Romance भंवर (पूर्ण) - Page 5 - SexBaba
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Romance भंवर (पूर्ण)

Update:-31

अपस्यु कैंटीन के गेट से, ये सारा तमाशा होते देख रहा था। कुंजल जब अपना गुस्सा दिखाई तो अपस्यु सामने देख कर इतना ही सोचा… "एक तरफ प्यार तो दूसरी तरफ परिवार। तू तो पीस गया बेटा।

क्या तेवर थे। लावणी तो बिल्कुल दुबक ही गई। अराव को कमर से पकड़कर खींचना पड़ा वरना कुंजल तो आज भीड़ ही गई थी। साची को भी लगा शायद वो इतने लोगों के बीच कुछ ज्यादा ही बोल गई, इसलिए वो लावणी को लेकर चुपचाप वहां से निकल गई।

"बस रे कितना गुस्सा करेगी"…. अराव उसे खींचकर पार्किंग लाते हुए बोला।

"हद है मोनू, बिना कोई बात समझे वो कैसे ओवर्रिएक्ट कर रही थी। तेरा खून नहीं खौला क्या"… कुंजल अभी भी अपनी भड़ास निकलती कहने लगी।

अराव ने अपने पॉकेट से सिगरेट निकालकर जलाते हुए…. "तो तू उसे सफाई में क्या कहती। कैसे उसकी बहन अचानक से चली आई, कैसे समझाएगी"..

कुंजल, अराव के हाथ से सिगरेट लेकर एक कस खींचती…. "ठीक है तेरी बात, लेकिन देखा नहीं कितनी बदतमीजी कर रही थी"…

"हां बदतमीजी की तो है उसने, लेकिन अपस्यु की खातिर इग्नोर मार"… अराव एक कस खींचते बोला…

"चल क्लास का टाइम हो गया, चलते हैं, समझने दे उन लैला मजनू को अपना मैटर। लेकिन एक बात तो तय रहा उनका पैचअप भी हुआ ना तो भी आज के बात का बदला तो मैं लेकर रहूंगी"…. कुंजल के चेहरे पर कुटिल मुस्कान और आखों में शरारत साफ दिख रही थी।

अपस्यु के लिए भी दूसरा दिन बस चूहे बिल्ली के खेल से ज्यादा कुछ नहीं था, उल्टा कैंटीन में हुई घटना के बाद मामला अब और उलझ चुका था क्योंकि कुंजल भी खफा हो चुकी थी।

रात के करीब 2 बज रहे होंगे… घर में सब सोए हुए थे… अराव चुपचाप उठा और सभी सिक्योरिटी को भेदकर लावणी के घर में घुस चुका था। लावणी के दरवाजे के पास खड़े होकर उसने पूरे दरवाजे को देखा… "हाहहा, आधुनिक ताले.. शुक्र है मेहनत बच गई। छिटकिनी होती तो मेहनत बढ़ जाती"… किसी चोर कि भांति वो दरवाजे का ताला खोल कर चुपचाप कमरे में प्रवेश किया।

अंधेरा कमरा और एसी लगभग 18 डिग्री पर। अराव ने मोबाइल का फ़्लैश जलाकर, लाइट का स्विच ढूंढा और पहले लाइट ऑन किया, फिर एसी को बंद करके एक कोने में खड़ा हो गया।

लावणी को जब गर्मी लगीं तब सबसे पहले उसने अपने ऊपर के चादर को हटा दिया….. उसे चादर हटाते देख अराव के आखों में चमक अा गई थी लेकिन…… "धत… ये पूरे कपड़े में कौन सोता है। फिल्मों की हेरोइन कितना सेक्सी कपड़े पहने सोती है… कोई-कोई तो टूपीस में ही सोई रहती हैं। इसको देखो, बच्चों की तरह एबीसीडी वाले कुर्ता पजामा पहन कर सोई है। क्लीवेज तक ना दिख रहा।.. उफ्फ ! लेकिन क्या लग रही है"..…

अराव अपने ख्यालों में ही था और लावणी अपनी आखें मीजती उठकर बैठ गई… "ओह इतनी गर्मी क्यों लग रही है।".. नींद में ही बड़बड़ाते वो उठी और पास पड़े पानी के बॉटल को उठाकर पानी पीने लगी। बॉटल मुंह से लगाए 2 घूंट पानी अंदर ही गया था कि जली लाइट देखकर वो सोच में पड़ गई।

अभी सोंच, कुछ निष्कर्ष पर पहुंचती उससे पहले ही कोने में खड़ा अराव दिख गया। वो पानी पीते-पीते सरक गई। अराव उसके पास पहुंच कर… "पानी तो आराम से पी लिया करो"

"तुम इस वक़्त मेरे कमरे में क्या कर रहे हो".. और चादर को सीने से लगा कर खुद को ढकने लगी…

"एक तो पहले से पूरे बदन पर चादर की तरह कपड़े चढ़ा कर सोई हो, ऊपर से खुद को चादर लेेकर ढक रही। डरो मत, मैं यहां कोई रेप नहीं करने आया"… अराव एसी चलाते हुए बोला..

"प्लीज यहां से जाओ, देखो मेरी धड़कने कितनी बढ़ी हुई है"… लावणी खुद को समेट कर मिन्नतें करने लगी।

अराव उछलकर उसके पास बिस्तर पर बैठ गया और उसके सीने पर हाथ रखकर…. "हां यार धड़कने तो बढ़ी हुई है"..

लावणी दूर हटती…. "ये क्या कर रहे हो"..

अराव:- तुमने ही धड़कन देखने कही, हैं मैं देख रहा था।

लावणी:- अराव प्लीज परेशान नहीं करो ना, डर से मैं कहीं मार ना जाऊं।

अराव:- तुम सच बताना, अभी मुझ से डर लगा रहा है या ये डर है कि कहीं किसी ने देख लिया तो तुम्हारी बैंड ना बज जाए।

लावणी, थोड़ा निश्चिंत होती… "दोनों से"..

अराव:- ठीक है, यदि ऐसी बात है तो मेरे कुछ सवालों के जवाब देदो मैं चला जाता हूं।

लावणी:- पाऊं कहां है तुम्हारे कहो तो वो पकड़ लूं, लेकिन प्लीज अभी चले जाओ। कॉलेज में कल क्लास भले छोड़ दुं लेकिन तुम्हारे सभी सवालों के जवाब जरूर दूंगी। प्लीज अब मान जाओ मेरी बात। प्लीज प्लीज प्लीज….

अराव:- ठीक है मैं जा रहा हूं लेकिन पहले यहां आकर खड़ी हो जाओ।

"मानने वाले तो हो नहीं, बेकार में बहस करने का कोई मतलब नहीं, लो खड़ी हो गई"… थोड़े गुस्से के भाव उसके चेहरे पर थे। लेकिन अगले ही पल उसकी आंखें बिल्कुल बड़ी होते चली गई और मुंह से "ऊऊ… ऊऊऊ" निकालने लगा। इधर लावणी जैसे ही सामने खड़ी हुई, अराव ने उसके कमर में हाथ डाला और होंठ से होंठ लगा कर चंद सेकंड का एक चुम्बन लिया और उससे अलग होकर खिड़की के रास्ते बाहर चल दिया।

अचंभित आखें और स्थूल परा बदन। लगभग 1 मिनट बाद वो अपनी जगह से हिली। चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान थी और होंठ पर … "पागल कहीं का"..

सुबह का वक़्त था.. लावणी ठीक वैसे ही फुदक रही थी जैसे 3 दिन पहले साची कर रही थीं। चाल-ढाल और चेहरे की रंगत सब बदला हुए था। साची उसे देख कर थोड़ा हैरान हो गई और उसका हाथ पकड़ कर कमरे में लेे जाती हुई…

साची:- क्या हुआ है तुझे..

लावणी:- मुझे क्या होगा। ठीक तो हूं…

साची:- अच्छा ! और ये जो तू इतनी चहक रही है, गीत गुनगुना रही है उसका क्या…

लावणी, साची के कंधे को पकड़कर घूमती हुई कहने लगी… तो तुम भी मेरे साथ गाओ ना दीदी….

साची:- हट पहली, चल कॉलेज।

वो लावणी को पहली बार इतनी खुश देख रही थी लेकिन अगले ही पल जब ख्याल आया की कहीं ये उन दोनों भाइयों के चंगुल में तो नहीं फसी तब उसका दिमाग ठनक गया।

इधर रघुवंशी परिवार में सुबह का वक़्त था। सभी नॉर्मल ही तैयार हो रहे थे.. लेकिन जब तीनों खाने के टेबल पर इकट्ठा हुए तब कुंजल और अपस्यु डायनिंग टेबल पर ताल देते हुए गाने लगे… "तेरे दर पर सनम चले आये.. तू ना आया तो हम चले आये।"

अराव:- कोई सिंगिंग कॉम्पिटिशन है क्या.. दोनों बहुत बढ़िया गा रहे हो।

उधर से नंदनी टेबल पर प्लेट लगाती… "बेटा, गाने का मतलब भी बहुत शानदार है"…

अपस्यु और कुंजल दोनों एक साथ…. "बताओ .. बताओ… बताओ.. इस गाने का शानदार मतलब भी बताओ".…

नंदनी अपनी हंसी छिपाती हुई… वहीं अगर कोई तुम्हारे यहां ना अा पाए तो तुम उनके यहां पहुंच जाओ…

मतलब समझ में आते ही अराव ने जो गर्दन झुकाकर खाना शुरू किया, फिर वो घर के बाहर निकालने तक झुका ही रहा लेकिन ये दोनों भाई-बहन लगातार ताल देते हुए गाते रहे…. "तेरे दर पर सनम चले आये.. तू ना आया तो हम चले आये।"

अराव जल्दी खाना खत्म करके कॉलेज भगा। कुंजल भी कॉलेज के लिए निकली लेकिन उसे लंबोर्गिनी इतनी पसंद आ गई, की आज भी वो कॉलेज उसी कार से चली गई। अपस्यु थोड़ी देर नंदनी से बात करने के बाद, अपने पास पड़े सभी दस्तावेज नंदनी को सौंप दिया।

नंदनी उन पेपर्स को फिर से अपस्यु को सौंपकर सारे बॉन्ड्स को रुपए में बदलकर पैसा बैंक में जमा करवाने के लिए बोल दी। मां बेटे के बीच थोड़ी घरेलू बात-चित के बाद अपस्यु भी कॉलेज के लिए निकल गया। रास्ते में बस एक ही ख्याल अा रहा था… "देखते हैं आज का तेवर कैसा है"..

पहली क्लास समाप्त हो चुकी थी। अपस्यु और साची ने यूं तो आज एक कवि की भावना के ऊपर विश्लेषण सुना था लेकिन अपने अंदर की भावनाओ का दोनों विश्लेषण नहीं कर पा रहे थे। क्लास समाप्त होते ही आज अपस्यु ने भी साची का कोई पीछा नहीं किया और सीधा कैंटीन चला गया।

वहां कुंजल अपने किसी दोस्त के साथ बैठी थी लेकिन अराव वहां नहीं था।अपस्यु उनके बीच बैठते हुए… "ये अराव कहां है"..

कुंजल:- जिसके दर गया था, उसे लेकर दर-दर भटकने गया है।..

अपस्यु:- ओह ! और ये भाई साहब कौन है..

कुंजल:- मनोज उपाध्याय, मेरा अच्छा दोस्त और क्लासमेट।

अपस्यु:- हेल्लो मनोज…

मनोज उसे घूरते हुए…. "क्या तुमने मुझे सचमुच नहीं पहचाना, मैं वहीं हूं जिसने तुम्हे उस दिन रोका था, जब तुम कुंजल के साथ बदतमीजी कर रहे थे"..

कुंजल:- मनोज .. नहीं।

अपस्यु:- एक मिनट कुंजल.. इसे पूरा बोलने दे.... हां जी मनोज जी.. आगे..

मनोज:- आगे क्या, कुछ नहीं..

अपस्यु:- तुम्हारा वो ग्रुप ना दिख रहा है जो उस दिन खड़ा था…

मनोज:- वो सब अपने-अपने ज़िन्दगी में व्यस्त हैं।

अपस्यु:- मनोज अब मैं जो कहूंगा वो अपनी बहन को कहूंगा, इसलिए बात को तुम दिल पर मत लेना। कुंजल, बेटा ऐसे लोगों से दोस्ती करने से अच्छा है कि एक सांप पाल लो। केवल दोस्त कह देने से दोस्त हो जाते हैं क्या?

मनोज:- क्या मतलब है तुम्हारा..

अपस्यु:- सीईईईईईईईईई...…. चुप। पहले ही कहा ना अपनी बहन से बात कर रहा हूं।

कुंजल:- क्या हुआ सोनू, ये लड़का है इसलिए कोई परेशानी है क्या..

अपस्यु:- नही रे पागल… तू बस मेरी बात सुन। यही वो तेरे दोस्त है ना जिसके सामने से मैं तुम्हे ले गया और इसकी इतनी हिम्मत तक ना हुई कि बचाने कि कोशिश भी करे। हम 2 थे, ये 5 फिर भी सब तमाशा देखते रहे। पुलिस तक में किसी ने कंपलेंट नहीं की। मुझे बस इतना ही कहना था। बाकी तुझ पर छोड़ा।

कुंजल:- देखो मनोज हम क्लासमेट है और तुम शायद गलत टेबल पर बैठ गए हो। इसलिए प्लीज कहीं और चले जाओ। लव यू भाई..

अपस्यु:- लव यू टू सिस…

कुंजल:- बार बार दरवाजे पर क्यों देख रहे हो, बात ना बनी तो मैं बात करूं क्या तुम्हारे लिए।… लो 100 साल जिएगी.. अभी बात ही कर रहे थे कि सामने से चली भी अाई।

साची लावणी को ढूंढ़ती हुई अा रही थी। अाकर सीधा वो दोनो भाई-बहन के बीच बैठ गई…. "लावणी कहां है".. टेढ़े मुंह सवाल पूछती

कुंजल:- कौन लावणी..

ऐसा लग रहा था सास बहू के सीरियल वाला एक्सप्रेशन साची में घुस गया हो। कुंजल के सवाल पर वो ठीक वैसे ही गर्दन झटक कर कुंजल को देखी जैसे किसी सीन को इंटेंस बनाने के लिए सीरियल का कोई कैरेक्टर झटकता है, बस एक्शन रिप्ले की कमी रह गई।

साची:- मैंने पूछा लावणी कहां है।

अपस्यु:- हमे नहीं पता।

साची:- अराव कहां है।

कुंजल:- हमारे माथे पर क्या इंक्वायरी काउंटर लिखा है। मैं जा रही हूं भाई। … और कुंजल इतना कहकर साची को घूरती हुई वहां से चली गई।

यूं तो कैंटीन में लोगों की आवाज़ अा रही थी लेकिन साची और अपस्यु के बीच पूरी खामोशी। दोनों बस खामोश, चेहरे को अलग-अलग दिशा में घुमाए चुप चाप वहीं बैठे हुए थे।
 
Update:-32

यूं तो कैंटीन में लोगों की आवाज़ अा रही थी लेकिन साची और अपस्यु के बीच पूरी खामोशी थी। दोनों बस खामोश, चेहरे को अलग-अलग दिशा में घुमाए चुप चाप वहीं बैठे हुए थे।

सुबह जब अराव कॉलेज पहुंचा तभी उसने लावणी को संदेश भेज दिया था कि साची को छोड़कर पार्किंग के पीछे आओ, मैं इंतजार कर रहा हूं। लावणी भी जैसी ही अपने क्लास के लिए निकली वो क्लास में ना जाकर अराव के पास पहुंच गई।

"कल की अपनी हरकत पर तुम्हे कुछ कहना है।".. लावणी अपने लटों में उंगलियां घुमाती हुई पूछने लगी।

"आज तुम में कुछ बदला-बदला नजर अा रहा है। क्या तुम आज हल्का मेकअप करके अाई हो? रात के 2 बजे तक तो तुम्हारी लटें सीधी थी, ये सुबह-सुबह इतनी आकर्षक और कर्ली कैसे हो गए"… अराव ने लावणी को ध्यान से देखते हुए पूछा।

वो शायद कुछ कहने की स्तिथि में नहीं थी इसलिए भागने कि कोशिश करने लगी। अराव ने उसका हाथ पकड़कर खींच लिया। लावणी सीधी जाकर अराव के बाहों में गिरी। अराव उसे कमर से पकड़ कर खुद से चिपका लिया और चेहरे पर आए कुछ बालों को हटाते हुए पूछने लगा…. "तुमने जवाब नहीं दिया"

"दीदी कहती है तुमलोग मतलबी हो। धोका दोगे।"… लावणी अपनी पलकें नीचे करती बोली।

"कल को तुम्हारी दीदी का पैचअप हो गया अपस्यु के साथ तब क्या? तुम्हारी अपनी कोई राय नहीं बस दीदी ने जो विचार रख दिए उसे ही फॉलो करते रहो"

"छोड़ो ना अराव, मुझे डर लग रहा है। किसी ने देख लिया तो"….

