Incest कैसे कैसे परिवार - Page 6 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Incest कैसे कैसे परिवार

अध्याय ३२: पाँचवाँ घर - शोनाली और जॉय चटर्जी ५

******************


शोनाली और सागरिका:

सजल ने आज पहली बार ट्रिपल चुदाई में भाग लिया था और उसका उत्साह देखते ही बनता था. अभी तक तो उसके चूत में रहकर ऐसी चुदाई की थी, पर अब उसे सागरिका की गांड मारने का अवसर मिलने वाला था. निखिल ने उसे ट्रिपल चुदाई में गांड मारने के गुर सिखाये. सजल का लंड में ये सुनकर ही कड़क हो गया. सागरिका उसे ही देख रही थी. और उसने भी सजल के लंड को देखा और समझ गयी कि वो रुकने की स्थिति में नहीं है. उसने निखिल को पुकारा और उसे सजल की स्थिति से अवगत कराया. निखिल ने उसे अपनी बाँहों में ले लिया.

“तो मेरी होने वाली बीवी अब अपनी सवारी के लिए मन बना चुकी है.”

“और नहीं तो क्या, पूरा मजा केवल मम्मी के ही लिए है क्या?”

“नितिन, आ जा भाई, अपनी भाभी की चुदाई करने के लिए.”

नितिन ने बिस्तर पर लेटकर अपने लंड को पकड़ा और सागरिका ने उसके ऊपर चढ़कर अपनी चूत उसपर लगाकर बैठ गयी. लंड पूरा अंदर लेते ही वो उछलते हुए नितिन को चोदने लगी. निखिल ने अपना स्थान लिया और सागरिका के आगे खड़ा होकर उसे अपना लंड प्रस्तुत किया. सागरिका ने ताल तोड़े बिना ही निखिल के लंड को मुंह में लिया और पूरी गहराई तक चूसने लगी. उसे इस बात का गर्व था कि उसका होने वाला पति इतने तगड़े लंड का स्वामी है. और उसे इस बात से कोई आपत्ति नहीं थी कि सागरिका अन्य लोगों से भी चुदवाती थी. और चुदवाती रहेगी. वैसे भी निखिल स्वयं भी दूसरों की चुदाई के लिए उन्मुक्त था. अपने गले तक प्रहार करते हुए लंड के साथ उसकी चूत में पेले हुए अपने देवर के लंड से भी वो पूर्णतया संतुष्ट थी. पर अब उसके छोटे देवर सजल को एक नया अनुभव देने का समय था.

निखिल के लंड को मुंह से निकालकर उसने आगे झुकते हुए स्वयं को नितिन के समतल कर दिया. इस आसन में उसकी गांड अब ऊपर आ गयी. फिर उसने सजल को कहा कि वो अब उसकी गांड मार सकता है. नितिन ने अपने धक्के रोक दिए जिससे कि उसके भाई को सरलता हो. सजल सागरिका की सुंदर मांसल गांड देखकर बहुत ही उत्तेजित था. फिर उसने निखिल द्वारा बताई रीति को दुहराया और काँपते हुए अपने लंड को सागरिका की गांड पर लगाया. निखिल उसे देख रहा था और सजल ने उसे देखा तो निखिल ने उसे अँगूठा ऊपर करते हुए आगे बढ़ने के लिए कहा. सजल ने सागरिका की मखमली गांड में बहुत ध्यान से लंड डालना प्रारम्भ किया. सागरिका साँस रोके उसके इस पराक्रम को अनुभव कर रही थी. कुछ ही देर में सजल ने उसकी गांड की अँधेरी गुफा में अपने लंड को पूरा डाल दिया. फिर उसने विजयी मुस्कान के साथ निखिल को देखा. निखिल ने अपने हाथ को ऊँचा उठाते हुए अपने भाई के हाथ पर हाई-फाइव किया.

“अब मार ले अपनी भाभी की गांड, जैसे मैंने समझाया था. नितिन, तुम भी ध्यान रखना.” इसके बाद उसने सागरिका के मासूम चेहरे को ठोढ़ी से उठाया और अपने लंड को उसके मुंह में डाल दिया.

“अब तुम्हें भी हम तीनों भाइयों से चुदवाने का सुख मिलने वाला है. और हम तुम्हारे ऊपर कोई दया नहीं दिखाने वाले हैं. ओके, बेबी?”

सागरिका क्या कहती, उसके मुंह, चूत और गांड तीनों में लंड ठुंसे हुए थे. उसने निखिल के लंड पर अंदर ही अंदर जीभ चलाकर अपनी स्वीकृति दे दी.

“चलो भाइयों, अब अपनी भाभी की मस्त चुदाई करो.”

सजल अभी तेज और धुरंधर चुदाई के बारे में अधिक तो नहीं जानता था, पर उसे ये अवश्य समझ आ गया कि उससे बिना रुके सागरिका की गांड मारने की अपेक्षा है. उसने लंड को पिस्टन के समान सागरिका की कोमल गांड में चलाना आरम्भ ही किया था कि उसे आभास हुआ कि ये उसकी पिछली डबल चुदाई से बहुत भिन्न थी. जहाँ चूत में उसके लंड को कुछ खुलापन और कोमलता का अनुभव हुआ था, गांड में अधिक कसाव और कठोरता सी थी. और नीचे से उसे नितिन के लंड के साथ घर्षण का जो अनुभव हो रहा था वो उसके सेक्स जीवन का अनूठा अनुभव था.

शोनाली बड़े प्रेम से अपनी बेटी को अपने दामाद और उसके भाइयों से चुदवाती देख रही थी और उसे इस बात से बहुत सांत्वना थी कि उसकी बेटी को इतना अच्छा वर और परिवार मिला है, जो उन सबकी इस जीवन शैली में उनसे भी अधिक संलग्न है. अपनी चूत में ऊँगली डालकर वो अपनी बेटी की दमदार चुदाई देख रही थी. निखिल ने सागरिका के सिर को अपने हाथ में थामा हुआ था और सागरिका के सामने उसके लंड को चूसने के सिवाय और कोई प्रकल्प नहीं था. उसे अपनी चूत और गांड में चलते मोटे लम्बे लंड जो सुख दे रहे थे उसका प्रदर्शन करने में वो असमर्थ थी. उसने न जाने कितनी बार इस प्रकार की चुदाई की इच्छा की थी, पर केवल पार्थ और जॉय के होने के कारण उसे कभी ऐसा सुनहरा अवसर नहीं मिल पाया था. अब तक.

और उसे अपनी गांड में सजल के लंड से अधिक ही आनंद आ रहा था. कारण ये था कि उसकी ताल असम्मिलित सी थी और सागरिका की गांड को समझ नहीं पड़ रहा था कि उसका अगला धक्का कैसा होगा. पहले सजल नितिन के साथ ताल मिलकर उसकी गांड मार रहा था, पर तेजी दिखने के कारण ये क्रम बहुत जल्दी ही ध्वस्त हो गया था. यही कारण था कि नितिन और सजल की ताल बेताल थी. और इसका सबसे अधिक आनंद सागरिका को ही प्राप्त हो रहा था. नितिन तो अपनी भाभी की चुदाई पहले भी कर चुका था और डबलिंग भी कर चुका था, पर उसे आज सजल के उत्साह के कारण अलग मजा आ रहा था. उसके लंड पर घर्षण का कोण बदलते रहने के कारण उसे भी एक नया सुख मिल रहा था. उसे विश्वास था कि अब उसे ये प्रक्रिया अपनी माँ और नानी पर भी अपनानी होगी.

सागरिका की चूत से जहाँ पानी की धार छूट कर नितिन की जांघों को गीला कर रही थी वहीं उसके मुंह से गिरती लार नितिन के चेहरे को. नितिन चाहकर भी इन दोनों से स्वयं को दूर नहीं कर सकता था. वो केवल अपने हाथ से चेहरे और जांघों को पोंछ कर साफ कर रहा था. सजल को इस प्रकार की कोई दुविधा नहीं थी. वो तो एक स्कूल के शरारती बच्चे के समान पूरी तन्मयता के साथ उस खेल में जुटा था जैसे किसी बच्चे को खिलौनों से भरे कमरे में छोड़ दिया गया हो. और उसकी यही उमंग सागरिका और नितिन को भी आनंद की पराकाष्ठा पर ले जा रही थी.

निखिल को इस नए समीकरण का ज्ञात नहीं था, अन्यथा वो भी सजल के इस रूप से प्रभावित हुए बिना न रहता. वो तो अपने दोनों भाइयों को अपनी होने वाली पत्नी की भीषण चुदाई करते हुए ही संतुष्ट और आनंदित था. सागरिका अब उसके लंड को अपने मुंह में अधिक देर तक नहीं रख पा रही थी और उसकी इस कठिनाई को समझते हुए निखिल ने उसके सिर को छोड़ दिया. इसके साथ ही सागरिका ने लंड को मुंह से निकाला और खांसने लगी. फिर मुंह में लेकर निखिल के लंड को चाटने लगी. उसकी चूत भी अब अधिक चुदने से मना कर रही थी. झड़ते हुए सागरिका अब तक चुकी थी.

बैठक में सुमति अपने आप को बहुत देर तक रोके रही फिर समर्थ की मूक स्वीकृति पाकर उस कमरे में चली गयी. आज उसे एक नए लंड से निकले वीर्य का स्वाद जो मिलना था. और वो भी उसकी प्यारी सागरिका की गांड में से. ओह, क्या उसे और कुछ भी चाहिए? कमरे में धीरे से कदम रखकर वो शोनाली को अपनी चूत में ऊँगली चलते हुए देखी और अपने कपड़े गिरा दिए. सजल को सागरिका की गांड के कसाव के कारण अब रुका नहीं गया और वो भरभराते हुए सागरिका की गांड में अपने वीर्य को छोड़ने लगा. पूरा स्खलित होते ही उसे आभास हुआ कि वो अब तक स्वचालित सी चुदाई कर रहा था.

सागरिका की लाल हुई गांड के छेद से अपने रस को बहता देख उसे गर्व अनुभव हो रहा था. वो एक ओर हटा ही था कि सुमति से जा टकराया जो सागरिका की गांड की ओर चली आ रही थी. दोनों डगमगा गए पर सुमति की गति अगर तेज होती तो गिरना तय था. सुमति ने क्षमा की दृष्टि से सजल को देखा और फिर अपने मुंह को सागरिका की गांड से लगते हुए रस का सेवन करने लगी. सजल उसकी उठी हुई गांड देखकर बहुत आकर्षित हुआ और उसने सुमति की गांड पर अपना हाथ फेरा. सुमति इस क्रिया से झड़ गयी और तेजी से सागरिका की गांड में से अपने पेय को खींचकर पीने लगी. हटते हुए उसने अपने होंठों पर जीभ फिराई और सजल के लंड पर अपनी दृष्टि डाली. घुटनों पर गिरते हुए उसे सजल के लंड को मुंह में लेकर चाटकर साफ कर दिया.

फिर उठी और एक बार पीछे मुड़कर शोनाली को देखते हुए उसने कपड़े पहने और बैठक में लौट गयी. नितिन और निखिल भी अब झड़ रहे थे. नितिन ने सागरिका की चूत को भरा तो निखिल ने उसके मुंह को. निखिल झड़कर अलग हट गया. और फिर सागरिका भी नितिन के ऊपर से हटकर बिस्तर पर ढेर हो गयी. शोनाली ने अपनी बेटी की चूत से बहते हुए रस को देखा तो उठी और सागरिका की चूत को चाटकर उसे इस रस से मुक्ति दिला दी.

सब अब संतुष्ट थे. एक दूसरे को प्रेम से देखते हुए उन्होंने कपड़े पहने, हालाँकि सागरिका अभी भी लेटी थी. शोनाली से सागरिका का माथा चूमा और उसे जब सम्भव हो बैठक में आने के लिए कहकर अन्य चारों निकल गए. सागरिका चुदाई के संस्मरण लिए हुए बहुत देर तक लेटी हुई मुस्कराती रही और फिर कपड़े पहन कर बैठक में चली गयी.

********************

कुछ ही समय में सागरिका भी बैठक में आ गयी. समर्थ के निर्देश पर सबको उनकी रूचि का ड्रिंक दिया गया था. समर्थ के मन में एक प्रश्न था.

समर्थ: “पार्थ, तुमने अपने उस नए अनुबंध के बारे में कुछ बताया नहीं, जिसके लिए तुम और रूचि गए थे.”

पार्थ कुछ देर सोचकर बोला, “नाना जी, सबसे पहले मैं ये बता दूँ कि ये बात इस कमरे के बाहर नहीं जाना चाहिए, क्योंकि जिनके साथ हमारा अनुबंध हुआ है वो अपनी प्रतिष्ठा के लिए कुछ भी कर सकते हैं.”

समर्थ ने अपने परिवार की ओर देखा. सबने इसे गोपनीय रखने का वचन दिया. समर्थ ने पार्थ को वो बता सकता है.

पार्थ: “पहली बात तो ये जिसे आप सुनकर आश्चर्य में पड़ जायेंगे वो ये है की चार नंबर वाले डिसूजा भी हमारे ही समान पारिवारिक सम्भोग में लिप्त है. मुझे वो लोग वहीं मिले थे. आंटी के भाई आजकल अफ्रीका से आये हुए हैं और उन सभी के आपसी संबंध हैं.”

“वाओ!” ये पारुल ने कहा था. “डेविड इस सो हॉट!”

उसकी इस बात पर सब हंस पड़े.

“पर जो मैं अब बताने जा रहा हूँ, उसे किसी भी स्थिति में बाहर नहीं जाना चाहिए.” पार्थ रुका और फिर आगे बताने लगा, “जिनके साथ हमारा अनुबंध हुआ है वो इस प्रदेश के जाने माने मंत्री श्रीमान ____ हैं.” इस बार सभी चौंक गए. समर्थ के चहरे पर भी अविश्वास के भाव थे.

“हाँ, उनका बाहर का रूप और अंदर का रूप बहुत भिन्न हैं. मुझे जहाँ तक समझ आया है, वो भी अपनी बेटी की चुदाई करते हैं, हालाँकि मैंने देखा नहीं. वो और उनकी पत्नी अन्य लोगों से चुदाई करने में कोई बुराई नहीं समझते. जहाँ तक मैं समझता हूँ, अभिनेत्री केके की भी वो चुदाई कर चुके हैं.”

“पार्थ, उस दिन क्या हुआ ये बताओ, आगे की बात समझने में हम स्वयं ही सक्षम हैं.” समर्थ ने कहा. अन्य सभी लोग भी इस कथानक के बारे में जानना कहते थे.

पार्थ ने बताना आरम्भ किया.

“रूचि और मुझे एक अलग कार में ले जाया गया था. और हम दोनों उनके ही बंगले पर रुके थे. उस रिसोर्ट में उनका अलग बंगला है, जिसे हर प्रकार से सुरक्षित किया गया है. उनकी अनुमति के बिना रिसोर्ट के मैनेजर इवान स्टोन भी वहां नहीं आ सकते.”



पार्थ के शब्दों में अगले भाग में पूर्ण विवरण प्रकाशित किया जायेगा. इस भाग में उसके आगे क्या हुआ ये जानिए.



पार्थ की पूरी बात सुनकर परिवार वाले अत्यंत आश्चर्य में थे. उनके कभी स्वप्न में भी भान नहीं हुआ था कि उक्त मंत्री इस प्रकार का व्यभिचारी भी हो सकता है. यही नहीं उसने इस सबके लिए एक रिसोर्ट भी बनाया है जिसमे अन्य प्रसिद्द और मान्य व्यक्तिगण को भी सम्मिलित किया था. कुछ लोगों के बारे में जानकर उन्हें और भी अधिक अचरज हुआ. सच में हाथी के दाँत दिखाने के और तथा खाने के और होते हैं. जिनके बारे में पार्थ ने बताया था उन पर तो यही चरितार्थ होता था. पर इन दोनों परिवारों के बारे में भी यही कहा जा सकता था. किसे पता था कि बाहर के समाज में सौम्य और चरित्रवान बने ये सभी अंदर से किस प्रकार से लिप्त हैं. समर्थ कुछ सोच में डूबे थे. उनके मन में कुछ चल रहा था. उन्होंने सुप्रिया को देखा तो वो भी उन्हें ही देख रही थी. आँखों का एक और जोड़ा उन्हें देख रहा था, वो थी सुमति.

सुप्रिया: “पापा, क्या आप भी वही सोच रहे हैं, जो मैं?”

समर्थ मुस्कुराते हुए बोला, “तुम जानती हो कि ये सच है, क्या करना चाहती हो?”

सुप्रिया: “अगर देखा जाये तो अभी हमें कुछ नहीं करना होगा. श्रेयकर यही होगा कि शोनाली इस संदर्भ में आगे बढ़े. अभी उन्हें हमारे विषय में अधिक नहीं पता है. उन्हें अनुमान अवश्य है, पर…..,”

पार्थ बोल उठा: “नहीं अनुमान नहीं, मैंने डेविड को बताया था, तो उन्हें पता है.”

सुप्रिया ने उसे देखा, उसे किसी का बीच में बोलना अच्छा नहीं लगा था, पर ये जानकर कि उसने गलत अनुमान किया था, अपनी बात को आगे बढ़ाया.

सुप्रिया: “मैंने गलत समझा था, परन्तु फिर भी मैं चाहूँगी कि इसके संबंध में शोनाली और सुमति अगला कदम लें. पारुल भी डेविड से बात कर सकती है. डेविड से उसे अधिक जानकारी भी प्राप्त हो सकेगी. शोनाली और सुमति मिशेल के साथ मिलकर कुछ आयोजन कर सकती हैं. पापा आप का क्या सोचना है.”

समर्थ: “मुझे ये सही लग रहा है, इस प्रकार से शीला की जो उस समाज में जुड़ने की इच्छा थी, कुछ रूप में पूर्ण हो जाएगी. मेरे विचार से जब तक हम लौटेंगे, हमारे तीन परिवार तो कम से कम मिल चुके होंगे.”

पार्थ: “नाना जी, आप शेट्टी परिवार को भूल गए.”

समर्थ: “भूला नहीं, पार्थ. पर अधिक शीघ्रता विनाश का कारण बनती है. पहले इस परिवार से घनिष्ठता बना लो, उसके बाद ही आगे कुछ सोचो.”

पार्थ: “जी नाना जी, आप ने सही कहा.”

शीला: “डेविड और रिचर्ड के बारे में सोचकर ही मेरी चूत पनिया रही है.”

पार्थ: “नानी, आप भूल गयीं. मार्क भी अब यहीं पढ़ने वाला है, तो आपको उसके विषय में भी सोचना होगा.”

ये सुनकर सब हंस पड़े तो शीला शर्मा गयी.

शीला: “बहुत दुष्ट हो गया है तू पार्थ, इधर आ, तेरी चालाकी को चूसकर निकालती हूँ.”

पार्थ शीला के सामने खड़ा हुआ तो शीला ने उसका लोअर सरकाकर नीचे खींचा और उसके लंड पर अपनी जीभ चलाने लगी.

“अब हो चुकी बात, चलो कुछ देर बाद आगे की बातें करेंगे. मैं भी अपनी नातिन की चूत का रस पीने के लिए लालायित हूँ. सुना है बहुत मीठा है उसका पानी.”

संजना ये सुनकर शर्मा उठी. सुप्रिया ने सजल को अपने पास बुलाया और सजल वशीभूत होकर उसके पास आ गया.

“बहुत बड़ा हो गया है रे मेरा बेटा। सुना हैं अपनी माँ को भी चोदता है अब तू. मौसी का ध्यान नहीं आया कभी?”

“मौसी, अब तो हर दिन.”

ये सुनकर सब हंस पड़े कि इसका कारण एक ही हो सकता है.

“तो दूर क्यों रहता है? माँ ने मना तो किया नहीं होगा?”

“नहीं. बस समय नहीं मिल पाया.”

“चल आज तू अपनी मौसी की भी चुदाई करना. अपनी भाभी और उसकी माँ को तो चोद ही चुका है तू आज.”

सजल मौसी के मुंह से ऐसी भाषा सुनकर कुछ अचम्भे में था, परन्तु जल्दी ही समझ गया कि इस खेल में शर्म का कोई स्थान नहीं है.

“माँ, मैं सजल को अपने कमरे में ले जा रही हूँ. तुम चाहो तो बाद में वहीं आ जाना.” शीला को बताकर वो जाते हुए मुड़ी और सुमति को आंख मारते हुए बोली, “आप भी तैयार रहना अपनी औषधि के लिए.”

सुमति के चेहरे के उद्गार देखने योग्य थे. उसने निखिल को देखा तो निखिल भी उसे ही देख रहा था. आँखों के संकेत दोनों के लिए पर्याप्त थे.

निखिल ने सुमति को साथ लेकर पूछा, “कहाँ चलें?”

सुमति के शरीर ने झुरझुरी ली, “जहाँ तेरा मन हो.”

निखिल उसे लेकर सुप्रिया वाले कमरे में ही चला गया. नितिन ने सोचा कि कहीं उसे अवसर न मिले, तो तपाक से उसने पारुल को पकड़ा और चल दिया. पारुल भी उसके इस व्यवहार पर हंस पड़ी. कमरे में समर्थ, शोनाली, सुरेखा, सागरिका और जॉय ही बचे थे.

शोनाली ने सुझाया. “ हम तीनों एक दूसरे को सुख दे सकती हैं और हम तीनों तो आप एक एक करके चोदो।”

जॉय की तो बांछे खिल गयीं, एक साथ तीन तीन सुंदरियों की चुदाई. उसकी ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं था. उन्होंने वहीं बैठक में ही समर्थ और संजना के निकट ही अपने प्रेमालाप का निर्णय लिया. शीला पार्थ को लेकर अपने कमरे में जा चुकी थी. सुप्रिया सजल के साथ थी. सुमति ने निखिल को घेरा हुआ था. पारुल को नितिन ले गया था. अगले चरण के खेल के लिए बिसात बिछ चुकी थी और सभी खिलाड़ी खुलकर खेलने को आतुर थे.

*******************

सुप्रिया और सजल:

सुप्रिया सजल को अपने निर्धारित कमरे में ले आई और समय व्यर्थ न करते हुए अपने कपड़े यूँ ही आनन फानन फेंके और सजल के सामने कुछ ही देर में वो प्राकृतिक अवस्था में खड़ी थी. सजल भी अपने कपड़े निकाल चुका था पर मौसी को नंगा देखकर उसका मुंह खुला रह गया. वो इस समय एक परी के समान सुंदर लग रही थी. हाँ, आयु का दंश उन्हें अवश्य कुछ काट रहा था, परन्तु आज भी वो अनंत सुंदरी थीं.

“क्या देख रहा है?”

“आ आ आप बहुत सुंदर हो, मौसी.”

“तेरी माँ से भी अधिक?” सुप्रिया ने उसे छेड़ा.

सजल ने कुछ नहीं कहा फिर धीमे स्वर में बोला, “नहीं.”

सुप्रिया एक पल के लिए चौंकी, फिर मुस्कुराकर सजल की ओर बढ़ी.

“जानता है, तेरा ये सीधापन ही मुझे हमेशा रास आता है. तुम अपनी मौसी को नंगा देखकर उसकी चुदाई से पहले भी अपनी माँ को ही उससे श्रेष्ठ मानता है. सच मैं, मैं तेरी इस सच्चाई से बहुत ही प्रभावित हूँ. क्या करना चाहता है तू अपनी मौसी के साथ?”

सुप्रिया ने उसके खड़े होते हुए लंड को अपने हाथ में लेकर सहलाते हुए पूछा.

“सब कुछ. मम्मी ने कहा था कि आप मुझे बहुत कुछ सीखा सकती हो.”

“सीखा दूँगी समय आने पर, लेकिन आज जो तू चाहता है, वो करुँगी। बता न?”

“कहा न मौसी सब कुछ. आपका मुंह, चूत और गांड सब कुछ.”

“हम्म, और मेरे हाथ?” सुप्रिया ने सजल के लंड को अपने हाथ से दबाते हुए ठिठोली की.

“वो भी.”

सुप्रिया ने सजल के चेहरे को अपने दूसरे हाथ से सहलाया और फिर उसकी गर्दन पकड़कर उसे अपनी ओर खींचते हुए अपने जलते हुए होंठ सजल के होंठों से मिला दिया. सजल मौसी के चुंबन में खो गया और साथ देने लगा. न जाने कितनी देर दोनों एक दूसरे के आलिंगन में चुंबन में बंधे रहे. फिर सुप्रिया ने हाँफते हुए उसे अलग किया और उसे बिस्तर पर बैठा दिया. अब तक सजल का लंड अपने पूरे जोश में आ चुका था. और सुप्रिया उसके आकार से प्रभावित हुए बिना न रह सकी. अपने घुटनों पर बैठकर सजल के लंड को अपने मुंह में लिया और उसे प्रेम से चूसने लगी.

*****************

सुमति और निखिल:

सुमति संभल ही नहीं पा रही थी. समर्थ से चुदने और गांड मरवाने से उसकी प्यास कम होने के स्थान पर और बढ़ गयी थी. चार लौंड़ों का रस गांड से पीने से भी उसे संतुष्टि नहीं हुई थी. आज उसने प्रण किया हुआ था कि परिवार के हर लंड का रस जिस भी गांड में जायेगा उसे पीने के बाद ही वो घर लौटेगी. समर्थ, निखिल, सजल और जॉय का रस पी चुकी थी. अभी नितिन और पार्थ शेष थे. उसे ये भी विश्वास हो गया था कि हो न हो नितिन आज पारुल की गांड मारने में सफलता पायेगा और उसे नितिन का पानी पारुल की गांड से पीने का सौभाग्य मिलेगा.

और पार्थ! शीला पार्थ को गांड मरवाये बिना तो छोड़ने से रही. तो उसका आज का प्रण पूरा होने की पूरी संभावना थी. बस एक अड़चन थी, कि उसे पता कैसे चलेगा. वो नहीं जानती थी की समर्थ ने इसका पूरा प्रबंध किया हुआ है. अब बात ये भी थी कि अगर उसकी चुदाई चल रही होगी तो वो जाएगी कैसे? फिर उसने ऐसे सभी प्रश्नों को ताक में रखा और निखिल के साथ कमरे में जाते ही तुरंत अपने कपड़े उतार फेंके और निखिल को भी जल्दी से नंगा कर दिया. निखिल के बलशाली लंड को अपने मुंह से चाटते हुए वो अपनी चूत को सहलाने लगी. निखिल उसकी इस उत्सुकता को समझ रहा था और उसे डर था कि कहीं उन दोनों की चुदाई में व्यवधान न पड़े.

“बुआ, आप आराम से रहो. नानाजी से सब प्रबंध कर दिया है. पारुल और नानी गांड मरवा कर हमारे ही पास आएँगी। और आपको उनके गांड खाली करने का पूरा अवसर दिया जायेगा. इसीलिए, अब अपनी चुदाई पर ध्यान दो और आनंद उठाओ.”

सुमति ने निखिल की बात सुनी तो वो समर्थ की ऋणी हो गयी. कितना ध्यान और मान रखते हैं उसका. उसकी लंड चाटने की गति सामान्य हो चली पर अपनी चूत से उँगलियों को छेड़ना उसने बंद नहीं किया.

“बुआ, चलो लेटो, लंड बाद में चाटने का भी समय रहेगा. आपकी चूत और गांड के स्वाद के साथ मिलेगा. अभी क्या रखा है इसमें?”

सुमति निर्विरोध बिस्तर पर लेट गयी और निखिल के चेहरे को लालायित दृष्टि से देखने लगी. निखिल उँगलियों के माध्यम से निखिल सुमति की चूत और गांड को चाटने, सहलाने, कुरेदने और छेड़ने में व्यस्त हो गया. उसका कौन सा अंग कब क्या कर रहा था इसमें कोई नियम नहीं था और सुमति का कामोन्मादित शरीर इन बदलते हुए आघातों को समझने में असमर्थ था और निखिल के उँगलियों पर नाच रहा था. तड़पती, लरजती, सिसकारियां लेती हुई सुमति सागरिका के भाग्य को धन्य मान रही थी जिसे ऐसा विलक्षण चुड़क्कड़ पति मिलने जा रहा था. और ये उनके परिवार के लिए भी शुभ था. दोनों परिवारों के बढ़ते हुए घनिष्ठ सम्बन्ध अब जीवन पर्यन्त रहने वाले थे.

सुमति की चूत के रस से अब निखिल की उँगलियाँ भीग चुकी थीं. परन्तु उसने अपने आक्रमण में कोई कमी नहीं की थी. बल्कि अब उसने सुमति की गांड पर अधिक ध्यान दिया और जैसा कि सुमति की इच्छा थी उसकी गांड को भी उँगलियों से छेड़ते हुए सुमति को अनन्य बार झाड़ दिया. जब निखिल ने सुमति एक नशे जैसी स्थिति में ऑंखें बंद किये हुए पड़ी देखा, तो उसने दुष्ट मुस्कराहट के साथ सोचा कि चुदने के लिए लालायित है, और ऐसी चुदाई के लिए कि उसका रोम रोम काँप जाये. निखिल ने आज सुमति के साथ एक नया प्रयोग करने का निर्णय लिया. उसने सुमति को घोड़ी का आसन लेने के लिए आग्रह किया. सुमति ने पलटते हुए अपनी गांड उठाकर आसन ले लिया. अब वो अपनी चूत की खुजली दूर होने की आशा कर रही थी.

*******************

पारुल और नितिन:

पारुल मन ही मन नितिन की इस लालसा पर प्रसन्न थी. वो जानती थी कि नितिन उस पर आसक्त है और ये नहीं दिखाना चाहती थी कि उसके मन में भी नितिन के प्रति वही भावना थी. नितिन कमरे में पारुल के साथ जाते ही उससे लिपट गया. पारुल के हाथ उसकी पीठ पर गए और पारुल ने अपने होंठ नितिन के होंठों से जोड़ दिए. नितिन कई स्त्रियों की चुदाई कर चुका था, पर उसे जो आकर्षण पारुल में दिखा था वो किसी और में नहीं. मन की बातें मन ही जाने. दोनों एक दूसरे से लिपटे हुए चुंबनों का आदान प्रदान करते रहे और फिर जब हटे तो उनके चेहरे लाल थे. पारुल ने पहल करते हुए नितिन के कपड़े निकाले और फिर नितिन की ओर देखा तो नितिन सचेत हुआ और पारुल को उसके कपड़ों से मुक्त कर दिया. दोनों प्रेमी एक दूसरे को देखते हुए अपने भाग्य को धन्य कर रहे थे.

कुछ देर तो दोनों एक दूसरे को केवल देखते ही रहे. एक दूसरे में उन्हें एक अनजाना आकर्षण दिख रहा था. फिर नितिन पहल की और पारुल को बिस्तर पर लिटा दिया और उसे ऊपर से नीचे था चूमने और चाटने लगा. उसकी चूत पर पहुंचते ही उसे पारुल की सुगंध ने मुग्ध कर दिया. अपनी जीभ से उसकी चूत को चाटते ही उसे विश्वास हो गया कि वे दोनों भी एक दूसरे के लिए ही बने हैं. और इसी आशय से उसने पारुल को अपने मुंह से सुख देना आरम्भ किया. पारुल मौखिक सहवास से परिचित थी, और वैसे तो नितिन कुछ भी अलग नहीं कर रहा था, पर पारुल का रोम रोम उसे पुकार रहा था और उसमे एक ऐसी भावना जागृत कर रहा था जिससे वो अब तक अनिभिज्ञ थी. क्या ये प्यार है?

नितिन और पारुल दोनों के मन में समान भावनाएं थीं. पारुल ने अपना ढेर सारा रस नितिन के मुंह में उढ़ेल दिया. नितिन को इस रस में जो स्वाद आया वो अलग था. क्या ये प्यार है?

नितिन के मुंह में झड़ने के साथ ही पारुल ने उसे कहा कि वो भी उसके लंड को चूसने की इच्छुक है. नितिन कब मना करने वाला था. उसने तुरंत ही अपने लंड को पारुल के मुंह के समीप कर दिया जिसे पारुल ने पूरे प्रेम के साथ चाटा और चूसने में लग गयी. नितिन के लंड को न जाने कितनी ही बार चूसा गया था, पर उसे पारुल के मुंह में एक अलग ही आनंद मिल रहा था. क्या ये प्यार है?

पारुल स्वयं भी इन्हीं विचारों में खोई थी. लौड़े तो उसने भी चूसे थे, कई तो नहीं पर पर्याप्त. पर उसे जो अनुभूति उसे नितिन के लंड को चूसने में हो रही वो नई थी. क्या ये प्यार है?

जब नितिन झड़ने को हुआ तो उसने पारुल को चेताया, पर पारुल ने उसके लंड को मुंह से निकालने में कोई रूचि नहीं दिखाई. और नितिन ने उसके मुंह में ही अपना पानी छोड़ दिया. पारुल ने ख़ुशी से उसके पूरे रस को पी लिया और नितिन की ओर प्रेम भरी दृष्टि से देखा. दोनों एक दूसरे को देखकर अब ये समझ गए थे कि उनके बीच केवल चुदाई का ही संबंध नहीं रहेगा. ये सम्भवतः उनके प्रेम की पहली सीढ़ी थी. वैसे भी वो दोनों विवाह के लिए इतनी शीघ्र तैयार नहीं थे, पर भविष्य में इसकी संभावना उन्हें उज्ज्वल दिख रही थीं. एक दूसरे को फिर से चूमते हुए दोनों लेट गए.

“मुझे कुछ अलग सी अनुभूति हुई आज, मैं समझा तो नहीं सकता, पर जीवन में ऐसा भाव पहली बार आया है मेरे मन में.” नितिन ने पारुल को चूमते हुए बताया.

“मुझे भी, कुछ अलग ही लगा आज. क्यों? मुझे भी नहीं पता पर तुम्हारे साथ एक अलग ही जुड़ाव अनुभव हुआ. ” पारुल ने भी उसे चूमते हुए कहा.

“क्या ये प्यार है?” दोनों ने एक साथ पूछा और फिर हंसने लगे.

“देखा न हम दोनों एक ही जैसा सोचते हैं.” पारुल बोली.

“हम्म मुझे नानी और मम्मी से बात करनी होगी.” नितिन ने कहा.

“और मुझे भी, नहीं तो वो मेरे लिए लड़का ढूंढने में लग जाएँगी दीदी के विवाह के बाद.”

“पर अभी मैं विवाह नहीं कर सकता.” नितिन ने सफाई दी.

“मैं भी. अभी दो वर्ष तक तो नहीं.” पारुल ने सहमति जताई.

“तो क्या सगाई कर लें और दो साल बाद?”

“देखो मम्मियाँ क्या कहती हैं. सगाई हो या नहीं, हम एक दूसरे के तो साथी बन ही सकते हैं. सगाई तो केवल औपचरिकता ही है.” पारुल ने कहा.

अब तक नितिन का लंड खड़ा हो चुका था और अपनी संभावित पत्नी की चुदाई के लिए तत्पर था.

“तो सुहागरात मना लेते हैं?” नितिन ने कहा.

“बिलकुल. नेकी और पूछ पूछ.” पारुल ने ये कहते हुए अपने पैर फैला दिए.

*******************

शीला और पार्थ:

शीला सुमति की चुदाई देखकर बहुत उत्तेजित थी. उसके ऊपर पार्थ ने अपने नए अनुभव के बारे में सुनकर उसकी आग और भड़का दी थी. अब अगर उसकी भरपूर चुदाई जल्दी न हुई तो वो न जाने क्या करने वाली थी. पहले उसने सोचा था कि समर्थ उसकी चुदाई करेंगे पर सुमति की गांड मारने के बाद वो बैठक में चले गए थे. संजना की जीभ में वो आनंद नहीं था जो किसी लंड के चूत में घुसने का होता है. और गांड के बारे में तो सोचना भी नहीं चाहिए क्योंकि गांड में जब लंड जाता है तब आनंद की पराकाष्ठा होती है. जब गांड में लौड़ा जाता है, सुख से तन-मन भर जाता है. शीला को इस बात पर हँसी आ गई. कमरे में घुसे ही थे तो शीला को हँसते देख पार्थ पूछ बैठा कि क्या बात है?

शीला: “मैंने दो पंक्ति की कविता बनाई है: जब गांड में लौड़ा जाता है, सुख से तन-मन भर जाता है. कैसी है?”

अब हंसने की बारी पार्थ की थी.

“नानी, आपका सच में कोई पर्याय नहीं. आप इतने दिनों तक एक लंड से काम चला लेंगी? टूर पर क्या करेंगी?”

“चिंता न करो, नाती जी. ये टूर का उद्देश्य ही ये है. ये विशेष टूर है. इसके बारे में बाद में बताएँगे. पर ये जान लो कि न मुझे कोई कमी होगी न नाना जी को.”

पार्थ नानी की इस बात पर सोचता ही रह गया.

फिर बोला, “नानी, वैसे विचार उत्तम है. मैं रूचि से पूछूँगा कि हम भी क्लब के लिए ऐसा ही टूर बनाएँ।”

“बना ले, तेरी क्लब की औरतें तो तुझे मालामाल कर देंगी अगर ये टूर बना तो. और तुम्हें बहुत लम्बे टूर जाने की आवश्यकता भी नहीं है. बस एक सप्ताह का टूर बना, इतने में ही वो चुद चुद कर निहाल हो जाएँगी. पर वो सब बाद में, पहले मेरी चुदाई कर डाल. संजना से चूत चटवा कर और तेरी माँ की चुदाई देखने के बाद बेचारी को कोई भी संतोष नहीं मिला है. ”

कपड़े फेंककर शीला बिस्तर पर लेटी और अपने पाँव फैलाकर पार्थ को आशा से देखने लगी. पार्थ ने भी सोचा कि क्या बिगड़ता है, चोदकर इनको शांत कर ही देता हूँ. उसने भी तत्काल कपड़े उतारे और अब तक खड़े हुए लंड को शीला की चूत पर रखा और एक भारी धक्के के साथ अंदर पेल दिया. शीला ने आनंद भरी सिसकारी ली और अपने पाँव कैंची के समान पार्थ की कमर पर लपेट दिए. और पार्थ ने भी अपनी चिर परिचित चुदाई का परिचय दिया और अपने जवान लौड़े से शीला की बूढी चूत में आतंक मचा दिया. शीला भी खेली खिलाई थी. पार्थ उसके चुदाई के सामर्थ्य से अपरिचित तो नहीं था, परन्तु अगर उसने ये सोचा था कि शीला उसके सामने कुछ दया की भीख माँगेगी, तो हुआ कुछ उल्टा ही.

शीला इतनी अधिक उत्साहित और उत्तेजित थी कि पार्थ की इस शक्तिशाली चुदाई को भी वो बड़ी ही आसानी से झेल रही थी हुए उसका आनंद भी ले रही थी. न जाने सच में या पार्थ को छेड़ने के उद्देश्य से शीला उसे और भी तेजी से चोदने के लिए उलाहना देनी लगी. अब अपने लंड पर गर्व करने वाले पार्थ के तन बदन में आग सी लग गयी. वो और तेज गति से शीला को चोदने में जुट गया और शीला भी उसे और अधिक कोसते हुए उकसा रही थी. ऐसा नहीं था कि शीला नहीं समझ रही थी कि वो भी आग से खेल रही है, पर जो आग उसकी चूत में भड़की हुई थी उसका ऐसी भीषण चुदाई के सिवाय कोई और उपचार भी नहीं था. पार्थ को लग रहा था कि वो नानी से हारने वाला है. वो चाहे जितने भी तेज और गहरे धक्के लगाता शीला उन्हें आसानी से झेल रही थी. और इसका और भी एक कारण था, शीला की चूत अब इतना पानी छोड़ चुकी थी कि उसमे लंड तैर रहा था और पार्थ को अब कोई भी आनंद नहीं मिल रहा था.

“नानी, आपकी चूत पूरी गीली हो चुकी है, पता भी नहीं चल रहा है मेरे लंड को. रुको मैं उसे पोंछ दूँ. ”

“कर जो करना है, पर जल्दी कर. आज मुझे अच्छे से चोद कर खुश कर दे, बस.” शीला ने कुछ खीझ के साथ कहा.

पार्थ ने अपनी शर्ट से शीला की चूत को पोंछा और अपने लंड को एक ही धक्के ने अंदर डाल दिया. पोंछने का काम कुछ अच्छे से ही हुआ था क्योंकि इस बार शीला की चीख निकल गयी. अब उसे लगने लगा कि उसने पार्थ को छेड़कर गलती की क्योंकि पार्थ पूरे नियंत्रण में था और शीला की चूत की धज्जियाँ उड़ा रहा था. इस आयु में शीला कितना पानी छोड़ती, उसकी चूत में पार्थ अब एक वहशी रूप में लंड की पिलाई कर रहा था. शीला को अपनी नानी याद आ गयी.

“मुझे छोड़ दे बेटा, मुझसे गलती हो गयी जो मैंने तुझे इतना कुछ कहा. अपनी नानी पर दया कर, मेरी चूत फट गयी है. क्यों जानवर के समान चोद रहा है?”

पर ये बाजी अब पार्थ के हाथ में थी और इस बार उसने अपनी भड़ास निकाली। शिला की बूढी चूत उस जवान मोटे लौड़े के सामने पस्त हो चुकी थी. और अभी पार्थ झड़ने से बहुत दूर था. और इसी कारण पार्थ ने एक निर्णय किया.

“ठीक है, नानी. अगर चूत फट गयी है तो मुझे अपनी गांड मारने दो.”

इससे पहले कि शीला कुछ कह पाती पार्थ ने अपने मोटे लम्बे लंड को शीला की चूत से निकाला और गांड में थोक दिया. शीला की चीख बैठक में चल रहे टीवी पर गूंज गयी. समर्थ ने संजना की चूत में से अपने मुंह को हटाकर देखा तो शीला की गांड में पार्थ का लंड फँसा हुआ था.

“इसे मैंने कई बार समझाया है कि जवान लौंडों को मत छेड़ा कर. इतनी बुढ़ा गयी पर बुद्धि नहीं आयी. चूत का सत्यानाश करवाकर अब गांड भी फड़वा लेगी माँ की लौड़ी.” समर्थ शीला के इस व्यव्हार पर अपने विचार रखते हुए संजना की चूत में फिर से अपनी जीभ चलाने लगा.

शीला को सच में अब कुछ कुछ समझ आने लगा था. उसकी विनती कोई सुनने के लिए नहीं था. जिस पार्थ को वो उलाहना देकर उकसा रही थी वो अब उसकी चूत फाड़ने के बाद गांड का भी बैंड बजा रहा था. उसकी दया की भीख ने कुछ देर में पार्थ को भी विचलित कर दिया. उसने अपनी गति कुछ कम की और शीला की चूत को अपनी उँगलियों से छेड़ने लगा. गति कम होने से शीला को कुछ आराम मिला और पार्थ की उँगलियों ने उसकी चूत को कुछ सीमा तक फिर से सामान्य कर दिया.

ऐसी धुआंधार चुदाई के कारण शीला की नसें ढीली हो गयीं थीं और हड्डियां चटक रही थीं. पर पार्थ का भी अब संयम समाप्त हो चूका था. इस गति और कठोरता से चोदने से वो भी अब झड़ रहा था. उसने शीला की गांड में अपना माल भर दिया. शीला कुछ कुनमुनाई पर पार्थ ने उसे वैसे ही रुकने के लिए कहा. फिर उसने अपनी पैंट में से शीला की गांड बंद करने के लिए एक प्लग निकाला और बड़े प्रेम से उसकी गांड में डालकर उसे बंद कर दिया.

“अपनी माँ का बहुत ध्यान रखता है. सच में तेरे जैसा बेटा भाग्य वालों को ही मिलता है. अब क्या करूं.”

“माँ के कमरे में जाओ, और उन्हें वहीँ ये जूस पिला कर आ जाओ.” पार्थ ने उन्हें समझाया.

शीला ने कपड़े पहनने की आवश्यकता नहीं समझी और उस कमरे की ओर बढ़ चली जहाँ वो निखिल से चुद रही थी. कमरे में जाकर देखा तो सुमति अपनी गांड उठाकर लेटी थी और निखिल अपने लंड से उसकी चुदाई करने ही वाला था. कमरे के खुलने से निखिल रुक गया और सुमति ने भी उस ओर देखा. शीला को अपनी ओर आते देख वो समझ गयी कि उनका प्रयोजन क्या है. उसने निखिल से कहा कि उसे कुछ मिनट का समय चाहिए. और फिर वो पलटी और सीधे लेट गयी. शीला ने उसे इस स्थिति में देखा तो वो भी जान गयी कि सुमति क्या चाहती है. उसने सुमति के मुंह के दोनों ओर पैर किये और अपनी गांड को उसके मुंह पर लगा दिया. सुमति ने अपना मुंह पूरा खोला और बहुत धीरे से शीला की गांड में से प्लग निकाला।

प्लग के निकलते ही वीर्य के मोटे मोटे थक्के सुमति के खुले मुंह में जा गिरे. जब उनके स्वतः गिरने का क्रम रुका तो सुमति ने शीला की जांघ के ऊपर हाथ रखकर दबाया. शीला की गांड अब सुमति के मुंह पर लग गयी. जैसे कोल्ड ड्रिंक को स्ट्रॉ से खींचकर पीते हैं वैसे ही सुमति ने शीला की गांड में से पूरा रस सोख लिया.

सुमति के कार्य सम्पन्न करने के बाद शीला उठी और सुमति के होंठ चूमकर निखिल को बोली, “अच्छे से चोदना अपनी बुआ सास को. और अपना पानी पिलाना मत भूलना.”

ये कहकर उसने निखिल के हाथ में वो प्लग थमाया और चल दी. द्वार पर जाकर मुड़ी तो देखा कि सुमति अपनी गांड उठाकर उसी आसन में आने लगी थी जिस आसन में वो शीला के आने के समय थी. शीला प्रसन्न मन से पार्थ के पास लौट गयी.

******************

संजना, सुरेखा, सागरिका, समर्थ और जॉय:

बैठक में वातावरण भिन्न था. समर्थ संजना की चूत चाट रहा था और सुरेखा एवं सागरिका जॉय के लंड को चूस रही थीं. संजना आज पहली बार अपनी मम्मी को सजल के अतिरिक्त किसी के लंड को चूसते हुए देख रही थी. पर उसे जो सबसे अजीब संवेदन था वो अपने नाना के खुरदुरे हाथों को अपने शरीर पर चलने का था. नाना के हाथों का स्पर्श और उनकी उसकी चूत पर लपलपाती हुई जीभ उसे एक अन्य ही लोक में ले जा चुके थे. नाना की चूत चाटने का ढंग परिवार की स्त्रियों से बिलकुल ही अलग था. जहाँ परिवार की स्त्रियों के स्पर्श में एक कोमलता थी, वहीं समर्थ के स्पर्श में कुछ कठोरता सी थी.

समर्थ संजना के रस की गंध और स्वाद में खो चुका था. जिस प्रकार वो संजना की चूत में अपनी जीभ डाल डाल कर उसके रस को चाट रहा था उससे ये सिद्ध होता था कि उसे ये अमृत के समान ऊर्जावान लग रहा था. और संजना केवल इन विचारों में खोई थी कि कब उसकी सील टूटेगी और चुदाई का आनंद ले पायेगी. उसके शरीर इस कल्पना से ही काँप उठा. समर्थ बिना रुके उसकी चूत में अपने मुंह लगाए हुए चाटता रहा.

जॉय के लंड को चूस कर सुरेखा और सागरिका ने बिलकुल अच्छे से खड़ा और गीला कर दिया था. अब प्रश्न ये था कि आगे क्या करना है.

“मौसी, आप पहले अपनी चुदाई करो, आप दोनों कभी मिले नहीं हो न.” सागरिका ने सुरेखा से कहा तो सुरेखा को सागरिका कि इस भावना पर बहुत अपनत्व आया.

“ऐसा कुछ नहीं है, मैं बाद में भी….”

“नहीं, मौसी, पहले आप.”

ये कहकर उसने सुरेखा को सोफे पर लिटा दिया और अपने पिता से कहा कि वे अब मौसी की चुदाई करें. जॉय सुरेखा की चूत पर लंड लगाकर अंदर करने लगा. उधर सागरिका ने देखा कि समर्थ का लंड भी खड़ा है, पर उसका कुछ होना नहीं है क्योंकि संजना की तो चुदाई होने नहीं थी. उसने समर्थ के नीचे जाकर उसके लंड को अपने मुंह में लिया और चूसने लगी. समर्थ ने अपना आसन बदल कर दोनों के लिए कुछ आसानी कर दी, पर उसका मुंह संजना की चूत से हटा नहीं.

सागरिका समर्थ का लंड चूस रही थी जो संजना की चूत चाट रहा था, जॉय ने सुरेखा की चुदाई में अपना ध्यान लगाया हुआ था और बैठक में एक बड़ी शांतिमय ढंग से सब कुछ हो रहा था. जॉय के पूछने पर सुरेखा ने कुछ तेज चुदाई के लिए कहा. तो जॉय ने एक अच्छी लय में मद्धम गति से सुरेखा की चुदाई करना आरम्भ कर दिया।

******************

सुप्रिया और सजल:

“ओह, मौसी!” सजल के मुंह से निकला. “ओह, मौसी.”

सुप्रिया बिना विश्राम के सजल के लंड पर अपनी जीभ और होंठों का जादू बिखेरती रही. वैसे अब तक सजल तीन स्त्रियों से लंड चुसवा चूका था, पर जो सुप्रिया का ढंग था उसने उसे मंत्रमुग्ध कर दिया था.

“मम्मी ने कहा था कि आप सबसे अच्छी हो और मुझे सिखाओगी भी, तब मैंने सोचा था कि वो यूँ ही बोल रही है, पर आप सच में विलक्षण हो, मौसी.”

“तेरी माँ से अच्छी?” सुप्रिया ने फिर उसे छेड़ा.

आदमी सामान्य परिस्थिति में जो उत्तर देता है वो लंड किसी स्त्री के मुंह में होने पर नहीं देता. पर सजल अभी भी चौकन्ना था.

“इस मामले में तो आप उनसे आगे हो.”

“हम्म्म, स्मार्ट बॉय.” सुप्रिया ने उसके लंड पर थूका और फिर अपने मुंह में लेकर चूसने लगी.

सजल का लंड अब उतावला हो चला था, और सुप्रिया अभी उससे चूत नहीं चटवाना चाहती थी क्योंकि उसमे अभी भी वीर्य के अवशेष सम्भव थे. इसीलिए उसने सजल से कहा कि वो उसकी चूत को केवल ऊपर से चाटे और चोदने के लिए गीला भर कर दे. सजल ने उसकी इस बात को समझा और उसकी चूत को ऊपर से चाटा और उँगलियों से चूत के अंदर कुछ देर तक हलचल की. अब समय आ गया था मौसी को चोदने का. सजल की तो जैसे आज लॉटरी लगी हुई थी. शोनाली, सागरिका और अब सुप्रिया, एक से बढ़कर एक सुंदर और चुड़क्कड़ परिवार की महिलाओं का जो उसे साथ मिल रहा था.

सुप्रिया ने उसे पूछा कि ऊपर रहना चाहता है या नीचे? सजल को शोनाली के साथ चुदाई में अलग आनंद आया था सो उसने फिर वही आसन के लिए कहा. सुप्रिया ने उसे लेटने के लिए कहा और उसके लेटते ही एक बार फिर लंड को चाटा और थूक से गीला करते हुए उसके दोनों ओर पांव किया और उसके लंड पर बैठ गयी. सजल तो जैसे स्वर्ग में चला गया हो. सुप्रिया ने इतनी जल्दी उसके लंड को अंदर लिया कि पलभर में ही सजल का लंड उसकी बच्चेदानी से जा टकराया.

“लंड मस्त है तेरा. अपने भाइयों को टक्कर देता है और नाना को भी. बहुत मस्त।” सुप्रिया फिर झुकी और उसने अपने मम्मे सजल के वक्ष से सटाये और उसके होंठ चूमते हुए अपने कूल्हे चलने लगी. ये ऐसा आसन है जिसमे शरीर का पूर्ण व्यायाम हो जाता है, और सुप्रिया के शरीर की लचक ही थी जो इसे सम्भव बना रही थी. हल्के धक्कों के साथ सुप्रिया सजल के लंड पर उछलती रही. पर ये आसन सरल आसान नहीं था इसी कारण उसने अपने मम्मे सजल की छाती से हटा लिए. आसन बदलने से सुप्रिया अपनी गति बढ़ाने में भी सफल हो गयी.

सजल ने अपने सामने झूलते हुए सुघड़ मम्मों को देखा तो उससे रहा नहीं गया और उसने अपने हाथों से उन्हें दबोच लिया और निचोड़ने लगा. सुप्रिया तो जैसे पागल ही हो गयी और तेज गति से उछलने लगी. सजल ने उसके दूधिया मम्मों को दबाना और निचोड़ना बंद नहीं किया. सुप्रिया के मुंह से अब आनंद भरी सिसकारियां निकल रही थीं. फिर उसने अपने दोनों हाथ सजल के दो ओर किया और अपनी गति और भी तीव्र कर दी. सहारा मिल जाने से उसे अब उछल कूद में कोई भी कठिनाई नहीं हो रही थी. सुप्रिया अचानक ही रुक गयी और उसका शरीर एक बिन जल की मछली के समान फड़कने लगा.

सजल को तो समझ ही नहीं पड़ा कि हुआ क्या। पर तभी सुप्रिया जोर से चीखी और धम्म से सजल की छाती पर गिर पड़ी. सजल अब घबराने लगा कि मौसी को कुछ हुआ तो नहीं. वो क्या करे इस बारे में सोच ही रहा था कि सुप्रिया कुनमुनाई और फिर उसकी छाती से लग गयी. उसने धीरे से अपने चेहरे को ऊपर किया और सजल को देखा.

“तूने तो कमाल कर दिया, बेटा। मुझे इतनी जल्दी झड़ा दिया. पर तेरा नहीं हुआ न?”

सजल ने नकारा तो सुप्रिया बोली, कुछ देर रुक. मुझे साँस लेने दे.” पर वो न सजल के सीने से उठी, न ही उसके लंड को अपनी चूत से निकाला। सजल का लंड उसकी चूत में अभी भी फड़फड़ा रहा था. न जाने कितनी देर तक यूँ ही स्थिति बनी रही. फिर सुप्रिया उठी, सजल के लंड को बाहर किया और उसे चाटा। फिर घोड़ी का आसन ले लिया.

“मौसी की गांड मारेगा?” अपनी गांड हिलाकर सुप्रिया ने सजल को निमंत्रण दिया.

“हाँ, हाँ, हाँ.” सजल एक ही बार में कह गया.

“तो चढ़ जा पीछे से. और अच्छे से मारना। तेज तेज, अंदर तक. कर लेगा?”

“हाँ हाँ, अभी भाभी की ऐसे ही मारी थी.” सजल ने गर्व से कहा.

“तो चढ़ जा मेरे घोड़े.”

सजल के तो भाग्य ही खुल गए. आज दो दो महिलाओं की गांड मरने का सौभाग्य जो मिल रहा था. पर निखिल ने जो उसे सिखाया था सागरिका की गांड मारने के समय अब सजल उनकी माँ के ही ऊपर प्रयोग करने जा रहा था. उसने सुप्रिया की ऊँची उठी हुई गांड को देखा और अपने लंड को पकड़ कर उसके मुहाने रखा.

“डर मत, घुसा दे. डरेगा तो आगे क्या करेगा?” सुप्रिया ने उसे समझाया.

सजल ने लंड के टोपे को अंदर धकेला और उसके अंदर जाने के बाद एक लम्बा धक्का लगाया जिससे उसके लंड ने पूरी दूरी तय कर ली.

“शाबास! अब मार मेरी गांड!!”

सजल अब एक स्वचालित मशीन समान सुप्रिया की गांड मारने लगा. भाभी की गांड कुछ अधिक कसी थी और उसके साथ ही एक और लंड उनकी चूत में होने से बहुत ही अधिक तंग थी. पर मौसी की गांड खुली हुई थी और उसे दोनों के बीच का अंतर समझ आ रहा था. दोनों का अलग सुख था. मौसी की गांड में लंड आसानी से चल रहा था पर गर्मी अधिक थी. और उस गर्मी में उसे अपना लंड भी गर्माते हुए अनुभव हो रहा था. और मौसी की गांड की एक खूबी थी. सुप्रिया इतनी बार गांड मरवा चुकी थी कि वो गांड मरवाते समय अपनी गांड की मांसपेशियों को इस प्रकार से संकुचित करती थी कि लंड पर अतिरिक्त तनाव आता था.

“अरे रे!” सुप्रिया अचानक से बोली.

“क्या हुआ मौसी?”

“सुमति के लिए कैसे रोकेंगे मेरी गांड में तेरा पानी?” सुप्रिया ने दुविधा से पूछा.

“आप गांड ऊपर किये रखना, मैं कुछ लेकर इसे बंद कर दूंगा. अभी आप टेंशन मत लो.”

“ठीक है, तो चलने दे.”

सजल की आँखें अब कमरे में घूम रही थीं और उसे उपयुक्त वास्तु दिखाई दे गयी. एक लम्बी मोटी मोमबत्ती टेबल पर रखी थी. मोटी यानि मोटी, और उसके अगले उपयोग के बारे में सोचते हुए सजल ने अपने धक्कों की गति और गहराई बढ़ा दी. सजल ने कोई दस से पंद्रह मिनट तक अपनी मौसी की गांड को ठोका और सुप्रिया ने भी पूरा आनंद लेकर गांड मरवाई. फिर अंत में सजल ने गांड में अपना पानी छोड़ ही दिया. लंड से पूरा रस निकलने के पश्चात् उसने सुप्रिया से उसी आसन में बने रहने का आग्रह किया. अपने लंड को निकालकर वो टेबल के पास गए और मोमबत्ती लेकर लौटा. सुप्रिया ने देखा तो हंस पड़ी.

“बंद कर मेरी गांड और चल सुमति के पास मेरे साथ. मोमबत्ती से तूने मुझे अपनी जवानी याद करा दी.”

सजल ने बहुत संभाल कर मोमबत्ती को सुप्रिया की गांड में डाला और फिर उसे सहारा देकर खड़ा किया. फिर दोनों सुमति के कमरे की ओर कल पड़े. कपड़े पहनने की दोनों ने इस बार कोई आवश्यकता नहीं समझी.

*******************

सुमति और निखिल:

निखिल ने आज सुमति के साथ एक नया प्रयोग करने का निश्चय किया. उसके अनुरोध पर सुमति घोड़ी के आसन में आ गयी और अब वो आशा कर रही थी कि निखिल उसकी चूत में जलती हुई आग को बुझायेगा. निखिल ने अपने लंड को सुमति की चूत पर लगाते ही एक धक्का दिया और सुमति की चूत में उसका लंड समा गया. सुमति को कुछ शांति मिली. उसकी दहकती हुई चूत ने निखिल के लंड को जकड़ लिया और निखिल को भी उस गर्मी का आभास हुआ. इस आग को बुझाने का एक ही उपाय था, और वो था सुमति की कमरतोड़ चुदाई. परन्तु निखिल इस कार्य में तुरंत नहीं लगना चाहता था.

पर उसने सुमति की चूत को कोई दो तीन मिनट ही चोदा और फिर एक ही बार में अपने लंड को बाहर खींच लिया. सुमति सकपका गयी. उसे अपनी चूत का खालीपन तनिक भी रास नहीं आया. वो कुछ कह पाती इसके पहले ही निखिल ने लंड को उसकी गांड पर रखा और इस बार गांड को चीरते हुए अपने लंड को अंदर पेल दिया. गांड मरवाने की अभ्यस्त सुमति भी इस अप्रत्याशित प्रहार से धराशाई हो गई. और निखिल को लगा जैसे उसने अपने लंड को कड़ाही से निकालकर नंगी आग पर रख दिया हो. गांड की असहनीय गर्मी उसके लंड को तपाने लगी.

