब्लाउज और ब्रा अलग कर दी. अपने हाथ आगे करते हुए स्मिता के दोनों मम्मों की घुंडिया अपनी उँगलियों में लेकर हल्के से मसलने लगा. उसके चुंबन बिना रुके स्मिता के कान, गर्दन और पीठ को तर कर रहे थे. स्मिता ये जान गई की आज उसका सामना सेक्स में निपुण एक ऐसे खिलाडी से है जो उसके रोम रोम को पुलकित कर देगा. मेहुल अब अपने हाथों से उसके दोनों मम्मों को दबा रहा था, या यूँ समझो की मसल रहा था, और उसकी उंगलिया घुंडियों को मसल रही थीं.

"कैसा लग रहा है, मम्मी। "

"ब ब ब बहुत अच्छा"

मेहुल यूँ ही स्मिता को चूमते हुए अपने हाथ को हटाता है और उसकी साड़ी को एक हाथ से उसके शरीर से उतारने लगता है और कुछ ही पलों में साड़ी कालीन पर गिर जाती है. पर मेहुल का हाथ ठहरता नहीं और वो पेटीकोट का नाड़ा खोल देता है और पेटीकोट भी लहरा कर स्मिता का शरीर छोड़ देता है. स्मिता ने पैंटी नहीं पहनी थी और वो पेटीकोट के गिरते ही नंगी हो गई. दो पल के लिए मेहुल अपने दोनों हाथ मुक्त करता है और अपनी टी-शर्ट, शॉर्ट्स उतार फेंकता है. वो और अंडरवियर में अपने शरीर को स्मिता के शरीर के पीछे पूरा मिला देता है. स्मिता को अपनी गांड में कुछ चुभता हुआ प्रतीत होता है तो वो समझ जाती है कि मेहुल ने अपने कपडे उतार दिए हैं. वो उसके देखने के लिए लालायित हो जाती है और घूम जाती है.

**********

श्रेया का शयनकक्ष: श्रेया और विक्रम

"पापा जी, मुझे मेहुल भैया के लिए बहुत डर लग रहा है. वो इतने सीधे हैं कि कहीं कुछ उल्टा सीधा न कर बैठें."

"चिंता तो मुझे भी है, श्रेया, पर मोहन भी शीशे में उतर गया था. मुझे स्मिता पर विश्वास है कि वो सब अच्छे से संभाल लेगी. दूसरा तुम ने ही देखा की मेहुल ने उसका ही नाम लिया था."

"आप बाथरूम से आईये तब तक मैं स्नेहा और मम्मी से बात कर लेती हूँ." कहते हुए वो अपनी माँ को कॉल लगाती है.

"हेलो मम्मी, स्नेहा पहुँच गयी न?"

“------”

"आज मेहुल को हमने अपना खेल दिखा दिया. अभी मम्मी जी उसे अपने कमरे में समझाने के लिए ले गई हैं."

“------”

"आप तो मम्मी जी को जानती हो, उनका तीर कभी नहीं चूकता।"

“------”

"अरे आपका भी नंबर आएगा, शीघ्र. पहले हम तो निपट लें. पर वो स्नेहा को जरूर चोदेगा, बहुत आगे पीछे घूमता है उसके."

“------”

"जी. आज तो मैं पापाजी के साथ हूँ. महक है, मोहन के साथ. और आप?"

“------”

"चलो आप भी इन्जॉय करो, गुड नाईट."

इतने में विक्रम बाथरूम से बाहर आ गया, एकदम नंगे और श्रेया अंदर घुस गयी और नहाकर कुछ ही मिनटों में नंगी ही बाहर आ गई. विक्रम बिस्तर पर लेटा था और उसका लंड सीधे पंखे को देख रहा था. श्रेया ने अपनी चूत को विक्रम के मुंह पर रखा और झुककर उसका लंड चूसने लगी.

**********

मोहन का शयनकक्ष: महक और मोहन

"कल पता लगेगा कि मेहुल माना कि नहीं. हालाँकि वो इतना दब्बू है कि मम्मी के कहने पर मानेगा अवश्य." महक ने अपने विचार रखे.

"तुम ये क्यों सोचती हो कि वो दब्बू है. मेरी समझ से वो बहुत संयम में रहता है. वो कभी कॉलेज बंद होने पर सीधे घर नहीं आता। २ -३ घंटे कहाँ रहता है, पता नहीं. दब्बू या डरपोक लोग ऐसा नहीं कर सकते. मुझे तो लगता है की वो हम सबसे कुछ छुपा रहा है. मैंने इसीलिए नहीं पूछा ताकि उसे झूठ न बोलना पड़े मुझसे."

"चलो, ये भी कल पता चल जायेगा. मम्मी राज उगलवाने की विशेषज्ञ है. उन्हें तो किसी खुफ़िआ जाँच एजेंसी में होना चाहिए था."

महक अपने कपडे उतार कर बिस्तर पर लेट गई और अपने दोनों पाँव फैला दिए.

"आइये, आपकी स्वीट डिश (मिठाई) परोसी हुई है. सीधे चाट लीजिये."

मोहन ने भी देर न की और कपडे उतार कर महक की चूत में अपने मुंह से पिल गया.

**********

गौड़ा परिवार के घर:

"श्रेया का फोन था. स्मिता मेहुल का आज उद्घाटन कर रही है. इतना सीधा लड़का है, पता नहीं उसे आघात न पहुंचे."

"उसे घर किसने भेजा था जल्दी, वैसे तो वो ६ बजे के पहले नहीं जाता है?"

"स्नेहा ने, उसे बोली थी कि वो उधर जा रही है. बाकी उसने भाग्य के हाथ में छोड़ दिया था."

"वही तरीका जो मोहन और मेरे लिए काम आया था. पर हम दोनों फिर भी थोड़े तेज हैं. मेहुल सच में बहुत सीधा है."

"अब कल ही पता चलेगा कि क्या हुआ. मुझे नहीं लगता मेहुल कल कॉलेज जाने की स्थिति में होगा."

इस समय सब लोग बैठक में बातें कर रहे थे. स्नेहा अविरल की गोद में थी, और विवेक का सिर अपनी माँ की गोद में.

"चलो सोते हैं, कल शायद श्रेया के घर जाना होगा. सब कुछ ठीक ठाक रहे और मेहुल कहीं कुछ उल्टा न कर बैठे."

ये कहकर सब अपने कमरों में चले गए.

**********

स्मिता का शयनकक्ष: स्मिता और मेहुल

जब परिवार के सब लोग इस चिंता में डूबे थे कि मेहुल पर कोई विपरीत असर न हो, बाकी लोगों की धारणा के विपरीत, यहाँ मेहुल ही इस अभियान को नियंत्रित कर रहा था.

स्मिता जब मेहुल की ओर मुड़ी तो उसे विश्वास था कि मेहुल भी उसकी ही तरह निर्वस्त्र होगा. पर उसे ये देखकर अचरज हुआ कि अभी भी मेहुल अंडरवियर पहने हुए था. वो अपना हाथ नीचे बढ़ाती इससे पहले ही मेहुल ने उसके हाथ अपने कन्धों पर रखे और एक गहरा चुम्बन लेने लगा. स्मिता फिर से लहरा उठी. चूमते हुए ही मेहुल ने स्मिता को बिस्तर पर लिटा दिया और उसकी आँखों से आरम्भ करते हुए, एक एक इंच शरीर को चूमते और चाटते हुए नीचे की ओर अग्रसर हुआ. स्मिता ने ऐसा उत्तेजक और मादक प्रेम कभी भी अनुभव नहीं किया था. अंततः मेहुल उसकी जांघों के जोड़ पर पहुंच गया जहाँ एक अमूल्य निधि उसको देख रही थी. उसने अपनी जीभ से उस गुफा के चारों और चाटकर उसे चमका दिया.

स्मिता अब वासना से तड़प रही थी और उसकी चूत से पानी की धार बह रही थी. मेहुल बहुत प्रेम और संयम से हर एक बूँद को चाट रहा था. तभी उसने स्मिता के भगनासे को दो उँगलियों के बीच में लेकर दबाया और अंगूठे से उसके ऊपर के पतले हल्के छेद को रगड़ने लगा. स्मिता को जैसे ४४० वोल्ट का करेंट लगा. उसका पूरा शरीर बिस्तर से एक फुट ऊपर उछल गया और उसकी चूत से एक फुहार निकली जिसने मेहुल के पूरे चेहरे को सरोबार कर दिया.

"हम्म्म्म, मॉमा लव्स इट. क्यों माँ तुम्हें मज़ा आया? कभी छोड़ी है ऐसी धार पहले." मेहुल ने अपने चेहरे पर लगे स्मिता के रस को हाथों से पोंछते हुए पूछा.

"न न न नहीं. ऐसा कभी नहीं हुआ, तू तो जादूगर है रे."

"लो अपने पानी का स्वाद लो", कहते हुए मेहुल ने अपनी कामरस से सनी उँगलियाँ स्मिता के मुंह में डाल दीं। स्मिता ने उसकी ओर कामुक आँखों से देखते हुए उँगलियाँ चूस कर साफ कर दीं. फिर मेहुल स्मिता के बगल में लेट गया और अपने एक हाथ से उसकी चूत को सहलाते हुए उसके होंठों का रस पीने में जुट गया. फिर उसने अपना बायाँ हाथ स्मिता की गर्दन के नीचे से निकालकर उसके बाएँ स्तन को भींचने लगा. दायाँ हाथ चूत में व्यस्त था.

स्मिता ने अपना मुंह मोड़कर मेहुल के होंठ चूम लिए. कामातुर माँ अब अपने बेटे के हाथों में एक खिलौना थी, एक ऐसा बेटा जो बाहर से जो दिखता था अंदर से बिल्कुल अलग था.

"सब ये सोच रहे होंगे कि आज मैं तेरा उद्घाटन करूंगी क्योंकि तू सेक्स से अनिभिज्ञ होगा. उन्हें बहुत आश्चर्य होगा ये जानकर कि तू इतना बड़ा खिलाड़ी है. तूने मुझे बिना अपने लंड को छुए बिना ही इतना आनंद दिया है कि मैं वर्णन नहीं कर सकती. पर तू अभी तक अंडरवियर क्यों पहने है."

"वो भी उतार दूंगा मेरी प्यारी मम्मी. मैं तुम्हे वो सुख देना चाहता हूँ जो आपने स्वप्न में भी नहीं अनुभव किया होगा. पर मेरी एक विनती है आपसे. हमारे बीच जो भी होगा, पर आप अभी किसी को बताना मत. मैं चाहता हूँ कि सब यही सोचते रहें कि मैं अनाड़ी हूँ. जब तक मैं परिवार की सभी महिलाओं को नहीं चोद लेता, जैसा कि मुझसे अपेक्षित है, आप कुछ नहीं कहोगी."

स्मिता इस समय हर शर्त पर सहमत थी. मेहुल की तीन उँगलियाँ उसकी चूत में अंदर बाहर हो रही थीं, और उसे अपनी चूत की आग बुझानी थी. पर मेहुल था कि इतना धीरे चल रहा था की उसे रुकना भारी लग रहा था.

"मेहुल, क्या अब तुम मुझे चोदोगे। मैं जली जा रही हूँ. मेरी आग को शांत कर दो बेटा। "

"हम्म्म्म, मम्मी तुमने तो कहा था कि दीक्षा में तुम मुझे अपने तीनों छेद समर्पित करोगी."

"हाँ, अवश्य. हमारा यही नियम है. इससे न सिर्फ दीक्षार्थी को सेक्स का पूरा अनुभव होता है, बल्कि ये भी पता लगता है कि उसकी ठहरने की क्षमता कितनी है और वो कितनी बार लड़ाई में खेल सकता है. क्योंकि उसे हमारे समुदाय की अन्य स्त्रियों को भी संतुष्ट करना होता है. और हम मानक से नीचे के खिलाड़ी को अतिरिक्त परीक्षण देते हैं.

"और आप लोग तीन बार को एक मानक मानते हो." मेहुल ने मुस्कराते हुए पूछा.

"हाँ, क्यों तू कितने बार चोद लेता है."

"ज्यादा नहीं, बस यूँ समझो की तीन स्त्रियों को तो पूरा अनुभव दे ही सकता हूँ."

"क्या!" स्मिता की ऑंखें फटी की फटी रह गयीं.

"अरे छोड़ो ये सब मम्मी, अब आपके पहले छेद का समय है. और मैं चाहूंगा कि आप मुंह से मेरे लंड को शांत करो."

स्मिता की आँखों में चमक आ गई. उसने मेहुल से अंडरवियर उतारने को कहा. मेहुल जानता था कि ये उसके लिए एक सरप्राइस होना चाहिए.

"नहीं मम्मी, ये शुभ कार्य तो आपको अपने ही हाथों से संपन्न करना होगा. आखिर मैं आपका शिष्य जो हूँ."

ये कहकर मेहुल बिस्तर के उस ओर खड़ा हो गया जहाँ स्मिता लेटी थी. स्मिता बैठ गई और उसने मेहुल का अंडरवियर उतार दिया.

"ओ गॉड! ये क्या है?" उसके चेहरे पर अविश्वास के भाव थे. "क्या है ये?"

**********

श्रेया का शयनकक्ष: श्रेया और विक्रम

विक्रम और श्रेया ने एक बार मौखिक सम्भोग का आनंद लिया और दोनों एक दूसरे के मुंह में अपना पानी छोड़ चुके थे. पर दोनों का मन अभी भरा नहीं था. दोनों का पूरा ध्यान इस बात पर ही लगा था की स्मिता मेहुल को कैसे अपने वश में कर रही होगी और मेहुल की क्या प्रतिक्रिया हो रही होगी. दोनों के कान किसी भी ऐसी ध्वनि के लिए संवेदनशील थे जिससे ये पता लगे कि कहीं मेहुल कमरा छोड़कर बाहर तो नहीं जा रहा. ऐसी किसी भी विषम परिस्थिति में उसे रोकना आवश्यक था.

"पापाजी, आज आप मुझे घोड़ी के आसान में ही चोदिये, कहीं दौड़ना पड़ा मेहुल के पीछे तो देर नहीं होगी." ये कहकर श्रेया ने आसन धारण किया और सिर और कमर को झुककर अपनी गांड को ऊँचा उठा दिया.

विक्रम के मन में पहले श्रेया की गांड मारने का विचार आया पर अपने लंड को चूत पर रखकर अंदर पेल दिया. चाहे श्रेया कम आयु की थी पर उसने चुदाई ५ साल पहले ही शुरू कर दी थी. वो इस तगड़े धक्के को भी बड़ी सरलता से झेल गई. विक्रम उसे तेज गति से चोदने लगा. श्रेया भी उसका पूरा साथ दे रही थी और दोनों जल्दी ही अपनी भूख (या प्यास) मिटाकर विश्राम करना चाहते थे.

जल्द ही दोनों एक बार फिर से झड़ गए और एक दूसरे को चूमकर कपडे पहनकर बैठक में चले गए. आज पहरे की रात थी, जब तक स्मिता का सन्देश नहीं आता कि स्थिति काबू में है, उन्हें इसी प्रकार जागते रहना था.

श्रेया ने दोनों के लिए एक छोटा पेग बनाया, टीवी को सायलेंट में डालकर देखते हुए चुस्की लेने लगे. दोनों के दिल इस समय धड़क रहे थे. ४० मिनट से अधिक हो गया था और स्मिता ने कोई भी सूचना नहीं दी थी.

**********

मोहन का शयनकक्ष: महक और मोहन

मोहन अपनी जीभ महक की चूत में डालकर झाड़ू के समान घुमाने लगा. अपनी एक ऊँगली महक की चूत में डालकर उसे कुछ समय के किये ऊँगली से चोदा और अपने होंठों से उसके भगनासे को दबाकर रखा. इस आक्रमण के सामने महक ने हाथ डाल दिए और उसकी चूत भरभरा कर पानी छोड़ने लगी. अब चूँकि भगनासा मोहन के होंठों के बीच ही था तो सारी धार मोहन के मुंह में ही सीधी चली गई. मोहन ने अपने तेजी से अपना मुंह हटाया और अपनी दायीं हथेली में थोड़ा पानी इकठ्ठा किया। फिर महक के दोनों पांव अपने बाएं हाथ से इस तरह ऊपर उठाये कि उसके घुटने पेट से जा लगे. अब महक की चूत और गांड के दोनों छेद मोहन के सामने थे. उसने अपने हाथ में एकत्रित महक का कामरस उसकी गांड की छेद पर मल दिया.

महक समझ गयी कि मोहन आज उसकी गांड का आनंद लेगा, वो भी इस खेल के लिए अपने आपको मनाने लगी. अब महक की गांड पहली बार तो मारी जा नहीं रही थी. समुदाय में गांड मारने के लिए पुरुष लालायित रहते थे. वैसे महिलाएं भी इसमें पीछे नहीं थीं पर महक चाहती थी कि मोहन एक बार उसकी चूत की खुजली मिटा देता तो अच्छा होता. पर आज की विशेषता को देखकर उसने कोई आपत्ति नहीं की.

"थोड़ी वेसलीन लगा लो. ऐसे दर्द होगा." उसने मोहन से कहा.

मोहन जल्दी से ड्रेसिंग टेबल से वेसलीन की शीशी उठा लाया. तब तक महक घोड़ी की तरह अपनी गांड ऊपर करके लेट गई. मोहन ये देखकर मुस्कुरा दिया. वो पिछले आसन में ही उसकी गांड मारना चाहता था क्यूंकि उसमे गांड का रास्ता और तंग हो जाता था और आनंद अधिक आता था. पर इसमें महक को परेशानी होती थी. तो महक ने उसका ध्यान दूसरी ओर करके अपनी अनुसार मुद्रा ले ली थी. मोहन महक की गांड पर अच्छे से वेसलीन की मालिश की और उतने ही ध्यान से अपने लंड को भी चिकना कर लिया. महक की गांड का छेद इस समय आक्रमण की उत्सुकता से लपलपा रहा था. मोहन ने अपना लंड रखा और हल्के हल्के अंदर उतार दिया.

"आअह, वाह, क्या गजब की गांड है तेरी महक."

"लंड आपका भी कोई कम नहीं. चाहे जितनी बार भी खाऊं हमेशा नया और बड़ा ही लगता है. मेरी गांड को बिल्कुल सही लेवल तक भरता है. मेरी ही गांड का साइज देखकर ये लंड बना है."

"तू मुझसे छोटी है, तेरी गांड इसके साइज की बनी है."

"चलो ठीक है अब चोदो भी, बातें बाद में कर लेंगे. नीचे भी जाना है."

ये सुनकर मोहन को आज के दिन का महत्त्व याद आ गया. उसे अपना वो समय याद आ गया जब वो अपनी माँ के कमरे में था और उसके पिता बैठक में उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे. उसने मन ही मन मेहुल को शुभकामना दीं और इच्छा की कि मेहुल भी उसकी तरह इस पूरे पारिवारिक समारोह में सम्मिलित हो जाये.

ये सोचते हुए उसने महक की गांड में अच्छे लम्बे शॉट आरम्भ किया , पर इन धक्कों में तीव्रता तेजी नहीं थी, अपितु शीघ्रता अवश्य थी. वो कभी भी महक की कठोर चुदाई नहीं करता था, उसकी छोटी बहन जो ठहरी. महक को भी उसके बड़े भाई का प्यार ही भाता था. उसे चोदने वाले और भी थे, कुछ तो ऐसे जो हड्डियां हिला देते थे. उसे कभी कभार वो भी अच्छा लगता था. पर जो प्यार मोहन देता था उसकी कोई तुलना नहीं थी.

कुछ ही मिनटों की चुदाई के बाद मोहन महक की गांड में ही झड़ गया. लगभग साथ में महक भी झड़ चुकी थी. दोनों बाथरूम में जाकर निर्मल हुए और कपड़े पहन कर बैठक पहुंचे जहाँ विक्रम और श्रेया टीवी देख रहे थे. उन्हें देखकर मोहन ने भी दो हल्के ड्रिंक्स बनाये और सब चुपचाप चुस्कियां लेते हुए टीवी देखने लगे.

मोहन ने विक्रम से पूछा "मम्मी का कोई मेसेज।"

"नहीं"

"आशा करनी चाहिए कि सब ठीक रहे. मेहुल अब शायद लड़कियों से न घबराये."

**********

स्मिता का शयनकक्ष: स्मिता और मेहुल

"ओ गॉड! ये क्या है?" स्मिता के चेहरे पर अविश्वास के भाव थे, "क्या है ये?"

स्मिता की आँखों के आगे उसके जीवन का सबसे बड़ा लंड झूल रहा था. मोटा इतना था जितनी कि उसकी कलाई. और लम्बा जितना कि उसकी कोहनी से इसकी कलाई. ये मनुष्य का लंड नहीं था. यही कारण था कि उसे केवल विवाहित महिलाएं ही झेल पाती थीं. कैसे जायेगा वो उसकी चूत में. और गांड, ये सोचते ही स्मिता के शरीर में झुरझुरी सी होने लगी.

"ये, ये, ये तुम्हारा लंड है?"

"आपको क्या लगता है."

"और तुम्हारी प्रिंसिपल इसे अपनी गांड में लेती है?"

"और उसकी माँ, बहन और सास भी."

"क्या? तुमने उसके खानदान की सारी औरतों को चोद दिया है क्या?"

"नहीं, बेटी अभी बाकी है. नहीं, उसे चोदने का कोई प्लान नहीं है. नहीं तो मेरी अन्य ९ रंडियों का क्या होगा."

"रंडी! ये क्या कह रहे हो?"

"अरे मम्मी, जब एक बार आप इस खूंटे से बंध जाओगी न तो रंडी की ही तरह चुदवाओगी मुझ से. अब देर मत करो, लंड चूसो मेरा, आपके पहले छेद का उद्घाटन करना है."

स्मिता ने धीरे से उसका लंड अपने मुंह में डाला और हल्के हलके चूसने लगी. वो ये सोच रही थी कि उनके समुदाय की महिलाएं तो पागल ही हो जाएँगी. फिर उसके मुँह से हंसी निकल गई.

"क्या हुआ?"

"श्रीमती गुप्ता, जो अपने आप को बहुत बड़ी चुड़क्कड़ मानती है और कहती है की ऐसा कोई लंड नहीं बना जो उसकी गांड की गर्मी ठंडी कर सके जब इसे देखेगी तो फट जाएगी हरामजादी की गांड."

"उसकी गांड उस समय देखेंगे. आज आपकी बारी है. पहले अपनी बचा लो फिर दूसरों की सोचना. वैसे सुजाता आंटी की गांड भी मस्त है. परसों के लिए बुक कर दो उन्हें मेरे लिए. परसों में फ्री हूँ ३ बजे के बाद. पर याद रहे उसे कुछ बताना नहीं है."

ये कहते हुए मेहुल ने पहल की और स्मिता के मुंह में अपना लंड डालकर उसका सिर पकड़ा और लंड अंदर तक धकेल दिया. लंड गले में जाकर फंस गया और स्मिता की साँस रुक गई और आँखों में आंसू आ गए. वो सिर हिलाकर छटपटाने लगी. मेहुल ने सिर को छोड़ा और लंड को बाहर खींच लिया पर मुंह से निकला नहीं. स्मिता ने उसे विनती भरी आँखों से देखा.

"जब मैं कह रहा हूँ की चूसो इसे तो इधर उधर की बातें क्यों कर रही हो. अब लगो काम पर और इसकी ठीक से सेवा करो. जब तक मैं न बोलूं, रुकना नहीं."

कहते हुए मेहुल बिस्तर पर पांव चौड़े करके बैठ गया और स्मिता को अपना स्थान लेने का संकेत किया. एक तकिया उठाकर अपने पांवों के बीच डाल दी जिससे स्मिता के घुटने न दुखें. स्मिता ने अपना स्थान ग्रहण किया और ऊपर से नीचे तक लंड को अच्छे से चाटते हुए अपने मुंह में ले लिया और इस बार पूरी तन्मयता से चूसने लगी. हालाँकि मुंह इतना चौड़ा करके चूसने में उसे कठिनाई हो रही थी पर वो मेहुल को अपने प्यार की गहराई से भी अवगत कराना चाहती थी.

मेहुल जानता था कि माँ अधिक देर ये नहीं कर पायेगी अन्यथा उसके जबड़े दुःख जायेंगे. वो उन्हें केवल उन्हें अपना और उनका स्थान दिखाना चाहता था. जो औरतें उससे चुदवाती थीं उन्हें उसके पांवों में झुकना पड़ता था. आज उसकी माँ वहां थी.

"आगे से जब भी हम चुदाई के लिए साथ होंगे तो आपका यही स्थान होगा. फिर मैं आपकी सेवा करूँगा पर पहले आपको मेरे सामने इसी आसन में आना होगा. ठीक है?"

स्मिता ने लंड चूसते हुए सिर हिलाया कि उसे ये स्थिति स्वीकार्य है.

"उठिये अब, मैं नहीं चाहता कि आपको कोई कष्ट हो." मेहुल ने आज्ञा दी.

स्मिता खड़ी हो गई.

"थोड़ा अपने इस सौंदर्य का दर्शन तो कराओ मम्मी. पीछे मुङो और नीचे झुको."

स्मिता ने वैसे ही किया जिससे उसकी गांड मेहुल के मुंह से सामने आ गई. मेहुल ने उसकी कमर पकड़कर धीरे से अपनी ओर खींचा और उसकी गांड में अपना मुंह डाल दिया. स्मिता चिहुंक पड़ी, पर अपने आसन से हटी नहीं.

मेहुल उसकी गांड के चारों ओर अपनी जीभ से चाट रहा था और गांड के छेद के सितारे पर विशेष रूप से ध्यान दे रहा था. स्मिता को गुदगुदी होने लगी तो वो हंस पड़ी. मेहुल ने उसकी ख़ुशी बढ़ने के लिए उसके नितम्ब दोनों हाथों से फैलाये और अपनी जीभ को गांड की गुफा में ढकेल दिया. स्मिता एक झुरझुरी के साथ एकदम से झड़ गई.

"मम्मी, आपकी गांड तो बहुत टाइट है, लगता है किसी अच्छे लंड से इसकी सिकाई नहीं हुई कभी."

स्मिता की अचानक मानो चेतना जाग्रत हुई. वो स्वयं को कोसने लगी कि क्यों उसने तीनों छेदों का नाम लिया. उसे नहीं लगता था कि वो मेहुल का डंडा अपनी गांड में ले पायेगी, चूत तो अम्भ्वतः उसे स्वीकार कर भी ले, पर गांड! ये सोचते ही उसकी गांड फट गई. और अगर गांड में ले भी लिया तो कितने दिन तक उसकी स्थिति थिंक हो पायेगी ये समझना कठिन था.

"अरे मम्मी, घबराओ नहीं, मैंने जितनी आंटियों को चोदा है सब की गांड इतनी ही संकरी थी, कई तो पहली बार गांड में लंड ले रही थीं. पर आज सब उछल उछल कर मुझसे गांड मरवाती हैं. आप मेरा विश्वास करो मैं आपको असीम सुख के सिवा कुछ नहीं दूंगा."

स्मिता ने अपनी सांसे संयत की. मेहुल ने उसकी गांड चाटना बंद करके, उसे सीधे होने के लिए कहा.

"अगर वेसलीन हो, तो ले आईये न प्लीज."

स्मिता गांड मटकाती हुई ड्रेसर से वेसलीन ले आयी. देखा तो मेहुल बिस्तर पर लेट चूका था और दोनों तकिये अपने सिर के नीचे लगा रखे थे.