अराव उसके होंठ पर अपनी उंगली लगाकर चुप करवा दिया और उसके चेहरे को ऊपर करके उसके आखों में आखें डालकर…. "शायद ये फीलिंग फिर कीसी के लिए नहीं हो, आई लव यू"

"तुम्हारी बातें मुझे अच्छी लगती है, तुम मुझे आकर्षित करते हो, लेकिन मैं अपने परिवार से बहुत प्यार करती हूं और उनकी मर्जी के खिलाफ कुछ नहीं कर सकती। यही वजह है कि मैं शुरू से तुमसे दूरियां बना कर रखी और शायद तुम जैसी गर्लफ्रेंड अपने लिए ढूंढ़ रहे हो मैं वैसी ना बन सकूं"

अराव उसे अपने बाहों में समेटते हुए…. "कुछ भविष्य कि चिंता वक़्त पर छोड़ते है, बस इस पल मुझे जवाब चाहिए"…

"तुम्हे अगर सवाल जवाब वाला वो फिल्मी लव चाहिए, तो शायद तुम्हे एक बार सोचना पड़ेगा। तुम्हे भी मेरी दिल की विवशता पता है इसलिए तो तुमने यहां मुझे खींचकर अपने बाहों में भर लिया और मैं कुछ विरोध तक नहीं कर पाई। फिर ये जवाब कैसा"

अराव, लावणी से अलग होकर उसका चेहरा देखने लगा। लावणी उसे देखकर मुस्कुराई और मुस्कुराती हुई कहने लगी… "मैंने अलग होने तो नहीं कहा, मुझे भी अच्छा लग रहा था"

उफ्फ ये खुशी के पल। जिस चंचलता का परिचय अभी लावणी ने दिया था उसकी तो उम्मीद भी अराव ने नहीं की थी। लेकिन जबसे उसके दिल का हाल पता चला था, वो बस उसके प्यारे से चेहरे को देख कर यहीं सोच रहा था.. "शायद इतने अरमान दबाकर तो में कभी मुस्कुरा भी ना पाऊं।" और लावणी अपने दिल का हाल बताकर आज पहली अपनी दिल की सुनी और अराव के बाहों में वो कुछ सुकून सा मेहसूस करती उसी में खो गई।

कुछ देर बाद लावणी, अराव से अलग हुई और कहने लगी.. "मुझे तुम्हे साथ अभी घूमने की चाहत हो रही है। फिर क्या था, दोनों वहां से सैर सपाटे पर निकल गए और इधर जब साची को 2 क्लास समाप्त होने के उपरांत भी लावणी नहीं मिली तो उसे ढूंढ़ती वो कैंटीन जा पहुंची।

अपस्यु और साची के बीच कुछ देर खामोशी यूं ही छाई रही और इस खामोशी को अपस्यु तोड़ते हुए… "2 कप कॉफ लाना मुकेश।"

"मुझे कॉफी नही पीनी"… साची गुस्से में बोलने लगी, लेकिन कुछ ही देर में मुकेश ने 2 कॉफी लाकर, एक कप साची और एक कप अपस्यु के पास रख दिया। साची वहां बैठ कर बस लावणी का ही इंतजार कर रही थी और रहा रह कार उसे यहीं ख्याल अा रहा था कि ना जाने इसका भाई क्या कर रहा होगा मेरी बहन के साथ। लावणी तो नहीं आई लेकिन कॉफी जरूर अा गया। गुस्से में वो कॉफी अपस्यु के मुंह के ऊपर फेक दी और कहने लगी… "अपनी कॉफी रखो अपने पास।"

अपस्यु ने जब रुमाल से अपना चेहरा साफ किया तो उसका पूरा चेहरा लाल हो चुका था और छाले पर गए थे। "कभी कभी दिल गलत जगह लग जाता है।"… इतना कह कर अपस्यु कैंटीन से बाहर निकाल आया। अभी ये सीन चल ही रहा होता है की कैंटीन के गेट पर अपस्यु के सामने एक लड़की अाकर खड़ी हो जाती है और उसके चेहरे को देखती हुई कहने लगी… "तुम्हे जल्द ही ट्रीटमेंट कि जरूरत है वरना मुंह पर जलने का निशान रह जाएगा"..

अपस्यु:- "हम्म ! मैं जा ही रहा हूं ट्रीटमेंट करवाने, बॉस ने केस डिटेल भेजी है क्या?'

लड़की:- "हां सर ने पूरी डिटेल भेज दी है और कहा है कि 4 दिन बाद केस कि सुनवाई है, इसलिए 2 दिन में यदि डिटेल मिल जाति तो अच्छा रहता"…

अपस्यु:- "ठीक है, मैं कोशिश करूंगा 2 दिन में सारे डिटेल कलेक्ट करके सिन्हा साहब को पहुंचा दू"

लड़की:-"ये लो सर ने भिजवाया है"

अपस्यु:- "लेकिन शशि ये काम तो उनके हेल्प के बदले हेल्प थी, फिर सर ने पैसे क्यों भिजवाए"

शशि- "25% मेहनताना है 75% सर ने हेल्प वाले कोटा में काट लिया"

अपस्यु:- "ठीक है। सर को थैंक्स कहना।"

शशि:-"अरे सुनो, सर ने एक और संदेश भिजवाया है। आज रात फैमिली डिनर होटेल ताज पैलेस में।"

अपस्यु:- "हम्मम ! ठीक है हमलोग अा जाएंगे।"..

एडवोकेट सिन्हा की पीए ने अपस्यु से सिन्हा सर के संदेश को देकर वहां से निकल गई। जब वो अपस्यु को रोककर उससे बातें कर रही थी, तब साची जिज्ञासावश पीछे रुक कर सारी बातें सुनने लगी। एडवोकेट सिन्हा को कौन नहीं जानता था इसलिए उसे समझने में देर ना लगी कि अपस्यु सिन्हा साहब के लिए काम करता है। और जब अपस्यु ने ₹1000-₹1000 के 10 बंडल गीन कर रखे तब साची को उसके पैसे के इनकम के बारे में भी समझ में अा गया। 1 केस के डिटेल निकालने के ₹40 लाख रुपया मेहनताना।

अपस्यु, शशि से अपनी बात समाप्त कर वहां से निकलने लगा। साची का मन हुआ कि वो अपस्यु को रोक ले। लेकिन जितना वक़्त वो सोचने में निकाल दी, उतने वक़्त में तो अपस्यु उसके नजरों से ओझल हो गया। कैंटीन से लौटकर वो सीधा घर अा गया।

नंदनी जब उसका चेहरा देखी तो घबराकर वो बेचैन हो गई।…. "बेटा, क्या हुआ.. सोनू.. सोनू"

अपस्यु:- पूरी बात बताता हूं मां, लेकिन पहले इसका इलाज तो कर ले वरना तेरा बेटा का चेहरा परमानेंट जला हुआ दिखेगा।

नंदनी:- हां चलो डॉक्टर के पास चलते है।

"आप ही तो मेरी डॉक्टर हो, अब घबराना बंद करो और 2 मिनट के लिए आप यहां बैठो"… इतना कहकर, अपस्यु हॉल के उस हिस्से में गया जिसे कबाड़खाना कहा जाता था। हालांकि वो अब पूरा व्यवस्थित हो चुका था और उसे प्लाईबोर्ड से पूरा पार्टीशन करके अति सुंदर तरीके से घेर दिया गया था।

अपस्यु कुछ दुर्लभ जरीबुटी अंदर से निकाल लाया, जो गुरुजी अक्सर वहां के छात्रों के इलाज में इस्तमाल करते थे। अपस्यु ने उन जड़बुटी को हल्दी के साथ पीस कर घोल बनाए और लाकर नंदनी के हाथ में दे दिया।.. "लो मां इसे मेरे चेहरे पर लगा दो।"

"सोनू तू मुझे डरा रहा है। तू जानता है ना क्या इस्तमाल कर रहा है"… नंदनी परेशान होती पूछने लगी। लेकिन अपस्यु ने नंदनी को आश्वाशन दिया और जाकर गोद में लेट गया। नंदनी उसके चेहरे पर बड़ी सौम्यता से उस लेप को लगती हुई कहने लगी… "तुझ जैसे लोगों के लिए ही वो कहावत बनी है, नीम हकीम खतरे जान"….. "आप बेकार में घबरा रही हैं मां। वैसे तो मुझे जड़ीबुटी में जरा भी दिलचस्पी नहीं थी लेकिन गुरुजी ने इसे जीवन का मूल आधार बोल-बोल कर भेजे में घुसा दिया।"

"तेरे गुरुजी के किस्से मैं तो किसी दिन पूरा सुनूंगी लेकिन पहले मुझे ये बताओ की ये सब हुआ कैसे और झूट बोलने की जरा भी कोशिश मत करना।" तबतक नंदनी अपस्यु के चेहरे पर वो लेप लगा चुकी थी और अब वो उसके बालों में तेल लगाकर उसके सिर की धीरे-धीरे मालिश कर रही थी।

अपस्यु के मुंह से झूट नहीं निकाल पाया और उसने सब सच-सच बता दिया। नंदनी उसकी पूरी बात ध्यान से सुनती रही, और पूरा सुनने के बाद मुस्कुराती हुई बस धीमे से इतना ही कही… "बचपन का प्यार औे नादानियां".. अपस्यु को कब नींद आ गई उस पता भी ना चला। नंदनी उसके सिर के नीचे सिरहाना रखकर उसके मासूम से चेहरे को सुकून में सोते हुए देखने लगी। देखते-देखते कब उसके आखों से आशु छलक आए उसे भी पता ना चला।

दोपहर के 3.30 बजे तक कुंजल और अराव भी घर पहुंचे। नंदनी ने दरवाजे पर ही दोनों को शोर मचाने से मना कर दिया। इधर नंदनी काम में लग गई और उधर कुंजल और अराव ने मिलकर अपस्यु को उठा दिया।

अपस्यु:- क्या है यार, कितनी अच्छी नींद में सोया हुआ था।

कुंजल:- भाई तुम इस टैटू को परमानेंट करवा लो, बहुत मस्त दिख रहे हो। बिल्कुल उस सॉ मूवी के विलेन कि तरह।

अराव:- ना ना, अपस्यु को वो जोकर वाला लूक ज्यादा शूट करेगा। बैटमैन वाला।

अपस्यु:- बहुत ही गंदा जोक था जरा भी हसी नहीं आई। वैसे आज तू लावणी के साथ किधर रफूचक्कर हो गया था।

कुंजल:- कंग्रॅजुलेशन तो कह दो…

अपस्यु:- क्या बात कर रहे हो। सच में लड़के.. ये मैं क्या सुन रहा हूं?

अराव, थोड़ा शर्माते हुए… "हां सच सुना"…

अपस्यु और कुंजल एक साथ….. उफ्फ ये शर्माना…

कुंजल:- मुझे आज पार्टी चाहिए.. पब चलेंगे।

अराव:- भाई के साथ पब जाकर क्या करेगी।

अपस्यु:- सही कहा अराव ने।

कुंजल:- दोनों बात को घुमाओ मत। आज मुझे पब जाना है। एक सेलिब्रेशन तो बनती है।

अपस्यु:- हम्मम ! ठीक है मैं कुछ जुगाड करता हूं लेकिन एक शर्त है।

कुंजल:- क्या ?

अपस्यु:- यहीं की पब पहुंचने से पहले तक मैं बॉस हूं। उसके बाद फिर सब नॉर्मल।

कुंजल:- मुझे मंजूर है।

अराव:- मुझे नही.. पहले पूरी बात बताओ…

कुंजल:- कुछ ही देर की तो बात है और वैसे भी यही तो हमारा बॉस भी है।

अराव:- तुम समझ नहीं रही पागल।

कुंजल:- मुझे कुछ नहीं समझना, भाई हम दोनों राजी हैं।

अपस्यु:- तू काहे नहीं कुछ बोल रहा।

अराव:- पागल हो गई है ये.. हां ठीक है मैं भी तैयार हूं…

अपस्यु हड़बड़ा कर उठा और कहने लगा…. "बैग पैक करके रेडी कर" ..

"आज काम पर"…. अराव बोल ही रहा था कि अपस्यु ने उसे चुप कराया… "बॉस.. ने जो बोला, बस करो और हां आधे घंटे में हमलोग निकलेंगे"… अपस्यु की बात सुनकर अराव चुपचाप वहां से निकल गया। कुंजल भी तैयार होने चली गई। इधर अपस्यु नंदनी के पास पहुंचा..

"मां चलो तैयार हो जाओ, मेरे दोस्त के भय्या की शादी है वहीं चलना है"….अपस्यु नंदनी के हाथ से किताब लेकर नीचे रखते हुए कहने लगा.. लेकिन नंदनी ये कहते हुए बात को टाल गई… की वो उसके दोस्त की शादी में जाकर क्या करेगी। कोई पहचान वाला भी तो होना चाहिए तुम तीनो चले जाओ।…. अपस्यु का काम बन गया। बस थोड़ी सी जिद और किया, और सीधा चला आया अपने कमरे में।

वाशरूम जाकर उसने सबसे पहले अपना मुंह धोया। मुंह धो कर उसने अपना चेहरा बड़े गौर से आइने में देखा। चेहरे पर माध्यम लाल निशान अब भी थे। इस निशान को देखकर अपस्यु खुश हुआ और फिर जल्द ही अराव और कुंजल को लेकर वो सीधा पहुंच गया अपने तीसरे फ्लैट।
 
Update:-33(A)

वाशरूम जाकर उसने सबसे पहले अपना मुंह धोया। मुंह धो कर उसने अपना चेहरा बड़े गौर से आइने में देखा। चेहरे पर माध्यम लाल निशान अब भी थे। इस निशान को देखकर अपस्यु खुश हुआ और फिर जल्द ही अरा और कुंजल को लेकर वो सीधा पहुंच गया अपने तीसरे फ्लैट।

आरव:- अपस्यु मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि तुझे हुआ क्या है? कुंजन को साथ ले आया। व्हाट थे फॅक !!!

कुंजन:- भाई ये मोनू इतना रिएक्ट क्यों कर रहा है?

अपस्यु:- कुंजल, 5 मिनट हमे सुनो, कोई सवाल दिमाग में आए भी तो बस मन में रखना, ठीक…

कुंजल ने "हां" में अपना जवाब दिया… आरव फिर से पूछने लगा.... "तेरे दिमाग में चल क्या रहा है।"

अपस्यु, केस फाइल और वो 10 लाख वाला ब्रीफकेस खोलकर दिखाने लगा…. "2 हफ्ते पहले बात हुई थी सिन्हा जी से। ये है पूरा केस। "आर डी एंटरप्राइज" और "मेघा ग्रुप" के बीच 60 करोड़ एक प्रोजेक्ट कि पार्टनरशिप हुई थी 50-50 की। लेकिन एग्रीमेंट के पेपर में एक छोटा सा लूप था। "आर डी" वालों के लीगल सलाहकारों से चूक हो गई और अब उसका प्रॉफिट तो दूर की बात है, बेचारे का मूलधन भी बेईमानी होने के कगार पर है।

आरव:- हमे क्या करना है..

अपस्यु:- या तो 2000 के ब्लैंक स्टाम्प पेपर पर सिग्नेचर लेना है..

आरव:- ये तो संभव नहीं..

अपस्यु:- हां.. दूसरा ये की वो एग्रीमेंट के असली पेपर उड़ाने है।

आरव:- इस से उनका क्या फायदा होगा।

अपस्यु:- लॉ का मामला है अब इसपर मै क्या कहूं।

आरव:- कोई तीसरा ऑप्शन ना दिया।

अपस्यु:- दिया है ना.. उसकी बेटी से शादी करके जमाई बन जाऊं, और पेपर लाकर सिन्हा जी के हाथ में दे दू।

कुंजल:- ये सही ऑप्शन है।

"फिर उस बेचारी साची का क्या होगा"…... अराव अपनी बात कहते हुए अपना हाथ कुंजल के ओर बढ़ा दिया, कुंजल भी ताली देती हुई हसने लगी।

अपस्यु:- इधर .. इधर.. इधर ध्यान दो..

आरव:- ध्यान क्या देना है। भाई वो असल एग्रीमेंट के पेपर तू अभी प्लान करके 5 घंटे में उड़ा लेगा। कोई फिल्म चल रही है क्या? आज के आज ये काम कर पाना संभव नहीं।

अपस्यु:- तू सही कह रहा है, लेकिन मैं बिना होमवर्क के आऊंगा क्या?

आरव:- तेरी सारी बातें ठीक है.. लेकिन कुंजल को साथ लाना। मतलब मै इस बात पर कैसे रिएक्ट करूं मुझे कुछ समझ में नहीं अा रहा।

अपस्यु:- इसमें समझने जैसा क्या है हां। जरा गौर से देख इसके चेहरे को, कभी नोटिस किया है इसके हाउ-भाव… नहीं ना… तो पहले गौर से देख..

आरव:- इसमें नोटिस करने जैसा क्या है। बढ़िया मस्त लग रही है। हां थोड़ा झल्ली कि तरह है पर कुछ मेकअप और थोड़ा सा ये टॉमबॉय वाला लूक बदल ले तो लड़कों कि लाइन लग जाएगी…

अपस्यु:- और इसके काॅकेन के लत का क्या?

"क्या" चौंक देने वाला सच था, जब सामने आया तो दोनों हैरान थे… आरव ये सोचकर कि ये लड़की किस दलदल में घुस रही है और कुंजल इस बात से कि भाई को कैसे पता चला।

"किसी को हैरान होने ही जरुरत नहीं है, और तू ही तो कहता है ना आरव ये भाई नहीं मेरा बाप है… तो हां जिम्मेदारियों के मामले मैं तुम सब का बाप हूं और मुझे तुमलोग की खबर नहीं होगी तो किसे होगी"… अपस्यु ने बड़ी संजीदगी से अपनी बात रखी।

आरव क्या प्रतिक्रिया दे उसे कुछ समझ में ही नहीं अा रहा था। उसे बस अपने अंदर ये मेहसूस हो रहा था कि अंधेरे कुएं के अंदर है कुंजल, जहां से केवल उसकी आवाज़ ही अा रही लेकिन वो कहीं नजर नहीं आ रही। इधर कुंजल अचानक ही फुट फुट कर रोने लगी। उसे रोता देख दोनों भाई उसके पास पहुंच गए और उसे सांत्वना देते चुप करवाने लगे। .. "कुछ नहीं हुआ, अभी हम लोग हैं ना, सब देख लेंगे। रोते नहीं, चुप हो जा.. शांत.. कुछ नहीं हुआ"… कुछ देर बाद कुंजल खुद ही शांत हुई। उसके चेहरे पर मायूसी की शिकन थी और बातों में 0 दर्द….

"कुछ वक़्त की मार और कुछ नादानियां..

हमे कहां से कहां पहुंचा देती है…. "



"जानते हो भाई, पहले लगता था ये परिवार, घर सब बेईमानी होते है। रिश्ते-नाते सब एक दिखावा है, यहां किसी को किसी की चिंता नहीं। फिर तुम दोनों से मिली। दिल के अरमान को जैसे पंख लग गए। कुछ ही घंटे तो हुए थे और तुम दोनों का वो प्यार भी दिखा, जब एक ही दिन में हमारे लिए करोड़ों यूं बिछा दिए जैसे इनका कोई मोल नहीं।… मैं उसी शॉपिंग कॉम्प्लेक्स के वाशरूम में ना जाने कितनी देर रोई।"

"इतनी महंगी अपनी सपोर्ट कार ऐसे दे दी, जैसे कोई साइकिल किसी को दे रहा हो.. मैं बिलख बिलख कर रोई। पहली बार ऐसा लग रहा था प्यार हो तो पैसे की कोई जरूरत नहीं।"

"मां अक्सर कहती थी, एक दिन जब तुम्हारे भाई तुमसे मिलेंगे तब तुम कहोगी की नहीं हमारे परिवार के लोग संगठित है। मैं उन्हें चिढ़कर जवाब देती… वैसे ही भाई ना, जिसने पैसे के लिए अपने भाई के साथ बेईमानी कर लिया। और फिर उस भाई की सच्चाई भी पता चली। खुद जो भी किया हो लेकिन उसके भाई पर कोई आंच ना आए इसलिए उसे धोका दिया, लेकिन उसके लिए वो सब करके गया जो उसका था.. और मैं पागल बिना सच्चाई जाने क्या क्या सोचती रही….