निखिल ने रुकना सही नहीं समझा, अन्यथा उसके लंड के जलने की आशंका थी. और उसने सुमति की गांड में लंड की यात्रा आरम्भ की. जैसे जैसे लंड अंदर से बाहर और बाहर से अंदर होता रहा, अंदर की गर्मी भी उसी अनुपात में घटने लगी. सुमति को तो गांड मरवाने में आनंद आना ही था तो वो अपनी गांड उछालकर निखिल के लंड के थपेड़ों का प्रतिउत्तर देने लगी. पर निखिल यहाँ भी अधिक देर तक रुकने के मूड में नहीं था. इस बार भी जब दो तीन मिनट हुए तो उसने लंड को बाहर निकाला और इस बार फिर से सुमति की चूत में जड़ दिया.

सुमति समझ गयी कि निखिल आज उसकी चूत और गांड एक साथ मरेगा और एक छेद के रस को दूसरे में मिलाता रहेगा. फिर उसने सोचा कि इस प्रकार से तो उसे न केवल उसे अपनी गांड में से निखिल का रस पीने मिलेगा, बल्कि अपनी चूत के रस के साथ इस मिश्रण का भरपूर आनंद मिलेगा. उसे निखिल के इस नए ढंग का परिणाम अत्यंत सुखद और स्वादिष्ट लग रहा था. उसने इस प्रकार से अपने बेटे पार्थ और भाई जॉय से भी चुदने का निर्णय लिया.

निखिल दोनों छेदों में पर्याप्त समय दे रहा था और उसके चूत से गांड और वापिस चूत में लंड को बदलते रहने का क्रम सटीक और अटूट था. सुमति के दोनों छेदों के खुले होने से भी उसे इस लुका छिपी में अधिक कठिनाई नहीं हो रही थी. सुमति की आनंद से भरी सिसकारियां अब हल्की चीखों में परिवर्तित हो चुकी थीं. पूरी डबल चुदाई का आनंद न सही पर निखिल उसे एक नए प्रकार से ही उसका आनंद दे रहा था. सुमति की चूत से झरता रस बिस्तर को इतना गीला कर चुका था कि उसे बदलना नितांत आवश्यक था.

निखिल उसकी गांड मार ही रहा था कि कमरे में सुप्रिया ने सजल के साथ प्रवेश किया. सुप्रिया ने पीछे मुड़कर अपनी गांड से बाहर निकली हुई मोमबत्ती को दिखाया तो सुमति एक बार फिर झड़ गयी.

“वाओ, मॉम, क्या आइडिआ लगाया है.” निखिल ने देखा तो हंसकर बोला।

“ये सजल की तीव्र बुद्धि का काम है.” सुप्रिया ने सजल को पूरा श्रेय दिया. “अब थोड़ा हटो मैं सुमति के आगे आ जाऊँ फिर अपना खेल चालू कर देना.”

निखिल ने अपने लंड को सुमति की गांड से निकाला और सुमति को सीधे लेटने के लिया कहा और उसके सीधे होते ही उसके मुंह पर आ गयी. सुमति ने मोमबत्ती को निकाला और उसके मुंह में सजल और सुप्रिया की चुदाई का मिश्रण गिरने लगा. स्वाभाविक रूप से जब गांड से पानी निकलना बंद हुआ तो सुमति ने सुप्रिया को नीचे खींचा और उसकी गांड पर मुंह लगाकर, जोर से बचा हुआ माल भी पी लिया. निखिल ने इसी आसन में सुमति की गांड में अपना लंड पेल दिया और फिर उसकी गांड मारने लगा.

“मॉम, ये मोमबत्ती यहां छोड़ दो. हमारे काम आएगी.” निखिल ने अपने धक्कों पर बिना अंकुश लगाए अपनी माँ से कहा. सुप्रिया ने मोमबत्ती उठाई और सुमति से कहा कि उसे साफ कर दे. सुमति के लिए तो जैसे हर अंश टॉनिक था तो उसने चाटकर उसे साफ कर दिया. सुप्रिया उठी और मोमबत्ती निखिल को सौंपकर सजल के साथ कमरे से चली गयी.

निखिल को हंसी आ आ गयी.

“देखा बुआ, नानी प्लग दे गयी और मम्मी मोमबत्ती. सब आपको कितना चाहते हैं, कि आपकी मन की इच्छा पूरी करने के लिए हर सम्भव उपाय करते हैं.” निखिल इस समय सुमति की गांड में लंड पेल रहा था. और अब दोनों झड़ने के निकट थे.

जब निखिल निलजील सुमति की चूत में लंड डाला तब सुमति ने उत्तर दिया, “सच है. सबने मुझे कितनी सरलता और भेदभाव के स्वीकार किया है. मुझे नहीं लगता कि मुझे कभी इससे अधिक प्यार मिला हो.”

अब सुमति झड़ रही थी. निखिल का लंड भी अब झड़ने की कगार पर था, इसीलिए उसने चूत में से लंड निकाला और सुमति की गांड में फिर से डाला और तेज धक्कों से उसकी गांड को पेलने लगा. उसके लंड से वीर्य का स्त्राव भी उसके धक्कों को धीमा न कर पाया. पर जब उसे आभास हुआ कि उसका वीर्य अब सुमति की गांड से झाग के साथ बाहर निकल रहा है तो उसने धक्के हल्के किये और अपने झड़े हुए लंड को बाहर निकालते हुए नानी द्वारा दिए प्लग से सुमति की गांड बंद कर दी. अब उसे एक ग्लास की आवश्यकता थी. जो उसे मिल गया.

अपने लंड को सुमति के मुंह के पास ले जाने पर सुमति ने पूरे प्यार से उसे चाटा और कुछ देर मुंह में लेकर चूसा. सुमति आनंदित थी. निखिल ने उसे सीधे लिटाया और ग्लास उसकी गांड के नीचे लगाते हुए प्लग को निकाल बाहर किया. ग्लास लगभग आधा भर गया तो उसने उसे सुमति को दिया. सुमति अपने कोहनी के बल बैठकर स्वाद लेते हुए उसे पीने लगी. निखिल विस्मृत आँखों से उसे देख रहा था. आखिरी घूंट को अपने मुंह में घुमाते हुए सुमति ने उसे निगल लिया.

“बहुत अलग स्वाद था आज. चूत और गांड की गंध से तुम्हारे रस के स्वाद में अलग ही बात थी. मुझे लगता है कि मुझे अब इसे अपनी नियमित डोज़ में जोड़ लेना चाहिए, पर किसी और की चूत और गांड से निकले तो पता लगेगा कि सच में इतना ही स्वादिष्ट है या नहीं.” सुमति ने अपने विचार रखे.

निखिल हंस कर बोला, “मुझे नहीं लगता कि आपको इस के कोई विशेष कठिनाई होगी. चलिए अब चलते हैं. लोगों के मन मैं उस रिसोर्ट के बारे में जो प्रश्न हैं, उन्हें तो मैंने अभी तक सुना भी नहीं.”

“बिलकुल, चलो.” सुमति और निखिल ने भी अब कुछ पहनने पर ध्यान नहीं दिया और दोनों नग्नावस्था में ही बैठक को चले गए.

********************

पारुल और नितिन:

नितिन और पारुल अपनी अनौपचारिक सुहागरात मना रहे थे. पारुल ने अपने पाँव फैलाये और नितिन ने अपने लंड को उसकी चूत में डाल दिया. वो इस कमसिन कोमल लड़की को प्रेम से ही चोदने का पक्षधर था. वैसे पारुल पार्थ के मोटे लम्बे लंड को भी ले चुकी थी, और नितिन का लंड भी पार्थ से अधिक भिन्न नहीं था, पर वो इस चुदाई को अपने और पारुल के लम्बे और उज्ज्वल भविष्य के लिए स्मरणीय बनाने वाला था. एक मद्धम गति से चुदाई करते हुए दोनों प्रेमी एक दूसरे के चुंबन में लीन थे. नितिन की जीभ पारुल के मुंह में थी जिसे पारुल अपनी जीभ से लड़ा रही थी. पर इस लड़ाई में ज्वर नहीं था, प्रेम था.

पारुल को ये आभास हुआ कि नितिन उसे उसी प्रेम और कोमलता से चोद रहा है जैसे उसके पिता जॉय चोदते हैं. और इस निष्कर्ष ने उसे नितिन से और भी अधिक निकट आने में सहायता की. उसे अब विश्वास हो गया कि नितिन उसे न केवल प्रेम से परिपूर्ण करेगा, परन्तु समय आने पर उसकी रक्षा में भी आगे रहेगा. पारुल और नितिन के तन जुड़ने के साथ अब मन भी एक थे. पहले नितिन का मन पारुल की गांड मारने का था, परन्तु उसने उसे आज के लिए त्याग दिया. समय आने पर उसे पारुल की मुलायम और संकरी गांड मारने के अनगिनत अवसर मिलेंगे. पर आज उसे केवल चूत से ही संतुष्टि थी.

जब नितिन ने अपनी भावना पारुल को बताई तो उसकी आँखें आंसुओं से भर उठीं, पर स्वयं को संभालते हुए उसे कहा, “बुआ बेचारी दुःखी होंगी, उनकी इच्छा थी मेरी गांड से तुम्हारा पानी पीने की.”

“कोई बात नहीं, जब भी हम इसके बारे में निर्णय लेंगे उन्हें पहले पेय के लिए अवश्य आमंत्रित कर लेंगे.” नितिन ने कहा.

“बिल्कुल नहीं. मैं मम्मी से प्लग ले लूँगी जो तुम्हारा पानी गांड में रोक कर रखेगा. घर पर पिला दूंगी. पहली बार गांड मारोगे तब हम अकेले ही रहेंगे. बल्कि मैं आज ही मम्मी से प्लग लेकर अपने पर्स में रख लेती हूँ.”

नितिन ने इस बात पर पारुल के होंठ चूम लिए. पारुल और नितिन के इस समागम को चुदाई कहना अनुचित होगा. वो दो प्रेमियों की रासलीला थी. दोनों जानते थे कि उनका ये समय कितना बहुमूल्य है. अन्य समय वो दूसरों के साथ चुदाई में लीन रहते थे. पर एक दूसरे के साथ अब उनका इस प्रकार से ही मिलन होगा, ये लगभग निश्चित था. हाँ, ऐसा नहीं कि उचित समय पर वे तेज और व्यग्र चुदाई नहीं करेंगे, पर उनका मुख्य आकर्षण इसी प्रकार से सम्भोग के होंगे.

पारुल की जीभ को अपने मुंह में लिए हुए नितिन उसे चूस रहा था. पारुल अपनी जीभ को उसके मुंह में घुमा रही थी और इसी के साथ नितिन का लंड भी पारुल की चूत में अपनी यात्रा में मग्न था. न जाने कितनी देर तक यूँ ही दोनों प्रेमी एक दूसरे से जुड़े रहे. परन्तु शारीरक और प्राकृतिक सीमाओं के कारण अब दोनों उबाल पर आ रहे थे. नितिन ने अब अपनी गति बढ़ाई और पारुल ने उसका साथ देते हुए अपनी कमर को उछालते हुए उसके हर धक्के का साथ दिया. इसी गति से कुछ देर के संसर्ग के बाद जब नितिन को लगा कि वो अब झड़ने वाला है, तो उसने पारुल को बताया. पारुल ने इच्छा जताई कि वो नितिन के रस को पीने की इच्छुक है. नितिन जब झड़ने लगा उसने अपना लंड पारुल को प्रस्तुत किया. पारुल ने उसे मुंह में लेकर चूसना आरम्भ किया ही था कि नितिन के लंड से रस की धार उसके मुंह में गिरने लगीं. पारुल ने एक बून्द भी व्यर्थ न जाने दी. जब उसने नितिन के सम्पूर्ण रस को पी लिया तो उसके लंड को चाटते हुए उसे साफ किया और चूमते हुए नितिन को प्रेम भरी दृष्टि से देखा.

“तुम्हारा हुआ या नहीं?” नितिन ने पारुल से पूछा.

“पूरा नहीं” पारुल ने उत्तर दिया.

ये सुनते ही नितिन नीचे की ओर गया और अपने मुंह से उसे चाटने लगा.

“ये क्या कर रहे हो? पारुल ने आश्चर्य से कहा, क्योंकि अभी नितिन का लंड उसकी चूत से निकले हुए देर नहीं हुई थी.

“अपनी भावी पत्नी का स्वाद ले रहा हूँ, चुदाई के बाद कैसी लगती है. पर मुझे कोई विशेष अंतर नहीं लगा.” नितिन अपने कार्य में जुट गया.

पारुल के लिए ये एकदम नया अनुभव था. उसकी माँ और बुआ उसकी चूत चुदाई के बाद चाटकर कई बार साफ कर चुकी थीं, पर किसी पुरुष ने ये अब तक नहीं किया था. फिर उसने विचार किया कि झड़ा तो नितिन भी नहीं है. उसकी चूत की कुलबुलाहट ने उसे चेतावनी दी कि वो अब झड़ने वाली है. नितिन को बताने से भी नितिन ने अपनी जीभ और मुंह को हटाया नहीं और पारुल के झड़ते ही उसके सारा रस पी किया. पारुल और नितिन फिर आलिंगनबद्ध हो गए और एक दूसरे को चूमते हुए कुछ देर यूँ ही लेटे रहे. फिर उन्होंने कपड़े पहने और बैठक की ओर चल दिए. दोनों ने एक दूसरे का हाथ थामा हुआ था. और उनके बैठक में पहुंचने पर सबने इसे देखा. प्रश्नभरी आँखों ने दोनों को देखा.

नितिन ने कहा, “हम आप लोगों को बाद में कुछ बताना चाहते हैं.”

अनुभवी सुप्रिया और शोनाली समझ गए और एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा पड़े.

*****************

संजना, सुरेखा, सागरिका, समर्थ और जॉय:

संजना के अनूठे स्वाद और सुगंध से अचम्भित समर्थ एक नशे की अवस्था में थे. संजना भी निरंतर उन्हें अपने अमृत से विव्हल कर रही थी. समर्थ अपनी बेटियों का तो अक्षत अमृत नहीं पी पाए थे, परन्तु अपनी नातिन के रस का पान करने में वो कोई कमी नहीं करना चाहते थे. जॉय उनके ही बगल में उनकी छोटी बेटी सुरेखा की चुदाई कर रहा था और समर्थ सुरेखा की बेटी का रस पीने में व्यस्त थे. संजना भी पहले पुरुष संसर्ग से इतनी उत्तेजित थी कि उसका शरीर उसकी भावनाओं के वश में आकर कभी जलता तो कभी ठंडा पड़ जाता.

समर्थ जब अपने घुटनों पर बैठे हुए थक गए तो उन्होंने निणर्य लिया कि आज के लिए अमृत कलश को छोड़ना ही श्रेयस्कर है. संजना की चूत तो बहती नदी के समान अविरल जल का निस्तारण किये जा रही थी. उन्होंने संजना के भग्नाशे को चाटा और अपनी उँगलियों में लेकर हल्के से मसक दिया. यही वो शिखर था जिसे छूने के प्रयास में संजना इतनी देर से व्याकुल थी. उसकी चीख सुनकर सभी सहम गए. सुरेखा तो समझी कि उसके पिता ने संजना को चोद दिया है.

परन्तु स्थिति के आकलन से ज्ञात हुआ कि संजना का कौमार्य सुरक्षित था और वो बुरी तरह से कांप रही थी और समर्थ होनी उँगलियों में लेकर उसके भग्न को मसल रहे थे.

अंततः, संजना शांत पड़ गयी. फिर उसने अपनी आँखों को आधा खोला और धीमे स्वर में कहा, “थैंक यू, नानू।”

समर्थ ने उसकी चूत पर एक चुंबन लिया और सागरिका से पूछा, “कुछ सहायता करूँ क्या, बहू?”

सागरिका ने उनकी ओर देखा और मुस्कुराई, “नाना जी, इसमें पूछने कि कोई आवश्यकता है ही नहीं. सब आपका ही है, जो चाहे ले लीजिये.”

समर्थ खड़े हो गए और उनके विशाल मोटे और लम्बे लंड को देखकर सागरिका के मुंह में पानी आ गया. पर समर्थ अब बहुत देर से अपने लंड को संभाले हुए था तो उसे चुदाई की इच्छा था. उसकी आँखों से झलकती वासना को देखकर सागरिका समझ गयी कि चूसने का अवसर उसे बाद में ही मिलेगा. अब तक परिवार के सदस्य एक एक करके बैठक में जमा हो रहे थे. सबकी आँखें अब जॉय के ऊपर ही थीं जो चुदाई के अपने अंतिम पड़ाव पर था. सुप्रिया, सुमति और पारुल चल रहे चुदाई के खेल को देखते रहे पर कुछ बोले नहीं. पारुल और नितिन अभी भी कपड़े पहने थे और एक दूसरे का हाथ पकड़े थे. सुमति ने देखा कि किसी की गांड नहीं मारी जा रही तो कुछ उदास सी हो गयी. पर समर्थ ने उसके भावों को पढ़ लिया. सागरिका उसके लंड पर आँखें गढ़ाए थी.

समर्थ: “बहू, मैं तुम्हारी बुआ के लिए कुछ। …”

समर्थ की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि सागरिका झट से घोड़ी के आसन में आ गयी और अपनी गांड हिलाकर समर्थ को ललचाने लगी. समर्थ ने आव देखा न ताव उसके पीछे जाकर उसकी गांड में अपना लंड पेल दिया. लौड़ा सागरिका की गांड में गया, पर दर्द निखिल को हुई. पर उसने अपनी भांवनाओं को संयत किया और समर्थ द्वारा अपनी भावी पत्नी की गांड मारते देखने लगा. सुप्रिया ने संजना के पास जाकर उसे उठाया और फिर सोफे पर बैठा दिया. उसकी आँखों में अभी भी एक नशा सा था. सुप्रिया ने उसे पानी लेकर दिया.

पानी पीकर संजना बोली, “नानू सच में बहुत अच्छे है,”

सुप्रिया ने मुस्कुराते हुए उसे अपने सीने से लगा लिया. “तुम भी बहुत अच्छी हो, वेरी वेरी स्वीट.”

जॉय झड़ रहा था और सुरेखा उसके वीर्य को अपनी चूत में सहेजने का प्रयास कर रही थी. जब जॉय अपने रस से उसकी चूत को भर चुका तो वो एक और हट के खड़ा हो गया, और फिर सोफे पर ढह गया. और कोई समय होता तो पारुल अपने पिता का रस चाटने में देर न लगती. पर आज कुछ अंतर था. इसीलिए वो खड़ी रही. सुमति का ध्यान सागरिका की गांड में चल रहे समर्थ के लंड पर था और उससे ये आशा करना कि वो सुरेखा को चाटेगी व्यर्थ था. सुप्रिया ने ये कार्य अपने ऊपर लिया.

सुरेखा की चूत के आगे झुकते हुए उसने उसे चाटते हुए पूरा साफ कर दिया. फिर अपनी जीभ से उसके अंदर बचे हुए वीर्य को भी खींचकर पी किया. सुरेखा अब धीरे धीरे सामान्य हो रही थी. उसने आँख खोली तो देखा कि उसके बच्चे सजल और संजना भी उसे ही देख रहे हैं. उसे कुछ क्षण के लिए शर्म आयी, पर जब देखा कि वो दोनों भी नंगे ही हैं, तो उसने एक संतुष्ट मुस्कुराहट के साथ अपनी आँखें बंद कर लीं और सुप्रिया को उसकी चूत को चाटकर साफ करने के लिए छोड़ दिया.

निखिल ने नितिन और सुमति को देखा. जहाँ सुमति की आँखों में उसे एक भूख दिखाई दी, जो अवश्य ही उसकी भावी पत्नी की गांड से रस पीने के लिए थी, उसे नितिन को देखकर आश्चर्य हुआ. उसने पारुल का हाथ जोर से पकड़ा हुआ था, जैसे छोड़ने वाला न हो. पर उसकी आँखें उनकी माँ सुप्रिया पर थीं जो अब उनकी मौसी की चूत साफ करके हटी थीं. निखिल मुस्कुराया. प्रेम हो या नहीं, ये मादरचोद का मादरचोद ही रहेगा।

समर्थ के मुंह से अब जो ध्वनि आ रही थी, उसे सुनकर सभी ने ये अनुमान लगा लिया कि उसका पानी अब छूटने ही वाला है. सुमति की आँखें चमक रही थीं. और उसकी जीभ लपलपा रही थी. और जब समर्थ ने एक हुंकार के साथ अपना रस सुमति की गांड में गिराया तो सुमति तुरंत उनके पास जा पहुंची. हालाँकि गांड में कुछ देर तक पका हुआ माल उसे अधिक स्वादिष्ट लगता था, परन्तु गर्मागर्म माल खाने का ये स्वर्णिम अवसर वो कैसे छोड़ सकती थी. समर्थ ने उसे देखा और फिर झड़ने के बाद अपने लंड को सागरिका की गांड से निकाल कर सुमति के मुंह के आगे कर दिया. सुमति ने उसके लंड को चाटकर साफ तो किया पर उसकी आंखें सागरिका की गांड पर टिकी रहीं. वो तो अच्छा हुआ कि गांड से रस बाहर नहीं बहा अन्यथा सुमति क्या करती बताना सम्भव नहीं है.

समर्थ के लंड को चाटने के बाद सुमति के अपने होंठ सागरिका की गांड पर लगा दिया और खींच खींच कर उसे खाली करने लगी. सागरिका अपनी बुआ के इस व्यसन से भली भांति परिचित थी, पर इस प्रक्रिया से उसे गांड में गुदगुदी हो रही थी इसीलिए वो हंसने लगी. सुमति ने अपने खुराक लेने के बाद सिर उठाया तो देखा कि सब उसे ही देख रहे है. पर उनकी आँखों में उसे प्यार के सिवाय और कुछ न दिखा. उसने अपने होंठ चाटे और जाकर सोफे पर बैठ गयी.

अब पार्थ द्वारा मंत्रीजी के रिसोर्ट की सम्पूर्ण कथा को सुनने का समय था.

*******************

पार्थ द्वारा मंत्रीजी के रिसोर्ट की कथा:

समस्त परिवारगण पार्थ के अनुभव का श्रवण कर रहे थे. पार्थ ने जो बताया उसे सुनकर उनके आश्चर्य की कोई सीमा ही नहीं रही. उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि इस देश में ऐसा भी कुछ सम्भव है. पर जब समर्थ ने उन्हें याद दिलाया कि पार्थ का दिंची क्लब स्वयं इसका उदाहरण है तो उन्हें विश्चास हो ही गया.

पार्थ ने बताना आरम्भ किया.

रूचि और मुझे एक ही कार में ले जाया गया था. और हम दोनों उनके ही बंगले पर रुके थे. उस रिसोर्ट में उनका बंगला या महल है, जिसे हर प्रकार से सुरक्षित किया गया है. उनके सरकारी सुरक्षा कर्मी उस बंगले के एक गेट पर ही पहरा देते हैं और उन्हें भी अंदर आने की अनुमति नहीं है. इसका अर्थ ये है कि उन्हें भी उनके क्रियाकलापों का ज्ञान नहीं है. अंदर उनकी अपने सुरक्षाकर्मी रहते हैं और दूसरा गेट रिसोर्ट में खुलता है. उनकी अनुमति के बिना रिसोर्ट के मैनेजर इवान स्टोन भी वहां नहीं आ सकते.

किसी ने कभी स्वप्न में भी ये कल्पना नहीं की थी कि उक्त मंत्री इस प्रकार का व्यभिचारी भी हो सकता है. यही नहीं उसने इस सबके लिए एक रिसोर्ट भी बनाया है जिसमे अन्य प्रसिद्द और मान्य व्यक्तिगण भी सम्मिलित थे. कुछ लोगों के बारे में जानकर उन्हें और भी अधिक अचरज हुआ. सच में हाथी के दाँत दिखाने के और तथा खाने के और होते हैं. जिनके बारे में पार्थ ने बताया था उन पर तो यही चरितार्थ होता था. पर इन दोनों परिवारों के बारे में भी यही कहा जा सकता था. किसे पता था कि बाहर के समाज में सौम्य और चरित्रवान बने ये सभी अंदर से किस प्रकार से लिप्त हैं.

मंत्रीजी जिन्हें सभी नेताजी कहते हैं अपनी सुरक्षा के साथ अपने परिवार के साथ हमारे आगे जा रहे थे. मैं और रूचि अपनी गाड़ी में उनके पीछे थे. हमारे पीछे केके का परिवार था. और उनके पीछे हमारे क्लब के नौ रोमियो दो गाड़ियों में थे. इस लम्बी पंक्ति में हम सभी लगभग दो बजे नेताजी के रिसोर्ट पर पहुंचे थे. हमारी जाँच के बाद हम सभी को नेताजी के बंगले में जाने की अनुमति मिली. अंदर जाने के बाद उस बंगले की विराटता देखकर ही मन प्रफुल्लित हो गया. नेताजी की पत्नी शिखा और पुत्री मनीषा अपने कमरे में चले गए. रूचि और मुझे एक कमरा दिया गया था जिसमे हमें पहुंचाया गया. केके अपनी पति और बेटे के साथ एक कमरे में चले गए थे. कुछ देर में हम सब नहा धोकर उनकी बैठक में पहुंच गए. नेताजी की सेवा में रिसोर्ट की लड़कियाँ और लड़के लगे हुए थे. वे एक बहुत ही मासूम दिखने वाली लड़की को कुछ समझा रहे थे.

“और तुम उसकी बेटी का पात्र निभाओगी. इसके आगे की बात तुम जाकर केके से समझ लो. बस ये जानो कि मैंने तुम्हारी विकृति के अनुसार ही तुम्हें उनके लिए चुना है. मुझे निराश मत करना.”

“नहीं, सर. आप जानते हैं कि इस प्रकार की भूमिका मैं कितने अच्छे से निभाती हूँ. और अगर वो ऐसे प्रसिद्ध लोगों के साथ हो तो सोने पर सुहागा. मैं आपका धन्यवाद करना चाहूँगी.”

“उसके भी तुम्हें अवसर मिलेगा अगर तुम अपने काम में सफल हुईं और वे प्रसन्न हुए. अब तुम जाकर केके से मिलो और उससे समझो कि तुमसे क्या अपेक्षा है.” नेताजी ने उसे जाने के लिए संकेत किया.

नेताजी की पत्नी शिखा और बेटी मनीषा इस समय तक बैठक में आ चुकी थीं और दोनों निर्वस्त्र थीं. रूचि और मैं अभी अपने कपड़े पहने हुए थे.

शिखा: “पार्थ और रूचि. आप दोनों को इस वर्ष की पोशाक का बताया गया था, तो आप भी जाकर उचित प्रकार से लौटें.”

उनके कथन में निवेदन कम और आज्ञा अधिक थी. रूचि और मैं अपने कमरे में गए और नंगे होकर बैठक में लौट आये. अब तक नेताजी भी नंगे हो चुके थे और मनीषा उनकी गोद में बैठी हुई थी.

नेताजी: “पार्थ और रूचि को मुझसे कुछ व्यवसाय संबंधित बातें करनी हैं, तो हम तीनों मेरे ऑफिस में जा रहे हैं. मनीषा तुम जाकर केके को पूछो अगर उन्हें कुछ चाहिए. शिखा आप जाकर रूचि के रोमियो से मिलें और उन्हें एक बार फिर रिसोर्ट के नियम समझा दें. लड़के हैं, कोई कोताही न कर बैठें।”

पार्थ: “नेताजी, मैंने उन्हें सब कुछ समझा दिया है.”

नेताजी: “कोई बात नहीं, शिखा फिर से एक बार समझा देगी.”

नेताजी के साथ रूचि और मैं ऑफिस में गए और लगभग एक घंटे के विचार विमर्श के बाद हम एक सहमति पर पहुंचे. इसके बाद नेताजी ने एक सहमतिपत्र बनाया जिस पर हम तीनों से हस्ताक्षर किये.

नेताजी: “इसका अनुबंध शिखा के नाम से बनाया जायेगा. उसके पूरे होने के बाद आपको देने के लिए वो स्वयं ही आएगी, क्योंकि लिखित पत्र है और मैं इसे किसी और माध्यम से नहीं भेज सकता.”

रूचि: “अगर ऐसा है तो वो मेरे घर पर ही आएं जिससे कोई अफवाह भी नहीं उठेगी.”

नेताजी: “आपकी सुझाव उचित है. आप शिखा को अपने घर का पता दे दीजिएगा. चलिए अब देखें क्या कुछ चल रहा है.”

तभी नेताजी का फोन बजा और बताया गया कि रिसोर्ट के मैनेजर इवान स्टोन आये हैं.

नेताजी: “मेरे रिसोर्ट के मैनेजर इवान आ रहे हैं. मैं उनसे आपको मिलता हूँ और हमारे अनुबंध के बारे में बताता हूँ. उन्हें अधिक विस्तार में मैं आगे उन्हें रात में समझा दूंगा.”

इसके बाद हम बैठक में गए और इवान से मिले. इवान से बातें करने के बाद जब हम चलने को हुए तो इवान केके से मिलने का इच्छुक दिखा. नेताजी ने तो कुछ नहीं कहा पर बाद में पता लगा कि शिखा ने उसे समझाया था. जो उसने देखा उसे देखकर उसके मन में केके और उसके पति के लिए कोई भी आदर था वो समाप्त हो गया. रूचि ने भी उसे समझाया था. रूचि को कैसे पता था कि क्या हुआ है वो मुझे नहीं पता, पर उसने उस रात मुझे बताया। मुझे इसमें कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि मैं क्लब में केके के कारनामे देख चुका था. हाँ मुझे उस मासूम दिखने वाली लड़की पर अवश्य अचरज हुआ कि नेताजी ने उसे इसीलिए चुना था क्योंकि वो इस प्रकार के खेलों में निपुण थी.

जब हम रेस्त्रां पहुंचे तो मेरी भेंट डेविड के परिवार से हुई, जैसा कि मैंने आपको बताया था. मुझे इस बात पर सुखद आश्चर्य हुआ कि हमारे आठ घरों के छोटे से द्वीप में चार परिवार हमारी ही जीवन शैली में लिप्त हैं. डेविड को विश्वास दिलाकर कि उन्हें हमसे कोई डर नहीं है, मैं और रूचि एक ओर बैठकर चल रही गतिविधियों को देखते रहे. ये साफ दिख रहा था कि ये रिसोर्ट सदस्यों की सभी विकृतियों को पूरा करने का माध्यम है. जो परिवार या लोग हमारे सामने शीशे के समान साफ दिखते हैं, उनके अंदर कितना मैल है ये देखकर आश्चर्य भी हुआ दुःख भी.

एक प्रसिद्ध समाज सेविका जो नैतिक मूल्यों के लिए कई भाषण दे चुकी है, एक प्रसिद्ध डॉक्टर जिनको जीवनदाता माना जाता है, एक मुख्य व्यवसाई जिनके सच्चाई और स्वच्छ व्यक्तित्व को अनूठा समझा जाता है. इसी प्रकार से अन्य लोग जो आये थे सभी अपने व्यवसाय में अग्रणी थे. पर वहाँ न किसी के शरीर पर कोई वस्त्र था, न चेहरे पर कोई मुखौटा. ये भी दिख रहा था कि वे सब किसी न किसी प्रकार से नेताजी के ऋणी थे. पर उनमे से कोई भी किसी भी सरकारी पद पर नहीं था. नेताजी ने चुन चुन कर अपने इस समूह को बनाया था. पार्थ कुछ देर के लिए रुका और सजल ने उसे ग्लास में ड्रिंक थमा दी. इससे पहले कि वो कुछ बोलता शोनाली बोल पड़ी.

“मैं अभी मिशेल से मिलने गयी थी. उसे भी बहुत ख़ुशी हुई मुझसे मिलकर. हमने मिलकर एक पार्टी करने का निश्चय किया है. देखना ये है कि माँ बाबूजी के जाने के पहले सम्भव होगी या नहीं.”

“पार्थ.” ये समर्थ थे जिन्हें पार्थ के कुछ भावुक होने का आभास हो रहा था. “कौन अपने जीवन को किस प्रकार से जीता है, इसपर टिप्पणी करना या कोई विचार बनाना गलत है. समाज की कई सीमाएं हैं, परन्तु वे सामाजिक परिवेश को प्रदूषण से बचाने के लिए हैं. हमारे परिवार में जो हम कर रहे हैं, इससे समाज के किसी भी और व्यक्ति पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं है. इसी प्रकार से अगर वहाँ आये लोग अपने अंतर की वासना को इस रूप में पूरा करते हैं तो समाज पर कोई अंतर नहीं पड़ता. क्या वो समाज सेविका, या डॉक्टर या व्यवसाई अपने कार्यों में किसी प्रकार से भी कमी करते हैं, क्या उन्होंने किसी की हानि की है? अगर तुम्हें उनके ऊपर क्रोध है तो हम सब पर क्यों नहीं. यहाँ हम सबको देखकर बताओ कि हम उनसे किस प्रकार से भिन्न हैं, और अगर नहीं तो तुम्हारी भावनाएं उनके और हमारे प्रति भिन्न क्यों हैं?”

पार्थ अपनी ड्रिंक पीते हुए समर्थ की बात पर चिंतन करता रहा.

“आप सच कह रहे हैं नानाजी. मैं समझ गया.” पार्थ ने कहा, “नहीं तो मेरा तो सन्यास ही आरम्भ हो जायेगा.”

सब हंस पड़े और पार्थ ने ड्रिंक समाप्त करते हुए आगे की कथा सुनाना आरम्भ किया. सजल उठकर उसके ग्लास को फिर भर लाया. खाने के बाद परिवार एक दूसरे को आमंत्रित कर रहे थे, कुछ पूरे परिवार आमंत्रित थे पर अधिकांश में चुने हुए लोग ही थे. सम्भवतः इस प्रकार का आयोजन बुरा नहीं माना जाता था क्योंकि किसी ने इस पर आपत्ति नहीं की थी. हमें बाद में समझ में आया कि अधिकांश आमंत्रण लड़को और लड़कियों को ही दिए गए थे. और रिसोर्ट ने उनके बदले में अपने लड़कों और लड़कियों को निर्धारित किया था. मतलब अगर किसी परिवार का एक लड़का अकेला आमंत्रित किया गया था तो उस परिवार को रिसोर्ट से अन्य लड़के को लेने की छूट थी. इसके बाद भी अगर कोई रिसोर्ट का लड़का या लड़की बचते थे तो वो अपने मन से किसी भी परिवार के साथ जा सकते थे.

मुझे भी आमंत्रण मिला था, परन्तु मैं और रूचि कुछ चर्चा करना चाहते थे और इसीलिए मैंने उसे स्वीकार नहीं किया था. रूचि ने मुझे इस बात के लिए छेड़ा था, पर अधिक कुछ नहीं कहा था. कुल मिलाकर सोलह परिवार थे, इसमें इवान और नेताजी का परिवार भी सम्मिलित था. शिखाजी और डेविड डॉक्टर परिवार में आमंत्रित हुए थे. डॉक्टर की पुत्री को जैसन ने आमंत्रित किया था. डॉक्टर साहब की पत्नी और बेटे को भी आमंत्रण था पर उन्होंने बाद में आने के लिए कहा था. मिशेल ने इवान के साथ जाने की इच्छा की थी और उसे हेलेन ने सहर्ष स्वीकार किया था. कुल मिलाकर सभी एक दूसरे के साथ मिल कर चुदाई करने वाले थे. एक से अधिक परिवारों में भी निमंत्रण थे. मुझे तो समझ ही नहीं पड़ा कि वे ये सब कैसे संभालेंगे. फिर इसके बारे में चिंता न करते हुए हम अपने कमरे में चले गए.

अगले दिन सुबह इवान से जब चर्चा हुई तो उसने हमें अपना cctv वाला कमरा दिखाया और ये भी बताया कि सभी प्रसंग रिकॉर्ड किये गए थे और हम चाहें तो उन्हें अपने कमरे में टीवी पर देख सकते हैं. उसने हमें उन्हें देखने की प्रक्रिया बताई. हमें एक पासवर्ड भी दिया गया. फिर शेष रिसोर्ट के बारे में भी बताया गया.

इवान: “मेरी कल जो नेताजी से बात हुई है उनका सदा से मानना था कि हमारे आयोजनों में अधिकांश लड़कों की कमी हो जाती है. महिलाएं यहाँ आने पर नए नए प्रयोग करना चाहती हैं जो हर बार सम्भव नहीं होता. इस प्रकार के अनुबंध से हमारे लिए ये सम्भव हो सकेगा. जहां तक लड़कियों की कमी का प्रश्न है, तो उसके लिए अभी कोई विशेष आवश्यकता नहीं जान पड़ती है क्योंकि हमारे रिसोर्ट की लड़कियाँ ही नब्बे प्रितशत से अधिक अनुरोध संभाल पाती हैं. मैं ये बता दूँ कि अधिकतर परिवार में ये महिलाओं पर केंद्रित अधिक है क्योंकि उन्हें समाज में अधिक सजग रहना होता है. मेरे विचार से इसीलिए आपके क्लब से ये अनुबंध हम सबके लिए बहुत लाभदायी सिद्ध होगा.”

इसके बाद इवान ने हमे नाश्ता करवाया और फिर हम अपने कमरे में चले आये. सुबह के समय पूरा रिसोर्ट सूना पड़ा था. रात भर चुदाई में संलग्न लोग अभी तक सोये पड़े थे. हम अपने कमरे में गए तो रूचि ने कल की रिकॉर्डिंग देखने की इच्छा व्यक्त की. हमने पासवर्ड का प्रयोग करते हुए इवान द्वारा दिए निर्देशों के अनुसार उनका चैनल लगाया तो हमारे घर के समान अलग अलग कमरों के दृश्य दिखे. रूचि ने रिमोट मेरे हाथ से लिया और सबसे पहले समाज सेविका के कमरे पर केंद्रित कर दिया.

अनुपमा और उसके पति रोहित के कमरे में उनकी पुत्री नहीं थी जो किसी और के कमरे में गयी हुई थी. रिसोर्ट की एक बाला उनके कमरे में थी. वो लड़की अंजलि की चूत चाट रही थी और रोहित उस लड़की के पीछे से उसकी चुदाई कर रहे थे. ये बताना सम्भव नहीं कि उनका लंड चूत में था या गांड में. कुछ देर ये देखने के बाद रूचि ने चैनल बदल दिया। रूचि यही कर रही थीं, चार पांच मिनट के लिए एक कमरे में चल रहे दृश्य को देखतीं और फिर बदल देतीं. मुझे समझ नहीं आया कि वे चाहती क्या थीं. मेरे पूछने पर उसने कहा कि कुछ नया. ये सब तो देखा हुआ है.

मुझे आश्चर्य हुआ कि ऐसा क्या ढूँढ रही है जो देखा न हो, पर मैंने कुछ न पूछने का निश्चय किया. अचानक उसने एक चैनल पर लगाया जिसमे शिखा थी. ये डॉक्टर का कमरा था और डॉक्टर की पत्नी कोमल, डॉक्टर, उनका बेटा रमन और डेविड थे. पर रूचि इस चैनल पर रुक गयी. और मेरे सीने में सिमटते हुए बोली कि आज मुझे यही देखना है. मैंने कोई टिप्पणी नहीं की.

“शिखा मेरे घर पर आने वाली हैं, अनुबंध के साथ, तो मैं जानना चाहती हूँ कि उनकी किस प्रकार से आवभगत करनी चाहिए. अगर शिखा हमसे प्रसन्न रहेगी तो नेताजी भी रहेंगे और कभी कभार अगर कोई उलझन आयी तो सरलता से संभाल ली जाएगी.”

रूचि की बात मुझे भी सही लगी और हम दोनों उस कमरे में चल रहे दृश्य को आगे के लिए देखने लगे. बस एक ही कमी थी इन वीडियो में, वो ये कि इनमें वीडियो मात्र था, कौन क्या कह रहा था ये नहीं पता चल रहा था. और हर कमरे में कवल दो ही कैमरे थे जिसके कारण दृष्टिकोण सीमित था. पर जानने समझने के लिए पर्याप्त था. शिखा और कोमल एक दूसरे के साथ 69 के आसन में थीं और चूत चाटने में व्यस्त थीं. तीनों पुरुष एक ओर थे और कुछ पी रहे थे. उन तीनों के लंड भी खड़े हुए थे और देखने से अच्छे नाप के प्रतीत हो रहे थे. शिखा ऊपर थी और उसने डॉक्टर को देखा और तीनों लौडों पर आँख दौड़ाई. फिर उसने अपना चेहरा कोमल की चूत में डाल दिया.

रूचि क्या देखना चाहती थीं ये मुझे समझ में नहीं आया. मैं उसके साथ देखता रहा. कुछ देर बाद शिखा ने अपना चेहरा उठाया तो वो पूरा गीला था. अपने होंठों पर जीभ फेरते हुए उसने कुछ कहा. फिर उसने तीनों पुरुषों को पास बुलाया. कोई दो दो मिनट तक उसने तीनों के लंड चाटे और फिर उनसे कुछ कहा और वहाँ से हटकर एक सोफे पर बैठ गयी. उसने अपनी उँगलियों से अपनी चूत को छेड़ने में अधिक देर नहीं की. मेरे विचार से वो कोमल की चुदाई देखना चाहती थी.

कोमल के पति ने उससे कुछ पूछा और फिर डेविड और रमन से कुछ कहा. रमन से डेविड की ओर देखकर कुछ पूछा फिर अपने पिता को उत्तर दिया. रमन बिस्तर पर लेट गया और डॉक्टर ने अपनी पत्नी को सहारा देते हुए अपने बेटे के लंड पर बैठा दिया. कोमल अपने बेटे के लंड पर कुछ देर उछली और जब उसे लगा कि लंड अब सही प्रकार से जम गया है तो रुक गयी और डॉक्टर से कुछ कहा. डॉक्टर ने आगे जाकर अपने लंड को उसके मुंह में दे दिया. अचानक देखा तो शिखा खड़ी हुई और उसने एक टेबल के अंदर से कुछ निकाला। ये एक अच्छा लम्बा डिल्डो था. शिखा ने अब उसे डिल्डो से अपनी चूत को चोदना आरम्भ किया.

डेविड कोमल की पीछे गया और हमने उसके लंड को कोमल की गांड में गुम होते देखा. इसके बाद तीनों ने कोमल की लम्बे समय तक चुदाई की और फिर उसके तीनों छेदों में अपना रस भर दिया. शिखा ने उठकर कोमल की चूत से रस को चूसा और फिर कोमल के साथ उसे बाँटा, यही प्रक्रिया उसने कोमल की गांड से बहते हुए रस के साथ भी की. डॉक्टर का तो लंड साफ ही था, शिखा ने अन्य दोनों को साफ किया और फिर कोमल को उठाकर सोफे पर बैठा दिया. कोमल वहीं ढुलक गयी.

शिखा ने तीनों से कुछ पूछा और हमने यही समझा कि वो उनसे उसकी चुदाई के बारे में बात कर रही थी. पर रूचि ने टीवी को बंद कर दिया.

“जब शिखा मुझे अनुबंध देने आये तो तुम्हें क्लब से रोमियो भेजने होंगे. उसे अतृप्त तो नहीं भेज सकते.”

इसके बाद हमने चुदाई की और हम सो गए क्योंकि अगला दिन बहुत महत्वपूर्ण था.

*****************

अगले दिन जब हम उठे तो नहाने के बाद नाश्ते के लिए रेस्त्रां गए. रिसोर्ट में कोई भी नहीं दिखा. रेस्त्रां में हम दोनों ही थे और हमने शांति से खाया और अपने कमरे में लौट गए. दस बजे मैं और रूचि को लेने के लिए इवान आया और हमें उस स्थान पर ले गया जहाँ केके का शो था. अच्छा बड़ा सा हॉल था और एक स्टेज भी था. समस्या थी कि किस प्रकार से सारी सजावट और सेट को लगाया जाये. इसका उपाय इवान ने ही बताया. उसने बताया कि सभी लोगो को कमरे में ही रहने के लिए कहा गया है दो बजे तक. तब तक हमें अपना सारा कार्य समाप्त करना होगा. इस अवधि में सब सामान्य वस्त्रों में रहेंगे.

साढ़े दस बजे के आसपास सेट लगाने वाले आ गए और उन्हें अत्यंत गुप्त रूप से अंदर लाया गया और इस पर विशेष ध्यान दिया गया कि वे इधर उधर न जाएँ न देखें. इसमें CCTV का महत्वपूर्ण योगदान था. उन्होंने ढाई घंटे में ही अपना काम समाप्त किया और उन्हें अगले दिन शाम को आने के लिए कहा गया, जब रिसोर्ट खाली हो चुका होगा. इसके बाद इवान ने कण्ट्रोल रूम में बताया।

इवान: “अब सभी को अपने प्राकृतिक अवस्था में आने के लिए कह दिया है. हम सब भी अपने कमरों में जाकर कपड़े निकालकर रेस्त्रां में मिलते हैं. शाम पाँच बजे से अन्य कार्यक्रम आरम्भ होंगे. केके का शो आठ बजे के आसपास होगा. अन्य कार्यक्रम उसके बाद भी चलते रहेंगे. साढ़े ग्यारह बजे से इस वर्ष की विदाई और नए वर्ष की स्वागत का आयोजन है. तो हम कुछ ही देर में मिलते हैं.”

इसके बाद हम सब अपने कमरे में जाकर नंगे होकर रेस्त्रां में पहुंचे जो पूरा भरा हुआ था. कई लोग जो नाश्ता नहीं कर पाए थे भोजन पर जुटे हुए थे. एक अत्यंत उन्मुक्त वातावरण था. डेविड का परिवार भी अब अन्य लोगों से मिलकर बातों में व्यस्त था. डेविड ने मुझे बताया कि रिचर्ड की नेताजी से चर्चा बहुत लाभकारी रही और उसका पूरा परिवार बहुत प्रसन्न है. मैंने अधिक जानने का प्रयास नहीं किया.

मिशेल आंटी मेरे पास आयीं और कहने लगीं “कल तुम कहाँ थे?

पार्थ: “मैं और रूचि जल्दी सोने चले गए थे.”

मिशेल: “आज हमारे लिए कुछ समय निकाल पाओगे?”

मैंने उनके कान में कहा, “आज तो नहीं, पर बाद में अवश्य. आज दूसरे फल खाने का अवसर जो मिला है.”

मिशेल: “नॉटी बॉय. पर मैं समझ सकती हूँ. ठीक है. हम बाद में वहीं मिलते हैं.”

इसके बाद अन्य महिलाएं भी आकर मुझसे मिलती रहीं और कई पुरुष आकर रूचि पर डोरे डालते रहे. हमारे लिए आज रात साथियों की कोई कमी न थी. खाने के बाद तीन बजे सभी अपने कमरों में चले गए. आज की रात लम्बी थी और सभी उसके लिए विश्राम करना चाहते थे. आज नेताजी नहीं आये थे. न ही शिखा और मनीषा। वे अपने कमरे में ही खाना खा रहे होंगे केके के परिवार के साथ. हमारे रोमियो भी नहीं आये थे. हम भी आकर सो गए और साढ़े चार बजे ही उठे.

पाँच बजे के पहले हम दोनों हॉल में पहुंच गए, जहाँ इवान ने हमारा स्वागत किया और सामने की दो सीटों पर बैठने के लिए आमंत्रित किया. अन्य अथिति भी आने लगे थे. कुछ ही देर में हॉल में सभी लोग आ गए. रिसोर्ट के अन्य कर्मी भी आ गए. और हॉल को बंद कर दिया गया. नेताजी और उनका परिवार भी आगे की सीटों पर ही बैठा हुआ था. हॉल की बत्तियां धीमी कर दी गयीं और इवान और हेलेन स्टेज पर पहुंचे. मैं और रूचि विस्मयता से देख रहे थे कि आगे क्या होना है.

कार्यक्रम अब आरम्भ होने वाला था.

क्रमशः

1198900
 
अध्याय ३३: आठवाँ घर - स्मिता और विक्रम शेट्टी ४

**********************


मेहुल का कमरा:

मेहुल फोन पर सचिन से बात कर रहा था.

सचिन: “तुम्हारा क्लब में तीन दिन बाद ग्यारह बजे का समय निश्चित हुआ है. संचालिका जी तुम्हारी चुदाई की पारंगतता की परीक्षा लेंगी. उसके पहले तुम जाकर अपने टेस्ट करवा लो जिससे ये पता चल जाये कि कोई यौन रोग तो नहीं है. ये आवश्यक है.” सचिन ने जानकर संचालिका का नाम नहीं बताया.

मेहुल: “पर तुम तो देख चुके हो.”

सचिन: “यही नियम है. तुम्हें दो घंटे से कम में उनकी मुंह, चूत और गांड में अपना रस छोड़ना है. और ये उनकी संतुष्टि के अनुसार होना चाहिए. अगर उत्तीर्ण हुए तो फिर तुम्हें अनगिनत महिलाओं को चोदने के अवसर मिलेंगे, मेरी माँ को भी.”

इतने में श्रेया आ गई.

“भाभी, आप?”

“आज के लिए याद है न? मैं अभी आती हूँ, या तुम मेरे कमरे में आओगे?”

“भाभी, मैं ही आ जाऊँगा।”

“ठीक है आधे घंटे बाद. देर मत करना. और हो सकता है हम खाना देर से करें, तो तुम्हें कोई कठिनाई तो नहीं होगी?”

“भाभी, आपके साथ के लिए तो मैं दस दिन भी व्रत रख सकता हूँ.”

“मेरा प्यारा प्यारा बच्चा.” श्रेया ने भावुक होकर मेहुल का माथा चूमा. “अब चलती हूँ.”

“ओके, भाभी, मैं आधे घंटे में आता हूँ.”

सचिन: “कौन था?”

मेहुल: “मेरी भाभी, आज इनकी चुदाई करनी है.”

सचिन: तो क्या कोई समय सारिणी बनी हुई है?”

मेहुल: “ऐसा नहीं है, समय आने पर बता दूंगा.”

इसके बाद सचिन ने क्लब के नियमों से उसे परिचित कराया. फिर दोनों ने फोन रख दिया. मेहुल बाथरूम में गया और नहाकर श्रेया के कमरे में जाने लगा. घड़ी देखकर मेहुल श्रेया के कमरे के लिए चल पड़ा. स्मिता ने उसे देखा और बुलाया.

“देख तुझे बहुत प्यार करती है, तू भी उसे प्यार से ही चोदना। ठीक है न?”

“माँ मैं जानता हूँ. आप बिलकुल चिंता न करो. उन्हें भी मैं वही प्यार दूँगा जिसकी वे योग्य हैं.”

***********

श्रेया का कमरा:

ये कहने के बाद मेहुल श्रेया के कमरे में चला गया. श्रेया भी अभी नहाकर ही निकली थी और ड्रेसिंग टेबल पर बैठी अपने बाल सँवार रही थी. उसका सुंदर शरीर नहाने के बाद और भी लुभावना लग रहा था. मेहुल ठगा सा खड़ा हुआ अपनी भाभी के अप्रतिम सौंदर्य को निहार रहा था. श्रेया ने जान तो लिया था कि मेहुल क्या कर रहा है, पर कुछ बोली नहीं. बाल बनाने के बाद वो अचानक से मुड़ी तो उसके तेजस्वी मुखमण्डल देखकर मेहुल के मन में तार बज उठे.

“आ गया मेरा बच्चा?” श्रेया जब अधिक दुलार के मूड में रहती तो उसे यूँ ही पुकारती थी. मेहुल भी जानता था कि उसकी इस उपाधि में वैमनस्व तनिक भी न था, बल्कि प्रेम की असीम थाह थी. न जाने दोनों बहनों में इतना अंतर क्यों है. मेहुल ने मन में सोचा.

“उधर सोफे पर बैठ. मैं बस आई.”

मेहुल जाकर बैठा और कुछ ही देर में श्रेया आकर उसके साथ बैठ गई.

“तुझसे कुछ बातें भी करनी हैं.” श्रेया ने कहा.

“बोलो भाभी.”

श्रेया ने एक गहरी श्वास भरी, “ देख मेरी बात बुरी लगे तो मुझे सीधे बोल देना. मन में मत रखना. तुझे मेरी कसम.”

“इसकी कोई आवश्यकता नहीं भाभी. मैंने आपसे कभी अपने मन की बात नहीं छुपाई है.”

“तो ये बता कि तू स्नेहा को इतना चाहता है, उसके आगे पीछे घूमता है. उससे विवाह करना चाहता है या?”

“नहीं. विवाह के बारे में तो मैंने कभी सोचा ही नहीं. केवल वही है जो मुझे भोंदू समझती है इसीलिए मैं उसे बताना चाहता हूँ कि मैं वैसा नहीं हूँ.”

श्रेया के मन से ये बोझ उतर गया कि स्नेहा के अन्यत्र विवाह से मेहुल को ठेस नहीं पहुंचेगी.

“अब तो दो चार दिन बाद उसके साथ तेरा मिलाप है ही. तब मन भरकर ढेर सारी बातें कर लेना.”

“जी भाभी.”

“मम्मी जी तेरी बड़ी प्रशंसा कर रही थीं.”

“कौन सी?” मेहुल ने सावधानी से पूछा.

“दोनों, तेरी मम्मी जी भी और मेरी भी. तूने दोनों का मन मोह लिया. तो भाभी को भी वही सुख देगा?”

“भाभी आप जो कहेंगी, आपके लिए सब करूँगा। बस एक बार कह तो दीजिये.”

“ओह मेरा बच्चा.” श्रेया ने उसका माथा चूमा. “तुझे पता है न हम आज यहाँ क्यों साथ हैं?”

“जी भाभी.”

“हम्म्म, तो अपनी भाभी की बात मानेगा?”

“आप जानती हो कि मैं आपकी कोई बात नहीं टालता.”

श्रेया खड़ी हो गई और मेहुल की ओर देखकर बोली, “मेरी मन से चुदाई करना. तेरा प्रेम मुझे अनुभव होना चाहिए.”

मेहुल भी खड़ा हुआ और श्रेया को अपनी बाँहों में समेटते हुए बोला, “भाभी, आपके साथ मैं केवल प्रेम ही कर सकता हूँ.”

श्रेया ने इस बार मेहुल के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसका माथा चूमा, फिर आँखें और फिर अंत में होंठ. होंठ मिलते ही दोनों के शरीर में मानो बिजली सी कौंध गई. ये चुंबन जो केवल आत्मीयता दर्शाने के लिए आरम्भ हुआ था अब प्रगाढ़ हो चला था. मानो दोनों एक दूसरे के होंठ चबा जाना चाहते थे. मुंह खुले और लपलपाती जीभें एक दूसरे से स्पर्धा में जुट गईं. श्रेया ने ही अंत में इस बांध को रोका. हाँफते हुए उसने मेहुल का हाथ पकड़ा और उसे बिस्तर की ओर ले गई. मेहुल को बिस्तर पर बैठाते हुए उसने अपने वस्त्रों को निकालना आरम्भ कर दिया. समय की आवश्यकता के अनुसार अधिक वस्त्र पहने ही नहीं गए थे, तो पलक झपकते ही वो मेहुल के सामने निर्वस्त्र अपने सम्पूर्ण वैभव में खड़ी हुई थी. मेहुल उसे पलक झपके बिना देख रहा था. किसी अप्सरा का भी ऐसा सौंदर्य नहीं रहा होगा.

“भाभी, आप बहुत बहुत सुंदर हो. भैया की तो लॉटरी लग गई है.”

“पर तुम तो जानते हो कि हमारे परिवार में हर वस्तु मिल बाँट कर ही भोगी जाती है.”

“हम भी भाग्यशाली हैं.”

“अब अपने भी कपड़े उतार, हमें पूरा दिन थोड़े ही न मिला है.”

इस बार मेहुल को कुछ झिझक हुई. इसीलिए नहीं कि उसे नंगा होने में कोई संकोच था, अपितु इसीलिए कि उसके लंड को देखने के बाद भाभी उसके स्वांग को समझ न लें. वो उनसे झूठ भी नहीं बोल पायेगा. पर अब इस चिंतन का समय तो था नहीं. सर ओखली में था. उसने अपने कपड़े भी निकाल दिए. और जैसे ही श्रेया ने उसके लिंग को देखा तो समझ गई कि ये हो ही नहीं सकता कि ये अनुभवहीन हो चुदाई के क्षेत्र में.

“ओह, तो मेरा प्यारा बच्चा इसे छुपाये घूम रहा था. सच बता तुझे ये सब स्वांग करने की क्या पड़ी थी. यहां हमारी मम्मियाँ तुझे सिखाने की होड़ में थीं, और मैं भी यही सोच बैठी थी कि अपने बच्चे को अच्छे से प्रेम करना सिखाउंगी, पर इतना तो समझती हूँ कि ऐसे लौड़े के साथ तूने चुदाई न की हो ये सम्भव ही नहीं. है न?”

“भाभी, मुझे पहले तो पता नहीं था कि हमारा परिवार इस प्रकार से लिप्त है, तो बताने का कोई प्रयोजन ही नहीं था. फिर मुझे बाहर से बहुत अनुभव प्राप्त हो रहा था, पर मैं ये भी दर्शा नहीं सकता था. तो मैं चक्रव्यूह में फंस गया. हमारी मम्मियाँ ये जान चुकी हैं, पर मेरे निवेदन पर उन्होंने कुछ कहा नहीं. और मैं आपसे भी यही निवेदन करूँगा. एक बार महक और स्नेहा को स्वयं ज्ञात हो जाये फिर मैं ये मुखौटा भी उतार फेंकूँगा.”

“हम्म. बात तो सही है. एक झूठ अनेक झूठ बुलवाता है. तो अब बात हमारी. अब जब तू इतना अनुभवी है तो क्यों नहीं अपने अनुभव का लाभ अपनी भाभी को भी देता. तो आज जैसा तू चाहे वैसे चोद, मैं अपनी इच्छा बाद में पूरी कर लूँगी।”

“सच भाभी!” मेहुल ने श्रेया को बाँहों में लिया और ताबड़तोड़ चूमने लगा.

फिर मेहुल रुका और श्रेया को देखकर बोला, “भाभी सच कहूँ तो मुझे प्यार करना आता ही नहीं. केवल चोदना ही आता है. जिन्होंने भी सिखाया उन्हें केवल मेरे लंड से प्यार था और चुदाई से संबंध. इसीलिए मैंने कभी किसी को भी प्यार नहीं किया। पर आपके लिए मैं आपको आज उस प्रकार से चोदुँगा जैसा मैंने सीखा है, पर आप मुझे वचन दीजिये कि अगली बार से आप मुझे प्यार करना भी सिखाएँगी।”

“बिल्कुल मेरे बच्चे. पर आज तेरा ढंग भी तो देखूँ। वैसे कितनों को चोदा है अब तक?” श्रेया से पूछे बिना नहीं रहा गया.

“यही कोई दस को. सब विवाहित या विधवा ही थीं. आपकी आयु की कोई नहीं, न आप जैसी सुंदर. न मम्मी जैसी सुंदर, न ही आंटीजी जैसी. पर चुदाई की भूख बहुत थी.”

“हूँ. तब तो मेरी मम्मी को तूने खुश कर दिया होगा?”

“जी, मुझे तो लगता है.”

“तो अब क्या?”

“पहले आपकी चूत का स्वाद लेना है. फिर आगे देखेंगे. और भाभी एक बात और.”

“अब और क्या है?” श्रेया बिस्तर पर लेटती हुई पूछी.

“उन सबको गांड मरवाने में बहुत आनंद आता था.”

“तूने अपनी मम्मी की गांड मारी?”

“नहीं उन्होंने अगली बार के लिए बचा ली.”

श्रेया ने मेहुल के लंड को देखा. “और मेरी मम्मी की?”

“जी, मारी थी.”

“तो मेरी गांड भी मार सकता है. मुझे भी गांड मरवाने में बहुत आनंद आता है. हम ये क्यों न करें कि मेरी भी गांड आज छोड़ देते हैं और अगली बार में मम्मी जी और मेरी गांड एक साथ मारना. उस दिन तुझे केवल हम अपनी गांड ही मारने देंगी. क्या विचार है?” श्रेया ने अपने पैर फैलाये और अपनी चूत के पूरे दर्शन मेहुल को करवा दिए.

“मुझे आपका हर सुझाव स्वीकार है. तो अगले सप्ताह आप दोनों की गांड का आनंद मुझे मिलेगा.” मेहुल ने कहा.