मेहुल का तना लंड इस समय बहुत ही भयावना लग रहा था.

"पहले अपनी चूत में अच्छे से वेसलीन लगा लीजिये और फिर मेरे लंड पर भी. मैं नीचे रहूँगा, जिससे आप अपनी सुविधा के अनुसार जितना संभव हो उतना लंड डाल पाएं. अपने अनुमान से चुदवाइये अपनी चूत।"

स्मिता ने चैन की साँस ली, कि चलो अपने तरीके से ही लेगी. इतने में मेहुल ने उसे झटका दिया.

"पर गांड मैं अपने ढंग से मारूंगा।"

स्मिता की फिर गांड फट गई. पर ओखली में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना सोचते हुए अपने मन को मनाया. स्मिता बिस्तर पर बैठी और अपने पांव चौड़े करते हुए अपनी चूत में वेसलीन लगाने लगी. जब उसे लगा की उसकी चूत अच्छी चिकनी हो गई है, तो उसने मेहुल के लंड को पकड़ा और उसके टोपे पर एक चुम्मा लिया. फिर वेसलीन लगाकर उसे भी बिल्कुल चिकना कर दिया.

"आइये अब सवारी कीजिये. आपका घोड़ा तैयार है."

**********

बैठक में:

इस समय सब परिवार वाले एक गूढ़ चिंतन में डूबे थे. २ घंटे से ऊपर हो चुके थे. रात का लगभग १ बजने को था, पर स्मिता की ओर से कोई सन्देश नहीं आया था.

"कहीं मम्मी और मेहुल सो तो नहीं गए. जाकर देखूं?" महक ने पूछा.

"नहीं, नियम यही है कि मैसेज के पहले कोई भी क्रिया या प्रतिक्रिया नहीं की जाएगी. अगर मेहुल बाहर नहीं गया है तो स्थिति तनावपूर्ण अवश्य है, पर नियंत्रण में है. मुझे स्मिता पर पूरा विश्वास है. वो मेहुल को सांचे में ढाल लेगी. पर हमें अपनी निगरानी हटानी नहीं है." विक्रम ने मना करते हुए स्पष्ट किया.

"ठीक है पापा."

और सब बैचेनी से प्रतीक्षा में लगे रहे.

**********

स्मिता का शयनकक्ष: स्मिता और मेहुल

स्मिता ने बिस्तर पर चढ़ते हुए मेहुल के दोनों ओर पाँव किये, अपनी चूत के छेद पर मेहुल के लंड को लगाया और बहुत धीरे धीरे से उस पर उतरने लगी. लगभग ६-७ इंच लेने के बाद वो रुक गई और आगे झुककर मेहुल को चूमने लगी. मेहुल ने भी उसका भरपूर साथ दिया और उसके मम्मे मसलने लगा. स्मिता इस समय बहुत आनंदित थी और इतनी लम्बाई के लंड कई बार ले चुकी थी. पर चौड़ाई थी जो उसे आगे बढ़ने से रोक रही थी. इस समय उसे अपनी चूत पूरी तरह से पैक लग रही थी, मानो हवा तक जाने का स्थान न हो.

उसने धीरे धीरे उठक बैठक शुरू की, वेसलीन लगी होने से वो बहुत हो आसानी से चुदवा रही थी. इसी उपक्रम में उसने अपनी गति बढ़ा दी, चौड़ी हुई चूत अब और लंड की मांग करने लगी. वो लंड पर शायद एक दो इंच और उतरी होगी कि उसके ऐसे स्थान पर पंहुचा जहाँ आज तक कोई बिरला ही जा पाया था. इसी गहराई पर उसने अपनी चूत को रोक लिया और अपनी गति बढ़ाते हुए चुदवाने लगी.

"ओह, माँ, क्या लंड है तेरा मादरचोद. पूरी सिलाई खोल दी मेरी चूत की." वो बड़बड़ा रही थी.

उसकी चूत अब दनादन पानी की धार छोड़ रही थी जो मेहुल की जांघों को तर बतर कर रही थीं. वो इस समय वासना के ऐसे उन्माद में थी की उसे किसी भी और चीज़ का भान नहीं था. उसके सारी इन्द्रियाँ एक ही स्थान पर केंद्रित थीं और वो थी उसकी चूत। यही कारण था की जब मेहुल ने अपने दोनों हाथ उसकी कमर में डालकर मुट्ठी बंधी तो उसे इसका अर्थ न समझ पायी. मेहुल ने धीरे धीरे अपने बंधे हुए हाथ उसकी कमर के बिल्कुल नीचे के हिस्से पर ले जाकर रोक दिए.

हल्की हल्की चुम्मियाँ लेते हुए मेहुल ने बड़े प्यार से पूछा," मम्मी, मज़ा आ रहा है?"

"हूँ. बहुत. बहुत मजा आ रहा है. तेरा लंड वाकई में बहुत शानदार है."

"पर अभी तो आधा ही खाई हो, फिर भी इतना मजा आ रहा है."

"मेरे लिए इतना ही पर्याप्त है , बस मुझे चोदने दे."

"हम्म्म, मम्मी."

"ह्म्म्मम्म"

"पर मैंने आपको पूरा सुख देने का वचन दिया था, है न?"

"हाँ दे तो रहा है. और कितना देगा." अचानक स्मिता के दिमाग की बत्ती जल उठी. कहीं ये सारा तो नहीं जड़ देगा मेरी चूत में., वो हटने का प्रयास करने लगी. पर मेहुल ने उसे अपने बाहुपाश में जकड रखा था.

"मम्मी, मैं हमेशा अपना वचन पूरा करता हूँ."

ये कहकर आधी ऊपर उठी स्मिता को जोर से अपने लंड की ओर खींचा और साथ ही अपनी कमर को बहुत तेजी के साथ ऊपर की ओर उठाते हुए एक जोरदार धक्का मारा. मेहुल का पूरा लंड अब स्मिता की चूत में जड़ तक समा गया था. स्मिता ऐसे आघात से एकदम सन्न हो गई. उसे लग रहा था जैसे किसी ने उसको चाकू से चीर दिया हो. उसकी आँखों से आंसू झरने लगे.

मेहुल स्मिता को उसी स्थिति में पकड़कर उसके बहते हुए आंसू चूम चूम कर पीने लगा. हल्के हल्के चुम्बन भी ले रहा था. एक हाथ से वो स्मिता की पीठ सहला रहा था. कुछ देर इसी तरह रहने पर स्मिता को थोड़ा आराम लगा तो वो रोने लगी. मेहुल ने उसके होंठ चूमते हुए कहा.

"मम्मी, एक बात बताओ."

"पूछ"

"जब बैंड ऐड की पट्टी निकालते है तो धीरे धीरे निकालने में अधिक दर्द होता या एक बार में निकालने में?"

"एक बार में निकालने में दर्द ज्यादा होता है पर ठीक भी जल्दी होता है."

"अब समझीं मैंने ऐसा क्यों किया. अपने आप कभी भी पूरा लंड नहीं लेतीं और जो अब आनंद मिलने वाला है उससे वंचित रह जातीं. मुझे क्षमा करना आपको इस तरह से छलना पड़ा. " मेहुल ताबड़तोड़ चुम्बन जड़ते हुए बोला।

"तू बहुत दुष्ट है. अब?"

"अब मैं आपको नीचे करूँगा और आपकी सही तरह से चुदाई करूँगा, जो आपका अधिकार है." ये कहकर मेहुल ने स्मिता की कमर पकड़कर एक करवट ली और स्मिता उसके नीचे आ गई. इस पूरे उपक्रम में मेहुल के लंड ने अपना स्थान नहीं छोड़ा.

मेहुल ने अब हलके और सधे हुए धक्कों से स्मिता की चुदाई शुरू की. अपने बाएं अगूंठे से वो रह रह कर भग्नाशे को कभी सहलाता, कभी रगड़ता और कभी उँगलियों में लेकर दबा देता. पर उसके इस प्रयास में कोई क्रम नहीं थे. स्मिता को अब वो आनंद आ रहा था जिससे वो इस जीवन में अछूती थी और ये सुख कोई और नहीं उसका सबसे लाडला बेटा ही उसे दे रहा था.

मेहुल ने भी अब गति पकड़ ली थी पर अभी भी वो पूरी लम्बाई का प्रगोग नहीं कर रहा था. उसकी चौड़ाई ही इतना घर्षण पैदा कर रही थी कि स्मिता कि चूत पानी पानी हो रही थी. अब कमरे में फच फच की ध्वनि गूंज रही थी.

"और चोद मुझे, और!" स्मिता ने मेहुल का उत्साह बढ़ाते हुए कहा. मेहुल ने भी अब समझ लिया कि उसकी माँ पूरे लंड के लिए तैयार है. उसने अब अपने धक्के पूरे गहरे और लम्बे कर दिये। बिस्तर कराह रहा था और स्मिता की चूत रो रो कर बेहाल थी. इतना पानी उसने छोड़ा था आज की पूरी बाल्टी भर जाती और अभी भी खेल समाप्त नहीं हुआ था. मेहुल के धक्के स्मिता की बच्चेदानी को हिला दे रहे थे. जिस रास्ते वो निकला था आज वहीँ उसने अपना झंडा गाढ़ दिया था.

"बेटा, अब बस कर. मेरी चूत फट गई है. इतना झड़ी हूँ कि कुछ बचा नहीं. अपने पानी से सींच दे मेरी चूत।"

मेहुल भी अब अधिक दूर नहीं था. उसने अपनी गति में परिवर्तन करते हुए कभी गहरे तो कभी तेज, कभी हलके तो कभी कभी रूककर धक्कों की झड़ी लगा दी. अपने निकट आते हुए उत्सर्ग से भी अंकुश हटा दिया. बस फिर क्या था स्मिता की चूत में तो जैसे एक बाढ़ सी आ गयी. उसका अपना पानी जब मेहुल के रस से मिला तो पूरा बिस्तर गीला हो गया. मेहुल ने पूरा झड़ने के बाद अपना लंड बाहर निकाला स्मिता की चुम्मियाँ लेता हुआ उसकी बगल में लेट गया.

दोनों हांफ रहे थे. फिर एक दूसरे की ओर मुड़कर एक लम्बा चुम्बन लिया.

"कैसा रहा." मेहुल ने पूछा.

"अद्वितीय. परम सुख मिला है आज. तूने सीखा कहाँ से ये सब?"

"बताया न, मुझे बहुत अच्छी शिक्षिकाएँ मिलीं. जो इस कला में बहुत निपुण हैं. उन्होनें बहुत कुछ सिखाया कि किसी स्त्री को कैसे सुख देते हैं."

"पर तू जो जबरदस्ती कर गया, वो."

"उनका कहना है की स्त्री सदैव हर क्रीड़ा के लिए मानती नहीं है, कभी कभी मनाने की असफल चेष्टा से कर लेना सही रहता है."

"क्या मैं पास हो गया?"

मेहुल का मुंह चूमते हुए स्मिता बोली, "एकदम टॉप."

"कुछ पियोगी?"

"हाँ बना दे एक पेग. टाइम क्या हुआ है?"

"१ बजे हैं."

"क्या. अरे मेरा फोन दे और पेग बना कर ला."

स्मिता ने विक्रम को मेसेज किया, "मिशन सफल,"

तब तक मेहुल पेग ले आया और दोनों माँ बेटे नंगे ही चुस्कियां लेने लगे.

**********

बैठक में:

"मिशन सफल,"विक्रम ने अपने फोन पर मेसेज पढ़ा. और सबको बता दिया. सबके मन में आनंद और सफलता की एक लहर दौड़ गई. और सब उठ के एक दूसरे के गले मिले और फिर अपने अपने कमरों में चले गए.

**********

स्मिता का शयनकक्ष: स्मिता और मेहुल

जब दोनों ने दो पेग लगा लिए तो मेहुल ने चिहुल की, "मम्मी, अब आओ, आपके तीसरे छेद का वचन भी पूरा कर देता हूँ." उसे पता था कि आज उसकी माँ किसी भी स्थिति में अपनी गांड नहीं मरवाने वालीं. स्मिता के हाथ पांव कांपने लगे.

वो विनती करने लगी, "बेटा, आज तू बस चूत ही से संतुष्ट हो ले."

मेहुल भी अपनी माँ को अधिक नहीं सताना चाहता था. हाँ अगर वो उसके परिवार की न होकर कोई और होती तो वो बिना गांड फाड़े छोड़ता नहीं.

"ठीक है मम्मी. पर कब."

स्मिता ने कुछ सोचा फिर बोली, "एक आइडिया है. परसों तू सुजाता और मुझे एक ही साथ क्यों नहीं चोदता। मेरी गांड भी तभी मार लेना और सुजाता की भी."

"हम्म आइडिया बुरा नहीं है. परन्तु मुझे स्वीकार नहीं है. मैं सुजाता आंटी को एक बार अकेले में ही चोदना चाहता हूँ. वे भी मुझे मूर्ख समझती हैं और आपको भी अधिक आदर नहीं देतीं. इसके बारे में कुछ करना होगा”, मेहुल के चेहरे पर एक क्रूर मुस्कान थी, “तब तक अपने २-३ राउंड हो जाएँ"

"क्यों नहीं।" ये कहते हुए दोनों माँ बेटे फिर से एक दूसरे के आलिंगन में खो गए.

अभी पूरी रात जो शेष थी.

क्रमशः

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कैसे कैसे परिवार

अध्याय ९: मिश्रण - दिंची क्लब और दो परिवार


दिंची क्लब: पहला साक्षात्कार (Interview) :- पुरुष आवेदक.

एक सुन्दर मध्यम उम्र की सहायिका ने रोमियो के नए आवेदक को कमरे में ले जाकर कपड़े उतार कर गाउन पहनने को कहा. निखिल ने निसंकोच वहीँ अपने कपड़े उतारे और गाउन पहन लिया. सहायिका जिसका नाम सोनम था, ने निखिल के मुरझाये लंड को देखकर अपने सूखे होंठों पर जीभ चलाई. पर वो जानती थी कि आज उसका दिन नहीं है. वो अपनी भावनाएं मन में दबाकर कमरे से चली गई. कुछ ही समय पश्चात् शोनाली ने कमरे में प्रवेश किया. उसने भी वही गाउन पहना हुआ था.

"नमस्ते, मैडम! " निखिल ने उसका अभिवादन किया.

"नमस्ते रोमियो, ये अचरज का विषय है न कि हम यहाँ मिल रहे हैं. पर जो होता है, अच्छे के लिए ही होता है.”

तभी सोनम ने कमरे में फिर प्रवेश किया. उसके हाथ में एक फीता था.

"हमें पहले औपचारिकता पूरी करनी होगी. सोनम, प्लीज इनके लंड को चूसकर खड़ा करो और उसका नाप लो."

सोनम की आँखों में चमक आ गई. उसने हाथ पकड़कर आवेदक को सोफे पर बैठाया और उसके गाउन को साइड में करते हुए बिना देरी किये हुए उसका लंड अपने मुंह में ले लिया. वो अपने भाग्य को धन्य कर रही थी, क्योंकि अधिकतर उसे मात्र देखने और नापने के लिए ही बुलाया जाता था. पर लगता है, आज शोनाली बहुत अच्छे मूड में है. वो लंड चूसने में पारंगत थी और चाट चाट कर और चूस चूस कर कुछ ही देर में निखिल के लंड को अपने प्रताप में ले आयी.

"शोनाली, ये तैयार है."

"ठीक है नापो."

"हम्म्म, 11.२ इंच लम्बाई।"

"३ इंच गोलाई।"

"शोनाली, ये मापदंड पर खरा है."

"ओके, सोनम. तुम रिकॉर्ड के लिए फोटो लो, और प्रविष्टि कर लो. ये अत्यंत लोकप्रिय होने वाला है."

सोनम अपना कार्य संपन्न करके चली गई. आवेदक खड़ा हो गया पर उसका लंड गाउन के बाहर अभी भी तन्नाया हुआ था. शोनाली ने उसे बाँहों में लेकर एक गहरा चुम्बन लिया.

"मुझे तो पता भी नहीं था कि तुम इतना बड़ा लंड लिया घूमते हो."

"हाँ,, इस विषय में हम दोनों भाई बहुत धनी हैं."

"तो क्या तुम्हारा भाई भी? वो छोटू भी?"

"बिल्कुल "

"हम्म्म्म शायद उसे भी सदस्य बनाया जा सकता है. पर वो बाद में. हम अपना इंटरव्यू शुरू करते हैं."

"पहली बात ये कि ये क्लब हमारी महिला सदस्यों के सुख और आनंद के लिए है. तुम्हारा दायित्व होगा कि जिस सदस्या ने तुम्हें चुना हो, उसे पूर्ण रूप से प्रसन्न करना. कुछ की विशेष रुचियाँ रहती हैं, परन्तु मुझे विश्वास है कि इसमें तुम्हें भी आनंद आएगा। पर पहले उनकी इच्छा पूरी करना तुम्हारा दायित्व है."

"जी"

"और उन सब से पहले तुम्हें मुझे संतुष्ट करना होगा।" शोनाली ने अर्थ भरी मुस्कान से कहा, “क्योंकि मैं इस साक्षात्कार में ये सुनिश्चित करुँगी कि न केवल तुम्हें एक शक्तिशाली लंड प्राप्त है, बल्कि तुम इसके उपयोग में भी पारंगत हो.”

निखिल उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया. फिर उसने शोनाली का एक पांव उठाया और उसकी सैंडल निकाल दी. यही उसने दूसरे पांव के साथ किया. उसने शोनाली को सोफे पर बैठने का इशारा किया. फिर शोनाली के एक पैर को चूमने और चाटने लगा.

"ओह" शोनाली के मुंह से निकला.

"आपकी सेवा में निखिल प्रस्तुत है, देवी."

निखिल कुछ देर यूँ ही दोनों पांवों को चूमता और चाटता रहा. फिर वो खड़ा हो गया और शोनाली का हाथ पकड़कर उसे भी खड़ा कर दिया. उसने शोनाली का गाउन खोला और निकाल दिया. फिर दोबारा शोनाली को सोफे पर बैठा दिया और उसके पाँव फैलाकर अपने हाथ से उसकी चूत को सहलाने लगा. शोनाली एक तन्द्रा में आ गई. उसके बाद निखिल ने अपना मुंह उसकी एकदम चिकनी चूत पर लगाया और उसे चाटने लगा. उसने अपनी एक उंगली उसकी चूत में डालकर उसे हलके हलके से चोदने लगा. साथ ही अपने मुंह से उसे चाटता जा रहा थे. फिर उसने अपने होंठों से भग्नासे को दबाया और मसलने लगा. शोनाली बेकाबू होकर झड़ने लगी. निखिल ने अपनी उंगली निकली और अपनी जीभ अंदर डाल दी और सडप सडप कर पानी पीने लगा.

"ओह माँ. क्या जादू है मेरी जीभ में. कहाँ से ट्यूशन ली है जो इस उम्र में इतना निपुण हो गया."

"कहीं नहीं आंटी , बस समझो होम ट्यूशन है."

"तू सुप्रिया को चोदता है?" शोनाली से आश्चर्य से पूछा.

"और नितिन भी. और हम दोनों नानी को भी चोदते हैं."

"ओह. शीलाजी तो अब ६५ की होगी ही. उसे भी तुमने नहीं बख्शा।"

"हम कौन हैं बख्शने वाले, उल्टा उन्होंने ने हमें प्रशिक्षित किया है."

ये सब बातें करते समय निखिल अपनी २ उंगलियां शोनाली की चूत में चला रहा था.

"और तेरे नाना?

"वो मां और मौसी को चोदते हैं."

"सुरेखा तो ऐसी नहीं लगती."

"अभी पिछले हफ्ते ही उनका उद्घाटन किया है. हम दोनों भाइयों को अभी तक अवसर नहीं मिला है. आंटी, आप मेरा लंड चूसोगी, प्लीज?"

"नेकी और पूछ पूछ. ला इधर ला" शोनाली ने उतावली होकर कहा.

निखिल खड़ा हो गया और अपना गाउन उतार फेंका. शोनाली सोफे पर आगे हुई और थोड़ी देर लंड को सहलाते हुए गपाक से में अपने मुंह में ले ली. पहले तो वो हल्के हलके से चूसी फिर भूखी शेरनी की तरह उसे चूमने और चाटने लगी. थोड़ी ही देर में निखिल का लंड लोहे की रॉड जैसा तन गया.

"चलो बिस्तर पर चलते है,"

दोनों बिस्तर की ओर बढे. वहां शोनाली ने एक तकिया अपनी गांड के नीचे लगाई और एक सिर के नीचे और पैर फैला दिए.

"आ जा मेरे घुड़सवार, चढ़ जा घोड़ी पर और दिखा कितना दम है तुझमें. मुझे ताबड़तोड़ और गहरी चुदाई पसंद है. है तेरे बस की?" शोनाली ने उसे उकसाते हुए कहा.

"मैं अपनी पूरी चेष्टा करूंगा. पर अभी तक किसी ने कमी नहीं निकाली. पर आप मुझे बीच में टोकना नहीं."

"अरे तेरे जैसे लौड़े दिन में तीन बार खाती हूँ. मैं क्यों टोकूंगी तुझे?"

निखिल ने अपना स्थान लिया, शोनाली की चूत पर अपने लंड को लगाकर, उसके दोनों मम्मों को हाथ में ले लिया.

"चलो आंटी, यात्रा पर चलते हैं."

कहते हुए उसने एक लम्बा शॉट मारा. धक्का इतना शक्तिशाली था कि पलंग हिल गया. और पूरा ११ इंच का मूसल एक ही बार में अंदर चला गया. शोनाली की तो आँखें बाहर आ गयीं और साँस रुक गयी. उसे लगा कि किसी ने उसकी चूत को चाकू से चीर दिया हो.

"अबे भोसड़ी के, कोई एक बार में पेलता है ऐसा मूसल."

"पर आंटी आप ही तो बोलीं थीं की आपको ऐसी चुदाई पसंद है और ऐसे लौड़े आप दिन में तीन बार लेती हैं. और मैं आज आपका सेवक हूँ. अपने जैसा चाहा था उसे पूरा किये बिना अब मैं नहीं रुकूंगा."

कहकर निखिल ने अपना पूरा लंड निकला और दोबारा उसी तेजी से पेल दिया. और फिर ये क्रम बिना रुके चलित हो गया. शोनाली संभल ही नहीं पा रही थी. गहरे, लम्बे और तेज धक्कों के आगे वो बेबस थी. पर उसकी चूत इस पर अनुकूल प्रतिक्रिया कर रही थी. उसका पानी छूटने लगा था. इससे हुआ ये कि निखिल के भीषण धक्के थोड़े आसान हो गए झेलने में.

"तू अपनी नानी को भी ऐसे ही चोदता है क्या, इस बेदर्दी से."

"अरे उन्हें तो हम तीनों को एक साथ चोदना पड़ता है. उनकी आयु पर मत जाओ वो आपके जैसी स्त्रियों को पानी पिला दे."

"देखती हूँ."

निखिल के धक्के अब असहज और भयावने हो रहे थे. पर अब शोनाली ने खेल समझ लिया था और पूरा साथ दे रही थी. वो रह रह कर झड़ रही थी और उसका शरीर अब एक गुड़िया की तरह उछल रहा था. कोई १० से १५ मिनट यूँ चोदने के बाद निखिल अपने शीर्ष पर पहुँच गया.

"मैं झड़ने वाला हूँ."

"शुक्र है" शोनाली ने मन में सोचा फिर बोली, "अंदर मत छोड़ना मेरे मुंह में छोड़ना."

"तो फिर उठिये."

निखिल ने अपने लंड को धीरे धीरे बाहर निकाला। जैसे ही उनका टोपा बाहर आया, शोनाली एक बार और झड़ गई. उसने निखिल को सोफे पर बैठाया और उसका लंड चूमने चाटने लगी. फिर मुंह में लेकर ऐसा दबाव बनाया कि निखिल का पानी छूटने लगा. शोनाली ने निसंकोच पूरा रस पी लिया और फिर उठकर सोफे पर बैठकर सुस्ताने लगी.

"तुमने सच में शक्तिशाली चुदाई की है, और मेरी हड्डियाँ हिला दीं. पर आनंद बहुत मिला. कुछ सदस्य तो तुम्हारे लिए पागल ही हो जाएँगी."

"आपने उकसाया न होता तो प्यार से करता."

"नहीं, मुझे क्लब में ऐसे ही चुदना पसंद है. क्या एक ड्रिंक लोगे? फिर इंटरव्यू का दूसरा चरण शुरू करेंगे."

"ठीक है."

शोनाली दोनों के लिए एक मंहगी व्हिस्की का पेग बनाकर आयी.

"हमारे परिवारों को मिलना चाहिए, एक बार." शोनाली मन में कुछ सोचते हुए एक घूँट लेकर बोली.

"नाना से पूछूंगा. मना तो नहीं करेंगे."

कुछ समय यूँ ही बातें करते हुए दोनों ने ड्रिंक ख़त्म की.

"मुझे तो अगले चरण से डर लग रहा है."

"क्यों आंटी?"

"क्लब की अधिकतर महिलाओं को गांड मरवाना अत्यधिक पसंद है. कुछ हैं जो केवल गांड ही मरवाती हैं, जो कुछ रोमियो को नहीं भाता। इसीलिए हमने ये टेस्ट रखा है. क्या तुम्हें गांड मारना पसंद है?"

"अत्यंत. नानी और मम्मी तो गांड मरवाने की रसिया हैं. जब तक दिन में एक बार उनकी गांड की खुजली नहीं मिटाई जाये वो बेचैन रहती हैं. आप चाहें तो उन सारी सदस्यों को जो सिर्फ गांड मरवाना पसंद करती है, मुझे दे सकती है."

"पर सुनो, ऐसी दरिंदगी से मत मारना कि चल न सकूं."

"आप बेफिक्र रहिये. इतने प्यार से मारूंगा कि आप मुझे मान जाएँगी."

"ठीक है. पर ठहरो, मुझे गांड मरवाते समय लंड चूसने अच्छा लगता है. मैं किसी को बुलाती हूँ. तुम्हे आपत्ति तो नहीं है."

"मुझे कोई आपत्ति नहीं है."

शोनाली ने सोनम को फोन लगाकर सचिन को भेजने के लिया कहा.

"दूसरे चरण के लिए लड़का फिट है?" सोनम ने पूछा. उसे शोनाली का स्वाद पता था.

"बिलकुल".

“चलो अब तुम मेरी गांड तैयार करो और सचिन की चिंता मत करना.”

"नो प्रॉब्लम, आंटी जी. बिस्तर पर चलें?"

"नहीं, यहीं कालीन पर. मुझे दो तकिये दो अपने घुटने के नीचे रखने के लिए. और टेबल पर पड़े जैल को भी ले लो."

निखिल बिस्तर पर से दो तकिये उठा लाया और जैल भी ले आया. शोनाली ने तकिये अपने घुटनों और हाथ के नीचे रखे और गांड को आसमान की ओर उठा दिया. निखिल उसके पीछे झुका और उसकी गांड पर अपना मुंह रखकर चाटने लगा. फिर दोनों हाथों से उसने उस रहस्यमई द्वार के पट खोले और अपनी जीभ से कुरेदने लगा. तभी शोनाली को कुछ याद आया. उसने निखिल से कहा कि ड्रावर के अंदर एक बट प्लग रखा है, उसे निकाल ले.