"मैं तो बस तुम दोनों के साथ यही सोचकर आने को राजी हुई थी कि यहां का सबकुछ समेट कर मैं मां के साथ कहीं दूर चली जाऊंगी। बस 2 घंटो में मुझे रोना परा और एक दिन बीतने के बाद पता चला कि यहां तो सबकुछ मेरा है और मैं अपने ही घर में चोरी के इरादे से अाई हूं। .. दिल किया वहीं छत से कूद जाऊं, लेकिन उसके लिए भी हिम्मत नहीं जुटा पाई क्योंकि तुम सबका मोह अा गया….. पता नहीं कि कब मेरी गंदी सोच ने मुझे इस नशे का आदि बना दिया और इस नशे को पालने के लिए मैंने इसे बेचकर ना जाने कितने को नशे का आदी बना दिया।"

गमगीन माहौल था.. तीनों की आखें भर अाई थी। अपस्यु और आरव ने कुछ पल यूं ही आशुओं के साथ बिताए फिर अपस्यु ने सबको शांत किया और कुंजल से एक-एक बात कि जानकारी लेने लगा… उसकी बात जब समाप्त हुई तब दोनों भाई के पास अब एक और काम अा चुका था.. अपनी बहन को उस ड्रग्स रैकेट से निकालना।

क्योंकि कुंजल जिसके लिए काम कर रही है उसका केवल इतना ही कहना था.. स्मार्ट सेलर को वो किसी कीमत पर छोड़ नहीं सकते। जितनी ड्रग्स उसे इस्तमाल करनी है करे लेकिन उसका काम यदि बंद किया तो बर्बाद करके मार डालेंगे….

अपस्यु:- अराव आज रात का काम निपटाने के बाद कल से फ़िरदौस पर काम शुरू करना है।

अराव:- तो क्या कुंजल को तुमने शामिल करने का सोच लिया है।

कुंजल:- अपने घर का काम है, मैं क्यों नहीं शामिल हो सकती।

अपस्यु:- हां बहुत सोच कर ही ये फैसला लिया है आरव। दर्द कि अभी कहानी ख़त्म कहां हुई है, इसके नफरत और सीने की जलन को भी तो एक वजह देनी होगी वरना ये भी कहीं घुट ना जाए।

कुंजल:- कौन सी नफरत, सारे गीले-सिकवे तो दूर हो गए हैं। सच्ची अब अंदर कोई भी नफरत नहीं बची।

अपस्यु:- और उस जलन का क्या जो तुझे उस रात रुला रही थी। "मेरे पापा को जिसने मारा"….. मैं नहीं चाहता कि तू इस गम में बिखर जाए, और फिर से कुछ गलत करने लगे।

अराव:- ठीक है समझ गया, आज से वो सामिल हुई। अब आज के काम पर ध्यान दे क्या?

"मैंने पता किया है। मेघा ग्रुप वाले का मालिक है जगदीश राय। दिखाने के लिए कॉन्ट्रैक्टर है लेकिन मुख्य धंधा बेटिंग का है।"… अपस्यु इतना बोल ही रहा था कि कुंजल बीच में बोलने लगी… "हां मै जानती हूं इसे। पुरानी दिल्ली में ये अंडरग्राउंड फाइटिंग करवाता है"..

अपस्यु, कुंजल को घूरने लगा और आरव उसे शांत रहने का इशारा किया…. "इसी का पाता लगाते - लगाते तो तुम्हारे बारे में पता चला कुंजल, अब ध्यान से सुनो। जगदीश राय अपने सारे डॉक्यूमेंट उसी अंडरग्राऊंड फाइट वाली लोकेशन पर रखता है। उसने वहीं फर्स्ट फ्लोर पर अपना एक केबिन बना रखा है और वहीं के सेफ में पड़ा है वो एग्रीमेंट।

अराव:- साला ये जगदीश तो फस गया…. स्मोक एंड डाउन ही होगा ना…

अपस्यु:- हां… वहीं करेंगे… कुंजल तेरे साथ रहेगी और वो तुम्हारी जमीदारी है।

शाम के तकरीबन 7 बजे अराव और कुंजल बीएमडब्लू से पुराने दिल्ली के ओर निकले। लोकेशन से कुछ दूर पीछे आरव ने अपनी कार लगाई और वहां से दोनों भाई बहन अपना-अपना बैग लेकर दूसरे कार में बैठ गए। कार में ही दोनों ने, खुद को ऊपर से लेकर नीचे तक मास्क किया, आखें ही भर दिख रही थी बाकी पूरा बदन ढाका था। ऐसा लग रहा था जैसे कोई "निंजा एसाशियन" अपने मिशन पर निकले हो।

दोनों उसी कार में बैठकर अपस्यु के कॉल का इंतजार कर रहे थे। लगभग 8.30 बजे अपस्यु का कॉल भी अा गया…. "मैं पिछली गली के बाहर हूं, और बिजली का पूरा कनेक्शन मेरे सामने है… कुंजल जानती है उनका पॉवर बैकअप स्टेशन.. तुम वहां का काम निपटाकर तुरंत कॉल करो।"

"एक्शन टाइम सीस, डर तो ना लग रहा।"…. "थोड़ा थोड़ा लग रहा है। ये सब पहली बार है ना ऊपर से तुम दोनों ने ऐसे प्लान वहां बताया की सब ऊपर से गया"..
 
Update:-33(B)

आरव:- कोई बात नहीं। तुम्हे बिल्कुल भी डरने कि जरूरत नहीं है। तुम बस बैकअप पॉवर स्टेशन कहां है वो मुझे बताकर गाड़ी में इंतजार करना। जब मैं कहूं "हो गया" तब तुम्हे सिर्फ इतना करना है कि कार को रेवर्स करके लेे आना और गली के बीचों-बीच लगा देना ताकि रास्ता ब्लॉक हो जाए।

कुंजल:- बस इतना ही..

अराव:- हां बस इतना ही.. और हां कार के अंदर ही बैठी रहना क्योंकि ये बुलेट प्रूफ है। कुछ भी हो जाए बाहर मत निकालना।

कुंजल को सारी बातें समझाते-समझाते, दोनों गली के दूसरे मोड़ पर पहुंच गए। आरव अपना बैग उठाया, और चल दिया बैकअप पॉवर स्टेशन के पास। वहां बस एक छोटी सी बाधा थी जिसे आरव क्लियर करते हुए अपस्यु से कहा… रेडी.. फिर 3, 2, 1,… इधर अपस्यु ने ट्रांसफार्मर में शॉर्ट शिर्कट किया उधर अराव ने बैकअप पॉवर स्टेशन कि बैंड बजा दिया।

अराव के इशारे पर कुंजल अपना काम करके बस इंतजार करने लगी। इधर अपस्यु भी गली के दूसरे मोड़ को वहीं की एक कार से ब्लॉक करके, उसमें धमाका किया। दोनों भाई ने चेहरे पर मस्क लगाया और बाहर चारो ओर धुआं ही धुआं।

सब प्लान के मुताबिक हो रहा था। पॉवर कट और उसके 2 मिनट में ही बाहर का रास्ता ब्लॉक करके चारो ओर धुआं करना।.. अब दोनों भाई दरवाजे पर बैठकर उसके खुलने का इंतजार करने लगे।

जैसा कि उन्हें पता था, कुछ लोग पॉवर सप्लाई चेक करने बाहर अा रहे होंगे.. जैसे ही दरवाजा खुला… दोनों भाई स्मोक बॉम्ब लेे कर तैयार थे। जब उन्होंने दरवाजा खोला तो बाहर पूरा अंधेरा कोहरा जैसा लगा, जिसमें उनकी टॉर्च और फ़्लैश लाइट कोई काम कि नहीं थी।

खतरे का अंदाजा होते ही वो लोग दरवाजा बंद करने लगे लेकिन धुएं और अंधेरे की आड़ में दोनों भाई अंदर घुस चुके थे और जिन-जिन के हाथो की टॉर्च लाइट जल रही थी। सबको अंधेरे में "वन लास्ट शॉट" पड़ रहे थे। बिल्कुल साधा हुआ निशाने के साथ, कान के ठीक नीचे एक जोरदार प्रहार और बस एक चींख निकल कर आवाज़ दब जाती।

दोनों भाई एक-एक कदम बढ़ रहे थे और एक-एक स्मोक बॉम्ब डालते आगे बढ़ रहे थे। टॉर्च जला कर लोग देखने कि कोशिश तो कर रहे थे लेकिन एक इंच आगे देखने में भी परेशानी हो रही थी, गोली किसपर चलाते। और बस चंद सेकेंड का ही मोहलत होता, उसके बाद तो धुएं कि चपेट में आने वाले बेहोश होकर गिर रहे थे।

काम जैसा सोचा ठीक वैसा ही हुआ और दोनों भाई वहां से एग्रीमेंट की फाइल उड़ाने में कामयाब हो गए। एग्रीमेंट के पेपर हाथ में आते ही अराव ने अपस्यु को वहां से निकलने के लिए खिंचा। लेकिन एग्रीमेंट ढूंढ़ने के चक्कर में अपस्यु के हाथ एक कमाल कि डायरी लग गई। अपस्यु कुछ देर रुकने का संकेत दिया और उस डायरी के सारे पन्नों को अपने मोबाइल के कमरे में पैक कर लिया।

काम होते ही निकालने का इशारा मिला। इस्तमाल हुई गाडियां अलग अलग मेट्रो स्टेशन के पार्किंग में लगाकर आरव और अपस्यु मेट्रो से होटल ताज पैलेस के पास पहुंचे वही कुंजल बीएमडब्लू को लेकर होटल ताज पैलेस पहुंच गई।

तीनों ताज के बाहर मिले और वहीं से फिर अंदर सिन्हा जी के फैमिली डिनर पार्टी पर चले गए। एक पूरा हॉल एरिया ही बुक था जहां कुछ और गेस्ट भी थे। अपस्यु को देखकर सिन्हा जी अपने एक गेस्ट को छोड़कर उससे मिलने चले गए।

सिन्हा:- कातिल दिखने लगे हो तुम तो। यहां की लड़कियों का आकर्षण तुम ही हो। अपस्यु:- अरे अरे अरे… सर जी हुआ क्या है…

"हेल्लो हैंडसम, कहां रहते हो आजकल, कोई मुलाकात ही नहीं। डैड बता रहे थे कि तुम दिल्ली शिफ्ट हो गए"… पीछे से सिन्हा जी की बेटी "ऐमी" अपनी बात कहती वहीं खड़ी हो गई।

अपस्यु और सिन्हा जी के बीच कुछ नजरों का इशारा हुआ और अपस्यु, आरव की ओर देखने लगा…. "तुम दोनों बातें करो मैं आया".. और इतना कहकर सिन्हा जी आरव और कुंजल के पास पहुंच गए।.. इधर अपस्यु, ऐमी को हां में जवाब देकर इधर- उधर देखने लगा..

ऐमी:- दिल्ली आए फिर भी कोई मुलाकात नहीं।

अपस्यु:- थोड़ा व्यस्त चल रहा था ऐमी इसलिए नहीं मिल पाया। अब तो यहीं हूं मुलाकात होते रहेगी। वैसे मैंने सुना था तुम यूएस जा रही थी वो क्या करने..

ऐमी:- बैचलर इन म्यूजिक

अपस्यु:- हां वही।

ऐमी:- नहीं जा सकी यार। डैड ने कहा म्यूजिक ही सीखना है तो यहीं सीख लो। यूएस घूमने के लिए तुम्हे वहां पढ़ने कि क्या जरूरत है.. जाओ जितने दिन तक मन हो घूम आओ..

अपस्यु:- गई थी फिर घूमने..

ऐमी:- येस.. 2 महीने का यूरोप टूर और 1 मंथ का यूएस.. लास वेगास क्या जगह है यार.. मज़ा आ गया।

अपस्यु:- तो पापा को बोलकर वहीं सैटल हो जाना था ना।

ऐमी:- नाइट लाइफ ही बढ़िया है। डे लाइफ तो बोरिंग है यार। वहां की लाइफ में वो थ्रिल और एडवेंचर नहीं जो यहां की लाइफ में है। हां घूमने के लिए मस्त जगह है पर रहने के लिए… अपने इंडिया से बेस्ट कोई जगह नहीं।

"क्या बातें हो रही है तुम दोनों में"… सिन्हा जी काम निपटाकर उनके बीच पहुंचे..

ऐमी:- कुछ नहीं डैड वो वर्ल्ड टूर वाली बातें चल रही थी...

अपस्यु:- ठीक है ऐमी, सर, अब मैं चलता हूं।

ऐमी:- डैड ये अपस्यु कितना बदल गया है ना.. पहले पार्टी खत्म होने तक रुकता था.. आज आया और जा रहा है।

सिन्हा जी:- कोई काम होगा बेटा, इसलिए जा रहा है।

अपस्यु ने फिर ज्यादा बातें नहीं बनाया और वहां से दोनों को अलविदा कहकर तीनों भाई बहन निकल गए। तीनों अपने कार में सवार होकर तेज म्यूजिक बजाया और कार अपनी रफ्तार से निकाल पड़ी "किट्टी सु" पब।

पब के अंदर पहुंचते ही तीनों बार काउंटर पर पहुंचे.. सब कुछ भूल कर मस्ती में 4 टकीला शॉट लगाया और डीजे की धुन पर थिरकने लगे। अपस्यु थोड़ी देर नाचने के बाद बार काउंटर पर बैठ गया और कॉकटेल का आंनद लेते दोनों को मस्ती में नाचते हुए देखने लगा। उन्हें नाचते देख अपस्यु मुस्कुरा भी रहा था और कॉकटेल का मज़ा भी लेे रहा था।

तीनों ने वहां खूब मस्ती की, पार्टी रात के 11:30 बजे तक चली उसके बाद तीनों वापस से फ्लैट पहुंचे। आरव और कुंजल कुछ ज्यादा ही पी लिए थे इसलिए वो दोनो आते ही सो गए और अपस्यु खिड़की के बाहर झांक कर सहर की रौशनी को देख रहा था।

"छपाक- छपाक"… श्वंस अंदर ही अटकी राह गई और आरव और कुंजल चौकते हुए उठकर बैठ गए।

"पास में नींबू पानी रखा है, पियो और जल्दी से रेडी हो जाओ"… अपस्यु ने दोनों को जगाते हुए कहा। आधे घंटे बाद दोनों तैयार होकर आए तब तक दोनों का नाश्ता भी लग चुका था। ..

अपस्यु:- मैंने कल रात सोच लिया..

अराव:- क्या सोच लिया..

अपस्यु:- कुंजल रिहैब सेंटर जाएगी।

कुंजल:- भाई नहीं.. प्लीज.. देखो कल रात मैंने कहां कुछ भी लिया।

अपस्यु:- एक बार का नशेड़ी हमेशा का नशेड़ी

कुंजल:- जी नहीं … मैं एडिक्ट नहीं हूं।

आरव:- प्रूफ करो।

कुंजल:- कैसे प्रूफ करना होगा।

अपस्यु:- 15 दिन रोज सुबह ब्लड टेस्ट…

कुंजल:- ठीक है मुझे मंजूर है।

"चलो फिर बैग पैक करो। और हां मां को आज मैं चिल्ड्रंस केयर घुमाने ले जा रहा हूं, तो जबतक हम लौटे, कुंजल को सभी बुनियादी बातें बताकर ट्रेनिंग का आइडिया दे देना। कल सुबह से इसकी ट्रेनिंग शुरू होगी।"… अपस्यु अपना बैग पैक करते हुए बोला।

सुबह के तकरीबन 11 बज रहे थे। नंदनी और अपस्यु दोनों सुनंदा चिल्ड्रंस केयर पहुंचे। जैसे ही अपस्यु वहां के कैंपस में पहुंचा सभी दौड़े चले आए।.... अपस्यु उनके साथ थोड़ी देर तक बात किया फिर नंदनी को लेकर वहां की सारी व्यवस्था दिखाने लगा। वहां रहने वाले सभी बच्चे नंदनी को अपना-अपना कमरा दिखाने लगे। वहां उनका रहन-सहन देखकर नंदनी काफी खुश हुई।

सबके कमरे घूमने के बाद अपस्यु जैसे ही गैलरी में आया.. सामने से वैभव दौड़ता हुआ आया और अाकर सीधा नीचे बैठ गया। उसे देखते ही अपस्यु मुस्कुराने लगा और खुद तो बैठा ही साथ में नंदनी को भी बैठने का इशारा किया..