भाभी की सुंदर खुली चूत को देखकर मेहुल के मुंह में पानी आ गया. उसने सामने बैठकर अपना मुंह चूत पर लगाते हुए जोर से चूसा. श्रेया की चूत से निकलते रस ने उसके मुंह में पदापर्ण किया और श्रेया ने भी एक गहरी श्वास भरी. इसके बाद तो जैसे मेहुल किसी उन्मत्त पशु के समान हो गया. वो श्रेया की चूत के हर रोम को चाट रहा था, चूम रहा था. उसने अपना विशेष ध्यान श्रेया के भग्नाशे पर भी रखा जिसे वो बीच बीच में अपने होंठों में लेकर मसलता, फिर चाटता और फिर चूसता.

श्रेया अब उन सभी स्त्रियों को धन्य कर रही थी जिन्होंने मेहुल का शिक्षण किया था. समुदाय में अनेक पुरुषों और कुछ स्त्रियों ने भी उसकी चूत को चूसा था. परन्तु मेहुल के जैसा अनुभव उसे किसी के साथ न हुआ था. उसे अपने समुदाय की उन स्त्रियों के भाग्य पर ईर्ष्या हुई जो मेहुल से संसर्ग करने वाली थीं. मेहुल ने अब चूत के साथ श्रेया की गांड के छेद को भी टटोलना आरम्भ कर दिया था. अपनी उँगलियों को चूत से गीला करने के पश्चात् वो श्रेया की गांड के ऊपर फिरा रहा था. परन्तु उसने अभी तक उसे भेदा न था.

उसने श्रेया की टांगों को ऊँचे उठाते हुए उन्हें मोड़ दिया। अब श्रेया की चूत और गांड दोनों उसके सामने प्रस्तुत थीं. इस बार उसने गांड पर अपनी जीभ चलाई. श्रेया ने अपने हाथों से अपनी टांगों को पकड़ लिया. मेहुल ने ये देखा तो उसने अपने हाथ हटा लिए और श्रेया की चूत में चलाने लगा. भग्न को अंगूठे से मसलते हुए उसके श्रेया की गांड के दोनों ओर हाथ रखे और गांड को खोलने में सफलता प्राप्त की. इस बार अपनी जीभ से श्रेया की गांड की बाहरी त्वचा को चाटते हुए उसने जीभ को अंदर प्रविष्ट कर दिया.

श्रेया मेहुल के इस कामक्रिया से अत्यंत चकित हुई. वो जिस सरलता से अपने हाथों, उँगलियों, अँगूठों और जीभ का समन्वय कर रहा था, वो किसी अनुसंधान का विषय बन सकता था. गांड में जीभ, भग्न पर ऊँगली श्रेया को अपने प्रथम चरम पर ले जाने के लिए सफल हुए. जैसे ही श्रेया के शरीर को मेहुल ने अकड़ते हुए अनुभव किया, उसने भग्नाशे पर चल रही ऊँगली से उसे तीव्र गति से मसलना और रगड़ना आरम्भ कर दिया. श्रेया का शरीर जड़वत हो गया, पर कमर के नीचे का भाग काँप रहा था. उसकी चूत से रस की धार निकलने लगी जिसने मेहुल के मुंह को सींच दिया.

परन्तु मेहुल रुकने वाला कहाँ था, उसने अपने कार्यकलाप को नहीं रोका और गांड में जीभ से और भीतरी वार करने लगा.

“बस, बस मेरे बच्चे, बस. अब मत चाट मेरी गांड. मैं अब तेरे लंड का भी स्वाद लेना चाहती हूँ. प्लीज मुझे छोड़.”

मेहुल ने अनमने होकर श्रेया की गांड से अपनी जीभ को निकाला और फिर श्रेया की टांगों को नीचे लाने में श्रेया की सहायता की. श्रेया कुछ देर लेटी रही और फिर बिस्तर के कोने पर बैठ गई. मेहुल अपने तने लौड़े को लेकर उसके सामने आ खड़ा हुआ. श्रेया ने उसके लंड को देखा तो वो फिर से आश्चर्य में आ गई. अब उसका आकार अपितु और बढ़ गया था. उसने अपनी जीभ से टोपे को चाटा। उसके बाद लंड पर थूकते हुए उसे कुछ चिकना किया और अपने मुंह में ले लिया. मेहुल को आज एक असीम शांति मिली. वो न जाने कब से अपनी भाभी की चुदाई के सपने देखता था. आज उन्हें पूरा होते देख उसे अपने भाग्य पर गर्व हुआ.

श्रेया लंड चूसने में महारथी थी. परिवार और समुदाय के सभी लौड़े उसके मुंह का आनंद ले चुके थे. हर आकार और आकृति के लंड उसके गले तक की थाह नापा था, और उसके मुंह में अपना रस बरसा चुके थे. मेहुल ने अपने हाथ श्रेया के सिर पर रख दिए. परन्तु पूरा क्रिया को श्रेया के ही ऊपर छोड़ दिया.

“भाभी, मैं अभी आपके मुंह में नहीं झड़ना चाहता. प्लीज बाद में चूस लेना. मुझे सच में अब चुदाई की इच्छा है.”

“ठीक है, जैसे मेरे बच्चे का मन है, वैसा ही करेंगे।” श्रेया ने लंड मुंह से निकाला फिर उसे अपने हाथ में थामे हुए देखा, “वैसे मेरा बच्चा है बहुत बड़ा. पर चाहे कितना भी बड़ा हो जाये, मेरे लिए तो तू मेरा लाडला ही रहेगा.”

“भाभी, मुझे भी आपसे यही आशा है. आपने सदा से मुझे इतना वातसल्य दिया है, एक माँ के समान, तो मैं सदा आपका बच्चा ही रहूँगा।”

“हम्म, बातें अच्छी बनाता है. चल अब अपनी भाभी को दिखा क्या सीखा है तूने.”

“भाभी आप सीधी लेट जाओ. इस प्रकार से हम दोनों एक दूसरे को देख सकेंगे.”

श्रेया ने सामान्य आसन ग्रहण किया और अपनी टाँगों फैला लीं. मेहुल ने झुककर एक बार चूत को चूमा, जीभ से चाटा और भग्न को भी छेड़ा. और फिर अपने लंड चूत पर रगड़ने लगा. भगनाशे को दबाते हुए कुछ समय तक वो इसी प्रकार से लंड को चूत पर घिसता रहा. फिर हल्के से चूत में उतार दिया.

मेहुल ने चूत में लंड इतनी शांति से डाला था कि पहले श्रेया को तो आभास ही नहीं हुआ. पर जैसे जैसे लंड अपनी यात्रा में आगे बढ़ा श्रेया को उसकी प्रगति का आभास होने लगा. एक स्थान को छू लेने के पश्चात श्रेया को मेहुल के लंड के आकार का अनुभव हुआ. मेहुल अनवरत अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए लालायित था, परन्तु उसने भी शीघ्रता नहीं दिखाई. अंतिम पड़ाव पर पहुंचने के पश्चात वो रुका और उसने श्रेया को देखा, जिसके चेहरे पर एक शांत मुस्कराहट थी और वो भी उसे असीम प्रेम से देख रही थी.

“बच्चा नहीं है रे तू, इतने अंदर तक सम्भवतः कोई और नहीं गया है अब तक. इतने धैर्य से तो कदापि नहीं. जितने बड़े लंड वाले मिले वो स्वयं पर इतना गर्व करते हैं कि ये भूल जाते हैं कि स्त्री, चुदाई प्रेम से ही करवाने की इच्छुक होती है. हाँ कई बार भीषण चुदाई की इच्छा होती, है जैसे मेरी मम्मी की होती है. तेरा लंड इतनी सरलता से तूने मेरी चूत में डाला है कि मुझे आभास भी नहीं हुआ. अब देखूं तुम चुदाई कैसे करते हो.”

“भाभी, आपको मैं उस प्रकार से तो चोद ही नहीं सकता. आज पहली बार तो कदापि नहीं. तो आज मैं आपसे प्रेम करने का प्रयास करूँगा, आता नहीं पर प्रयास करूँगा। अगली बार के लिए अन्य प्रकार की चुदाई को सुरक्षित रखते हैं.”

“जो तुम चाहो.”

मेहुल ने कोई शीघ्रता नहीं की, उसने धीमे धीमे ही श्रेया को चोदना आरम्भ किया. श्रेया को अपने पिता की याद आ गई, जो इसी प्रकार से उसे बड़े प्रेम से चोदते थे. श्रेया के चेहरे के भावों को देखते हुए मेहुल अपनी गति की कम और अधिक कर रहा था. उसे स्वयं पर भी ये आश्चर्य हुआ कि वो इस प्रकार की चुदाई के लिए सक्षम है. गति धीरे धीरे ही बढ़ रही थी, परन्तु श्रेया और मेहुल एक दूसरे की आँखों में आँखें डाले हुए इस प्रेमलीला का आनंद ले रहे थे.

श्रेया की चूत से पानी रिस रहा था और मेहुल के लंड के लिए पर्याप्त चिकनाई प्रदान कर रहा था. मेहुल ने अपनी गति को इसी प्रकार से संतुलित रूप से बढ़ाते हुए उस गति पर ले आया जहाँ से वो अन्य स्त्रियों की चुदाई का आरम्भ करता था. श्रेया अब आनंद से किलकारियाँ ले रही थी और मेहुल को प्रेम से देखती हुई कभी बीच बीच में कुछ असहजता का प्रदर्शन करती थी. मेहुल भी इससे अवगत था परन्तु उसे ये भी ज्ञान था कि चुदाई का परम सुख केवल प्रेम से की गई चुदाई से प्राप्त नहीं होता, कुछ कड़ाई भी आवश्यक होती है. वैसे भी श्रेया ने उसे छूट दी हुई थी.

और इसी विचार के साथ मेहुल ने अपनी गति बढ़ानी आरम्भ की, श्रेया का शरीर और बिस्तर मेहुल के इन शक्तिशाली धक्कों के थपेड़ों से हिलने लगा. श्रेया अब मेहुल के चेहरे और आँखों में देखने में असमर्थ थी. हालाँकि मेहुल उसके चेहरे पर उभरते हर भाव को देख समझ रहा था. चुदाई का महारथी योद्धा अपने प्रतिद्वंदी के भाव देखकर अपने भाले का प्रयोग करता था. कब कितना चुभाना है, कितनी गहराई तक भेदना है और किस गति और शक्ति से उसका उपयोग करना है, ये मेहुल की शिक्षिकाओं के संसर्ग ने उसे भली भांति सिखाया था.

“भाभी, आपकी चूत से बहुत पानी बह रहा है.”

“हाँ मेरी जान, मेरे बच्चे! तूने इसे रुला ही दिया है. बस अब झड़ने की शक्ति नहीं रही मुझमें.”

श्रेया के ये वचन सुनते ही मेहुल ने उसके भग्नाशे से खेलना आरम्भ किया और गति असंभावित रूप से बढ़ा दी. श्रेया की चीख से कमरा और घर हिल गया और वो कांपते हुए धराशाई हो गई. उसकी चूत ने पानी का एक फौहारा छोड़ा और फिर हार स्वीकार कर ली. मेहुल ने गति धीमी की और श्रेया को चोदता रहा. कुछ पलों के बाद श्रेया ने चेतना पाई तो उसे देखने लगी.

“बहुत अच्छा चोदता है रे. मेरी तो जैसे जान ही निकाल दी. आ जा अब मेरी चूत में शक्ति नहीं बची है. मेरे मुंह में झड़ ले.”

मेहुल ने अपने लंड को श्रेया के मुंह में डाला और श्रेया उसे प्रेम से चाटने लगी. अपने रस से भीगे लंड को चाटने में श्रेया को बहुत आनंद आ रहा था. फिर मुंह में लेकर चूसा और कोई पाँच सात मिनट के बाद मेहुल ने उसके मुंह में अपना रस छोड़ दिया जिसे श्रेया ने प्रेम से स्वाद लेकर पी लिया.

मेहुल भाभी के बगल में लेट गया और दोनों एक दूसरे के शरीर को सहलाते हुए हल्की सी नींद में चले गए.

इधर श्रेया और मेहुल निद्रा में थे तो वहीं नायक परिवार में भोजन के उपरांत मंत्रणा चल रही थी. कुछ समय के विचार विमर्श के बाद ये निश्चित किया गया कि श्रेया के प्रस्ताव को मानने में कोई विशेष आपत्ति नहीं है. अगर शेट्टी परिवार कौटुम्बिक सम्भोग में लिप्त है तो आगे के लिए अनेक संभावनाएं खुल जाएँगी.

इसी के साथ मंत्रणा समाप्त हुई और अंजलि को श्रेया को अपना निर्णय बताने का दायित्व सौंपा गया. अंजलि ने इसे शाम को ही पूर्ण करने का बीड़ा भी उठा लिया.

*************

स्मिता का घर:

श्रेया और मेहुल जब उठे तो चार बजने को थे. दोनों ने बाथरूम में जाकर हल्का स्नान किया और फिर बैठक में आ गए. श्रेया ने चाय चढ़ा दी और वर्षा ने मेहुल की ओर देखकर आँखों से पूछा “क्या हुआ?”

मेहुल ने संकेत से बताया कि बहुत अच्छा रहा. वर्षा मुस्कुरा दी. श्रेया की चाय बन गई तो वो लेकर आ गई और तीनों बैठे चाय पीने लगे. वर्षा ने श्रेया को देखा तो उसके चेहरे को दमक से जान लिया कि वो भी प्रसन्न थी. तभी घर की घंटी बजी, मेहुल ने उठकर खोला तो सामने अंजलि थी.

“अरे दीदी, आप? आओ आओ.” उसने अंजलि का स्वागत किया.

अंजलि अंदर आई तो श्रेया समझ गई कि उसका तीर सही लक्ष्य पर लगा था. उसने अंजलि का हाथ पकड़ा और अपने कमरे में ले गई. बिस्तर अब तक ठीक नहीं किया था तो अंजलि ने भौहें सिकोड़ीं.

श्रेया: “अरे मेहुल से चुदवाकर हटी हूँ कुछ देर पहले. बिस्तर अभी भी ठीक नहीं किया. और तुम बताओ.”

अंजलि: “मैंने परिवार में बात की. उन्हें कोई आपत्ति नहीं है. परन्तु ये होगा कैसे इसकी मुझे चिंता है. अब तक किसी को पता नहीं था हमारे विषय में. पर अब न जाने क्यों एक डर सा लग रहा है.”

श्रेया: “अंजलि, मेरा परिवार और मोहन का परिवार इस प्रकार से कई वर्षों से संलिप्त है. कुछ और लोग हैं जो इस विषय को जानते हैं, परन्तु वो भी अपने सामाजिक प्रतिष्ठा के चलते कभी कुछ नहीं कहेंगे. हमारे घर सटे हुए हैं तो किसी को इतना संशय भी नहीं होगा. समय चलते तुम्हें कुछ अन्य परिवारों के बारे में भी पता चल जायेगा, परन्तु ये तुम सबको स्वयं निर्धारित करना होगा.”

श्रेया आगे बोली, “रही बात कि इसका प्रारम्भ कैसे होगा, तो मैं पापाजी से कहकर कोई रिसोर्ट में जाने के लिए आग्रह कर सकती हूँ, जहाँ हमें कोई और न जानता हो. वहाँ हम अपने मन के अनुरूप इसका आरम्भ कर सकते हैं. अगर तुम सब इसके लिए सहमत हो तो अगले शुक्रवार को हम चल सकते हैं.”

श्रेया ने ये बताना आवश्यक नहीं समझा कि ये वही रिसोर्ट है जहाँ उनके समुदाय के मिलन समारोह होते हैं. अंजलि ने कुछ देर चिंतन किया.

अंजलि, “मुझे परिवार वालों ने ये अधिकार दिया है कि जो मैं सही समझूँ वो निर्णय ले सकती हूँ, जो उन सबको मान्य होगा.”

श्रेया अंजलि को आशा से देख रही थी. अंजलि ने सिर उठाकर श्रेया को देखा और उसका आशय समझ गई.

अंजलि, “श्रेया, तुम अंकल से बात कर सकती हो. हम सब शुक्रवार को चलेंगे.”

श्रेया: “बहुत अच्छा निर्णय है. अब मुस्कुरा भी दो.” ये कहते हुए उसने अंजलि को बाँहों में ले लिया और उसके होंठ चूम लिए.

अंजलि भी मुस्कुरा दी और फिर उसने श्रेया के होंठ चूमे और अपने घर चली गई. श्रेया बाहर आई और अपने पति की प्रतीक्षा करने लगी.

**************

समुदाय की मंत्रणा:

मधुजी ने अपनी प्रबंधन समिति को एक मंत्रणा के लिए अगले दिन अपने घर पर आमंत्रित किया. महिला सदस्याओं के लिए इसमें कोई अड़चन नहीं थी, परन्तु पुरुष सदस्य कुछ आनाकानी करने के बाद सहमत हो गए. अगले दिन सभी समय पर उनके घर पहुंच गए. घर के अन्य सदस्य बाहर थे, और उनके पति गिरी अपने नए मित्र जीवन राणा के घर गए हुए थे. इस बात की मधुजी को अत्यंत प्रसन्नता थी कि जीवन से मिलने के बाद जैसे गिरी में भी शक्ति का संचार हो गया था. अब वो भी अपने कमरे में बंद न रहकर परिवार की रात्रिकालीन क्रीड़ा में भाग लेने लगे थे.

मधुजी ने सबको अपने ऑफिस में बैठाया।

“आपसे मैंने कल बात की थी, एक नए परिवार को जोड़ने के विषय में. मैंने उनके बारे में छानबीन आरम्भ कर दी है. मेरे विचार से तीन चार महीने में हमें उनके बारे में विस्तृत सूचना मिल जाएगी.”

“परन्तु मेरा आपको इस विषय में अपने एक संशय को दूर करने के लिए ये मंत्रणा की है. नया परिवार स्मिता शेट्टी और सुनीति राणा के पड़ोसी परिवार हैं. वर्षा और समीर नायक.”

एक सदस्य ने सीटी बजाई।

“तो मेरा संशय यही है कि इतने निकट रहने वाले परिवारों को जोड़ना सही है या नहीं? आप जानते हो कि हमारे अन्य परिवार नगर में फैले हुए हैं.”

तनीषा (एक सदस्या) बोली, “मुझे इसमें कोई विशेष समस्या नहीं दिखती. वैसे भी हमारे समुदाय में इस वर्ष केवल राणा परिवार ही जुड़ पाया है. नए परिवार को आने में वैसे भी छह महीने तो लग ही जायेंगे. फिर उन्हें भी अपनी समाजिक प्रतिष्ठा की चिंता होगी.”

अन्य सब भी उनके इस विचार से सहमत थे. उन्हें भी इस बात की चिंता थी कि नयी पीढ़ी की सोच पृथक थी और कहीं ऐसा न हो कि आगे चलकर समुदाय का खंडन हो जाये.

“मुझे नहीं लगता कि ऐसा होने की अधिक संभावना है. हाँ, हमें विवाह के विषय में अपने नियम बदलने पर भी विचार करना चाहिए. समुदाय के बाहर विवाह करने पर, परिवार के केवल उस सदस्य को ही एक वर्ष के लिए अलग करना पूरे परिवार को अलग करने से अच्छा होगा. अगर आप सहमत हो तो इस बिंदु पर अगले मिलन समारोह में वोट लिए जा सकते हैं.” मधुजी ने कहा.

“ये उत्तम विचार है. विवाह की संख्या बढ़ रही है. ऐसा न हो कि इस नियम के कारण समुदाय ही समाप्त हो जाये.” एक पुरुष सदस्य ने कहा.

“अब हमें आने वाली नई समिति के विषय में भी सोचना होगा. आप सबने बहुत अच्छा कार्य किया है और इसके लिए हम सभी आभारी हैं. परन्तु नियम यही है कि अगले मिलन पर नए चुनाव होंगे और उसके अगले मिलन में नयी समिति शपथ लेगी.”

सबने सिर हिलाकर सहमति दी.

“जैसा आप जानते हैं आप अपनी ओर से दो सदस्यों का नाम मनोनीत कर सकते हैं, उनकी स्वीकृति होने पर. अन्य सदस्य एक का ही नाम दे सकते हैं. उसके बाद कौन चुना जाता है ये तो चुनाव पर ही निर्भर है. तो मैं चाहूंगी कि आप अपने नाम सोच कर उनसे परामर्श कर लें. अन्य सदस्यों को भी सूचना कर दें ताकि इस समारोह में चुनाव पूर्ण हो सकें. समय अधिक नहीं है, पर हम एक बहुत छोटा समुदाय हैं.”

“हाँ, मेरे विचार से इस सप्ताह में ही नाम निर्धारित हो जायेंगे. इस मिलन पर चुनाव किये जा सकते हैं.”

इसके बाद आर्थिक स्थिति पर चर्चा हुई. फिर मंत्रणा समाप्त करने के पश्चात सब सदस्य अपने घर या कार्य पर चले गए.

**************

स्मिता का घर:

श्रेया मोहन के आने के बाद उसे कमरे में ले गई और अंजलि से हुई बात बता दी. मोहन ने सोचा कि ये बात सबके साथ साझा करना अत्यंत आवश्यक है. उसने इसका दायित्व उठाया और रात्रिभोज के उपरांत इसके विषय में चर्चा करने का समय चुना. शाम को एक दो ड्रिंक्स के बाद भोजन किया गया और फिर मोहन ने कहा कि वो सबके साथ एक बात बाँटना चाहता है. तो सब लोग वहीँ बैठक में बैठ गए. मोहन ने उस रात को सुनाई देने वाली चीखें और फिर श्रेया का अंजलि के घर जाना और फिर आज अंजलि का उनके घर आना सबको बताया. विक्रम उसकी ओर ध्यान से देख रहा था. अंत में उसने श्रेया द्वारा प्रस्तावित रिसोर्ट की योजना अपने पिता को बताई.

“तो अब हमें ये निर्णय लेना है कि हम उन्हें अपने साथ ले जायेंगे या नहीं?”

“अगर बात इतनी आगे बढ़ा ही चुके हो तो न कहने का प्रश्न ही कहाँ बचता है.” विक्रम ने श्रेया की ओर देखकर कहा.

“पापा.” श्रेया कुछ बोलती उसके पहले ही विक्रम ने उसे रोक दिया, “क्या बात यहीं तक सीमित है या कुछ और भी है.”

“हमने मधुजी को उनके बारे में जाँच करने के लिए निवेदन किया है.”

“तेरी माँ का… कभी कुछ पूछ भी लिया करो.”

“सॉरी, पापा.” मोहन और श्रेया ने कहा. इस पूरे वार्तालाप में महक और मेहुल मौन ही थे.

“सुनिए.” स्मिता ने कहा, “मुझे इसमें कोई विशेष समस्या नहीं लग रही है. आप क्यों इतना चिंतित हो रहे हैं?”

“अगर अंजलि ने श्रेया से झूठ कहा हो तो?”

“आप श्रेया की बुद्धिमता पर शंका कर रहे हैं. और अंजलि कभी इस घटना को स्वीकार नहीं करती.”

“ओके, तो क्या चाहते हो?”

“रिसोर्ट बुक कर दो. कितने कमरे चाहिए पड़ेंगे?” स्मिता ने अब बागडोर अपने हाथ में ले ली.

“छह हम और वहां से सात. तेरह लोग.”

“किसी को जोड़ लो, मुझे ये अंक अच्छा नहीं लगता.”

“मम्मी को ले लो!” श्रेया ने तुरंत अपना सुझाव दिया.

“अविरल मानेगा तीन दिन के लिए?”

“ओह, उन्हें मनाया जा सकता है. स्नेहा तो रहेगी ही उनके साथ.”

“हाँ सुजाता ही ठीक रहेगी.”

इसके बाद विक्रम ने रिसोर्ट के एक तल पर चार बड़े कमरे बुक कर दिए. उसी तल पर बने एक समारोह कक्ष को भी बुक कर दिया. लोकेश जो मधुजी का पुत्र और रिसोर्ट का स्वामी था उसने विक्रम को उत्तम सेवा का आश्वासन दिया. बाद में जब लोकेश ने अपनी माँ मधुजी को बताया तो उन्होंने लोकेश से अपनी ओर से कुछ अन्य निवेदन भी किये. लोकेश ने बिना कारण जाने उन्हें स्वीकार किया. मना करता भी तो कैसे? मधुजी उसे अपनी गांड मरवाते हुए जो समझा रही थीं.

***************

मेहुल दुविधा में था. परसों उसका महक के साथ का समय था, फिर अगले दिन दिंची क्लब में और फिर उसके अगले दिन स्नेहा के साथ. और अब ये नया बखेड़ा उनके पड़ोसियों के साथ का. वैसे अंजलि मस्त थी और जब वो मिलती थी, जो कम ही होता था, उसे चोदने का विचार उसके मन में कई बार आता था. उसकी माँ वर्षा की बात कुछ और ही थी. पका हुआ फल थी जिसकी जवानी अब तक ढली नहीं थी, कुछ उसकी अपनी माँ के समान. और उसे इस आयु की स्त्रियों को चोदने में असीम आनंद आता था. उसे सिखाने वाली हर स्त्री लगभग इसी आयु की जो थीं.

वो महक या स्नेहा के साथ बनी योजना को बदलना चाहता था, विशेषकर महक क्योंकि वो किसी भी कारण से क्लब में जाकर विफल नहीं होना चाहता था. पर उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो करे भी तो क्या? पर इसका समाधान स्वयं ही हो गया. जिस दिन उसका महक से समय तय हुआ था, राणा परिवार ने महक को शॉपिंग के लिए बुला लिया. महक मेहुल की ओर देखकर मना करने ही वाली थी कि मेहुल ने उसे रोका और जाने के लिए सहमति देने का संकेत किया. फोन रखकर महक मेहुल की और मुड़ी.

“क्यों?”

“मैं कहीं भागा नहीं जा रहा हूँ, पर जिस घर में तुझे जाना है वहाँ अगर अभी से टाल मटोल करेगी तो नकारात्मक व्यवहार माना जा सकता है. मेरी मान, मन लगाकर शॉपिंग करना और उन सबको अपने निर्मल व्यवहार से जीत लेना. फिर मैं तो यहीं हूँ.”

महक मेहुल के सीने से लग गई. उसकी आँखों में आंसू थे.

“आप संसार के सबसे अच्छे भाई हो!”

मेहुल ने इधर उधर देखा, स्मिता और श्रेया उन्हें देखकर भावुक हो रहे थे.

“क्या देख रहे हो?”

“मैं देख रहा था कि दादा (मोहन) का नंबर मैंने कैसे काट दिया.”

महक हंसने लगी.

“ओके, भाई, आप दोनों वर्ल्ड के बेस्ट भाई हो. अब ठीक.”

“हम्म, वर्ल्ड की बेस्ट बहन जब बोल रही है तो मान लेता हूँ. क्यों मम्मी और भाभी?”

“बिलकुल सही. और हमारा परिवार वर्ल्ड का बेस्ट परिवार.”

स्मिता और श्रेया ने आगे बढ़कर उन दोनों को बांध लिया और चारों एक दूसरे से लिपट गए.

मेहुल की एक समस्या हल हो गई थी. उसने भाभी से कहा कि स्नेहा को और दो दिन आगे बढ़ा दो.

“ओह हो हो, मेरे बच्चे का साथ पाने के लिए अब अपॉइंटमेंट लेना पड़ रहा है.”

“भाभी, आप भी!” मेहुल शर्माते हुए बोला।

“चल मैं उसे कहे देती हूँ.” श्रेया ने कहा और फिर सब अपने कार्य में लग गए.

****************

दिंची क्लब में मेहुल:

मेहुल निर्धारित दिन और समय पर सचिन द्वारा दिए पते पर पहुंच गया. घर से कुछ दूर था, नगर की सीमा से बाहर. अपनी गाड़ी को खड़ा करने के बाद वो अंदर गया जहाँ एक सुंदर मध्यम आयु की स्त्री बैठी हुई कुछ पढ़ रही थी. मेहुल को देखकर वो मुस्कुराई और उसका स्वागत करने के बाद उसके आने का उद्देश्य पूछा. मेहुल ने उसे बताया तो उसने मेहुल से उसका पहचान पत्र माँगा. मेहुल ने अपना ड्राइविंग लाइसेंस दिया जिसकी उस महिला, जिसका नाम नूतन लिखा हुआ था, ने प्रति बनाई और मेहुल को लौटा दिया.

उसी समय वहाँ एक और आगंतुक का पदापर्ण हुआ. एक पचास पचपन वर्ष की महिला ने आकर नूतन से बात की और अपना नाम बताया. नूतन ने उससे भी उसका पहचान पत्र लिया और फिर प्रति बनाकर लौटा दिया. उस महिला को देखकर मेहुल का लंड टनटना गया. महिला ने जिस प्रकार से मेकअप किया था और स्वयं को प्रस्तुत कर रही थी, उससे ये विदित था कि वो धनाढ्य परिवार की है. सचिन के द्वारा बताई हुई फ़ीस का ध्यान आते ही उसे समझ आ गया कि ये महिला भी अपनी चुदाई के लिए ही आई है. ये कुछ सीमा तक सच था. रूचि मैडम की माँ राशि ने अपनी सहेलियों में से कुछ को चुनकर इस क्लब के विषय में बताया था. उसका अपनी बेटी के इस नए व्यवसाय में कुछ सहायता करने का उद्देश्य था. रूचि ने पार्थ से बात की और फिर कुछ चिंतन के बाद उनमें से दो महिलाओं को ही चुना गया. अगर इनमे से कोई पारित नहीं होती तो किसी और को अवसर दिया जा सकता था.

नूतन ने उस महिला, जिसका नाम सोनी था, पास के एक कमरे में बैठाया और फिर मेहुल को लेकर चल पड़ी. एक कमरे के आगे जाकर उसने उसे खोला और मेहुल को अंदर आने को कहा. कमरा बहुत अच्छा सजाया हुआ था और किसी भी पाँच सितारा होटल के कमरे को मात कर सकता था. नूतन ने मेहुल को आवश्यक निर्देश दिए. कपड़े उतारकर कहाँ रखने हैं, स्नान करने के बाद गाउन पहनना है और फिर उसके परीक्षण के लिए संचालिका की प्रतीक्षा करनी है. मेहुल के पूछने पर नूतन ने बताया कि वे भी बीस मिनट में पहुंच जाएँगी. नूतन ने मेहुल को एक प्रपत्र भी दिया और उसे भरने के लिए कहा. उसमें गोपनीयता की शपथ और अन्य कुछ विवरण भरने थे. इसके बाद उसने कमरे को बंद किया और चली गई. मेहुल ने अपने कपड़े बताये अनुसार रखे और स्नान के लिए चला गया. वहाँ पर उपलब्ध गाउन को पहना, कोई अंतर्वस्त्र की आवश्यकता नहीं थी. मेहुल ने उस फॉर्म को भरा और अपने हस्ताक्षर करने के बाद उसे टेबल पर रख दिया. फिर वो सोफे पर बैठकर कमरे के दरवाजे की ओर देखते हुए अगले पड़ाव की प्रतीक्षा करने लगा.

*********

दिंची क्लब में सोनी:

मेहुल को छोड़कर नूतन सोनी के पास आई और उन्हें अपने साथ एक दूसरे कमरे में ले गई. सोनी भी कमरे की भव्यता से प्रभावित हुए बिना न रह सकी. नूतन ने मेहुल के ही समान सोनी को समझाया, फॉर्म भरने के लिए दिया और चली गई. सोनी ने स्नान किया और फॉर्म भरा. क्लब की फ़ीस पर अवश्य उसे कुछ शंका थी परन्तु राशि (रूचि मैडम की माँ) ने उसे समझाया था कि उसे हर पैसे की कीमत कई गुना मिलेगी. सोनी के पति एक बड़े व्यवसाई थे और महीने में कई दिन बाहर ही रहते थे. जब राशि ने उनके साथ जाना छोड़ा तो सोनी को आश्चर्य हुआ था.

कुछ दिनों पहले उसने राशि से बात की तो राशि ने बताया कि उसने अपनी अलग व्यवस्था कर ली है और अब उसकी चुदाई नियमित रूप से जवान, मोटे, कड़े और बड़े लौडों से होती है. सोनी के निवेदन पर कुछ दिन पहले राशि ने उसे अपने घर बुलाया और उसे इस क्लब के बारे में बताया. यहाँ की गोपनीयता को बनाये रखने के लिए उसने हमारे मुंबई में किये गए अनाचारों के वीडियो दिखाए. अगर सोनी गोपनीयता नहीं बना पाई तो वो उन्हें सोनी के पति के पास भेजने में कोई संकोच नहीं करेगी. क्लब की फीस अधिक थी, पर राशि ने पाई पाई का मोल बताया. आज सोनी यहाँ पहली बार आई थी. राशि ने उसे ये तो समझा दिया था आज उसकी भरपूर चुदाई होगी और हर प्रकार से संतुष्ट हो कर ही लौटेगी.

अब वो उस व्यक्ति की राह देख रही थी जो उसकी परीक्षा लेने वाला था. “इतने लौड़े खाये हैं कि ये लौंडा भी मेरे तलवे चाटेगा.” ये सोचते हुए सोनी मन ही मन मुस्कुरा उठी.

*********

दिंची क्लब में शोनाली और पार्थ:

शोनाली और पार्थ एक की कार में कुछ ही देर में पहुंचे. शोनाली अपने नए रोमियो को लेकर कुछ उत्सुक थी, पर पार्थ ने उसे कुछ भी नहीं बताया था.

शोनाली: “रूचि मैडम के जुड़ने से हमारा क्लब अब हानि से उठकर लाभ में आ चुका है. अब उनकी माँ भी हमें नए सदस्य देकर सहायता कर रही हैं. हमें उनका कृतग्न होना चाहिए.”

पार्थ: “बुआ, वो तो हम हैं. इसी कारण उन्हें घर पर सेवा दी जा रही है, जो अन्य किसी भी सदस्य को नहीं मिलतीं.”

शोनाली: “ये भी ठीक है. तो चलो आज के लिए शुभकामनायें.”

पार्थ: “आपको भी बुआ. मम्मी के लिए माल संभाल के रखियेगा.”

शोनाली: “ये भी कोई बोलने की बात हुई? आज तक दीदी को मैंने कभी निराश किया है?”

पार्थ ने शोनाली के होंठ चूमे और फिर कार से बाहर निकला, शोनाली भी निकली और क्लब में चली गई. नूतन ने उन्हें उनके कमरों का नंबर दिया और दोनों एक नए अनुभव के लिए चल पड़े. नूतन उन दोनों को जाते हुए देख रही थी.

“ये अच्छा काम है, नयी चूत और नया लंड इनको ही पहले मिलता है.” उसने सोचा. अब उसकी आवश्यकता पड़ने में कुछ समय था. उसने नापने का फीता निकलकर अपने साथ रख लिया.

***************

दिंची क्लब में सोनी और पार्थ:

पार्थ ने कमरे में प्रवेश किया तो सोनी ने उसे सिर उठाकर देखा. और देखती रह गई. उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया. अगर ये मेरी चुदाई करने वाला है तो बहुत आनंद आएगा.

“नमस्ते सोनी जी, मैं पार्थ हूँ.”

“न न न नमस्ते, पार्थ!”

“आपको आने में कोई कठिनाई तो नहीं हुई न? ड्राइवर लाने ही यहाँ मनाही है.”

“नहीं, राशि ने अच्छे से बताया था.”

“मुझे क्षमा करें, मैं भी स्नान करके आता हूँ.”

सोनी ने केवल सिर हिलाया. पार्थ ने झटपट स्नान किया और गाउन पहन लिया. आते समय उसने बिस्तर के पास उपस्थित वस्तुओं का निरीक्षण किया. जैल की ट्यूब नई थी, और अन्य वस्तुएं भी नयी ही थीं.

“जी सोनी जी, तो इसके पहले कि मैं आपको हमारे नियम इत्यादि बताऊँ क्या आपको कोई प्रश्न पूछना है.”

“आपके क्लब के सभी लड़के आप जैसे हैंडसम हैं क्या?”

पार्थ हंसने लगा. “अधिकतर हैं. पर आपको पता है कि यहां हम लड़कों को सुंदरता के कारण नियुक्त नहीं करते. आपको पता है न?”

“कुछ कुछ.”

पार्थ: “इस क्लब में रोमियो बनने के हेतु, चार योग्यताएँ आवश्यक हैं. लंड दस इंच से अधिक होना चाहिए, रोमियो को चुदाई में पारंगत होना चाहिए, रोमियो को स्वयं पर अतिरिक्त गर्व नहीं होना चाहिए, और अंतिम पर सबसे मुख्य कि उसे गोपनीयता रखना आना चाहिए.”

सोनी: “द द द दस इंच!”

पार्थ सोनी की आँखों में झांककर बोला: “जी. कम से कम. अब मैं आपको कुछ नियम बताता हूँ. आज के लिए और कुछ आगे के लिए.”

“पहला नियम केवल आज के लिए है: आज आपकी चुदाई जैसी मैं चाहूँगा वैसे ही करूँगा. अगर आपको किसी भी समय अड़चन या किसी भी प्रकार की कठिनाई हो, आप तुरंत बता दीजियेगा. हमारे क्लब में सदस्याएं आनंद लेने के लिए आती है, बलात्कार का यहाँ कोई प्रयोजन नहीं है.”

“दूसरा भी केवल आज के लिए ही है: आज मैं आपके मुंह, चूत और गांड तीनों में अपना रस गिराऊँगा। आपको हर बार उसे पीना होगा.”

“इसके बाद से अगर आप सदस्य बनती हैं तो आपकी चुदाई जैसा आप चाहेंगी वैसे की जाएगी.”

इसके बाद पार्थ ने कुछ और नियम भी उसे बताये. “तो आप क्या आगे बढ़ना चाहेंगी?”

सोनी ने स्वीकृति में सिर हिलाया. पार्थ ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और सोनी के हाथ को थामा, फिर उसे खड़ा कर दिया. सोनी की आयु ५५ वर्ष के लगभग थी, परन्तु उसने स्वयं को बहुत संभाल कर रखा था और इसीलिए उसका शरीर उसकी आयु को छुपा रहा था. पर पार्थ की पैनी दृष्टि ने इस छलावे को भांप लिया था. फिर उसे सोनी के लंड के आकार के बारे में आश्चर्य होने से भी ये विश्वास हो गया था कि आज की चुदाई सोनी भूलेगी नहीं. हाँ, क्लब में उसे चोदने के लिए और भी रोमियो मिलेंगे, पर पहला बड़ा लंड उसका ही होगा.

सोनी के चेहरे को उठाकर पार्थ ने अपने होंठ उसके होंठों से जोड़ दिए. सोनी मानो पिघल गई. उसने भी पार्थ का साथ दिया और क्षण भर में दोनों के चुंबन की ऊर्जा से कमरा तपने लगा. सोनी के शरीर में मानो अग्नि प्रज्ज्वलित हो उठी. उसने ऐसा कभी अनुभव नहीं किया था. पार्थ ने उसे चूमते हुए उसके गाउन को उतार फेंका. अब सोनी नग्नावस्था में पार्थ से लिपटी हुई उसके चुंबन का आनंद ले रही थी. उसने भी अपने हाथ बढ़ाये और पार्थ के गाउन को निकाल दिया. अब दोनों नंगे एक दूसरे से चिपके हुए चुंबन का आनंद लेने लगे.

“बैठिये.” पार्थ ने सोनी से कहा. सोनी आज्ञा मानकर बैठ गई और उसके सामने पार्थ का लंड आ गया.

“ओह माँ, ये लंड है?” सोनी अचरज से देख रही थी. “मेरी चूत में कैसे जायेगा?”

“आप इसकी चिंता न करें, चूत में भी जायेगा और गांड में भी. और आपको आनंद भी आएगा. पर पहले आप इसे अपने मुंह से चूसकर आनंदित करें.”

“मुझे डर लग रहा है, पार्थ.”

“सोनी जी, मैंने इसी लंड से लड़कियों की भी चुदाई की है और उनकी गांड भी मारी है. कुछ की तो मैंने गांड की सील भी इससे ही खोली है, यहीं, इसी कमरे में और इसी बिस्तर पर. आपको सच में डरने की आवश्यकता नहीं है.” इस बार पार्थ ने लंड को सोनी के होंठों से लगा दिया.

सोनी ने मुंह खोला और पहले जीभ से पार्थ के लंड को चाटा। हर कोण से चाटने के बाद उसने लंड मुंह में लिया और चूसने लगी. यहाँ उसका वर्षों का अनुभव था, और इसमें वो निपुण थी. पार्थ भी खड़ा हुआ यही सोच रहा था कि सोनी के लंड चूसने का ढंग बहुत भिन्न था और कामोत्तेजक भी. बीच बीच में लंड निकालकर सोनी उसे हर ओर से चाटती और फिर चूसने लगती. धीरे धीरे वो पार्थ के लंड को अपने मुंह में अधिक अंदर तक लेने में सफल हो रही थी. पर एक व्यवधान के बाद वो रुक गई और फिर उतनी ही गहराई तक लंड को चूसने और चाटने में लगी रही.

पार्थ जानता था कि इस बार अगर वो जल्दी झड़ेगा तो चूत और गांड में अधिक समय तक टिक पायेगा. इसीलिए वो भी स्वयं भी शीघ्र झड़ने के लिए आतुर था. सात आठ मिनट की चुसाई के बाद पार्थ ने सोनी को बताया कि अब वो झड़ने वाला है और उन्हें पूरा पानी पीना होगा. सोनी बिना रुके अपने काम में लगी रही और जब पार्थ ने अपना पानी छोड़ा तो सोनी ने बिना संकोच या कठिनाई के उसके लगभग पूरा रस पीने में सफलता पाई. जो उसके मुंह से बाहर निकला, उसे उसने उँगलियों के माध्यम से इकट्ठा करने के बाद चाट लिया.

“बहुत सुंदर! सोनी जी, इस पड़ाव में तो आप उच्च कोटि से भी ऊपर निकल गयीं.”

सोनी अपनी प्रशंसा सुनकर चहक उठी.

“तो अब मुझे भी आपके इस प्रयास का उत्तर देना होगा, चलिए बिस्तर पर ही चलते हैं, आगे का खेल वहीँ खेलेंगे.” पार्थ ने सोनी को बिस्तर पर बैठा दिया. फिर उसके पाँव खोले और चूत की ओर देखा जो अब पसीजी हुई थी.

“मुझे इसका स्वाद लेना है, आप लेट जाएँ तो अच्छा है.”

सोनी बिस्तर पर उचित स्थिति में लेट गई और अपने पाँवों को फैला दी. पार्थ ने कुछ ही क्षणों में सोनी को अपनी प्रतिभा से अवगत करा दिया. सोनी वैसे तो कई लोगों से चुदवा चुकी थी, परन्तु उनमें से अधिकांश चूत चाटने के क्षेत्र में अनुभवी नहीं थे. वे एक प्रकार से नौसिखिये थे जो चोदना तो भली भांति जानते थे पर चाटने और चूसने में निपुण नहीं थे. पर जिस प्रकार से पार्थ उसकी चूत से खेल रहा था, जिस प्रकार से उसके होंठ, जीभ और उँगलियाँ अपना संगीत बना रही थीं उसका स्तर ही भिन्न था. सोनी की चूत से पानी बहे जा रहा था और पार्थ निःसंकोच उसे पी भी रहा था.

जब पार्थ को ये लगा कि सोनी अब चुदने के लिए पर्याप्त रूप से आतुर हो चुकी है तो वो हटा और अपना आसन सोनी के पैरों के बीच में लगाया. सोनी ने उसके मोटे लम्बे लंड को देखा तो सिहर उठी. क्या सच में वो इस दैत्य को अपनी चूत में ले पायेगी? क्या ये उसके जीवन का अंतिम दिन है? परन्तु उसने सोचा कि अंतिम हो या नहीं, इस लंड से चुदे बिना मरना भी ठीक नहीं होगा.

“थोड़ा प्यार से डालना, पार्थ। मैंने इतने बड़े लंड से कभी चुदवाया नहीं है. प्लीज.”

“सोनी जी, मैंने आपको विश्वास दिलाया था और फिर से कहता हूँ, कि कुछ क्षणों के लिए आपको अवश्य कष्ट हो सकता है, हालाँकि मैं प्रयास करूँगा कि वो भी न हो, परन्तु उसके बाद आपको आनंद की ऐसी ऊंचाई पर ले जाऊँगा जिसे अपने अब तक अनुभव नहीं किया है. परन्तु कुछ संयम अवश्य रखना होगा.”

“मैं तुम पर विश्वास कर रही हूँ. राशि ने भी यही कहा था. वो मुझसे झूठ नहीं बोलती. मैं तुम्हारी शरण में हूँ. ले चलो जहाँ मैं आज तक नहीं पहुँची।” सोनी ने कुछ साहस से कहा, हालाँकि उसका मन अभी भी विस्मित था.

पार्थ ने अपने लंड से सोनी की चूत को घिसना आरम्भ किया. सोनी की चूत ने आशय समझकर आने वाले आगंतुक के लिए रस से अपनी गुफा को भिगाया. पार्थ ने बहुत ध्यान और संयम के साथ अपने लंड को सोनी की चूत में डालना आरम्भ किया. पक्क की हल्की ध्वनि के साथ उसके सुपाड़े ने अपना स्थान सोनी की चूत में ग्रहण कर लिया. सोनी साँस रोके अपनी चूत के संहार की प्रतीक्षा कर रही थी. पर अब तक सब ठीक था. पार्थ ने लंड पर उसी प्रकार से दबाव बनाये रखा और उसके लंड का प्रयाण भी आगे चलता रहा. लगभग आधे लंड के अंदर जाने के बाद पार्थ रुका और सोनी के चेहरे को देखा. उसे देखकर वो मुस्कुराया.

“कुछ पता लगा?” पूछने पर सोनी ने न में सिर हिलाया.

“ठीक है, अभी लंड पूरा अंदर नहीं है, मैं इसी लम्बाई से आपकी चुदाई करूँगा, धीरे धीरे आपको स्वयं ही और गहराई से चुदने की इच्छा होगी.”

पार्थ ने सधी ताल से सोनी की चुदाई आरम्भ की, सोनी को ये आभास नहीं हुआ कि हर कुछ धक्कों के बाद पार्थ अपने लंड को कुछ और गहराई तक डाल रहा था. वो तो इस चुदाई से इतना उत्तेजित हो चुकी थी कि अब उसे पार्थ के कहे अनुसार और अधिक गहरी चुदाई की इच्छा होने लगी.

“थोड़ा और डालो, बहुत अच्छा लग रहा है. ऐसा मुझे कभी नहीं लगा. प्लीज, थोड़ा और.”

पार्थ कब मना करने वाला था. उसने कुछ और अंदर तक लंड डाला और कुछ गति भी बढ़ा दी. सोनी को अब आनंद की परिभाषा समझ आने लगी थी. अब उसकी लंड की चाह और तीव्र होने लगी थी. और जैसे जैसे वो पार्थ को प्रोत्साहित करती, पार्थ उसे और तीव्रता से चोदने लगता. अचानक सोनी की साँस मानो रुक गई. उसकी आँखें फ़ैल गईं। उसे लगा कि अब उसका अंत आ गया है. पार्थ ने अचानक ही अपने पूरे लंड को उसकी चूत में उतार दिया था और रुक गया था. पार्थ भी सोनी के चेहरे के भाव देख रहा था. कुछ देर तक सोनी यूँ ही निष्चल पड़ी रही, फिर सचेत हुई और उसने पार्थ को देखा.

“मैं मरी नहीं?”

“नहीं.”

“तो फिर चोदो मुझे. मरने तक चोदो। पूरा लंड डाल दिया है न? तो अब मुझे उसका प्रताप भी दिखाओ.”

“ये हुई न बात, अब आप उस शिखर पर पहुंचेंगी जिसकी अपने कल्पना भी नहीं की होगी.”

इसके साथ ही पार्थ ने अपने शक्तिशाली कूल्हे हिलाये और सोनी की चूत को अपने लंड की पूरी लम्बाई से चोदने लगा. सोनी को सच में कुछ नए ब्रम्हांड के दर्शन होने लगे. वो जैसे आकाश में रंग बिरंगे तारों के मध्यस्त थी, हर रंग नया था, अनूठा था. उसके शरीर का हर अंग आनंद की तरंग में बह रहा था. विशेषकर उसकी चूत जिसे किसी बलशाली वस्तु से प्रताड़ित किया जा रहा था. उन्हीं रंगों में अचानक परिवर्तन हुआ. सब एक दूसरे में मिलने लगे, फिर अलग हुए, फिर मिले. उसका शरीर एक नया अनुभव कर रहा था जो जीवित होने पर सम्भव नहीं था.

उसकी आँखे उसके सामने किसी को देख रही थीं, जो एक अत्यंत सुंदर और बलशाली पुरुष था. और उन दोनों का शरीर जुड़ा हुआ था. सोनी की आँखों में एक बार रंग मिल गए पर इस बार वे जुड़े रहे, उसे लगा कि उसका शरीर उसके वश में नहीं था. वो छटपटा रही थी, आनंद से. उसकी एक तीव्र किलकारी या चीख ने उसे इस तंद्रा से जगाया. उसके शरीर के स्पंदन रुक नहीं रहे थे. सामने वो पुरुष अभी तक उससे जुड़ा हुआ था. धीरे धीरे वो लौटी तो पार्थ को पहचान गई. उसे ये भी आभास हुआ कि अब पार्थ का लंड उसकी चूत में अवश्य था, पर कुछ कम कड़ा था. पार्थ उसे देखकर मुस्कुराया.

“कैसा लगा, सोनी जी?”

“क्या, मैं अभी भी जीवित हूँ. मुझे तो समस्त ब्रम्हांड के दर्शन हो गए.”

पार्थ ने अपना लंड बाहर निकाला. सोनी को हाथ पकड़कर उठाया और उसके मुंह को लंड पर लगा दिया. सोनी स्वतः ही उसे चाटने लगी और फिर थोड़ी देर चूसी भी.

“पार्थ तुमने सच कहा था, मुझे ऐसा अनुभव कभी भी नहीं हुआ है.”

“धन्यवाद, और अब अपनी चूत से रस निकालकर चाटिये. फिर कुछ देर विश्राम करते हैं.”

सोनी अपनी चूत में ऊँगली डालकर पार्थ और अपने रस के मिश्रण को चाटने लगी. विश्राम के समय सोनी ने अपने विषय में कुछ कुछ बताया. उनके पति के व्यवसाय के कारण अधिकतर बाहर जाना पड़ता था. पहले वो भी उनके साथ जाती थीं, परन्तु अकेली वहाँ भी ऊब जाती थीं. फिर सहेलियों के साथ किट्टी पार्टियों में सम्मिलित हो गयीं. कुछ ही वर्ष पहले उनकी किट्टी की सहेलियों ने मुंबई जाने की योजना बनाई. उनमें से एक ने किसी एक एजेंसी के द्वारा युवा साथियों की व्यवस्था कर ली. उस यात्रा में सोनी ने पहली बार अपने पति के सिवाय किसी और से सहवास किया था. एक शारीरिक अपेक्षा की संतुष्टि हो गई.

इसके बाद ये एक सामान्य प्रक्रिया हो गई. आनंद तो आता था, परन्तु इसका मुख्य ध्येय शरीर की आवश्यकता ही रही. कुछ महीनों पहले राशि ने जाना बंद कर दिया. पूछने पर इस क्लब के बारे में बताया, और आज वो अपने इस निर्णय से पूर्णतया संतुष्ट थी. पार्थ ने कुछ अधिक नहीं बताया. और अब समय अंतिम चरण को विधिवत पूरा करने का था. पार्थ मन में तो सोनी को सदस्यता दे ही चुका था, परन्तु सोनी की गांड का भोग किये हुए वो उन्हें छोड़ भी नहीं सकता था. पार्थ के लंड ने अंगड़ाई ली तो सोनी से छुपा न रहा. उसकी आँखों में भय की परछाईं देखकर पार्थ ने उन्हें आश्वासन दिया.

“पार्थ, अब तक मेरी गांड केवल मेरे पति ने ही मारी है, वो भी इन ३२ वर्षों में कुल आठ से दस बार. गांड मरवाये हुए मुझे एक लम्बा समय हो चुका है. हालाँकि मैं जानती हूँ कि तुम मुझे अधिक कष्ट नहीं दोगे, पर अगर मैं कहूँ रुकने के लिए तो कृपा करके बुरा न मानना।”

“ये विश्वास मैं आपको पहले भी दिला चुका हूँ.” पार्थ के मन में लड्डू फूट रहे थे. सोनी के कहने का ये तात्पर्य था कि उसकी गांड इस आयु में भी एक सीमा तक अछूती ही थी. गांड की कसावट के बारे में सोचकर पार्थ का लंड फनफना गया और सोनी की आँखें फट गयीं.

“आइये, पहले आपकी गांड को इस क्रिया के लिए उचित स्थिति में लेकर आते हैं. इससे आपको न केवल आनंद ही आएगा, बल्कि आगे आने वाले आनंद की भी कल्पना हो जाएगी. इसके बाद सच मानिये आप गांड मरवाने के लिए सदा उतावली रहेंगी. और इस क्लब के हर रोमियो से आपको इस आनंद की प्राप्ति होगी.”

सोनी का शरीर सिहर उठा. पार्थ ने अनजाने में ही उसकी सदस्यता की पुष्टि कर दी थी. पार्थ सोनी को देखकर ये सोच रहा था कि आज के बाद ये चुदाई के लिए इतनी आतुर रहेंगी कि दो तीन महीने में ही डबल चुदाई के लिए भी मान जाएँगी. पार्थ ने शोनाली बुआ से ये निश्चित करने का प्रण किया कि जब भी सोनी का इस प्रकार का निवेदन आएगा, उसे अवश्य बताया जाये. अन्यथा तीन महीने के बाद वो स्वयं ही इस कांड को पूरा करेगा. पार्थ ने सोनी का हाथ पकड़कर उन्हें बिस्तर पर घोड़ी का आसन लेने का आदेश दिया. घोड़ी बनकर भी सोनी के हाथ पाँव काँप रहे था.

पार्थ ने सामने के मनोरम दृश्य को देखा तो उसका तना लंड ऊपर नीचे होने लगा. सोनी की चिकनी गांड पर हाथ फिराते हुए उसने अपनी जीभ से उसके गांड के फूल को छेड़ा. सोनी को गुदगुदी सी हुई और वो मचल गई.

“क्या कर रहे हो?”

“ओह, इतनी सुंदर और मनभावन गांड को देखकर स्वाद लेने का मन किया.” पार्थ ने उत्तर दिया और फिर से जीभ से सोनी की गांड को चाटा। सोनी खिलखिलाने लगी. पार्थ अपने पथ पर अग्रसर रहा. सोनी की गोलाइयों को अपने हाथों से अलग किया और सामने उभरी गांड पर अपने मुंह से लार टपका दी. अँगूठे से लार को सोनी की गांड के छल्ले पर रगड़ा. अब सोनी का भय न जाने कहाँ खो गया. सोनी की गांड को अब पार्थ ने फिर से चाटना आरम्भ किया. इस बार उसकी इस क्रिया में लालसा थी. सोनी की गांड केवल उसके पति ने ही मारी थी. उसकी गांड को किसी ओर ने कभी स्पर्श भी नहीं किया था, चाटना तो दूर ही बात रही.

पार्थ सोनी को उस सीमा तक ले जाना चाहता था जहाँ सोनी का भय समाप्त हो जाये. अगर वो तनाव में रही तो उसकी गांड मारने में बहुत कठिनाई होनी थी, और सम्भवतः सोनी को आनंद के स्थान पर इस कृत्य से अरुचि हो जाती. उसे किसी भी प्रकार की शीघ्रता नहीं थी. दो घंटे की सीमा केवल रोमियो के लिए होती है. पार्थ अपने पूरे ध्यान के साथ सोनी की गांड का रसास्वादन कर रहा था. सोनी की गांड भी अब तनावमुक्त हो चुकी थी. गांड के अंदर जीभ डालकर पार्थ ने सोनी को विस्मित किया और वो झड़ गई. पार्थ मुस्कुराया, ये किला अब मेरे आगे हार मान ही लेगा.

अपनी जीभ से कई मिनट तक पार्थ सोनी की गांड का भोग करता रहा. इसके बाद उसने जीभ निकाली और अपनी छोटी ऊँगली पर जैल लगाया और हल्के से गांड को भेद दिया. सोनी की सिसकी निकली, पर उसने आपत्ति नहीं की. कुछ देर तक उस एक ऊँगली से ही पार्थ गांड मारता रहा. फिर उसने ट्यूब से भारी मात्रा में जैल सोनी की गांड में उड़ेला. फिर गांड के दोनों पाटों को भींचकर जैल को अंदर तक जाने दिया. दोबारा इसी को दोहराने के बाद फिर ऊँगली से गांड को चिकना किया. फिर दूसरी ऊँगली को भी उसमे जोड़ दिया.

अब तक सोनी पूर्ण रूप से तनावमुक्त हो चुकी था. उसका पार्थ पर अथाह विश्वास बन गया था. जितनी देर उसने उसकी गांड को उचित स्थिति में लाने में लगाया था, उसका यही अर्थ था कि वो उसकी बलि तो नहीं ही चढ़ाएगा. अचानक सोनी की आँखें भीग गयीं. उसने निर्णय लिया कि चाहे उसे कितनी भी पीड़ा हो, वो पार्थ को अपनी गांड की भेंट पूरी श्रध्दा से चढ़ायेगी. उसकी गांड ने उसके इस निर्णय का सम्मान किया और पार्थ ने ये अनुभव किया मानो सोनी की गांड की तंग गली कुछ ढीली हो गयी है.

समय आ चुका था. पार्थ ने अपने लंड पर जैल लगाया, गांड में फिर और जैल डाला. और सोनी को बताया कि वो अब गांड मारने जा रहा है. अगर उसे किसी भी प्रकार की असहजता हो तो वो रुक जायेगे. सोनी के मौन का अर्थ पार्थ ने समझ लिया. वो अपनी गांड की आहुति दे रही थी. और पार्थ इसे स्वीकार करने के लिए कर्तव्यबद्ध था.

गांड के संकरे छेद पर अपने लंड को लगाकर पार्थ ने हल्के दबाव के साथ सुपाड़े को अंदर धकेल दिया. सोनी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की. पार्थ ने दबाव बनाये रखा और जब लंड लगभग तीन इंच के लगभग अंदर चला गया तो वो रुक गया. फिर इसी गहराई तक उसने गांड मारना आरम्भ किया. सोनी को इस गहराई तक कोई कष्ट नहीं था. पार्थ के हल्के धक्के उसकी गांड को खोलने में सफल हो रहे थे. सोनी भी इस नए संवेदन सानन्दित हो रही थी. तीन चार मिनट तक इस गहराई को नापने के बाद पार्थ ने फिर लंड को अंदर धकेला और इस बार आधा लंड गांड में समा गया.

पार्थ का इस प्रक्रिया का ढंग ही कुछ ऐसा था कि सोनी को फिर कोई पीड़ा या कष्ट नहीं हुआ. पर उसे अपनी गांड भरी भरी अवश्य लगने लगी. पार्थ ने अब इस गहराई तक गांड मारने का कार्यक्रम आरम्भ किया. गांड ने उसका स्वागत किया और कुछ ही देर में उपयुक्त खुलापन मिल गया. इस गहराई तक भी पार्थ ने तीन चार मिनट गांड मारी. अब सही परीक्षा का समय था. लंड को दबाते हुए पार्थ इस बार आठ नौ इंच तक की गहराई पर जाकर रुका.

सोनी को अब अपनी गांड पैक होने का आभास होने लगा. पार्थ ने पूर्व प्रक्रिया का अनुपालन करते हुए इस गहराई को भी जीत लिया. अब अंतिम पड़ाव था. उसने सोनी की गांड पर हाथ फिरते हुए उसके कूल्हे पकड़े और फिर लंड को अंदर बाहर करते हुए एक झटके में पूरा अंदर पेल दिया. सोनी अचम्भित सी रह गई. इस बार उसे अपनी गांड में एक तीव्र जलन सी हुई, पर पल भर में जैसे वो जलन से खुजली में परिवर्तित हो गई. गांड के अंदर कुनमुनाहट होने लगी. तब उसे उस सत्य का आभास हुआ कि पार्थ के पूरे मूसल ने उसकी गांड में अपना झंडा गाड़ दिया है.