"जब मेरी गांड में अपना माल छोड़ोगे तो इसे लगा देना जिससे तुम्हारा माल अंदर ही रहे."

"ऐसा क्यों?"

"क्योंकि तुम्हारी सुमति आंटी को गांड से निकला हुआ वीर्य बहुत स्वादिष्ट लगता है. तो ये उनके लिए प्रसाद होगा. हर नए रोमियो के पानी को गांड में लेकर जाती हूँ. उन्हें कुछ समय तक गांड में रुका हुआ वीर्य तो और भी अधिक प्रिय है."

निखिल अचंभित हो गया, पर जाकर बट प्लग ले आया.

"ओके, अब शुरू हो जाये जहाँ पर छोड़े थे."

निखिल ने फिर अपना कार्यक्रम पुनरारंभ कर दिया. अपनी जीभ से शोनाली के गांड खोदने लगा और उसके आसपास के भूरे सिकुड़ी रेखाओं से बने हुए गांड के छेद को चाटने लगा. जब उसे लगा कि गांड अब लौड़ा खाने के लिए उपयुक्त है, तब उसने ट्यूब को शोनाली की गांड में डाला और ढेर सारा जैल उसमे भर दिया. फिर दो उँगलियों से उसे अच्छे से गांड के अंदर फैलाया और उसकी गांड को चौडाने लगा. तभी दरवाज़ा खुला और एक लड़का गाउन पहने हुए अंदर आया.

"हेलो शोनाली मैम! सोनम ने कहा आप गांड मरवाने वाली हो तो चूसने के लिए भी लंड चाहिए."

"आ जा सचिन. इससे मिल, ये निखिल है. और अब ये मेरी गांड मारने जा रहा है. तो तू सामने आ जा और दे दे अपना लंड मेरे मुंह में."

"हाय निखिल, आई ऍम सचिन." अपना गाउन उतारते हुए सचिन ने अपना परिचय दिया.

"हेलो सचिन." हाथ मिलते हुए निखिल ने उसे स्वीकार किया.

निखिल ने जब देखा की गांड मस्त तैयार है, तब उसने अपने लंड पर भी जैल लगाया और अच्छे से चिपड़कर चिकना कर दिया. उधर सचिन ने अपना लंड शोनाली के सामने प्रस्तुत किया जिसे शोनाली सहर्ष मुंह में लेकर पूरी तन्मयता से चूसने और चाटने लगी. निखिल ने अपने लंड को शोनाली लुपलुपाते हुए गांड के छेद पर रखा और हल्का सा दबाव बनाया. थोड़ा ठहर कर सुपाड़ा गप्प से अंदर चला गया. निखिल ने अत्यधिक संयम दिखते हुए अपने लंड को धीरे धीरे अंदर पेलना शुरू किया और लगभग ४-५ मिनट में जड़ तक समा दिया.

"ओह, वाह. क्या लंड है तेरा. बिलकुल गांड भर दी तूने अच्छे से. अब धीरे से पेलना, थोड़ा चलने के बाद तेज चुदाई करना." ये निर्देश देकर शोनाली वापिस सचिन के लंड पर पिल गई.

निखिल ने वैसा ही किया, हल्के धक्कों से प्रारम्भ करके धीरे धीरे गति बढ़ाने लगा. कुछ ही समय में वो अपना पूरा लंड तेजी के साथ शोनाली की गांड में पेल रहा था. तभी दरवाज़ा खुला और पार्थ अंदर आया, उसे शीघ्र ही कहीं जाना था तो वो थोड़ी ही बात करके निकल गया. निखिल ने अपना कार्यक्रम चलने दिया और लम्बे ताकतवर धक्कों से उसने शोनाली की गांड का कीमा बना दिया. शोनाली अब हर क्षण झड़ रही थी. सचिन ने बताया कि वो भी निकट है, पर शोनाली रुकी नहीं बल्कि और गहराई से चूसने लगी. तभी निखिल ने भी घोषणा की कि उसका भी निकलने वाला है.

"अंदर ही डालना और फिर बट प्लग से बंद कर देना गांड को मेरी." शोनाली ने उसे चेताया.

निखिल ने बगल से प्लग उठा लिया और एक हुंकार के साथ शोनाली की गांड में अपना पानी छोड़ दिया. लंड सिकुड़ने के बाद उसने बाहर निकला और प्लग से शोनाली की गांड का द्वार सील कर दिया. शोनाली ने अपनी गांड मटका कर और थोड़े अंदरूनी खिचांव से प्लग को ठीक से अंदर किया। उधर सचिन ने भी अपना माल शोनाली के मुंह में छोड़ा जिसे शोनाली ने एक अच्छी चुड़क्कड़ रंडी की तरह कुछ पिया और कुछ अपने चेहरे और वक्ष पर मल लिया.

सचिन ने शोनाली की ओर देखा, “लगता है निखिल ने भरपूर मॉल छोड़ा है आपकी सिस-इन-लॉ के लिए.”

“ओह, यस! शी विल बी वेरी हैप्पी!” शोनाली ने कहा.

फिर वो उठी और किसी पेशेवर विश्लेषक की तरह निखिल का फॉर्म लिया और उस पर उत्तीर्ण और आवेदन स्वीकृत लिखकर हस्ताक्षर कर दिए.

"निखिल, वेलकम टू दिंची क्लब." शोनाली ने उससे हाथ मिलाकर कहा.

सचिन ने भी हाथ बढ़ाया, "वेलकम ब्रो, तुम्हें यहाँ बहुत आनंद आएगा."

"धन्यवाद आप दोनों का. मुझे भी यही आशा है."

कहते हुए सब अपने कपडे पहनने के लिए निकल गए.

सुप्रिया सिंह का घर:

निखिल जब अपने घर पहुंचा तो बहुत रात हो चुकी थी. अपने कमरे की ओर बढ़ते हुए उसे अपनी माँ सुप्रिया के कमरे से सिसकारियों और फच फच की ध्वनि सुनाई दीं। वो मुस्क़ुराते हुए अपने कमरे में जाकर लेट गया. सम्भवतः नितिन उसकी माँ की चुदाई में व्यस्त था. उनकी माँ सच में एक अत्यंत कामुक स्त्री थी, चाहे जितना भी चुदे, अगली चुदाई के लिए सदैव तत्पर रहती थी. कभी कभी तो नितिन, वो और उनके नाना, तीनों भी उसे कम पड़ते थे. पर आज शोनाली आंटी को चोदकर बहुत आनंद मिला था. और अब तो उसकी झोली में और भी ऐसी ही गर्म और प्यासी औरतें गिरने वाली थीं।

उसकी माँ और नानी के सतत परिश्रम और प्रशिक्षण से नितिन और वो दोनों इस कला में अत्यंत पारंगत थे. ऐसा नहीं था कि वो और लड़कियों या महिलाओं को नहीं चोदते थे, पर उनके लंड को झेलना हर स्त्री के बस का नहीं था. इसी कारण उनकी ऑंखें हमेशा अपने दोस्तों की मम्मी या रिश्तेदार महिलाओ पर रहती थीँ . जहाँ उन्हें कोई भी लक्षण लगता कि वो उनकी चपेट में आ सकती है, तो वो अपना मोह जाल फैलाते थे और कुछ ही दिनों में वो आंटी अपने बिस्तर में उन्हें आमंत्रित कर लेती थी.

चूँकि उनकी माँ इतनी खुली थी तो उन स्त्रियों को वो अपने ही घर बुला लेते थे. अब ये समझना कठिन न होगा की नाना की कृपादृष्टि से उनका भी पूरा घर वीडियो से लैस था और कई बार जब उनमे से कोई नयी मुर्गी की चुदाई कर रहा होता था तो अन्य सब उनके नाना के घर में लाइव शो देखते. निखिल और नितिन अपनी पटायी औरत को वैसे तो अपने ही लिए पटाते थे, पर कभी कभी अधिक गर्म और प्यासी महिला उनके हत्थे चढ़ जाती तो वो दोनों एक साथ भी सवारी करते थे. जो भी स्त्री इन दोनों के बीच में पिस कर जाती, वो अपने जीवन का अनंत सुख पाती थी, हालाँकि उसकी चाल कुछ दिनों के लिए बदल जाती थी. यही सब सोचते हुए निखिल सो गया.

पर उसी घर के दूसरे कमरे में जैसे कोई घमासान युद्ध छिड़ा हुआ था. सुप्रिया घोड़ी के आसन में अपनी गांड उठाये और चेहरे को तकिये में दबाये हुए सिसक सिसक कर हल्की हल्की चीखें निकाल रही थी. अगर कोई सिर्फ उसका चेहरा देखता तो उसे दया आ जाती, पर उसकी गांड में अपना मोटा लम्बा लंड पेल रहे उस लड़के के मन में ऐसी कोई भावना नहीं थी. उसके लंड का हर वार लम्बा और वहशी था. वो अपना लंड लगभग पूरा बाहर निकलता और फिर बहुत तेज पाशविक गति से वापस गांड में ठूंस देता. उसकी गति इतनी तीव्र थी कि अंदर बाहर का एक चक्र पलक झपकते ही हो जाता था.

"क्यों मम्मी, मजा आ रहा है. कैसा लग रहा है मेरा लौड़ा अपनी गांड में लेकर?"

"तुम जानते हो मुझे तुम तीनों से गांड मरवाना कितना अच्छा लगता है तो पूछ क्यों रहा है. अपनी ताकत बातों में मत ख़राब कर, मेरी गांड पर ध्यान दे मादरचोद."

"वो तो मैं हूँ. मादरचोद. हम तीनों ही मादरचोद हैं. और नानीचोद भी." नितिन ने उसकी बात मानी और अब अपने पूरे जोश से गांड का माल हिलाने में लग गया.

उसे ये आश्चर्य था कि जो स्त्री औरत हर दिन चुदवाती हो और गांड मरवाती हो उसके दोनों छेद आज भी कैसे इतने तंग थे. वो स्त्रियों के राज से अनिभिज्ञ था. शीला ने सुप्रिया को चूत की मांस पेशियों के कुछ ऐसे व्यायाम सिखाये थे जिनके कारण उसकी चूत और गांड व्यायाम से लगभग २ घंटे में ही वापिस सिकुड़ जाती थी. शीला ने अपनी जवानी इसी प्रकार संभाले रखे थी. अनगिनत लौडों को अपने दोनों छेदों की यात्रा करवाने के बाद भी कोई उसकी चूत को भोसड़ा नहीं कह सकता था. नितिन अब चुदाई के उस चरण पर पहुँच चुका था जहाँ उसके लंड से पानी निकलने ही वाला था.

"मम्मी, मेरा होने वाला है. कहाँ छोडूं?"

"मू में, मू " सुप्रिया की आवाज़ धक्को से दब गयी थी.

नितिन ने अपनी गति कम की और फिर बहुत सावधानी से अपने लंड को बाहर खींचा और सुप्रिया के सामने जाकर खड़ा हो गया.

सुप्रिया ने करवट ली और बैठ गई, और लपक के नितिन के लंड को गपक लिया. वो एक भूखी भिखारन की तरह नितिन के लंड को चूस रही थी. उसे देखकर कोई वैश्या भी शर्मा जाती. कोई उसके इस रूप और उसके ऑफिस के रूप को देखकर सोच भी नहीं सकता थी कि वो दोनों एक ही स्त्री हैं. जैसे ही नितिन के लंड ने धार छोड़नी शुरू की सुप्रिया ने एक दो धारें अपने मुंह से पी लीं और फिर लंड निकालकर अपने चेहरे पर मलने लगी.

पिचकारियां उसके चेहरे के हर रोम को भिगा दे रही थीं. जब नितिन का रस ख़त्म हुआ तो सुप्रिया का पूरा चेहरा उसके वीर्य से ओतप्रोत था. सुप्रिया ने अपने हाथों से उसे इकठ्ठा किया और अपने मुंह में डाल लिया. कुछ उसने अपने स्तनों पर भी मल लिया. अब उसके चेहरे पर संतुष्टि के भाव थे. जैसे उसके अंदर का जानवर शांत हो गया हो.

"गांड फाड़ने में तुझे मजा आया?"

"अरे मम्मी, तुम्हारी गांड तो ऐसी ही कि हर समय अपने लौड़े को इसी में डाले रखूँ."

"तो तेरी नानी का क्या होगा?"

"अरे उनकी गांड के लिए निखिल है न."

दोनों हंसने लगे.

"निखिल से पता करेंगे क्या हुआ उसके नए काम का. कहीं इंटरव्यू के लिए गया था, किसी क्लब में."

"अब कल देखना, मुझे कालेज भी जाना है. मैं सोने जा रहा हूँ."

"चलो कल मिलते है."

थोड़ी देर में दोनों अपने अपने कमरों में तृप्ति की नींद में डूब गए.

शोनाली का घर:

कुछ समय पश्चात् सागरिका ने सबके लिए एक डबल ड्रिंक बनाया और इस बार खुद भी लिया.

"तो मॉम, कैसा रहा आज का इंटरव्यू?" सागरिका ने शोनाली से पूछा.

"एकदम फर्स्ट क्लास. और जॉय हमें सम्भवतः अपना पहला दामाद मिल गया है. सागरिका के लिए मुझे ऐसा लड़का मिला है जो हमारे परिवार के लिए बिल्कुल उपयुक्त है." कहकर उसने अपनी पूरी ड्रिंक एक ही साँस में समाप्त कर दी.

"और उसका नाम है ......”

सागरिका ने प्रश्न किया क्योंकि वो अब बहुत ज्यादा उत्सुक थी. उन लोगों की जीवन शैली में उपयुक्त बैठने वाला अगर कोई लड़का मिल जाये और वो भी जिसे उसकी माँ पसंद करे तो इससे अच्छा क्या हो सकता है.

"निखिल."

"कौन वो पार्थ का दोस्त?"

"और समर्थ और शीला का नाती."

"तीन नंबर वाले"

"हाँ, वही. और अब अच्छा समाचार. निखिल, उसका भाई नितिन और समर्थ भी हम ही लोगों के समान पारिवारिक सम्भोग में लिप्त हैं. सुप्रिया अपने घर में निखिल और नितिन से तो चुदवाती ही है और तो और समर्थ और शीला भी इसमें मिले हुए हैं. सुरेखा भी अभी कुछ ही दिनों पहले जुड़ी है. उसकी गाड़ी ५ दिन से यहीं है."

"शोनाली, ये तो बहुत ही शुभ समाचार है. पर क्या वो विवाह के लिए मानेंगे? हम बंगाली, वो ठाकुर, समर्थ मानेगें?"

"अरे ये भी तो समझो कि जिस प्रकार हमें सागरिका के लिए लड़का मिलने में समस्या आ रही ही, उसी प्रकार मुझे नहीं लगता कि उन्हें निखिल के लिए कम कठिनाई हो रही होगी."

"निखिल करता क्या है?"

"अरे अपने नाना का इतना बड़ा बिज़नेस है, उसी में जायेगा. पार्थ से पता करेंगे उसके बारे में."

"एक बात और, आज निखिल ने दिंची क्लब में रोमियो का काम ले लिया है."

सागरिका, उत्साह से, "मम्मी, तो क्या उसका लंड..."

"हाँ, ११ इंच से ज्यादा."

"और बहुत स्वादिष्ट भी. शोनाली की गांड के रस के साथ पिया था. ये अच्छा होगा, अपने दामाद से गांड मरवा कर उसकी पानी पियूँगी."

"दीदी, आपको अपनी गांड मरवाने के और दूसरों की गांड से पानी पीने के सिवाय कुछ और भी सूझता है?" जॉय ने थोड़ा चिढ़कर कहा. "हम लोग यहाँ गंभीर बात कर रहे हैं. प्लीज."

"सॉरी, मैं अपनी ख़ुशी नहीं संभल पायी." सुमति ने सहम कर कहा.

"अरे बुआ, तुम क्यों ऐसा सोचती हो. तुम्हे अपनी सुहागरात में अपनी गांड से कामरस पिलाऊंगी. चाहे वो जो भी हो." सागरिका सुमति के होंठ पर हल्का सा चुम्बन लेकर बोली.

"मेरी प्यारी गुड़िया." सुमति भाव विभोर हो उठी.

"तो करना क्या है?" जॉय ने पूछा.

"पहले पार्थ से बात करो. फिर समर्थ को उसके परिवार के सहित मिलने के लिए आमंत्रित करो. पर पार्थ की सहमति के पश्चात्."

"ठीक है. अब देर हो रही है, पार्थ से सुबह बात करेंगे. फिर देखते हैं."

"पापा, अगर आपको मेरी स्वीकृति चाहिए तो मैं अपनी हाँ अभी से देती हूँ. लड़का सुन्दर और सशक्त है, धनी परिवार से है, ११" लम्बा लंड लेकर घूमता है, अपनी माँ और नानी को चोदता है, और तो और मेरी मम्मी को पसंद है. प्यार साथ रहने से अपने आप ही पनप जायेगा."

"ठीक है. मुझे ख़ुशी है. अब कल पार्थ से समझ लें फिर निष्कर्ष निकालेंगे."

सुप्रिया का घर:

सुबह नाश्ते के लिए सुप्रिया निखिल और नितिन के साथ बैठी थी. तीनों अपने अपने काम पर जाने के लिए तैयार थे.

तभी सुप्रिया ने निखिल से पूछा, "तुम कहीं इंटरव्यू के लिए गए थे? नाना तुम्हें कब से हमारी कंपनी में आने को कह रहे हैं, वो क्यों नहीं करते."

"रिलैक्स मॉम. मैं आप लोगो के साथ ही काम करने वाला हूँ, बस कुछ दिन रुक जाओ. और जहाँ मैं गया था वो कोई नौकरी नहीं है."

"तो क्या है."

"एक क्लब है जहाँ जवान लड़के मध्यम आयु और उससे अधिक की महिलाओं का मनोरंजन करते हैं."

"और तुम उसमे कैसे चले गए?"

"पार्थ ने मुझे बताया था, वो क्लब में नए लड़कों को हर महीने शामिल कर रहे हैं, क्योंकि माँग बहुत है, तो उसने मुझसे पूछा था. और उस क्लब में प्रवेश के लिए लंड कम से कम १०" का होना चाहिए."

"और इस मानक पर तो तुम दोनों ही पूरे उतारते हो. फिर क्या हुआ?"

"क्या आप जानती हो कि उस क्लब में पार्थ की पार्टनर कौन है?"

"कौन?"

"उसकी मामी शोनाली."

"इंटरेस्टिंग."

"और मेरा इंटरव्यू शोनाली आंटी ने ही लिया था."

"ओके, वैरी वेरी इंटरेस्टिंग."

"इंटरव्यू क्या था मेरी चुदाई की क्षमता की परीक्षा थी. उनके मुंह, चूत और गांड तीनों को चोदना था."

"और उसमे तो तुम वैसी की बहुत काबिल हो."

"हाँ, पर मेरा कुछ और भी मानना है. शायद उनके घर में भी हमारी ही तरफ खुली चुदाई का वातावरण है."

"वैरी वैरी इंटरेस्टिंग."

"मुझे लगता है शोनाली या उनके घर से कोई संपर्क करेगा."

"तुमने क्या हमारे बारे में बता दिया?" सुप्रिया भड़क उठी.

"रिलैक्स, मॉम सामने वाले ने भी तो कुछ बताया होगा. वैसे भी उनका भी राज हमारे पास है."

"ओके. तुम्हारे नाना बहुत गुस्सा होने वाले हैं."

"मैं नानी से कहकर उन्हें मना लूंगा. नितिन से भी सहायता ले लूंगा मनाने के लिए."

"तुम्हारे मनाने का तरीका मुझे पता है. सौ प्रतिशत सफलता की कुंजी है. चलो मुझे देर हो रही है. शाम को मिलेंगे."

शोनाली का घर:

उधर शोनाली के घर भी सब नाश्ता कर रहे थे. सभी अच्छे मूड में थे और हंसी मजाक चल रहा था.

पार्थ ने सुमति से पूछा,"क्यों माँ, कल का स्वाद कैसा था?"

इससे पहले कि अन्य लोग समझते कि किस बारे में बात हो रही है, सुमति बोल पड़ी, "बहुत अच्छा था, शोनाली की गांड से पीकर मन खुश हो गया. किसका था?"

ये आखिरी सवाल उसने जॉय और सागरिका की ओर देखकर पूछा था, ये इशारा था कि बात करो.

"मेरा दोस्त है निखिल, क्लब में कल ज्वाइन किया है."

जॉय,"पार्थ, हम कल रात बात कर रहे थे. संभवतः निखिल के घर में भी हमारे जैसा पारिवारिक वातावरण है."

पार्थ, "मैं जानता हूँ. क्लब में लाने के पहले हम जो जाँच करते हैं, उसमे इसकी सम्भावना जताई गई है."

जॉय,"शोनाली का ये मानना है कि वो सागरिका के लिए उचित रहेगा. विवाह के लिए."

पार्थ, "क्या! मामी एक बार की चुदाई में ही शादी तक पहुँच गयी?"

शोनाली, "नहीं पार्थ, चुदवायी तो मैं बहुतों से हूँ क्लब में, पर अगर उनके घर में भी चुदाई का यही वातावरण है, तो दोनों परिवार एक दूसरे के लिए सही रहेंगे. किसी को भी अपनी जीवन शैली बदलनी नहीं होगी."

पार्थ,"मामी, आप बोल तो सही रही हो. बात बन भी सकती है. सागरिका ने क्या कहा?"

सागरिका, "दादा, मैं सहमत हूँ."

पार्थ कुछ सोचते हुए, "मम्मी और मामी मेरे विचार से आप दोनों एक बार निखिल की मम्मी से बात करो. हो सके तो उनके ऑफिस ही चली जाओ."

शोनाली, "सुप्रिया क्यों? समर्थ से न पूछें?"

पार्थ, "उसकी माँ सुप्रिया आंटी हैं, समर्थ अंकल नहीं. अगर उन्हें आवश्यक लगेगा तो वो पूछेंगी उनसे. और आप दोनों जाना, इससे उन्हें विश्वास होगा की आप गंभीर हो."

शोनाली, "फिर?"

पार्थ, "अगर उनकी प्रतिक्रिया सकारात्मक रही तो शुक्रवार को चाय पर बुलाओ. इस शनिवार क्लब में कोई कार्यक्रम नहीं है. तो मैं उसे सप्ताहांत के लिए बंद कर देता हूँ. अगर बात बनती लगे तो सप्ताहांत दोनों परिवार साथ गुजारेंगे। इससे अगर कोई भी संदेह हो कि आगे सम्बन्ध कैसे रहेंगे वो स्पष्ट हो जायेगा."

शोनाली, "ठीक है"

सुमति से अब रहा नहीं गया. वो बड़ी पुलकित स्वर में बोल ही पड़ी,"उड़ी बाबा, ये शनिवार तो मुझे खूब खाने मिलेगा."

सबने उसे एक अजीब निगाहों से देखा फिर हंसने लगे.

सुप्रिया का ऑफिस:

सुप्रिया अपने काम में व्यस्त थी जब उसका फोन बज उठा. उसने अनजान नंबर देखकर काट दिया. पर कुछ ही मिनटों में उसके ऑफिस का फोन घनघना उठा.

"हैलो। "

"सुप्रिया जी, मैं शोनाली बोल रही हूँ, संभ्रांत नगर के ५ नंबर घर से."

"हैलो शोनाली जी, कैसी हैं आप?" सुप्रिया ने पूछा. उसने निखिल से हुई उसकी सुबह की बात के बारे में सोचा,"वैरी इंटरेस्टिंग."

"मैं अच्छी हूँ. हम आपसे मिलना चाह रहे थे. क्या हम आ सकते हैं?"

"हम से आपका क्या मतलब है, और कौन."

"मेरी नन्द, सुमति भी आएंगी."

"ओके, आप लोग दोपहर ३ बजे आ जाएँ. तब चार बजे तक आपके साथ रह सकती हूँ."

"ठीक है, हम पहुँच जायेंगे. धन्यवाद."

"मुझे प्रसन्नता होगी." ये कहकर सुप्रिया ने फोन काट दिया।

वो सोचने लगी कि आखिर क्या बात हो सकती है. फिर अपनी सेक्रेटरी से तीन से चार बजे तक का समय बुक करने का बताकर उसने अपना ध्यान अपने काम की ओर लगा दिया. दोपहर के तीन बजे सेक्रेटरी ने बताया कि उससे मिलने दो महिलाएं आई है. सुप्रिया ने उन्हें भेजने का आग्रह किया और तीन कॉफ़ी लाने के लिया कहा. कुछ ही क्षणों में शोनाली और सुमति अंदर आये। शोनाली तो सुप्रिया से कई बार मिली थी और उसने आगे बढ़कर उससे हाथ मिलाया. पर सुमति सुप्रिया की सुंदरता से हतप्रभ रह गई. जब उसने सुप्रिया का हाथ अपने हाथ में महसूस किया तो वो अपनी तन्द्रा से निकली.

"क्या देख रही हैं, दीदी?" सुप्रिया ने उसे पुकारा.

"आप बहुत सुन्दर हो. बहुत सुन्दर."

"धन्यवाद, पर आपसे फिर भी कम ही लगूंगी इस मेकअप के बिना." सुप्रिया ने विनम्रता से कहा. "आइये बैठते हैं. अभी कॉफ़ी भी आ रही है. आप कॉफ़ी ही लेंगीं न, या कुछ और बोलूँ। "

"नहीं, कॉफ़ी ही सही है."

फिर तीनों बातें करने लगीं और जैसा स्त्रियों का स्वभाव है, बिना किसी विषय पर कॉफी आने तक उन्होंने १० मिनट बातें कर ली थीं. उसके बाद उन्होंने कॉफ़ी पीते हुए कुछ और हल्की फुल्की बातें की. कॉफ़ी समाप्त होने पर सुप्रिया ने सेक्रेटरी से ऑफिस बॉय से टेबल क्लियर करने को बोला। जब वो चला गया तो अपने पास पड़े रिमोट से सुप्रिया ने कमरा लॉक कर दिया.

"अब मेरी आज्ञा के बिना यहाँ कोई नहीं आएगा. अब बताइये आप मुझसे किसलिए मिलने के लिए उत्सुक थे." सुप्रिया ने शोनाली की आँखों में झांककर पूछा.

"हम अपनी बेटी सागरिका के लिए कोई योग्य लड़का देख रहे हैं." ये कहकर शोनाली ने अपने पर्स में से एक लिफाफा निकला और सुप्रिया को थमा दिया.

सुप्रिया ने खोला तो उसमें सागरिका के विभिन्न परिधानों में फोटो थे.

"आपकी बेटी बहुत सुन्दर है. जिस घर में जाएगी वहाँ चार चाँद लगा देगी."

"हमारा भी यही मानना है. और हम ये इच्छा रखते हैं कि वो आपके घर में चाँदनी लाये."

सुप्रिया भौंचक्की रह गई. उसने ये तो सोचा ही नहीं था.

"पर, पर.." सुप्रिया सोच रही थी कि उनके राज पर जो पर्दा इतने सालों से पड़ा है वो कहीं खुल न जाये.

"हम सब भी उसी प्रकार कौटुंबिक प्रेम में विश्वास रखते हैं, जिस तरह संभवतः आप." ये कहकर शोनाली थोड़ी झिझकी, फिर उसने सुमति की ओर देखा तो सुमति ने सहमति में सिर हिलाया. शोनाली ने अपने पर्स से एक और लिफाफा निकला और सुप्रिया के हाथों में दिया.