वैभव:- भैय्या… (थोड़ा सांस लिया)… भैय्या… (फिर सांस लिया)

अपस्यु:- रुक जा बाबा.. पहले पूरा सांस लेले फिर बोल…

"इक मिनट".. बोलकर वैभव अपने सीने पर हाथ रखकर अपनी सासें सामान्य करते हुए… "भैय्या यहां मन नहीं लगता है। बस स्कूल से कैंपस और कैंपस से स्कूल होता रहता है। यहां तो कहीं बाहर भी नहीं जा सकते और तो और इतना बड़ा ग्राउंड भी नहीं है कि खेल सकते है।"

अपस्यु:- बाप रे इतनी ज्यादा प्रॉबलम।

वैभव:- और नहीं तो क्या? अगर ऐसा ही चलता रहा तो हम तो खेलना ही भूल जाएंगे।

अपस्यु:- आप इनसे मिले.. ये देखिए मेरी मां अाई हैं।

विभव:- मां .. वो जो आप ने उस दिन फिल्म में दिखाया था वैसा ही ना।

नंदनी:- इधर अा जाओ… मै यहां नहीं थी ना इसलिए आपने फिल्मों में ही मां को देखा है। अब मै अा गई हूं ना तो आप को मां कहीं और ढूंढनी नहीं पड़ेगी।

वैभव:- सच्ची में…

नंदनी:- हां बिल्कुल सच्ची।

वैभव ने नंदनी के गालों पर किस किया और वो फिर से भाग गया खेलने के लिए। नंदनी, वैभव को सुनकर काफी खुश हुई फिर वहां से दोनों आफिस में पहुंचे… वहां के सारे स्टाफ और सुपरवाइजर से मिलने के बाद दोनों शाम के 6 बजे तक लौट आए।

नंदनी बहुत खुश नजर आ रही थी। वो अपने सभी बच्चों के साथ बैठकर चिल्ड्रंस केयर का अपना अनुभव साझा करने लगी। अपस्यु और आरव भी वहां के कुछ खट्टे-मीठे यादें साझा करने लगे। रविवार का खुशहाल परिवारिक माहौल चलता रहा और सब बैठकर एक दूसरे की खिचाई और बातचीत में मशगूल थे।

परिवार के साथ वक़्त कैसे बीता पता भी नहीं चला। बात करते-करते शाम गुजर गई और बात करते-करते सभी सो भी गए, किंतु अपस्यु अब भी जाग रहा था। अपनी सोच में डूबा वो देर रात 2 बजे बालकनी से फिर से वो झरोखा एक बार देखा… उसके चेहरे पर एक संतोषजनक मुस्कान थी और चंद दिल के अल्फ़ाज़…

रूप आकर्षण में जो मोह गया मन

सो प्रेम परिभाषित कहां से होय ।

हृदय संग जो प्रीत का मेल भय


फिर रूप मोह रहा ना कोय ।।

(जो किसी के रूप को देख कर आकर्षित हो जाए, उसे सच्चे प्रेम की कल्पना नहीं करनी चाहिए। और जहां दिल से दिल मिल जाते हैं, फिर रूप रंग कोई मायने नहीं रखता)
 
Update:- 34

अपस्यु देर रात 2 बजे बालकनी से आखरी बार फिर वो झरोखा एक बार देखा… उसके चेहरे पर एक संतोषजनक मुस्कान थी और चंद दिल के अल्फ़ाज़…

रूप आकर्षण में जो मोह गया मन

सो प्रेम परिभाषित कहां से होय ।

हृदय संग जो प्रीत का मेल भय


फिर रूप मोह रहा ना कोय ।।

सुबह खामोश थी और अपस्यु के चेहरे पर खुशी की मुस्कान। लगभग 4 बजे अपस्यु ने आरव और कुंजल को उठाया। कुंजल नकीयाते उठी, आखें बंद और शरीर मारा हुआ। जबरदस्ती उठाने का नतीजा यह हुआ कि कुंजल कभी इस दीवार पर टिक कर सोती तो कभी उस दीवार पर। सुबह 4 से 6 के वर्कआउट में वो 12 बार सोई होगी। 8 बार पानी पी होगी और 5-6 बार बाथरूम गई।

इतनी मेहनत करनी होगी उसने कभी सोचा ना था। तीनों जल्दी से तैयार हो गए कॉलेज के लिए। आरव और कुंजल कार से निकले। अपस्यु भी पीछे से निकालने ही वाला था कि उसे नंदनी ने रोक लिया।

नंदनी उसे रोकती उसके चेहरे को गौर से देखने लगी…. "हल्का हल्का निशान अब भी है"… "कल तक ठीक हो जाएगा मां" .. और उनके गालों पे किस करता हुए कॉलेज को निकला।

साहित्य की पहली क्लास और अपस्यु के पसंदीदा कवि प्रेमचंद जी की चर्चा चल रही थी। अपस्यु उसकी एक कविता में खोता चला गया। तभी उसके इस प्यारे से विषय में खलल डालती साची ने एक छोटा सा नोट लिख कर बढ़ा दिया… "तुमसे बात करनी है"… अपस्यु ने उस पत्री को एक नजर देखा और फिर जवाब में लिख दिया… "ठीक है क्लास के बाद".. इतना लिख, फिर से अपस्यु कवि की उस कल्पना में डूब गया जिसका वर्णन इस वक़्त प्रोफेसर कर रही थी।

अपस्यु बहुत ही प्रभावित हुआ अपने प्रोफेसर से और जैसे ही क्लास समाप्त हुई वो भागकर उनके पास पहुंचा…. "नमस्ते गुरुवी, मैं अपस्यु हूं"

प्रोफेसर:- तुम वहीं नटखट बालक हो ना जो मेरी कक्षा में दूसरा या तीसरा दिन उपस्थित है?

अपस्यु:- क्षमा कीजिए गुरूवी। लेकिन साहित्य के ऊपर आप को सुनने के बाद अब मुझे अफसोस हो रहा है कि मैं आप की कक्षा कैसे छोड़ सकता हूं।

प्रोफेसर:- मुझे रिझाने कि कोशिश की जा रही है क्यों..

अपस्यु:- नहीं मैंने सरल तरीके से अपनी बात रखी है।

प्रोफेसर:- अच्छा है। कक्षा में अब से उपस्थित रहना।

अपस्यु:- जी गुरूवी। अब आज्ञा चाहूंगा।..

प्रभावित हुए प्रोफेसर से बात करने के बाद अपस्यु, साची से मिलने कैंटीन के ओर चला जा रहा था, तभी रास्ते में ही साची उसे रोकती हुई कहने लगी… "कैंटीन में बहुत भीड़ है, कहीं और चलते है।"

अपस्यु मुस्कुराते हुए प्रतिक्रिया दिया और प्यार से पूछा… "तो कहां चलना है।".... साची बिना कोई भाव प्रकट किए हुए उसे कॉलेज के बाहर उसी कैंटीन में चलने के लिए बोली जहां ये दोनों पहली मुलाकात में रुके थे।

अपस्यु और साची दोनों आमने-सामने बैठे थे। साची का चेहरा जहां कोई भाव व्यक्त नहीं कर रहा था वहीं अपस्यु का हंसमुख चेहरा था… कुछ देर के खमशी के बाद… "तो…"

अपस्यु:- जी मै समझा नहीं।

साची:- तुम्हे कुछ नहीं कहना।

अपस्यु:- मुझे किस विषय में क्या कहना था साची।

साची:- वही जो तुमने किया।

अपस्यु:- मुझे याद नहीं अा रहा मैंने क्या किया? जरा प्रकाश तो डाल दीजिए विषय पर।

साची:- वहीं मुझसे झूट क्यों बोला?

अपस्यु:- मुझे नहीं लगता कि मैंने कोई झूट तुमसे कहा होगा। क्योंकि झूट कहने की कोई तो वजह चाहिए। लेकिन यदि तुम्हे ऐसा लगता है कि मैंने कोई झूट बोला है तो अभी बताओ।

साची:- झूठ नहीं कहा कि तुम अनाथ हो।

अपस्यु:- पहली बात तो ये की मैंने ऐसा कभी नही कहा।… (साची बीच में कुछ बोलने कि कोशिश की, तब अपस्यु अपना हाथ दिखाते) .. पहले पूरा सुनो.. मैंने कभी ऐसा नहीं कहा लेकिन यदि तुमने ऐसा सुना भी होगा तो भी ये सच था, उस समय मैं अनाथ था अब नहीं हूं।

साची:- तो क्या रातों रात आसमन से सब उतर आए?

अपस्यु:- मैंने जवाब विनम्र होकर और शालीनता के साथ दी है। मैं चाहूंगा तुम भी शब्दों कि मर्यादा को उल्लांघित ना करो। फिर से प्रश्न पूछो।

साची:- जब तुम अनाथ थे तो तुम्हारा परिवार कहां से आया।

अपस्यु:- मेरे और मेरे अंकल के बीच कुछ आंतरिक मामला था सुलझ गया सो अब मेरे पास मेरा परिवार है। यहां पर ना मैं झूटा हूं और ना वो जिसने तुम्हे ये बताया। बस तुम बेवकूफ हो। और कोई शंका है मन में।

साची:- अच्छा तो मैं बेवकूफ हो गई और तुम झूठे नहीं हो। तो फिर ये बताओ कि तुम्हारी आमदनी जब 50-60 हजार है महीने की तो फिर वो करोड़ों की कार कहां से आई।

अपस्यु:- एक बात बताओ तुम्हारे बेईमान बाप और चाचा के पास इतने पैसे कहां से आते हैं जो हर महीने अपने बेटो को $10K USD भेजते है।

साची:- how dare you..

अपस्यु:- अपनी जगह बैठ जाओ, क्योंकि ना तो मुझ से तेज चिल्ला सकती हो और ना ही मुझ से ज्यादा तेवर तुम्हारे पास होगा। अब ध्यान से सुनो, तुमने भी मेरी बहन और भाई के सामने इतने ही प्यारे-प्यारे शब्द कहे थे, शुक्र करो मैंने तुम्हे यहां अकेले में कहा। जब तुम्हारे नौकर पेषा अभिभावक अपनी 80-90 हजार की सैलरी में से 70 हजार रुपया तुम्हारे भाई को भेज कर भी इतना कुछ बना चुके हैं तो मैं तो फिर भी एक अरबपति का बेटा रहा हूं। सबकुछ लूट जाने के बाद ये मेरी गरीबी की अवस्था है। 2 करोड़ सालाना देकर तो मैं एक अनाथालय चला रहा हूं फिर मेरे लिए लंबोर्गिनी कौन सी बड़ी बात है आज रोल्स रॉयस घर के आगे खड़ी कर दूं। लेकिन फिर भी देखो, तुम्हारी बदतमीजी का जवाब यहां मै मुस्कुरा कर दे रहा हूं और तुम सभी लोगों के सामने मुझे बेज्जत करने के बाद भी अकड़ कर सवाल पूछ रही हो।

साची:- नहीं .. वो .. मुझे माफ़ कर दो प्लीज।

अपस्यु:- दिल में बैर होता तो आराम से यहां बैठकर बात नहीं कर रहा होता।

साची मुस्कुराती हुई…. "मैं भी ना पूरे बेवकूफ ही थी। मुझे अपने किए पर बहुत पछतावा हो रहा है। सो सबकुछ भूलकर आज से हम दोस्त"….

अपस्यु:- तुम्हे हमेशा दोस्त बनाने की बड़ी जल्दी रहती है। अभी के लिए हम क्लासमेट ही अच्छे हैं। वैसे इतनी बातें हो ही गई है तो मैं एक बात कहता चलूं, किसी करीबी पर तुम्हे हक, गुस्सा और अपना बेवकूफी दिखाना हो ना तो उसे अकेले में दिखाओ, किसी के परिवार के सामने किसी की बेज्जाति करना एक अपराध के समान है, दोबारा ये भूल किसी और के साथ मत करना। शायद उसे या उसके किसी परिवार के सदस्य में हमारे परिवार जितना संस्कार ना हो।

साची का मुंह एकदम छोटा पड़ गया। वो पीछे से कुछ बोली लेकिन अपस्यु उसे अनसुना करके गीत गुनगुनाते हुए निकल गया। बातों के दौरान ही उसके दूसरे क्लास का वक़्त हो गया था, लेकिन उसे इस क्लास में बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं थी इसलिए अपस्यु कुंजल के क्लास में जाकर बैठा।

आज उस बेंच पर फिर से विन्नी और क्रिश बैठे मिले। अपस्यु को देखते ही वो उठकर जाने लगे, लेकिन इसबार अपस्यु उन्हें रोक लिया और चारो वहीं बैठ गए। क्लास के दौरान अपस्यु ने विन्नी और क्रिश को सॉरी का एक नोट लिखकर दिया , जिसके नीचे बड़ा सा स्माइली बना था।

विन्नी ने उस चिट को देखा और बिना कोई प्रतिक्रिया के उसे नीचे फेक दी। अपस्यु ने एक बार और पुनः प्रयास किया लेकिन इस बार सॉरी और स्माइली के साथ-साथ नीचे एक नोट भी लिखा था… "इस बार दोनों ने करेले जैसी शक्ल वाली प्रतिक्रिया दी, तो जोर से चिल्लाते हुए दंडवत माफी मांग लूंगा।"

इस बार विन्नी और क्रिश दोनों हंस दिए और उसकी ओर देखकर कहने लगे .. "माफ़ किया".. दोनों अपने पढ़ाई में लग गए और इधर अपस्यु कुंजल को

परेशान करने लगा। एक तो आज उसकी नींद पूरी न हुई थी ऊपर से अपस्यु का तंग करना, वो पूरा चिढ़ गई।

लेकिन अभी तो ये करेला ही था इसपर नीम चढ़ना बाकी था। पीछे से 5 मिनट बाद आरव भी वहीं चला आया। इस बार अराव को देखकर विन्नी और क्रिश इशारों में पूछे "अब".. दोनों भाई एक साथ हाथ जोड़ कर विनती करने लगे.. "प्लीज".. दोनों भाइयों का बदला रूप देख कर विन्नी और क्रिश ने जाते-जाते एक नोट छोड़ा… "क्लास के बाद कैंटीन में मिलना"…

इधर वो दोनो गए इधर एक साइड आरव तो दूसरे साइड अपस्यु.. अब चढ़ गया था करेले पर नीम। कुंजल के पास कभी इधर से नोट्स अा रहे थे तो कभी उधर से। अंत में हार कर बेचारी ने अपने किताब कॉपी को बंद किया, पैर को मोड़ कर टेबल पर रखी और अपना सिर घुटनों पर टिका कर आराम से बैठ गई।

क्लास खत्म होने के बाद तीनों कैंटीन पहुंचे जहां उनकी मुलाकात क्रिश और विन्नी से हुई। दोनों भाई ने यहां पर उस दिन के लिए माफी मांगी। उसके बाद कुछ ट्रीट और फ्रेंड्स एंड फैमिली टाइम।

वक़्त अच्छा बीत रहा था। सुबह ट्रेनिंग दिन में कॉलेज लौटकर आए तो कुछ घूमना टहलना और रात को परिवार के साथ बात करते करते सो जाना। हालांकि अराव की एक्स्ट्रा ड्यूटी लावणी के साथ बात करने की भी थी, सो वो पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ रोज रात के 2 बजे तक पूरा करता था।

वैसे अराव का देर रात तक जागना और सुबह जल्दी उठ जाने के कारण उसके आदत में भी कुंजल की तरह ही बदलाव अा चुका था.. कॉलेज से लौटकर बैग पटके और सीधा बिस्तर पर जाकर खुद भी बिछ गए।

इसी दौरान कॉलेज में साची से मुलाकात भी होती रही। ऐसा नहीं था कि दिल में कोई बैर की भावना से उसे देखना या उससे नफरत जैसी कोई फीलिंग थी। बस वो आम सहपाठियों की तरह ही एक सहपाठी थी जिससे हंस कर मिलना और थोड़ी सी बातचीत बस।

लगभग 10 दिन बीतने को आए थे। यूं तो हर बीता हुआ दिन कुंजल के लिए भारी पर रहा था। लेकिन दसवां दिन आते-आते, नशे कि वो अशिम पिरा, अपने पूर्ण चरम पर थी। कुंजल का व्यवहार बिल्कुल पागलों जैसा हो चला था और अब नौबत ये अा चुकी थी कि जल्द ही कुंजल के लिए कुछ नहीं किया गया तो उसके हालत का ज्ञान मां को भी हो जाएगा और उसकी मानसिक संतुलन भी पूरी तरह बिगड़ सकती है…

सुबह 4 बजे जबसे वो उठी, ट्रेनिंग एरिया में उसे देखकर अपस्यु और अराव के दिमाग काम करना बंद कर चुका था। और बस कुछ ही देर की बात थी जब मां भी जाग जाती और उन्हें भी सबकुछ पता चल जाता।
 
Update:-35

सुबह 4 बजे जबसे वो उठी, ट्रेनिंग एरिया में उसे देखकर अपस्यु और अराव के दिमाग काम करना बंद कर चुका था। और बस कुछ ही देर की बात थी जब मां भी जाग जाती और उन्हें भी सबकुछ पता चल जाता।

आरव:- अपस्यु, कुछ कर भाई, इसकी हालत मुझ से देखी नहीं जा रही।

कुंजल:- फ़िक्र मत करोओ ओ…… (इतना बोलते बोलते कुंजल धाराम से गिर गई)

"अपस्यु… अपस्यु"… आरव कुंजल को पकड़ कर चिल्लाने लगा… "शांत.. आरव, मां को पता चल जाएगा। चल हॉस्पिटल चलते हैं।"

कुछ इंजेक्शन और स्लाइन की बॉटल चढ़ाने के बाद डॉक्टर साहब दोनों भाई के पास पहुंचे…. "कब से ड्रग्स लेे रही थी"..

अपस्यु:- पता नहीं सर, कोई कॉम्प्लिकेशन तो नहीं है।

डॉक्टर:- वो मैं अभी नहीं बता सकता, पेशेंट की कंडीशन जब स्टेबल होगी तभी कुछ कहा जा सकता है। फिलहाल तो मुझे ये जानकारी चाहिए कि ये कितने दिनों से ड्रग्स लेे रही थी।

अपस्यु:- कुछ कह नहीं सकते सर कब से लेे रही, बस हमे भी 10 दिनों से पता है। लेकिन इसने 10 दिनों में ड्रग्स को हाथ तक नहीं लगाई।

डॉक्टर:- हां जानता हूं। ब्लड में ड्रग्स की कोई मात्रा नहीं है और इसका दिमाग उस ड्रग्स की मांग कर रहा है। पूरा सीएनएस (सेंट्रल नरवस सिस्टम्स) पर बहुत ही बुरा असर पड़ा है।..

डॉक्टर साहब अपनी बात कहकर चले गए और दोनों भाई कुंजल के बेड के पास बैठकर उसका हाथ थामे चेहरे को देख रहे थे…. थोड़ी देर में नंदनी भी हॉस्पिटल पहुंच गई। दोनों भाई अब भी कुंजल का हाथ थामे बस उसी को देख रहे थे। इसी बीच नंदनी वार्ड में पहुंची। काफी गुस्से में लग रही थी और आते ही अपस्यु को 2 थप्पड खींचकर लगाई।…. "मर जाने देते, इसको हॉस्पिटल क्यों लेकर आए".. नंदनी चिल्लाते हुए बोलने लगी।

अपस्यु, नंदनी को खुद में समेट कर…. "शांत हो जाओ मां, कुछ नहीं हुआ .. शांत। आप यहां आराम से बैठ जाओ" … नंदनी वहीं चेयर पर बैठ गई, अराव ने उसे तुरंत पानी पिलाते हुए कहने लगा…. "बच्चे ही तो हैं, गलती हो जाती है, और कुंजल ने तो सबकुछ छोड़ दिया है तब उसे हॉस्पिटल आना पड़ा है। ऐसे वक़्त में आप उसे हौसला नहीं देगी तो वो अपने इस बुरे लत को कैसे छोड़ पाएगी"..