सोनी अचंभित थी कि पार्थ ने कितने संयम का परिचय दिया था. उसकी गांड में एक ऐसा संवेदन हो रहा था जिसका उसे पहले कभी अनुभव नहीं किया था. एक पूर्ति का आभास था. उसे जिस बात का डर था उसने तो अपनी उपस्थिति नहीं दिखाई थी.

“पूरा लंड ले लिया आपने, सोनी जी. बधाई हो. अब मैं आपकी गांड मारने का कार्यक्रम करूँगा। वैसे अब कोई भी कठिनाई नहीं होने चाहिए, पर अगर हो तो बताइयेगा अवश्य.”

पार्थ ने बहुत हल्की गति से अपने लंड का प्रयत्न सोनी की गांड में आरम्भ किया. इस धीमी गति के कारण सोनी को भी लंड के संचालन का पूरा आभास हो रहा था. उसका शरीर एक भिन्न उत्तेजना से कांप रहा था. पार्थ गांड मारने की कला का विशेषज्ञ था. क्लब की कुछ महिलाओं की तो गांड की सील भी उसने ही तोड़ी थी. आज वो स्त्रियाँ हर सम्भव प्रकार की चुदाई में दक्ष हो चुकी थीं. उसे विश्वास था कि सोनी भी उसी राह पर अग्रसर है. एक बार उसे इस प्रकार की चुदाई का आनंद मिल गया तो शीघ्र ही वो अपनी सारी झिझक छोड़कर चुदवाया करेगी.

हल्की गति से जब सोनी की गांड अभ्यस्त हो गई तो पार्थ ने अपने लंड की गति बधाई. सोनी कूँ कूँ की ध्वनि से सिसकारियां लेने लगी. अब गति अवरोधक की आवश्यकता नहीं थी, पर पार्थ ने नियंत्रण नहीं खोया और शनैः शनैः गति बढ़ाता रहा. एक सीमा पर आकर वो रुक गया. उसे इस बात का भान था कि अत्यधिक तीव्र गति से सोनी को चोटिल होने की संभावना थी. और उसने यही गति अंत तक बनाये रखी.

सोनी आनंद के सागर में तैर रही थी. उसे अविस्मरणीय आनंद प्राप्त हो रहा था. अपितु ऐसा सुख उसे आगे जीवन में कभी दोबारा नहीं प्राप्त होगा क्योंकि उसकी गांड मारने वाला हर रोमियो पार्थ के समान संयमी तो नहीं होने वाला. उसके कामांध मन ने जैसे ये पुष्टि कर दी कि वो अब क्लब में सदस्या तो बनेगी ही, पर अन्य रोमियो भी उसकी चूत और गांड का मंथन करेंगे.

“ओह, पार्थ. तुमने मुझे आज जीत लिया. मेरी गांड में न जाने क्या हो रहा है?” सोनी बड़बड़ाई.

इस खेल का पारखी पार्थ उसकी इन भावनाओं को समझ गया. अब उसने अधिक परीक्षा न लेने का विचार मन में लाया और अपने एक हाथ से सोनी के भग्नाशे को मसलने लगा. सोनी के शरीर से मानो ज्वालामुखी फूट पड़ा. शरीर की छटपटाहट ऐसी बड़ी जैसे पानी से निकालने पर मछली तड़पती है. पार्थ को अपने हाथ पर सोनी के रस की फुहार ने अवगत करा दिया की अब इस खेल का अंत करना ही उचित है.

सोनी की चूत को सहलाते हुए, उसके भग्न को छेड़ते हुए पार्थ ने कुछ कुछ गति बधाई और सोनी को आनंद की उस पराकाष्ठा तक ले गया जहाँ वो जीवन में कभी नहीं गई थी. सोनी को फिर उसी ब्रम्हांड के दर्शन हुए, चाँद, तारे और न जाने कितने रंग उसकी आँखों के आगे चलायमान हो गए. अपने शरीर पर उसका वश न रहा. कुछ समय उपरांत उसे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे उसके शरीर में कहीं कोई पानी भर रहा हो. अपने शिखर से उतरते हुए इस संवेदना का कारण पता चल गया.

पार्थ के लंड से रस की धार उसकी गांड को भर रही थी. गांड में ठंडे और गर्म का सम्मिश्रण हो रहा था. एक अनूठी अनुभूति थी. पार्थ ने लंड पूरा गाड़कर अपना रस छोड़ा था. अब उसके वीर के किले से बाहर निकलने का समय था. संभालते हुए उसने अपने लंड को सोनी की खुली गांड से बाहर निकाला. सोनी एकदम वहीँ पर ढह गई. पार्थ मुस्कुराया. उसे अब अपने क्लब के लिए एक और सदस्या मिल गई थी.

चेतना लौटने पर सोनी ने स्वप्निल आँखों से पार्थ को देखा, “थैंक यू. तुमने आज मुझे पूर्ण रूप से बदल दिया. मैं इसे सदा याद रखूँगी.”

इसके बाद सोनी ने अपनी गांड में ऊँगली डाली और कुछ रस एकत्रित किया. “हालाँकि मुझे ये सोचकर पहले घिन आई थी की मुझे ये भी करना होगा, पर तुम्हारे इस उपकार के लिए मैं इसे भी पूरी रूचि के साथ ग्रहण करुँगी.” सोनी ने अपनी उँगलियों को चाटा और पार्थ को दिखाया.

“इतना ही पर्याप्त है. इसका अभिप्राय केवल इतना ही है कि आप आगे से किसी भी इस कृत्य को घिनौना नहीं समझेंगी. अब आप जाकर स्नान कर लें.” पार्थ ने कहा और सोनी को हाथ से उठाया.

सोनी नहाने चली गई, पार्थ ने उसकी सदस्यता के आवेदन को स्वीकृति दी. सोनी के बाहर आने पर उसने भी स्नान किया और बाहर आया तो सोनी कपड़े पहन चुकी थी. पार्थ ने टेबल के अंदर से एक लाल कंगन निकाला और सोनी को दिया.

“आप अभी गांड मरवाने में इतनी अनुभवी नहीं हैं. क्लब में आने पर आप ये पहन लिया कीजिये. इससे हमारे रोमियो को पता चल जायेगा कि आपके साथ कैसा व्यवहार करना है. जब आप पूर्ण रूप से आश्वस्त हो जाएँ तब इसे पहनना बंद कर सकती हैं.”

सोनी ने कंगन अपने पर्स में रख लिया और पार्थ का एक बार फिर धन्यवाद किया.

“आपको कार चलने में अगर असुविधा हो तो मैं आपकी कार चला सकता हूँ.”

सोनी ने इसके लिए स्वीकृति दी तो पार्थ ने कहा कि वो उसी कमरे में रुकें और जब निकलने का समय होगा तो वो उन्हें ले चलेगा.

इसके बाद पार्थ आवेदन पत्र लेकर चला गया और सोनी अपनी कल्पना में खो गई.

क्रमशः

1200700
 
अध्याय ३४: आठवाँ घर - स्मिता और विक्रम शेट्टी ५

************************

दिंची क्लब में शोनाली और मेहुल:

शोनाली अपनी सैंडल चटखाते हुए निर्धारित कमरे तक पहुंची और दरवाजा खोला. मेहुल जो बहुत देर से उसी ओर देख रहा था अंदर आई महिला को देखकर चौंक गया. वहीँ शोनाली भी स्तब्ध रह गई.

शोनाली: “तुम! मेहुल!”

मेहुल: “शोनाली आंटीजी आप! ओह शिट!”

शोनाली: “हम्म्म, पार्थ ने मुझे बताया नहीं कि आज तुम्हारा साक्षात्कार है. उसे तो मैं बाद में ठीक करुँगी.”

मेहुल: “आंटीजी, मुझे भी सचिन ने ये नहीं बताया कि आप यहाँ की संचालिका हैं. अगर आप चाहें तो मैं अभी यहाँ से चला जाता हूँ.” ये कहते हुए मेहुल उठने लगा.

शोनाली ने मेहुल को देखा, “नहीं, इसकी कोई आवश्यकता नहीं है. जो भी है हम अब एक दूसरे के विषय में जान ही चुके हैं. तो क्लब के लिए मैं इसे यूँ ही नहीं जाने दे सकती. और फिर तुम भी मेरे विचार से जाना नहीं चाहोगे. तुम बैठो, मैं स्नान करके आती हूँ.”

शोनाली स्नान करने घुस गई और सोचने लगी कि निखिल और पार्थ के साथ उनके ही आठ परिवारों के समूह में तीन तीन बड़े लंड वाले कैसे हो सकते हैं? नितिन को मिला लें तो चार हो जायेंगे. स्नान करने के बाद उसने गाउन डाला और कमरे में आ गई. मेहुल ने उसके भीगे शरीर को देखा और बालों से चूते पानी को देखकर उसका लंड खड़ा हो गया. अब उसका जाना सम्भव नहीं था.

“तो मेहुल, मैं पहले यहाँ के कुछ नियम बता देती हूँ. फिर तुम्हारा नाप लिया जायेगा, तुम्हें विश्वास है कि तुम्हारा लंड दस इंच से अधिक बढ़ा है.”

मेहुल उनके मुंह से लंड सुनकर चकित हुआ, “जी, विश्वास है.”

इसके बाद मेहुल को भी शोनाली ने नियम बताये.

शोनाली: “मेहुल, यहाँ पर हमारी सदस्य महिलाएं अपने शरीर की प्यास मिटाने के लिए आती है. वो यहाँ प्यार ढूंढने नहीं बल्कि चुदने के लिए आती हैं. इस बात को सदा याद रखना. कभी भी कोई सदस्या अगर अधिक निकट आने का प्रयास करे तो पार्थ या मुझे इसके बारे में बता देना.”

इसके बाद उसने कमरे में रखे फोन से नूतन को बुलाया. नूतन ने अपने हाथ में फीता लिया और कमरे में चली आई.

“नूतन, तुम्हें मेहुल के खड़ा लंड नापना है. ये कार्य तुम्हारे लिए नया नहीं है, तो मुझे अधिक कुछ बताने की आवश्यकता नहीं है.” शोनाली ने नूतन से कहा.

नूतन मेहुल के पैरों के बीच बैठी और गाउन को हटाया. मेहुल के आधे खड़े लंड को देखते ही नूतन और शोनाली को पता चल गया कि नापना व्यर्थ है, पर नियम की अनदेखी भी नहीं की जा सकती थी. नूतन ने लंड को चाटा और फिर मुंह में लेकर चूसने लगी. शोनाली का कहना सही था, नूतन इस कार्य में विशेष रूप से निपुण थी और कुछ ही देर में मेहुल का लंड पूर्ण रूप से तन गया.

शोनाली भी देख रही थी. उसे कालिया का लंड याद आ गया. आज मेरी गांड फटेगी!

“ठीक है नूतन, अब नापो।”

नूतन ने मेहुल को खड़े होने के लिए कहा और फिर उसके लंड को थामकर उसे नापा।

“११.८ इंच है.” नूतन ने हकलाते हुए बताया.

“हम्म्म, बहुत सही. हमारे यहाँ का रिकॉर्ड क्या है अब तक का?”

“मुझे याद नहीं है मैडम, पर ये अवश्य पता है कि १२ इंच तक कोई भी नहीं है.”

“मेरा भी यही विचार है. कालिया भी मेहुल के आसपास ही है. ठीक है तुम जा सकती हो.”

नूतन चली गई और कुछ ही देर में फोन बजा.

“मैडम कालिया का लंड ११. ७ इंच है.”

“धन्यवाद, नूतन.”

“हाँ तो मेहुल, अब बताओ कि क्या तुम अगले चरण पर जाना चाहोगे?”

“जी, बिलकुल.”

“अगर यहाँ आये हो तो अवश्य तुम्हें चुदाई की तकनीकें पता होंगी ही. तो क्यों नहीं तुम मुझे अपने मुंह और जीभ का कौशल दिखाओ.” शोनाली ने मेहुल से कहा.

“अवश्य।” मेहुल ने कहा और उसे बाँहों में लेकर होंठ चूमने लगा.

शोनाली का अर्थ कुछ भिन्न था परन्तु मेहुल ने ये जानकर भी इस प्रकार से हो आगे बढ़ने का निर्णय लिया. कुछ ही पलों में शोनाली उसकी बाँहों में कसमसाने लगी और मेहुल ने दोनों के शरीर पर लदे गाउन उतार दिए. एक दूसरे से यूँ ही लिपटे हुए चूमते हुए मेहुल सधे पाँवों से शोनाली को बिस्तर की ओर ले गया. बिस्तर के पास जाकर उसने चुंबन तोड़ा और शोनाली को बिस्तर पर लेटने का संकेत दिया. शोनाली कंपकंपाते हुए बिस्तर पर लेटी तो मेहुल ने उसके पैरों को फैलाया और फिर उसकी चूत के पास नाक लगाकर एक गहरी साँस ली. शोनाली की चूत की सुगंध उसके नथुनों से होते हुए उसके फेफड़ों में समा गई.

फिर उसने जीभ से केवल भग्नाशे को छेड़ा और कुछ समय तक बस यही करता रहा. शोनाली की साँसे अब और तीव्र हो चली थीं. इसके बाद मेहुल चूत के बाहरी भाग को चाटने लगा. हर छिद्र को उसने चाटा और इस पूरे समय शोनाली केवल आहें और सिसकारियां ही लेती रही. जैसे ही मेहुल की जीभ ने शोनाली की चूत में प्रवेश किया, शोनाली का संयम टूट गया और वो मेहुल के मुंह में ही झड़ गई. मेहुल ने कोई आपत्ति नहीं की, न ही अपने सिर को गंतव्य से हटाया. मेहुल अपनी लय में शोनाली की चूत चाटता और चूसता रहा. जब शोनाली फिर झड़ने के निकट पहुंची तो अचानक मेहुल ने अपनी जीभ बाहर निकाल ली. शोनाली छटपटा उठी.

पर मेहुल ने उसकी गांड के नीचे हाथ रखते हुए उसके कूल्हे उठाये और अपनी जीभ को शोनाली की गांड की गोलाई पर फिराने लगा. शोनाली की छटपटाहट और बढ़ गई. उसने भी अपने कूल्हे और उठा लिए और मेहुल के लिए अब गांड का स्वाद लेने में सरलता हो गई. मेहुल ने भी इस सुगमता का लाभ उठाया और गांड के छेद को भरपूर चाटा। फिर जब उसे लगा कि शोनाली स्वयं को संभाल पायेगी तो उसने कूल्हे के नीचे से हाथ हटाकर गांड को खोला और जीभ अंदर कर दी. शोनाली की सिसकारी ने उसे बता दिया कि वो सही पथ पर है. पर इस आसन में ये कार्य अत्यधिक कठिन था, इसीलिए मेहुल ने इसे बाद में पूर्ण करने का निर्णय लिया और लौट कर चूत पर ध्यान लगाया. कुछ ही देर में शोनाली एक बार और झड़ी और उसके चेहरे पर तृप्ति का भाव आ गए.

“बहुत अच्छा, अति उत्तम. अब मुझे तुम्हारे लंड की शक्ति का परीक्षण करना है. तो आओ मुझे अपना लंड चूसने के लिए दो.”

मेहुल ने शोनाली को बैठाया और वो जब बिस्तर के किनारे आ गयी तो उसे अपना लंड प्रस्तुत कर दिया. शोनाली ने मेहुल के लंड को चाटने और चूसने में अपना पूरा परिश्रम लगाया. लंड बड़ा होने के कारण उसे कुछ असहजता अवश्य हुई, पर इस क्लब में बड़े लंड वाला वो पहला नहीं था तो शोनाली ने शीघ्र ही अपनी ताल पकड़ ली. मेहुल उसके सिर पर हाथ रखे हुए था और शोनाली के इस परिश्रम का आनंद ले रहा था. परन्तु उसके मन में एक विचार और चल रहा था.

उसकी तीव्र बुद्धि ने शीघ्र ही ये समझ लिया कि अगर पार्थ और उसकी बुआ इस प्रकार के क्लब के संयोजक हैं तो उनके परिवार में भी कौटुम्बिक व्यभिचार परम्परा होगी. अब उसे ये पता था कि राणा परिवार इसमें संलिप्त था. वहीं कल के रहस्योद्घाटन के बाद नायक परिवार में भी यही प्रथा थी. शोनाली की बेटी सागरिका का विवाह समर्थ सिंह के परिवार में तय हुआ था, तो सम्भव है कि वहां भी इस प्रकार का ही वातावरण होगा. अर्थात, इन आठ घरों में से पाँच घरों में पारिवारिक चुदाई चलती थी. ये कितना अविश्वसनीय संयोग था? तो क्या अन्य तीनों परिवार बजाज, डिसूजा और पटेल भी?

क्या इस विषय में उसे कुछ छानबीन करना चाहिए? अगर पता चल भी गया तो क्या अंतर पड़ेगा? फिर उसकी आँखों में उन परिवारों की स्त्रियों के चेहरे और भरेपूरे शरीर घूमने लगे. अवश्य, अंतर तो पड़ेगा. उसने इसके लिए अपने नए मित्र सचिन की सहायता लेने का निश्चय किया. सचिन भी अपनी माँ की चुदाई करता था और माँ बेटे इस क्लब का हिस्सा थे, माँ सदस्या के रूप में तो सचिन रोमियो की भूमिका में. इस योजना के बारे में आगे सोचने का निश्चय करने के बाद उसने शोनाली के मुंह में अपने लंड के धक्के लगाने आरम्भ किये. शोनाली जो अब तक अकेली ही सारा परिश्रम कर रही थी, इस सहायता से प्रसन्न हो गई. शोनाली के मुंह में झड़ने के बाद शोनाली ने उसके वीर्य को पीने में कोई कोताही नहीं की.

शोनाली को मेहुल के रस में कुछ नया ही स्वाद आया. उसे अपनी नन्द सुमति के भाग्य पर जलन हुई जो गांड में छोड़े हुए रस का पहला स्वाद लेने वाली थी. पर शोनाली ईर्ष्या करने वाली स्त्रियों में तो थी नहीं, उसने अपने इन विचारों को शीघ्र ही मन से दूर कर दिया.

“तुम्हें कितना समय लगेगा?” शोनाली ने मेहुल से पूछा फिर उसके लंड को देखा. लंड अभी भी उसी स्थिति में था, हाँ कुछ कड़ापन कम हुआ था पर उसका आकार अभी भी यथावत था.

“अधिक नहीं, बस कुछ ही मिनट.” मेहुल ने घड़ी की ओर देखा तो उन्हें अभी २५ मिनट ही लगे थे, अर्थात अन्य दो चरणों के लिए पर्याप्त समय था.

शोनाली उससे कुछ इधर उधर की बात करने लगी. इतना अनुभव कैसे है, कितनी स्त्रियों को चोदा है, इत्यादि. उसे आश्चर्य हुआ कि मेहुल का लगभग सम्पूर्ण अनुभव मध्यम आयु या उनसे बड़ी स्त्रियों के साथ ही था. क्लब के लिए इसका ये अनुभव बहुत मूल्यवान होने वाला था, अगर वो उत्तीर्ण होता. पर मेहुल के लंड की वर्तमान स्थिति को देखकर शोनाली को विश्वास था कि ऐसा न होने की संभावना नगण्य थी. शोनाली की अपेक्षा के अनुसार अधिक देर प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी. अपने हाथ से इस पूरे समय वो मेहुल के लौड़े को सहलाती रही थी. जब उसे लगा कि वो अंगड़ाइयाँ लेने लगा है तो अपने मुंह से कुछ देर चाटकर उसे गीला किया.

“मेरे विचार से अब चुदाई की परीक्षा की जा सकती है. तुम मुझे जिस प्रकार से भी चाहो चोद सकते हो. क्लब में हर लौड़े से चुदवा चुकी हूँ तो मुझे नहीं लगता कि कोई कठिनाई होगी. पर पहले मेरी चूत को चाटकर समुचित रूप से गीला कर दो.”

शोनाली ने लेटते हुए अपने पैर खोल दिए. मेहुल ने कुछ समय उसकी चूत को चाटा और फिर अपने लंड को उसपर रखते हुए घिसने लगा. चूत से हल्का पानी रिसा और मेहुल ने सही अवसर जानकर एक अच्छा धक्का लगाया और उसके लंड का आधा भाग शोनाली की चूत में प्रविष्ट हो गया. शोनाली को आनंद की अनुभूति होने लगी. उसे विश्वास हो गया कि मेहुल की माँग क्लब में बहुत अच्छी रहने की आशा थी. मेहुल ने शोनाली के चेहरे को देखा और किसी प्रकार की व्यथा को न देखकर लंड को बाहर निकाला और इस बार के धक्के ने उसे लगभग पूरी गहराई तक पहुंचा दिया.

“ओह! सचमुच बड़ा है. कुछ बचा है क्या?” शोनाली को लगा कि अब लंड पूरा घुस चुका होगा.

मेहुल ने कोई उत्तर नहीं दिया। वो अपने पाशविक रूप में लौटने लगा था. उसने लंड को फिर से बाहर निकाला और इस बार के धक्के की शक्ति इतनी अधिक थी कि न केवल लंड पूरा अंदर समा गया, बल्कि इतना सुगठित पलंग भी हिल गया. शोनाली की भी स्थिति एकदम परिवर्तित हो गई. उसकी चूत में मानो कोई चाकू चल गया हो. इतने लौड़े लेने के बाद भी मेहुल के शक्तिशाली धक्के ने उसकी नींव हिला दी.

मेहुल अब कहाँ रुकने वाला था. वो लम्बे धक्कों के साथ शोनाली की चुदाई करने लगा. एक बार लंड की ताल सही बैठे के बाद उसने शोनाली के मम्मों पर हाथ रखे और उन्हें मसलते हुए उसकी उग्रतम चुदाई करने लगा. शोनाली को इस सब से संतुलित होने में कुछ समय लगा पर फिर उसने भी मेहुल का साथ देना प्रारम्भ कर दिया. मेहुल का लंड शोनाली की हर गहराई को छू रहा था और शोनाली को भी इसमें पूर्ण आनंद मिल रहा था.

मेहुल की शक्ति और सामर्थ्य से वो बहुत प्रभावित हुई. क्लब की कुछ विशिष्ट महिलाएं जो इस प्रकार की चुदाई के लिए लालायित रहती थीं उनके लिए तो मेहुल एक वरदान होने वाला था. विशेषकर उसकी क्षमता और तीव्रता जो किसी इंजन के पिस्टन के समान द्रुत गति से चलायमान था. शोनाली भी इस चुदाई से आल्हादित होकर पानी छोड़ रही थी. उसकी जलमग्न चूत में मेहुल के लंड के चलने से ऐसी ध्वनि आ रही थी मानो कोई नौका चल रही हो.

“छप, छप, छप, छप, छप, छप.”

शोनाली की चुदाई करते समय मेहुल के सामने उस महिला की भी छवि आ रही थी जिसे उसने रिसेप्शन पर देखा था. उसकी आयु पचपन की रही होगी, पर चुदाई में पूरा आनंद देगी. उसकी गांड मारने में क्या आनंद आएगा. पर उसके पहले उसे शोनाली आंटी की गांड का फालूदा बनाना था. और इसके लिए भी वो उत्सुक था. उसकी तीव्र गति से चुदाई और मन में चल रहे अनेक कलुषित विचारों के ही कारण उसके लंड में अब उबाल आने लगा था. शोनाली भी अब सम्भवतः दो बार झड़ चुकी थी तो उसे अब झड़ने में कोई समस्या नहीं दिखी. उसने शोनाली को बताया कि वो झड़ने वाला है और शोनाली ने उसे उत्साह से झड़ने के लिए आमंत्रित किया. कुछ ही पलों में मेहुल का वीर्यरस शोनाली की चूत को सींच रहा था. अपने लंड से अंतिम बून्द निकलने तक मेहुल ने लंड को अंदर ही जमाये रखा और फिर बाहर निकाल लिया.

शोनाली ने उसे पास बुलाया और लेटे हुए उसके लंड को स्वच्छता प्रदान की. इसके बाद उसने मेहुल को हटने के लिए कहा और फिर वैसे ही लेटे हुए अपनी चूत में से मिश्रित रस को निकालकर चाटा। बस यही मिल सकता है. गांड वाला मिश्रण तो सुमति दीदी के लिए सुरक्षित रखना होगा. कुछ देर लेटे रहने के बाद वो उठी और टेबल में से गांड बंद करने वाला प्लग निकाला। उसे ढूंढकर एक मोटा प्लग निकाला क्योंकि उसकी गांड का फैलाव छोटे प्लग को रोक नहीं पाता और सुमति के लिए उसकी गांड में कुछ नहीं बचता.

शोनाली ने मेहुल को समझाया कि उसकी गांड में झड़ने के पश्चात उसे उसकी गांड को उस प्लग से बंद करना है. मेहुल ने इसके लिए हामी भरी. पर इसके साथ ही उसे ये भी विश्वास हो गया कि इस परिवार में भी चुदाई की प्रथा है. क्या सच में इतने परिवार इस प्रकार से लिप्त हैं? आंटी किसके लिए उसके वीर्य को संभाल रही हैं? पार्थ के परिवार के बारे में सोचा तो उसे सुमति पर सबसे अधिक संशय हुआ. उसका लंड अब फिर से अपने रौद्र रूप में आ रहा था. शोनाली उसकी इस प्रतिक्रिया से मुस्कराई. मेहुल का लंड कालिया से किंचित ही बड़ा था, इसीलिए समस्या कोई नहीं थी. पर एक अनावश्यक सी झुनझुनी उसकी गांड में हो रही था. सम्भवतः ये सोचकर कि जब सुमति को पता लगेगा कि उसका आज का भोग पड़ोस के ही लड़के का है तो उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी।

शोनाली ने घड़ी देखी, अब केवल ४५ मिनट ही शेष थे.

“पर्याप्त हैं.” ये सोचकर वो उठी और मेहुल को पीछे आने के लिए कहा.

बिस्तर पर जाकर घोड़ी बन गई और टेबल की ओर संकेत करके मेहुल को जैल की ट्यूब लेने के लिए कहा.

“क्या मैं कुछ समय इस सुंदर गांड की सराहना कर सकता हूँ?” मेहुल ने प्रश्न किया तो शोनाली ने उसे अनुमति दे दी.

“वाओ आंटीजी. आपकी गांड बहुत ही मस्त है और क्या गोलाई है.” मेहुल ने उसके नितम्ब पर हाथ से सहलाते हुए कहा.

कुछ देर यूँ ही हाथों से सहलाने के बाद उसके गांड के दोनों और के गोलार्धों को अलग किया तो लुपलुप करती गांड का छेद उसके सामने खुल गया. अपनी जीभ से गांड की बाहरी झुर्रीदार त्वचा को चाटा तो शोनाली सिहर गई. मेहुल ने अपनी जीभ से बाहर के हर छिद्र हर रोम को चाटकर लाल कर दिया. फिर गांड के अंदर जीभ से कुरेदना आरम्भ किया. जब उसे लगा कि गांड अब लौड़े के लिए उतावली हो रही है तो उसने ट्यूब से जैल निकाला और गांड में अच्छे से भर दिया. दो उँगलियों की सहायता से गांड पूर्ण रूप से चिकनी हो गई. अपने लंड पर भी जैल चिपड़ने के बाद उसने घड़ी देखी, ३५ मिनट.

“आंटीजी, मैं आ रहा हूँ.” मेहुल ने चेताया.

“स्वागत है.” शोनाली ने उत्तर दिया, “अपने ढंग से मारो. गांड मेरी बहुत मारी गई है, इसीलिए हर प्रकार के आक्रमण के लिए सदैव उत्सुक रहती है.”

मेहुल ने गांड में सुपाड़ा डाला, जो बिना किसी अड़चन के अंदर चला गया. इतने बड़े लौडों से मरवाती है, खुली तो होनी ही थी. तीन इंच तक लंड को अंदर डालने के बाद मेहुल रुका, फिर लंड को बाहर खींचा और एक तीव्र धक्के के साथ पूरे लंड को अंदर पेल दिया. शोनाली की चीख निकली और वो औंधे मुंह बिस्तर पर गिर गई. इस कारण उसकी गांड में लंड और तंग हो गया. मेहुल ने शोनाली को उठने या सम्भलने का अवसर नहीं दिया. इस प्रकार उसे गांड में कुछ अधिक घर्षण मिल रहा था और वो लम्बी थापों के साथ शोनाली की गांड मारने में जुट गया.

तीन चार मिनट तक इस प्रकार से गांड मारने के बाद उसने गति कम की और शोनाली को घोड़ी के आसन में लौटने में सहायता की.

“बड़े निर्मम हो, मेहुल.” शोनाली ने कहा तो सही पर इसमें अभियोग का अभिप्राय नहीं था.

एक बार सही स्थिति में आने के बाद मेहुल ने फिर से शोनाली की गांड का बैंड बजाना आरम्भ कर दिया. शोनाली अब तक मेहुल की अद्भुत शक्ति और सामर्थ्य की प्रशंसक बन चुकी थी. उसने भी गांड हिला हिला कर, उछाल उछाल कर मेहुल की ताल से ताल मिलाई। मेहुल को शोनाली की ये प्रतिक्रिया बहुत भा गई. अधिकतर उससे गांड मरवाने वाली आंटियां उसे ही पूरा परिश्रम करने देती थीं और बस ऊह आह वाह के अतिरिक्त कोई और अन्य प्रतिक्रिया कम ही देती थीं. इसका अर्थ ये नहीं की उन्हें गांड में उसका लौड़ा अच्छा नहीं लगता था, बस वो इतनी उन्मुक्त होकर नहीं चुदवाती थीं.

“आंटीजी, क्या गांड है आपकी, और आपकी ये थिरकते हुए गोल गोल नितम्बों का तो कोई सानी नहीं. सच में आपकी गांड मारने में जो मजा आ रहा है उतनी किसी और गांड में नहीं आया. यू आर टू गुड ए फक.” मेहुल प्रशंसा किये बिना न रह सका.

शोनाली ने भी अपनी गांड को आगे पीछे करते हुए उसका उत्तर दिया, “लौड़ा तेरा भी मस्त है. क्या गांड की सिलाई खोल रहा है. सच में तुझसे गांड मरवाने के लिए मुझे अपना कलेंडर बनाना पड़ेगा. पार्थ के साथ भी इतना…” शोनाली झोंक में बोल तो गई पर रुक कर भी उसने सच्चाई को उजागर कर ही दिया. वो चुप हो गई.

“आंटीजी, मैं बच्चा नहीं हूँ, मैं समझ चुका हूँ कि पार्थ आपकी चुदाई करता ही होगा. अन्यथा इस प्रकार से आप दोनों इस क्लब का प्रबंधन नहीं कर रहे होते. पर मुझे कोई अंतर नहीं पड़ता है. ये आपके बीच का विषय है. बस मुझे बीच बीच में अपनी गांड मारने का अवसर देती रहना.”

शोनाली ने गहरी श्वास भरी और अपनी गांड को फिर उछालने लगी, मेहुल ने भी निर्भीक होकर गति और गहराई दोनों को चपल कर दिया. कमरे में गूंजती थापों का संगीत सुरीला हो चला था. उसमे शोनाली की सिसकारियां और मेहुल के हू हू के स्वरों ने नया ही रंग भर दिया था. दो बार झड़ चुकने के कारण अब मेहुल बहुत देर से शोनाली की गांड मार रहा था. परन्तु इस गति ने उसे भी अब अपने अंत तक ला ही दिया था.

“आंटीजी, मैं झड़ने ही वाला हूँ. प्लग से आपकी गांड बंद कर दूँगा जैसा अपने कहा है.”

“ओके ओके. भर दे मेरी गांड और बंद कर दे उसे. मेरा भी अब और झड़ने का संबल नहीं है.” शोनाली ने एक प्रकार से चैन की साँस ली.

कुछ और तेज धक्कों के बाद मेहुल ने अपना लंड जड़ तक गाढ़ दिया और झड़ने लगा. प्लग को उसने अपने हाथ में लिया और उसे शोनाली की चूत से झरते पानी से गीला किया. झड़ने के बाद उसने अपने लंड के सुकड़ने तक लंड को पूरा अंदर गाड़े रखा. फिर अत्यंत सावधानी से लंड को बाहर निकाला. और प्लग से शोनाली की गांड को बंद कर दिया. कुछ बूँदे अवश्य बाहर छूट गयीं. शोनाली ने हाथ पीछे कर के प्लग की जाँच की. जो कुछ बूँदे उसकी उँगलियों के सम्पर्क में आयीं उन्हें इकट्ठा करके चाट लिया. मेहुल ने घड़ी देखी. दो घंटे पूरे होने में बस दो ही मिनट शेष थे. शोनाली ने भी ये देखा और मुस्कुरा दी.

“अब तुम हटो पाँच मिनट के लिए.” शोनाली ने कहा.

उसके बाद उसने अपने बैग से एक बेल्ट निकली जिसे कमर में बाँधा। उस बेल्ट में एक और बेल्ट थी जो नीचे की ओर जाती थी. उस बेल्ट को भी बाँधा और मेहुल को उसका अभिप्राय समझ आ गया. दूसरी बेल्ट के बाँधने से अब प्लग गांड से निकल नहीं सकता था. पर इससे शोनाली को अवश्य असुविधा हो रही होगी. मेहुल ने उस स्त्री के प्रति शोनाली के प्रेम को देखकर उसके मन में शोनाली के प्रति आदर और बढ़ गया.

इसके बाद शोनाली ने कपड़े पहने और मेहुल से कहा कि वो चाहे तो स्नान कर सकता है. मेहुल ने झटपट स्नान किया और कमरे में आकर अपने कपड़े पहन लिए.

“मैं दिंची क्लब के रोमियो के रूप में तुम्हारा स्वागत करती हूँ. फिर मिलेंगे. अब मुझे निकलना होगा.” ये कहते हुए शोनाली ने फॉर्म पर उत्तीर्ण लिखकर हस्ताक्षर किये और सैंडल चटकाती हुई चली गई.

***********************

मेहुल का प्रस्थान:

मेहुल कपड़े पहनकर बाहर आया तो देखा कि उसके बगल वाले कमरे से सोनी निकल रही हैं. उसने उन्हें नमस्ते कहा.

“हैलो, मैडम.”

“हैलो यंग मैन, क्या नाम है तुम्हारा?”

“जी मेहुल. आज मेरा इंटरव्यू था यहाँ काम के लिए.” मेहुल सोनी के साथ चलते हुए बोला।

“गुड़, इसका अर्थ हम मिलते रहेंगे. मैं भी आज सदस्या बनी हूँ.”

“जी बहुत अच्छा. अवश्य ही मिलना होगा तब तो. आप संतुष्ट हैं?” मेहुल ने पूछा तो सोनी ने उसकी ओर देखा.

मेहुल को लगा उसने गलत प्रश्न कर दिया, “मेरा अर्थ है क्लब से, वातावरण इत्यादि.”

“हाँ संतुष्ट हूँ. क्लब से भी, वातावरण से भी और इत्यादि से भी. इत्यादि से सबसे अधिक.” ये कहते हुए सोनी हंस दी.

मेहुल ने भी उसके हंसी में साथ दिया. रिसेप्शन पर पार्थ और शोनाली खड़े थे. शोनाली ने सोनी की बिगड़ी चाल को देखा तो मुस्कुरा पड़ी.

धीरे से पार्थ के कान में फुसफुसाई, “इसकी चाल बदल दी तुमने.”

“आइये सोनी जी, मैं आपको आपके घर छोड़ देता हूँ.” पार्थ ने सोनी से कहा तो सोनी ने अपने पर्स से कार की चाबी उसे थमा दी.

फिर नूतन की ओर देखकर बोली, “नूतन धन्यवाद.”

नूतन का चेहरा खिल उठा. उसे इस प्रकार से कम ही लोग धन्यवाद करते थे, “आपका स्वागत है, मैडम. क्लब की सदस्या बनने के लिए आपका आभार और बधाई.”

“फिर मिलते हैं, नूतन.” ये कहकर सोनी पार्थ के साथ बाहर चली गई.

“तुम कैसे आये हो, मेहुल?”

“जी, अपनी कार से.”

“हम्म्म, नूतन क्या कोई अन्य कार्य है आज?”

“नो, मैडम. आल डन फॉर द डे.”

“तो चाहो तो मेहुल के साथ चली जाओ, सिक्युरिटी को लॉक करने का आदेश दे देते हैं.”

“धन्यवाद, मैडम.” ये कहते हुए नूतन ने सिक्युरिटी को बुला भेजा.

“मेहुल, मैं चलती हूँ. तुम नूतन का ध्यान रखना.” ये कहते हुए शोनाली ने मेहुल को आँख मारी और अपनी कार की ओर चली गई.

सिक्युरिटी के आने के बाद उसे प्रभार देकर नूतन ने अपनी पुस्तक, पर्स इत्यादि लिया और मेहुल के साथ निकल गई.

************************

पार्थ और सोनी:

पार्थ सोनी को लेकर चल पड़ा. सोनी के चेहरे पर संतुष्टि और समर्पण के भाव थे, जिन्हें पार्थ भली भांति समझता था. एक गहरी साँस लेते हुए पार्थ ने हर नई सदस्या के साथ चली बात को दोहराया. उसने सोनी को समझाया कि क्लब प्रेम करने का स्थान नहीं है. इसे केवल वो अपनी शारीरिक तृप्ति का ही एक मार्ग समझे. ऐसा करने से उसे कभी भी भविष्य में दुःख नहीं पहुंचेगा. सोनी भी बुद्धिमान थी और उसने पार्थ को विश्वास दिलाया कि उसका ऐसा कोई आशय नहीं है, न ही पहले था. वो अपने जीवन से संतुष्ट थी, और जो कमी थी उसका उसे उपचार मिल गया था.

इसके बाद सोनी ने पार्थ से पूछा कि राशि ने और किन किन स्त्रियों के नाम सुझाये हैं. सोनी के अतिरिक्त जो चार और नाम थे वो उसने सोनी को बताये. और ये भी बताया कि वो केवल एक ही को अभी सदस्यता दे सकता था.

“सबको लेने में क्या बुराई है?” सोनी ने पूछा.

“क्लब में अभी इतने रोमियो नहीं हैं कि हम इससे अधिक सदस्य बना सकें. आज एक जुड़ा है इसीलिए दो स्थान बने हैं. हम एक रोमियो के जुड़ने पर ही एक या दो सदस्य बनाते हैं.”

“हम्म्म, बात तो सही कह रहे हो, पार्थ.” इसके बाद सोनी ने उन चारों में से एक का नाम सुझाया.

“सुंदर है, धनी है, विधवा है, और मेरे समान चुड़क्कड़ है, हम सबसे अधिक. जहाँ तक मुझे पता है वो अवश्य सबसे पहले जुड़नी चाहिए. उसके बाद…” ये कहते हुए सोनी ने अपनी सूची पार्थ को बता दी. पार्थ ने उसे याद कर लिया।

“और क्लब में क्या क्या चलता है? क्या करती हैं यहाँ पर इतनी सारी महिलाएं?”

पार्थ: “कुछ तो आपको इस महीने के अंत की पार्टी में पता चल जायेगा. हर माह के अंतिम शनिवार और रविवार को पार्टी होती है. इसमें सभी रोमियो आते ही हैं और अधिकांश सदस्याएं भी आती हैं. ये एक सेक्स पार्टी होती है जिसमें आपको अनेकानेक प्रकार की चुदाई के दृश्य देखने मिलेंगे. आप स्वयं भी अपनी इच्छानुसार भाग ले सकती हैं. अगले सप्ताह आप की एक और सहेली के भी जुड़ने का अनुमान है.”

सोनी: “क्या किसी महिला की कोई विशेष कामना भी होती है?”

पार्थ ने गियर बदला और कुछ देर सोचने के बाद बोला, “मैं आपको किसी का नाम नहीं बताऊंगा, पर कुछ की विशिष्ट इच्छाओं और कामनाओं के बारे में बता देता हूँ.”

सोनी ध्यान से सुनने लगी.

“एक महिला हैं जो फ्लफर की भूमिका निभाती हैं. ये ऐसी भूमिका है जिसमें वो एक प्रकार से स्वच्छता का बीड़ा उठाती हैं. जब भी किसी महिला की चुदाई पूर्ण होती है तो वो उसकी चूत या गांड को चाटकर साफ करती हैं और उनके रस को पीती हैं. पार्टी के समापन के निकट आने पर ही वो अपनी चुदाई करवाती हैं. परन्तु जितनी चुदाई पार्टी में चलती है, तो उनके लिए हर स्थान पर उपस्थित होना सम्भव तो नहीं होता, परन्तु उनकी इस लालसा से अब अन्य सदस्य महिलाएं अवगत हैं तो वो उनकी प्रतीक्षा करती हैं या स्वयं ही उनके सामने चली जाती हैं.”

सोनी आश्चर्य से सुन रही थी.

“एक महिला हैं जो स्वयं को लेस्बियन मानती हैं, वे कभी भी लंड को चूत में नहीं लेतीं। उन्होंने जीवन में केवल चार या पांच लंड ही अपनी चूत में लिए हैं. उनमें से एक मेरा भी है, सदस्या बनने के लिए उन्होंने ये बलिदान किया था.” पार्थ ने हंसकर कहा तो सोनी भी हंस पड़ी.

“तो वो क्लब में आती ही क्यों हैं?”

“उन्हें अपनी चूत में लंड अच्छे नहीं लगते, परन्तु गांड मरवाने में बहुत रूचि है. तो उन दो दिनों में वे लगभग हमारे सारे रोमियो से अपनी गांड मरवाती हैं. फिर उन्हें अपनी संगत के लिए चूतें भी मिल जाती हैं. कई महिलाओं को उनसे अपनी चूत चटवाने में असीम सुख मिलता है.”

“ओके”

पार्थ ने सोनी की ओर देखा, “क्या आप सच में कुछ और सुनना चाहेंगी?”

सोनी ने हामी भरी.

“हमारी एक सदस्या हैं जिनका एक अलग ही व्यसन है. इसे अंग्रेजी में गोल्डन शॉवर कहते हैं.”

“ये क्या होता है?”

पार्थ ने सोचा फिर बता ही दिया, “उन्हें रोमियो और अन्य स्त्रियों के मूत्र पीने या उससे स्नान जैसा करने में आनंद आता है. क्योंकि इसके कारण उनकी चुदाई बाद में कम होती है, तो पहले वो मन भर के चुदवाती हैं और फिर अपनी इस इच्छा को पूरा करती हैं. अपनी चुदाई के बाद वो अधिकांश समय बाथरूम के टब में ही रहती हैं, जहाँ जब किसी को जाना होता है तो वो उन्हें अपना मूत्र दान करता है.”

“छी छी छी.” सोनी के मुंह से निकल पड़ा.

“इसीलिए मैंने पूछा था. सेक्स में कई लोगों के अपने अपने विचार और विकृतियां होती हैं. बड़ी बात ये है कि क्लब में इन्हें पूरा करने का हम सम्पूर्ण प्रयास करते हैं. दूसरी ओर कोई भी किसी दूसरे की विकृति से घृणा नहीं करता. सब अपने आनंद में डूबे रहते हैं.”

“पार्टी में डबल और ट्रिपल चुदाई सबसे अधिक होती है. आप समझ रही होंगी. इसका अर्थ है कि एक ही स्त्री की चूत और गांड में दो अलग लंड, और कभी मुंह में तीसरा लंड भी होता है. सबसे अधिक प्रचलित यही है.”

सोनी सोच रही थी कि उसने तो अपने जीवन में कुछ देखा ही नहीं. सोनी का घर भी आ गया था. उसने पार्थ के होंठ चूमे और उसे धन्यवाद दिया.

“मुझे बताना आपने किसे चुना. वैसे राशि भी क्लब की पार्टी में आएगी क्या?”

“अब तक तो नहीं आयी हैं, परन्तु आगे के बारे में कहना सम्भव नहीं. हो सकता आ ही जाएँ. और आपकी जिस सहेली को चुनूँगा आपको अवश्य बता दूंगा.”

सोनी उतर कर घर चली गई, पार्थ उसकी मटकती गांड को देखता रहा और फिर अपने घर के लिए चल पड़ा.

*********************

नूतन और मेहुल:

मेहुल नूतन को लेकर चल पड़ा. नूतन की चूत में हलचल मची हुई थी. उसने जब से मेहुल के लंड नापा था चुदवाने की कल्पना मात्र से ही उत्तेजित हो गई थी. शोनाली ने उसे इस इच्छा को पूरी करने का सुअवसर तो दिया था, पर क्या मेहुल भी उसका साथ देगा?

“तो कैसा रहा क्लब में प्रवेश?” उसने बात आरम्भ करने के प्रयोजन से पूछा.

“अच्छा और अप्रत्याशित.” मेहुल ने उत्तर दिया. पर ये नहीं बताया कि उसने शोनाली के इस रूप की कभी कल्पना भी नहीं की थी.

“शोनाली और मैं कॉलेज में साथ थीं.” नूतन ने बताया. इस बात पर मेहुल चौंक गया और उसने नूतन को देखा.

“आप दिखती तो नहीं हैं. मुझे तो आप बहुत युवा लगती हैं. कैसे?”

इस बात पर नूतन खिलखिला पड़ी. “मस्का मार रहे हो? और अगर इस मस्के से कुछ पाना चाहते हो तो…”

“तो?”

“पा सकते हो, जो चाहो, जैसे चाहो.” ये कहकर नूतन ने अपने हाथ मेहुल की जांघ पर रखे और सहला दिया.

“हम्म्म, सुझाव अच्छा है. अगर आपको कोई आपत्ति नहीं तो मैं क्यों कर पीछे हटूँगा। पर पहले आप शोनाली मैडम और अपने विषय में कुछ बताइये.”

“हम दोनों कॉलेज में एक साथ थीं. हॉस्टल के एक ही कमरे में हम एक साल रहीं थीं, फिर शोनाली की माँ ने हमें एक फ्लैट किराये पर दिलवा दिया था. हम दोनों एक दूसरे से तो संबंध हॉस्टल में ही बना चुके थे, पर फ्लैट में आने के बाद तो हम लड़कों से भी चुदवाने लगे. ये हमें बहुत समय बाद पता चला कि शोनाली की मम्मी का हमें फ्लैट दिलवाने का उद्देश्य क्या था.”

“जब हम दोनों कॉलेज में होतीं तो हमें बताये बिना वो फ्लैट में आतीं और चुदवाती थीं. घर वैसे ही साफ सुथरा रहता और हम दोनों को कभी भी कोई शंका नहीं हुई. हम दोनों के कमरे अलग थे और फिर बॉय फ्रेंड भी बन गए. मैं तो एक हो बॉय फ्रेंड के साथ छह आठ महीने रहती थी, पर शोनाली किसी को एक महीने से अधिक नहीं टिकने देती थी. एक दिन मुझे कॉलेज में ही बहुत तेज ज्वर चढ़ गया तो मैं अपने फ्लैट में लौट गई. देखा तो शोनाली के कमरे में से कुछ पटकने जैसी ध्वनि आ रही थी. शोनाली तो कॉलेज में थी, तो यहाँ कौन था.”

“मैंने डरते हुए कमरे में झाँका तो शोनाली की मम्मी दो लड़कों से चुदवा रही थीं. समस्या ये हुई कि उन्होंने मुझे देख लिया था, हालाँकि मुझे उस समय पता नहीं चला. मैं अपने कमरे में गई और दवा लेकर लेट गई. कुछ देर में मुझे नींद आ गई. दो या तीन घंटे बाद मेरे कमरे में कोई आया तो मैंने आँख खोली. शोनाली की मम्मी खड़ी हुई थीं.

“नूतन, बेटी क्या हुआ?” उनके स्वर में चिंता थी, पर कोई ग्लानि नहीं थी.

“आंटीजी, बहुत तेज ज्वर है. अब कुछ ठीक लग रहा है.” आंटी ने मुझे पानी पिलाया और फिर खाने के लिए कुछ लेकर आ गयीं. मुझे प्रेम से खिलाया और फिर मुझे लिटा दिया.

“अगर अब तक तुम नहीं समझी हो तो मैंने ये फ्लैट जितना तुम दोनों के लिए लिया है, उतना ही अपने लिए भी.”

मैंने उन्हें देखा पर कुछ बोला नहीं.

“मेरे तलाक के बाद मुझे भी चुदाई की इच्छा होती है. तुम दोनों तो इसके लिए तरसती नहीं हो, पर मुझे अपने नगर में चुदवाने में बहुत कठिनाई है. तो शोनाली ने मुझे ये रास्ता सुझाया था. अगर तुमने उन लड़कों को नहीं पहचाना हो तो वो दोनों शोनाली के बॉय फ्रेंड रह चुके हैं. मुझे नए नए लंड दिलवाने के लिए ही वो इतनी जल्दी बॉय फ्रेंड बदलती है. और फिर उन्हें मुझे सौंप देती है.”

“जिस दिन उसे कोई सही लड़का मिल जायेगा, उस दिन ये सब भी रुक जायेगा. तब तक मैं भी इसका पूरा आनंद ले रही हूँ.”

“इस रहस्य के खुलने के बाद आंटी हमारे पास नियमित रूप से आने लगीं. फिर शोनाली को उनके पति जॉय मिल गए और मुझे अपने पति. दो वर्ष बाद हम दोनों ने विवाह कर लिए. आंटी ने वो फ्लैट दो तीन वर्ष और रखा और फिर छोड़ दिया. उन्हें भी एक पुरुष मित्र ने विवाह के लिए प्रस्ताव रखा और उन्होंने विवाह कर लिया और इन सबसे दूर हो गयीं.”

“शोनाली और उसके पति जॉय सेक्स के विषय में उन्मुक्त थे और उन्होंने अन्य साथियों के साथ चुदाई करना आरम्भ कर दिया. मैं अपने पति के प्रति उनके देहांत तक निष्ठावान रही. उनके बीमे के कारण मुझे काफी धनराशि मिल गई, पर उनके व्यवसाय को संभालना मेरे लिए कठिन था. शोनाली के समझाने पर मैंने उसके पति जॉय को दस प्रतिशत का हिस्सा बेच दिया और फिर उन्होंने उसे अच्छे से संभाल लिया. अब वो उसमे ३०% के भागीदार हैं और इतने पर ही हम सब संतुष्ट हैं.”

मेहुल ध्यान से सब सुन रहा था.

“मेरे पति के देहांत की बरसी के कुछ दिन बाद शोनाली ने मुझे अपने जीवन को फिर से जीने का आग्रह किया. हमारे कोई संतान नहीं थी, तो एकाकीपन सताता था. उसने मुझे आग्रह किया कि अगले कुछ दिन तक जो वो कहेगी, वही मैं करुँगी और जीवन के रस से पुनः आनंद लूँगी। उसके अगले दिन उसने पार्थ को मेरे पास भेजा. इसके बाद क्लब से जुड़ना हुआ और अब हालाँकि मैं अपने पति के लिए दुःखी हूँ पर अन्य रूप से जीवन जीने का प्रयास कर रही हूँ.”

मेहुल को उसकी इस कहानी से उसके प्रति आदर बढ़ गया. और शोनाली के प्रति भी. नूतन का घर भी आ गया था. गाड़ी लगाकर दोनों अंदर चले गए.

**************

शोनाली:

शोनाली ने कार में बैठते ही सुमति को फोन किया और बता दिया कि वो घर लौट रही है, उसके लिए उपहार लेकर. सुमति बहुत प्रसन्न हो गई और शोनाली ने फोन काट दिया. आज उसे कुछ अधिक ही संतुष्टि मिली थी. इसका एक कारण मेहुल के द्वारा की गई श्रेष्ठ चुदाई, दूसरा मेहुल के साथ मिलना जो एक आश्चर्य था और जिसके लिए उसने पार्थ की खिंचाई करनी थी. और फिर नूतन को मेहुल के साथ भेजना. उसे विश्वास था कि मेहुल नूतन की भी भरपूर चुदाई करेगा. अन्यथा नूतन को न जाने कब मेहुल का साथ मिलता, ये कहना सम्भव नहीं था.

कल उसे क्लब के अगले सप्ताह की नियुक्तियाँ देखनी होंगी, फिर माह के अंत की पार्टी भी सिर पर आ चुकी थी. इस बार उसे नहीं लगता था कि वे कोई विशेष कार्यक्रम कर पाएंगे. उसने कल सिमरन से बात करके कैटरिंग का प्रबंध करने का निर्णय लिया. अन्य कार्यक्रम के लिए भी उसे पार्थ और रूचि से बात करनी होगी. वैसे भी वो इस बार रूचि की माँ राशि को आमंत्रित करना चाहती थी. वो सदस्या थीं, परन्तु क्लब कभी आई नहीं थीं. इस बार उनकी दो सहेलियाँ भी रहेंगी, तो हो सकता है आ जाएँ.

घर पहुंचकर उसके कार बंद करने के पहले ही तड़ाक से दरवाजा खुला और सुमति का उद्वेलित चेहरा सामने दिखा. शोनाली को हंसी आते आते रह गई. कार से निकलकर उसने सुमति का हाथ थामा और दोनों शोनाली के कमरे में चली गयीं. सुमति ने जल्दी से अपने कपड़े उतारे और शोनाली को आशा से देखने लगी. सुमति भी अब तक अपने कपड़े निकाल चुकी थी. वो जाकर सोफे पर बैठ गई और अपने पैर फैला लिए. सुमति उसके सामने बैठी और गांड के प्लग को देखा.

“बहुत बड़ा लंड था क्या, भाभी? ये मोटा वाला प्लग लगाया हुआ है.” सुमति ने पूछा.

“हाँ बहुत बड़ा था, और उसने मेरी गांड को पूरा भरा हुआ है. उसका रस मेरी गांड में तैर रहा है. थोड़ा ध्यान से निकालना प्लग को नहीं तो बाहर गिर जायेगा फिर आपको दुःख होगा.”

“वाह क्या बात है, वैसे कौन था?”

“बाद में बताउंगी. पहले अपना काम करो.”

सुमति ने शोनाली की गांड के नीचे अपनी जीभ फैलाई और फिर धीरे से प्लग को निकाला. प्लग के कुछ ही बाहर आते आते शोनाली की गांड से रस बहने लगा. सुमति ने उसे चाटते हुए प्लग को निकालना चालू रखा. जैसे जैसे प्लग बाहर आता, रस भी बाहर निकलता. अब प्लग उस स्थान पर था जहाँ से उसे पूरा ही बाहर निकला था. सुमति ने अपने अनुभव के आधार पर शोनाली की गांड को ऊपर उठाया और प्लग को बाहर खींचा और एक ही झटके में अपना मुंह शोनाली की गांड पर लगाकर खोल दिया. शोनाली की गांड से रस की नदी सुमति के मुंह में प्रवेश कर गई.

आरम्भ की धार जब चुक गई तो सुमति ने अपनी जीभ से शोनाली की गांड को अंदर से चाटा और हर बून्द को पी लिया. ये सुमति का अद्भुत अनुभव ही था कि एक भी बून्द उसके मुंह के बाहर नहीं गिरी. अंदर बाहर से गांड को चाटने के बाद सुमति संतुष्ट हो गई और चटखारे लेते हुए बैठ गई.

“बहुत स्वादिष्ट मिश्रण था आज तो दीदी, कौन है वो?”

“मेहुल, आठ नंबर वालों का लड़का. और उसका लंड अब तक का क्लब का सबसे बड़ा और मोटा लंड है.”

“ओह! तो फिर मुझे भी चुदवाओ न भाभी. एक नए मोटे लौड़े से गांड मरवाने की बड़ी इच्छा है.”

“ठीक है, देखती हूँ कब आपकी ये इच्छा पूरी कर पाती हूँ. पर शीघ्र ही उसके लौड़े से अपनी चूत और गांड फड़वाने के लिए आप मन बना लीजिये. चलिए अब मैं नहा लेती हूँ. फिर देखते हैं घर में और क्या चल रहा है.”

फिर कुछ सोचते हुए, “दीदी, मैं पार्थ की क्लास लेने वाली हूँ. उसने मुझे बताया नहीं कि मेहुल है आज का नया रोमियो. तो आप बीच में मत पड़ना, ठीक है?”

सुमति अपने बेटे के ऊपर क्रुद्ध शोनाली को देखती रही. फिर उसने सिर हिलाया.

“मैं जानती हूँ भाभी, आप उसे भी आहत नहीं करोगी. पर क्या आप ये करते हुए इस बात को निश्चित कर सकती हैं कि मैं वहाँ नहीं रहूँ.”

“ठीक है. अब मैं नहा लेती हूँ.”

इसके बाद शोनाली नहाने चली गई और सुमति अपनी जीभ और मुंह में बसे स्वाद को लिए हुए बाहर.

*************************

महक की भावी ससुराल:

महक जब राणा परिवार के घर पहुंची तो सुबह के दस बजे हुए थे. सुनीति ने उसे अंदर खींचा और गले से लगा लिया. फिर उसे कंधों से पकड़कर कुछ दूर करते हुए ध्यान से देखा.

“सच में तुम बहुत सुंदर हो महक. असीम को तुमसे अच्छी पत्नी नहीं मिल सकती थी.”

महक शर्मा गई. पर इसका उसके पास कोई उत्तर तो था नहीं.

“अब ये बताओ कि क्या लोगी? फिर मैंने कुमार को कहा है वो हमें जहाँ जाना है ले जायेगा.” सुनीति ने उसे सोफे पर बैठाते हुए पूछा.

“चाय या कॉफी, कुछ भी ठीक है.” महक ने कहा.

सुनीति ने सलोनी को कॉफी बनाने के लिए कहा और फिर बोली कि तब तक कपडे बदलकर आती है. सलोनी चाय लेकर आई और इतने में सुनीति भी आ गई. सुनीति ने सलोनी को कुमार को बुलाने के लिए कहा और भावी सास बहू चाय पीने लगीं. कुमार आया और उसने महक को नमस्ते की और फिर अपनी चाय पीने लगा.

“तो मॉम, क्या कार्यक्रम है आज आपका? मुझे दो बजे तक छोड़ देना, कुछ काम है.”

“ठीक है, वैसे महक भी गाड़ी चला ही लेती है, तुम चाहो तो हमें मॉल में छोड़कर भी जा सकते हो. तुम्हारे रहने से व्यर्थ का व्यवधान ही रहेगा और तुम भी बोर हो जाओगे.” सुनीति ने कहा.

“ये भी ठीक है. तो चलें?” कुमार के कहने पर सब उठे ही थे की जीवन भी आ गए. महक ने उनके पाँव छूकर आशीर्वाद लिया.

“अरे अब ये सब कौन करता है बहू? जीती रहो.” जीवन ने भी उसे आशीर्वाद दिया. “कहाँ जाने का कार्यक्रम है?”

“बाबूजी, महक को शॉपिंग के लिए ले जा रही हूँ. फिर ये यहीं रुकेगी आज.”

“ये तो बड़ी अच्छी बात है, तो फिर हम शाम को बैठेंगे.”

महक चल पड़ी फिर कार में बैठकर सुनीति से बोली, “मैंने घर में आज रुकने के लिए नहीं बताया.”

सुनीति ने कहा, “कोई बात नहीं, मैं अभी स्मिता से कहे देती हूँ. और सलोनी तुम्हारे घर से तुम्हारे रुकने के लिए आवश्यक वस्त्रादि ले आएगी.”

सुनीति ने स्मिता से आज्ञा ली, और फिर सलोनी से कहा कि वो दोपहर में जाकर आठ नंबर वाले घर से महक का बैग ले आए.

“चलो, अब कोई चिंता नहीं. अब ये बताओ कि तुम साड़ी कैसी पहनती हो?”

“जी, मेरी ऐसी कोई विशेष रूचि नहीं है और मैं आप जैसा चाहेंगी, वही पहन लूँगी.”

“वैसे तुम्हारी मम्मी भी तुम्हारे लिए यही सब करने वाली हैं, पर मेरी इच्छा है कि तुम एक रस्म में तो मेरी साड़ी पहनो.”