इस बार सुप्रिया और भी आश्चर्य चकित हो गई. ये सागरिका की नंगी तस्वीरें थीं जिसमे वो अपने ही परिवार के सदस्यों के साथ संभोगरत थी. इन तस्वीरों में सागरिका के हर छेद की चुदाई के दृश्य थे.

"हम्म्म्म" सुप्रिया ने उन तस्वीरों को वापिस लिफाफे में रख दिया और सोच में पड़ गई.

उनकी जीवन शैली के अनुरूप लड़की मिलना बहुत कठिन था. सागरिका का रूप देखकर उसकी आंखे चौंधिया गयी थी. उसे विश्वास था कि निखिल और नितिन दोनों को वो अच्छी आएगी. पापा और मम्मी को भी न अच्छी लगने जैसी कोई बात थी नहीं. फिर परिवार धनी था तो किसी प्रकार से कोई समस्या आनी नहीं चाहिए थी.

"मुझे निखिल और अपने परिवार में बात करनी होगी. मुझे स्वयं से कोई कठिनाई नहीं लगती. पर हमें उन दोनों की आपस में और हमारे परिवारों की अनुकूलता देखनी होगी."

"हम समझते है. समाज में हमारी जीवन शैली प्रकट न हो, इसके लिए हम भी बहुत सावधान रहते हैं. आप सोचें और विचार करें." ये कहकर शोनाली ने दूसरा लिफाफा अपने पर्स में रख लिया.

सुप्रिया: "ठीक है. अब एक बात बताइये."

शोनाली: "अवश्य"

सुप्रिया: "क्या ये आपके कल निखिल के साथ समय बिताने का परिणाम है."

शोनाली: "आप किस प्रकार की भाषा में सुनना पसंद करेंगी."

सुप्रिया: "गन्दी और सटीक."

शोनाली: "हाँ, कल जब निखिल ने मुझे चोदा तो मुझे ऐसा अनुभव हुआ जो अनुपम था. उसने मेरी चूत को जिस ढंग से चोदा उससे कुझे ये विश्वास हो गया कि इतना सामर्थ्य बिना घरेलू प्रशिक्षण के नहीं आ सकता. उसके बाद जब उसने मेरी गांड मारी तो सच बताऊँ, मुझे आकाश गंगा का भ्रमण करा दिया. क्या चोदता है, अभी भी उस समय को सोचकर मेरी चूत और गांड में खुजली हो रही है."

शोनाली ने बात जारी रखते हुए कहा: "तब मैंने ये निश्चय किया कि अगर संभव हुआ तो मैं अपनी बेटी से निखिल का विवाह कराऊंगी जिससे वो इस सुख को जब चाहे पा सके."

सुप्रिया: "आपकी बात सही है. मेरे बेटों के लंड का ध्यान आते ही, मेरी भी चूत और गांड खुजलाने लगते हैं. वैसे तो मैं इसके लिए अपने साथ एक डिल्डो रखती हूँ, पर आज सोच रही हूँ की लड़के की माँ होने का लाभ उठाऊँ."

सुप्रिया अपनी पैंट निकलकर एक ओर बहुत सजा कर रख देती है. फिर अपनी पैंटी भी उतार देती है. अपने ऊपर के कपडे वो नहीं छूती.

"आपने अच्छा किया कि आप दोनों साथ आये. आपमें से एक अपने मुंह और जीभ से मेरी चूत की गर्मी शांत करेगा और दूसरा मेरी गांड की. क्या आप ये करेंगी?"

"दीदी को गांड अधिक प्रिय है, तो वो आपकी गांड की शांति करेंगी. मैं आपकी चूत को चाटकर आपको आनंद दूंगी." शोनाली ने कालीन पर लेटते हुए कहा. "आइये."

सुप्रिया ने बिना देरी किये अपनी चूत को शोनाली के मुंह पर रख दिया और शोनाली उसे बहुत ही प्रेम से चाटने लगी. और कुछ ही क्षणों में उसकी जीभ सुप्रिया की गुलाबी चूत के अंदर विचरण कर रही थी. सुप्रिया ने एक संतुष्टि की सांस ली. तभी उसने अपनी गांड पर किसी की सांसों की दस्तक महसूस हुई. फिर किसी की जीभ ने उसकी गांड के भूरे सितारे पर अपनी जीभ फिराई। सुप्रिया के शरीर में एक आनंद की लहर दौड़ गई.

सुमति गांड चाटने में बहुत पारंगत थी. उसका विश्वास था कि वो किसी को भी (पुरुष या स्त्री) को बिना छुए सिर्फ उसकी गांड चाट कर झड़ा सकती थी. सुमति सुप्रिया की गांड चारों ओर चाटती फिर उस पर फूंक मारती और जब इस फूँक से गांड चुलबुला जाती तो फिर से चाटने लगती. फिर उसने दोनों नितम्बो को पकड़कर बाहर की ओर धकेला, जिससे की गांड का छेद खुल कर सामने आ आया. सुमति ने अपने मुंह से थोड़ी लार उस छेद में डाल दी. सुप्रिया कांप गयी. फिर सुमति ने अपनी जीभ को अंदर डालकर उसे घुमाना प्रारम्भ किया. सुप्रिया एक हल्की की चीख के साथ शोनाली के मुंह में झड़ गयी.

पर सुमति का मन कहाँ भरा था. वो किसी भूखी भिखारन की तरह सुप्रिया की गांड को अंदर बाहर से चूस और चाट रही थी. चाटना, चूसना, फिर फूँकना सब एक ऐसे कटिबद्ध क्रम में हो रहा था की सुप्रिया की स्थिति बेकाबू हो चुकी थी.

"बस बस, अब और नहीं. आप वाकई गांड चाटने में बहुत दक्ष हैं. मेरा पानी २ बार निकल गया है.”

नीचे से शोनाली ने हामी भरते हुए उसकी चूत पर अपना आक्रमण चालू रखा. होने वाली समधन को वो इस स्थिति में लाकर छोड़ना चाहते थे कि वो कुछ सोचने की अवस्था में न रह पाए. सुमति ने सुप्रिया की गांड पूरी फैलाई और अपना मुंह को उसके ऊपर लगा कर जोर से चूसा जैसे की कोई वैक्यूम क्लीनर करता है. अब सुप्रिया की हालत पस्त हो गई. वो भरभरा के एक बार और झड़ी और एक तरफ लुढ़क गयी.

कुछ देर अपने आप को सँभालने के बाद सुप्रिया ने कहा, "सुमति जी, आपके जैसा गांड का पारखी मैंने आज तक नहीं देखा. आप सच में अद्वितीय है."

सुमति: "आपके जैसी सुन्दर गांड को बिना चखे मैं कैसे रह सकती थी. आपकी गांड जितनी बाहर से सुन्दर है अंदर से उतनी ही स्वादिष्ट."

सुप्रिया: "आपको मम्मी बहुत पसंद करने वाली है. पर अब हमें उठना होगा थोड़ी ही देर में मेरी एक मीटिंग है."

शोनाली और सुमति उठे और अपने कपडे ठीक किये, उन्होंने उतारे तो थे ही नहीं. सुप्रिया ने जल्दी से अपनी पैंटी और पैंट पहने, और एक रूम फ्रेशनर से कमरे को सुगंधित कर दिया और सेक्स की गंध दबा दी.

"तो क्या हम शुक्रवार को मिल सकते हैं"

"लगभग तय समझिये. मैं आज रात या कल सुबह तक निश्चित कर दूँगी."

"ओके, बाय सुप्रिया जी. मुझे आशा है कि आप संतुष्ट हो गयी होंगीं."

"१००% से अधिक. मेरे विचार से हम शीघ्र ही संबंधी बन सकते हैं."

ये सुनकर शोनाली और सुमति आनंदित और संतुष्ट होकर अपने घर की ओर निकल पड़े.

शोनाली का घर:

सुप्रिया का फोन रात नौ बजे के आसपास आया. उसने बताया कि समर्थ, शीला और वो स्वयं शुक्रवार की शाम ७ बजे मिलने आएंगे. उसने ये भी बताया कि सुरेखा का आना अभी निश्चित नहीं है, अपितु संभव है. शोनाली के आग्रह पर उसने ड्रिंक्स और रात्रि भोज दोनों के लिए सहमति दे दी. निखिल की ओर से अभी स्वीकारोक्ति नहीं मिली थी पर उसने सीधे मना भी नहीं किया था, जो उसके विचार से सकारात्मक था. अभी केवल बड़े लोग मिलकर बातें करेंगे, वैसे भी शुक्रवार को अधिकतर युवा बाहर ही रहते हैं, तो उनकी खुल कर बातें हो सकेंगी.

शोनाली ने फोन रखकर ये शुभ समाचार प्रसारित किया तो सबके चेहरे प्रसन्नता से खिल उठे. शोनाली ने पार्थ से क्लब में पार्टी के आयोजन के लिए पुष्टि की. पार्थ ने उसे बताया कि उसने सोनम और नूतन को दोनों दिन के लिए बुला लिया है. ये दोनों क्लब में ही कार्यरत हैं और कुछ विशेष परियोजनों में बुलाई जाती हैं.साथ ही कुछ रोमियो भी सहायक के रूप में उपस्थित रहेंगे.

ये सब विश्वासपात्र थे, जिन्हें पार्थ और शोनाली भली भांति जानते थे. इसी के साथ उसने श्रीमती सिमरन खन्ना को २० लोगों (जिसमे सहायक और अन्य शामिल थे) के खाने पीने का प्रबंध के लिए भी कह दिया है. सिमरन, जो एक केटरिंग कंपनी चलती थीं, भी क्लब की ही सदस्य थीं और इस प्रकार के प्राइवेट और गुप्त आयोजनों में उन्हें ही व्यवस्था दी जाती थी. हालाँकि उनके केवल बावर्ची ही रहते थे और परोसने का काम क्लब के सहायक और सहायिकाएं सिमरन के साथ करते थे.

क्लब का किचन क्लब के दूसरे हिस्से में था और गोपनीयता पर आंच आने का प्रश्न नहीं था. हालाँकि उसे सिमरन को शुक्रवार को बताना होगा। जब शोनाली को विश्वास हो गया कि सब कुछ नियंत्रण में तो वो जॉय के पास जाकर बैठ गयी.

"सोचो, अब सागरिका की शादी हो जाएगी और वो चली जाएगी." उसकी ऑंखें भर आयीं।

"दूर नहीं है, और ये भी देखो कि हमें कितना अच्छा परिवार मिला है. अब सब कुछ पहले जैसा ही रहेगा, शायद पहले से अच्छा."

"सच कहते हो. सब कुछ कितनी जल्दी हो गया."

"अभी कुछ हुआ नहीं है, बहुत आगे की मत सोचो. ये सोचो कि सम्भावना है."

तभी सागरिका और पार्थ सबके लिए शराब और खानपान ले आये और सब बैठ कर आगे आने वाले समय के बारे में सोचते हुए ड्रिंक्स लेकर खाना खाये और फिर सोने के लिए चले गए.

क्रमशः

1141500
 
कैसे कैसे परिवार



मिश्रण १.१


भाग 2

Words: 8620

खेल कक्ष:

कमरा बंद होने के बाद सब लोग बार की ओर बढ़े और अपने लिए अपनी पसंद की ड्रिंक बनाई. सब अपनी ड्रिंक पीते हुए बातें कर रहे थे. निखिल सागरिका से उसके भविष्य के बारे में पूछ रहा था. दोनों अपनी पसंद और नापसंद के बारे में भी बात कर रहे थे.

तभी समर्थ की आवाज आयी जिसने सबको उनकी ओर आकर्षित किया, "बातें तो और भी समय होती रहेंगीं. मेरे विचार से हम यहां बातें करने नहीं बल्कि ये जानने के लिए आये हैं कि हमारे परिवार एक दूसरे के कितना अनुरूप हैं. और अगर मैं गलत नहीं हूँ तो इसका अर्थ ये है कि हम एक दूसरे को चुदाई में संतुष्ट कर सकते हैं या नहीं."

सबने हाँ में हाँ मिलाई।

"तो फिर क्या करना है?"

"पापा, मैंने सोच रखा है. आप कहें तो बताऊँ?" सुप्रिया ने समर्थ के पास जाकर कहा.

"तुमने सब सोच रखा होगा, ये तो मैं जानता हूँ. अब हम सबको भी बताओ." समर्थ ने उसे अपनी बाँहों में लेकर उसके होंठों को चूमकर उत्तर दिया.

"पापा, आप हम सबसे बड़े है, तो अपनी होने वाली बहू पर सबसे पहले आपका ही अधिकार बनता है. इसीलिए सागरिका आपके साथ रहेगी." सुप्रिया ने बताया, "सागरिका, जाओ तुम नानाजी की पास जाओ."

सागरिका शर्माती हुई समर्थ के साथ खड़ी हो गई.

"अब मम्मीजी सबसे बड़ी है, तो इनको मैं पार्थ का साथ देती हूँ. पार्थ नानी जी के पास जाओ."

पार्थ जैसे ही शीला के पास पहुंचा शीला ने उसे अपनी बाँहों में भींच लिया.

"शोनाली और निखिल एक दूसरे का स्वाद ले चुके हैं, इसीलिए मैं निखिल को सुमति के साथ करती हूँ."

निखिल सुमति के पास गया. सुमति की तो आंखे ही चौंधिया गयीं.

"शोनाली को मैं अपने दूसरे बेटे नितिन का साथ देती हूँ, उसे पता होना चाहिए की मैं इतनी खुश और संतुष्ट कैसे रहती हूँ." नितिन ने शोनाली हो अपनी बाँहों में ले लिया और उसके होंठ चूम लिए.

"और मैं अपने आपको अपने समधी जॉय के हवाले करती हूँ. मुझे आशा है की वो अपना रिश्ता पक्का करने मैं मेरी सहायता करेंगे."जॉय सुप्रिया के पास आया और उसके हाथों को लेकर उन्हें चूम लिया.

पार्थ ने तभी घोषणा की, "जैसे ही हमने कमरा रिमोट से बंद किया है, सारे कैमरे चालू हो चुके हैं और हम सबका ये खेल रिकॉर्ड हो रहा है. अगर इसमें किसी को आपत्ति हो तो बताये, मैं उसे रोक दूंगा."

किसी ने आपत्ति नहीं जताई.

समर्थ ने अपनी दबंग आवाज में कहा, "अब इन कपड़ों की क्या आवश्यकता है?" ये कहकर उसने अपने कपडे उतार दिए और नंगा हो गया.

उसका अनुशरण करते हुए अन्य लोग भी अपने कपडे उतार कर खड़े हो गए. शोनाली ने एक ओर लगी कपड़ों की अलमारी की और इशारा किया और सबने एक एक करके अपने कपडे उसमें लटका दिए. समर्थ ने सागरिका का हाथ अपने हाथ में लिया और उसे सोफे पर बैठा दिया.

समर्थ: "देखें तो कैसा रस है हमारी होने वाली बहुरानी का. बेटी तुम्हारी चूत तो देखने से ही बहुत मीठी और रसीली लग रही है.. मैं स्वाद चख लूँ तुम्हारा?"

सागरिका: "नानाजी, आपकी ही चूत है, जैसा मन हो वैसा कीजिये."

समर्थ नीचे बैठकर ने सागरिका के दोनों पांव अपने कन्धों पर रखे और अपना मुंह सागरिका की जांघों के बीच डाल दिया. सभी लोग ठहर कर ये दृश्य देख रहे थे. तभी शीला ने पार्थ के लौंड़ों को हाथ से पकड़ा और उसे लेकर सोफे पर बैठ गई. अब शीला सागरिका के साथ बैठी थी, पार्थ ने अर्थ समझ कर शीला के आगे घुंटने तक दिया और अपना मुंह समर्थ जैसे ही शीला की जांघों में छुपा लिया. अन्य सभी यही विधि अपनाने के लिए अग्रसर हुए और कुछ ही क्षणों में जॉय सुप्रिया की, नितिन शोनाली की और निखिल सुमति के बीच में मुंह छुपा लिए. सभी स्त्रियां एक लाइन में बैठी थीं और सभी पुरुष उनकी चूतों में सिर घुसाए हुए थे.

शृंखला कुछ इस प्रकार से थी:

सागरिका - समर्थ, शीला - पार्थ, सुमति - निखिल, सुप्रिया - जॉय और शोनाली - नितिन.

हर पुरुष अपनी साथिन को अधिकतम मौखिक सुख देने का प्रयास कर रहा था. चूतें चाटी और चूसी जा रही थी.

उँगलियाँ चूतों में कहीं धीमी तो कहीं द्रुत गति से विचरण कर रही थी. कहीं जीभ चूत के पपोटों के साथ गाँड के भूरे सितारे को भी गीला कर थी. कहीं भगनासे को इस तरह निचोड़ा जा रहा थे कि उसकी मालकिन थरथरा उठती थी.

किसी ने चाटने के साथ एक ऊँगली चूत और एक गाँड में दाल रखी थी.

कहने का तात्पर्य ये है की हर पुरुष अपनी क्षमता का परिचय अपने नए साथी को कराना चाहता था. और ये कहना उचित होगा की ऐसा ध्यान पाने से महिलाएं आनंद की लहरों पर डोल रही थीं. पूरा कमरा अब स्त्रियों की सीत्कार और सिसकारियों से गुंजायमान था. हर स्त्री कुछ न कुछ बोल रही थी पर इस वातावरण में किसके मुंह से क्या निकल रहा था ये किसी को समझ नहीं आ रहा था.

हर पुरुष का चेहरा इस समय कामरस से भीगा हुआ था और स्त्रियों ने अपना पानी छोड़ने में कोई कंजूसी नहीं की थी. जब स्त्रियाँ शांत पड़ीं तो पुरुष अपना चेहरा उठाकर उनकी ओर देखने लगे. सबकी आँखों में संतुष्टि के भाव देखकर सभी पुरुषगण गर्व से फूल गए. फिर समर्थ उठे और उन्होंने शीला के पास जाकर उसका एक गहरा चुंबन लिया.

"ले भागवान, चख ले अपनी होने वाली बहू की चाशनी, बहुत मीठी है अपनी बहू."

"सच में बहुत मीठी है, पर मैं तो बाद में स्रोत से ही पियूँगी, तभी प्यास बुझेगी।" ये कहकर शीला ने अपने साथ बैठी सागरिका को अपने पास खींचा और उसके मुंह में मुंह डालकर उसे चूम लिया. "सच बेटी, बहुत दिन से किसी जवान लौंड़ोंकी का रस नहीं पिया, ये बुढ़िया तरस गई थी."

"नानी, आप कहाँ से बूढ़ी हो गयीं. और आप जब चाहे मुझे बुला लेना में आकर आपका भी रस पियूँगी और अपना भी पिलाऊंगी."

"बहुत अच्छे संस्कार दिए है शोनाली ने तुम्हें."

उधर समर्थ के कृत्य को संकेत मानकर पार्थ ने उठकर सुमति को चूमा, निखिल ने सुप्रिया को, जॉय ने शोनाली को और नितिन उठकर सागरिका के पास गया और उसका मन भर कर चुम्बन किया.

"देवर भाभी अभी से एक दूसरे से घुल मिल रहे हैं. इससे अधिक प्रसन्नता की क्या बात हो सकती है." शीला ने समीक्षा की.

"सच है माँ, ऐसा ही रहा तो घर स्वर्ग बन जायेगा."

"मैं जानती हूँ सुप्रिया दीदी, जिस घर में सागरिका जाएगी उसे स्वर्ग बना देगी." सुमति ने अपनी टिप्पणी की.

किसी को भी इस बात से कोई आपत्ति नहीं थी.

कुछ समय के लिए सबने एक विराम लिया और कुछ लोग बाथरूम गए, कुछ ने अपने लिए एक ड्रिंक बनाई. कुछ उस बड़े कक्ष में यूँ ही चहलकदमी कर रहे थे. फिर एक एक करके सारे पुरुष इस बार सोफे पर बैठे, शृंखला वही थी, बस इस बार पुरुष सोफे पर थे. उनकी साथी स्त्रियों ने उनके पांवों के बीच अपना स्थान ग्रहण किया. स्पष्ट था की इस बार मौखिक सम्भोग का आनंद पुरुष उठाएंगे. और इसी के साथ इस सामूहिक सहवास का दूसरा चरण प्रारम्भ हुआ.

स्त्रियों ने अपने साथियों के लौंड़ों को प्यार से चूसना और चाटना शुरू कर दिया. इनमें से कुछ तो इस कला की पारखी थीं और अपने साथी को वो स्खलन के द्वार पर लाकर रोक देतीं और कुछ समय बाद दोबारा वहीँ लेकर आ जातीं। उनके साथी एक आनंद और पीड़ा की दो धाराओं में सवार थे. इसकी अग्रणी थी शीला जिसका लौड़े चूसने का उतना ही अनुभव था जितनी सागरिका और पार्थ की मिलकर आयु. और दूसरी भला उसकी शिष्य पुत्री के सिवा और कौन हो सकता था. सागरिका की जो कमी अनुभव की थी वो उसे अपने उत्साह और ऊर्जा से पूरी कर रही थी. अब समर्थ का लौड़े को चूसने वाली वो कोई पहली तो थी नहीं, पर ये अवश्य स्पष्ट था कि वो उसे हर रूप में सुख और संतुष्टि देने का प्रयास कर रही थी. और समर्थ के चेहरे के भाव उसकी सफलता को दर्शा रहे थे.

पार्थ को अब ये समझ आ गया था की उसके लौड़े पर अब पूरा वश शीला का है. अब जब वो चाहेगी तभी उसका पानी छूटेगा.

पार्थ ने अपने साथ बैठे निखिल से पूछा, "तुम कैसे इनके इस आक्रमण से अपने आपको सँभालते हो?"

निखिल: "सँभालने की आवश्यकता ही क्या है? हम सेक्स को स्पर्धा नहीं समझते. कभी जल्दी झड़ने में कोई शर्म नहीं मानते. इसे हम आनंद का एक साधन मानते हैं. हममें से कोई एक दूसरे से जीतने का प्रयास नहीं करता."

निखिल के ये बात सुनकर चटर्जी परिवार को थोड़ी सांत्वना मिली. जॉय को तो जैसे दूसरा जीवन मिल गया. उन्हें अब किसी प्रकार का प्रदर्शन नहीं करना था. सिंह परिवार की तरह इन दो दिनों केवल आनंद की उबलब्धि के लिए व्यतीत करने थे. रिश्ता हो या नहीं ये दिन उन्हें सदैव याद रहने चाहिए थे. इस स्वीकारोक्ति ने उनके सभी सदस्यों को तनावमुक्त कर दिया. और इसका प्रभाव उनके उत्साह पर पड़ा जो चौगुना हो गया.

अपने लौंड़ों को अपने साथी के मुंह से चुसवाते हुए अब लगभग दस मिनट तो निकल ही चुके थे. और पुरुषगण अपना बीज गिराने के लिए तैयार थे. उनके लौंड़ों की नसों और सुपाड़े को फूलता हुआ महसूस करने पर ये पता चल गया की वे सब झड़ने की कगार पर है. महिलाओं ने अपने आप को आते हुए सुनामी के लिए तैयार ही किया था कि एक एक करके सारे लौंड़ों अपना पानी छोड़ने लगे. इस स्वादिष्ट प्रोटीन युक्त प्रसाद की भेंट अपने मुंह में स्वीकारते हुए स्त्रियों ने एक बूँद भी बाहर न गिरने दी. पीने के बाद उन्होंने अपने हिस्से के लौड़े को एक बार और प्यार से चाटकर साफ किया और फिर अपने पांवों पर खड़ी हो गयीं.

शीला ने सागरिका से पूछा, "कैसा लगा मेरे पति का स्वाद बहू ?"

सागरिका: "बहुत अच्छा नानी जी. अब मुझे आपकी सुंदरता का रहस्य पता चल गया है."

शीला ने सागरिका को अपने गले से लगा लिया.

शीला: "और भी हैं इसके राज, एक बार तू बहू बनकर आ तो जा, देख तेरी सास को इसकी जवानी ही इसका साथ नहीं छोड़ती."

इसी तरह एक दूसरे से सब बातें कर रहे थे. समर्थ जॉय को एक ओर ले गया.,

समर्थ: "जॉय, तुम इतने सहमे से क्यों हो."

जॉय: "जी, लड़की का बाप हूँ, कुछ गलती न हो जाये."

समर्थ: "इस सोच को अपने मन से निकाल दो, अपने घर की लक्ष्मी हमें दे रहे हो और हम से ही डरते हो. संबंधों में मिठास रहनी चाहिए, औपचारिकता और डर नहीं. हमारे साथ वैसे ही रहो जैसे रहते हो. तुम हमसे छोटे नहीं हो. क्या मैं गलत कह रहा हूँ?"

जॉय: "बिल्कुल नहीं. अपने मेरे दिल को जीत लिया, नानाजी." ये कहकर जॉय नानाजी के गले से लग गया.

फिर दोनों लौट कर रणक्षेत्र में आ गए, जहाँ अगले चरण की तैयारी चल रही थीं.

शीला ने समर्थ को जॉय साथ वापिस आते देखा तो आँखों के इशारे से पूछा कि सब ठीक है? समर्थ ने हल्के गर्दन के इशारे से बताया कि अब ठीक है. शीला ने चैन की साँस ली.

समर्थ: "तो मेरी प्यारी बहूरानी अब क्या चाहती है?"

सागरिका: "जो मेरे प्यारे नानाजी चाहते हैं. मेरी चूत में आपका लंड."

शीला: "देखा मेरी बहूरानी को, घर में आने के पहले ही सबका मन जीत रही है? क्यों जॉय, क्या कहते हो."

जॉय: "माँ जी, आप बिल्कुल सही कह रही हैं, इसका स्वभाव ही बहुत मिलनसार है. और अगर सामने कोई लंड तानकर खड़ा हो तो फिर ये संकोच नहीं करती. जितनी जल्दी हो सके उसे अपनी चूत या गाँड में ले लेती है."

समर्थ ने जॉय को थम्स अप करके शाबाशी दी और सागरिका को बाँहों में लेकर उसके होंठों से अपने होंठ मिला दिए. दोनों ऐसे एक दूसरे को चूम रहे थे जैसे पृथ्वी का अंत निकट हो. समर्थ के हाथ सागरिका के वक्षस्थलों पर रेंग रहे थे. फिर उसने अपने हाथ पीछे किये और सागरिका के दोनों नितंबों को भरकर निचोड़ दिया. सागरिका की एक हल्की सी कराह निकल गयी और उसने चुम्बन को और भी गहरा करने का प्रयास किया. पर समय अब चुम्बन का नहीं, चुदाई का था. तो समर्थ ने उसका हाथ लिया और जमीन पर लगे मोटे गद्दों में से एक पर उसे ले जाकर बैठा दिया. फिर उसके साथ खुद बैठ चुम्बनों का आदान प्रदान पुनः आरम्भ हो गया.

फिर समर्थ ने सागरिका को लिटा दिया और अपना मोटा लम्बा लंड उसकी कमसिन गुलाबी चूत के मुंहाने रखा.

समर्थ: "बहू, डाल दूँ?"

सागरिका: "अब सोचिये मत, बना लीजिये आज मुझे अपनी. चोद दीजिये ये चूत।"

समर्थ ने अपने लंड को सागरिका की चूत में उतारना शुरू किया और कुछ ३-४ मिनट में पूरा लंड उसकी चूत में बैठ गया.