अपस्यु:- आरव सही कह रहा है मां। आप मुस्कुराओ और मुस्कुरा कर कुंजल की हिम्मत बढ़ाओ।

नंदनी:- एक शब्द भी नहीं। चुप !! इसकी वजह से पुलिस घर तक अाकर गई है और सबके सामने उन्होंने जो अपशब्द कहे। और फिर ये इसके फोन पर कैसे कैसे कॉल अा रहे है। कितनी गंदी-गंदी गालियां दे रहे है, और तो और मुझ से कह रहे हैं आज तेरी बेटी को मशहूर कर दूंगा। इसकी ऐसी ऐसी तस्वीर भेजी है कि मन तो कर रहा है अभी गला घोंटा दू।

अपस्यु वहीं कुछ देर बैठा रहा। केवल इस बात पर जोड़ देकर समझता रहा की "आज कल हैक के जरिए बहुत सी लड़कियों को फसाया जा रहा है। इसके लिए बहुत से कानून बने हैं.. और अगर कोई चोरी से हमारे घर की लड़की की तस्वीर वायरल कर रहा है तो हमे चोर को पकड़ना चाहिए या फिर जिसके साथ बुरा हो रहा हो उसी का गला घोंटा देना, कहां तक की समझदारी है।"..

अपस्यु को सुनने के बाद नंदनी का गुस्सा थोड़ा शांत हुआ लेकिन कलेजे में आग अब भी लगी थी….. "मैं नहीं जानती की तू क्या करेगा लेकिन ऐसी तस्वीरें अगर वायरल हुई तो मैं आत्महत्या कर लूंगी"

"आप चिंता मत कीजिए, कुंजल के जागने से पहले मैं सरा मामला निपटा लूंगा। अराव मां के पास तू रुक"… अराव भी चार कदम साथ चला, "मैं भी चल रहा हूं तेरे साथ"…………... "नहीं इस वक़्त हम में से एक का यहां रहना यहां जरूरी है। तूने उस फ़िरदौस की कुंडली कहां रखी है।"….…. "वहीं सेफ में है।" …..….. "ठीक है आरव, तू मां के पास रुक"…..…. "प्लान करेगा या सब कुछ अचानक, ये तो बता दे"………. "आरव, तुझे क्या लगता है इस वक़्त मै बैठकर प्लान करूंगा। जैसा-जैसा दिमाग में आएगा वैसा-वैसा करता चला जाऊंगा। आज स्वयं महादेव मुझ में विराजमान है। रौद्र रूप देखेंगे मेरा।…... "अपस्यु, किसी को भी मत छोड़ना और ना ही वहां कोई सबूत मिले, पूरा तांडव करना"

अपस्यु फ्लैट वापस आया… किसी साधु की भांति हवन कुंड जला कर उसमें अग्नि प्रजॉल्लित की। कुछ समय के यज्ञ के बाद उसने रक्त तिलक किया। युद्ध का बिगुल बजाकर संख्णद किया और खुद को तैयार करने लगा।

वहां से सीधा वो पुलिस चौकी निकला और जाकर उस थानेदार के सामने बैठा जिसने बदतमीजी की थी। जाते ही 1000 की 2 गाडियां उसके आगे पटकते…. "फ़िरदौस से मिलना है मुझे।"

थानेदार:- तू कौन है बे और ये जो तू नोट फेंक रहा…

बोल ही रहा था कि अपस्यु ने फिर से एक गद्दी फेकी… फिर वो कुछ बोलने के हुआ… अपस्यु ने फिर एक गद्दी फेकी… 5 गड्डियां फेंके जाने के बाद जब वो दोबारा मुंह खोल, अपस्यु ने सारे नोट समेटना शुरू कर दिया। थानेदार उसका हाथ पकड़कर… "तू तो गुस्सा हो रहा है छोटे। चल मिलवाता हूं तुझे फ़िरदौस से। अपनी गाड़ी तो लाया है ना"

दोनों वहां से निकल गए दिल्ली-हरियाणा के हाईवे पर। थोड़ा अंदर जाकर एक वीराने में, खेतों के बीचों बीच चल रहा था ये जहर बनाने का कारोबार। अपस्यु पैदल-पैदल आगे बढ़ रहा था और साथ में अपनी वॉच डिवाइस को भी हवा में उड़ाता जा रहा था, जिसका फोकस आगे था।

खेत के बीच की पगडंडी पर वो रुका और वहीं बैठकर चारो ओर का जायजा लेने लगा…. "तू ये क्या कर रहा है चुटिया… कहीं तू यहां कोई कांड तो करने ना आया।"

वो बोल ही रहा था इतने में उसकी सर्विस रिवॉल्वर अपस्यु के हाथ में…. "चू-चपर नहीं। वरना ये जो मैंने अभी उड़ाया है ना, ये ना केवल मुझे आगे देखने में मदद करता है बल्कि इससे मैं एक छोटा धमाका भी कर सकता हूं। एक धमाके से भले कुछ ना बिगड़े लेकिन अपने सर पर देख.. इतने सारे एक साथ फोड़ दिए ना तो तेरे बदन के भी इतने ही छोटे चीथरे होंगे.. इसलिए अब चुपचाप पास पड़ी गोली भी ला और तमाशा देख"…

अपस्यु किसी पागल कि तरह सिना चौड़ा किए आगे बढ़ा… 4 कदम आगे जाते ही 2 लोगों ने उसका रास्ता रोका… अपस्यु ने धाय-धाय करते 2 फायरिंग की और दोनों अपना पाऊं पकड़ कर कर्रहाने लगे। फायरिंग की आवाज़ सुनते ही लोग हथियार लेकर निकले।

कहीं कोई नहीं बस 2 लोगों के कर्रहाने की आवाज़। कुछ लोग दौड़ कर उस आवाज़ के पास पहुंचने लगे… इधर अपस्यु घने धान में लेटा वॉच डिवाइस से 4 लोगों को आते देखा… पहली फायरिंग एक ढेर और अपस्यु ने अपनी जगह बदली।

फायरिंग के साथ ही वहां के इलाकों में उड़ रहे डेवाइस से भी "भिन-भिन" की आवाजें शुरू। सभी पागल होकर गोली चलाने वाले को ढूंढ़ने लगे। जहां-तहां पागलों की तरह गोलियां चला रहे थे। ऐसे माहौल को देखकर थानेदार को भी अपने जान कि चिंता होने लगी और उसने भी तुरंत वायरलेस करके बैकअप भेजने के लिए बोल दिया।

बस एक ही निर्भीक था वहां जो आगे बढ़ते हुए सबको ऐसे गोली मार रहा था, कि उनके दिलों में खौफ बढ़ता जा रहा था। इसी बीच फ़िरदौस को जब कुछ समझ में नहीं आया और उसे लगा कि पुलिस का कोई बड़ा ऑपरेशन चल रहा है, तब वो अपनी जान बचाकर भागने लगा, लेकिन अपनी मौत से कौन भाग पाया हैं।

अपस्यु भी खड़ा हुआ… शारीरिक क्षमता ऐसी की जब उसने दौड़ लगाई तो पल भर में यहां से वहां… वो तेज लहरों की भांति आगे बढ़ रहा था और रास्ते में आने वाला हर कोई गोली खाकर चिल्लाते हुए नीचे गिरते जा रहा था। बस कुछ समय और फ़िरदौस के पाऊं पर अपस्यु ने एक लात जमा दिया।

लड़खड़ा कर वो नीचे जा गिरा… अपने दोनो हाथ जोड़कर वो आत्मसमर्पण करने की बात कहने लगा…. गुस्से में अपस्यु ने उसके मुंह पर एक लात जमा दिया। उसका जबरा टूट चुका था और मुंह से खून बाहर आने लगा। दर्द में कर्राहते हुए उसने फिर रहम कि भीख मांगी। एक और लात मुंह पर फिर से जमाया.. जबड़ों की ज्योग्राफीया बदल गया।

एक हाथ अपने मुंह पर रखकर, एक हाथ आगे उसे दिखाते बस का इशारा करने लगा… गुस्से में अपस्यु ने इस बार पसलियों पर लात मारी। तीन पसलियां टूट चुकी थी। फ़िरदौस के आखों के आगे अंधेरा छा गया, उसमे अब कोई भी चेतना नहीं बची थी। लेकिन अपस्यु का गुस्सा अब भी कम नहीं हुआ।

दाएं कॉलर बोन पर फिर से तेज-तेज 2 लात जमा दिया और अंत में 10mm का एक सरिया उसके जांघ के ठीक ऊपर वाले हिस्से जहां "फीमर बोन" होता है, वहां वो सरिया इस पार से उस पार घुसेड़ दिया। दूसरे सरिया को पर में ऐसे घुसेड़ा की उसके किडनियों के बीचोबीच से लेकर लिवर फाड़ते हुए पेट के दाएं से बाएं वो सरिया निकल अाई। थानेदार डर से कांपता हुआ वहीं कुछ दूर पीछे खड़ा था।

"मेरे साथ चल"… अपस्यु थानेदार को घूरते हुए बोला। वो बिना कोई शब्द कहे अपस्यु के साथ चल दिया। रास्ते में चलते-चलते अपस्यु ने वहां हुए हर डैमेज का ब्योरा उस थानेदार को दिया। किसे कहां गोली लगी, कौन कितना डैमेज है और कितने वक़्त तक इलाज ना मिलने के कारण वो मर सकते हैं। बस केवल फ़िरदौस को छोड़कर जो हॉस्पिटल में ज्यादा से ज्यादा 2 दिन तक दर्द झेलेगा लेकिन मारना उसका निश्चित है।

बात करते करते दोनों एक झोपड़े में पहुंच गए, जहां नशे के समान का रख-रखाव होता था।अपस्यु ने टेबल पर पड़ी लैपटॉप को अपने बैग में डाला, जबकि फ़िरदौस का फोन वो पहले ही लेे चुका था.. उसके यहां का काम ख़त्म हुआ… थानेदार के साथ फिर वो बाहर निकला, वहीं पास पड़े एक अपराधी का गन उठाकर थानेदार के कंधे पर सीधा गोली मारी… गोली लगते ही वो चिल्लाने लगा…

अपस्यु, उसकी सर्विस रिवॉल्वर वापस करते हुए…. "तुम बिना घायल हुए अकेले इतना बड़ा कांड कैसे कर सकते हो… अच्छी सी कहानी सोचो जबतक तुम्हारा बैकअप पहुंचता होगा। अभी 2 लोग और हैं लिस्ट में।
 
Update:-36

अपस्यु, उसकी सर्विस गन वापस करते हुए…. "तुम बिना घायल हुए अकेले इतना बड़ा कांड कैसे कर सकते हो… अच्छी सी कहानी सोचो जबतक तुम्हार बैकअप पहुंचता होगा। अभी 2 लोग और हैं लिस्ट में।

थानेदार को वहीं छोड़कर अपस्यु निकला, रास्ते से ही उसने आरव को फोन लगाया…. "सब सैटल हो गया" आरव ने उधर से पूछा…

"हां फ़िरदौस का खेल खत्म बस उसके 2 चमचे है जिसके पास कुंजल की कुछ तस्वीरें है। वहीं जा जा रहा हूं। उधर सब ठीक है।"

आरव:- कुंजल को अभी तक होश नहीं आया है। मां का गुस्सा थोड़ा कम हुआ है लेकिन तू तो समझ सकता है ना।

अपस्यु:- दोनों का ख्याल रखना.. बस इन दोनों के पास पहुंच जाऊं फिर पूरा काम ख़त्म हो जाएगा.. चल तू वहां ध्यान दे मैं यहां देखता हूं।

कार अपने टॉप स्पीड में थी। 15 मिनट में ही अपस्यु फिर से सहर में दाखिल हो चुका था। अपस्यु ने सबसे पहले उन दोनों चमचों को फोन लगाया। उन्हें झांसा देकर उनसे पता निकलवाया। यह अच्छी खबर थी कि दोनों एक ही जगह किसी फैशन स्टूडियो में थे। बिना देर किए अपस्यु वहां पहुंचा और जोड़-जोड़ से दोनों का नाम पुकारने लगा… "रिकी, जैश.. रिकी.. जैश"… कुछ लड़के बाहर आए… "तुम में से रिकी और जैश कौन है"…

2 लड़के आगे आकर… "हम है.. तुम्हीं ने कॉल किया था अभी"… अपस्यु तेजी से उनके पास पहुंचा। एक हाथ से रिकी के हाथ की उंगलियां पकड़ी और उसे उल्टा घुमा दिया। दूसरे के सिर के बाल को पकड़ कर दीवार पर दे मारा। ना कोई बात और ना ही कोई संभलने का मौका.. बस 2 सेकंड लगे पहुंचने में और एक सेकंड में ये सब हो चुका था।

बाकी बचे वहां उसके 3 साथी जो अपस्यु पर लपके, लेकिन अपस्यु के हाथ में था डंडा और वो तुरंत नीचे बैठ कर इतने तेजी के साथ उनके पाऊं पर डांडिया खेला गोल-गोल घूमकर, की जब अपस्यु खड़ा हुआ तब वो तीनो पाऊं पकड़ कर नीचे बैठे कर्रह रहे थे… 10 सेकंड का ये करनामा और मात्र 11 सेकंड में पांचों के होश उड़ चले थे।

रिकी अपनी टूटी उंगली पकड़ कर चिल्ला रहा था इतने में तेजी से एक डंडा पड़ा पीठ पर.. छटपटा गया वो… इससे पहले की कुछ और प्रतिक्रिया देता पूरे एक मिनट तक उपर डंडे बरस चुके थे… 6 हड्डियां और एक पसली इसकी गई। अब बाड़ी थी उस जैश की जिसका सर घूमना थोड़ा ठीक हुआ था। वो अपने कमर से गन निकल कर जैसे ही आगे कि ओर ताना.. एक जोरदार डंडा उसकी कलाई पर और उसकी कलाई टूट गई।

"आव-आव" करके वो अपनी कलाई झटकने लगा लेकिन अपस्यु आज रुकने के मूड से बिल्कुल भी नहीं था। टूटी कलाई पर एक और जोरदार डंडा उसने दे मारा। चिल्लाना जैसे हलख में ही अटक गया हो। जैश पर अब बरसने वाला था कहर। इसके पीठ को अपस्यु ने उधेड़ दिया। शर्ट के साथ-साथ उसके पीठ का भी चिथरा हो चुका था।

अपस्यु ने रिकी और जैश का फोन लिया.. दोनों के फोन चेक करने के बाद उनका फोन भी अपने बैग में रख लिया। फिर वो स्टूडियो के अंदर वाले कमरे में गया। वहां अपस्यु को एक कंप्यूटर और 2 हार्ड ड्राइव मिली, जिसमें बहुत से लड़कियों के अश्लील तस्वीरें और वीडियो थी।

ये नजारा देख कर अपस्यु का और खून खौल गया। वो फिर बाहर आया और इस बार पचों के अंडकोष पर इस बेरहमी से हमला किया कि जिंदा तो रहेंगे लेकिन अब इनकी ज़िन्दगी में सेक्स नहीं रहेगा।

एक हार्ड ड्राइव वहीं सबूत के लिए फेंक कर बाकी सरा सामान बैग के साथ ही गाड़ी के डिक्की में रखा और वहीं से 5 फिट का रोड निकाल लाया। गुस्सा इतना था कि अपस्यु ने पूरे फ़ैशन स्टूडियो को तहस-नहस कर दिया। बिल्कुल वो अपने आपे से बाहर हो चुका था।

तभी मौके पर पुलिस पहुंच गई। थानेदार अपने वहीं महान व्यक्ति निकले जिन्होंने अपस्यु को उसके परिवार से मिलाया, श्रीमान अजिंक्य सिंह। अपस्यु अब भी तोड़-फोड़ में लगा था। अजिंक्य पहुंचे ही अपस्यु को पीछे से पकड़ा और उसे धक्का देते हुए पीछे 2 डंडे हौंक दिए।

अपस्यु गुस्से में मुड़ा ही था मारने के लिए, की सामने पुलिस की वर्दी और वर्दी में खड़ा अजिंक्य। अपस्यु को इस रूप में देखकर अजिंक्य कहने लगा… "साला तय नहीं कर पा रहा हूं कि तू मीडियम रेंज का क्रिमिनल होगा या मेजर रेंज का। कहीं ना कहीं क्राइम करते ही मिलता है।कैसे पागलों कि तरह मारा है इनको, जरा इनकी हालात तो देखो.. शर्मा जी एम्बुलेंस को कॉल कीजिए, एकाध टपक गया तो छोड़े की जवानी जेल में ही सर जाएगी। तेरे साथी कहां है बे"…

अपस्यु:- सब भाग गए.. कोई अपशब्द नहीं बोलना और ना ही हाथ लगाना मैं साथ चल रहा हूं।

अजिंक्य:- तुझे तो पूरा कानून पता है। लॉ कर रहा है या पैदाइशी क्रिमिनल है।

अपस्यु, बिल्कुल खामोश रहा और अजिंक्य के साथ-साथ चलते उसने सिन्हा जी को कॉल लगा दिया… "हां अपस्यु बोलो"…

"मारपीट का केस है और चार्ज शायद 5 हाफ मर्डर का लगे.. बेल चाहिए अभी"… अपस्यु ने अजिंक्य को देखते बोला।

सिन्हा जी:- किसने किया और कौन सी चौकी में बंद है"…

अपस्यु:- मैं खुद अभियुक्त हूं। सराफतगंज थाना…

इतना कहकर अपस्यु उनकी जीप में जाकर बैठ चुका था। जीप आगे बढ़ी और अजिंक्य पूछने लगा… "ना बे तुझमें इतना तेवर कहां से आया है।"… अपस्यु ने कोई जवाब नहीं दिया। … "कोई शातिर खिलाड़ी लगता है तू, लेकिन तेरी किस्मत मेरे आगे ही दम तोड़ देती है। लगता है आज तक सही पुलिसवाले से तेरा पाला नहीं पड़ा है।"… अपस्यु बस सुनता रहा।