“बिलकुल, आप जैसा चाहो.”

“वैसे तुम्हें मैं बता दूँ, आज तुम मेरे और अपने ससुरजी के साथ सोने वाली हो.”

महक ने कुछ नहीं कहा पर कुमार ने लम्बी आह भरी.

“अब तुझे क्या हो गया?” सुनीति ने हंसकर पूछा.

“मैं सोच रहा था कि भाभी आयी हैं तो मुझे भी कुछ प्यार मिलेगा.”

“वो सब भी मिलेगा, अब तो नियमित आया करेगी महक. हैं न महक?”

“जी”

“तो फिर मेरा और भैया का क्या होगा?”

“क्यों तेरी दीदी नहीं है क्या?”

“अरे मम्मी वो आज अपनी सहेली के घर रहने वाली हैं. आपको बताया तो था.”

“अरे हाँ. चल कोई नहीं सलोनी को बुला लेना दोनों भाई. पर आज के लिए महक केवल हम दोनों पति पत्नी की ही है. समझे.”

“समझा मॉम. अब आपकी बात तो माननी ही होगी न?” कुमार ने ऐसे नाटक करते हुए बोला कि महक हंस पड़ी.

“हँसते हुए और भी सुंदर लगती हो महक. ऐसे ही रहा करो. हमारे बीच में कोई दीवार नहीं होनी चाहिए. बहू भी हमें बेटी ही लगती है.”

“हाँ भाभी. सलोनी मौसी हमारी असली मौसी नहीं हैं, पर हम उन्हें मम्मी की बहन ही समझते हैं और भाग्या को अपनी. आप बिलकुल औपचारिकता में मत पड़ना. मम्मी पापा इसीलिए आज आपको अपने साथ रहने के लिए कह रहे हैं कि आपका डर या अन्य भावनाएं मिट सकें और हम सब प्रेम से आगे एक साथ जीवन का आनंद ले सकें.”

महक को ये बात बहुत भाई. उसे पता था कि उसकी मॉम और श्रेया भाभी की मॉम के बीच सहज संबंध नहीं थे. हालाँकि पिछले कुछ दिनों से सुजाता आंटी का व्यवहार कुछ बदला हुआ लग रहा था. मॉम की उनके प्रति राय भी अब कुछ बदल सी रही थी. मॉल आने के बाद कुमार ने सुनीति और महक को कार की चाबी दे दी और फिर मोबाइल से उबर बुक की. सुनीति और महक मॉल में चले गए और कुछ देर बाद कुमार भी निकल गया.

***********************

स्मिता का घर:

सुनीति से बात होने के बाद स्मिता ने फोन काटा और अपने पति विक्रम को बताया कि महक आज अपने भावी ससुराल में ही रहेगी.

“वैसे ये आवश्यक भी है. मेरे सिवाय परिवार में कोई उनसे संबंधियों के रूप में अब तक मिला नहीं है. हम दोनों परिवारों को एक बार साथ मिलने का कार्यक्रम बनाना चाहिए.” स्मिता ने कहा.

विक्रम: “हाँ, ये कर सकते हैं. मैं एक दो दिन में आशीष से बात करूँगा। फिर देखते हैं. वैसे तुम और सुनीति ही इस पूरे कार्यक्रम की व्यवस्था करोगी और तुम दोनों को मना करने का साहस किसी में नहीं है.” विक्रम ने चुहल की.

स्मिता: “ठीक है. कल आप आशीष से बात करना मैं सुनीति से कर लूँगी। अब एक अन्य बात है.”

“क्या?”

“मेरे पास समुदाय के प्रबंधन समिति के सदस्य के लिए प्रस्ताव आया है. वैसे भी चुनाव होगा. परन्तु आपसे पूछे बिना मैं कुछ नहीं करुँगी। “

“मुझे क्या आपत्ति हो सकती है. हाँ ये अवश्य है कि तुम अत्यधिक व्यस्त हो जाओगी, पर वो भी ठीक है. एक वर्ष की ही तो बात है. पर महक का विवाह भी है तो ये निर्णय मैं तुम पर ही छोड़ता हूँ. मेरी ओर से स्वीकृति है.”

“ठीक है, तो मैं नामांकन भर देती हूँ. आवश्यक तो है नहीं कि जीत ही जाऊँगी। और आज क्या सोच रहे हैं? महक है नहीं. मेहुल बाहर है. पता नहीं कब लौटेगा? मोहन भी श्रेया के साथ गया हुआ है और सम्भवतः दोनों श्रेया के मायके में ही रुकेंगे. तो हम दोनों ही हैं आज. आप ऑफिस जा रहे हो क्या?”

“रहने दो. इतने दिनों तो हमें एकांत मिला है. तो मैं ऑफिस से छुट्टी मरता हूँ और हम दोनों अपने पूर्व समय के समान घूमने, और आनंद करने चलते हैं. फिर शाम को अपनी पार्टी करेंगे.”

“अच्छा सुझाव है. कहाँ चलना है?”

“तुम तैयार हो और सोचो. तब तक मैं भी सोचता हूँ. पर चलते हैं कहीं अच्छे स्थान पर.”

स्मिता तुरंत चली गई और विक्रम फोन पर आसपास के स्थानों को देखने लगा जहाँ वो अन्य पर्यटकों को भेजता है. एक स्थान उसे उपयुक्त लगा और उसने वहीँ जाना तय किया. फिर वो भी तैयार होने के लिए अपने कमरे में चला गया.

&&&&&&&&&&&&&&&

अब शाम हो चुकी है.

सुजाता का घर:

शाम होते तक मोहन और श्रेया सुजाता के घर पहुंच गए. सुजाता उन्हें देखकर बहुत प्रसन्न हो गई. श्रेया और सुजाता गले मिलीं और मोहन के साथ श्रेया बैठक में जा बैठी. कुछ ही देर में अविरल और विवेक भी आ गए. सुजाता के पाँव तो जैसे आज थिरक रहे थे. उसने तुरंत उठकर अविरल, मोहन और विवेक के लिए ड्रिंक्स की व्यवस्था की. फिर उसने अपने और श्रेया के लिए भी हल्की ड्रिंक्स बनाईं। फिर पुरुष वर्ग को अकेला छोड़कर माँ बेटी दूसरी ओर बैठ गयीं.

श्रेया: “मॉम, अपने मुझे बताया क्यों नहीं कि मेहुल का लंड इतना बड़ा और मोटा है? सच में बहुत आनंद आया उसके साथ चुदाई में.”

सुजाता: “उसने मुझसे प्रण लिया था कि मैं किसी को भी नहीं बताऊँगी, तुमसे भी यही कहा होगा?”

श्रेया: “हाँ, और मैं भी अपनी बात पर अडिग हूँ.”

सुजाता: “तेरी गांड मारी या नहीं?”

श्रेया: “नहीं मॉम, उस दिन समय कम था. वैसे अभी तक उसने मम्मी जी की गांड भी नहीं मारी है. तो ये तय हुआ है कि हम दोनों की गांड एक साथ मारेगा. बड़ा मजा आने वाला है उस दिन. आपकी गांड मारी थी क्या?”

सुजाता की आँखें जैसे स्वप्निल हो गयीं, “हाँ मारी थी और ऐसा अनुभव दिया था कि मैं उसके सामने नतमस्तक हो गयी. अब तो अगर वो मुझे बुलाये और मुझे बीच सड़क में भी नंगा करके गांड मारना चाहे तो मैं दौड़ी चली जाऊँगी।”

“ओह हो, मॉम. आप तो उसकी दीवानी हो गयी हो, पापा को कोई चिंता तो नहीं करनी चाहिए?” श्रेया ने हसंते हुए पूछा.

सुजाता: “उन्हें न आज तक करने की आवश्यकता पड़ी और न ही आगे पड़ने वाली है. एक बात कहूँ?”

“जी.”

सुजाता: “मेहुल तुझे बहुत मानता है. उसे समझाना कि वो स्नेहा को थोड़ा प्यार से चोदे. स्नेहा उसकी इतने दिनों तक यूँ ही उपेक्षा करती रही है. न जाने क्यों मुझे एक डर सा सता रहा है अपनी बच्ची के लिए.”

श्रेया: “मॉम, मेहुल से शालीन और सौम्य लड़का और दूसरा कोई नहीं है. आप कहती हो तो मैं उसे बोल दूँगी पर डरने जैसी कोई बात मुझे लगती नहीं.”

दो ड्रिंक्स और पीने के बाद सुजाता और श्रेया किचन में खाना लगाने के लिए गए और इतने में ही स्नेहा भी आ गयी. उसने सुजाता और श्रेया को तो देखा नहीं पर मोहन को देखते ही उछल पड़ी.

“जीजू! कब आये? मुझे बोला क्यों नहीं मैं पहले लौट आती.” उसने दौड़कर मोहन को गले लगा लिया और उसे चूमने लगी.

“बस यूँ मन किया तो चले आये. साली से मिले हुए जो इतने दिन हो गए थे.”

“ये अच्छा किया. दीदी कहाँ हैं?”

“किचन में.”

स्नेहा किचन में गई और श्रेया के गले लग गई. दोनों बहनें एक दूसरे को चूमते हुए मिल रही थीं. सुजाता की आँखों में आंसू आ गए. फिर तीनों ने खाना लगाया और सबने बैठकर सप्रेम भोजन किया. भोजन के बाद कुछ देर यूँ ही गपशप चलती रही.

“तो फिर आज सोने का क्या प्रावधान है, सुजाता?”

“मैं तो कहती हूँ सब एक ही कमरे में रहें. बहुत दिन हो गए हमें साथ में चुदाई किये हुए. क्या कहते हो सब?”

सबने अपनी स्वीकृति दी और ये निश्चय हुआ कि अविरल और सुजाता का कमरा ही इस कृत्य के लिए श्रेष्ठ है. घर को बंद करने के बाद सभी उस कमरे में चल दिए.

*********************

स्मिता का घर:

स्मिता और विक्रम दिन भर घूमने के बाद शाम को घर पहुंचे. दोनों को इस प्रकार से अकेले घूमने से अपने पुराने समय की याद आ गयी. उन्होंने निश्चय किया कि महीने में कम से कम एक बार वो इसी प्रकार से बाहर जाया करेंगे. घर पहुंचने के बाद दोनों नहाये और फिर बैठक में विक्रम ने पीने के लिए ड्रिंक्स बनाये. रात के लिए खाना वे साथ ले आये थे.

स्मिता: “चलो, अब हम अकेले हैं. मोहन और श्रेया सुजाता के घर पर हैं और महक अपनी भावी ससुराल में. बस मेहुल को ही आना है. तो देखते हैं कब लौटेगा.”

विक्रम के मन में एक विचार आया, “देखो तो सही कहाँ है, और अगर वो भी किसी मित्र के साथ है और रुकना चाहे तो रुक जाने देना.”

स्मिता: “लगता है आज आपका मूड कुछ अधिक रोमांटिक है.”

विक्रम ने स्मिता को बाँहों में भरते हुए बोला, “सच यार, हमारे पास अब एक दूसरे के लिए पर्याप्त समय ही नहीं रहता. कोई न कोई कार्यक्रम या घटना हमें दूर रखती है. इसीलिए कह रहा हूँ.”

स्मिता ने मेहुल को फोन लगाया.

स्मिता: “हैलो मेहुल? हाँ कहाँ हो अब तक आये नहीं.”

मेहुल: “”

स्मिता: “अच्छा अपनी किसी मित्र के साथ हो, आज आओगे या नहीं?”

मेहुल: “”

स्मिता: “अगर चाहो तो वहाँ ही रुक सकते हो. तुम्हारे पापा ने भी अनुमति दी हुई है.”

मेहुल: “”

स्मिता: “बहुत शरारती हो गए हो. आना कल तो तुम्हें सिखाऊँगी।” हँसते हुए स्मिता ने उत्तर दिया.

मेहुल: “”

स्मिता: “ठीक है, कल सुबह मिलते हैं. एन्जॉय.”

स्मिता ने फोन काटा और विक्रम की ओर देखा, “चलो अब कोई रोड़ा नहीं है. जो मन में आये सो करो आज.”

दोनों एक दूसरे की बाँहों में लिपटे हुए अपने जीवन के अविस्मरणीय पलों के बारे में बातें करते रहे और ड्रिंक्स भी लेते रहे. आज की रात भिन्न थी.

**********************

नूतन और मेहुल:

जब स्मिता का फोन आया तो मेहुल नूतन के घर में उसके बिस्तर पर नंगा लेटा हुआ था. नूतन उसके लंड को चूस रही थी. क्लब से आने के बाद नूतन ने खाना बाहर से मंगा लिया था और खाने के बाद नूतन को मेहुल के लंड से चुदवाने का अवसर भी मिला था. पर इस सब में समय बहुत निकल गया था और शाम हो चुकी थी. नूतन चाहती थी कि अगर सम्भव हो तो मेहुल आज की रात वहीं रुक जाये और उसने मेहुल से भी इसके लिए निवेदन किया था. मेहुल ने कुछ उत्तर नहीं दिया था.

परन्तु जब फोन पर बात हो गई तो नूतन मेहुल की बातों से जान गई कि उसकी प्रार्थना मान ली गई है. मेहुल के लंड को वो और तीव्रता से चूसने में जुट गई. मेहुल ने फोन काटा और नूतन से कहा कि वो आज की रात उसके साथ बिताने के लिए उपलब्ध है. नूतन के आनंद की सीमा न रही. वो खाने के बाद हुई निर्बाध चुदाई की याद करते हुए सिहर उठी.

*********************

सुनीति का घर:

सुनीति और महक शॉपिंग समाप्त करते हुए चार बजे घर पहुंच गयीं थीं. इस अवधि में भावी सास बहू में बहुत बातचीत हुई और उनमे घनिष्टता भी बढ़ गयी. महक को अब सुनीति के साथ कोई भी झिझक नहीं रह गई थी. वैसे तो ये दोनों परिवार एक दूसरे के साथ वर्षों से रह रहे थे और एक दूसरे से अच्छे परिचित भी थे, परन्तु अब होने वाली घनिष्टता और अंतरंगता उस सब पर हावी थी. घर पहुंचकर सलोनी ने महक का बैग उसे दिया और महक और सुनीति स्नान करने चली गयीं।

बाहर आने पर सलोनी ने चाय बनाई हुई थी. कुछ देर अब बैठकर बातें करने के बाद जीवन भी आ गए और वो भी बातों में सम्मिलित हो गए. महक भी जीवन के बलशाली व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना न रह सकी. जीवन ने बताया कि उनके परम मित्र और सुनीति के माता पिता दो दिन बाद आने वाले हैं. कल ड्राइवर को गाड़ी लेकर भेजा जाना है. ये सुनकर सुनीति की प्रसन्नता की कोई सीमा नहीं रही. उसने जीवन के गले लगा लिया और उन्हें चूमने लगी. तब तक सलोनी भी आ गई. उसे ये भी जानकर कि बलवंत और गीता आ रहे है बहुत प्रसन्नता हुई.

घर का वातावरण कई स्तर और प्रफुल्लित हो उठा. उसके बाद छह बजे तक परिवार के अन्य सदस्य भी घर आ गए. असीम को देखकर महक का मन विचलित हो गया. परन्तु वो समुदाय के नियम जानती थी. विवाह तक उन्हें दूर रहना था. वे अन्य किसी के भी साथ चुदाई कर सकते थे, परन्तु एक दूसरे के साथ नहीं. असीम और महक भी एक दूसरे को आँखें चुराकर देख रहे थे. पर कुछ करने की स्थिति में नहीं थे. कुछ देर बाद सलोनी ने सबके लिए पीने पिलाने की व्यवस्था कर दी और दिन भर में हुई घटनाओं के बारे में बातें चलती रहीं. सुनीति ने महक के लिए ली गयी वस्तुओं को सबको दिखाया और जैसा अपेक्षित था सबको बहुत अच्छी लगी.

ड्रिंक्स के बाद भोजन हुआ और फिर पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सुनीति महक को अपने कमरे में ले गयी. असीम और कुमार पहले ही सलोनी पर घात लगाए हुए थे तो सलोनी ने कुछ समय बाद उनके कमरे में आने का आश्वासन दिया. अग्रिमा जीवन की गोद में जा बैठी और फिर उसके साथ ही चली गयी. असीम और कुमार अपने कमरे में चले गए और सलोनी की प्रतीक्षा करने लगे.

सुनीति महक को अपने कमरे में ले गयी.

सुनीति: “महक, पहले जाकर स्नान कर लो, हम सभी ये करते हैं और तुम्हें भी शाम को स्नान करना चाहिए.”

“जी मम्मीजी, हम भी घर में सोने जाने के पहले स्नान करते हैं. मैं अभी जाती हूँ.” ये कहकर उसने अपने बैग में से उचित वस्त्र निकालने लगी.

“इनको आवश्यकता नहीं पड़ेगी,” सुनीति ने मुस्कुराते हुए कहा. “बाथरूम में बाथरोब है, वही पहन लेना.”

“जी.”

“वैसे स्नान करने से त्वचा मुलायम और कोमल हो जाती है. चुदाई में अधिक आनंद आता है, क्यों?”

“जी, मम्मीजी. आपने सही कहा. इसी कारण हमने भी ये पद्धति अपनाई है. पर हम चुदाई के बाद स्नान नहीं करते, जिससे कि एक दूसरे के रस को हम यूँ ही न बहा दें.”

“सच है, रस में नहाकर पानी से नहाना व्यर्थ ही ही.” सुनीति ने कहा और फिर महक की थोड़ी पकड़कर उसका चेहरा ऊपर किया. फिर हल्के से उसके होंठ चूमते हुए बोली, “तुम बहुत सुंदर हो महक. हमारा भाग्य अच्छा है जो तुम जैसी बहू मिलने जा रही है. असीम बेचारा तुम्हारे सानिध्य से इतने दिन दूर रहेगा. कहीं पागल न हो जाये मेरा बेटा।”

“मम्मीजी, अपने विवाह की कोई तिथि निश्चित की है क्या अब तक?” महक ने पूछा.

“हाँ, कल पंडितजी आये थे. तीन महीने बाद की तिथि दी है. कल मैं स्मिता से बात करूंगी. अगर उनके लिए वो तिथि उपयुक्त है, अन्यथा चार महीने और प्रतीक्षा करनी होगी. लगता है तुम भी असीम से मिलने के लिए इच्छुक हो.”

“मम्मीजी, अपने भावी पति से मिलने के लिए कौन इच्छुक नहीं होगा. पर नियम के अनुसार हम चुदाई के सिवाय किसी भी अन्य रूप से मिल सकते हैं. घूमने जा सकते है, चुंबन ले सकते हैं, एक दूसरे को छूकर या सहला कर संतुष्ट कर सकते हैं, परन्तु चुदाई नहीं कर सकते, मौखिक भी नहीं.”

“हाँ मुझे बताया गया है. चलो तुम नहा कर आ जाओ. तुम्हारे ससुर भी आते ही होंगे, इन्हें समाचार देखना अधिक आवश्यक लगता है अपनी बहू से मिलने के स्थान पर.”

महक उनकी बात पर धीमे से हंस दी.

“बहुत मोहक हंसी है. सदा यूँ ही हंसती रहना. चलो अब जाओ.”

महक स्नान के लिए गई और सुनीति ने आशीष को अंदर बुला लिया.

“अब समाचार बाद में देख लेना. अंदर आइये.”

आशीष पीने के सामान के साथ अंदर आ गया.

“और पीनी है आपको?”

“देखेंगे, मन किया तो. वैसे एक एक पेग यहाँ अलग से पीकर महक की धड़क निकल जाएगी, क्यों.”

“आपको तो बहाना चाहिए. चलिए ठीक है. महक स्नान कर ले तो आप चले जाना. फिर मैं जाऊंगी।”

इतने में ही महक बाहर आ गई, बाथरोब में और उसका शरीर पानी की बूंदों से झिलमिल कर रहा था. आशीष उसे देखकर मंत्रमुग्ध हो उठा. फिर वो नहाने चला गया. नहाते हुए भी उसका लंड महक की सुंदरता के कारण खड़ा हो गया. स्नान के बाद उसने भी बाथरोब पहना पर उसका खड़ा लंड उसमें से भी विदित था. बाहर आया ही था कि सुनीति तपाक से अंदर चली गई. महक ने भी अपने भावी ससुर के लंड की स्थिति को देख लिया, पर शर्माते हुए आँखें झुकाकर खड़ी रही.

“अरे शर्माने जैसी कोई बात ही नहीं है. तुम तो इन सब खेलों में हम सबसे भी अधिक अनुभवी हो. इतने वर्षों से समुदाय में जो हो. तो फिर झिझक किस बात की है, महक.”

“जी, वो अलग बात है. पर अब मैं इस घर में बहू जो बनके आने वाली हूँ तो कुछ तो लाज आएगी न, पापाजी.”

“हम्म्म, बात तो तुम्हारी सही है. और यही कारण है कि सुनीति ने तुम्हें आज आमंत्रित किया और रुकने के लिए कहा. शर्म और झिझक जितनी पहले हट जाये उतना ही अच्छा है सबके लिए.”

“जी, पापाजी.”

ससुर बहू एक दूसरे का आकलन कर रहे थे. महक का इन दो मिनट की बातचीत से ही बहुत कुछ संकोच दूर हो गया था. इतने में सुनीति भी स्नान करके बाहर आई और उसी प्रकार के बाथरोब में थी. सुनीति की सुंदरता को देखते ही महक की जैसे साँस ही रुक गई. उसके बालों से गिरता हुआ हल्का पानी और तराशा हुआ सुंदर शरीर किसी अप्सरा की कल्पना के समान था. आशीष भी सुनीति को देखकर गर्व से फूल गया. सुनीति ने उन दोनों को देखा तो कुछ शर्मा सी गई. विशेषकर महक की आँखों की चमक और लालसा देखकर. आज उसे अपनी भावी बहू के सानिध्य का आनंद मिलने वाला था और महक को देखकर वो समझ गई कि उसे दोनों प्रकार के सुख का अनुभव है.

क्रमशः

1203200
 
Oh Wow!

My story features in the X-Forum scoop!

XF1.png




XF2.png
 
अध्याय ३५: आठवाँ घर - स्मिता और विक्रम शेट्टी ६

************************

नूतन और मेहुल:

नूतन को जैसे ही पता चला कि मेहुल आज रात उसके साथ ही रुकने वाला है, इसकी प्रसन्नता की सीमा नहीं रही. वो मेहुल के तगड़े लंड को, जिसे वो अब तक प्रेम से चूस रही थी, नए जोश के साथ चूसने लगी.

दोपहर को जब वो नूतन के घर पहुंचे थे तो नूतन ने खाना बाहर से ही मंगा लिया था. घर में जाकर दोनों ने स्नान किया, हालाँकि मेहुल को अपने वही वस्त्र पहनने पड़े. तब तक खाना भी आ गया और हल्का खाना खाने के बाद नूतन मेहुल को अपने शयनकक्ष में ले गई. बहुत सुंदर सजा हुआ था परन्तु किसी भी प्रकार की अतिश्योक्ति नहीं थी. नूतन ने तुरंत अपने कपड़े निकाल फेंके. वो इस समय के लिए बहुत समय से प्रतीक्षारत थी. मेहुल के लंड को नापने के बाद उससे चुदे बिना नूतन को शांति नहीं मिलनी थी. वो तो शोनाली की कृपा थी जो मेहुल को उसने नूतन के साथ भेजा, अन्यथा ऐसा कम ही होता था.

नूतन को नंगा होते देखने के बाद मेहुल ने उसके शरीर को जांचा. नूतन अवश्य अपना ध्यान रखती थी, क्योंकि कुछ हल्की रेखाओं के सिवाय उसका शरीर बहुत गठा हुआ था. नूतन ने अब आशा से मेहुल को देखा तो मेहुल ने भी अपने कपड़े निकाल ही दिए. उसका लम्बा मोटा लंड उछलकर व्यायाम करने लगा. नूतन ने उसे अपने हाथ में लिया और सहलाने लगी.

“अगर शोनाली न होती तो मुझे न जाने कब इस लंड से चुदाई का अवसर मिलता कहना सम्भव नहीं है. सच में तुम्हारे लंड में इतनी शक्ति है कि तुम किसी भी स्त्री को संतुष्ट कर सकते हो.”

मेहुल ने कुछ भी कहना उचित न समझा. कुछ समय तक सहलाने के बाद नूतन घुटनों के बल बैठ गई और उसने लंड को सूँघा। फिर जीभ निकालकर टोपे को चाटा और कुछ समय तक यूँ ही चाटती रही. मेहुल के लंड से उसे शोनाली की गांड का स्वाद भी कहने मिल गया, परन्तु उसने कोई संकोच नहीं किया. लंड की गोलाई को चाटने में उसे अच्छा समय बिताना पड़ा. जब उसने लंड के बाहर के हर भाग से अपनी पहचान कर ली तो फिर उसे मुंह में लिया और चूसने लगी.

लंड पूरा तो मुंह में लेना सम्भव था नहीं, उसकी चौड़ी मात्र से ही नूतन के गाल फूल रहे थे, परन्तु उसने पूरी श्रद्धा के साथ जितना सम्भव हो पाया उतना लंड मुंह में लिया और बहुत प्रेम से उसे चूसा. कुछ ही मिनटों में उसे ये पता चल गया कि इस प्रकार से तो उसके मुंह का आकार ही बदल जायेगा. तो उसने लंड को मुंह से निकाला और उसे चूमते हुए चाटने से ही संतोष कर लिया. अब तक मेहुल के लंड में इतना तनाव आ चुका था कि उसके लिए रुकना कठिन हो रहा था. उसने नूतन के सिर पर हाथ फेरा. नूतन भी लंड की स्थिति देखकर समझ चुकी थी कि अब अपनी चूत का संहार करवाने का समय आ ही चुका है.

वो खड़ी हुई और बिस्तर पर जाकर लेट गई और अपने पैर फैला लिए. मेहुल ने उसकी चूत को देखा तो कुछ समय के लिए अपने लंड की इच्छा को दबाकर अपने जीभ की इच्छा को चुना. नूतन की बहती चूत के आगे जाकर उसने अपने मुंह को उसकी चूत में डाला और उसके रस को चाटने के बाद उसकी चूत और उसके आसपास के अंग को भी चाटने लगा. नूतन की सिसकारी निकली और उसने कुछ और रस मेहुल को अर्पण कर दिया. मेहुल ने उसे भी पी लिया और अब अपनी जीभ से नूतन की चूत को टटोलने लगा. चूत में जीभ जाते ही नूतन के शरीर ने अंगड़ाई ली और फिर उसकी चूत ने रस की फुहार छोड़ दी. मेहुल समझ गया की नूतन अब चुदास से भरपूर है और उसने अपनी जीभ को कुछ और अंदर चलने के बाद बाहर निकाला। नूतन ने एक गहरी साँस भरी और संतुष्टि की भावना व्यक्त की.

“मेहुल, मैं चाहती हूँ कि अगर हो सके तो तुम आज रात मेरे पास ही रुक जाओ.”

“ऐसा सम्भव नहीं लगता. पर देखते हैं.”

परन्तु फिर नूतन ने एक भीषण गलती भी कर दी.

“अगर रुक नहीं सकते तो मुझे आज पटक पटक कर चोदो। ऐसे चोदो कि मेरी आत्मा काँप जाये. बहुत दिन हो गए ऐसी चुदाई किये हुए. क्लब की अंतिम पार्टी के बाद मेरी अच्छी चुदाई नहीं हुई है, तो प्लीज मेरी माँ चोद दो. ऐसे चोदो कि मैं दया की भीख माँगू पर दया करना नहीं.”

नूतन ने ये कह तो दिया पर उसने मेहुल के चेहरे के बदलते भाव नहीं देखे. मेहुल अपने पाशविक व्यक्तित्व की ओर जा रहा था.

“अगर तुम ऐसे चोदोगे तो मैं तुमसे गांड भी मरवाऊँगी, आज नहीं तो कुछ ही दिन में.”

मेहुल अब अपने पाशविक रूप के निकट था. उसने नूतन को एक अवसर दिया अपने वक्तव्य को बदलने का.

“आप सच में ऐसी चुदाई ही चाहती हैं. क्योंकि अगर मैंने आरम्भ कर दिया तो फिर मैं रुकुंगा नहीं.”

नूतन तो अपनी ही कल्पना में खोई थी, उसने मेहुल की चेतावनी और उसके बदले हुए स्वर पर कोई अधिक ध्यान नहीं दिया. और ये उसके लिए एक अत्यंत कष्टकारी अनुभव होने वाला था. अंत में संतुष्टि के पहले उसे पीड़ा का सामना करना था. पर अब उसने अपने पत्ते फेंक दिए थे और मेहुल के हाथ में बाजी थमा दी थी. मेहुल ने नूतन की चूत पर एक दृष्टि डाली. उत्तेजना से चूत कुछ फूल सी गई थी और पंखुड़ियाँ अलग हो गई थीं. चूत चुदने के लिए आतुर थी और मेहुल चोदने के लिए. मेहुल ने अपने शक्तिशाली लंड को नूतन की चूत पर कुछ देर तक रगड़ा जिसके कारण चूत और गीली हो गई. फिर धीरे से उसने अपने लंड को अंदर डालना आरम्भ किया. नूतन उसकी ओर प्रेम से देख रही थी. शनैः शनैः मेहुल ने लगभग आधे से अधिक लंड को चूत में डाला और रुक गया.

उसने नूतन की तरसती हुई आँखों में देखा। आगे झुकते हुए उसने नूतन के होंठों से होंठ मिला दिए और चूसने लगा. नूतन ने भी उसका पूरा साथ दिया. चुंबन को तोड़ते हुए मेहुल ने नूतन के मम्मों पर अपने हाथ रखे और उन्हें पहले तो प्यार से सहलाया पर धीरे धीरे उन्हें मसलने लगा. चुदाई की आग में जल रही नूतन को ये भी अच्छा ही लगा. दोनों मम्मों को अपने हाथों से मसलते हुए इस बार मेहुल ने लंड बाहर निकाला तो नूतन की आँखें जैसे बुझ गयीं. इससे पहले कि वो कुछ कह पाती मेहुल ने एक शक्तिशाली धक्का मारा और नूतन की भयावह चीख के साथ उसका लंड नूतन की चूत में समा गया. नूतन के चेहरे के भाव अब प्रेम से बदलकर पीड़ा के हो गए. उसकी आँखों में आँसू आ गए. पर वो कुछ बोल न पाई और उसके होंठ केवल कुछ कहने को कांप कर रह गए.

मेहुल ने जैसा कहा था, वही किया. अपने लंड को वो लगभग पूरा निकालता और फिर पूरा ही अंदर डालता. कुछ समय तक तो उसने इस क्रिया को एक धीमी गति से ही किया, परन्तु फिर उसकी गति बढ़ने लगी. और एक समय के बाद उसके कूल्हे इस तीव्रता से चल रहे थे कि नूतन को पटक पटक के चुदने की जो इच्छा थी वो पूरी होने लगी. पर मेहुल को सिखाने वाली अनुभवी स्त्रियों ने उसे और भी बहुत कुछ सिखाया था. और उसका अनुशरण करते हुए कुछ ही देर में मेहुल ने अपनी गति कम कर दी. फिर बढ़ाई फिर मध्यम की और इस प्रकार एक अनियमित गति से नूतन की चुदाई में जुट गया.

मेहुल की शिक्षिका ने समझाया था कि मस्तिष्क कुछ ही समय में एक गति से अभ्यस्त हो जाता है और उसके अनुसार स्वयं को ढाल लेता है. अगर गति और गहराई बदलती रहे तो उसे समझ नहीं आता कि हो क्या रहा है और वो शिखर पर ही झूमता रहता है, क्योंकि उसे इस बात का ज्ञान नहीं होता कि अब क्या होगा. इस ज्ञान का उपयोग मेहुल कई बार अनन्य स्त्रियों पर कर चुका था. आज इसका लाभ नूतन को मिल रहा था. अंतर ये था कि जहाँ नूतन को इस समय इस बात का भान नहीं था,वहीँ वो बाद में इस चुदाई का जीवन भर स्मरण करने वाली थी.

मेहुल के शक्तिशाली लंड के धक्कों से नूतन अब कई बार झड़ चुकी थी. उसे समय का ज्ञान और ध्यान ही नहीं था. बस उसकी चूत की जो कुटाई हो रही थी उसके कारण उसका शरीर मानो संकुचित होकर उसकी चूत की नसों में समा गया था, हर संवेदन अब उसी में केंद्रित था. पीड़ा ने अब आनंद का रूप ले लिया था. चूत ने भी अपने आक्रमणकारी से समझौता कर लिया था और अपने भीतर उसके हर धक्के का स्वागत कर रही थी. बदलती गति और धक्कों की आकस्मिकता के कारण नूतन भी जैसे किसी आनंद के समुद्र में तैर रही थी. कभी वो लहरों में ऊपर जाती, तो कभी शीघ्र गति ने नीचे डूबने लगती, और फिर ऊपर चल देती.

उसे जीवन का एक नया और अविस्मरणीय अनुभव हो रहा था. वो वस्तुतः इस अनुभव को दोबारा कभी नहीं पाने वाली थी. नीचे डूबते हुए उसे लगता की उसकी लीला समाप्त हो रही हो तो ऊपर जाते हुए एक जीवनदान का आभास होता. मेहुल उसके चेहरे के बदलते हुए भावों पर पैनी दृष्टि रखे हुए था. और कुछ देर की और चुदाई के बाद उसे आभास हुआ कि अब नूतन ढीली पड़ चुकी है, अर्थात वो अचेत हो गई थी. मेहुल ने अपनी गति कम की और कुछ देर की और चुदाई के बाद नूतन ने आँखें खोली दीं। इस बार उसकी आँखों में समर्पण था. अब मेहुल उसे जिस प्रकार से भी चाहता भोग सकता था.

कुछ देर और धक्के लगाने के बाद मेहुल जब झड़ने के निकट हुआ तो उसने अपने लंड को बाहर खींचा और फिर नूतन के सिर के पास जाकर रुक गया. नूतन ने उसका अभिप्राय समझ लिया और सिर ऊँचा करते हुए लंड को चाटा और फिर चूसने लगी. कुछ ही देर में मेहुल ने उसके मुंह में अपने रस की वृष्टि कर दी और नूतन ने बिना संकोच हर बूँद को पी कर अपनी प्यास को बुझाया. मेहुल हट गया और नूतन वहीँ पसर गई और आँखें बंद किये हुए अपने शरीर में उठ रही आनंद की संवेदनाओं का आभास करती रही. उसके चेहरे पर संतुष्टि की एक मुस्कराहट थी.

मेहुल बैठा हुआ नूतन को देखता रहा जो आँखें बंद किये मुस्कुरा रही थी. जिन अन्य स्त्रियों को उसने चोदा था और जिन्होंने उसे बहुत कुछ सिखाया भी था उनमें और नूतन में अंतर था. उन स्त्रियों ने उसका उपयोग अपने स्वार्थ और वासना मात्र के लिए किया था. और वो नूतन के समान भाग्य की सताई हुई भी नहीं थीं. हालाँकि नूतन ने भी उसे अपनी वासना मिटाने के लिए प्रयोग किया था, परन्तु उसकी इसमें कोई अन्य लालसा नहीं थी. और वो अपने स्वर्गीय पति के कार्य को भी संभाल रही थी, जो प्रशंसनीय था.

नूतन ने आँखें खोलीं और फिर मेहुल की ओर देखा.

“मुझे बीच में लगा था कि मैंने तुम्हें पटक कर चोदने का आमंत्रण देकर गलती कर दी. पर अब लग रहा है जैसे मेरी वर्षों की प्यास बुझ गई है. आत्मा और शरीर दोनों तृप्त हो गये हों जैसे. सच में तुम कुछ ही दिनों में क्लब के सबसे प्रचलित रोमियो बन जाओगे. तुम्हारा कार्ड सदा बुक रहेगा. मैं इसके बाद कब तुमसे मिल पाऊँगी इसका मुझे कोई अनुमान नहीं है.”

“आप इतना चिंतन न करें. मैं आपसे अत्यंत आकृष्ट हूँ और किसी न किसी अवसर पर आकर आपका साथ पाना चाहूँगा।”

“काश तुम रुक पाते।”

मेहुल फिर चुप ही रहा.

“चलो अब कुछ खाना पीना नहाना धोना भी हो जाये. फिर तुम्हें जाना भी होगा.” नूतन ने कहा और उठकर बाथरूम में चली गई. इसके बाद मेहुल गया और फिर दोनों ने यूँ नंगे खाना खाया.

“जाने के पहले एक बार मैं तुम्हारा लंड चूस कर उसका रस पीना चाहती हूँ.”

“बिलकुल.”

ये कहते हुए मेहुल बिस्तर पर लेट गया और नूतन उसके लंड को चूसने और चाटने लगी. कुछ ही देर हुई थी कि मेहुल का फोन बजा और उसे स्मिता ने रात में बाहर रखने के लिए कहा. नूतन उसके लंड को और अधिक परिश्रम के साथ चूसने लगी. कुछ और देर में मेहुल ने अपने वीर्य से उसका मुंह भर दिया जिसे नूतन ने पी लिया और फिर उसके पास आकर बैठ गई.

“मेरे घर के पास एक कपड़े की दुकान है, रात और कल सुबह के लिए कुछ ले आओ. तब तक मैं खाने पीने के लिए प्रबंध करती हूँ. व्हिस्की पीते हो या बियर?”

“दोनों ही ठीक हैं, जो आपको प्रिय हो वही पी लूँगा।”

“तो फिर व्हिस्की ही रहेगी।”

“तो मैं कपड़े लेकर आता हूँ, दुकान कहाँ है?”

नूतन ने उसे दिशा बताई और मेहुल कपड़े पहनकर चला गया. आधे घंटे बाद वो अपने लिए कपड़े लेकर आ गया. नूतन ने तब तक सारा प्रबंध भी कर लिया था. व्हिस्की, चिकन और अन्य अल्पाहार से टेबल सुसज्जित थी.

“क्यों न आपके कमरे में ही बैठें, यहाँ कुछ आनंद नहीं आएगा.”

“ओके, पर तुम्हें ये सब ले चलने में मेरी सहायता करनी होगी.”

“इसमें कहने वाली बात ही नहीं, मैं वैसे भी करता. क्यों न आप जाकर कमरे में व्यवस्था कीजिये, मैं ये सब लेकर आता हूँ.”

कुछ ही देर में कमरे में पूरा प्रबंध हो गया. मेहुल ने कुछ खोदने का भी निणर्य लिया। उसे विश्वास था कि शोनाली के बारे में वो अवश्य कुछ बता पायेगी. और अभी तक उसे ये पता भी नहीं था कि शोनाली और वो पड़ोसी हैं. तो बता भी देगी. मेहुल और नूतन दोनों बिस्तर पर ही अधलेटे अपनी ड्रिंक पीने लगे और बीच बीच में एक दूसरे को चूम लेते.

“आपको याद है न अपने क्या कहा था अगर मैं रात को रुका तो?” मेहुल ने कहा.

नूतन: “हाँ याद है, अच्छे से. मेरी गांड मारोगे। है न?”

मेहुल: “अगर मन न हो तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है.”

नूतन: “नहीं, अगर मन न होता तो मैं बोलती ही नहीं. पर दो मिनट रुको मैं गांड में कुछ लगा लूँ, जिससे बाद में सरलता हो.”

मेहुल: “ठीक है, पर जो भी हो मेरे सामने ही करो, मैं भी तो देखूँ क्या लगा रही हैं आप?”

नूतन उठी और बाथरूम में जाकर एक ट्यूब और एक गांड का प्लग ले आई, जिस प्रकार का शोनाली ने लगाया था. फिर उसने एक ऊँगली से गांड में ट्यूब से जैल लगाई और फिर आगे झुककर मेहुल को अपनी गांड दिखाते हुए उसमें वो प्लग धीरे से अंदर डाल दिया. थोड़ा अंदर बाहर करते हुए ठीक से बैठाया और फिर सीधे होकर मेहुल की ओर मुड़ गई. बिस्तर में लौटकर वो मेहुल से चिपक गई.

नूतन: “शोनाली ने दिया था मुझे, ऐसे ही समय के लिए. कम ही उपयोग में लेती हूँ.”

मेहुल को जो प्रश्न पूछना था उसके लिए नूतन ने अनजाने में ही अवसर दे दिया था.

मेहुल: “हाँ, मुझे याद आया. शोनाली मैडम ने मुझसे गांड मरवाने के बाद मेरा वीर्य ऐसे ही प्लग से अपनी गांड में सहेज लिया था, जैसे किसी के लिए हो. ये क्या रहस्य है? अगर आप बता सकती हो तो बताओ, मैं किसी से न कहूँगा।”

नूतन: “नहीं, ये कोई ऐसा बड़ा राज नहीं है क्लब में. शोनाली की नन्द और पार्थ की माँ को गांड में से निकला वीर्य पीने का व्यसन है. जितनी देर गांड में रुका हो, उन्हें उतना ही स्वादिष्ट लगता है. इसीलिए हर बार जब शोनाली किसी नए रोमियो की परीक्षा लेती है तो सुमति, उसकी नन्द के लिए उस रोमियो का वीर्य भी ले जाती है. घर पहुंचते तक वो उसकी गांड में एक घण्टे से अधिक घूमते रहता है.”

मेहुल: “ओह!” उसका अनुमान सही था परन्तु अधिक जानने के लिए उसने अचरज जताया.

नूतन: “हाँ, वैसे वो हर मासिक पार्टी में विशेष अतिथि के रूप में आती हैं. पहले तो वो अकेली ही हर गांड से रस पी जाती थीं, परन्तु पिछले आठ नौ मास पूर्व एक नयी सदस्या आयी हैं जो गांड के साथ साथ चूत से भी रस पीने का व्यसन रखती हैं. तो अब दोनों ही इस कार्य में व्यस्त रहती हैं.”

मेहुल: “ओह!”

नूतन ने किसी अच्छे भेदिए के समान और कुछ भी बताना चाहा.

नूतन: “मुझे पता है कि सुमति तो सबसे अधिक आनंद उसके बेटे पार्थ के रस को पीने में ही आता है, इसीलिए क्लब की समस्त महिलाएं पार्थ से जब गांड मरवाती हैं तो सुमति को ही वो रस अर्पण करती हैं.”

मेहुल और खोदते हुए: “यानि माँ और बेटा?”

नूतन: “हाँ, वैसे सुमति अपने भाई से भी चुदवाती है, ये मुझे लगता है. पर पक्का नहीं है. पर तुम्हें क्लब में लाने वाले सचिन और उसकी माँ रमोना इस खेल में खुलेआम लिप्त रहते हैं. यहाँ तक कि रमोना ने ही सचिन को क्लब में प्रवेश दिलवाया था.”

मेहुल ने अपने बाएं हाथ से नूतन के एक मम्मे की घुंडी को मसला और दूसरे से उसकी चूत के भग्नाशे को. फिर उसे चूमते हुए बोला, “क्लब बहुत रोमांचक स्थान लगता है.”

नूतन: “तुम देखना इस माह की पार्टी में संभ्रांत महिलाएं, जिनमें मैं भी एक हूँ, किस प्रकार से अपनी वासना और शारीरिक भूख की तृप्ति करती हैं. कुछ कृत्य तो ऐसे होते हैं कि तुम्हें विचलित कर सकते हैं.”

मेहुल: “वो जब होगा तब देखेंगे. अब तो मैं आपकी गांड की सेवा करना चाहता हूँ.”

नूतन: “कुछ देर और ठहर जाओ. फिर. पर पटक पटक के मत मारना। चूत थी तो मैं सहन कर पाई, पर गांड तो फट ही जाएगी.”

मेहुल: “जैसे आप कहेंगी, वैसे ही मारूंगा। आप निश्चिन्त रहिये.”

अब मेहुल उस समय की प्रतीक्षा करते हुए अपनी ड्रिंक पीने लगा जब नूतन उसे अपनी गांड मारने के लिए हरी झंडी दिखाएगी.

*************************

सुजाता का घर:

सुजाता के शयनकक्ष में सामूहिक चुदाई का वातावरण बन चुका था. सुजाता, अविरल, श्रेया और मोहन विवाहित जोड़े थे तो स्नेहा और विवेक अविवाहित. इस प्रकार से सामूहिक सम्भोग के कम ही अवसर मिलते थे. स्नेहा भी अब अधिकतर श्रेया के घर चली जाती थी और सुजाता के लिए अविरल और विवेक ही बचते थे. अब दोनों उसकी भरपूर चुदाई करते थे इसमें कोई संशय नहीं था, परन्तु इस प्रकार सम्पूर्ण परिवार एक साथ कम ही मिलता था. और इसीलिए अधिक ही अधीरता थी सबके मन में.

जब ये ध्यान आया कि एक बाथरूम में इतने लोग कैसे नहाएंगे तो सबको शीघ्र नहाकर लौटने के लिए कहा गया. श्रेया और मोहन उसके कमरे में गए तो स्नेहा और विवेक अपने में. दस ही मिनट में सभी नहाकर हल्के वस्त्रों में कमरे में लौट आये. पर अंदर आये तो पाया कि सुजाता और अविरल केवल अंगवस्त्रों में ही थे. अन्य सबके लिए ये समस्या बन गई क्योंकि वे केवल ऊपर ही वस्त्र डालकर आ गए थे. सुजाता ने भाँप लिया और हाथ पीछे करते हुए अपनी ब्रा खोल दी और फिर हाथों से अपनी पैंटी भी उतार दी. अविरल ने भी अपना अंडरवियर उतार दिया तो देखा देखी अन्य सब भी अपने वस्त्रों से वंचित हो गए. ऐ-सी की ढंडी हवा में चूचियाँ और लंड अकड़ने लगे. सभी सुजाता की ओर देख रहे थे.

“अरे मुझे क्यों ताक रहे हो सब?”

कोई कुछ न बोला तो सुजाता समझ गई.

“देखो, मुझे तो मोहन से ही पहले चुदवाने की इच्छा है. तुम सब अपना देख लो. जब मोहन और मेरा हो जायेगा तब आगे अन्य मिश्रण देखेंगे.”

“मुझे श्रेया दीदी…” विवेक ने कहा.

“चलो स्नेहा, अब मेरी लाड़ली ही मेरा प्यार पायेगी.” अविरल ने स्नेहा को बाँहों में भरते हुए कहा.

*********************

स्मिता का घर:

स्मिता और विक्रम एक दूसरे के साथ बैठे बातें कर रहे थे. पूरा दिन साथ बिताने के बाद अब बैठकर अपने जीवन पर चिंतन कर रहे थे.

“समय न जाने कैसे पंख लगाकर उड़ गया न? जैसे कुछ ही दिन हुए हों जब हम मेहुल और महक की आयु में थे. आज पीछे देखो तो सब कुछ धुंधला सा लगता है.” विक्रम भावुक हो रहा था.

स्मिता: “ऐसा नहीं है. मुझे आज भी सब कल के समान ही याद है. हमारा विवाह, फिर सुहागरात, फिर बच्चे, आपके व्यवसाय में हानि के बाद फिर से उठने का परिश्रम, सब याद है.”

“परिवार में उन्मुक्त चुदाई का आरम्भ, मोहन से पहली चुदाई, समुदाय में प्रवेश, मोहन का विवाह और उसकी घोषणा के बाद मेरी, सुजाता और श्रेया की सामूहिक चुदाई, सब याद है.”

विक्रम उसे देख रहा था, स्मिता ने दो तीन वाक्यों में ही जीवन का सारांश व्यक्त कर दिया था.

“हाँ, सच है. याद मुझे भी है. मोहन को गोद में लेना। फिर महक और मेहुल का आगमन. महक के साथ मेरी पहली चुदाई, गौड़ा परिवार से भेंट और फिर संबंध. वैसे देखो तो याद सब है. पर कुछ यादें धुंधला भी गई हैं.”

स्मिता उसके सीने से चिपकते हुए, “वो अच्छी यादें नहीं होंगी. भूल भी जाओगे तो कुछ न होगा.”

विक्रम ने उसके सिर को चूमा.

“हमें सच में अब अपने लिए हर माह कुछ समय निकालना होगा. आज बहुत अच्छा दिन रहा.”

“वैसे और कुछ भी है जो इस दिन को इससे भी अच्छा बना सकता है.”

विक्रम मुस्कुराते हुए, “ऐसा क्या हो सकता है?”

“चलिए अपने कमरे में वहाँ दिखती हूँ.”

“अब आपकी तो बात माननी ही होगी, चलो.”

स्मिता और विक्रम अपने कमरे में गए तो स्मिता विक्रम की ओर मुड़ी और बोली, “चलो कुछ देर डांस करते हैं.”

विक्रम स्मिता के आज के मूड से बहुत प्रसन्न था. आज वो किसी अलग ही रंग में दिख रही थी. विक्रम ने तुरंत अपनी स्वीकृति दे दी और स्मिता ने अपने कमरे में रखे स्टीरिओ पर एक हल्का सा संगीत चला दिया जो नृत्य के लिए अनुकूल था. संगीत आरम्भ करते ही स्मिता विक्रम की बाँहों में सिमट गई और दोनों उस संगीत पर नृत्य करने लगे. यूँ ही एक दूसरे से लिपटे हुए न जाने कितनी ही देर तक नाचते रहे. एक के बाद एक संगीत बदलते रहे पर दोनों पति पत्नी एक दूसरे के साथ यूँ ही नृत्य करते रहे. एक बार नृत्य समाप्त हुआ तो दोनों उत्तेजित हो चुके थे और अब ये समझा जा सकता था कि इस खेल के अगले चरण में क्या होने वाला है.

“कुछ गर्मी लग रही है, मैं नहाने जा रही हूँ.” स्मिता ने इठलाते हुए कहा. उसका संकेत विक्रम ने समझ लिया.

“हमें पानी बचाने का प्रयास करना चाहिए, मैं भी साथ चलता हूँ.”

“ओह, नहीं! आप मुझे स्नान करते हुए देखना चाहते हो?” स्मिता ने नखरे दिखाए.

“हम्म, मैं ऐसा कैसा कर सकता हूँ? मैं तो कितना सीधा हूँ आप तो जानती ही होंगी.”

“हाँ हाँ, सब जानती हूँ. देखा है आपको समुदाय के मिलन समारोह में जब आप लड़कियों और स्त्रियों को कैसे ताड़ते हैं.”

“ओहो, तो ये आपकी सोच है. वैसे मैंने भी आपको जवान जवान लड़कों को नापते हुए देखा है.”

अब चूँकि स्मिता फंसने लगी तो उसने तुरंत बात को बदला.

“चलिए, अब स्नान कर लेते हैं फिर देखते हैं आज क्या करना शेष है.”

दोनों स्नान करने के लिए बाथरूम में शेष रात्रि के बारे में सोचते हुए चले गए.

रात अभी शेष थी.

************************

सुजाता का घर:

ये तय हुआ कि इस चुदाई के बाद जिसे भी जिसके साथ मन करे वो चुदाई कर सकता है. सुजाता ने मोहन को आगे बढ़कर हाथ में हाथ दिया. अनजाने ही उसका ध्यान मोहन के लंड पर गया. अब मोहन किसी भी रूप से कम नहीं था पर न जाने क्यों कर सुजाता ने उसकी तुलना मेहुल से कर ही ली. उसकी आँखों ने श्रेया को देखा जो उसे ही देख रही थी. माँ बेटी में एक मूक सहमति बनी. श्रेया भी जानती थी कि मेहुल के लंड का आकार उन सबसे बड़ा तो है ही, उसकी चुदाई करने की क्षमता भी अधिक है. श्रेया ने सिर हिलाकर अपनी माँ को समझाया कि वो इस तुलना में न पड़े.

सुजाता ने अपना चेहरा मोहन के सीने में छुपा लिया, वो संयत होने के बाद ही उससे आँख मिलाने वाली थी. मोहन के कोमल स्पर्श ने उसकी पीठ को सहलाया तो सुजाता को इस बात का आभास हुआ कि जो भी है, सम्भवतः उसकी बेटी को श्रेष्ठतर भाई ही मिला है. मोहन मन से बहुत ही सरल और सुशील था. उसने अपने सिर को ऊपर उठाया तो मोहन ने उसका माथा चूमा और फिर होंठों से होंठ मिला दिए. एक गहरे चुंबन में सास और दामाद डूब गए. श्रेया और विवेक भी एक दूसरे के आलिंगन में चुंबनरत थे. दोनों कई दिन बाद जो मिले थे. वैसे स्नेहा श्रेया के घर चली जाती थी, पर परिवार के अन्य लोग इतना नहीं जाते थे. श्रेया का भी आना कुछ समय से कम हो गया था और इसी कारण भाई बहन का प्रेम उफान पर था.

“कोई लड़की मिली भाई, आपको मेरी भाभी के लिए?” श्रेया ने पूछा.

“कहाँ दीदी, आप तो जानती ही हो. समुदाय में जब तक किसी लड़की की माँ की ओर से बात नहीं बढ़ेगी, तब तक अपना सिग्नल डाउन ही रहेगा.” विवेक ने कुछ असंतोष से कहा.

“अगले कुछ महीनों में इस समस्या का भी समाधान होने वाला है. तुम्हें पता है न कि इस बार के चुनाव में मम्मी और मेरी सासू माँ दोनों के नाम प्रस्तावित किये गए हैं. सासू माँ ने तो आवेदन डाला है, मम्मी ने कुछ किया क्या?”

“कह तो रही थीं, पापा से बात हुई थी हो सकता है डाला हो. वैसे दोनों में से एक को तो हटना होगा. दोनों तो नहीं चुनी जा सकतीं.”

“हाँ, पर मैं चाहूंगी कि मम्मी बनें, सासू माँ को मैं मना लूँगी हटने के लिए. और वैसे तुम्हारा सिग्नल डाउन नहीं बल्कि अप ही लग रहा है मुझे तो.” श्रेया ने विवेक के लंड को हाथ में लेकर सहलाते हुए कहा.

“वो आपके लिए ही है. नहीं तो..”

“छोड़ ये सब. आज बस प्रेम की बात कर.” ये कहकर दोनों के होंठ फिर जुड़ गए.

स्नेहा के साथ अविरल अब तक इन सब से आगे निकल चुका था. वो स्नेहा को लिटाकर उसकी चूत चाटने में व्यस्त था. स्नेहा की चूत के आसपास के हर भाग को चाटने के बाद अब वो उसकी चूत के अंदर का रस ले रहा था. स्नेहा भी अपने पिता के इस अद्भुत और अपार प्रेम से विव्हल उनका सिर हल्के से पकड़े हुए उन्हें उत्साहित कर रही थी. उसकी हल्की सिसकारियां अविरल को भी उत्साहित कर रही थीं और वो भी अपनी पूरी जीभ को अंदर डालने का भरसक प्रयत्न कर रहा था. इस चूत के रस से उसका कभी मन नहीं भरता था.

हाँ जब स्नेहा का विवाह हो जायेगा, तब न जाने अविरल क्या करेगा. एक बात थी कि स्नेहा रहेगी इसी नगर में तो इतनी दूरी नहीं होगी. पर फिर भी अब जैसी बात भी नहीं रहेगी. सुजाता कुछ दिन से समुदाय में उसके विवाह का प्रस्ताव देने के लिए उत्सुक थी. पर अविरल चाहता था कि उसके ब्यूटी पार्लर का काम और सुचारु रूप से चल निकले तभी इस ओर विचार किया जाये.

**************************

स्मिता का घर:

स्मिता और विक्रम दोनों स्नान करने के लिए गए और वहां भी दोनों की अठखेलियाँ रुकी नहीं. एक दूसरे को छेड़ते हुए, गुदगुदाते हुए, सहलाते हुए, चूमते हुए दोनों लम्बे समय तक पानी की बौछार से भीगते रहे. नहाना तो एक बहाना मात्र था, उन्हें एक दूसरे का सानिध्य इतना प्रसन्न कर रहा था कि वे एक दूसरे से एक पल भी दूर नहीं रहना चाह रहे थे. कल समीकरण फिर बदल जायेंगे, और आज ही उनका था और इसका वो सम्पूर्ण लाभ उठाना चाह रहे थे. स्नान होते होते दोनों के शरीर कामाग्नि से जल रहे थे. पानी की शीतलता भी उनकी इस अग्नि को शांत करने में असमर्थ थी. दोनों ने बिना अपने शरीर को पोंछे हुए ही कमरे में प्रवेश किया. पानी चू कर नीचे गिर रहा था पर उन्हें इसका भान भी न था. वे केवल एक दूसरे में ही खोये हुए थे.

बिस्तर पर स्मिता को बैठाकर विक्रम उसके साथ बैठा और फिर चुंबनों का आदान प्रदान आरम्भ हो गया. परन्तु इस बार इसके साथ ही उनके हाथ एक दूसरे के शरीर पर भी रेंग रहे थे. पर वे और कितनी देर तक संयम रखते. विक्रम ने धीरे से स्मिता को बिस्तर पर सीधा लिटाया और फिर उसके साथ लेटे हुए उसे चूमता रहा. फिर वो उठा और उसने स्मिता की याचना भरी आँखों में झाँका और उसके पैरों के बीच में आकर उन्हें फैलाया और चूत में दो उँगलियाँ डालकर उन्हें अंदर बाहर करने लगा. स्मिता ने एक झुरझुरी ली और ऐसा प्रतीत हुआ मानो वो झड़ गई हो. पर विक्रम बिना रुके अपनी अपनी उँगलियों से उसकी चूत से खेलता रहा और स्मिता की आँखों में झांकता रहा.

उसने अपनी जीभ से स्मिता के भग्नाशे को छेड़ा और इस बार स्मिता का शरीर ऐंठ गया और रस की एक फुहार छूट गई. इसके बाद विक्रम ने अपनी उँगलियों निकालीं और अपनी जीभ से स्मिता के चूत के आसपास चाटते हुए उसकी चूत की पंखुड़ियों को भी चाटा। भगनाशे पर अधिक ध्यान रखते हुए वो केवल जीभ मात्र से स्मिता के साथ खेल रहा था. स्मिता की सिसकारियां और हाथों के सिर पर दबाव से विक्रम को समझ आ रहा था कि स्मिता भी पूरा आनंद ले रही है.

************************

नूतन और मेहुल:

अब मेहुल उस समय की प्रतीक्षा करते हुए अपनी ड्रिंक पीने लगा जब नूतन उसे अपनी गांड मारने के लिए हरी झंडी दिखाएगी. तभी उसके मन में एक विचार आया कि इस समय का वो सदुपयोग कर सकता है, शोनाली के परिवार और क्लब के बारे में जानने के लिए. एक हाथ से नूतन के मम्मे को सहलाते हुए उसने ड्रिंक को एक ओर रखा और दूसरे मम्मे को अपने मुंह में लेकर चूसने लगा. नूतन भी इस रंग में रंग गई और उसने भी अपना ग्लास एक और रख दिया.

जहाँ एक ओर मेहुल क्लब के बारे में जानने के लिए उत्सुक था, वहीँ दूसरी ओर मेहुल के बाहर जाने के समय नूतन ने शोनाली से बात की थी. शोनाली ने उसे क्लब के बारे में अधिक से अधिक जानकारी देने के लिए कहा. विशेषकर कुछ सदस्यों के बारे में. नूतन को ये समझने में देर न लगी कि शोनाली ये जानना चाहती है कि क्या मेहुल इस प्रकार के संबंधों से हतोत्साहित या विचलित होता है, या उत्तेजित अथवा सामान्य रहता है. मेहुल ये नहीं जानता था कि उसके पीछे ये बात हो चुकी है. वो स्वयं क्लब के बारे में जानने के लिए उत्सुक था, और शोनाली के बारे में भी. दोनों एक दूसरे के रहस्य जानने के लिए आतुर थे.

“क्लब के बारे में कुछ और बताइये न? मेरी उत्सुकता बहुत बढ़ गई है?” मेहुल ने पूछा तो नूतन को पंछी जाल में फंसता हुआ प्रतीत हुआ.

“बहुत कुछ है. हर सदस्या के अपने स्वाद हैं. हालाँकि कुछ एक अनुपात में सीधी भी हैं. परन्तु क्लब की कुछ पार्टियों के बाद वे भी अपने नए अनुभवों के आधार पर नए स्वाद ढूंढ़ लेती हैं. इस माह की पार्टी में तुम्हें ये पता चल ही जायेगा. वैसे हर पार्टी की एक थीम होती है.”