शीला ने जॉय को जाकर एक गहरा चुम्बन दिया, "कितने सुन्दर लग रहे हैं न दोनों?"

जॉय, जो अब खुल चुका था, ने शीला की गाँड दबाते हुए उसके चुम्बन का उत्तर दिया, "सचमुच, मुझे विश्वास है कि चुदवाती हुई आप भी बहुत ही सुंदर लगती होगी."

शीला: "ये देखने मैं अब तुम्हे ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करनी होगी, आओ पार्थ, तुम्हारे मामा को मेरी चुदवाती हुई मुद्रा देखनी है."

ये कहकर शीला पार्थ को लेकर एक गद्दे पर जाकर बैठ गई.

सुमति ने निखिल, शोनाली ने नितिन को अपने अपने गद्दों पर बैठा दिया. सुप्रिया और जॉय दोनों देख रहे थे.

सुप्रिया: "कितना मनोरम दृश्य है."

जॉय: "अगर पारुल भी होती तो और सुन्दर होता."

सुप्रिया: "हाँ, पर देखा जाये तो फिर लौंड़ों की कमी पड़ जाती."

जॉय हंस दिया. "वो तो वैसे भी पड़ने ही वाली है. अगले हफ्ते वो वापिस जो आ रही है."

सुप्रिया: "जॉय, प्लीज उसे आने के बाद मुझसे मिलने भेजना."

जॉय: "अवश्य. पर अब हम अपने विषय में भी कुछ सोचें?" ये कहकर जॉय ने सुप्रिया को बाँहों लिया और चुम्बनों की बौछार कर दी.

उसका हाथ लेकर वो भी एक गद्दे पर बैठ गया. और फिर उसने चारों ओर देखा.

समर्थ अपने लंड को तीव्रता से सागरिका की चूत में पेल रहा था. वहीँ शीला के फैले हुए पांवों के बीच पार्थ का लंड उसकी चूत की गहराइयाँ नाप रहा था. सुमति ने निखिल को लिटा दिया था और वो उसके लंड पर सवार थी और आगे झुककर तेजी से अपनी गाँड उछालकर चुदवा रही थी. नितिन ने शोनाली को घोड़ी बनाया हुआ था और वो पीछे से उसकी चूत में अपना लंड पेल रहा था. चारों महिलाएं सिसकारियों और घुटी हुई चीखों से अपने आनंद का प्रदर्शन कर रहे थे. जॉय ने ये सब देखकर सुप्रिया को खड़े स्थिति में ही आगे झुका दिया और उसकी कमर को मजबूती से पकड़कर पीछे से उसकी चूत में एक ही झटके में लंड पेल दिया. अब पांचों जोड़े संभोगरत थे और आनंद में झूल रहे थे.

समर्थ: "जॉय, तेरी बेटी की चूत तो बहुत कसी है. बहुत मजा आ रहा है इसे चोदने में."

जॉय: "बाबू जी, आपकी बेटी की चूत भी कोई कम नहीं. क्या सट के जा रहा है मेरा लंड इसकी चूत में."

सागरिका: "नानाजी, थोड़ा और जोर से चोदिये न, आपका लंड बहुत मजा दे रहा है, थोड़ा और लम्बे धक्के मारिये. मेरी चूत फटेगी नहीं, सच में."

समर्थ ने ये सुनकर अपने धक्कों की गति और तेज कर दी. इस उम्र में भी उसकी शक्ति देखने वाली थी. उसके लम्बे और गहरे धक्के सागरिका की चूत को भरपूर सुख दे रहे थे. उसका पानी अब तक दो बार छूट चूका था.

वहीँ शीला अपने आप को पूरी तरह से पार्थ को समर्पित कर चुकी थी. पार्थ अब उसकी बूढी चूत को प्रबल शक्ति से चोद रहा था. चूँकि शीला को इस प्रकार की चुदाई पसंद थी और वो इसकी रोज की दिनचर्या थी, वो इस नए लंड का भरपूर आनंद ले रही थी.

शीला: "बहुत अच्छा पार्थ, तू तो बहुत बढ़िया चुदाई करता है बेटा। मेरे नातियों के साथ मिलकर एक दिन तुम मेरे तीनों छेद सील करना."

पार्थ: "नानी, आप जब कहोगी मैं आ जाऊँगा. आपके बस बुलाने की देर होगी, मैं सब काम छोड़कर आपकी सेवा में उपस्थित हो जाऊँगा."

शीला की पनियाई हुई चूत अब पार्थ को वो घर्षण नहीं दे पा रही थी. तो उसने अपना लंड बाहर निकाला और गद्दे पर बिछे हुए बिस्तर के कपडे से उसकी चूत को पोंछ कर सुखा दिया और फिर वापिस अपना पूरा लंड एक ही झटके में डाल कर बेरहमी से चोदने लगा.

शीला: "वाह रे मेरे शेर, अब फटेगी मेरी चूत सही से. चोद मुझे हरामी. दम लगाकर चोद। "

पार्थ भी कहाँ पीछे हटने वाला था. उसने ऐसी चुदाई शुरू की जिसे देखकर कमजोर ह्रदय के व्यक्ति को दौरा ही पड़ जाता. पर शीला को इसमें असीम सुख मिल रहा था.

सुमति भी निखिल के लंड पर पूरे जोरशोर से उछल रही थी. निखिल का लंड उसके पार्थ के लंड के ही जितना बड़ा और चौड़ा था और उसे इससे बहुत संतुष्टि मिल रही थी. पार्थ उसको अब इतना समय नहीं देता था. घर में तीन और चुदने को तैयार चूतें जो थीं. उसे अब उसको किसी ने किसी के साथ बाँटना ही पड़ता था, अकेले माँ बेटे की चुदाई को बहुत समय हो गया था. पर आज निखिल से चुदने में उसे वही समय याद आ रहा था. और अभी नितिन भी तो था. अब भविष्य में उसे इन तीनों में से किसी न किसी के साथ अकेली रात मिल ही जाएगी. यही सोचकर उसकी चूत लगातार पानी छोड़ रही थी. वो आगे झुककर अपने मम्मी निखिल के मुंह में दबाकर उसके लंड पर जबरदस्त उठक बैठक कर रही थी. निखिल ने उसकी गाँड में एक ऊँगली डाली हुई थी जिससे वो उसके छेद को हल्के हल्के कुरेद रहा था.

सुमति फुसफुसा कर: "निखिल, मेरी गाँड जरूर मारना, उस दिन शोनाली की गाँड से तेरा रस पिया था, बहुत स्वादिष्ट था. पर मुझे अपनी गाँड से निकाल कर पीना है."

निखिल को याद आया की शोनाली ने अपनी गाँड को एक प्लग से बंद किया था क्लब में, जिससे उसका वीर्य बाहर न बहे. उसे समझ आ गया कि वो अवश्य सुमति के लिए सहेजी होगी. इतना प्यार और एक दूसरे का ध्यान रखने वाले परिवार की लड़की से शादी करने में कोई समस्या नहीं होने चाहिए.

निखिल: "बुआ, चिंता न करो. अब से मैं तुम्हें गाँड का इतना रस पिलवाऊंगा कि तुम्हारी सारी प्यास मिटा दूंगा. और नितिन और नाना से भी कहूंगा. आपके लिए अब कभी कमी नहीं होगी."

सुमति ये सुनकर बेहाल हो गई. उसकी गति अब कभी तेज तो कभी धीमी पड़ने लगी. ये समझकर कि शायद वो थक गई हो निखिल ने उसे पकड़कर एक करवट ली और सुमति अब नीचे थी और निखिल उसके ऊपर. अब तक निखिल सुमति के परिश्रम से ठहरा हुआ था पर अब उसने चूत में अपने लंडों को ऐसे पेलना शुरू किया कि सुमति का रोम रोम कांप गया.

शोनाली और जॉय भी अपने अपने साथी की पूरे जोश से चुदाई कर रहे थे. सुप्रिया की चूत इतने बार चुदने के बाद भी व्यायाम के कारण काफी कसी थी. और उसे चोदने में जॉय को बहुत आनंद आ रहा था. उसके साथ ही शोनाली नितिन को तेज चुदाई के लिए उकसा रही थी और नितिन अपनी पूरी ताकत उसकी चूत फाड़ने में झोंक रहा था.

पर आखिर ये सब कितनी देर चलता, एक एक करके सभी पुरुषों ने घोषणा की कि वो झड़ने वाले हैं. शीला ने सबको चेताया की चूत में कोई नहीं झड़ेगा बल्कि सब चेहरे पर अपना कामरस छोड़ेंगे. उसने महिलाओं को भी चेताया कि वो अपना मुंह बंद रखें और अपने चेहरे पर ही पूरा वीर्य इकठ्ठा करें. ये सुनकर जैसे जैसे जो झड़ने वाला होता वो अपने साथी के चेहरे के पास जाकर अपने लंडों की मुठ मरने लगता. सबसे पहले समर्थ की ही धार छूटी जिसने सागरिका के सुन्दर चेहरे पर गाढ़े सफ़ेद पानी का लेप कर दिया. उसके बाद जॉय ने सुप्रिया, निखिल ने सुमति, नितिन ने शोनाली और अंत में पार्थ ने शीला के चेहरे को अपने पानी से पोत दिया. शीला ने उसे अपने चेहरे और स्तनों पर अच्छे से माला और वही अन्य महिलाओं ने भी किया.

उसके बाद शीला उठी और सागरिका के पास जाकर उसका चेहरा और स्तन चाटकर साफ कर दिया और सागरिका से अपना चेहरा और स्तन चटवा लिए. फिर उसने बाकी तीनों महिलाओं के चेहरे और स्तन चाटकर साफ किये और अंत में लेट कर ऑंखें बंद करते हुए आनंद की अनुभूति करते हुए विश्राम करने लगी.

अन्य सभी लोग उठे और बार या बाथरूम की और अग्रसर हुए. कुछ ही देर में सब लोग वहीँ नंगे खड़े होकर अपनी अपनी ड्रिंक का पान करने लगे.

पार्थ: "नानी जी बहुत शांति से लेटी हैं. कोई परेशानी तो नहीं?"

समर्थ: "अरे नहीं, उसे लंडों का टॉनिक बहुत पसंद है. शराब से ज्यादा उसे इस टॉनिक से नशा होता है."

पार्थ: "सच में नानाजी, सबके अपने अपने स्वाद और पसंद होती है. मम्मी को गाँड मरवाकर उससे वीर्य पीना बहुत पसंद है. बल्कि हमारे यहाँ गाँड मारने के बाद उसका पूरा प्रसाद मम्मी को ही पिलाया जाता है."

समर्थ:" सुमति, लगता है अगले चरण में तुम्हे भरपूर भोजन मिलने वाला है. क्योंकि अगला राउंड गाँड खोलने का है."

सुमति की आँखों में एक चमक आ गयी जिसे देखकर कोई भी ये समझ सकता था कि वो इस समाचार से कितनी आनंदित हुई थी.

समर्थ ने शीला को पास बुलाया और उसके कान में कुछ कहा. शीला ने मुस्कुरा कर सिर हिलाया और सुमति की ओर देखकर मुस्कुराई. सुमति झेंप गई तो शीला उसे अपने साथ अलग ले गई.

शीला: "समर्थ ने मुझे क्या बोले जानती हो?"

सुमति: "नहीं माँ जी."

शीला हँसते हुए बोली," उन्होंने कहा कि इस बार गाँड का पानी अकेले न पियूँ बल्कि इस बार तुम्हें पीने दूँ, फिर अगली बार मैं पियूँ."

सुमति आश्चर्य से उसकी ओर देखने लगी.

शीला: "तुम क्या सोचती हो, तुम्हें ही सब उलटे शौक हैं. मेरे पास आना कभी मेरे देखोगी तो चौंक जाओगी."

सुमति: "माँ जी, इससे अधिक विकृत क्या हो सकता है?"

शीला ने सुमति को पास खींचा और उसके कान में कुछ कहा. सुमति की ऑंखें चौड़ी हो गयीं.

शीला: "इन सबका मजा लेना हो तो कभी आओ हमारी हवेली पर."

सुमति: "ज जज जज्जि माँ जी. आउंगी."

शीला: "चलो अब लंडों को तैयार करें, मेरी तो गाँड कल रात से खुजला रही है. समर्थ ने मुझे कल छुआ भी नहीं, अपनी ताकत बचने के लिए."

उधर एक ओर शोनाली और पार्थ में भी कुछ गुप्त बातचीत चल रही थी. शोनाली उसकी बात से सहमत नहीं लग रही थी.

पार्थ: "मामी, मैं एक बार नानाजी से पूछ लूंगा अलग से. अगर उन्होंने सहमति दे दी, तब तो आपको कोई आपत्ति नहीं होगी न?"

शोनाली बेमन से मान गई.

पार्थ: "नानी बुला रही हैं, न जाने माँ के साथ क्या खिचड़ी पका रही थीं."

शोनाली: "बाद में पता चल जायेगा."

इसी के साथ सब अपनी ड्रिंक्स समाप्त कर चुके होते हैं और अगले चरण में प्रवेश के लिए कमर कस लेते हैं.

शीला: "अब गाँड मारने की बारी है. पर इसमें एक ही शर्त है. सारे मर्द पानी गाँड में ही छोड़ेंगे."

सबने अपनी स्वीकृति दी.

शीला ने आगे कहा, "और गाँड से निकला सूप ये मेरी सुमति को पिलायेंगे. तो ख़बरदार अगर किसी ने एक बूँद भी बाहर निकाला. ये सुनकर शोनाली चौंक गई. वो तुरंत दरवाजे के पास गई और बाहर खड़े एक सहायक से कुछ कहा. कोई ५-७ मिनट में सहायक ने उसके हाथ में कुछ थमा दिया.

शोनाली, "ये प्लग है जिससे गाँड का पानी बाहर नहीं निकलता. मैंने सबके लिए एक एक लिया है. और ये वेसलीन की ट्यूब, इतने बड़े लंडों हमारी गाँड में बिना वेसलीन के नहीं लेने वाले हम." ये कहते हुए उसने पांचों प्लग और वेसलीन की ट्यूब बाँट दिए.

समर्थ: "मैं चाहूंगा कि महिलाएं अपने साथी का लंडों चूस कर खड़ा करें. और इस बीच सुमति और शीला उनकी गाँड तैयार करें. बाद में सुमति शीला की गाँड तैयार करेगी."

जॉय: "पर सुमति दीदी का क्या होगा, और वैसे भी ये दोनों तीन गाँड कैसे तैयार करेंगे?"

इससे पहले कि समर्थ उत्तर देता शोनाली बोल उठी. "मेरे पास इसका भी उपाय है. बस ५ मिनट दो मुझे."

ये कहकर उसने टेबल से अपन मोबाइल उठाया और एक मेसेज भेजा. कुछ ५-७ मिनट में कमरे का एक दरवाजा खुला और उससे एक नंगी औरत ने प्रवेश किया. ये कोई और नहीं सिमरन थी. शोनाली ने उसके पास जाकर उसे उसकी भूमिका समझाई। सिमरन ने बेझिझक इस स्वीकार कर लिया. अब इस चरण की तैयारी हो चुकी थी.

समर्थ गद्दे पर बैठ गए और सागरिका अपने घुटनों पर उनकी जांघों के बीच आ गई. उसने अपनी गाँड ऊपर उठाकर समर्थ का लंडों अपने मुंह में ले लिया. शीला ने अपनी होने वाली बहू के पीछे स्थान लिया और उसकी जांघों से ऊपर चाटना शुरू किया.

जॉय ने अपना स्थान ग्रहण किया, फिर सुप्रिया ने सागरिका की तरह उसका लंडों अपने मुंह में लिया और सुमति उसकी गाँड की ओर अग्रसर हुई. नितिन और शोनाली ने भी अपनी स्थिति तय की और इस बार शोनाली की गाँड के पीछे सिमरन थी.

पार्थ और निखिल ने अपने लिए एक ड्रिंक बनाई और दोनों एक ओर खड़े होकर सामने चलने वाले सेक्स शो को देखने लगे. पार्थ को अपने क्लब के लिए एक नया आइडिया भी मिल गया. वो हर पार्टी में ऐसे शो अपने सदस्य और रोमियो से करवा सकता था. उसने मन ही मन नानाजी का धन्यवाद किया और निखिल के साथ खेल देखने लगा.

सागरिका इस समय समर्थ के लंडों की पूरी श्रद्धा से चुसाई कर रही थी. ऐसा लंडों का कोई अंश नहीं था जिसे उसे अछूता छोड़ा हो. उसे चाटने और चूसने में जैसे एक लालच का पुट था. जैसे कि वो कहीं खो न जाये. उसके पीछे शीला नानी उसकी चूत से लेकर गाँड तक चाटे जा रही थी. अब शीला एक अलग ही अनुभवी और पारखी औरत थी. उसने अपने जीवन का लम्बा समय किसी न किसी लंड के छोर पर ही बिताया था. और कुछ यही उनके मुंह की भी महिमा थी. वो लंडों, चूत हो या गाँड सबको इतने प्रेम से चाटती और चूसती थीं कि कोई बिरला ही उनसे स्पर्धा कर सकता था.

पर उनका मुख्य ध्यान सागरिका की गाँड पर ही था. उसकी गाँड के भूरे सितारे नुमा प्रवेश द्वार को वो अपनी उँगलियों से सहलाती और फिर चाट लेती. कुछ देर में उसने सागरिका की गाँड को दो हाथों से खोला और अपनी लम्बी जीभ को अंदर डालकर उससे ही जैसे उसे चोदने लगी. खुले छेद को थूक से भरकर उसने पहले दो फिर तीन उँगलियाँ अंदर डाल कर गाँड को थोड़ा चौड़ा कर दिया. फिर अपने हाथ से वेसलीन की ट्यूब लेकर लगभग एक चौथाई ट्यूब को गाँड के अंदर खाली कर दिया और दो उँगलियों से उसे अच्छी तरह से रगड़ रगड़ कर चिकना कर दिया. इस पूरे उपक्रम में गाँड का छेद अब काफी खुल गया था और समर्थ के लंडों के प्रवेश के लिए अब उचित था.

वहीँ दूसरी ओर सुमति जहाँ एक अनुभवी स्त्री थी पर उसका अधिक प्रेम गाँड से था. गाँड से सम्बंधित हर क्रिया की वो विशेषज्ञ थी. उसकी इस कला का एक नमूना सुप्रिया देख ही चुकी थी, और अब वो उस अनुभव के लिए दोबारा तैयार थी. बस इस बार उसके मुंह में जॉय का तमतमाया हुआ लंड था. सुमति उसकी गाँड खोलकर अपनी जीभ से ऐसे चाट रही थी जैसे किसी स्वादिष्ट व्यंजन खाने के बाद लोग थाली चाटते है. एक एक मिली मीटर को उसने चाट कर चमका दिया. और जब लगा की अब कुछ बाकी नहीं बचा है, तो वेसलीन की ट्यूब से गाँड को अच्छे से तर किया और उँगलियों से अच्छे से अंदर फैला कर अपने भाई के लिए तैयार कर दिया.

शोनाली नितिन के भरी लंड को दिल लगाकर चूस रही थी. साथ ही वो उसे अपने मुंह ने पूरी तरह लेकर अच्छे से गीला भी कर रही थी. उसके पीछे सिमरन को गाँड चाटने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, इसीलिए उसने सीधे से वेसलीन लगाकर शोनाली की गाँड को अच्छा चिकना कर दिया और तीन उँगलियों से छेद को चौड़ा भी कर दिया. ये गाँड अब चुदाई के लिए सबसे पहले तैयार हुई थी.

शीला ने सागरिका के नितम्ब पर एक हल्की चपत दी तो उसने समर्थ के लंड को अपने मुंह से निकाल दिया. समर्थ शीला के आगे खड़े हो गए और शीला ने वेसलीन से उनके लंड की अच्छी मालिश कर दी.

वहीँ जॉय और नितिन के साथ भी यही हुआ. अब तीन मोटे लंड तीन मखमली गाँड के लिए तैयार थे. शीला ने पार्थ को बुलाया और लिटा दिया. अब वो उसके लंड को चूम और चाट कर तैयार करने लगी. सुमति ने अपना स्थान शीला के पीछे लिया और अपना जादू दिखाना प्रारम्भ किया. शीला इस स्तर के गुदा प्रेम से अभी तक वंचित थी. कुछ ही क्षणों में उसकी गाँड इतनी उत्तेजित हो गई की रुकना असंभव सा लगने लगा. सुमति से उसकी मनस्थिति को समझा और गाँड में वेसलीन लगाकर तीन उँगलियों के प्रयोग से खोल दिया. फिर पार्थ उठकर पास आ गया और उसके लंड पर उसने बहुत प्रेम से वेसलीन लगाई.

सुमति: "बेटा, अच्छे से मारना नानी की गाँड, मेरी इज्जत का सवाल है. नहीं तो सब सोचेंगे कि मैंने तुझे कुछ सिखाया नहीं."

पार्थ: "अरे माँ, तुम चिंता न करो. नानी की मैं पूरे मन से सेवा करूँगा और उनकी गाँड का घी मथ दूंगा."

सुमति ने अब निखिल को अपने पास बुला लिया और उसके लंड पर जुट गई और सिमरन ने उसकी गाँड को तैयार करने का काम शुरू किया. कुछ ही देर में ये जोड़ा भी तैयार था. सिमरन ने सबसे विदा मांगी और बताया कि आधे घंटे में शाम का नाश्ता परोसा जायेगा.

समर्थ ने अपना लंड सागरिका की मुलायम गाँड पर रखा और बड़े ही प्रेम से अंदर धकेल दिया. प्लप्प की आवाज़ के साथ सुपाड़ा गाँड की झिल्ली को छेदते हुए अंदर चला गया. सागरिका थोड़ी कसमसाई पर आगे के लिए अपने को सँभालने लगी. अब उसकी गाँड पहली बार तो मारी नहीं जा रही थी, और पार्थ के लंड को भी वो ले चुकी थी. पर गाँड मरवाना थोड़ा ज्यादा पेचीदा होता है. समर्थ पर इस कला के पारखी थे. न जाने कितनी ही गाँड उनकी इस कला से परिचित थीं. वो अविरल बिना रुके अपने लंड को बहुत हल्के से गाँड में उत्तर रहे थे. सागरिका साँस रोके इस प्रहार के समाप्त होने की राह देख रही थी. उसे अपनी गाँड धीरे धीरे भरती हुई महसूस हो रही थी. अचानक ये प्रगति रुक गई. उसने समर्थ को आगे झुककर उसकी गर्दन पर चुम्बन लेते हुए महसूस किया.

फिर फुसफुसाते हुए समर्थ ने कहा,"बहू तुमने तो मेरा पूरा ही लंड ले लिया आसानी से." ये कहकर एक झटका मारा तो रहा सहा लंड भी जड़ तक जाकर बैठ गया. इसके साथ ही समर्थ ने सागरिका की चूत पर एक हाथ रखकर उसे मसलने के साथ गाँड में अपने लंड की चहलकदमी शुरू कर दी. धीरे धीरे उन्होंने अपनी गति बढ़ाई और उसी गति से सागरिका की चूत की रगड़ाई भी. सागरिका तो जैसे पागल ही हो गई, वो लगातार झड़ रही थी. न जाने कितना पानी था उसके शरीर में जो चूत के रास्ते बहा जा रहा था. समर्थ ने अपने पूरे जोश से सागरिका की गाँड यही कोई १० मिनट तक मारी और फिर एक ओर रखे प्लग को उठाया और अपना पानी सागरिका की गाँड में छोड़ दिया. लंड सिकुड़ जाने के बाद धीरे से बाहर निकालते हुए प्लग जो गाँड ने डाल कर उसे सील बंद कर दिया. सुमति के लिए पहला पकवान तैयार था.

पार्थ ने शीला की गाँड में अपना लंड टिकाया और एक बार जैसे ही प्रवेश हुआ उसने लंडों बाहर खींचकर एक लम्बे झटके में पूरा एक ही बार में पेल दिया. अब शीला की गाँड इतनी बार पिल चुकी थी कि उसे उसमें भी मजा ही आया. वो आनंद से चीख पड़ी.

शीला: “वाह रे मेरे शेर. फाड़ दे ये गाँड, मिटा दे इसकी खुजली. कल से लपलपा रही है लंड के लिए. तेरे नाना ने तो कल छुआ भी नहीं मुझे. आज के लिए बचा रहा था. अच्छे से चोद, चिंता न कर फटेगी नहीं. बहुत राही इस रास्ते से गुजर चुके हैं. जरा जोर से और कस के मार. हाँ यूँ अब आया मजा. बहुत अच्छा लंड है रे तेरा. सुमति, तेरी किस्मत कितनी अच्छी है जो ऐसे लंड वाले लड़के को पैदा किया.”

बस यूँ ही बोलते हुए शीला की चूत भी पानी छोड़ रही थी. पार्थ ने अपनी दो उँगलियों में भग्नासे को पकड़ कर मसल दिया. शीला चीखकर झड़ गयी. पार्थ उसकी गाँड पूरी बेरहमी से मार रहा था, और शीला को यही पसंद था. अगर गाँड मरवाने में आंसू न निकलें तो मारने वाले की औकात पर बात आ जाती है. पर पार्थ उसे उसकी इच्छा से अधिक गहराई और वहशी तरीके से चोद रहा था. पर आखिर कितनी देर टिकता. १० मिनट की इस भयंकर चुदाई के बाद पार्थ ने बताया की वो झड़ने वाला है. अपना पानी छोड़कर, उसने अपने लंड को निकला और प्लग से शीला की लगभग फटी गाँड को सील कर दिया. सुमति के लिए दूसरा पकवान तैयार था.

लगभग उसी समय जॉय ने भी अपना माल सुप्रिया की गाँड में उड़ेल दिया और उसे भी सुमति के भोज के लिए पैक कर दिया। शोनाली की गाँड नितिन ने भर कर पैक कर दी. अब सुमति के लिए एक ही व्यंजन चार स्वाद में परोसने के लिए तैयार थे. प्रतीक्षा थी तो सुमति की जिसकी गाँड में अभी भी निखिल का लंड अपनी पूरी कलाबाजियां दिखा रहा था. पर कुछ ही देर में उसने भी सुमति की गाँड को सींच दिया और उसे भी प्लग लगाकर पैक कर दिया.

अभी सारी महिलाएं अपने घुटनों पर ही थीं और सबकी गाँड अभी भी उठी हुई थी. शीला ने पहल करते हुए सुमति को घुटनों के बल बैठने को कहा. उसके बाद उसने एक एक करके सारे आदमियों को आगे करते हुए शीला से उनके लंडों चटवा कर साफ करवाए. फिर उसने निखिल को इशारा करके एक पेग बनाने को कहा और उसे एक बाउल (बड़ी कटोरी) में लाने को कहा. निखिल समझ गया और लेने चला गया.

शीला: “सुमति, आज मैं तुम्हे ये रस पीने का एक और तरीका सिखाती हूँ.”

निखिल ने वो शराब (लगभग २ पेग के बराबर) से भरा कटोरा जमीन पर रखा.

शीला ने उसके ऊपर निशाना साधा और अपनी गाँड से प्लग निकाल कर रुका हुआ वीर्य कटोरे में छोड़ दिया.

एक एक करके चारों महिलाओं ने अपनी गाँड में थमा वीर्य उस कटोरे में डाल दिया. अंत में बारी आयी सुमति की तो उसने देखा कि सब उसकी ही ओर देख रहे हैं.