जीप जैसे ही थाने में घुसी वहां का मुंसी भागता हुआ पहुंचा… "किसको अरेस्ट कर के लाए हो, यहां तो धुरंधर वकीलों की लाइन लगी हुई है।"

अजिंक्य:- बैनचो यहीं कुत्ते कि जिंदगी है। इसकी शक्ल देखो, साला पढ़ने-लिखने वाला लड़का है ये। आज सजा होती तो कल सुधर कर निकलता। साला इन वकीलों को ही पहले ठोकना चाहिए।

अपस्यु:- वहां से जो एक हार्ड डिस्क उठाया है उसे ध्यान से देखना। और हां हर सजा सबको सुधारती नहीं, कभी-कभी लोग क्राइम की दलदल में बस सजा के कारण ही घुसते चले जाते हैं।

अजिंक्य:- ओ तेरी.. अपने बाप को देख कर तेरी भी जुबान खुलने लगी…

अपस्यु:- अपने कहे का अफसोस हो तो मुझे कॉल कर लेना।

थाने के अंदर सारी फॉर्मेलिटी करने के बाद अपस्यु बाहर आया। वहां आए वकीलों को उसने धन्यवाद कहा और अपनी गाड़ी से पैसे निकालकर उनकी पूरी फ़ी देदी। बिना कोई देर किए वो वापस फ्लैट पहुंच गया और नहा धोकर फिर तुरंत हिल हॉस्पिटल के लिए निकल गया।

रास्ते में ही उसने एक कहानी तैयार की, हॉस्पिटल पहुंचकर मां को वो कहानी सुनाया और यकीन करवा चुका था कि सभी दोषियों को पुलिस ने पकड़ लिया है। नंदनी के लिए ये एक राहत के पल थे। उसने चैन कि सांस ली और वहीं बैठी रही अपनी बेटी के पास।

शाम के तकरीबन 7 बजे कुंजल को होश आया। आंख खुलते ही पूरे परिवार को अपने पास पाकर, कुंजल फिर से रोने लगी।… "अरे यार इसको तो ठीक से रोना भी नहीं आता।"… आरव ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा…

अपस्यु:- अरे मां आप जरा वो क्लासिकल रोना तो दिखाओ इसे। लड़कियों के रोने में कैसी नजाकत और अदा होनी चाहिए।

नंदनी ने भी अपने चूड़ियों से भरे हाथ को बिल्कुल मिना कुमारी की तरह अपने सिर पर रखी और दिखा दी क्लासिकल स्टाइल में रोने कि झलकियां….. "कुंजल लड़कियों का रोना मतलब अपने सारे बिगड़े काम एक ही रोने में बन जाए। दोबारा कोशिश करो और इस बार अच्छा परफॉर्म करना बेटा।"

घरवालों का रोने के ऊपर की प्रतिक्रिया को देखकर कुंजल हसने लगी। थोड़े ही देर में डॉक्टर भी वहां पहुंच गए। कुंजल को पूरी तरह जांचने के बाद उन्होंने एक दिन रुककर कुछ और टेस्ट करवाने के लिए बोल दिया।

सभी लोगों को वहां से जबरदस्ती भेजकर अपस्यु वहीं रुक गया। रात के 9 बजे उसे खाना खिलाकर अपस्यु जब उसके मुंह को साफ करने लगा तब कुंजल ने उसका हाथ पकड़कर कहने लगी… "बस भाई इतना भी ना करो कि हर बात में रोना अा जाए।"

अपस्यु:- मार खाएगी। एक बात बताओ ये फ़िरदौस तुझे 10 दिनों से कॉल कर रहा था हमे बताई क्यों नहीं।

कुंजल:- मैंने सोचा मैं खुद ही हैंडल कर लेती।

अपस्यु, उत्सुकता वश:- और वो कैसे बेटा..

कुंजल:- वो सोचने के लिए तुम थे ना भाई… (और हसने लगी)

अपस्यु:- हां तो तेरे भाई ने आज उसके बारे में सोच भी लिया और उसका चेप्टर भी खत्म कर दिया।

कुंजल:- चैप्टर खत्म मतलब..

अपस्यु:- मतलब वहीं जो तुम सोच रही हो..

कुंजल:- सच..

अपस्यु:- हां बाबा सच..

कुंजल खुशी के मेरे गले लगने के लिए, उठने कि कोशिश करने लगी। लेकिन अपस्यु उसे लिटाते हुए उसके गले लग गया और उसके सर पर हाथ फेरने लगा। कुछ ही समय लगे होंगे और कुंजल गहरी नींद में सो गई। वो वहीं उसके पास बैठा उसके सर पर हाथ रख, कुंजल को ही देख रहा था। 10.30 के करीब हो रहे थे और उसके फोन की घंटी बाजी।

"जी कहिए मिस"…. अपस्यु वार्ड के बाहर आते हुए बात करने लगा..

साची:- कैसी है तुम्हारी बहन अभी।

अपस्यु:- वो बिल्कुल ठीक है। कल कुछ टेस्ट में बाद डिस्चार्ज मिले शायद।

साची:- सुबह पुलिस अाई थी तुम्हारे यहां?

अपस्यु:- यहीं बताने के लिए कॉल की हो क्या?

साची:- नहीं, बस बात शुरू करने के लिए कोई ढंग के शब्द ही नहीं मिल रहे, उसी को शुरू करने की कोशिश कर रही हूं।

अपस्यु:- गूगल कर लो शायद जवाब मिल जाए।

साची:- वेरी फनी.. अच्छा सुनो मुझे सच में दिल से गिल्टी फील हो रहा है पता नहीं मैंने गुस्से में क्या से क्या कर दिया। बहुत दिनों से तुम्हे कॉल करने का सोच रही लेकिन हिम्मत ही नहीं पड़ रही थी।

अपस्यु:- तुम्हे इतना घबराने कि जरूरत नहीं है। जब दिल करे तब कॉल लगा लिया करो। जितना वक़्त सोचने में हम बर्बाद कार देते हैं उतने में तो हम काम खत्म कर लेंगे। काम जब खत्म हो गया फिर सोचेंगे की अच्छा हुआ या बुरा।

साची:- जी गुरुदेव.. वैसे गुरु देव से याद आया कि तुम्हारी गुरिवी मिस सुनैना दीक्षित कितनी हॉट है ना।

अपस्यु:- 2 पेग चढ़ा कर कॉल लगाई हो क्या?

साची:- नहीं पूरे होश में हूं और कुछ फ्रैंडली बातें कर रही हूं ताकि मैं क्लासमेट से तुम्हारी दोस्त बन सकूं। वैसे दोस्ती कि बात से याद आईं उस दिन घर पर जब तुमने मेरा हाथ खिंचा था और मै जब तुम्हारे ऊपर गिरी थी उस वक़्त की तुम्हारी फीलिंग क्या थी? वो दिन रात बालकनी में खड़े रहना? और वो जो तुमने मुझसे कहा था… दिल में फीलिंग कुछ और रखकर दोस्ती नहीं कर सकता?.. और वो सरप्राइज वाली बात भी?

अपस्यु:- एक ही बार में इतने सारे सवाल। तुम्हे जो जानना है, मैं वहीं से शुरू करता हूं। जब मैंने तुम्हे पहली नजर में देखा तो तुम्हे देखता ही रह गया। मैं अपने उस वक़्त के अनुभव को साझा नहीं कर सकता। तुम्हारी एक झलक के लिए मै प्यासा रहता। जब तुम मेरी सेवा कर रही थी तब ऐसा लगा जैसे दिल के बहुत ही करीब हो। मैं बयां नहीं कर सकता इससे ज्यादा कुछ। उस दिन का सरप्राईज यहीं था कि जो बात अभी मैंने कम शब्दों में बयां किया उसे मैं तुम्हे विस्तार से बताता। तुम्हारे साथ चंद लम्हे मैं बांटता।

साची:- तो अब ये सब फीलिंग खत्म हो गई या फिर मुझ में कोई शैतान दिख गया। गलतियां तो हर किसी से होती है। क्या ये कह देना कि "मैं तो एक अरबपति का बेटा हूं".. ये अहम नहीं था। वहीं मेरे पैरेंट की तुमने ऐसे उदहारण से तुलना की जो जरा भी तुलनात्मक नहीं था। जिसने कई साल सर्विस में बिताया हो, पुरखों की अर्जी हुई संपत्ति हो वो क्यों नहीं महीने के 70 या 80 हजार का खर्च अपने बच्चों के लिए उठाएगा।

अपस्यु:- हां अनियंत्रित मै भी हो गया था और बाद में मुझे भी इस बात का अफसोस भी हुआ। मै खुद मिलकर तुमसे इस बात के लिए माफी भी मांगता लेकिन कहानी ही कुछ उलझी थी सो मैं ये कर ना सका।

साची:- अभी भी मेरे सवाल का जवाब नहीं मिला। अभी जो तुमने जवाब दिया वो सवाल के दूसरे हिस्से का जवाब था, पहला हिस्सा अभी भी अधूरा है।

अपस्यु:- कल मिलकर बात करे क्योंकि कुछ सवालों के जवाब आमने-सामने होकर ही दिए जाए तो बेहतर होता है।

साची:- मैं कल के इंतजार में नहीं रुक सकती, बाहर मिलो मुझ से अभी।

अपस्यु:- नहीं मिल सकता कुंजल के पास हूं हॉस्पिटल में।

साची :- कौन से हॉस्पिटल में हो।

अपस्यु:- तुम्हारे दिमाग में चल क्या रहा है?

साची:- ये मेरे सवाल का जवाब नहीं है। सवाल अब भी वही है.. कौन से हॉस्पिटल में हो।

अपस्यु:- लालजी हॉस्पिटल।

साची:- ठीक है मेरा इंतजार करना, सोना मत।आमने सामने बैठकर ही सवाल जवाब करेंगे।

"हेल्लो.. साची.. हेल्लो" और कॉल डिस्कनेक्ट हो गया।………
 
Update:-37

"हेल्लो.. साची.. हेल्लो" और कॉल डिस्कनेक्ट हो गया।………

रात में तकरीबन 12.30 बजे, अपस्यु हॉस्पिटल के मुख्य द्वार पर खड़ा इंतजार ही कर रहा था…. स्कूटी सड़क के किनारे लगी और साची साइड स्टैंड पर उसे खड़ी कर अपस्यु की ओर चली अा रही थी…. "हाय !!!!!"

चेहरे की रौनक और उस चेहरे पर ये किया मेकअप कातिलाना था, और ऊपर से ये हल्के गुलाबी रंग के होंठ.. उफ्फ !!… कानो की बड़ी-बड़ी बालियां, जब-जब गालों से टकराती ऐसा लगता जैसे कोई होंठ प्यार से इन गालों को स्पर्श कर रहा हो। गहरे नीला रंग का लहंगा जिसपर सुनहरे रंग की जड़ी का काम किया गया था, कमर पर ऐसे बंधी थी कि नजरें कमर के उस हिस्से पर जम जाए। हाथ की उंगलियां फरफरा उठे मात्र एक स्पर्श के लिए।

ऊपर बंधी वो तंग चोली जो कमर से लेकर ऊपर तक के अाकर को ऐसे निखार रहा हो मानो एक कोई गृतवाकर्षण है जो अपनी ओर खींच रहा हो। उसपर से पीछे का वो लगभग बैकलेस नजारा जो कमर कि गहराई से शुरू होकर ऊपर की ओर आती जो बीच में मात्र चोली कि चौड़ी पट्टी से ढकी थी, मन को विचलित कर रही थी। ऊपर बंधी डोरियां जब कंधो के बीच से पीठ पर टकराती, दिल में जलन पैदा कर जाती। काश मैं ही डोरी बन जाता।

"तुम्हारे लिए ही इतनी मेहनत की है। कहो तो मैं बैठ जाती हूं, तुम आराम से निहारते रहना।"… चेहरे पर खुशी और आखों में शरारत, साची अपनी ही अदा से अपस्यु को चिढाती हुई कहने लगी।

"इतनी रात में इतना बन संवर निकली हो, ऊपर से स्कूटी लेे अाई, किसी ने रोका नहीं।" अपस्यु अपने बेईमान नजरों को चुराते हुए बोला।

"तुम उसकी चिंता छोड़ो, चालो वॉक करते-करते बातें करते हैं।" चेहरे पर एक अलग ही खुशी और होठों पर अलग ही मुस्कान..

"पता नहीं तुम्हारे दिमाग में क्या चल रहा है लेकिन इस बदले रूप को देखकर मैं बहुत ही संशय (कॉफ्यूजन) में पर गया हूं।"… अपस्यु कदम से कदम मिलाते हुए अपनी बात कही।

"देखो… कैसी लग रही हूं मै".. साची 2 कदम आगे जाकर सामने खड़ी हो गई और दोनों हाथ फैलाकर खुद को दिखाने लगी।

"आज पक्का तुमने कोई नशा किया है जो ऐसी हरकतें कर रही हो।"… अपस्यु ने हंसते हुए कहा…

"खुल कर जीना और बिंदास होकर अपनी बात कहना भी तो एक नशा ही है"

….. शरारत भरी मुस्कान के साथ साची ने जवाब दिया।

अपस्यु:- वैसे तुम्हे कुछ जवाब चाहिए था ना।

"वो फोन पर चाहिए था, लेकिन तुम्हे देखने के बाद मेरा अब मूड बदल गया है।"… साची अपनी खुशी का इजहार करती हुई वहीं सड़क पर अपनी बाहें फैला कर गोल-गोल घुमती हुई जवाब दी।

अपस्यु:- बात क्या है साची ..

"बात जो तुम समझकर भी समझना नहीं चाहते अपस्यु".. बिल्कुल सामने खड़े हो इंच भर फासले की दूरी से अपनी बात कहती साची।

अपस्यु उसके बांह को पकड़ कर उसे झकझोरते हुए…. "साची तुम्हे हुआ क्या है"

"मुझे किस करो, फिर मै बताऊंगी"… साची, अपस्यु के आखों में झांकती हुई कहने लगी।

"तुम्हारा आज पक्का दिमाग खराब हो गया है"… साची को किनारे कर, अपस्यु दो कदम आगे बढ़ते हुए कहने लगा।

"ए… ए… रूको रुको.. जो भी बातें करनी है मेरे सामने खड़े होकर मेरी आखों में आखें डाल कर कहो।" साची झटककर अपस्यु के आगे बढ़ती हुई, उसका रास्ता रोककर कहने लगी।

"मेरी आखों में आई फ्लू हो गया है। आखों में आखें डाल कर मैं बात नहीं कर सकता।"… अपस्यु फिर आगे बढ़ते हुए जवाब दिया।

"ये कैसे आज मुर्गी कि तरह, नहीं सॉरी, मुर्गे की तरह "पक-पक" करते इधर से उधर फुदक रहे हो। एक जगह खड़े होकर बात करों ना।" .. साची फिर उसका रास्ता रोकते कहने लगी।

"तुम्हारा भेजा आज सटक गया है साची"… अपस्यु गंभीर होते हुए कहा।

"ओह हो !! बेबी थोड़ा सीरियस दिख रहे है, क्या बात हो गई जानू"… साची ने उसके गालों पर उंगली फिराती हुई कहने लगी।

" हाय कितनी प्यारी और दिलकश लग रही है, जी करता है अभी बाहों में भर लूं"… अपस्यु साची के अदा पर फिदा होते हुए सोचने लगा…

"मेरी आखों में देख कर कहो जो भी अभी सोच रहे हो"… साची सभी फासले मिटाती अपस्यु के बिल्कुल करीब अा चुकी थी।

इतने करीब की श्वास चेहरे से टकराने लगे थे। होंठ बिल्कुल रत्ती भर फासले से दूर थे। नज़रे इतनी करीब थी कि अब एक दूसरे के आखों में झांकने के सिवाय कहीं और नहीं देखा जा सकता था। किनारे से दोनों की उंगलियां एक दूसरे को स्पर्श कर रही थी। साची के वक्ष, अपस्यु के सीने पर ऐसे स्पर्श होने लगी कि दोनों के सीने में एक चुभन सी पैदा कर रही थी, जो उन्हें श्वास लेने से रोकने लगे। अपने श्वास की कमी को पूरा करने के लिए दोनों अंदर तक पूरी श्वास खींच रहे थे। नजरें अब बोझिल सी होने लगी थी और वो धीरे-धीरे बंद होती जा रही थी। कमर का वो हिस्सा जहां अपस्यु की उंगलियां स्पर्श करने के लिए व्याकुल थी अब दोनों हाथों से थामे था। होंठ जैसे सुख चुके थे और वो करीब आते हुए एक दूसरे के होठों को सौम्या स्पर्श दे रहे थे…

"तेरे बिना तेरे बिना, दिल नइयो लगदा, मेरा दिल नइयो लगदा"

उफ्फ !… और साची अपने सीने पर हाथ रखकर, चौंकने के कारण अचानक से तेज हुई धड़कन को हंसती हुई काबू में करने लगी। अपस्यु भी मुस्कुराते हुए अपने सिर पर एक हाथ मारा और अपनी श्वास सामान्य करने लगा।

साची अपना फोन उठाते…. "हां मम्मी, कहिए"

अनुपमा:- शादी से सब लौट आए बेटा तू कहां रह गई।

साची:- मां पनौती ही पनौती लगी थी। वहां तबीयत बिगड़ी और रास्ते में गाड़ी।

अनुपमा:- अरे ! कहां है बेटा, हम अा रहे हैं।

साची:- चिंता नहीं कीजिए मम्मी, अपस्यु है साथ मेरे।

अनुपमा:- अपस्यु ? वो कहां मिल गया तुझे…

साची:- एक तो मैं अकेली लड़की रात के 12.30 बजे वीराने में फस गई थी, उसकी आपको चिंता नहीं, बस अपस्यु के नाम से चौंक रही है। उसकी बहन कुंजल हॉस्पिटल में है और मेरी स्कूटी उसी हॉस्पिटल के थोड़े पीछे खराब हो गई। जब मैं स्कूटी खींच कर ला रही थी तभी अपस्यु मिल गया। और कुछ जानना है, या नहीं यदि शक दूर करना है तो अा जाओ यहीं।

अनुपमा:- कितनी झल्ली है तू साची। उसके सामने ही सबकुछ बोल दी पागल। सुनेगा तो क्या सोचेगा।