मेहुल बड़े ध्यान से सुन भी रहा था और नूतन के मम्मों से भी खेल रहा था. नूतन को शोनाली की बात याद थी. उसने पहले उसी दिशा में बात करने की ठानी. उसके बाद वो अधिक विकृत कृत्यों पर प्रकाश डालेगी.

मेहुल, “तो इस बार की पार्टी की थीम क्या है?”

नूतन ने मेहुल के होंठ चूमे, “परिवार.”

मेहुल चौंका फिर उसने भी नूतन के होंठ चूमे. “ये कैसी थीम है?”

“थीम के आधार पर एक शो होता है. तुमने अभी क्लब का हॉल नहीं देखा है जहाँ पार्टियां होती हैं. वहाँ इस प्रयोजन के हेतु एक मंच है. क्लब में कुछ सदस्याएं और रोमियो एक ही परिवार से हैं. वैसे तुम पार्थ और शोनाली के बारे में जान ही चुके हो. शोनाली पार्थ की बुआ है. सचिन जिसने तुम्हें परिचित कराया है, उसकी माँ रमोना भी क्लब की सदस्या है. एक नानी नाती की जोड़ी है, हालाँकि नानी अभी बाहर जाने वाली हैं तो इस पार्टी में नहीं आएंगी. शोनाली के ही निकट में रहती हैं वो.”

“कुछ सदस्याओं ने अपने विस्तृत परिवार के लड़कों को रोमियो बनवाया है. मामी, चाची, बुआ, मौसी इत्यादि ने रोमियो बनवाये हैं. दूसरी और यही कार्य कुछ रोमियो ने भी किया है. हालाँकि ये कम है क्योंकि क्लब की फीस सबके सामर्थ्य की नहीं है. इसमें गोपनीयता भी नितांत आवश्यक है.”

मेहुल सुन रहा था और नूतन उसके चेहरे के भाव पढ़ रही थी. मेहुल के आरम्भिक आश्चर्य के बाद उसने कोई विरोधी भाव नहीं दर्शाया तो नूतन को शोनाली के लिए एक समाचार मिल गया. मेहुल भी समझ गया था कि नूतन उसे देख रही है तो उसने अपनी भावनाओं को छुपा लिया. पर शोनाली के मोहल्ले की नानी से उसका ध्यान अन्य सात घरों पर गया. उसे ये समझ आ गया कि इसका भेद अगली पार्टी में अवश्य खुल जायेगा. नानी न भी आये पर नाती तो आएगा ही.

“तो इस प्रकार के छह जोड़े इस बार अपना कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे और फिर पार्टी आरम्भ हो जाएगी.”

“और अगर आप बता सकें तो कुछ बताएंगी कि किस महिला को क्या रास आता है जिससे कि मैं उनके सुख के लिए सही रास्ता अपनाऊँ।” मेहुल ने घुमाकर बोला पर नूतन समझ गई कि अब उसे मेहुल को उन विकृत कृत्यों से परिचित करवाने का उपयुक्त समय है.

“हम्म. वैसे कुछ महिलाएं कभी कभी क्लब न जाकर मेरे या मंजुला के घर आना रुचिकर समझती हैं. इसका कारण होता है कि रोमियो और प्रबंधकों के सिवाय कोई और पुरुष या स्त्री का क्लब में प्रवेश वर्जित है. इसी कारण वे हम दोनों में से किसी एक के घर का उपयोग करती हैं. उनके द्वारा इसके लिए विशेष प्रयोजन किया जाता है, और उनके द्वारा चुने हुए रोमियो भी उनकी सेवा के लिए आते हैं.”

मेहुल कुछ कुछ समझ रहा था. उसे अपनी प्रिंसिपल मैडम के घर की सच्चाई जो पता थी. फिर भी उसने आगे कुरेदना चाहा और नूतन ने उसका हाथ पकड़ा.

“चलो, मैं तुम्हें वो कमरा दिखती हूँ जहाँ उन की सेवा की जाती है.”

नूतन मेहुल को अगले कमरे में ले गई जो उसके शयनकक्ष से बड़ा था. इसका पूरा व्यय क्लब ने ही दिया है. कमरे में एक बड़ी सी अलमारी थी, एक बड़ा विशाल बिस्तर, चार एक सीट के सोफे भी रखे हुए थे. कमरे को देखकर मेहुल को ये भी समझ आ गया कि इसमें वीडियो रिकॉर्ड करने का भी प्रावधान होगा, पर उसने कुछ कहा नहीं. कमरे के साथ एक स्नानघर भी था. एक और अलमारी भी थी. नूतन ने अब तक कुछ नहीं कहा था.

“इसका उपयोग कब होता है? मुझे इसका कोई आशय नहीं दिखता।” मेहुल ने कहा.

नूतन ने उसे एक सोफे पर बैठाया और बड़ी अलमारी खोली. उसमे अनेकानेक प्रकार के सेक्स से संबंधित खिलौने थे. उन्हें बहुत व्यवस्थित रूप से रखा गया था. पर मेहुल ने एक ऐसा उपकरण देखा जिससे उसे इस कमरे का प्रयोजन समझ में आ गया. हुक में कुछ पिंजड़े रूपी यंत्र थे, जो पुरुष के लिंग के रूप के थे. अर्थात इनका प्रयोग किसी पुरुष के लंड को बंदी बनाने के लिए होता था. पाँच या छह विभिन्न आकार के पिंजड़े थे. नूतन ने अब तक उसकी ओर देखा नहीं था. इसी के साथ उसमे बड़े आकार के दो-मुंहे नकली लंड भी रखे हुए थे. वो उस अलमारी को दिखाकर कुछ समझाने वाली नहीं थी. उसे आशा थी कि मेहुल स्वयं इनका उपयोग समझे. और पूछने पर ही वो उत्तर देगी.

“मुझे कुछ कुछ समझ आ रहा है. कुछ सदस्याएं लेस्बियन संबंध भी रखती हैं परन्तु दूसरी महिला क्लब की सदस्या नहीं हैं. इसीलिए यहाँ आती हैं. उन्हें क्लब के रोमियो भी प्राप्त हो जाते हैं और लेस्बियन सुख भी.”

“सही समझे हो. और कुछ?”

“जो पिंजड़े हैं उनका प्रयोग सम्भवतः उन सदस्यों के पति या अन्य व्यक्ति द्वारा किया जाता है. हमारे रोमियो से चुदवाती हैं और उन्हें इनमे बंद करके उन्हें प्रताड़ित करती हैं. पर कोई भी पुरुष ऐसे व्यवहार को कैसे सहन करता है?”

“मनुष्य की मानसिक विकृतियों को समझना आज तक सम्भव नहीं हो पाया है. हमारे क्लब में ऐसी दो सदस्याएं हैं, एक के पति बहुत आयु प्राप्त कर चुके हैं और अब उन्हें केवल अपनी पत्नी, जो उनसे अधिक छोटी नहीं हैं, को जवान लड़कों से चुदवाते हुए देखकर ही आनंद आता है. वो पिंजड़ा नहीं पहनते, क्योंकि उनका लंड कुछ ही देर में स्खलित हो जाता है. पर दूसरी के पति मध्यम आयु के हैं और प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं. उन्हें इसमें बंद रखा जाता है. और जब रोमियो उनकी चुदाई कर चुके होते हैं तब वो अपनी पत्नी को चोदते हैं.”

मेहुल समझ रहा था कि नूतन के इस कमरे का क्या महत्व है.

अनायास ही उसके मुंह से निकल पड़ा, “इनके वीडियो कहाँ रखती हो आप?”

इस बार चौंकने की बारी नूतन की थी.

“तुम्हें, तुम्हें कैसे पता कि वीडियो भी हैं?”

“कमरे की बनावट, सजावट और प्रकाश का वितरण इस बात को दर्शाता है कि इस कमरे में कैमरे लगे हैं. कितने ये तो आप जानती होगी, पर चार या अधिक हैं.”

“तुम सच में बुद्धिमान हो. हाँ इनकी रिकॉर्डिंग हैं. देखना चाहोगे?”

“हाँ पता तो चले कि मुझे किस प्रकार की सेवा के लिए चुना जायेगा?”

“ठीक है. पर ये बात हम दोनों के सिवाय किसी को ज्ञात नहीं होनी चाहिए.”

“ये मेरा वचन है.”

इसके बाद उसी अलमारी के अंदर एक बक्से में से नूतन ने एक यू एस बी की हार्ड डिस्क निकाली.

“चलो मेरे ही कमरे में देखेंगे. इसमें अन्य दृश्य भी हैं.”

दोनों कमरे में लौट गए. नूतन ने देखा कि ड्रिंक्स अब पीने योग्य नहीं थीं तो उसने उन्हें फेंककर नए पेग बनाये और डिस्क को अपने टीवी से जोड़ा और टीवी पर उस डिस्क के अध्याय दिखने लगे.

“क्या देखोगे?”

“जो आप दिखाओगी. मेरे लिए तो सब कुछ नया ही है.”

नूतन बिस्तर पर ड्रिंक ले कर बैठ गई, मेहुल ने भी वही किया. फिर नूतन कुछ देर तक उन अध्यायों को छानती रही. अंत में उसने एक अध्याय चुना.

************************

सुजाता का घर:

मोहन और सुजाता का चुंबन और भी प्रगाढ़ हो गया था. अपनी सास को चोदे हुए मोहन को भी कुछ अधिक ही समय हो गया था. उसका गदराया मांसल शरीर किसी को भी चुदाई के लिए उद्यत करने का सक्षम था. सुजाता इसका पूरा लाभ भी उठाती थी. समुदाय के कई लड़के उसके बिस्तर की शोभा बढ़ा चुके थे. कई बार तो उसने अपनी सिखाये गए तीन चार लड़कों को भी एक साथ आमंत्रित किया था. पर उसने ये पाया कि उसे अधिक के साथ चुदाई करने में कोई विशेष आनंद नहीं आता था. इसी कारण से उसने इस प्रकार के सामूहिक चुदाई को विशेष दिनों के लिए ही सीमित कर दिया था. परन्तु उन दिनों की कोई परिभाषा नहीं की थी.

मोहन उसे उसी दिन से अच्छा लगा था जब उसने समुदाय में प्रवेश लिया था. उस दिन तो मोहन से चुदने का अवसर नहीं मिल पाया था, परन्तु जब उसे कामक्रीड़ा सीखने के लिए चुना गया तब उसने मोहन के व्यक्तित्व में एक आकर्षण पाया था. सौभाग्य से उसने श्रेया के विवाह का जब आवेदन दिया तो उसमें से एक मोहन भी था. दो अन्य प्रत्याशी भी थे, पर उन्हें सुजाता ने औपचारिकता के लिए ही चोदा था. अंत में मोहन को जब चुना गया तो श्रेया भी प्रसन्न हुई थी. पर उसे मोहन से चुदने का केवल एक बार ही अवसर मिला था इसके पहले कि विवाह तय हुआ. फिर तो विवाह होने तक दोनों केवल चूमा चाटी से ही एक दूसरे को संतुष्ट करते रहे.

न जाने क्यों सुजाता स्वयं को स्मिता से श्रेष्ठ मान बैठी. उसे पता था कि ऐसा व्यवहार उचित नहीं है और अविरल ने भी उसे समझाया था. पर सुजाता रुक नहीं पाती थी. स्मिता ने समुदाय में इस बात को नहीं बताया अन्यथा सुजाता के लिए समस्या खड़ी हो सकती थी. पर मेहुल ने उसे ऐसा पाठ पढ़ाया कि उसकी सारी अकड़ निकल गई. उसने स्मिता से क्षमा भी मांगी. आज वही मोहन उसके शरीर से फिर एक बार खेल रहा था. उसने सुजाता को स्मिता के बगल में ही लिटाया और फिर अपने ससुर की ओर एक बार देखते हुए सुजाता की चूत में अपना मुंह लगा दिया और उसकी रसीली चूत को चाटने लगा. सुजाता ने अपना हाथ उसके सिर पर रखा और आनंद से आँखें मींच लीं.

स्नेहा भी अब तक अपने पिता की चूत चुसाई से उत्तेजित हो चुकी थी और इसके आगे बढ़ना चाहती थी. उसने अपने पिता अविरल के सिर को हटाने का प्रयास किया तो अविरल समझ गया कि अब उसकी बेटी चुदने के लिए उत्सुक है. एक अच्छे पिता के समान उसने स्नेहा की चूत में से अपना मुंह हटाया और खड़ा होकर स्नेहा को सही स्थिति में आने के लिए कहा. स्नेहा बिस्तर पर पीछे की ओर चली गई और अपने पैरों को फैला लिया. अविरल ने स्नेहा की खिली चूत को एक बार देखा और अपने फनफनाते लौड़े को चूत पर लगाकर एक धक्का लगाया. लंड चूत की गहराइयों में समाता चला गया. बाप बेटी दोनों ने एक आनंद भरी आह भरी. स्नेहा ने अपने दोनों पैरों की कैंची बनाकर अपने पिता की कमर को कस लिया.

अविरल ने धक्के लगाने आरम्भ किये और कुछ ही देर में एक अच्छी गति पा ली. स्नेहा भी कमर उछालते हुए अपने पिता के लंड को अपनी पूरी गहराई में उतारने का प्रयास कर रही थी. अविरल ने आगे झुकते हुए स्नेहा के होंठों से होंठ मिला लिए. बिना अपनी लय को तोड़े हुए दोनों चुंबन में लीन हो गए. कुछ देर में अविरल ने अपने होंठ अलग किये और इस बार उन्हें स्नेहा के मम्मों को चूसने के लिए उपयोग किया. स्नेहा की आनंद भरी सिसकारी निकली और उसने अविरल के सिर को अपने स्तन पर दबा लिया. श्रेया और विवेक भी पीछे नहीं थे. श्रेया ने विवेक के लंड को चूसकर उसे इतना उत्तेजित कर दिया था कि अब विवेक रुकने की स्थिति में नहीं था. उसने श्रेया को बिस्तर पर धकेला और उसके ऊपर चढ़कर उसकी चूत में एक ही बार में पूरा लंड पेल दिया.

“उउउह, लगता है मेरा भाई उफ्फ्फ…” श्रेया अपनी बात पूरी भी न कर पाई थी कि विवेक ने उसका मुंह अपने मुंह से बंद कर दिया. विवेक को इस बात से बिलकुल आपत्ति नहीं थी कि श्रेया अभी अपने मुंह से उसके ही लंड को चूस चुकी थी. कामांध विवेक ने उसे चूमते हुए तीव्र गति से चुदाई आरम्भ कर दी. श्रेया भी अपने भाई के उत्साह से अछूती न रही और उसने भी अपनी कमर उछालते हुए उसका साथ दिया. दोनों बहनें एक साथ कमर उछालते हुए अपने पिता और भाई के लंड का आनंद ले रही थीं.

तो उनकी माँ कैसे पीछे रहती. पर सुजाता ने मोहन से अपनी गांड मरवाने की इच्छा की तो मोहन ने भी इसमें सम्मति जताई. तो सुजाता घोड़ी के आसन में आ गई. सुजाता की गांड के छेद को थूक और उँगलियों से कुछ देर तक खोलने के बाद मोहन ने अपने लंड से उसकी गांड की गहराई नाप दी. श्रेया मोहन के पास विवेक से चुद रही थी और उसके पास स्नेहा अपने पिता से. इस समय किसी को प्रेम से चोदने या चुदने की इच्छा नहीं थी. इस चुदाई में केवल शरीर की भूख को मिटाना था और उसमे तीनों जोड़े बढ़ चढ़कर अपनी शक्ति और उत्साह का प्रदर्शन कर रहे थे.

कमरे में आहों, कराहों और सिसकारियों की ऊष्मा थी. चुदाई की सुगंध से कमरा महक रहा था. शरीर पसीने से लथपथ होने लगे थे. और तीनों जोड़े पूरी त्वरता और गति से चुदाई का आनंद ले रहे थे. इस समय कमरे का वातावरण ऐसा था मानो यहां कोई युद्ध लड़ा जा रहा हो. योद्धा अपनी अपनी शक्ति के प्रदर्शन में लगे हुए थे. ये किसी भी प्रकार से प्रेम नहीं था. केवल वासना और शरीर की संतुष्टि ही एकमात्र उद्देश्य था. दोनों प्रतिद्वंदी अपने विरोधी को हराने का प्रयास कर रहे थे. परन्तु सफल कोई न हो रहा था. कोई अस्त्र त्यागने के बारे में सोच नहीं रहा था.

परन्तु प्रकृति के अपने नियम हैं और किसी को भी असीम शक्ति अथवा बल प्रदान नहीं किया जाता. इसी कारण एक लम्बे समय के बात गति शिथिल होने लगी. महिलाएं अब अपने रस का निस्तारण कर चुकी थीं और केवल पुरुष ही शेष थे. मोहन ने सुजाता की गांड मारते हुए उसके नितम्बो को इतनी शक्ति से पकड़ा हुआ था कि वो लाल हो चुके थे. उसके धक्कों ने भी इसमें अपना यथोचित योगदान किया था. सुजाता को आज की मोहन की ये शक्तिशाली चुदाई बहुत रास आई थी. मोहन अधिकतर गांड भी प्रेम से ही मारता था. परन्तु आसपास चल रहे दृश्य ने उसे भी उद्वेलित कर दिया था.

मोहन ही पहले झड़ा भी और उसके पीछे पीछे अविरल ने अपनी बेटी की चूत भर दी. अंत में विवेक के रस की प्यासी श्रेया की भी चूत को उसका प्रिय रस मिल ही गया. तीनों जोड़े एक दूसरे को चूमते हुए एक दूसरे से लिपटे रहे. समय जैसे थमा हुआ था. उन्हें पता था कि आज रात हर मिश्रण में चुदाई का आनंद मिलेगा और इसके लिए वे पूर्ण रूप से तत्पर थे.

************************

सुनीति का घर:

सुनीति ने उन दोनों को देखा तो कुछ शर्मा सी गई. विशेषकर महक की आँखों की चमक और लालसा देखकर. आज उसे अपनी भावी बहू के सानिध्य का आनंद मिलने वाला था और महक को देखकर वो समझ गई कि उसे दोनों प्रकार के सुख का अनुभव है. महक की झिझक देखते हुए सुनीति ने ही आगे बढ़ने का बीड़ा उठाया. आगे बढ़कर उसने महको को अपनी बाँहों में भर लिया. महक भी सिकुड़कर उससे लिपट गई.

“शर्मा रही हो? तुम तो समुदाय में बहुत समय से सक्रिय हो, तो शर्म कैसी?”

“जी मम्मी जी, वो मेरे सास ससुर नहीं थे न. न कोई संबंधी ही थे. तो वहाँ इतना संकोच नहीं था. अब बात कुछ और है.”

“मैं समझ सकती हूँ. पर हमारा भी परिवार तुम्हारी ही जीवन शैली में लिप्त है. तो शीघ्र ही इस संकोच को दूर करो और सम्मिलित हो जाओ.”

ये कहते हुए सुनीति ने महक के चेहरे को उठाया और उसके होंठ चूम लिए. मानो एक बाँध रुका था, जैसे ही दोनों के होंठ मिले तो टूट गया और एक दूसरे के चुंबन में दोनों लीन हो गयीं. और इस बात का ध्यान ही नहीं रहा कि दोनों के तौलिये उनका शरीर छोड़कर गिर चुके थे. आशीष इस लुभावने दृश्य को देखकर अद्भुत आनंद का अनुभव कर रहा था. सुनीत के सौंदर्य से वो अनिभिज्ञ नहीं था पर महक ने भी उसे आकर्षित किया. उसके लंड ने इस बात का सम्मान किया और उठकर अपना प्रयोजन दर्शाया.

महक को चूमते हुए सुनीत उसे बिस्तर की ओर ले चली और उसे बिस्तर पर लिटाकर उसके होंठों से स्वयं को हटाते हुए नीचे उसकी चूत को अपने होंठों से चूमने लगी. उसके बाद अपनी जीभ और उँगलियों से अपनी भावी बहू की चूत का अवलोकन करने में व्यस्त हो गई. अचानक उसे ध्यान आया कि उसके पति भी वहीं उपस्थित हैं. उसने सर उठाकर देखा तो आशीष अभी भी तौलिये में ही थे, हालाँकि उनका लंड उसमे भी टैंट बनाये हुए था.

“आइये, न मेरे साथ अपनी बहू की चूत का स्वाद लीजिये. और वो तौलिये हटा दीजिये, आप उसमे बहुत अटपटे दिख रहे हैं.”

आशीष ने तौलिया हटाया तो महक ने उनके लंड को देखकर संतोष की साँस ली. हालाँकि वो उन्हें समुदाय में प्रवेश के समय देख चुकी थी, पर अब निकट के दर्शन थे. आशीष सुनीति के साथ बैठ गया और अपने सामने परोसी हुई चिकनी चूत को देखने लगा. सुनीति ने महक की चूत से मुंह और जीभ हटाई और एक ओर होकर अपने पति को स्थान दिया. आशीष ने महक की गीली चूत पर चमकती अपनी पत्नी के द्वारा चाटी हुई चूत को देखा और फिर फाँकों को फैलाकर अपनी जीभ से उसे चाटने लगा. महक अब एक भिन्न ही अनुभति कर रही थी. इस प्रकार उसकी चूत को एक साथ दो लोगों ने कभी नहीं चाटा था. अब आशीष और सुनीति एक एक करके उसकी चूत के रस को पी रहे थे.

सुनीति: “मैं अपनी बहूरानी को भी अपना स्वाद दे देती हूँ. तब तक आप उसकी गांड का भी स्वाद ले लो. आज उसका भी आपको उद्धार जो करना है.”

आशिष ने ये सुना तो उसका लंड फड़क उठा. अपने हाथों से महक के नितम्बों को उठाकर उसने अपनी जीभ से उसकी गांड को हल्के से चाटा तो महक की सिसकारी निकल गई. अब आशीष उसकी चूत के ऊपर के भाग से गांड के निचले भाग तक अपनी जीभ से चाटने लगा. बीच में वो चूत में भी जीभ डाल देता और कभी गांड में भी. महक के मुंह पर अब सुनीति ने अपनी चूत लगा दी थी तो महक कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थी.

सुनीति: “सुनिए. मैं लेटकर महक से अपनी चूत चुसवाती हूँ. आपको इस प्रकार उसकी चूत और गांड तक पहुंचने में सरलता होगी.”

आशीष हटा, सुनीति लेटी और इस बार महक उसकी चूत में मुंह डालकर ये सिद्ध करने में जुट गई कि वो एक आदर्श बहू की भूमिका में सटीक बैठेगी. उसके पीछे उसके भावी ससुर ने फिर से उसकी चूत और गांड चाटने का कार्यक्रम आरम्भ कर दिया. आशीष से अब रुका नहीं जा रहा था. उसने सर हटाकर महक के आगे सुनीति को देखा और आँखों से विनती की कि उसे भी कुछ ध्यान चाहिए.

सुनीति: “महक बेटी. अब अपने पापाजी के लंड को भी चुदाई के उपयुक्त कर दो. बहुत देर से रुके हुए हैं वो भी.”

महक ने इस बार पहली बार अपना सुझाव दिया.

महक: “मम्मीजी, चलिए हम दोनों इस कार्य को करते हैं.”

आशीष प्रसन्न हो गया और लेट गया. उसके एक ओर सुनीति आ गई और दूसरी ओर महक. दोनों सुंदरियों के बीच आशीष स्वयं को भाग्यशाली समझ रहा था. सुनीति ने लंड को पकड़ा और महक की ओर किया.

“पहले तुम, नहीं तो स्वाद और सुगंध कम हो जाएगी.”

महक ने अपने भावी ससुर के लंड को प्रेम से चाटा और फिर मुंह में लेकर चूसने लगी. आशीष उसके सिर पर हाथ फेरने लगा. कुछ समय बाद महक ने लंड को छोड़ा और अपनी भावी सास की ओर कर दिया.

“धन्यवाद मम्मीजी. स्वाद और सुगंध बहुत अच्छी है. आप बहुत भाग्यशाली हैं.”

“वो तो हूँ.” ये कहते हुए आशीष के लंड को मुंह में लेकर सुनीति चूसने लगी.

कुछ समय तक इसी प्रकार से भावी सास बहू भावी ससुर के लंड को चूसती चाटती रहीं. अब आशीष चुदाई के लिए तत्पर था और महक और सुनीति भी.

“महक, आओ, अब पहले तुम्हारी चूत का ही आनंद दे दो इनको.”

रात अभी शेष थी

************************

सुजाता का घर:

सभी कुछ देर तक यूँ ही शांति से लेटे रहे. फिर विवेक उठा और सबके लिए नए पेग बनाये. श्रेया उठी और उसकी सहायता करने लगी. फिर स्नेहा भी आ गई और तीनों ने मिलकर सबके पेग बनाये. उधर सुजाता, अविरल और मोहन बैठे हुए थे. सुजाता दोनों के बीच में स्थापित हो गई. स्नेहा और श्रेया ने आकर उन्हें उनके पेग दिए और फिर तीनों भाई बहन अपने पेग लेकर उनके सामने बैठ गए.

“तुम दोनों सप्ताह में एक दिन आ ही जाया करो. देखो कितना अच्छा लग रहा है, सब ऐसे बैठे हुए हैं.” सुजाता ने कहा. अविरल ने भी उसका समर्थन किया.

मोहन: “ठीक है, हम दोनों हर शुक्रवार आ जाया करेंगे. अन्य किसी दिन सम्भव नहीं है.”

श्रेया और स्नेहा एक दूसरे से लिपट गयीं. सुजाता भी अपनी इच्छा पूरी होते देख प्रसन्न हो गई. सबके चेहरों पर एक प्रसन्नता थी. अपने पेग के घूँट लेते हुए अन्य बातें चलती रहीं. सुजाता चुदाई के लिए आतुर हो रही थी और अपने दोनों ओर बैठे लौडों को सहला रही थी.

“लगता है मम्मी को अब इन दोनों से एक साथ चुदना है. है न मम्मी?” श्रेया ने सुजाता की इच्छा का अनुमान लगाया.

“हाँ पर….” सुजाता कुछ बोलती इसके पहले ही स्नेहा बोल उठी.

स्नेहा: “मम्मी, आप हम तीनों भाई बहन को आनंद लेने दो, आप पापा और जीजू से चुदवाओ। अगर हुआ तो दादा को भी भेज देंगे आपकी सेवा में.”

“कितनी प्यारी बच्ची है. ठीक है. विवेक को भी भेज ही देना, जब मन करे.”

सुजाता ने झुकते हुए मोहन के लंड को मुंह में लिया और कुछ देर चूसकर अविरल की ओर मुड़ गई. बड़ी सरलता से वो एक एक करके दोनों लंड चूस रही थी. स्नेहा ने विवेक के लंड को कुछ देर चूसा और फिर लेट गई. श्रेया ने उसके मुंह पर अपनी चूत लगाई और झुकते हुए अपने मुंह से स्नेहा की चूत को चाटना आरम्भ कर दिया. विवेक ने अपने सामने परोसी हुई अपनी दीदी श्रेया की सुडोल गांड को देखा तो उसे अपना लक्ष्य दिख गया.

विवेक ने अपनी माँ की ओर एक बार देखा जो अब तक दोनों लौड़ों को चूसने में ही व्यस्त थी. उसके एक एक मम्मे पर उनके पति और एक पर दामाद के हाथ थे और उनकी चूत में अविरल की उँगलियाँ चल रही थीं. विवेक को पता था कि अब शीघ्र ही उसकी माँ चुदने के लिए व्याकुल होने वाली है. उसने अपने सामने खिली हुई गांड को देखा और आगे बढ़कर उस पर थूक लगाया. अंगूठे की सहायता से थूक को अंदर धकेला. श्रेया ने विवेक का तात्पर्य समझा अपनी गांड को ढीला किया तो विवेक का अंगूठा सरलता से अंदर प्रवेश कर गया.

अपने लंड को अपनी दीदी की गांड पर रखते हुए उसने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि उसकी दोनों बहनें एक दूसरे की चूत चाटने में कितनी मग्न थीं. हल्के दबाव के साथ उसके सुपाड़े ने श्रेया की मखमल सी कोमल गांड में अपना स्थान बना ही लिया.

“शाबास! विवेक. अपनी दीदी की गांड अच्छे से मारना। बेचारी तुम्हारे लंड के लिए बहुत तरसती है.” मोहन ने उसे उत्साहित किया.

श्रेया ने अपना मुंह स्नेहा की चूत से हटाया, “तो आप अब हर सप्ताह आने के लिए स्वीकृति दे ही दीजिये.”

“अरे, जब मम्मीजी ने कह दिया तो मैं कैसे मना कर सकता हूँ? हैं न मम्मीजी?” मोहन ने बोला।

इस बात से वातावरण कुछ हल्का हो गया. पर सुजाता की प्यास भड़क गई.

“तो फिर आ जाओ और मेरी गांड मार लो, दामादजी.” सुजाता ने अपने मुंह से लंड निकाले और अविरल की ओर देखा.

“मुझे क्या देख रही हो, इधर चढ़ जाओ और मोहन तुम्हारी गांड मार लेगा पीछे से.” अविरल ने सुजाता को अपने लौड़े पर चढ़ने का आमंत्रण दिया.

मोहन भी अब सास की गांड मारने के लिए उत्सुक था. जब तक उसने अपने लंड पर थूक लगाया, तब तक सुजाता अविरल के लंड पर चढ़ाई कर चुकी थी और पूरे लंड को उसकी चूत निगल गई थी. मोहन ने आव देखा न ताव और अपने लंड को सुजाता की गांड पर लगाया और एक झटके से सुपाड़े को अंदर डाल दिया. सुजाता के मुंह से एक आनंद भरी सिसकारी निकली. उधर विवेक भी श्रेया की गांड में अपने लंड पर दबाव बनाये हुए उसे और अंदर धकेल रहा था. श्रेया की जीभ स्नेहा की चूत में अंदर जाकर अपनी छोटी बहन का रस पीने में व्यस्त थी.

सुजाता को मोहन ने सम्भलने का अवसर नहीं दिया. उसे अपनी सास की अनंत कामपिपासा का ज्ञान था और वो जानता था कि सुजाता दुहरी चुदाई में किसी भी प्रकार की कोताही सहन नहीं करती थी. विवाह के पहले भी वो अपने समुदाय के अन्य लड़कों के साथ उसकी कई बार चुदाई कर चुका था. वो सुजाता को वैसे ही चोदता था जैसे कि वो चाहती थी. अपने लंड को कुछ बाहर खींचकर एक लम्बे धक्के के साथ उसने लंड को लगभग पूरा गांड में डाल दिया. अपने ससुर के लंड का अनुभव उसे उस महीन झिल्ली के उस पर हो रहा था. एक बार फिर लंड को बाहर निकालकर इस बार और अधिक शक्ति के साथ उसने धक्का लगाया और लंड को पूरा गांड में पेल ही दिया.

“आहा मोहन, क्या पेला है बेटा। अब तुम दोनों मेरी तगड़ी चुदाई करो. मेरी आत्मा तृप्त कर दो.” सुजाता ने कहा और अविरल के होंठ चूसने लगी.

अविरल ने कमर उठाकर धक्के लगाने आरम्भ किये और मोहन ने भी उसकी ताल में ताल मिलाकर सुजाता की चूत और गांड में लंड के हमले करते हुए सुजाता के मम्मों को अपने हाथों से मसलने लगा. मोहन वैसे तो बहुत शांत स्वभाव का था और उसकी चुदाई भी उसी प्रकार से होती थी, परन्तु अपनी सास के साथ वो एक नए ही रूप में दिखता था. ससुर और दामाद मिलकर सुजाता को निर्ममता से चुदाई कर रहे थे.

विवेक के लंड ने अब अपना पूरा मार्ग सरल कर लिया था और अब वो बड़ी सतर्कता के साथ अपनी बड़ी बहन की गांड मार रहा था. स्नेहा उसी चूत से बहते रस को छप छप कर पी रही थी और स्नेहा की चूत का रस श्रेया पी रही थी. विवेक के लंड की गति उतनी द्रुत नहीं थी जितनी उनके पास में चल रही चुदाई में थी. वो श्रेया की गांड का पूरा आनंद लेकर उसे मंथर गति से ही चोद रहा था.

विवेक के मन में एक नया विचार आया तो उसने अपनी गति बढ़ाई. श्रेया चाहकर भी अपनी गांड उछालकर उसके लंड का साथ नहीं दे सकती थी, क्योंकि उसकी चूत से स्नेहा की जीभ निकल जाती. पर वो अपने भाई और बहन के इस दोहरे हमले का आनंद पूर्ण रूप से ले रही थी. विवेक का ध्यान इस समय बँटा हुआ था, एक ओर वो श्रेया की गांड मरने में व्यस्त था और अपने लंड को अंदर बाहर होते देख रहा था, वहीं दूसरी ओर उसका ध्यान अपनी माँ की ओर भी था जिसे उसके पापा और जीजा चोद रहे थे. मोहन और अविरल की तीव्र और शक्तिशाली चुदाई से उसकी माँ के मुंह से निकलती हुई कामोत्तेजक चीखें उसे और भी प्रेरित कर रही थीं.

वो आगे झुका और उसने श्रेया के कान में कुछ कहा. श्रेया ने बिना कुछ कहे सिर हिलाया. तो विवेक ने अपनी गति कुछ और बढ़ाई और फिर रुक गया. स्नेहा को भी इस बात का भान हुआ.

विवेक ने बहुत सावधानी के साथ अपने लंड को श्रेया की गांड से निकाला और फिर उठकर अपनी माँ सुजाता के सामने बिस्तर पर जा खड़ा हुआ. अविरल ने नीचे से उसे देखा और मुस्करा पड़ा, वहीँ जब मोहन ने ये देखा तो अपनी गति और बढ़ा दी. एक अच्छे दामाद का ये कर्तव्य है कि वो अपनी सास के सुख के लिए हर प्रकार का प्रयास करे. इस समय श्रेया ने भी अपने भाई के तने लंड को देखा जिसपर उसकी गांड का रस चिपका हुआ था. सुजाता की गांड पर जब मोहन ने हल्की सी चपत लगाई तो उसने अपनी आँखें खोलीं और सामने अपने बेटे के लंड को लहराते हुए देखा.

उसकी आँखों में एक नई चमक आ गई और उसके शरीर में एक नए आनंद का संचार हुआ. तीन तीन पारिवारिक लौडों से चुदने का ये स्वर्णिम अवसर उसके उन्माद को और भी बढ़ाने में सफल हुआ. बिना हाथों से छुए उसने अपना मुंह खोला और विवेक के लंड पर जीभ फिराई. फिर अपनी जीभ के द्वारा ही उसने लंड को अपने मुंह में लेने का प्रयास किया, पर सफल न हो सकी. विवेक ने अपनी माँ की सहायता के लिए उसका सिर अपने हाथों से पकड़ा और थोड़ा लंड को मुंह में डाल दिया. सुजाता उसे इतने में ही चाटने लगी और फिर धीरे धीरे अंदर अपने मुंह में लेने लगी.

लंड के पर्याप्त मात्रा में अंदर जाने के बाद ही उसने अपने हाथों का प्रयोग किया और विवेक के लंड को चूसने लगी.

“मॉम, अधिक नहीं. मैं तो दीदी की गांड का स्वाद दिलाने के लिए आया हूँ. और हर कुछ मिनटों में आता रहूँगा।”

“ये तो बहुत अच्छी बात है.” सुजाता ने मुंह से लंड निकाला और कहने के बाद फिर से चूसने लगी.

जब श्रेया ने ये बात सुनी तो उसने अपने मुंह को स्नेहा की चूत से हटाया.

“तब तो हमें अपनी स्थिति बदल लेनी चाहिए. स्नेहा तुम पलट कर दूसरी ओर हो जाओ, और मैं इस ओर हो जाती हूँ, जिससे की विवेक भैया को हर बार चलकर इतनी दूर न जाना पड़े. बस गांड से लंड निकालें और माँ से चुसवा लें.”

श्रेया के सुझाव में तर्क था और तत्क्षण ही ये परिवर्तन भी कर लिया गया. विवेक ने अपने लंड को सुजाता के मुंह से निकाला.

“बस मॉम, मैं यूँ गया और यूँ आया.” विवेक ने श्रेया की गांड के पीछे आते हुए कहा.

सुजाता ने अपने होंठों पर जीभ फिराई, “जब मन करे सो आ. वैसे तेरे पापा और जीजा भी ठोक कर चोद रहे हैं आज.”

विवेक ने अपने लंड को श्रेया की गांड में डाला और इस बार गति कम नहीं रखी. श्रेया समझ गई कि उसकी गांड की अब घनघोर चुदाई भी होगी और उसकी माँ का भी उसकी गांड के स्वाद से कई बार परिचय होगा। उसने स्नेहा की चूत को चाटने पर और उत्साह दिखाया. स्नेहा कुछ व्यथित थी. ऊपर श्रेया के सिर के होने से उसे अधिक कुछ दिख नहीं रहा था और सुनाई सब दे रहा था. उसने सोचा कि ऐसे तो उसे केवल रेडियो की ही कमेंट्री सुनने मिलेगी, दूरदर्शन का आँखों देखा हाल नहीं. श्रेया की चूत को चाटते हुए वो इसका तोड़ सोच रही थी. कुछ ही धक्कों के बाद विवेक अपनी माँ के सामने लौट गया. स्नेहा ने श्रेया की गांड पर थपकी दी. श्रेया ने अपनी चूत को उसके मुंह से हटाया.

“दीदी, दादा को बोलो मुझे भी आपकी गांड का स्वाद लेना है. एक बार मुझे और फिर एक बार मॉम को.”

श्रेया ने तो सुना ही, विवेक ने भी सुन लिया. दोनों बहनें एक दूसरे की चूत पर फिर से टूट पड़ीं. इस बार विवेक ने वही किया, श्रेया की गांड कुछ देर मारकर श्रेया को आगे किया और स्नेहा को लंड सौंप दिया. दो तीन बार इसी चक्र के बाद अब उसके अंडकोष रिक्त होने की अर्चना करने लगे. दूसरी ओर भी अब चुदाई समाप्त होने में अधिक देर न थी. मोहन और अविरल अपनी पूरी शक्ति सुजाता की चुदाई में झोंक रहे थे और सुजाता की चीखें धीरे धीरे क्षीण हो रही थीं. अब उसके मुंह से सिसकारियां ही निकल रही थीं.

अविरल ने अपने रस की फुहार सुजाता की चूत में उढेली तो सुजाता की चूत को ठंडक पड़ी. गांड की जलन को ठंडा करने के लिए एक अच्छे दामाद का कर्तव्य पूरा करते हुए मोहन ने अपने रस से अपनी सास की गांड भरने में अधिक समय नहीं लिया. साथ ही अब विवेक भी सुजाता से अपने लंड के अंतिम पड़ाव के लिए लंड चुसवा ही रहा था. चूत और गांड को ठंडक मिली ही थी कि विवेक ने अपने रस से सुजाता के मुंह में वीर्यपात कर दिया. सुजाता निःसंकोच उस रस को पी गई.

अब सुजाता के मन को शांति मिली, जब तीनों छेदों में उसके परिवार के पुरुषों ने अपने रस का योगदान दे दिया. स्नेहा और श्रेया भी अपने चरम पर पहुंचकर एक दूसरे से लिपटी हुई थीं. मोहन और विवेक अपने कृत्य के समापन के बाद हट गए और सुजाता को सहारा देकर अविरल के ऊपर से हटाया. सुजाता के चेहरे पर एक संतुष्टि थी और चेहरे पर एक चमक.

“क्यों मॉम, कैसा रहा?” श्रेया ने पूछा.

“अरे तू तो जानती ही है. इससे अधिक आनंद कभी मिल ही नहीं सकता. चलो अब मैं थोड़ा सफाई कर के आती हूँ फिर सोचेंगे कि सोना है या चुदना।”

**********************

नूतन और मेहुल:

नूतन मेहुल के साथ बिस्तर पर ड्रिंक ले कर बैठ गई. फिर नूतन ने अंत में उसने एक अध्याय चुना जो उसे उपयुक्त लगा. टीवी पर एक सुंदर महिला के दर्शन हुए. उसके पीछे नूतन आई और फिर एक अन्य महिला. उन दोनों को देखकर मेहुल अचरज में पड़ गया. प्रथम महिला टीवी की एक प्रसिद्ध कलाकार थी जो अधिकतर माँ अथवा और प्रेममई सास की भूमिका के लिए जानी जाती थी. उसके साथ वाली महिला भी उनके साथ एक धारावाहिक में कार्य कर रही थी और उसमें वो दोनों प्रतिद्वंदी थीं. पहली स्त्री कमल रंधावा थी और दूसरी जो विलेन थी उसका नाम दर्शा था. नूतन ने उन्हें कमरे में छोड़ा और बाहर चली गई.

नूतन ने शांति तोड़ी, “कमल क्लब की सदस्या है, पर दर्शा नहीं है. इसीलिए उन्हें यहाँ आना पड़ता है. दोनों को स्त्रियों से भी सेक्स करना अच्छा लगता है. जहाँ तक कमल की बात है, तो वो हर प्रकार की चुदाई में सम्मिलित होती है, पर दर्शा अन्य पुरुषों से केवल गांड ही मरवाती है. वैसे इस वीडियो में उसका कारण भी पता चल जायेगा.”

मेहुल ने सिर हिलाया पर अपनी आंखें टीवी से हटाई नहीं. अब तक कमल और दर्शा एक दूसरे को चूमने में व्यस्त हो चुके थे और फिर उन्होंने अपने कपड़े उतार दिए और संभाल कर अलमारी में टाँग दिए.

दर्शा: “तो आज क्या सोचा है?’

कमल: “वही हर बार के समान इस बार भी तीन लड़के आने वाले हैं. दो मेरे लिए तो एक तेरी गांड के लिए. क्यों नहीं चुदवा लेती सच में मन संतुष्ट हो जायेगा.”

दर्शा: “नहीं कमल, तू तो मेरे पति और मेरे समझौते के बार में जानती ही. मेरी चूत केवल उनके लिए है और वो भी किसी और की चूत में अपना लंड नहीं डालते. हाँ, हम दोनों को गांड मरवाने और मारने की पूरी स्वंत्रता है.”

“मैं सच में तुम दोनों के इस समीकरण पर अचम्भित हूँ. पर जैसा तुम चाहो.” दोनों बाथरूम में जाकर बाहर निकली ही थीं कि कमरे में तीन रोमियो अंदर आ गए.

नूतन में मेहुल को समझाया, “मैं तुम्हें ये सब दूसरों की चुदाई दिखाने के लिए नहीं दिखा रही हूँ, बल्कि किस प्रकार की कामक्रीड़ाएं चलती हैं ये बताना चाहती हूँ. तो आगे बढ़ा देती हूँ.”

इसके बाद कुछ आगे बढ़कर कुछ और दृश्य दिखाए जिसमें कमल की डबल चुदाई और दर्शा की गांड की चुदाई थे. मेहुल ने इतना तो देख ही लाया कि कमल को तीनों लड़कों ने हर छेद में चोदा और तीनों ने ही दर्शा की गांड भी मारी। इसके बाद नूतन ने अगले वीडियो को लगाया. हालाँकि नूतन ये दर्शा रही थी कि वो अपने मन से वीडियो का चयन कर रही थी, परन्तु ऐसा नहीं था. वो शोनाली के द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुसार ही उन्हें चुन रही थी. नूतन को कुछ वीडियो के बारे में तो समझ आया था परन्तु एक ऐसा वीडियो था जिसके बारे में उसे कुछ दुविधा थी. अगले वीडियो को चलाते हुए उसने मेहुल को कुछ और बताया.

“इस सदस्या के पति स्वास्थ्य कारणों से अब सम्भोग नहीं पाते। उनकी दवाइयों के कारण अब उनके लंड में इतनी शक्ति नहीं है. अधिक वृद्ध तो नहीं हुए हैं परन्तु उनका लंड खड़ा होता भी है देर के लिए और उतनी देर में वे इन्हें संतुष्ट नहीं कर पाते। क्लब में तो ये महिला आती ही हैं, परन्तु कभी कभी उनके पति भी उनकी चुदाई देखने में रूचि दिखाते हैं. मेरे विचार से तुम उन दोनों को देखकर पहचान भी जाओगे.”

इतनी बात बताई ही थी कि टीवी पर नूतन ने आगमन किया और उसके पीछे एक महिला और पुरुष भी आ गए. मेहुल उन्हें देखकर पहचान गया. वे नगर के एक प्रतिष्ठित व्यवसाई थे और उन्हें उसके पिता के द्वारा आयोजित कुछ पार्टियों में देखा था. उनकी पत्नी उनसे अधिक छोटी नहीं थीं और वो उसकी माँ की घनिष्ट मित्र थी. भरा पूरा शरीर, जिसे देखकर मेहुल का मन कई बार मचला था पर परिवार की प्रतिष्ठा के कारण कभी अपनी रूचि पर कोई कार्यवाही नहीं की.

परन्तु अब उसे लगता था कि आंटी भी कुछ ही समय में उसके नीचे होंगी. मोहनी सच में मोहनी ही थी, पार्टियों में उनके आसपास भँवरे घूमते थे पर उन्होंने कभी किसी को भी भाव नहीं दिया. आज मेहुल को उसका कारण समझ आ गया था. उनके पति सोहनलाल को तीन या चार वर्ष पहले ह्रदय आघात हुआ था, और सम्भवतः इसी कारण उनकी कामशक्ति क्षीण हो गई थी. नूतन ने उन्हें पूरे सम्मान से कमरे में लेकर छोड़ा और फिर सोहनलाल को कुछ कहते हुए बाहर चली गई. नूतन की ओर मेहुल देखा तो उसने बताया कि उन्हें कुछ समय के लिए रुकने के लिए कहा था क्योंकि कोई भी रोमियो आया नहीं था. मोहिनी ने अपने वस्त्र उतार कर अलमारी में रखे और यही सोहनलाल ने भी किया. दोनों ने हल्के फुल्के गाउन पहन लिए थे. मोहिनी को चूमते हुए सोहनलाल ने उसे विश्वास दिया. और फिर एक ओर रखे हुए सोफे पर जाकर बैठ गए.

कुछ देर में तीन रोमियो अंदर आये और मेहुल को आश्चर्य इस बात पर हुआ कि उन्होंने पहले झुककर सोहनलाल के पाँव छुआ और आशीर्वाद लिया। इसके बाद वे मोहिनी के पास गए और उसके भी पाँव छुए. मोहिनी की आयु पचास वर्ष से अधिक थी. पर उसने स्वयं को बहुत सहेज कर रखा था. और उसके शरीर में कहीं भी झुर्री इत्यादि नहीं थीं. इसके बाद तीनों रोमियो ने भी अपने कपड़े उतार कर अलमारी में टाँगे पर उन्होंने कोई कपड़ा नहीं डाला. मेहुल को भी उनके लंड के आकार को देखकर समझ में आया कि इस क्लब का नाम दिंची क्लब क्यों है.

एक और बात जिसे मेहुल ने विशेष रूप से समझा कि सम्भवतः इन तीनों रोमियो से इस जोड़े की पहचान भी थी. उसने नूतन से पूछा कि क्या हर बार इन्हीं को बुलाया जाता है? इस पर नूतन ने मना किया, परन्तु ये भी बताया कि अधिकतर रोमियो से सोहनलाल मिल चुके हैं और इसीलिए ऐसा प्रतीत होता है. मेहुल को अभी भी कुछ संदेह था, पर वो चुप ही रहा. तीनों रोमियो ने मोहिनी को घेर लिया और उसके शरीर से खेलने लगे. मोहिनी भी उनका पूरा साथ दे रही थी. सोहनलाल भी उन सबको उत्साहित कर रहे थे.

अचानक मोहिनी ने उन्हें हटाया और सोहनलाल के पास जाकर उन्हें अपनी बाँहों में ले लिया. सोहनलाल ने उसे चूमा और कहा कि वो आनंद ले, वो इसकी अधिकारी है. फिर उसने उन तीनों रोमियो को कहा कि वे तीनों मिलकर मोहिनी की हर प्रकार से प्यास बुझाएं. महिनी तीनों के बीच में लौट गई और फिर आगे का खेल आरम्भ हो गया.

नूतन ने इसके बाद पिछले वीडियो के समान ही इस वीडियो के मुख्य आकर्षण दिखाए. इसमें भी मोहिनी की एकल, दुहरी और तीनों छेदों में एक साथ चुदाई के दृश्य थे. वीडियो की कुल अवधि लगभग तीन घंटे की थी और उसके अंत में मोहिनी के शरीर पर लालिमा छाई हुई थी. उसकी चूत और गांड से रस बह रहा था और वो बेसुध सी लेटी हुई थी. तीनों रोमियो अपने कार्य सम्पन्न करने के बाद बाथरूम से नहाकर निकले और अपने कपड़े पहने. इसके बाद उन्होंने सोहनलाल के पाँव छुए. सोहनलाल ने उन्हें अच्छे प्रदर्शन के लिए धन्यवाद दिया और फिर वो तीनों चले गए.

इसके बाद नूतन दिखाई दी जिसने मोहिनी को बाथरूम में नहलाया और उसे उसके वस्त्र पहनने में सहायता की. तब तक मोहिनी भी अपने पूर्व स्वरूप में आ चुकी थी. उसने नूतन को धन्यवाद किया और उचित रोमियो के चयन के लिए भी धन्यवाद किया. सोहनलाल ने भी नूतन को धन्यवाद किया और फिर कुछ देर तक तीनों ने बैठकर अन्य विषयों पर बात की जिसमे से कुछ संबंध नूतन के व्यवसाय से भी था. इसके बाद वो भी चले गए.

नूतन ने मेहुल को समझाया, “हमारे यहाँ सदस्य बनने वाली लगभग हर महिला को अपने पति की प्रत्यक्ष या परोक्ष सहमति प्राप्त है. सोहनलाल जी अपने स्वास्थ्य बिगड़ने के पहले मोहिनी जी को रगड़ कर चोदते थे, इसीलिए वो कभी कभी यहाँ आकर ये निश्चित करते हैं कि अब भी मोहिनी की उसी प्रकार से चुदाई की जा रही है. हाँ ये डबल ट्रिपल चुदाई पहले कभी नहीं की गई थी, पर अब नियमित हो चुकी है.”

“सेक्स का विषय ही अनोखा है. इसमें जितनी प्रकार की लीलाएं हैं वो किसी और क्रीड़ा में नहीं. और विकृतियां भी उतनी ही है. परन्तु जिसे जिस में सुख मिले, बिना किसी दूसरे को कष्ट दिए हुए या उसकी स्वीकृति के बिना तो सब चंगा है.”

“तुम सच कह रहे हो.”

************

सुनीति का घर:

कुछ समय तक इसी प्रकार से भावी सास बहू भावी ससुर के लंड को चूसती चाटती रहीं. अब आशीष चुदाई के लिए तत्पर था और महक और सुनीति भी.

“महक, आओ, अब पहले तुम्हारी चूत का ही आनंद दे दो इनको.”

सुनीति ने महक को अपने साथ बिस्तर पर लिटा लिया और उसके होंठ चूमने लगी. एक हाथ से उसके मम्मों को भी सहला रही थी. फिर दूसरे हाथ से महक के पैरों को खोला. दो उँगलियाँ उसकी चूत में डालकर कुरेदा तो महक चिंहुक पड़ी. महक को अपनी जांघों पर कुछ आभास हुआ तो उसने नीचे देखा. आशीष का मुंह उसकी चूत के निकट था और उसकी जांघों पर आशीष की साँसों की ऊष्मा का आभास था. आशीष ने अपनी जीभ से महक की जाँघों पर चाटना आरम्भ किया तो महक की तो जैसे धड़कन ही रुक सी गई.

आशीष ने चूत तक पहुंचने में कुछ देर लगाई और इस पूरी अवधि में सुनीति महक के होंठ चूसती रही, स्तन मसलती रही और अपनी उँगलियाँ महक की चूत में डाले रही. जब आशीष की जीभ ने महक की चूत को स्पर्श किया तो सुनीति ने अपनी ऊँगली निकाली और आशीष के मुंह में डाल दी. आशीष ने उसे चाट कर साफ किया. उसके नथुनों में महक की चूत की लुभावनी सुगंध समा गई. अपनी जीभ से उसने महक की चूत को चाटना आरम्भ कर दिया.

महक अब कामपिपासा से परिपूर्ण हो चुकी थी. वो चाहती तो थी कि अब ये अठखेलियाँ बंद हों और उसकी असली चुदाई की जाये, पर वो अपने भावी सास ससुर से ये कह नहीं सकती थी. दूसरी ओर सुनीति और आशीष उससे यही सुनना चाहते थे और इसीलिए वो उसे इतना छेड़ रहे थे. सुनीति ने अपनी उँगलियों से महक के भग्नाशे को जब दबाया तो महक से रुका नहीं गया. उसने ढेर सा रस आशिष के मुंह में छोड़ा।

फिर कराहते हुए बोल पड़ी, “पापाजी, अब और मत सताओ, प्लीज. मम्मीजी, प्लीज पापा को बोलो न कि अब चोद डालें मुझे. पापाजी प्लीज, मम्मीजी प्लीज. प्लीज.”

आशीष और सुनीति इसी प्रतिक्रिया के लिए आतुर थे. आशीष ने एक बार फिर महक की चूत पर जीभ फिराई और उठकर अपने लंड को उसकी रस भरी चूत पर रख दिया.

“आपकी होने वाली पहली बहू है, अच्छे से चोदना इसे.” सुनीति ने आशीष ने कहा और महक के स्तन दबाकर उसे चाटने लगी. आशीष ने अपने लंड को महक की चूत पर रखते हुए एक अच्छा शक्तिशाली झटका दिया तो महक की चूत में उसके लंड ने आधा रास्ता तय कर लिया. पाँच सेकण्ड रुकने के को बाहर खींचा और इस बार के धक्के ने उसके लंड को अपनी भावी बहू की चूत में पूर्ण रूप से स्थापित कर लिया.

“बहुत तंग है क्या? सुनीति ने पूछा.

“हाँ, और गर्म भी बहुत है.”

“होगी ही.”

इसके साथ ही सुनीति ने अपने एक हाथ को नीचे किया और महक के भग्नाशे से खेलने लगी. एक मम्मे को चाटते हुए, भग्न से खेलते हुए वो अपने पति को प्रोत्साहित करने में जुट गई. महक इस आनंद से अछूती न थी. इस प्रकार की चुदाई उसके अपने परिवार के बाहर पहली बार हो रही थी. अन्य हर बार एक शारीरिक भूख को ही मिटाया जाता था, और इस बार उसे सच में प्रेम की अनुभूति हो रही थी. आशीष ने जैसे ही अपने लंड को अंदर बाहर अंदर करना आरम्भ किया महक का शरीर आनंद से भर उठा.

“ओह! पापाजी. चोदो मुझे। बहुत अच्छा लग रहा है. मैं आपकी बड़ी बहू जो बनने वाली हूँ, अच्छे से स्वागत करिये मेरा.” महक के मुंह सी यूँ ही निकल गया.

सुनीति ने उसकी चूची और चूत से खेलते हुए उसे सांत्वना दी, “तेरा भाग्य अच्छा है बहू, न केवल तेरे ससुर तुझे अच्छे से चोदेेंगे, पर तेरा देवर, पति, इनके पिताजी और मेरे पिताजी भी तेरी भरपूर चुदाई करके तुझे सदा सुहागन और सुखी रखने वाले हैं. जितने भाग्यशाली हम हैं तेरे जैसी बहू और परिवार को पाकर उतनी ही तुम भी हो. अभी अपने ससुर से चुदाई का आनंद लो. तेरी नन्द भी कुछ कम नहीं है, न माँ, सब तुझे पूरा प्यार देंगे.”

महक ये सब सुनकर भावुक हो गई. आशीष ने अपने लंड को उसकी कमसिन चूत में गहराई तक उतारकर चोदना चालू रखा और सुनीति उसके शरीर के अन्य अंगों से खेलती रही. आशीष भी इस चुदाई का पूरा आनंद ले रहा था और ये भी सोच रहा था कि किस दिन वो अपनी समधन पर चढ़ पायेगा. महक और वो एक दूसरे की चुदाई में खोये हुए अवश्य थे पर एक दूसरे के परिवारों के बारे में भी रह रह कर सोच रहे थे. अब ऐसा तो हो नहीं सकता था कि सुनीति ऐसा न करती.

पंद्रह मिनट की इस प्रेमपूर्वक चुदाई के बाद आशीष और महक झड़ गए. सुनीति ने भी ये जान लिया कि आशीष ने ये मात्र स्वागत के लिए ऐसी चुदाई की है. अगली चुदाई में वो महक की माँ चोद देगा. आशीष ने अपने लंड को बाहर निकाला तो सुनीति ने महक की ओर संकेत किया.

“बहू, अपने पापाजी के लंड को साफ कर दो, पहली बार तुम्हारी चूत का रस पिया है इसने.” सुनीति ने कहा.

महक कोहनी के बल बैठी और आशीष ने उसके मुंह में अपना लंड दे दिया. महक ने सप्रेम उसे चाटा। नीचे उसकी चूत पर उसकी सास का मुंह लगा हुआ था. सुनीति ने उसकी चूत में से अपने पति का रस एकत्रित किया और रुक गई. आशीष के लंड को जब महक ने हटाया तो सुनीति ने उसके मुंह से मुंह मिलाया और महक को उसके और आशीष के रस का मिश्रण पिला दिया. सास बहू कुछ देर यूँ ही एक दूसरे को चूमते रहे. आशीष ने अगले पेग बनाये.

रात अभी शेष थी.

क्रमशः

1205100
 
अध्याय ३६: आठवाँ घर - स्मिता और विक्रम शेट्टी ७

***************************

नूतन और मेहुल:

नूतन ने अगला वीडियो आरम्भ करने से पहले मेहुल से कहा कि वो आँखें बंद रखे और जब वो कहे तब खोले.

नूतन: “मैं ये तुम्हें आरम्भ से नहीं दिखाना चाहती. कुछ आगे करने के बाद दिखाऊँगी।”

मेहुल: “अब और कितने दिखाओगी, कब से तुम्हारी मखमली गांड की आशा से मेरा लंड तड़प रहा है.”

नूतन: “इसीलिए मैं तुम्हें पूरे नहीं दिखा रही, क्लब में महिलाओं की क्या रूचि है ये जानना भी आवश्यक है. ये और अगला वीडियो कुछ विशेष विकृतियों के बारे में है. इनके लिए हम केवल उन्हीं रोमियो को चुनते हैं जो ये खेल खेल सकते हैं. अन्यथा नहीं.”

मेहुल ने समझते हुए, “ठीक है. पर अब तक मैंने ऐसा कुछ नहीं देखा जो मेरे लिए कठिन हो.”

नूतन: “ये अच्छा है, पर अब आँखें बंद करो.”

मेहुल ने आँखें बंद कर लीं और नूतन ने सही स्थान पर वीडियो लेकर रोका और मेहुल से ऑंखें खोलने के लिए कहा। कमरा अभी खाली ही था, पर शीघ्र ही बाथरूम का द्वार खुला और उसमें से एक स्त्री बाहर निकली. उसके आँखों पर एक मुखौटा था. वो नंगी तो थी ही, पर वो इस समय घुटनों के बल चल रही थी, और तो और उसके गले में एक पट्टा बंधा हुआ था, जैसे कुत्तों को बंधा जाता है. उस पट्टे की रस्सी किसी के हाथ में थी. जब वो कमरे में आगे आई तो उसके पीछे एक पुरुष था जो उस पट्टे को पकड़े हुए था. उसने भी मुखौटा पहना था और वो भी नंगा ही था.

उनके आगे आने पर मेहुल ने देखा कि कमरे में इस बार गद्दा बिस्तर पर तो था ही, एक नीचे भी बिछा हुआ था. वो स्त्री उस गद्दे पर आकर रुक गई और अपना मुंह नीचे करके कुत्ते के समान ही बैठ गई. नूतन ने मेहुल को देखा तो उसने मेहुल की आँखों में एक विषैली चमक देखी। उस स्त्री के सामने उस पुरुष ने एक स्टूल रखा और उसपर बैठ गया.