“अरे माँ, देखो नानी ने तुम्हारी पसंद के खाने को एक नए अंदाज में बनवाया है.”

अंततः सुमति ने भी अपनी गाँड से कामरस उस कटोरे में भर दिया. जब ये सब चल रहा था तो नितिन और सागरिका सबके लिए नए ड्रिंक्स बना कर ले आये थे. अब ९ नंगे लोग अपने हाथों में ग्लास थामे खड़े थे. सुमति ने कांपते हाथों से अपना शराब, वीर्य और गाँड के रस का कॉकटेल उठाया.

“चियर्स!” सब ने जोर से चिल्लाकर सुमति को प्रेरित किया और अपने ग्लास एक बार में ही खाली कर दिए. सुमति ने भी अपना प्याला अपने मुंह से लगाकर गटागट पीना शुरू किया. पर अधिक होने के कारण पूरा नहीं पी पायी. बाकी जो बचा वो उसने अपने चेहरे पर डाल कर उसे कॉकटेल से धो दिया.

“कीमती पेय की बर्बादी.” ये कहकर शीला उसके पास आयी और उसकी ठुड्डी से लेकर ऊपर तक चाटकर खुद पी लिया.

“क्यों सुमति, कैसा लगा स्वाद?”

“अच्छा था, पर तुम लोग उसमे इतना सारा दारू क्यों डाला? क्या मुझे नशे में करके मेरी गाँड मारना चाहते हो?”

ये सुनकर सब खिलखिला उठे. और फिर बाथरूम में जाकर नहाकर, अपने कपडे पहनने लगे. कुछ ही देर में वे सब संभ्रांत व्यक्तियों की तरह शाम के नाश्ते के लिए डाइनिंग रूम की और बढ़ गए.

उनके पीछे, सहायकों ने कमरे को साफ किया और सभी उपयोग किये हुए बिस्तरों को हटाकर नए लगा दिए. २० मिनट में वो कमरा पहले जैसा ही हो गया था.

नाश्ते के समय यूँ ही हल्की फुल्की बातें चलती रहीं. समर्थ और सिमरन में आँखों से कुछ बात हुई. समर्थ और सिमरन कुछ देर के लिए गायब हो गए. उन्होंने प्रयास तो किया कि किसी को समझ न आये पर इतने चतुर लोगों से वो बच न पाए. जब कुछ देर बाद सिमरन आयी तो उसकी चाल बदली हुई थी. शोनाली ने उसे देखकर आंख मारी तो सिमरन भी मुस्कुरा दी. समर्थ भी कुछ ही देर में आ गए. सब उनकी ओर देखकर मुस्कुराने लगे.

समर्थ: “बेचारी, सुबह से काम में लगी थी. देखा तो सोचा थोड़ी उसकी मालिश कर दूँ.”

शीला: “अंदर बाहर दोनों से मसला लगता है. कैसी थी?”

समर्थ: “जैसे पुरानी शराब.”

सब लोग हंसने लगे.

यूँ ही शाम के ७ बज गए. पार्थ ने पूछा कि कौन क्या लेगा. सबने अपनी पसंद की ड्रिंक बता दी. उसके साथ ही सिमरन ने खाने के लिए भी भेज दिया. इस समय दोनों परिवार बिल्कुल एक ही लग रहे थे.

समर्थ: “मुझे ख़ुशी है कि हम लोग एक दूसरे से इतने जल्दी स्वाभाविक हो गए.”

जॉय: “बाबूजी, इसके लिए आपका और माँ जी का बहुत श्रेय है. “

समर्थ: "हम बुजुर्गों का काम भी यही होता है."

शाम ८. ३० तक यही सब चलता रहा उसके बाद सबने खाना खाया और कुछ देर के लिए बाहर लॉन में बैठ गए.

सुप्रिया: “अब रात के लिए मैंने ये जोड़े तय किये हैं. सब अपने कमरे में ही रहेंगें। इससे उन्हें अलग से बात करने का समय भी मिलेगा.

१, निखिल और सागरिका: इन्हें जीवन साथ बिताना है, इसीलिए अच्छा हो जो एक दूसरे से पूछना हो पूछ लें.

२. माँ जी और जॉय: अब जब ये समधन से अंतरंग हो चुके हैं तो उसकी माँ से भी मिल लें.

३. पापा और शोनाली: अब बेटी की माँ का भी नाप देख लें.

४. सुमति और नितिन: अब ये दो भाई हर मिठाई को बांटते है.

५. पार्थ और मैं: क्यूंकि मैं इसकी शक्ति और विवेक दोनों से अचंभित हूँ.

सब ने अपनी सहमति जताई और उठने लगे. तभी पार्थ ने समर्थ से कुछ बात करने के लिए एक ओर बुलाया. जब बात पूरी हो गई तो समर्थ के हाव भाव से लग रहा था कि वो सहमत है. बात समाप्त होने पर पार्थ ने शोनाली को थम्ब्स अप का इशारा किया. शोनाली और पार्थ ने समर्थ और सुप्रिया से कुछ समय माँगा और एक ओर चले गए. लगभग १५ मिनट में वे लोग वापिस आ गए. तब तक बाकी सब अपने कमरों में जा चुके थे. ये चारों भी अपने कमरों में चले गए.

अगले दिन सुबह:

अगले दिन सभी एक एक करके अपने कमरों से निकलकर सुबह के नाश्ते के लिए डाइनिंग रूम में पहुँच गए. इस बार समर्थ शीला, शोनाली जॉय साथ बैठे थे. ये देखकर सबको सुखद आश्चर्य हुआ कि सागरिका ने निखिल के साथ बैठने का निश्चय किया. सुप्रिया नितिन और सुमति पार्थ के साथ बैठी थी. सिमरन ने बहुत अच्छा नाश्ता लगवाया था और सबने भरपूर खाया.

निखिल और सागरिका एक साथ बोले: “हमें कुछ कहना है.”

सबकी दृष्टि उनकी ओर केंद्रित हो गई.

निखिल ने पहल की: “हम दोनों की ये शादी से सहमति है. कल रात हमने काफी देर बात की और ये महसूस किया कि हमारी सोच लगभग हर विषय में मिलती है.”

सागरिका: “दूसरा ये कि हमने देखा कि हमारे परिवार कितनी सरलता से एक दूसरे के करीब आ गए. आज ऐसा लग ही नहीं रहा कि एक सप्ताह पहले हम लोग एक दूसरे को ठीक से जानते तक न थे, सिवाय इसके कि हम पडोसी थे.”

निखिल: “इसीलिए हमने ये सोचा है कि हम दोनों एक दूसरे और दोनों परिवारों के साथ बहुत खुश रहेंगे. और तो और हमारी जीवन पद्धति पर भी कोई आंच नहीं आएगी.”

ये सुनकर शीला ने उठकर सागरिका को गले लगा लिया और अपने गले का हार निकलकर उसे पहना दिया. उसका माथा चूमा और सागरिका ने उसके पांव छूकर आशीर्वाद लिया. फिर सागरिका ने समर्थ और सुप्रिया के पांव छुए. सुप्रिया ने भी उसे गले से लगाकर अपने हाथ का कंगन उसे पहनाया.

सुप्रिया: ”शोनाली और जॉय, आज से सागरिका हमारे घर की बेटी हुई. आप मंगनी और शादी की समय निश्चित करिये.”

ये सुनकर सुमति और शोनाली दोनों रोने लगीं. परन्तु उनके इन आँसुओं में ख़ुशी थी और किसी ने भी उन्हें चुप करने का प्रयास नहीं किया. पार्थ निखिल के पास जाकर उसके गले लग गया.

“अब हम केवल दोस्त नहीं है, जीजा जी.”

निखिल ने हंसकर अपने मित्र को उत्तर दिया, “अब संभल के रहना साले साहब.”

जॉय ने उठकर अपने कमरे से एक डिब्बा लाया और निखिल के हाथों में एक बेशकीमती आयातित घड़ी पहना दी. फिर उसे गले से लगाकर उसके माथे को चूम लिया.

“बेटा मुझे आज इतनी ख़ुशी मिली है, जिसका मैं वर्णन नहीं कर सकता.”

सिमरन ने भी सबको गले मिलकर बधाई दी और विश्वास दिलाया कि अगर उसकी कंपनी से केटरिंग कराई जाएगी तो वो अपनी पूरी श्रध्दा से उसे सफल करेगी.

सब लोग एक हंसी ख़ुशी के वातावरण में न जाने कितनी देर बातें ही करते रहे. फिर पार्थ ने समर्थ से पूछा कि क्या जो कल बात की थी वो अभी भी वैध है. समर्थ ने हामी भरकर कहा कि अब तो १०० गुना अधिक वैध है. पार्थ ने शोनाली की ओर देखकर उसे सिर हिलाकर स्वीकृति दी.

दोपहर के खाने के पहले दो चक्र शराब के चले, इस मौके का सबने जी भर के आनंद लिया.

भोजन के पश्चात् सभी लोग खेल कक्ष में चले गए. सभी बिना कुछ कहे बिना अपने वस्त्रों से अलग हुए और उन्हें अलमारी में टांग दिया.

तभी शोनाली और पार्थ ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा.

पार्थ: “कल मैंने नानाजी से कुछ पूछा था जिसकी उन्होंने मुझे अनुमति दे दी थी. इसीलिए आज का विशेष आयोजन हमारे दोनों परिवारों की स्त्रियों के लिए है.”

शोनाली: “सुमति दीदी ने कल माँ जी से हुई बात मुझे बताई थी, जो मैंने पार्थ को बताई.”

शीला के होठों पर एक मुस्कराहट और आँखों में चमक आ गई.

“इसीलिए, आज मैंने अपने क्लब के ६ रोमियो को अपनी सेवा के लिए और भी बुलाया है. हमारे चारों पुरुष सहायक, जो हमारे रोमियो भी हैं उनके साथ होंगे. दोनों सहायिकाएं भी उपस्थित रहेंगी. अब चूँकि हम सब व्यस्त होंगे तो पूरे कार्यकर्म का निर्देशन सिमरन जी करेंगी.”

ये कहकर उसने दो बार ताली बजाई। एक ओर का दरवाजा खुला जिसमें से सिमरन नंग धडंग अंदर आयी. उसके दोनों ओर उनकी दोनों सहायिकाएं सोनल और आतिशी भी नंगी खड़ी हो गयीं.

उसके बाद दरवाजे से १० नंगे लड़कों ने प्रवेश किया. और वो सब सिमरन के पीछे एक व्यूह में खड़े हो गए.

पार्थ: “आज हम सब अपने परिवार की महिलाओं को एक साथ तीन पुरुषों से सम्भोग का सुख देंगे. पर इसमें कुछ नियम हैं जो हर स्त्री के स्वभाव के अनुरूप होंगे:

१. गाँड का रस मम्मी को ही अर्पित होगा.

२. नानी माँ को अंत में वीर्य से नहलाया जायेगा.

३. चूत मारने के बाद के रस का सेवन केवल सागरिका के लिए होगा.

शोनाली: “मेरे विचार में ये नियम सही हैं और अगर किसी को कोई आपत्ति है तो बता सकता है.”

समर्थ: “मुझे ये देखकर प्रसन्नता होती है कि तुम हर कार्य एक नियम के अनुसार करते हो. मुझे किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं है.”

अन्य सबने भी अपनी स्वीकृति दी.

"इसमें से पहले सागरिका और नितिन, सुमति दीदी और पापा जी साथ होंगे क्यूंकि उन्हें अभी तक एक दूसरे का साथ नहीं मिला है. बाकी सब एक म्यूजिकल चेयर से जीते जायेंगे.”

ये कहकर शोनाली ने पाँचों स्त्रियों को एक गोले में खड़ा कर दिया. अब पुरुष लोग एक गोले में आ गए. शोनाली के कहने पर सिमरन ने एक गाना बजा दिया और सब आदमी गोले में घूमने लगे. इसमें होना ये था कि गाना रुकने पर जो भी आदमी जिस स्त्री के सम्मुख होता वो उसका साथी बन जाता. इसमें सागरिका और सुमति को केवल दो लोगों को चुनना था. तीन बार में सबके साथी निश्चित हो गए.

शोनाली के हिस्से में निखिल +२ आये , सुप्रिया को पार्थ +जॉय +१ मिले और शीला को तीनों नए रोमियो. २ २ रोमियो सागरिका और सुमति को भी मिले. .

और एक सामूहिक चुदाई का नंगा खेल प्रारम्भ करने के लिए बीच में आ गए.

कुछ ही समय में कमरा नंगे शरीरों का एक अखाडा बन गया था. पांचों महिलाएं एक गोल चक्र में एक दूसरे को देखती हुई बैठ गयीं. जब एक बार महिलाओं ने अपने हिस्से के लंड को चूस चाट कर कड़ा कर लिया तो उन्हें जल्द से जल्द अपने काम पर लगने के लिए उत्साहित करने लगीं.

शीला इस समय तीन रोमियो के बीच में सैंडविच बनी हुई थी. एक लंड उसकी चूत में था, एक गाँड में और एक मुंह में. सबसे बड़ी बात की तीनो लंडों १०” से बड़े थे यानि उसके शरीर में ३०” लंड भरे हुए थे. और वो सब उसके द्वारा उत्साहित किये जाने के कारण एक गहराई और बेदर्दी से उसके छेदों को मथ रहे थे. एक लंड जब चूत में घुसता तो गाँड वाला बाहर निकलता और इसी लय ने उसके दोनों छेदों का मंथन कर रखा था. उसके मुंह का लंड पहले तो शीला की दया पर निर्भर था पर बाद में उसने भी शीला का सिर पकड़कर उसे अपनी गति से चोदना शुरू कर दिया था.

यही कुछ स्थिति बाकी औरतों की भी थी. इस समय प्रेम और प्यार नहीं बल्कि शरीर का सहवास हो रहा था, सिर्फ जिस्म की भूख मिटाई जा रही थी. सिमरन एक घडी से समय देख रही थी. उसने ३ मिनट पूरे होने पर “CHANGE” की आवाज़ दी. ये सुनकर सबने अपने लंड बाहर निकाल लिए. फिर गाँड मारने वाले आदमी ने अगली औरत के पास जाकर अपना लंड उसके मुंह में डाल दिया. जिसका लंड मुंह था वो नीचे लेट गया और चूत में लंड पेल दिया और जो चूत में था उसे गाँड में स्थान मिला.

(समझने के लिए: शीला की गाँड मारने वाले व्यक्ति ने अपने लंड को सुमति के मुंह में डाला. शीला की चूत मारने वाले ने गाँड में लंड डाला और सागरिका की गाँड मारने वाले ने अपना लंड शीला के मुंह में डाला.)

इसी प्रकार से हर 3 मिनट में सिमरन आवाज़ देती और हर आदमी अपने हिस्से का छेद बदल कर अगले निशान पर चला जाता. इस पूरे क्रम को पूरा करने में ४५ मिनट निकल गए और अब आदमियों से रुका नहीं जा रहा था. महिलाएं भी अब बदहवासी की ओर जा रही थीं. अंत में जो जहाँ से शुरू किया था वहीँ वापिस पहुँच चुका था. एक एक करके लंडो ने पानी छोड़ना शुरू कर दिया और कुछ ही मिनटों में हर छेद पानी से लथपथ हो गया था. सागरिका अपने सामने आयी चूत से रस पिने लगी और सुमति गाँड. सब की साफ होने के बाद सब लोग निढाल पड़ गए.

सिमरन, सोनल और आतिशी ने गर्म पानी से गीले तौलिये लाये और सबके शरीर एक एक करके पोंछकर साफ किये. उसके बाद सबके लिए एक नया ड्रिंक बनाया और सबको दिया. अपना ड्रिंक पीते हुए सब यही सोच रहे थे कि क्या हम लोग विकृत तो नहीं हैं. दोपहर के लगभग तीन बज चुके थे और ५ बजे निकलना भी था तो यही तय किया कि अब अंतिम चरण का खेल शुरू किया जाये.

पर शीला ने अपनी मांग रख दी.

शीला: “देखो, ऐसा मौका बार बार नहीं आता, मैं अपनी एक इच्छा पूरी करना चाहती हूँ.”

समर्थ: “इतना खेलने के बाद अभी भी कुछ है जो बाकी है तुम्हारे मन में?”

शीला: “और क्या. मेरा मन एक साथ चार लंडों से चुदने का है. एक मुंह में, दो चूत और एक गाँड में.”

समर्थ: “इस उम्र में झेल पाओगी ये सब.”

शीला: “कोई नहीं, अगर झेल नहीं पायी तो कम से कम प्रयास करते हुए मरूंगी.”

समर्थ: “चुप कर. ऐसा क्यों बोलती है?”

शीला ने जॉय, पार्थ, निखिल और नितिन की ओर देखकर कहा, “करोगे इस बुढ़िया की इच्छा पूरी?”

जॉय: “अवश्य करेंगे, पर आप अपने आप को बूढ़ा समझना छोड़िये.”

ये कहकर चारों ने उसे घेर लिया.

घर के चारों पुरुषों ने उसे घेर कर लिटा दिया. सोनल और आतिशी आगे आयीं और सभी पुरुषों के लंड चूसकर अच्छे से खड़ा करने में लग गयीं. समर्थ बड़ी भूखी आँखों से दोनों को देख रहे थे.

शोनाली उनके पास गई, और धीरे से बोली, “आप का जब दिल करे बाबूजी, तब आप सोनम और आतिशी की मार लेना.”

समर्थ: “मुझे पता है कि तुम मुझे निराश नहीं करोगी.”

इस समय सामने जॉय ने अपना स्थान जमीन पर बनाया और सबने मिलकर सँभालते हुए शीला को उसके लंड पर बैठाया. निशाना गाँड पर था और कुछ ही मेहनत से जॉय का पूरा लंड शीला की गाँड में बैठ गया. अब बारी पार्थ और नितिन की थी दो लंड शीला की चूत में डालने की. कुछ अचरज भरी कलाबाजियों के साथ ये भी संभव हो गया और अब शीला की चूत में दो लंड थे और एक उसकी गांड में था. निखिल ने आगे आकर अपना लंड शीला के मुंह में घुसा दिया.

और अब शुरू हुआ भीषण चुदाई का वीभत्स नाच. वैसे भी सबके लौड़े एक से बढ़कर एक थे और जिस लयबद्ध तरीके से वो चोद रहे थे उससे ये प्रतीत होता था कि ये उन्होंने पहले भी किया हुआ है. शीला के मुंह में अगर निखिल का लंड न होता तो शायद उसकी चीखें क्लब को हिला देतीं. कुछ ही समय में शीला के झड़ने का सिलसिला थमा तो सबने एक दूसरा आसन में आक्रमण चालू रखा. इसी तरह से अलट पलट कर चारों मिलकर शीला को एक गुड़िया की तरह चोद रहे थे. तभी एक धक्के में गलती से नितिन का लंड चूत से बाहर तो आया पर चूत में जाने की स्थान पर नितिन ने उसे निखिल के लंड के साथ जो उसकी नानी की गाँड में पहले ही डला हुआ था उसके साथ मिला दिया. अब शीला की गाँड में दो लंड थे और चूत में एक.

(नीचे मैंने इस पराक्रम के कुछ चित्र भी लगाए हैं.)

इस प्रकार से शीला मंथन यही कोई बीस मिनट चला होगा. जिसके अंत तक शीला चुद चुद कर और झड़ झड़ कर निर्जीव सी हो गई थी. उधर सभी महिलाओं ने बाकी के लंड भी चूसकर झड़ने की कगार पर ला दिए थे. जब चुड़क्कड़ चार झड़ने के करीब पहुंचे तो वो हट जाते. जैसे ही आखिरी आदमी ने अपना लंड शीला के मुंह से निकाला, सब उसके इर्द गिर्द घेरा बनाकर खड़े हो गए और मुठ मारने लगे. एक एक करके हर पुरुष ने अपना गाढ़ा सफ़ेद वीर्य शीला के चेहरे और शरीर पर गिरा दिया. जब सब हटे तो शीला का चूत से ऊपर का पूरा शरीर कामरस से पुता हुआ था. पर शीला निढाल पड़ी थी.

सागरिका और सुप्रिया ने छाती और पेट, शोनाली ने चेहरा और सुमति ने चूत और गांड को चाटकर अच्छे से साफ कर दिया. सब खड़े होकर शीला के भोगे हुए शरीर को देख रहे थे.

कुछ देर में शीला ने आंख खोली और सबको अपनी ओर देखता पाया.

शीला: ” आऊवोह, मैं जीवित हूँ? मैं तो समझी थी कि मैं मर चुकी हूँ और फ़रिश्ते मुझे चोद रहे हैं.”

सुप्रिया: “अरे मम्मी तुम पूरी जिन्दा हो पर हाँ, फ़रिश्ते अवश्य तुम्हें चोद रहे थे.”

समर्थ ने हाथ बढाकर शीला को खड़ा किया.

समर्थ: “तो कैसा रहा तुम्हारा ये अनुभव?”

शीला: “अद्भुत, अद्वितीय, अकल्पनीय. मैं तो समझी थी कि मैं स्वर्ग में हूँ. पर इन लड़कों ने मुझ बुढ़िया की हड्डियां हिला डालीं ” फिर रूककर, “मुझे उसका नाम बताओ जिसने मेरी गाँड में दूसरा लंड डाला था.”

सब सहम गए, फिर नितिन ने हाथ खड़ा किया. शीला आगे बढ़ी और उसे चूम लिया.

“तूने मुझे वो सुख दिया जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी.”

पार्थ ने तभी कहा, “अब हमारे निकलने का समय हो रहा है, तो सब लोग नहाकर तैयार हो जाओ.”

सब एक एक करके तैयार हो गए. पार्थ ने सिमरन को बुलाकर कहा, “आपका इनाम पक्का है. अगले महीने के दूसरे शनिवार को सारे रोमियो आपकी सेवा में होंगे.”

तैयार होकर सब बाहर आये और एक दूसरे की गले मिलकर फिर रिश्ते की बधाई दी और अपनी गाड़ियों में सवार होकर अपने घर के लिए निकल गए.
 
हम पहले परिवार की ओर लौट रहे हैं.

पर पात्र परिचय एक बार देख लें क्योंकि इससे पहले इसमें एक पात्र के नाम में त्रुटि थी. गौतम के स्थान पर आलोक लिखा गया था जो कि छठवें पटेल परिवार का पात्र है.

कहानी की दिशा यही रहेगी। पहले परिवार से आँठवे तक, उसके बाद एक मिश्रित प्रकरण।

कहानी की आवश्यकतानुसार कुछ प्रकरण में नए पात्र हो सकते हैं. वो दोबारा आएंगे या नहीं ये अभी कहना संभव नहीं है.

इस समय की स्थिति के अनुसार अपडेट कल रात तक प्रकाशित हो जाना चाहिए।
 
कैसे कैसे परिवार

अध्याय १०: पहला घर - अदिति और अजीत बजाज २

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काफी देर के बाद कैमरे में उसकी दादी दिखी. कुछ देर बाद वो कपड़े बदले हुए फिर दिखी. फिर कुछ देर बाद उनके कमरे में उसे अपने पापा दिखाई दिए. उन्होंने आकर दादी को बाँहों में भर लिया और चूमने लगे. दादी भी उनका पूरा साथ दे रही थी.

दादी: “अदिति सो गयी है क्या?”

पापा: “हाँ, उसकी दवाई से नींद आती है.”

दादी: “बस अब दो और सप्ताह की बात है, फिर वो पहले जैसी ठीक हो जाएगी.”

पापा: “हाँ, पर दवा पता नहीं कितने दिन और लेना पड़े. न जाने वो इतने दिन बिना चुदाई के कैसे रह पाई.”

दादी: “अरे मैं थी न, हाँ ये सच है की वो तुम्हारे लंड की अब बहुत प्यासी है.”

पापा: “और ये?” कहकर पापा ने दादी की चूत को दबाया.

दादी: "और ये भी. अब इसकी उतनी चुदाई नहीं होती जितनी ये चाहती है. २ सप्ताह बाद तो और भी कम हो जाएगी.”

पापा: “घर में अकेले मेरे ही पास लंड थोड़े ही है? जैसे मुझे सिखाया था, अब गौतम को भी सिखा दो चुदाई के सूत्र.”

दादी: “मैं तो तैयार हूँ, पर गौतम न जाने क्या सोचेगा.”

पापा: “वही जो मैंने २४ साल पहले सोचा था. जवान लड़का है, चुदाई के लिए मना करे ये हो नहीं सकता.”

दादी: “पर अदिति? उसे ये शायद अच्छा न लगे.”

पापा: “नहीं, मेरे विचार से उल्टा ही होगा. अदिति ऑपरेशन से पहले कई बार गौतम को चोदने के लिए कह चुकी है.”

दादी: “अच्छा!”

पापा: “हाँ और वो ये भी चाहती है की मैं अनन्या की सील खोलूं.”

ये सारी बातें सुनकर गौतम के तो होश ही उड़ गए. यहाँ वो दादी को फंसा कर चोदने का प्लान बना रहा था, वहां उसकी माँ पहले ही उससे चुदने का कार्यक्रम बनाये हुए है. और अगर पापा अनन्या को चोद लेंगे तो हो सकता है कि उसका भी नंबर लग जाये.

उसने अपना ध्यान सामने चल रहे वीडियो पर लौटाया. अब तक उसके दादी और पापा नंगे हो चुके थे और एक दूसरे को चूमते हुए बिस्तर की ओर बढ़ रहे थे. बिस्तर पर जाकर दादी लेट गई और अपने पांव फैला लिए. अजीत ने अपना मुंह दादी की जांघों में डाल दिया. अब वीडियो पर इससे अधिक देखना संभव नहीं था. पर यही कुछ ५-७ मिनट बाद उसने दादी को कांपते हुए देखा और उसके बाद अजीत ने अपना सर जांघों के बीच से निकाल लिया. फिर अजीत ने अपना लंड शालिनी के मुंह के पास लाकर हिलाना शुरू किया. शालिनी ने उसके लंड को अपने मुंह में लिया और कोई ४-५ मिनट तक चूसा. उसके बाद अजीत ने अपने लंड को शालिनी की चूत में डाल दिया और दोनों चुदाई करने लगे.

अपनी दादी को इस तरह चुदते देखकर गौतम ने अपना लंड निकाला और मुठ मारने लगा. उसने सोचा कि जब उसकी दादी और माँ दोनों उससे चुदवाने को तत्पर हैं. अभी मम्मी को ठीक होने में समय है तो दादी पर ही पहले हमला किया जाये. उसने फिर ये वीडियो फॉरवर्ड किया और अगले दिन सुबह उसने राधा को दादी को मौखिक सहवास करते हुए देखा. तो उसका शक सही था. राधा पर भी वो हाथ साफ कर सकेगा या नहीं इस पर उसे शंका थी. उसने जब दोपहर के वीडियो में अपनी माँ और दादी को फिर मौखिक सम्भोग में लिप्त देखा तो उसने निर्णय कर लिया की वो अगले एक दो दिन में ही किसी प्रकार दादी की चुदाई कर ही लेगा.

यही सोचते हुए उसने वीडियो बंद किया और नींद में चला गया.