साची:- सॉरी मम्मी, ये तो सोची ही नहीं।

अनुपमा:- पागल, दे उसे फोन…

साची अपस्यु के ओर फोन बढ़ती हुई कहने लगी…. "लो मम्मी तुमसे बात करेंगी"

अपस्यु :- जी आंटी नमस्ते।

अनुपमा:- हां नमस्ते बेटा। माफ़ करना बेटा उसमे थोड़ी समझदारी कि कमी है। मैंने उससे बस चिंता में पूछी और उसने ना जाने क्या-क्या कह दिया।

अपस्यु :- कोई बात नहीं है आंटी। आप को इतना सोचने कि कोई जरूरत नहीं।

अनुपमा:- थैंक्स बेटा। साची कह रही थी तुम्हारी बहन हॉस्पिटल में एडमिट है। कोई चिंता का विषय तो नहीं।

अपस्यु :- नहीं आंटी कोई चिंता की बात नहीं है। वो आज कल की लड़कियों में फ़ैशन सा नहीं अा गया है जीरो फिगर वाला बस उसी का चक्कर है सब।

अनुपमा:- बताओ ! मैं सोचती थी मेरे घर का ही ये हाल है यहां तो सब पगलाई है। पता नहीं लकड़ी वाला फिगर पाकर, कौन सा तीर मार लेंगी। मैं इतनी मोटी हो गई हूं, लेकिन आज भी मेरे हसबैंड की शायरी इसी फिगर को देखकर निकलती है। ये लोग भी ना केवल दिखावे में जी रही हैं। ओह ! सॉरी बेटा मै भी ना तुम्हे बस सुनाए ही जा रही हूं।

अपस्यु :- कोई बात नहीं आंटी, आप को सुनने के बाद लगता है किसी दिन पूरा सुन लूं।

अनुपमा:- बहुत प्यारी बातें करते हो बेटा। अच्छी परवरिश हुई हैं तुम्हारी। अच्छा सुनो बेटा रात बहुत हो गई है क्या तुम साची को घर तक छोड़ दोगे।

अपस्यु :- जी बिल्कुल आंटी। बस 5 मिनट का तो रास्ता है।

कॉल डिस्कनेक्ट हुआ और अपस्यु ने साची को उसका फोन देते हुए कहा… "तो मैडम शादी अटेंड करने गई थी।

साची, अपस्यु को ध्यान से देखती हुई…. "आज की बात अधूरी रह गई, यहां से फुर्सत हो जाओ फिर हम इस अधूरी बात को पूरा करेंगे। और हां सही कहा था तुमने जो मज़ा आमने-सामने की बातों का है वो फोन कॉल पर कभी नहीं हो सकती। अब चले सर"

साची, अपस्यु के साथ कार में बैठ गई। दोनों के बीच पूरे रास्ते खामोशी ही रही लेकिन बार-बार एक दूसरे को देखना और देख कर प्यार से मुस्कुरा देना अपनी अलग ही छाप छोड़ रही थी, जिसमें शायद शब्दों का कोई काम ही नही। अनुपमा पहले से ही बाहर खड़ी थी, उसने अपस्यु को अपना आभार व्यक्त की और दोनों मां-बेटी अंदर चले गए।

कुंजल को वहां 2 दिन और रुकना पड़ गया। डिस्चार्ज से पहले डॉक्टर ने खुद मुलाकात कि अपस्यु से और उन्होंने समझते हुए कहा…. "आने वाला एक महीना बहुत ही भारी होगा कुंजल के लिए। वो खुद तो कोशिश कर ही रही है लेकिन ऐसे केस में फैमिली कि बहुत इंपॉर्टेंस होती है इसलिए इसका अच्छे से ख्याल रखना। दवाई टाइम से देते रहना और केस अगर ना संभले तो बेहतर होगा रेहबिलेशन सेंटर भेज देना।"

अपस्यु ने डॉक्टर को धन्यवाद कहा और हॉस्पिटल से निकलने से पहले अराव को सूचित कर दिया। अपस्यु और कुंजल कुछ ही देर में घर के दरवाजे पर थे। कुंजल ने जैसे ही हॉल में अपना कदम रखा .. बूम-बूम धमाके की आवाज हुई .. चारो ओर लाल हरी चमकीली बारिश होने लगी.. सामने लगी बड़ी सी स्क्रीन पर कुंजल की प्यारी तस्वीर आने लगी। उसपर बड़े और बोल्ड अक्षोरों में लिखा आने लगा…. "Welcome Back, The Real Hero Of This House"

अगले कुछ दिनों तक सबने जैसी छुट्टी ले रखी हो, कोई घर से बाहर ही नहीं निकला। सुबह के 4 बजे से दिन शुरू होता, वर्कआउट फिर से अपनी रूटीन में शुरू हो चुकी थी। उसके बाद सरा दिन फैमिली के साथ मस्ती मज़ाक और ढेर सारी बातें। इस बीच अराव और लावणी की थोड़ी बहुत बातें होती रही, उसने भी खुशी के साथ ये कह दी थी "अभी पूरा समय उधर ही देना"। लेकिन हॉस्पिटल के उस रात के बाद साची ने अबतक अपस्यु से एक बार भी संपर्क नहीं किया था।

रविवार की सुबह थी, वर्कआउट के बाद तीनों भाई बहन हॉल में ही हल्ला-गुल्ला मचा रहे थे। आपस में इतने मशगूल थे कि किसी को घर की घंटी भी नहीं सुनाई दी। नंदनी ने जैसे ही दरवाजा खोला सामने कुछ मेहमान थे। कुछ जाने पहचाने चेहरे तो कुछ अनजान चेहरे… "जी हम अंदर अा सकते हैं क्या?"
 
Update:-38

रविवार की सुबह थी, वर्कआउट के बाद तीनों भाई बहन हॉल में ही हल्ला-गुल्ला मचा रहे थे। आपस में इतने मशगूल थे कि किसी को घर की घंटी भी नहीं सुनाई दी। नंदनी ने जैसे ही दरवाजा खोला सामने कुछ मेहमान थे। कुछ जाने पहचाने चेहरे तो कुछ अनजान चेहरे… "जी हम अंदर अा सकते हैं क्या?"

सामने पूरी मिश्रा फैमिली थी। नंदनी सबका स्वागत करती सबको हॉल में लेे अाई। एयरपोर्ट के बाद यह पहला अवसर था जब राजीव आरव को देख रहा था। इधर तीनों भाई बहन आपस में ही लगे थे तभी कुंजल की नजर सामने आए मेहमानों पर गई और वो तेजी से भागकर अपने कमरे में चली गई।

इधर कुछ पल बाद अपस्यु और अराव को भी पता चला की घर में मेहमान आए हुए हैं तो वो भी वहां से अपने कमरे कि ओर तेजी से निकले। इसी क्रम में जब अपस्यु साची के पास से गुजरा तब साची ने पलट कर उसे आंख मेरी और होंठों से हवा में एक चुम्मा उसकी ओर भेज दिया।

अपस्यु अपना सिर पीट कर कहने लगा…. "आज ये सबके सामने बवाल करवाएगी।"….. "मुझे तो लगता है यहां शादी की बातचीत शुरू करवाएगी।".. आरव ने हंसते हुए तंज कसा।

"आप का हॉल तो बहुत बड़ा है, यहां क्रिकेट भी खेला जा सकता है।" अनुपमा ने नंदनी से मज़ाक करती हुई कहीं।

हॉल में फिर सभी का जमावड़ा हुआ। तीन भाई बहन भी अपने कपड़े बदल कर हॉल में ही पहुंच चुके थे।"… कुछ औपचारिक परिचय के बाद, बातों का सिलसिला जब शुरू हुआ तब राजीव ने ही सबसे पहले मोर्चा संभल लिया और अपना पुराना गुस्सा निकालना शुरू कर दिया। आरव की बदतमीजियों का गुणगान बढ़-चढ़ कर करने लगा। सुलेखा भी इसमें उसका पूरा साथ दे रही थीं।

हालांकि अनुपमा ने दोनों को रोकने की नाकाम कोशिश तो की, लेकिन एक बार जब फ्लो और पिकअप पकड़ लिए तो बस पकड़ लिए। इसी क्रम में बेचारे आरव को नंदनी के हाथ का पहला झन्नाटेदार तमाचा लगा। आरव कुछ बोलने को हुआ, लेकिन जैसे ही उसने अपना मुंह खोला दूसरे गाल पर फिर से पाचों उंगलियों के निशान छाप दिए नंदनी ने और बिल्कुल शांत रहने के लिए बोल दी।

अपस्यु ने भी आखों से इशारा कर उसे शांत रहने कहा और खुद मामले को हाथ में लेते हुए कहने लगा… "उंकल इसने बदतमीजी की इसे थप्पड पड़ी। हवालात में भी डाला गया। भड़े एयरपोर्ट पर भी बैज्जती की गईं। क्या आप खुद की सजा जस्टिफाई कर सकते है, जब आपने आरव को बिना जाने, कॉलेज के फॉर्म जमा करने वाले दिन, गंदा खून और गंदी नाली का कीड़ा कहा था।…

अनुपमा क्या सोच कर यहां अाई थी और ये क्या होने लगा। नंदनी ने भी इस बात को भाप लिया और वो उठकर इस बार अपस्यु को एक थप्पड जड़ दी… "माफ़ कीजियेगा आप लोग। बच्चे हैं ना अभी उतनी समझदारी नहीं आई है। तुमलोग जाओ अपने-अपने कमरे दिखाओ अपने दोस्तों को, स्टडी की बातें करो… अब जाओ यहां खड़े मत रहो।

अनुपमा, नंदनी की समझदारी पर उसे मन ही मन धन्यवाद करने लगी। इधर गुस्से में लाल-पीला होते हुए आरव ने अपस्यु से कहा…. "जब बता ही रहे थे तो ये भी बता देते की मुझे मारने के लिए उसने गुंडे भी भेजे थे।"

अराव इतने गुस्से में था की उसे ये भी समझ में नहीं आया कि उसके साथ-साथ कुंजल, लावणी और साची भी चल रही थी। अब तक ये लोग चलते-चलते हॉल के दूसरे हिस्से में अा चुके थे…. जैसे ही ये बात सबके कानो में गई एक ही वक़्त पर एक साथ सबकी प्रतिक्रिया अा चुकी थी….

अपस्यु:- तू गुस्से में है मेरे भाई थोड़ा शांत हो जा।

कुंजल:- इतनी बड़ी बात और मुझे पता तक नहीं।

लावणी:- क्या मेरे पापा ने ऐसा करवाया था?

साची:- ये झूट बोल रहा है

सब अपनी-अपनी बात कहकर एक दूसरे का मुंह देखने लगे। तभी साची, अपस्यु के करीब पहुंचकर कहने लगी…. "ये लोग इतिहास वाले लोग है बीती बातों का अध्यन करेंगे, हम चलते हैं तुम्हारे कमरे। मैं भी देखना चाहूंगी एक साहित्य भक्त का कमरा कैसा दिखता है।"

अपस्यु, को साची की बात कुछ हद ठीक लगी, यहां रुके तो बातें बढ़ेगी इसलिए वो दोनों चल दिए। इधर आरव, लावणी से कहने लगा… "तुम इतिहास कि स्टूडेंट हो ना तो चलो, हम दोनों मेरे कमरे में चलकर तुम्हारे पापा ने ऐसा क्यों किया उसपर चर्चा करते है।" आरव की बात सुनकर लावणी को हंसी अा गई और वो दोनों भी निकल लिए।

हॉल के उस हिस्से में अकेली खड़ी रह गई कुंजल… खड़ी होकर खुद से ही कहने लगी…. "काश इन दोनों बहनों का कोई भाई यहां होता, मैं भी उसे अपना कमरा दिखाने लेे जाती। कोई नहीं बहन कि सेवा बहुत कर ली मेरे भाइयों ने अब उनके साथ भी थोड़ा वक़्त बीता लें, तबतक मैं ट्रेनिंग एरिया ही हो आती हूं।"

आरव और लावणी…

दोनों कमरे के अंदर आते ही, आरव ने लावणी को जोड़ से गले लगा लिया। लावणी कसमसाती हुई उस पीछे धकेलती…. "अराव प्लीज़ नहीं ना।"

अराव:- क्या नहीं ना।

लावणी:- वहीं गले लगाना।

अराव:- लेकिन मेरा मन है बेबी।

लावणी:- अभी नहीं पहले मुझे ये बताओ जो तुमने कहा क्या वो सच था?

आरव:- क्या तुमने अपने पापा को उस दिन एयरपोर्ट पर नहीं सुना था।

लावणी:- क्या सच में आरव।

आरव:- मुझे गले लगा कर दिलाशा दो ना लावणी। मेरे ससुर जी ने मेरे साथ ऐसा करवाया इस बात से हताश हूं मै।

लावणी:- मुझे नहीं सुनना अब इस बारे में, तुमने भी गलती कि और उन्होंने भी। हालांकि उनकी गलती कुछ ज्यादा ही बड़ी थी। सो अब बात को खत्म करो।

आरव:- उसकी फीस लगेगी, एक किस।

लावणी आरव के चेहरे को देखती हुई थोड़ी मायूस होकर कहने लगी…. "जानते हो कभी-कभी ऐसा लगता है तुम बहुत दूर किसी ख्वाब कि तरह हो आरव। डर हमेशा इस बात का सताता रहता है कि तुम जैसा टॉल, हैंडसम और रिच लड़का जिसके पीछे दिल्ली की कोई भी हॉट लड़की अा सकती है उसका रिश्ता मुझ जैसी एवरेज लड़की के साथ कितने दिन चलेगा"

आरव उसे अपने बिस्तर के किनारे बिठा कर खुद घुटनों के बल फर्श पर बैठ गया। उसके हाथों को अपने हाथों में थामते हुए कहने लगा…. "तुम्हारे साथ मुस्कुराते हुए मैं हर वक़्त काट लूंगा बाकी मुझे बातें नहीं बनानी आती है करूंगा, वो करूंगा, चांद तारे तोड़ कर क़दमों में रख दूंगा। चलो अब ये अपना सिकुड़ा हुए चेहरे पर हंसी की फुलझड़ी जलाओ"

लावणी, अपने माथे को आरव के माथे से टिकाकर कहने लगी…. "ये बड़ी-बड़ी बातें करते हुए तुम बिल्कुल अच्छे नहीं लगते आरव। तुम मुझे छेड़ने, और इधर उधर छूने वाले आरव ही बने रहो"….

एक दूसरे को मेहसूस करते हुए दोनों के होंठ जुड़ते चले गए। प्रेम रस में डूबकर दोनों एक दूसरे को उत्सुकता के साथ चूमते चले जा रहे थे। …. "आव…." लावणी मीठे दर्द में थोड़ा चिल्लाई और आरव को धक्का देकर खुद से अलग करती हुई कहने लगी…. "बेशर्म कहीं के, कुछ तो शर्म करो, पूरा परिवार नीचे बैठा है।" …. शादी के बाद यही पूरा परिवार इसी बिस्तर को सजाकर मुझे तुम्हारे पास भेजेगा लावणी।"..… "तुम से तो बात करना ही बेकार है। बेशर्म थे और हमेशा बेशर्म ही रहोगे।"…

खिलखिलाती हंसी के साथ छेड़-छाड़ इन दोनों के बीच चलती ही रही। इधर अपस्यु और साची जैसे ही दोनों अंदर आए, साची उसके कमरे को देखती हुई कहने लगी…. "किसी ने आज तक तुमसे कहा है क्या की तुम बहुत गहरे इंसान हो जो रहता डार्क में है लेकिन ताकता उजाले को है।"

अपस्यु, हैरानी से उसका चेहरा देखते हुए…. "तुम कौन हो"

साची:- मैं समझी नहीं?

अपस्यु:- मेरे कमरे की एक झलक तो देखी तुमने और इस दीवार पर लगे पेंट की कहानी पढ़ ली। तुम कोई साधारण मनुष्य तो नहीं लगती।

साची:- ऐसा तो कोई भी कर सकता है।

अपस्यु उसके जवाब पर थोड़ा मुस्कुराया और कहने लगा…. "तुम में जितनी नादानियां है, उतनी ही संजीदगी भी हैं। या फिर वो रंग जो तुम्हारे गहराइयों में है कहीं, उसी का प्रयोग करके तुम सुनिश्चित करती हो की किसके साथ कैसे पेश आना है। एक ही वक़्त पर तुम गंभीर और मजाकिया दोनों हो सकती हो बस अलग-अलग पहलुओं में तुम्हारा अलग-अलग रंग दिखेगा.. फिर भी एक कमी है… गुस्सा तीव्र है और भाषा में शब्दों के प्रयोग पर नियंत्रण नहीं है इसलिए शायद जब गुस्से में होती हो तो कुछ भी बोल जाती हो…

साची, अपस्यु को धक्का देकर दीवाल में चिपका दी और अपने दोनों हाथ उसके सिर के आजू-बाजू टीका कर…. "जब मेरे बारे में बोलते हो तो अच्छा लगता है। हां ये कहना ग़लत नहीं होगा तुम में शेरलॉक होल्म्स, जम्स बोंड और बहुत से जासूसी किरदारों के साथ-साथ कई सारे बाबाओं कि आत्मा भी समाई है। मेरे एक छोटे से ऑब्जर्वेशन पर इतना बड़ा लैक्चर दे डाला।"….