“तुम जानती हो न कि आज तुम्हें तुम्हारे व्यवहार का दंड मिलेगा?”

“जी.”

“बहुत अच्छा. तुम जानती हो कि तुम्हारे दण्ड का क्या नियम है. तो अब आरम्भ करते हैं.”

“ये पति पत्नी हैं. दोनों एक दूसरे के पूरक हैं ये तुम्हें आगे देखकर पता चल जायेगा.” नूतन ने समझाया.

उस महिला ने अपना चेहरा उठाया और फिर अपने पति के तलवे चाटने लगी. दोनों तलवों को चाटने के बाद उसने ऊपर देखा तो पति का लंड अब पूरे आक्रोश में था. पति ने स्टूल को आगे किया और लंड को पत्नी के मुंह के सामने ले आया. अपने मुंह में लेकर चूसते हुए पत्नी के मुंह से गप्प गप्प की ध्वनि आ रही थी. परन्तु अधिक देर तक चूसने का अवसर नहीं दिया गया.

“इतना पर्याप्त है, अब तुम्हारे दण्ड का समय आ गया है.”

ये सुनकर पत्नी ने अपने कूल्हे ऊपर उठा लिए. पति उठकर उसके पीछे गया और उसकी चूत में उँगलियाँ डालकर उसे चोदने लगा. पत्नी के मुंह से सिसकियाँ निकलने लगीं. अपनी उँगलियों को बाहर निकलकर पति ने लंड को उसकी चूत में एक ही धक्के में डाल दिया. पत्नी आगे की और गिर पड़ी, पर तुरंत संभलकर पूर्व आसन में आ गई.

“गुड गर्ल.” पति ने कहा और उसे तेजी से चोदने लगा. पर इस बार भी उसने अधिक देर तक चुदाई नहीं की. लंड बाहर निकाला और उँगलियों से चूत से ढ़ेर सारे रस को बटोरकर पत्नी की गांड पर लगाया. पत्नी कसमसाने लगी.

“वैसे तो तुम्हारी गांड सूखी ही मारनी चाहिए, पर आज तुम पर मुझे दया आ गई है.” पति ने कहा.

फिर अपने लंड को गांड पर रखा और पहले कुछ इंच तक बहुत धीरे से लंड डाला। फिर अचानक एक ही बार में एक धक्के में ही पूरा लंड पेल दिया. पत्नी फिर आगे गिर गई पर इस बार उठी नहीं। पति पूरी शक्ति के साथ उसकी गांड मारने में जुटा रहा. मेहुल को समझ नहीं आ रहा था कि इसके लिए उन्हें नूतन के घर आने की क्या आवश्यकता पड़ी थी. दस मिनट की दमदार चुदाई के बाद जब पति झड़ने को हुआ तो उसने लंड को बाहर निकाला और फिर से स्टूल पर जा बैठा. पत्नी ने सिर उठाकर उसके लंड को मुंह में लिया और चाटने लगी. तभी कमरे का द्वार खुला और दो रोमियो अंदर आ गए.

“आओ, इस रंडी ने मुझसे छल किया है. और अब इसे दण्ड दिया जा रहा है. क्या तुम दोनों भी मेरी सहायता करोगे.”

“जी, सर. बताएं क्या करना है.”

“तुम्हारे सामने इसकी चूत और गांड है, तो चोदो जी भर कर. आज हम तीनों इसे चोद चोद कर इसके किये का भुगतान करेंगे.”

दोनों रोमियो शीघ्र ही नंगे हो गए. उन्हें पहले ही बता दिया गया था कि उनकी भूमिका क्या है. एक रोमियो नीचे लेटा और पत्नी को दूसरे ने सहारा देकर उसके लंड पर बैठा दिया. इसके बाद दूसरे ने अपने लंड पर जैल लगाया और उसकी गांड में अपना लंड डाल दिया. पति ने अपने लंड को फिर से मुंह में डाला और अब तीनों उसे चोदने में व्यस्त हो गए. नूतन ने वीडियो आगे बढ़ाया तीनों पुरुष उसे चोदते रहे, पर केवल पति के ही लंड को उसके मुंह में जाने का सौभाग्य मिला. पति ने आगे भी उसकी चूत और गांड मारी, और इस समय एक रोमियो अलग खड़ा रहा. चुदाई लगभग दो घंटे चली, बीच में विराम भी लिया गया, पर पत्नी को केवल एक बार बाथरूम जाने की अनुमति मिली और वो घुटनों के बल ही गई और आई.

चुदाई समाप्त हुई तो पति ने दोनों रोमियो को जाने के लिए कहा और पत्नी को रस्सी से लेकर पहले जैसे बाथरूम में ले गया. इसके कुछ देर बाद दोनों बाहर आये तो वो अब नंगे तो थे पर मुखौटे नहीं थे. मेहुल दोनों को पहचान गया. वो महिला एक सम्मानित विधायक थी जो महिला सशक्तिकरण की पक्षधर थी. मेहुल को इस अपवाद पर हंसी आ गई.

“बाहर जो दिखते हैं, लोग वैसे होते नहीं. ये अपने पति की अधीनता से संतुष्ट होती हैं. और ये क्लब कभी नहीं जातीं। केवल पहले दिन ही इंटरव्यू के लिए गई थीं, और उसके बाद कभी नहीं. यहाँ या अन्य दो क्लब प्रबंधक के घर ही जाती हैं. अपने पति के सामने या साथ ही चुदवाती हैं. मुंह में पति के सिवा किसी का लंड नहीं लेतीं। पति को इन्हें दूसरों से चुदवाती देखने में आनंद आता है.”

“सच में संसार में किस किस प्रकार के लोग रहते हैं और कैसी कुंठाओं से ग्रस्त हैं.” मेहुल ने कहा और नूतन ने वीडियो बंद कर दिया.

“एक बात है, आप आगे अगर कोई और वीडियो चलाने वाली हैं तो पहले मेरे लंड को चूसकर शांत कर दें. कब से अपनी गांड की कल्पना से तना हुआ है.” मेहुल ने कहा और इसे नूतन ने सहर्ष स्वीकार कर लिया.

नूतन मेहुल के लंड चूसने में जुट गई और मेहुल आँखें बंद किये हुए अब तक के देखे हुए वीडियो का मन ही मन विश्लेषण करने लगा. ये तो उसे समझ आ ही गया था कि क्लब में स्त्रियों की न केवल काम वासना को तृप्त किया जाता था, बल्कि उनकी कुंठाओं का भी पोषण किया जाता था. उसे केवल एक ही चिंता थी कि इस प्रकार की स्त्रियों के समागम के पश्चात क्या रोमियो अपने जीवन में आगे जाकर कभी सादे सेक्स का आनंद ले पाएंगे? वो स्वयं इस बात का उदाहरण था. परन्तु उसने इस विषय को कभी और सोचने के लिए छोड़ दिया. वैसे भी अब समुदाय में सम्मिलित होने के बाद सादे सेक्स के अवसर कम ही रहने वाले थे. उसके परिवार की ही जीवनशैली सादी तो किसी भी प्रकार से नहीं थी.

नूतन ने उसके लंड को चूसकर उसका रस पी लिया और फिर मेहुल के साथ बैठ गई.

“कुछ आराम मिला?”

मेहुल ने हामी भरी तो नूतन ने फिर से रिमोट उठा लिया.

“फिर से आँखें बंद करो. ये भी कुछ कुछ पिछले जैसा ही है पर एक बड़ा परिवर्तन है.”

मेहुल ने आँखें बंद कर लीं पर उसे अनुमान था कि इस बार क्या होगा.

************************

सुनीति का घर:

सुनीति और महक अब एक दूसरे से खुल गए थे. आशीष भी अपनी पत्नी के अपनी भावी बड़ी बहू के साथ के वार्तालाप को सुन रहा था. उसे आज ये आभास हुआ था कि उसके पिता या उसके ससुर को किस प्रकार की भावना रही होगी जब उन दोनों का विवाह निश्चित हुआ था. उसके मन में आनंद की एक नई लौ थी. सुनीति और महक बातें कर रही थीं जैसे एक परिवार में जुड़ने पर उसके बारे में बताया जाता है.

सुनीति, “मैं तुम्हारी मम्मी से बात करूंगी कि जब तक विवाह सम्पन्न नहीं होता तब तक वो तुम्हें इसी प्रकार से सप्ताह में एक या दो दिन हमारे पास आने की अनुमति दे दें.”

“दो तीन दिनों में मेरे माता पिता भी यहीं आ रहे हैं. कई वर्षों के बाद उन्होंने यहाँ आना स्वीकार किया है, पुराने विचारों के कारण अब तक रुके हुए थे. पर इस बार जब पापाजी, यानि इनके पिताजी जब गाँव गए तो उन्हें मनाने में सफल रहे थे. अभी तो केवल दो माह के लिए आने के लिए माने हैं, पर हम सब यही चाहते हैं कि वे अब यहीँ रहें. देखें क्या होता है. सम्भव है कि तुमसे मिलने के बाद वे इस पर विचार करें. उन्हें भी अपने नातियों के बच्चों से खेलने का मन तो करेगा ही.” सुनीति ने मुस्कुरा कर कहा तो महक शर्मा गई.

“अरे सुनीति, कहाँ अभी से इस फूल सी बच्ची को माँ का दायित्व देना चाहती हो. अभी तो इसके खाने खेलने के दिन हैं.” आशीष ने हँसते हुए कहा.

“मुझे पता है आपके खेल का अर्थ. आपको तो बस एक ही ध्यान रहता है.”

“मेरा वो तात्पर्य नहीं था, पर अगर इतनी सुंदर स्त्रियां सामने हों तो ऐसा न सोचना भी एक अपराध ही, है न महक?” आशीष ने कहा.

“जी पापाजी.” महक ने कहा.

“क्या? तुम एक बार में ही इनका पक्ष लेने लगीं? मेरे बारे में कोई सोच नहीं है?” सुनीति ने गंभीर स्वर में कहा.

महक घबरा गई कि ये क्या हो गया, कहाँ पति पत्नी के बीच में फंस गई. वो कुछ कहने ही वाली थी कि सुनीति और आशीष ठहाके मार कर हंसने लगे.

“अरे तुम घबराओ मत. ये तो हमारे ठिठोली करने का ढंग है.”

ये सुनकर महक शांत हुई और सुनीति के सीने में मुंह छुपा लिया.

“वैसे अगले सप्ताह तुम्हारी भेंट इनके पिता और मेरे माता पिता से होगी, अन्य सबसे भी तुम उचित रूप से मिलोगी.” सुनीति के इस कथन से महक को कुछ आभास हो गया कि ये मिलन किस प्रकार का होगा.

इसके बाद सुनीति ने अपने और आशीष के माता पिता के बारे में बताया. उनकी घनिष्ठ मित्रता और गाँव में उनके मित्र समूह के बारे में भी बताया. महक जो कभी गाँव में नहीं रही थी ये सुनकर अचरज में पड़ गई कि वे सब अपने गाँव में इतने वर्षों से इस प्रकार से उन्मुक्त सेक्स का आनंद ले रहे थे.

“गाँव को इतना पिछड़ा मत समझो. वो कई मापदंडों में नगरों से भी आगे हैं. वैसे तो मुझे अपने परिवार और उनके मित्रों के ही बारे में पता है, पर आश्चर्य नहीं होगा कि ये अन्य परिवारों के बीच भी चलता हो. वहाँ भी कई मित्र मंडलियाँ हैं. वैसे मेरी माँ तुमसे मिलकर बहुत प्रसन्न होंगी. उन्हें तो कबसे अपने नातियों की बहुओं के आने की प्रतीक्षा है. उन्हें ये तो पता है कि असीम का विवाह तय हो गया है, पर ये नहीं पता कि तुम्हारे परिवार की जीवनशैली भी ऐसी ही है. उन्हें कुछ आशंका है कि आगे क्या होगा. अगले सप्ताह तुमसे मिलकर वो दुविधा भी मिट जाएगी.”

इस बार आशीष बोला, “पापा और सुनीति के पिता बहुत पुराने मित्र हैं. मेरी माँ के देहांत के बाद उन्हें यहां लाने के लिए हमें बहुत प्रयास करने पड़े. आज भी वो निरंतर अपने गाँव जाते रहते हैं. उनका बहाना तो ये होता है कि खेत खलिहान देखने जा रहे हैं, पर उन्हें वहाँ अपने मित्रों के साथ रहना अधिक भाता है.”

सुनीति अब अपने हाथ को नीचे ले जाकर महक की चूत से खेल रही थी. उसने देख लिया था कि अब आशीष भी अगली चुदाई के लिए आतुर हैं. और इस बार अवश्य ही वो अपनी भावी बहू की गांड ही मारने के इच्छुक होंगे. सुनीति को पता था कि आज उसे अपने सुख का त्याग करके महक और आशीष को अधिक समय देना होगा. फिर वो ये सोचकर मुस्कुरा उठी कि इसकी भरपाई वो कल करेगी. और उसके बाद तो उसके पिता भी आ ही जायेंगे. कितने दिन हो गए उनसे मिले हुए. ये सोचते हुए उसकी चूत में पानी आ गया. उसके महक की चूत में एक ऊँगली डाली और रस से भीगी उस ऊँगली से महक की गांड को कुरेदा. महक ने अपने कूल्हे उठाकर उन्हें सहायता की.

“गांड मरवाना अच्छा लगता है?” सुनीति ने पूछा.

“जी. बहुत.” महक ने भी बेझिझक उत्तर दिया.

“तो तेरी ये इच्छा आज तेरे पापाजी पूरी करेंगे और उसके बाद परिवार के सारे पुरुष. इन सबको भी गांड मारने में बहुत आनंद आता है.” ये कहकर सुनीति ने गांड में ऊँगली डाल कर घुमाई. “सुनिए, बहूरानी भी गांड मारने में रूचि रखती है, तो क्या आप…”

“बिलकुल, नेकी और पूछ पूछ.”

ये सुनकर महक हंस पड़ी और सुनीति ने कहा, “देखा, क्या कहा था मैंने?” फिर आशीष से बोली कि वो बाथरूम से जैल ले आये. आशीष अपने लंड को हिलाते हुए बाथरूम से जैल ले आया.

“अब महक को मेरी चूत का रस पीने दो और आप उसकी गांड मारो. थोड़ा प्रेम से मारना बहू है हमारी.”

हालाँकि महक कहना तो चाहती थी कि जैसे मन हो वैसे मारो, पर उसने चुप रहना ही भला समझा. अगर आशीष जोर से मारेंगे तो अच्छा ही होगा. आशीष उठकर बाथरूम में गया और लौटा तो उसके हाथ में जैल की एक ट्यूब थी. सुनीति लेट गई थी और महक उसकी चूत पर झुकी हुई थी. महक की सुंदर गांड इस समय ऊपर उठी हुई आशीष को आमंत्रण दे रही थी. इस समय वो महक की गांड को प्रेम से मारना चाहता था. उसे विश्वास था कि महक कड़ाई से गांड मरवाने का भी अनुभव रखती होगी, परन्तु उसे उसी प्रकार से प्रस्तुत होना था जैसे विक्रम अपनी बेटी के साथ होता था.

महक की गांड पर हाथ फिराते हुए उसे अग्रिमा और भाग्या की गांड की याद आ ही गई. वो भी इसी प्रकार से सुडौल और सुंदर थीं. समुदाय में उनके प्रवेश को इतने दिन भी नहीं हुए थे कि उसे अन्य लड़कियों की गांड का आनंद मिल पाता। उसे मधु जी की पोती मान्या की गांड का भी ध्यान आया जो सम्भवतः सबसे यंग और तंग थी. अपने सामने परोसी हुई गांड को देखकर आशीष के मुंह में पानी भर आया. उसने ट्यूब को एक ओर रखा और महक के नितंब फैलाकर उसके गांड के छेद को खोल दिया. बाहर भूरी दिखने वाली गांड अंदर से हल्का गुलाबी रंग लिए हुए थी. अपनी जीभ से उसने उसे छेड़ा तो महक के शरीर के कम्पन ने उसे और आगे बढ़ने के लिए उत्साहित किया.

इस बार उसने अपनी जीभ को महक की गांड के ऊपर घुमाया और फिर अंदर डाल दिया. महक की प्रतिक्रिया से सुनीति समझ गई कि आशीष क्या कर रहा है. उसने आशीष की ओर देखा.

“ कैसा स्वाद है बहू का?”

“मीठा तो नहीं है, पर बहुत भिन्न है. तुम्हें लेना है?”

“अभी नहीं. आपके रस से मिले स्वाद को चखूँगी। वैसे महक चाहे तो मेरी गांड का स्वाद चख सकती है.”

महक समझ गई कि उससे क्या अपेक्षित है, पर उसने अभी अपना ध्यान सासू माँ की चूत पर ही रखा. सुनीति ने उसके सिर पर प्रेम से हाथ घुमाया, पर कुछ बोली नहीं. आशीष अब महक की गांड को अच्छे से चाट चुका था. उसने ट्यूब को लिया और महक की गांड में अच्छे से डाला और अपनी उँगलियों से उसे अंदर तक मिला दिया. इसके बाद अपने लंड पर उसने पर्याप्त जैल लगाया. अब वो अपनी भावी बहू की गांड मारने के लिए आतुर था. अंगूठे से उसे खोलकर उसने तंगी का अनुमान लगाया. और अपने लंड को महक की गांड पर रखा. अभी आशीष ने लंड गांड के छेद पर लगाया ही था कि सुनीति ने उसे रोक दिया.

“सुनिए, ऐसा करते हैं कि मैं उलटी हो जाती हूँ, और मैं महक की चूत का ध्यान रखती हूँ और आप गांड पर केंद्रित रहिये.”

“ये भी सही है.” आशीष ने कहा, हालाँकि इस समय उसे रोकने के कारण उसे कुछ क्रोध भी आया.

कुछ ही पल में नई स्थिति में भावी सास बहू एक दूसरे में डूब गयीं. आशीष ने फिर कुछ जैल अपने लंड पर लगाया और महक की गांड को अंगूठे से खोला और फिर अपने लंड को उसकी गांड पर रखा. किसी प्रकार का नया व्यवधान न पड़ जाये, इसी सोच के साथ उसने शीघ्रतिशीघ्र अपने लंड का सुपाड़ा अंदर धकेल दिया. उफ्फ, क्या गांड थी और उससे बहती हुई ऊष्मा से उसके लंड को मानो एक भट्टी में प्रवेश करने का अनुभव हुआ. तंग, सुडौल, मखमली और गर्म, महक की गांड के बारे में उसके यही विचार मन में कौंधे.

महक के मुंह से एक हल्की सी कराह निकली, परन्तु उसने अपनी सास की चूत से मुंह को हटाया नहीं. बल्कि लंड के अंदर जाते ही उसकी जीभ ने सुनीति की चूत में और भीतर तक प्रवेश कर लिया. सुनीति ने उसके सिर पर हाथ फेरा और आशीष को संकेत किया कि वो अब किले को जीत ले. आशीष की आँखें चमक उठीं और उसने इस बार लंड पर और अधिक दबाव डाला और इस बार उसका लंड महक की गांड में अंदर घुसता गया जैसे मक्खन पर छुरी चलती है.

कुछ ही पलों में उसके पूरे लंड ने महक की गांड की गहराई को नाप लिया था. अब उसने हल्के धक्कों के साथ महक की गांड मारनी आरम्भ की. उसे अपनी बेटी अग्रिमा की गांड की तंगी और महक की गांड में बहुत समानता लग रही थी. अपनी बेटी की गांड के बारे में सोचते ही उसका लंड और फनफना उठा और उसने गति बढ़ा ही. महक को भी अब आनंद आने लगा. उसके मन की इच्छा जो गांड तेजी से मरवाने की थी वो अब पूरी होती दिख रही थी. महक अपनी जीभ से सुनीति की चूत को अंदर तक चाट रही थी. महक की कुशलता और अपने पति के चेहरे पर आनंद के भावों से सुनीति भाव विभोर हो गई. महक सुनीति की चूत को न केवल प्रेम से चाट और चूस रही थी, बल्कि उसके द्वारा छोड़े जा रहे रस की हर बूँद पर अपना अधिकार जमा रही थी.

आशीष के धक्के अब महक की आशा के अनुरूप हो गए थे. उसे अपनी गांड में एक लम्बे मोटे लंड से जो संवेदना की इच्छा थी वो पूर्णतया पूरी हो रही थी. उसकी अपनी चूत भी इसकी साक्षी थी. और इस रस को पीने में सुनीति पीछे नहीं थी. सुनीति के लिए उस मधुर रस का पान सरल था क्योंकि महक की चूत द्वारा छोड़ी हर बूँद उसके ही मुंह में जा रही थी. अपनी जीभ के महक की चूत में अंदर तक डालकर सुनीति केवल अपने होंठों से ही उसे चूस रही थी. जीभ से होता हुआ महक की चूत का रस उसके मुंह में जा रहा था.

हर बूँद का स्वाद उसे प्राप्त हो रहा था. हालाँकि आशीष के धक्कों की बढ़ती हुई गति से इस स्थिति को बनाये रखने में उसे अत्यधिक परिश्रम करना पड़ रहा था. परन्तु वो अनुभवी थी और उसने अपने हाथ आशीष के हाथों से सटकर महक की गांड पर रखे हुए थे, जिसके कारण कुछ सीमा तक वो अपने परिश्रम में सफल हो रही थी. भावी सास ससुर के साथ इस मिलन में उसे अपार आनंद मिल रहा था. उसे विश्वास था कि परिवार के अन्य जन भी चुदाई में इतने ही पारंगत होंगे. जिन्हें इस प्रकार की शिक्षा मिली हो, वो उपयुक्त प्रेमी सिद्ध होंगे.

“ओह, पापा जी. खोल दीजिये मेरी गांड. प्लीज अपना पानी मेरी गांड में ही छोड़ना. नहीं तो इसकी जलन नहीं मिटेगी.” महक ने विनती करते हुए अपना मुंह सुनीति की चूत से हटाकर बोला.

“चिंता न करो बहूरानी, तुम्हारी गांड को अच्छे से सींच दूँगा। तुम्हारी जलन दूर हो जाएगी. वैसे भी अब मैं झड़ने ही वाला हूँ.”

कुछ और धक्कों के बाद आशीष ने अपने रस से महक की गांड को भर दिया. सुनीति और महक भी झड़ गए पर यथास्थिति में ही एक दूसरे की चूत को चाटते रहे. आशीष ने अपने लंड को बाहर निकाला तो महक की खुली गांड से रस बहता हुआ नीचे सुनीति के मुंह में भी चला गया. पर सुनीति ने कोई आपत्ति नहीं की और जो मिला उसे ग्रहण कर लिया. कोई पाँच सात मिनट के बाद दोनों संतुष्ट हो कर एक दूसरे से हट गयीं. महक उठकर खड़ी हुई तो उसकी गांड से आशीष के बहते रस ने सुनीति के चेहरे और वक्ष पर एक धारा छोड़ दी.

एक ओर बैठकर महक ने अपनी उँगलियाँ से गांड को साफ किया और प्रेम से अपने भावी सास ससुर को देखा. वो भी उसे उसी भावना से देख रहे थे. सुनीति ने अपने पति के रस को जहाँ जहाँ गिरा था अपने अंग पर मल लिया. महक ने उठकर सुनीति और आशीष के होंठ चूमे.

“आपने मुझे जो अपने परिवार में स्वीकार किया है, उसकी मैं ऋणी हूँ, और कभी आपके परिवार की प्रतिष्ठा को कम नहीं होने दूँगी, ये मेरा वचन है.”

“हम भी तुम्हारे जैसी बहू पाकर प्रसन्न हैं. हम सब जीवन के हर सुख दुःख में साथ रहेंगे. अब चलो बाथरूम में सफाई कर लेते हैं और फिर सोते हैं.”

************************

नूतन और मेहुल:

नूतन ने मेहुल को आँखें खोलने के लिए कहा और इस बार टीवी पर अलग दृश्य था. दो महिलाएं खड़ी हुई थीं और उनके सामने दो गद्दे बिछे थे जिस पर दो पुरुष घुटनों के बल बैठे हुए थे. सब नंगे ही थे. महिलाओं की आयु ४५ वर्ष के निकट थी, परन्तु अधिक अंतर नहीं था उन दोनों में. देखने में सुंदर थीं, शारीरिक रूप से भी आकर्षक थीं. पुरुष भी स्वस्थ और बलिष्ठ थे. दोनों के लंड भी किसी अनुपात में छोटे तो नहीं ही थे.

“ये दोनों बहनें हैं और क्लब के दूसरी ओर के नगर में रहते हैं. इन्हें तुम सम्भवतः नहीं पहचानते होंगे. दोनों हमारी क्लब की सदस्या हैं.” नूतन ने बताया.

“कोई फैमिली डिस्काउंट मिला है क्या?” मेहुल ने हँसते हुए पूछा.

“ये तो तुम्हें शोनाली से ही पूछना होगा.” नूतन ने भी हंसकर बोला।

बड़ी बहन दोनों पुरुषों से सम्बोधित थी, “अब तुम दोनों यहीं बैठकर हम दोनों की चुदाई देखोगे. कुछ बोलना नहीं है, चुपचाप देखना कैसे बड़े बड़े लौड़े तुम्हारी पत्नियों के हर छेद की माँ चोदने वाले हैं. आज हम दोनों की भरपूर चुदाई होने वाली है. जैसे तुम दोनों नहीं कर सकते.”

मेहुल को ये बड़ा तिरस्कारपूर्ण लगा. उसने नूतन को देखा, पर उसने कुछ नहीं कहा. इसके बाद कमरे में नूतन का प्रवेश हुआ और उसके पीछे चार रोमियो आ गए. बड़ी बहन ने नूतन से कोई प्रश्न करना ही चाहा था कि नूतन ने उसे ठहरने का संकेत दिया और वो स्त्री चुप हो गई. चारों रोमियो अंदर आये और दोनों को चूमा और फिर अपने कपड़े उतारने लगे. नूतन बाहर चली गई. दोनों स्त्रियां बिस्तर पर बैठ गयीं और दो दो रोमियो उनके सामने जा खड़े हुए. लौडों को तौल कर उन्होंने अपने पतियों पर फिर कुछ कटाक्ष किया और एक एक करके लंड चूसने लगीं.

रोमियो भी उनके पतियों को ताने दे रहे थे. पर दोनों पति चुप ही थे. कुछ ही देर में नूतन फिर से आयी और इस बार वो दो और रोमियो को ले कर आयी थी. बड़ी बहन ने नूतन का आभार माना और लंड चूसने में जुट गई. वो दोनों रोमियो भी नंगे होकर पुरुषों के सामने लंड हिलाते हुए बिस्तर पर पीछे जाकर उन दोनों बहनों के मम्मे दबाने लगे और गर्दन तथा कान चाटने लगे.

इसके बाद चुदाई का महासंग्राम जो आरम्भ हुआ तो मेहुल को उन दोनों महिलाओं की क्षमता पर आश्चर्य हुआ. नूतन वीडियो बीच बीच में आगे कर रही थी पर फिर भी जिन भिन्न भिन्न आसनों में उन दोनों की भीषण चुदाई हुई वो किसी उच्च कोटि के पुरुस्कार के लिए चयनित किया जा सकता था. क्लब के छह रोमियो ने हर सम्भव मिश्रण में उन दोनों की भरपूर चुदाई तो की ही, परन्तु जिस प्रकार से वो सभी उन दोनों पतियों की अवहेलना और अपमान कर रहे थे वो उनके प्रति सहानुभूति उत्पन्न कर रहा था.

वीडियो दो घंटे के निकट था पर नूतन ने उसे पच्चीस मिनट में ही दिखा दिया. जब उन दोनों को चुदाई समाप्त हुई तो रोमियो निकल गए और वो दोनों महिलाएं बिस्तर पर एक दूसरे को चूमती और चाटती रहीं. फिर वे दोनों उठीं और बाथरूम में चली गयीं.

“अब एक रोचक दृश्य भी देखो और सुनो.” नूतन ने मेहुल से कहा.

जब दोनों महिलाएं बाथरूम से आयीं तो वो नंगी ही थीं और सोफे पर बैठ गयीं.

“आज बहुत आनंद आया. आप दोनों को भी आया?” बड़ी बहन ने पूछा.

“हाँ, मस्त चुदाई की है तुम दोनों की.” उसके पति ने उत्तर दिया जिसका उसके साढ़ू ने समर्थन किया.

“अब आप दोनों के आनंद लेने का समय है.” छोटी ने कहा. तभी नूतन ने प्रवेश किया. इस बार वो नंगी ही थी.

“नूतन, तुम्हारा आभार है जो तुमने इतना अच्छा प्रबंध किया. अब हमारे पतियों को भी कुछ सुख की आशा है.”

“अवश्य. मैं तो कब से इसकी प्रतीक्षा कर रही हूँ. पर आज आप बहुत समय तक लगे रहे.”

नूतन ने उन दोनों पतियों को उठाया और बिस्तर पर ले गई. इसके बाद दोनों ने मिलकर नूतन को चोदा और मेहुल ने अनुभव किया कि वो इसमें सक्षम थे और किसी भी प्रकार से उन्नीस नहीं थे. वो क्यों इस प्रकार के अपमान को सह रहे थे ये उसे समझ नहीं आया. पर मनुष्य की विकृतियों की थाह समझना असम्भव है. नूतन की चुदाई करने के बाद दोनों महिलाओं ने नूतन की चूत और गांड में से अपने पतियों के रस को साफ किया. फिर नूतन बाहर चली गई.

दोनों पति भी सोफे पर बैठे और छोटी बहन ने एक अलमारी से शराब निकाली और चारों ने दो दो पेग पिए. इस बीच कुछ बातें और भी हुईं.

छोटी, “आज मेनका आ रही है, तो आप दोनों को आज अपनी बेटी को चोदने का अवसर मिलेगा.”

बड़ा, “ओह, धन्यवाद। सच में वो मस्त चुदवाती है. तो क्या आज रात तुम दोनों?”

बड़ी, “हाँ, अपने बेटों से चुदने का जो आनंद है उसकी कोई तुलना नहीं है.”

इसके बाद नूतन ने वीडियो बंद कर दी. उसकी गांड अब चुदने के लिए लालायित थी. एक अंतिम वीडियो जिसे विशेषकर शोनाली ने दिखने को कहा था वो अपनी गांड की खुजली मिटने के बाद दिखा देगी. नूतन ने जब ये मेहुल को बताया तो उसकी बाँछे खिल गयीं. बहुत देर से तड़प रहा था वो इस गांड को मारने के लिए. उसके लंड ने एक अंगड़ाई ली तो नूतन खिलखिला उठी.

“लगता है ये भी अब आतुर है.”

“होगा नहीं, इतनी देर से आप वीडियो पर वीडियो दिखाए जा रही हो. वो तो मैं ही हूँ जो इस दण्ड को सहन कर रहा हूँ.”

“सॉरी मेहुल, पर ये भी आवश्यक ही था. शोनाली ने क्यों तुम्हें आज ही सब समझाने के लिए कहा था ये मुझे नहीं पता, क्योंकि इसके लिए रोमियो को अलग से बुलाया जाता है.”

मेहुल को समझ आ रहा था कि शोनाली ने ऐसा क्यों किया था. पर वो नूतन को बता नहीं सकता था. शोनाली उसकी थाह नापना चाहती थी.

“अब मुझे भी तुम्हारे लंड को अपनी गांड में लेने के लिए देर नहीं करनी है.”

ये कहते हुए उसने पास की टेबल से एक जैल की ट्यूब निकालकर मेहुल को थमा दी. फिर उसने घोड़ी का आसन ले लिया और अपनी गांड को मटकाते हुए घुमाने लगी. मेहुल उसके पीछे गया और उसकी थिरकती गांड को देखकर सम्मोहित हो गया. इस आयु में भी नूतन की गांड के कसाव बने हुए थे. उसके चिकने नितम्बों पर हाथ फिराते हुए वो अपने लक्ष्य को साधने के लिए उत्सुक था. नूतन उसे छेड़ने के लिए अपनी गांड के छेद को खोल और सिकोड़ रही थी. मेहुल ने नूतन के नितम्ब पकड़े और उसे रोक दिया. उसके मुंह में पानी आ गया. और उसकी जीभ ने नूतन की गांड के भूरे छेद को छेड़ा. नूतन सिसक उठी.

गांड को चाटते हुए मेहुल अपनी उँगलियों से उसे खोलने का प्रयत्न कर रहा था. नूतन मोटे लम्बे लौड़े लेने की अनुभवी थी और उसकी गांड को खुलने में अधिक परिश्रम भी नहीं लगा. खुलते ही मेहुल की जीभ ने उसे अंदर तक सहलाया। दो तीन मिनट तक वो उसकी गांड को इसी प्रकार से प्रेम करता रहा फिर उसने जैल से उसे भरा और अपने लंड पर भी समुचित मात्रा में जैल लगा लिया. नूतन अब मेहुल के बलशाली लंड से अपनी गांड का सत्यानाश होने के लिए तड़प रही थी.

मेहुल ने उसकी गांड के दोनों ओर हाथ रखे और अपने लंड को गांड के छेद पर लगाते हुए दबाव बनाना आरम्भ किया. पक्क की ध्वनि के साथ उसके लंड का टोपा पहली बाधा सरलता से पार कर गया. उसने अपने लंड पर नूतन की गांड को संकुचित होता अनुभव किया. कुछ समय यूँ ही रुककर उसने फिर से दबाव डाला और लंड की यात्रा आगे की ओर चल पड़ी. नूतन ने सोचा था कि मेहुल रुक रुक कर लंड अंदर डालेगा, पर हुआ इसका विपरीत ही. मेहुल बिना रुके समान दबाव के साथ उसकी गांड में पूरा लंड समाने तक आगे बढ़ता रहा. और अंत में रुक गया.

नूतन ने एक गहरी साँस भरी. कालिया के नाग के बाद आज पहली बार उसे अपनी गांड पूर्ण रूप से भरी हुई अनुभव हो रही थे. ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कि एक मिलीमीटर का भी स्थान अछूता न था. ये गांड मारेगा कैसे? उसके मन में प्रश्न उठा. और इसका भी समाधान तुरंत ही हो गया. मेहुल ने अपने लंड को बहुत प्रेम से बाहर खींचा और इस बार जब उसने अंदर डाला तो नूतन की गांड की मानो धज्जियाँ ही उड़ गयीं.

“ओह माँ! उई माँ. मर गई रे!” नूतन के मुंह से निकला.

परन्तु उसकी गांड अब मेहुल के वश में थी. उसके बच निकलने के हर प्रयास को मेहुल के मजबूत हाथों ने निरस्त्र कर दिया. कुछ देर छटपटाने के बाद मेहुल ने फिर उसकी गांड से लंड निकालकर अंदर की ओर धकेला. नूतन को कुछ कष्ट हुआ, पर कुछ ही क्षणों में उसकी गांड इस आगंतुक का मानो स्वागत करने के लिए खुलने लगी. मेहुल को भी ये आभास हो गया और उसने अपने लंड को नूतन की गांड में पिस्टन की भांति चलाना आरम्भ कर दिया.

नूतन की गांड में अब जलन का स्थान एक नई अनुभूति ने ले लिया था. मेहुल गांड मारने का बहुत अनुभवी खिलाडी था. जिन महिलाओं ने उसकी शिक्षा की थी, उन्होंने हर प्रकार के व्यवधान और प्रतिक्रिया के लिए भी उसे शिक्षित किया था. किस गांड को कितनी गति, शक्ति और गहराई से मारा जाना चाहिए, वो इसमें निपुण हो चुका था. नूतन की गांड में लंड के तीन चार बार के भ्रमण से ही उसे पता चल गया था कि नूतन को कैसी चुदाई आनंद देगी.

और नूतन भी अब उसकी इस शिक्षा का आनंद ले रही थी. कुछ रोमियो केवल अपने लंड के बड़े होने के घमंड में ही इतने चूर होते थे कि वे दनादन गांड मारने लगते थे. नूतन ने कभी उनको दुबारा अवसर नहीं दिया था, हालाँकि उन्हें ये अवश्य समझाकर भेजा था कि वे क्या गलत कर रहे थे. मेहुल को इस प्रकार से उसकी गांड को एक वाद्य यंत्र के समान बजाते हुए उसे मेहुल की सामर्थ्य और परिपक्वता पर आश्चर्य हुआ.

मेहुल अब एक सधी हुई गति से नूतन की गांड मार रहा था. वो अपनी गति और गहराई को रह रह कर बदल भी रहा था जिससे नूतन और उसे दोनों को इस मिलन का असीम आनंद मिल रहा था. नूतन ने अपने एक हाथ से अपने भगनाशे को छेड़ा और पल भर में ही झड़ गई. उसके झड़ते ही मेहुल ने अपनी गति बदली और इसके पहले कि नूतन पूरी सम्भलती उसे और गहराई तक चोदने लगा.

नूतन की अब सिसकारियां और आनंद भरी सीत्कारों ने मेहुल को और प्रोत्साहित किया। अचानक मेहुल ने नूतन से कहा कि वो आसन बदलना चाहता है. इस बार नूतन अपनी पीठ के बल लेटी और मेहुल ने फिर से उसकी गांड मारनी आरम्भ कर दी. नूतन के दोनों पैरों को पकड़कर उसने मोड़ दिया जिसके कारण लंड की चोट अब और विकट हो गई. दस मिनट तक नूतन की इस आसन में गांड मारने के बाद नूतन अनगिनत बार झड़ी और उसकी चूत के रस ने मेहुल के लंड के ऊपर अपने पानी छोड़ा था, जो अब मेहुल के लंड के माध्यम से उसकी गांड में भी जा चुका था और राह सरल हो गई थी.

मेहुल ने बताया कि अब वो भी झड़ने वाला है तो नूतन ने कुछ न कहा. मेहुल ने इसका अर्थ ये माना कि वो गांड में ही पानी छोड़ सकता है. कुछ ही देर में अपने पानी से नूतन की गांड को लबालब भर दिया और फिर ठहर कर अपने लंड को नूतन की गांड से निकाला और फिर नूतन के पाँव सीधे किया और उसके साथ जाकर लेट गया.

“कैसा लगा?”

“अद्भुत.” ये कहते हुए नूतन ने उसके सीने में अपना सिर छुपा लिया.

मेहुल उसके बालों को सहलाता रहा और उसे लगा कि नूतन सो गई है. पर कुछ ही देर में नूतन हिली और फिर उठ गई. बाथरूम की ओर जाती हुई नूतन की मटकती गांड को देखकर मेहुल का लंड फिर अकड़ गया. नूतन लौटी तो उसने तुरंत रिमोट उठाया.

“शोनाली ने मुझे कहा है तुम्हें एक वीडियो दिखाने के लिए, और इसे अंत में ही दिखाना था.”

ये कहते हुए वो मेहुल के साथ बैठी और वीडियो खोजने लगी, फिर उसने वीडियो चलाया. मेहुल ये तो समझ गया था कि शोनाली उसे ये वीडियो किसी विशिष्ट अभिप्राय से ही दिखाना चाहती थीं. परन्तु जो उसने देखा तो वो सकते में आ गया. उसने अपने चेहरे पर कोई भाव नहीं लाये पर उसे शोनाली के इस वीडियो के चयन का अभिप्राय समझ आ गया था.

उस वीडियो में तीसरे बंगले की मालकिन शीला थीं, जो इस आयु में भी चुदाई में अग्रणी थीं. उनके साथ पार्थ की माँ सुमति थी. वीडियो में सामान्य सामूहिक चुदाई का खेल चला था. शीला क्लब की सदस्या थीं, पर सुमति नहीं थी. इसी कारण वे दोनों नूतन के घर पर ये खेल खेल रही थीं. उनकी चुदाई में चार रोमियो थे और लगभग एक घंटे इस चुदाई का कार्यक्रम चला था. मेहुल ने अब भली भांति समझ लिया था था कि पार्थ और समर्थ अंकल के घर भी पारिवारिक चुदाई का खेल चलता है. और उसे शोनाली के इस रहस्योद्घाटन का तात्पर्य भी समझ आ गया था.

वीडियो देखने के बाद टीवी बंद कर दिया गया और मेहुल ने नूतन की एक बार और भीषण चुदाई की और फिर दोनों सो गए.

***************************

अगले दिन सुबह:

मेहुल:

मेहुल ग्यारह बजे नूतन के घर से निकला. अपनी कार में अपने पास रखे बैग को देखकर वो मुस्कुराया. उसने नूतन से कुछ सेक्स के खिलौने लिए थे, उधार पर. इसका मूल्य उसे लौटाने पर चुकाना था. आज सुबह भी मेहुल ने नूतन को निर्बाध दो घंटे चोदा था. उसकी चूत और गांड की ऐसी दुगति की थी कि जब वो निकल रहा था तो नूतन बिस्तर पर नंगी निढ़ाल पड़ी थी और उसकी चूत और गांड से मेहुल का रस बह रहा था. उसने एक क्षीण मुस्कान के साथ मेहुल को बाय कहा था.

मेहुल ने अपना फोन उठाया और एक कॉल लगाई.

“मेहुल?”

“हाँ, घर में कौन है?”

“अभी तो सब बाहर हैं, तुम आ रहे हो क्या?” उस ओर से प्रश्न आया.

“हाँ, और आपको मुझे कैसे दरवाजे पर मिलना है, ये जानती हैं न आप?”

“हाँ, हाँ, बिलकुल, बिलकुल.”

“ठीक है, मैं पंद्रह मिनट में आ रहा हूँ. मेरे पास आपके लिए एक आदेश भी है और एक प्रस्ताव भी.” ये कहकर मेहुल ने फोन बंद किया और कार को नए गंतव्य की ओर मोड़ लिया.

**************************

महक-सुनीति:

सुनीति ने महक को प्रातः शीघ्र ही उठा दिया. महक ने स्नान किया और वस्त्र पहनकर सुनीति के साथ बैठक में चली गई. जीवन के साथ में सलोनी भी खड़ी थी. सलोनी के भाव देखकर ही पता चल रहा था कि उसकी रात में अच्छे से चुदाई हुई है. महक ने उनके पाँव छुए तो जीवन ने उसे आशीर्वाद दिया.

जीवन: “मेरी बलवंत से बात हुई है, उसने दो दिन का समय और माँगा है, तो मैं दो दिनों बाद ही जाऊँगा।”

सुनीति का मुंह मुरझा गया. उसे देख जीवन ने उसे अपनी बाँहों में लिया.

“परन्तु मैंने उसे अधिक समय रहने के लिए भी मना लिया है. दो दिन की देरी के दण्ड स्वरूप दो सप्ताह और रुकेंगे. क्यों न यूँ ही उन्हें दण्ड दे दे कर जाने ही न दिया जाये.”

“ओह! पापा. आप सच में महान हो.”

“चलो अब नष्ट इत्यादि करो, फिर तुमसे भी मुझे कुछ बात करनी है.”

************************

मेहुल:

मेहुल ने अपनी कार रोकी और अपने जूते मोज़े उतार कर एक ओर जूते के स्थान पर लगा दिया. फिर उसने तीन बार घंटी बजाई. दो तीन मिनट के बाद घर के अंदर से कुण्डी खुली। मेहुल ने स्वयं द्वार खोला और अंदर चला गया. उसके सामने एक स्त्री घुटनों के बल बैठी थी और अपना सिर झुकाये हुए थी. उसके कपड़े एक ओर पड़े सोफे पर अस्तव्यस्त पड़े थे और वो पूर्ण नग्नावस्था में थी. मेहुल उसके सामने जाकर खड़ा हो गया. महिला ने झुककर मेहुल के पैरों को चाटा। मेहुल आगे बढ़कर एक सोफे पर बैठ गया और अपने पैर टेबल पर रख दिए. वो महिला घुटनों के बल चलकर आयी और इस बार उसने मेहुल के तलवे चाटकर साफ किया. मेहुल मुस्कुराया.

“गुड़ गर्ल. तुम बहुत अच्छी दासी हो. हो न?”

महिला ने सिर हिलाया. हालाँकि वो अब लड़की नहीं थी, पर अपने लिए गर्ल का सम्बोधन सुनकर उसे प्रसन्नता अवश्य हुई थी.

“तो मैं आपके लिए एक प्रस्ताव लाया हूँ. अगर आप उसे स्वीकार करेंगी तो मैं आपको अपनी दासता से मुक्त कर दूँगा।”

उस महिला ने न में सिर हिलाया.

“क्या आपको स्वीकार नहीं है?” मेहुल के स्वर में आश्चर्य था.

“मुझे मुक्ति नहीं चाहिए. ये मेरे लिए एक नया अनुभव है और मैं कुछ दिन और इसका आचरण करना चाहती हूँ.”

मेहुल के अट्ठास में एक कुटिलता थी, जिसे सुनकर वो महिला सहम गई.

“अच्छा है, बहुत अच्छा. जैसे आपकी इच्छा. अपनी गांड दिखाओ.”

महिला मुड़ी और अपनी गांड मेहुल की ओर करते हुए आगे झुक गई. मेहुल को देखकर ही आभास हो गया कि इस गांड में रात में किसी ने गुल्ली डंडा खेला है. उसके मन में एक विचार आया.

“अब से इस गांड में कोई और लंड नहीं जायेगा, जब तक आपकी दासता समाप्त नहीं हो जाती.”

“ये कैसे सम्भव है. प्लीज, ऐसा मत करो.”

“ठीक है. पर जिस दिन मैं आने के लिए कहूँगा उसके एक दिन पहले से कोई लंड नहीं जाना चाहिए. ठीक है?”

“जी. ये सम्भव है.”

मेहुल मुस्कुराया. अपने कपड़े उतारकर उसे एक ओर रखे और उसके तमतमाए लंड को देखकर महिला का मुंह सूख गया.

“आज मेरे पास अधिक समय नहीं है. पर इस गांड को मारे बिना तो जा नहीं पाउँगा.” मेहुल ने महिला के चेहरे पर ख़ुशी की झलक देखी. “पर पहले मेरा प्रस्ताव. अगर स्वीकार नहीं होगा, तो आज के बाद मैं आपके पास कभी नहीं आऊँगा।”

महिला समझ गई कि ये कुछ ऐसा होगा जो उसके लिए कठिन होगा. अन्यथा…

“तो मैं चाहता हूँ कि ........” मेहुल बता रहा था और उस महिला के चेहरे की हवाइयाँ उड़ रही थीं. ऐसा अपमानजनक प्रस्ताव सुनकर वो विचलित हो गई. पर उसकी आँखों के सामने मेहुल अपने लंड को भी सहला रहा था, जिसके बिना उसे अब चुदाई की चरम आनंद को खोने का भय भी था.

“ऐसा आपको मात्र एक बार करना है. इसके बाद कभी भी ऐसी कोई भी परिस्थिति नहीं उपजेगी. तो आप क्या सोचती हैं?”

“मु मु मुझे कुछ समय चाहिए.”

“चलिए आपकी गांड की सिकाई करने तक का समय में आपको देता हूँ. गांड मारने तक आपको अपना निर्णय लेना होगा.” मेहुल ने उस महिला को उठाते हुए सोफे पर बैठाया.

“इतना कठिन नहीं है. और सम्भव है इसमें भी आपको आनंद आये. मेरी दासी बनने के पहले आपने ऐसी कल्पना की थी? नहीं न, तो चिंता छोड़ दीजिये. अब सोफे पर ही झुक जाइये. आज आपकी गांड यहीं मारने का मन है.”

महिला एक नशे जैसी मनस्थिति से सोफे पर आगे की ओर झुक गई. मेहुल ने अपने लंड को उसके मुंह के सामने किया तो अपनी गांड के लेने से पहले चाटकर गीला करने का अवसर मिलने पर महिला को कुछ शांति मिली. उसने लंड को चाटा और अच्छे से गीला कर दिया और कुछ देर चूसा.

“मेरी रात की साथिन की चूत और गांड का स्वाद कैसा लगा? अच्छा लगा न?”

महिला ने कोई उत्तर नहीं दिया और मेहुल के लंड को और अधिक ऊर्जा से चूसने लगी.

“अब इतना ही ठीक है.”

मेहुल उसके पीछे गया और उसकी गांड में अपने मुंह से ढेर सारा थूक उढेल दिया. अंगूठे से उसे अंदर डालकर उसने अपने लंड को छेद पर रखा. लंड का दबाव बनाते हुए टोपे के अंदर प्रविष्ट होते ही महिला ने एक गहरी श्वास भरी.

“आह!”

“आप जानती हो न मुझे कैसे गांड मारना अच्छा लगता है?”

“हाँ, और मुझे भी इस मोटे लंड से गांड मरवाने में बहुत आनंद आता है. इसके लिए मैं बीच चौराहे पर भी नंगी होकर गांड मरवा सकती हूँ.”

मेहुल ने अपने लंड को अब तक एक चौथाई तक उस गांड में डाल लिया था. इस बार उसने लंड को बाहर किया और एक अच्छा धक्का लगाया. इतनी खुली और चुदी हुई गांड में भी उसके लंड ने केवल आधा ही लक्ष्य भेदा. महिला दूभर होकर सोफे पर फ़ैल गई. मेहुल इतनी ही गहराई तक अपने लंड को अंदर बाहर करने लगा. महिला के मुंह से आनंद की सिसकारियाँ निकल रही थीं. मेहुल ने इस क्रम में अचानक से एक और शक्तिशाली धक्का लगाया तो लंड इस बार पूरा गांड में समा गया. महिला की चीख ने कमरे को दहला दिया.

“मर गई, माँ. मर गई. मेरी गांड फट गई. मत कर बेटा इतना अत्याचार. क्यों फाड़ रहा है मेरी गांड?”

महिला की याचना ने मेहुल के मन को और कठोर कर दिया. ये मेहुल का वो व्यक्तित्व था जिसके लिए प्रौढ़ महिलाएं उसकी दीवानी थीं. उसके मन में दया करुणा का कोई स्थान नहीं रहता था जब वो अपने इस रौद्र रूप में उनकी चुदाई करता था.

“नहीं फ़टी है. और फटेगी भी नहीं. इतने लौड़े खाने के बाद भी अगर आपकी गांड फट रही होती तो उस दिन ही फट चुकी होती जिस दिन मैंने पहली बाद मारी थी. अब रोना गाना बंद करो, नहीं तो मैं चला जाऊँगा और लौटूँगा भी नहीं.” मेहुल के कर्कश स्वर ने महिला के रुदन को एकाएक रोक दिया.

“कर ले अपने मन की, पर जाने की बात मत करना. फट जाये तो फट जाये पर तेरे लंड के बिना अब जीवन नहीं जीना है.”

“ये हुई न बात, अब देखो कैसे तुम्हारी गांड की खुजली मिटाता हूँ.”

इसके बाद तो मेहुल ने जिस धुआंधार गति से उसकी गांड में अपने लंड से पेला तो उस महिला को स्वर्ग और नर्क के एक साथ दर्शन प्राप्त हो गए. दस मिनट की इस भीषण चुदाई के बाद अब उस महिला के मुंह से दर्द की कराहों ने आनंद की सीत्कारों निकलने लगीं.

“सच में, तेरा जैसा गांड मारने वाला मुझे आज तक नहीं मिला. तू अपनी माँ की भी गांड मारना ऐसे ही. उसे भी रुलाना. उसकी गांड को अपने बाप के लायक मत छोड़ना. मार दिया तूने मुझे आज, पर अब मैं हर दिन मरने के लिए भी तैयार हूँ. आह, आह, वाह क्या मोटा लौड़ा है तेरा मादरचोद. क्या खाकर पैदा किया था तेरी माँ ने? ऐसी माँ को तो ऐसे लौड़े से चुदने का पूरा अधिकार है.”

महिला जो कह रही थी, उसके कारण मेहुल का आक्रोश बढ़ रहा था. अपनी माँ के लिए ऐसे शब्द सुनकर उसके चेहरे पर क्रूरता की चमक आ गई. उसने अपने लंड के पूरे लम्बाई के साथ महिला की गांड पर हमले करने आरम्भ कर दिए. इसके साथ ही वो महिला के नितम्बों पर थप्पड़ मारने लगा. गांड में चलायमान लम्बा मोटा लंड और गांड पर पड़ते हुए थप्पड़ों के कारण वो महिला अचानक एक भयानक चीख के साथ झड़ी और आगे गिर कर शिथिल हो गई. मेहुल ने अपना आक्रमण नहीं रोका और अगले दस मिनट तक उस मृतप्राय महिला की गांड के परखच्चे उडाता रहा. अंत में उसने अपने पानी को उसकी गांड में ही छोड़ दिया. लंड को धीरे से बाहर निकालकर वो महिला के मुंह के पास गया. उसके बाल पकड़कर उसके चेहरे को ऊपर किया और अपने लंड को आश्चर्य से खुले मुंह में डाल दिया.

“माँ की लौड़ी, मेरी माँ के बारे में अगर कभी और उल्टा सीधा बोली तो तेरी वो हालत करूँगा की तेरी आत्मा काँप जाएगी. समझी रंडी, माँ की लौड़ी?” मेहुल ने जिस स्वर में ये बोला था तो उस महिला को आभास हो गया कि उसने सीमा पर कर ली थी. लंड को चाटने के बाद वो सोफे से उतर कर मेहुल के पैरों में गिर गई.

“मुझे क्षमा कर दे बेटा, मेरे मुंह से जो भी निकला उसे मेरी भूल समझ कर क्षमा कर दे. अब मैं सपने में भी ऐसा नहीं करुँगी.” ये कहते हुए वो मेहुल के पैर चाटने लगी.

मेहुल को अपने पैरों पर उसके आँसुओं का आभास हुआ. उसने महिला को उठाया और सोफे पर बैठाया.

“ठीक है, पर आगे से इस बात का ध्यान रखना. मैं नहीं चाहता कि आपको किसी प्रकार से चोट पहुंचे. आप हमारे बीच कभी मेरी माँ को मत लाना. अब बताइये कि मेरा प्रस्ताव स्वीकार है या नहीं?”

महिला ने स्वीकृति दी तो मेहुल ने उसे कपड़े पहनने के लिए कहा और स्वयं भी कपड़े पहन लिए.

“मैं अभी आया.” ये कहकर मेहुल कार से वो बैग ले आया.

“इन्हें देखिये और मैंने आपको जो कहा है, ये सब उनके लिए ही है.” मेहुल ने उसे हर वस्तु का अभिप्राय समझाया और उसे कैसे उपयोग में लाना है ये भी बताया.

“मेहुल. मैं तुम्हारे लिए इस तिरिस्कार को भी झेलने के लिए मान रही हूँ. पर ये वचन दो कि इसके बाद ये दासी की भूमिका केवल हम दोनों के एकांत में ही होगी. प्लीज.”

“मैंने तो आपको मुक्त करने का भी प्रस्ताव किया था. आपने ही उसे नहीं माना। पर मैं वचन का धनी हूँ. ये आपको मात्र एक बार ही करना है.”

महिला ने मेहुल का माथा चूमा और उस बैग को बंद कर लिया. मेहुल निकल गया और उस महिला ने वो बैग अपनी अलमारी में छुपाकर रख दिया. गांड सहलाते हुए वो बाथरूम में घुस गई.

************************

स्मिता का घर:

एक बजे तक सारे पंछी अपने घोसले में लौट चुके थे. भोजन करने के बाद स्मिता ने मेहुल से बात करनी चाही. स्मिता और श्रेया एक सोफे पर बैठे थे और मेहुल उनके सामने था.

“बेटा, हमें ये निर्णय लेना है कि तुम्हे महक और स्नेहा के साथ पहले भेजा जाये, या हम दोनों का जो अधूरा कार्य है उसे सम्पन्न किया जाये.”

माँ और भाभी की गांड मारने के बारे में सोचते ही मेहुल का लंड अंगड़ाई लेने लगा. पर उसने कुछ बोला नहीं.

“मैं और श्रेया चाहते है कि अधूरा कार्य पूरा किया जाये और हम दोनों को उसे एक साथ करने में कोई आपत्ति नहीं है, बल्कि हमें ये अधिक रुचिकर लग रहा है.”

श्रेया बोली, “भाई, इसके बाद आप महक और स्नेहा के साथ भी कार्य अधूरा छोड़कर उसे दोनों के साथ एक बार में पूरा कर सकते हो. दोनों अभी इतना परिपक्व नहीं हैं कि आपके लंड को सरलता से झेल सकें.”

मेहुल, “जैसा आप उचित समझें. परन्तु ये होगा कैसे?”

स्मिता ने उसकी ओर एक पर्ची बढ़ाई.

SC: कल

M: दो दिन बाद

S: उसके दो दिन बाद

MS: उसके दो या तीन दिन बाद.

मेहुल ने इसका अर्थ समझ लिया.

“ठीक है माँ, भाभी. पर अगर एक दो दिन इधर उधर हो जाएँ तो आप बुरा मत मानना। मेरे अपने भी कुछ कार्य हैं, जिनकी मैं उपेक्षा नहीं कर सकता. पर मैं आपकी इस समय सारणी का पूरा मान रखने का प्रयास करूँगा। कल कब?”

“दोपहर तीन के बाद ही. तुम्हें कुछ काम है क्या?”

“नहीं कल नहीं है. और मैं प्रयास करूँगा कि जो दिन अपने निर्धारित किये हैं उन दिनों भी मैं उपलब्ध रहूँ। क्या हम तीन बजे ही हर दिन के लिए निर्धारित कर सकते हैं?”

“मेरे विचार से ये उचित है.” श्रेया के चेहरे के भाव से मेहुल उनकी सुंदरता की प्रशंसा किये बिना न रह सका.

“भाभी, यू आर टू ब्यूटीफुल.”

श्रेया शर्मा गई.

“धत्त, कोई अपनी भाभी को ऐसे बोलता है क्या?”

“उनकी भाभी आपके जितनी सुंदर भी नहीं होंगी.”

स्मिता ने बीच में टोका, “ठीक है. तो कल मिलेंगे. अभी नींद आ रही है.”

मेहुल, “मॉम, मुझे आपसे कुछ कहना है, अकेले में.”

श्रेया उठकर चली गई और मेहुल स्मिता के पास जाकर बैठा. उसने जो कल रात अन्य बंगले के परिवारों के बारे में जाना तो वो स्मिता को बताया. पर ये वचन भी लिया कि वो आगे किसी को नहीं कहेगी. उसके पापा को भी नहीं. स्मिता मान गई. इसके बाद मेहुल ने कल के लिए कुछ विशेष निवेदन किया किसे सुनकर स्मिता अचरज में तो पड़ी पर सहर्ष मान भी गई. मेहुल और स्मिता इसके बाद अपने कमरों में चले गए.

**********************

स्मिता का घर:

मेहुल अगले दिन तक घर में ही रहा. उसकी पढ़ाई के कुछ पीछे रह जाने के कारण उसने इस पूरे समय केवल उस पर ही ध्यान दिया. उसे इस रूप में देखकर कोई सोच भी नहीं सकता था कि ये लड़का किसी को भी निर्ममता से भी चोद सकता है. उसकी प्रिंसिपल मैरी का निमत्रण आया था परन्तु मेहुल ने उनसे क्षमा माँगते हुए आने में असमर्थता बताई थी. मैरी ने भी अपनी चुदाई से अधिक महत्व मेहुल की पढ़ाई को दिया, वो एक शिक्षिका जो थीं.

महक अपने भाई के साथ मिलन के लिए अब आतुर हो गई थी, पर उसकी माँ और भाभी ने उसे दो दिन रुकने के लिए कहा था. महक ने राणा परिवार के सप्ताहांत के निमंत्रण के बारे में बताया तो स्मिता को कुछ निराशा हुई क्योंकि इसी समय उनके अपने परिवार में भी सामूहिक चुदाई का खेल होता था. परन्तु महक के ससुराल वालों को प्रसन्न रखना भी उतना ही आवश्यक था. उसने महक से कहा कि वो सुनीति से कहे कि वो बारी बारी से एक सप्ताह छोड़कर जाया करेगी. उसे विश्वास था कि सुनीति मान जाएगी. श्रेया ने स्मिता से समुदाय के प्रबंधन के चुनाव से हटने के लिए निवेदन किया तो स्मिता ने मान लिया और अपना समर्थन सुजाता को देने की घोषणा समुदाय में कर दी. महक के विवाह में व्यस्त होने का कारण बताने से उसके इस निर्णय पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ.