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अनन्या इस समय अपने मित्रों के साथ शहर के बाहर एक फार्म हाउस में थी. उसकी सहेली नताशा और उसके बॉयफ्रैंड्स जय और परम यहाँ थोड़ी मस्ती के लिए आये थे. अनन्या ने अभी तक किसी के साथ सेक्स नहीं किया था पर उसने हाथ से परम को कई बार झाड़ा था. परम जानता था कि अनन्या इससे अधिक नहीं करेगी, इसीलिए वो भी उस पर अधिक दबाव नहीं डालता था. अनन्या और परम दोनों अपने संबंधों के प्रति गंभीर भी नहीं थे और परम इसी कारण दूसरी लड़कियों से अपने सेक्स की भरपाई करता था. अनन्या को भी इसमें कोई आपत्ति नहीं थी. उसने अपना कौमार्य एक विशेष व्यक्ति के लिए संभाला हुआ था. और उसे विश्वास था कि एक दिन वही उसकी सील तोड़ेगा.

नताशा जय और परम दोनों से चुदवाती थी. और दोनों को ये बात पता थी. वैसे तो वो अकेले उनके साथ आना चाहती थी पर उसकी माँ इसकी अनुमति नहीं देने वाली थी. अनन्या के कारण उसे आने अनुमति मिली थी, पर उसकी माँ नहीं जानती थी कि बेटी और दो लड़कों के साथ जा रही थी और उसके मंतव्य ठीक नहीं थे. और ये इस समय दिखाई भी दे रहा था. चारों मित्र अपने हाथ में बियर लिए हुए थे. अनन्या एक कुर्सी पर बैठ कर अपनी बियर पी रही थी. कुछ ही देर पहले परम और उसने हस्त सम्भोग किया था, परम ने उसकी चूत बहुत अच्छे तरह से चाटकर उसको संतुष्ट किया था. पर उसे लग रहा था कि उसकी जवानी की आग बुझाने के लिए उसे ही पहला कदम लेना होगा. प्रश्न ये था कि अपने कौमार्य के उपहार को जीतने वाले से कैसे बताया जाये.

शाम को घर लौटते हुए उसने किसी प्रकार से उस व्यक्ति से इस पर बात करने का मन बना लिया. वैसे भी नताशा जय और परम को सम्भोग में संलग्न देखकर उसकी वासना जागृत हो गई थी. कब और कैसे की उधेड़बुन में वो अपने घर पहुँच गई. अगले दिन उसकी दादी का ६३वां जन्मदिन था.

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शालिनी का ६३वां जन्मदिन:

आज शालिनी का ६३वां जन्मदिन था. घर में ही एक छोटा सा आयोजन रखा गया था. शालिनी की चार सहेलियों को भी बुलाया था. शाम सात बजे पार्टी शुरू हुई थी. शराब और खाने में सब लोग व्यस्त थे. शालिनी को सबने अपनी ओर से उपहार दिए. उसने सबका धन्यवाद भी किया. तभी अनन्या और गौतम उसके पास आये और उसे गले लगकर उसके जन्मदिन की बधाई दी. अनन्या फिर चली गई, पर गौतम रुका रहा.

गौतम: “दादी, आपको मेरी ओर से लाखों बधाइयाँ. अगर आप बताओ नहीं तो कोई कह नहीं सकता कि आप ६३ साल की हो गई हो.”

शालिनी: “उसका कारण तुम सब हो, मुझे जितनी आनंद और सुख तुम सबने दिया है, उसके कारण मुझे अपनी आयु और अकेलेपन का आभास नहीं होता.”

गौतम: “दादी, मैं तो आपको और भी सुख देना चाहता हूँ.” उसकी इस बात में एक भिन्न ही अर्थ छुपा था.

दादी: “सच कहूँ तो मुझे तुमसे अपने इस जन्मदिन पर कुछ अलग उपहार चाहिए, ऐसा उपहार जो जब तक हम चाहें एक दूसरे को दे सकें.”

गौतम समझ गया कि दादी का संकेत किस ओर है. पर उसने निर्बोध भाव से पूछा, “क्या दादी?”

शालिनी ने अपनी सहेलियों की ओर देखा तो वो अपने आप में व्यस्त थीं. पर अदिति की ऑंखें उन पर थीं. अदिति ने हल्के से सिर हिलाकर अपनी ओर से हरी झंडी दिखा दी. शालिनी ने अपने दाएं हाथ से गौतम की पैंट के ऊपर से ही उसके लंड को पकड़कर दबाते हुए कहा.

शालिनी: “मुझे तेरा लंड चाहिए. बोल देगा?”

गौतम: “दादी!!! मम्मी और पापा क्या कहेंगे?”

शालिनी: “उनकी इसमें अनुमति है. बस तुझे अपना मन बनाना है. अगर सच में तू मुझे उपहार देना चाहता है तो आज की रात मेरे साथ रह कर मुझे जी भर कर चोदना। क्या कहता है?”

गौतम: “दादी, मैं आपको बहुत प्यार करता हूँ. आपके मांगे हुए उपहार से कैसे मना कर सकता हूँ.”

शालिनी: “तो पार्टी के बाद मेरे कमरे में आ जाना.”

उधर अदिति और अनन्या बात कर रहे थे.

अनन्या: “मम्मी, मुझे तुमसे कुछ पूछना है और कुछ मांगना भी है.”

अदिति: ”हाँ बोल.”

अनन्या: “यहाँ नहीं, थोड़ा आपके कमरे में चलें?”

अदिति ने अजीत को बताया और अनन्या के साथ अपने कमरे में आ गई.

अनन्या ने दरवाज़ा बंद किया,”मम्मी इससे पहले की मेरा साहस टूटे मैं एक बार में अपनी बात कह देती हूँ. मैं अभी भी कुंवारी हूँ. पर मुझे सेक्स की अब बहुत इच्छा रहती है. मैं चाहती हूँ कि एक विशेष व्यक्ति मेरे कौमार्य को भंग करे. और इसके लिए मुझे आपकी अनुमति और स्वीकृति दोनों चाहिए.”

अदिति: “मुझे गर्व है कि इस युग में भी तुमने अपना कौमार्य बचाकर रखा है. ये भी सच है कि तुम्हारी आयु सेक्स का सुख लेने की हो चुकी है. तो जो भी वो व्यक्ति है जिससे तुम इसे भंग करवाने की इच्छुक हो, तुम्हें उसे ये बात किसी माध्यम से बतानी चाहिए.”

अदिति का ये बात कहते हुए दिल टूट रहा था क्योंकि उसने अजीत को इस कार्य के लिए चुना हुआ था.

अनन्या: “मैं चाहती हूँ कि आप इसमें मेरी माध्यम बनें.”

अदिति अब अपने पति और बेटी की परस्पर विरोधी इच्छाओं के बीच फंस गई थी.

अदिति: “मैं तुम्हारी कैसे सहायता कर सकती हूँ?”

अनन्या: “क्योंकि वो विशेष व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि आपके पति और मेरे पापा हैं.”

अदिति का सिर घूम गया. वो धप्प से सोफे पर बैठ गई. फिर वो जोर जोर से हंसने लगी.

अनन्या: “मम्मी, क्या हुआ. ऐसे क्यों हंस रही हो?”

अदिति: ”मुझे इस बात की चिंता थी कि तुमने किसे चुना था क्योंकि मैंने भी किसी को चुना हुआ था इस शुभ कार्य के लिए.”

अनन्या: “तो हंस क्यों रही हो?”

अदिति: “क्योंकि मैंने जिसे चुना था वो भी तेरे पापा ही हैं.”

ये कहकर अदिति ने उठकर अनन्या को गले से लगा लिया.

अदिति: “आज पार्टी के बाद हमारे कमरे में आ जाना. शुभ काम में देरी नहीं करनी चाहिए.”

ये कहकर उसने अनन्या का हाथ लिया और दोनों पार्टी में लौट गए.

************

शालिनी का कमरा:

पार्टी समाप्त होने के बाद शालिनी अपने कमरे में चली गई और कुछ ही देर में गौतम कपडे बदल कर आ गया. शालिनी उससे अपने कपड़े उतारकर लेटने के लिए कहती है और बाथरूम में घुस जाती है. गौतम कमरे में बिस्तर पर लेट गया. कमरे में रोशनी खिली हुई थी. वो इस समय नंगा था और उसके जवान कसरती शरीर पर उसका शानदार खड़ा हुआ लंड बहुत बड़ा और कड़ा लग रहा था. लगभग २२ साल की आयु में इसका भरपूर आनंद लिया और दिया था. पर आज कुछ विशेष था.

वो बाथरूम से उसकी दादी के निकलने की प्रतीक्षा कर रहा था. उन्होने अभी थोड़ी देर पहले टब में गर्म पानी से नहाया था. तभी बाथरूम का दरवाज़ा खुला और दो सुंदर पैर बाहर आए. बाहर आने वाली भीगी हुई स्त्री दिखने में कोई ४२-४३ वर्ष की रही होगी, पर गौतम जानता था कि वो ६३ वर्ष की थी. आज उनका जन्मदिन जो था. पर उन्होंने स्वयं को इस तरह से संभाल कर रखा था कि आयु उन पर हावी नहीं हुई थी. बाहर आकर उन्होंने कमरे की लाइट बंद कर दी. बाहर से चाँदनी रात की रोशनी कमरे को भिगोने लगी. वो खिड़की से बाहर देख रही थी और उनका शरीर चाँदनी में और भी ज़्यादा लुभावना लग रहा था. उसके स्तन तने हुए थे, लंबे बाल लगभग नितंबो को छू रहे थे.

गौतम की आँखें उन सुडोल नितंबों को ताक रही थीं, आयु का प्रभाव होते हुए भी वो बेहद आकर्षक थे. उन्होंने पलट कर गौतम की ओर देखा. उसकी आँखों में निमंत्रण था, और होठों पर एक मुस्कुराहट. उसका पहले से खड़ा लंड और अकड़ गया और वो बिस्तर से उठकर उसकी ओर बढ़ा. वो इस स्त्री के रोम रोम से प्यार करना चाहता था, वो उसे अपना बनाना चाहता था. वो उसे दिल भर कर चोदना चाहता था. गौतम उसके पीछे जाकर उन से चिपक गया. उसका लंड उन नितंबो में चुभने लगा था और उसका सीना पीठ पर सट गया. उसने अपनी बाहें कमर में डालकर उन्हें अपनी ओर खींचा.

उन के होठों से वो गर्दन और कानों के चुंबन लेते हुए उसने भर्राई हुई आवाज़ में कहा,"आइ लव यू, दादी."

"वैसे ही जैसे में चाहती हूँ कि तुम मुझे प्यार करो?" दादी ने पूछा, उनकी आँखों में निमंत्रण था और होंठ कंपकपा रहे थे.

“जैसा आप चाहती हो. और जैसा आप पापा से करती हो.” गौतम ने उत्तर दिया.

शालिनी एक पल के लिया ठिठक गई, फिर बोली, “हम्म्म, तुझे मेरे और अजीत के बारे में कैसे पता?”

गौतम: “कुछ दिन पहले आप दोनों को इस कमरे में आते हुए देखा था.”

शालिनी: “तो क्या, किसी बात के लिए आये होंगे.”

गौतम: “ऐसी क्या बात थी जिसके लिए नंगे आना पड़ा, और कपडे हाथ में लेकर?”

शालिनी समझ गई कि गौतम संभवतः सब कुछ जान चुका है.

शालिनी: “और क्या देखा?”

गौतम: “यही कि राधा आपके पास सुबह और मम्मी दोपहर को आती हैं. क्यों मैं सही समझ रहा हूँ न?”

शालिनी: “इसीलिए तू कुछ दिन काम पर नहीं गया था न ताकने के लिए कि मैं क्या करती हूँ.”

गौतम: “सही पकड़े हैं.”

शालिनी अब मुड़ी और दोनों एक दूसरे के सामने आ गए. उसके होंठ चूमते हुए बोली: “जब पकड़ी हूँ तो सजा भी दूंगी.”

गौतम: “दादी, मुझसे उपहार लेकर मुझे सजा दोगी ?”

शालिनी: “अजीत ने कहा है मैं तुझे वो सब सिखाऊं जो मैंने उसे बरसों पहले सिखाया था.”

गौतम: “तो देर किस बात की है?”

शालिनी ने गौतम का हाथ लेकर उसे बिस्तर पर खींचा। फिर उसने लेट कर अपने पांव फैलाकर गौतम को बुलाया.

शालिनी: “अगर किसी स्त्री को संतुष्ट करना है तो उसका सबसे पहला और सरल उपाय है उसकी चूत से प्यार करना. अगर किसी भी स्त्री को तुम अपने मुंह से संतुष्ट कर दोगे तो वो तुम्हें सदैव याद रखेगी और दोबारा तुमसे मिलना चाहेगी. तो मेरे प्यारे बच्चे अब अपनी दादी की चूत को ऐसे प्यार करो जैसे कि स्वर्ग का द्वार है.”

गौतम: “ये स्वर्ग का द्वार है, इसे समझने में मुझे कोई कठिनाई नहीं है.”

ये कहते हुए गौतम ने अपना मुंह दादी की चूत में लगाया और उसे चाटने लगा. अब ये कहना कि ये उसकी पहली चूत थी जिसे वो ये सुख दे रहा था गलत होगा. वो पिछले तीन सालों में कई चूतों का रस पी चुका था. और उसको सिखाने वाली उसकी आयु की लड़कियां ही नहीं, बल्कि कुछ मध्यम आयु की विवाहित स्त्रियाँ भी थीं. उन सब ने मिलकर उसे इस कला में बहुत पारंगत कर दिया था. और आज उसे उस कला को अपनी चहेती दादी पर प्रयोग करने का अवसर मिला था. गौतम उन्हें ये दिखाना चाहता था कि वो उन्हें हर प्रकार से संतुष्ट कर सकता है..

शालिनी भी गौतम के उपक्रम से ये समझ गई कि जिसे वो सिखाना चाहती है, वो पहले ही प्रशिक्षित है. पर उसने इस समय कुछ भी कहना उचित नहीं समझा बल्कि इसका पूर्ण आनंद लेने का निश्चय किया. प्रश्नोत्तर बाद में किये जा सकते थे. शालिनी ने अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया और गौतम को समर्पित कर दिया. गौतम ने उसके इस बदले हुए भाव को समझ लिया. अब दादी उसके वश में होंगी.

शालिनी के मुंह से आनंद की सीतकारें निकल रही थीं. अपने प्यारे पोते को अपनी जांघों के बीच अपनी चूत पर जादू करता जो अनुभव कर रही थी. उसकी चूत पानी छोड़ रही थी और अभी तो केवल आरम्भ था. गौतम के अधक प्रयास उसे एक नयी स्वर्णिम ऊंचाइयों पर ले जा रहे थे. उन्होंने ये समझ लिया कि वो स्वयं गौतम को इससे श्रेष्ठ ज्ञान नहीं दे सकती थी.

गौतम न केवल अपनी जीभ बल्कि उँगलियों का भी बहुत ही सुन्दर उपयोग कर रहा था. उसकी जीभ अब शालिनी की चूत की गहराइयों में जाकर उसके अंदर की संवेदनशील नसों को छेड़ रही थी. साथ ही उसकी दो उँगलियाँ शालिनी के भगनासे पर ही थीं और कभी रगड़कर, तो कभी मसलकर वो अपनी दादी को वासना की ऊंचाई से नीचे नहीं उतरने दे रहा था. शालिनी ने अपनी गांड उठाई जिससे गौतम को कुछ सुगमता हो. परन्तु गौतम ने इसका अलग ही उपयोग किया. उसने अपने बाएँ हाथ को उसकी उठे नितम्बों के नीचे लगाया और बहुत ही हल्के हल्के उसकी गांड के छेद को सहलाने लगा. पर उसे इस हाथ से बहुत अच्छे से ये छेड़छाड़ करने में समस्या लगी. तो उसने दाएँ हाथ को नीचे लगाकर बाएँ हाथ से ऊपर का पराक्रम अबाधित रखा. अब चूँकि उसकी दाएँ हाथ की उँगलियाँ रस से गीली थी, तो शालिनी की गांड के भूरे सितारे पर उसकी सहलाने की गति भी बढ़ गयी.

शालिनी: “बेटा, मैं तो गयी.” कहते हुए शालिनी पूरी तरह से भरभरा कर झड़ने लगी. यही वो अवसर था जब गौतम ने अपनी बीच वाली उंगली को शालिनी की गांड में उतार दिया और उसे गोल गोल घुमाने लगा. अभी शालिनी का झड़ना समाप्त भी नहीं हुआ था कि इस अनायास आक्रमण ने उसे एक बार फिर रोमांच की ऊंचाई पर भेज दिया. और फिर वो एक झटके से उससे उतरी और उसकी चूत ने एक फव्वारा छोड़ा जिससे गौतम का सारा चेहरा भीग गया. पर गौतम कहाँ रुकने वाला था. उसने शालिनी के भगनासे को जोर से दबाया और गांड में उंगली से मैथुन करने लगा. शालिनी को अब कुछ भी बूझ नहीं रहा था. वो आनंद की इस पराकाष्ठा से आज तक अनिभिज्ञ थी. उसके तन और मन इस समय ऐसी लहरों में बह रहे थे जिसका उसने कभी अनुभव नहीं किया था.

अंततः उसका शरीर ढीला पड़ गया. अब उसमे कुछ शेष नहीं था. गौतम ने ये समझा और धीरे से गांड में से उंगली बाहर निकली और उसकी चूत पर एक गहरा चुम्बन लेते हुए शालिनी की जांघों से अलग हो गया.

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अदिति का कमरा:

पार्टी समाप्त होने ही अदिति अनन्या को अपने साथ ही लेकर अपने कमरे में चली आयी. उसने अजीत को ये बता दिया था कि अनन्या की भी वही इच्छा है जो उस दोनों की है. अजीत ये सुनकर बहुत प्रसन्न हो गया था. अजीत कमरे में पहले ही आ चुका था और अभी बाथरूम में था. अदिति ने अनन्या को अपने पास बैठाया और उसे समझाया कि पहली बार सम्भोग में कुछ दर्द होने की सम्भावना रहती है, परन्तु उसके बाद जीवन के असीमित आनंद का द्वार खुल जाता है.

उसने ये जानने का प्रयास किया कि क्या अनन्या घर के बाहर भी किसी से सम्बन्ध बनाना चाहती है. अनन्या ने कहा कि अभी उसने इस बारे में अधिक विचार नहीं किया है. हालाँकि उसके साथ की अधिकतर लड़कियाँ अपने बॉयफ्रेंड के साथ ये सुख लेती हैं, पर कुछ हैं जो उसकी ही तरह सोचती हैं और अपने को संजो के रखे हैं. इतने में अजीत बाथरूम से बाहर आया, उसने केवल एक तौलिया ही अपनी कमर के नीचे बांधा हुआ था और उसका धड़ नंगा था. और उसने माँ बेटी को बातें करते हुए देखा. अनन्या ने उसकी ओर देखा तो उसने अपनी ऑंखें झुका लीं. अदिति ने उसकी ठुड्डी पकड़कर उसका चेहरा ऊपर किया.

अदिति: “बेटी, ये वो खेल है जिसमें शर्म नहीं होनी चाहिए. बाकी समय तुम चाहे जितना भी शर्म और आदर रखो, पर जब भी चुदाई का समय हो तो उन सबको हटाकर केवल इसकी ओर ही ध्यान रखो. अगर कुछ भी और सोचोगी तो इस सुख से वंचित रह जाओगी.”

अनन्या ने स्वीकृति में सिर हिलाया। अदिति उसे अपने साथ बाथरूम में ले गई और उससे नहाकर आने के लिए कहा. फिर उसने अजीत को समझाया कि उसे बहुत प्यार और संयम से अनन्या का कौमार्य भंग करना है.

अदिति: “अनन्या अभी कली है, मेरे, माँ जी या मोनिका के जैसी नहीं है कि तुम एक बार में चढ़ाई कर दो.”

अजीत: “तुम शायद अपना पहला संसर्ग भूल रही हो, मैंने तुम्हें जिस तरह से पहली बार चोदा था, उस समय को याद करो.”

अदिति: “हाँ. बस वैसे ही.”

इतने में अनन्या बाहर आ गई, अब कोई और कपडा तो उसके पास था नहीं तो उसने अपने आप को एक तौलिये से ही लपेट रखा था. अजीत का लंड ये देखते ही फनफना गया. अदिति ने उसकी जांघ हल्के से थपथपाई और स्वयं स्नान के लिए चली गई. अजीत ने बार से तीन पेग बनाये और एक अनन्या को थमा दिया. अनन्या हालाँकि पार्टी में भी पी चुकी थी पर न जाने आज उसपर कोई नशा नहीं चढ़ा था. उसने तीन चार घूँट में ही अपना पेग समाप्त किया और एक और बना लिया. अदिति तब तक बाहर आ चुकी थी और वो भी केवल तौलिया ही लपेटे थी. उसने देख लिया कि अनन्या दूसरा पेग बना रही है. वो उसके पास गई और उसे समझाया कि पहली बार का सुख शराब के नशे में नहीं लेना चाहिए, अन्यथा उसे जीवन का पहला अनुभव उस प्रकार से याद नहीं रहेगा जैसा रहना चाहिए.

अनन्या ने माँ की बात को समझा और अपने पेग को चुस्कियों में पीना शुरू किया. अजीत और अदिति भी यही कर रहे थे.

अजीत: “अगर तुम्हें इसमें जरा सा भी संकोच है तो कोई आवश्यक नहीं कि हम ये करें.”

अनन्या ये सुनकर चौंक गई.

अनन्या: “नहीं, पापा. ये मेरा बहुत पहले का प्रण है. और मुझे नहीं लगता कि आज से कोई अच्छा समय आएगा. मम्मी ने मुझे बहुत कुछ समझाया है. मैं चाहती हूँ कि आज मुझे एक कली से फूल बना दें.”

ये कहती हुई वो आगे बढ़ी और अजीत के पास आकर उसने उसे चूम लिया. अजीत ने अपना ग्लास अदिति को दिया और अनन्या को अपनी बाँहों में लेकर चुम्बनों की बौछार कर दी. और इसी के साथ उसने अनन्या के शरीर से तौलिया खींच कर अलग कर दिया. अदिति की एक सिसकारी निकल गई. उसने कभी सोचा भी न था कि अनन्या निर्वस्त्र कितनी सुन्दर लगती होगी. उसके नंगे शरीर को देखकर अदिति की चूत भी पनिया गई. उधर बाप बेटी के चूमा चाटी में न जाने कब अजीत का तौलिया भी गिर गया. अनन्या ने जब अपनी नाभि पर कुछ चुभता हुआ पाया तो नीचे देखा. उसकी आंखे अपने पिता के लंड को देखकर फ़ैल गयीं. जय और परम जो अपने आपको बड़े महारथी समझते थे उसके पिता के आगे गौण ही थे. न जाने उसके मन में कहाँ से ये विचार आया कि अगर नताशा एक बार पापा का लंड झेल लेगी तो जो मुझे उलाहने देती है,उसकी बोलती ही बंद हो जाएगी. यही सोचते हुए उसने अजीत के तने हुए लंड को अपने हाथ में ले लिया.

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शालिनी का कमरा:

शालिनी अपनी साँसों को संभल रही थी. उसने मौखिक सम्भोग से कभी भी इतना आनंद नहीं पाया था.

शालिनी: “कहाँ से सीखा तूने ये सब.”

गौतम: “अरे दादी आप आम खाओ, गुठलियाँ न गिनो. क्या आपको अच्छा लगा?”

शालिनी: “अच्छा? ऐसा अनुभव मैंने जीवन में कभी भी नहीं लिया है.”

गौतम: “दादी, बात ये है कि मैं आपसे असीम प्रेम करता हूँ. ये सुख आपको इस कारण मिला, न कि मेरे कहीं से सीख कर आने से.” गौतम ने बात बनाते हुए कहा.

शालिनी समझ गई कि ये बताने वाला नहीं है. उसने अपने हाथ में गौतम का लंड पकड़ा और हल्के से सहलाते हुए पूछा.

शालिनी: “और इसका कैसे प्रयोग करते हैं वो भी तुझे भली भांति आता ही होगा.”

गौतम: “कुछ कुछ. पर जैसे आप सिखाओगी मैं वैसा ही करूँगा.”

शालिनी: “ह्म्म्मम्म, मेरा मन अब तेरे इस लंड को चूसने का है और फिर मैं चाहूंगी कि तू मुझे अच्छे से चोदे.”

गौतम: “दादी, आप जो चाहे वैसा करो.”

शालिनी: “चल सामने आकर खड़ा हो जा, जरा चूस कर देखूं तेरे लंड को कैसा स्वाद है.”

गौतम शालिनी के सामने जा खड़ा हुआ और शालिनी ने बिना समय नष्ट किये हुए उसके लंड को अपने मुंह में ले लिया. उसने ये प्रण किया कि जितना आनंद गौतम ने उसे दिया है, उससे अधिक वो उसे लौटाएगी. और गौतम ने जाना कि उसकी दादी क्या बला है. उसके लंड के टोपे, लम्बाई, चौड़ाई और अंडकोष हर स्थान पर मानो शालिनी के मुंह और हाथ एक ही समय चल रहे थे. वो लंड को अपने गले तक ले जाती और वहां उसके लंड को दबाती थी. गौतम अब तक जिन भी स्त्रियों के साथ संभोगरत हुआ था सबकी लंड चूसने की विभिन्न शैलियाँ थीं. पर आज वो उन सबके समावेश से बनी एक शैली को अनुभव कर रहा था. और ये कहना गलत नहीं होगा कि उसकी दादी उन सब बाकी स्त्रियों से कोसों आगे थीं.

शालिनी ने कुछ ही समय में गौतम को चरम पर ले आया. पर यहाँ उसने अपनी उँगलियों से कुछ ऐसा किया कि गौतम ले लंड में उफनता हुआ उबाल मानो शांत हो गया. यही क्रिया जब शालिनी ने तीसरी बार दोहराई तो गौतम से रहा नहीं गया.

गौतम: “दादी, अब और मत सताओ, मुझे झड़ जाने दो, प्लीज.”

शालिनी ने अपने पैतरे बदले और कुछ ही सेकण्ड में गौतम का ज्वालामुखी फूट पड़ा और अपना लावा शालिनी के मुंह में गिराने लगा. शालिनी ने उसके इस लावे को पूरा पी लिया. गौतम असमंजस में था क्यूंकि अभी तक कोई भी स्त्री उसका पूरा पानी नहीं पी पाई थी. शालिनी ने पूरा गटकने के बाद गौतम की ओर मुस्कुरा कर देखा.

“क्यों बेटा, कैसा लगा.”

“दादी आप सच में विलक्षण हो.”

“अब कितनी देर लगेगी तेरा फिर से खड़ा होने में?”

“बस समझो कुछ ही मिनट.”

“हूउउउनंनन, अब मेरी चूत कुलबुला रही है. अब जैसे ही तेरा लंड खड़ा हो जाये इसकी भी प्यास बुझा देना.”

“अवश्य दादी।”

अब जवान लड़के की लंड को खड़े होने में अधिक समय तो लगता नहीं, वो भी तब, जब उसके सपनों की अप्सरा उसके सामने निर्वस्त्र पड़ी हो. और जैसे ही गौतम को लगा कि अब वो दादी की चुदाई कर सकता है, उसने आगे बढ़कर अपने लंड को शालिनी के मुंह के पास लगा दिया.

गौतम: “दादी, थोड़ा इसे प्यार करो जिससे ये भी आपको उतना ही लौटा सके.”

शालिनी: “मुझे विश्वास है कि ये कई गुना लौटाने वाला है.”