अपनी बात कहती हुई साची धीरे-धीरे आगे भी बढ़ती जा रही थी। अपस्यु जो पहले से दीवार से चिपका था वो और कहां से पीछे जाता… हालांकि कोई बड़ी बात नहीं थी उसका यहां से निकालना, बस थोड़े जोड़ लगाने कि देर थी और साची किनारे। लेकिन अपस्यु शायद साची को अलग करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पा रहा था। बेबस, बस पीछे हटने की कोशिश कर तो रहा था, लेकिन अब दीवार तो वो खिस्का नहीं सकता था इसलिए श्वास रोक कर पेट को ही पीठ से चिपकाने कि कोशिश में जुटा हुआ था… और साची आगे आते-आते इतना उसके ऊपर अा चुकी थी कि बस उसके होंठ से होंठ नहीं मिले थे, क्योंकि वो अभी बोल रही थी वरना शरीर तो पूरा उसी के ऊपर था…

साची अब भी आगे बढ़ती हुई बोल ही रही थी… मेरे एक छोटे से ऑब्जर्वेशन पर इतना बड़ा लैक्चर दे डाला।"…. ये सब तो मैं बर्दास्त कर लूंगी। लेकिन ये जो तुम मुझे पप्पी देने ने कंजूसी करते हो ना ये मुझसे बर्दास्त नहीं होता…

साची चूमने के लिए अपने होंठ आगे बढ़ा ही रही होती है कि पीछे से कुंजल के गले की खराश की आवाज़ आती है… साची अब भी अपने होंठ आगे बढ़ाए जा रही थी…

अपस्यु, कुंजल की आवाज़ सुनकर अपना चेहरा उसकी ओर घुमाते हुए अपने मुंह से कुछ बोलने की कोशिश की, जो सुनने में कुछ इस तरह से निकलकर अाई……"कूं .. अा .. है।"… साची उसके बाएं घूमे गर्दन को बिल्कुल मध्य में करती हुई…. "आज तो ये किस हो ही जाने दो बेबी"…. अपस्यु अपना गला साफ करते हुए जोर से बोला… "कुंजल अाई है"…

साची अपना एक हाथ नीचे ले जाकर उंगली के इशारे से कुंजल को बिस्तर पर बैठने के लिए कहीं.. वहीं सामने देखते हुए अपस्यु से कहने लगी… उसके सामने जब मैं तुम्हे अपनी नफरत दिखा सकती हूं तो प्यार क्यों नहीं।"

अपस्यु उसे धक्के देकर किनारे किया और वो कमरे से नजरें चुरा कर भागने लगा। तभी कुंजल उसे रोकती हुई फोन आगे बढ़ा दी और कहने लगी… "सिन्हा अंकल का बार-बार कॉल अा रहा था। कुछ जरूरी होगा बात कर लो। अपस्यु कॉल लगाते हुए भागा वहां से….

"आज शाम 7 बजे से मेरे ऑफिस में मीटिंग है। सहर के बड़े-बड़े लोग होंगे और मुद्दा है तीन दिन पहले हुए कांड का… कोई चूक ना हो और तैयारी पूरी रहे। समय पर अा जाना।"… सिन्हा जी ने दूसरी ओर से सूचना दे दी।

इधर कमरे के अंदर साची और कुंजल रह गए थे। अपस्यु के जाते ही कुंजल बस चंद सेकंड वहां रुकी और साची से बिना कोई बात किए वह उठकर जाने लगी… उसे जाते हुए देख साची मायूस होती कहने लगी….

यूं तो बुरे हम भी नहीं, बस वक़्त बुरा हुआ कुछ इस कदर

अब तो गर रोते भी है तो, उसमें भी ज़हर नजर आता है ।
 
Update:-39 (A)

कॉल डिस्कनेक्ट होने के बाद अपस्यु अपनी मां में पास आया और उसकी गोद में सर रखकर आखें मूंद लिया। नंदनी उसके बालों में हाथ फेरती हुई सभी लोगों से बात करने लगी। चर्चाओं का विषय आगे बढ़ रहा था इसी क्रम में नंदनी अपस्यु को जगाती हुई पूछने लगी, "क्या ये सच है?"

अपस्यु:- क्या मां मैं समझा नहीं।

अनुपमा:- तुमने हमारी एक भी बात नहीं सुनी क्या?

अपस्यु :- माफ़ कीजियेगा आंटी, मेरी आंख लग गई थी।

राजीव:- सुनकर अनजान बन रहा है। इसने केवल कहानी गढ़ी होगी। साची ने मुझसे कहा था और मैंने आफिस में यह बात उठाई थी। इसलिए सर ने अपने लड़के को उस कॉलेज से निकालकर कहीं और एडमिशन करवा दिया।

सुलेखा:- बिल्कुल सही कहे है जी, ये तो वही बात हो गई करे कोई और, और श्रेय कोई और लूट लेे। वैसे भी वो कहां इतने बड़े आदमी, इन जैसों की सुनेगे।

नंदनी:- हां शायद आप ने सही कहा।

अनुपमा:-:सब आपस में ही बोले जा रहे हैं कोई उसकी भी सुनेगा। बेटा हमे ये जानना है कि तुमने उस होम मिनिस्टर के बेटे को कैसे उस कॉलेज से और हमारे बच्चियों से दूर किया?

अपस्यु :- जाने भी दो ना आंटी, अंकल को अगर लगता है कि उन्होंने अपने ऑफिस में बात करके इस मामले को सुलझा दिया, तो ऐसा ही सही।

राजीव:- नहीं क्या मतलब है तुम्हारा, तुमने ये मामला निपटाया हैं। जानते भी हो वो कौन है। सेंट्रल होम मिनिस्टर। उनका रूतवा, उनकी पॉवर, और पूरे देश पर उनका कितना स्ट्रोंग होल्ड है तुम्हे पता भी है। गली के नेता नहीं है वो समझे।

अपस्यु :-:हां ठीक है ना अंकल मैं कहां कुछ बोल रहा हूं।

सुलेखा:- देखा दीदी कितना चालक बन रहा है ये। अभी इसने बोला था इनको (राजीव को) ताने मार कर, "इन्हे ऐसा लगता है तो यही सही।" कैसे पलटी मार गया अभी। बदतमीज है ये भी।

नंदनी:- अपस्यु चल मुझे बता क्या है पूरा मामला और एक भी शब्द झूट नहीं।

फिर से राजीव कुछ बोलना चाह रहा था इसपर अनुपमा उसे रोकती हुई कहने लगी…. "आप ही आप बोलते रहेंगे देवर जी, तो कैसे बात समझ में आएगी। उसे भी थोड़ा सुनते है। तुम बोलो बेटा।

अपस्यु :- कुछ नहीं आंटी, बस मैंने होम मिनिस्टर सर से एक मुलाकात किया। उन्हें पूरा मामला बताया। बहुत ही सरल और अच्छे इंसान है, उन्होंने भी मेरी बात को सुना और आश्वासन दिया कि अब दोबारा कोई समस्या नहीं होगी। और उन्होंने जो बोला वो किया।

राजीव:- झूट बोल रहा है ये। मै मान ही नहीं सकता।

सुलेखा:- इसे तो वहां के गेट आगे खड़ा ना होने दे, और कहता है मिलकर आया।

राजीव:- अभी दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। बोलो इससे अपनी बात साबित करे।

अपस्यु को हंसी अा गई इस बात पर और वो हंसते हुए कहने लगा…. "जी अंकल मैंने मां लिया, आप सही और मै गलत। यहां कोई अदालत चल रहा है क्या? अब मैं उनसे एक बार मिला हूं और मिलकर ये मामला निपटाया। वो कोई आम इंसान तो है नहीं की अभी के अभी आप को लेकर पहुंच जाऊं या फिर उन्हें कॉल ही लगा कर सच्चाई सामने रख दूं।

नंदनी जो अपने ही घर में शुरू से बेइज्जाती की घूंट पर घूंट पीए जा रही थी, उसको राजीव और सुलेखा का ऐसा रवाय्या बहुत खला। उन्होंने अपस्यु को गुस्से से देखती हुई कहने लगी…. "जब तुम कहते हो कि तुमने ये सब किया है तो फिर साबित करने में क्या परेशानी है?"

राजीव चुटकी लेते हुए…. रहने दीजिए बहन जी ये आज कल के लड़कों की यही समस्या है काम काम और डिंगे ज़्यादा।

अपस्यु:- ठीक है मुझे साबित करना है ना अभी हो जाएगा। राजीव अंकल उन्हीं के ऑफिस में है ना। तो उनसे कहिए कॉल लगाए गृह मंत्री आवास के किसी भी कर्मचारी या अधिकारी से जिनसे इनकी बात होती होगी। इनसे कहिए फोन स्पीकर पर डालकर पूछने… "कुछ दिन पहले कोई लड़का गृह मंत्री आवास में अाकर, होम मिनिस्टर के बेटे को उसी के सामने थप्पड भी लगाया था क्या… कहिए पूछने। लेकिन अभी मै एक बात बता देता हूं, वो होम मिनिस्टर है। और उन्हें यदि पता चला कि उनके बेटे के मार खाने की बात मैंने बाहर बताई है, तो वो मेरी इंक्वायरी करेंगे और मैं राजीव अंकल का नाम बोल दूंगा कि "इन्हे ही यकीन नहीं था और इनको ही कन्फर्मेशन चाहिए था, इसलिए मजबूरन मुझे ये सब बताना पड़ा।"

अनुपमा:- देवर जी अपस्यु कह रहा है मारकर आया है वो आप की बेटी और मेरी बेटी को परेशान करने वाले लड़के को, वो भी उसके बाप के सामने… और आप दोनों मियां बीवी को ये तक यकीन नहीं की वो होम मिनिस्टर से मिला भी है। अब आप की बारी है.. मैं भी आप का कलेजा देख लेती हूं कि आप ये बात उनके घर से पता लगा सकते है या नहीं।

राजीव पूरे विश्वास के साथ अपना फोन निकलते हुए अपस्यु को झूठा कहा और फोन स्पीकर पर डाल कर उसने कॉल लगा दिया। नाम था शुक्ला जी (पी ए)…

"कैसे है मिश्रा जी, बहुत दिनों के बाद याद किए"

"कुछ नहीं शुक्ला जी, मुझे कुछ जानकारी चाहिए थी"

"कैसी जानकारी मिश्रा जी, पूछिए ना। हम तो हमेशा है आप की सेवा में।"

"शुक्ला जी अभी कुछ दिन पहले, वहां सर के निवास पर कोई कांड हुए था क्या?"

"कैसी बात आप कर रहे है मिश्रा जी। सेंट्रल होम मिनिस्टर के दरवाजे तक कोई कांड करने वाला नहीं पहुंच सकता आप तो घर के अंदर के कांड के बारे में पूछ रहे है। आज दिन में ही चढ़ा लिए है क्या?"

राजीव अपस्यु के ओर देखते, जैसे विजई मुस्कान दे रहा हो…. "अरे ऐसी कोई बात नहीं है शुक्ला जी बस ऐसे ही पूछ रहा था। उड़ती-उड़ती खबर थी कि कोई 22-23 साल का लड़का सर के बेटे को उन्हीं के सामने थप्पड मार कर गया है।"

"धीरे बोलिए मिश्रा जी, कहीं किसी ने सुन लिया ना तो सर हम दोनों की नौकरी खा जाएंगे। इस बात को यहीं खत्म कीजिए। दोबारा चर्चा भी नहीं कीजिएगा।"

राजीव की शक्ल देखने लायक थी। खुद की बे इज्जति करवाना किसे कहते हैं उसका प्रत्यक्ष उदहारण सामने था। नंदनी और अनुपमा मंद-मंद मुस्कुरा रही थी और उन्हें जैसे गर्व मेहसूस हो रहा हो… "साबाश बेटा क्या काम किया है।" इधर राजीव और सुलेखा अपना मुंह छिपा रहे थे। राजीव ने तुरंत लावणी और साची को आवाज़ लगाया और बड़े ही प्यार से नंदनी से जाने की इजाज़त भी मांगी।

लावणी तो दौड़ कर चली आई लेकिन साची अब भी कुंजल के साथ शायद बातें कर रही थी। अनुपमा ने राजीव से कहा रहने दो वो अा जाएगी और सब वहां से चलने लगे। जाते-जाते अनुपमा, अपस्यु के बालों में हाथ फेरती उसे दिल से धन्यवाद कहीं और अपने घर लौट आई।

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यूं तो बुरे हम भी नहीं, बस वक़्त बुरा हुआ कुछ इस कदर

अब तो गर रोते भी है तो, उसमें भी ज़हर नजर आता है ।

कुंजल के बढ़ते कदम रुक गए वो पलट कर वापस आयी और साची के पास बैठ गई। थोड़ी देर दोनों के बीच खामोशी रही फिर साची ने बोलना शुरू किया…. "लगता है मुझ से मेरी खुश नाराज हो गई है या फिर मैं ही दिल बहलाने के लिए उसे नाराज समझ रही हूं। क्योंकि अगर कोई नाराज हो तो मनाया भी का सकता है लेकिन मुझ से तो मेरी खुशी ही दूर हो गई है।"

कुंजल:- इतनी मायूस नहीं होते साची वक़्त हर मरहम की दवा है। समय के साथ सब ठीक हो जाता है।

साची:- वक़्त !! हाहाहाहाहा … हर बीते वक़्त के साथ तो मैं उसके लिए कोई आम सी लड़की होती जा रही हूं। एक अनजान जिसके बारे में ना सोचते हैं ना बात करते है। सड़क पर इधर से उधर करते जैसे कई इंसान दिख जाते है जिनके लिए क्या फीलिंग हो।

कुंजल:- क्या हुआ है तुम्हे साची। अभी कुछ देर पहले तो कितनी खिली सी थी बस कुछ ही पल में इतनी डिप्रेस कैसे हो सकती हो।

साची:- उसकी हर अदा निराली है। पास होकर भी मेरे पास नहीं। बात भी करता है और दिल भी नहीं दुखाता, लेकिन फिर भी पिरा दे जाता है। वो मुझ से ना ही नफरत करता है और ना ही प्यार। कोई तो भावना दिखाता। नफरत करता तो नफरत को प्यार में बदलने कि कोशिश करती। प्यार करता तो प्यार की बरिशें ऐसी करती की फिर कोई गिला शिकवा न होता। कुछ तो भावना होती उसकी मेरे लिए…

कुंजल:- साची प्लीज तुम रोना बंद करो और पूरी बात बताओ।

साची, अपने आशु पोछती… "सॉरी कुंजल, मैं शायद भावनाओ में बह गई थी। चलती हूं, सब बाहर इंतजार कर रहे होंगे…

कुंजल अपनी आखें दिखाती….. बैठी रहो चुपचाप। अब आराम से अपनी पूरी बात कहो। कभी-कभी दिल के दर्द को सुना देना चाहिए, अच्छा लगेगा। मुझे लगता नहीं तुम्हारी कोई अच्छी दोस्त यहां है इसलिए तुम्हारी हालत ऐसी है। अब बताओ भी…

साची कुंजल की बात पर अपनी चुप्पी साधे रही… वो बात तो करना चाहती थी लेकिन हाल-ए-दिल साझा करने का मन नहीं था। बहुत पूछने के बाद भी जब साची चुप ही रही। कुंजल को उसकी दशा पर बहुत ही तरस आने लगा। वजह भले अलग हो, लेकिन जिस तरह का तनाव और अकेलापन कभी कुंजल ने झेला था उसे वो साची में देख रही थी।

वो उस मनोदशा को भांप रही थी जिससे कभी कुंजल कभी गुजर चुकी थी। इसलिए कुंजल ने अपनी कहानी उसे बताना शुरू किया। पारिवारिक आंतरिक मामला क्या था वो तो नहीं बताई लेकिन उसके इस तनाव ने किस मोड़ पर उसे लाकर खड़ा कर दिया सब बयां कर गई। साची बड़े ध्यान से कुंजल को सुन रही थी और जैसे-जैसे उसके बारे में पता चलता जा रहा था वो हैरानी से बस कुंजल को ही देखती रही….

पूरी बात सुनने के बाद साची को भी अपना वर्तमान कुंजल के अतीत जैसा लगने लगा। उसने भी अपनी चुप्पी तोड़ी और अपना हाल-ए-दिल बयान करना शुरू किया….

किस्सा मै क्या बताऊं तुम्हे हाल-ए-दिल का

अपने ही नजरिए ने मुझे अपने नजरों में गिरा दिया।

कहां से शुरू करूं पता नहीं, लेकिन जो भी मेरे साथ हो रहा है वो अच्छा ही हो रहा है। मै इसी योग्य हूं। कुछ दिन पहले की ही तो बात है.. मेरे अरमानों के पंख लगने शुरू हुए थे और वो खुले आसमानों में उड़ने को भी तैयार थे।

यह वो दिन था जब मुझे अपस्यु सरप्राइज देने वाला था। इससे पहले हम दोनों यहीं नीचे हॉल में मिला करते थे। कई हसीन लम्हे और कई सारी प्यारी बातें थी। शायद अपस्यु मेरे मन की भावना को जानता था, उसे मेरे दिल का हाल भी पता था। वो जनता था मै उससे पहल कि उम्मीद लगाए बैठी हूं और मेरी भावनाओ को ध्यान में रखकर उसने रात में संदेश भेजा था.. "कल तुम्हारे लिए सरप्राइज है।"

रात आखों में ही बीती, ये शायद मेरी पहली भूल थी क्योंकि ठीक से सोती तो शायद मेरी बुद्धि भी ठीक से काम करती लेकिन दिल के हाथों मजबुर और आने वाले दिन के सरप्राइज को मै अपने दिमाग में संजोने लगी। वो रात बहुत प्यारी थी और अरमान अपने पंख लगाए उड़ रहे थे। मैं अकेले में खुद से ही बात कर रही थी…

कल मुझे बाहों में भर कर वो मेरी आखों में आखें डाल कर मेरे होठों को चूमते हुए सरप्राइज देगा जिसमे आखों से इजहार होगा। या फिर वो थ्री पीस सूट पहने होगा। मैंने तो सूट का रंग भी सोच रखा था गहरे नीले रंग का सूट, अपस्यु के प्रेसनलीटी पर खूब जचता। हाथो में फूलों का गुलदस्ता लिए जिसमे गुलाब मोग्रा और तरह-तरह के फूल होते। वो अपने घुटने पर बैठकर इजहार करता।

प्यार समा था वो भी। सुबह तक सबकुछ प्यारा था। उसमे चार चांद तब लग गया जब पता चला अपस्यु बिल्कुल ठीक है। मेरी खुशी का ठिकाना ना रहा। मुझे लगा अब शायद घुटनों पर बैठकर, वाला इजहार होगा। लेकिन तभी दिल में टीस लगी और सोची की ऐसा कुछ माहौल बना तो उसे मै किस वाले सीन में कन्वर्ट करूंगी। अभी-अभी तो उसकी चोट ठीक हुई थी कैसे वो घुटनों पर बैठ जाता।

सुबह का वक़्त नहीं कट रहा था और मै उन्हें रिझाने के लिए दिल से तैयार हो रही थी। यहां तक सब कुछ प्यारा चल रहा था। हमारी सुबह कि मुलाकात हुई और आखों में सपने लिए मैं, अपस्यु के साथ नए उड़ान भरने के लिए तैयार थी। लेकिन पहला ही घटना कॉलेज के मुख्य द्वार पर हो गई।
 
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