***********************

अगले दिन:

सुबह मेहुल ने नहा धोकर नाश्ता किया और फिर से अपनी पढ़ाई पूरी करने में जुट गया. फिर एक बजे खाना खाया और अपने कमरे में लौट गया. ये घर में उसका सामान्य व्यवहार था इसीलिए किसी ने उसे कुछ नहीं कहा. खाने के बाद उसने अपने कमरे में जाकर कुछ लोगों से बात की और फिर एक घंटे के लिए सो गया. ढाई बजे उठकर स्नान किया और फिर आज के कार्यक्रम के लिए उचित कपड़े पहने. अपना फोन लेकर बैठक में गया जहाँ स्मिता बैठी थी.

“श्रेया को मैंने कमरे में भेज दिया है. मैं भी आती हूँ. तुम कितनी देर में आने वाले हो?” स्मिता ने पूछा.

मेहुल ने घड़ी देखी, “बस आपके पीछे पीछे आता हूँ.”

स्मिता चली गई और मेहुल ने रसोई में जाकर पानी पिया. उसके फोन पर एक संदेश आया. उसने देखा और फिर घर के मुख्य द्वार को हल्का खोलकर स्मिता के कमरे में चला गया. मेहुल कमरे में गया तो देखा कि स्मिता और श्रेया अब तक यूँ ही बैठे थे.

“क्या हुआ?” उसने पूछा.

“तुम्हारी ही राह देख रहे थे.”

“ओह, ठीक है.” ये कहते हुए उसने आगे बढ़कर अपनी माँ को बाँहों में भर लिया. फिर दूसरे हाथ को फैलाकर श्रेया को भी बाँहों में ले लिया.

“मेरी प्यारी मॉम और भाभी. मैं बता नहीं सकता कि मैं आज कितना प्रसन्न हूँ. मैंने जीवन में कभी सोचा न था कि ऐसा दिन भी आएगा, जब हम इस प्रकार से एक दूसरे के साथ होंगे.”

“पर हमें पता था. तुम्हें न बताना हमारी दुविधा थी. वैसे भी बीस वर्ष के होने के बाद तुम्हें सब बताना ही था. पर तुम्हें स्वयं ही सब पता चल ही गया.”

मेहुल ने स्मिता के गाउन को उसके कंधे से खिसकाया तो वो पल भर में ही नीचे गिर गया और स्मिता का लुभावना शरीर अपने पूरे दर्प में चमक उठा.

“मेहुल.”

मेहुल ने सुना तो उसने श्रेया को देखा और उसके भी गाउन को उसी प्रकार से उतार दिया. अब उसके सामने उसकी माँ और भाभी पूर्णतया नग्न खड़ी हुई थीं. न उनके शरीर पर एक भी धागा ही था न ही आँखों में रत्ती भर लज्जा. एक प्यास थी, जिसे मिटाने का दायित्व मेहुल पर था. मेहुल की टी-शर्ट को श्रेया ने उतारा और स्मिता उसके पजामे के नाड़े को खींचकर पजामे को निकाल फेंकने को ही थी, कि उसे लगा कि वो कुछ भारी था.

“मेरा मोबाइल है उसमे.” मेहुल ने बताया और फिर पजामे से मोबाइल निकालकर एक ओर रख दिया.

“भाभी, मैंने आज के लिए एक विशेष प्रबंध किया है. परन्तु आपको मेरे ऊपर विश्वास करना होगा कि ये केवल आज के लिए है. आप किसी भी प्रकार से मुझपर गुस्सा नहीं होने वाली हैं.”

श्रेया को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी, हालाँकि उसने सोचा कि ये मेहुल ने केवल उससे ही क्यों पूछा.

“मॉम, आपको भी.” मेहुल ने मानो भाभी के मन को पढ़ लिया था.

“अवश्य.” माँ और भाभी ने उसे विश्वास दिलाया. इतने में मेहुल का मोबाइल थरथराया.

“ठीक है. तो मुझे पाँच मिनट का समय दीजिये. मैं बस यूँ गया और यूँ आया.” ये कहकर मेहुल नंगा ही कमरे से निकल गया.

जब मेहुल कमरे में लौटा तो उसके हाथों में एक कुत्ते को घुमाने वाला पट्टा था. और जब वो और भीतर पहुँचा तो स्मिता और श्रेया की ऑंखें आश्चर्य से फ़टी रह गयीं. पट्टे के दूसरे छोर पर एक नंगी महिला थी. पट्टा उसके गले में बंधा था और वो घुटनों के बल चलकर मेहुल के पीछे आ रही थी. यही नहीं, उसकी गांड में से पूँछ जैसी वस्तु निकली हुई दिख रही थी. कानों के ऊपर भी कुत्ते के जैसे नकली कान लगे हुए थे. एक प्रकार से वो महिला मानव रूप में भी एक कुतिया ही लग रही थी.

और वो कोई और नहीं, बल्कि श्रेया की माँ सुजाता थी!

स्मिता को मेहुल ने संकेत अवश्य दिया था, पर ये दृश्य देखकर उसका मन विचलित हो गया. और श्रेया! उसे तो जैसे काटो तो खून नहीं. सुजाता उनके आगे उसी रूप में रही. मेहुल ने पट्टे को एक हल्का सा झटका दिया तो सुजाता ने आगे बढ़कर स्मिता के पैरों को चाटना आरम्भ कर दिया. दोनों पैर चाटकर उन मेहुल को देखा. मेहुल ने उसे संकेत दिया और वो लौटकर अपने स्थान पर चली गई.

“मुझे आंटीजी के इस विकृति के प्रति झुकाव का जब आभास हुआ तो मैंने सोचा कि क्यों न उन्हें भी आज के इस खेल में सम्मिलित कर लिया जाये. वो मेरी हर आज्ञा पालन करने के लिए आतुर रहती हैं और मैं उन्हें प्यार से…” मेहुल ने सुजाता की ओर देखा, “… क्या बुलाया करता हूँ मैं आपको?”

“सूजी, सूजी डार्लिंग.” सुजाता ने उत्तर दिया.

श्रेया ये देखकर अचम्भित थी कि उसकी माँ किसी प्रकार से भी किसी प्रभाव में नहीं दिख रही थी और न उन्हें उनके सामने इस प्रकार से उपस्थित होने में कोई शर्म आ रही थी.

“सूजी डार्लिंग, बहुत प्यारा नाम रखा है इसका तुमने बेटा। तो क्या ये मेरी भी आज्ञा मानेगी?” स्मिता ने आनंद लेते हुए कहा.

“क्यों सूजी डार्लिंग, क्या कहती हो?” मेहुल ने पट्टे को खींचकर पूछा.

“अगर मेरे स्वामी कहेंगे तो अवश्य मानूँगी.”

“सही उत्तर, सूजी डार्लिंग। आज के लिए तुम हम तीनों की आज्ञा मानोगी. अपनी बेटी को भी अपनी स्वामिन समझकर ही बात करोगी. समझीं?”

“जी.”

“और इसके लिए तुम्हें उपहार स्वरूप में क्या मिलेगा, ये भी बता ही दो.”

सुजाता ने श्रेया और स्मिता की ओर देखा और बिना हिचक उत्तर दिया, “आप मेरी गांड मारेंगे और मुझे मेरी इन दोनों स्वामिनों को हर प्रकार से स्वच्छ करने का अवसर देंगे.”

“हम्म्म. मॉम, भाभी. आपकी कोई इच्छा है?”

“अभी नहीं. पर अगर कुछ मन में आया तो अवश्य बोलूँगी। वैसे मेरे पैरों के तलवे भी गंदे हो गए हैं. तो सूजी डार्लिंग, उन्हें चाटकर साफ कर दो. और मेरी प्यारी बहू के भी.”

श्रेया ने एक बार कुछ कहना चाहा, पर मेहुल के सिर के संकेत के कारण रुक गई.

“सूजी डार्लिंग, तुम मॉम की इच्छा पूरी करो, मुझे भाभी से कुछ बात करनी है.”

ये कहकर मेहुल श्रेया को एक ओर ले गया.

“भाभी, अभी आप बिना प्रश्न इस खेल में सम्मिलित हो जाइये. आंटीजी को भी ये आनंद देता है. शेष मैं आपको बाद में समझा दूँगा। उन्हें आप जितना तिरस्कृत करेंगी, उन्हें उतनी ही उत्तेजना होती है. मैं बाद में समझाता हूँ. पर आप.....”

“ठीक है. मुझे तुम पर विश्वास है. अब चलो, देखें सूजी डार्लिंग क्या कर रही है. मेहुल, मॉम ने हम सबको सदा अपने अंगूठे के नीचे रखा और कई बार हम सबको तिरस्कृत और प्रताड़ित किया है. न जाने क्यों मुझे आज अपने सामान्य स्वभाव के विपरीत उन्हें उनके ही ढंग से उत्तर देने की इच्छा है. ये मेरा स्वाभाविक स्वरूप नहीं है, तो अगर मैं कुछ अधिक आगे बढ़ जाऊँ तो मुझे टोक देना.”

मेहुल को श्रेया के उत्तर से शांति मिली और दोनों पास आकर खड़े हो गए. सुजाता अब तक स्मिता के पैरों के तलवे चाट कर चमका चुकी थी और उसी प्रकार बैठी हुई अगली आज्ञा की प्रतीक्षा कर रही थी.

स्मिता, “ओके, सूजी डार्लिंग. देखो मेरी बहू भी आ ही गई है. तुम तो इसे जानती ही हो? तुम्हारी बेटी जो ठहरी. अब जाओ, उसके भी पैरों को चाटकर साफ करो. उसके बाद मैं तुम्हें आगे क्या करना है बताती हूँ.”

अब खेल की कमान स्मिता ने संभाल ली थी. सुजाता से इतने वर्षों का वैमनस्व का आज वो स्वयं प्रतिशोध लेने वाली थी. उन्होंने मेहुल को देखा कि अगर उसे आपत्ति हो. मेहुल ने अपने उठे अंगूठे से उसकी शंका को दूर कर दिया. आज न केवल मेहुल अपनी माँ और भाभी की गांड मारने वाला था, बल्कि उन्हें अपने ऊपर किए गए अपराधों का भी मोल चुकाने का अवसर दे रहा था. श्रेया अपनी माँ के गालों को अपने मुक्त तलवे से सहला रही थी. सुजाता पूरी तन्मयता से श्रेया के पैरों को चाट रही थी. स्मिता उसके पीछे आई और उसकी गांड में लगे डिल्डो को जोर से हिला दिया और गांड पर अपने पैरों से एक हल्की चपत लगाई.

“जी मम्मीजी, मारो इसके गांड पर लात और थप्पड़. बहुत अकड़ू है ये.” सुजाता ने आश्चर्य से सिर उठाकर श्रेया को देखा तो श्रेया ने अपने अंगूठे को उसके मुंह में डाला और बोली, “किसने कहा रुकने को? चल अपना काम कर नहीं तो मेहुल को कह दूँगी और तुझे उसके लंड से गांड मरवाने की इच्छा को भूलना होगा.”

सुजाता का शरीर सिहर उठा और ऐसा प्रतीत हुआ मानो वो झड़ गई हो. पर वो श्रेया के पैरों को चाटने में लग गई. जब दोनों पैरों को चाट लिया तो स्मिता ने मेहुल से पट्टे को ले लिया.

“सूजी डार्लिंग, आज तुम हम तीनों की कुतिया हो. मेरी गांड मारने के लिए मेरा बेटा बहुत दिनों से उतावला है. पर इसके लंड को ऐसे झेलना मेरे वश का नहीं है. तो आकर मेरी गांड को चाटो और उसे उसके लंड के लिए सुगम बना दो.” स्मिता ने क्रूर स्वर में बोला।

“मॉम, भाभी. इसके पहले आप ये सम्भालो.” मेहुल ने दो रिमोट जैसे उपकरण उन्हें दिए. “सूजी की गांड में जो डिल्डो है, उसमें बैटरी है, इस बटन से उसे चलाया जाता है, इन दो से उसकी गति कम या अधिक की जाती है और इस बटन से उसे रोका जाता है.” ये रिमोट स्मिता ने ले लिए.

दूसरे रिमोट को श्रेया को देकर कहा, “भाभी, आंटीजी की चूत में एक अंडे के आकार का वाइब्रेटर है. उसे भी इसी प्रकार से चलाया जाता है. अब आप दोनों के हाथ में ये रिमोट हैं तो जैसे चाहें उपयोग करें.”

सास बहू ने दोनों को चलाया तो सुजाता की चूत और गांड में हलचल होने लगी और वो कंपकँपा गई. धीमा और तेज करने का अभ्यास करने के बाद दोनों को न्यूनतम गति पर लेकर छोड़ दिया. अब सुजाता की चूत और गांड में हल्के स्पंदन हो रहे थे. पर आज के लिए उसे अपना पद पता था. मेहुल को लगा कि उसने इन दोनों को प्रभार देकर गलती कर दी. वे दोनों इस समय ही इतनी कड़ाई दिखा रही थीं तो आगे न जाने क्या करेंगी. उसने अपने दोनों हाथों को नीचे की ओर करते हुए उन्हें संकेत किया कि वे संयम में रहें. श्रेया ने अपने पैर हटा लिए.

“ओके, सूजी डार्लिंग. जाओ अब मेरी सासू माँ की गांड को भली भांति मेरे लाडले देवर के लंड के लिए चिकना कर दो. पर इसके लिए केवल अपने मुंह और जीभ का प्रयोग करना. जैल इत्यादि को बाद में लगाना. तब तक मैं देवर राजा के लंड को चूसती हूँ.”

मेहुल को पास बुलाकर उसने लंड को हाथ में लिया. “देखो सूजी डार्लिंग. कैसा मोटा तगड़ा लौड़ा है मेरे देवर का. गांड में पूरी खलबली मचा देगा. तुम तो ले चुकी हो इसे, कैसे लगा था?”

“बहुत ही अच्छा. ऐसे गांड मारी थी मेरी कि मैं इसकी दासी बन गई.” सुजाता को मानो उस याद ने घेर लिया.

“पूछा किसी ने कैसे मारी थी? और हम भी देख रहे हैं कि तुम इसकी दासी हो. अपना काम सम्भालो. मम्मीजी चलिए इसे अपनी गांड चाटने दीजिये.” श्रेया ने कहा.

“मुझे लगता है मैं सोफे पर जाती हूँ, वहाँ ठीक रहेगा. इसे बिस्तर पर नहीं चढ़ने देना है.” स्मिता ने कहा और सोफे पर जाकर बैठी और अपनी दोनों टाँगों को ऊपर कर लिया. इस प्रकार से उसकी चूत और गांड दोनों अब नीचे बैठकर चाटी जा सकती थीं.

“आओ, सूजी डार्लिंग. मेरे बेटे के लिए मेरी गांड को अच्छे से साफ और गीला कर दो. ध्यान रहे अंदर तक सफाई करनी है. मेरे प्यारे बेटे के लंड पर कोई गंदगी नहीं लगनी चाहिए.”

सुजाता न जाने क्यों इस सबमें और भी उत्तेजित हो रही थी. वो स्मिता की गांड के नीचे जाकर रुकी और अपनी जीभ से चाटने लगी.

“आओ भैया, अब तुम्हारे लंड को भी मम्मीजी की गांड के लिए सही कर दूँ.” श्रेया ने कहा और फिर रिमोट से सुजाता कि चूत के अंदर के अंडे की गति बढ़ा दी.

श्रेया ने मेहुल के लंड को मुंह में लिया पर अपनी माँ की गतिविधियों पर भी ध्यान रखा. वो अंडे की गति से खेल रही थी. कभी बढ़ा देती तो कभी कम कर देती. सुजाता भी उसी गति से स्मिता की गांड को चाट रही थी. स्मिता ने अपने नितम्ब फैलाये और उसकी गांड का छेद खुल गया.

“अंदर भी चाटो सूजी डार्लिंग.” स्मिता ने कहा.

सुजाता ने स्मिता की गांड में जीभ डाली ही थी कि स्मिता ने गांड को बंद कर लिया. सुजाता की जीभ उसमे फँसी रह गई. पर सुजाता भी कोई कच्ची खिलाडी तो थी नहीं, उसने स्मिता के नितम्ब फैलाये और अपनी जीभ को बाहर निकाल ही लिया. पर इस बार वो अपनी जीभ को अंडे की गति के अनुरूप स्मिता की गांड में अंदर और बाहर करने लगी. जीभ में थूक को एकत्रित करती और फिर स्मिता की गांड में डालकर अपनी जीभ से अंदर तक धकेल देती.

स्मिता ने श्रेया को देखा तो उसका एक हाथ रिमोट पर था. स्मिता ने भी अब रिमोट से खेलना आरम्भ किया और सुजाता की गांड का डिल्डो हलचल में आ गया. अब सुजाता के लिए समस्या हो गई. दोनों अलग गति से उसकी चूत और गांड में हिल रहे थे. और उसका मस्तिष्क इसे समझने में असमर्थ था. उसकी चूत पानी छोड़ने लग रही थी. परंतु उसे आज अपने कर्मों की प्रायश्चित करना था. वो स्मिता की गांड को अंदर से चाटने में जुटी रही.

“हम्म्म, श्रेया. इधर आओ और देखो सूजी डार्लिंग ने ठीक से काम किया है या नहीं?” स्मिता ने श्रेया को पुकारा. श्रेया ने मेहुल के तमतमाए लंड को मुंह से निकाला और स्मिता की गांड का निरीक्षण किया.

“सूजी डार्लिंग ने अच्छा काम किया है. फिर वो एक ओर पड़ी जैल की ट्यूब ले आई और सुजाता को देकर कहा, “सूजी डार्लिंग, अब इनकी गांड में अच्छे से लगा दो और हट कर अपने स्थान पर चली जाओ.”

सुजाता ने आज्ञा का पालन किया और फिर घुटनों के बल कुतिया के समान खड़ी हो गई. श्रेया ने अब मेहुल को पुकारा और उसके लंड पर भी जैल लगाया.

“जाओ, मेरे लाडले देवर जी. कर दो अपनी मम्मी की गांड का भी बेड़ा पर. पर इन पर दया करना, ये सूजी डार्लिंग जैसी रण्डी नहीं हैं. माँ हैं आपकी.”

“बिलकुल भाभी. और फिर आपकी गांड भी उतने ही प्रेम से मारूंगा।”

श्रेया ने मेहुल के लंड को अपनी सास की गांड के मुहाने रखा. और फिर आगे जाकर स्मिता के होंठों को चूमा.

“मम्मी जी, अब देखिये अपने छोटे बेटे के बड़े लंड का प्रताप.”

“मॉम, आर यू रेडी?” मेहुल ने पूछा.

“हाँ, मेरे लाल. कब से तरस रही हूँ इसके लिए. अब देर न कर.”

मेहुल ने लंड पर दबाव बनाया और सुजाता के परिश्रम और जैल के कारण चिकनी हुई गांड में लंड पक्क से घुस गया. स्मिता की हल्की से आह निकली. मेहुल अपनी माँ की गांड में लंड का टोपा डालने के बाद रुक गया. स्मिता की गांड का स्पंदन और गर्मी ने उसे एक अपूर्व सुख का आभास कराया. कुछ देर तक यूँ ही रुकने के बाद उसने फिर दबाव डाला और लंड कुछ और अंदर गया. मेहुल फिर रुका और स्मिता भी अपनी साँसों को संभालने लगी.

मेहुल ने इसी प्रकार अपने लंड को दो तीन इंच अंदर डालकर रुकते हुए अंतिम लक्ष्य को पार किया. और इसमें उसने लगभग सात आठ मिनट लगा दिए. लंड जब पूरा अंदर समा गया तो मेहुल रुका रहा. उसकी तीव्र इच्छा थी कि पूरे लंड को बाहर निकालकर पेल दे, पर अपनी माँ के साथ वो ऐसा नहीं कर था. तो उसने तीन चार इंच निकाला और फिर धकेला. इस प्रकार से स्मिता की गांड को कुछ देर तक मारने के बाद उसने कुछ लम्बे धक्के लगाने आरम्भ किये, पर पूरा लंड अभी तक उपयोग नहीं किया.

स्मिता आनंद से दूभर हो गई थी.

“कैसा लग रहा है मम्मीजी?” श्रेया ने पूछा.

“पूरा भरा हुआ, पर बहुत अच्छा भी. जा तू अब अपनी गांड भी चटवा कर आ जा फिर दोनों को एक साथ चोद पाये.” स्मिता ने सुझाव दिया.

सुजाता ने जब ये सुना तो उसकी आँखें चमक उठीं. अपनी बेटी को इस लंड के लिए उपयुक्त बनाने के विचार से उसकी चूत फिर से बहने लगी. श्रेया ने उसकी ओर देखा.

“सूजी डार्लिंग, सुना मम्मीजी ने क्या कहा? आ जाओ, अब मेरी गांड को भी मेरे प्यारे देवर के लिए तैयार करो.” ये कहते हुए श्रेया उसी प्रकार से सोफे पर जा बैठी और सुजाता उसके सामने जाकर उसकी गांड को चाटने लगी.

जिस प्रकार से सुजाता ने स्मिता की गांड के साथ किया था उसने वही ढंग श्रेया की गांड अपनाया. पर एक समस्या ये रही कि श्रेया की गांड स्मिता की गांड से कहीं अधिक तंग और संकरी थी. परन्तु सुजाता ने और परिश्रम से श्रेया की गांड को समुचित रूप तक खोल दिया. इसके बाद उसने जाकर ट्यूब ली और श्रेया की गांड में डालकर उसे अच्छे से अंदर तक चिपड़ दिया. सुजाता ने फिर श्रेया को देखा और संकेत दिया कि अब वो स्मिता के पास चली जाये. अब मेहुल स्मिता की गांड पूरे लंड से मार रहा था और स्मिता कि सिसकारियों ने कमरे में एक संगीत बिखेरा हुआ था. श्रेया स्मिता के साथ जाकर घोड़ी के आसन में आ गई.

“सूजी डार्लिंग,” मेहुल ने सुजाता को पुकारा.

“जी”

“इधर आओ, और जब मैं अपना लंड एक गांड से निकालूँगा तब तुम इसे साफ करके दूसरी गांड में डालना. और खाली हुई गांड को चाटकर उसे गीला बनाये रखना. इसके लिए मैं तुम्हें बिस्तर पर आने की अनुमति दे रहा हूँ.”

सुजाता मेहुल के पास आकर उकड़ूँ बैठ गई.

स्मिता ने श्रेया को देखा और बोली, “अब देख तू भी मेरे छोटे बेटे के मोटे लौड़े का प्रताप.”

श्रेया हंस पड़ी और उसने अपनी गांड मटकाई और मेहुल से बोली, “आ जाओ मेरे देवर जी. अपनी भाभी की गांड भी कृतार्थ कर दो.”

मेहुल ने अपने लंड को स्मिता की गांड से धीरे से बाहर निकाला और सुजाता की ओर किया. सुजाता ने लपक कर उसे चाटा और फिर एक मिनट के लिए चूसा और अपनी बेटी, स्मिता की बहू और मेहुल की भाभी की गांड के मुहाने पर रख दिया. उसने दीन दृष्टि से मेहुल को देखा, मानो कह रह थी कि मेरी बेटी पर दया करना. मेहुल ने मुस्कुराकर सिर हिलाकर उन्हें भरोसा दिलाया. फिर अपनी माँ की गांड की ओर संकेत किया मानो कहा हो कि आपका ध्यान उधर रखा चाहिए.

“भाभी, आर यू रेडी?” मेहुल ने पूछा.

सुजाता देखना चाहती थी अपनी बेटी की गांड में मेहुल के लंड का प्रवेश और वो स्मिता की गांड को ऊपर से चाटते हुए मेहुल के लंड को देखती रही. मेहुल ने स्मिता के समान ही श्रेया की भी गांड में अपने लंड को डाला. लगभग एक ही ढंग वो आज उन दोनों की गांड मारने वाला था. आधे लंड से दस मिनट तक श्रेया की गांड मारने के बाद उसने लंड निकाला और सुजाता ने फिर से स्मिता की गांड से अपना मुंह हटाते हुए उसके लंड को चाटा।

“चूसना नहीं है.” मेहुल ने कहा.

सुजाता ने मन मारकर लंड साफ करके उसे स्मिता की गांड पर लगा दिया और स्वयं श्रेया की ओर मुड़ गई. अपनी बेटी की खुली गांड देखकर उसे कुछ दया आई. उसने अपनी जीभ से उसकी गांड के खुले भाग को चाटा तो गांड स्वतः ही बंद होती चली गई. बस अब इसी प्रकार का क्रम चल निकला मेहुल एक की गांड मारता फिर सुजाता उसका लंड चाटती, अगली गांड पर लगाती और जिस गांड से निकला था उसे चाटने लग जाती। मेहुल इस प्रकार से अपनी माँ और भाभी दोनों की गांड मार रहा था और सुजाता उनकी सहायक थी.

आधे घंटे से अधिक तक चले इस क्रम का अंत अब निकट था. मेहुल ने सुजाता को कुछ समझाया और वो जैसे ही स्मिता की गांड में झड़ने लगा तो लंड बाहर निकाला, सुजाता ने उसे अपनी मुठ्ठी में पकड़ा जिससे कि रस बाहर न गिरे और श्रेया की गांड में डाल दिया. मेहुल ने एक दो धक्के ही श्रेया की गांड में लगाए और उसे अपने रस से भर दिया. उसका शरीर अकड़ा हुआ था. श्रेया की गांड पर मेहुल का लंड लगाने के बाद सुजाता ने अपना मुंह स्मिता की गांड पर लगाकर मेहुल का रस चूस लिया. उधर जैसे ही श्रेया की गांड से लंड निकला तो उसने श्रेया की गांड भी चूसकर खाली कर दी. अब वो प्यासी आँखों से मेहुल के लंड को ताकने लगी. मेहुल ने अपने लंड को उसके नाक के सामने किया और सुजाता ने उसक लंड को मुंह में लेकर बेशर्मी से चूसना आरम्भ कर दिया.

सास बहू अब संतुष्ट होकर उसी मुद्रा में थी. फिर दोनों ने करवट ली और सुजाता की मेहुल के लंड पर हो रही गतिविधि को देखने लगीं. मेहुल ने अपने लंड को बाहर निकाला और सुजाता के सिर पर थपकी दी.

“गुड जॉब, सूजी डार्लिंग.”

“यस, सूजी डार्लिंग. वेरी गुड जॉब.” स्मिता और श्रेया ने भी सहमति जताई.

सुजाता का गर्व से फूल कर सीना चौड़ा हो गया.

“कुछ समय के लिए विश्राम करते हैं. उसके बाद सूजी डार्लिंग को उनके उत्तम प्रदर्शन और कार्य कौशल के लिए उनका उचित प्रकार से धन्यवाद किया जायेगा.” मेहुल ने कहा तो सब बैठ गए, केवल सुजाता अपने स्थान पर निर्धारित आसन में ही रही.

“जब सूजी डार्लिंग के पुरुस्कार की बात चली है तो उन्हें कुछ ट्रेलर दिखाया जाये?” श्रेया ने कहा.

उसने रिमोट से सुजाता की गांड के डिल्डो को उच्चतम गति पर कर दिया. देखा देखी स्मिता ने भी यही किया. बेचारी सुजाता से अब सहन नहीं हो रहा था, वो इस आसन में डोल रही थी पर उसके ऊपर दया करने वाला वहाँ कोई न था.

मेहुल ने उसकी ये स्थिति देखी तो कहा, “इतना मत करिये कि सूजी डार्लिंग अपने पुरुस्कार के पहले ही धराशाई हो जाएँ. बल्कि मैं सोच रहा हूँ कि उनकी गांड का डिल्डो निकाल ही दिया जाये. नहीं तो इतनी खुली गांड मारने में कोई आनंद नहीं आएगा.”

ये सुनकर श्रेया ने रिमोट से उसे बंद किया और पास आकर धीरे से डिल्डो को निकाल दिया. गांड खुल कर सामने आई तो श्रेया बोली, “ठीक कहा. ऐसी खुली गांड तो रेल की सुरंग जितनी चौड़ी है. कुछ सामान्य होने दीजिये, नहीं तो न आपको, न ही सूजी डार्लिंग को आनंद आएगा.”

ये सुनकर सुजाता का चेहरा लाल हो गया. फिर श्रेया ने जाकर सबके लिए फलों का रस लाया और सबने उसे शांति से पिया. इतनी देर का विराम ही मेहुल के लिए पर्याप्त सिद्ध हुआ. स्मिता और श्रेया ने कानाफूसी की.

स्मिता, “मेहुल, सूजी डार्लिंग का उपहार उसे इसी स्थान पर देना चाहोगे या बिस्तर पर?”

मेहुल, “बिस्तर पर. घुटने दुःख गए होंगे और मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई विशेष आनंद आएगा दोनों को. उपहार है तो कष्ट नहीं होना चाहिए.”

स्मिता, “ओके, सूजी डार्लिंग अब तुम उठ सकती हो और बिस्तर पर जाओ. श्रेया जाकर सूजी डार्लिंग की गांड में जैल लगा दो. चाहे सुरंग जितनी चौड़ी ही क्यों न हो, पर मेरे बेटे के लंड के लिए फिर भी संकरी ही है.”

सुजाता ने धन्य माना कि उसे अब यूँ नहीं बैठना होगा. और उठकर कुछ लड़खड़ाते हुए बिस्तर पर जाकर घोड़ी का आसन बना लिया. श्रेया ने जाकर उसकी गांड में जैल लगाया और फिर मेहुल के लंड पर जैल लगाकर उसे सवारी गांठने के लिए कहा. इसके बाद मेहुल ने अपने चिर परिचित ढंग से सुजाता की गांड की धज्जियाँ उड़ा दीं. स्मिता और श्रेया ये दृश्य देखकर स्वयं को भाग्यशाली माने कि मेहुल ने उनकी गांड में ऐसा आतंक नहीं मचाया. पंद्रह मिनट तक सुजाता की गांड मारकर मेहुल ने अपने लंड को निकालकर सुजाता में मुंह में डाला और अपना रस वहीं मुंह में ही छोड़ दिया.

इसके बाद सब सहज हो गए. श्रेया ने सुजाता को बाथरूम में ले जाकर नहलाया.

“मॉम, आज के आचरण के लिए मुझे क्षमा करना. पर आपने हम सबको हमेशा नीचा दिखाया है, इसीलिए मैं आज स्वयं को रोक न पाई.” उसने सुजाता से कहा.

“सच तो ये है कि जब तक मेहुल के नीचे मैं नहीं आई थी तब तक मैं भी बहुत घमंडी थी. इस लड़के ने मेरी पूरी विचारधारा बदल दी. अब मुझे लगता है कि मुझे इस प्रकार के व्यव्हार की अपेक्षा थी, कि कब कोई आएगा और मुझे मेरा स्थान दिखायेगा. काश, तुम्हारे पापा ये समझ पाते तो तुम सबको इतना सहन न करना पड़ता.” सुजाता ने बोला।

“और मैं चाहूँगी कि बीच बीच में मुझे इस प्रकार का घूँट पिलाया जाये, मुझे इसमें सच में एक आनंद आया, मानो मेरी एक कुँठा जाग्रत हो गई है.”

“ठीक है, आप जब चाहोगी हम आपको ऐसे ही तिरस्कृत करेंगे. मम्मीजी और मेहुल से भी बात कर लेते हैं.”

श्रेया और सुजाता कमरे में आये तो स्मिता और मेहुल यूँ ही बैठे थे. श्रेया ने सुजाता के साथ हुई बात को बताया तो स्मिता ने कहा, “ठीक है. ये ‘सूजी डार्लिंग’ हमारा कोड वर्ड रहेगा. जब भी हम में से किसी को इस प्रकार के आनंद की इच्छा होगी वो इसका प्रयोग कर सकता है. सुजाता भी इसका उपयोग करके बता सकती है कि वो दासी स्वरूप में आना चाहती है. इस के सिवाय हम सब सामान्य रूप से रहेंगे.”

सबको ये सुझाव रुचिकर लगा. इसके बाद एक से गले मिलकर स्मिता, श्रेया स्नान करने चले गए. मेहुल सुजाता को लेकर उसे घर के बाहर छोड़ने आया.

“मेहुल बेटा, मैं तुम्हारा धन्यवाद करती हूँ. और मैं तुम्हारी दासता से कभी मुक्त नहीं होना चाहती. पर स्मिता की बात भी सही है.”

“ओके आंटीजी. अब आप जाइये, आज आपने बहुत कुछ वहन किया है. अब जाकर विश्राम कीजिये.”

***********************

सुजाता का घर:

चार दिन बाद:

शाम को सभी भोजन के बाद अपने कमरों में चले गए. सुजाता बाथरूम में गई तो अविरल ने एक बैग सोफे के एक ओर रख दिया. सुजाता बाहर आई तो उसका पानी से गीला शरीर दमक रहा था. अविरल ने उसे अपने साथ बैठाया और उसके गले में बाँहें डाल दीं.

“क्या बात है, आज बड़ा प्रेम उमड़ रहा है मुझ पर?” सुजाता ने इठलाकर पूछा.

“बात ही कुछ ऐसी है. न जाने क्यों मुझे लगता है कि मेरी वर्षों की दबी इच्छा पूरी होने वाली है.” अविरल ने उसके होंठ चूमकर कहा.

“अच्छा जी. और वो क्या है.”

“बात ये है "सूजी डार्लिंग”,” अविरल ने बैग को उठाकर सामने की टेबल पर रखा, “कि श्रेया ने मुझे तुम्हारी दबी हुई इच्छाओं से अवगत करा दिया है.”

सुजाता अचरज से अपने पति को देखती रही, फिर मुस्कराई और नीचे बैठकर अविरल के पैरों को चाटने लगी. अविरल ने अपने पैर फैला दिए और सोफे पर फैलकर बैठ गया. उन दोनों के जीवन में नए रंग भरने लगे थे.

और रात अभी शेष थी.

************************

अविरल अपनी पत्नी के इस नए रूप में देखकर दुविधा में था. आज तक उसने सुजाता को अन्य लोगों पर एक प्रकार से राज करते हुए ही देखा था. उसने एक और अनुभव किया था. पिछले कुछ दिनों से उसके इस व्यवहार में स्पष्ट रूप से कमी आई थी. और वो पहले से अधिक संतुष्ट भी लग रही थी. क्या उसका वो दुर्व्यवहार का कारण उसकी इस विकृति का पोषित न हो पाना था? क्या अब वो इसीलिए अधिक प्रसन्न है क्योंकि उसे अपना सच्चा स्वरूप दिख गया था?

“सूजी डार्लिंग, उठो और व्हिस्की लेकर आओ. और वो बड़ा कटोरा भी ले आओ जिसमें तुम नमकीन इत्यादि रखती हो. उसे खाली ही लाना.”

सुजाता ने रसोई से वो कटोरा ले आई. साथ में कुछ अल्पाहार भी ले आई. अविरल उसकी अधीनता की सीमा नापना चाहता था. सुजाता ने कटोरा अविरल के सामने रखा फिर व्हिस्की, पानी और दो ग्लास भी ले आई. उसके बाद सुजाता उसके सामने ही घुटनों के बल बैठ गई.

“सूजी डार्लिंग, मैं कुछ नियम बनाना चाहता हूँ. इनका तुम्हें पालन करना होगा. तुम उनके विषय में क्या विचार रखती हो इससे मुझे कोई अंतर नहीं पड़ता. समझ रही हो न?”

“जी.”

“पहला नियम: ये कमरा अब से मेरा और सूजी डार्लिंग का है. इस कमरे में सुजाता के लिए कोई स्थान नहीं है. कमरे के बंद होते ही तुम सूजी डार्लिंग बन जाओगी. ठीक है?”

सुजाता के उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना ही अविरल आगे बोला,

“दूसरा नियम: कमरे के बाहर तुम केवल सुजाता ही रहोगी और इस नाम का कोई अर्थ नहीं होगा. हाँ अगर श्रेया या अन्य किसी को इस विषय में बात करनी हो तो उन्हें इस कमरे में ही आना होगा.”

सुजाता ने शब्दों में अन्य किसी सुना तो काँप गई. क्या अन्य परिवारजनों को भी अविरल बताने वाले हैं?

“तीसरा नियम: स्मिता और विक्रम के घर में भी ये नियम उनके कमरे में ही उपयोग में आएगा. ये आज श्रेया स्मिता को बता देगी. इसका अर्थ ये है कि इन दो स्थानों के सिवाय तुम सदा सुजाता ही रहोगी, और इन दो स्थानों में सदा ही सूजी डार्लिंग. इस व्यवस्था को कुछ समय के लिए केवल तीन लोग ही परिवर्तित कर सकते हैं: मैं, श्रेया और मेहुल.”

सुजाता आश्चर्य से अविरल को देखने लगी. अविरल मुस्कुराया.

“श्रेया ने मुझे बताया कि तुम्हें मेहुल ने ही इस राह पर डाला है, तो मैं उसके अधिकार को तो छीनने से रहा.”

“मैं कुछ कहना चाहती हूँ.” सुजाता बोली, “मुझे आपके नियम मानने में कोई कठिनाई नहीं है. परन्तु अगर विवेक, स्नेहा और मोहन हमारे साथ रहे जैसे पिछले सप्ताह थे तो क्या होगा?”

“कुछ नहीं होगा, यही नियम रहेगा और तुम सूजी डार्लिंग ही बनी रहोगी. यही स्मिता के घर के लिए भी उपयुक्त है. अन्य परिवार के लोगों को भी इस नियम से अवगत करा दिया जायेगा, जब भी उन्हें जानने की आवश्यकता होगी.”

“अब अंतिम नियम: ये रूप केवल हमारे परिवार के साथ ही होगा। बाहरी किसी भी व्यक्ति, चाहे वो समुदाय का ही क्यों न हो, इस रूप के दर्शन नहीं करेगा.”

“आप बच्चों के सामने मुझे सूजी डार्लिंग बनाये रखेंगे?”

“मुझे विश्वास है कि तुम्हें भी इसमें अत्यधिक आनंद आएगा. क्या श्रेया की दासी बनना तुम्हें अच्छा नहीं लगा था?”

“लगा था. आप ठीक कह रहे हैं. और इन नियमों के कारण कभी भी स्थिति नियंत्रण से बाहर नहीं होगी. परन्तु क्या आपको नहीं लगता कि विशेष परिस्थितियों में बाहरी लोगों के सामने भी ये रूप लेने में बुराई नहीं है?”

सुजाता अब अत्यधिक उत्तेजित होने लगी थी. अगर उसके परिवार वाले भी उसे इस प्रकार से उपयोग करेंगे तो उसकी हर दबी इच्छा पूरी हो सकेगी.

अविरल: “इस विषय में सोचा जा सकता है. उस समय के आने तक इसे सीमित समूह में ही रखा जाये तो ठीक होगा.”

“जी, जैसा मेरे स्वामी चाहें.” सुजाता ने कहा और अविरल के दाएं पैर के अंगूठे को चूस लिया.

“गुड गर्ल, सूजी डार्लिंग. आओ इस नए जीवन के लिए एक एक पेग हो जाये.”

सुजाता उठकर पेग बनाने लगी. पहला पेग बनाते ही अविरल ने उसे रोक दिया. वो सुजाता की सीमा की जाँच करना चाहता था.

“ये मेरा ग्लास है. तुम्हारे लिए मेरे पास एक नया विचार है.”

सुजाता उसे देखने लगी. अविरल ने कटोरा उठाया और उसे थमा दिया.

“मेरे पैरों को व्हिस्की से धोकर उसे ग्लास में डालकर पीना, सूजी डार्लिंग.”

सुजाता के शरीर में एक झुरझुरी सी हुई. इस प्रकार के तिरिस्कार उसने कल्पना भी नहीं की थी.

“और आगे भी पहले मेरे पाँव धोया करोगी, इसी प्रकार से.”

“जी.”

सुजाता ने एक गिलास में व्हिस्की डाली और कटोरे को नीचे रखकर अविरल के पाँव धोये और फिर उस व्हिस्की को ग्लास में डाल लिया.

“गुड, गुड, चीयर्स माई डियर सूजी डार्लिंग!”

अविरल को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया था और सुजाता को अपने जीवन का अर्थ.

अगले पृष्ठ पर शेष भाग है.
 
**********************

दो दिन पहले:



मेहुल और महक:

महक आज बहुत चहक रही थी. सुबह नाश्ते के समय भी उसके इस हर्ष का अनुमान लग गया था. मेहुल शांत था, पर उसे महक की आँखों में दिख रहा था कि वो उसे ही देख रही थी.

“तो मेहुल, तुम्हारा आज का क्या कार्यक्रम है?” विक्रम ने पूछा.

“जैसे आपको पता न हो? आप भी न!” स्मिता ने हंसकर कहा.

“अरे भाई, पूछने में क्या जाता है? क्यों महक?” विक्रम भी हंस पड़ा, पर महक का चेहरा लाल हो गया.

“देखो कैसे लाल हो गए हैं इसके गाल.” विक्रम ने हँसते हुए कहा.

“पापा. आप बहुत बुरे हो. मैं आपसे बात नहीं करती. मम्मी, बस आप ही मेरी फ्रेंड हो.” महक ने रूठने का नाटक किया.

“अब देखें शाम तक चेहरा ही लाल रहेगा या कुछ और भी लाल लाल हो जायेगा. क्यों महक?” स्मिता ने हंसकर कहा.

“मम्मा, आप भी पापा के साथ हो गयीं. अब मेरा क्या होगा?” महक ने रुंआसे स्वर में पूछा।

“क्या हो गया हमारी प्यारी नंद को?” श्रेया भी आ गई तो पूछने लगी.

स्मिता ने बताया तो श्रेया भी हंसने लगी. वो महक के कान के पास गई और फुसफुसाई, “अगर कहो तो पहले मैं कुछ तेल वेल लगा दूँ, कहीं सूज न जाये तुम्हारी….”

“मैं जा रही हूँ, इस घर में मेरा कोई भी नहीं है.” महक उठते हुए बोली, हालाँकि उसके मन में भी लड्डू फूट रहे थे.

“अरे रुको, दीदी. नाश्ता कर के जाओ. फिर न जाने कब मिले? चलो मैं चलता हूँ साथ.” मेहुल ने उसके हाथ को पकड़ा और बैठा लिया.

“अब तू कह रहा है तो रुक जाती हूँ. नहीं तो चली ही जाने वाली थी.”

“चलो, अच्छा हुआ. अब वैसे भी विवाह के बाद तू अपने ससुराल जो चली जाएगी. फिर हमारी याद कहाँ आनी है,” श्रेया ने कहा.

“ऐसा मत कहो भाभी.”

“अच्छा अब ये बताओ कि क्या है आज का कार्यक्रम?”

स्मिता: “मैं और श्रेया तो सुजाता के साथ उसके चुनाव में सहायता करने के लिए जा रहे हैं. आप और मोहन अपने काम पर जाओ. और महक और मेहुल अपने कार्य को पूरा करेंगे.”

नाश्ते के बाद स्मिता ने मेहुल को पास बुलाया. “मेहुल बेटा, महक का ध्यान रखना. तेरा लंड बहुत लम्बा और मोटा है. उसे चोट न पहुंचे. वैसे भी अब वो कुछ ही दिनों में पराई भी हो जाएगी.”

मेहुल, “मम्मी, आप बिल्कुल भी चिंता न करो. दीदी को कुछ नहीं होगा. ये मेरा वचन है.”

ग्यारह बजे तक विक्रम, मोहन, श्रेया और स्मिता निकल गए. मेहुल बैठक में ही बैठा रहा, वो महक दीदी के बुलावे के लिए ठहरा हुआ था. आधे घण्टे बाद महक भी आई तो मेहुल उसे ठगा सा देखता रह गया. महक ने बहुत सुंदर कपड़े पहने थे और उत्कृष्ट मेकअप किया हुआ था. उसकी सुंदरता इस समय चन्द्रमा को भी पीछे छोड़ रही थी. मेहुल को यूँ तकते देख वो शर्मा गयी.

“क्या देख रहा है?”

“दीदी, तुम कितनी सुंदर हो. असीम कितना भाग्यशाली हैं.”

महक आगे बढ़कर मेहुल के गले लग गयी. “आई लव यू.”

“आई लव यू, टू.”

“चलो मेरे कमरे में.” महक ने मेहुल के हाथ को पकड़ा और एक नयी यात्रा के लिए दोनों चल पड़े.

मेहुल के मन में एक ही भावना थी. वो आज महक को ऐसा सुख देना चाहता था जिसे वो जन्म जन्मांतर तक न भूले. आज वो अपनी उन सारी प्रशिक्षिकाओं के अनुभव के निचोड़ का उपयोग करने वाला था. महक भी मन में ऐसा ही कुछ विचार कर रही थी. उसके मन में ये था कि वो मेहुल को अपने प्रेम से इतना आनंदित कर देगी कि उसे पिछले दिनों में जो भी अनुभव हुआ है उसे वो भूल जायेगा. उसे ये नहीं पता था कि मेहुल इस खेल में दो साल से लिप्त था और उसका अनुभव ऐसी अनुभवी और परिपक़्व महिलाओं के साथ था जो महक से कोसों आगे थीं.

महक के कमरे में जाते ही मेहुल के नथुनों में एक सुगंध भर गयी. महक ने उसके इस संगम के लिए एक सुंदर वातावरण बनाया था. मेहुल का मन अपनी दीदी के इस प्रेम से विव्हल हो गया. महक ने उसकी ओर मुड़कर उसे अपनी बाँहों में भर लिया.

महक, “मुझे जब ये पता चला था कि समुदाय में जाने के बाद एक दिन मुझे तुम्हारे साथ भी सम्भोग का अवसर मिलेगा तो मुझे स्वयं पर संशय होने लगा था. तब तुम अठारह वर्ष के थे और ऐसा सोचना भी मुझे पाप लगा था. पर जैसे समय निकला, मैंने तुम्हारे बारे में भी सोचना आरम्भ किया तो कई दिन तो मैं केवल तुम्हें ही अपने साथ होने की कल्पना करती थी.”

मेहुल ये नहीं बता सका कि उसके मन में परिवार की किसी भी स्त्री के लिए मन में कभी ऐसे विचार भी आये हों. वो अपनी अन्य महिला मित्रों से ही संतुष्ट था. पर वो महक की बात सुन रहा था.

“उस दिन जब तुमने भैया, भाभी और स्नेहा को पकड़ा तो मुझे लगा था कि मेरी इच्छा कभी पूर्ण न होगी, और तुम हमें छोड़कर चले जाओगे. जब तुमने मम्मी के साथ जाने का निर्णय लिया तो मेरे मन को इतनी शांति मिली थी कि मैं रात भर सोई नहीं थी. और आज मैं तुम्हारे साथ हूँ. मुझे चुदाई का बहुत अनुभव नहीं है. घर में ही मैं अधिक चुदाई करती हूँ. समुदाय में जहाँ मेरी सहेलियाँ हर दूसरे दिन किसी न किसी से चुदवाती हैं, मैं इसमें बहुत कोताही करती हूँ. जो समुदाय के नियमों के लिए आवश्यक है केवल उतनी.”

मेहुल: “एक बात का मैं भी समर्थन करता हूँ. मुझे समुदाय में अत्यधिक रूचि नहीं है. पर क्योंकि ये हम सबके लिए नितांत आवश्यक है तो मैं भी उतना ही भाग लूँगा जितना न्यूनतम है.”

महक: “अब असीम के साथ विवाह भी होने वाला है. उनके परिवार में तो और भी अधिक ही चुदाई का वातावरण है. तो मुझे बहुत कुछ सीखने को मिलने वाला है. पर जो भी मैं जानती हूँ, मैं उसे हम दोनों के सुख के लिए प्रयोग में लाना चाहती हूँ.”

मेहुल ने जब महक की बात सुनी तो उसने भी अपने पिछले दो वर्षों के बारे में उसे संक्षेप में बताया. महक को अचरज इस बात का हुआ कि मेहुल इतनी चतुरता से अपने इस रूप को सबसे छुपा सका था. उसे भी लगा कि मेहुल के अनुभव से उसे भी कुछ नया अनुभव होने वाला है.

महक: “तो मेरा छोटा भाई उतना भी अनुभवहीन नहीं है जितना सब समझते हैं. पर इस बात को जिस चतुराई से छुपाया है वो भी प्रशंसनीय है.”

मेहुल: “मैं नहीं चाहता था कि मेरे इस चरित्र का किसी को पता चले. मुझे क्या पता था कि यहाँ तो सब चार कदम आगे थे.” कहते हुए वो हंस पड़ा.

उसके हाथ महक की पीठ को सहला रहे थे. महक ने अपना चेहरा उठाया तो मेहुल ने उसे चूम लिया. और मानो दोनों को शरीर में बिजली सी कौंध गयी. एक दूसरे को वो चूमने लगे और मेहुल की जीभ ने महक के मुंह में हलचल मचा दी.

मेहुल: “मुझे आपको अच्छे से देखना और प्यार करना है. कपड़े उतार देते हैं.”

महक: “मेरे मन की बात.”

दोनों पलक झपकते ही एक दूसरे के सामने नंगे हो गए. एक दूसरे के शरीर आज पहली बार इतनी निकटता से देखे थे, वो भी बिना वस्त्रों के बंधन के तो कुछ समय तक तो एक दूसरे को देखते ही रहे. महक सुंदरता की प्रतिमा थी तो मेहुल युवा शक्ति का नमूना. महक ने जब मेहुल के लंड को देखा तो वो सहम गई. अभी तक लंड पूरा खड़ा भी नहीं हुआ था फिर भी वो बहुत भयानक सा लग रहा था.

“भाई, तुम्हारा लंड तो बहुत बड़ा है. क्या ये मेरी चूत में जा पायेगा?”

“दीदी, बिलकुल जायेगा.” मेहुल ने महक को बाँहों में लेकर चूमा, “और आपको मैं इस प्रकार से चोदुँगा कि आपको केवल आनंद का अनुभव होगा.”

महक कुछ सोचते हुए, “हाँ, मैं समझती हूँ. फिर भी डर लग रहा है.”

“आप मुझ पर विश्वास कर सकती हो.”

“मैं जानती हूँ.”

मेहुल ने महक को बिस्तर पर बैठाया और फिर धीरे से लिटा दिया. एक बार महक के लेटते ही उसके पाँव चौड़े करते हुए वो उनके बीच में खिली हुई चूत को देखने लगा. उसे न जाने क्यों चालीस वर्ष के ऊपर की ही स्त्रियों में अधिक रूचि थी. मेहुल ने अब तक दो तीन अपनी आयु की लड़कियों को भी चोदा था, पर उसका मन मध्यम आयु से अधिक की स्त्रियों पर आसक्त था. जो आकर्षण उसे महक की चूत में दिख रहा था वो पहले कभी न हुआ था. उसके बीच में अपने सिर को रखते हुए उसने एक गहरी साँस लेते हुए उसकी चूत की मादक सुगंध को सूँघा। फिर अपनी जीभ से उसे चाटना आरम्भ किया.

“ओह, मेहुल!” महक ने सिसकारी ली.

महक अपने भाई के सिर पर प्यार से हाथ फिराने लगी. मेहुल भी पूरे मन से महक की चूत के रस को चाट रहा था और महक की चूत भी उसे पर्याप्त रस दे रही थी. ऐसा लग रहा था मानो महक की चूत कोई नहर या नदी थी जिसमे जल की कोई कमी न थी. मेहुल ने भी अपनी जीभ को इस बहती हुई नदी में और अंदर धकेला और महक की चूत के जितना सम्भव हो उतना अंदर तक चाटने का प्रयास किया. महक को भी एक अद्भुत आनंद आ रहा था. उसने तो सोचा था कि मेहुल अनाड़ी होगा, पर उसके कार्यकलापों ने सिद्ध कर दिया था कि इससे बड़ा खिलाड़ी सम्भवतः उसके संसर्ग में अब तक नहीं आया था. मेहुल के सिर पर हाथ फिराते हुए वो अपनी जाँघें चौड़ी किये हुए मेहुल की जादुई जीभ की प्रतिभा का आनंद ले रही थी.

मेहुल वैसे तो जीवन भर ये रस पी सकता था, पर आज उसके मन में अन्य ही लक्ष्य था. उसने सर उठाकर महक को देखा तो महक उसके बालों में हाथ घुमाते हुए उसे अत्यधिक प्रेम से देख रही थी. मानो वासना का एक कण भी न हो. दोनों की आँखें मिलीं तो महक मुस्कुराई.

“दी….” मेहुल ने इतना ही कहा था कि महक ने उसे रोक दिया. “अब मुझे भी तेरे लंड का स्वाद लेने दे. देखूं तो मेरा भाई जो इतना बड़ा लंड लेकर घूम रहा था मेरे मुंह में समायेगा या नहीं?”

मेहुल उठ गया और महक वहीं बिस्तर पर बैठ गई. मेहुल का विशाल लंड इस समय तमतमाया हुआ था और महक एक बार तो डर ही गई. परन्तु उसने हार न मानी और सुपाड़े पर अपनी जीभ फिराई। लंड ने झटका मारा और उसके इस कार्य का स्वागत किया. लंड को चाटते हुए महक का आत्मविश्वास भी बढ़ने लगा और वो और द्रुत गति से लंड चाटने लगी. फिर अपने मुंह में लिया और पूरे भरे मुंह से उसे चूसने का प्रयास करने लगी. कुछ देर में उसका मुंह मेहुल के लंड का अभ्यस्त हो गया और फिर महक ने पूरे प्रेम से मेहुल के लंड की चूसा. पर दोनों भाई बहन के शारीरिक संगम के लिए आतुर थे. दोनों अब और संयम नहीं रख सकते थे. महक ने लंड को मुंह से निकाला और फिर मेहुल को देखा. मेहुल उसकी निशब्द भाषा को समझ गया और उसे बिस्तर पर लिटा दिया.

“धीरे करना, तेरा लंड बहुत बड़ा है.” महक ने प्रार्थना की.

“दीदी, आप चिंता न करो. बस आनंद लो. सम्भव है कि कुछ कष्ट हो, पर वो क्षणिक ही होगा. ये मेरा वचन है.”

मेहुल ने एक बार फिर महक की चूत को देखा और उसे चाटने से स्वयं को रोक न पाया. दो तीन मिनट उसे चाटकर जब उसे शांति मिली तो उसने अपने लंड को चूत पर लगाया.

“धीरे” महक ने अंतिम बार कहा.

मेहुल ने कुछ न बोला और लंड को महक की चूत में बहुत सहज गति से अंदर डाल दिया. महक ने एक सिसकारी ली, और अपने पैरों को फैला दिया. महक को चूत में मेहुल की यात्रा आगे बढ़ती रही. पर आधे लंड के अंदर समाने के बाद वो ठहर गया. अब उसने लंड को आगे पीछे करना आरम्भ किया और महक को आनंद आने लगा. मेहुल स्वयं पर अंकुश लगाए था. और इसी प्रकार से वो कुछ समय तक चोदता रहा. जब उसे लगा कि महक की चूत में आगे बढ़ा जा सकता है तो धीरे धीरे वो और अंदर तक जाने लगा.

सधे हुए धक्के और शांत रूप से चल रहे इस सम्भोग में महक को कोई भी असहजता नहीं हुई. हालाँकि उसे मेहुल के इस नियंत्रण पर आश्चर्य और गर्व अवश्य हुआ. वो आनंद के सागर में डूबती उभरती रही और मेहुल अपने लंड को उसकी चूत में एक सतत गति से चलाता रहा. महक के शरीर ने एक झुरझुरी के साथ अपने पहले स्खलन की घोषणा की. मेहुल के लंड ने अपना पूरा लक्ष्य प्राप्त कर लिया था और उसके लंड की ठोकर के साथ ही महक के शरीर ने इसका स्वागत किया था.

मेहुल एक निश्चित योजना के साथ महक को पूरे लौड़े के साथ चोदने लगा, गति भी ऐसी थी कि महक हर कुछ देर में झड़ जाती थी. कई दिनों से इस प्रकार की चुदाई से उसका नाता नहीं रहा था. उसे चुदाई और सम्भोग का अंतर भी समझ आया. जो मेहुल कर रहा था वो सम्भोग था, चुदाई नहीं. मेहुल भी ये जानता था कि दीदी की पहली चुदाई में प्रेम होना आवश्यक था. चुदाई तो इसके बाद भी की जा सकती थी. दोनों भाई बहन इस यात्रा के नए राही थे और दोनों उसका पूर्ण आनंद ले रहे थे.

दोनों भाई बहन इसी प्रकार से प्रगाढ़ प्रेम के साथ सम्भोग में जाने कितनी ही देर लीन रहे. महक को ये सम्भोग सदा के लिए स्मरण रहने वाला था. मेहुल भी इसी प्रकार के भावों में खोया था. अब जिस सरलता और चपलता से उसका लंड महक की चूत में चल रहा था उसका कारण महक की चूत से बहती हुई रस की निरंतर धारा थी. मेहुल भी अब अपने चरम पर पहुंच चुका था और झड़ने की कगार पर था. उसने महक से पूछना आवश्यक नहीं समझा और उसे केवल एक चेतावनी ही दी.

महक ने कोई उत्तर नहीं दिया और इस लम्बी दौड़ के समापन पर मेहुल ने अपना रस महक की चूत में छोड़ दिया. दोनों एक दूसरे को चूमने लगे और फिर मेहुल महक के साथ लेट गया जहाँ उनके होंठ एक दूसरे से अलग नहीं हुए. फिर एक दूसरे के होंठों के छोड़कर एक दूसरे की आँखों में देखते हुए उनकी मुस्कुराहट ने अपना प्रेम दर्शा दिया.

महक ने पहले बात बोल, “वाओ, मेहुल, तुम तो सच में अद्भुत हो. मुझे तुम्हारे लंड से एक बार भी कोई पीड़ा नहीं हुई.”

मेहुल, “मैंने तो पहले ही कहा था.”

महक: “हाँ. पर अब मुझे अगली बार जोर से जम कर चोदना, मुझे भी तो पता चले कि मेरे भाई के पीछे इतनी स्त्रियाँ क्यों मरती हैं.”

मेहुल: “बिलकुल, दी. जैसा आप चाहो.”

क्रमशः

1207200
 
मैं Incest विषय पर कुछ अन्य कहानियाँ लिखने के बारे में सोच रहा हूँ।

कुछ विचार हैं , और उन सभी को एक ही थ्रेड में लिखूँगा । पर ये अलग अलग कहानियां होंगी।

मुझे लगता है कि ज्यादातर लोगों को यह कहानी बहुत जटिल लगती है।

तो दूसरी कहानियां सरल होंगी,

अगर आपको यह विचार पसंद आया तो मुझे बताएं।

21 फरवरी के बाद आरम्भ करूंगा।
 
भाई,

मुझे भी टाइम लगता है लिखने में. पढ़ता कोई है नहीं।

आप पिछले 10-20 पन्नों को देख लो.

आपके, मेरे और के सिवाय अब यहां कोई नहीं है.

आप दोनों को तो मैं मैसेज में भी आगे की कहानी भेज सकता हूँ, अगर लिखूंगा तो.

पहले भूले भटके कोई एक आधा लाइक भी कर देता था. अब वो भी नहीं है.

पोल समाप्त होने पर देखूंगा।
 
अभी टूर से वापिस पहुंचा हूँ.

आज रात को अगला अपडेट पर काम चालू होगा।

एक ही बात कहना चाहूँगा, अगर आप पढ़ रहे हैं तो किसी प्रकार तो अपनी उपस्थिति बताइये। कमेंट, लाइक, कुछ तो हो.

हम यहाँ से प्रोत्साहन के सिवाय कुछ भी आशा नहीं करते। अगर वो भी न हो, तो दुःख तो होता ही है.

सम्भव है आपको कोई परिवार अच्छा न लग रहा हो, या कोई प्रति अच्छी न लगी हो. अगर आप बताओगे तो उसे ठीक करने की संभावना है.

पोल अभी २८ फरवरी तक है. उसके बाद ही आगे कुछ सोचूँगा।
 
Back
Top