ये कहते हुए शालिनी ने लंड मुंह में लेकर कुछ देर चूसा जिससे वो अच्छे से गीला भी हो जाये और अच्छा कड़क हो जाये जिससे वो उसकी चूत के पेंच ढीले कर सके. फिर गौतम ने अपना स्थान उस द्वार के समक्ष लिया जहाँ से कई वर्ष पहले उसके पिता ने संसार में कदम रखा था.

गौतम: “दादी, कैसी चुदाई पसंद करोगी, प्यार से या धुआंधार।”

शालिनी: “ये वाली तो धुआंधार होनी चाहिए, बाद में एक बार प्यार से भी चोदना। पर इस बार कोई दया नहीं दिखाना।”

गौतम ने ये सुनकर अपने लंड को दादी की चूत के ऊपर रखकर उसे उसकी लकीरों पर घिसा और जब लगा कि उसकी पंखुड़ियाँ खुल गयी है तो धीरे से अपने सुपाड़े को चूत में बैठाया. शालिनी साँस रोके उसके इस उपक्रम को देख रही थी. और जब गौतम को लगा कि उसका लंड अच्छे से बैठा है तो उसने दबाव बनाया और लंड को कोई ३-४ इंच तक अंदर धकेल दिया. शालिनी अब भी कामुक और प्रेम भरी आँखों से उसे ताक रही थी. अचानक उसके चेहरे के भाव आश्चर्य और कुछ दर्द के मिले जुले भावों में बदल गए. गौतम ने एक लम्बे और शक्तिशाली झटके से अपना शेष लंड उसकी चूत में जो उतार दिया था.

गौतम अब ठहरने वाला नहीं था. उसे उसकी दादी ने हरी झंडी दिखा दी थी और अगर अब उसे अपने निर्णय पर पुनर्विचार की इच्छा भी थी तो तीर धनुष से छूट चुका था. गौतम अपने लंड की पूरी लम्बाई का प्रयोग कर रहा था. उसकी गोलाई अच्छी होने से शालिनी की बूढी और खुली चूत को भी बहुत सट के जा रहा था. कुछ लोग शालिनी की चूत भोसड़ा कहते, पर उनके लंड गौतम जैसे नहीं थे. और ये भी था कि पिछले ३ सालों में उसकी चुदाई कम और चुसाई ज्यादा हुई थी. शालिनी अब इस पलंगतोड़ चुदाई से विचलित नहीं थी, पर उसकी बूढी हड्डियां इन धक्कों से चरमरा रही थीं. उसने गौतम के सीने पर हाथ रखकर उसकी गति कम करने का प्रयास किया.

पर ये असंभव था. गौतम ही स्वयं को रोकने में असमर्थ था. शालिनी की चूत भी उसके शरीर का साथ नहीं दे रही थी और लगातार पानी छोड़ रही थी. इसके कारण घर्षण कम हो गया और गौतम का लंड अब और सरलता से गंतव्य को भेदने में जुट गया. अंततः शालिनी ने भी अपनी चूत की गुहार सुनी और आनंद के झोंकों में बहने लगी.

शालिनी: “क्या राक्षस की तरह चोद रहा है. दादी हूँ मैं तेरी, थोड़ी तो दया कर.”

गौतम: “दादी मैंने आपसे पूछा ही था, आपने ने ही ऐसे चुदने की इच्छा की थी. और आपकी चूत तो इतना पानी छोड़ रही है जैसे नदी हो.”

शालिनी, अपनी कमर को अब उठाकर गौतम की चुदाई में लिप्त हो गई.

शालिनी: “बात मेरी चूत की नहीं. सच कहूं तो मेरी जो इच्छा थी वही पूरी हो रही है और बहुत आनंद आ रहा है. बात मेरी इन बूढी हड्डियों की है, जो इस उम्र में ऐसे व्यायाम की अभ्यस्त नहीं हैं.”

गौतम ने ये सुनकर अपनी गति धीमी कर ली और शालिनी के होंठ चूमकर बोला, “अरे दादी, एक बार ये हड्डियां खुल गयीं तो फिर आपको हर दिन ऐसी ही चुदाई चाहिए होगी. और जकड़ी हुई हड्डियों को खोलने के लिए ऐसी ही चुदाई करते हैं.”

गौतम ने फिर अपनी गति बढ़ा दी. शालिनी अब इतना झड़ चुकी थी कि उसकी चूत अब जैसे सूखने लगी. गौतम का लंड भी अब इस बढ़ते हुए घर्षण को पहचान गया और कुछ ४ मिनट की चुदाई के बाद अपना माल छोड़ने को उत्सुक हो उठा.

गौतम: “दादी, कहाँ निकालूँ?”

दादी “मेरे मुंह में छोड़. पता तो चले की अपने बाप से कितना मिलता है तेरा स्वाद.”

गौतम ने धक्के हल्के किया और फिर अपने लंड को बाहर निकला और शालिनी के मुंह पर लगा दिया. शालिनी ने उसे अपने मुंह में लेकर पूरी शक्ति से चूसना प्रारम्भ कर दिया. और बस कुछ क्षणों में गौतम के अपना लावा उसके मुंह में भर दिया. पूरा पानी शालिनी ने फिर से पी लिया. गौतम आकर दादी के साथ लेट गया.

गौतम: “दादी, पहले भी तो तुमने मेरे रस का स्वाद लिया था तब तो पता लग गया होगा की मेरे और पापा के स्वाद का अंतर. फिर अब ऐसा क्यों?”

शालिनी: “वो पहले का स्वाद था और ये बाद का. तू नहीं समझेगा इसका अंतर. अपनी माँ से पूछना कभी. या अनन्या से.”

गौतम चौंक कर: “अनन्या से?”

शालिनी उसके होंठ चूमकर और सीने पर अपना सिर रखकर बोली, “हाँ. जैसे तू आज मेरे बिस्तर में है, वैसे ही अनन्या तेरे पापा के बिस्तर में है. तेरी माँ आज उसके कौमार्य का भोग अपने पति को लगा रही है.”

गौतम: “वाओ!”

********************

अदिति का कमरा:

अजीत ने अनन्या को बिस्तर पर लिटाया और अपना चेहरा उसकी जांघों के बीच डाल दिया. चारों ओर उसे चूमते हुए उसने एक लम्बी साँस ली और अनन्या की अब तक अक्षत योनि की महक ली. आज के बाद ये असंभव हो जायेगा. उसने चेहरा उठाकर अदिति को बुलाया.

अजीत: “लो अपनी बेटी की कुंवारी चूत की सुगंध ले लो. और चाहो तो स्वाद भी चख लो. आज के बाद ये ऐसी न रहेगी.”

अदिति आगे झुकी और उसने भी एक साँस में अपनी बेटी की सुगंध भर ली. फिर उसने उसकी चूत पर अपनी जीभ से चाटा और पंखुड़ियां खोलकर अपनी जीभ अंदर डालकर अंदर का स्वाद चखा. फिर वो हट गई.

अदिति: “आज ये तुम्हारी ही है. पर मुझे ये अवसर देने के लिए धन्यवाद.”

अजीत ने अब अपने मुंह और जीभ से अनन्या की संकरी चूत को प्यार करना प्रारम्भ किया. और कुछ ही समय में अनन्या बिस्तर पर कसमसा रही थी. अजीत की जीभ उसकी चूत के हर कोने को खंगाल रही थी. अब उसके कॉलेज वाले दोस्त उसे बचकाना लग रहे थे. अजीत का पारखी और अनुभवी मौखिक आक्रमण उसके जीवन का प्रथम जीवंत सेक्स का अनुभव था. यही कारण है कि पूरी सृष्टि इस एक कार्य के लिए पागल है. अनन्या की कमसिन चूत अब पानी बहा रही थी और अजीत उसके बहाव में गोते लगते हुए उस जल से अपनी प्यास बुझा रहा था. एक ओर अदिति भी अपने तौलिये को फेंककर अपनी चूत को बाहर से मसल रही थी.

अचानक अनन्या का शरीर अकड़ गया और उसके कूल्हे और पैर कांपने लगे. उसकी चूत से एक लम्बी धार निकली जो अजीत के मुंह में समा गई. आज उसका पहला स्त्राव हुआ था. और फिर उसका शरीर ढीला पड़ गया.

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शालिनी का कमरा:

गौतम: “दादी, क्या मुझे भी अनन्या?”

शालिनी: “बच्चू, पहले मुझे और अपनी माँ को ही संभाल ले, ज्यादा लालच में न पड़। “

गौतम: “अरे दादी, मैं तो इसीलिए पूछ रहा था कि बाहर की गतिविधियाँ बंद करने की आवश्यकता तो नहीं. जब घर में ही…”

शालिनी: “बात तो तेरी सही है, कुछ दिन ठहर के देख.”

गौतम: “और राधा?”

शालिनी: “हम्म्म लगता है तू घर की किसी औरत को छोड़ने वाला नहीं. चल मैं उससे बात करुँगी. परन्तु उसके विषय में विश्वास के साथ नहीं कह सकती. क्योंकि किसी ने इस ओर कोई प्रयास नहीं किया. पता नहीं अब तक अनन्या का कौमार्य टूटा भी होगा या नहीं.”

इसी उधेड़बुन में दादी और पोता सोचते हुए निद्रामग्न हो गए.

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अदिति का कमरा:

और अब समय था अनन्या के कौमार्य के विच्छेदन का. अदिति ने बाथरूम में जाकर वहां से एक वेसलीन की शीशी लाई। पहले उसने अजीत के लंड को मुंह में लेकर अच्छे से चूसा और चाटकर कुछ हद तक गीला किया. पर एक कुँवारी चूत के लिए और चिकनाई की आवश्यकता तो समझते हुए, वेसलीन लगाकर उसे पर मला. फिर थोड़ी वेसलीन और लगाई और अजीत से कहा कि वो अपने लंड पर स्वयं ही मले.

फिर उसने अनन्या की कच्ची चूत पर वेसलीन लगाई और उसे एक ऊँगली से उसके अंदर भी मला। इतने में ही अनन्या एक बार झड़ गई. वो बहुत उत्सुक थी और रुक न पाई. अदिति ने उसके छोड़े हुए पानी और वेसलीन से उसकी चूत के अंदर अच्छे से मालिश की. जब उसे लगा कि अब वो अगले पड़ाव के लिए तैयार है, तो वो उठी और अजीत की ओर मुड़ी।

अदिति: “आपकी बेटी अब फूल बनने के लिए उत्सुक है. आइये और इसको अपने जीवन का वो सुख दीजिये, जिससे वो अभी तक अनिभिज्ञ रही है.”

अजीत ने अपने तने हुए लंड को अनन्या की चूत के ऊपर रगड़ा जिस कारण अनन्या कुनमुमनाने लगी.

अजीत हँसते हुए बोला, “कुछ ज्यादा ही बेचैन हो रही हो.”

अदिति बोल पड़ी, “क्यों न हो, उसका सपना जो पूरा होने जा रहा है. चलिए और आगे बढिये.”

अजीत ने अपने लंड को अनन्या की चूत में फंसाया और हल्के दबाव के साथ उसकी चूत की कोमल पंखुड़ियों को चीरते हुए सुपाड़े को अंदर प्रविष्ट कर दिया. अनन्या सिहर उठी. इतने दिनों का उसका सपना आज पूरा जो होने जा रहा था.

“पापा, थोड़ा जल्दी करो न, प्लीज.”

“नहीं बेटी, उसमें तुम्हे दर्द होगा. मैं जानता हूँ मुझे क्या करना है.” अजीत बोलते हुए अपने लंड को दबाते हुए अंदर धकेल रहा था.

एक घोंघे की गति से बढ़ाते हुए कुछ समय में लगभग ५ इंच लंड अनन्या की मखमली चूत में समा चुका था. अनन्या को अभी तक किसी प्रकार का दर्द नहीं हुआ था. अजीत ने अदिति को देखा और अदिति ने वस्तुस्थिति भांपते हुए अनन्या के पास बैठकर उसके हाथ अपने हाथों में ले किये और उन्हें सहलाने लगी. अनन्या समझ गई कि अब सच का सामना होने वाला है. उसने अपने मन को पक्का किया और अपने पापा को आँखों से संकेत किया कि वो आगे बढ़ें.

इस बार अजीत ने अपने लंड को बाहर खींचा और इस बार थोड़ा तेजी से अंदर बढ़ाया. पर लंड पिछली गहराई पर ही रुक गया, उसे अनन्या के कौमार्य की झिल्ली रोक रही थी. अजीत ने उसी क्रम को दोहराते हुए हर बार अपनी गति को बढ़ाते हुए लंड को अंदर और फिर बाहर किया. और फिर एक बार ही अचानक उसने एक तगड़ा धक्का लगाया, और अनन्या का शरीर अकड़ गया. उसने अदिति के हाथ को जोर से अपने हाथ में दबाया। इसके पैर छटपटाने लगे और आँखों में आँसू आ गए. उसकी सील टूट चुकी थी, उसके पापा का लंड अपने अंतिम अवरोध को तोड़कर आगे बढ़ चुका था.

अदिति उसके हाथ और माथे को सहला रही थी. अजीत रुका हुआ था और उसने झुककर अनन्या के होंठ चूमे और बाप बेटी एक दूसरे को चूमने लगे. जब अजीत को लगा कि समय सही है, उसने अपने लंड की चहलकदमी आरम्भ कर दी. अब उसका लंड अनन्या की चूत में हर बार थोड़ा बढ़ कर जा रहा था. कुछ ही समय में लंड की पूरी लम्बाई अनन्या की गहराई नाप रही थी. अनन्या को भी अब दर्द के स्थान पर एक नई संवेदना का अनुभव हो रहा था. ये हर उस अनुभव से अलग था जो उसने अपने जीवन में किये थे. कुछ अलग, कुछ मीठा सा. उसे लगा जैसे उसके शरीर की सभी कोशिकाएं उसके इस अंग में समा गई थी.

उसकी नई खुली चूत अब पानी से भरने लगी थी. अजीत के धक्कों से अब छप छप की ध्वनि आने लगी थी. अदिति ने अजीत की ओर प्रेम भरी आँखों से देखा और उसके होंठ चूम लिए. फिर उसने मुड़कर अपनी बेटी के होंठों पर अपने होंठ रखे. माँ बेटी एक प्रगाढ़ चुम्बन में लीन हो गए. अजीत अब आसानी से अपने लंड को अनन्या की चूत में पेल रहा थे, चूत से छूटता रस उसके प्रयास को सरल बना रहा था. पर इतने संकरे रास्ते के कारण अब उसका अधिक देर तक ठहरना संभव नहीं था. उसने अदिति को संकेत किया कि वो झड़ने वाला है.

अदिति ने अनन्या को बताया तो अनन्या ने कहा कि अंदर ही छोड़ो, वो गोली ले लेगी पर बाहर नहीं निकालें. ये सुनकर अजीत के लंड ने अपनी पिचकारी खाली करना शुरू कर दी और कुछ ही क्षणों में अनन्या की चूत में अपना पूरा रस डालकर अलग हो गया.

अदिति: “कैसी लगी मेरी बेटी को अपनी पहली चुदाई?”

अनन्या : “मम्मी, मुझे तो ऐसा लग रहा था जैसे मैं बादलों में तैर रही हूँ. इतना मजा आता है चुदाई में? मुझे नहीं लगता कि अब मैं एक दिन भी इसके बिना रह पाऊंगी.”

अदिति: “मुझे ख़ुशी है कि तुझे इतना आनंद आया. ला अब मैं तेरी चूत साफ कर दूँ.”

ये कहते हुए अदिति ने अनन्य की जांघों को फैलाया और झुककर उसकी चूत में अपना मुंह लगाकर चाटने लगी. अपनी बेटी और पति के इस मिश्रित रास को भोग लगाकर उसका मन उल्लास से भर गया. उसके अच्छे से चाटकर अनन्या की चूत को साफ कर दिया. फिर उसके फैले हुए पांवों के बीच खिली हुई पाव के सामान फूली हुई लाल गुलाबी चूत को देखकर अजीत और अदिति ने एक दूसरे को एक संतोष भाव से देखा.

अदिति ने अनन्या को आज उनके ही साथ सोने का आमंत्रण दिया और तीनों नंगे ही एक दूसरे की बाहों में सो गए. आज घर में सब सो रहे थे और सब अपने सपनों में एक ही दृश्य की कल्पना कर रहे थे. और वो था उन्मुक्त सेक्स का वातावरण। जीवन के नए आनंद के द्वार खुल चुके थे.

********************

नया दिन नया प्रारम्भ:

सुबह ६ बजे सब जाग चुके थे. गौतम ने शालिनी को एक बार बहुत प्यार से चोदा और फिर कपड़े पहनकर अपने कमरे में चल दिया. उसे ये रात जीवन पर्यन्त याद रहने वाली थी. उधर अदिति ने भी अनन्या की चूत को चूसकर एक बार स्खलित किया और फिर अजीत ने उसे पूरे प्यार के साथ एक बार फिर चोदा। फिर अनन्या अपने कपडे पहनकर अपने कमरे की ओर चल दी. दोनों भाई बहन अपने कमरे में पहुँचने के पहले एक दूसरे से भिड़ गए. और दोनों को ये समझने में देर नहीं लगी कि वे अपने कमरे में क्यों नहीं थे.

गौतम: "अनन्या, तुम्हें मेरी बधाई."

अनन्या की ऑंखें फ़ैल गयीं.

अनन्या: "दादा आप?"

गौतम: "मैं दादी के साथ था. अब घर में सब कुछ बदल गया है. चलो तैयार होकर मिलते हैं."

अनन्या ने सिर हिलाया और दोनों अपने अपने कमरे में चले गए.

जब सब लौट कर बैठक में आये तो घर में एक अलग ही वातावरण का अनुभव किया. अनन्या अजीत की ओर ऑंखें चुराकर देख रही थी. और गौतम शालिनी को ताक रहा था. अजीत और अदिति ने इस बदले हुए समीकरण को समझ लिया और सब कुछ वापिस पहले जैसा करने का प्रयत्न करने लगे. शालिनी ने इसे समझ लिया. घर में अब कोई असहजता नहीं होनी चाहिए थी.

शालिनी: “अदिति, राधा कहाँ है.”

अदिति: “अपना काम करने के बाद अपने कमरे में गई है. अब बारह बजे ही लौटेगी. कुछ काम है क्या?”

शालिनी ने कोई उत्तर नहीं दिया, उसके मन में एक विचार आया था और वो उठी और किचन और घर के दरवाजे अंदर से लॉक कर दिए.

शालिनी: “नहीं, कोई काम नहीं है, पर हम सब जो बातें अब करने वाले हैं उसका सुनना उचित नहीं होगा.”

ये कहते हुए वो गौतम की बगल में बैठ गयी.

शालिनी: “हम सबने कल एक नए जीवन का आरम्भ किया है. सच ये भी है कि आज जो हमारे बीच में कुछ असहजता है, मानो सब एक दूसरे से डरे हुए हैं. पर मेरे विचार में ये सही नहीं है.”

सब चौंक गए.

शालिनी: “हमने पारिवारिक प्रेम को बढ़ावा ही दिया है. जीवन में उन्माद और रोमांच होना चाहिए. अब मेरे विचार से गौतम और अनन्या ही एक दूसरे से अंतरंग नहीं हुए हैं. पर इसमें अधिक समय नहीं लगेगा. जब हम एक दूसरे से इतने अच्छे से परिचित हो चुके हैं तो शर्म किस बात की है? वर्षों पहले जब मैंने अजीत को अपने बिस्तर में बुलाया था, न मुझे तब इस बात की कोई ग्लानि हुई थी और न ही मुझे कल अपने प्यारे पोते गौतम से चुदवाने के बाद हुई है.” ये कहकर शालिनी ने गौतम के होठों पर अपने होंठ रखे और उसे एक प्रगाढ़ चुम्बन दिया.

“जब हम सब एक दूसरे से हर प्रकार से प्रेम कर सकते हैं, तो अपने आप को क्यों रोकना. मैं शेष जीवन इस प्यार और सहवास के बिना नहीं बिताना चाहती.” शालिनी ने अजीत को पास बुलाया और उसे भी एक चुम्बन दिया. “क्या तुम सबको मेरे इस व्यहवार में किसी भी प्रकार से प्रेम के सिवाय कुछ और दिखा?”

सबने न में सिर हिलाया.

“और इसीलिए, अब मैं चाहूंगी कि हम जब भी चाहें, जहां भी चाहें और जिसके साथ भी चाहें, चुदाई कर सकें. राधा इसमें बाधक बन सकती है और हमें इसका उपाय ढूँढना ही होगा. पर उसे जब तक कोई समाधान नहीं मिलता किसी भी प्रकार से कोई शक नहीं होना चाहिए. ठीक है?”

सबने इस बार हाँ में सर हिलाया.

“तो घर की सबसे बड़ी होने के नाते मैं इस उन्मुक्त जीवन शैली का शुभारम्भ करती हूँ.” ये कहते हुए शालिनी खड़ी हुई और अपने कपड़े उतारने लगी. पल भर में ही वो सबके सामने नंगी खड़ी थी. और उसके चेहरे पर किसी प्रकार की शर्म नहीं थी. बल्कि आँखों में एक नयी चमक थी.

“दादी, आप कितनी सुन्दर हो!” अनन्या के मुंह से निकल पड़ा.

“क्यों न हो, दादी जो है मेरी.” अब तक गौतम सम्भल चुका था और उसने शालिनी के नितम्ब पकड़कर उन्हें दबाते हुए अधिकार भरे शब्दों में कहा.

अजीत भी कहाँ पीछे रह सकता था. “ये मत भूलो कि ये मेरी माँ है.” शालिनी के पीछे से उसके स्तन दबाते हुए उसने भी अपना अधिकार जमाया.

“उँह” शालिनी ने अपने स्तन दबते हुए एक दबी हुई आह भरी.

अजीत: “और ये मत भूलो कि इस चूत और गांड में गौतम से पहले मेरा लंड गया था.”

गौतम: “पर डैड, मैंने अभी तक दादी की गांड नहीं मारी है. इसीलिए इस में आप इकलौते ही हैं.”

अजीत: “क्यों माँ, अपने पोते को आधा ही सुख दिया क्या?”

शालिनी: “मेरी बूढी हड्डियां चटका दीं इसने रात में. मेरी तो हिम्मत ही नहीं हुई आगे कुछ करने की. पर आज की रात गांड भी मरवा लूंगी अपने पोते से.”

अनन्या: “दादी वो सब ठीक है. पर मैं पापा और आपकी चुदाई देखना चाहती हूँ. क्योंकि इस पूरे नए समीकरण का आरम्भ वहीँ से हुआ था.”

गौतम ने भी अनन्या के स्वर में स्वर जोड़ा.

अदिति: “अब लगता है कि आप दोनों को बच्चों की बात माननी ही पड़ेगी.”

अदिति: “अनन्या, बिटिया इधर आ और अपने पापा के लंड को थोड़ा अच्छे से कसकर खड़ा कर. फिर हम उधर बैठकर इस खेल को देखेंगे.”

अनन्या को इससे अधिक निमंत्रण की आवश्यकता नहीं थी. वो तपाक से उठी और अजीत के सामने खड़ी हो गयी. फिर उसने अजीत की पैंट खोली और उसे नीचे सरका दिया.

अजीत: “रुक थोड़ा.”

ये कहकर अजीत ने पूरी पैंट निकाली और फिर अपनी टी-शर्ट और अंडरवियर भी उतार फेंका. अब वो भी अपनी माँ के समान नंगा खड़ा था.

अनन्या घुटनो के बल बैठी और लंड मुंह में लेने ही लगी थी कि अदिति बोल उठी, “कपड़े पहनकर चूसेगी? इन्हें निकाल ही दे तो अच्छा है. तेरे भाई को भी तो तेरी सुंदरता का दर्शन करने दे.”

अनन्या ने गौतम की ओर देखा और कुछ शर्माई फिर उसे अपनी माँ की कल रात की बात याद आ गयी और उसने तुरंत अपनी शर्म छोड़ी और गौतम की आँखों में देखते हुए कपड़े निकालने लगी. गौतम उसके शनैः शनैः अनावृत होते संगमरमरी शरीर को ललचाई आँखों से देख रहा था.

अदिति: “हम्म्म, ये ठीक है. पर तू क्यों बैठा टुकुर टुकुर देख रहा है. तेरी दादी की चूत तेरे सामने है. अपने पापा के लिए उसे भी अच्छे से तैयार कर दे. पर मेरे विचार से हमें शयनकक्ष में चलना चाहिए.”

गौतम ने अनन्या के ऊपर से हटाकर शालिनी की ओर देखा. “चलो, मेरी नयी गर्लफ्रेंड।”

ये कहते हुए गौतम ने शालिनी को थामा और अदिति के कमरे को ओर बढ़ चला. पीछे पीछे अनन्या और अजीत भी आ गए. अदिति ने बैठक से बिखरे पड़े कपड़े समेटे और वो भी कमरे में आ गयी और कमरा लॉक कर दिया. अनन्या ने समय व्यर्थ नहीं किया था, पर अब वो बिस्तर पर बैठी हुई अजीत के लंड को चूस रही थी. गौतम को कुछ समय लगा क्योंकि उसने भी अपने कपड़े उतारे थे. और अदिति की ऑंखें उसके लंड पर पड़ीं और उसे अपने बेटे पर गर्व हो उठा. शालिनी तो पहले से ही उत्तेजित थी, सो वो बिस्तर पर टाँगे फैलाये लेटी थी और अपनी चूत में ऊँगली कर रही थी. गौतम ने उसकी उँगलियों को हटाया और अपने मुंह को उसकी चूत पर मलने लगा.

************************

ये सब इस बात से अनिभिज्ञ थे की राधा अभी तक घर में ही थी. वो किसी काम से ऊपर छत पर गयी थी, परन्तु सब ये माने हुए थे कि वो अपने घर गयी है. राधा जब नीचे उतरी तो वो सीढ़ी पर ही रुक गयी थी, और उनकी बातें सुन रही थी. उसकी शंका सही सिद्ध हुई. बाप बेटे शालिनी को चोद रहे थे. हालाँकि गौरव ने कल रात ही पहली बार चोदा था शालिनी को. जब अजीत के लंड को चूसने के लिए अदिति ने कहा तो राधा अपने आप को रोक नहीं पायी और छुपकर झाँका. अजीत के लंड को देखकर उसका मन मचल गया. उसके पति के लंड से दुगना रहा होगा अजीत. उसकी चूत पनिया गयी.

जैसे ही सब कमरे में गए और दरवाजे को लॉक किये, राधा दबे पांव अपने घर की ओर चली गयी. वो ये भूल गयी कि शालिनी ने दरवाजा अंदर से बंद किया था राधा को अंदर न आने देने के लिए. उसने तो इसे सामान्य दिनों के समान ही समझा और क्योंकि कई बार दरवाजा खुला भी रहता था तो इस पर ध्यान नहीं दिया. अपने कमरे में जाकर वो बिस्तर पर लेट गयी और जो घर में चल रहा था उसकी कल्पना में लीन हो गयी. जब उससे सहन नहीं हुआ तो उसने अपने कपड़े उतारे और किचन से एक बैंगन लेकर अपनी चूत में डालकर उसे शांत करने लगी. उसकी आँखों के सामने अजीत का मोटा लम्बा लंड घूम रहा था. वो किसी प्रकार उससे चुदवाने की कल्पना करने लगी. पर उसके पति को इसका आभास नहीं होना चाहिए था.

क्रमशः

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